योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
२६६ योगवाशिष्ठ ।
हैं क्योंकि वाणी से अतीतपद है । हे राक्षसी ! यह जो द्रष्टा, दर्शन और दृश्य है इसके अन्तर जो अनुभवसत्ता है सो परमात्मा है । वह परमात्मा ही द्रष्टा, दर्शन, दृश्यरूप होकर भासता है ! उसी में यह सब जगल्लीला है; नानात्वभाव से भी वह कुछ खण्डितभाव को नहीं प्राप्त हुआ; अखण्ड ही है। उसी तन्मात्रसत्ता को ब्रह्म कहते हैं। हे भद्रे वही ! चिदणु संवेदन से वायुरूप हुआ है और वायु उसमें अत्यन्त भ्रान्ति मात्र है, क्योंकि केवल शुद्ध चिन्मात्र है । जब उसमें शब्द का संवेदन फुरता है तब शब्दरूप हो भासता है और शब्दरूप उसमें भ्रान्तिमात्र है । उसमें शब्द और शब्द का अर्थ देखना दूर से दूर है, क्योंकि केवल चिन्मात्र है । उसमें अहं त्वं कुछ नहीं । वह निष्किञ्चन है ऐसे रूप होकर भासता है; क्योंकि शक्तिरूप है । उसमें जैसी प्रतिभा फुरती है तैसा ही होकर भासता है इससे फुरना ही इस जगत् का कारण है। जो अनेक यत्नों से मिलता है सो भी आत्मसत्ता है। जब उसको कोई पाता है तब उसने कुछ नहीं पाया और सब कुछ पाया है। पाया तो इस कारण नहीं कि आगे भी अपना आप था और सब कुछ इस कारण पाया कि आत्मा को पाने से कुछऔर पाना नहीं रहता । हे राक्षसी! अज्ञानरूपी वसन्तऋतु में जन्मों की परम्परा बेलि तब तक बढ़ती जाती है जब तक इसका काटनेवाला बोधरूपी खड्ग नहीं प्राप्त हुआ। जब बोधरूपी खड्ग प्राप्त होता है तब जन्मरूपी बेलि को काटता है। हे राक्षसी ! चिदणु संवेदन द्वारा आपको दृश्य में प्रीति करता है-जैसे किरणों का चमत्कार जलरूप होकर स्थित होता है-सो शुद्ध ही आपको संवेदन द्वारा फुरता देखता है । चिदणु द्वारा जो जगत् हुआ है सो मेरु से आदि लेकर तीनों भुवनों में किरणों की नाईं स्थित-होता है और वास्तव में सब मायामात्र हैं, भ्रम से भासते हैं । जैसे स्वप्न में रागी को स्वप्नस्त्री का आलिङ्गन होता है तैसे ही यह जगत् मन के फुरने से भासता है सो भ्रममात्र है । हे राक्षसी ! सर्वशक्तिरूप आत्मा में जैसे सृष्टि का आदि फुरना हुआ है तैसा ही रूप होकर भासने लगा है । और जैसे संकल्प किया है तैसे ही स्थित हुआ है । इससे सब जगत्
उत्पत्ति प्रकरण । २६७
संकल्पमात्र है। जैसे जिसमें बालक का मन लगता है तैसा ही रूप उस- का हो भासता है; तैसे ही संवित् के आश्रय जैसा संवेदन फुरता है तैसा ही रूप हो भासता है। हे राक्षसी ! चिद्अणु परमाणु से भी सूक्ष्म है और उसने ही सब जगत् को पूर्ण किया है और सब जगत् अनन्तरूप आत्मा है उसमें संवेदन से जगत् की रचना हुई है। जैसे नटनायक जैसे जैसे बालक को नेत्रों से जताता है तैसे ही तैसे वह नृत्य करता है और जब वह ठहर जाता तब यह भी ठहर जाता है; तैसे ही चित्त के अवलोकन से सुमेरु से तृण पर्यन्त जगत् नृत्य करता है। जैसे चित्त संवेदन अनन्त शक्ति आत्मा में फुरता है तैसे ही तैसे हो भासता है। हे राक्षसी ! देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से आत्मसत्ता रहित है, इस कारण सुमेरु आदिक से भी स्थूल है; उसके सामने सुमेरु आदिक तृण के समान हैं और बाल के अग्र के सहस्रों भाग से भी सूक्ष्म है। अल्पता से ऐसा सूक्ष्म नहीं जिसमें सरसों का दाना भी सुमेरुवत् स्थूल है। माया की कला बहुत सूक्ष्म है उससे भी चिद्अणु सूक्ष्म है, क्योंकि निर्मायिकपद परमात्मा है। जैसे सुवर्ण और भूषण की शोभा समान नहीं अर्थात् स्वर्ण में भूषण कल्पित है समान कैसे हो, तैसे ही माया परमात्मा के समान नहीं क्योंकि कल्पित है। हे राक्षसी ! जैसे सूर्य आदिक सब अनुभव से प्रकाशते हैं इनका सद्भाव कुछ न था उस सत्ता से ही इनका प्रकट होना हुआ है और फिर जर्जरीभूत होते हैं। शुद्ध चिन्मात्र सत्ता प्रकाशरूप है और वह सदा अपने आपमें स्थित है उस चिद्अणु के भीतर बाहर प्रकाश है और यह जो सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि आदिक प्रकाश हैं सो तम से मिले हुए हैं अर्थात् भेदरूप हैं। ये भी तमरूप हैं, क्योंकि प्रकाश की अपेक्षा रखते हैं। इसमें इतना भेद है कि प्रकाश शुक्लरूप है और तम कृष्णरूप है इससे रङ्ग का भेद है प्रकाशरूप कोई नहीं। जैसे मेघ का कुहिरा श्याम होता है और वरफ का शुक्ल होता है पर दोनों कुहिरे हैं; तैसे ही तम और प्रकाश दोनों तुल्य हैं और आत्मसत्ता दोनों को प्रकाशती है इससे दोनों का आश्रयभूत आत्मसत्ता ही है। हे राक्षसी ! रात्रि, दिन, भीतर, बाहर, नदियाँ, पहाड़ आदिक सब लोक आत्मसत्ता
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के प्रकाश से प्रकाशते हैं—जैसे—कमल और नीलोत्पल दोनों को सूर्य प्रकाशता है । कमल श्वेत है और नीलोत्पल श्याम है; जहाँ श्वेत कमल है वहाँ नीलोत्पल का अभाव है और जहाँ नील कमल है वहाँ श्वेत कमल का अभाव है पर दोनों का प्रकाशक सूर्य है; तैसे ही तम और प्रकाश दोनों का प्रकाशक चिदात्मा है । जैसे रात्रि और दिन दोनों सूर्य से सिद्ध होते हैं तैसे ही तम और प्रकाश दोनों आत्मा से सिद्ध होते हैं । जैसे दिन तब कहाता है, जब सूर्य उदय होता है और जब सूर्य अस्त होता है तब रात्रि होती है; आत्मा तैसे भी नहीं । आत्मप्रकाश सदा उदयरूप है और उदय अस्त से रहित भी है । उस बिना कुछ सिद्ध नहीं होता सबका प्रकाश चिद्अणु ही है । हे राक्षसी ! उस अणु के भीतर विचित्र अनुभव अणु है । जैसे वसन्तऋतु में पत्र, फूल, फल और टास होते हैं तैसे ही चिद्अणु में सब अनुभव अणु होते हैं । जैसे एक बीज से अनेक वृक्ष क्रम से हो जाते हैं तैसे ही एक चिद्अणु से अनेक अनुभव अणु होते हैं। कई व्यतीत हुए हैं; कई वर्त्तमान हैं और कई होंगे । जैसे समुद्र में तरङ्ग होते हैं सो कोई अब वर्त्तते हैं और कई आगे होंगे; तैसे ही आत्मा में तीनों काल की सृष्टि वर्त्तती है । हे राक्षसी ! चिद्अणु आत्मा उदासीन है और आसीन की नाईं स्थित होता है । सबका कर्त्ता भी है और भोक्ता भी है और स्पर्श किसी से नहीं किया जाता । जगत् की सत्यता उसी से उदय होती है इस कारण वह सबका कर्त्ता है और सबका अपना आप है इससे सबको भोगता है । वास्तव में न कुछ उपजा है और न लीन होता है । चिन्मात्रसत्ता ज्यों की त्यों सदा अपने आपमें स्थित है और अखण्ड और सूक्ष्म है इस कारण किसी से स्पर्श नहीं किया जाता है । हे राक्षसी ! जो कुछ जगत् दीखता है वह सब आत्मरूप है; आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । आत्मा और जगत् कहनेमात्र को दोनों नाम हैं वास्तव में एक आत्मा ही है । आत्मा का चमत्कार ही जगत्रूप हो भासता है । वास्तव में जगत् कुछ बना नहीं चिन्मात्रसत्ता सदा अपने आपमें स्थित है और जो कुछ कहना है वह उपदेश के निमित्त है वास्तव में दूसरी कुछ वस्तु नहीं
उत्पत्ति प्रकरण। २६६
बनी--तीनों जगत् चिदाकाशरूप हैं। हे राक्षसी द्रष्टा! जब दृश्य पद को प्राप्त होता है तब स्वाभाविक ही अपने भाव को नहीं देखता। जैसे नेत्र जब घट को देखता है तब घट ही भासता है अपना नेत्रत्वभाव नहीं दृष्टि आता; तैसे ही दृश्य के होते द्रष्टा नहीं भासता और जब दृश्य नष्ट होता है तब द्रष्टा भी अवास्तव है, क्योंकि द्रष्टा भी दृश्य के सम्बन्ध से कहते हैं। जब दृश्य नष्ट हो जावे तब द्रष्टा किसको कहिये। दृश्य विषय-भूत वह होता है जो अदृश्य है; वह विषयभूत किसी का नहीं इस कारण उसमें और कोई कल्पना नहीं बनती और यह जगत् भी उसका ही आभास है। हे राक्षसी! जैसे भोक्ता बिना भोग नहीं होते, तैसे ही द्रष्टा बिना दृश्य नहीं होता। जैसे पिता बिना पुत्र नहीं होता; तैसे ही एक बिना द्वैत नहीं होते। हे राक्षसी! द्रष्टा को दृश्य उपजाने की सामर्थ्य है। दृश्य को द्रष्टा उपजाने की सामर्थ्य नहीं, क्योंकि दृश्य जड़ है। जैसे सुवर्ण से भूषण बनता है पर भूषण से स्वर्ण नहीं बनता, तैसे ही द्रष्टा से दृश्य होता है; दृश्य से द्रष्टा नहीं होता। हे राक्षसी! सुवर्ण में जैसे भूषण है तैसे ही द्रष्टा में जो दृश्य है वह भ्रमरूप है-इसी से जड़रूप है। जब द्रष्टा दृश्य को देखता है तब दृश्य दृश्य भासता है द्रष्टृत्वभाव नहीं भासता और जब द्रष्टा अपने स्वभाव में स्थित होता है तब दृश्य नहीं भासता। जैसे जब तक भूषणबुद्धि होती है तब तक सुवर्ण नहीं भासता-भूषण ही भासता है और जब सुवर्ण का ज्ञान होता है तब सुवर्ण ही भासता है-भूषण नहीं भासता। एक सत्ता में दोनों नहीं सिद्ध होते जैसे अन्धकार में किसी पुरुष को देखकर उसमें पशुत्वभ्रम हो तो जब तक पशुबुद्धि होती है तब तक पुरुष का निश्चय नहीं होता और जब निश्चय करके पुरुष जाना तब फिर पशुबुद्धि नहीं रहती, तैसे ही जब द्रष्टा दृश्य को देखता है तब द्रष्टाभाव नहीं दीखता दृश्य ही भासता है। जैसे रस्सी के ज्ञान से सर्प का अभाव हो जाता है तैसे ही बोध करके दृश्य का अभाव होता है तब एक ही परमात्मसत्ता भासती है-द्रष्टासंज्ञा भी नहीं रहती। जैसे दूसरे की अपेक्षा से एक कहलाता है और दूसरे के अभाव से एक एक नहीं कह सकते तैसे ही दृश्य के अभाव में द्रष्टा कहना नहीं रहता।
३०० योगवाशिष्ठ ।
केवल शुद्ध संवित्मात्र पद शेष रहता जिसमें वाणी की गम नहीं। जैसे दीपक पदार्थों को प्रकाशता है तैसे ही द्रष्टा दर्शन और दृश्य को प्रकाशता है और बोध से मातृ, मान और मेय त्रिपुटी लीन हो जाती है। जैसे सुवर्ण के जानने से भूषण की कल्पना का अभाव हो जाता है तैसे ही ज्ञान से त्रिपुटी का अभाव हो जाता है केवल शुद्ध अद्वैतरूप रहता है। हे राक्षसी ! परमाणु जो अत्यन्त निस्स्वादरूप है वह सर्व स्वादों को उपजाता है। जहाँ रस सहित होता है वह चिद्अणु करके होता है जैसे आदर्श बिना प्रतिबिम्ब नहीं होता तैसे ही सब स्वाद चिद्अणु बिना नहीं होते। सबको रस देनेवाला चिद्अणु ही है। आत्मभाव से सबका अधिष्ठान है और सूक्ष्म से सूक्ष्म है इससे निस्स्वाद है। वह चिद्अणु आपको छिपा नहीं सकता। सब जगत् को उसने ढाँप रखा है और आप किसी से ढाँपा नहीं जाता। वह चिदाकाशरूप है; सब पदार्थों को सत्ता देनेवाला है और सबका आश्रयभूत है। जैसे घास के बन में हाथी नहीं छिपता तैसे ही आत्मा किसी पदार्थ से नहीं छिपता। हे राक्षसी ! जिससे सब पदार्थ सिद्ध होते हैं और जो सदा प्रकाशरूप है वह मूर्खों को नहीं भासता-यह बड़ा आश्चर्य है। वह सदा अनुभवरूप है और यह सब जगत् उस ही से जीता है। जैसे वसन्त ऋतु से फूल, फल, टास और पत्र फूलते हैं तैसे ही सब जगत् आत्मा से फूलता है। वही चिदात्मा जगतरूप होके भासता है और सर्वात्मभाव से सब उसके ही अवयव हैं। परमार्थ निरवयव और निराकाररूप है उसमें कुछ उदय नहीं हुआ। हे राक्षसी ! एक निमेष के अबोध से चिद्अणु में अनेक कल्पों का अनुभव होता है। जैसे एक क्षण के स्वप्न में पहले आपको बालक और फिर वृद्धअवस्था देखने लगता है। उन कल्पों में जो निमेष है उसमें अनेक कल्प व्यतीत होते हैं क्योंकि अधिष्ठान सर्व शक्तिमान् है जैसा संवेदन जहाँ फुरता है वैसा रूप हो भासता है जैसे स्वप्न में अभोक्ता को भोक्तृत्व का अनुभव होता है। तैसे ही निमेष में कल्प का अनुभव होता है। वासना से आवेष्टित अभोक्ता ही आपको भोक्ता देखता है जैसे स्वप्न में मनुष्य अपना मरण प्रत्यक्ष देखता है तैसे ही
उत्पत्ति प्रकरण । ३०१
यह जगत् भ्रम से भासता है । जैसी जहाँ स्फूर्ति दृढ़ होती है वैसे ही होकर वहाँ भासता है । हे राक्षसी ! जो कुछ आकर भासते हैं वे भ्रांति मात्र हैं । जैसे निर्मल आकाश में नीलता भासती है तैसे ही आत्मा में विश्व भासता है । आत्मा सर्वगत और सबका अनुभव है । हे राक्षसी ! उसमें व्याप्य-व्यापक भाव भी नहीं क्योंकि सर्व आत्मा है और सर्वरूप भी वही है । जब शुद्धचित्त संवित् संवेदन में फुरता है तब पृथक पृथक भाव चेतता है । इच्छा से जिस पदार्थ की उपलब्धि होती है उसमें व्याप्य-व्यापक भाव की कल्पना होती है—वास्तव में जो इच्छा है वही पदार्थ है । जैसे जल में द्रवता होती है और उससे तरंग, फेन और बुद्बुदे होते हैं सो सब जलरूप हैं जल से भिन्न नहीं, तैसे ही इच्छा से उपजे पदार्थ आत्मरूप हैं उससे भिन्न नहीं । आत्मा देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है; केवल शुद्ध चिन्मात्र और सर्वरूप होकर स्थित हुआ है और सबका अनुभव भी उसी में हुआ है । वह तो शुद्ध सत्तामात्र है उसमें द्वैतकल्पना कैसे कहिये ? हे राक्षसी ! जब कुछ द्वैत होता है तब एक भी होता है; जो कुछ द्वैत ही नहीं तो एक कैसे कहिये ? जैसे धूप की अपेक्षा से छाया है और छाया की अपेक्षा से धूप है; तैसे ही एक की अपेक्षा से द्वैत कहाता है इस कल्पना से जो रहित है वही चिन्मात्ररूप है और जगत् भी उससे व्यतिरिक्त नहीं । जैसे जल और द्रवता में कुछ भेद नहीं । तैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । हे राक्षसी ! नाना प्रकार के आरम्भ उसमें दृष्टि आते हैं तो भी आत्मसत्ता सम है । हे राक्षसी ! जब सम्यक्बोध होता है तब द्वैत भी अद्वैतरूप भासता है, क्योंकि अज्ञान से द्वैत कल्पना होती है । वास्तव में द्वैत कुछ नहीं; अज्ञान के अभाव से द्वैत का भी अभाव हो जाता है । ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं जैसे जल और द्रवता, वायु और स्पन्दता और आकाश और शून्यता में कुछ भेद नहीं तैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । हे राक्षसी ! द्वैत और अद्वैत जानना दुःख का कारण है । द्वैत और अद्वैत की कल्पना से रहित होने को ही परम-पद कहते हैं । द्रष्टारूप जो जगत् है वह चिद्परमाणु में स्थित है और
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उसमें सुमेरु आदिक स्थित है । बड़ा आश्चर्य है कि माया से चिद् परमाणु में त्रिलोकियों की परम्परा स्थित हैं इसी से असम्भवरूप और मायामय है । जैसे बीज में वृक्ष स्थित है तैसे ही चिदणु में जगत् स्थित है । जैसे शाखा, पत्र, फूल और फल से बीज अपना बीजत्व नहीं त्यागता और अखण्ड रहता है तैसे ही चिदणु के भीतर जगत् का विस्तार है और अणुत्वभाव नहीं त्यागता—अखण्ड ही रहता है । हे राक्षसी ! जैसे बीज परिणाम से वृक्षभाव में प्राप्त होता है तैसे ही चिदणु भी परि-णाम से जगतरूप होता है । सब चिदणु का किञ्चनरूप है इससे ऐसे दिखाई देता है, वास्तव में न द्वैत है, न अद्वैत है, न बीज—न अंकुर है न स्थूल है—न सूक्ष्म है, न कुछ उपजा है—न नष्ट होता है, न अस्ति है—न नास्ति है, न सम है—न असम है और न जगत् है—न अजगत् है; केवल चिदानन्द आत्मसत्ता अचिन्त्यचिन्मात्र अपने आपमें स्थित है, जैसी-जैसी भावना होती है तैसी ही तैसी ही भासती है । हे राक्षसी ! यह अनउदय ही संवेदन के वश से उदय होकर भासता है । जैसे बीज से वृक्ष अनन्यरूप अनेक हो भासता है तैसे ही एक आत्मा अनेकरूप हो भासता है । न कुछ उदय हुआ है और न मिटता है । हे राक्षसी ! उस चिदणु में कमल की डंडी की ताँत सुमेरु की नाईं स्थूल है । जैसे कमल की डंडी की ताँत से सुमेरु स्थूल है तैसे ही चिदणु से कमल की डंडी स्थूल है और दृश्यरूप है, पर चिदणु दृश्य और मन सहित षड्इन्द्रियों का विषय नहीं इस कारण ताँत से भी सूक्ष्म है उस चिद्-अणु में अनन्त सुमेरु आदिक स्थित हैं सो क्या रूप है; जैसे आकाश में शून्यता होती है तैसे ही आत्मा में जगत् है । हे राक्षसी ! जिसको आत्मा का बोध हुआ है उसको जगत् सुषुप्ति की नाईं भासता है । वह आत्मसत्ता अद्वैतरूप और परिणाम से रहित है उसमें मुक्त पुरुष सदा स्थित है । परमार्थ से जगत् भी ब्रह्मरूप है, भिन्नभाव कुछ नहीं ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सूच्युपाख्याने परमार्थनिरूपणन्नाम सप्तपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५७ ॥
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३०४ | योगवाशिष्ट ।
तेरे शरीर का निर्वाह कैसे होगा ? राक्षसी बोली, हे राजन् ! हजार वर्ष में समाधि में स्थित रही और जब समाधि खुली तब मुझको क्षुधा लगी। अब मैं फिर हिमालय पर्वत की कन्दरा में जाकर निश्चल समाधि में, जैसे मूर्ति लिखी होती है, तैसे ही स्थित हूँगी और जब समाधि से उतरूँगी तब अमृत की धारणा में विश्राम करूूँगी । जब उससे उतरूँगी तब शरीर का त्याग करूूँगी परन्तु हिंसा न करूूँगी । हे राजन् ! जिस प्रकार मैंने हिंसाधर्म को अङ्गीकार किया था वह सुन ! मुझको जब बड़ी क्षुधा लगी तब उसके निवारण के अर्थ मैं हिमालय पर्वत के उत्तर शिखर पर वन में एक सोने की शिला के पास लोहे के थम्भ की नाईं जीवों के नाश के निमित्त तप करने लगी और जब बहुत वर्ष व्यतीत हुए तब ब्रह्माजी ने मनोवांछित वर मुझको दिया । तब मेरे दो शरीर हुए—एक आधार-भूत सूर्य की नाईं और दूसरा पुर्यष्टक और मैं विसूचिका नाम राक्षसी हुई । उस शरीर से मैं अनेक जीवों के भीतर जाकर उनको भोजन करती रही, परन्तु ब्रह्माजी ने मुझसे कहा था कि जो गुणवान् होंगे और जो 'ॐ' मन्त्र पढ़ेंगे उन पर तेरा बल न चलेगा तू निवृत्त हो जावेगी । हे राजन् ! उसी मन्त्र का उपदेश अब तुम भी अङ्गीकार करो । उस मन्त्र के पाठ से सबके रोग नष्ट होंगे । ब्रह्माजी का जो उपदेश है उसको तुम नदी के तट पर जाकर और पवित्र होकर शीघ्र ही ग्रहण करो । उसके पाठ से तुम्हारी प्रजा का दुःख नष्ट हो जावेगा । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार जब अर्द्धरात्रि के समय राक्षसी ने कहा तब राजा मन्त्री और राक्षसी तीनों निकट नदी के तीर पर गये और अनन्य व्यति-रेक करके आपस में सुहृद् हुए । जब तीनों पवित्र होकर बैठे तब जो मन्त्र राक्षसी को ब्रह्माजी ने उपदेश किया था वही मन्त्र विसूचिका ने प्रीतिसंयुक्त राजा को उपदेश किया और वहाँ से चलने लगी । तब राजा ने कहा, हे महादेवी ! तू हमारी गुरु है इससे हम कुछ प्रार्थना करते हैं उसे अङ्गीकार कर । जो महापुरुष हैं उनका सुन्दर सुहृदपना बढ़ता जाता है और तुम्हारा शरीर भी इच्छाचारी है। इससे मन के हरने वाले भूषण-वस्त्र संयुक्त स्त्री का सा लघु शरीर धरके कुछ काल हमारे
उत्पत्ति प्रकरण । ३०५
नगर में निवास करो । राक्षसी बोली, हे राजन् ! मैं तो लघु आकार भी धरूँगी परन्तु तुम मुझे भोजन न दे सकोगे । जो लघु स्त्री का शरीर धरूँगी तो भी मेरा स्वभाव राक्षसी का है इसको तृप्त करना समान जनों की नाईं तो नहीं । जैसा कुब्ज शरीर का स्वभाव है सो सृष्टि पर्यन्त तैसा ही रहता है-अन्यथा नहीं होता । राजा बोले, हे कल्याणरूपिणि ! तू स्त्री समान शरीर धरके हमारे नगर में चलकर रह; जो चोर पापी मेरे मण्डल में आवेंगे वे हम तुझे देंगे और तू उन्हें स्त्रीरूप को त्याग करके राक्षसी शरीर से एकान्त ठौर ले जाकर अथवा हिमालय की कन्दरा में जाके भोजन करना, क्योंकि बड़े भोजन करनेवाले को एकान्त में खाना सुखरूप है । जब उनको भोजन करके तृप्त होना तब सो रहना; जब निद्रा से जागना तब समाधि में स्थित होना और जब समाधि से उतरना तब फिर हमारे पास आना हम तेरे निमित्त बन्दीजन इकट्ठे कर रक्खेंगे उनको ले जाकर भोजन करना । जो धर्म के निमित्त हिंसा है वह हिंसा पापरूप नहीं और जिसकी हिंसा करता है उसका मरण भी नहीं बल्कि उस पर दया है, क्योंकि वह पाप करने से छूटता है । राक्षसी बोली, हे राजन् ! तुमने युक्तिसहित वचन कहे हैं इससे मैं स्त्री का शरीर धरके तुम्हारे साथ चलती हूँ । युक्तिपूर्वक वचन को सब कोई मानते हैं इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहकर राक्षसी ने महासुन्दर स्त्री का शरीर धारण किया और बहुत कङ्कण आदिक नाना प्रकार के भूषण और वस्त्र पहिनकर राजा के साथ चली । निदान राजा और मन्त्री आगे चले और स्त्री पीछे चली । राजा उसको अपने ठाम में ले आया और एकान्त स्थान में तीनों बैठे रात्रि को परस्पर चर्चा करते रहे जब प्रातःकाल हुआ तब सौभाग्यवती स्त्रीरूप राक्षसी राजा के अन्तःपुर में जा बैठी और जो कुछ स्त्रियों का व्यवहार है वह करती रही और राजा और मन्त्री अपने व्यवहार में लगे । इसी प्रकार जब छः दिन व्यतीत हुए तब राजा के मण्डल में जो तीन सहस्र चोर बँधे हुए थे उन सबको उसने कर्कटी को दे दिया और उसने राक्षसी का शरीर धरके उनको भुजा मण्डल में ले
३०६ योगवाशिष्ठ ।
जैसे मेघ बूँदों को धारता है, हिमालय के शिखर को चली। जैसे किसी दरिद्री को सुवर्ण पाने से प्रसन्नता होती है तैसे वह प्रसन्न हुई और वहाँ जा तृप्त होके भोजन किया और सुखी होके सो रही। दो दिन पर्यन्त सोई रही, उसके उपरान्त जागके पाँच वर्ष पर्यन्त समाधि में लगी रही और जब समाधि खुली तब फिर राजा के पास आई। इसी प्रकार जब वह आवे तब राजा उसकी पूजा करे और जितने दुष्ट जन इकट्ठे किये हों उनको दे दे। वह उन्हें ले जाकर हिमालय की कन्दरा में भोजन करके फिर ध्यान में लगे और जब ध्यान से उतरे तब फिर वहाँ आवे और फिर ले जावे। हे रामजी ! इसी प्रकार जीवन्मुक्त होकर वह राक्षसी प्रकृत स्वभाव को करती रही और जब अनेक वर्ष व्यतीत हुए तब राजा विदेहमुक्त हुआ। फिर जो कोई उस मण्डल का राजा हो उससे भी राक्षसी की सुहृदता हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे राक्षसीसुहृदता- वर्णनन्नामाष्टपञ्चाशत्तमस्सर्गः ॥ ५८ ॥
वशिष्ठजी बोले; हे रामजी ! निदान जब राक्षसी आवे तब किरात देश का राजा पूर्व की नाईं उसकी पूजा करे और जो कुछ विशूचिका अथवा दूसरा कोई रोग उनकी प्रजा में हो उसे वह राक्षसी निवृत्ति कर दे। इसी प्रकार अनेक वर्ष व्यतीत हुए। एक बार उसको ध्यान में लगे बहुत वर्ष व्यतीत हो गये तब किरातदेश के राजा ने दुःख की निवृत्ति के लिये ऊँचे स्थान पर उसकी प्रतिमा स्थापन की और उस प्रतिमा का एक नाम कन्दरा देवी और दूसरा नाम मङ्गला देवी रक्खा। उसका ध्यान करके सब पूजा करने लगे और उसी से उसका कार्य सिद्ध होने लगा। हे रामजी ! उस प्रतिमा में उस देवी ने आप निवास किया। जो कोई जिस फल के निमित्त उस प्रतिमा की पूजा करे उसका कार्य सिद्ध हो और न पूजे तो दुःखित हो। इससे जो कोई कुछ कार्य करने लगे वह प्रथम मङ्गला देवी की पूजा करे तो उसका कार्य सिद्ध होवे और जो विधि करके उसकी पूजा करे उससे वह बहुत प्रसन्न हो। हे रामजी ! अब तक वह प्रतिमा किरातदेश में स्थित है। जिस जिस फल के निमित्त
उत्पत्ति प्रकरण । ३०७
उसकी कोई सेवा करता है तैसा फल उसको वह देती है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सूच्याख्यानसमाप्तिवर्णनन्नामैकोनषष्टितमस्सर्गः ॥५६॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह आनन्दित कर्कटी का आख्यान जैसे पूर्व हुआ है वैसे ही मैंने तुमसे कहा है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! राक्षसी का कृष्णवपु किस निमित्त था और कर्कटी इसका नाम क्यों था ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह राक्षसों के कुल की कन्या थी राक्षसों का वपु शुक्ल भी होता है; कृष्ण भी होता है और रक्त पीत आदि भी होता है। हे रामजी ! कर्कटी नाम एक जलजन्तु भी होता है और उसका श्याम आकार होता है; उसी के समान कर्कट नाम एक राक्षस था उसके समान उसकी यह पुत्री हुई; इस कारण इसका नाम कर्कटी हुआ । हे रामजी ! यहाँ कर्कटी का और कुछ प्रयोजन न था; अध्यात्मप्रसंग और शुद्ध चेतन के निरूपण के निमित्त मैंने तुमसे यह आख्यान कहा है । यह आश्चर्य है कि असतरूप जगत् के पदार्थ सतरूप होकर भासते हैं और जो आत्मसत्ता सदा सम्पन्नरूप है वह अविद्यमान की नाईं भासती है । हे रामजी ! वास्तव में तो एक अनादि, अनन्त और परम कारण आत्मसत्ता स्थित है; भावना के वश से उसमें जगत्रूप भासता है और अनन्यरूप है । जैसे जल और तरङ्ग में कुछ भिन्नता नहीं होती तैसे ही ब्रह्म और जगत् में कुछ भिन्नता नहीं । आत्मा में जगत् कुछ द्वैतरूप नहीं हुआ; आत्मसत्ता सदा अपने आपही में स्थित है और उसमें जैसा-जैसा चित्तस्पन्द दृढ़ होता है तैसा ही तैसा रूप होकर भासता है जैसे वानर रेत को इकट्ठा करके उसमें अग्नि की भावना करते हैं और तापते हैं तो उनका शीत उसी से निवृत्त होता है तैसे ही सम, स्थित और शान्तरूप आत्मा में जब जगत् की भावना फुरती है तब नाना प्रकार का भासता है । जैसे थम्भे में पुतलियाँ अनउदय ही शिल्पी के मन में उदय की नाईं भासती हैं तैसे ही भावना के वश से आत्मा ही जगत् हो भासता है । जैसे बीज में पत्र, फूल, टहनी और वृक्ष अनन्यरूप होते हैं वैसे ही ब्रह्म में जगत् अनन्यरूप है । जैसे और वृक्ष में कुछ भेद नहीं तैसे ही ब्रह्म और जगत्
३०= योगवाशिष्ठ ।
में कुछ भेद नहीं; अविचार से भेद भासता है और विचार किये से जगत् भेद नष्ट हो जाता है। हे रामजी! अब यह विचार न करना कि कैसे उपजा है, कहाँ से आया है और कब का हुआ है। जैसे हुआ तैसे हुआ, अब इसकी निवृत्ति का उपाय करना चाहिये। जब तुम यह जानोगे तब हृदय की चिदजड़ ग्रन्थि टूट जावेगी। शब्द और अर्थ की जो कुछ कल्पना उठती है सो मेरे वचनों और स्वरूप में स्थित भये से नष्ट हो जावेगी। हे रामजी! यह सब जगत् अनर्थ चित्त से उपजा है और मेरे वचनों के सुनने से शान्त हो जावेगा। इसमें संशय नहीं कि सब जगत् ब्रह्म से उपजा है और सब ब्रह्मस्वरूप ही है पर जब तुम ज्ञान में जागीगे तब ज्यों का त्यों ही जानोगे। रामजी ने पूछा, हे भगवन्! जो जिससे होता है वह उससे व्यतिरेक होता है; जैसे कुलाल से घट भिन्नरूप होता है; तो आप कैसे कहते कि सब जगत् ब्रह्म से उपजा है और ब्रह्मस्वरूप ही है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! यह जगत् ब्रह्म से ही उपजा है। जितने कुछ प्रतियोगी शब्द शास्त्रों ने कहे हैं सो दृश्य में हैं। शास्त्र ने उपदेश जताने के निमित्त कहे हैं, वास्तव में यह शब्द कोई नहीं। जैसे किसी बालक को परछाहीं में वैताल भासता है तो पूछते हैं कि किस' भाग में स्थित होकर वैताल ने भय दिया है और वह कहता है कि अमुक ठौर में वैताल ने भय दिया है सो वह व्यवहार के निमित्त कहता है, पर वैताल तो वहाँ कोई भी न था, तैसे ही आत्मा में उपदेश के निमित्त भेदकल्पना करी है वास्तव में द्वैतकल्पना कोई नहीं। हे रामजी! ब्रह्म जगत् हुआ है यह अर्थ केवल व्यतिरेक में नहीं होता। कुलाल जो दण्ड से घट उपजाता है सो व्यतिरेक के अर्थ हैं। स्वामी का टहलुआ यह भिन्न के अर्थ है और ये अभिन्नरूप भी होते हैं। जैसे अवयवी के अवयव हैं; सुवर्ण से भूषण हुए हैं और मृत्तिका से घट हुए हैं तैसे ही अभिन्न और अवयवी का स्वरूप है। जैसे भूषण स्वर्णरूप है, घट मृत्तिकारूप है तैसे ही ब्रह्म से उपजा जगत् ब्रह्म-रूप ही है। वास्तव में भिन्न-अभिन्न, कारण-परिणाम, भाव-विकार अविद्या और विद्या, सुख-दुख आदिक मिथ्याकल्पना अज्ञान से उठती
उत्पत्ति प्रकरण । ३०६
है । हे रामजी ! अबोध से भेदकल्पना होती है और ज्ञान से सब कल्पना शान्त हो जाती हैं । केवल अशब्दपद शेष रहता है । जब तुम ज्ञान-योग होगे तब ऐसे जानोगे कि आदि-मध्य-अन्त से रहित; अविभाग और अखण्डरूप एक आत्मसत्ता ज्यों की त्यों स्थित है । अज्ञान से अथवा जिज्ञासु को उपदेश के निमित्त द्वैतवाद कल्पना है; बोध होने से द्वैत भेद कुछ नहीं रहता । हे रामजी ! वाच्यवाचकभाव द्वैत बिना सिद्ध नहीं होता । जब बोध होता है तब वाच्य का मौन होता है । इसमें महावाक्य के अर्थ में निष्ठा करो और जो कुछ भेद कल्पना मन ने रची है उसकी निवृत्त के अर्थ मेरे वचन सुनो । हे रामजी ! यह मन ऐसे उपजा है जैसे गन्धर्वनगर होता है और उसी ने जगत् की रचना की है । मैंने जैसे देखा है तैसे तुमसे दृष्टान्त में कहता हूँ; जिसके जाने से सब जगत् तुमको भ्रान्तिमात्र भासेगा । वह निश्चय धारण करके तुम जगत् की वासना दूर से त्याग दोगे और बोध से सब जगत् तुमको मन का मनरूप भासेगा । तब तुम आत्मरूप होकर अपने आप में निवास करोगे अर्थात् जगत् की कल्पना त्याग करके अपने स्वभावसत्ता में स्थित होंगे । इसलिये इसको सावधान होकर सुनो । हे रामजी ! यह मनरूपी बड़ा रोग है इसलिये विवेकरूपी ओषधि से उसको शान्त करना चाहिए। सब जगत् चित्त की कल्पना है । वास्तव में वह शरीर आदिक कुछ नहीं जैसे रेत से तेल नहीं निकलता; तैसे ही जगत् से वास्तव में कुछ नहीं निकलता-चित्त द्वारा भासता है । वह चित्तरूपी संसार स्वप्न की नाईं है और रागद्वेष आदिक सङ्कल्पों से युक्त है । जो उससे रहित होता है वही संसार समुद्र के पार जाता है । इसलिये शुभ गुणों से चित्त की शुद्धि करो । जो विवेकी हैं वे शुभकार्य करते हैं अशुभ नहीं करते हैं और आहार व्यवहार भी विचार के करते हैं । उन्हीं आर्यों की नाईं तुम भी शास्त्रों के अनुसार चेष्टा करो । जब तुमको ऐसा अभ्यास होगा तब तुम शीघ्र ही ज्ञानवान् होगे और ज्ञान के प्राप्त होने से सब कल्पना मिट जावेगी और आत्म-स्थित होगी । चित्त ने सब जगत्रूपी चित्र मन ही मन रचे हैं । जैसे मोर का अण्डा काल पाकर अनेक रङ्ग धारण करता है तैसे ही मन
३१० योगवाशिष्ठ ।
अनेक प्रकार के जगत् धारण करता है वह मन जड़ और अजड़रूप है उसमें जो चेतनभाग है वह सब अर्थों का बीजरूप है अर्थात् सबका उपादान है और जड़ भाग जगतरूप है । हेरामजी ! सर्ग के आदि में पृथ्वी आदिक तत्त्व न थे । जैसे स्वप्न में जगत् विद्यमान की नाईं भासता है तैसे ही ब्रह्मा ने विद्यमान की नाईं उसको देखा । जड़संवेदन से पहाड़ आदिक जगत् देखा और चेतनसंवेदन से जङ्गमरूप देखा । वह सब जगत् दीर्घ वेदना है । वास्तव में देहादिक सब शून्यरूप हैं और आत्मा में व्यापे हुए हैं । आत्मा का कोई शरीर नहीं । अपने से जो दृश्यरूप मन चेता है वही आत्मा का शरीर है । वह आत्मा विस्तरण रूप है और निर्मल स्थित है और मन उसका आभासरूप है । जैसे सूर्य की किरणों से जलाभास होता है तैसे ही आत्मा का आभास मन है । यह मनरूपी बालक अज्ञान से जगतरूपी पिशाच को देखता है और ज्ञान से परमात्मपद शान्तरूप निरामय को देखता है। हे रामजी ! जब आत्मा चैत्यता को प्राप्त होती है तब वही चित्तरूप दृश्य एक ब्रह्म का द्वैत देखता है । उसकी निवृत्ति के लिए मैं तुमसे एक कथा कहता हूँ । गुरु के वचन जो दृष्टान्त सहित होते हैं और वाणी भी मधुर और स्पष्ट होती है तो श्रोता के हृदय में वह अक्षर जैसे जल में तेल की बूँद फैल जाती है तैसे ही फैल जाते हैं और जो दृष्टान्त से रहित होते और अर्थ स्पष्ट नहीं होता तो वह क्षोभसंयुक्त वचन कहाता है और अक्षर पूर्ण नहीं होते; इसलिये वे वचन श्रोता के हृदय में नहीं ठहरते और उपदेष्टा के वचन निष्फल हो जाते हैं । मैं तुमसे एक आख्यान नाना प्रकार के दृष्टान्तों सहित; मधुर वाणी में स्पष्ट करके कहता हूँ। जैसे चन्द्रमा की किरणें अपने गृह पर उदय हों और मन्दिर शीतल हो जावे तैसे ही मेरे स्पष्ट वचन और प्रकाशरूप अर्थ सुनने से तुम्हारा भ्रम निवृत्त हो जावेगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे मनअंकुरोत्पत्तियकननाम- षष्टितमस्सर्गः ॥ ६० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! पूर्व जो मुझसे ब्रह्माजी ने सर्ग का वृत्तान्त कहा है वह मैं तुमसे कहता हूँ। एक समय मैंने ब्रह्माजी के पास जाकर
उत्पत्ति प्रकरण । ३११
पूछा कि हे भगवन् ! ये जगत् गण कहाँ से आये और कैसे उत्पन्न हुए तब पितामहजी ने मुझसे इन्दु ब्राह्मण का आख्यान इस भाँति कहा । वे बोले हे मुनीश्वर ! यह सब जगत् मन से उपजा है और मन से ही भासता है । जैसे जल में द्रवता के कारण नाना प्रकार के तरंग और चक्र फुरते हैं तैसे ही मन के फुरने से सब जगत् फुरते हैं और मनरूप ही हैं। हे मुनीश्वर ! पूर्व कल्प में मैंने एक वृत्तान्त देखा है उसे सुनो । एक समय जब दिन का क्षय हुआ तब में सम्पूर्ण सृष्टि को संहार एकाग्रभाव हो रात्रि को स्वस्वभाव होकर रहा । जब मेरी रात्रि व्यतीत हुई और मैं जागा तब मैंने उठकर विधिसंयुक्त सन्ध्यादिक कर्म किये और बड़े आकाश की ओर देखा कि तम और प्रकाश से रहित; शून्यरूप और इतर से रहित व्यापित है । चिदाकाश में चित्त को मिला के जब मैंने सर्ग के उपजाने का संकल्प चित्त में धारण किया तब मुझको शुद्ध सूक्ष्म चिदाकाश में सृष्टि दृष्टि आई । वह सृष्टि मुझे बड़े विस्तार सहित और परस्पर अदृष्टरूप दृष्टि आई है और हर सृष्टि में ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—तीनों देवता भी थे । देवता गन्धर्व किन्नर और मनुष्य, सुमेरु, मन्दराचल, कैलास, हिमालय आदिक पर्वत पृथ्वी, नदियाँ, सातों समुद्रादिक सब सृष्टि के विस्तार हैं । वे दश सृष्टि हैं उनमें जो दश ब्रह्मा देखे वे मानों मेरे ही प्रतिबिम्ब कमल से उत्पन्न हुए हैं और राजहंस के ऊपर आरूढ़ हैं। उनकी भिन्न भिन्न सृष्टि है । उनमें नदी के बड़े प्रवाह चलते हैं; वायु आकाश में चलता है; सूर्य और चन्द्रमा उदय होते हैं देवता स्वर्ग में क्रीड़ा करते हैं, मनुष्य पृथ्वी में फिरते हैं । दैत्य और नाग पाताल में भोग भोगते हैं और कालचक्र फिरता है बारह मास उसकी बारह कीलें हैं और बसन्तादिक षट्ऋतु हैं । वासना के अनुसार शुभाशुभ आचार करके लोग नरक स्वर्ग भोगते हैं और मोक्ष फल पाते हैं । हर सृष्टि में सप्तद्वीप हैं; उत्पत्ति और प्रलय कल्प होते हैं और गङ्गाजी का प्रवाह जगत् के गले में यज्ञोपवीत है । कहीं ऐसे सृष्टि स्थित हैं, कहीं सदा प्रकाश रहता है और कहीं अहंकार से स्थावर जङ्गम प्रजा हैं । बिजली की नाईं सृष्टि उपजती और मिट जाती है । जैसे वृक्ष के पत्र उपजते हैं और नष्ट हो जाते हैं वैसे ही और गन्धर्व-
३१२ योगवाशिष्ठ ।
नगरवत् सृष्टि देखी। एक एक ब्रह्माण्ड में स्थावर जङ्गम ऐसी प्रजा देखी जैसे गूलर के फल में अनेक मच्छर होते हैं। आत्मा में काल का भी अभाव है। क्षण, लव, दिन, मास और वर्षों का प्रवाह चला जाता है। हे मुनीश्वर ! अन्तर्वाहक दृष्टि से मैंने उन सृष्टियों को देखा जब में चर्मदृष्टि से देखूँ तब कुछ न भासे और दिव्यदृष्टि से देखूँ तो सब कुछ भासे। चिरकाल पर्यन्त में यह चरित्र देखता रहा कि कदाचित् चित्तभ्रम हो तो स्पष्ट भासे। तब एक सृष्टि के सूर्य को देखके मैंने आवाहन किया और जब वह मेरे निकट आया तो मैंने उससे कहा; हे देवदेवेश, भास्कर ! तुम कुशल से तो हो ? ऐसे कहकर मैंने फिर कहा कि हे सूर्य ! तुम कौन हो और यह सृष्टि कहाँ से उपजी है ? यह एक जगत् है व ऐसे अनेक जगत् हैं; जैसे तुम जानते हो कहो ? तब वह सूर्य भी जो त्रिकाल-ज्ञान रखता था मुझको जान के प्रणामकर आनन्दित वाणी से बोला, हे ईश्वर ! इस दृश्यरूपी पिशाच के आप ही नित्य कारण होते हैं। आप तो सब जानते ही हैं तो मुझसे क्यों पूछते है। यदि लीला के अर्थ पूछते हो तो जैसे हुआ है तैसे में आपके सम्मुख निवेदन करता हूँ। हे भगवन् ! यह जो सत् असत् रूपी नाना प्रकार के व्यवहारों संयुक्त जगत् भासता है वह सब मन के फुरने में स्थित है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे आदित्यासमागमन्नामैक षष्टितमस्सर्गः ॥ ६१ ॥
भानु बोले, हे भगवन् ! आपका जो कल्प का दिन व्यतीत भया है उसमें जो जम्बूद्वीप था उसके एक कोने में कैलाश पर्वत था और उसकी कन्दरा में सुवर्णज्येष्ठ नाम आपका एक पुत्र रहता था। उसने वहाँ एक कुटी रची जिसमें साधुजन निवास करते थे। इन्दुनाम ब्राह्मण वेदवेत्ता शान्तरूप ने कश्यप ऋषि के कुल में उत्पन्न हो स्त्री सहित उस कुटी में जाके निवास किया और उस स्त्री से प्राणों की नाईं स्नेह करता था। जैसे मरुस्थल में घास नहीं उपजती तैसे ही उससे सन्तान न उपजे। ओर जैसे शरदकाल की बेलि बहुत सुन्दर होती है परन्तु फल से शून्य होती है तैसे ही वह स्त्री थी। तब दोनों पुरुष पुत्र के निमित्त कैलाश
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पाने से फिर दुःखी भी न हो और नाश भी न हो और सबका ईश्वर हो। तब एक भाई ने कहा कि सबसे बड़ा ऐश्वर्य मण्डलेश्वर का है। क्योंकि सब पर उसकी आज्ञा चलती है। दूसरे भाई ने कहा कि मण्डलेश्वर की विभूति भी कुछ नहीं, क्योंकि वह भी राजा के अधीन होता है; इससे राजा का पद बड़ा है। तीसरे ने कहा राजा की विभूति भी कुछ नहीं; क्योंकि राजा चक्रवर्ती के अधीन होता है इसलिए चक्रवर्ती का पद बड़ा है। चौथे कहा कि चक्रवर्ती भी कुछ नहीं, क्योंकि वह भी यम के अधीन होता है, इसमें यम का पद बड़ा है। पाँचवें ने कहा कि इन्द्र के आगे यम की विभूति कुछ नहीं इससे इन्द्र का पद बड़ा है। छठे ने कहा कि इन्द्र की विभूति भी कुछ नहीं ब्रह्मा के एक मुहूर्त में इन्द्र नष्ट हो जाता है तब सबसे बड़े भाई ने जो बड़ा बुद्धिमान् था गम्भीर वचन से कहा कि जो कुछ विभूति है सो सब ब्रह्मा के कल्प में नष्ट हो जाती है—इससे बड़ा ऐश्वर्य ब्रह्माजी का है इससे बड़ा और कोई नहीं। हे भगवन्! इस प्रकार जब बड़े भाई ने कहा तब सबने कहा, भली कही ! भली कही । फिर सबने बड़े भाई से कहा, हे तात ! जो सबका दुःखनाशकर्त्ता और जगत्पूज्य ब्रह्मपद है तो उसको कैसे प्राप्त हों ? जिस उपाय से हम प्राप्त हों वह उपाय कहो । उसने कहा, हे भाइयो ! और सब भावनाओं को त्याग करो और यह निश्चय करो कि हम ब्रह्मा हैं और पद्मासन पर बैठे हैं। सब सृष्टि के कर्त्ता और सबकी पालना और संहारकर्त्ता हम ही हैं और जो कुछ जगज्जाल है उसका आश्रयभूत हम नहीं । सब सृष्टि हमारे अङ्ग में स्थित है जब हम ऐसा निश्चय और सजातिभावना धरके बैठेंगे तब हमको ब्रह्मा का पद प्राप्त होगा । हे भगवन् ! जब इस प्रकार बड़े भाई ने कहा तब छोटे भाइयों ने कहा, हे तात ! तुमने यथार्थ कहा है जैसे तुमने कहा है तैसे ही हम करते हैं। ऐसा कहकर सब ध्यान में स्थित हुए और जैसे कागज पर मूर्ति लिखी होती है तैसे ही दशों ध्यान स्थित हुए। मन में हरएक ने यही चिन्तवन किया कि में ब्रह्मा हूँ; कमल मेरा आसन है, में सृष्टिकर्त्ता और भोक्ता हूँ और महेश्वर भी में ही हूँ। साङ्गोपाङ्ग जगत्कर्म मैंने ही रचे हैं; सरस्वती और
उत्पत्ति प्रकरण ।
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गायत्री सहित वेद मेरे आगे आ खड़े हैं और इस लोकपाल और सिद्धों के मण्डलों को पालनेवाला भी मैं ही हूँ। स्वर्ग, भूमि, पाताल, पहाड़, नदियाँ और समुद्र सब मैंने रचे हैं और महाबाहु वज्र के धारनेवाला और यज्ञों का भोक्ता इन्द्र मैंने ही रचा है। सूर्य मेरी आज्ञा से तपता है और जगत् की मर्यादा के निमित्त सब लोकपाल मैंने ही रचे हैं। जैसे गो को गोपाल पालता है तैसे लोकपाल मेरी आज्ञा पाकर जीवों को पालते हैं और समुद्र में तरङ्ग उपजते और मिट जाते हैं तैसे ही जगत् मुझसे उपजा है और फिर मुझमें ही लीन होता है। क्षण, दिन, मास, वर्ष, युग आदिक काल मेरे ही रचे हुए हैं और मैंने ही सब काल के नाम रखे हैं। मैं ही दिन को उत्पन्न करता हूँ और रात्रि को लीन कर लेता हूँ; सदा आत्मपद में स्थित हूँ और पूर्ण परमेश्वर मैं ही हूँ। हे ब्रह्माजी! इस प्रकार वे दशों भाई भावना धारण कर बैठे रहे—मानों कागज पर मूर्ति लिख छोड़ी है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे ऐन्दवसमाधिवर्णनंनाम द्विषष्टितमसर्गः ॥ ६२ ॥
भानु बोले, हे भगवन्! इस प्रकार इन्द्र के दशों पुत्र पितामह की भावना धारण करके बैठे और जैसे जेठ, आषाढ़ में कमल के पत्र सूखकर गिर पड़ते हैं तैसे ही उनकी देह धूप और पवन से सूखकर गिर पड़ी। तब वनचर उनके शरीरों को आपस में खेंचकर भक्षण कर गये। जैसे वानर फल पकड़ते हैं और विदारण करते हैं तैसे ही इनके देह वे विदारने लगे तो भी उनकी वृत्ति ध्यान से छूट के बाह्यदेहादिक अभ्यास में न आई, ब्रह्मा की भावना में ही लगी रही। इस प्रकार जब चारों युग का अन्त हुआ और तुम्हारे कल्प दिन का क्षय होने लगा तब द्वादश सूर्य तपने लगे; पुष्कल मेघ गरजके वर्षने लगे; बड़ा भूचाल आया; वायु चलने लगा; समुद्र उछलने लगे; सब जल ही जल हो गया और सब भूत क्षय हो गये। जब सबको संहार करके रात्रि को वे आत्मपद में स्थित हुये तब उनके शरीर भी नष्ट हो गये और पुर्यष्टक आकाश में आकाशरूप होके ब्रह्मा के सङ्कल्प को लेकर तीव्र भावना के वश से दशों सृष्टि सहित भिन्न-भिन्न
३१६ | योगवाशिष्ट ।
अपनी-अपनी सृष्टि के दश ब्रह्मा हुए। फिर जागकर देखते हैं कि आकाश में फुग्ते हैं। हे भगवन् ! उन दशों ब्राह्मणों के चित्त आकाश में ही सब सृष्टि स्थित हैं। उन दश सृष्टियों में से एक सृष्टि का सूर्य मैं हूँ। आकाश में मेरा मन्दिर है और क्षण, दिन, पक्ष, मास और युग मुझ ही से होते हैं—इस क्रिया में मुझको उन्होंने लगाया है। हे भगवन् ! इस प्रकार मैंने आपसे दशों ब्रह्मा और उनकी दशों सृष्टि कहीं, वे सृष्टि सब मनोमात्र हैं। अब जैसी आपकी इच्छा हो तैसी कीजिये। भिन्न-भिन्न जगत्जाल कल्पना जो इन्द्रजाल की नाईं विस्तृत हुई हैं वे चित्त के भ्रम से भासती हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे जगद्रचनानिर्णयवर्णनन्नाम त्रिषष्टितमसर्गः ॥ ६३ ॥
इतना कहकर ब्रह्माजी बोले, हे ब्राह्मण, ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! इस प्रकार ब्रह्मा के सूर्य ब्रह्मा से कहकर जब तूष्णीम् हुए तब उनके वचनों को विचार कर मैंने कहा, हे भानु ! तुमने सृष्टि दश कहीं अब मैं क्या रचूँ। यह तो दश सृष्टि हुई हैं और दश ब्रह्मा हैं अब मेरे रचने से क्या सिद्ध होगा ? हे मुनीश्वर ! जब इस प्रकार मैंने कहा तब सूर्य विचार कर बोले, हे प्रभो ! आप तो निरिच्छित हैं आपको सृष्टि रचने में कुछ इच्छा नहीं, सृष्टि की रचना आपको विनोदमात्र है किसी कामना के निमित्त नहीं रचते। आप निष्कामरूप हैं। जैसे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब होता है और जल बिना प्रतिबिम्ब की कल्पना नहीं होती तैसे ही संवेदन करके आपसे सृष्टि की रचना होती है। अज्ञानी को आप सृष्टिकर्त्ता भासते हैं पर आप तो सदा ज्यों के त्यों निष्क्रियरूप हैं, हे भगवन् ! आपको शरीर आदिक की प्राप्ति और त्याग में कुछ द्वेष नहीं और उत्पत्ति और संहार की आपको कल्पना नहीं—लीलामात्र आपसे सृष्टि होती है। जैसे सूर्य से दिन होता है और सूर्य के अस्त होने से दिन लय हो जाता है पर सूर्य असंसक्तरूप है तैसे ही आपमें संवेदन के फुरने से सृष्टि होती है और संवेदन के अस्फुर हुए सृष्टि का लय होता है, पर आप सदा आसक्त हैं। जगत् की रचना आपका नित्यकर्म है और उस कर्म के त्याग करने से आपको कुछ अपूर्व वस्तु भी नहीं प्राप्त होती इससे जो कुछ आपका
उत्पत्ति प्रकरण । ३१७
नित्यकर्म है उसे कीजिये। हे जगत्पति ! जैसे निष्कलङ्क दर्पण प्रतिबिम्ब अङ्गीकार करता है तैसे ही महापुरुष यथा प्राप्त कर्म को असंसक्त होकर अङ्गीकार करते हैं। जैसे ज्ञानवान् को कर्म करने में कुछ प्रयोजन नहीं तैसे ही उसको करने में और न करने में कुछ प्रयोजन नहीं; करना न करना दोनों उसको सम हैं। इस कारण दोनों में आप सुषुप्तिरूप हैं। हे भगवन् ! आप तो सदा सुषुप्तिरूप हैं और उत्थान किसी प्रकार नहीं। इससे आप सुषुप्तिरूप प्रबोध होकर अपने प्रकृत आचार कीजिये। जो इन्द्र ब्राह्मणों के पुत्रों की सृष्टि देखो तब भी विरुद्ध कुछ नहीं। जो ज्ञान दृष्टि से देखो तो एक ही अद्वैत ब्रह्म है और कुछ नहीं बना और जो चित्तदृष्टि से देखो तो संकल्परूप अनेक सृष्टि फुरती है। उसमें आस्था करनी क्या है ? जो चर्मदृष्टि से देखो तो आपको सृष्टि भासती ही नहीं। उनके साथ आपको क्या है; उनकी सृष्टि उन्हीं के चित्त में स्थित है और उनकी सृष्टि आप नाश भी न कर सकोगे क्योंकि जो इन्द्रियों से कर्म होता है वह नष्ट हो सकता है, परन्तु मन के निश्चय कोई को नष्ट नहीं कर सकता । हे भगवन् ! जो निश्चय जिसके चित्त में दृढ़ होगया है उसको वही निवृत्त करे तो निवृत्त होता है और कोई निवृत्त नहीं कर सकता । देह नष्ट होने से निश्चय नहीं नष्ट होता जो चिरकाल का निश्चय दृढ़ हो रहा है उसका स्वरूप से नाश नहीं होता । हे भगवन् ! जो मन में दृढ़ निश्चय हो रहा है वही पुरुष का रूप है; उसका निश्चय और किसी से नहीं होता । जैसे जल सींचने से पर्वत चलायमान नहीं होता तैसे ही चित्त का निश्चय और से चलायमान नहीं होता ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे ऐन्दवनिश्चयकथनन्नाम चतुःषष्टितमस्सर्गः ॥ ६४ ॥
भानु बोले, हे देवेश ! इस पर एक पूर्व इतिहास है वह आप सुनिये। इन्द्रद्युम्न नाम एक राजा था और उसकी कमलनयनी अहल्या रानी थी। उसके नगर में इन्द्र नामक एक ब्राह्मण का पुत्र बहुत सुन्दर और बलवान् रहता था। एक समय उस रानी ने पूर्व की अहल्या गौतम की स्त्री और इन्द्र की कथा सुनी तब एक सहेली ने कहा, हे रानी ! जैसे पूर्व अहल्या थी तैसे ही तुम भी हो और जैसा वह इन्द्र सुन्दर था तैसे ही