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हित चौरासी (गोस्वामी हित हरिवंश - राधासुधानिधि एवं ललितचरण गोस्वामी सविस्तार सटीक)

Hit Chaurasi of Goswami Hit Harivansh with Commentary

गोस्वामी हित हरिवंश द्वारा

DevanagariHindipublished275 पृष्ठ

॥ श्रीहित ॥ ॥ श्रीराधा वल्लभो जयति ॥ मङ्गलाचरण नवल चंद प्रिया बदन, अति अनूप रूप सदन, हँसनि नवल मंद चपल चितवन सुखदाई। नवल अधर सरस लाल दसन झलक छबि रसाल, छिन छिन छबि होत नवल मन नहिं ठहराई॥ निरखत सोभा गँभीर बिसरे पिय नैन चीर, मनहुँ कमल रहे फूलि तरनि उदय माई। नवल प्रिया नव किसोर नवल सखी चहूँ ओर, विमल प्रेम ऊपर 'हित ध्रुव' बलि जाई॥

  • हितदास

निभृत निकुञ्ज विलासी ठाकुर श्रीश्रीराधावल्लभलालजी महाराज

वंशी अवतार, प्रेमस्वरूप, रसिकाचार्य अनन्त श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु जी महाराज

रसिकावतंश श्रीदामोदरदासजी महाराज (श्रीसेवकजी)

१. पद १-२५: श्रीराधा-माहात्म्य, निकुञ्ज-लीला एवं शृंगार-रस

श्रीहित कृपामूर्ति परमभागवत स्वामी श्रीहितदासजी महाराज

॥ श्रीहरिवंश ॥ ॥ श्रीराधा वल्लभ ॥ श्रीगुरु-वन्दना नमो० नमो जय श्रीहरिवंश। रसिक अनन्य बेनु कुल मण्डन, लीला मान सरोवर हंस॥ नमो जयति वृंदावन सहज माधुरी, रास विलास प्रसंस। आगम-निगम अगोचर राधे चरन सरोज व्यास अवतंस॥

  • दास हितदास श्रीइष्ट देव वन्दना शृंगार रस माधुर्य्य सार सर्वस्व विग्रहे। नमो नमो जगद्वन्द्ये वृन्दावन महेश्वरि॥ हे वृन्दावन की महामहिम स्वामिनि ! हे जगत् वन्दनीया! हे श्रृङ्गार, रस, माधुरी की सार सर्वस्व मूर्ति !! आपके श्रीचरणों में बार-बार नमन है।
  • कृपा भिखारी दीन हितदास

श्रीराधा लेखक के भावोद्गार जाने किस अज्ञात प्रेरणा ने मुझे यह सब लिखने के लिये फिर से बाध्य कर दिया और फल स्वरूप यह गलत-सही 'हित चौरासी' की टीका आज लिख कर पूर्ण हुई। 'तेरे मन कछु और है कर्त्ता के कछु और,' मेरे कुछ प्रेमी वैष्णवों की इच्छा थी कि 'श्रीराधा सुधा निधि' की ही तरह श्रीहित ध्रुवदास जी की समस्त कृतियों का एक संग्रह ग्रन्थ प्रकाशित हो और मैं उस पर शब्दार्थ एवं आवश्यकीय टिप्पणियाँ लिख दूँ प्रेमियों की सद्भावना के अनुसार मैंने उक्त ग्रन्थों (व्यालीस लीला समुच्चय) पर शब्दार्थ एवं टिप्पणियाँ लिखना प्रारम्भ भी कर दिया। कार्यरम्भ करने के कुछ ही दिनों पश्चात् अकस्मात् एक दिन 'हित चौरासी' एवं 'सेवक वाणी' पर भी टीका टिप्पणी लिखने की भावना जागी। मैंने इस भावना को ज्यों ज्यों रोकना प्रारम्भ किया त्यों त्यों यह बलवती होती गयी और प्रारम्भ किए गये कार्य को शिथिल करके इसने अपना कार्य आरम्भ करा लिया। कार्य की प्रगति कहूँ या कुछ और, न कुछ डेढ़ मास में ही 'हित चौरासी' की टीका सम्पूर्ण लिख गयी। ग्रन्थ तो लिख गया किन्तु मेरे मन में बार-बार आता है कि मैंने 'श्रीराधा सुधा निधि की टीका लिखकर रसिक समाज का एक अपराध किया था, और 'हित चौरासी' पर टीका टिप्पणी लिखकर यह दूसरा अपराध है क्योंकि यह लेखन, प्रकाशन के विचार से हुआ है, यों तो बहुत से पूर्वकालीन सन्तों ने इस ग्रन्थ पर टीकायें लिखी हैं किन्तु उनका उद्देश्य निज रसास्वाद था, मेरी तरह लोक ख्याति किंवा व्यापार नहीं। इसके लिये मैं उन रसिक सन्तों, आचार्यों एवं वैष्णवों से क्षमा की भीख माँगता हूँ। मैं इस कार्य में अपराध तो तब मानता हूँ, जब इस विहार रस वृन्दावन विलास को शास्त्रीय शब्दों में गोपनीय स्वीकार करता हूँ और जब यह देखता हूँ कि हमारे पूर्वज रसिकाचार्यों ने जिस वृन्दावन रस को प्रकट किया है वह

हित चौरासी • • १६ सत्यं शिवं सुन्दरम् है तो उसके मूल में एक चरम सत्य का दर्शन करता हूँ। वह सत्य उज्ज्वल है, शान्तिपूर्ण है, कल्याणमय है और अमलात्मा मुनिजन वंदनीय है। तब मैं निर्भय होकर एक आनन्द का अनुभव करता हूँ अपनी इस सेवा वृत्ति के द्वारा। अस्तु; इसी अवलम्ब को लेकर इस अल्पमति ने अपने इस लघु एवं असफल से प्रयास में रसिकावतंस आचार्य्य वर्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद द्वारा प्रकाश किये गये दिव्य एव परमोज्ज्वल शृङ्गार रस को अपनी शक्ति भर उसके अपने यथार्थ रूप में ही ला रखने की कोशिश की है। उस रस-प्रवाह के विशुद्ध सम्पतन में कोई विकृति न आ जाय इस भय से मैं सदा भयभीत रहा हूँ। हित चौरासी के दिव्य पदों के भावार्थ लिखने में केवल शब्दों के पर्याय वाची दूसरे शब्द लिखने का ही मेरा आग्रह रहा है। कहीं कहीं तो ब्रज भाषा के प्राचीन शब्दों को वर्त्तमान खड़ी बोली का रूप देकर पंक्ति के शेष शब्द ज्यों के त्यों रख दिये गये हैं। ऐसा करने में पद के मूल भाव की रक्षा ही लक्ष्य में रही है। इस बात की और भी रक्षा करने के लिये मैंने भावार्थ के साथ अपना मत जो भी कुछ लिखा है उसे [ .... ] इस कोष्ठ में रख दिया है और जहाँ कहीं मूल के शब्द या पंक्ति के अर्थ लिखने की आवश्यकता पड़ी है, वहाँ (....) इस लघु कोष्ठ का प्रयोग किया है। कहीं कहीं किसी शब्द, वाक्य या क्रिया के भाव को अधिक स्पष्ट करने के लिए - शब्द, वाक्य, क्रिया - इस शैली का प्रयोग किया गया है। सम्पूर्ण ग्रन्थ में प्रत्येक पद के पूर्व, 'अवतरण' नाम से पद के भीतर आये हुए भावों की परिचय रूपा भूमिका सी है। यह 'अवतरण'-या पद परिचय मेरी अपनी भावना का है। इन अवतरणों में पद के लिये जो भूमि निर्माण की गयी है, वह एक दम ठीक ही है, मैं ऐसा दम भरने का दुस्साहस नहीं कर सकता। इन अवतरणों को प्रत्येक व्यक्ति रस विलास सिद्धान्त का ध्यान रखते हुए अपने भावानुसार अलग-अलग भी निर्मित कर सकता है। दूसरी बात पदों के मूल पाठ की है। इस ग्रन्थ में प्राचीन से प्राचीन प्रतियाँ जो मुझे मिल सकी हैं, उन्हीं से यहाँ पाठ लिया गया है। वर्त्तमान् प्रकाशित प्रतियों में और निकट भूतकाल में लिखित प्रतियों में मूल प्रायः अशुद्ध है; क्योंकि ब्रज-भाषा के विचार से शब्दों का जो रूप होना चाहिये

२० • • हित चौरासी

इनमें वह न होकर शुद्ध संस्कृत के अनुसार है। यह बात ब्रजभाषा के सारल्य स्वाद और लावण्य को न्यून सी करती है, अतः मुझे ही क्यों सब भाषा मर्मज्ञों को अनुचित ही प्रतीत होगी। ब्रजभाषा के रूप इन प्रतियों में शुद्ध होकर संस्कृत किंवा हिंदी में किस प्रकार हुए कुछ इसके उदाहरण देखिये-

ब्रजभाषावर्तमान हिन्दी
भाँमतीभावती
प्राँनप्राण
जाँमिनीयामिनी
रमनरमण
जुद्धयुद्ध
सैनशयन
अंकअङ्क
राइराय
सुरस्वर
मंजुलमञ्जुल

– इत्यादि यद्यपि यह शब्द रूपान्तर अर्थ रूवान्तर नहीं करता, तथापि ब्रज-वाणी की रसात्मक धारा एवं लालित्य में अवश्य एक कण्टक है, जिसे मनीषी गण समझ सकते हैं। मूल पाठ में आये हुए कुछ पारिभाषिक शब्दों के अर्थ प्रसंग में जैसे घटित हो रहे हैं उसी तरह लिखे गये हैं, इससे साहित्यिक सज्जनों को विचार तो अवश्य होगा किन्तु इन शब्दार्थों से पद का भाव समझने में पर्याप्त सहायता मिलेगी और वह सहायता उसी दिशा में होगी जो रसिकाचार्य्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र की रस विहार की किंवा 'हित चौरासी' की दिशा है। पहले इन पारिभाषिक शब्दों पर स्वतन्त्र टिप्पणियाँ लिख दूँ ऐसा मन हुआ किन्तु ग्रन्थ का कलेवर बढ़ जाने एवं रस विहार का अत्यन्त स्पष्टीकरण हो जाने के भय से मैने ऐसा नहीं किया।

हित चौरासी • • २१ इस नित्य विहार रस पूर्ण ग्रन्थ के प्रणेता हैं – रसिकाचार्य्य वर्य्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद इस सम्पूर्ण ग्रन्थ में कुल चौरासी ही पद हैं, शायद इसी से हित चौरासी नाम दिया गया है। ग्रन्थ के सम्पूर्ण पद मुक्तक हैं। प्रत्येक पद अपने लिये स्वतंत्र है, वह दूसरे पद की अपेक्षा नहीं रखता, तथापि सम्पूर्ण ग्रन्थ में आद्यन्त केवल एक ही विषय, परमोज्वल शृंगार-विशुद्ध वृन्दावन रस विलास वर्णित है; यह वर्णन कितना जागृत वर्णन है, कहने की आवश्यकता नहीं। संस्कृत साहित्य में जिस प्रकार श्रीजयदेव कविराज का गीत गोविन्द महाकाव्य शृङ्गार रस वर्णन के सर्वोच्च सिंहासन पर आसीन है, उसी प्रकार ब्रज भाषा साहित्य में हित चौरासी का स्थान है। काव्य के गुण, अर्थ, अनुप्रास, उक्ति चोज, अलङ्कार, भाव व्यञ्जना, प्रसाद, शब्द माधुर्य्य, अर्थ माधुर्य्य मौलिकता आदि गुणों में यह ग्रन्थ अपने समान आप ही है। वर्तमान् युग के साहित्य महारथी श्रीवियोगी हरि जी “ब्रज माधुरी सार में लिखते हैं- “भाषा में हित चौरासी एक अनुपम ग्रन्थ है। पढ़ते-पढ़ते कहीं-कहीं तो कवि कोकिल जयदेव का स्मरण हो आता है। श्री गोसाईं जी ने ब्रज साहित्य का भारी उपकार किया है। श्रीहितजी ने आध्यात्मिक पक्ष के अर्थानुसार श्रीराधाकृष्ण का विशुद्ध शृङ्गार वर्णन किया है। इनका वर्णित रास विहार प्रकृति पुरुष का एक दिव्य रहस्य कहा जाता है....।” अस्तु, उपासना और भक्ति के क्षेत्र में श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु भगवान् श्रीकृष्ण की वंशी के अवतार माने जाते हैं। यह वंशी साक्षात् प्रेम रूपा है अतः यह बात निर्विवाद सिद्ध हो जाती है कि श्रीहित जी युगल किशोर श्रीराधा वल्लभ लाल के पारस्परिक प्रेम के ही दिव्य अवतार हैं। इनकी इष्टाराध्या हैं नित्य रास रस विहारिणी, वृन्दावन निभृत निकुञ्ज विलासिनी, नित्य नव किशोरी प्रेम प्रतिमा श्रीराधा। अतः श्रीहित हरिवंश चन्द्र ने सर्वत्र ही अपने पद एव श्लोकों में रस मूर्त्ति श्रीराधा के रूप, गुण, लीला, प्रभाव एवं स्वविलास आदि का ही गान किया है, क्योंकि श्रीकृष्ण की वंशी भी तो यही सब कुछ करती है। वंशी स्वरूप श्रीहिताचार्य्य की वाणी रसिक अनन्यों का जीवन है, वे इस वाणी रस गान का पान करके उन्मत की भाँति गा उठते हैं-

२२ • • हित चौरासी रास रस रचित बानीं जु प्रगटित जगत, सुद्ध अविरुद्ध परसिद्ध जानी। स्याम स्यामा प्रगट प्रगट अक्षर निकट, प्रगट रस श्रवत अति मधुर बानी।। सो जु बानीं रसिक नित्य निसिदिन रटत, कहत अरु सुनत रस रीति जानी। ताहि तजि और गाऊँ न कबहुँ कछू, प्रान रमि रही (श्री) हरिवंश बानीं।। –सेवकजी अस्तुः श्रीहितजी की रसोपासना का साधन भी विशुद्ध प्रेम ही है। इस प्रेम के लक्ष्य और स्वरूप हैं श्रीवन विहारी श्रीराधा और श्रीकृष्ण। इस तत्व की उपासना करने वाले उपासक 'रसिक अनन्य' कहे जाते हैं। इन रसिक अनन्यों का लक्ष्य मोक्षादि न होकर रस स्वरूप नित्य विहार की प्राप्ति है। नित्य विहार में उनका स्वरूप दिव्य नव किशोरी है। इनका भाव दासी है और सुख–तत्सुख है। हित चौरासी में इसी तत्सुख पूर्ण दासी भाव की रस धारा है। पाठकों को इसका विशद वर्णन 'प्राक्कथन' में मिलेगा। अन्त में इतना ही कहना अलं होगा कि यदि मेरे इस प्रयास से किसी भी सहृदय को कुछ लाभ मिल सका तो मेरा सम्पूर्ण श्रम सफल है– मैं धन्य हूँ। वृन्दावन – विनयावनत कुंजगली हितदास गुरु पूर्णिमा २००७ वि०

॥ श्रीहित राधावल्लभ ॥ प्राक्कथन 'रस' एक ऐसा विलक्षण तत्व है जो एक होकर भी अनेक रूपों में प्रतिभासित होता रहता है। इसी लिये रस को ब्रह्म कहा गया है- रसो वै सः; (श्रुति...)। भोजन के छः और साहित्य के नव (नौ) रस तो प्रसिद्ध ही हैं किन्तु इनके सिवाय रस के और भी भेद प्रभेद हो सकते हैं। इसी विचार से श्रीरूप गोस्वामी ने भक्ति को एक रस स्वीकार किया है जो साहित्य के नौ रसों से परे है। महाप्रभु श्री हित हरिवंश चन्द्र कृत 'हित चौरासी' में जिस रस का गान किया गया है वह भक्ति रस से अत्यन्त परे है। जिसके लिये श्रीहरिराम जी 'व्यास' ने कहा है- नवधा लौं सब भक्ति उबीठी रति भागौत कथा की। रहनि कहनि सबहिनु तें न्यारी 'व्यास' अनन्य सभा की॥ नवधा में अन्तिम आत्म निवेदन और श्रीमद् भागवत कथित रति-गोपी प्रेम से भी श्रेष्ठ है रसिक अनन्यों की रहनी एवं करनी। जिस रस को धारण करके उपासक 'रसिक अनन्य' कहलाते हैं; वह है वृन्दावन रस। यह वृन्दावन रस सबसे विलक्षण है। इसके समक्ष धर्म अर्थ, काम, मोक्ष, योग ध्यान, धारणा, ज्ञान कर्म सब निस्तेज हो जाते हैं। इस 'वृन्दावन-रस' का स्वरूप क्या है ? इसके प्राकट्य-कर्त्ता आचार्य्य कौन हैं ? इत्यादि प्रश्न पाठकों के लिये आवश्यकीय हैं; अतः इस विषय में प्रथम हम रसिकाचार्य्य वर्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभुपाद का संक्षिप्त जीवन परिचय देकर फिर उनके द्वारा प्रकाशित 'श्रीवृन्दावन रस' की चर्चा करेंगे- रसिकाचार्य्य गोस्वामी श्रीहित हरिवंश चन्द्र का परिचय - "श्रीराधा चरण प्रधान हृदय अति सुदृढ़ उपासी" श्रीहित हरिवंश चन्द्र महाप्रभु पाद का यथार्थ परिचय तो भक्तमाल कार श्रीनाभा स्वामी के इस छप्पय से मिलता है-

२४ • • हित चौरासी श्रीराधा चरन प्रधान हृदय अति सुदृढ़ उपासी। कुंज केलि दंपती तहाँ की करत खबासी।। सर्बसु महा प्रसाद प्रसिद्ध ताके अधिकारी। विधि निषेध नहिं दासि अनन्य उत्कट ब्रत धारी।। श्रीव्यास सुवन पथ अनुसरै सोइ भलैं पहिचानि है। (श्री) हरिवंश गुसाईं भजन की रीति सकृत कोउ जानि है।। – श्री नाभा जी इन दिव्य विभूतियों का लोक परिचय क्या ? ये तो सदा ही अलौकिक हैं। जैसे इनका आगमन नित्य लोक से होता है वैसे ही इनका अन्त्य और नित्य निवास भी नित्य लोक में ही होता है। बीच का जो थोड़ा सा काल आविर्भाव एवं तिरोभाव के रूप में दीख पड़ता है, एक लीला-कौतुक मात्र है। इस काल में ये चाहे संसारी की तरह व्यवहार कर लें; चाहे योगिराज की तरह; इन्हें बन्धन तो मानो छूते ही नहीं। सच तो यह है कि इन्हें जैसा योग वैसा ही भोग। ये नित्य जल कमल वत् हैं। यदि ये भोगी की तरह रह जाते हैं तो उस भोग में भी महान् योग की शिक्षा प्रदान कर जाते हैं और तब इनके योग की तो चर्चा ही कौन करे ? इनके जन्म, कर्म, गुण, रूप सभी अपार होते हैं। किन्तु विश्व-जनों का स्वभाव भी बड़ा विचित्र है जो ऐसी विभूतियों का लौकिक परिचय-जल कमलवत् रहनी की जानकारी किये बिना असन्तोष का अनुभव करता है, तब उन्हें उन्हीं की रीति से परिचय भी देना पड़ता है। इस दृष्टि से हमारे महाप्रभु पाद का जन्म ब्रज मण्डलान्तर्गत मथुरा के समीप 'बाद' नामक ग्राम में विक्रम संवत् १५५९ वैशाख शुल्क एकादशी सोमवार को हुआ था। पिता का नाम व्यास मिश्र और माता का नाम तारा रानी था। व्यास मिश्र कुलीन गौड़ ब्राह्मण थे। विद्वान् होने के नाते प्रतिष्ठित इतने कि तत्कालीन दिल्ली नरेश सिकन्दर लोदी भी जिनका सम्मान किया करता। इनके ज्योतिष, आयुर्वेद आदि के ज्ञान पर रीझ कर बादशाह ने इन्हें चार हजारी मनसब की निधि प्रदान की थी। किसी समय व्यास मिश्र बादशाह के साथ अपनी राज नगरी देववन (सहारन पुर) से ब्रज मण्डल सकुदुम्ब आये थे, इसी यात्रा काल में श्रीहरिवंश चन्द्र का जन्म 'बाद' में हुआ था। बाद ग्राम

हित चौरासी • • २५ में सुख पूर्वक छः मास निवास करके व्यास मिश्र सपरिवार देव वन चले गये। हरिवंश चन्द्र का बाल्य काल एवं यौवन देव वन में ही बीता। 'होनहार विरवान के होत चीकने पात' के न्याय से श्रीहरिवंश के बाल्यकाल में ही अनेकों चमत्कार देखने में आये। केवल छः मास की अवस्था में "श्रीराधा सुधा निधि स्तव" का गान, तीन वर्ष की आयु में श्री प्रियाजी (राधा) की भावना-ध्यान सिद्धि श्रीराधा द्वारा प्रत्यक्ष भोग आरोगना, फूलमाला प्रसादी देना, नीलाम्बर उढ़ा देना, पाँच वर्ष की आयु में कुए में कूदकर अनन्त श्री ठाकुर रंगी लालजी का श्रीविग्रह निकालना (प्रकट करना) और उनकी सेवा पूजा की सुन्दर व्यवस्था करना; अल्प काल में ही सर्व शास्त्र पारङ्गत हो जाना, आठ वर्ष की आयु में स्वामिनी श्रीराधा से मंत्र ग्रहण करके शिष्य होना इत्यादि बातें इनके अलौकिक स्वरूप को प्रकट करती हैं। अस्तु; उपवीत संस्कार और विद्याध्ययन के पश्चात् व्यास मिश्र ने आपका विवाह किया। आपकी धर्मपत्नी श्रीरुक्मणी देवी, पूर्ण पति परायणा, सुशीला और भक्ता थीं अतः उनके संग से आपको राधा भक्ति के प्रचार में अच्छी सहायता मिली। स्वामिनी श्रीराधा की आज्ञानुसार आपने अपने देश में विशुद्ध प्रेम लक्षणा श्रीराधा भक्ति का प्रचार किया। इस तरह घर में ही आपकी आयु बत्तीस वर्ष की हो गयी। इस बीच में आपके तीन पुत्र और एक पुत्री ने जन्म ग्रहण किया ; जिनके नाम क्रमशः श्रीवन चन्द्र, कृष्ण चन्द्र गोपीनाथ और साहिब देवी हैं। विपुल सम्पत्ति, योग्य सन्तति, अनुकूल पत्नी और सबसे विशिष्ट राज प्रतिष्ठा का भी परित्याग करके आप बतीस वर्ष की आयु में लोक कल्याण की भावना से श्रीवन के लिये विदा हुए। किन्तु श्रीकृष्ण की अचिन्त्य लीला शक्ति ने अपना काम किया। आपको एक की जगह दो दो कन्याओं से विवाह करना पड़ा। दहेज में अपार सम्पत्ति के साथ श्रीराधा वल्लभ जी का श्रीविग्रह भी मिला। आत्मदेव अपनी दोनों कन्याएँ श्रीकृष्ण दासी एवं मनोहरी दासी को श्रीहरिवंश चन्द्र को समर्पित कर भजन करने हिमालय चले गये और आप प्रभु विधान को सहर्ष स्वीकार कर समस्त समाज के साथ श्रीवन आये। विक्रम संवत् १५९१ कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को आपने श्रीवन में प्रथम निवास

२६ • • हित चौरासी किया। ब्रज वासियों ने आपका खूब आदर सत्कार किया, रहने को भूमि दी, कुटियाएँ निर्माण कीं, और तन, मन धन से आपकी सेवा में लग गये। भै गाँव के राजा नरवाहन जी तो आपके स्वरूप पर मुग्ध होकर मंत्र शिष्य ही हो गये। अब आचार्य्यपाद अपने परिकर सहित श्रीवन में सुख पूर्वक निवास करने लगे। आपके श्रीवन आगमन के एक वर्ष पश्चात् संवत् १५९२ कार्तिकारम्भ में ओरछे के राज पण्डित श्रीहरिराम व्यास श्रीवन आए और आचार्य्यपाद के शिष्य हो गए। स्वामी श्रीहरिदास से भी श्रीहिताचार्य्य की गाढ़ी प्रीति हो गयी। तत्पश्चात् श्रीमत् प्रबोधानन्द सरस्वती पाद ने आपकी शरण ग्रहण की और इस प्रकार श्रीवृन्दावन रसिक अनन्यों का खासा अखाड़ा बन गया। इनमें से श्रीहरिवंशी श्रीहरिदासी का योग मानों मणि काञ्चन योग हुआ और उसमें व्यासजी के मिलने पर यह रसिक संगम 'रसिक त्रिवेणी' के नाम से प्रख्यात हो गया। अस्तु; श्रीहिताचार्य्य पाद श्रीवन में अठारह वर्ष संवत् १६०९ विक्रम तक विराजमान् रहे और शारदीय पूर्णिमा को आप अपने नित्य परिकर में चले गये। आपने अपने १८ वर्ष श्रीवन वास के जीवन में जिस रस की धारा बहायी वह रस- 'वृन्दावन रस' के नाम से प्रख्यात है। वह आपके ग्रन्थ श्रीराधा सुधा निधि, हित चौरासी एवं स्फुट वाणी के रूप में प्राप्त है। इस वृन्दावन रस को समझने के लिये पाठकों को तीन बातों का जानना आवश्यक है- १. श्रीहित हरिवंश का इष्ट तत्व २. श्रीहित हरिवंश का उपासना भाव और ३. नित्य विहार का स्वरूप अतः अब हम इन तीनों का क्रमशः संक्षिप्त वर्णन करेंगे- श्रीहित हरिवंश का इष्ट तत्व- श्रुति ने जिसे-रसो वै सः रस रूप ब्रह्म कहा है वह रस ब्रह्म वृन्दावन विलासी श्रीकृष्ण है। ये श्रीकृष्ण समस्त श्रुति स्मृति पुराण एवं तन्त्रादिकों से प्रतिपादित सार-सारतत्व हैं किन्तु फिर उनसे अलक्षित भी हैं। उनके लीला

हित चौरासी • • २७ विहार स्वरूप को अचिन्त्य और अतर्क्य समझ कर ही इन्हें श्रुतियाँ 'नेति नेति' कह कर पुकारती हैं। इसी प्रकार- यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।

  • श्रुति अर्थात् "जिस तक वाणी नहीं पहुँच सकती और जो मन एवं इन्द्रियों से भी अप्राप्य है।" ऐसा कहकर श्रीकृष्ण के विहारी स्वरूप का ही संकेत किया गया है। यह विहारी श्रीकृष्ण रूप, रस, श्रृंगार, माधुर्य्य, अनुराग एवं भाव की परावधि है। किन्तु आश्चर्य की बात तो यह है कि ऐसा परात्पर तत्व, अव्यक्त ब्रह्म विहारी श्रीकृष्ण भी किसी अनिर्वचनीय दिव्या किशोरी मणि के श्रीचरणों में अपना शिखि पिच्छ विलुण्ठित करते देखा जाता है।¹ यह श्रीकृष्ण वन्दिता, आराधनीया श्रीराधा ही रसिकाचार्य्य श्रीहित हरिवंश चन्द्र की इष्ट आराध्या हैं। इनके तात्विक रूप का वर्णन करते हुए आपने बताया है- प्रेम्णः सन् मधुरोज्वलस्य हृदयं श्रृंगार लीला कला, वैचित्री परमावधिर्भगवतः पूज्यैव कापीशता। ईशानी च शची महा सुख तनुः शक्तिः स्वतन्त्रा परा, श्रीवृन्दावन नाथ पट्ट महिषी राधैव सेव्या मम।। श्रीराधा सुधानिधि, श्लो.-७८ अर्थात् "जो मधुर एवं उज्ज्वल प्रेम की प्राण स्वरूपा, शृङ्गार लीला कलाओं की विचित्रता पूर्ण परम अवधि भगवान् श्रीकृष्ण की भी आराधनीया और अनिर्वचनीय शासन कर्त्री हैं। जो ईश्वर रूप श्रीकृष्ण की शची तथा परम सुख मय वपु धारिणि परा एवं स्वतन्त्रा शक्ति हैं। श्रीवृन्दावन नाथ श्रीकृष्ण की पट्ट-महिषी श्रीराधा ही मेरी सेव्या-आराधनीया स्वामिनी हैं।" 1 रसघन मोहन मूर्त्ति विचित्र केलि महोत्सबोल्लासितम्। राधा चरण विलोडित रुचिर शिखण्डं हरिं वन्दे।। -श्रीराधा सुधा निधि, श्लोक २००

२८ • • हित चौरासी इन श्रीराधा ने श्रीकृष्ण को निरन्तर अपने वश में कर रखा है। श्रीकृष्ण सदा इनके प्रति चाटुकारी करते रहते हैं, प्रार्थना एवं स्तुति करते हैं और बार-बार उनके चरणों में लोट जाते हैं- केनापि नागर वरेण पदे निपत्य संप्रार्थितैक परिरम्भ रसोत्सवायाः। सभ्रूविभङ्गमतिरङ्गनिधेः ............... ।। श्रीराधा सु. ९ अर्थात् "हे राधिके ! कोई चतुर शिरोमणि किशोर आपके श्रीचरणों में बारम्बार गिरकर आपसे परिरम्भण सुखोत्सव की याचना कर रहे हों....।" और किंचैकं बहु मान भङ्गि रसवच्चाटूनि कुर्वत् परम्। अर्थात् "एक (श्रीकृष्ण) रस पूर्ण वचनों के द्वारा चाटुकारी परायण हैं और दूसरी (श्रीराधा) अत्यन्त मानभङ्गिमा युक्त।" इसी प्रकार कालिन्दी तट कुञ्ज मन्दिर गतो योगीन्द्र वद्यत्पद- ज्योतिर्ध्यान परः सदा जपति यां प्रेमाश्रु पूर्णो हरिः। श्रीराधा सुधा निधि ९५ अर्थात् "योगीन्द्रों के समान जिनकी चरण ज्योति के ध्यान परायण होकर प्रेमाश्रु पूर्ण नेत्र तथा गद्गद् वाणी से कालिन्दी तट के किसी निकुञ्ज मन्दिर में विराजमान् श्रीहरि भी स्वय जिस राधा नाम का जप करते हैं।" इतना ही नहीं श्रीकृष्ण तो सदैव श्रीराधा कृपा की वाञ्छा करते रहते हैं- नैंकु प्रसन्न दृष्टि पूरन करि नहिं मोतन चितयौ प्रमदा तैं। (जै श्री) हित हरिवंश हंस कल गामिनि भावै सो करहु प्रेम के नातैं।।

  • हित चौरासी, पद सं ७३ भाव यह है कि श्रीकृष्ण के हृदय में यह लालसा शेष ही रही आती है कि मेरी स्वामिनी ने कभी प्रसन्नता एवं कृपा पूर्ण दृष्टि से मेरी ओर नहीं देखा।

हित चौरासी • • २६ अस्तु, उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि श्रीहितहरिवंश चन्द्र की आराध्या श्रीराधा हैं जो कि श्रीकृष्ण आराध्या , परा एवं स्वतन्त्रा शक्ति ही नहीं वरन श्रीकृष्ण की भी शासन कर्त्री और प्रेम रस (की भी) हृदय रूपा हैं। पुराणों एवं श्रुतियों में राधा के जिस रूप का वर्णन है वह रसिकाचार्य्य श्रीहित हरिवंश को स्वीकार नहीं है क्योंकि वहाँ श्रीराधा का स्वरूप श्रीकृष्ण आराधिका (विशेष प्रेमी भक्ता) मात्र है। अतएव श्रुति अनुमोदित राधा के रूप के भाव को अस्वीकार (गौण) करके आपने श्रीराधा का रूप श्रुति शेखर, श्रुति हृदय और श्रुति अलक्षित ही अपने ग्रन्थों में यत्र तत्र बताया है देखिये- (१) अलक्ष्यं राधाख्यं निखिल निगमैरप्यात्तितरां रसाम्भोधेः सारं... अर्थात् "राधा नामक कोई रसाम्भोधि सार तत्व समस्त वेदों को भी अत्यन्त अलक्षित है।" (२) यद वृन्दावन मात्र गोचरमहो यन्नश्रुतीकं शिरो- प्यारोढुं क्षमते न यच्छिव शुकादीनां तु यद्ध्यानगम्।। अर्थात् "जो केवल श्रीवृन्दावन मात्र में दृष्टि गोचर होता है; जिसका वर्णन करने में श्रुति शिरोभाग उपनिषद् भी समर्थ नहीं हैं, जो शुक शिवादि के भी ध्यान में नहीं आता।" (३) श्रीराधा श्रुति मौलि शेखर लता नाम्नी मम प्रीयताम्। अर्थात् श्रीराधा नामक श्रुति मौलि शेखर लता मुझ पर प्रसन्न हों।" श्रीहिताचार्य्य पाद की राधा केवल वेदों से ही अलक्षित नहीं वरं वेद वादियों और वेद प्रतिपाद्य ब्रह्म से भी अलक्षित है- ब्रह्मेश्वरादि सुदुरूह पदारविन्द श्रीमत्पराग परमाद्भुत वैभवायाः। सर्वार्थसार रस वर्षि कृपार्द्र दृष्टेस्तरया नमोस्तुवृषभानु भुवोमहिम्ने।।

  • श्रीराधा सुधा निधि, श्लोक२ अर्थात् "जिनके चरण कमल ब्रह्मा शङ्कर आदि के लिये भी अत्यन्त सुदुरूह हैं,.......मैं उन्हीं श्रीवृषभानु नन्दिनी जू की महिमा को नमन करता हूँ।"

३० • • हित चौरासी और इसीलिये आपने समस्त आर्ष पौरुषेय ग्रन्थों एवं समस्त आचार्यों के मतों का खण्डन सा करते हुए श्रीराधा के प्रकृष्ट रूप का वर्णन किया है। देखिये- श्रीराधे श्रुतिभिर्बुधैर्भगवताप्यामृग्य सद्वैभवे स्वस्तोत्र स्वकृपात एव सहजोयोग्योप्यहं कारितः। पद्येनैव सदापराधिनि महन्मार्ग विरुद्ध्यत्वदे- काशेस्नेह जलाकुलाक्षि किमपि प्रीतिं प्रसादी कुरु।। –श्रीराधा सुधा निधि श्लोक २६९ अर्थात् "श्रीराधे ! आपका वैभव श्रुतियों, बुध जनों एवं स्वयं भगवान् के लिये भी अन्वेषणीय है किन्तु फिर भी आपकी कृपा के द्वारा आपका स्तोत्र पद्य रूप करने के लिये मैं सहज योग्य बना दिया गया अतएव हे स्नेह जल पूर्ण आकुल नयनि! सदापराधी एवं महत् मार्गों का भी विरोध करके एक मात्र तुम्हारी ही आशा रखने वाले मुझ पर अपनी अनिर्वचनीय कृपा प्रीति का प्रसाद कीजिये।" जिन शास्त्रों, श्रुतियों एवं आचार्यों द्वारा राधा का यह प्रकृष्ट रूप न देखा जाने से सामान्य किंवा लघु रूप से वर्णित कर दिया गया, उसके लिये आपने आश्चर्य एवं पश्चाताप भी प्रकट किया- यत्पादाम्बुरुहैक रेणु कणिकां मूर्ध्ना निधातुं न हि प्रापुर्ब्रह्म शिवादयोप्यधिकृतिं गोप्यैक भावाश्रयाः। सापि प्रेम सुधा रसाम्बुधि निधी राधापि साधारणी- भूता काल गति क्रमेण बलिना हे दैव तुभ्यं नमः।। श्रीराधासुधा निधि श्लोक ७२ अर्थात् "ओ दैव ! तुझे नमस्कार है। धन्य है तेरी महिमा !! जिससे प्रेरित होकर काल क्रम के प्रभाव वश प्रेमामृत-रस-समुद्र श्रीकृष्ण की भी निधि श्रीराधिका साधारण हो गयीं ! अहो ! जो गोपियों के भावों की एकमात्र आश्रय हैं, जिनके चरण-कमलों की रेणु के कण मात्र को ब्रह्मा शिव आदि भी अपने सिर पर धारण करने की इच्छा रखते हुए भी प्राप्त नहीं कर पाते।"

हित चौरासी • • ३१ ऐश्वर्य की दृष्टि से श्रीराधा श्रुतिशेखर लता श्रुति अलक्षित, ब्रह्मा शंकर नारदादि से अगम्य, श्रीकृष्ण वन्दिता हैं। माधुर्य्य दृष्टि से प्रेम रस की अधिष्ठात्री, श्रीकृष्ण को भी अपने रस दान से रसिक बनाने वाली और सौन्दर्य्य माधुर्य्य, लावण्य, कारुण्य सुख, छबि, रूप, वैदग्ध्य एवं रति केलि विलास की सार रूपा हैं। जिनका वसनाञ्चल वयार स्पर्श प्राप्त करके योगीन्द्र दुर्गम गति मधुसूदन भी कृतकृत्यता का अनुभव करते हैं। इनकी चरण रज में श्रीकृष्ण को भी वश में करने की विलक्षण शक्ति है। वैसे तो ये ब्रह्मेश्वरादि दुर्गम हैं तथापि कृपा परवश वृषभानु भवन में प्रकट भी हो जाती हैं तब इनकी चरण रज को गोपियाँ भी धारण करके अपने मनोभिलषित पदार्थ—रसिक शेखर श्रीकृष्ण को प्राप्त कर सकती हैं। ये राधा कन्दर्प कोटि शर मूर्च्छित नन्द नन्दन की जीवन दात्री संजीवनी हैं। अनन्त भाव भङ्गिमाओं की निधान एवं पूर्णानुराग सागर सार मूर्त्ति होने से इनके अङ्ग अङ्ग से रस के अमित समुद्र लहरियाँ लेते रहते हैं और लता निकुंज में विराजित कृपा रस पुंज की वृष्टि करती रहती हैं। कोक कलाओं में अतिशय प्रवीण होने से सदा ही सुरत रङ्गिणि बनी रहती हैं प्रियतम उदधि से सङ्गम करने की लालसा नित्य धावमान हैं इनमें। इन निकुंज अधीश्वरि के चरणों को हृदय में धारण करके श्रीकृष्ण अपने तीव्र स्मर ताप को शान्त करते हैं। यही चरण अपने आश्रित वर्ग के लिये सदा उज्ज्वलतम प्रेम का प्रवाह प्रवाहित करते रहते हैं, अतएव श्रीराधा आश्रितों की चिन्तामणि ब्रज नागरियों की चूडामणि, वृषभानु वंश की कुल मणि, सकामी श्याम की शान्ति मणि और हित हरिवंश की हृदय मणि हैं। अखिल सौन्दर्य्य राशि श्रीराधा जब अपने प्रियतम से बातों के रंग में ढलती हैं तो अरुण होठों से सौन्दर्य्य की अपार राशि निकल निकल कर चारों ओर फैल जाती है। ताम्बूल रंजित दंतावली, सिन्दूर अलंकृत मौक्तिक पंक्ति की शोभा को भी तिरस्कृत करने लगती है। जिनके संलाप में अनन्त अनंग तरंग मालाएँ क्षुभित हो उठतीं और अक्षर प्रत्यक्षर में अपार रस का समुद्र प्रसवित होने लगता है। ये अपनी माधुर्य्य स्निग्ध वाणी से निकुञ्ज भवन ही