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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2673)

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विश्रामके लिये सरोवरमें छिपे हुए दुर्योधन

एवमुक्त्वा महाराज प्राविशत् तं महाह्रदम् ।
अस्तम्भयत तोयं च मायया मनुजाधिपः ॥ ५४ ॥
महाराज! ऐसा कहकर राजा दुर्योधनने उस महान् सरोवरमें प्रवेश किया और मायासे उसका पानी बाँध दिया ॥ ५४ ॥
तस्मिन् ह्रदं प्रविष्टे तु त्रीन् रथान् श्रान्तवाहनान् ।
अपश्यं सहितानेकस्तं देशं समुपेयुषः ॥ ५५ ॥
जब दुर्योधन सरोवरमें समा गया, उसके बाद अकेले खड़े हुए मैंने अपने पक्षके तीन महारथियोंको वहाँ उपस्थित देखा, जो एक साथ उस स्थानपर आ पहुँचे थे। उन तीनोंके घोड़े थक गये थे ॥ ५५ ॥
कृपं शारद्वतं वीरं द्रौणिं च रथिनां वरम् ।
भोजं च कृतवर्माणं सहितान् शरविक्षतान् ॥ ५६ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—शरद्वान्‌के पुत्र वीर कृपाचार्य, रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणकुमार अश्वत्थामा तथा भोजवंशी कृतवर्मा। ये सब लोग एक साथ थे और बाणोंसे क्षत-विक्षत हो

रहे थे॥ ५६॥ ते सर्वे मामभिप्रेक्ष्य तूर्णमश्वाननोदयन्। उपायाय तु मामूचुर्दिष्ट्या जीवसि संजय॥ ५७॥ मुझे देखते ही उन तीनोंने शीघ्रतापूर्वक अपने घोड़े बढ़ाये और निकट आकर मुझसे कहा—'संजय! सौभाग्यकी बात है कि तुम जीवित हो'॥ ५७॥ अपृच्छंश्चैव मां सर्वे पुत्रं तव जनाधिपम्। कच्चिद् दुर्योधनो राजा स नो जीवति संजय॥ ५८॥ फिर उन सबने आपके पुत्र राजा दुर्योधनका समाचार पूछा—'संजय! क्या हमारे राजा दुर्योधन जीवित हैं?'॥ ५८॥ आख्यातवानहं तेभ्यस्तदा कुशलिनं नृपम्। तच्चैव सर्वमाचक्षं यन्मां दुर्योधनोऽब्रवीत्॥ ५९॥ ह्रदं चैवाहमाचक्षं यं प्रविष्टो नराधिपः। तब मैंने उन लोगोंसे दुर्योधनका कुशल-समाचार बताया तथा दुर्योधनने मुझे जो संदेश दिया था, वह भी सब उनसे कह सुनाया और जिस सरोवरमें वह घुसा था, उसका भी पता बता दिया॥ ५९ १/२॥ अश्वत्थामा तु तद् राजन् निशम्य वचनं मम॥ ६०॥ तं ह्रदं विपुलं प्रेक्ष्य करुणं पर्यदेवयत्। अहोधिङ् स न जानाति जीवतोऽस्मान् नराधिपः॥ ६१॥ पर्याप्ता हि वयं तेन सह योधयितुं परान्। राजन्! मेरी बात सुनकर अश्वत्थामाने उस विशाल सरोवरकी ओर देखा और करुण विलाप करते हुए कहा—'अहो! धिक्कार है, राजा दुर्योधन नहीं जानते हैं कि हम सब जीवित हैं। उनके साथ रहकर हमलोग शत्रुओंसे जूझनेके लिये पर्याप्त हैं'॥ ६०-६१ १/२॥ ते तु तत्र चिरं कालं विलप्य च महारथाः॥ ६२॥ प्राद्रवन् रथिनां श्रेष्ठा दृष्ट्वा पाण्डुसुतान् रणे। तत्पश्चात् वे महारथी दीर्घकालतक वहाँ विलाप करते रहे। फिर रणभूमिमें पाण्डवोंको आते देख वे रथियोंमें श्रेष्ठ तीनों वीर वहाँसे भाग निकले॥ ६२ १/२॥ ते तु मां रथमारोप्य कृपस्य सुपरिष्कृतम्॥ ६३॥ सेनानिवेशमाजग्मुर्हतशेषास्त्रयो रथाः। तत्र गुल्माः परित्रस्ताः सूर्ये चास्तमिते सति॥ ६४॥ सर्वे विचुक्रुशुः श्रुत्वा पुत्राणां तव संक्षयम्।

मरनेसे बचे हुए वे तीनों रथी मुझे भी कृपाचार्यके सुसज्जित रथपर बिठाकर छावनीतक ले आये। सूर्य अस्ताचलपर जा चुके थे। वहाँ छावनीके पहरेदार भयसे घबराये हुए थे। आपके पुत्रोंके विनाशका समाचार सुनकर वे सभी फूट-फूटकर रोने लगे ।। ६३-६४ १/२ ।।

ततो वृद्धा महाराज योषितां रक्षिणो नराः ।। ६५ ।।
राजदारानुपादाय प्रययुर्नगरं प्रति ।
महाराज! तदनन्तर स्त्रियोंकी रक्षामें नियुक्त हुए वृद्ध पुरुषोंने राजकुलकी महिलाओंको साथ लेकर नगरकी ओर प्रस्थान करनेकी तैयारी की ।। ६५ १/२ ।।

तत्र विक्रोशमानानां रुदतीनां च सर्वशः ।। ६६ ।।
प्रादुरासीन्महान् शब्दः श्रुत्वा तद् बलसंक्षयम् ।
ततस्ता योषितो राजन् क्रन्दन्त्यो वै मुहुर्मुहुः ।। ६७ ।।
कुरर्य इव शब्देन नादयन्त्यो महीतलम् ।
उस समय वहाँ अपने पतियोंको पुकारती और रोती-बिलखती हुई राजमहिलाओंका महान् आर्तनाद सब ओर गूँज उठा। राजन्! अपनी सेना और पतियोंके संहारका समाचार सुनकर वे राजकुलकी युवतियाँ अपने आर्तनादसे भूतलको प्रतिध्वनित करती हुई बारंबार कुररीकी भाँति विलाप करने लगीं ।। ६६-६७ १/२ ।।

आजघ्नुः करजैश्चापि पाणिभिश्च शिरांस्युत ।। ६८ ।।
लुलुचुश्च तदा केशान् क्रोशन्त्यस्तत्र तत्र ह ।
हाहाकारविनादिन्यो विनिघ्नन्त्य उरांसि च ।। ६९ ।।
शोचन्त्यस्तत्र रुरुदुः क्रन्दमाना विशाम्पते ।
वे जहाँ-तहाँ हाहाकार करती हुई अपने ऊपर नखोंसे आघात करने, हाथोंसे सिर और छाती पीटने तथा केश नोचने लगीं। प्रजानाथ! शोकमें डूबकर पतिको पुकारती हुई वे रानियाँ करुण स्वरसे क्रन्दन करने लगीं ।।

ततो दुर्योधनामात्याः साश्रुकण्ठा भृशातुराः ।। ७० ।।
राजदारानुपादाय प्रययुर्नगरं प्रति ।
इससे दुर्योधनके मन्त्रियोंका गला भर आया और वे अत्यन्त व्याकुल हो राजमहिलाओंको साथ ले नगरकी ओर चल दिये ।। ७० १/२ ।।

वेत्रव्यासक्तहस्ताश्च द्वाराध्यक्षा विशाम्पते ।। ७१ ।।
शयनीयानि शुभ्राणि स्पर्ध्यास्तरणवन्ति च ।
समादाय ययुस्तूर्णं नगरं द्वाररक्षिणः ।। ७२ ।।
प्रजानाथ! उनके साथ हाथोंमें बेंतकी छड़ी लिये द्वारपाल भी चल रहे थे। रानियोंकी रक्षामें नियुक्त हुए सेवक शुभ्र एवं बहुमूल्य बिछौने लेकर शीघ्रतापूर्वक नगरकी ओर चलने लगे ।। ७१-७२ ।।

आस्थायाश्वतरीयुक्तान् स्यन्दनानपरे पुनः । स्वान् स्वान् दारानुपादाय प्रययुर्नगरं प्रति ॥ ७३ ॥ अन्य बहुत-से राजकीय पुरुष खच्चरियोंसे जुते हुए रथोंपर आरूढ़ हो अपनी-अपनी रक्षामें स्थित स्त्रियोंको लेकर नगरकी ओर यात्रा करने लगे ॥ ७३ ॥

अदृष्टपूर्वा या नार्यो भास्करेणापि वेश्मसु । ददृशुस्ता महाराज जना याताः पुरं प्रति ॥ ७४ ॥ महाराज! जिन राजमहिलाओंको महलोंमें रहते समय पहले सूर्यदेवने भी नहीं देखा होगा, उन्हें ही नगरकी ओर जाते हुए साधारण लोग भी देख रहे थे ॥ ७४ ॥

ताः स्त्रियो भरतश्रेष्ठ सौकुमार्यसमन्विताः । प्रययुर्नगरं तूर्णं हतस्वजनबान्धवाः ॥ ७५ ॥ भरतश्रेष्ठ! जिनके स्वजन और बान्धव मारे गये थे, वे सुकुमारी स्त्रियाँ तीव्र गतिसे नगरकी ओर जा रही थीं ॥

आगोपालाविपालेभ्यो द्रवन्तो नगरं प्रति । ययुर्मनुष्याः सम्भ्रान्ता भीमसेनभयार्दिताः ॥ ७६ ॥ उस समय भीमसेनके भयसे पीड़ित हो सभी मनुष्य गायों और भेड़ोंके चरवाहेतक घबराकर नगरकी ओर भाग रहे थे ॥ ७६ ॥

अपि चैषां भयं तीव्रं पार्थेभ्योऽभूत् सुदारुणम् । प्रेक्षमाणास्तदान्योन्यमाधावन्नगरं प्रति ॥ ७७ ॥ उन्हें कुन्तीके पुत्रोंसे दारुण एवं तीव्र भय प्राप्त हुआ था। वे एक-दूसरेकी ओर देखते हुए नगरकी ओर भागने लगे ॥ ७७ ॥

तस्मिंस्तथा वर्तमाने विद्रवे भृशदारुणे । युयुत्सुः शोकसंमूढः प्राप्तकालमचिन्तयत् ॥ ७८ ॥ जब इस प्रकार अति भयंकर भगदड़ मची हुई थी, उस समय युयुत्सु शोकसे मूर्च्छित हो मन-ही-मन समयोचित कर्तव्यका विचार करने लगा— ॥ ७८ ॥

जितो दुर्योधनः संख्ये पाण्डवैर्भीमविक्रमैः । एकादशचमूभर्ता भ्रातरश्चास्य सूदिताः ॥ ७९ ॥ ‘भयंकर पराक्रमी पाण्डवोंने ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके स्वामी राजा दुर्योधनको युद्धमें परास्त कर दिया और उसके भाइयोंको भी मार डाला ॥ ७९ ॥

हताश्च कुरवः सर्वे भीष्मद्रोणपुरःसराः । अहमेको विमुक्तस्तु भाग्ययोगाद् यदृच्छया ॥ ८० ॥ ‘भीष्म और द्रोणाचार्य जिनके अगुआ थे, वे समस्त कौरव मारे गये। अकस्मात् भाग्य-योगसे अकेला मैं ही बच गया हूँ ॥ ८० ॥

विद्रुतानि च सर्वाणि शिबिराणि समन्ततः ।

इतस्ततः पलायन्ते हतनाथा हतौजसः ॥ ८१ ॥ ‘सारे शिविरके लोग सब ओर भाग गये। स्वामीके मारे जानेसे हतोत्साह होकर सभी सेवक इधर-उधर पलायन कर रहे हैं॥ ८१॥

अदृष्टपूर्वा दुःखार्ता भयव्याकुललोचनाः । हरिणा इव वित्रस्ता वीक्षमाणा दिशो दश ॥ ८२ ॥ दुर्योधनस्य सचिवा ये केचिदवशेषिताः । राजदारानुपादाय प्रययुर्नगरं प्रति ॥ ८३ ॥ ‘उन सबकी ऐसी अवस्था हो गयी है, जैसी पहले कभी नहीं देखी गयी। सभी दुःखसे आतुर हैं और सबके नेत्र भयसे व्याकुल हो उठे हैं। सभी लोग भयभीत मृगोंके समान दसों दिशाओंकी ओर देख रहे हैं। दुर्योधनके मन्त्रियोंमेंसे जो कोई बच गये हैं, वे राजमहिलाओंको साथ लेकर नगरकी ओर जा रहे हैं॥

प्राप्तकालमहं मन्ये प्रवेशं तैः सह प्रभुम् । युधिष्ठिरमनुज्ञाय वासुदेवं तथैव च ॥ ८४ ॥ ‘मैं राजा युधिष्ठिर और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी आज्ञा लेकर उन मन्त्रियोंके साथ ही नगरमें प्रवेश करूँ, यही मुझे समयोचित कर्तव्य जान पड़ता है'॥ ८४॥

एतमर्थं महाबाहुरुभयोः स न्यवेदयत् । तस्य प्रीतोऽभवद् राजा नित्यं करुणवेदिता ॥ ८५ ॥ परिष्वज्य महाबाहुर्वैश्यापुत्रं व्यसर्जयत् । ऐसा सोचकर महाबाहु युयुत्सुने उन दोनोंके सामने अपना विचार प्रकट किया। उसकी बात सुनकर निरन्तर करुणाका अनुभव करनेवाले महाबाहु राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने वैश्यकुमारीके पुत्र युयुत्सुको छातीसे लगाकर बिदा कर दिया॥ ८५ १/२॥

ततः स रथमास्थाय द्रुतमश्वानचोदयत् ॥ ८६ ॥ संवाहयितवांश्चापि राजदारान् पुरं प्रति । तत्पश्चात् उसने रथपर बैठाकर तुरंत ही अपने घोड़े बढ़ाये और राजकुलकी स्त्रियोंको राजधानीमें पहुँचा दिया॥ ८६ १/२॥

तैश्चैव सहितः क्षिप्रमस्तं गच्छति भास्करे ॥ ८७ ॥ प्रविष्टो हास्तिनपुरं बाष्पकण्ठोऽश्रुलोचनः । सूर्यके अस्त होते-होते नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए उसने उन सबके साथ हस्तिनापुरमें प्रवेश किया। उस समय उसका गला भर आया था॥ ८७ १/२॥

अपश्यत महाप्राज्ञं विदुरं साश्रुलोचनम् ॥ ८८ ॥ राज्ञः समीपान्निष्क्रान्तं शोकोपहतचेतसम् । राजन्! वहाँ उसने आपके पाससे निकले हुए महाज्ञानी विदुरजीका दर्शन किया, जिनके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे और मन शोकमें डूबा हुआ था॥ ८८ १/२॥

तमब्रवीत् सत्यधृतिः प्रणतं त्वग्रतः स्थितम् ॥ ८९ ॥ दिष्ट्या कुरुक्षये वृत्ते अस्मिंस्त्वं पुत्र जीवसि । विना राज्ञः प्रवेशाद् वै किमसि त्वमिहागतः ॥ ९० ॥ एतद् वै कारणं सर्वं विस्तरेण निवेदय । सत्यपरायण विदुरने प्रणाम करके सामने खड़े हुए युयुत्सुसे कहा—'बेटा! बड़े सौभाग्यकी बात है कि कौरवोंके इस विकट संहारमें भी तुम जीवित बच गये हो; परंतु राजा युधिष्ठिरके हस्तिनापुरमें प्रवेश करनेसे पहले ही तुम यहाँ कैसे चले आये? यह सारा कारण मुझे विस्तारपूर्वक बताओ' ॥ ८९-९०१/२ ॥

युयुत्सुरुवाच

निहते शकुनौ तत्र सजातिसुतबान्धवे ॥ ९१ ॥ हतशेषपरीवारो राजा दुर्योधनस्ततः । स्वकं स हयमुत्सृज्य प्राङ्मुखः प्राद्रवद् भयात् ॥ ९२ ॥ युयुत्सुने कहा—चाचाजी! जाति, भाई और पुत्रसहित शकुनिके मारे जानेपर जिसके शेष परिवार नष्ट हो गये थे, वह राजा दुर्योधन अपने घोड़ेको युद्धभूमिमें ही छोड़कर भयके मारे पूर्व दिशाकी ओर भाग गया ॥ ९१-९२ ॥

अपक्रान्ते तु नृपतौ स्कन्धावारनिवेशनात् । भयव्याकुलितं सर्वं प्राद्रवन्नगरं प्रति ॥ ९३ ॥ राजाके छावनीसे दूर भाग जानेपर सब लोग भयसे व्याकुल हो राजधानीकी ओर भाग चले ॥ ९३ ॥

ततो राज्ञः कलत्राणि भ्रातॄणां चास्य सर्वतः । वाहनेषु समारोप्य अध्यक्षाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ९४ ॥ तब राजा तथा उनके भाइयोंकी पत्नियोंको सब ओरसे सवारियोंपर बिठाकर अन्तःपुरके अध्यक्ष भी भयके मारे भाग खड़े हुए ॥ ९४ ॥

ततोऽहं समनुज्ञाप्य राजानं सहकेशवम् । प्रविष्टो हास्तिनपुरं रक्षँल्लोकान् प्रधावितान् ॥ ९५ ॥ तदनन्तर मैं भगवान् श्रीकृष्ण और राजा युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर भागे हुए लोगोंकी रक्षाके लिये हस्तिनापुरमें चला आया हूँ ॥ ९५ ॥

एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वैश्यापुत्रेण भाषितम् । प्राप्तकालमिति ज्ञात्वा विदुरः सर्वधर्मवित् ॥ ९६ ॥ अपूजयदमेयात्मा युयुत्सुं वाक्यमब्रवीत् । प्राप्तकालमिदं सर्वं ब्रुवता भरतक्षये ॥ ९७ ॥ रक्षितः कुलधर्मश्च सानुक्रोशतया त्वया ।

वैश्यापुत्र युयुत्सुकी कही हुई यह बात सुनकर और इसे समयोचित जानकर सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता तथा अमेय आत्मबलसे सम्पन्न विदुरजीने युयुत्सुकी भूरि-भूरि प्रशंसा की एवं इस प्रकार कहा—'भरतवंशियोंके इस विनाशके समय जो यह समयोचित कर्तव्य प्राप्त था, वह सब बताकर अपनी दयालुताके कारण तुमने कुल-धर्मकी रक्षा की है ॥ ९६-९७ ½ ॥

दिष्ट्या त्वामिह संग्रामादस्माद् वीरक्षयात् पुरम् ॥ ९८ ॥
समागतमपश्याम ह्यंशुमन्तमिव प्रजाः ।
'वीरोंका विनाश करनेवाले इस संग्रामसे बचकर तुम कुशलपूर्वक नगरमें लौट आये—इस अवस्थामें हमने तुम्हें उसी प्रकार देखा है, जैसे रात्रिके अन्तमें प्रजा भगवान् भास्करका दर्शन करती है ॥ ९८ ½ ॥

अन्धस्य नृपतेर्यष्टिर्लुब्धस्यादीर्घदर्शिनः ॥ ९९ ॥
बहुशो याच्यमानस्य दैवोपहतचेतसः ।
त्वमेको व्यसनार्तस्य ध्रियसे पुत्र सर्वथा ॥ १०० ॥
'लोभी, अदूरदर्शी और अन्धे राजाके लिये तुम लाठीके सहारे हो। मैंने उनसे युद्ध रोकनेके लिये बारंबार याचना की थी, परंतु दैवसे उनकी बुद्धि मारी गयी थी; इसलिये उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी। आज वे संकटसे पीड़ित हैं, बेटा! इस अवस्थामें एकमात्र तुम्हीं उन्हें सहारा देनेके लिये जीवित हो ॥ ९९-१०० ॥

अद्य त्वमिह विश्रान्तः श्वोऽभिगन्ता युधिष्ठिरम् ।
एतावदुक्त्वा वचनं विदुरः साश्रुलोचनः ॥ १०१ ॥
युयुत्सुं समनुप्राप्य प्रविवेश नृपक्षयम् ।
पौरजानपदैर्दुःखार्द्धाहेति भृशनादितम् ॥ १०२ ॥
'आज यहीं विश्राम करो। कल सबेरे युधिष्ठिरके पास चले जाना' ऐसा कहकर नेत्रोंमें आँसू भरे विदुरजीने युयुत्सुको साथ लेकर राजमहलमें प्रवेश किया। वह भवन नगर और जनपदके लोगोंद्वारा दुःखपूर्वक किये जानेवाले हाहाकार एवं भयंकर आर्तनादसे गूँज उठा था ॥ १०२ ॥

निरानन्दं गतश्रीकं हृताराममिवाशयम् ।
शून्यरूपमपध्वस्तं दुःखाद् दुःखतरोऽभवत् ॥ १०३ ॥
वहाँ न तो आनन्द था और न वैभवजनित शोभा ही दृष्टिगोचर होती थी। वह राजभवन उस जलाशयके समान जनशून्य और विध्वस्त-सा जान पड़ता था, जिसके तटका उद्यान नष्ट हो गया हो। वहाँ पहुँचकर विदुरजी दुःखसे अत्यन्त खिन्न हो गये ॥ १०३ ॥

विदुरः सर्वधर्मज्ञो विक्लवेनान्तरात्मना ।
विवेश नगरे राजन् निःशश्वास शनैः शनैः ॥ १०४ ॥
राजन्! सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता विदुरजीने व्याकुल अन्तःकरणसे नगरमें प्रवेश किया और धीरे-धीरे वे लंबी साँस खींचने लगे ॥ १०४ ॥

युयुत्सुरपि तां रात्रिं स्वगृहे न्यवसत् तदा ।
वन्द्यमानः स्वकैश्चापि नाभ्यनन्दत् सुदुःखितः ।
चिन्तयानः क्षयं तीव्रं भरतानां परस्परम् ॥ १०५ ॥

युयुत्सु भी उस रातमें अपने घरपर ही रहे। उनके मनमें अत्यन्त दुःख था, इसलिये वे स्वजनोंद्वारा वन्दित होनेपर भी प्रसन्न नहीं हुए। इस पारस्परिक युद्धसे भरतवंशियोंका जो घोर संहार हुआ था, उसीकी चिन्तामें वे निमग्न हो गये थे ॥ १०५ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि ह्रदप्रवेशपर्वणि एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत ह्रदप्रवेशपर्वमें उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८ श्लोक मिलाकर कुल ११३ श्लोक हैं।)

(गदापर्व)

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(गदापर्व)

त्रिंशोऽध्यायः

अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्यका सरोवरपर जाकर दुर्योधनसे युद्ध करनेके विषयमें बातचीत करना, व्याधोंसे दुर्योधनका पता पाकर युधिष्ठिरका सेनासहित सरोवरपर जाना और कृपाचार्य आदिका दूर हट जाना

धृतराष्ट्र उवाच

हतेषु सर्वसैन्येषु पाण्डुपुत्रै रणाजिरे ।
मम सैन्यावशिष्टास्ते किमकुर्वत संजय ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जब पाण्डुके पुत्रोंने समरांगणमें समस्त सेनाओंका संहार कर डाला, तब मेरी सेनाके शेष वीरोंने क्या किया? ॥ १ ॥
कृतवर्मा कृपश्चैव द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् ।
दुर्योधनश्च मन्दात्मा राजा किमकरोत् तदा ॥ २ ॥
कृतवर्मा, कृपाचार्य, पराक्रमी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तथा मन्दबुद्धि राजा दुर्योधनने उस समय क्या किया? ॥

संजय उवाच

सम्प्राद्रवत्सु दारेषु क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
विद्रुते शिबिरे शून्ये भृशोद्विग्नास्त्रयो रथाः ॥ ३ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! जब महामनस्वी क्षत्रिय राजाओंकी पत्नियाँ भाग चलीं और सब लोगोंके पलायन करनेसे सारा शिविर सूना हो गया, उस समय पूर्वोक्त तीनों रथी अत्यन्त उद्विग्न हो गये ॥ ३ ॥
निशम्य पाण्डुपुत्राणां तदा वै जयिनां स्वनम् ।
विद्रुतं शिबिरं दृष्ट्वा सायाह्ने राजगृद्धिनः ॥ ४ ॥
स्थानं नारोचयंस्तत्र ततस्ते ह्रदमभ्ययुः ।
सायंकालमें विजयी पाण्डवोंकी गर्जना सुनकर और अपने सारे शिविरके लोगोंको भागा हुआ देखकर राजा दुर्योधनको चाहनेवाले उन तीनों महारथियोंको वहाँ ठहरना अच्छा न लगा; इसलिये वे उसी सरोवरके तटपर गये ॥ ४ १/२ ॥

युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितो रणे ॥ ५ ॥
हृष्टः पर्यचरद् राजन् दुर्योधनवधेप्सया ।
राजन्! इधर धर्मात्मा युधिष्ठिर भी रणभूमिमें दुर्योधनके वधकी इच्छासे बड़े हर्षके साथ भाइयोंसहित विचर रहे थे ॥ ५ १/२ ॥
मार्गमाणास्तु संक्रुद्धास्तव पुत्रं जयैषिणः ॥ ६ ॥
यत्नतोऽन्वेषमाणास्ते नैवापश्यञ्जनाधिपम् ।
विजयके अभिलाषी पाण्डव अत्यन्त कुपित होकर आपके पुत्रका पता लगाने लगे; परंतु यत्नपूर्वक खोज करनेपर भी उन्हें राजा दुर्योधन कहीं दिखायी नहीं दिया ॥
स हि तीव्रेण वेगेन गदापाणिरपाक्रमत् ॥ ७ ॥
तं हृदं प्राविशच्चापि विष्टभ्यापः स्वमायया ।
वह हाथमें गदा लेकर तीव्र वेगसे भागा और अपनी मायासे जलको स्तम्भित करके उस सरोवरके भीतर जा घुसा ॥ ७ १/२ ॥
यदा तु पाण्डवाः सर्वे सुपरिश्रान्तवाहनाः ॥ ८ ॥
ततः स्वशिविरं प्राप्य व्यतिष्ठन्त ससैनिकाः ।
दुर्योधनकी खोज करते-करते जब पाण्डवोंके वाहन बहुत थक गये, तब सभी पाण्डव सैनिकोंसहित अपने शिविरमें आकर ठहर गये ॥ ८ १/२ ॥
ततः कृपश्च द्रौणिश्च कृतवर्मा च सात्वतः ॥ ९ ॥
संनिविष्टेषु पार्थेषु प्रयातास्तं हृदं शनैः ।
तदनन्तर जब कुन्तीके सभी पुत्र शिविरमें विश्राम करने लगे, तब कृपाचार्य, अश्वत्थामा और सात्वतवंशी कृतवर्मा धीरे-धीरे उस सरोवरके तटपर जा पहुँचे ॥ ९ १/२ ॥
ते तं हृदं समासाद्य यत्र शेते जनाधिपः ॥ १० ॥
अभ्यभाषन्त दुर्धर्षं राजानं सुप्तमम्भसि ।
राजन्नुत्तिष्ठ युध्यस्व सहास्माभिर्युधिष्ठिरम् ॥ ११ ॥
जित्वा वा पृथिवीं भुङ्क्ष्व हतो वा स्वर्गमाप्नुहि ।
जिसमें राजा दुर्योधन सो रहा था, उस सरोवरके समीप पहुँचकर, वे जलमें सोये हुए उस दुर्धर्ष नरेशसे इस प्रकार बोले—‘राजन्! उठो और हमारे साथ चलकर युधिष्ठिरसे युद्ध करो। विजयी होकर पृथ्वीका राज्य भोगो अथवा मारे जाकर स्वर्गलोक प्राप्त करो ॥ १०-११ १/२ ॥
तेषामपि बलं सर्वं हतं दुर्योधन त्वया ॥ १२ ॥
प्रतिविद्धाश्च भूयिष्ठं ये शिष्टास्तत्र सैनिकाः ।
न ते वेगं विषहितुं शक्तास्तव विशाम्पते ॥ १३ ॥
अस्माभिरपि गुप्तस्य तस्मादुत्तिष्ठ भारत ।

'प्रजानाथ दुर्योधन! भरतनन्दन! तुमने भी तो पाण्डवोंकी सारी सेनाका संहार कर डाला है। वहाँ जो सैनिक शेष रह गये हैं, वे भी बहुत घायल हो चुके हैं; अतः जब तुम हमारेद्वारा सुरक्षित होकर उनपर आक्रमण करोगे तो वे तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे; इसलिये तुम युद्धके लिये उठो' ।। १२-१३ ½ ।।

दुर्योधन उवाच

दिष्ट्या पश्यामि वो मुक्तानीदृशात् पुरुषक्षयात् ॥ १४ ॥
पाण्डुकौरवसम्मर्दाज्जीवमानान् नरर्षभान् ।
दुर्योधन बोला—मैं ऐसे जनसंहारकारी पाण्डव-कौरव-संग्रामसे आप सभी नरश्रेष्ठ वीरोंको जीवित बचा हुआ देख रहा हूँ, यह बड़े सौभाग्यकी बात है ॥
विजेष्यामो वयं सर्वे विश्रान्ता विगतक्लमाः ॥ १५ ॥
भवन्तश्च परिश्रान्ता वयं च भृशविक्षताः ।
उदीर्णं च बलं तेषां तेन युद्धं न रोचये ॥ १६ ॥
हम सब लोग विश्राम करके अपनी थकावट दूर कर लें तो अवश्य विजयी होंगे। आप लोग भी बहुत थके हुए हैं और हम भी अत्यन्त घायल हो चुके हैं। उधर पाण्डवोंका बल बढ़ा हुआ है; इसलिये इस समय मेरी युद्ध करनेकी रुचि नहीं हो रही है ॥ १५-१६ ॥
न त्वेतदद्भुतं वीरा यद् वो महदिदं मनः ।
अस्मासु च परा भक्तिर्न तु कालः पराक्रमे ॥ १७ ॥
वीरो! आपके मनमें जो युद्धके लिये महान् उत्साह बना हुआ है, यह कोई अद्भुत बात नहीं है। आपलोगोंका मुझपर महान् प्रेम भी है, तथापि यह पराक्रम प्रकट करनेका समय नहीं है ॥ १७ ॥
विश्रम्यैकां निशामद्य भवद्भिः सहितो रणे ।
प्रतियोत्स्याम्यहं शत्रून् श्वो न मेऽस्त्यत्र संशयः ॥ १८ ॥
आज एक रात विश्राम करके कल सबेरे रणभूमिमें आप लोगोंके साथ रहकर मैं शत्रुओंके साथ युद्ध करूँगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १८ ॥

संजय उवाच

एवमुक्तोऽब्रवीद् द्रौणी राजानं युद्धदुर्मदम् ।
उत्तिष्ठ राजन् भद्रं ते विजेष्यामो वयं परान् ॥ १९ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर द्रोणकुमारने उस रणदुर्मद राजासे इस प्रकार कहा—'महाराज! उठो, तुम्हारा कल्याण हो। हम शत्रुओंपर विजय प्राप्त करेंगे ॥ १९ ॥
इष्टापूर्तेन दानेन सत्येन च जपेन च ।
शपे राजन् यथा ह्यद्य निहनिष्यामि सोमकान् ॥ २० ॥

‘राजन्! मैं अपने इष्टापूर्त कर्म, दान, सत्य और जयकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आज सोमकोंका संहार कर डालूँगा ।। २० ।।
मा स्म यज्ञकृतां प्रीतिमाप्नुयां सज्जनोचिताम् ।
यदिमां रजनीं व्युष्टां न हि हन्मि परान् रणे ।। २१ ।।
‘यदि यह रात बीतते ही प्रातःकाल रणभूमिमें शत्रुओंको न मार डालूँ तो मुझे सज्जन पुरुषोंके योग्य और यज्ञकर्ताओंको प्राप्त होनेवाली प्रसन्नता न प्राप्त हो ।।
नाहत्वा सर्वपञ्चालान् विमोक्ष्ये कवचं विभो ।
इति सत्यं ब्रवीम्येतत्तन्मे शृणु जनाधिप ।। २२ ।।
‘प्रभो! नरेश्वर! मैं समस्त पांचालोंका संहार किये बिना अपना कवच नहीं उतारूँगा, यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ। मेरे इस कथनको तुम ध्यानसे सुनो’ ।। २२ ।।
तेषु सम्भाषमाणेषु व्याधास्तं देशमाययुः ।
मांसभारपरिश्रान्ताः पानीयार्थं यदृच्छया ।। २३ ।।
वे इस प्रकार बात कर ही रहे थे कि मांसके भारसे थके हुए बहुत-से व्याध उस स्थानपर पानी पीनेके लिये अकस्मात् आ पहुँचे ।। २३ ।।
ते तत्र धिष्ठितास्तेषां सर्वं तद् वचनं रहः ।
दुर्योधनवचश्चैव शुश्रुवुः संगता मिथः ।। २४ ।।
उन्होंने वहाँ खड़े होकर उनकी एकान्तमें होनेवाली सारी बातें सुन लीं। परस्पर मिले हुए उन व्याधोंने दुर्योधनकी भी बात सुनी ।। २४ ।।
तेऽपि सर्वे महेष्वासा अयुद्धार्थिनि कौरवे ।
निर्वन्धं परमं चक्रुस्तदा वै युद्धकाङ्क्षिणः ।। २५ ।।
कुरुराज दुर्योधन युद्ध नहीं चाहता था तो भी युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले वे सभी महाधनुर्धर योद्धा उससे युद्ध छेड़नेके लिये बड़ा आग्रह कर रहे थे ।। २५ ।।
तांस्तथा समुदीक्ष्याथ कौरवाणां महारथान् ।
अयुद्धमनसं चैव राजानं स्थितमम्भसि ।। २६ ।।
तेषां श्रुत्वा च संवादं राज्ञश्च सलिले सतः ।
व्याधाभ्यजानन् राजेन्द्र सलिलस्थं सुयोधनम् ।। २७ ।।
राजन्! उन कौरवमहारथियोंकी वैसी मनोवृत्ति जानकर जलमें ठहरे हुए राजा दुर्योधनके मनमें युद्धका उत्साह न देखकर और सलिलनिवासी नरेशके साथ उन तीनोंका संवाद सुनकर व्याध यह समझ गये कि ‘दुर्योधन इसी सरोवरके जलमें छिपा हुआ है’ ।। २६-२७ ।।
ते पूर्वं पाण्डुपुत्रेण पृष्टा ह्यासन् सुतं तव ।
यदृच्छोपगतास्तत्र राजानं परिमार्गता ।। २८ ।।

पहले राजा दुर्योधनकी खोज करते हुए पाण्डुकुमार युधिष्ठिरने दैववश अपने पास पहुँचे हुए उन व्याधोंसे आपके पुत्रका पता पूछा था ॥ २८ ॥

ततस्ते पाण्डुपुत्रस्य स्मृत्वा तद् भाषितं तदा । अन्योन्यमब्रुवन् राजन् मृगव्याधाः शनैरिव ॥ २९ ॥

राजन्! उस समय पाण्डुपुत्रकी कही हुई बात याद करके वे व्याध आपसमें धीरे-धीरे बोले— ॥ २९ ॥

दुर्योधनं ख्यापयामो धनं दास्यति पाण्डवः । सुव्यक्तमिह नः ख्यातो ह्रदे दुर्योधनो नृपः ॥ ३० ॥

'यदि हम दुर्योधनका पता बता दें तो पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर हमें धन देंगे। हमें तो यहाँ यह स्पष्टरूपसे ज्ञात हो गया कि राजा दुर्योधन इसी सरोवरमें छिपा हुआ है ॥ ३० ॥

तस्माद् गच्छामहे सर्वे यत्र राजा युधिष्ठिरः । आख्यातुं सलिले सुप्तं दुर्योधनममर्षणम् ॥ ३१ ॥

अतः जलमें सोये हुए अमर्षशील दुर्योधनका पता बतानेके लिये हम सब लोग उस स्थानपर चलें, जहाँ राजा युधिष्ठिर मौजूद हैं ॥ ३१ ॥

धृतराष्ट्रात्मजं तस्मै भीमसेनाय धीमते । शयानं सलिले सर्वे कथयामो धनुर्भृते ॥ ३२ ॥

'बुद्धिमान् धनुर्धर भीमसेनको हम सब यह बता दें कि धृतराष्ट्रका पुत्र दुर्योधन जलमें सो रहा है ॥ ३२ ॥

स नो दास्यति सुप्रीतो धनानि बहुलान्युत । किं नो मांसेन शुष्केण परिक्लिष्टेन शोषिणा ॥ ३३ ॥

'इससे अत्यन्त प्रसन्न होकर वे हमें बहुत धन देंगे। फिर हमें शरीरका रक्त सुखा देनेवाले इस सूखे मांसको ढोकर व्यर्थ कष्ट उठानेकी क्या आवश्यकता है?' ॥ ३३ ॥

एवमुक्त्वा तु ते व्याधाः सम्प्रहृष्टा धनार्थिनः । मांसभारानुपादाय प्रययुः शिविरं प्रति ॥ ३४ ॥

इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करके धनकी अभिलाषा रखनेवाले वे व्याध बड़े प्रसन्न हुए और मांसके बोझ उठाकर पाण्डव-शिविरकी ओर चल दिये ॥ ३४ ॥

पाण्डवापि महाराज लब्धलक्ष्याः प्रहारिणः । अपश्यमानाः समरे दुर्योधनमवस्थितम् ॥ ३५ ॥ निकृतेस्तस्य पापस्य ते पारं गमनेप्सवः । चारान् सम्प्रेषयामासुः समन्तात् तद्रणाजिरे ॥ ३६ ॥

महाराज! प्रहार करनेमें कुशल पाण्डवोंने अपना लक्ष्य सिद्ध कर लिया था; उन्होंने दुर्योधनको समरांगण-में खड़ा न देख उस पापीके किये हुए छल-कपटका बदला चुकाकर वैरके पार जानेकी इच्छासे उस संग्रामभूमिमें चारों ओर गुप्तचर भेज रखे थे ॥ ३५-३६ ॥

आगम्य तु ततः सर्वे नष्टं दुर्योधनं नृपम् ।
न्यवेदयन्त सहिता धर्मराजस्य सैनिकाः ॥ ३७ ॥
धर्मराजके उन सभी गुप्तचर सैनिकोंने एक साथ लौटकर यह निवेदन किया कि 'राजा दुर्योधन लापता हो गया है' ॥ ३७ ॥
तेषां तद् वचनं श्रुत्वा चाराणां भरतर्षभ ।
चिन्तामभ्यगमत् तीव्रां निःशश्वास च पार्थिवः ॥ ३८ ॥
भरतश्रेष्ठ! उन गुप्तचरोंकी बात सुनकर राजा युधिष्ठिर घोर चिन्तामें पड़ गये और लंबी साँस खींचने लगे ॥ ३८ ॥
अथ स्थितानां पाण्डूनां दीनानां भरतर्षभ ।
तस्माद् देशादपक्रम्य त्वरिता लुब्धका विभो ॥ ३९ ॥
आजग्मुः शिविरं हृष्टा दृष्ट्वा दुर्योधनं नृपम् ।
वार्यमाणाः प्रविशंश्च भीमसेनस्य पश्यतः ॥ ४० ॥
भरतभूषण! नरेश! तदनन्तर जब पाण्डव खिन्न होकर बैठे हुए थे, उसी समय वे व्याध राजा दुर्योधनको अपनी आँखों देखकर तुरंत ही उस स्थानसे हट गये और बड़े हर्षके साथ पाण्डव-शिविरमें जा पहुँचे। द्वारपालोंके रोकनेपर भी वे भीमसेनके देखते-देखते भीतर घुस गये ॥
ते तु पाण्डवमासाद्य भीमसेनं महाबलम् ।
तस्मै तत् सर्वमाचख्युर्यद् वृत्तं यच्च वैश्रुतम् ॥ ४१ ॥
महाबली पाण्डुपुत्र भीमसेनके पास जाकर उन्होंने सरोवरके तटपर जो कुछ हुआ था और जो कुछ सुननेमें आया था, वह सब कह सुनाया ॥ ४१ ॥
ततो वृकोदरो राजन् दत्त्वा तेषां धनं बहु ।
धर्मराजाय तत् सर्वमाचचक्षे परंतपः ॥ ४२ ॥
राजन्! तब शत्रुओंको संताप देनेवाले भीमने उन व्याधोंको बहुत धन देकर धर्मराजसे सारा समाचार कहा ॥
असौ दुर्योधनो राजन् विज्ञातो मम लुब्धकैः ।
संस्तभ्य सलिलं शेते यस्यार्थे परितप्यसे ॥ ४३ ॥
वे बोले—'धर्मराज! मेरे व्याधोंने राजा दुर्योधनका पता लगा लिया है। आप जिसके लिये संतप्त हैं, वह मायासे पानी बाँधकर सरोवरमें सो रहा है' ॥ ४३ ॥
तद् वचो भीमसेनस्य प्रियं श्रुत्वा विशाम्पते ।
अजातशत्रुः कौन्तेयो हृष्टोऽभूत् सह सोदरैः ॥ ४४ ॥
प्रजानाथ! भीमसेनका वह प्रिय वचन सुनकर अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए ॥ ४४ ॥
तं च श्रुत्वा महेष्वासं प्रविष्टं सलिलह्रदे ।

क्षिप्रमेव ततोऽगच्छन् पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥ ४५ ॥ महाधनुर्धर दुर्योधनको पानीसे भरे सरोवरमें घुसा सुनकर राजा युधिष्ठिर भगवान् श्रीकृष्णको आगे करके शीघ्र ही वहाँसे चल दिये ॥ ४५ ॥

ततः किलकिलाशब्दः प्रादुरासीद् विशाम्पते । पाण्डवानां प्रहृष्टानां पञ्चालानां च सर्वशः ॥ ४६ ॥ प्रजानाथ! फिर तो हर्षमें भरे हुए पाण्डव और पांचालोंकी किलकिलाहटका शब्द सब ओर गूँजने लगा ॥ ४६ ॥

सिंहनादांस्ततश्चक्रुः श्वेडांश्च भरतर्षभ । त्वरिताः क्षत्रिया राजन् जग्मुर्द्वैपायनं ह्रदम् ॥ ४७ ॥ भरतभूषण नरेश! वे सभी क्षत्रिय सिंहनाद एवं गर्जना करने लगे तथा तुरंत ही द्वैपायन नामक सरोवरके पास जा पहुँचे ॥ ४७ ॥

ज्ञातः पापो धार्तराष्ट्रो दृष्टश्चेत्यसकृद्रणे । प्राक्रोशन् सोमकास्तत्र हृष्टरूपाः समन्ततः ॥ ४८ ॥ हर्षमें भरे हुए सोमकवीर रणभूमिमें सब ओर पुकार-पुकारकर कहने लगे ‘धृतराष्ट्रके पापी पुत्रका पता लग गया और उसे देख लिया गया’ ॥ ४८ ॥

तेषामाशु प्रयातानां रथानां तत्र वेगिनाम् । बभूव तुमुलः शब्दो दिविस्पृक् पृथिवीपते ॥ ४९ ॥ पृथ्वीनाथ! वहाँ शीघ्रतापूर्वक यात्रा करनेवाले उनके वेगशाली रथोंका घोर घर्घर शब्द आकाशमें व्याप्त हो गया ॥ ४९ ॥

दुर्योधनं परीप्सन्तस्तत्र तत्र युधिष्ठिरम् । अन्वयुस्त्वरितास्ते वै राजानं श्रान्तवाहनाः ॥ ५० ॥ अर्जुनो भीमसेनश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । धृष्टद्युम्नश्च पाञ्चाल्यः शिखण्डी चापराजितः ॥ ५१ ॥ उत्तमौजा युधामन्युः सात्यकिश्च महारथः । पञ्चालानां च ये शिष्टा द्रौपदेयाश्च भारत ॥ ५२ ॥ हयाश्च सर्वे नागाश्च शतशश्च पदातयः । भारत! उस समय अर्जुन, भीमसेन, माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव, पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न, अपराजित वीर शिखण्डी, उत्तमौजा, युधामन्यु, महारथी सात्यकि, द्रौपदीके पाँचों पुत्र तथा पांचालोंमेंसे जो जीवित बच गये थे, वे वीर दुर्योधनको पकड़नेकी इच्छासे अपने वाहनोंके थके होनेपर भी बड़ी उतावलीके साथ राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे गये। उनके साथ सभी घुड़सवार, हाथीसवार और सैकड़ों पैदल सैनिक भी थे ॥ ५०—५२ १/२ ॥

ततः प्राप्तो महाराज धर्मराजः प्रतापवान् ॥ ५३ ॥

द्वैपायनं ह्रदं घोरं यत्र दुर्योधनोऽभवत् ।
महाराज! तत्पश्चात् प्रतापी धर्मराज युधिष्ठिर उस भयंकर द्वैपायनह्रदके तटपर जा पहुँचे, जिसके भीतर दुर्योधन छिपा हुआ था ॥ ५३ १/२ ॥
शीतामलजलं हृद्यं द्वितीयमिव सागरम् ॥ ५४ ॥
मायया सलिलं स्तभ्य यत्राभूत् ते स्थितः सुतः ।
अत्यद्भुतेन विधिना दैवयोगेन भारत ॥ ५५ ॥
उसका जल शीतल और निर्मल था। वह देखनेमें मनोरम और दूसरे समुद्रके समान विशाल था। भारत! उसीके भीतर मायाद्वारा जलको स्तम्भित करके दैवयोग एवं अद्भुत विधिसे आपका पुत्र विश्राम कर रहा था ॥ ५४-५५ ॥
सलिलान्तर्गतः शेते दुर्दर्शः कस्यचित् प्रभो ।
मानुषस्य मनुष्येन्द्र गदाहस्तो जनाधिपः ॥ ५६ ॥
प्रभो! नरेन्द्र! हाथमें गदा लिये राजा दुर्योधन जलके भीतर सोया था। उस समय किसी भी मनुष्यके लिये उसको देखना कठिन था ॥ ५६ ॥
ततो दुर्योधनो राजा सलिलान्तर्गतो वसन् ।
शुश्रुवे तुमुलं शब्दं जलदोपमनिःस्वनम् ॥ ५७ ॥
तदनन्तर पानीके भीतर बैठे हुए राजा दुर्योधनने मेघकी गर्जनाके समान भयंकर शब्द सुना ॥ ५७ ॥
युधिष्ठिरश्च राजेन्द्र तं ह्रदं सह सोदरैः ।
आजगाम महाराज तव पुत्रवधाय वै ॥ ५८ ॥
राजेन्द्र! महाराज! आपके पुत्रका वध करनेके लिये राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ उस सरोवरके तटपर आ पहुँचे ॥ ५८ ॥
महता शङ्खनादेन रथनेमिस्वनेन च ।
ऊर्ध्वं धुन्वन् महारेणुं कम्पयंश्चापि मेदिनीम् ॥ ५९ ॥
यौधिष्ठिरस्य सैन्यस्य श्रुत्वा शब्दं महारथाः ।
कृतवर्मा कृपो द्रौणि राजानमिदमब्रुवन् ॥ ६० ॥
वे महान् शंखनाद तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे पृथ्वीको कँपाते और धूलका महान् ढेर ऊपर उड़ाते हुए वहाँ आये थे। युधिष्ठिरकी सेनाका कोलाहल सुनकर कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा तीनों महारथी राजा दुर्योधनसे इस प्रकार बोले— ॥ ५९-६० ॥
इमे ह्यायान्ति संहृष्टाः पाण्डवा जितकाशिनः ।
अपयास्यामहे तावदनुजानातु नो भवान् ॥ ६१ ॥
‘ये विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डव बड़े हर्षमें भरकर इधर ही आ रहे हैं। अतः हमलोग यहाँसे हट जायँगे। इसके लिये तुम हमें आज्ञा प्रदान करो’ ॥ ६१ ॥
दुर्योधनस्तु तच्छ्रुत्वा तेषां तत्र तरस्विनाम् ।

तथेत्युक्त्वा हृदं तं वै माययास्तम्भयत् प्रभो ॥ ६२ ॥ प्रभो! उन वेगशाली वीरोंकी वह बात सुनकर दुर्योधनने 'तथास्तु' कहकर उस सरोवरके जलको पुनः मायाद्वारा स्तम्भित कर दिया ॥ ६२ ॥ ते त्वनुज्ञाप्य राजानं भृशं शोकपरायणाः । जग्मुर्दूरे महाराज कृपप्रभृतयो रथाः ॥ ६३ ॥ महाराज! राजाकी आज्ञा लेकर अत्यन्त शोकमें डूबे हुए कृपाचार्य आदि महारथी वहाँसे दूर चले गये ॥ ६३ ॥ ते गत्वा दूरमध्वानं न्यग्रोधं प्रेक्ष्य मारिष । न्यविशन्त भृशं श्रान्ताश्चिन्तयन्तो नृपं प्रति ॥ ६४ ॥ मान्यवर! दूरके मार्गपर जाकर उन्हें एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया। वे अत्यन्त थके होनेके कारण राजा दुर्योधनके विषयमें चिन्ता करते हुए उसीके नीचे बैठ गये ॥ ६४ ॥ विष्टभ्य सलिलं सुप्तो धार्तराष्ट्रो महाबलः । पाण्डवाश्चापि सम्प्राप्तास्तं देशं युद्धमीप्सवः ॥ ६५ ॥ इधर महाबली धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन पानी बाँधकर सो गया। इतनेहीमें युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले पाण्डव भी वहाँ आ पहुँचे ॥ ६५ ॥ कथं नु युद्धं भविता कथं राजा भविष्यति । कथं नु पाण्डवा राजन् प्रतिपत्स्यन्ति कौरवम् ॥ ६६ ॥ इत्येवं चिन्तयानास्तु रथेभ्योऽश्वान् विमुच्य ते । तत्रासांचक्रिरे राजन् कृपप्रभृतयो रथाः ॥ ६७ ॥ राजन्! उधर कृपाचार्य आदि महारथी रथोंसे घोड़ोंको खोलकर यह सोचने लगे कि 'अब युद्ध किस तरह होगा? राजा दुर्योधनकी क्या दशा होगी और पाण्डव किस प्रकार कुरुराज दुर्योधनका पता पायेंगे' ऐसी चिन्ता करते हुए वे वहाँ बैठकर आराम करने लगे ॥ ६६-६७ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥

पाण्डवोंका द्वैपायनसरोवरपर जाना, वहाँ युधिष्ठिर और श्रीकृष्णकी बातचीत तथा तालाबमें छिपे हुए दुर्योधनके साथ युधिष्ठिरका संवाद

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकत्रिंशोऽध्यायः

पाण्डवोंका द्वैपायनसरोवरपर जाना, वहाँ युधिष्ठिर और श्रीकृष्णकी बातचीत तथा तालाबमें छिपे हुए दुर्योधनके साथ युधिष्ठिरका संवाद

संजय उवाच

ततस्तेष्वपयातेषु रथेषु त्रिषु पाण्डवाः ।
ते ह्रदं प्रत्यपद्यन्त यत्र दुर्योधनोऽभवत् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! उन तीनों रथियोंके हट जानेपर पाण्डव उस सरोवरके तटपर आये, जिसमें दुर्योधन छिपा हुआ था ॥ १ ॥

आसाद्य च कुरुश्रेष्ठ तदा द्वैपायनं ह्रदम् ।
स्तम्भितं धार्तराष्ट्रेण दृष्ट्वा तं सलिलाशयम् ॥ २ ॥
वासुदेवमिदं वाक्यमब्रवीत् कुरुनन्दनः ।
पश्येमां धार्तराष्ट्रेण मायामप्सु प्रयोजिताम् ॥ ३ ॥
कुरुश्रेष्ठ! द्वैपायन-कुण्डपर पहुँचकर युधिष्ठिरने देखा कि दुर्योधनने इस जलाशयके जलको स्तम्भित कर दिया है। यह देखकर कुरुनन्दन युधिष्ठिरने भगवान् वासुदेवसे इस प्रकार कहा—'प्रभो! देखिये तो सही, दुर्योधनने जलके भीतर इस मायाका कैसा प्रयोग किया है? ॥ २-३ ॥

विष्टभ्य सलिलं शेते नास्य मानुषतो भयम् ।
दैवीं मायामिमां कृत्वा सलिलान्तर्गतो ह्ययम् ॥ ४ ॥
'यह पानीको रोककर सो रहा है। इसे यहाँ मनुष्यसे किसी प्रकारका भय नहीं है; क्योंकि यह इस दैवी मायाका प्रयोग करके जलके भीतर निवास करता है ॥

निकृत्या निकृतिप्रज्ञो न मे जीवन् विमोक्ष्यते ।
यद्यस्य समरे साह्यं कुरुते वज्रभृत् स्वयम् ॥ ५ ॥
तथाप्येनं हतं युद्धे लोका द्रक्ष्यन्ति माधव ।
'माधव! यद्यपि यह छल-कपटकी विद्यामें बड़ा चतुर है, तथापि कपट करके मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकता। यदि समरांगणमें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र इसकी सहायता करें तो भी युद्धमें इसे सब लोग मरा हुआ ही देखेंगे' ॥ ५ १/२ ॥

वासुदेव उवाच

मायाविन इमां मायां मायया जहि भारत ॥ ६ ॥
मायावी मायया वध्यः सत्यमेतद् युधिष्ठिर ।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—भारत! मायावी दुर्योधनकी इस मायाको आप मायाद्वारा ही नष्ट कर डालिये! युधिष्ठिर! मायावीका वध मायासे ही करना चाहिये, यह सच्ची नीति है॥ ६ १/२॥ क्रियाभ्युपायैर्बहुभिर्मायामप्सु प्रयोज्य च॥ ७॥ जहि त्वं भरतश्रेष्ठ मायात्मानं सुयोधनम्। भरतश्रेष्ठ! आप बहुत-से रचनात्मक उपायोंद्वारा जलमें मायाका प्रयोग करके मायामय दुर्योधनका वध कीजिये॥ ७ १/२॥ क्रियाभ्युपायैरिन्द्रेण निहता दैत्यदानवाः॥ ८॥ क्रियाभ्युपायैर्बहुभिर्बलिर्बद्धो महात्मना। क्रियाभ्युपायैर्बहुभिर्हिरण्याक्षो महासुरः॥ ९॥ रचनात्मक उपायोंसे ही इन्द्रने बहुत-से दैत्य और दानवोंका संहार किया, नाना प्रकारके रचनात्मक उपायोंसे ही महात्मा श्रीहरिने बलिको बाँधा और बहुसंख्यक रचनात्मक उपायोंसे ही उन्होंने महान् असुर हिरण्याक्षका वध किया था॥ ८-९॥ हिरण्यकशिपुश्चैव क्रिययैव निष्षूदितौ। वृत्रश्च निहतो राजन् क्रिययैव न संशयः॥ १०॥ क्रियात्मक प्रयत्नके द्वारा ही भगवान्‌ने हिरण्यकशिपु-को भी मारा था। राजन्! वृत्रासुरका वध भी क्रियात्मक उपायसे ही हुआ था, इसमें संशय नहीं है॥ १०॥ तथा पौलस्त्यतनयो रावणो नाम राक्षसः। रामेण निहतो राजन् सानुबन्धः सहानुगः॥ ११॥ क्रिया योगमास्थाय तथा त्वमपि विक्रम। राजन्! पुलस्त्यकुमार विश्रवाका पुत्र रावण नामक राक्षस श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा क्रियात्मक उपाय और युक्तिकौशलके सहारे ही सम्बन्धियों और सेवकोंसहित मारा गया, उसी प्रकार आप भी पराक्रम प्रकट करें॥ ११ १/२॥ क्रियाभ्युपायैर्निहतौ मया राजन् पुरातनौ॥ १२॥ तारकश्च महादैत्यो विप्रचित्तिश्च वीर्यवान्। नरेश्वर! पूर्वकालके महादैत्य तारक और पराक्रमी विप्रचित्तिको मैंने क्रियात्मक उपायोंसे ही मारा था॥ १२ १/२॥ वातापिरिल्वलश्चैव त्रिशिराश्च तथा विभो॥ १३॥ सुन्दोपसुन्दावसुरौ क्रिययैव निष्षूदितौ। क्रियाभ्युपायैरिन्द्रेण त्रिदिवं भुज्यते विभो॥ १४॥ प्रभो! वातापि, इल्वल, त्रिशिरा तथा सुन्द-उपसुन्द नामक असुर भी कार्यकौशलसे ही मारे गये हैं। क्रियात्मक उपायोंसे ही इन्द्र स्वर्गका राज्य भोगते हैं॥ १३-१४॥ क्रिया बलवती राजन् नान्यत् किंचिद् युधिष्ठिर।

दैत्याश्च दानवाश्चैव राक्षसाः पार्थिवास्तथा ॥ १५ ॥ क्रियाभ्युपायैर्निहताः क्रियां तस्मात् समाचर । राजन्! कार्यकौशल ही बलवान् है, दूसरी कोई वस्तु नहीं। युधिष्ठिर! दैत्य, दानव, राक्षस तथा बहुत-से भूपाल क्रियात्मक उपायोंसे ही मारे गये हैं; अतः आप भी क्रियात्मक उपायका ही आश्रय लें ॥ १५ १/२ ॥

संजय उवाच

इत्युक्तो वासुदेवेन पाण्डवः संशितव्रतः ॥ १६ ॥ जलस्थं तं महाराज तव पुत्रं महाबलम् । अभ्यभाषत कौन्तेयः प्रहसन्निव भारत ॥ १७ ॥ संजय कहते हैं—महाराज! भरतनन्दन! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर उत्तम एवं कठोर व्रतका पालन करनेवाले पाण्डुकुमार कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने जलमें स्थित हुए आपके महाबली पुत्रसे हँसते हुए-से कहा— ॥ १६-१७ ॥

सुयोधन किमर्थोऽयमारम्भोऽप्सु कृतस्त्वया । सर्वं क्षत्रं घातयित्वा स्वकुलं च विशाम्पते ॥ १८ ॥ जलाशयं प्रविष्टोऽद्य वाञ्छञ्जीवितमात्मनः । उत्तिष्ठ राजन् युध्यस्व सहास्माभिः सुयोधन ॥ १९ ॥ ‘प्रजानाथ सुयोधन! तुमने किसलिये पानीमें यह अनुष्ठान आरम्भ किया है। सम्पूर्ण क्षत्रियों तथा अपने कुलका संहार कराकर आज अपनी जान बचानेकी इच्छासे तुम जलाशयमें घुसे बैठे हो। राजा सुयोधन! उठो और हम लोगोंके साथ युद्ध करो ॥ १८-१९ ॥

स ते दर्पो नरश्रेष्ठ स च मानः क्व ते गतः । यस्त्वं संस्तभ्य सलिलं भीतो राजन् व्यवस्थितः ॥ २० ॥ ‘राजन्! नरश्रेष्ठ! तुम्हारा वह पहलेका दर्प और अभिमान कहाँ चला गया, जो डरके मारे जलका स्तम्भन करके यहाँ छिपे हुए हो? ॥ २० ॥

सर्वे त्वां शूर इत्येवं जना जल्पन्ति संसदि । व्यर्थं तद् भवतो मन्ये शौर्यं सलिलशायिनः ॥ २१ ॥ ‘सभामें सब लोग तुम्हें शूरवीर कहा करते हैं। जब तुम भयभीत होकर पानीमें सो रहे हो, तब तुम्हारे उस तथाकथित शौर्यको मैं व्यर्थ समझता हूँ ॥ २१ ॥

उत्तिष्ठ राजन् युध्यस्व क्षत्रियोऽसि कुलोद्भवः । कौरवेयो विशेषेण कुलं जन्म च संस्मर ॥ २२ ॥ ‘राजन्! उठो, युद्ध करो; क्योंकि तुम कुलीन क्षत्रिय हो, विशेषतः कुरुकुलकी संतान हो। अपने कुल और जन्मका स्मरण तो करो ॥ २२ ॥