विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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१५० : विज्ञानभैरव तत्त्वज्ञानी को यह प्रतीत होने लगता है कि जो ज्ञान है, वही ज्ञेय अथवा ज्ञाता भी है। सब कुछ प्रकाशात्मक शिवमय है। इस प्रकार के ज्ञान का उन्मेष होने पर साधक शिव बन जाता है ॥१३४॥ [धारणा-११२] ¹मानसं चेतना शक्तिरात्मा चेति चतुष्टयम् । यथा प्रिये परिक्षीणं तथा तद्भैरवं वपुः ॥१३५॥ हे प्रिये, मानसं संकल्पात्मकं मनः, चेतना बुद्धिः, शक्तिः प्राणाख्या, आत्मा एतदुपहितो जीवः परिमितप्रमाता-इत्येतच्चतुष्टयं यदा परिक्षीणं चिच्चमत्कारता- मापन्नं तदा तत् पूर्वोक्तं भैरवं वपुः परभैरवस्वरूपम्, व्यज्यत इति शेषः । एतच्चतुष्टय- मुपाधिमयं मायीयोपाधिगलनाद् यदा क्षीयते, तदा चिच्छेषतया हिमनिर्मुक्तभास्करवत् प्रकाशमानः प्रकाश एवावशिष्यत इति दृढानुभवसमधिगमात् साक्षाद् भैरव एव भवतीति भावः ॥१३५॥ हे प्रिये, संकल्पात्मक मन, चेतनात्मक बुद्धि, प्राणनामक शक्ति और इनसे उपहित परिमित प्रमाता—ये चारों जब सब तरह से विलीन हो जाते हैं, अर्थात् जब ये साधक को चिति के चमत्कारमात्र प्रतीत होने लगते हैं, तब वह “अन्तः स्वानुभवानन्दा” (श्लो० १५) इत्यादि ग्रन्थ से पूर्व प्रतिपादित भैरव स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। इसका अभिप्राय यह है कि साधक जब इन चारों स्थितियों को माया की उपाधि (उपज) मान लेता है, तो माया की अलीकता के आधार पर इन चारों स्वरूपों की स्थिति क्षीण हो जाती है और केवल चिति बच रहती है। इस स्थिति में साधक हिम (कुहरे) से निर्मुक्त सूर्य के समान मायीय आवरणों से निर्मुक्त चिति के प्रकाश से आलोकित हो उठता है, प्रकाशमय बन जाता है। अर्थात् इस तरह की भावना का दृढ़ अभ्यास करने पर साधक साक्षात् भैरव हो जाता है। इस प्रकार यहाँ निर्विकल्प अवस्था की प्राप्ति के लिये ११२ धारणाओं का वर्णन किया गया है। इनमें से किसी एक धारणा में चित्त को एकाग्र करने वाला साधक जीवन पर्यन्त ²जीवन्मुक्त दशा में रहता है और मृत्यु के उपरान्त विदेह-मुक्ति को प्राप्त करता है, अर्थात् परमेश्वर के स्वरूप से उसका स्वरूप अभिन्न हो जाने से वह ईश्वर बन जाता है। “न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति, अत्रैव समवलीयन्ते” (बृ० उ० ४।४।६) इस बृहदारण्यक श्रुति के अनुसार निष्कल ब्रह्म की उपासना करने वाला जीव कहीं आता-जाता नहीं है। पशु प्रमाता (अज्ञानी जीव) जैसे स्वर्ग या नरक में जाता है, अथवा जैसे सकल ब्रह्म का उपासक अर्चिरादि
- स्पन्दनिर्णय (पृ० २३) और शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ५१) में यह श्लोक प्रमाण रूप से उद्धृत है।
- विदेह-कैवल्य को ही विदेह-मुक्ति कहा जाता है, जिसकी कि चर्चा पहले (पृ० ११६) आ चुकी है। आगे भी (पृ० १५२ और १५४-१५५ में) जीवन्मुक्ति और विदेह-मुक्ति की व्याख्या की गई है।
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विज्ञानभैरव : १५१ मार्ग से ब्रह्मलोक में जाता है, उस तरह की गति अर्थात् उत्क्रमण निष्कल ब्रह्म के उपासक का नहीं होता, किन्तु उसके प्राण तो गरम तवे पर पड़ी पानी की बूँद की तरह वहीं लीन हो जाते हैं । यही स्थिति शास्त्र में— "जिज्ञासारहितं शुद्धं निर्विकल्पं परं परम्" जिज्ञासा रहित शुद्ध निर्विकल्पक परम पद के नाम से कही गई है । कठोपनिषद् में इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है— यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ।। (२।३।१०) अर्थात् जब जीव की पाचों ज्ञानेन्द्रियां मन के साथ स्थिर (निश्चल=निष्क्रिय) हो जाती हैं और बुद्धि भी काम करना बन्द कर देती है, तो इसी स्थिति को परम गति कहा जाता है । यहाँ 'परम गति' शब्द से प्रतिपादित स्थिति और पहले बताये गये भैरव के स्वरूप में (भैरवी मुद्रा अथवा शाम्भवी मुद्रा में) कोई अन्तर नहीं है । यह स्थिति निष्कल ब्रह्म के उपासकों के लिये स्वतः सिद्ध है । इसके लिये मरने के बाद तिल, अन्न, मधु (शहत) आदि मिलाकर बनाये गये पिण्डों को देने की जरूरत नहीं रहती । इनकी आवश्यकता तो कार्म ¹मल से आवृत पशु (अज्ञ) जीवों के लिये ही है । सहज भाव से निष्कल ब्रह्म के उपासक साधक के लिये पूजा, जप, ध्यान आदि की परिभाषाएँ भी बदल जाती हैं, जैसा कि अभी आगे बताया जायगा । यहाँ स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जैसे साधक की जीवन्मुक्ति दशा में कर्तृत्व और ज्ञातृत्व की प्रतीति होती है, उसी तरह से मृत व्यक्ति में भी इनकी उपलब्धि क्यों नहीं होती ? इसका उत्तर यह है कि परमेश्वर नित्य एवं स्वतन्त्र है । उसका स्वातन्त्र्य यही है कि जब यह जीवदशा को प्राप्त कर लेता है, तो यह देह, इन्द्रिय प्रभृति खिलौनों से खेलने लगता है और जब कभी अपने स्वरूप में विश्रान्ति ले लेता है, तो वह बाह्य स्पन्दों का परित्याग कर स्वात्म-स्पन्द में ही प्रतिष्ठित हो जाता है, जैसा कि सुषुप्ति प्रभृति दशाओं में होता है । जब शरीर छूट जाता है, तो उस समय परात्मा अपने स्वातन्त्र्य के कारण कभी क्षुब्ध न होने वाली निष्क्रिय अवस्था को स्वीकार कर लेता है, अतः उस समय ज्ञातृत्व, कर्तृत्व आदि की उपलब्धि नहीं होती । जैसा कि भैरवस्रोत के ग्रन्थ अनुत्तरभट्टारक में कहा गया है—
- तत्त्वप्रकाशकार ने १८ वीं कारिका में मल का लक्षण बताया है कि मल एक है और अनेक प्रकार की शक्तियों से युक्त है । यह पुरुष की ज्ञान और क्रिया शक्ति को उसी तरह से ढक लेता है, जैसे कि भूसी चावल को और कालिमा तांबे को ढके रहती है । इस तरह से द्वैतवादी शैवों के यहाँ मल आत्मा में रहने वाला द्रव्यविशेष माना गया है । अद्वैतवादी दार्शनिक ऐसा नहीं मानते । वे संसार के अनादि कारण अज्ञान को ही मल कहते हैं । यह मल तीन तरह का होता है— आणव, मायीय और कार्म । अणु (जीव) गत अज्ञान ही उसके परमार्थ स्वरूप को ढक लेता है । इसी को आणव मल कहते हैं । माया शक्ति के अधीन मल मायीय तथा पुण्य और पाप कर्मों की वासना से उत्पन्न मल कार्म मल कहलाता है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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१५२ : विज्ञानभैरव मृतचेष्टस्य पिण्डस्य न किञ्चिदुपलभ्यते । सुखं दुःखं न चैवास्ति परमानन्दभावनात् ॥ जिज्ञासारहितं स्थानं यत्र देवो निरञ्जनः । अकालकलनाहेतुर्गमागमविवर्जितः ॥ निरालम्बो निरुत्साहः शून्यभूतः शिवः स्वयम् । संज्ञानाशेन निर्जीवसंज्ञा सा व्योमरूपिणी ॥ अर्थात् प्राण-पखेरु के उड़ जाने से जिसकी सारी चेष्टाएँ समाप्त हो गई हैं, ऐसे मृत शरीर को कुछ भी बोध नहीं होता, न तो उसको सुख का अनुभव होता है और न दुःख का ही, क्योंकि वह तो परम आनन्द की भावना में लीन हो गया है । वह उस जिज्ञासारहित स्थान पर पहुँच जाता है, जहाँ पर कि काल की कलना और आवागमन से रहित, निरालम्ब, निरुत्साह, शून्यस्वरूप, निरंजन देव शिव स्वयं निवास करते हैं । संज्ञा के नष्ट हो जाने पर शरीर निर्जीव हो जाता है, किन्तु इस दशा में वह आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त हो जाता है । इसी प्रसंग में शिव ने देवी को यह भी कहा है— विचरामि न चैकाकी कदाचिच्छून्यरूपता । सर्वं सर्वमयश्चाहं तद् रमेऽहं त्वया सह ॥ कदाचिदीदृशं विश्वं दृश्यमेतदितीरितम् । अर्थात् मैं कभी अकेला नहीं रहता, तब भी कभी-कभी शून्य स्वरूप हो जाता हूँ । मैं सब कुछ हूँ । यह सब कुछ मेरा ही स्वरूप है । मैं जब तुम्हारे साथ विहार करता हूँ, तभी कदाचित् यह जगत् दृश्य के रूप में परिणत हो जाता है । देहपात के अनन्तर भी देह में आत्मा की स्थिति मानने के ही कारण जैमिनीय शाखा वाले अन्त्येष्टि संस्कार के समय निर्जीव पिण्ड में भी विष्णुसंबंधी २१ स्नानों का विधान करते हैं । ऐसा न मानने पर “अविनाशी वा अरेऽयमात्मा” (बृ० उ० ४।५।१४), “नित्यो नित्यानाम्” (क० उ० २।२।१३), “न जहाति मृतं चापि सर्वव्यापी धनञ्जयः” (यो० चू० उ० २६) इत्यादि वचन प्रामाणिक नहीं रह जायेंगे । इस लिये मृत्यु के उपरान्त भी भैरव शरीर निर्विकल्प अवस्था में विद्यमान रहता है, इस बात को मानने में कोई दोष नहीं प्रतीत होता । इस निर्विकल्प भैरवावस्था में नित्य प्रविष्ट होने से इस रहस्य मार्ग का अनुसरण करने वाले व्यक्तियों के लिये तीर्थाटन आदि कर्मकाण्ड अनावश्यक हैं, इस बात को निम्न श्लोक में जयरथ ने भी कहा है— बहुलमहसि बोधे प्रोच्छलत्येकरूपे जननमरणभाषां कातराः कल्पयित्वा । अविदितपरमार्थस्तीर्थदेवालयादि- श्रयणमुपदिशन्तो हन्त ! नापत्रपन्ते ॥
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विज्ञानभैरव : १५३ अर्थात् महान् महिमाशाली एकरस बोधभैरव की विद्यमानता में भी कायर आदमी जन्म और मरण की कल्पना करके उससे मुक्ति पाने के लिये, परमार्थ तत्त्व का ज्ञान न होने से, तीर्थयात्रा, देवदर्शन आदि उपायों का उपदेश करते हुए लज्जित नहीं होते, हाय ! इससे बढ़कर दुःख की बात और क्या हो सकती है ? इस रहस्य मार्ग में श्रद्धा रखने वाले विवेकी पुरुष तो जीवन्मुक्ति को भी तुच्छ समझते हैं, तब वे पशुदर्शन की प्राणभूत अन्त्येष्टि संस्कार जैसी बातों की उपेक्षा कर दें, तो इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है ? जैसा कि निम्न श्लोक में बताया गया है— नयकलनया यस्योद्भूते विवेकपरामृते तृणमिव न सा जीवन्मुक्तिर्गता गणनीयताम् । प्रमयसमये प्रत्यासन्ने स्वसंविदि संस्फुरन् अभिलषति नैवान्त्येष्ट्याद्याः क्रियाः पशुकल्पिताः ॥ अर्थात् रहस्य शास्त्रों का अभ्यास करने से जिसको विवेकरूपी परम अमृत दशा प्राप्त हो गई है, उसको यह जीवन्मुक्ति तृण की तरह तुच्छ लगती है। मृत्यु का समय समीप आने पर अपने संवित्स्वरूप में विचरण करने वाला योगी पशुशास्त्रों में विहित अन्त्येष्टि संस्कार जैसे क्रियाकलापों की अभिलाषा नहीं रखता। मृत व्यक्ति को पिण्ड दान करने की बात भी उपहासास्पद है। जैसा कि कहा गया है— प्राग्जन्मकोटिसमुपार्जितदुष्कृतौघ- खेदावहं कमपि पिण्डमवैति जन्तुः । ऊर्ध्वोर्ध्वशासनरतोऽपि गुरुर्मूताय तस्मै समर्पयति पिण्डमिति प्रमादः ॥ अर्थात् पहले के करोड़ों जन्मों में इकट्ठे हुए पाप कर्मों के कारण प्राणी इस दुःख- दायी पिण्ड (शरीर) को पाता है। जब यह मर जाता है, अर्थात् जब इस पिण्ड से पिण्ड छूट जाता है, तब इस सर्वोत्कृष्ट शिवशास्त्र का अनुसरण करने वाला गुरु भी पुनः उसको पिण्ड देने की बात करे, तो इससे बढ़ कर प्रमाद की बात ओर क्या हो सकती है ? इस रहस्यशास्त्र का अभ्यास करने वाले साधक के लिये जन्म और मरण एक सरीखे हैं। ये जन्म-मरण शरीर के धर्म हैं, आत्मा के नहीं। भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय में इस विषय को विस्तार से समझाया गया है। छान्दोग्य श्रुति के निम्न वचन में भी यही बात कही गई है—‘‘जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते’’ (छा० उ० ६।११।३) । अर्थात् जीव (प्राण) से रहित शरीर को ही मरा हुआ कहा जाता है, जीव (आत्मा) कभी नहीं मरता । शान्त-तरंग समुद्र के समान मन को निश्चल कर देने वाली ऊपर उपदिष्ट ११२ धारणाओं में से किसी एक धारणा के अभ्यास से मन के निश्चल हो जाने पर योगी के चित्त में दो प्रकार की दशाएँ उत्पन्न होती हैं—देह के रहते जीवन्मुक्ति तथा देह के छूट जाने पर
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१५४ : विज्ञानभैरव विदेह-मुक्ति, जिनका कि अभी ऊपर निर्देश किया जा चुका है। इनमें से जीवन्मुक्ति दशा में मन, बुद्धि, प्राणशक्ति और आत्मा (परिमित अहन्ता)—ये चारों स्थितियाँ नष्ट हो जाती हैं, क्योंकि जीवन्मुक्त योगी सर्वत्र सदा चिन्मात्र दशा में ही सावधानी से पड़ा रहता है और यह समझता है कि यह सारा जागतिक प्रपंच उस चिति का ही चमत्कार है। इस स्थूल देह के छूट जाने पर उसको शान्त बोधस्वरूप दूसरे दिव्य देह की प्राप्ति होती है, क्योंकि वह तो परमेश्वर स्वरूप ही हो जाता है। उसको इस दूसरे देह तक उत्क्रमण की, (जाने की) आव- श्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि आत्मा तो सर्वत्र व्याप्त है, वह जायगा कहाँ ? जैसा कि वीर- यामल में कहा गया है— उत्क्रान्तिर्विद्यते यस्य तस्य स्यान्मानकल्पना । अमाने शून्यनिभसि कस्योत्क्रान्तिः क्व च क्रमेत् ॥ यदि सर्वगतो देवो वदोत्क्रम्य क्व यास्यति । अथासर्वगतो देवो घटतुल्यस्तदा भवेत् ॥ अर्थात् जिसकी उत्क्रान्ति हो, अर्थात् जो कहीं अन्यत्र जाता हो, उसको परिच्छिन्न ही मानना पड़ेगा। अपरिच्छिन्न, शून्यस्वभाव आत्मा की उत्क्रान्ति कैसे हो सकती है ? वह जायगा भी कहाँ ? यदि परमेश्वर सर्वगत है, तो यह बताया जाय कि वह कहाँ जायगा ? अब यदि वह असर्वगत माना जाता है, तब तो वह घड़े की तरह जड़ हो जायगा । मृत्यु के उपरान्त मुक्ति जीवन्मुक्त की ही होती है, देह को आत्मा मानने वाले और कर्मकाण्ड के अनुष्ठान में लगे रहने वाले अज्ञानी को यह मुक्ति नहीं मिल सकती । उसकी वासनाएँ मलिन हैं, अतः वह परलोक में ही जायगा । श्राद्ध करना, पिण्ड दान करना आदि उसी के लिये सहायक हो सकते हैं। देह में आत्मा के इस अभिमान की वासना का वर्णन श्रीमदाचार्य अभिनवगुप्त ने मालिनीवार्त्तिक में इस प्रकार किया है— अस्ति मे पिण्डदोऽद्याहं पिण्डदानक्रमात्तथा । प्राप्नोम्यवयवाभोगं पूर्णदेहोऽस्मि सुस्थितः ॥ अदृष्टक्रियया पुत्रशिष्यस्वाम्यादिकल्पतया । स्वर्गभाग्यहम त्यन्तमात्तसद्भोगसुस्थितः ॥ नास्ति मे पिण्डदः कश्चित् स्वयं चास्म्यतिदुष्कृती । न मे त्रातास्ति कुत्रापि पतामि नरकार्णवे ॥ (पृ० ९९) अर्थात् मुझे पिण्ड दान करने वाला कोई है। प्रतिदिन पिण्ड दान मिलने के ही कारण धीरे-धीरे एक अवयव का आकार प्राप्त करता हुआ अन्त में मैं सम्पूर्ण देह से परिपूर्ण सुव्यवस्थित हो गया हूँ। पुत्र, शिष्य, स्वामी आदि के द्वारा सम्पादित सत्कर्मों से उत्पन्न अदृष्ट के कारण आज मैं स्वर्ग का अधिकारी हो गया हूँ और अच्छे कर्मों का फल भोग रहा हूँ। मुझे कोई पिण्ड देने वाला नहीं है और मैं स्वयं बड़ा पापी हूँ। मेरा कोई रक्षक नहीं है। मैं घोर नरक में पड़ने वाला हूँ। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १५५ वस्तुतः यह अपनी संवित्ति का ही माहात्म्य है कि इस तरह से भ्रान्तिवश व्यक्ति स्वर्ग और नरक की कल्पना कर लेता है । इसमें वास्तविकता कुछ भी नहीं है । जिस व्यक्ति को इस स्थिति का ज्ञान हो जाता है, वह उक्त धारणाओं में से किसी एक में अपने मन को एकाग्र कर कृतकृत्य हो जाता है, अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है, उसका परमार्थ भैरव स्वरूप प्रकट हो जाता है । ॥१३५॥ निस्तरङ्गोपदेशानां शतमुक्तं समासतः । द्वादशाभ्यधिकं देवि यज्ज्ञात्वा ज्ञानविज्जनः ॥१३६॥ हे देवि, इत्थं मया समासतः संक्षेपेण ¹निस्तरङ्गोपदेशानां स्थिरधारोपदेशानां स्वात्ममात्रविश्रान्तिप्रदानां द्वादशाभ्यधिकं शतं द्वादशोत्तरशतमुक्तम् । एतदेव विज्ञाय जनो ज्ञानविद् भवति साक्षाद् भैरवसारूप्यमवैतीति तात्पर्यम् ॥१३६॥ देवी के द्वारा पूछे गये प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत कर इस प्रकरण का उपसंहार करते हुए भगवान् भैरव कहते हैं कि हे देवि, इस तरह से मैंने संक्षेप में यहां ११२ निर्विकल्पक धारणाओं का उपदेश किया है । ये सभी धारणाएँ साधक के चित्त को निस्तरंग (स्थिर) बना देने वाली हैं, जिससे कि उसकी स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठा हो जाती है । इन धारणाओं को ठीक से समझ लेने पर मनुष्य ज्ञानी हो जाता है, अर्थात् साक्षात् भैरव बन जाता है ॥१३६॥ अत्र चैकतमे युक्तो जायते भैरवः स्वयम् । वाचा करोति कर्माणि शापानुग्रहकारकः ॥१३७॥ अत्र च एकतमे एतेषु उपदेशेषु मध्ये एकस्मिन्नपि युक्तः समाहितः, एतासु धारणास्वन्यतमनिष्ठवान् मायीयोपाधिसंवलितवेद्यराशिपतितैन्द्रियगणोऽपि, वाचा कथनमात्रेण, न पुनः प्रयत्नेनेत्यर्थः, शापानुग्रहादिकार्याणि करोति । तत्रापि तथैव समाध्येकीभावनया तत्तदुज्झित्य निस्तरङ्गप्रकाशवान् स्वयं साक्षाद् भैरवो भवतीति निश्चयः ॥१३७॥ ऊपर बताये गये उपदेशों में से किसी एक में भी समाहित हो जाने वाला साधक, अर्थात् इन धारणाओं में से किसी एक का भी निष्ठापूर्वक अभ्यास करने वाला योगी, भले ही इस मायामय उपाधि से आविर्भूत जागतिक प्रपंच में रम रहा हो, बिना प्रयत्न के वचन मात्र से सब कुछ कर सकता है, किसी को भी शाप या वरदान देने में समर्थ हो सकता है । इस प्रकार की सामर्थ्य के आ जाने पर भी जो साधक इसका उपयोग न कर निरन्तर समाधि
- तन्त्रालोकविवेककार जयरथ ने 'निस्तरङ्ग' शब्द का अर्थ 'स्वात्मस्वरूप में विश्राम ले लेने के कारण शान्तस्वरूप' (निस्तरङ्गा स्वात्ममात्रविश्रान्त्या शान्तरूपेत्यर्थः—भा० ३, आ० ५, पृ० ३९९) ऐसा किया है । इन धारणाओं के अभ्यास से भी साधक स्वात्म- स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । अतः इन धारणाओं को निस्तरंग उपदेश बताना उचित ही है ।
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१५६ : विज्ञानभैरव में लीन बना रहता है, उसके चित्त में निस्तरंग (स्थिर) स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति हो जाती है, वह स्वयं साक्षात् भैरव बन जाता है, यह ध्रुव सत्य है ॥१३७॥ अजरामरतामेति सोऽणिमादिगुणैर्युतः¹। योगिनीनां प्रियो² देवि सर्वमेलापकाधिपः³ ॥१३८॥ जीवन्नपि विमुक्तोऽसौ कुर्वन्नपि न⁴ लिप्यते । हे देवि, स साधकः, उक्तधारणाभ्यासादार्ढ्येन अजरामरताम् एति प्राप्नोति, अणिमादिगुणैर्युतः सन् विज्ञानात्मकसोमपानाद् योगिनीनां ज्ञानक्रियानन्दादिशक्तीनां प्रियः सर्वमेलापकाधिपो भवति सकलस्यास्य वेद्यवेदकादिराशेः खिलीकृतस्वभावोऽत्यन्त- निर्मलचिद्वपुरद्वैतप्रकाशमयः परमात्मा भैरवः संपद्यत इति तात्पर्यार्थः । असौ स साधकः, जीवन्नपि विमुक्तो जीवन्मुक्त एव । पश्यन्नपि, शृण्वन्नपि, जिघ्रन्नपि इत्यादि चेष्टितं कुर्वन्नपि न लिप्यते । कर्माणि कुर्वन्नपि तत्फलैर्न लिप्यत इति भावः ॥१३८॥ श्रुति में देवताओं ने कहा है कि “सोमरस का पान कर हम अमर हो गये हैं”। जैसे देवगण सोमरस का पान कर अजर-अमर हो गये, उसी तरह से ऊपर बताई गई धारणाओं में दृढ़ अभ्यास से प्राप्त हुए विज्ञान रूपी सोमरस का पान कर योगी अजर और अमर हो जाता है। उसको अणिमा प्रभृति सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। वह ¹योगिनियों का, ज्ञान- क्रिया-आनन्द प्रभृति शक्तियों का स्वामी हो जाता है और सभी मेलापकों का अधिपति बन जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि वह योगी इस जगत् की सभी वेद्य (ज्ञेय) और वेदक (ज्ञापक) वस्तुओं को तिरस्कृत कर अत्यन्त निर्मल चिन्मय शरीर को धारण कर अद्वय, प्रकाश- मय परमात्मा, अर्थात् साक्षात् भैरव बन जाता है। इस प्रकार का साधक जीवन्मुक्त कहलाता है। वह देखना, सुनना, सूँघना, प्रभृति क्रियाकलापों को करता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं होता, उनमें रस नहीं लेता। जैसा कि भगवान् ने गीता में कहा है— पश्यञ्शृण्वन्स्पृशन् जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ।। प्रलपन् विसृजन् गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ।.... ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः । लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥ (५।८-१०) १. °णान्वितः-क० । २. प्रभुर्दे°-ख० । ३. °कारकः-ख० । ४. च चेष्टितम्-क० ।
- कौल मत में साधक को वीर अथवा सिद्ध और साधिका को योगिनी कहा जाता है। सिद्धों और योगिनियों के संघट्ट को मेलापक कहते हैं। ११२ प्रकार की धारणाओं में से किसी एक का भी सहारा लेकर योगी इस मेलापक का अधिपति हो जाता है, सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त कर लेता है, सिद्धों और योगिनियों का सारा समुदाय इसी के निर्देश के अनुसार चलता है। योगिनीप्रिय और मेलापकाधिप इन दो शब्दों का यही साम्प्रदायिक अर्थ है।
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विज्ञानभैरव : १५७ कर्मफल की आकांक्षा को छोड़कर जो साधक इन्द्रियों की विषयों के प्रति स्वाभाविक प्रवृत्ति में रस नहीं लेता, वह उनके फल से उसी प्रकार लिप्त नहीं होता, जैसे कि जल में रहते हुए भी कमलपत्र जल से लिप्त नहीं होता। यही बात स्पन्दकारिका में भी कही गई है— गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् । लब्धात्मलाभाः सततं स्युर्ज्ञस्यापरिपन्थिनः ॥ (श्लो० २९) अर्थात् अपने भीतर अनन्त विशेषताओं को छिपाये हुए सामान्य स्पन्द से ही सत्त्व, रज, तम, महत्, अहंकार आदि की तथा उनके कारण उत्पन्न होने वाले सुख-दुःख आदि की स्थिति बन पाती है। इस बात को भलीभाँति जानने वाले ज्ञानी के लिये यह गुणों की सृष्टि उसके सहज स्वभाव को, स्वात्मस्वरूप को छिपाने में कभी समर्थ नहीं हो सकती। इन प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि इस प्रकार का योगी कर्म करता हुआ भी उनसे लिप्त नही होता। यही बात “न कर्म लिप्यते नरे” (ई० उ० २) इस श्रुति में बताई गई है ॥१३८॥ श्रीभैरवी१ उवाच इदं यदि वपुर्देव परायाश्च महेश्वर ॥१३९॥ एवमुक्तव्यवस्थायां जप्यते को जपेश्च कः । ध्यायते को महादेव२ पूज्यते कश्च तृप्यति ॥१४०॥ हूयते कस्य वा होमो याग³क्षेत्रादि किं कथम् । हे देव प्रकाशमान महेश्वर, यदि पराया देव्या इदमेव उक्तरीत्या भवता प्रति- पादितं वपुः स्वरूपम्, एवं तु सर्वं परादेवीमयमेवेति सर्वमयव्यवस्थायां सत्याम्, जप्यते को जपेश्च कः ? जप्यजापकादिभेदानामपि वस्तुतस्तदभावात् । हे महादेव, एवं सति को ध्यायते, कः पूज्यते, कश्च तृप्यति ? कश्च हूयते, किमर्थं वा होमो१ यागो वा कस्य कृते क्रियते ? ॥१३९-१४०॥ अपने परा देवी विषयक प्रश्न के उत्तर में देवी ने ११२ धारणाओं का उपदेश सुना, जिसमें से कि किसी एक धारणा में भी चित्त को समाहित करने पर साधक स्वात्मस्वरूप में १. °देवो-क० । २. °नाथ-क० । ३. यागः कस्य च-क० ख०।
- खड़े होकर वौषट् शब्द के उच्चारण के साथ किये गये हवन को याग और बैठ कर स्वाहाकारपूर्वक किये गये हवन को होम कहते हैं। द्रष्टव्य—कात्यायन श्रौतसूत्र (१।२। ६-७)। सात्वतसंहिता (२।३६) के भाष्य में बिम्ब प्रभृति में भगवान् की पूजा को याग और अग्नि में दी गई आहुति को होम कहा गया है।
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१५८ : विज्ञानभैरव प्रतिष्ठित हो जाता है । देवी को पुनः शंका उठती है कि जब सब कुछ परादेवीमय ही है, तो हे देव, हे महेश्वर, आप यह बताइये कि जप करने वाला और जप भी तो परा देवी का ही स्वरूप हुआ, तब इनकी अलग से सत्ता कैसे मानी जायगी ? इसी प्रकार हे महादेव, यदि साधक सर्वमय हो जाता है, तो साधक का और परा शक्ति का स्वरूप अभिन्न हो जायगा । इस अवस्था में भेद के न रहने पर किसका ध्यान किया जायगा ? किसकी पूजा की जायगी ? किसको तृप्त किया जायगा ? किसके लिये होम किया जायगा ? याग किसके लिये किया जायगा ? होम या याग का स्वरूप क्या होगा और वह कैसे सम्पन्न होगा ? जब सब कुछ परादेवीमय, स्वात्मस्वरूपमय ही है, तब ध्याता और ध्येय का, पूज्य और पूजक का तथा इसी प्रकार तर्पणीय और तर्पक आदि का भेद भी कहाँ रहेगा ? जिनकी कि शास्त्रों में विस्तार से चर्चा की गई है । आगे १४८वें श्लोक में भगवान् भैरव ने क्षेत्र की भी परिभाषा दी है । तदनुसार देवी के प्रश्न में भी उसका समावेश आवश्यक है । अतः ‘यागः कस्य च किं कथम्’ इसके स्थान पर ‘यागक्षेत्रादि किं कथम्’ यह पाठ उचित प्रतीत होता है । इसका अर्थ यह होगा कि सबकी अभिन्नता में याग और क्षेत्र (तीर्थाटन अथवा किसी विशेष तीर्थ में निवास) की भी अलग से क्या स्थिति रहेगी और इनका स्वरूप किस प्रकार बनेगा ? देवी सभी परिमित प्रमाता साधकों के हित को ध्यान में रखकर इन प्रश्नों को पूछती हैं कि जब सब कुछ विज्ञान भैरव स्वरूप ही है, तब विभिन्न शास्त्रों में प्रतिपादित जप, पूजा, यज्ञ, तीर्थाटन आदि की क्या उपयोगिता है ? आराध्य और आराधक को भिन्न मानने में ही इनकी सार्थकता हो सकती है । अद्वय दृष्टि में तो इनकी कोई उपयोगिता प्रतीत नहीं होती ॥१३९-१४०॥ श्रीभैरव उवाच एषाऽत्र प्रक्रिया बाह्या स्थूलेष्वेव मृगेक्षणे ॥१४१॥ हे मृगेक्षणे, एषा प्रक्रिया जपपाठपूजाध्यानहोमदानतीर्थाटनादिका प्रकृष्टा क्रिया अत्र परमतत्त्वे, परतत्त्वदृष्ट्येति यावत्, बाह्या स्थूला इति च कथ्यते । स्थूलदृष्टिमभि- लक्ष्य एता जपपूजादिका क्रिया उपदिष्टा इति भावः ॥१४१॥ स्वात्मस्वरूप भैरव देवी के इन प्रश्नों का अलग-अलग उत्तर देने से पहले संक्षेप में एक ही वाक्य में उत्तर देते हैं कि हे मृगनयनि ! जप, पाठ, पूजा, ध्यान, होम, यज्ञ-याग, तीर्थाटन प्रभृति विविध कर्मकाण्डीय विधियों का विस्तार इस परम तत्त्व की दृष्टि से न होकर बाह्य स्थूल दृष्टि के आधार पर किया गया है । अर्थात् जो योगी स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गया है, उसके लिये इन बाह्य स्थूल क्रियाओं की कोई उपयोगिता नहीं है, किन्तु जप, पूजा आदि की उपयोगिता उन्हीं के लिये है, जिनकी कि दृष्टि स्थूल है, जिनकी अद्वय दृष्टि अभी विकसित नहीं हुई है, इस सारे जगत् को एकाकार स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित नहीं देख पाती ॥१४१॥
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विज्ञानभैरव : १४९ ^1भूयोभूयः परे भावे भावना भाव्यते हि या। जपः^१ सोऽत्र स्वयं नादो मन्त्रात्मा जप्य^२ ईदृशः ॥१४२॥ परे भावे विश्वपूरणे स्वस्वभावे भूयोभूयः पौनःपुन्येन या भावना विमर्शना “अहमेव परो हंसः शिवः परमकारणम्” (स्व० ४।३९९) इत्यादिरूपा भाव्यते संपाद्यते, स जपः। अत्र अस्मिन् शास्त्रे सूक्ष्मवस्तूपदेशमये भावनैव जपपदेनाभिधीयते। जप्यमाह- स्वयं नादो मन्त्रात्मा अकृतकाहंविमर्शात्मा, ^2“पृथङ्मन्त्रः पृथङ्मन्त्री न सिध्यति कदाचन” इति न्यायात्, ईदृश ईदृशजपविषयः, जप्यो जपनीयो देवः। सोऽहं ब्रह्मोति शब्दस्यानाहताख्यस्य श्रवणाज्जपः, ईदृङ् मन्त्रात्मतया जपाङ्गश्च जप्य इति तात्पर्यम् ॥१४२॥ सूक्ष्मतम वस्तुओं का उपदेश देने वाले इस शास्त्र में परभाव, अर्थात् इस विश्व के पूरक स्वस्वभाव में जो भावना की जाती है, स्वच्छन्दतन्त्र के अनुसार “मैं इस जगत् का परम कारण परम हंस, प्राणमय शिव हूँ” इस प्रकार से दिन-रात स्वाभाविक रूप से प्रवर्तमान अपने प्राणमय अजपा स्वरूप का विमर्श, चिन्तन करने का जो उपदेश किया जाता है, तदनुरूप मैं ही ब्रह्म हूँ, मैं ही शिव हूँ, इस अनाहत नादरूपी शब्द (सोऽहम्, हंसः) की निरन्तर भावना को ही यहाँ जप कहा जाता है। जपनीय मन्त्र भी स्वयं नादात्मक ब्रह्म ही है, जिसमें कि अपने अकृत्रिम अहमात्मक स्वरूप का निरन्तर परामर्श होता रहता है। श्रीकण्ठसंहिता में बताया गया है कि मन्त्र और मन्त्री अर्थात् मन्त्र, मन्त्र का जप करने वाला और मन्त्र की अधिष्ठात्री देवता-ये कभी अलग-अलग नहीं माने जाते। अतः भावनात्मक जप का विषय यह नादात्मक मन्त्र ही माना जाता है, जिसमें कि साधक को परम तत्त्व के साथ अपनी प्रत्यभिज्ञा की स्पष्ट प्रतीति होने लगती है। योगिनीहृदयदीपिका (पृ० ११५) में उद्धृत श्लोक में जप का लक्षण यह बताया गया है- ^3संयम्येन्द्रियसंचारं प्रोच्चरेन्नादमन्तरम्। एष एव जपः प्रोक्तो न तु बाह्यजपो जपः॥ १. जपस्तोत्रं-म०, जपतोऽन्तः-यो०। २. जप ईरितः-यो०।
- तन्त्रा० वि० (भा० १, आ० १, पृ० १३५), योगिनी० दीपिका (पृ० १९६), ई० प्र० वि० वि० (भा० २, पृ० २६२), स्वच्छन्द० (भा० १, प० २, पृ० ७७), शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ५५), महार्थ० परि० (पृ० १२२) में यह श्लोक मिलता है।
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० २४) प्रभृति ग्रन्थों में बताया गया है कि यह श्लोक श्रीकण्ठो- संहिता से उद्धृत किया गया है।
- भास्करराय नित्याषोडशिकार्णव (५।३९) के श्लोक के रूप में इसकी व्याख्या करते हैं, किन्तु योगिनीहृदयदीपिकाकार अमृतानन्द योगी अभियुक्तवचन (पृ० १९६) और प्रामाणिकवचन (पृ० ३१३) कह कर इसी श्लोक को उद्धृत करते हैं। वस्तुतः यह
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१६० : विज्ञानभैरव अर्थात् इन्द्रियों की बहिर्मुख प्रवृत्ति को रोक कर आन्तर अनाहत नाद की भावना करना ही जप कहलाता है, विकल्पात्मक नाना वर्णों के संघात से बने मन्त्रों का बाह्य उच्चा- रण वस्तुतः जप नहीं कहलाता । तन्त्रालोक में जप का स्वरूप यह बताया गया है— तत्स्वरूपं जपः प्रोक्तो भावाभावपदच्युतः । ( १।१९० ) जयरथ ने त्रिशिरोभैरव और विज्ञानभैरव के प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत करते हुए इसकी व्याख्या यह की है कि उस शिव के परावाक् स्वभाव, अनाहत नादमय स्वरूप का बार-बार परामर्श करना ही जप कहलाता है। इसमें भाव और अभाव से निर्मुक्त, इन दोनों दशाओं के बीच में स्फुरित होने वाले संवित्स्वरूप का ही बोध होता है। ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविवृतिविमर्शिनी (भा० २, पृ० २६१-२६२ ) में अभिनवगुप्त ने यह शंका उठाई है कि शब्दों की आवृत्ति से ही तो जप की सिद्धि होती है, परावाग् स्वभाव अनाहत नाद का जप कैसे किया जा सकता है ? साथ ही वहीं इसका उत्तर भी दिया है कि जैसे स्वात्मस्वरूप एक बार ही प्रकाशित होता है, बार-बार उसके प्रकाश की आवश्यकता नहीं रहती, उसी तरह यह जप भी एक बार ही प्रत्यभिज्ञात होता है, अपनी प्राण शक्ति के इस स्वाभाविक व्यापार को एक बार पहचान लेने पर फिर बार-बार इसको पहचानने की आवश्यकता नहीं रह जाती । "कथा जपः” ( ३।३७ ) इस शिवसूत्र की विमर्शिनी में क्षेमराज ने इसी श्लोक के आधार पर जप की व्याख्या की है । हंस गायत्री के जप के विषय में आगे मूल में पुनः चर्चा आवेगी । तभी इस पर विस्तार से विचार किया जायगा ॥१४२॥ १ध्यानं २हि ३निश्चला ४बुद्धिर्नि ५राकारा निराश्रया । न तु ध्यानं शरी ६राक्षिमुखहस्तादिकल्पनां ॥१४३॥ निश्चला वेद्यावेद्यपतितापि समाधानबलान्निवातदीपवत् स्थिरा, निराकारा नानोल्लेखशून्या, 'निर्विकारा' इति पाठे विकारवर्जिता, निराश्रया कन्दहृदयद्वादशान्ता- द्याश्रयहीना च बुद्धिः ध्यानमिति कथ्यते । अत्र सूक्ष्मवस्तूपदेशके भैरवशास्त्रे सूक्ष्म- शरीरस्य कल्पनामयस्य भगवतः साकारस्वरूपस्य मुखहस्तादिकल्पना ध्यानपदेन नैव कदाचनाऽभिधीयते ॥१४३॥ निश्चल अर्थात् अत्यन्त स्थिर, निराकार अर्थात् भांति-भांति के आकारों की कल्पना से शून्य, अथवा विकारों से रहित, अर्थात् नाना प्रकार के परिणामों से मुक्त, निराश्रय अर्थात् मूलाधार, हृदय, द्वादशान्त आदि स्थानों का सहारा न लेने वाली बुद्धि ही इस शास्त्र १. या-यो० त० म० । २. निष्कला-यो० । ३. चिन्ता नि०-यो० म० । ४. ०वि०- ख० । ५. ०रस्य-यो० त०, ख०, ०रादि०-म० । ६. ०न्म म० । श्लोक संकेतपद्धति का प्रतीत होता है, जिसके कि कुछ श्लोक बाद में नित्याषोडशिकार्णव के पंचम पटल के अन्त में जोड़ दिये गये ।
- तन्त्रा० वि० ( भा० १, आ० १, पृ० १३४ ), योगिनी० ( पृ० १९६ ) और महार्थ० ( पृ० १२७ ) में यह श्लोक उद्धृत है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १६१ 'ध्यान' पद से कही जाती है । इसका अभिप्राय यह है कि वेद्य अथवा अवेद्य विषयों की उप- स्थिति में भी समाधि के अभ्यास के कारण पवन रहित स्थान में स्थापित दीपक के समान जो स्थिर निर्विकार बुद्धि होती है, उसी को इस शास्त्र में 'ध्यान' के नाम से जाना जाता है । भगवान् के साकार रूप की कल्पना कर उसके मुंह, आँख आदि अंगों में अपने चित्त को स्थिर करना यहां ध्यान नहीं कहा जाता । ध्यान की यह कल्पना तो स्थूल दृष्टि वाले पशु-शास्त्रों की उपज है ॥१४३॥ १पूजा नाम न पुष्पाद्यैर्या मतिः क्रियते दृढा । निर्विकल्पे परे १व्योम्नि सा पूजा ह्यादराल्लयः ॥१४४॥ नाम इति प्रसिद्धेऽर्थे । प्रसिद्धमेतद् यदत्र शास्त्रे पुष्पाद्यैः पूजा न निष्पाद्यते, अपि तु निर्विकल्पे परे व्योम्नि महाव्योमनि परचिदाकाशे, या दृढा मतिः क्रियते, आदरात् श्रद्धाप्रकर्षात्, यो लयो विश्रान्तिः संपाद्यते, सैव तत्त्वतः पूजा ॥१४४॥ इस शास्त्र में यह बात प्रसिद्ध है कि यहाँ पुष्प, २धूप, गन्ध आदि बाह्य उपकरणों से पूजा नहीं की जाती, किन्तु निर्विकल्पक महाकाश अर्थात् परचिदाकाश, बोधभैरव के प्रति दृढ़ आस्था ही पूजा कहलाती है कि इस बोधभैरव से ही यह सारा संसार व्याप्त है । अतः आदर और श्रद्धा पूर्वक उक्त धारणाओं में से किसी एक धारणा का निरन्तर अभ्यास करते हुए उस बोधभैरव में, स्वात्मस्वरूप में विश्रान्ति प्राप्त कर लेना, लीन हो जाना ही परमार्थतः पूजा कहलाती है । जैसा कि संकेतपद्धति के निम्न श्लोक में भी बताया गया है— ३न पूजा बाह्यपुष्पादिद्रव्यैर्या प्रथिताऽनिशम् । स्वे महिम्न्यद्वये धाम्नि सा पूजा या परा स्थितिः ।। योगिनीहृदय ( ३।२-३ ) में पूजा के तीन भेद बताये गये हैं और परा पूजा का यह लक्षण किया गया है कि सभी जागतिक पदार्थों में अद्वय दृष्टि ही, उन सबकी परम महिमामय स्वात्म- स्वरूप में परम प्रतिष्ठा ही वस्तुतः परा पूजा है । तन्त्रालोक में पूजा का लक्षण इस प्रकार दिया गया है— १. महा°-ने० त० शि० स्त० ।
- तन्त्रा० वि० ( भा० १, आ० १, पृ० ५१; भा० ३, आ० ४, पृ १२४ ), स्तवचिन्ता- मणिटीका (पृ० १२० ) और नेत्रतन्त्रोद्योत ( भाग २, पृ० ९ ) में यह श्लोक मिलता है । शिवस्तोत्रावलीव्याख्या ( पृ० २११ ) पर चतुर्थ पाद और ( पृ० ३७३ ) पर उत्तरार्ध मात्र मिलता है ।
- धूप, गन्ध, दीप, नैवेद्य प्रभृति की आध्यात्मिक व्याख्या के लिये ऋजुविमर्शिनी ( पृ० १३४ ) देखनी चाहिये ।
- संकेतपद्धति का यह श्लोक ऋजुविमर्शिनी ( पृ० ८९ ) योगिनीहृदयदीपिका (पृ० १९१) प्रभृति ग्रन्थों में उद्धृत है । ११
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१६२ : विज्ञानभैरव पूजा नाम विभिन्नस्य भावौघस्यापि संगतिः । स्वतन्त्रविमलानन्तभैरवीयचिदात्मना ॥ (४।१२१) अर्थात् रूप, रस आदि विभिन्न भाव पदार्थों की देश, काल आदि से अपरिच्छिन्न, निरुपाधिक, स्वतन्त्र, स्वच्छ, भैरवाकार परसंवित् से, अर्थात् बोधभैरव से अभेद रूप में प्रतिष्ठा ही पूजा कही जाती है। भट्ट उत्पल ने अपनी शिवस्तोत्रावली में पूजाविधि का वर्णन इस प्रकार किया है— ध्यानायासतिरस्कारसिद्धस्त्वत्स्पर्शोत्सवः । पूजाविधिरिति ख्यातो भक्तानां स सदाऽस्तु मे ॥ (१७।४) अर्थात् उच्चार, करण, ध्यान प्रभृति प्रयत्नसाध्य आणव प्रभृति उपायों के सहारे से संपन्न होने वाली विविध बाह्य विधियों को छोड़कर अनुपाय प्रक्रिया से सहज विधि से सम्पन्न होने वाला स्वात्मस्वरूप बोधभैरव का साक्षात्कार ही भक्त जनों की वास्तविक पूजा-विधि है। इसीलिये भट्ट नारायण ने— मलतैलाक्तसंसारवासनावर्तिदाहिना । ज्ञानदीपेन देव त्वां कदा नु स्यामुपस्थितः ॥ (श्लो० ११३) स्तवचिन्तामणि के इस श्लोक में भगवान् से प्रार्थना की है कि हे भगवन्, मैं पुष्प आदि से तो नित्य ही आपकी पूजा करता हूँ, किन्तु आप मेरे लिये वह स्थिति उपस्थित कीजिये कि जिससे मैं आपके सामने उस ज्ञानरूपी दीपक को लेकर उपस्थित हो सकूं, जो कि मल से, अज्ञानरूपी तैल से सिंचित वासना रूपी बत्ती को, धर्म-अधर्म प्रभृति जागतिक परम्परा को आगे बढ़ाने वाले समस्त संस्कारों को जला देने वाला है। इन सब वचनों का संक्षिप्त अभिप्राय यही है कि भेद बुद्धि को छोड़कर अद्वय स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित होना ही वास्तविक पूजा है, पुष्प आदि से की गई पूजा तो एक प्रकार का विकल्प व्यापार ही है ॥१४४॥ ¹अत्रैकतमयुक्तिस्थे योत्पद्येत दिनाद्दिनम् । ²भरिताकारता सात्र तृप्तिरत्यन्तपूर्णता ॥१४५॥ अत्र प्रोक्तधारणासु एकतमयुक्तिस्थे सिद्धसमाधानदार्ढ्ये योगिनि, एकस्यां कस्याञ्चिद् युक्तौ धारणायामवस्थिते योगिनि इति यावत्, दिनाद्दिनम् उत्तरोत्तरम् भरिताकारता निर्विकल्पसमाधिरसस्वादाद् या पूर्णस्वात्मस्वरूपोपलब्धिरूपाऽत्यन्तपूर्णता उत्पद्येत, सा अत्र शास्त्रे तृप्तिरिति कथ्यते ॥१४५॥ ऊपर बताई गई ११२ धारणाओं में से किसी एक युक्ति (धारणा) में दृढ़ता पूर्वक एकाग्र समाधि का अभ्यास करने वाले योगी के चित्त में दिन-प्रतिदिन उत्तरोत्तर निर्विकल्प समाधि के रस के आस्वाद के बढ़ते रहने से सर्वज्ञ व्याप्त भैरव स्वरूप की, पूर्ण स्वात्मस्वरूप १. °रि°-शि० ।
- शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३४) में यह श्लोक उद्धृत है। २. भरिताकारता = भरितावस्था की विवेचना श्लोक ७१ की व्याख्या में देखनी चाहिये। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १६३ की उपलब्धि जब परिपूर्ण हो जाती है, अर्थात् जब स्वात्मस्वरूप बोधभैरव का साक्षात्कार स्पष्ट हो जाता है, तो इसी अत्यन्त परिपूर्ण स्थिति का नाम तृप्ति है ॥१४५॥ १महाशून्यलये वह्नौ भूताक्षविषयादिकम् । हूयते मनसा २सार्धं ३स होमैश्चेतनास्रुचा ॥१४६॥ महाशून्यस्य शून्यातिशून्यपदस्य आ समन्तात् लयो यत्र तस्मिन् परतत्त्वात्मनि शून्यातिशून्यरूपे परभैरवस्वरूपे वह्नौ भूताक्षविषयादिकं भूतेन्द्रियविषयभुवनतत्त्वादि- रूपं सकलं जगत् संकल्पविकल्पात्मकम्, तद्विभागकल्पनाहेतुना मनसा सह, चेतना विश्वानुसन्धात्री शक्तिरेव स्रुक् तया चेतनास्रुचा यद् हूयते सोऽत्र शास्त्रे वस्तुतो होमो हविरित्युच्यते ॥१४६॥ महाशून्य अर्थात् २शून्यातिशून्य पदवी (महामाया शक्ति) का चारों तरफ से जिस परतत्त्वात्मक परभैरव स्वरूप वह्नि में विलयन हो जाता है, अर्थात् जहां पहुँच कर शून्याति- शून्य पदवी की भी कोई पृथक् सत्ता नहीं रहने पाती, उस बोधभैरव रूप अग्नि में पंच महा- भूत, इन्द्रिय गण, अनेक विषय, भुवन-तत्त्व आदि संकल्प-विकल्पात्मक सकल जगत् की इन विभागों की कल्पना में प्रधान सहायक मन के साथ आहुति दे देना ही वास्तविक होम या हवि कहलाता है। यज्ञीय होम में घृत आदि की आहुति स्रुवा नाम के लकड़ी के बने पात्र से दी जाती है, उसी तरह से उक्त पदार्थों की यह अद्भुत हवि भी चिति नामक पात्र में रखकर दी जाती है। यह चिति ही सारे विश्व का अनुसन्धान करने वाली चेतना नाम की शक्ति है। इस चेतना में ही समस्त जागतिक पदार्थों को रखकर उनको बोधभैरव रूप अग्नि में लीन कर दिया जाता है, जिससे कि शुद्ध स्वात्मस्वरूप बच रहता है। अद्वय नय के अनुसार यही वास्त- विक होम है, जिससे कि शुद्ध अद्वय तत्त्व के अतिरिक्त सब कुछ भस्म हो जाता है। स्वच्छन्द- तन्त्र में इस होम का निम्न प्रकार से वर्णन किया गया है— एवं हृदम्बुजावस्थो यष्टव्यो भैरवो विभुः । सबाह्याभ्यन्तरं कृत्वा पश्चाद्यजनमारभेत् ॥ (२।१५४) योगिनीहृदयदीपिका (पृ० २६४) में भी इसी अभिप्राय के दो श्लोक उद्धृत हैं— धर्माधर्महविर्दीप्ते आत्माग्नौ मनसा स्रुचा । सुषुम्णावर्त्मना नित्यमक्षवृत्तीर्जुहोम्यहम् ॥ नैदानैस्तर्पणैः सम्यग् विशुद्धैरमृतात्मभिः । मदहन्तां करोमीदं विश्वं हव्यपुरस्सरम् ॥ १. °दि°—ख० । २. साकं—शि० । ३. °मः स्रुक्च चेतना—ख० शि० ।
- महार्थ० परि० (पृ० १२७), स्वच्छन्द० (भा० १, प० २, पृ० ८७), शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ३३), योगिनी० दीपिका (पृ० २६४) में यह मिलता है।
- शून्यातिशून्य प्रभृति शब्दों की व्याख्या पृ० ४३-४४ की टिप्पणी में की जा चुकी है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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१६४ : विज्ञानभैरव इनमें से पहला श्लोक ज्ञानार्णवतन्त्र (२१।२९) और द्वितीय शुभगोदयावासना (श्लो० ३९) में उपलब्ध है। इसी लिए शिव सूत्र (२।८) में इस पांचभौतिक शरीर को हवि बताया गया है। भगवद्गीता में भी— सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे । आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥ यहाँ ज्ञान से जलाई गई योगाग्नि में सभी बाह्य विषयों की आहुति देने की बात बताई गई है। महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १२७) में भी इस विषय का वर्णन मिलता है ॥१४६॥ यागोऽत्र परमेशानि तुष्टिरानन्दलक्षणा । क्षपणात् सर्वपापानां१ त्राणात् सर्वस्य पार्वति ॥१४७॥ रुद्रशक्तिसमावेशस्तत्क्षेत्रं भावना परा । अन्यथा तस्य तत्त्वस्य का पूजा कश्च तृप्यति ॥१४८॥ हे परमेशानि, उक्तसमाधानोत्था आनन्दलक्षणा तुष्टिरेवात्र यागो देवयजनम् । हे पार्वति, रुद्रप्रमातॄणां पतिरूपाणां या शक्तिरनाश्रिताख्या, तस्यां पशुप्रमातुस्तन्मयी- भवनमेव क्षेत्रम् । हेतुरूपेण क्षेत्रपदं निर्वक्ति—सर्वेषां सर्वविधानां पाशानां क्षपणात्, सर्वस्य प्राणिजातस्य च भवभयत्राणादिति । अर्थादस्मिन् शास्त्रे सर्वविधपाशक्षपणकरः सर्वविधभवभयमोचकश्च १रुद्रशक्तिसमावेशोऽनाश्रितशिवशक्त्यावेश एव क्षेत्रपदेनाभि- धीयते, न च पुनः कुरुक्षेत्रधर्मक्षेत्रादिगमनादि । एतत्सर्वं जप-ध्यान-पूजा-२तर्पण-होम- याग-क्षेत्रादिकं पराया देव्या भावनात्मकमेव विज्ञेयम् । यतो हि अद्वैतसतत्त्वस्य तस्य अन्यथा प्रकारान्तरेण का पूजा कश्च तृप्यति ? पूजनतर्पणादिकं कर्म ततो व्यतिरिक्तं न संभवतीति भावः ॥१४७-१४८॥ हे परमेश्वरि, इस शास्त्र में उक्त समाधि अवस्था में अनुभूयमान आनन्दजन्य सन्तुष्टि ही याग, अर्थात् देवयजन कहा जाता है। इसी प्रकार हे पार्वति, पशुरूपी प्रमाता को जब पूर्व उपदिष्ट किसी उत्कृष्ट भावना के माध्यम से पति रूपी रुद्र प्रमाता (अनाश्रित शिव) १. ॰शानां-ख० ।
- भट्ट आनन्द ने रुद्रशक्तिसमावेश का अर्थ 'रुद्र अर्थात् शिव की सर्वज्ञता प्रभृति छः शक्तियों का प्रादुर्भाव' किया है। शिव के सर्वज्ञता प्रभृतिः छः गुणों का विवेचन पृ० ८ की १ संख्या की टिप्पणी में देखना चाहिये ।
- 'तर्पण' शब्द की दो तरह की व्याख्या की जाती है । एक के अनुसार पूजा देवताओं की तथा तर्पण पितरों के निमित्त किया जाता है। दूसरी व्याख्या के अनुसार कुल, क्रम आदि शास्त्रों में प्रदर्शित तथा प्रस्तुत शास्त्र में भी 'जग्धिपान' (श्लो० ७१) प्रभृति श्लोकों में वर्णित विधि को तर्पण कहते हैं । इससे प्राप्त उल्लास दशा को तृप्ति कहा जाता है ।
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विज्ञानभैरव : १६५ की शक्ति में समावेश अर्थात् तन्मयता प्राप्त हो जाती है, तो इस तन्मयीभाव को ही यहाँ 'क्षेत्र' कहा जाता है। इस भैरव शास्त्र में अद्वय दृष्टि की प्रधानता के कारण कुरुक्षेत्र प्रभृति द्वैत दृष्टि के पोषक तीर्थ स्थानों को क्षेत्र नहीं माना जाता। निर्वचन पद्धति से क्षेत्र वह कह- लाता है, जो सभी तरह के पाशों को नष्ट करने वाला हो और समस्त प्राणियों की इस संसार रूपी भय से रक्षा कर सकता हो। अनाश्रित शिव में समाविष्ट हो जाने पर ही पशु प्रमाता सभी पाशों से मुक्त हो सकता है और इस संसार रूपी महाभय से त्राण पा सकता है। अतः 'क्षेत्र' पद से अनाश्रित शिव-शक्ति में पशु प्रमाता की स्थिति का ही बोध होगा, कुरुक्षेत्र प्रभृति तीर्थ स्थानों का नहीं, क्योंकि उनमें निवास करने वाला तो द्वैत स्थिति में ही पड़ा रह जाता है। इस प्रकार देवी के द्वारा किये गये जप, ध्यान, पूजा, तर्पण, होम, याग, क्षेत्र विषयक प्रश्नों का अद्वय नय के अनुसार समाधान प्रस्तुत कर भगवान् भैरव कहते हैं कि परम तत्त्व परमार्थतः अद्वय है, एक ही है। ऊपर बताई गई भावनात्मक पद्धति के सिवाय दूसरी कोई विधि नहीं है, जिसके अनुसार कि जप, पूजा आदि कर्मकाण्ड सम्पन्न हो सकें। पूजन, तर्पण आदि कर्म भी तो उस अद्वय तत्त्व से भिन्न नहीं है। ऐसी अवस्था में किससे किसकी पूजा की जायगी और कौन किससे तृप्त होगा ? पूज्यपूजकभाव और तर्प्यतर्पकभाव द्वैत दृष्टि में ही सम्भव हो सकता है, अतः इस अद्वय नय में भावना के सिवाय इनकी कोई पृथक् सत्ता नहीं है ॥१४७-१४८॥ स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारः स्वात्मा हि सर्वतः । आवेशनं तत्स्वरूपे स्वात्मनः स्नानमीरितम् ॥१४९॥ हि यतः, स्वात्मा सर्वतः स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारः, अतस्तस्मिन् स्वात्मस्वरूपे स्वात्मन आवेशनमेव स्नानमीरितम् । निगदितधारणाभ्यासेनाद्वैतस्वात्मस्वरूपस्य स्वतन्त्रानन्दचिन्मात्रसारतयाऽनुभवात् तत्स्वरूपे लयभावनैव मुख्यं स्नानमित्यर्थः ॥१४९॥ "यागक्षेत्रादि किं कथम्" (श्लो० १४१) इस श्लोक में आये आदि पद से स्नान का ग्रहण किया गया है। सदाचार में स्नान का प्रमुख स्थान है, अतः अद्वय नय के अनुसार प्रस्तुत श्लोक में स्नान की व्याख्या की गई है। ऊपर जिन धारणाओं का वर्णन किया गया है, उनमें से किसी एक के अभ्यास से अद्वय स्वभाव आत्मा के सब तरह से स्वतन्त्र, आनन्द, चिन्मात्र- स्वरूप का साक्षात्कार होने पर उसी में समाविष्ट हो जाने की स्थिति को ही यहाँ स्नान कहा जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि स्वात्मस्वरूप वस्तुतः स्वतन्त्र है। इसका यह स्वरूप आनन्द और ज्ञानमय है। अपने इस स्वाभाविक स्वरूप में उक्त धारणाओं के अभ्यास से साधक लीन हो जाता है। जैसे स्नान करने के लिये नदी, जलाशय आदि के जल में डुबकी लगाई जाती है, उसी तरह से इस आन्तर स्नान में भी साधक स्वात्मस्वरूप में डुबकी लगाता है। उसकी यह लीनावस्था ही अद्वय शास्त्र में स्नान के नाम से कही जाती है ॥१४९॥
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१६६ : विज्ञानभैरव १यैरेव पूज्यते द्रव्यैस्तर्प्यते वा परापरः१ । यश्चैव पूजकः सर्वः स एवैकः क्व पूजनम् ॥१५०॥ परापर इति परादेव्या सहितः परः परमेश्वरो भैरवः, यैरेव द्रव्यैः कुसुमादिभिः पूज्यते, क्षीरखण्डादिभिर्वा तर्प्यते, यश्चैव पूजकः सर्वः एकः स एव पूज्यपूजोपकरण- पूजकादिकः सर्व एष भेदस्तस्यैकस्य स्वरूपमित्येतेन तत्त्वज्ञानेन क्व पूजनं स्थूलमार्गेण कस्य पूजनं क्रियेत ? यदा हि सर्वस्य पूज्यपूजादेस्तदेकस्वरूपतया क्वापि भिन्नता नास्ति, तदा उक्तपारमार्थिकपूजाव्यतिरेकेण न किञ्चिदन्यत् पूजनादिकं संभवतीति भावः ॥१५०॥ परापर शब्द का अर्थ है परा देवी के साथ विद्यमान पर, परमेश्वर भैरव भट्टारक । परा देवी के साथ विद्यमान परभैरव की जिन पुष्प, गन्ध, धूप आदि से पूजा की जाती है, अथवा खीर, मिश्री-मावा आदि से भोग लगाया जाता है और जो पूजा करने वाला अथवा भोग लगाने वाला है, यह सब तो एक ही तत्त्व है। पूज्य, पूजन सामग्री और पूजक इस तरह के सभी भेद एक ही तत्त्व के विभिन्न स्वरूप हैं, इस तरह का पारमार्थिक बोध जग जाने पर किससे किसकी पूजा की जायगी ? जब कि इन सभी की एकरूपता के कारण परस्पर कोई भिन्नता नहीं है, तब इस अद्वय नय में प्रदर्शित पूजा के अतिरिक्त स्थूल दृष्टि से सम्पन्न होने वाली पूज्य, पूजन साधन, पूजा, पूजक आदि की परमार्थ दृष्टि से कोई सत्ता नहीं मानी जा सकती। इसी लिये महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १०७) में उद्धृत प्रभाकौल नामक ग्रन्थ में बताया गया है— यावत् तत् परमं शान्तं न विजानन्ति सुन्दरि । तावत् पूजाजपध्यानहोमलिङ्गार्चनादिकम् ॥ विदिते तु परे तत्त्वे सर्वाकारे निरामये । क्व पूजा क्व जपो होमः क्व च लिङ्गपरिग्रहः ॥ अर्थात् हे सुन्दरि, जब तक उस परम शान्त परमार्थ पद को नहीं जान पाते, तभी तक पूजा, जप, ध्यान, होम, लिगपूजा आदि कर्मकाण्ड किये जा सकते हैं। किन्तु जब उस सर्वाकार, निर्विकार, परम तत्त्व का बोध हो जाता है, तब पूजा, जप, होम, वेष-परिवर्तन आदि की कोई उपयोगिता नहीं रह जाती। इस स्थिति में तो पूजा, जप आदि की इस अद्वय भैरवनय में ऊपर बताई परिभाषाएं ही लागू हो सकती हैं ॥१५०॥ व्रजेत् प्राणो विशेज्जीव इच्छया कुटिलाकृतिः । दीर्घात्मा सा महादेवी परं२क्षेत्रं परापरा३ ॥१५१॥ १. ॰वरः-म० । २. परं-ख० । ३. ॰त्परा-ख० ।
- योगिनी० दीपिका (पृ० २४४), महार्थ० परि० (पृ० १०७) में प्राप्त है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : १६७ प्राण: 'स:' इत्येवंरूप: प्रकाशो व्रजेत् बहिर्नि:सरेत्, जीव: 'अहम्' इत्येवं प्रकार: क्षपारूपोऽपानो विशेत् अन्तः पुनः प्रविशेत् । प्राणस्य बहिर्निःसरणेऽपानस्यान्तःप्रवेशने च जीवात्मता संभवतीति संभावनायां लिङ् । अपानस्य प्रत्यावृत्त्यान्तःप्रवेशाभावे जीव एव न स्यादित्यपानदशैव जीवप्रादुर्भाव इत्यतो विशेज्जीव इत्युक्तम् । जीवस्य प्राणा- न्तर्वर्तित्वात् प्राणस्य हकारलिपिवत् कुटिलाकृतित्वाज्जीवोऽपि कुटिल इति इच्छाया कुटिलाकृतिरित्युक्तम् । वक्रत्वमपि तस्य स्वतन्त्रपरमेश्वरेच्छयैवेति भावः । कुण्डलिन्या अधोमुख्याः सार्धत्रिवलयाकारत्वात् तदन्तःस्था प्राणशक्तिरपि कुटिला । सा महादेवी महदम्बरैकप्रकाशस्वरूपा संविद्गगनचरी प्रमातृप्रमेयप्रमाणपथगामिनी, दीर्घात्मा वितताकृतिर्भवति । सैव परं क्षेत्रं सर्वपाशानां क्षपणात् सर्वस्य त्राणात् तीर्थभूमिर्वा सा, न तु कुरुक्षेत्रादि क्षेत्रम् । इयमेव देवी परापरा भेदाभेदात्मकतयाऽहमिति प्राधान्येन इदमिति गुणीकारेणार्थतस्तच्छब्दास्मच्छब्दयोरभेदः, तत्तया मत्तया निर्देशेन भेदश्चेति परापरात्वम् ॥१५१॥ 'ऊर्ध्वे प्राण' (श्लो० २४) इस श्लोक में सकार-हकार (सोऽहम्) जपात्मक हंस गायत्री (परा देवी) के स्वरूप का प्रारंभिक वर्णन किया गया था । मध्य में 'होच्चारं मनसा कुर्वन्' (श्लो० ८०) इस श्लोक में पुनः उसका उल्लेख हुआ । अब यहाँ उपसंहार में पुन उसका प्रतिपादन किया जा रहा है । वस्तुतः उक्त ११२ धारणाओं के प्रतिपादक प्रत्येक श्लोक के चतुर्थ चरण में भैरव ओर भैरवी के सामरस्यमय परा देवी के पारमार्थिक स्वरूप का ही विवेचन किया गया है । किन्तु इन तीन श्लोकों में विशेष रूप से उस स्वरूप का विवेचन मिलता है, जो कि सहज अजपाजप के नाम से प्रसिद्ध है । हंस गायत्री में विद्यमान सकार प्राण ओर प्रकाश (सूर्य अथवा दिन) का प्रतिनिधित्व करता है, तथा हकार जीव (अपान) तथा क्षपा (रात्रि) का । सभी प्राणियों के अनुभव के आधार पर यह बात सिद्ध है कि प्राण (सकार) की गति स्वाभाविक रूप से बाहर की ओर तथा अपान (हकार) की गति निरन्तर भीतर की ओर चलती रहती है । अपान को जीव इसलिये कहा जाता है कि प्राण के बाहर निकलने के बाद अपान जब शरीर में प्रविष्ट होता है, तभी यह बोध हो सकता है कि शरीर में जीवात्मा विद्यमान है । अपान के प्रवेश न करने पर शरीर शव कहा जायगा । अपान के कारण ही शरीर में जीवात्मा की स्थिति बनी रहती है, अतः स्वाभाविक है कि अपान को जीव के नाम से जाना जाय । व्रजेत् और विशेत् में संभावना में लिङ् लकार का प्रयोग किया गया है, विधि में नहीं । प्राण और अपान की गति कब तक चलती रहेगी, इस संबन्ध में किसी नियम का विधान नहीं किया जा सकता, केवल संभावना ही व्यक्त की जा सकती है । जीव अर्थात् अपान निरन्तर प्राण का अनुवर्तन करता रहता है, अर्थात् जब तक शरीर जीवित है, यह अवश्यंभावी है कि प्राण के निःसरण के बाद अपान का प्रवेश हो । जिस प्राण वायु का अपान अनुवर्तन करता है, उसकी गति हकार की लिखावट की तरह टेढी-मेढी होती है, अतः यह जीव भी अपनी इच्छा से ही प्राण के अनुरूप कुटिल (घुमावदार) आकृति धारण कर लेता है । जीव की यह वक्रता (कुटिलता=घुमावदार
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१६८ : विज्ञानभैरव आकृति) परमेश्वर की स्वतन्त्र इ च्छा शक्ति का ही खेल है। मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी साढ़े तीन आटे मार कर बैठी रहती है, अतः उसमें रहने वाली यह प्राण शक्ति भी कुटिल आकार की हो जाती है। इस प्राण शक्ति के भीतर विद्यमान जीव बाल (केश) के अग्रभाग सोवें हिस्से के समान परम सूक्ष्म है। उसकी कोई आकृति नहीं है, किन्तु जीव के आधारभूत इस प्राण की वक्रता के कारण आधेय जीव में भी औपाधिक वक्रता मान ली जाती है । वास्तव में जीव कुटिल नहीं है, प्राण ही कुटिल है। "प्राक् संवित् प्राणे परिणता" कल्लट के इस वचन के अनुसार हृदय रूपी आकाश में संवित् का प्रवेश होते ही जीव दशा उत्पन्न होती है। पूर्णाहन्ता का विमर्श करने वाली संवित् से परिमित देह आदि में आत्मा का अभिमान करने वाली जीव दशा का आविर्भाव होता है, जैसे कि महाकाश से घटाकाश की उत्पत्ति होती है। प्राणशक्ति का एक लपेटा वाम नाडी इडा में और दूसरा लपेटा दक्षिण नाडी पिंगला में रहता है। इस तरह से उसके दो वलय (घेरे) बनते हैं। सुषुम्ना नाम की मध्य नाडी सार्ध कहलाती है, क्योंकि इसमें प्राण जब हृदयाकाश से ऊपर की ओर चढ़ता है, तब 'हम्' वर्ण की उत्पत्ति होती है और जब वह द्वादशान्त से उत- रता है, तो उसकी अपान दशा से 'सः' वर्ण उत्पन्न होता है। इन दो वर्णों का स्पष्ट उच्चारण करते रहने से ही जीव 'जीवित' कहलाता है। जैसा कि आगे (१५३ श्लो०) बताया जायगा कि जीव सदा 'हंस-हंस' इस मन्त्र का जप करता रहता है। इस मन्त्र का जप जीव ही करता है, परमेश्वर नहीं, क्योंकि परिमित अहन्ता का संपर्क जीव दशा में ही रहता है। ईश्वर दशा में तो पूर्णाहन्ता रहती है, अतः वहाँ 'मैं वह हूँ, वह मैं हूँ, मैं यह हूँ' इस तरह के विमर्श नहीं रहते। यह त्याज्य है, यह उपादेय है, यह मेरा है, यह मेरा नहीं है—इस तरह से छोड़ने और लेने के प्राण और अपान के धर्मों से समानता होने के कारण 1 जीव 'हंस' कहलाता है। इस तरह से सूर्य की किरणों के फैलने पर दिन के प्रकाश की तरह चित्(संवित्)सूर्य के हृदयाकाश में उदित होने पर प्राण का प्रकाश जगमगाने लगता है। चित्सूर्य की किरणें जब . सिमटती हैं, तो यह अपान दशा रात्रि कहलाती है। हृदय रूपी आकाश में रहने वाली यह संवित् ह और स, ,धर्म और अधर्म, दीर्घ और ह्रस्व, दिन और रात, अग्नि और सोम—इन सबको उत्पन्न करने वाली है, जो कि शून्य की भी विश्राम स्थली है। उसी को इस विज्ञानभैरव तन्त्र में 'परा देवी' कहा गया है। 'दीर्घात्मा''''परापरा' इस श्लोकार्ध में उसी का स्वरूप बताया गया है। यह महादेवी महाकाश को भी प्रकाशित करने वाली है, सदा बोधगगन में बिहार करती रहती है और साथ ही प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण व्यवहार को भी चलाती है। यही स और ह इन दोनों वर्णों को
- हान (त्याग) और उपादान (परिग्रह), छोड़ना और लेना—इन दोनों व्यापारों में हंस और जीव की समानता है। हंस जैसे दूध पी जाता है और पानी को छोड़ देता है, उसी तरह से जीव में भी प्राण और अपान का हान और उपादान व्यापार निरन्तर चलता रहता है। इसी समानता के आधार पर जीव को हंस कहा जाता है।
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विज्ञानभैरव : १६९
उत्पन्न करती है और उनको अपने में विलीन भी कर लेती है। यह महादेवी द्वादशान्त स्थित आकाश में सकार के रूप में तटस्थ भाव से रहती है और उसी के बगल में अन्तःकरण और बहिरिन्द्रिय के प्रतीकभूत विसर्ग स्वभाव हकार के रूप में। इस तरह इसकी यह अजपा स्थिति अन्यपदेश्य अर्थात् नाम और रूप के द्वारा समझने लायक न होने पर भी धीरे-धीरे स्थूल आकार धारण करने लगती है। इसके आकार का विस्तार होने पर ही द्वैत-संपत्ति को बढ़ाने वाले, नानात्व का प्रसार करने वाले, दिन रात, सुख-दुःख प्रभृति अनेक द्वन्द्वात्मक पदार्थों की सृष्टि होती है। यह महादेवी सभी तरह के पापों का नाश कर देने के कारण तथा सबकी रक्षक होने से सही माने में श्रेष्ठ तीर्थभूमि है। कुरुक्षेत्र प्रभृति तीर्थ इसकी बराबरी नहीं कर सकते। इस तरह से अपने स्वरूप का विस्तार करने के कारण यह दीर्घात्मा महादेवी इस द्वैत दशा में परापरा अवस्था में रहती है, क्योंकि यहाँ 'अहम्' (मैं) का बोध प्रधान रहता है और इदम् (यह) यह का बोध अप्रधान (गौण)। तत् और अस्मत् शब्द के अर्थ में कोई भेद नहीं है, किन्तु तत्ता (उसका) और मत्ता (मेरा), इदन्ता और अहन्ता के रूप में निर्देश करने पर भेद की भी प्रतीति होती है। अतः इस परापरा अवस्था में भेद और अभेद दोनों स्थितियाँ विद्यमान रहती हैं। हंस मन्त्र को अजपा इस लिये कहा जाता है कि अपरा अवस्था में यद्यपि इसके वाच्य वर्ण हकार और सकार का उच्चारण स्पष्ट होता है, किन्तु जब परा देवी इनको अपने में समेटे हुए अपने बाह्य स्वरूप का संवरण करती है, उस समय हकार के मस्तक पर स्थित बिन्दु रूप अनुस्वार का केवल बिन्दु के रूप में जप नहीं किया जा सकता। इसी तरह से यह प्राणशक्ति जब बाहर निकलती है, तब सकार के आगे विसर्ग रूप में स्थित दो बिन्दुओं का बिना अकार के उच्चारण नहीं हो सकता। इसीलिये 'हंसः' इस मन्त्र की अजपा गायत्री के रूप में ख्याति है। हंस मन्त्र वर्ण-क्रम से जैसे 'अजपा' रूप से प्रसिद्ध है, उसी तरह से यह 1संवित्क्रम से भी 'अजपा' स्थिति में ही रहता है। संवित् के प्रकाश से ही सभी शब्दों का स्फुरण होता है। उस संवित् के स्फुरण के लिये किसी अन्य पदार्थ की आवश्यकता नहीं रहती, वह तो स्वयंप्रकाश है, क्योंकि उसको प्रकाशित करने वाली दूसरी कोई संवित् नहीं है। स्वप्रकाश वस्तु को दूसरे प्रकाश की आवश्यकता नहीं रहती, जैसे कि एक दीपक को प्रकाशित करने के लिये दूसरे दीपक की जरूरत नहीं पड़ती। प्रश्न उठता है कि अभी बताया गया है कि हंस मन्त्र का उच्चारण जीवावस्था में ही होता है। इस प्रकार यह जीव दशा का मन्त्र है। तब इस जीवदशा (परिमित अहन्ता) के
- नित्याषोडशिकार्णव की अर्थरत्नावली टीका (पृ० ३, ३४-३९) में वर्ण, मण्डल (चक्र), मन्त्र, धाम और संवित् नामक क्रम दर्शन के पांच प्रमेयों का प्रतिपादन किया गया है। महार्थमंजरी (पृ० ८९-९४) में वृन्दचक्र के अन्तर्गत धाम, मुद्रा, वर्ण, कला, संवित्, भाव, पात और अनिकेत इन आठ पदार्थों की व्याख्या की गई है। प्रस्तुत प्रकरण में वर्णक्रम और संवित्क्रम से इन्हीं प्रमेयों की ओर इंगित है। जिज्ञासु जनों को इनके स्वरूप का परिचय वहीं से प्राप्त करना चाहिये।