दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
दोहावली ८७ विषयासक्त साधुकी अपेक्षा वैराग्यवान् गृहस्थ अच्छा है सीस उघारन किन कहेउ बरजि रहे प्रिय लोग । घरहीं सती कहावती जरती नाह बियोग ॥२५४॥ भावार्थ—अधजली भागनेवाली ऐसी सतीको सिर खोलनेके लिये किसने कहा था ? प्यारे सगे-सम्बन्धी तो सब रोक रहे थे । इससे तो यही अच्छा था कि स्वामीके वियोगकी अग्निमें सदा जला करती और घर बैठी ही सती कहलाती । (तात्पर्य यह है कि साधु होकर फिर विषयोंकी ओर ललचानेसे तो घर बैठे भजन करना ही अच्छा है ।)॥२५४॥ साधुके लिये पूर्ण त्यागकी आवश्यकता खरिया खरी कपूर सब उचित न पिय तिय त्यागि । कै खरिया मोहि मेलि कै बिमल बिबेक बिराग ॥२५५॥ भावार्थ—[कहते हैं कि साधु होनेके बाद तुलसीदासजीको एक दिन उनकी स्त्री मिल गयी । स्त्रीने उनकी झोलीमें खरी (सफेद गोपीचन्दन) और कपूर आदि देखकर कहा कि] हे प्रियतम ! जब आप अपनी झोलीमें खरी और कपूर आदि सब सामान रखते हैं, तब स्त्रीका त्याग उचित नहीं है । अतएव या तो मुझको भी इस झोलीमें डाल लीजिये, अथवा विशुद्ध ज्ञान और वैराग्यको धारण कीजिये । [कहते हैं कि उसी क्षणसे तुलसीदासजीने झोली-झंडा फेंक दिया । यह दोहा वास्तवमें सभी विरक्त-वेषधारी पुरुषोंके लिये चेतावनी- स्वरूप है] ॥२५५॥
८८ दोहावली भगवत्प्रेममें आसक्ति बाधक है, गृहस्थाश्रम नहीं घर कीन्हें घर जात है घर छांड़े घर जाइ । तुलसी घर बन बीचहीं राम प्रेम पुर छाइ ॥२५६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि घर करनेसे (गृहस्थीमें रहनेसे) अपना असली घर (परलोक) नष्ट हो जाता है और घर छोड़नेसे (संन्यास ग्रहण करनेसे) यहांका घर (गृहस्थी) नष्ट होता है । अतएव तू घर और वनके बीचमें ही (अर्थात् घरहीमें गृहत्यागी- की भाँति रहकर) श्रीरामजीके प्रेमकी पुरी बसा ॥२५६॥ संतोषपूर्वक घरमें रहना ही उत्तम है दिएँ पीठि पाछें लगै सनमुख होत पराइ । तुलसी संपति छाँह ज्यों लखि दिन बैठि गँवाइ ॥२५७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि संपत्ति शरीरकी छायाके समान है। इसकी पीठ देखकर चलनेसे यह पीछे-पीछे चलती है और सामने होकर चलनेसे दूर भाग जाती है। (जो धनसे मुंह मोड़ लेता है, धनकी नदी उसके पीछे-पीछे बहती चली आती है; और जो धनके लिये सदा ललचाता रहता है, उसे सपनेमें भी पैसा नहीं मिलता ।) इस बातको समझकर घर बैठकर ही दिन बिताओ (अर्थात् संतोषसे रहो और भगवान्का भजन करो ) ॥२५७॥ विषयोंकी आशा ही दुःखका मूल है तुलसी अद्भुत देवता आसा देवी नाम । सेयें सोक समर्पई बिमुख भएँ अभिराम ॥२५८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि आशादेवी नामकी एक अद्भुत देवी है; यह सेवा करनेपर तो शोक (दुःख) देती है और इससे विमुख होनेपर सुख मिलता है ॥२५८॥
दोहावली ८३
मोह-महिमा
सोई सेंवर तेइ सुवा सेवत सदा बसंत । तुलसी महिमा मोह की सुनत सराहत संत ॥२५९॥ भावार्थ—वही सेमलका पेड़ है और वही तोते हैं (बार-बार अनुभव कर चुके हैं कि इसके फलमें गूदा नहीं होता), तो भी मोह- वश वसन्त ऋतु आनेपर सदा उसीपर मँडराये रहते हैं। (चोंच मारते हैं, रुई उड़ जाती है, हाथ कुछ भी नहीं आता।) तुलसी- दासजी कहते हैं कि इस बातको सुनकर संतलोग भी मोहकी महिमाकी सराहना करते हैं ॥२५९॥
विषय-सुखकी हेयता
करत न समुझत झूठ गुन सुनत होत मति रंक । पारद प्रगट प्रपंचमय सिद्धिउ नाऊँ कलंक ॥२६०॥ भावार्थ—[बार-बार धोखा खानेपर भी] विषयी मनुष्य विषयोंके लिये चेष्टा करते हुए यह नहीं समझते कि इनमें कहीं भी सुख नहीं है; विषयोंके झूठे गुणोंको सुनते ही उनकी बुद्धिका दिवाला निकल जाता है (उनका मन विषयोंके लिये ललचा उठता है)। यह प्रपञ्चमय विषय-सुख प्रत्यक्ष पारेके समान है, जिसके सिद्ध होनेपर भी उसका नाम 'कलङ्क' ही होता है ॥२६०॥
लोभकी प्रबलता
ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार । केहि कै लोभ विडंबना कीन्हि न एहिं संसार ॥२६१॥ भावार्थ—ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कवि, पण्डित और गुणोंका धाम इस संसारमें ऐसा कौन मनुष्य है, जिसकी लोभने मिट्टी पलीद न की हो? ॥२६१॥
९० दोहावली धन और ऐश्वर्यके मद तथा कामकी व्यापकता श्रीमद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि। मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि ॥२६२॥ भावार्थ-धनके मदने किसको टेढ़ा नहीं कर दिया, प्रभुताने किसको बहरा नहीं बना दिया और मृगलोचनी (सुन्दर स्त्री) के नयन-बाण ऐसा कौन है, जिनको नहीं लगे ? ॥२६२॥ मायाकी फौज ब्यापि रहेउ संसार महँ माया कटक प्रचंड । सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाखंड ॥२६३॥ भावार्थ-मायाकी प्रचण्ड सेना संसारभरमें फैल रही है, कामादि (काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और मत्सर) वीर इस सेनाके सेनापति हैं और दम्भ, कपट, पाखण्ड उसके योद्धा हैं ॥२६३॥ काम, क्रोध, लोभकी प्रबलता तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ । मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महूँ छोभ ॥२६४॥ भावार्थ-हे तात ! काम, क्रोध और लोभ-ये तीन दुष्ट बड़े ही बलवान् हैं, ये विज्ञानसम्पन्न मुनिके मनमें भी पलक मारते-मारते क्षोभ उत्पन्न कर देते हैं ॥२६४॥ काम, क्रोध, लोभके सहायक लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि । क्रोध कें परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि ॥२६५॥ भावार्थ-श्रेष्ठ मुनि विचारकर कहते हैं कि लोभके इच्छा और
दोहावली ९१ दम्भका बल है, कामके केवल कामिनीका बल है और क्रोधके कठोर वचनका बल है ॥२६५॥ मोहकी सेना काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि । तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि ॥२६६॥ भावार्थ-काम, क्रोध, मद और लोभ आदि मोहकी प्रबल सेना है। इनमें स्त्री जो माया की साक्षात् मूर्ति है, वह तो बहुत ही भया- नक दुःख देनेवाली है ॥२६६॥ अग्नि, समुद्र, प्रबल स्त्री और कालकी समानता काह न पावक जारि सक का न समुद्र समाइ । का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ ॥२६७॥ भावार्थ—अग्नि क्या नहीं जला सकती ? समुद्रमें कौन वस्तु नहीं डूब सकती, प्रबल होनेपर अबला कहलानेवाली स्त्री क्या नहीं कर सकती ? और जगत्में काल किसको नहीं खाता ? ॥२६७॥ स्त्री झगड़े और मृत्युकी जड़ है. जनमपत्रिका बरति कै देखहु मनहिँ बिचारि । दारुन बैरी मीचु के बीच बिराजति नारि ॥२६८॥ भावार्थ-जन्मकुण्डलीको व्यवहारमें लाकर मनमें विचारकर देखो कि स्त्री भयंकर बैरीके और मृत्युके बीचके स्थानमें विराज रही है (कुण्डलीके बाहर स्थानोंमें छठा शत्रु का और आठवां मृत्युका माना जाता है। इनके बीचमें स्त्रीका स्थान सातवाँ है। जगत्में स्त्रियोंके कारण न मालूम कितने लोगोंमें शत्रुता और कितनोंकी मृत्यु हुई है।) ॥२६८॥
९२ दोहावली उद्बोधन दीपसिखा सम जुबति तन मन जनि होसि पतंग। भजहि राम तजि काम मद करहि सदा सतसंग ॥२६९॥ भावार्थ—युवती स्त्रियोंका [ सुन्दर ] शरीर दीपककी लौके समान है, मन ! तू उसमें पतंग मत बन [ नहीं तो भस्म हो जायगा ]। काम और मदको त्यागकर श्रीरामका भजन कर और सदा सत्सङ्ग कर ॥२६९॥ गृहासक्ति श्रीरघुनाथजीके स्वरूपकेज्ञानमें बाधक है काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे भव कूप ॥२७०॥ भावार्थ—जो काम, क्रोध, मद और लोभके परायण हैं और जो दुःखरूप गृहमें ही आसक्त हैं, वे संसाररूपी कुएँमें पड़े हुए मूढ़ श्रीरघुनाथजीको कैसे जान सकते हैं ? ॥२७०॥ काम-क्रोधादि एक-एक अनर्थकारक हैं, फिर सबकी तो बात ही क्या ? ग्रह ग्रहीत पुनि बातबस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार ॥२७१॥ भावार्थ—जिसे कुग्रह लगे हों [अथवा जो पिशाचग्रस्त हो] फिर जो वायुरोगसे पीड़ित हो और उसीको फिर बिच्छू डंक मार दे, ऐसे तीन प्रकारसे पागल बने हुएको ऊपरसे शराब पिला दी जाय तो कहिये, यह कैसा इलाज है? ॥२७१॥
दोहावली ९३ किसके मनको शान्ति नहीं मिलती ? ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम । भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥२७२॥ भावार्थ—जो मनुष्य मोहके वशीभूत होकर भूतप्राणियोंके द्रोहमें तत्पर है, श्रीरामसे विमुख है और भोगोंमें आसक्त हो रहा है; उसको क्या स्वप्नमें भी [दैवी] सम्पत्ति, शुभ शकुन या चित्तकी शान्ति प्राप्त हो सकती है ? ॥२७२॥ ज्ञानमार्गकी कठिनता कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक । होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक ॥२७३॥ भावार्थ—ज्ञान कहने (समझाने) में कठिन है, समझनेमें कठिन है और साधन करनेमें भी कठिन है। यदि 'घुणाक्षर' न्यायसे* कहीं ज्ञान प्राप्त भी हो जाय तो फिर भी उस [के बचाये रखने] में अनेकों विघ्न आते रहते हैं। (तात्पर्य यह है कि कहीं गुरुकृपासे परोक्ष ज्ञान हो ही जाता है, तो फिर भी अपरोक्षतक पहुँचनेमें बहुत-सी बाधाएँ आती हैं) ॥२७३॥ भगवद्भजनके अतिरिक्त और सब प्रयत्न व्यर्थ हैं खल प्रबोध जग सोध मन को निरोध कुल सोध । करहिं ते फोटक पचि मरहिं सपनेहुँ सुख न सुबोध॥२७४॥ *काठमें जब घुन लग जाता है और उसे काटता है, तब उसमें कई तरहकी रेखाएँ बन जाती हैं। संयोगसे कोई रेखा अक्षर-जैसी बन जाय तो उसे 'घुणाक्षर' कहते हैं। इसी प्रकार बिना प्रयत्नके संयोगवश कोई घटना हो जाय तो उसे 'घुणाक्षर-न्याय' कहते हैं।
९४ दोहावली भावार्थ—जो लोग दुष्टोंको ज्ञानका उपदेश देना, संसारका सुधार करना, मनका निरोध करना और कुलको शुद्ध करना चाहते हैं, वे व्यर्थ ही परिश्रम करते हुए मर जाते हैं; उन्हें स्वप्नमें भी सुख या सुन्दर ज्ञान नहीं मिलता। [अतएव इन सब कार्योंके पीछे न पड़कर संतोषपूर्वक श्रीभगवान्का भजन करना चाहिये] ॥२७४॥ संतोषकी महिमा सोरठा कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु । चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ ॥२७५॥ भावार्थ—स्वाभाविक संतोषके बिना क्या कोई शान्ति पा सकता है? चाहे करोड़ों प्रकारसे जतन करते-करते कोई मर जाय, परंतु जलके बिना सूखी जमीनपर क्या कभी नाव चल सकती है? ॥२७५॥ मायाकी प्रबलता और उसके तरनेका उपाय सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल । अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि ॥२७६॥ भावार्थ—जिसे भगवान्की प्रबल माया मोहित न कर दे ऐसा देवता, मनुष्य अथवा मुनि कोई भी नहीं है। यों मनमें विचारकर उस महामायाके स्वामी (प्रेरक) श्रीरामका भजन करना चाहिये ॥२७६॥ गोस्वामीजीकी अनन्यता दोहा एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास । एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास ॥२७७॥
दोहावली १५ भावार्थ—एक ही भरोसा है, एक ही बल है, एक ही आशा है और एक ही विश्वास है। एक रामरूपी श्यामघन (मेघ) के लिये ही तुलसीदास चातक बना हुआ है ॥२७७॥ प्रेमकी अनन्यताके लिये चातकका उदाहरण जौं घन बरषै समय सिर जौं भरि जनम उदास । तुलसी या चित चातकहि तऊ तिहारी आस ॥२७८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हे रामरूपी मेघ ! चाहे तुम ठीक समयपर बरसो (कृपाकी दृष्टि करो) चाहे जन्मभर उदासीन रहो—कभी न बरसो, परंतु इस चित्तरूपी चातकको तो तुम्हारी ही आशा है ॥२७८॥ चातक तुलसीके मतें स्वातिहुँ पिएँ न पानि । प्रेम तृषा बाढ़ति भली घटें घटैगी आनि ॥२७९॥ भावार्थ—हे चातक ! तुलसीदासके मतसे तो तू स्वाति नक्षत्रमें बरसा हुआ जल भी न पीना ! क्योंकि प्रेमकी प्यासका बढ़ते रहना ही अच्छा है; घटनेसे तो प्रेमकी निष्ठा ही घट जायगी ॥२७९॥ रटत रटत रसना लटी तृषा सूखि गे अंग । तुलसी चातक प्रेम को नित नूतन रुचि रंग ॥२८०॥ भावार्थ—अपने प्यारे मेघका नाम रटते-रटते चातककी जीभ लट गयी और प्यासके मारे सब अङ्ग सूख गये। तुलसीदासजी कहते हैं कि तो भी चातकके प्रेमका रंग तो नित्य नया और सुन्दर ही होता जाता है ॥२८०॥ चढ़त न चातक चित कबहुँ प्रिय पयोद के दोष । तुलसी प्रेम पयोधि की ताते नाप न जोख ॥२८१॥
९६ दोहावली भावार्थ—चातकके चित्तमें अपने प्रियतम मेघका दोष कभी आता ही नहीं। तुलसीदासजी कहते हैं कि इसीलिये प्रेमके अथाह समुद्रका कोई माप-तौल नहीं हो सकता (उसका थाह नहीं लगाया जा सकता) ॥२८१॥ बरषि परुष पाहन पयद पंख करौ टुक टूक। तुलसी परी न चाहिऐ चतुर चातकहि चूक ॥२८२॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मेघ (बादल) कठोर ओले बरसाकर भले ही चातककी पांखोंके टुकड़े-टुकड़े कर दे, पर प्रेमके प्रणमें चतुर चातकको अपने प्रेमका प्रण निबाहनेमें कभी भूल नहीं करनी चाहिये ॥२८२॥ उपल बरषि गरजत तरजि डारत कुलिस कठोर। चितव कि चातक मेघ तजि कबहुँ दूसरी ओर ॥२८३॥ भावार्थ—मेघ कड़क-कड़ककर गर्जता हुआ ओले बरसाता है और कठोर बिजली भी गिरा देता है; इतनेपर भी प्रेमी पपीहा मेघको छोड़कर क्या कभी किसी दूसरी ओर ताकता है ? ॥२८३॥ पबि पाहन दामिनि गरज झरि झकोर खरि खीझि। रोष न प्रीतम दोष लखि तुलसी रागहि रीझि ॥२८४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि मेघ बिजली गिराकर, ओले बरसाकर, बिजली चमकाकर, कड़क-कड़ककर, वर्षाकी झड़ी लगा- कर और आंधीके झकोरे देकर अपना बड़ा भारी रोष प्रकट करता है; परंतु चातकको अपने प्रियतमका दोष देखकर क्रोध नहीं होता (उसे दोष दीखता ही नहीं), बल्कि इसमें भी वह अपने प्रति मेघका अनुराग देखकर उसपर रीझ जाता है ॥२८४॥
दोहावली ९७ मान राखिबो माँगिबो पिय सों नित नव नेहु । तुलसी तीनिउ तब फबैं जौ चातक मत लेहु ॥२८५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि आत्मसम्मानकी रक्षा करना, माँगना और फिर भी प्रियतमसे प्रेमका नित्य नवीन होना (बढ़ना)—ये तीनों बातें तभी शोभा देती हैं जब चातकके मतका अनुसरण किया जाय ॥ २८५ ॥ तुलसी चातक ही फबै मान राखिबो प्रेम । बक्र बूंद लखि स्वातिहु निदरि निबाहत नेम ॥२८६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं, प्रेमके मानकी रक्षा करना और प्रेमको भी निबाहना चातकहीको शोभा देता है। स्वाती नक्षत्र- में भी यदि बूंद [मेघकी ओर निहारते हुए उसके मुखमें सीधी न पड़कर] टेढ़ी पड़ती है तो वह उसका निरादर करके प्रेमके नियमको निबाहता है (चोंचको टेढ़ी करनेमें दूसरी ओर ताकना हो जायगा और इससे उसके प्रेममें व्यभिचार होगा, इसलिये वह प्यासा रह जाता है, परंतु मुँह टेढ़ा नहीं करता । दूसरी बात यह है कि वह टेढ़ी चोंच करके पीता है तो उसका मान घटता है, वह माँगता नहीं है, प्रेमी है; देना हो तो सीधे दो, नहीं तो न सही) ॥ २८६ ॥ तुलसी चातक माँगन्यो एक एक घन दानि । देत जो भू भाजन भरत लेत जो घूंटक पानि ॥२८७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि चातक एक ही (अद्वितीय) माँगनेवाला है और बादल भी एक ही (अद्वितीय) दानी है। बादल इतना देता है कि पृथ्वीके सब बर्तन (झील, तालाब आदि) भर जाते हैं; परंतु चातक केवल एक घूंट ही पानी लेता है ॥२८७॥ दोहा० ७-८—
९८ दोहावली तीनि लोक तिहुँ काल जस चातक ही केँ माथ । तुलसी जासु न दीनता सुनी दूसरे नाथ ॥२८८॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि तीनों लोकोंमें और तीनों कालोंमें कीर्ति तो केवल अनन्य प्रेमी चातकके ही भाग्यमें है, जिसकी दीनता संसारमें किसी भी दूसरे स्वामीने नहीं सुन पायी ॥ २८८ ॥ प्रीति पपीहा पयद की प्रगट नई पहिचानि । जाचक जगत कनाउड़ो कियो कनौड़ा दानि ॥२८९॥ भावार्थ—पपीहा और मेघके प्रेमका परिचय प्रत्यक्ष ही नये ही ढंगका है; याचक (मँगता) तो संसारभरका ऋणी होता है, परंतु इस प्रेमी पपीहेने दानी मेघको अपना ऋणी बना डाला ॥२८९॥ नहिं जाचत नहिं संग्रहइ सीस नाइ नहिं लेइ । ऐसे मानी मागनेहि को बारिद बिनु देइ ॥२९०॥ भावार्थ—पपीहा न तो मुंहसे मांगता है, न जलका संग्रह करता है और
लिये सुखदायिनी होती है; परंतु तुलसीदासजी कहते हैं कि चातक- की-सी रीझ (प्रेम) और मेघकी-सी बुद्धि किसी विरले ही बुद्धिमान्की होती है (चातक मेघपर इतना रीझा रहता है कि कष्ट सहनेपर भी : उससे प्रेम बढ़ाता ही है और मेघकी ऐसी बुद्धिगुणज्ञता है कि वह दाता होकर भी ऋणी बन जाता है।) ॥ २६२ ॥ चातक जीवन दायकहि जीवन समयँ सुरीति । तुलसी अलख न लखि परै चातक प्रीति प्रतीति ॥२९३॥ भावार्थ—चातकके जीवनदाता मेघके प्रेमकी सुन्दर रीति तो उसके जीवनकालमें ही देखनेमें आती है; परंतु [अनन्य प्रेमी] चातकका प्रेम एवं विश्वास तो अलख (अज्ञेय) है, तुलसीदासजी कहते हैं, वह तो किसीके लखनेमें ही नहीं आता (अर्थात् उसका प्रेम तो मरते समय भी बना रहता है)—(देखिये दो० ३०२, ३०४, ३०५) ॥ २६३ ॥ जीव चराचर जहाँ लगें हैं सब को हित मेह । तुलसी चातक मन बस्यो घन सौं सहज सनेह ॥२९४॥ भावार्थ—संसारमें जितने चर-अचर जीव हैं, मेघ उन सभीका हितकारी है; परंतु तुलसीदासजी कहते हैं कि उस मेघके प्रति स्वाभाविक स्नेह तो एक चातकके ही चित्तमें बसा हुआ है ॥२६४॥ डोलत बिपुल बिहंग बन पिअत पोखरिन बारि । सुजस धवल चातक नवल तुही भुवन दस चारि ॥२९५॥ भावार्थ—वनमें बहुत-से पक्षी डोलते हैं और वे पोखरियोंका जल पिया करते हैं; परंतु हे नित्य नवीन प्रेमी चातक ! चौदहों लोकोंको अपने निर्मल यशसे उज्ज्वल तो एक तू ही करता है ॥२६५॥
१०० दोहावली मुख मीठे मानस मलिन कोकिल मोर चकोर । सुजस धवल चातक नवल रह्यो भुवन भरि तोर ॥२६६॥ भावार्थ—कोयल, मोर और चकोर मुँहके तो मीठे होते हैं; परंतु मनके बड़े मैले होते हैं (बोली तो बड़ी मीठी बोलते हैं, पर कीट-सर्पादि जीवोंको खा जाते हैं) परंतु हे नवल चातक ! विश्व- भरमें निर्मल यश तो तेरा ही छाया हुआ है ॥ २६६ ॥ बास बेस बोलनि चलनि मानस मंजु मराल । तुलसी चातक प्रेम की कीरति बिसद बिसाल ॥२६७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि हंसका निवासस्थान (मानसरोवर), वेष (रंग-रूप), बोली, चाल और [नीर-क्षीरका विवेक रखनेवाला तथा मोती चुगनेकी टेकवाला] मन सभी सुन्दर हैं, परंतु प्रेमकी कीर्ति तो सबसे बढ़कर विस्तृत और निर्मल चातक- की ही है ॥ २६७ ॥ प्रेम न परखिअ परुषपन पयद सिखावन एह । जग कह चातक पातकी ऊसर बरसै मेह ॥२६८॥ भावार्थ—संसारके लोग (विषयीजन) कहते हैं कि चातक पापी है, क्योंकि मेघ ऊसरतकमैं बरसता है [परंतु चातकके मुँहमें नहीं बरसता]; पर मेघ इससे यह शिक्षा देता है कि प्रेमकी परीक्षा कठोरतासे नहीं करनी चाहिये (अर्थात् कठोरतामें प्रेम नहीं है, ऐसा नहीं मानना चाहिये; कहीं-कहीं कठोरतामें ही प्रेमका प्रकाश होता है। चातक पापी नहीं है, महान् प्रेमी है; उसके प्रेमका यश मेघकी कठोरतासे बढ़ता है) ॥ २६८ ॥ होइ न चातक पातकी जीवन दानि न मूढ़ । तुलसी गति प्रहलाद की समुझि प्रेम पथ गूढ़ ॥२६९॥
दोहावली १०१ भावार्थ—न तो चातक ही पापी है और न जीवनदाता मेघ ही मूर्ख है। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रह्लादकी दशापर विचार करके समझो कि प्रेमका मार्ग कितना गूढ़ (सूक्ष्म) है। (प्रह्लादको पद-पद- पर कष्ट मिलता है और भगवान् उसके कष्टको जानते हुए भी बहुत विलम्बसे प्रकट होते हैं। यह उनकी प्रेमलीला ही है।) ॥२९९॥ गरज आपनी सबन को गरज करत उर आनि । तुलसी चातक चतुर सो जाचक जानि सुदानि ॥३००॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं, कि अपनी-अपनी गरज सभी को होती है और उसी गरजको (कामनाको) हृदयमें रखकर लोग जहाँ-तहाँ गरज करते (सबसे विनती करते) फिरते हैं। परंतु चतुर (अनन्य प्रेमी) चातक तो एक मेघको ही सर्वोत्तम दानी समझकर केवल उसीका याचक बना ॥३००॥ चरग चंगु गत चातकहि नेम प्रेम की पीर । तुलसी परबस हाड़ पर परिहैं पुहुमी नीर ॥३०१॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि बाजके पंजेमें फँसनेपर चातकको अपने प्रेमके नियमकी पीड़ा (चिन्ता) होती है। [उसे यह चिन्ता नहीं होती कि मैं मर जाऊँगा, पर इस बातकी बड़ी पीड़ा होती है कि बाजके द्वारा मारे जानेपर] मेरी हड्डियाँ और पाँख [स्वाती-नक्षत्रमें मेघ-जलमें न पड़कर] पृथ्वीके साधारण जलमें पड़ेगा ॥३०१॥ बध्यो बधिक परचो पुन्य जल उलटि उठाई चोंच । तुलसी चातक प्रेम पट मरतहूँ लगी न खोंच ॥३०२॥ भावार्थ—किसी बहेलियेने चातकको मार दिया, वह पुण्य- सलिल गङ्गाजीमें गिर पड़ा; परंतु गिरते ही उस अनन्य प्रेमी
१०२ दोहावली चातकने चोंचको उलट कर ऊपर उठा लिया। तुलसीदासजी कहते हैं कि चातकके प्रेमरूपी वस्त्रपर मरते दमतक कोई खोंच नहीं लगी (वह कहींसे फटा नहीं) ॥३०२॥ अंड फोरि कियो चेटुवा तुष पर्यो नीर निहारि। गहि चंगुल चातक चतुर डार्यो बाहिर बारि ॥३०३॥ भावार्थ—किसी चातकने अंडेको फोड़कर उसमेंसे बच्चा निकाला, परंतु अंडेके छिलकेको पानीमें पड़ा हुआ देखकर उस [प्रेमराज्यके] चतुर चातकने, तुरंत उसे पंजेसे पकड़कर जलसे बाहर फेंक दिया ॥३०३॥ तुलसी चातक देत सिख सुतहि बारहीं बार। तात न तर्पण कीजिए बिना बारिधर धार ॥३०४॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि चातक अपने पुत्रको वारंबार यही सीख देता है कि हे तात! [मेरे मरने पर] प्यारे मेघ की धाराको छोड़कर अन्य किसी जलसे मेरा तर्पण न करना ॥३०४॥ सोरठा जिअत न नाई नारि चातक घन तजि दूसरहिं। सुरसरिहू को बारि मरत न माँगेउ अरध जल ॥३०५॥ भावार्थ—जीते-जी तो चातकने [प्यारे] मेघको छोड़कर दूसरेके सामने गर्दन नहीं झुकायी (याचना नहीं की) और मरते समय भी गङ्गाजलमें* अर्धजलीतक न माँगी (मुक्तिका भी निरादर कर दिया) ॥३०५॥ *मरते हुए आदमीको आधा गङ्गाजीमें और आधा बाहर रखते हैं, इसको 'अर्धजल' क्रिया कहते हैं। इस अवस्थामें जिसके प्राण छूटते हैं, उसकी सहज मुक्ति हो जाती है—ऐसा शास्त्रोंमें वर्णन आता है।
दोहावली १०४ सुनु रे तुलसीदास प्यास पपीहहि प्रेम की । परिहरि चारिउ मास जो अँचवै जल स्वाति को ॥३०६॥ भावार्थ—रे तुलसीदास ! सुन, पपीहेको तो केवल प्रेमकी ही प्यास है [जलकी नहीं]; इसीलिये वह बरसातके चारों महीनोंके जलको छोड़कर केवल स्वाति-नक्षत्रका ही जल पीता है ॥३०६॥ जाँचै बारह मास पिएै पपीहा स्वाति जल । जान्यो तुलसीदास जोगवत नेही नेह मन ॥३०७॥ भावार्थ—चातक बारहों महीने मेघसे [उसे देखते ही ‘पिउ- पिउ’ की पुकार मचाकर] जल मांगा करता है, परंतु पीता है केवल स्वाति-नक्षत्रका ही जल । तुलसीदासजी कहते हैं कि मैंने इससे यह समझा है कि चातक ऐसा करके अपने स्नेही मेघका मन रखता है (जिससे मेघको यह कहनेका मौका न मिले कि तू तो स्वार्थी है, जब प्यास लगती है, तभी मुझे पुकारता है, फिर सालभर मेरा नाम भी नहीं लेता) ॥३०७॥ दोहा तुलसी कें मत चातकहि केवल प्रेम पिआस । पिअत स्वाति जल जान जग जाँचत बारह मास ॥३०८॥ भावार्थ—तुलसीदासके मतसे तो चातकको केवल प्रेमकी ही प्यास है [जलकी नहीं]; क्योंकि सारा जगत् इस बातको जानता है कि चातक पीता तो है केवल स्वाति-नक्षत्रका जल, परंतु याचक बना रहता है बारहों महीने ॥३०८॥ आलवाल मुकुताहलनि हिय सनेह तरु मूल । होइ हेतु चित चातकहि स्वाति सलिल अनुकूल ॥३०९॥ भावार्थ—चातकके हृदयरूपी मोतियोंकी (बहुमूल्य) क्यारीमें प्रेमरूपी वृक्षकी जड़ लगी है । ईश्वर करे स्वाति-नक्षत्रका जल
१०४ दोहावली चातकके चित्तमें रहनेवाले प्रेमके लिये अनुकूल हो जाय। (अर्थात् स्वाति-नक्षत्रके जलसे हृदयमें लगी हुई प्रेम वृक्षकी जड़ भलीभाँति सींची जाय, जिससे प्रेम-वृक्ष फूल-फलकर लहलहा उठे) ॥३०६॥ उष्ण काल अरु देह खिन मग पंथी तन ऊख । चातक बतियाँ ना रुचीं अन जल सींचें रूख ॥३१०॥ भावार्थ—गर्मियोंके दिन थे, चातक शरीरसे खिन्न था (थका हुआ था), रास्ते चल रहा था, उसका शरीर बहुत गरम हो रहा था [इतनेमें उसे कुछ पेड़ दीख पड़े, मनमें आया कि जरा विश्राम कर लूं] परंतु अनन्य प्रेमी चातकको मनकी यह बात अच्छी नहीं लगी; क्योंकि वे वृक्ष [स्वाति-नक्षत्रके जलसे सींचे हुए न होकर] दूसरे ही जलसे सींचे हुए थे ॥३१०॥ अन जल सींचे रूख की-छाया तें बरु घाम । तुलसी चातक बहुत हैं यह प्रबीन को काम ॥३११॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि यों चातक (चातक- प्रेमका दम भरनेवाले) बहुत हैं, परंतु ‘स्वातीके जलके अतिरिक्त अन्य जलसे सींचे हुए वृक्षकी छायासे तो धूप ही अच्छी' ऐसा मानना तो किसी [प्रेम-प्रणको निबाहनेमें] चतुर चातक (सच्चे प्रेमी) का ही काम है ॥३११॥ एक अंग जो सनेहता निसि दिन चातक नेह । तुलसी जासों हित लगै वहि अहार वहि देह ॥३१२॥ भावार्थ—चातकका जो रात-दिनका (नित्य-चौबीसों घंटेका) प्रेम है, वही एकाङ्गी प्रेम है।* तुलसीदासजी कहते हैं, ऐसा एकाङ्गी *एकाङ्गी प्रेम उसे कहते हैं, जिसमें प्रेमी यह नहीं देखता कि प्रेमास्पद उसके बदलेमें प्रेम करता है या नहीं।
दोहावली १०५
प्रेम जिसके साथ लग जाता है, वही उसका आहार है, (वह खाना- पीना सब भूलकर उसीकी स्मृतिसे जीता रहता है) और वही उसका शरीर है (वह अपने शरीरकी सुधि भुलाकर उसीके शरीरमें तन्मय हुआ रहता है) ॥ ३१२ ॥ एकांगी अनुरागके अन्य उदाहरण बिबि रसना तनु स्याम है बंक चलनि बिख खानि । तुलसी जस श्रवननि सुन्यो सीस समर्प्यो आनि ॥३१३॥ भावार्थ—जिसके दो जीभें हैं, काला शरीर और टेढ़ी चाल है तथा जो विषकी खान है, ऐसा सर्प भी कानोंसे अपनी प्रशंसा सुनते ही [प्रेमवश] आकर अपना सिर सौंप देता है* ॥ ३१३ ॥ मृगका उदाहरण आपु ब्याध को रूप धरि चहै कुरंगहि राग । तुलसी जो मृग मन मुरै परै प्रेम पट दाग ॥३१४॥ भावार्थ—राग (वीणाका मधुर स्वर) स्वयं बहेलियाका रूप धरकर हरिनको मार डाले [परंतु रागके प्रति उसका अनुराग तो वैसा ही रहता है]। तुलसीदासजी कहते हैं कि यदि राग
१०६ | दोहावली
भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि [मणिके लोभसे सर्प- को मारनेके लिये आये हुए] व्याधको मणि अपने प्रकाशसे भले ही सर्प दिखला दे, [और इस प्रकार उसकी मृत्युमें सहायक बनकर शत्रु का काम करे] परंतु [इससे क्या मणिके प्रति सर्प- का अनुराग कम हो जाता है ? क्या मणिके वियोग में सर्प अन्धा नहीं हो जाता.?* (अर्थात् वह अन्धा हो जाता है) और मणिसे उसका प्रेम नहीं हटता ॥ ३१५ ॥
कमलका उदाहरण
जरत तुहिन लखि बनज बन रबि दै पीठि पराउ । उदय बिकस अथवत सकुच मिटै न सहज सुभाउ ॥३१६॥ भावार्थ—कमलोंके वनको पालेसे जलते हुए देखकर भी सूर्य उनकी ओर पीठ देकर (उनकी अवहेलना करके) चाहे भाग जाय, परंतु सूर्यके उदय होनेपर खिल जाना और अस्त होनेपर सिकुड़ जाना—कमलोंका यह सहज स्वभाव (स्वाभाविक प्रेम) नहीं मिट सकता ॥ ३१६ ॥
मछलीका उदाहरण
देउ आपने हाथ जल मीनहि माहुरु घोरि । तुलसी जिऐ जो बारि बिनु तौ तु देहि कबि खोरि ॥३१७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि जल चाहे स्वयं अपने
*कहा जाता है कि रातको मणिधर सर्प अपनी मणि निकालकर जमीनपर रख देता है और उसके प्रकाशसे ओस चाटा करता है और आहारकी खोज किया करता है। व्याध आकर उस मणिपर गोबर डाल देता है, जिससे मणिका प्रकाश ढक जाता है और सर्प मणिको न पाकर अंधा हो जाता है और सिर पटक-पटककर मर जाता है।