महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2375)
कर्णद्वारा पृथ्वीमें धँसे हुए पहियेको उठानेका प्रयत्न
अध्याय (पृष्ठ 2376)
एकनवतितमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णका कर्णको चेतावनी देना और कर्णका वध
संजय उवाच
तमब्रवीद् वासुदेवो रथस्थो
राधेय दिष्ट्या स्मरसीह धर्मम् ।
प्रायेण नीचा व्यसनेषु मग्ना
निन्दन्ति दैवं कुकृतं न तु स्वम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! उस समय रथपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्णने कर्णसे कहा—'राधानन्दन! सौभाग्यकी बात है कि अब यहाँ तुम्हें धर्मकी याद आ रही है! प्रायः यह देखनेमें आता है कि नीच मनुष्य विपत्तिमें पड़नेपर दैवकी ही निन्दा करते हैं। अपने किये हुए कुकर्मोंकी नहीं ॥ १ ॥
यद् द्रौपदीमेकवस्त्रां सभाया-
मानाययेस्त्वं च सुयोधनश्च ।
दुःशासनः शकुनिः सौबलश्च
न ते कर्ण प्रत्यभात्तत्र धर्मः ॥ २ ॥
'कर्ण! जब तुमने तथा दुर्योधन, दुःशासन और सुबलपुत्र शकुनिने एक वस्त्र धारण करनेवाली रजस्वला द्रौपदीको सभामें बुलवाया था, उस समय तुम्हारे मनमें धर्मका विचार नहीं उठा था? ॥ २ ॥
यदा सभायां राजानमनक्षज्ञं युधिष्ठिरम् ।
अजैषीच्छकुनिर्ज्ञानात् क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ३ ॥
'जब कौरवसभामें जूएके खेलका ज्ञान न रखनेवाले राजा युधिष्ठिरको शकुनिने जान-बूझकर छलपूर्वक हराया था, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था? ॥ ३ ॥
वनवासे व्यतीते च कर्ण वर्षे त्रयोदशे ।
न प्रयच्छसि यद् राज्यं क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ४ ॥
'कर्ण! वनवासका तेरहवाँ वर्ष बीत जानेपर भी जब तुमने पाण्डवोंका राज्य उन्हें वापस नहीं दिया था, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था? ॥ ४ ॥
यद् भीमसेनं सर्पैश्च विषयुक्तैश्च भोजनैः ।
आचरत् त्वन्मते राजा क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ५ ॥
'जब राजा दुर्योधनने तुम्हारी ही सलाह लेकर भीमसेनको जहर मिलाया हुआ अन्न खिलाया और उन्हें सर्पोंसे डँसवाया, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ गया था? ।।
यद् वारणावते पार्थान् सुप्ताञ्जतुगृहे तदा ।
आदीपयस्त्वं राधेय क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ६ ॥
'राधानन्दन! उन दिनों वारणावतनगरमें लाक्षाभवनके भीतर सोये हुए कुन्तीकुमारोंको जब तुमने जलानेका प्रयत्न कराया था, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ गया था? ।। ६ ।।
यदा रजस्वलां कृष्णां दुःशासनवशे स्थिताम् ।
सभायां प्राहसः कर्ण क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ७ ॥
'कर्ण! भरी सभामें दुःशासनके वशमें पड़ी हुई रजस्वला द्रौपदीको लक्ष्य करके जब तुमने उपहास किया था, तब तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था? ।। ७ ।।
यदनायैः पुरा कृष्णां क्लिश्यमानामनागसम् ।
उपप्रेक्षसि राधेय क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ८ ॥
'राधानन्दन! पहले नीच कौरवोंद्वारा क्लेश पाती हुई निरपराध द्रौपदीको जब तुम निकटसे देख रहे थे, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ गया था? ।। ८ ।।
विनष्टाः पाण्डवाः कृष्णे शाश्वतं नरकं गताः ।
पतिमन्यं वृणीष्वेति वदंस्त्वं गजगामिनीम् ॥ ९ ॥
उपप्रेक्षसि राधेय क्व ते धर्मस्तदा गतः ।
'(याद है न, तुमने द्रौपदीसे कहा था) 'कृष्णे! पाण्डव नष्ट हो गये, सदाके लिये नरकमें पड़ गये। अब तू किसी दूसरे पतिका वरण कर ले। जब तुम ऐसी बात कहते हुए गजगामिनी द्रौपदीको निकटसे आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे थे, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था? ।। ९ १/२ ।।
राज्यलुब्धः पुनः कर्ण समाव्यथसि पाण्डवान् ।
यदा शकुनिमाश्रित्य क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ १० ॥
'कर्ण! फिर राज्यके लोभमें पड़कर तुमने शकुनिकी सलाहके अनुसार जब पाण्डवोंको दोबारा जूएके लिये बुलवाया, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था? ।।
यदाभिमन्युं बहवो युद्धे जघ्नुर्महारथाः ।
परिवार्य रणे बालं क्व ते धर्मस्तदा गतः ॥ ११ ॥
'जब युद्धमें तुम बहुत-से महारथियोंने मिलकर बालक अभिमन्युको चारों ओरसे घेरकर मार डाला था, उस समय तुम्हारा धर्म कहाँ चला गया था? ।। ११ ।।
यद्येष धर्मस्तत्र न विद्यते हि
किं सर्वथा तालुविशोषणेन ।
अद्येह धर्म्याणि विधत्स्व सूत
तथापि जीवन्न विमोक्ष्यसे हि ॥ १२ ॥
'यदि उन अवसरोंपर यह धर्म नहीं था तो आज भी यहाँ सर्वथा धर्मकी दुहाई देकर तालु सुखानेसे क्या लाभ? सूत! अब यहाँ धर्मके कितने ही कार्य क्यों न कर डालो, तथापि जीते-जी तुम्हारा छुटकारा नहीं हो सकता ॥ १२ ॥ नलो ह्यक्षैर्निर्जितः पुष्करेण पुनर्यशो राज्यमवाप वीर्यात् । प्राप्तास्तथा पाण्डवा बाहुवीर्यात् सर्वैः समेताः परिवृत्तलोभाः ॥ १३ ॥ निहत्य शत्रून् समरे प्रवृद्धान् ससोमका राज्यमवाप्नुयुस्ते । तथा गता धार्तराष्ट्रा विनाशं धर्माभिगुप्तैः सततं नृसिंहैः ॥ १४ ॥ 'पुष्करने राजा नलको जूएमें जीत लिया था; किंतु उन्होंने अपने ही पराक्रमसे पुनः अपने राज्य और यश दोनोंको प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार लोभशून्य पाण्डव भी अपनी भुजाओंके बलसे सम्पूर्ण सगे-सम्बन्धियोंके साथ रहकर समरांगणमें बढ़े-चढ़े शत्रुओंका संहार करके फिर अपना राज्य प्राप्त करेंगे। निश्चय ही ये सोमकोंके साथ अपने राज्यपर अधिकार कर लेंगे। पुरुषसिंह पाण्डव सदैव अपने धर्मसे सुरक्षित हैं; अतः इनके द्वारा अवश्य धृतराष्ट्रके पुत्रोंका नाश हो जायगा' ॥ १३-१४ ॥
संजय उवाच
एवमुक्तस्तदा कर्णो वासुदेवेन भारत । लज्जयावनतो भूत्वा नोत्तरं किञ्चिदुक्तवान् ॥ १५ ॥ **संजय कहते हैं—**भारत! उस समय भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर कर्णने लज्जासे अपना सिर झुका लिया, उससे कुछ भी उत्तर देते नहीं बना ॥ १५ ॥ क्रोधात् प्रस्फुरमाणौष्ठो धनुरुद्यम्य भारत । योधयामास वै पार्थं महावेगपराक्रमः ॥ १६ ॥ भरतनन्दन! वह महान् वेग और पराक्रमसे सम्पन्न हो क्रोधसे ओठ फड़फड़ाता हुआ धनुष उठाकर अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा ॥ १६ ॥ ततोऽब्रवीद् वासुदेवः फाल्गुनं पुरुषर्षभम् । दिव्यास्त्रेणैव निर्भिद्य पातयस्व महाबल ॥ १७ ॥ तब वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने पुरुषप्रवर अर्जुनसे इस प्रकार कहा—'महाबली वीर! तुम कर्णको दिव्यास्त्रसे ही घायल करके मार गिराओ' ॥ १७ ॥ एवमुक्तस्तु देवेन क्रोधमागात्तदार्जुनः । मन्युमभ्याविशद् घोरं स्मृत्वा तत्तु धनंजयः ॥ १८ ॥
भगवान्के ऐसा कहनेपर अर्जुन उस समय कर्णके प्रति अत्यन्त कुपित हो उठे। उसकी पिछली करतूतोंको याद करके उनके मनमें भयानक रोष जाग उठा ।। १८ ।। तस्य क्रुद्धस्य सर्वेभ्यः स्रोतोभ्यस्तेजसोऽर्चिषः । प्रादुरासंस्तदा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १९ ॥ कुपित होनेपर उनके सभी छिद्रोंसे—रोम-रोमसे आगकी चिनगारियाँ छूटने लगीं। राजन्! उस समय वह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ १९ ॥ तत् समीक्ष्य ततः कर्णो ब्रह्मास्त्रेण धनंजयम् । अभ्यवर्षत् पुनर्यत्नमकरोद् रथसर्जने ॥ २० ॥ यह देख कर्णने अर्जुनपर ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके बाणोंकी झड़ी लगा दी और पुनः रथको उठानेका प्रयत्न किया ॥ २० ॥ ब्रह्मास्त्रेणैव तं पार्थो ववर्ष शरवृष्टिभिः । तदस्त्रमस्त्रेणावार्य प्रजहार च पाण्डवः ॥ २१ ॥ तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने भी ब्रह्मास्त्रसे ही उसके अस्त्रको दबाकर उसके ऊपर बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी और उसे अच्छी तरह घायल किया ॥ २१ ॥ ततोऽन्यदस्त्रं कौन्तेयो दयितं जातवेदसः । मुमोच कर्णमुद्दिश्य तत् प्रजज्वाल तेजसा ॥ २२ ॥ तदनन्तर कुन्तीकुमारने कर्णको लक्ष्य करके दूसरे दिव्यास्त्रका प्रयोग किया जो जातवेदा अग्निका प्रिय अस्त्र था। वह आग्नेयास्त्र अपने तेजसे प्रज्वलित हो उठा ॥ २२ ॥ वारुणेन ततः कर्णः शमयामास पावकम् । जीमूतैश्च दिशः सर्वाश्चक्रे तिमिरदुर्दिनाः ॥ २३ ॥ परंतु कर्णने वारुणास्त्रका प्रयोग करके उस अग्निको बुझा दिया। साथ ही सम्पूर्ण दिशाओंमें मेघोंकी घटा घिर आयी और सब ओर अन्धकार छा गया ॥ २३ ॥ पाण्डवेयस्त्वसम्भ्रान्तो वायव्यास्त्रेण वीर्यवान् । अपोवाह तदाभ्राणि राधेयस्य प्रपश्यतः ॥ २४ ॥ पराक्रमी अर्जुन इससे विचलित नहीं हुए। उन्होंने राधापुत्र कर्णके देखते-देखते वायव्यास्त्रसे उन बादलोंको उड़ा दिया ॥ २४ ॥ ततः शरं महाघोरं ज्वलन्तमिव पावकम् । आददे पाण्डुपुत्रस्य सूतपुत्रो जिघांसया ॥ २५ ॥ तब सूतपुत्रने पाण्डुकुमार अर्जुनका वध करनेके लिये जलती हुई आगके समान एक महाभयंकर बाण हाथमें लिया ॥ २५ ॥ योज्यमाने ततस्तस्मिन् बाणे धनुषि पूजिते । चचाल पृथिवी राजन् सशैलवनकानना ॥ २६ ॥
राजन्! उस उत्तम बाणको धनुषपर चढ़ाते ही पर्वत, वन और काननोंसहित सारी पृथ्वी डगमगाने लगी ॥ २६ ॥ ववौ सशर्करो वायुर्दिशश्च रजसा वृताः । हाहाकारश्च संजज्ञे सुराणां दिवि भारत ॥ २७ ॥ भारत! कंकड़ोंकी वर्षा करती हुई प्रचण्ड वायु चलने लगी। सम्पूर्ण दिशाओंमें धूल छा गयी और स्वर्गके देवताओंमें भी हाहाकार मच गया ॥ २७ ॥ तमिषुं संधितं दृष्ट्वा सूतपुत्रेण मारिष । विषादं परमं जग्मुः पाण्डवा दीनचेतसः ॥ २८ ॥ माननीय नरेश! जब सूतपुत्रने उस बाणका संधान किया, उस समय उसे देखकर समस्त पाण्डव दीनचित्त हो बड़े भारी विषादमें डूब गये ॥ २८ ॥ स सायकः कर्णभुजप्रमुक्तः शक्राशनिप्रख्यर्रुचिः शिताग्रः ॥ २९ ॥ भुजान्तरं प्राप्य धनंजयस्य विवेश वल्मीकमिवोरगोत्तमः । कर्णके हाथसे छूटा हुआ वह बाण इन्द्रके वज्रके समान प्रकाशित हो रहा था। उसका अग्रभाग बहुत तेज था। वह अर्जुनकी छातीमें जा लगा और जैसे उत्तम सर्प बाँबीमें घुस जाता है, उसी प्रकार वह उनके वक्षःस्थलमें समा गया ॥ स गाढविद्धः समरे महात्मा विघूर्णमानः श्लथहस्तगाण्डिवः ॥ ३० ॥ चचाल बीभत्सुरमित्रमर्दनः क्षितेः प्रकम्पे च यथाचलोत्तमः । समरांगणमें उस बाणकी गहरी चोट खाकर महात्मा अर्जुनको चक्कर आ गया। गाण्डीव धनुषपर रखा हुआ उनका हाथ ढीला पड़ गया और वे शत्रुमर्दन अर्जुन भूकम्पके समय हिलते हुए श्रेष्ठ पर्वतके समान काँपने लगे ॥ ३० ½ ॥ तदन्तरं प्राप्य वृषो महारथो रथाङ्गमुर्वीगतमुज्जिहीर्षुः ॥ ३१ ॥ रथादवप्लुत्य निगृह्य दोर्भ्यां शशाक दैवान्न महाबलोऽपि । इसी बीचमें मौका पाकर महारथी कर्णने धरतीमें धँसे हुए पहियेको निकालनेका विचार किया। वह रथसे कूद पड़ा और दोनों हाथोंसे पकड़कर उसे ऊपर उठानेकी कोशिश करने लगा; परंतु महाबलवान् होनेपर भी वह दैववश अपने प्रयासमें सफल न हो सका ॥ ३१ ½ ॥ ततः किरीटी प्रतिलभ्य संज्ञां
जग्राह बाणं यमदण्डकल्पम् ॥ ३२ ॥
ततोऽर्जुनः प्राञ्जलिकं महात्मा
ततोऽब्रवीद् वासुदेवोऽपि पार्थम् ।
छिन्ध्यस्य मूर्धानमरेः शरेण
न यावदारोहति वै रथं वृषः ॥ ३३ ॥
इसी समय होशमें आकर किरीटधारी महात्मा अर्जुनने यमदण्डके समान भयंकर आंजलिक नामक बाण हाथमें लिया। यह देख भगवान् श्रीकृष्णने भी अर्जुनसे कहा—'पार्थ! कर्ण जबतक रथपर नहीं चढ़ जाता तबतक ही अपने बाणके द्वारा इस शत्रु का मस्तक काट डालो' ॥
तथैव सम्पूज्य स तद् वचः प्रभो-
स्ततः शरं प्रज्वलितं प्रगृह्य ।
जघान कक्षाममलार्कवर्णां
महारथे रथचक्रे विमग्ने ॥ ३४ ॥
तब 'बहुत अच्छा' कहकर अर्जुनने भगवान्की उस आज्ञाको सादर शिरोधार्य किया और उस प्रज्वलित बाणको हाथमें लेकर जिसका पहिया फँसा हुआ था, कर्णके उस विशाल रथपर फहराती हुई सूर्यके समान प्रकाशमान ध्वजापर प्रहार किया ॥ ३४ ॥
तं हस्तिकक्षाप्रवरं च केतुं
सुवर्णमुक्तामणिवज्रपृष्ठम् ।
ज्ञानप्रकर्षोत्तमशिल्पियुक्तैः
कृतं सुरूपं तपनीयचित्रम् ॥ ३५ ॥
हाथीकी साँकलके चिह्नसे युक्त उस श्रेष्ठ ध्वजाके पृष्ठभागमें सुवर्ण, मुक्ता, मणि और हीरे जड़े हुए थे। अत्यन्त ज्ञानवान् एवं उत्तम शिल्पियोंने मिलकर उस सुवर्णजटित सुन्दर ध्वजाका निर्माण किया था ॥ ३५ ॥
जयास्पदं तव सैन्यस्य नित्य-
ममित्रवित्रासनमीड्यरूपम् ।
विख्यातमादित्यसमं स्म लोके
त्विषा समं पावकभानुचन्द्रैः ॥ ३६ ॥
वह विश्वविख्यात ध्वजा आपकी सेनाकी विजयका आधार स्तम्भ होकर सदा शत्रुओंको भयभीत करती रहती थी। उसका स्वरूप प्रशंसाके ही योग्य था। वह अपनी प्रभासे सूर्य, चन्द्रमा और अग्निकी समानता करती थी ॥ ३६ ॥
ततः क्षुरप्रेण सुसंशितेन
सुवर्णपुङ्खेन हुताग्निवर्चसा ।
श्रिया ज्वलन्तं ध्वजमुन्ममाथ
महारथस्याधिरथेः किरीटी ॥ ३७ ॥ किरीटधारी अर्जुनने सोनेके पंखवाले और आहुतिसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान तेजस्वी उस तीखे क्षुरप्रसे महारथी कर्णके उस ध्वजको नष्ट कर दिया, जो अपनी प्रभासे निरन्तर देदीप्यमान होता रहता था ॥ ३७ ॥
यशश्च दर्पश्च तथा प्रियाणि सर्वाणि कार्याणि च तेन केतुना । साकं कुरूणां हृदयानि चापतन् बभूव हाहेति च निःस्वनो महान् ॥ ३८ ॥ कटकर गिरते हुए उस ध्वजके साथ ही कौरवोंके यश, अभिमान, समस्त प्रिय कार्य तथा हृदयका भी पतन हो गया और चारों ओर महान् हाहाकार मच गया ॥ ३८ ॥
दृष्ट्वा ध्वजं पतितमाशुकारिणा कुरुप्रवीरेण निकृत्तमाहवे । नाशांसिरे सूतपुत्रस्य सर्वे जयं तदा भारत ये त्वदीयाः ॥ ३९ ॥ भारत! शीघ्रकारी कौरव वीर अर्जुनके द्वारा युद्धस्थलमें उस ध्वजको काटकर गिराया हुआ देख उस समय आपके सभी सैनिकोंने सूतपुत्रकी विजयकी आशा त्याग दी ॥ ३९ ॥
अथ त्वरन् कर्णवधाय पार्थो महेन्द्रवज्रानलदण्डसंनिभम् । आदत्त चाथाञ्जलिकं निषङ्गात् सहस्ररश्मेरिव रश्मिमुत्तमम् ॥ ४० ॥ तदनन्तर कर्णके वधके लिये शीघ्रता करते हुए अर्जुनने अपने तरकससे एक अंजलिक नामक बाण निकाला, जो इन्द्रके वज्र और अग्निके दण्डके समान भयंकर तथा सूर्यकी एक उत्तम किरणके समान कान्तिमान् था ॥ ४० ॥
मर्मच्छिदं शोणितमांसदिग्धं वैश्वानरार्कप्रतिमं महार्हम् । नराश्वनागासुहरं त्र्यरत्निं षड्वाजमज्जोगतिमुग्रवेगम् ॥ ४१ ॥ सहस्रनेत्राशनितुल्यवीर्यं कालानलं व्यात्तमिवातिघोरम् । पिनाकनारायणचक्रसंनिभं भयङ्करं प्राणभृतां विनाशनम् ॥ ४२ ॥ वह शत्रुके मर्मस्थलको छेदनेमें समर्थ, रक्त और मांससे लिप्त होनेवाला, अग्नि तथा सूर्यके तुल्य तेजस्वी, बहुमूल्य, मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंके प्राण लेनेवाला, मूठी बाँधे हुए
हाथसे तीन हाथ बड़ा, छः पंखोंसे युक्त, शीघ्रगामी, भयंकर वेगशाली, इन्द्रके वज्रके तुल्य पराक्रम प्रकट करनेवाला, मुँह बाये हुए कालाग्निके समान अत्यन्त भयानक, भगवान् शिवके पिनाक और नारायणके चक्र-सदृश भयदायक तथा प्राणियोंका विनाश करनेवाला था ।।
जग्राह पार्थः स शरं प्रहृष्टो यो देवसङ्घैरपि दुर्নিবার्यः । सम्पूजितो यः सततं महात्मा देवासुरान् यो विजयेन्महेषुः ॥ ४३ ॥ देवताओंके समुदाय भी जिनकी गतिको अनायास नहीं रोक सकते, जो सदा सबके द्वारा सम्मानित, महामनस्वी, विशाल बाण धारण करनेवाले और देवताओं तथा असुरोंपर भी विजय पानेमें समर्थ हैं उन कुन्तीकुमार अर्जुनने अत्यन्त प्रसन्न होकर उस बाणको हाथमें लिया ।। ४३ ।।
तं वै प्रमृष्टं प्रसमीक्ष्य युद्धे चचाल सर्वं सचराचरं जगत् । स्वस्ति जगत् स्यादृषयः प्रचुक्रुशु- स्तमुद्यतं प्रेक्ष्य महाहवेषुम् ॥ ४४ ॥ महायुद्धमें उस बाणको हाथमें लिया और ऊपर उठाया गया देख समस्त चराचर जगत् काँप उठा। ऋषिलोग जोर-जोरसे पुकार उठे कि 'जगत्का कल्याण हो!' ॥ ४४ ॥
ततस्तु तं वै शरमप्रमेयं गाण्डीवधन्वा धनुषि व्ययोजयत् । युक्त्वा महास्त्रेण परेण चापं विकृष्य गाण्डीवमुवाच सत्वरम् ॥ ४५ ॥ तत्पश्चात् गाण्डीवधारी अर्जुनने उस अप्रमेय शक्तिशाली बाणको धनुषपर रखा और उसे उत्तम एवं महान् दिव्यास्त्रसे अभिमन्त्रित करके तुरंत ही गाण्डीवको खींचते हुए कहा — ॥ ४५ ॥
अयं महास्त्रप्रहितो महाशरः शरीरहृच्चासुहरश्च दुर्हृदः । तपोऽस्ति तप्तं गुरवश्च तोषिता मया यदीष्टं सुहृदां श्रुतं तथा ॥ ४६ ॥ अनेन सत्येन निहन्त्वयं शरः सुसंहितः कर्णमरिं ममोजितम् । इत्यूचिवांस्तं प्रमुमोच बाणं धनंजयः कर्णवधाय घोरम् ॥ ४७ ॥
'यह महान् दिव्यास्त्रसे प्रेरित महाबाण शत्रुके शरीर, हृदय और प्राणोंका विनाश करनेवाला है। यदि मैंने तप किया हो, गुरुजनोंको सेवाद्वारा संतुष्ट रखा हो, यज्ञ किया हो और हितैषी मित्रोंकी बातें ध्यान देकर सुनी हो तो इस सत्यके प्रभावसे यह अच्छी तरह संधान किया हुआ बाण मेरे शक्तिशाली शत्रु कर्णका नाश कर डाले, ऐसा कहकर धनंजयने उस घोर बाणको कर्णके वधके लिये छोड़ दिया ।।
कृत्यामथर्वाङ्गिरसीमिवोग्रां
दीप्तामसह्यां युधि मृत्युनापि ।
ब्रुवन् किरीटी तमतिप्रहृष्टो
ह्ययं शरो मे विजयावहोऽस्तु ।। ४८ ।।
जिघांसुरर्केन्दुसमप्रभावः
कर्णं मयास्तो नयतां यमाय ।
जैसे अथर्वांगिरस मन्त्रोंद्वारा आभिचारिक प्रयोग करके उत्पन्न की हुई कृत्या उग्र, प्रज्वलित और युद्धमें मृत्युके लिये भी असह्य होती है, उसी प्रकार वह बाण भी था। किरीटधारी अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न होकर उस बाणको लक्ष्य करके बोले—'मेरा यह बाण मुझे विजय दिलानेवाला हो। इसका प्रभाव चन्द्रमा और सूर्यके समान है। मेरा छोड़ा हुआ यह घातक अस्त्र कर्णको यमलोक पहुँचा दे' ।।
तेनेषुवर्येण किरीटमाली
प्रहृष्टरूपो विजयावहेन ।। ४९ ।।
जिघांसुरर्केन्दुसमप्रभेण
चक्रे विषक्तं रिपुमाततायी ।
किरीटधारी अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हो अपने शत्रुको मारनेकी इच्छासे आततायी बन गये थे। उन्होंने चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले उस विजयदायक श्रेष्ठ बाणसे अपने शत्रुको बींध डाला ।।
तथा विमुक्तो बलिनार्कतेजाः
प्रज्वालयामास दिशो नभश्च ।
ततोऽर्जुनस्तस्य शिरो जहार
वृत्रस्य वज्रेण यथा महेन्द्रः ।। ५० ।।
बलवान् अर्जुनके द्वारा इस प्रकार छोड़ा हुआ वह सूर्यके तुल्य तेजस्वी बाण आकाश एवं दिशाओंको प्रकाशित करने लगा। जैसे इन्द्रने अपने वज्रसे वृत्रासुरका मस्तक काट लिया था, उसी प्रकार अर्जुनने उस बाणद्वारा कर्णका सिर धड़से अलग कर दिया ।। ५० ।।
शरोत्तमेनाञ्जलिकेन राजं-
स्तदा महास्त्रप्रतिमन्त्रितेन ।
पार्थोऽपराह्ले शिर उच्चकर्त
वैकर्तनस्याथ महेन्द्रसूनुः ॥ ५१ ॥
राजन्! महान् दिव्यास्त्रसे अभिमन्त्रित अंजलिक नामक उत्तम बाणके द्वारा इन्द्रपुत्र
कुन्तीकुमार अर्जुनने अपराह्नकालमें वैकर्तन कर्णका सिर काट लिया ॥ ५१ ॥
तत् प्रापतच्चाञ्जलिकेन छिन्न-
मथास्य कायो निपपात पश्चात् ।
तदुद्यतादित्यसमानतेजसं
शरन्नभोमध्यगभास्करोपमम् ॥ ५२ ॥
वराङ्गमूर्व्यामपतच्चमूमुखे
दिवाकरोऽस्तादिव रक्तमण्डलः ।
अंजलिकसे कटा हुआ कर्णका वह मस्तक पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके बाद उसका
शरीर भी धराशायी हो गया। जैसे लाल मण्डलवाला सूर्य अस्ताचलसे नीचे गिरता है, उसी
प्रकार उदित सूर्यके समान तेजस्वी तथा शरत्कालीन आकाशके मध्यभागमें तपनेवाले
भास्करके समान दुःसह वह मस्तक सेनाके अग्रभागमें पृथ्वीपर जा गिरा ॥ ५२ १/२ ॥
ततोऽस्य देहं सततं सुखोचितं
सुरूपमत्यर्थमुदारकर्मणः ॥ ५३ ॥
परेण कृच्छ्रेण शिरः समत्यजद्
गृहं महर्धीव सुसङ्गमीश्वरः ।
तदनन्तर सदा सुख भोगनेके योग्य, उदारकर्मा कर्णके उस अत्यन्त सुन्दर शरीरको
उसके मस्तकने बड़ी कठिनाईसे छोड़ा। ठीक उसी तरह, जैसे धनवान् पुरुष अपने
समृद्धिशाली घरको और मन एवं इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाला पुरुष सत्संगको बड़े कष्टसे
छोड़ पाता है ॥ ५३ १/२ ॥
शरैर्विभिन्नं व्यसु तत् सुवर्चसः
पपात कर्णस्य शरीरमुच्छ्रितम् ॥ ५४ ॥
स्रवद्व्रणं गैरिकतोयविस्रवं
गिरेर्यथा वज्रहतं महाशिरः ।
देहाच्च कर्णस्य निपातितस्य
तेजः सूर्य खं वितत्याविवेश ॥ ५५ ॥
तेजस्वी कर्णका वह ऊँचा शरीर बाणोंसे क्षत-विक्षत हो घावोंसे खूनकी धारा बहाता
हुआ प्राणशून्य होकर गिर पड़ा, मानो वज्रके आघातसे भग्न हुआ किसी पर्वतका विशाल
शिखर गेरुमिश्रित जलकी धारा बहा रहा हो। धरतीपर गिराये गये कर्णके शरीरसे एक तेज
निकलकर आकाशमें फैल गया और ऊपर जाकर सूर्यमण्डलमें विलीन हो गया ॥
तदद्भुतं सर्वमनुष्ययोधाः
संदृष्टवन्तो निहते स्म कर्णे ।
ततः शङ्खान् पाण्डवा दध्मुुरुच्चै- र्दृष्ट्वा कर्णं पतितं फाल्गुनेन ।। ५६ ।। इस अद्भुत दृश्यको वहाँ खड़े हुए सब लोगोंने अपनी आँखों देखा था। कर्णके मारे जानेपर उसे अर्जुनद्वारा गिराया हुआ देख पाण्डवोंने उच्च स्वरसे शंख बजाया ।। ५६ ।।
तथैव कृष्णश्च धनंजयश्च हृष्टौ यमौ दध्मतुर्वारिजातौ । तं सोमकाः प्रेक्ष्य हतं शयानं सैन्यैः सार्धं सिंहनादान् प्रचक्रुः ।। ५७ ।। इसी प्रकार श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा हर्षमें भरे हुए नकुल-सहदेवने भी शंख बजाये। सोमकगण कर्णको मरकर गिरा हुआ देख अपनी सेनाओंके साथ सिंहनाद करने लगे ।।
तूर्याणि संजघ्नुरतीव हृष्टा वासांसि चैवादुधुवुर्भुजांश्च । संवर्धयन्तश्च नरेन्द्र योधाः पार्थं समाजग्मुरतीव हृष्टाः ।। ५८ ।। वे बड़े हर्षमें भरकर बाजे-बजाने और कपड़े तथा हाथ हिलाने लगे। नरेन्द्र! अत्यन्त हर्षमें भरे हुए पाण्डव योद्धा अर्जुनको बधाई देते हुए उनके पास आकर मिले ।।
बलान्विताश्चापरे ह्याप्यनृत्य- न्नन्योन्यमाश्लिष्य नदन्त ऊचुः । दृष्ट्वा तु कर्णं भुवि वा विपन्नं कृत्तं रथात् सायकैरर्जुनस्य ।। ५९ ।। अर्जुनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न एवं प्राणशून्य हुए कर्णको रथसे नीचे पृथ्वीपर गिरा देख दूसरे बलवान् सैनिक एक-दूसरेको गलेसे लगाकर नाचते और गर्जते हुए बातें करते थे ।।
महानिलेनाद्रिमिवापविद्धं यज्ञावसानेऽग्निमिव प्रशान्तम् । रराज कर्णस्य शिरो निकृत्त- मस्तं गतं भास्करस्येव बिम्बम् ।। ६० ।।
अध्याय (पृष्ठ 2387)
कर्णवध
कर्णका वह कटा हुआ मस्तक वायुके वेगसे टूटकर गिरे हुए पर्वतखण्डके समान, यज्ञके अन्तमें बुझी हुई अग्निके सदृश तथा अस्ताचलपर पहुँचे हुए सूर्यके बिम्बकी भाँति सुशोभित हो रहा था ॥ ६० ॥
शरैराचितसर्वाङ्गः शोणितौघपरिप्लुतः ।
विभाति देहः कर्णस्य स्वरश्मिभिरिवांशुमान् ॥ ६१ ॥
सभी अंगोंमें बाणोंसे व्याप्त और खूनसे लथपथ हुआ कर्णका शरीर अपनी किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले अंशुमाली सूर्यके समान शोभा पा रहा था ॥ ६१ ॥
प्रताप्य सेनामामित्रीं दीप्तैः शरगभस्तिभिः ।
बलिनाऽर्जुनकालेन नीतोऽस्तं कर्णभास्करः ॥ ६२ ॥
अस्तं गच्छन् यथादित्यः प्रभामादाय गच्छति ।
तथा जीवितमादाय कर्णस्येषुर्जगाम सः ॥ ६३ ॥
बाणमयी उद्दीप्त किरणोंसे शत्रु की सेनाको तपाकर कर्णरूपी सूर्य बलवान् अर्जुनरूपी कालसे प्रेरित हो अस्ताचलको जा पहुँचा। जैसे अस्ताचलको जाता हुआ सूर्य अपनी प्रभाको लेकर चला जाता है, उसी प्रकार वह बाण कर्णके प्राण लेकर चला गया ॥ ६३ ॥
अपराह्णेऽपराह्लोऽस्य सूतपुत्रस्य मारिष ।
छिन्नमञ्जलिकेनाजौ सोत्सेधमपतच्छिरः ॥ ६४ ॥
माननीय नरेश! दान देते समय जो दूसरे दिनके लिये वादा नहीं करता था, उस सूतपुत्र कर्णका अंजलिक नामक बाणसे कटा हुआ देहसहित मस्तक अपराह्नकालमें धराशायी हो गया ॥ ६४ ॥
उपर्युपरि सैन्यानामस्य शत्रोस्तदौजसा ।
शिरः कर्णस्य सोत्सेधमिषुः सोऽप्यहरद् द्रुतम् ॥ ६५ ॥
उस बाणने सारी सेनाके ऊपर-ऊपर जाकर अर्जुनके शत्रुभूत कर्णके शरीरसहित मस्तकको वेगपूर्वक अनायास ही काट डाला था ॥ ६५ ॥
कर्णं तु शूरं पतितं पृथिव्यां
शराचितं शोणितदिग्धगात्रम् ।
दृष्ट्वा शयानं भुवि मद्रराज-
श्छिन्नध्वजेनाथ ययौ रथेन ॥ ६६ ॥
शूरवीर कर्णको बाणसे व्याप्त और खूनसे लथपथ होकर पृथ्वीपर पड़ा हुआ देख मद्रराज शल्य उस कटी हुई ध्वजावाले रथके द्वारा ही वहाँसे भाग खड़े हुए ॥ ६६ ॥
हते कर्णे कुरवः प्राद्रवन्त
भयार्दिता गाढविद्धाश्च संख्ये ।
अवेक्षमाणा मुहुरर्जुनस्य
ध्वजं महान्तं वपुषा ज्वलन्तम् ॥ ६७ ॥
कर्णके मारे जानेपर युद्धमें अत्यन्त घायल हुए कौरवसैनिक अर्जुनके प्रज्वलित होते हुए महान् ध्वजको बारंबार देखते हुए भयसे पीड़ित हो भागने लगे ॥ ६७ ॥
सहस्रनेत्रप्रतिमानकर्मणः
सहस्रपत्रप्रतिमाननं शुभम् ।
सहस्ररश्मिर्दिनसंक्षये यथा
तथापतत् कर्णशिरो वसुंधराम् ॥ ६८ ॥
सहस्रनेत्रधारी इन्द्रके समान पराक्रमी कर्णका सहस्रदल कमलके समान वह सुन्दर मस्तक उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़ा, जैसे सायंकालमें सहस्र किरणोंवाले सूर्यका मण्डल अस्त हो जाता है ॥ ६८ ॥
(व्यूढोरस्कं कमलनयनं तप्तहेमावभासं
कर्णं दृष्ट्वा भुवि निपतितं पार्थबाणाभितप्तम् ।
पांशुग्रस्तं मलिनमसकृत् पुत्रमन्वीक्षमाणो
मन्दं मन्दं व्रजति सविता मन्दिरं मन्दरश्मिः ॥)
जिसकी छाती चौड़ी और नेत्र कमलके समान सुन्दर थे तथा कान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान जान पड़ती थी, वह कर्ण अर्जुनके बाणोंसे संतप्त हो धरतीपर पड़ा, धूलमें सना मलिन हो गया था। अपने उस पुत्रकी ओर बारंबार देखते हुए मन्द किरणोंवाले सूर्यदेव धीरे-धीरे अपने मन्दिर (अस्ताचल)-की ओर जा रहे थे।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णवधे एकनवतितमोऽध्यायः ॥ ९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णवधविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ६९ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 2390)
द्विनवतितमोऽध्यायः
कौरवोंका शोक, भीम आदि पाण्डवोंका हर्ष, कौरव-सेनाका पलायन और दुःखित शल्यका दुर्योधनको सान्त्वना देना
संजय उवाच
शल्यस्तु कर्णार्जुनयोर्विमर्दे
बलानि दृष्ट्वा मृदितानि बाणैः।
ययौ हते चाधिरथौ पदानुगे
रथेन संछिन्नपरिच्छदेन ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! कर्ण और अर्जुनके संग्राममें बाणोंद्वारा सारी सेनाएँ रौंद डाली गयी थीं और अधिरथपुत्र कर्ण पैदल होकर मारा गया था। यह सब देखकर राजा शल्य, जिसका आवरण एवं अन्य सारी सामग्री नष्ट कर दी गयी थी, उस रथके द्वारा वहाँसे चल दिये ॥ १ ॥
निपातितस्यन्दनवाजिनागं
बलं च दृष्ट्वा हतसूतपुत्रम्।
दुर्योधनोऽश्रुप्रतिपूर्णनेत्रो
दीनो मुहुर्निःश्वसंश्चार्तरूपः ॥ २ ॥
कौरव-सेनाके रथ, घोड़े और हाथी मार डाले गये थे। सूतपुत्रका भी वध कर दिया गया था। उस अवस्थामें उस सेनाको देखकर दुर्योधनकी आँखोंमें आँसू भर आये और वह बारंबार लंबी साँस खींचता हुआ दीन एवं दुःखी हो गया ॥ २ ॥
कर्णं तु शूरं पतितं पृथिव्यां
शराचितं शोणितदिग्धगात्रम्।
यदृच्छया सूर्यमिवावनिस्थं
दिदृक्षवः सम्परिवार्य तस्थुः ॥ ३ ॥
शूरवीर कर्ण पृथ्वीपर पड़ा हुआ था। उसके शरीरमें बहुत-से बाण व्याप्त हो रहे थे तथा सारा अंग खूनसे लथपथ हो रहा था। उस अवस्थामें दैवेच्छासे पृथ्वीपर उतरे हुए सूर्यके समान उसे देखनेके लिये सब लोग उसकी लाशको घेरकर खड़े हो गये ॥ ३ ॥
प्रहृष्टवित्रस्तविषण्णविस्मिता-
स्तथा परे शोकहता इवाभवन्।
परे त्वदीयाश्च परस्परेण
यथायथैषां प्रकृतिस्तथाभवन् ॥ ४ ॥ कोई प्रसन्न था तो कोई भयभीत। कोई विषादग्रस्त था तो कोई आश्चर्यचकित तथा दूसरे बहुत-से लोग शोकसे मृतप्राय हो रहे थे। आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमेंसे जिसकी जैसी प्रकृति थी, वे परस्पर उसी भावमें मग्न थे ॥
प्रविद्धवर्माभरणाम्बरायुधं धनंजयेनाभिहतं महौजसम् । निशाम्य कर्णं कुरवः प्रदुद्रुवु- र्हतर्षभा गाव इवाजने वने ॥ ५ ॥ जिसके कवच, आभूषण, वस्त्र और अस्त्र-शस्त्र छिन्न-भिन्न होकर पड़े थे, उस महाबली कर्णको अर्जुनद्वारा मारा गया देख कौरव-सैनिक निर्जन वनमें साँड़के मारे जानेपर भागनेवाली गायोंके समान इधर-उधर भाग चले ॥
भीमश्च भीमेन तदा स्वनेन नादं कृत्वा रोदसीः कम्पयानः । आस्फोटयन् वल्गते नृत्यते च हते कर्णे त्रासयन् धार्तराष्ट्रान् ॥ ६ ॥ कर्णके मारे जानेपर धृतराष्ट्रके पुत्रोंको भयभीत करते हुए भीमसेन भयंकर स्वरसे सिंहनाद करके आकाश और पृथ्वीको कँपाने तथा ताल ठोंककर नाचने-कूदने लगे ॥
तथैव राजन् सोमकाः सृञ्जयाश्च शङ्खान् दध्मुः सस्वजुश्चापि सर्वे । परस्परं क्षत्रिया हृष्टरूपाः सूतात्मजे वै निहते तदानीम् ॥ ७ ॥ राजन्! इसी प्रकार समस्त सोमक और सृंजय भी शंख बजाने और एक-दूसरेको छातीसे लगाने लगे। सूतपुत्रके मारे जानेपर उस समय पाण्डवदलके सभी क्षत्रिय परस्पर हर्षमग्न हो रहे थे ॥ ७ ॥
कृत्वा विमर्दं महदर्जुनेन कर्णो हतः केसरिणेव नागः । तीर्णा प्रतिज्ञा पुरुषर्षभेण वैरस्यान्तं गतवांश्चापि पार्थः ॥ ८ ॥ जैसे सिंह हाथीको पछाड़ देता है, उसी प्रकार पुरुषप्रवर अर्जुनने बड़ी भारी मार-काट मचाकर कर्णका वध किया, अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और उन्होंने वैरका अन्त कर दिया ॥ ८ ॥
मद्राधिपश्चापि विमूढचेता- स्तूर्णं रथेनापकृतध्वजेन ।
दुर्योधनस्यान्तिकमेत्य राजन् सबाष्पदुःखाद् वचनं बभाषे ॥ ९ ॥ राजन्! जिसकी ध्वजा काट दी गयी थी, उस रथके द्वारा मद्रराज शल्य भी विमूढ़चित्त होकर तुरंत दुर्योधनके पास गये और दुःखसे आँसू बहाते हुए इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥ विशीर्णनागाश्वरथप्रवीरं बलं त्वदीयं यमराष्ट्रकल्पम् । अन्योन्यमासाद्य हतं महद्भि- र्नरश्वनागैर्गिरिकूटकल्पैः ॥ १० ॥ ‘नरेश्वर! तुम्हारी सेनाके हाथी, घोड़े, रथ और प्रमुख वीर नष्ट-भ्रष्ट हो गये। सारी सेनामें यमराजका राज्य-सा हो गया है। पर्वतशिखरोंके समान विशाल हाथी, घोड़े और पैदल मनुष्य एक-दूसरेसे टक्कर लेकर अपने प्राण खो बैठे हैं ॥ १० ॥ नैतादृशं भारत युद्धमासीद् यथा तु कर्णार्जुनयोर्बभूव । ग्रस्तौ हि कर्णेन समेत्य कृष्णा- वन्ये च सर्वे तव शत्रवो ये ॥ ११ ॥ ‘भारत! आज कर्ण और अर्जुनमें जैसा युद्ध हुआ है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ था। कर्णने धावा करके श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा तुम्हारे अन्य सब शत्रुओंको भी प्रायः प्राणोंके संकटमें डाल दिया था; परंतु कोई फल नहीं निकला ॥ ११ ॥ दैवं ध्रुवं पार्थवशात् प्रवृत्तं यत् पाण्डवान् पाति हिनस्ति चास्मान् । त्वदर्थसिद्धयर्थकरास्तु सर्वे प्रसह्य वीरा निहता द्विषद्भिः ॥ १२ ॥ ‘निश्चय ही दैव कुन्तीपुत्रोंके अधीन होकर काम कर रहा है; क्योंकि वह पाण्डवोंकी तो रक्षा करता है और हमारा विनाश। यही कारण है कि तुम्हारे अर्थकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करनेवाले प्रायः सभी वीर शत्रुओंके हाथसे बलपूर्वक मारे गये ॥ १२ ॥ कुबेरवैवस्वतवासवानां तुल्यप्रभावा नृपते सुवीराः । वीर्येण शौर्येण बलेन तेजसा तैस्तैस्तु युक्ता विविधैर्गुणौघैः ॥ १३ ॥ ‘राजन्! तुम्हारी सेनाके श्रेष्ठ वीर कुबेर, यम और इन्द्रके समान प्रभावशाली तथा बल, पराक्रम, शौर्य, तेज एवं अन्य नाना प्रकारके गुणसमूहोंसे सम्पन्न थे ॥ १३ ॥ अवध्यकल्पा निहता नरेन्द्रा- स्त्वदर्थकामा युधि पाण्डवेयैः ।
तन्मा शुचो भारत दिष्टमेतत् पर्यायश्वस त्वं न सदास्ति सिद्धिः ॥ १४ ॥ ‘जो-जो राजा तुम्हारे स्वार्थकी सिद्धि चाहनेवाले और अवध्यके समान थे, उन सबको पाण्डवोंने युद्धमें मार डाला। अतः भारत! तुम शोक न करो। यह सब प्रारब्धका खेल है। सबको सदा ही सिद्धि नहीं मिलती, ऐसा जानकर धैर्य धारण करो’ ॥ १४ ॥
एतद् वचो मद्रपतेर्निशम्य स्वं चाप्यनीतं मनसा निरीक्ष्य । दुर्योधनो दीनमना विसंज्ञः पुनः पुनर्न्यश्वसदार्तरूपः ॥ १५ ॥ मद्रराज शल्यकी ये बातें सुनकर और अपने अन्यायपर भी मन-ही-मन दृष्टि डालकर दुर्योधन बहुत उदास एवं दुःखी हो गया। वह अत्यन्त पीड़ित और अचेत-सा होकर बारंबार लंबी उसाँसें भरने लगा ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यप्रत्यागमने द्विनवतितमोऽध्यायः ॥ ९२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यका युद्धसे प्रत्यागमनविषयक बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९२ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2394)
त्रिनवतितमोऽध्यायः
भीमसेनद्वारा पचीस हजार पैदल सैनिकोंका वध, अर्जुनद्वारा रथसेनाका विध्वंस, कौरव-सेनाका पलायन और दुर्योधनका उसे रोकनेके लिये विफल प्रयास
धृतराष्ट्र उवाच
तस्मिंस्तु कर्णार्जुनयोर्विमर्दे
दग्धस्य रौद्रेऽहनि विद्रुतस्य।
बभूव रूपं कुरुसृञ्जयानां
बलस्य बाणोन्मथितस्य कीदृक् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! कर्ण और अर्जुनके उस संग्राममें, जबकि सबके लिये भयानक दिन उपस्थित हुआ था, बाणोंकी आगसे दग्ध और उन्मथित होकर भागती हुई कौरव-सेना तथा सृंजय-सेनाकी कैसी अवस्था हुई? ॥ १ ॥
संजय उवाच
शृणु राजन्नवहितो यथा वृत्तो महाक्षयः।
घोरो मनुष्यदेहानामाजौ च गजवाजिनाम् ॥ २ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! उस युद्धस्थलमें मनुष्यके शरीरों, हाथियों और घोड़ोंका जैसा घोर एवं महान् विनाश हुआ, वह सब सावधान होकर सुनिये ॥ २ ॥
यत्र कर्णे हते पार्थः सिंहनादमथाकरोत्।
तदा तव सुतान् राजन्नाविवेश महद् भयम् ॥ ३ ॥
महाराज! कर्णके मारे जानेपर अर्जुनने महान् सिंहनाद किया, उस समय आपके पुत्रोंके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ॥ ३ ॥
न संधातुमनीकानि न चैवाशु पराक्रमे।
आसीद् बुद्धिर्हते कर्णे तव योधस्य कर्हिचित् ॥ ४ ॥
जब कर्णका वध हो गया, तब आपके किसी भी योद्धाका मन कदापि जल्दी पराक्रम दिखानेमें नहीं लगा और न सेनाको संगठित रखनेकी ओर ही किसीका ध्यान गया ॥ ४ ॥
वणिजो नावि भिन्नायामगाधे विप्लवे यथा।
अपारे पारमिच्छन्तो हते द्वीपे किरीटिना ॥ ५ ॥
अगाध एवं अपार समुद्रमें तूफान उठनेपर जब जहाज फट जाता है, उस समय पार जानेकी इच्छावाले व्यापारियोंकी जैसी अवस्था होती है, वही दशा किरीटधारी अर्जुनके द्वारा द्वीपस्वरूप कर्णके मारे जानेपर कौरवोंकी हुई ॥ ५ ॥