गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२७- ब्रह्ममूर्तिके ध्यानका निरूपण
| ६० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
देवों और असुरोंसे नमस्कृत देवाधिदेव परमेश्वर भगवान् हयग्रीवका पुनः ध्यान करना चाहिये और शङ्ख-चक्रादि मङ्गलमयी मुद्राएँ प्रदर्शित करनी चाहिये। उसके बाद पाद्य, अर्घ्य, आचमन तथा स्नान प्रदान करे। हे वृषध्वज ! उन्हें वस्त्र प्रदान करनेके बाद आचमन प्रदानकर उनको सुन्दर यज्ञोपवीत समर्पित करना चाहिये और उन्हें पाद्य, अर्घ्य आदि प्रदान करना चाहिये। अनन्तर मूल मन्त्रसे भैरवदेवको पाद्यादि प्रदान करते हुए उनका विधिवत् पूजन करना चाहिये।
हे शिव ! इसके बाद शुभदायिनी तथा ऐश्वर्य प्रदान करनेवाली परमादेवी लक्ष्मीकी पूजा करे। पूर्व दिशामें ‘ॐ शङ्खाय नमः’ कहकर शङ्खका, दक्षिण दिशामें ‘ॐ पद्माय नमः’ कहकर पद्मका, पश्चिम दिशामें ‘ॐ चक्राय नमः’ से चक्रका तथा उत्तर दिशामें ‘ॐ गदायै नमः’ से गदाका यथाक्रम पूजन करे।
इसी प्रकार पुनः पूर्व दिशामें ‘ॐ खड्गाय नमः’ से खड्ग, दक्षिण दिशामें ‘ॐ मुसलाय नमः’ से मुसल, पश्चिम दिशामें ‘ॐ पाशाय नमः’ से पाश, उत्तर दिशामें ‘ॐ अंकुशाय नमः’ से अंकुश तथा मध्यमें ‘ॐ सशराय धनुषे नमः’ कहकर शरयुक्त धनुषकी पूजा करनी चाहिये।
हे रुद्र ! पुनः पूर्व आदि चार दिशाओंमें श्रीवत्स, कौस्तुभ, वनमाला और मङ्गलमय पीताम्बरकी पूजा करके पुनः शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् हयग्रीवकी पूजा करे।
तदनन्तर ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’ से ब्रह्मा, ‘ॐ नारदाय नमः’ से नारद, ‘ॐ सिद्धाय नमः’ से सिद्ध, ‘ॐ गुरुभ्यो नमः’ से गुरु, ‘ॐ परगुरुभ्यो नमः’ से परगुरु और ‘ॐ गुरुपादुकाभ्यां नमः’ से गुरुपादुकाकी पूजा करे।
तत्पश्चात् ‘ॐ सवाहनाय सपरिवाराय इन्द्राय नमः’, ‘ॐ सवाहनाय सपरिवाराय अग्नये नमः’, ‘ॐ यमाय नमः’, ‘ॐ निर्ऋतये नमः’, ‘ॐ वरुणाय नमः’, ‘ॐ वायवे नमः’, ‘ॐ सोमाय नमः’, ‘ॐ ईशानाय नमः’, ‘ॐ अनन्ताय नमः’, ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’—इन मन्त्रोंसे पूर्व आदि दिशाओंसे ऊर्ध्वदिशापर्यन्त इन्द्र, अग्नि आदि सभी दिग्-देवताओंकी पूजा करनी चाहिये।
इसके बाद ‘ॐ वज्राय नमः’, ‘ॐ शक्तये नमः’, ‘ॐ दण्डाय नमः’, ‘ॐ खड्गाय नमः’, ‘ॐ पाशाय नमः’, ‘ॐ ध्वजाय नमः’, ‘ॐ गदायै नमः’, ‘ॐ त्रिशूलाय नमः’, ‘ॐ चक्राय नमः’, ‘ॐ पद्माय नमः’—इन मन्त्रोंसे वज्र, शक्ति आदि आयुधोंकी पूजा करे।
तत्पश्चात् ईशानकोणमें ‘ॐ विष्वक्सेनाय नमः’ इस मन्त्रसे विष्वक्सेनकी पूजा करे। इसी प्रकार अनन्तकी भी पूजा करे। हे वृषभध्वज ! भगवान् हयग्रीवके मूल मन्त्रसे गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्यके द्वारा उनकी पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् उन (देव हयग्रीव)-की प्रदक्षिणा करके नमस्कार करे और यथाशक्ति मूल मन्त्रका जपकर उन्हें समर्पित कर दे। तदनन्तर देवेश्वर भगवान् हयग्रीवकी इस प्रकार स्तुति करनी चाहिये—
ॐ नमो हयशिरसे विद्याध्यक्षाय वै नमः ॥
नमो विद्यास्वरूपाय विद्यादात्रे नमो नमः।
नमः शान्ताय देवाय त्रिगुणायात्मने नमः ॥
सुरासुरनिहन्त्रे च सर्वदुष्टविनाशिने।
सर्वलोकाधिपतये ब्रह्मरूपाय वै नमः ॥
नमश्चेश्वरवन्द्याय शङ्खचक्रधराय च।
नम आद्याय दान्ताय सर्वसत्त्वहिताय च ॥
त्रिगुणायागुणायैव ब्रह्मविष्णुस्वरूपिणे।
कर्त्रे हर्त्रे सुरेशाय सर्वगाय नमो नमः ॥
(३४। ५०–५४)
‘सर्वविद्याधिपति अश्वशिर भगवान्को नमस्कार
काण्ड ] गायत्रीन्यास तथा संध्या-विधि ६१
है। विद्यास्वरूप, विद्याप्रदायक उन देवके लिये बार-बार नमन है। शान्तस्वरूप, त्रिगुणात्मक, सुर तथा असुरोंका निग्रह करनेवाले, सभी दुष्टोंका विनाश करनेवाले, सर्वलोकाधिपति ब्रह्मस्वरूप उन देव हयग्रीवके लिये नमस्कार है। महेश्वरके लिये भी वन्दनीय, शङ्ख-चक्रधारी, जगत्के आदि कारण, परम उदार तथा सभी प्राणियोंका हित करनेवाले देवके लिये नमस्कार है। त्रिगुणात्मक, त्रिगुणातीत, ब्रह्मा-विष्णुस्वरूप, जगत्की सृष्टिके कर्त्ता, संहर्त्ता, देवेश्वर तथा सर्वव्यापक उन भगवान् हयग्रीवको बारम्बार नमस्कार है।
इस प्रकार स्तुति करके अपने हृदयकमलके मध्य शङ्ख, चक्र और गदाको धारण करनेवाले, करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान्, सर्वाङ्गसुन्दर, अविनाशी महेश्वरके भी ईश, देवाधिदेव, परमात्मा हयग्रीवका ध्यान करना चाहिये।
हे शङ्कर ! इस प्रकार मैंने भगवान् हयग्रीवकी पूजा-विधिका वर्णन किया। परम भक्तिपूर्वक जो इसका पाठ करता है, वह परमपदको प्राप्त होता है। (अध्याय ३४)
गायत्रीन्यास तथा संध्या-विधि
श्रीहरिने कहा—हे शङ्कर ! अब मैं गायत्रीदेवीके [पूजनमें] न्यासादिका वर्णन करूँगा, आप इसका श्रवण करें। इस (गायत्री-मन्त्र)-के ऋषि विश्वामित्र, देवता सविता, मस्तक ब्रह्मा और शिखा रुद्र हैं। ये विष्णुके हृदयमें रहनेवाली हैं। ये विनियोग-कालमें एकनेत्रा हैं। इनका प्रादुर्भाव कात्यायन-गोत्रमें हुआ है, तीनों लोक इनके चरण हैं तथा ये पृथिवीकी कोखमें स्थित रहती हैं। गायत्रीदेवीके स्वरूपको इस प्रकार जानकर [गायत्री-मन्त्रका] बारह लाख जप करना चाहिये।
इस मन्त्रके त्रिपद तथा चतुष्पाद अर्थात् तीन चरण तथा चार चरण होते हैं। त्रिपादके प्रत्येक चरणमें आठ अक्षर तथा चतुष्पादके प्रत्येक चरणमें छः अक्षर होते हैं। जपमें त्रिपदा और पूजनमें चतुष्पदा गायत्रीके मन्त्रका प्रयोग करनेके लिये कहा गया है<sup>१</sup>।
जप, ध्यान, यज्ञादि कृत्य एवं पूजनके कार्योंमें नित्य इस सर्वपापविनाशिनी गायत्रीदेवीका विधिवत् अपने अङ्गोंमें न्यास करना चाहिये।
पैरके अंगुष्ठ-भागमें, गुल्फ<sup>२</sup>के मध्यमें, दोनों जंघाओं, दोनों जानुओं<sup>३</sup>, ऊरु<sup>४</sup>-भाग, गुह्यस्थान, अण्डकोष, नाडी, नाभि, शरीरके उदरभाग, दोनों स्तन, हृदय, कण्ठ, ओष्ठ, मुख, तालु, दोनों स्कन्धप्रदेश, दोनों नेत्र और भौंहों तथा मस्तकमें इस (गायत्री)-मन्त्रका न्यास करके क्रमशः—पूर्व, दक्षिण, उत्तर तथा पश्चिम दिशामें इनका न्यास करना चाहिये।
हे रुद्र ! इन गायत्रीदेवीके मन्त्रके वर्णों (रंगों)-को कह रहा हूँ। क्रमशः इसके (चौबीस) अक्षर इन्द्रनीलमणि, अग्निसदृश, पीत, श्याम, कपिलवर्ण, श्वेत, विद्युतप्रभ, मौक्तिकवर्ण, कृष्ण, रक्त, श्याम, शुक्ल, पीत, श्वेत, पद्मरागतुल्य, शङ्खवर्ण, पाण्डुर, रक्त, आसवके समान रक्तकृष्णमिश्रित, सूर्यसदृश, सौम्य, श्वेत, शङ्खकी आभाके समान तथा श्वेत हैं।
गायत्रीदेवीके मन्त्रका जप करके मनुष्य जिन-जिन वस्तुओंका हाथसे स्पर्श करता है और नेत्रोंसे
<sup>१</sup> जिस गायत्री-मन्त्रका जप किया जाता है, वह त्रिपदा गायत्री कहलाती है। 'परोरजसेऽसावदोम्०' यह गायत्रीका चतुर्थ पाद है। इस चतुष्पदा गायत्रीका प्रयोग सूर्योपस्थान, पूजन आदिमें होता है।
<sup>२</sup> गुल्फ (पैरकी घुट्टी) पाँवोंकी गाँठें।
<sup>३</sup> जानु (घुटना)।
<sup>४</sup> ऊरु—घुटनेके ऊपरका भाग।
| ६२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
जिनका-जिनका अवलोकन करता है, वे सभी पवित्र हो जाते हैं। गायत्रीसे श्रेष्ठ कोई दूसरा मन्त्र नहीं है, ऐसा समझना चाहिये—
यद्यत्स्पृशति हस्तेन यच्च पश्यति चक्षुषा।
पूतं भवति तत् सर्वं गायत्र्या न परं विदुः॥
(३५। १९)
श्रीहरिने पुनः कहा— हे रुद्र! अब पापविनाशिनी संध्याकी विधिका वर्णन कर रहा हूँ। उसे आप सुनें। तीन बार प्राणायाम<sup>१</sup> करके संध्या<sup>२</sup>-स्नानका उपक्रम करे। प्राणवायुको संयतकर प्रणवमन्त्र (ॐकार) तथा सप्त व्याहृतिसे युक्त गायत्री-मन्त्रका (आपो ज्योतीरसोऽमृतं भूर्भुवः स्वरोम्) इस गायत्री सिरके साथ तीन बार उच्चारण करनेको प्राणायाम कहते हैं। द्विज प्राणायामोंके द्वारा मानसिक, वाचिक तथा कायिक दोषोंको भस्म कर लेता है। इसीलिये यथाविधि यथानियत सभी कालोंमें प्राणायामपरायण होना चाहिये।
प्रातः 'सूर्यश्च<sup>३</sup>०' इस मन्त्रके द्वारा, मध्याह्नमें 'आपः पु॑नन्तु<sup>४</sup>०' इस मन्त्रसे तथा सायंकाल 'अग्निश्च मा मन्युश्च<sup>५</sup>०' इस मन्त्रके द्वारा यथाविधि आचमन करके प्रणव-मन्त्रसे युक्त 'आपो॑ हि०<sup>६</sup>' इस ऋचासे कुशोदकके द्वारा मार्जन करते हुए प्रत्येक पदपर जल सिरपर छिड़के।
रजोगुणसे उत्पन्न होनेवाले पाप, तमोगुण और अज्ञानजन्य पाप, जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्तिकी स्थितिमें होनेवाले पाप तथा कायिक, वाचिक एवं मानसिक—ये नवों पाप इन नौ मन्त्रोंसे (मार्जनद्वारा) भस्म हो जाते हैं—
रजस्तमःस्वमोहोत्थान् जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिजान्।
वाङ्मनःकर्मजान् दोषान् नवैतान् नवभिर्दहेत्॥
(३६। ६)
दाहिने हाथमें जल लेकर उसे 'द्रुप॑दा०<sup>७</sup>' मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रितकर सिरपर छोड़ दे। अघमर्षण<sup>८</sup> मन्त्रकी तीन, छः, आठ अथवा बारह आवृत्ति करके अघमर्षण करे।
तत्पश्चात् 'उदु त्यं०<sup>९</sup>' तथा 'चि॒त्रं<sup>१०</sup>— इन मन्त्रोंसे सूर्योपस्थान करना चाहिये। इससे दिन तथा रात्रिमें किये गये समस्त पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।
१-यहाँ संध्याका प्रकरण प्राणायामसे प्रारम्भ किया गया है, परंतु प्राणायामसे पूर्व संध्योपासनमें मालाधारण, पवित्रीकरण, शिखाबन्धन, भस्मधारण आदि करनेका विधान है। तत्पश्चात् आचमन, मार्जन, भूमिशोधनके अनन्तर संकल्प करके 'ऋतञ्च०' इस मन्त्रसे आचमन करना चाहिये। तदनन्तर गायत्री-मन्त्रसे दिग्बन्धन करनेके पश्चात् विनियोगपूर्वक प्राणायाम करनेकी विधि है। पूरी संध्योपासनविधि जाननेके लिये गीताप्रेससे प्रकाशित 'नित्यकर्म-पूजाप्रकाश' ग्रन्थ देखना चाहिये।
२-संध्यासे संध्याकाल लेना है। यह काल प्रातः, सायं एवं मध्याह्नमें आता है।
३-सूर्यश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यद्रात्र्या पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना रात्रिस्तदवलुम्पतु। यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सूर्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा। (तै०आ० प्र० १०, अ० २५)
४-ॐ आपः पुनन्तु पृथिवीं पृथ्वी पूता पुनातु माम्। पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मपूता पुनातु माम्। यदुच्छिष्टमभोज्यं च यद्वा दुश्चरितं मम। सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रहग्ं स्वाहा। (तै०आ० प्र० १०, अ० २३)
५-ॐ अग्निश्च मा मन्युश्च मन्युपतयश्च मन्युकृतेभ्यः पापेभ्यो रक्षन्ताम्। यदह्ना पापमकार्षं मनसा वाचा हस्ताभ्यां पद्भ्यामुदरेण शिश्ना अहस्तदवलुम्पतु। यत्किञ्च दुरितं मयि इदमहमापोऽमृतयोनौ सत्ये ज्योतिषि जुहोमि स्वाहा। (तै०आ० प्र० १०, अ० २४)
६-आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। महे रणाय चक्षसे॥ यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः॥ तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः॥ (यजु० ११।५०-५२)
७-ॐ द्रुपदादिव मुमुचानः स्विन्नः स्नातो मलादिव। पूतं पवित्रेणेवाज्यमापः शुन्धन्तु मैनसः॥ (यजु० २०।२०)
८-ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत। ततः समुद्रो अर्णवः। समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः॥ (ऋग्वेद १०।१९०।१)
९-ॐ उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः। दृशे विश्वाय सूर्य स्वाहा॥ (यजु० ७।४१)
१०-ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा॥ (यजु० ७।४२)
२९- वास्तुमण्डल-पूजा-विधि
काण्ड ] देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्य-ध्यान तथा माहेश्वरीपूजन-विधि ६३
प्रातःकालकी संध्या खड़ा होकर तथा मध्याह्न एवं सायंकालकी संध्या बैठकर करनी चाहिये। प्रणव (ॐकार) और महाव्याहृतियों अर्थात् 'भूः, भुवः, स्वः' से संयुक्त करके गायत्री-मन्त्रका दस बार जप करनेसे इस जन्मके पाप, सौ बार जप करनेपर पूर्वजन्मके पाप तथा हजार बार गायत्रीका जप करनेसे तीन युगोंके पाप नष्ट हो जाते हैं—
दशभिर्जन्मजनितं शतेन तु पुरा कृतम्।
त्रियुगं तु सहस्रेण गायत्री हन्ति दुष्कृतम्॥
(३६। १०)
प्रातःकालमें गायत्री रक्तवर्णा, मध्याह्नकालमें सावित्री शुक्लवर्णा और सायंकालमें सरस्वती कृष्णवर्णा कही गयी हैं।<sup>१</sup> गायत्री-मन्त्रकी प्रथम व्याहृति 'भूः' का 'ॐ भूः हृदयाय नमः' से हृदयमें, द्वितीय व्याहृति 'भुवः' का 'ॐ भुवः शिरसे स्वाहा' से सिरमें तथा तृतीय व्याहृति 'स्वः' का 'ॐ स्वः शिखायै वषट्' से शिखामें न्यास करे। गायत्री-मन्त्रके प्रथम पाद (तत्सवितुर्वरेण्यं)-का कवचमें, द्वितीय पाद (भर्गो देवस्य धीमहि)-का नेत्रोंमें तथा तृतीय पाद (धियो यो नः प्रचोदयात्)-का अस्त्रमें और चतुर्थ पाद (परोरजसेऽसावदोम्)-का सर्वाङ्गमें न्यास करे। संध्याओंके समय इस कथित विधिसे न्यास करके वेदमाता गायत्रीका जप करनेवालेका सब प्रकारसे कल्याण होता है। प्राणायामके अनन्तर सभी अङ्गोंमें न्यास करे।
त्रिपदा गायत्री ब्रह्मा-विष्णु और शिवस्वरूपा है। इसके ऋषि, छन्द और विनियोगको भलीभाँति जानकर जप करना चाहिये। ऐसा करनेसे साधक सभी पापोंसे विमुक्त होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है।
'परोरजसेऽसावदोम्' यह गायत्रीका तुरीय पाद कहा जाता है। जो व्यक्ति संध्योपासन नहीं करता है, उसको सूर्यदेव विनष्ट कर देते हैं। तुरीय पादके ऋषि निर्मल तथा छन्द गायत्री एवं देवता परमात्मा हैं।
जो मनुष्य योग और मोक्षको प्रदान करनेवाली परमश्रेष्ठा देवी गायत्रीका जप करता है, उसके महान्-से-महान् पाप नष्ट हो जाते हैं।
प्रातः, मध्याह्न एवं सायं—इन तीनों संध्याओंमें १००८ या १०८ बार गायत्री-मन्त्रका जप करनेवाला व्यक्ति ब्रह्मलोक जानेका अधिकारी हो जाता है।
(अध्याय ३५—३७)
देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्य-ध्यान तथा माहेश्वरीपूजन-विधि
श्रीहरिने कहा— हे रुद्र! नवमी आदि तिथियोंमें 'ॐ ह्रीं दुर्गे रक्षिणि'—इस मन्त्रसे देवी दुर्गाका पूजन करना चाहिये। मार्गशीर्ष (अगहन)-मासकी तृतीया तिथिसे आरम्भ करके नामक्रमके अनुसार गौरी, काली, उमा, दुर्गा, भद्रा, कान्ति, सरस्वती, मङ्गला, विजया, लक्ष्मी, शिवा और नारायणीरूपमें उन देवीका पूजन करनेवाले अधिकृत मनुष्यका इष्ट (प्रियजनों या प्रिय वस्तुओं)-से वियोग नहीं होता।
दुर्गादेवीके अट्ठारह हाथ हैं। उन हाथोंमें खेटक<sup>२</sup>, घण्टा, दर्पण, तर्जनी-मुद्रा, धनुष, ध्वज, डमरू, परशु, पाश, शक्ति, मुद्गर, शूल, कपाल, शरक (बाण), अंकुश, वज्र, चक्र और शलाका—ये
<sup>१</sup> गायत्री, सावित्री एवं सरस्वती—ये गायत्रीके ही तीन स्वरूप हैं।
<sup>२</sup> खेटक—'खेटति भयमुत्पादयति अनेन इति खेटकः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार भय उत्पन्न करनेवाली यष्टि (दण्ड विशेष)-को खेटक या खेट कहते हैं। यह देवीके हाथमें रहता है—
यष्टिरूपेण खेट त्वमरिसंहारकारक। देवीहस्तस्थितो नित्यं मम रक्षां कुरुष्व च॥ (शारदीय दुर्गापूजापद्धति, अस्त्र-पूजा-प्रकरण)
६४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
सभी सुशोभित रहते हैं। इनसे सुसज्जित उन अष्टादशभुजा देवीका स्मरण करना चाहिये।
अट्ठाईस भुजावाली या अट्ठारह भुजावाली अथवा बारह भुजावाली या आठ भुजा अथवा चार भुजावाली दुर्गादेवीका भी ध्यान करना चाहिये। महिषासुरका वध करनेवाली वे देवी सिंहपर विराजमान रहती हैं।
वासुदेवने कहा—हे रुद्र ! सूर्यार्चनमें भगवान् सूर्यका इस प्रकार ध्यान करना चाहिये—
वे भगवान् सूर्य तेजःस्वरूप, रक्त वर्णवाले, श्वेत पद्मपर विराजमान, एक चक्रवाले रथपर समासीन, दो भुजाओंसे युक्त तथा कमल धारण करनेवाले हैं। इस रूपमें उनका सदैव ध्यान करना चाहिये।
श्रीहरिने पुनः कहा—हे वृषध्वज ! [अब] मैं माहेश्वरी-पूजाका वर्णन कर रहा हूँ, उसे सुनो—पहले स्नान तथा आचमन कर ले। इसके बाद आसनपर बैठकर न्यास करके मण्डलमें महेश्वरकी पूजा करे। हे महेशान ! हरकी पूजा परिवारके साथ करे। हे रुद्र ! 'ॐ हां शिवासनदेवता आगच्छत'—इस मन्त्रसे आसनके देवताओंका आवाहन करे। मण्डलके मुख्य द्वारपर स्नान, गन्ध आदिद्वारा 'ॐ हां गणपतये नमः' मन्त्रसे गणपतिकी, 'ॐ हां सरस्वत्यै नमः' मन्त्रसे सरस्वतीकी, 'ॐ हां नन्दिने नमः' मन्त्रसे नन्दीकी, 'ॐ हां महाकालाय नमः' मन्त्रसे महाकालकी, 'ॐ हां गङ्गायै नमः' मन्त्रसे गङ्गाकी, 'ॐ हां लक्ष्म्यै नमः' मन्त्रसे लक्ष्मीकी, 'ॐ हां महाकलायै नमः' मन्त्रसे महाकलाकी तथा 'ॐ हां अस्त्राय नमः' मन्त्रसे अस्त्रकी पूजा करे।
इसी प्रकार 'ॐ हां ब्रह्मणे वास्त्वधिपतये नमः' से वास्त्वधिपतिकी, 'ॐ हां गुरुभ्यो नमः' से गुरुकी, 'ॐ हां आधारशक्त्यै नमः' से आधारशक्तिकी, 'ॐ हां अनन्ताय नमः' से अनन्तकी, 'ॐ हां धर्माय नमः' से धर्मकी, 'ॐ हां ज्ञानाय नमः' से ज्ञानकी, 'ॐ हां वैराग्याय नमः' से वैराग्यकी, 'ॐ हां ऐश्वर्याय नमः' से ऐश्वर्यकी, 'ॐ हां अधर्माय नमः' से अधर्मकी, 'ॐ हां अज्ञानाय नमः' से अज्ञानकी, 'ॐ हां अवैराग्याय नमः' से अवैराग्यकी, 'ॐ हां अनैश्वर्याय नमः' से अनैश्वर्यकी, 'ॐ हां ऊर्ध्वच्छन्दाय नमः' से ऊर्ध्वच्छन्दकी, 'ॐ हां अधश्छन्दाय नमः' से अधश्छन्दकी, 'ॐ हां पद्माय नमः' से पद्मकी, 'ॐ हां कर्णिकायै नमः' से कर्णिकाकी, 'ॐ हां वामायै नमः' से वामाकी, 'ॐ हां ज्येष्ठायै नमः' से ज्येष्ठाकी, 'ॐ हां रौद्र्यै नमः' से रौद्रीकी, 'ॐ हां काल्यै नमः' से कालीकी, 'ॐ हां कलविकरण्यै नमः' से कलविकरणीकी, 'ॐ हां बलप्रमथिन्यै नमः' से बलप्रमथिनीकी, 'ॐ हां सर्वभूतदमन्यै नमः' से सर्वभूतदमनीकी, 'ॐ हां मनोन्मन्यै नमः' से मनोन्मनीकी, 'ॐ हां मण्डलत्रितयाय नमः' से मण्डलत्रितयकी, 'ॐ हां हौं हं शिवमूर्तये नमः' से शिवमूर्तिकी, 'ॐ हां विद्याधिपतये नमः' से विद्याधिपतिकी और 'ॐ हां हीं हौं शिवाय नमः' से शिवकी पूजा करे।
अनन्तर 'ॐ हां हृदयाय नमः' से हृदयकी, 'ॐ हीं शिरसे नमः' से सिरकी, 'ॐ हूं शिखायै नमः' से शिखाकी, 'ॐ हैं कवचाय नमः' से कवचकी, 'ॐ हौं नेत्रत्रयाय नमः' से नेत्रत्रयकी, 'ॐ हः अस्त्राय नमः' से अस्त्रकी और 'ॐ हां सद्योजाताय नमः' से सद्योजातकी पूजा करे।
सद्योजातकी आठ कलाएँ जाननी चाहिए, जो पूर्व आदि दिशाओंमें स्थित हैं। उनकी पूजा [गन्ध आदिसे] इस प्रकार करनी चाहिये—'ॐ हां सिद्धयै नमः' से सिद्धिकी, 'ॐ हां ऋद्धयै नमः'
काण्ड ] देवी दुर्गाका स्वरूप, सूर्य-ध्यान तथा माहेश्वरीपूजन-विधि [ ६५
से ऋद्धिकी, ‘ॐ हां विद्युतायै नमः’ से विद्युताकी, ‘ॐ हां लक्ष्म्यै नमः’ से लक्ष्मीकी, ‘ॐ हां बोधायै नमः’ से बोधाकी, ‘ॐ हां काल्यै नमः’ से कालीकी, ‘ॐ हां स्वधायै नमः’ से स्वधाकी और ‘ॐ हां प्रभायै नमः’ से प्रभाकी अर्चना करनी चाहिये।
हे वृषभध्वज ! वामदेवकी तेरह कलाएँ जाननी चाहिये, उनकी भी पूजा गन्ध-पुष्प आदिसे करनी चाहिये। उनकी पूजामें पहले ‘ॐ हां वामदेवाय नमः’ कहकर वामदेवकी पूजा करनेके बाद उनकी कलाओंका पूजन करना चाहिये। जैसे—‘ॐ हां रजसे नमः’ से रजस्की, ‘ॐ हां रक्षायै नमः’ से रक्षाकी, ‘ॐ हां रत्यै नमः’ से रतिकी, ‘ॐ हां कन्यायै नमः’ से कन्याकी, ‘ॐ हां कामायै नमः’ से कामाकी, ‘ॐ हां जनन्यै नमः’ से जननीकी, ‘ॐ हां क्रियायै नमः’ से क्रियाकी, ‘ॐ हां वृद्धयै नमः’ से वृद्धिकी, ‘ॐ हां कार्यायै नमः’ से कार्याकी, ‘ॐ हां रा (धा)-त्र्यै नमः’ से रा (धा)-त्रि (त्री)-की, ‘ॐ हां भ्रामण्यै नमः’ से भ्रामणीकी, ‘ॐ हां मोहिन्यै नमः’ से मोहिनीकी और ‘ॐ हां क्ष (त्व) रायै नमः’ से क्ष (त्व)-राकी अर्चना करनी चाहिये।
हे वृषभध्वज ! तत्पुरुषकी चार कलाएँ हैं। पहले ‘ॐ हां तत्पुरुषाय नमः’ इस मन्त्रद्वारा तत्पुरुषकी पूजा करे। तदनन्तर ‘ॐ हां निवृत्यै नमः’ से निवृत्तिकी, ‘ॐ हां प्रतिष्ठायै नमः’ से प्रतिष्ठाकी, ‘ॐ हां विद्यायै नमः’ से विद्याकी और ‘ॐ हां शान्त्यै नमः’ से शान्तिकी पूजा करनी चाहिये।
अघोरकी भैरव-सम्बन्धी छः कलाएँ जाननी चाहिये। इनकी पूजामें पहले ‘ॐ हां अघोराय नमः’ मन्त्रद्वारा अघोरकी पूजा करनेके पश्चात् ‘ॐ हां उमायै नमः’ से उमाकी, ‘ॐ हां क्षमायै नमः’ से क्षमाकी, ‘ॐ हां निद्रायै नमः’ से निद्राकी, ‘ॐ हां व्याध्यै नमः’ से व्याधिकी, ‘ॐ हां क्षुधायै नमः’ से क्षुधाकी तथा ‘ॐ हां तृष्णायै नमः’— से तृष्णाकी पूजा करनी चाहिये।
हे वृषभध्वज ! ईशानदेवकी पाँच कलाएँ हैं, इनकी पूजामें ‘ॐ हां ईशानाय नमः’ इस मन्त्रसे ईशानकी पूजा करनेके पश्चात् ‘ॐ हां समित्यै नमः’ से समितिकी, ‘ॐ हां अङ्गदायै नमः’ से अङ्गदाकी, ‘ॐ हां कृष्णायै नमः’ से कृष्णाकी, ‘ॐ हां मरीच्यै नमः’ से मरीचिकी और ‘ॐ हां ज्वालायै नमः’ से ज्वालाकी पूजा करे।
तदनन्तर हे शङ्कर ! ‘ॐ हां शिवपरिवारेभ्यो नमः’ से शिवपरिवारका, ‘ॐ हां इन्द्राय सुराधिपतये नमः’ से सुराधिपति इन्द्रका, ‘ॐ हां अग्नये तेजोऽधिपतये नमः’ से तेजोऽधिपति अग्निका, ‘ॐ हां यमाय प्रेताधिपतये नमः’ से प्रेताधिपति यमका, ‘ॐ हां निर्ऋतये रक्षोऽधिपतये नमः’ से रक्षोऽधिपति निर्ऋतिका, ‘ॐ हां वरुणाय जलाधिपतये नमः’ से जलाधिपति वरुणका, ‘ॐ हां वायवे प्राणाधिपतये नमः’ से प्राणाधिपति वायुका, ‘ॐ हां सोमाय नेत्राधिपतये नमः’ से नेत्राधिपति सोमका, ‘ॐ हां ईशानाय सर्वविद्याधिपतये नमः’ से सर्वविद्याधिपति ईशानका, ‘ॐ हां अनन्ताय नागाधिपतये नमः’ से नागाधिपति अनन्तका, ‘ॐ हां ब्रह्मणे सर्वलोकाधिपतये नमः’ से सर्वलोकाधिपति ब्रह्माका और ‘ॐ हां धूलिचण्डेश्वराय नमः’ से धूलिचण्डेश्वरका आवाहन, स्थापन, संनिधान, संनिरोध तथा सकलीकरण करना चाहिये।
तदनन्तर तत्त्व-न्यास करके मुद्रा दिखानी चाहिये तथा ध्यान करना चाहिये। इसके बाद पाद्य, आचमन, अर्घ्य, पुष्प, अभ्यङ्ग, उद्वर्तन और स्नान तथा सुगन्धानुलेपन, वस्त्र, अलंकार, भोग, अङ्गन्यास, धूप, दीप, नैवेद्य-अर्पण, करोद्वर्तन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, गन्ध एवं ताम्बूल निवेदन करनेके बाद
३०- प्रासाद-लक्षण
| ६६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
गीत, वाद्य, नृत्यसे महेश्वरको संतुष्टकर छत्र आदि समर्पित करना चाहिये। मुद्राका प्रदर्शन करके आवाहित देवके रूपका ध्यान, जप तथा तादात्म्यभावसे मूलमन्त्रद्वारा जप और पूजाको समर्पित करे।
इस प्रकार विविध कामनाओंकी सिद्धिके लिये विश्वावसु गन्धर्व तथा देवी कालरात्रि आदिकी उपासना करनी चाहिये। (अध्याय ३८—४१)
शिवके पवित्रारोपणकी विधि
**श्रीहरिने कहा—**हे महादेव ! अमङ्गलका नाश करनेवाले भगवान् शिवके पवित्रारोपणके पूजा-विधानको कह रहा हूँ। यह पूजा आषाढ़, श्रावण, माघ या भाद्रपद मासमें होती है। पवित्रारोपणकी इस पूजामें पवित्रक (जनेऊ) बनानेके लिये सत्ययुग आदिके भेदसे सूत्र-धारणका नियम है। जैसे—सत्ययुगमें सुवर्णके, त्रेतामें रजतके, द्वापरमें ताम्रके और कलियुगमें कन्याके हाथसे बनाये गये कपासके सूत्र (सूत)-को ग्रहण करना चाहिये। सूत्रको लेकर पहले उसे तिगुना करके पुनः उसका तिगुना करना चाहिये। इस प्रकार नवगुणित सूत्रसे पवित्रकका निर्माण करके वामदेवमन्त्रसे उसमें ग्रन्थि देनी चाहिये। तदनन्तर हे शिव ! सद्योजातमन्त्रसे उसका प्रक्षालन करके अघोरमन्त्रसे उसका शोधन करना चाहिये। तत्पुरुषमन्त्रसे उसमें बन्धन तथा ईशानमन्त्रसे तन्तुदेवताओंको सुगन्धित धूप दिखाना चाहिये।
तन्तुओंमें क्रमशः—ॐकार, चन्द्र, अग्नि, ब्रह्मा, नाग, शिखिध्वज, सूर्य, विष्णु और शिवका वास है—ये नौ तन्तुके देवता हैं। हे रुद्र ! उस पवित्रकमें एक सौ आठ या पचास अथवा पच्चीस तन्तु होने चाहिये। ये क्रमशः उत्तम, मध्यम तथा कनिष्ठ हैं। पवित्रकमें दस ग्रन्थिका मान है। अतएव प्रत्येक चार अंगुल या दो अंगुल अथवा एक अंगुलका अन्तर देकर एक-एक ग्रन्थिका बन्धन देना चाहिये। हे सदाशिव ! उन ग्रन्थियोंके नाम इस प्रकार हैं—प्रकृति, पौरुषी, वीरा, अपराजिता, जह्याया, विजया, रुद्रा, अजिता, मनोन्मनी तथा सर्वमुखी।
हे शिव ! ग्रन्थिबन्धनके पश्चात् उस पवित्रकको कुंकुम, चन्दन आदि सुगन्धित पदार्थोंसे रञ्जित करना चाहिये। उस गन्धानुरञ्जित पवित्रकको देवको समर्पित कर देना चाहिये। तदनन्तर यथाविधि सभी क्रियाओंको करके 'हे देवेश ! हे महेश्वर ! आप अपने गणोंके साथ यहाँपर आमन्त्रित हैं। प्रातःकाल यहींपर आपका पूजन करूँगा अतः आप यहाँपर उपस्थित रहें।'-इस प्रकार देवताको निमन्त्रित करे और गीत-वाद्यादिके द्वारा रात्रि-जागरण करे। प्रातः उन आमन्त्रित पवित्रकोंको भगवान् महेश्वरके पास स्थापित करके चतुर्दशी तिथिमें स्नान करे और सबसे पहले सूर्य तथा रुद्रकी पूजा करे, तदनन्तर ललाटस्थ विश्वरूपका ध्यानकर अपने आत्मस्वरूपकी पूजा करे।
तत्पश्चात् अस्त्रमन्त्रसे प्रोक्षित और हृदयमन्त्रके द्वारा अर्पित तथा संहितामन्त्रोंसे धूपित पवित्रकोंको भगवान्को समर्पित करना चाहिये। सबसे पहले शिवतत्त्व और विद्यातत्त्वकी पूजा करके आत्मतत्त्व और देवतत्त्वका पूजन इन निर्धारित मन्त्रोंसे करे—
'ॐ हौं हौं शिवतत्त्वाय नमः, ॐ हीं (हीः) विद्यातत्त्वाय नमः, ॐ हां (हौः) आत्मतत्त्वाय नमः, ॐ हां हीं हूं क्षौं सर्वतत्त्वाय नमः।'
भगवान् महेश्वरको पवित्रक विधिपूर्वक निवेदितकर स्वयं भी धारण करना चाहिये।
(अध्याय ४२)
काण्ड ] विष्णुके पवित्रारोपणकी विधि ६७
विष्णुके पवित्रारोपणकी विधि
श्रीहरिने कहा— हे वृषभध्वज ! अब मैं आपसे विष्णुके पवित्रारोपणका वर्णन करूँगा, जो भोग तथा मोक्ष दोनोंको देनेवाला है। प्राचीन समयमें हो रहे देवासुर-संग्राममें [अपनी विजय न होते देखकर] ब्रह्मादि देवगण विष्णुकी शरणमें गये। उन सबकी प्रार्थना सुन करके विष्णुने विजय-प्राप्तिके लिये उन्हें अपने गलेका हार, पवित्र नामक ग्रैवेयक तथा एक ध्वज प्रदान किया और कहा कि इन्हें देखते ही दानव नष्ट हो जायँगे। तभीसे उन पवित्रकोंकी पूजा आरम्भ हुई।
हे हर! प्रतिपदासे लेकर पौर्णमासीतक जिस देवताकी जो तिथि कही गयी है, उसके अनुसार ही उस तिथिमें उन देवताओंका पवित्रारोपण करना चाहिये। हे शिव! शुक्ल-पक्ष हो अथवा कृष्णपक्ष, द्वादशी तिथिमें विष्णुके लिये पवित्रारोपणका विधान है। व्यतीपातयोग, उत्तरायण, दक्षिणायन, चन्द्र तथा सूर्यग्रहण, विवाहादि मङ्गल एवं वृद्धि-कार्यों तथा गुरुजनके आगमन इत्यादि अवसरोंपर यह पूजा करनी चाहिये। पवित्रकके उद्देश्यसे भी नित्य पूजन हो सकता है; किंतु वर्षाकालमें इसका पूजन आवश्यक है।
हे रुद्र! इन पवित्रकोंका निर्माण वर्णानुसार होना चाहिये, जैसे—ब्राह्मणोंका पवित्रक कौशेय<sup>१</sup>, कपास, क्षौम<sup>२</sup> अथवा कुशसूत्रसे निर्मित होना चाहिये। क्षत्रियोंका पवित्रक कौशेयसूत्रसे, वैश्योंका क्षौमसूत्र तथा वल्कलसूत्रसे<sup>३</sup> और शूद्रोंका सनसे बना हुआ पवित्रक प्रशस्त माना गया है। कपास या पद्मज (कमल)-से निर्मित पवित्रक समस्त वर्णोंके लिये प्रशस्त है।
ॐकार, शिव, चन्द्रमा, अग्नि, ब्रह्मा, शेष, सूर्य, गणेश और विष्णु—इन नौ देवताओंका इस पवित्रकके तन्तुओंमें निवास है।
ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र—ये पवित्रकके तीन सूत्रोंके देवता हैं, जो उनमें अधिष्ठित रहते हैं। इन सूत्रोंको सुवर्ण, रजत, ताम्र, बाँस या मिट्टीके बने हुए पात्रमें रखना चाहिये। एक सौ आठ तन्तुओंका सूत्र उत्तम, चौवन तन्तुओंका सूत्र मध्यम तथा सत्ताईस तन्तुओंका पवित्रक कनिष्ठ होता है।
इन पवित्रकोंके प्रत्येक ग्रन्थि-पर्वोंको कुंकुम, हल्दी या चन्दनसे चर्चितकर उपवास रखते हुए उन्हें शास्त्रसम्मत पात्रमें रखकर अधिवासित करे।
पवित्रकको पृथक्-पृथक् अभिमन्त्रित करके उसका सम्यक् दर्शन तथा पुनः पूजन करना चाहिये और यत्नपूर्वक उसका वस्त्राच्छादन करके उसे मण्डलस्थ देवप्रतिमाके समक्ष यत्नपूर्वक स्थापित कर देना चाहिये।
ब्रह्मादि अन्य देवोंकी स्थापना करके कलशकी पूजा करे। मण्डलका निर्माण करके नैवेद्य समर्पित करे। पवित्रकको पुनः अधिवासित<sup>४</sup> करके तीन या नौ बार सूत्र घुमाकर वेदीको वेष्टित करे। तदनन्तर अपनेको तथा कलश, घी, अग्निकुण्ड, विमान, मण्डप और गृहको सूत्रसे वेष्टित करके एक सूत्र देवताके मस्तकपर अर्पित करे।
इस प्रकार सम्पूर्ण सामग्री निवेदितकर महेश्वर विष्णुकी पूजा करके इस मन्त्रका पाठ करना चाहिये—
१-कौशेय—विशेष कीड़ेके कोशसे बननेवाला वस्त्र (रेशमी वस्त्र)।
२-क्षौम—तीसी, केलेकी छाल या अन्य लताविशेषसे बने वस्त्र।
३-वल्कल—भोजपत्र नामके वृक्षविशेष अथवा अन्य मुलायम छालवाले वृक्षकी छालसे बना वस्त्र (वल्कल वस्त्र)।
४-अधिवासन—संस्कारविशेष।
३१- देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि
६८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-
आवाहितोऽसि देवेश पूजार्थं परमेश्वर॥
तत्प्रभातेऽर्चयिष्यामि सामग्र्याः संनिधौ भव।
(४३। २८-२९)
हे परमेश्वर! देवदेवेश्वर! आप यहाँपर पूजाके लिये आवाहित हैं। इस समस्त सामग्रीसे प्रभातकालमें मैं आपका पूजन करूँगा। आपकी संनिधि यहाँ बनी रहे।
एक रात्रि या तीन रात्रितक पवित्रकको अधिवासितकर स्वयं रात्रिमें जागरण करके प्रातःकाल भगवान् केशवका पूजन करे और निर्मित पवित्रकोंको उन देवको अर्पित करे। पवित्रकको धूपसे धूपित करके मन्त्रके द्वारा अभिमन्त्रित भी करना चाहिये।
गायत्री-मन्त्रसे पूजित इस पवित्रकके द्वारा देव-पूजन करके उसे मन्त्र पढ़कर देवताके समक्ष स्थापित कर दे—
विशुद्धग्रन्थिकं रम्यं महापातकनाशनम्।
सर्वपापक्षयं देव तवाग्रे धारयाम्यहम्॥
(४३। ३३)
हे देव! यह पवित्रक विशुद्ध रूपसे ग्रथित, सुन्दर तथा महापातकोंको नष्ट करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका क्षय करनेवाला है। इसे मैं आपके समक्ष स्थापित करता हूँ। तदनन्तर इस मन्त्रका पाठकर स्वयं भी धारण करना चाहिये—
पवित्रं वैष्णवं तेजः सर्वपातकनाशनम्॥
धर्मकामार्थसिद्धयर्थं स्वकण्ठे धारयाम्यहम्।
(४३। ३४-३५)
[हे देव!] यह विष्णु-तेजःस्वरूप, सर्वपाप-विनाशक पवित्रक है। मैं धर्म, काम तथा अर्थ—इस त्रिवर्गकी सिद्धिके लिये इसे अपने कण्ठमें धारण करता हूँ। अनन्तर इस प्रकार प्रार्थना करे—
वनमाला यथा देव कौस्तुभं सततं हृदि।
तद्वत् पवित्रं तन्तूनां मालां त्वं हृदये धर॥
(४३। ४१)
हे देव! आपके हृदयपर जिस प्रकार वनमाला और कौस्तुभ विराजते हैं, उसी प्रकार तन्तुओंकी बनी हुई यह माला और पवित्रक आप अपने हृदयपर धारण करें।
इस प्रकार प्रार्थना करके ब्राह्मणोंको भोजन कराकर और उन्हें दक्षिणा देकर उसी दिन सायंकाल या दूसरे दिन पुनः उसी प्रकार पूजा सम्पन्न करके निम्न मन्त्र पढ़ते हुए विसर्जन करे—
सांवत्सरीमिमां पूजां सम्पाद्य विधिवन्मया।
व्रज पवित्रकेदानीं विष्णुलोकं विसर्जितः॥
(४३। ४३)
हे पवित्रक! मैंने इस सांवत्सरी पूजाको विधिवत् सम्पादित किया है। इस समय मेरे द्वारा विसर्जित आप विष्णुलोकको पधारें। (अध्याय ४३)
ब्रह्ममूर्तिके ध्यानका निरूपण
**श्रीहरिने कहा—**हे रुद्र! भगवान्की पवित्रक आदिसे पूजाकर ब्रह्मका ध्यान करके साधक हरि बन जाता है (मेरा स्वरूप हो जाता है)। अब मैं मायाजालको नष्ट करनेवाले ब्रह्मके ध्यानका वर्णन करता हूँ। आप सुनें—
ब्रह्मके ध्यानके लिये प्रवृत्त प्राज्ञ (विशेष साधक) अपनी वाणी एवं मनको नियन्त्रितकर अपनी आत्मामें ही ज्ञानस्वरूप ब्रह्मका यजन करे और जिस प्राज्ञको यह उत्कट इच्छा हो कि मैं अपनी आत्मामें ब्रह्मका दर्शन (जीवब्रह्मका अभेददर्शन) करूँ, उसे महद्ब्रह्म (प्रत्यक्-चैतन्याभिन्न परब्रह्म)-में ज्ञानकी भावना (ब्रह्म एवं निर्विषय-नित्य-ज्ञानमें अभेदभाव) करनी चाहिये।
ब्रह्मका ध्यान ही समाधि है। 'मैं ब्रह्म हूँ' इस रूपमें सदा स्वयंकी अवस्थिति ही ब्रह्मका ध्यान है। स्वयंसे अभिन्न ब्रह्म देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि,
काण्ड ] ब्रह्ममूर्तिके ध्यानका निरूपण ६९
प्राण, अहङ्कार, पञ्चमहाभूत (पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश), पञ्चतन्मात्र (गन्धतन्मात्र, रसतन्मात्र, रूपतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र एवं शब्दतन्मात्र) विविध गुण, जन्म और भोजन, शयन आदि भोगसे सर्वथा रहित, स्वप्रकाश, निराकार, सदा निरतिशय, नित्य आनन्दस्वरूप, अनादि, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सर्वतः परिपूर्ण, सत्यस्वरूप, परमसुखस्वरूप, परमपद एवं तुरीय (कूटस्थ निरञ्जन परब्रह्म)-के रूपमें वेदोंमें वर्णित है।
हे वृषभध्वज! अपनी आत्माको रथी और शरीरको रथ समझना चाहिये। बुद्धि उसमें सारथि तथा मन लगाम है। इन्द्रियोंको उस रथमें जुते हुए अश्वके रूपमें स्वीकार किया गया है। ये इन्द्रियाँ ही रूप, रस, गन्ध आदि विषयका अनुभव करती हैं।
इन्द्रिय और मनसे युक्त आत्माको ही मनीषियोंने भोक्ता कहा है। जो मनुष्य विज्ञानरूपी सारथिसे युक्त है, मनरूपी लगामको अपने वशमें रखता है, वही उस परमपदको प्राप्त करता है, फिर वह उत्पन्न नहीं होता। जो विज्ञानरूपी सारथिसे नियन्त्रित मनरूपी लगामवाला मनुष्य है, वह स्वर्धुनी<sup>१</sup> (अज्ञान)-से पार हो जाता है और वही विष्णुका परमपद है<sup>२</sup>।
इस योगकी परम साधनामें अहिंसादि धर्मोंको यम तथा शौचादिक कर्मोंको नियम कहा गया है। पद्मादि आसन हैं। प्राण, अपानादिक वायुपर विजय प्राप्त करना प्राणायाम है। इन्द्रियोंपर विजय प्रत्याहार और ईश्वरका चिन्तन करना ध्यानावस्था है। मनको नियन्त्रित करना ही धारणा है और ब्रह्ममें मनको केन्द्रित करनेकी जो स्थिति होती है, वह समाधि है। यदि पहले इस योगके द्वारा चञ्चल चित्त स्थिर नहीं होता तो उस मूर्ति (परमेश्वर)-का इस प्रकार चिन्तन करना चाहिये—
जो हृदयकमलकी कर्णिकाके मध्य विराजमान रहनेवाले हैं तथा शङ्ख, चक्र, गदा और कमलसे सुशोभित हैं, जो श्रीवत्स तथा कौस्तुभमणि, वनमाला एवं लक्ष्मीसे विभूषित हैं, जो नित्य-शुद्ध, ऐश्वर्यसम्पन्न, सत्य, परमानन्दस्वरूप, आत्मस्वरूप, परमब्रह्म तथा परम ज्योतिःस्वरूप हैं—ऐसे वे चौबीस स्वरूप (अवतार)-वाले, शालग्रामकी शिलामें विराजमान, द्वारकादि<sup>३</sup> शिलाओंपर अवस्थित रहनेवाले परमेश्वर ध्यानके योग्य हैं और पूजनीय हैं। मैं भी वही हूँ—ऐसा समझना चाहिये।
इस प्रकार आत्मस्वरूप नारायणका यम-नियम इत्यादिक योगके साधनोंसे एकाग्रचित्त होकर जो ध्यान करता है, वह मनोऽभिलषित इच्छाओंको प्राप्तकर वैमानिक<sup>४</sup> देव हो जाता है। यदि निष्काम होकर उन हरिकी मूर्तिका ध्यान और स्तवन करे तो मुक्ति प्राप्त हो जाती है। (अध्याय ४४)
१-शब्दकल्पद्रुमके—'धूनयति कम्पयति शत्रून्'—इस व्युत्पत्तिके अनुसार 'धुनी' शब्द कम्पित कर देनेवालेके लिये प्रयुक्त होता है। इसलिये यहाँ प्रसंगानुसार 'स्वः' शब्दका मोक्ष अर्थ मानकर मोक्षको कम्पित (प्रतिबन्धित) करनेवाले अज्ञानको 'स्वर्धुनी' कह सकते हैं। इस तरह अज्ञानको पार कर लेना ही 'स्वर्धुनी' को पार करना समझना चाहिये।
२-आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं च सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च। इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयास्तेषु गोचराः॥
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तो भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः। यस्तु विज्ञानवानात्मा युक्तेन मनसा सदा॥
स तु तत्पदमाप्नोति स हि भूयो न जायते। विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः॥
स्वर्धुन्याः परमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्। (४४।६-९)
३-शब्दकल्पद्रुमके अनुसार द्वारकामें होनेवाली तक्षशिला भी भगवान् विष्णुकी मूर्ति मानी जाती है। इसीलिये जैसे गण्डकी नदीमें होनेवाली चक्रयुक्त शिला (शालग्रामशिला)-में विष्णुका सदा संनिधान है, वैसे ही द्वारकाकी शिलामें भी विष्णुका संनिधान है।
४-वैमानिक देव—शब्दकल्पद्रुमके—'विगतं मानम् उपमा यस्य'—इस व्युत्पत्तिके अनुसार निरुपमेयको विमान कहा जा सकता है। 'विमान एव वैमानिकः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार वैमानिक शब्द भी निरुपमेय (उपमारहित)-का बोधक हो सकता है। इसलिये प्रकृतमें 'वैमानिक देव'का अर्थ निरुपमेय—उपमारहित—सर्वोत्कृष्ट देव महाविष्णु किया जा सकता है।
| ७० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
विविध शालग्रामशिलाओंके लक्षण
**श्रीहरिने कहा—**हे वृषभध्वज! अब मैं प्रसंगवश शालग्रामका लक्षण कहता हूँ। शालग्रामशिलाओंके स्पर्शमात्रसे करोड़ों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। केशव, नारायण, गोविन्द तथा मधुसूदन आदि नामोंवाली विभिन्न शालग्रामशिलाएँ होती हैं, जो शंख, चक्र आदि चिह्नोंसे सुशोभित रहती हैं। इन शिलाओंके लक्षण इस प्रकार हैं—
शंख, चक्र, गदा तथा पद्मके चिह्नसे सुशोभित शिला ‘केशव’, पद्म, कौमोदकी* गदा, चक्र तथा शंखके चिह्नसे सुशोभित शिला ‘नारायण’, चक्र, शंख, पद्म तथा गदाके चिह्नसे विभूषित शिला ‘माधव’ और गदा, पद्म, शंख तथा चक्रके चिह्नसे शोभायमान शिला ‘गोविन्द’ नामसे जानी जाती है।
पद्म, शंख, चक्र, गदासे युक्त ‘विष्णु’ नामकी, शंख, पद्म, गदा तथा चक्रसे युक्त ‘मधुसूदन’ नामकी, गदा, चक्र, शंख, पद्मसे संयुक्त ‘त्रिविक्रम’ नामकी, चक्र, गदा, पद्म, शंखसे चिह्नित ‘वामन’ नामकी, चक्र, पद्म, शंख एवं गदासे समन्वित ‘श्रीधर’ नामकी और पद्म, गदा, शंख, चक्रसे अंकित ‘हृषीकेश’ नामकी शालग्राम-मूर्ति कही गयी हैं। इन देवमूर्तियोंको बार-बार नमन है।
पद्म, चक्र, गदा, शंख-चिह्नपूरित शालग्रामशिला ‘पद्मनाभ’, शंख, चक्र, गदा, पद्मयुक्त शालग्रामशिला ‘दामोदर’, चक्र, शंख, गदा तथा पद्मसे संयुक्त शालग्रामशिला ‘वासुदेव’, शंख, पद्म, चक्र, गदा-चिह्नसे समन्वित शालग्रामशिला ‘संकर्षण’, शंख, गदा, पद्म, चक्रसे सुशोभित शालग्रामशिला ‘प्रद्युम्न’ तथा गदा, शंख, पद्म और चक्रसे शोभित शालग्रामशिला ‘अनिरुद्ध’ नामसे अभिहित है। इन्हें बारम्बार प्रणाम है।
पद्म, शंख, गदा, चक्रके चिह्नसे विभूषित ‘पुरुषोत्तम’ नामकी, गदा, शंख, चक्र, पद्म-चिह्नसे विभूषित ‘अधोक्षज’ नामकी, पद्म, गदा, शंख, चक्रसे विभूषित ‘नृसिंह’ नामकी, पद्म, चक्र, शंख, गदासे अंकित ‘अच्युत’ नामकी और शंख, चक्र, पद्म, गदासे संयुक्त ‘जनार्दन’ की शालग्राम-मूर्ति है—इन देवनामोंसे अभिहित मूर्तियोंको नमस्कार है।
गदा, चक्र, पद्म, शंखसे अंकित शालग्राम ‘उपेन्द्र’, चक्र, पद्म, गदा, शंखसे युक्त शालग्राम ‘हरि’, गदा, पद्म, चक्र, शंख-चिह्नसे शोभित शालग्राम ‘श्रीकृष्ण’ नामसे प्रसिद्ध हैं और शालग्रामशिलाके द्वारदेशपर चिह्नित दो चक्र धारण करनेवाले, शुक्लवर्णवाले भगवान् वासुदेव हैं। इन सभी रूपों एवं नामोंको धारण करनेवाले हे गदाधर भगवान् विष्णु! हम सबकी आप रक्षा करें।
दो चक्रोंसे युक्त, रक्त आभावाली और पूर्वभागमें पद्म-चिह्नसे अंकित शालग्रामशिला ‘संकर्षण’ की मूर्ति होती है, किंतु छोटे-छोटे चक्रोंवाली तथा पीतवर्णकी होनेपर वह शिला ‘प्रद्युम्न’ कही जाती है। यदि शालग्रामशिला बड़ी तथा छिद्रसे संयुक्त शिरोभागवाली और वर्तुलाकार हो तो उसे ‘अनिरुद्ध’ नामक शालग्राम-मूर्ति कहते हैं। जो द्वारमुखपर नीलवर्णकी तीन रेखाओंसे युक्त होती है और जिसका शेष सम्पूर्ण भाग कृष्णवर्णसे सुशोभित रहता है, वह शालग्रामशिला ‘नारायण’ शिलाके नामसे जानी जाती है।
जिस शिलाके मध्यमें गदाके समान रेखा हो, यथास्थान नाभिचक्र उन्नत हो तथा वक्षःस्थल विस्तृत हो, वह ‘नृसिंह’ नामवाली शालग्रामशिला है और
* श्रीविष्णुकी गदाका नाम 'कौमोदकी' है।
काण्ड ] वास्तुमण्डल-पूजाविधि ७१
इन चिह्नोंके साथ ही उसमें तीन विन्दु अथवा पाँच विन्दु हों तो वह 'कपिल' नामक शिला है, वह शिला हम सबकी रक्षा करे। उसका पूजन ब्रह्मचारियोंको करना चाहिये। विषम परिमाणवाले दो चक्रोंसे चिह्नित शक्ति-चिह्नसे युक्त शिलाको 'वाराह' शिला कहते हैं। वह हम सबकी रक्षा करे। नीलवर्णवाली, तीन रेखाओंसे युक्त, स्थूल तथा विन्दुयुक्त शिला 'कूर्ममूर्ति' है और वही अगर वर्तुलाकार है तथा उसका पीछेका भाग झुका हुआ हो तो वह शिला 'कृष्ण' कही गयी है, वह हम सबकी रक्षा करे। पाँच रेखावाली शिला 'श्रीधर' नामकी कही जाती है। गदासे अंकित शिला 'वनमाली' है—ये हम सबकी रक्षा करें। गोलाकार तथा छोटी शिला 'वामन' शिला है, बायें भागमें चक्राङ्कित शिला 'सुरेश्वर' की मूर्ति है। विभिन्न रंगोंवाली, अनेक रूपोंवाली, नागके समान फणोंसे युक्त शिला 'अनन्तक' है। स्थूल हो, नीलवर्णकी हो और मध्यमें नीलवर्णका चक्र हो तो वह 'दामोदर'- शिला है। संकुचित द्वारवाली, रक्तवर्णवाली, लम्बी रेखाओंवाली, छिद्रयुक्त, एक चक्र तथा एक कमलवाली विस्तीर्ण शिला 'ब्रह्मशिला' है, ये सब हम सबकी रक्षा करें। विस्तृत छिद्रवाली तथा स्थूल चक्रवाली शिला 'कृष्णशिला' तथा बिल्वाकार शिला 'विष्णुशिला' है। अंकुशके आकारवाली, पाँच रेखाओंवाली तथा कौस्तुभ-चिह्नसे युक्त शिला 'हयग्रीव' शिला है। एक चक्र तथा एक कमलसे अंकित, मणि तथा रत्नोंकी आभासे युक्त कृष्णवर्णकी शिला 'वैकुण्ठ' शिला और द्वारपर रेखावाली, विस्तृत कमलसदृश शिला 'मत्स्यशिला' है—ये हम सबकी रक्षा करें। दाहिनी ओर रेखायुक्त, श्यामवर्णसे समन्वित, रामचक्रसे अंकित 'त्रिविक्रम' नामवाली शिला हम सबकी रक्षा करे। द्वारकामें स्थित, शालग्राममें निवास करनेवाले गदाधारी भगवान्को नमस्कार है। एक द्वारवाली, चार चक्रोंसे युक्त, वनमालासे विभूषित, स्वर्णरेखासमन्वित, गोपदसे सुशोभित तथा कदम्बके पुष्पकी आकृतिवाली 'लक्ष्मीनारायण' नामवाली शिला हम सबकी रक्षा करे।
एक चक्रवाले शालग्रामको 'सुदर्शन' कहते हैं, उनके रूपमें वे गदाधारी श्रीविष्णु हम सबकी रक्षा करें। दो चक्र होनेसे शालग्रामशिलाकी 'लक्ष्मीनारायण' संज्ञा होती है। जिसमें तीन चक्र हैं, वह (शिला) 'त्रिविक्रम' की मूर्ति है, चार चक्रवाली चतुर्व्यूह, पाँच चक्रवाली 'वासुदेव', छः चक्रवाली शालग्रामशिला 'प्रद्युम्न', सात चक्रवाली शिला 'संकर्षण', आठ चक्रवाली 'पुरुषोत्तम', नव चक्रवाली शिला 'नवव्यूह', दस चक्रवाली 'दशावतार' तथा ग्यारह चक्रवाली शिला 'अनिरुद्ध' कहलाती है—ये हम सबकी रक्षा करें। बारह चक्रोंसे युक्त शिला 'द्वादशात्मा' है। बारहसे अधिक चक्रकी शिला 'अनन्त' नामवाली है।
जो मनुष्य इस विष्णुमूर्तिमय स्तोत्रका पाठ करता है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है।
(अध्याय ४५)
वास्तुमण्डल-पूजाविधि
**श्रीहरिने कहा—**गृहेनिर्माणके प्रारम्भमें जिसके करनेसे समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं। संक्षेपमें उस वास्तुपूजाकी विधि कहता हूँ, यह पूजा ईशानकोणसे प्रारम्भ होकर इक्यासी पदवाले मण्डपके अन्तर्गत पूर्ण की जानी चाहिये।
इस मण्डलके ईशानकोणमें वास्तुदेवताका मस्तक होता है। नैर्ऋत्यकोणमें उनके दोनों पाद तथा अग्नि और वायुकोणमें दोनों हाथ होते हैं। आवास
७२ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- ---|---
अर्थात् भवन, गृह आदि, नगर, ग्राम, व्यापारिक पथ, प्रासाद, उद्यान, दुर्ग, देवालय तथा मठ आदिके निर्माणमें वास्तुदेवताकी स्थापनापूर्वक पूजा करनी चाहिये। बाईस* देवता बाह्यभागमें तथा तेरह देवता अन्तःभागमें अवस्थित रहते हैं।
यथा—ईश, शिखी, पर्जन्य, जयन्त, कुलिशायुध, सूर्य, सत्य, भृगु, आकाश, वायु, पूषा, वितथ, ग्रहक्षेत्र, यम, गन्धर्व, भृगुराज, मृग, पितृगण, दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदन्त, गणाधिप, असुर, शेष, पाप, रोग, अहिमुख, भल्लाट, सोम, सर्प, अदिति तथा दिति—ये वास्तुमण्डलके बाह्य देव हैं।
—इन बाह्य देवोंका पूजन करके बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि वह ईशानादि चारों कोणोंपर स्थित देवताओंकी पूजा करे। यथा—ईशानकोणमें आप (जल), अग्निकोणमें सावित्री, नैर्ऋत्यकोणमें जय और वायुकोणमें रुद्रदेवकी पूजा करे। नवपद परिमापके मध्यमें ब्रह्माकी पूजा करनी चाहिये और उनके समीप ही अन्य आठ देवताओंका भी पूजन करे। पूर्वादिक क्रमसे उन पूजनीय देवोंके नाम इस प्रकार हैं—
अर्यमा, सविता, विवस्वान्, विबुधाधिप, मित्र, राजयक्ष्मा, पृथ्वीधर और अपवत्स—ये आठ देव हैं, जो ब्रह्माके चारों ओर मण्डलाकार स्थित हैं।
दुर्गनिर्माणमें ईशानकोणसे नैर्ऋत्यकोणपर्यन्त सूत्रद्वारा किया गया रेखाङ्कन वंश कहा जाता है और अग्निकोणसे जब वायुकोणपर्यन्त दूसरी रेखा खींची जाती है तो वह वंश-रेखा, दुर्धर-रेखा कहलाती है। वंश-रेखापर ईशानकोणमें अदिति, दुर्धरयोग विन्दुपर हिमवन्त, नैर्ऋत्यकोण अर्थात् वास्तुमण्डलके अन्तिम नैर्ऋत्य विन्दुपर जयन्तके पूजनका विधान है। तत्पश्चात् दुर्धर-रेखाके प्रारम्भमें अग्निकोणपर नायिका तथा अन्तिम छोर वायुकोणपर कालिकादेवीकी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर शुक्र अर्थात् इन्द्रसे लेकर गन्धर्वपर्यन्त उक्त वास्तुदेवोंकी पूजा करके भवन-निर्माणका कार्य प्रारम्भ करना चाहिये।
वास्तु (भवन)-के सम्मुख-भागमें देवालय, अग्निकोणमें पाकशाला, पूर्व दिशामें यज्ञ-मण्डप, ईशानकोणमें काष्ठ या प्रस्तरसे बनी पट्टिकाओंके द्वारा घिरा हुआ सुगन्धित पदार्थों तथा पुष्पोंको रखनेका स्थान, उत्तर दिशामें भाण्डारागार, वायुकोणमें गोशाला, पश्चिम दिशामें खिड़की तथा जलाशय, नैर्ऋत्यकोणमें समिधा, कुश, ईंधन तथा अस्त्र-शस्त्रका कक्ष, दक्षिण दिशामें सुन्दर शय्या, आसन, पादुका, जल, अग्नि, दीप और सज्जन भृत्योंसे युक्त अतिथिगृहका निर्माण करना चाहिये।
गृहके बीच समस्त रिक्तभागमें कूप, जलसिंचित कदलीगृह और पाँच प्रकारके पुष्पपादपोंको सुनियोजित करे। भवनके बाह्य भागमें चारों ओर पाँच हाथ ऊँची दीवाल बनाकर वन और उपवनसे आच्छादित भगवान् विष्णुका मन्दिर बनाना चाहिये।
इस मन्दिरके निर्माणकार्यके प्रारम्भमें चौंसठ पदका वास्तुमण्डल बनाकर वास्तुदेवताकी विधिवत् पूजा करे। उक्त रीतिके अनुसार वास्तुमण्डलके मध्य भागमें चार पदके मण्डलान्तर्गत ब्रह्मा तथा उनके समीपस्थ प्रत्येक दो पदपर अर्यमादि आठ देवोंकी पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर कर्णभागपर कार्तिकेय आदिका पूजन करके, दोनों ओर पार्श्व विन्दुओंपर दो-दो पदोंकी दूरीसे स्थित अन्य पार्श्व देवोंका पूजन करे। तत्पश्चात् वास्तुमण्डलके ईशानादि कोणोंपर क्रमशः चरकी, विदारी, पूतना और पापराक्षसी नामक देवशक्तियोंकी पूजा करनी चाहिये। उसके बाद
* मूलपाठमें 'द्वाविंशति' पाठ है, वास्तवमें द्वात्रिंशत् पाठ होना चाहिये।
काण्ड ] वास्तुमण्डल-पूजाविधि ७३
बाह्य भागमें हेतुकादि देवोंका पूजन करे। इनके नाम हेतुक, त्रिपुरान्तक, अग्नि, वैताल, यम, अग्निजिह्वा, कालक, कराल और एकपाद हैं। उनकी पूजा करनेके पश्चात् ईशानकोणमें भीमरूप, पातालमें प्रेतनायक, आकाशमें गन्धमाली तथा उसके बाद क्षेत्रपाल देवोंकी पूजा करनी चाहिये।
यथासाध्य वास्तु संकुचित या विस्तृत क्षेत्रफलकी राशिको वसुओंकी संख्या अर्थात् आठसे पहले भाग दे, उसके बचे हुए शेष भागको यम माने। पुनः उक्त वास्तुराशिको आठसे गुणा करे, जो गुणनफल हो उसको ऋक्ष भाग अर्थात् सत्ताईससे भाग दे, जो शेष हो उसे ऋक्ष या नक्षत्रराशि कहते हैं और जो भागफल है, वह अव्यय कहलाता है।
उस ऋक्षराशिको चारसे गुणा करके गुणनफलमें नौसे भाग दे, जो शेषांश हो उसका नाम स्थिति है। इसी स्थिति अङ्कपर वास्तुमण्डलका निर्धारण करना चाहिये। ऐसा देवल ऋषिका अभिमत है।
उक्त वास्तुराशिको आठसे गुणा करके जो गुणनफल हो उसे पिण्ड कहते हैं। उस पिण्डको साठसे भाग देना चाहिये, जो शेषांक हो उसके द्वारा गृहस्वामीके जीवन-मरण और परिजनोंके विनाशका निर्धारण होता है।
मनुष्यको चाहिये कि वास्तुमण्डलके मध्यमें ही सदा गृहका निर्माण करे। उसके पृष्ठभागमें न करे। इसी प्रकार वास्तुमण्डलके वामपार्श्वमें भी गृह-निर्माण करना उचित नहीं होता है, क्योंकि वामपार्श्वमें वास्तुदेव सोये रहते हैं। अतः इसमें गृह-निर्माण नहीं करना चाहिये।
सिंह, कन्या तथा तुला राशि रहनेपर उत्तर दिशाके द्वारका शोधन करे और उसी प्रकार वृश्चिकादि अन्य राशियोंके रहनेपर पूर्व-दक्षिण तथा पश्चिम द्वारका शोधन करना चाहिये (क्योंकि भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिकमासमें पूर्व दिशामें मस्तक, उत्तर दिशामें पृष्ठ, दक्षिण दिशामें क्रोड और पश्चिम दिशामें चरण फैलाकर वास्तुनाग सोये रहते हैं। अतः उत्तर दिशाका द्वार इस कालमें प्रशस्त होता है। वृश्चिक, धनु एवं मकर राशि अर्थात् मार्गशीर्ष, पौष और माघमें वास्तुनागका सिर दक्षिण, पृष्ठ पूर्व, क्रोड पश्चिम और पैर उत्तर दिशामें रहता है। जिससे उस समय पूर्व दिशाका द्वार-शोधन उचित है। कुम्भ, मीन और मेष राशि अर्थात् फाल्गुन, चैत्र तथा वैशाखमासमें वास्तुनागका मस्तक पश्चिम, पृष्ठ दक्षिण तथा पैर उत्तर-पूर्व दिशामें रहता है। अतः दक्षिण दिशाके द्वारका शोधन इस कालमें श्रेयस्कर है। इसी प्रकार वृष, मिथुन और कर्कराशि अर्थात् ज्येष्ठ, आषाढ़ तथा श्रावणमासमें वास्तुनागका सिर उत्तर, पृष्ठ पश्चिम, क्रोड पूर्व और पैर दक्षिण दिशामें रहता है। उस समय पश्चिम द्वारका शोधन करना उचित होता है)।
वास्तुके विस्तारके अनुसार आधे भागमें द्वारका निर्माण करना चाहिये। इस प्रकार आठ दिशाओंमें आठ द्वार कहे गये हैं।
यदि उपर्युक्त शास्त्र-सम्मत विधिसे द्वार-शोधन नहीं होता है तो हानि होती है।
अतः उपर्युक्त विधिसे प्रासाद या भवनका निर्माण करके उसके पूर्वमें पीपल, दक्षिणमें पाकड़, पश्चिममें बरगद, उत्तरमें गूलर तथा ईशानकोणमें सेमलका वृक्ष लगाना चाहिये, जो घरके लिये शुभ-फलदायी होते हैं। इस प्रकार पूजित वास्तु प्रासाद और घरके विघ्नोंका नाश करनेवाला होता है।
(अध्याय ४६)
३२- वर्ण एवं आश्रमधर्मोंका निरूपण
७४
संक्षिप्त गरुडपुराण
[ आचार-
प्रासाद-लक्षण
श्रीसूतजीने पुनः कहा - हे शौनक ! अब मैं
प्रासाद-निर्माण एवं उसके लक्षणोंके विषयमें कह
रहा हूँ। आप सुनें।
सर्वप्रथम कुशल वास्तुविद्की देख-रेखमें
चारों दिशाओंमें चौंसठ-चौंसठ पद परिमापका
एक चतुष्कोण भूखण्ड तैयार करना चाहिये।
जिसमें अड़तालीस पद-परिमाण-भूमिमें दीवालका
निर्माण करे। साथ ही चारों दिशाओंमें कुल बारह
द्वार (वारादरी) बनाये जायँ।
प्रासादकी ऊँचाईके परिमाणको अर्थात्
पृथ्वीतलपर प्रासादका बनाया गया ऊँचा जो
धरातल है, उसको प्रासादिक जंघा (कुर्सी) कहते
हैं। भवनकी यह जंघा मानव-जंघाकी अपेक्षा ढाई
गुना अधिक होनी चाहिये। उसके ऊपर निर्मित
होनेवाले गर्भभागके विस्तार-परिमापको शुक्रांघ्रि
कहते हैं। गर्भभागको पुनः तीन अथवा पाँच
भागोंमें विभक्त करना चाहिये और शुक्रांघ्रिके
द्वारकी ऊँचाई शिखर-भागकी आधी करनी
चाहिये। चार शिखर बनाकर उसके तीसरे भागपर
वेदि-बन्धन करे। उसके चतुर्थ भागपर पुनः प्रासादके
कण्ठ-भागका निर्माण करना चाहिये।* अथवा
भवनका निर्माण करनेके लिये भूमिखण्डको समान
सोलह भागोंमें विभक्त करके उस सोलहवें भागके
चतुर्थ भागके मध्यमें गर्भगृहका निर्माण करवाये।
बचे हुए बारह भागमें भित्ति (दीवाल) - का निर्माण
करे। चतुर्थ भागकी ऊँचाईके अनुसार ही अन्य
भित्तियोंकी ऊँचाईका परिमाण निश्चित करना चाहिये।
भित्तिकी ऊँचाईके मानकी अपेक्षा शिखरकी ऊँचाई
दो गुनी हो। मन्दिरके चारों ओर बननेवाले
प्रदक्षिणा-भागका विस्तार शिखर-भागकी ऊँचाईके
मानका चतुर्थांश होना चाहिये।
बुद्धिमानोंको चाहिये कि वे उस देवप्रासादमें
चारों दिशाओंमें निर्गम (बाहर निकलनेके) द्वार
रखें। गर्भगृहकी चतुर्दिक् भित्तियोंमें प्रत्येक भित्तिका
पाँच भाग करके उसके मध्यके पाँचवें भागमें द्वार
लगाना चाहिये। ऐसा ही गर्भगृहके प्रत्येक द्वारका
मान वास्तुविद् विद्वानोंने निर्धारित किया है।
गर्भगृहके समान ही उसके अग्रभागमें मुखमण्डप
बनाना चाहिये। यह प्रासादका सामान्य लक्षण
कहा गया है। अब मैं लिङ्गनिर्माणके परिमाणको
कह रहा हूँ।
हे शौनक ! लिङ्गके परिमाणके अनुसार उसकी
पीठका निर्माण होना चाहिये। पीठभागका दुगुना
चारों ओर पीठका गर्भभाग हो। पीठगर्भके अनुसार
ही उसकी भित्ति तथा उसके विस्तारके अर्धपरिमाणमें
उस लिङ्गपीठका जंघाभाग निर्मित करे।
हे शौनक ! जंघाभागके परिमाणकी अपेक्षा
द्विगुणित ऊँचा शिखर होना चाहिये। पीठ और
गर्भभागके मध्य जो परिमाण हो, उस परिमाणके
अनुसार शुक्रांघ्रिभाग निर्मित होता है। द्वारनिर्माणके
समय पहले जैसा कहा जा चुका है, शेष कार्य
वैसे ही होगा। लिङ्गका परिमाण बताया जा चुका
है। अब द्वारका परिमाण कहते हैं। चार हाथ (छः
फुट) - का द्वार बनाया जाय, जो वास्तुसे आठवाँ
हिस्सा होता है। स्वेच्छानुसार इसका दुगुना विस्तार
हो सकता है।
द्वारके सदृश पीठके मध्यभागको छिद्रयुक्त ही
रखना चाहिये। पादिक, शेषिक तथा भित्तिद्वार
परिमाणके अनुसार ही उसके अर्ध-अर्ध परिमाणकी
दूरीपर निर्मित करे। उस गर्भभागके विस्तारके
समान ही मण्डपके जंघाभागका निर्माण करके उस
जंघाभागके द्विगुणके परिमाणमें ऊँचे शिखरभागको
- चारों शिखरोंके मध्यमें ऊपरके हिस्सेको कण्ठभाग कहते हैं।
काण्ड ]
प्रासाद-लक्षण
७५
निर्मित करे। शुक्रांघ्रिभागको पहलेकी ही भाँति
बनवाकर निर्गम अर्थात् द्वारभागको ऊँचा ही बनवावें—
ऐसा मण्डपनिर्माणका मान है। इसके अतिरिक्त शेष
प्रासाद-भागके स्वरूपको कह रहा हूँ, सुनें—
प्रासाद-मण्डपके अग्रभागमें त्रेवेद अर्थात्
त्रिद्वारीका निर्माण करवाना चाहिये, जिसके क्षेत्रभागमें
देवगण विद्यमान रहते हैं। इस प्रकार प्रासादके
मानका अवधारण करके बाह्य भागका निर्माण
करे।
इस निर्माणकार्यमें प्रासादके चारों ओर एक
पाद परिमाणवाली नेमि या नींवका निर्माण करना
चाहिये। वैसे संसारमें गर्भगृहके परिमाणके अनुसार
नेमिका मान उसका द्विगुण है। भित्तिकी चौड़ाईसे
दो गुणा ऊँचा उसका शिखर भाग होना चाहिये।
लक्षणों एवं स्वरूपकी भिन्नताके कारण प्रासाद
अनेक प्रकारके होते हैं। यथा—वैराज, पुष्पक,
कैलास, मालिका (माणिक) तथा त्रिविष्टप—ये
पाँच प्रकारके प्रासाद हैं। इनमें प्रथम प्रकारका
वैराज नामक प्रासाद सब प्रकारसे चौकोर और
समतल होता है। द्वितीय प्रकारका पुष्पक प्रासाद
आयताकार होता है। तृतीय प्रकारका कैलास
नामक प्रासाद वृत्ताकार, चौथा मालिका नामक
प्रासाद वृत्तायत और पाँचवाँ त्रिविष्टप नामक
प्रासाद अष्टकोणाकार होता है। इस प्रकारसे बने
हुए ये प्रासाद बड़े ही मनोहारी होते हैं। इन
प्रासादोंसे ही अन्य प्रकारके प्रासादोंका स्वरूप
निर्मित हुआ है।
यथा—मेरु, मन्दर, विमान, भद्रक, सर्वतोभद्र,
रुचक, नन्दन, नन्दिवर्धन और श्रीवत्स—ये नौ
प्रकारके चौकोर प्रासाद वैराज नामक प्रासाद
निर्माणकी कलासे ही उत्पन्न हुए हैं।
वलभी, गृहराज, शालागृह, मन्दिर, विमान,
ब्रह्ममन्दिर, भवन, उत्तम्भ और शिविकावेश्म—ये
नौ प्रासाद पुष्पक नामक प्रासादकलासे उत्पन्न हुए
हैं।
वलय, दुन्दुभि, पद्म, महापद्म, मुकुली, उष्णीषी,
शंख, कलश, गुवावृक्ष तथा अन्य वृत्ताकार प्रासाद
कैलास प्रासादसे निकले हैं। गज, वृषभ, हंस,
गरुड, सिंह, सम्मुख, भूमुख, भूधर, श्रीजय तथा
पृथिवीधर—इन प्रासादोंका उद्भव 'मालिका'
(मणिक) नामक वृत्तायत प्रासादसे हुआ है।
वज्र, चक्र, मुष्टिकवधु, वक्रस्वस्तिक, खड्ग,
गदा, श्रीवृक्ष, विजय तथा श्वेत—इन नौ प्रासादोंका
प्रादुर्भाव त्रिविष्टप नामक प्रासादसे हुआ है।
इसके अतिरिक्त त्रिकोण, पद्माकार,
अर्धचन्द्राकार, चतुष्कोण तथा षोडशकोणीय प्रकारसे
भी मण्डपके संस्थानका निर्माण जहाँ-तहाँ किया
जा सकता है, जो क्रमशः—राज्य, ऐश्वर्य, आयुवर्धन,
पुत्रलाभ और स्त्रीप्राप्ति करानेवाले होते हैं।
मुख्यद्वारके स्थानमें ही ध्वजा आदि तथा
गर्भगृहका निर्माण कराना चाहिये। सूत्रके द्वारा सम
संख्याओंसे गुणित मण्डपका निर्माण करके उस
मण्डपके चतुर्थांश अर्थात् चौथाई परिमाणका एक
भद्रगृह निर्मित करवाये। भद्रगृहको समानान्तर
वातायन (रोशनदान)—से अथवा वातायनसे रहित
बनाना चाहिये। कहीं मण्डपकी दीवालके बराबर
अथवा कहीं उससे डेढ़ गुना अथवा कहीं दुगुने
मापके मण्डप बनाये जाने चाहिये। प्रासादके
लतामण्डपकी भूमि विषम तथा चित्र-विचित्र
(रंग-बिरंगी) वर्णकी बनानी चाहिये। परिमाण-
विरोध रहनेपर उसे विषम रेखाओंसे अलंकृत
किया जा सकता है।
प्रासादकी आधारभूमि प्रत्येक दिशाओंमें
अवस्थित चार द्वारों और चार मण्डपोंसे सुशोभित
होनी चाहिये। जो प्रासाद सौ शृंगोंवाला अर्थात् सौ
मीनारोंसे युक्त रहता है, उसे मेरु-संज्ञासे अभिहित
३३- संध्योपासन, तर्पण, देवाराधन आदि नित्य कर्मों तथा आशौचका निरूपण
७६
संक्षिप्त गरुडपुराण
[ आचार-
किया जाता है। यह अन्य प्रासादोंकी अपेक्षा उत्तम
कोटिका होता है। इस प्रकारके प्रासादमें प्रत्येक
मण्डप तीन-तीन भद्रगृहोंसे अलंकृत होने चाहिये।
निर्माणपद्धति, आकार और परिमाणके वैभिन्न्यके
कारण वे प्रासाद भिन्न-भिन्न प्रकारके हो जाते हैं।
जिनमें कुछ प्रासादोंका आधार होता है, किंतु कुछ
आधारसे रहित होते हैं। वे प्रासाद अपने छन्दक
अर्थात् छत-निर्माणके भेदसे भी भिन्न-भिन्न प्रकारके
हो जाते हैं। रचना-पद्धति तथा नामके भेदसे
परस्पर सांकर्यके कारण भी भिन्न-भिन्न प्रकारके
प्रासाद हो जाते हैं।
देवताओंकी विशेषताके कारण बहुत प्रकारके
प्रासाद बताये गये हैं। यद्यपि स्वयंभू (स्वतः
प्रादुर्भूत देवमूर्ति) देवताओंके लिये निर्मित होनेवाले
प्रासादके निमित्त कोई नियम नहीं हैं, तथापि
देवोंके लिये उक्त मानके अनुसार ही उन प्रासादोंका
निर्माण करवाना चाहिये, जो चतुरस्र अर्थात् चौरस
भूमिपर समान चार कोणोंसे समन्वित हों। वे
प्रासाद चन्द्रशालाओं (बारादरी) - से युक्त तथा
भेरीशिखर (नौबतखानों)- से संयुक्त होने चाहिये।
उनके सामनेके भागमें वाहनोंके लिये लघु मण्डप
भी निर्मित हों।
देवप्रासादके द्वारदेशकी सन्निधिमें नाट्यशाला
बनानी चाहिये। प्रासादके विभिन्न दिशाओंके मुख्य
द्वारोंपर अलग-अलग द्वारपाल बनाने चाहिये। उस
देवप्रासादसे कुछ दूर देवालयमें रहनेवाले सेवकवर्गके
लिये आवास बनवाना चाहिये।
देवप्रासादकी भूमि फल, पुष्प और जलसे
परिपूर्ण होनी चाहिये। ऐसे प्रासादोंमें देवताओंको
स्थापित करके उनकी अर्ध्यादिक विविध प्रकारके
उपचारोंसे पूजा करनी चाहिये। वासुदेव तो सर्वमय
हैं, उनके भवनका निर्माण करनेवाला व्यक्ति सभी
फलोंको प्राप्त करता है।
(अध्याय ४७)
देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि
सूतजीने कहा- अब मैं सभी देवताओंकी
प्रतिष्ठा-विधिको संक्षेपमें कह रहा हूँ। प्रशस्त
तिथि-नक्षत्रादिमें प्रतिष्ठा करवानी चाहिये।
सर्वप्रथम अपनी वैदिक शाखामें कहे गये
विधानके अनुसार या प्रणव-मन्त्र (ॐकार) - का
उच्चारण करके पाँच या उससे अधिक ऋत्विजोंके
साथ मध्य स्थानमें स्थित आचार्यका वरण करे।
तदनन्तर पाद्य, अर्घ्य और मुद्रिका, वस्त्र-गन्ध-
माल्य एवं अनुलेपनीय द्रव्योंसे उनका पूजन करे।
गुरुको चाहिये कि वे मन्त्रन्यासपूर्वक प्रतिष्ठाकर्मका
समारम्भ करें।
प्रासादके अग्रभागमें दस अथवा बारह हाथका
एक वर्गाकार सोलह खम्भोंवाला मण्डप तैयार
करके उसमें (पूर्वादिक चारों दिशाओं और ईशानादिक
चार विदिशाओंमें एक-एक ध्वजा - इस तरह)
कुल आठ ध्वजोंको प्रतिष्ठित करना चाहिये। तदनन्तर
मण्डपके मध्यभागमें चार हाथ परिमाणकी एक
वेदीका निर्माण कराये। उस वेदीके ऊपरी भागमें
नदियोंके संगम-स्थलके किनारेसे लायी गयी बालुका
बिछाये। प्रधान कुण्डका निर्माण करवाकर उसके
पूर्व दिशामें वर्गाकार, दक्षिणमें धनुषाकार, पश्चिममें
वर्तुलाकार और उत्तरमें पद्माकार - इस प्रकार पाँच
कुण्डोंका निर्माण करवाना चाहिये अथवा सभी
कुण्ड चौकोर रखे जा सकते हैं।
कुण्ड-निर्माणके पश्चात् समस्त कामनाओंकी
सिद्धिके लिये आचार्य, शान्तिकर्मके लिये विहित
काण्ड ] देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि ७७
विधिसे हवन करे। कुछ लोग मण्डपके ईशानकोणकी भूमिको गायके गोबर या स्वच्छ मिट्टीसे लीपकर उसमें होम करते हैं।
मण्डपमें लगे तोरणोंके समीप ही पूर्वाद्कि दिशाओंमें चार द्वारोंका निर्माण करवाना चाहिये। मण्डपके तोरणस्तम्भ न्यग्रोध (वट), उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल), बिल्व, पलाश, खदिर (खैर) काष्ठसे निर्मित होने चाहिये। प्रत्येक तोरणस्तम्भका परिमाप पाँच हाथ होना चाहिये और प्रत्येक स्तम्भको वस्त्र-पुष्पादिसे अलंकृत करना चाहिये तथा उसके निचले भागको एक हाथ नापकर पृथ्वीमें गाड़ देना चाहिये। शेष चार हाथ परिमाणका भाग ऊपर रखे। इसी प्रकार उन्हें मण्डपके चारों ओरकी दिशाओंमें स्थापित करवाना चाहिये।
मण्डपके पूर्वी द्वारपर मृगेन्द्र, दक्षिणी द्वारपर हयराज, पश्चिमी द्वारपर गोपति तथा उत्तरी द्वारपर देवशार्दूलका न्यास करे। पहले ‘अग्निमीळे०’ इस मन्त्रसे पूर्व द्वारकी दिशामें मृगेन्द्रका न्यास करे। तदनन्तर ‘ईषेत्वेति च०’ इस मन्त्रसे दक्षिण द्वारकी दिशामें हयराजका, ‘अग्न आयाहि०’ इस मन्त्रसे पश्चिम द्वारकी दिशामें गोपतिका और ‘शं नो देवी०’ मन्त्रसे उत्तर द्वारकी दिशामें देवशार्दूलका न्यास करना चाहिये।
मण्डपकी पूर्व दिशामें मेघवर्णके समान श्याम, अग्निकोणमें धूम्रवर्ण, दक्षिण दिशामें कृष्णवर्ण, नैर्ऋत्यकोणमें धूसरवर्ण*, पश्चिम दिशामें पाण्डुरवर्ण, वायुकोणमें पीतवर्ण, उत्तर दिशामें रक्तवर्ण, ईशानकोणमें शुक्लवर्ण तथा मण्डपके मध्यभागमें अनेक वर्णवाली पताकाको स्थापित करे।
‘इन्द्रविद्येति०’ इस मन्त्रसे पूर्व दिशामें इन्द्र, ‘संसुप्ति०’ इस मन्त्रसे अग्निकोणमें अग्नि, ‘यमोनाग०’ इस मन्त्रसे दक्षिणमें यम, ‘रक्षोहणावेति०’ मन्त्रसे (नैर्ऋत्यमें निर्ऋति) पश्चिममें वरुण तथा ‘ॐ वातेति०’ मन्त्रसे वायव्यमें वायुदेवका अभिषेक करके उत्तरमें ‘ॐ आप्यायस्वेति०’ मन्त्रसे कुबेरकी पूजा करे। ‘ॐ तमीशान०’ इस मन्त्रसे ईशान दिशामें ईशान और मण्डपके मध्यभागमें ‘ॐ विष्णोर्लोकेति०’ मन्त्रसे विष्णुका पूजन करना चाहिये।
प्रत्येक तोरणके समीप दो-दो कलश स्थापित करनेके पश्चात् वस्त्र तथा उपवस्त्रसे आच्छादित, चन्दनादि सुगन्धित पदार्थोंसे अलंकृत, पुष्प, वितान एवं अन्यान्य पूजा-उपचारोंसे सुशोभित दिक्पालोंकी पूजा करनी चाहिये।
‘ॐ त्रातारमिन्द्र०’ मन्त्रसे इन्द्र, ‘ॐ अग्निर्मूर्धा०’ मन्त्रसे अग्नि, ‘ॐ अस्मिन्वृक्ष०’ मन्त्रसे निर्ऋति, ‘ॐ किं चे दधातु०’ मन्त्रसे वरुण, ‘ॐ आचत्वा०’ मन्त्रसे कुबेर, ‘ॐ इमा रुद्रेति०’ मन्त्रसे रुद्र आदि दिक्पालोंकी पूजा करके विद्वान् आचार्यको चाहिये कि वह वायव्यकोणमें होमद्रव्य एवं अन्य पूजामें प्रयुक्त वस्तुओंको स्थापित करे।
तदनन्तर वह गुरु वहाँ रखी गयी श्वेत शंखादिक शास्त्र-विहित समस्त वस्तुओंपर एक बार दृष्टिपात कर ले, ऐसा करनेसे निश्चित द्रव्योंकी शुद्धि हो जाती है।
तत्पश्चात् हृदयादि षडङ्गोंका न्यास व्याहृति और प्रणवमन्त्रसे संयुक्त करके क्रमशः—(ॐ हृदयाय नमः, ॐ भूः शिरसे स्वाहा, ॐ भुवः शिखायै वषट्, ॐ स्वः कवचाय हुम्, ॐ भूर्भुवः स्वः नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ भूर्भुवः स्वः करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् मन्त्रका उच्चारण करते हुए) हृदय, सिर, शिखा, कवच, नेत्र, करतल
* पीलापनके साथ शुक्लवर्ण पाण्डुरवर्ण है और थोड़ा कम पाण्डुरवर्ण धूसरवर्ण है।
| ७८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
|---|
और करपृष्ठका स्पर्श करे। तदनन्तर 'ॐ अस्त्राय फट्' मन्त्रसे अस्त्रका न्यास भी करना चाहिये, क्योंकि यह न्यास-कर्म समस्त इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला होता है।
अस्त्र-मन्त्रके द्वारा अक्षत और विष्टरको अभिमन्त्रित करके उसी विष्टरके द्वारा यज्ञमण्डपमें एकत्रित समस्त द्रव्योंका स्पर्श करे। तत्पश्चात् अस्त्र-मन्त्रसे पवित्र किये गये उन अक्षतोंको अपने चारों ओर बिखेर दे। उसके बाद पूर्व दिशासे लेकर अग्निकोण, दक्षिण, नैर्ऋत्यकोण, पश्चिम, वायुकोण, उत्तर और ईशानकोणपर्यन्त मण्डपमें अभिमन्त्रित अक्षतोंका निक्षेप करके सम्पूर्ण यज्ञ-मण्डपका लेपन करवाना चाहिये।
तदनन्तर याज्ञिक गुरुको चाहिये कि वह अर्घ्यपात्रमें गन्धादिसे युक्त जलको पूर्णकर मन्त्रसमूहोंसे उसे अभिमन्त्रित करे। उसी अभिमन्त्रित जलसे यज्ञमण्डपका प्रोक्षण करना चाहिये। उसके बाद जिस देवकी प्रतिष्ठा करनी है, उसी देवके नामसे मण्डपके ईशानकोणमें कलश स्थापितकर उसके दक्षिण भागमें अस्त्र-मन्त्रसे अभिमन्त्रित वर्द्धनीकी* स्थापना करे। उसके बाद कलश, वर्द्धनी, ग्रह और वास्तोष्पति देवकी यथाविहित आसनपर प्रतिष्ठाके साथ पूजा करके आचार्य प्रणव-मन्त्रका जप करे। तदनन्तर सूत्रसे वेष्टित, पञ्चरत्नोंसे युक्त दो वस्त्रोंसे आच्छादित सब प्रकारकी औषधियों तथा चन्दनादि सुगन्धित पदार्थोंसे अनुलिप्त उस कलशकी पुनः पूजा करे, साथ ही उस कलशमें प्रतिष्ठित देवताकी भी पूजा करनी चाहिये।
तदनन्तर उत्तम वस्त्रसे वर्द्धनीको आच्छादित करके उसके साथ कलशको घुमाये। वर्द्धनीकी जलधारासे उस कुम्भको सिञ्चित करके उसके आगे ही वर्द्धनीको स्थापित करे। वर्द्धनीके साथ उस कुम्भका पूजन करके स्थण्डिलमें मूल देवताकी पूजा करे।
उसके बाद वायव्यकोणमें एक घटकी स्थापना करनी चाहिये। उसमें गणपतिको आवाहनकर 'ॐ गणानां त्वेति०' मन्त्रसे उनकी पूजा करके ईशानकोणमें दूसरा घट स्थापित करे। उसमें वास्तुदोष-परिहारके लिये 'ॐ वास्तोष्पते०' इस मन्त्रसे वास्तुदेवकी पूजा करनी चाहिये। कुम्भके पूर्वभागमें भूत और गणदेवको बलि प्रदानकर वेदीका आलम्भन करे। तदनन्तर 'ॐ योगेयोगेति०' मन्त्रसे हरे कुशोंका आस्तरण करे और ऋत्विजोंके साथ आचार्य तथा यज्ञदीक्षित वह श्रेष्ठ यजमान स्नान-पीठपर उस देवमूर्तिको प्रतिष्ठित करे। उस समय विविध वैदिक मन्त्रोच्चारके साथ जय-जयकारकी मङ्गल ध्वनि करनी चाहिये।
स्नान करवानेके लिये पीठसहित उस देवमूर्तिको ब्रह्मरथपर बैठाकर ईशानकोणमें अवस्थित मण्डपपीठमें स्थापित करे। तदनन्तर 'ॐ भद्रं कर्णेभि०' मन्त्रसे स्नान कराकर यज्ञीय सूत्र या वल्कल वस्त्रसे पोंछकर मूर्तिको स्वच्छ करके तूर्यादिक वाद्य-यन्त्रोंका वादन करते हुए लक्षणोद्धार (मूर्तिका नामकरण) करे।
उसके बाद कांस्य या ताम्र-पात्रमें स्थित घृत और मधुसे मिश्रित अञ्जनको सोनेकी शलाकासे लेकर उस प्रतिमाकी आँखोंमें अञ्जन करे। अञ्जन लगानेके लिये 'ॐ अग्निर्ज्योतीति०' मन्त्रसे देवके नेत्रोंको उद्घाटित करना चाहिये।
अञ्जनादिसे सुशोभित उस देवप्रतिमाका नामकरण स्थापना करनेवाला व्यक्ति करे। तदनन्तर 'ॐ इमं मे गङ्गेति०' मन्त्रसे प्रतिमाके नेत्रोंमें शीतल-क्रिया (शीतलीकरण)-का सम्पादनकर 'ॐ अग्निर्मूर्द्धेति०' मन्त्रसे बाँबी अर्थात् दीमकादिके
* कमण्डलु (गडुआ) कलशविशेष-देवताकी प्रतिष्ठा आदिमें विहित पात्र।
काण्ड ] देव-प्रतिष्ठाकी सामान्य विधि ७९
द्वारा एकत्रित की गयी मिट्टी उस देवमूर्तिको समर्पित करे और बिल्व, गूलर, पीपल, वट, पलाशद्वारा निर्मित पञ्चकषायको लेकर 'ॐ यज्ञायज्ञेति०' मन्त्रसे प्रतिमाको स्नान कराये। तत्पश्चात् पञ्चगव्यसे स्नान कराकर सहदेवी, बला, शतमूली, शतावरी, घृतकुमारी, गुडूची, सिंही तथा व्याघ्री—इन औषधियोंसे युक्त जलसे 'ॐ या ओषधीति०' मन्त्रद्वारा स्नान कराये। तदनन्तर 'ॐ याः फलिनीति०' मन्त्रके द्वारा फल-स्नान करानेका विधान है।
तत्पश्चात् 'ॐ द्रुपदादिवेति०' मन्त्रसे विद्वानोंको उद्वर्तन-कृत्य करना चाहिये। अनन्तर उत्तर आदि दिशाओंमें क्रमशः चार कलशोंका स्थापन करना चाहिये और उन कलशोंमें विविध रत्न, सप्तधान्य<sup>१</sup> और शतपुष्पिका<sup>२</sup> नामक औषधिका निक्षेप करना चाहिये। इसके अतिरिक्त उन चारों कलशोंमें चारों समुद्र एवं चारों दिशाओंके अधिष्ठाता देवोंका आवाहन करना चाहिये। साथ ही दूध, दही, क्षीरोदक एवं घृतोदकसे चारों कलशोंको पृथक्-पृथक् परिपूर्ण करके 'आप्यायस्व०' इस मन्त्रसे दुग्धकुम्भ, 'दधिक्राव्णो०' मन्त्रसे दधिकुम्भ, 'या ओषधी०' इस मन्त्रसे क्षीरोदककुम्भ तथा 'तेजोसि०' मन्त्रसे घृतकुम्भको अभिमन्त्रित करना चाहिये। अभिमन्त्रित इन चारों कलशोंको चार समुद्रोंका प्रतिनिधि समझते हुए इनके द्वारा देवप्रतिमाको स्नान कराना चाहिये।
इस प्रकार स्नान-सम्पन्न उस देवप्रतिमाको सुन्दर वेश-भूषासे अलंकृत करके गुग्गुलका धूप प्रदान करे। तत्पश्चात् पुनः कुम्भोंमें पृथ्वीपर विद्यमान सभी तीर्थों, नदियों तथा सागरोंका विन्यास करना चाहिये। उन कुम्भोंको 'ॐ या ओषधीति०' मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उनसे पुनः उस देवप्रतिमाका अभिषेक करे। जो व्यक्ति अभिषेकके अवशिष्ट जलसे स्नान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।
समुद्रके प्रतिनिधिस्वरूप उन कुम्भोंसे उस देवमूर्तिका अभिषेक-कृत्य सम्पन्न होनेके पश्चात् अर्घ्य प्रदान करके 'ॐ गन्धद्वारेति०' मन्त्रसे सुगन्धित चन्दनादि पदार्थोंद्वारा अनुलेप करे। साथ ही शास्त्रोंमें विविध वेदमन्त्रोंसे देवमूर्ति-न्यासकी प्रक्रिया भी सम्पन्न करे। तत्पश्चात् 'ॐ इमं वस्त्रेति०' मन्त्रके द्वारा वस्त्रोंसे मूर्तिको आच्छादित करे। उसके बाद 'ॐ कविहाविति०' मन्त्रका उच्चारण करते हुए उस प्रतिमाको सुन्दर मण्डपमें ला करके 'ॐ शम्भवायेति०' मन्त्रसे शय्यापर स्थापित करे। तदनन्तर 'ॐ विश्वतश्चक्षु०' मन्त्रका उच्चारणकर समस्त पूजाविधिको सब प्रकारसे परिपूर्ण करे। तत्पश्चात् वहींपर बैठकर परमतत्त्वका ध्यान करते हुए आचार्यको शास्त्रीय विधानके अनुसार मन्त्रन्यास करना चाहिये। मन्त्रन्यासकी प्रक्रिया मन्त्रशास्त्रोंमें बतायी गयी है। इस न्यासके बाद मण्डपमें प्रतिष्ठापित देवप्रतिमाको वस्त्रसे आच्छादित करना चाहिये और उसकी यथाविधि पुनः पूजा भी करनी चाहिये। शास्त्रीय विधिके अनुसार जो देवताको समर्पित करना है, वह उनके पादमूलमें समर्पित कर देना चाहिये। इसके अतिरिक्त देवताके शिरोभागमें दो वस्त्रोंसे वेष्टित, स्वर्णसे युक्त एवं प्रणवसे अंकित कलश स्थापित करना चाहिये।
तदनन्तर कुम्भके सन्निकट बैठकर आचार्य वेदमन्त्रोच्चारके साथ अग्निकी स्थापना करे। तदनन्तर पूर्वदिशामें ऋग्वेदवेत्ता ऋत्विक् कुण्डके समीप बैठकर श्रीसूक्त तथा पवमान आदि सूक्तोंका पाठ करे।
कुण्डके दक्षिण दिशामें स्थित अध्वर्यु अर्थात् यजुर्वेदवेत्ता आचार्य रुद्रसूक्त तथा पुरुषसूक्तका पारायण करे। कुण्डके पश्चिममें बैठा हुआ उद्गाता सामवेदीय
१-जौ, धान, तिल, कँगनी, मूँग, चना, साँवा—इन धान्योंका समूह सप्तधान्य कहलाता है।
२-शतपुष्पिका सौंफ या वनसौंफको कहते हैं।