यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय हम निधिपति का आह्वान करते हैं. जगत् को आप ने बसाया है. आप हमारे होइए. आप संसार के गर्भधारी हैं. हम आप की इस गर्भधारण क्षमता को जानें. ( १९ ) ता ऽ उभौ चतुरः पदः संप्रसारयाव स्वर्गे लोके प्रोर्णुवाथां वृषा वाजी रेतोधा रेतो दधातु.. (२०) यज्ञ शक्ति और देव शक्ति दोनों से उम्मीद है कि वे अपने चारों पैरों का प्रसार करने की कृपा करें. दोनों शक्तियां स्वर्गलोक एवं पृथ्वीलोक में व्याप्त करने की कृपा करें. दोनों शक्तियां बलवान हैं. वे हमें बलशाली व वीर्यवान बनाएं. हमारे लिए शक्ति और शौर्य धारण करें. ( २० ) उत्सक्थ्या अव गुदं धेहि समज्रिं चारया वृषन्. य स्त्रीणां जीवभोजनः.. (२१) हे परम शक्ति! आप दुष्टों का दमन करने वाले व शक्तिमान हैं. जो व्यक्ति स्त्रियों से अपनी आजीविका कमाते हैं, अपना भोजन पाते हैं, आप उन को प्रताड़ना दीजिए. ( २१ ) यकासकौ शकुन्तिकाहालयिति वञ्चति. आहन्ति गभे पसो निगलगलीति धारका.. (२२) यह जल पक्षी की भांति प्रसन्नतादायी निनाद ( आवाज ) करता है. यह जल तेजोमय है. यह तेजस्वी जल कलकल निनाद करता है और शक्तिधारी है. ( २२ ) यकोसकौ शकुन्तक ऽ आहालयिति वञ्चति. विवक्षत ऽ इव ते मुखमध्वर्यो मा नस्त्वमभि भाषथाः.. (२३) उपर्युक्त तेज के प्रभाव से बोलने के इच्छुक मुंह पक्षी की तरह निरंतर शब्द करते हैं. उन से निवेदन है कि वे यज्ञ के बारे में निरर्थक बात न करें. ( २३ ) माता च ते पिता च ते ऽ ग्रं वृक्षस्य रोहतः. प्रतिलामीति ते पिता गभे मुष्टिमत् ँष् सयत्.. (२४) हे यजमान! आप के माता और पिता वृक्ष के आगे के भाग से ऊर्ध्व गति पाते हैं. ऊर्ध्वलोक से आप के पूर्वज बादल से वर्षा कर के शोभा बढ़ाते हुए ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो वे कहते हैं, हम आप से प्रसन्न हैं. ( २४ ) माता च ते पिता च तेग्रे वृक्षस्य क्रीडतः. विवक्षत ऽ इव ते मुखं ब्रह्मन्मा त्वं वदो बहु.. (२५) आप के माता और पिता वृक्ष के आगे के भाग पर खेलते हैं. आप बोलने के अधिक इच्छुक प्रतीत होते हैं. आप अधिक मत बोलें. ( २५ ) २९६ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय ऊर्ध्वामेनामुच्छ्रापय गिरौ भार १भ् हरन्निव. अथास्यै मध्यमेधता १भ् शीते वाते पुनन्निव.. ( २६ ) हे प्रजापति! आप इस राष्ट्र को ऊंचाइयों तक पहुंचाइए. हे प्रजापति! जैसे किसी भार को पर्वत पर पहुंचा कर ( लोग ) प्रसन्न होते हैं, उसी प्रकार हम राष्ट्र को ऊंचाई पर पहुंचा कर प्रसन्न होते हैं. जैसे ठंडी हवाओं के बीच से किसान अन्न को साफ करते हैं, उसी प्रकार प्रजापति की कृपा से हम राष्ट्र को पवित्र करें. ( २६ ) ऊर्ध्वमेनमुच्छ्रयताद्गिरौ भार १भ् हरन्निव. अथास्य मध्यमेजतु शीते वाते पुनन्निव.. ( २७) हे प्रजापति! आप इस राष्ट्र को ऊंचाइयों तक पहुंचाइए. हे प्रजापति! जैसे भार को पर्वत पर पहुंचा कर प्रसन्न होते हैं (लोग ), उसी प्रकार हम राष्ट्र को ऊंचाई पर पहुंचा कर प्रसन्न होते हैं. जैसे ठंडी हवाओं के बीच से किसान अन्न को साफ करते हैं, उसी प्रकार प्रजापति की कृपा से हम राष्ट्र को पवित्र करें. ( २७ ) यदस्या ऽ अ १भ् हुमेद्याः कृधु स्थूलमुपातसत्. मुष्काविदस्या ऽ एजतो गोशफे शकुलाविव.. ( २८) यह यज्ञाग्नि पाप भेदक व दुष्ट नाशक है. इस यज्ञाग्नि की स्थूल पृथ्वी पर स्थापना हो जाती है तब ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि धर्म रूपी गाय के चरणों में खुरों की तरह सुशोभित होते हैं. ( २८ ) यद्देवासो ललामगुं प्रविष्टिमिनमाविषुः. सक्थ्ना देदिश्यते नारी सत्यस्याक्षिभुवो यथा.. (२९) जब ऐसी ही ( यज्ञ जैसी ) परमानंददायी गतिविधि संपन्न होती है तो उन्हें उस परम सत्य की वैसे ही अनुभूति हो जाती है, जैसे स्त्री के अंगों को देख कर स्त्री की पहचान हो जाती है. ( २९ ) यद्धरिणो यवमत्ति न पुष्टं पशु मन्यते. शूद्रा यदर्यजारा न पोषाय धनायति.. (३०) जब हिरण खेत में घुस कर जौ ( अनाज ) खा जाता है तो किसान हिरण की पुष्टता से खुश नहीं होते बल्कि अपनी हानि से दुःखी ही होते हैं. वैसे ही कोई शूद्रा जार से ज्ञानधन पाती है तो उस का पति उस के इस तरह ज्ञान संपन्न होने से प्रसन्न नहीं होता है. ( ३० ) यद्धरिणो यवमत्ति न पुष्टं बहु मन्यते. शूद्रो यदर्यायै जारो न पोषमनु मन्यते.. (३१) जब हिरण खेत में घुस कर जौ ( अनाज ) खा जाता है तो किसान हिरण की यजुर्वेद - २९७
उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय
उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय पुष्टता से खुश नहीं होते बल्कि अपनी हानि से दुःखी ही होते हैं. वैसे ही कोई शूद्रा आर्यजन से ज्ञान पाती है तो उस का पति उस की इस ज्ञान प्राप्ति से ज्ञान पोषण को नहीं मानता. ( ३१ ) दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः. सुरभि नो मुखा करत्प्र ण ऽ आयूं षि तारिषत्.. (३२) हम शक्तिशाली यज्ञ की अग्नि को विधिविधानपूर्वक संस्कार युक्त बनाते हैं. यज्ञ देव की कृपा हमारे मुखों को सुगंधमय व हमें आयुष्मान बनाए. यज्ञ देव की कृपा हमारा तारण करें. ( ३२ ) गायत्री त्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप्पङ्क्त्या सह. बृहत्युष्णिहा ककुप्सूचीभिः शम्यन्तु त्वा.. (३३) हे यज्ञाग्नि! हम गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती, उष्णिाक्, ककुप् छंद व सूचियों से आप को शांत करते हैं. आप शांत होने की कृपा कीजिए. ( ३३ ) द्विपदा याश्चतुष्पदास्त्रिपदा याश्च षट्पदाः. विच्छन्दा याश्च सच्छन्दाः सूचीभिः शम्यन्तु त्वा.. (३४) हे यज्ञाग्नि! जो दो, तीन, चार, छह पद वाले, छंद छंदहीन व छंद छंदयुक्त हैं, वे सूचियों द्वारा आप को शांति प्रदान करें. ( ३४ ) महानाम्न्यो रेवत्यो विश्वा आशाः प्रभूवरीः. मैध्रीर्विद्युतो वाचः सूचीभिः शम्यन्तु त्वा.. (३५) हे यज्ञाग्नि! सब प्राणियों को धारण करने वाली ऋचाएं, समस्त दिशाएं, ‘महानाम्नी’ देववाणियां, रेवती नमक ऋचाएं, बादलों की बिजली और श्रेष्ठ वाणियां सूचियों द्वारा आप को शांति प्रदान करें. ( ३५ ) नार्यस्ते पत्न्यो लोम विचिन्वन्तु मनीषया. देवानां पत्न्यो दिशः सूचीभिः शम्यन्तु त्वा.. (३६) हे यज्ञाग्नि! यजमान की पत्नियां नेतृत्व करने में समर्थ हैं. हे यजमान! वे नारियां आप के लोमों को बुद्धिपूर्वक चुन कर अलग करने की कृपा करें. देवगणों की पत्नियां व दिशाएं सूची से आप को शांत करने की कृपा करें. ( ३६ ) रजता हरिणीः सीसा युजो युज्यन्ते कर्मभिः. अश्वस्य वाजिनस्त्वचि सिमाः शम्यन्तु शम्यन्तीः.. (३७) चांदी, सीसा और सोना विधिविधानपूर्वक यज्ञ में जोड़ा जाता है. वे इस यज्ञ २९८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय की सम्यक् रूप से रक्षा करें. वे इस यज्ञ की अग्नि को सम्यक् रूप से शांत करने की कृपा करें. ( ३७ ) कुविदङ्ग्यवमन्तो यवञ्चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय. इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ये बर्हिषो नम ऽ उक्तिं यजन्ति.. ( ३८ ) हे सोम! यवमान यानी जौ से पूरी तरह भरी हुई फसल को हम सब बहुत सोचविचार कर सावधानीपूर्वक काटते हैं. हम दया से परिपूर्ण आप को कुश का आसन भेंट करते हैं. आप यहां आने व भोजन करने की कृपा कीजिए. ये यजमान कुश के आसन पर बैठ कर नमस्कारपूर्वक आप के लिए यज्ञ कर रहे हैं. ( ३८ ) कस्त्वा च्छ्यति कस्त्वा विशास्ति कस्ते गात्राणि शम्यति. क ऽ उ ते शमिता कवि:.. ( ३९) कौन आप को आजाद करता है ? कौन आप को आदेश ( उपदेश ) देता है ? कौन आप को शांत करता है ? कौन आप को सुख देता है ? विद्वान् ( कवि ) परमात्मा ही यह सब करते हैं. ( ३९ ) ऋतवस्त ऽ ऋतुथा पर्व शमितारो वि शासतु. संवत्सरस्य तेजसा शमीभिः शम्यन्तु त्वा.. ( ४० ) ऋतुएं ऋतु के अनुसार सुखदायी हों. पर्व सुखद व अनुशासन में रहें. संवत्सर के तेज से सुख मिले. शांतिदायी कर्म आप के लिए सुखद हों. ( ४० ) अर्धमासाः परूंषि ते मासा ऽ आ च्छ्यन्तु शम्यन्तः. अहोरात्राणि मरुतो विलिष्टं सूदयन्तु ते.. ( ४१ ) हे परम पुरुष! आधे माह पक्ष और मास से आयु क्षीण होती है. मरुद्गण दिनरात आप के दुःख दूर करने की कृपा करें. ( ४१ ) दैव्या अध्वर्यवस्त्वा च्छ्यततु वि च शासतु. गात्राणि पर्वशस्ते सिमाः कृण्वन्तु शम्यन्तीः.. ( ४२ ) इस यज्ञ के अध्वर्यु ( पुरोहित ) आप के दोषों का क्षय करें व आप के अनुशासन हेतु मार्गदर्शन करें. इस यज्ञ के अध्वर्यु आप के शरीर उस के जोड़ों को शक्तिमान बनाने की कृपा करें. ( ४२ ) द्यौस्ते पृथिव्यन्तरिक्षं वायुश्छिद्रं पृणातु ते. सूर्यस्ते नक्षत्रैः सह लोकं कृणोतु साधुया.. ( ४३ ) हे परमात्मा! आप पृथ्वीलोक ( यजमान ) को परिपूर्ण बनाने की कृपा करें. आप अंतरिक्षलोक के दोष दूर करें. आप अंतरिक्षलोक को परिपूर्ण बनाने की कृपा यजुर्वेद - २९१
उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय करें. आप वायुलोक के दोष दूर करने की कृपा करें. हे परमात्मा! आप वायुलोक को परिपूर्ण बनाने की कृपा करें. सूर्य नक्षत्रों के साथ इस लोक को सज्जनता से पूरित करने की कृपा करें. ( ४३ ) शं ते परेभ्यो गात्रेभ्यः शमस्त्ववरेभ्यः. शमस्थिभ्यो मज्जभ्यः शम्वस्तु तन्वौ तव.. (४४) हे परमात्मा! आप की कृपा से हमारे शरीर के अंग विकारहीन हो जाएं. आप की कृपा से हमारे शरीर की हड्डियां व मज्जा विकारहीन हो जाएं. आप की कृपा से हमारे सुखों का विस्तार हो जाए. ( ४४ ) कः स्विदेकाकी चरति क ऽ उ स्विज्जायते पुनः. कि १४ स्विद्धिमस्य भेषजं किम्वावपनं महत्.. (४५) कौन अकेला विचरता है ? कौन बारबार उत्पन्न होता हैं? हिम की ओषधि कौन सी है ? अच्छी तरह बीज बोने का विशाल स्थान कौन सा है ? ( ४५ ) सूर्य ऽ एकाकी चरति चन्द्रमा जायते पुनः. अग्निर्गृहमस्य भेषजं भूमिरावपनं महत्.. (४६) सूर्य अकेले विचरते हैं. चंद्र देव बारबार उत्पन्न होते हैं. हिम की ओषधि अग्नि है. पृथ्वी बीज बोने का विशाल स्थान है. ( ४६ ) कि १४ स्वित्सूर्यसमं ज्योतिः कि १४ समुद्रसम १४ सरः. कि १४ स्वित्पृथिव्यै वर्षीयः कस्य मात्रा न विद्यते.. (४७) सूर्य के समान ज्योति कौन सी है ? समुद्र के समान तालाब कौन सा है ? पृथ्वी देवी से भी अधिक वर्षों वाला ( पुराना ) कौन है ? किस की कोई मात्रा ( परिमाण ) नहीं है ? ( ४७ ) ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिर्द्यौः समुद्रसम १४ सरः. इन्द्रः पृथिव्यै वर्षीयान् गोस्तु मात्रा न विद्यते.. (४८) ब्रह्म देव की ज्योति सूर्य की ज्योति के समान है. स्वर्गलोक समुद्र के समान तालाब है. इंद्र देव पृथ्वी देवी से भी पुराने हैं. गौ माता का कोई परिमाण नहीं है. ( ४८ ) पृच्छामि त्वा चितये देवसख यदि त्वमत्र मनसा जगन्थ. येषु विष्णुस्त्रिषु पदेष्वेष्टस्तेषु विश्वं भुवनमा विवेशाँ ३.. (४९) हे देवसखाओ! हम जिज्ञासु हैं. हम मन से आप से पूछते हैं कि क्या विष्णु ने अपने तीन पैरों में विश्व के सभी भुवनों को समा लिया ? क्या तीनों लोक विष्णु ३०० – यजुर्वेद
उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय के पैरों में (की परिधि में ) समा गए. यदि आप इस बात को जानते हैं तो हमें बताने की कृपा कीजिए. (४९) अपि तेषु त्रिषु पदेष्वस्मि येषु विश्वं भुवनमा विवेश. सद्यः पर्येमि पृथिवीमुत द्यामेकेनाङ्गेन दिवो अस्य पृष्ठम्.. (५०) जिन में सारे विश्व के भुवन समा गए, उन तीनों पैरों में भी मैं ही हूं. पृथ्वीलोक के ऊपर जो लोक है, उसे मैं इस एक मन रूपी अंग से जान जाता हूं. स्वर्गलोक के आधार पर लोक है. उसे मैं इस एक मन रूपी अंग से जान जाता हूं. (५०) केष्वन्तः पुरुष ऽ आ विवेश कान्यन्तः पुरुषे अर्पितानि. एतद्ब्रह्मन्नुप वल्हामसि त्वा किं स्विन्नः प्रति वोचास्यत्र.. (५१) किस के अंतस्तल में परम पुरुष आ कर रमण करता है? परम पुरुष के अंतस्तल में किन वस्तुओं को अर्पित किया जाता है? हे ब्राह्मण! हम यजमान यह जानने के इच्छुक हैं. आप कृपया हमारी इन जिज्ञासाओं को वाणी प्रदान करने की कृपा कीजिए. (५१) पञ्चस्वन्तः पुरुष ऽ आ विवेश तान्यन्तः पुरुषे अर्पितानि. एतत्त्वात्र प्रतिमन्वानो अस्मि न मायया भवस्युत्तरो मत्.. (५२) आप यह मानते हैं कि आप यह नहीं जानते. अतः मैं माया से अर्थात् आप को मायापूर्वक प्रत्युत्तर देता हूं कि परम पुरुष पांच महाभूतों व पांच तन्मात्राओं में रमण करता है. परम पुरुष को पांच महाभूत व तन्मात्राएं अर्पित हैं. (५२) का स्विदासीत्पूर्वचित्तिः किं स्विदासीद् बृहद्वयः. का स्विदासीत्पिलिप्पिला का स्विदासीत्पिशङ्गिला.. (५३) हे अध्वर्युगण! सब से पहले क्या जानना चाहिए? सब से बड़ा पक्षी कौन सा है? सब से अद्भुत रूप वाला कौन है? वह कौन है, जो सब रूपों को निगल जाता है. (५३) द्यौरासीत्पूर्वचित्तिरश्व ऽ आसीद् बृहद्वयः. अविरासीत्पिलिप्पिला रात्रिरासीत्पिशङ्गिला.. (५४) सब से पहले स्वर्गलोक को जानना चाहिए. सब से बड़ा पक्षी अग्नि रूपी अश्व है. पृथ्वी सब से अधिक रूपों को निगलने वाली है. रात्रि सभी रूपों को निगल जाने वाली होती है. (५४) का ईमरे पिशङ्गिला का ईं कुरुपिशङ्गिला. क ऽ ईमास्कन्दमर्षति क ऽ ईं पन्थां वि सर्पति.. (५५) यजुर्वेद - ३०१
उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय कौन रूपों को निगल जाती है ? कौन शब्द सहित सारे रूपों को निगल जाती है ? कौन उछलउछल कर चलता है ? कौन सरकसरक कर चलता है ? ( ५५ ) अजारे पिशङ्गिला श्वावित्कुरुपिशङ्गिला. शश ऽ आस्कन्दमर्षत्यहिः पन्थां वि सर्पति.. (५६) हे अध्वर्युओ! माया सब को निगलती है. वही विचित्र रूपों में शब्द को निगल जाती है. खरगोश उछलता है. विशेषतया सांप मार्ग पर सरकसरक कर चलता है. ( ५६ ) कत्यस्य विष्ठाः कत्यक्षराणि कति होमासः कतिधा समिद्धः. यज्ञस्य त्वा विदथा पृच्छमत्र कति होतार ऽ ऋतुशो यजन्ति.. (५७) इस यज्ञ में कितने अन्न हैं ? इस यज्ञ में कितने अक्षर हैं ? होम कितने ( प्रकार के ) होते हैं ? समिधाएं कितने ( प्रकार की ) होती हैं ? आप यज्ञ ( विद्या ) को विशेष प्रकार से जानते हैं. हम आप से यह जानना चाहते हैं कि प्रत्येक ऋतु में कितने होता यज्ञ करते हैं. ( ५७ ) षडस्य विष्ठाः शतमक्षराण्यूशीतिर्होमाः समिधो ह तिस्रः. यज्ञस्य ते विदथा प्र ब्रवीमि सप्त होतार ऽ ऋतुशो यजन्ति.. (५८) इस यज्ञ में छह प्रकार के अन्न हैं. इस यज्ञ में सौ अक्षर हैं. अस्सी प्रकार के होम होते हैं. समिधाएं तीन प्रकार की होती हैं. प्रत्येक ऋतु में सात होता यज्ञ करते हैं. ( ५८ ) को अस्य वेद भुवनस्य नाभिं को द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम्. कः सूर्यस्य वेद बृहतो जनित्रं को वेद चन्द्रमसं यतोजाः.. (५९) कौन है, जो इस लोक की नाभि को जानता है ? कौन है, जो स्वर्गलोक को जानता है ? कौन है जो अंतरिक्षलोक को जानता है ? कौन है, जो सूर्य की उत्पत्ति को जानता है ? कौन है, जो चंद्रमा की उत्पत्ति को जानता है ? ( ५९ ) वेदाहमस्य भुवनस्य नाभिं वेद द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम्. वेद सूर्यस्य बृहतो जनित्रमथो वेद चन्द्रमसं यतोजाः.. (६०) मैं ( परमात्मा ) इस लोक की नाभि को जानता हूं. मैं स्वर्गलोक को जानता हूं. मैं अंतरिक्षलोक को जानता हूं. मैं सूर्य व चंद्र देव की उत्पत्ति को जानता हूं. ( ६० ) पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्याः पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभिः. पृच्छामि त्वा वृष्णो अश्वस्य रेतः पृच्छामि वाचः परमं व्योम.. (६१) हम यजमान पृथ्वी के परम अंत से पूछते हैं. हम यजमान लोक की नाभि से ३०२ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय पूछते हैं. हम यजमान आप से पूछते हैं कि घोड़ों के वीर्य का बल कौन है. हम यजमान पूछते हैं कि वाणी का परम व्योम क्या है ? ( ६१ ) इयं वेदिः परो अन्तः पृथिव्या ऽ अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः. अय १४ सोमो वृष्णो अश्वस्य रेतो ब्रह्मायं वाचः परमं व्योम.. ( ६२ ) यह वेदी पृथ्वी का परम अंत है. यह यज्ञ की नाभि है. यह सोम अश्व के वीर्य का बल है. ब्रह्मा वाणी का परम व्योम है. ( ६२ ) सुभूः स्वयम्भूः प्रथमोन्तर्महत्यर्णवे. दधे ह गर्भमृत्वियं यतो जातः प्रजापतिः.. ( ६३ ) परमात्मा स्वयं उत्पन्न होने वाले हैं. उन्होंने सारे संसार को उपजाया है. सर्वप्रथम उन्होंने महान् अर्णव ( समुद्र ) में गर्भ धारा. उस गर्भ से प्रजापति ब्रह्मा उत्पन्न हुए. ( ६३ ) होता यक्षत्प्रजापति १४ सोमस्य महिम्नः. जुषतां पिबतु सोम १४ होतर्यज.. ( ६४ ) होता ने महिमाशालि सोम से प्रजापति का यजन किया. प्रजापति से निवेदन है कि प्रजापति उस सोमरस को पीने की कृपा करें. आप होताओं से भी निवेदन है कि आप भी ऐसा ही यजन करने की कृपा करें. ( ६४ ) प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परि ता बभूव. यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वय १४ स्याम पतयो रयीणाम्.. ( ६५ ) हे प्रजापति! आप के अलावा कोई दूसरा उतने विश्व रूपों वाला नहीं हो सकता. हम जिस कामना से यज्ञ करते हैं, हमारी वह कामना पूर्ण हो. हम धनों के स्वामी हो जाएं. ( ६५ ) यजुर्वेद - ३०३
चौबीसवां अध्याय
चौबीसवां अध्याय अश्वस्तूपरो गोमृगस्ते प्राजापत्याः कृष्णग्रीव ऽ आग्नेयो रराटे पुरस्तात्सारस्वती मेष्यधस्ताद्धन्वोरावश्विनावधोरामौ बाह्वोः सौमापौष्णः श्यामो नाभ्या ᳪ सौर्यायामौ श्वेतश्च कृष्णश्च पार्श्वयोस्त्वाष्ट्रौ लोमशसक्थौ सक्थ्योर्वायव्यः श्वेतः पुच्छ ऽ इन्द्राय स्वपस्याय वेहद्वैष्णवो वामनः.. (१) घोड़ा, नीलगाय तथा वृषभ प्रजापति देव से संबंधित हैं. काली गरदन वाला अज अग्नि से संबंधित है. सम्मुख स्थित मेष सरस्वती देवी से संबंधित है. नीचे स्थित धन अश्विनी देव से संबंधित है. काली नाभि वाला अश्व सोम और पूषा देव से संबंधित है. काले और सफेद पार्श्व भाग वाले सूर्य और यम देव से संबंधित हैं. अधिक लोम वाले त्वष्टा देव से संबंधित हैं. सफेद पूंछ वाले वायु देव से संबंधित हैं. गर्भ से द्वेष करने वाले इंद्र देव से संबंधित हैं. वामन (ठिगना) पशु विष्णु देव से संबंधित हैं. (१) रोहितो धूम्ररोहितः कर्कन्धुरोहितस्ते सौम्या बभ्रुररुणबभ्रुः शुकबभ्रुस्ते वारुणाः शितिरन्ध्रोन्यतः शितिरन्ध्रः समन्तशितिरन्ध्रस्ते सावित्राः शितिबाहुरन्यतः शितिबाहुः समन्तशितिबाहुस्ते बार्हस्पत्याः पृषती क्षुद्रपृषती स्थूलपृषती ता मैत्रावरुण्यः.. (२) लाल, धुएं जैसे लाल, पके फल जैसे लाल पशु सोम से संबंधित हैं. भूरा लाल, भूरा शुक्र जैसा हरा रंग वरुण देव से संबंधित है. कहींकहीं सफेद छेद वाले और एक ओर सफेद छेद वाले पशु सविता देव से संबंधित हैं. कहींकहीं सफेद बाहु वाले पूरी तरह सफेद बाहु वाले पशु बृहस्पति देव से संबंधित हैं. छोटे चकत्ते वाले व बड़े चकत्ते वाले मित्र देव और वरुण देव से संबंधित हैं. (२) शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त ऽ आश्विनाः श्येतः श्येताक्षोरुणस्ते रुद्राय पशुपतये कर्णा यामा ऽ अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपाः पार्जन्याः.. (३) एकदम शुद्ध बालों वाले, संपूर्ण शुद्ध बालों वाले, मणि के समान बालों वाले, शुद्ध बालों वाले अश्विनीकुमारों से संबंधित हैं. सफेद रंग, सफेद आंख, लाल रंग वाले पशु रुद्र देव के लिए और पशुपति के लिए हैं. सफेद कान वाले यम के लिए ३०४ - यजुर्वेद 632/19
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय रौद्र स्वभाव वाले रुद्र देव के लिए हैं. नभ रूप वाले पर्जन्य देव से संबंधित हैं. ( ३ ) पृश्निस्तिरश्चीनपृश्निरूर्ध्वपृश्निस्ते मारुताः फल्गूलौर्हितोर्णी पलक्षी ताः सारस्वतयः प्लीहाकर्णः शुण्ठाकर्णोध्यालोहकर्णस्ते त्वाष्ट्राः कृष्णग्रीवः शितिकक्षोज्ज्सक्थस्त ऽ ऐन्द्राग्नाः कृष्णाज्जिरल्पाज्जिर्महाज्ज्रिस्त ऽ उषस्याः.. (४) विचित्र रंग वाले तिरछी रेखा वाले और विचित्र बिंदु वाले मरुद्गण से संबंधित हैं. हलकीफुलकी लाल सफेद ऊन वाली ( भेड़ें ) सरस्वती देवी से संबंधित हैं. प्लीहा ( के रोगी ) कान वाले छोटे तथा लाल रंग के कान वाले त्वष्टा देव से संबंधित हैं. काली गरदन वाले, सफेद कांख वाले, लाल जांघों वाले इंद्र देव से संबंधित हैं. अग्नि देव से संबंधित हैं. काले, छोटे एवं बड़े धब्बे वाले पशु उषा देवी से संबंधित हैं. ( ४ ) शिल्पा वैश्वदेव्यो रोहिण्यस्त्र्यवयो वाचेविज्ञाता आदित्यै सरूपा धात्रे वत्सर्यो देवानां पत्नीभ्यः.. (५) विश्व देवी के पशु चितकबरे ( विचित्र ) रंग के हैं. आदित्य देव के अस्त्र अवयव वाणी अज्ञात व सुरूप हैं. धारक देव हेतु हैं. देवताओं की पत्नियों के लिए ये बछियां हैं. ( ५ ) कृष्णग्रीवा ऽ आग्नेयाः शितिभ्रुवो वसूना १४ रोहिता रुद्राणा १४ श्वेता ऽ अवरोकिण ऽ आदित्यानां नभोरूपाः पार्जन्याः.. (६) काली गरदन वाले पशु अग्नि, सफेद भौंहों वाले पशु वसुदेव व लाल रंग वाले पशु रुद्रदेव से संबंधित हैं. सफेद रंग वाले पशु आदित्य देव व नभ जैसे रूप वाले पशु पर्जन्य ( बादल ) से संबंधित हैं. ( ६ ) उन्नत ऽ ऋषभो वामनस्त ऽ ऐन्द्रावैष्णवा उन्नत ः शितिबाहुःशिति पृष्ठस्त ऽ ऐन्द्रा बार्हस्पत्याः शुकरूपा वाजिनाः कल्माषा ऽ आग्निमारुताः श्यामाः पौष्णाः.. (७) ऊंचे, नाटे, शक्तिमान पशु इंद्र देव और विष्णु, उन्नत, सफेद बाहु व सफेद पीठ वाले पशु इंद्र देव और बृहस्पति देव तथा शुक जैसे रूप वाले पशु वाजी देव से संबंधित हैं. चितकबरे पशु अग्नि और मरुद् देव से संबंधित हैं. श्याम रंग वाले पूषा देव से संबंधित हैं. ( ७ ) एता ऽ ऐन्द्राग्ना द्विरूपा ऽ अग्नीषोमीया वामना ऽ अनड्वाह ऽ आग्नावैष्णवा वशा मैत्रावरुण्योन्यत ऽ एन्यो मैत्र्यः.. (८) दो रूप वाले पशु इंद्र देव और अग्नि से संबंधित हैं. दो रूप वाले पशु सोम और अग्नि व छोटे रूप वाले पशु विष्णु और अग्नि से संबंधित हैं. बांझ पशु मित्र देव और वरुण देव से व अन्य पशु मित्र देव से संबंधित हैं. ( ८ ) यजुर्वेद - ३०५
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय कृष्णग्रीवा ऽ आग्नेया बभ्रवः सौम्याः श्वेता वायव्या ऽ अविज्ञाता ऽ अदित्यै सरूपा धात्रे वत्सप्तर्यो देवानां पत्नीभ्यः.. (९) काली गरदन वाले अग्नि, भूरे रंग वाले सोम, सफेद रंग वाले वायु से संबंधित हैं. अज्ञात रंग वाले आदित्य देव से संबंधित हैं. सुंदर रंग वाले धाता देव से संबंधित हैं. बछियां देव पत्नियों से संबंधित हैं. ( ९ ) कृष्णा भौमा धूम्ना ऽ आन्तरिक्षा बृहन्तो दिव्याः शबला वैद्युताः सिध्मास्तारकाः.. (१०) काले रंग के पशु भूमि के लिए, धुएं जैसे अंतरिक्ष हेतु विशाल पशु स्वर्ग के लिए, बहुरंगी विद्युत् हेतु और कुष्ठी पशु तारकों के लिए हैं. ( १० ) धूम्रान्वसन्तायालभेते श्वेतान्ग्रीष्माय कृष्णान्वर्षाभ्योऽरुणाञ्छरदे पृषतो हेमन्ताय पिशङ्गाञ्छिशिराय.. (११) धुएं जैसे रंग के पशु वसंत, सफेद जैसे रंग के पशु ग्रीष्म ऋतु व काले जैसे रंग के पशु वर्षा ऋतु के लिए हैं. गुलाब जैसे रंग के पशु शरद ऋतु के लिए, चितकबरे रंग के पशु हेमंत ऋतु व काले, पीले रंग के पशु शिशिर ऋतु के लिए हैं. ( ११ ) त्र्यवयो गायत्र्यै पञ्चावयस्त्रिष्टुभे दित्यवाहो जगत्यै त्रिवत्सा ऽ अनुष्टुभे तुर्यवाह ऽ उष्णिहे.. (१२) डेढ़ वर्ष के गायत्री हेतु, ढाई वर्ष के त्रिष्टुप् के लिए, तीन वर्ष के अनुष्टुप् हेतु, साढ़े तीन वर्ष के उष्णिग् छंद के लिए हैं. ( १२ ) पष्ठवाहो विराज ऽ उक्षाणो बृहत्या ऽ ऋषभाः ककुभेनड्वाहः पङ्क्त्यै धेनवौतिच्छन्दसे.. (१३) पीछे से भार ढोने वाले विराज छंद के लिए हैं. वीर्य सिंचक बृहती छंद के लिए हैं. बलवान ककुप् छंद के लिए हैं. गाड़ी खींचने वाले पंक्ति छंद के लिए दूध देने वाले अतिच्छंद के लिए हैं. ( १३ ) कृष्णग्रीवा ऽ आग्नेया बभ्रवः सौम्या ऽ उपध्वस्ताः सावित्रा वत्सप्तर्यः सारस्वत्यः श्यामाः पौष्णाः पृश्नयो मारुता बहुरूपा वैश्वदेवा वशा द्यावापृथिवीयाः.. (१४) काली गरदन वाले अग्नि व भूरे सोम से संबंधित हैं. मिश्रित रंग वाले सविता देव व छोटी बछियां सरस्वती देवी से संबंधित हैं. काले रंग के पूषा देव से संबंधित हैं. चितकबरे मरुद्गण से संबंधित हैं. बहुरूप वाले विश्व से संबंधित हैं. वंध्या गाएं स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक से संबंधित हैं. ( १४ ) उक्ताः सञ्चरा ऽ एता ऽ ऐन्द्राग्नाः कृष्णा वारुणाः पृश्नयो मारुताः कायास्तूपराः.. (१५) कहे गए संचरणशील पशु इंद्र देव और अग्नि के लिए हैं. काले रंग के पशु ३०६ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय वरुण देव के लिए चितकबरे रंग के पशु मरुद्गण के लिए व सींगरहित पशु प्रजापति के लिए हैं. ( १५ ) अग्नयेनीकवते प्रथमजानालभते मरुद्भ्यः सान्तपनेभ्यः सवात्यान्मरुद्भ्यो गृहमेधिभ्यो बष्किहान्मरुद्भ्यः क्रीडिभ्यः स ᳪ सृष्टान्मरुद्भ्यः स्वतवद्भ्योऽनुसृष्टान्.. ( १६ ) पहले जन्मे पशु सेनापति जैसे अग्नि के लिए हैं. उत्तम तप करने वाले मरुद्गणों के लिए वायु जैसे गतिमान पशु हैं. गृहमेध मरुद्गणों के लिए चिरप्रसूत पशु हैं. क्रीड़ाकारी मरुद्गणों के लिए अच्छे गुणी पशु हैं. स्वप्रेरित मरुद्गणों के लिए साथ रहने वाले पशु हैं. ( १६ ) उक्ताः सञ्चरा ऽ एता ऽ ऐन्द्राग्नाः प्राशृंगा माहेन्द्रा बहुरूपा वैश्वकर्मणाः... ( १७ ) ऊपर कहे गए संचरणशील पशु इंद्र देव एवं अग्नि के लिए हैं. प्रकृष्ट ( श्रेष्ठ ) सींग वाले पशु महेंद्र देव आदि के लिए हैं. बहुत से रंगों वाले विश्वकर्मा देव के लिए हैं. ( १७ ) धूम्रा बभ्रुनीकाशाः पितृणा ᳪ सोमवतां बभ्रवो धूम्रनीकाशाः पितॄणां बर्हिषदां कृष्णा बभ्रुनीकाशाः पितॄणामग्निष्वात्तानां कृष्णाः पृषन्तस्त्रैयम्बकाः.. ( १८ ) धुएं जैसे भूरे रंग के पशु पितरों के लिए हैं. धुएं और नेवले जैसे भूरे रंग के सोम गुणों वाले पशु पितरों के लिए हैं. काले और भूरे रंग के कुश के आसन पर बैठे पशु पितरों के लिए हैं. अग्नि विद्या में निपुण पशु पितरों के लिए हैं. काले रंग के चकत्तेदार पशु पितरों के लिए हैं. ( १८ ) उक्ताः सञ्चरा ऽ एताः शुनासीरीयाः श्वेता वायव्याः श्वेताः सौर्याः... ( १९ ) उपर्युक्त पशुओं के साथ ही संचरणशील पशु शुनासीर के लिए हैं. सफेद रंग के पशु वायु देव के लिए हैं. सफेद आभा वाले पशु सविता देव के लिए हैं. ( १९ ) वसन्ताय कपिञ्जलानालभते ग्रीष्माय कलविङ्कान्वर्षाभ्यस्तित्तिरीञ्छरदे वर्तिका हेमन्ताय ककराञ्छिशिराय विककरान्.. ( २० ) वसंत ऋतु के लिए चातक, गरमी के लिए चटक व वर्षा के लिए तीतर का निर्धारण किया गया है. लवा शरद ऋतु, ककर व शिशिर ऋतु हेतु विककर पक्षियों का निर्धारण किया गया है. ( २० ) समुद्राय शिशुमारानलभते पर्जन्याय मण्डूकान्द्भ्यो मत्स्यान्मित्राय कुलीपयान्वरुणाय नाक्रान्.. ( २१ ) समुद्र हेतु अपने ही बच्चों को मारने वाले पक्षी का निर्धारण किया गया है. यजुर्वेद - ३०७
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय बादल हेतु मंडूक का निर्धारण किया गया है. जलों के लिए मत्स्य, मित्र देव हेतु कुलीपय तथा वरुण देव के लिए नाक्र नामक पशु का निर्धारण किया गया है. ( २१ ) सोमाय ह १४ सानालभते वायवे बलाका ऽ इन्द्राग्निभ्यां क्रुञ्चान्मित्राय मद्गून्र्वरुणाय चक्रवाकान्.. (२२) सोम के लिए हंस पक्षी, वायु के लिए बगुली. इंद्र देव और अग्नि के लिए सारस, मित्र देव के लिए क्रौंच तथा वरुण देव हेतु चकवे का विधान किया गया है. ( २२ ) अग्नये कुटरूनालभते वनस्पतिभ्य ऽ उलूकानग्नीषोमाभ्यां चाषानश्विभ्यां मयूरान्मित्रावरुणाभ्यां कपोतान्.. (२३) अग्नि के लिए मुरगे व वनस्पतिदेव के लिए उल्लू व अग्नि और सोम हेतु नीलकंठ पक्षी का विधान मिलता है. अश्विनी देवों के लिए मोर व वरुण देव के लिए कबूतर पक्षी का विधान मिलता है. ( २३ ) सोमाय लबानालभते त्वष्ट्रे कौलीकानघोषादीर्देवानां पत्नीभ्यः कुलीका देवजामिभ्योग्नये गृहपतये पारूष्णान्.. (२४) सोम के लिए लबा, त्वष्टा के लिए बया व देव पत्नियों के लिए घोष आदि गुह्यतल पक्षी का विधान मिलता है. देवताओं की बहनों के लिए कुलीक व गृहपति हेतु पारूष्ण का विधान मिलता है. ( २४ ) अह्ने पारावतानालभते रात्र्यै सीचापूरहोरात्रयोः सन्धिभ्यो जतूर्मासेभ्यो दात्यौहान्त्संवत्तराय महतः सुपर्णान्.. (२५) दिन के लिए कबूतर और रात्रि के लिए सीचापू का विधान मिलता है. दिन तथा रात की संधि हेतु चमगादड़, मास हेतु कौए व वर्ष हेतु अच्छे पंख वाले ( गरुड़ ) का विधान मिलता है. ( २५ ) भूम्या ऽ आखूनालभतेन्तरिक्षाय पाङ्क्त्रान्दिवे कशान्दिग्भ्यो नकुलान्बभ्रुकानवान्तरदिशाभ्यः.. (२६) भूमि के लिए चूहों व अंतरिक्ष के लिए पांत में उड़ने वालों का विधान मिलता है. स्वर्ग के लिए कश व दिशाओं के लिए भूरे रंग के जंतु का विधान मिलता है. ( २६ ) वसुभ्य ऽ ऋश्यानालभते रुद्रेभ्यो रूरूनादित्येभ्यो न्यङ्कन्वश्वेभ्यो देवेभ्यः पृषतान्त्साध्येभ्यः कुलुङ्गान्.. (२७) वसुओं के लिए ऋष्य नामक हिरण व रुद्रगणों के लिए रुरु नामक हिरण का ३०८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय विधान मिलता है. आदित्य के लिए न्यंकु नामक हिरण का विधान मिलता है. विश्वों के लिए चकत्तेदार हिरण व साध्य के लिए कुलुंग हिरण का विधान मिलता है. ( २७ ) ईशानाय परस्वत ऽ आलभते मित्राय गौरान्वरुणाय महिषान्बृहस्पतये गवयांस्त्वष्ट्र ऽ उष्ट्रान्.. ( २८ ) ईशान देव हेतु परस्वत मृग, मित्र देव हेतु गौर मृग व वरुण देव हेतु भैंसों का विधान किया गया है. बृहस्पति देव हेतु गायों का और त्वष्टा देव हेतु ऊंटों का विधान किया गया है. ( २८ ) प्रजापतये पुरुषान्हस्तिन ऽ आलभते वाचे प्लुषीँश्चक्षुषे मशकाञ्छ्रोत्राय भृङ्गाः.. ( २९ ) प्रजापति हेतु हाथियों वाक् देव हेतु प्लुषी, चक्षु देव हेतु मच्छर व कानों हेतु भंवरों का विधान किया गया है. ( २९ ) प्रजापतये च वायवे च गोमृगो वरुणायारण्यो मेषो यमाय कृष्णो मनुष्यराजाय मर्कटः शार्दूलाय रोहित्ऋषभाय गवयी क्षिप्रश्येनाय वर्तिका नीलगङ्गोः कृमिः समुद्राय शिशुमारो हिमवते हस्ती.. ( ३० ) प्रजापति तथा वायु देव हेतु गोमृग, वरुण देव हेतु जंगली मेष, यम हेतु कृष्ण मेष, मनुष्यराज हेतु मर्कट, सिंहराज हेतु लाल मृग, ऋषभ हेतु गाय का विधान किया गया है. बाज हेतु बटेर, नीलांग हेतु कृमि, समुद्र हेतु शिशुमार व हिमवान हेतु हाथी का विधान किया गया है. ( ३० ) मयुः प्राजापत्य उलो हलिक्ष्णो वृषदं श्श शस्ते धात्रे दिशां कङ्को धुङ्क्षाग्नेयी कलविङ्को लोहिताहिः पुष्करसादस्ते त्वाष्ट्रा वाचे क्रुञ्चः.. ( ३१ ) प्रजापति के लिए किन्नर ( गायनवादन में कुशल ) उल को नियोजित करने की कृपा करें. खास तौर का शेर और बिलाव धाता देव हेतु नियोजित करने की कृपा करें. दिशा हेतु कंक को नियोजित करने की कृपा करें. आग्नेय दिशा हेतु धुंक्षा नियोजित करें. चिड़ा, लाल सांप और कमलभक्षी पक्षी त्वष्टा देव हेतु नियोजित करें. वाक् हेतु क्रौंच पक्षी को नियोजित करने की कृपा करें. ( ३१ ) सोमाय कुलुङ्ग ऽ आरण्योजो नकुलः शका ते पौष्णाः क्रोष्टा मायोरिन्द्रस्य गौरमृगः पिद्वो न्यङ्कुः कक्कटस्ते ऽ नुमत्यै प्रतिश्रुत्कायै चक्रवाकः.. ( ३२ ) सोम के लिए कुरंग पशु, पूषा देव के लिए जंगली मेष, नेवला तथा मधुमक्खी हैं. वायु के लिए शृगाल, इंद्र के लिए गौरमृग, अनुमति के लिए न्यंकु व प्रतिश्रुत्क देव के लिए चकवा पक्षी है. ( ३२ ) सौरी बलाका शार्गः सृजयः शयाण्डकस्ते मैत्राः सरस्वत्यै शारिः पुरुषवाक् श्वाविद्धौमी शार्दूलो वृकः पृदाकुस्ते मन्यवे सरस्वते शुकः पुरुषवाक्.. ( ३३ ) यजुर्वेद - ३०९
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय सूर्य के लिए बगुला पक्षी है. मित्र देव के लिए चातक, सृजय व शयांडक हैं. सरस्वती देवी के लिए मैना, पृथ्वी देवी के लिए सेही पक्षी व मन्यु देव के लिए सिंह, भेड़िया, सांप हैं. समुद्र के लिए मनुष्यवाची तोता पक्षी है. ( ३३ ) सुपर्णः पार्जन्य ऽ आतिर्वाहसो दर्विदा ते वायवे बृहस्पतये वाचस्पतये पैङ्गराजोलज ऽ आन्तरिक्षः प्लवो मद्गुर्मत्स्यस्ते नदीपतये द्यावापृथिवीयः कूर्मः.. (३४) पर्जन्य देव ( बादल ) के लिए गरुड़ पक्षी, वायु के लिए आती, वाहस तथा काष्ठ कुट्ट हैं. वाणीपति बृहस्पति देव के लिए पैंगराज तथा काष्ठ कुट्ट हैं. अंतरिक्ष के लिए अलज है. नदी देव के लिए मत्स्य वाहस तथा काष्ठ कुट्ट हैं. स्वर्गलोक एवं पृथ्वीलोक के लिए कच्छप ( कछुआ ) है. ( ३४ ) पुरुषमृगश्चन्द्रमसो गोधा कालका दार्वाघाटस्ते वनस्पतीनां कृकवाकुः सावित्रो ह १८ सो वातस्य नाक्रो मकरः कुलीपयस्तेकूपारस्य हियै शल्यकः.. (३५) चंद्र देव हेतु नर हिरण, वनस्पति देव हेतु गोह कालका तथा कठफोड़ा, सविता देव हेतु ताम्रचूर, वायु हेतु व समुद्र देव हेतु नक्र, मगरमच्छ एवं कुलीपय जलचर निर्धारित किया गया है. ही देव हेतु सेही को निर्धारित किया गया है. ( ३५ ) एण्यह्नो मण्डूको मूषिका तित्तिरिस्ते सर्पाणां लोपाश ऽ आश्विनः कृष्णो रात्र्या ऽ ऋक्षो जतूः सुषिलीका त ऽ इतरजनानां जहका वैष्णवी.. (३६) अह्न हेतु हरिणी, सर्प हेतु मेढक, चुहिया तथा तीतर का विधान है. अश्विनीकुमार हेतु लोपाश, रात्रि देवी हेतु कृष्ण मृग व अन्य देवगणों हेतु रीछ, जतू और सुषिलीका का विधान है. विष्णु हेतु जहका निर्धारित है. ( ३६ ) अन्यवापोर्धमासानाम्ऋश्यो मयूरः सुपर्णस्ते गन्धर्वाणामपामुद्रो मासां कश्यपो रोहित्कुण्डृणाची गोलत्तिका तेप्सरसां मृत्यवेसितः.. (३७) अर्द्धमास हेतु अन्यवाय ( कोयल ), जलों के लिए ऋष्यमृग और मोर, गंधर्वों के लिए सुपर्ण, जलों के लिए केकड़े, महीनों के लिए कछुए का विधान किया गया है. अप्सराओं के लिए रोहित, कृंडृणाची व गोलत्तिका का विधान है. मृत्यु के लिए काले हिरण का विधान किया गया है. ( ३७ ) वर्षाहूर्ऋतूनामाखुः कशो मान्थालस्ते पितॄणां बलायाजगरो वसूनां कपिञ्जलः कपोत ऽ उलूकः शशस्ते निर्ऋत्यै वरुणायारण्यो मेषः.. (३८) वर्षा को बुलाने वालों के लिए ऋतु, पितरों के लिए चूहे, छछूंदर तथा छिपकली, बलदेव के लिए अजगर, वसुओं के लिए कपिंजल व निर्ऋति देव के लिए कबूतर, उल्लू और खरगोश का विधान है. वरुण के लिए जंगली मेष का विधान किया गया है. ( ३८ ) ३१० - यजुर्वेद
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय श्वित्र आदित्यानामुष्ट्रो घृणीवान्वाध्रीणसस्ते मत्या ऽ अरण्याय सृमरो रूरू रौद्रः क्वयिः कुटरुर्दात्यौहस्ते वाजिनां कामाय पिकः.. ( ३९) आदित्यगणों के लिए विचित्र पशु, मति देवी के लिए ऊंट, चील और बकरे, अरण्य देव के लिए गाय, रुद्र देव के लिए रुरु मृग व वाजि देव के लिए क्वयि, कौए और मुरगे का विधान किया गया है. काम देव के लिए कोयल का विधान है. ( ३९ ) खड्गो वैश्वदेवः श्वा कृष्णः कर्णो गर्दभस्तरक्षुस्ते रक्षसामिन्द्राय सूकरः सि हो मारुतः कृकलासः पिप्पका शकुनिस्ते शरव्यायै विश्वेषां देवानां पृषतः.. (४०) वैश्वे देव के लिए गैंडे, राक्षसों के लिए कुत्ते, गधे और शेर, इंद्र देव के लिए सुअर व मरु देव के लिए सिंह का विधान किया गया है. शरव्य देवी हेतु गिरगिट, पपीहा और शकुनि तथा सभी देवों हेतु पृषत मृग का विधान है. ( ४० ) यजुर्वेद - ३११
पच्चीसवां अध्याय
पच्चीसवां अध्याय शादं दद्भिरवकां दन्तमूलैर्मृदं वस्वैस्तेगान्द १४ ष्ट्राभ्या १४ सरस्वत्या ऽ अग्रजिह्वं जिह्वाया ऽ उत्सादमवक्रन्देन तालु वाज १४ हनुभ्यामप ऽ आस्येन वृषणमाण्डाभ्यामादित्याँ श्मश्रुभिः पन्थानं भ्रूभ्यां द्यावापृथिवी वर्तोभ्यां विद्युतं कनीनकाभ्या १४ शुक्लाय स्वाहा कृष्णाय स्वाहा पार्याणि पक्ष्माण्यवार्या ऽ इक्षवोवार्याणि पक्ष्माणि पार्या ऽ इक्षवः.. ( १ ) दांतों से शाद देवता ( कोमल घास ), दंतमूल ( दांत की जड़ ) से जल में उपजने वाले शैवाल देव ( जल में उपजने वाली घास ) व दाढ़ों से मिट्टी व दाढ़ों से तेग देव को प्रसन्न करते हैं. जिह्वा के आगे के भाग से सरस्वती देवी व उत्साद देव को प्रसन्न करते हैं. तालु से अवक्रंद देव, ठोड़ी से अन्न देव, मुख से जल देव, अंडकोषों से वृषण देव व दाढ़ीमूंछ से आदित्य देव को प्रसन्न करते हैं. भौंहों से पंथ देव, बरौनियों से स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक, आंख की पुतलियों से विद्युत् देव को प्रसन्न करते हैं. शुक्ल देव के लिए स्वाहा. कृष्ण देव के लिए स्वाहा. पार देव के लिए स्वाहा. अवार देव के लिए स्वाहा. ऊपर के लिए स्वाहा. नीचे के लिए स्वाहा. ( १ ) वातं प्राणेनापानेन नासिके उपयाममधरेणौष्ठेन सदुत्तरेण प्रकाशेनान्तरमनूकाशेन बाह्यं निवेष्यं मूर्ध्ना स्तनयित्नुं निर्बाधेनाशर्नि मस्तिक्येण विद्युतं कनीनकाभ्यां कर्णाभ्या १४ श्रोत्र १४ श्रोत्राभ्यां कर्णौ तेदनीमधरकण्ठेनापः शुष्ककण्ठेन चित्तं मन्याभिरदिति १४ शीर्ष्णा निर्ऋतिं निर्जर्जल्पेन शीर्ष्णा संक्रोशौः प्राणान् रेष्माण १४ स्तुपेन.. ( २ ) प्राण से वात देव के लिए स्वाहा. अपान से नासिका देव के लिए स्वाहा. ऊपर के होंठ से सत् देव के लिए स्वाहा. ओष्ठ से उपयाम देव के लिए स्वाहा. उत्तर के प्रकाश से अंतर देव के लिए स्वाहा. भीतर के प्रकाश से बाह्य देव के लिए स्वाहा. मूर्धा से निवेश देव के लिए स्वाहा. सिर में स्थित अस्थि से स्तनयित्नु देव के लिए स्वाहा. मस्तिष्क से अशनि देव के लिए स्वाहा. आंख की पुतलियों से विद्युत् देव के लिए स्वाहा. कानों से श्रोत्र देव के लिए स्वाहा. दोनों कानों से देवशक्ति देव के लिए स्वाहा. नीचे के कंठ से तेदनी देव के लिए स्वाहा. ऊपर के सूखे कंठ से जल देव के लिए स्वाहा. नाड़ियों से चित्त देव के लिए स्वाहा. सिर से अदिति देव के लिए स्वाहा. जर्जर सिर से निर्ऋति देव ३१२ – यजुर्वेद
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय के लिए स्वाहा. बोलने वाले अंगों से प्राण देव के लिए स्वाहा. चोटी से रेष्म देव के लिए स्वाहा. ( २ ) मशकान् केशैरिन्द्र ४ स्वापसा वहेन बृहस्पति २४ शकुनिसादेन कूर्माञ्छफैराक्रमण ४ स्थूराभ्यामृक्षलाभिः कपिञ्जलाञ्जवं जङ्घाभ्यामध्वानं बाहुभ्यां जाम्बीलेनारण्यमग्निमतरुग्भ्यां पूषणं दोभ्यामश्विनाव ४ साभ्या २४ रुद्र ४ रोराभ्याम्.. ( ३ ) केशों से मशक देव के लिए स्वाहा. कंधों से इंद्र देव के लिए स्वाहा. पक्षी जैसे वेग से बृहस्पति देव के लिए स्वाहा. खुरों से कर्म देव के लिए स्वाहा. गुल्फों से आक्रमण देव के लिए स्वाहा. गुल्फों के नीचे नाड़ियों से कपिंजल के लिए स्वाहा. जंघाओं से वेग की देवी के लिए स्वाहा. बाहुओं से राह देव के लिए स्वाहा. घुटनों से जंगल देव के लिए स्वाहा. घुटनों से पूषा देव के लिए स्वाहा. नीचे के घुटनों से पूषा देव के लिए स्वाहा. दोनों कंधों से अश्विनी देव के लिए स्वाहा. देह की अन्य शक्तियों से रुद्र देव के लिए स्वाहा ( ३ ) अग्नेः पक्षतिर्वायोर्निपक्षतिरिन्द्रस्य तृतीया सोमस्य चतुर्थ्यदित्यै पञ्चमीन्द्राण्यै षष्ठी मरुता २४ सप्तमी बृहस्पतेरष्टम्यर्यम्णो नवमी धातुर्दशमीन्द्रस्यैकादशी वरुणस्य द्वादशी यमस्य त्रयोदशी.. (४) दाईं ओर की पहली अस्थि अग्नि, दूसरी ओर की अस्थि वायु, तीसरी ओर की अस्थि इंद्र देव, चौथी ओर की अस्थि, पांचवीं ओर की अस्थि अदिति देवी व छठी ओर की अस्थि इंद्राणी देवी से संबंधित हैं. सातवीं ओर की अस्थि मरुद् देव, आठवीं ओर की अस्थि बृहस्पति देव नौवीं ओर की अस्थि अर्यमा देव व दसवीं ओर की अस्थि धाता से संबंधित हैं. ग्यारहवीं ओर की अस्थि इंद्र देव से बारहवीं ओर की अस्थि वरुण देव व तेरहवीं ओर की अस्थि यम देव से संबंधित हैं. ( ४ ) इन्द्राग्न्योः पक्षतिः सरस्वत्यै निपक्षतिर्मित्रस्य तृतीयापां चतुर्थी निर्ऋत्यै पञ्चम्यग्नीषोमयोः षष्ठी सर्पाणा २४ सप्तमी विष्णोरष्टमी पूष्णो नवमी त्वष्टुर्दशमीन्द्रस्यैकादशी वरुणस्य द्वादशी यम्यै त्रयोदशी द्यावापृथिव्योर्दक्षिणं पार्श्व विश्वेषां देवानामूत्तरम्.. (५) बाईं ओर की पहली अस्थि इंद्र देव और अग्नि, दूसरी अस्थि सरस्वती देवी, तीसरी अस्थि मित्र देव, चौथी अस्थि जल देव, पांचवीं अस्थि निर्ऋति देव व छठी अस्थि अग्नि और सोम से संबंधित हैं. सातवीं अस्थि सर्प देव, आठवीं अस्थि विष्णु, नौवीं अस्थि पूषा देव, दसवीं अस्थि त्वष्टा देव व ग्यारहवीं अस्थि इंद्र देव व बारहवीं अस्थि वरुण देव, तेरहवीं अस्थि यम देव, दाहिना भाग स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक बायां भाग सभी देवों व उत्तर भाग अन्य देवों से संबंधित हैं. ( ५ ) यजुर्वेद - ३१३
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय मरुता ᳪ स्कन्धा विश्वेषां देवानां प्रथमा कीकसा रुद्राणां द्वितीयादित्यानां तृतीया वायोः पुच्छमग्नीषोमयोर्भासदौ क्रुञ्चौ श्रोणिभ्यामिन्द्राबृहस्पती ऊरुभ्यां मित्रावरुणावलाभ्यामाक्रमण ᳪ स्थूराभ्यां बलं कुष्ठाभ्याम्.. (६) कंधे की अस्थि मरुद्गणों, प्रथम अस्थि विश्वे देवों, दूसरी अस्थि रुद्रगणों, तीसरी अस्थि आदित्यगणों, पूंछ वायु, नितंब अग्नि और सोम से संबंधित हैं. जंघाएं क्रौंच देव व दोनों जंघाएं इंद्र देव और बृहस्पति देव, दोनों जंघाएं मित्र देव वरुण देव से संबंधित हैं. नीचे का भाग आक्रमण से संबंधित है. ऊपर का भाग बल देव से संबंधित है. ( ६ ) पूषणं वनिष्ठुनान्धाहीन्स्थूलगुदया सर्पान्गुदाभिर्विद्युत ऽ आन्त्रैरपो वस्तिना वृषणमाण्डाभ्यां वाजिन ᳪ शेपेन प्रजा ᳪ रेतसा चाषान् पित्तेन प्रदरान् पायुना कूश्माञ्छकपिण्डैः.. (७) बड़ी आंत पूषा देव, स्थूल गुदा अंधे सर्प देव, सामान्य गुदा अन्य सर्प देवों, बची हुई आंतें विद्युत् देव, वस्ति भाग जल देव, अंडकोष वृषण देव व उपस्थ बल देव से संबंधित हैं. वीर्य प्रजापति देव, पित्त चाष देव, पायु ( गुदा ) प्रदर देव व शक पिंड कूश्म देव से संबंधित हैं. ( ७ ) इन्द्रस्य क्रोडोदित्यै पाजस्यं दिशां जत्र्वोदित्यै भसज्जीमूतान् हृदयौपशेनान्तरिक्षं पुरीतता नभ ऽ उदयैन चक्रवाकौ मतस्नाभ्यां दिवं वृक्काभ्यां गिरीन् प्लाशिभिरुपलान् प्लीह्ना वल्मीकान् क्लोमभिर्गल्लोभिर्गुल्मान् हिराभिः स्रवन्तीर्ह्रदान् कुक्षिभ्या ᳪ समुद्रमुदरेण वैश्वानरं भस्मना.. (८) क्रोड इंद्र देव, पैर अदिति देव, हंसली अदिति देव, मेढ्राग्र अदिति देव, हृदय प्रदेश और नाड़ीप्रदेश अंतरिक्ष देव, पेट आकाश देव व फेफड़े चक्रवाक से संबंधित हैं. दोनों वृक्क ( गुर्दे ) पर्वत देव, क्लोम वाल्मीकि देव, क्लोमादि गुल्म, रक्त शिराएं नदी, कांख हृदय, पेट समुद्र व भस्म वैश्वानर से संबंधित हैं. ( ८ ) विधृतिं नाभ्या घृत ᳪ रसेनापो यूष्णा मरीचीर्विप्रुड्भर्नीहारमूष्मणा शीनं वसया पुष्वा अश्रुभिर्ह्रादुनीर्दूपीकाभिरस्ना रक्षा ᳪ सि चित्राण्यङ्गैर्नक्षत्राणि रूपेण पृथिवीं त्वचा जुम्बकाय स्वाहा.. (९) नाभि विधृति, वीर्य घृत, पकवान जल देव, वसा मरीचि देव, शरीर की गरमाई ओस देव, वसा शनि देव, आंसू फुहार देव गीड़ ( आंख की कीच ) ह्रादुनी आकाशीय विद्युत् देव से संबंधित हैं. खून के कण रक्षा देव, शारीरिक विभिन्न अंग विभिन्न देवों, शारीरिक सौंदर्य, नक्षत्र देवों व त्वचा पृथिवी देवी और त्वचा जुंबक देव से संबंधित हैं. ( ९ ) ३१४ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक ऽ आसीत्. स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१०) जो प्रथम जन्मा है, हिरण्यगर्भ में रहा, जो उत्पन्न हुई पीढ़ियों का एकमात्र पालक है, जो पृथ्वीलोक और स्वर्गलोक को धारता है, उस देव के अलावा किस देव के लिए हवि का विधान करें. ( १० ) यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक ऽ इन्द्राजा जगतो बभूव. य ऽ ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (११) जो अपने प्राणपण से पल भर में इस जगत् का महिमावान शासक हुआ, जो दोपायों और चौपायों का ईश्वर है, महिमावान हम उस देवता के अलावा और किस देवता के लिए हवि का विधान करें ? ( ११ ) यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्र १४ रस्या सहाहुः. यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१२) जिन की इस महिमा से हिमवान पर्वतों का निर्माण हुआ, जिस ने यह रसीले समुद्र निर्मित किए, जिन की भुजाएं दसों दिशाओं में फैली हुई हैं, हम उस देवता के अलावा और किस देवता के लिए हवि का विधान करें ? ( १२ ) य ऽ आत्मदा बलदा यस्य विश्व ऽ उपासते प्रशिषं यस्य देवाः. यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१३) जो आत्मशक्ति दाता और बलशक्ति दाता हैं, सारा विश्व जिस की प्रशंसा करता है, सारा विश्व जिस की उपासना करता है, जिस की छत्रच्छाया अमृत सरीखी सुखदायी है, जिस के बिना मृत्यु जैसा कष्ट होता है, उस के अलावा हम और किस देव के लिए हवि का विधान करें. ( १३ ) आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोदब्धासो अपरीतास ऽ उद्भिदः. देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे.. (१४) हम यज्ञ में सब ओर से अबाध रूप से कल्याणकारी व दुर्लभ परिणाम प्राप्त करें. सभी देवगण प्रतिदिन हमारी रक्षा व बढ़ोत्तरी करें. ( १४ ) देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवाना १४ रतिरभि नो निवर्त्तताम्. देवाना १४ सख्यमुपसेदिमा वयं देवा न ऽ आयुः प्रतरन्तु जीवसे.. (१५) देवगणों की उत्तम बुद्धि हमारे लिए कल्याणकारिणी हो. देवगणों की सरलता हमारे लिए कल्याणकारिणी हो. देवगणों का दान हमारे लिए अनुकूल हो. देवगणों की मित्रता हम को मिले. हम उस मित्रता से लाभ पाएं. हम देवताओं से दीर्घ आयु प्राप्त कर जीएं. ( १५ ) यजुर्वेद - ३१५