BharatKosha
Back to the archive

महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages

अध्याय (पृष्ठ 1405)

Page 1405Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

महर्षि पञ्चशिखका महाराज जनकको उपदेश

Page 1406Permalink

अथ चेदेवमप्यस्ति यल्लोके नोपपद्यते ।
अजरोऽयममृत्युश्च राजासौ मन्यते यथा ॥ २५ ॥
यदि ऐसी वस्तुका भी अस्तित्व मान लिया जाय, जो लोकमें सम्भव नहीं है अर्थात् यदि शास्त्रके आधारपर यह स्वीकार कर लिया जाय कि शरीरसे भिन्न कोई अजर-अमर आत्मा है, जो स्वर्गादि लोकोंमें दिव्य सुख भोगता है, तब तो बन्दीजन जो राजाको अजर-अमर कहते हैं, उनकी वह बात भी ठीक माननी पड़ेगी (सारांश यह है कि जैसे बन्दीजन आशीर्वादमें उपचारतः राजाको अजर-अमर कहते हैं, उसी प्रकार यह शास्त्रका वचन भी औपचारिक ही है। नीरोग शरीरको ही अजर-अमर और यहाँके प्रत्यक्ष सुख-भोगको ही स्वर्गीय सुख कहा गया है) ॥ २५ ॥

अस्ति नास्तीति चाप्येतत् तस्मिन्नसति लक्षणे ।
किमधिष्ठाय तद् ब्रूयाल्लोकयात्राविनिश्चयम् ॥ २६ ॥
यदि आत्मा है या नहीं—यह संशय उपस्थित होनेपर अनुमानसे उसके अस्तित्वका साधन किया जाय तो इसके लिये कोई ऐसा ज्ञापक हेतु नहीं उपलब्ध होता, जो कहीं दोषयुक्त न होता हो; फिर किस अनुमानका आश्रय लेकर लोकव्यवहारका निश्चय किया जा सकता है ॥ २६ ॥

प्रत्यक्षं ह्येतयोर्मूलं कृतान्तैतिह्ययोरपि ।
प्रत्यक्षेणागमो भिन्नः कृतान्तो वा न किञ्चन ॥ २७ ॥
अनुमान और आगम—इन दोनों प्रमाणोंका मूल प्रत्यक्ष प्रमाण है। आगम या अनुमान यदि प्रत्यक्ष अनुभवके विरुद्ध है तो वह कुछ भी नहीं है—उसकी प्रामाणिकता नहीं स्वीकार की जा सकती ॥ २७ ॥

यत्र यत्रानुमानेऽस्मिन् कृतं भावयतोऽपि च ।
नान्यो जीवः शरीरस्य नास्तिकानां मते स्थितः ॥ २८ ॥
जहाँ-कहीं भी ईश्वर, अदृष्ट अथवा नित्य आत्माकी सिद्धिके लिये अनुमान किया जाता है, वहाँ साध्य-साधनके लिये की हुई भावना भी व्यर्थ है, अतः नास्तिकोंके मतमें जीवात्माकी शरीरसे भिन्न कोई सत्ता नहीं है—यह बात स्थिर हुई ॥ २८ ॥

रेतो वटकणीकायां घृतपाकाधिवासनम् ।
जातिः स्मृतिरयस्कान्तः सूर्यकान्तोऽम्बुभक्षणम् ॥ २९ ॥
जैसे वटवृक्षके बीजमें पत्र, पुष्प, फल, मूल तथा त्वचा आदि छिपे होते हैं, जैसे गायके द्वारा खायी हुई घासमेंसे घी, दूध आदि प्रकट होते हैं तथा जिस प्रकार अनेक औषध द्रव्योंका पाक एवं अधिवासन करनेसे उसमें नशा पैदा करनेवाली शक्ति आ जाती है, उसी प्रकार वीर्यसे ही शरीर आदिके साथ चेतनता भी प्रकट होती है। इसके सिवा जाति, स्मृति, अयस्कान्तमणि, सूर्यकानामणि और बड़वानलके द्वारा समुद्रके जलका पान आदि दृष्टान्तोंसे भी देहातिरिक्त चैतन्यकी सिद्धि नहीं होती* ॥ २९ ॥

Page 1407Permalink

प्रेतीभूतेऽत्ययश्चैव देवताद्युपयाचनम् ।
मृते कर्मनिवृत्तिश्च प्रमाणमिति निश्चयः ॥ ३० ॥

(इस नास्तिक मतका खण्डन इस प्रकार समझना चाहिये) मरे हुए शरीरमें जो चेतनताका अभाव देखा जाता है, वही देहातिरिक्त आत्माके अस्तित्वमें प्रमाण है (यदि चेतनता देहका ही धर्म हो तो मृतक शरीरमें भी उसकी उपलब्धि होनी चाहिये; परंतु मृत्युके पश्चात् कुछ कालतक शरीर तो रहता है, पर उसमें चेतनता नहीं रहती; अतः यह सिद्ध हो जाता है कि चेतन आत्मा शरीरसे भिन्न है)। नास्तिक भी रोग आदिकी निवृत्तिके लिये मन्त्र, जप तथा तान्त्रिक पद्धतिसे देवता आदिकी आराधना करते हैं। (वह देवता क्या है? यदि पाञ्चभौतिक है तो घट आदिकी भाँति उसका दर्शन होना चाहिये और यदि वह भौतिक पदार्थोंसे भिन्न है तो चेतनकी सत्ता स्वतः सिद्ध हो गयी; अतः देहसे भिन्न आत्मा है, यह प्रत्यक्ष अनुभवसे सिद्ध हो जाता है और देह ही आत्मा है, यह प्रत्यक्ष अनुभवके विरुद्ध जान पड़ता है)। यदि शरीरकी मृत्युके साथ आत्माकी भी मृत्यु मान ली जाय, तब तो उसके किये हुए कर्मोंका भी नाश मानना पड़ेगा; फिर तो उसके शुभाशुभ कर्मोंका फल भोगनेवाला कोई नहीं रह जायगा और देहकी उत्पत्तिमें अकृताभ्यागम (बिना किये हुए कर्मका ही भोग प्राप्त हुआ ऐसा) माननेका प्रसंग उपस्थित होगा। ये सब प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि देहातिरिक्त चेतन आत्माकी सत्ता अवश्य है ॥ ३० ॥

नन्वेते हेतवः सन्ति ये केचिन्मूर्त्तिसंस्थिताः ।
अमूर्त्तस्य हि मूर्तेन सामान्यं नोपपद्यते ॥ ३१ ॥

नास्तिकोंकी ओरसे जो कोई हेतुभूत दृष्टान्त दिये गये हैं, वे सब मूर्त पदार्थ हैं। मूर्त जड पदार्थसे मूर्त जड पदार्थकी ही उत्पत्ति होती है। यही उन दृष्टान्तोंद्वारा सिद्ध होता है। जैसे काष्ठसे अग्निकी उत्पत्ति (यदि पञ्चभूतोंसे आत्माकी अथवा मूर्तसे अमूर्तकी उत्पत्ति स्वीकार की जाय तब तो पृथ्‍वी आदि मूर्त पदार्थोंसे आकाशकी भी उत्पत्ति माननी पड़ेगी, जो असम्भव है)। आत्मा अमूर्त पदार्थ है और देह मूर्त; अतः अमूर्तकी मूर्तके साथ समानता अथवा मूर्त भूतोंके संयोगसे अमूर्त चेतन आत्माकी उत्पत्ति नहीं हो सकती ॥ ३१ ॥

अविद्या कर्म तृष्णा च केचिदाहुः पुनर्भवे ।
कारणं लोभमोहौ तु दोषाणां तु निषेवणम् ॥ ३२ ॥

कुछ लोग अविद्या, कर्म, तृष्णा, लोभ, मोह तथा दोषोंके सेवनको पुनर्जन्ममें कारण बताते हैं ॥ ३२ ॥

अविद्यां क्षेत्रमाहुर्हि कर्म बीजं तथा कृतम् ।
तृष्णा संजननं स्नेह एष तेषां पुनर्भवः ॥ ३३ ॥

अविद्याको वे क्षेत्र कहते हैं। पूर्व-जन्मोंका किया हुआ कर्म बीज है और तृष्णा अंकुरकी उत्पत्ति करानेवाला स्नेह या जल है। यही उनके मतमें पुनर्जन्मका प्रकार है ॥ ३३ ॥

Page 1408Permalink

तस्मिन् गूढे च दग्धे च भिन्ने मरणधर्मिणि ।
अन्योऽस्माज्जायते देहस्तमाहुः सत्त्वसंक्षयम् ॥ ३४ ॥
वे अविद्या आदि कारणसमूह सुषुप्ति और प्रलयमें भी संस्काररूपमें गूढ़भावसे स्थित रहते हैं। उनके रहते हुए जब एक मरणधर्मा शरीर नष्ट हो जाता है, तब उसीसे पूर्वोक्त अविद्या आदिके कारण दूसरा शरीर उत्पन्न हो जाता है। जब ज्ञानके द्वारा अविद्या आदि निमित्त दग्ध हो जाते हैं, तब शरीर-नाशके पश्चात् सत्त्व (बुद्धि) का क्षयरूप मोक्ष होता है, ऐसा उनका कथन है ॥ ३४ ॥
यदा स्वरूपतश्चान्यो जातितः शुभतोऽर्थतः ।
कथमस्मिन् स इत्येवं सर्वं वा स्यादसंहितम् ॥ ३५ ॥
(उपर्युक्त नास्तिक मतमें आस्तिकलोग इस प्रकार दोष देते हैं—) क्षणिक विज्ञानवादीकी मान्यताके अनुसार शरीर और जीव जब क्षणिक हैं, तब पूर्व-क्षणवर्ती शरीरसे परक्षणवर्ती शरीर रूप, जाति, धर्म और प्रयोजन सभी दृष्टियोंसे भिन्न हैं। ऐसी अवस्थामें यह वही है, इस प्रकार प्रत्यभिज्ञा (स्मृति) नहीं हो सकती। अथवा भोग, मोक्ष आदि सब कुछ बिना इच्छा किये ही अकस्मात् प्राप्त हो जाता है, ऐसा मानना पड़ेगा (उस दशामें यह भी कहा जा सकता है कि मोक्षकी इच्छा करनेवाला दूसरा है, साधन करनेवाला दूसरा है और उससे मुक्त होनेवाला भी दूसरा ही है) ॥ ३५ ॥
एवं सति च का प्रीतिर्दानविद्यातपोबलैः ।
यदस्याचरितं कर्म सर्वमन्यत् प्रपद्यते ॥ ३६ ॥
यदि ऐसी ही बात है, तब दान, विद्या, तपस्या और बलसे किसीको क्या प्रसन्नता होगी? क्योंकि उसका किया हुआ सारा कर्म दूसरेको ही अपना फल प्रदान करेगा (अर्थात् दान करते समय जो दाता है, वह क्षणिक विज्ञानवादके अनुसार फल-भोगकालमें नहीं रह जाता, अतः पुण्य या पाप एक करता है और उसका फल दूसरा भोगता है) ॥ ३६ ॥
अपि ह्यायमिहैवान्यैः प्राक् कृतैर्दुःखितो भवेत् ।
सुखितो दुःखितो वापि दृश्यादृश्यविनिर्णयः ॥ ३७ ॥
(यदि कहें, यह आपत्ति तो अभीष्ट ही है कि कर्म करते समय जो कर्ता है, वह फल-भोग-कालमें नहीं है। एक विज्ञानसे उत्पन्न हुआ दूसरा विज्ञान ही फल भोगता है, तब तो) इस जगत्में यह देवदत्त नामक पुरुष यज्ञदत्त आदि दूसरोंके किये हुए अशुभ कर्मोंसे दुखी एवं परकृत शुभ कर्मोंसे सुखी हो सकता है (क्योंकि जब कर्ता दूसरा और भोक्ता दूसरा है, तब तो किसीका भी कर्म किसीको भी सुख-दुःख दे सकता है)। उस दशामें दृश्य और अदृश्यका निर्णय भी यही होगा कि जो पूर्वक्षणमें दृश्य था, वह वर्तमान क्षणमें अदृश्य हो गया तथा जो पहले अदृश्य था, वही इस समय दृश्य हो रहा है ॥ ३७ ॥
तथा हि मुसलैर्हन्युः शरीरं तत् पुनर्भवेत् ।
पृथग्ज्ञानं यदन्यच्च येनैतन्नोपपद्यते ॥ ३८ ॥

Page 1409Permalink

यदि कहें, देवदत्तके ज्ञानसे यज्ञदत्तका ज्ञान पृथक् एवं विजातीय है, सजातीय

विज्ञानधारामें ही कर्म और उसके फलका भोग प्राप्त होता है; अतः देवदत्तके किये हुए

कर्मका भोग यज्ञदत्तको नहीं प्राप्त हो सकता, उस कारण पूर्वोक्त दोषकी आपत्ति सम्भव

नहीं है, तब हम यह पूछते हैं कि आपके मतमें जो यह सादृश्य या सजातीय विज्ञान उत्पन्न

होता है, उसका उपादान क्या है? यदि पूर्वक्षणवर्ती विज्ञानको ही उपादान बताया जाय तो

यह ठीक नहीं है; क्योंकि वह विज्ञान नष्ट हो चुका और यदि पूर्वक्षणवर्ती विज्ञानका नाश ही

उत्तरक्षणवर्ती सजातीय विज्ञानकी उत्पत्तिमें कारण है, तब तो यदि कुछ लोग किसीके

शरीरको मूसलोंसे मार डालें तो उस मरे हुए शरीरसे भी दूसरे शरीरकी पुनः उत्पत्ति हो

सकती है (अतः यह मत ठीक नहीं है) ।। ३८ ।।

ऋतुसंवत्सरौ तिष्यः शीतोष्णेऽथ प्रियाप्रिये ।

यथातीतानि पश्यन्ति तादृशः सत्त्वसंक्षयः ।। ३९ ।।

ऋतु, संवत्सर, युग, सर्दी, गर्मी तथा प्रिय और अप्रिय—ये सब वस्तुएँ आकर चली

जाती हैं और जाकर फिर आ जाती हैं, यह सब लोग प्रत्यक्ष देखते हैं। उसी प्रकार

सत्त्वसंक्षयरूप मोक्ष भी फिर आकर निवृत्त हो सकता है (क्योंकि विज्ञानधाराका कहीं

अन्त नहीं है) ।। ३९ ।।

जरयाभिपरीतस्य मृत्युना च विनाशिना ।

दुर्बलं दुर्बलं पूर्वं गृहस्येव विनश्यति ।। ४० ।।

जैसे मकानके दुर्बल-दुर्बल अंग पहले नष्ट होने लगते हैं और फिर क्रमशः सारा मकान

ही गिर जाता है, उसी प्रकार वृद्धावस्था और विनाशकारी मृत्युसे आक्रान्त हुए शरीरके

दुर्बल-दुर्बल अंग क्षीण होते-होते एक दिन सम्पूर्ण शरीरका नाश हो जाता है ।। ४० ।।

इन्द्रियाणि मनो वायुः शोणितं मांसमस्थि च ।

आनुपूर्व्या विनश्यन्ति स्वं धातुमुपयान्ति च ।। ४१ ।।

इन्द्रिय, मन, प्राण, रक्त, मांस और हड्डी—ये सब क्रमशः नष्ट होते और अपने

कारणमें मिल जाते हैं ।। ४१ ।।

लोकयात्राविघातश्च दानधर्मफलागमे ।

तदर्थं वेदशब्दाश्च व्यवहाराश्च लौकिकाः ।। ४२ ।।

यदि आत्माकी सत्ता न मानी जाय तो लोकयात्राका निर्वाह नहीं होगा। दान और दूसरे

धर्मोंके फलकी प्राप्तिके लिये कोई आस्था नहीं रहेगी; क्योंकि वैदिक शब्द और लौकिक

व्यवहार सब आत्माको ही सुख देनेके लिये हैं ।। ४२ ।।

इति सम्यङ्मनस्येते बहवः सन्ति हेतवः ।

एतदस्तीदमस्तीति न किञ्चित्प्रतिदृश्यते ।। ४३ ।।

इस प्रकार मनमें अनेक प्रकारके तर्क उठते हैं और उन तर्कों तथा युक्तियोंसे आत्माकी

सत्ता या असत्ताका निर्धारण कुछ भी होता नहीं दिखायी देता ।। ४३ ।।

Page 1410Permalink

तेषां विमृशतामेव तत् तत्समभिधावताम् । क्वचिन्निविशते बुद्धिस्तत्र जीर्यति वृक्षवत् ॥ ४४ ॥ इस तरह विचार करते हुए भिन्न-भिन्न मतोंकी ओर दौड़नेवाले लोगोंकी बुद्धि कहीं एक जगह प्रवेश करती है और वहीं वृक्षकी भाँति जड़ जमाये जीर्ण हो जाती है ॥ ४४ ॥

एवमर्थैरनर्थैश्च दुःखिताः सर्वजन्तवः । आगमैरपकृष्यन्ते हस्तिपैर्हस्तिनो यथा ॥ ४५ ॥ इस प्रकार अर्थ और अनर्थसे सभी प्राणी दुखी रहते हैं। केवल शास्त्रके वचन ही उन्हें खींचकर राहपर लाते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे महावत हाथीपर अंकुश रखकर उन्हें काबूमें किये रहते हैं ॥ ४५ ॥

अर्थांस्तथात्यन्तसुखावहांश्च लिप्सन्त एते बहवो विशुष्काः । महत्तरं दुःखमनुप्रपन्ना हित्वाऽऽमिषं मृत्युवशं प्रयान्ति ॥ ४६ ॥ बहुत-से शुष्क हृदयवाले लोग ऐसे विषयोंकी लिप्सा रखते हैं, जो अत्यन्त सुखदायक हों; किंतु इस लिप्सामें उन्हें भारी-से-भारी दुःखोंका ही सामना करना पड़ता है और अन्तमें वे भोगोंको छोड़कर मृत्युके ग्रास बन जाते हैं ॥ ४६ ॥

विनाशिनो ह्यध्रुवजीवितस्य किं बन्धुभिर्भिन्नपरिग्रहैश्च । विहाय यो गच्छति सर्वमेव क्षणेन गत्वा न निवर्तते च ॥ ४७ ॥ जो एक दिन नष्ट होनेवाला है, जिसके जीवनका कुछ ठिकाना नहीं, ऐसे अनित्य शरीरको पाकर इन बन्धु-बान्धवों तथा स्त्री-पुत्र आदिसे क्या लाभ है? यह सोचकर जो मनुष्य इन सबको क्षणभरमें वैराग्यपूर्वक त्यागकर चल देता है, उसे मृत्युके पश्चात् फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेना पड़ता ॥ ४७ ॥

भूव्योमतोयानलवायवोऽपि सदा शरीरं प्रतिपालयन्ति । इतीदमालक्ष्य रतिः कुतो भवेद् विनाशिनोऽप्यस्य न शर्म विद्यते ॥ ४८ ॥ पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि और वायु—ये सदा शरीरकी रक्षा करते रहते हैं। इस बातको अच्छी तरह समझ लेनेपर इसके प्रति आसक्ति कैसे हो सकती है? जो एक दिन मृत्युके मुखमें पड़नेवाला है, ऐसे शरीरसे सुख कहाँ है ॥ ४८ ॥

इदमनुपधिवाक्यमच्छलं परमनिरामयमात्मसाक्षिकम् ।

Page 1411Permalink

नरपतिरभिवीक्ष्य विस्मितः
पुनरनुयोक्तुमिदं प्रचक्रमे ॥ ४९ ॥

पंचशिखका यह उपदेश जो भ्रम और वंचनासे रहित, सर्वथा निर्दोष तथा आत्माका साक्षात्कार करानेवाला था, सुनकर राजा जनकको बड़ा विस्मय हुआ; अतः उन्होंने पुनः प्रश्न करनेका विचार किया ॥ ४९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञ्चशिखवाक्ये पाषण्डखण्डनं नामाष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पंचशिखके उपदेशके प्रसंगमें पाखण्डखण्डन नामक दो सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१८ ॥


१. जन्मके समय गर्भवास आदिके कारण जो कष्ट होता है, उसपर विचार करके शरीरसे वैराग्य होना 'जातिनिर्वेद' है।
२. कर्मजनित क्लेश—नाना योनियोंकी प्राप्ति एवं नरकादि यातनाका विचार करके पाप तथा काम्य-कर्मोंसे विरत होना 'कर्मनिर्वेद' है।
३. इस जगत्की छोटी-से-छोटी वस्तुओंसे लेकर ब्रह्मलोकतकके भोगोंकी क्षणभंगुरता और दुःखरूपताका विचार करके सब ओरसे विरक्त होना 'सर्वनिर्वेद' कहलाता है।
* जाति कहते हैं जन्मको। जैसे गुड़ या महुवे आदिसे अनेक द्रव्योंके संयोगद्वारा जो मद्य तैयार किया जाता है, उसमें उपादानकी अपेक्षा विलक्षण मादकशक्तिका जन्म हो जाता है, उसी प्रकार पृथ्वी, जल, तेज और वायु—इन चार द्रव्योंके संयोगसे इस शरीरमें ही जीव चैतन्य प्रकट हो जाता है। जैसे जड मनसे अजड स्मृति उत्पन्न होती है, उसी प्रकार जड शरीरसे चेतन जीवकी उत्पत्ति हो जाती है। जैसे अयस्कान्तमणि (चुम्बक) जड होकर भी लोहको खींच लेती है, उसी प्रकार जड शरीर भी इन्द्रियोंका संचालन और नियन्त्रण कर लेता है; अतः आत्मा उससे भिन्न नहीं है। जैसे सूर्यकान्तमणि शीतल होकर भी सूर्यकी किरणोंके संयोगसे आग प्रकट करने लगती है, उसी प्रकार वीर्य शीतल होकर भी रस और रक्तके संयोगसे जठरानलका आविष्कार करता है और जैसे जलसे उत्पन्न हुआ बड़वानल जलको ही भक्षण करता है, उसी प्रकार वीर्यसे उत्पन्न हुआ यह शरीर स्वयं भी वीर्यका आधान एवं धारण करता है। अतः शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है।

२१९-

Page 1412Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

पंचशिखके द्वारा मोक्षतत्त्वका विवेचन एवं भगवान् विष्णुद्वारा मिथिलानरेश जनकवंशी जनदेवकी परीक्षा और उनके लिये वरप्रदान

भीष्म उवाच

जनको जनदेवस्तु ज्ञापितः परमर्षिणा ।
पुनरेवानुपप्रच्छ साम्पराये भवाभवौ ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! महर्षि पंचशिखके इस प्रकार उपदेश देनेपर जनदेव जनकने पुनः उनसे मृत्युके पश्चात् आत्माकी सत्ता या विनाशके विषयमें प्रश्न किया ॥ १ ॥

जनक उवाच

भगवन् यदि न प्रेत्य संज्ञा भवति कस्यचित् ।
एवं सति किमज्ञानं ज्ञानं वा किं करिष्यति ॥ २ ॥
जनकने पूछा— भगवन्! यदि मृत्युके पश्चात् किसीकी कोई विशेष संज्ञा नहीं रह जाती तो उस स्थितिमें अज्ञान अथवा ज्ञान क्या करेगा? ॥ २ ॥

सर्वमुच्छेदनिष्ठं स्यात् पश्य चैतद् द्विजोत्तम ।
अप्रमत्तः प्रमत्तो वा किं विशेषं करिष्यति ॥ ३ ॥
द्विजश्रेष्ठ! देखिये, मनुष्यकी मृत्युके साथ-साथ उसका सारा साधन नष्ट हो जाता है; फिर वह पहलेसे सावधान हो या असावधान, क्या विशेष लाभ उठा सकेगा? ॥ ३ ॥

असंसर्गो हि भूतेषु संसर्गो वा विनाशिषु ।
कस्मै क्रियेत कल्प्येत निश्चयः कोऽत्र तत्त्वतः ॥ ४ ॥
मृत्यु होनेके पश्चात् जीवात्माका विनाशशील पञ्चमहाभूतोंसे कोई संसर्ग रहता है या नहीं? यदि रहता है तो किसलिये रहता है? इस विषयमें यथार्थरूपसे क्या निश्चय किया जा सकता है? ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

तमसा हि प्रतिच्छन्नं विभ्रान्तमिव चातुरम् ।
पुनः प्रशमयन् वाक्यैः कविः पञ्चशिखोऽब्रवीत् ॥ ५ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! राजा जनककी बुद्धिको अज्ञानान्धकारसे आच्छादित तथा आत्माके नाशकी सम्भावनासे भ्रान्त एवं व्याकुल जानकर ज्ञानी महात्मा पंचशिख उन्हें मधुर वचनोंद्वारा शान्त करते हुए-से बोले— ॥ ५ ॥

Page 1413Permalink

उच्छेदनिष्ठा नेहास्ति भावनिष्ठा न विद्यते ।
अयं ह्यापि समाहारः शरीरेन्द्रियचेतसाम् ।
वर्तते पृथगन्योन्यमप्याश्रित्य कर्मसु ॥ ६ ॥
'राजन्! मृत्युके पश्चात् आत्माका न तो नाश होता है और न वह किसी विशेष आकारमें ही परिणत होता है। यह जो प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाला संघात है, यह भी शरीर, इन्द्रिय और मनका समूहमात्र है। यद्यपि ये सब पृथक्-पृथक् हैं तो भी एक-दूसरेका आश्रय लेकर कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं ॥ ६ ॥

धातवः पञ्च भूतेषु खं वायुर्ज्योतिषो धरा ।
ते स्वभावेन तिष्ठन्ति वियुज्यन्ते स्वभावतः ॥ ७ ॥
प्राणियोंके शरीरमें उपादानके रूपमें आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—ये पाँच धातु हैं। ये स्वभावसे ही एकत्र होते और विलग हो जाते हैं ॥ ७ ॥

आकाशोवायूरूष्मा च स्नेहो यश्चापि पार्थिवः ।
एष पञ्चसमाहारः शरीरमपि नैकधा ॥ ८ ॥
आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—इन पाँच तत्त्वोंके समाहारसे ही अनेक प्रकारके शरीरोंका निर्माण हुआ है ॥ ८ ॥

ज्ञानमूष्मा च वायुश्च त्रिविधः कार्यसंग्रहः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च स्वभावश्चेतना मनः ।
प्राणापानौ विकारश्च धातवश्चात्र निःसृताः ॥ ९ ॥
शरीरमें ज्ञान (बुद्धि), ऊष्मा (जठरानल) तथा वायु (प्राण)—इनका समुदाय समस्त कर्मोंका संग्राहक-गण है; क्योंकि इन्हींसे इन्द्रिय, इन्द्रियोंके विषय, स्वभाव, चेतना, मन, प्राण, अपान, विकार और धातु प्रकट हुए हैं ॥ ९ ॥

श्रवणं स्पर्शनं जिह्वा दृष्टिर्नासा तथैव च ।
इन्द्रियाणीति पञ्चैते चित्तपूर्वं गता गुणाः ॥ १० ॥
श्रवण, त्वचा, जिह्वा, नेत्र और नासिका—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। शब्द आदि गुण चित्तसे संयुक्त होकर इन इन्द्रियोंके विषय होते हैं ॥ १० ॥

तत्र विज्ञानसंयुक्ता त्रिविधा चेतना ध्रुवा ।
सुखदुःखेति यामाहुरदुःखामसुखेति च ॥ ११ ॥
विज्ञानयुक्त चेतना (विषयोंकी उपादेयता, हेयता और उपेक्षणीयताके कारण) निश्चय ही तीन प्रकारकी होती है। उसे अदुःखा, असुखा और सुख-दुःखा कहते हैं ॥ ११ ॥

शब्दः स्पर्शं च रूपं च रसो गन्धश्च मूर्तयः ।
एते ह्यामरणात् पञ्च षड्गुणा ज्ञानसिद्धये ॥ १२ ॥
शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध तथा मूर्त द्रव्य—ये छः गुण जीवकी मृत्युके पहलेतक इन्द्रियजन्य ज्ञानके साधक होते हैं (इनके साथ इन्द्रियोंका संयोग होनेपर ही भिन्न-भिन्न

Page 1414Permalink

विषयोंका ज्ञान होता है) ॥ १२ ॥ तेषु कर्मविसर्गश्च सर्वतत्त्वार्थनिश्चयः । तमाहुः परमं शुक्लं बुद्धिरित्यव्ययं महत् ॥ १३ ॥ श्रोत्र आदि इन्द्रियोंमें उनके विषयोंका विसर्जन (त्याग) करनेसे सम्पूर्ण तत्त्वोंके यथार्थ निश्चयरूप मोक्षकी प्राप्ति होती है। उस तत्त्वनिश्चयको अत्यन्त निर्मल उत्तम ज्ञान और अविनाशी महान् ब्रह्मपद कहते हैं ॥ १३ ॥ इमं गुणसमाहारमात्मभावेन पश्यतः । असम्यग्दर्शनैर्दुःखमनन्तं नोपशाम्यति ॥ १४ ॥ जो लोग गुणोंके संघातस्वरूप इस शरीरको ही आत्मा समझ लेते हैं, उन्हें मिथ्या ज्ञानके कारण अनन्त दुःखोंकी प्राप्ति होती है और उनकी परम्परा कभी शान्त नहीं होती ॥ १४ ॥ अनात्मेति च यद् दृष्टं तेनाहं न ममेत्यपि । वर्तते किमधिष्ठानात् प्रसक्ता दुःखसंसृतिः ॥ १५ ॥ इसके विपरीत जिनकी दृष्टिमें यह दृश्य प्रपंच अनात्मा सिद्ध हो चुका है, उनकी इसके प्रति न ममता होती है न अहंता, फिर उन्हें दुःखपरम्परा कैसे प्राप्त हो; उन दुःखोंके लिये आधार ही क्या रह जाता है? ॥ १५ ॥ अत्र सम्यग्वधो नाम त्यागशास्त्रमनुत्तमम् । शृणु यत् तव मोक्षाय भाष्यमाणं भविष्यति ॥ १६ ॥ अब मैं उस परम उत्तम सांख्यशास्त्रका वर्णन करता हूँ, जिसका नाम है सम्यग्वध (सम्यग्रूपेण दुःखोंका नाश करनेवाला)। उसमें त्यागकी प्रधानता है। तुम ध्यान देकर सुनो। उसका उपदेश तुम्हारे लिये मोक्षदायक होगा ॥ १६ ॥ त्याग एव हि सर्वेषां युक्तानामपि कर्मणाम् । नित्यं मिथ्याविनीतानां क्लेशो दुःखवहो मतः ॥ १७ ॥ जो लोग मुक्तिके लिये प्रयत्नशील हों, उन सबको चाहिये कि सम्पूर्ण कर्मोंमें अहंता, ममता, आसक्ति और कामनाका त्याग करे। जो इनका त्याग किये बिना ही विनीत (शम, दम आदि साधनोंमें तत्पर) होनेका झूठा दावा करते हैं, उन्हें अविद्या आदि दुःखदायी क्लेश प्राप्त होते हैं ॥ १७ ॥ द्रव्यत्यागे तु कर्माणि भोगत्यागे व्रतान्यपि । सुखत्यागे तपो योगं सर्वत्यागे समापना ॥ १८ ॥ शास्त्रोंमें द्रव्यका त्याग करनेके लिये यज्ञ आदि कर्म, भोगका त्याग करनेके लिये व्रत, दैहिक सुखोंके त्यागके लिये तप और सब कुछ (अहंता, ममता, आसक्ति, कामना आदि) त्याग देनेके लिये योगके अनुष्ठानकी आज्ञा दी गयी है। यही त्यागकी चरम सीमा है ॥ १८ ॥ तस्य मार्गोऽयमद्वैधः सर्वत्यागस्य दर्शितः ।

Page 1415Permalink

विप्रहाणाय दुःखस्य दुर्गतिस्त्वन्यथा भवेत् ॥ १९ ॥ सर्वस्व-त्यागका यह एकमात्र मार्ग ही दुःखोंसे छुटकारा पानेके लिये उत्तम बताया गया है, इसके विपरीत आचरण करनेवालोंको दुर्गति भोगनी पड़ती है ॥ १९ ॥ पञ्चज्ञानेन्द्रियाण्युक्त्वा मनःषष्ठानि चेतसि । बलषष्ठानि वक्ष्यामि पञ्चकर्मेन्द्रियाणि तु ॥ २० ॥ बुद्धिमें स्थित मनसहित पाँच ज्ञानेन्द्रियोंका वर्णन करके अब पाँच कर्मेन्द्रियोंका वर्णन करूँगा। जिनके साथ प्राणशक्ति छठी बतायी गयी है ॥ २० ॥ हस्तौ कर्मेन्द्रियं ज्ञेयमथ पादौ गतीन्द्रियम् । प्रजनानन्दयोः शेफो निसर्ग पायुरिन्द्रियम् ॥ २१ ॥ दोनों हाथोंको काम करनेवाली इन्द्रिय जानना चाहिये, दोनों पैर चलने-फिरनेका काम करनेवाली इन्द्रिय हैं। लिंग संतानोत्पादन एवं मैथुनजनित आनन्दकी प्राप्ति करनेके लिये है। गुदनामक इन्द्रियका कार्य मल-त्याग करना है ॥ २१ ॥ वाक् च शब्दविशेषार्थमिति पञ्चान्वितं विदुः । एवमेकादशैतानि बुद्ध्याऽऽशु विसृजेन्मनः ॥ २२ ॥ वाक्-इन्द्रिय शब्दविशेषका उच्चारण करनेके लिये है। इस प्रकार पाँच कर्मेन्द्रियोंको पाँच विषयोंसे युक्त माना गया है। मनसहित एकादश इन्द्रियोंके विषयोंका बुद्धिके द्वारा शीघ्र त्याग कर देना चाहिये ॥ २२ ॥ कर्णौ शब्दश्च चित्तं च त्रयः श्रवणसंग्रहे । तथा स्पर्शे तथा रूपे तथैव रसगन्धयोः ॥ २३ ॥ श्रवण-कालमें श्रोत्ररूपी इन्द्रिय, शब्दरूपी विषय और चित्तरूपी कर्ता—इन तीनोंका संयोग होता है, इसी प्रकार स्पर्श, रूप, रस तथा गन्धके अनुभव-कालमें भी इन्द्रिय, विषय एवं मनका संयोग अपेक्षित है ॥ २३ ॥ एवं पञ्चत्रिका ह्येते गुणास्तदुपलब्धये । येनायं त्रिविधो भावः पर्यायात् समुपस्थितः ॥ २४ ॥ इस प्रकार ये तीन-तीनके पाँच समुदाय हैं, ये सब गुण कहे गये हैं। इनसे शब्दादि विषयोंका ग्रहण होता है, जिससे ये कर्ता, कर्म और करणरूपी त्रिविध भाव बारी-बारीसे उपस्थित होते हैं ॥ २४ ॥ सात्त्विको राजसश्चापि तामसश्चापि ते त्रयः । त्रिविधा वेदना येषु प्रसूताः सर्वसाधनाः ॥ २५ ॥ इनमेंसे एक-एकके सात्त्विक, राजस और तामस तीन-तीन भेद होते हैं। उनसे प्राप्त होनेवाले अनुभव भी तीन प्रकारके ही हैं। जो हर्ष, प्रीति आदि सभी भावोंके साधक हैं ॥ २५ ॥ प्रहर्षः प्रीतिरानन्दः सुखं संशान्तचित्तता ।

Page 1416Permalink

अकुतश्चित् कुतश्चिद् वा चिन्तितः सात्त्विको गुणः ॥ २६ ॥ हर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख और चित्तकी शान्ति-ये सब भाव बिना किसी कारणके स्वतः हों या कारणवश (भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सत्संग आदिके कारण) हों, सात्त्विक गुण माने गये हैं ॥ २६ ॥

अतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथाऽक्षमा । लिङ्गानि रजसस्तानि दृश्यन्ते हेत्वहेतुतः ॥ २७ ॥ असंतोष, संताप, शोक, लोभ और असहनशीलता—ये किसी कारणसे हों या अकारण—रजोगुणके चिह्न हैं ॥

अविवेकस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतन्द्रिता । कथंचिदपि वर्तन्ते विविधास्तामसा गुणाः ॥ २८ ॥ अविवेक, मोह, प्रमाद, स्वप्न और आलस्य—ये किसी तरह भी क्यों न हों, तमोगुणके ही विविध रूप हैं ॥

अत्र यत् प्रीतिसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् । वर्तते सात्त्विको भाव इत्यपेक्षेत तत् तथा ॥ २९ ॥ इनमें जो शरीर या मनमें प्रीतिके संयोगसे उदित हो, वह सात्त्विक भाव है और उसको सत्त्वगुणकी वृद्धि जाननी चाहिये ॥ २९ ॥

यत् त्वसंतोषसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मनः । प्रवृत्तं रज इत्येवं ततस्तदपि चिन्तयेत् ॥ ३० ॥ जो अपने लिये असंतोषजनक एवं अप्रीतिकर हो, उसको रजोगुणकी प्रवृत्ति एवं अभिवृद्धि समझनी चाहिये ॥ ३० ॥

अथ यन्मोहसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् ॥ ३१ ॥ शरीर या मनमें जो अतर्क्य, अज्ञेय एवं मोह-संयुक्त भाव प्रादुर्भूत हो, उसको तमोगुणजनित जानना चाहिये ॥ ३१ ॥

श्रोत्रं व्योमाश्रितं भूतं शब्दः श्रोत्रं समाश्रितः । नोभयं शब्दविज्ञाने विज्ञानस्येतरस्य वा ॥ ३२ ॥ शब्दका आधार श्रोत्रेन्द्रिय है और श्रोत्रेन्द्रियका आधार आकाश है; अतः वह आकाशरूप ही है। ऐसी स्थितिमें शब्दका अनुभव करते समय आकाश और श्रोत्र—ये दोनों ही ज्ञान अथवा अज्ञानके विषय नहीं होते हैं* ॥ ३२ ॥

एवं त्वक्चक्षुषी जिह्वा नासिका चेति पञ्चमी । स्पर्शे रूपे रसे गन्धे तानि चेतो मनश्च तत् ॥ ३३ ॥ इसी प्रकार त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका भी क्रमशः स्पर्श, रूप, रस और गन्धके आश्रय तथा अपने आधारभूत महाभूतोंके स्वरूप हैं। इन सबका कारण मन है, इसलिये ये

Page 1417Permalink

सब-के-सब मनःस्वरूप हैं ।। ३३ ।। स्वकर्मयुगपद्भावो दशस्वेतेषु तिष्ठति । चित्तमेकादशं विद्धि बुद्धिर्द्वादशमी भवेत् ।। ३४ ।। इन दसों इन्द्रियोंमें अपने-अपने विषयोंको एक साथ भी ग्रहण करनेकी शक्ति होती है। ग्यारहवाँ मन और बारहवीं बुद्धि—इनको इन्द्रियोंका सहायक समझना चाहिये ।। ३४ ।। तेषामयुगपद्भाव उच्छेदो नास्ति तामसे । आस्थितो युगपद्भावो व्यवहारः स लौकिकः ।। ३५ ।। तमोगुणजनित सुषुप्तिकालमें अपने कारणमें विलीन हो जानेसे इन्द्रियाँ विषयोंका ग्रहण नहीं कर सकतीं, किंतु उनका नाश नहीं होता है। उनमें जो अपने विषयोंको एक साथ ग्रहण करनेकी शक्ति है, वह लौकिक व्यवहारमें ही दिखायी देती है (सुषुप्तिकालमें नहीं) ।। ३५ ।। इन्द्रियाण्यपि सूक्ष्माणि दृष्ट्वा पूर्वश्रुतागमात् । चिन्तयन्नानुपर्येति त्रिभिरेवान्वितो गुणैः ।। ३६ ।। पहले जाग्रत्-अवस्थाके देखने-सुनने आदिके द्वारा पूर्ववासनावश शब्द आदि विषयोंकी प्राप्ति होनेसे स्वप्नदर्शी पुरुष सूक्ष्म ग्यारह इन्द्रियोंको देखकर विषयसंगकी भावना करता हुआ सत्त्व आदि तीनों गुणोंसे युक्त हो शरीरके भीतर ही इच्छानुसार घूमता रहता है ।। ३६ ।। यत् तमोपहतं चित्तमाशु संहारमध्रुवम् । करोत्युपरमं काये तदाहुस्तामसं बुधाः ।। ३७ ।। सुषुप्तिकालमें जब चित्त तमोगुणसे अभिभूत होकर अपने प्रवृत्ति और प्रकाश-स्वभावका शीघ्र ही संहार करके थोड़ी देरके लिये इन्द्रियोंके व्यापारको बंद कर देता है, उस समय शरीरमें जो सुखकी प्रतीति होती है, उसे विद्वान् पुरुष तामस सुख कहते हैं ।। ३७ ।। यद् यदागमसंयुक्तं न कृच्छ्रमनुपश्यति । अथ तत्राप्युपादत्ते तमोऽव्यक्तमिवानृतम् ।। ३८ ।। सुषुप्तिकालमें स्वप्नदर्शी पुरुष उपस्थित दुःखको प्रत्यक्षकी भाँति अनुभव नहीं करता है। इसलिये वह सुषुप्तिकालमें भी तमोगुणयुक्त मिथ्या सुखका अनुभव करता है ।। ३८ ।। एवमेष प्रसंख्यातः स्वकर्मप्रत्ययो गुणः । कथञ्चिद् वर्तते सम्यक् केषांचिद् वा निवर्तते ।। ३९ ।। इस प्रकार अपने कर्मके अनुसार गुणकी प्राप्तिके विषयमें कहा गया है। अज्ञानियोंके ये गुण सम्यक्रूपेण प्रवृत्त होते हैं और ज्ञानियोंके निवृत्त हो जाते हैं ।। ३९ ।। एतदाहुः समाहारं क्षेत्रमध्यात्मचिन्तकाः । स्थितो मनसि यो भावः स वै क्षेत्रज्ञ उच्यते ।। ४० ।।

Page 1418Permalink

अध्यात्मतत्त्वका चिन्तन करनेवाले विद्वान् इस शरीर और इन्द्रियोंके संघातको क्षेत्र कहते हैं और मनमें जो चेतन सत्ता स्थित है, वही क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) कहलाता है ॥ ४० ॥ एवं सति क उच्छेदः शाश्वतो वा कथं भवेत् । स्वभावाद् वर्तमानेषु सर्वभूतेषु हेतुतः ॥ ४१ ॥ ऐसी अवस्थामें आत्माका विनाश कैसे हो सकता है? अथवा हेतुपूर्वक प्रकृतिके अनुसार प्रवृत्त पञ्चमहाभूतोंसे उसका शाश्वत संसर्ग भी कैसे रह सकता है? ॥ ४१ ॥ यथार्णवगता नद्यो व्यक्तीर्जहति नाम च । नदाश्च ता नियच्छन्ति तादृशः सत्त्वसंक्षयः ॥ ४२ ॥ जैसे नद और नदियाँ समुद्रमें मिलकर अपने नाम और व्यक्तित्व (रूप) को त्याग देती हैं तथा जैसे बड़े-बड़े नद छोटी-छोटी नदियोंको अपनेमें विलीन कर लेते हैं, उसी प्रकार जीवात्मा परमात्मामें विलीन हो जाता है। यही मोक्ष है ॥ ४२ ॥ एवं सति कुतः संज्ञा प्रेत्यभावे पुनर्भवेत् । प्रतिसम्मिश्रिते जीवेऽगृह्यमाणे च सर्वतः ॥ ४३ ॥ जीवके ब्रह्ममें विलीन हो जानेपर उसके नाम-रूपका किसी प्रकार भी ग्रहण नहीं हो सकता। ऐसी दशामें मृत्युके पश्चात् जीवकी संज्ञा कैसे रहेगी? ॥ ४३ ॥ इमां च यो वेद विमोक्षबुद्धि- मात्मानमन्विच्छति चाप्रमत्तः । न लिप्यते कर्मफलैरनिष्टैः पत्रं बिसस्येव जलेन सिक्तम् ॥ ४४ ॥ जो इस मोक्षविद्याको जानता है और सावधानीके साथ आत्मतत्त्वका अनुसंधान करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी भाँति कर्मके अनिष्ट फलोंसे कभी लिप्त नहीं होता ॥ ४४ ॥ दृढैर्हि पाशैर्बहुभिर्विमुक्तः प्रजानिमित्तैरपि दैवतैश्च । यदा ह्यसौ सुखदुःखे जहाति मुक्तस्तदाग्र्यां गतिमेत्यलिङ्गः ॥ ४५ ॥ किंतु संतानोंके प्रति आसक्तिके कारण और भिन्न-भिन्न देवताओंकी प्रसन्नताके लिये अज्ञानियोंद्वारा जो सकाम कर्म किये जाते हैं, ये सब मनुष्यके लिये नाना प्रकारके सुदृढ़ बन्धन हैं। जब वह इन बन्धनोंसे छूटकर सुख-दुःखकी चिन्ता छोड़ देता है, उस समय सूक्ष्म शरीरके अभिमानका त्याग करके सर्वश्रेष्ठ गति प्राप्त कर लेता है ॥ ४५ ॥ श्रुतिप्रमाणागममङ्गलैश्च शेते जरामृत्युभयादभीतः । क्षीणे च पुण्ये विगते च पापे

Page 1419Permalink

ततो निमित्ते च फले विनष्टे । अलेपमाकाशमलिङ्गमेव- मास्थाय पश्यन्ति महत्यसक्ताः ॥ ४६ ॥ श्रुति-प्रतिपादित प्रमाणोंका विचार और शास्त्रमें बताये हुए मंगलमय साधनोंका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य जरा और मृत्युके भयसे रहित होकर सुखसे सोता है। जब पुण्य और पापका क्षय तथा उनसे मिलनेवाले सुख-दुःख आदि फलोंका नाश हो जाता है, उस समय सम्पूर्ण पदार्थोंमें सर्वथा आसक्तिसे रहित पुरुष आकाशके समान निर्लेप और निर्गुण परमात्मामें स्थित हुए उसका साक्षात्कार कर लेते हैं ॥ ४६ ॥

यथोर्णनाभिः परिवर्तमान- स्तन्तुक्षये तिष्ठति पात्यमानः । तथा विमुक्तः प्रजहाति दुःखं विध्वंसते लोष्ट इवाद्रिमृच्छन् ॥ ४७ ॥ जैसे मकड़ी जाला तानकर उसपर चक्कर लगाती रहती है; किंतु उन जालोंका नाश हो जानेपर एक स्थानपर स्थित हो जाती है, उसी प्रकार अविद्याके वशीभूत हो नीचे गिरनेवाला जीव कर्मजालमें पड़कर भटकता रहता है और उससे छूटनेपर दुःखसे रहित हो जाता है। जैसे पर्वतपर फेंका हुआ मिट्टीका ढेला उससे टकराकर चूर-चूर हो जाता है, उसी प्रकार उसके सम्पूर्ण दुःखोंका विध्वंस हो जाता है ॥ ४७ ॥

यथा रुरुः शृङ्गमथो पुराणं हित्वा त्वचं वाप्युरगो यथा च । विहाय गच्छत्यनवेक्षमाण- स्तथा विमुक्तो विजहाति दुःखम् ॥ ४८ ॥ जैसे रुरुनामक मृग अपने पुराने सींगको और साँप अपनी केंचुलको त्यागकर उसकी ओर देखे बिना ही चल देता है, उसी प्रकार ममता और अभिमानसे रहित हुआ पुरुष संसार-बन्धनसे मुक्त हो अपने सम्पूर्ण दुःखोंको दूर कर देता है ॥ ४८ ॥

द्रुमं यथा वाप्युदके पतन्त- मुत्सृज्य पक्षी निपत्यसक्तः । तथा ह्यसौ सुखदुःखे विहाय मुक्तः पराग्र्यां गतिमेत्यलिङ्गः ॥ ४९ ॥ जिस प्रकार पक्षी वृक्षको जलमें गिरते देख उसमें आसक्ति छोड़कर वृक्षका परित्याग करके उड़ जाता है, उसी प्रकार मुक्त पुरुष सुख और दुःख—दोनोंका त्याग करके सूक्ष्म शरीरसे रहित हो उत्तम गतिको प्राप्त होता है ॥ ४९ ॥

भीष्म उवाच

Page 1420Permalink

अपि च भवति मैथिलेन गीतं नगरमुपाहितमग्निनाभिवीक्ष्य । न खलु मम हि दह्यतेऽत्र किंचित् स्वयमिदमाह किल स्म भूमिपालः ॥ ५० ॥ इदममृतपदं निशम्य राजा स्वयमिह पञ्चशिखेन भाष्यमाणम् । निखिलमभिसमीक्ष्य निश्चितार्थः परमसुखी विजहार वीतशोकः ॥ ५१ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! स्वयं आचार्य पंचशिखके बताये हुए इस अमृतमय ज्ञानोपदेशको सुनकर राजा जनक एक निश्चित सिद्धान्तपर पहुँच गये और सारी बातोंपर विचार करके शोकरहित हो बड़े सुखसे रहने लगे; फिर तो उनकी स्थिति ही कुछ और हो गयी। एक बार उन मिथिलानरेश राजा जनकने मिथिला-नगरीको आगसे जलती देखकर स्वयं यह उद्गार प्रकट किया था कि इस नगरके जलनेसे मेरा कुछ भी नहीं जलता है ॥ ५०-५१ ॥

इमं हि यः पठति विमोक्षनिश्चयं महीपते सततमवेक्षते तथा । उपद्रवान् नानुभवत्यदुःखितः प्रमुच्यते कपिलमिवैत्य मैथिलः ॥ ५२ ॥ राजन्! यहाँ जो मोक्षतत्त्वका निर्णय किया गया है, उसका जो पुरुष सदा स्वाध्याय और चिन्तन करता रहता है, उसे उपद्रवोंका कष्ट नहीं भोगना पड़ता। दुःख तो उसके पास कभी फटकने नहीं पाते हैं तथा जिस प्रकार राजा जनक कपिलमतावलम्बी पंचशिखके समागमसे इस ज्ञानको पाकर मुक्त हो गये थे, उसी प्रकार वह भी मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ५२ ॥

(श्रूयतां नृपशार्दूल यदर्थं दीपिता पुरा । वह्निना दीपिता सा तु तन्मे शृणु महामते ॥ नृपश्रेष्ठ! महामते! पूर्वकालमें जिस उद्देश्यसे अग्निद्वारा मिथिलानगरी जलायी गयी, उसे बताता हूँ, सुनो ॥ जनको जनदेवस्तु कर्माण्यधाय चात्मनि । सर्वभावमनुप्राप्य भावेन विचचार सः ॥ जनकवंशी राजा जनदेव परमात्मामें कर्मोंको स्थापित करके सर्वात्मताको प्राप्त होकर उसी भावसे सर्वत्र विचरण करते थे ॥ यजन् ददंस्तथा जुह्वन् पालयन् पृथिवीमिमाम् । अध्यात्मविन्महाप्राज्ञस्तन्मयत्वेन निष्ठितः ॥

Page 1421Permalink

महाप्राज्ञ जनक अध्यात्मतत्त्वके ज्ञाता होनेके कारण निष्कामभावसे यज्ञ, दान, होम और पृथ्वीका पालन करते हुए भी उस अध्यात्मज्ञानमें ही तन्मय रहते थे॥

स तस्य हृदि संकल्पं ज्ञातुमैच्छत् स्वयं प्रभुः।
सर्वलोकाधिपस्तत्र द्विजरूपेण संयुतः॥
मिथिलायां महाबुद्धिर्व्यलीकं किंचिदाचरन्।
स गृहीत्वा द्विजश्रेष्ठैर्नृपाय प्रतिवेदितः॥
अपराधं समुद्दिश्य तं राजा प्रत्यभाषत॥

एक समय सम्पूर्ण लोकोंके अधिपति साक्षात् भगवान् नारायणने राजा जनकके मनोभावकी परीक्षा लेनेका विचार किया; अतः वे ब्राह्मणरूपसे वहाँ आये। उन परम बुद्धिमान् श्रीहरिने मिथिलानगरीमें कुछ प्रतिकूल आचरण किया। तब वहाँके श्रेष्ठ द्विजोंने उन्हें पकड़कर राजाको सौंप दिया। ब्राह्मणके अपराधको लक्ष्य करके राजाने उनसे इस प्रकार कहा॥

जनक उवाच
न त्वां ब्राह्मण दण्डेन नियोक्ष्यामि कथंचन।
मम राज्याद् विनिर्गच्छ यावत् सीमा भुवो मम॥

**जनकने कहा—**ब्राह्मण! मैं तुम्हें किसी प्रकार दण्ड नहीं दूँगा, तुम मेरे राज्यसे, जहाँतक मेरी राज्यभूमिकी सीमा है, उससे बाहर निकल जाओ॥

इत्युक्तः स तथा तेन मैथिलेन द्विजोत्तमः।
अब्रवीत् तं महात्मानं राजानं मन्त्रिभिर्वृतम्॥

मिथिलानरेशके ऐसा कहनेपर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणने मन्त्रियोंसे घिरे हुए उन महात्मा राजा जनकसे इस प्रकार कहा—॥

त्वमेवं पद्मनाभस्य नित्यं पक्षपदाहितः।
अहो सिद्धार्थरूपोऽसि गमिष्ये स्वस्ति तेऽस्तु वै॥

‘महाराज! आप सदा पद्मनाभ भगवान् नारायणके चरणोंमें अनुराग रखनेवाले और उन्हींके शरणागत हैं। अहो! आप कृतार्थरूप हैं, आपका कल्याण हो! अब मैं चला जाऊँगा’॥

इत्युक्त्वा प्रययौ विप्रस्तज्जिज्ञासुर्द्विजोत्तमः।
अदहच्चाग्निना तस्य मिथिलां भगवान् स्वयम्॥

ऐसा कहकर वे ब्राह्मण वहाँसे चल दिये। जाते-जाते राजाकी परीक्षा लेनेके लिये उन श्रेष्ठ ब्राह्मणरूपधारी भगवान् श्रीहरिने स्वयं ही मिथिलानगरीमें आग लगा दी॥

प्रदीप्यमानां मिथिलां दृष्ट्वा राजा न कम्पितः।
जनैः स परिपृष्टस्तु वाक्यमेतदुवाच ह॥

Page 1422Permalink

मिथिलाको जलती हुई देखकर राजा तनिक भी विचलित नहीं हुए। लोगोंके पूछनेपर उन्होंने उनसे यह बात कही— ।।
अनन्तं बत मे वित्तं भाव्यं मे नास्ति किंचन ।
मिथिलायां प्रदीप्तायां न मे किंचन दह्यते ।।
'मेरे पास आत्मज्ञानरूप अनन्त धन है; अतः अब मेरे लिये कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं है, इस मिथिला-नगरीके जल जानेपर भी मेरा कुछ नहीं जलता है' ।।
तदस्य भाषमाणस्य श्रुत्वा श्रुत्वा हृदि स्थितम् ।
पुनः संजीवयामास मिथिलां तां द्विजोत्तमः ।।
राजा जनकके इस प्रकार कहनेपर उन द्विजश्रेष्ठने भी उनकी बात सुनी और उनके मनोभावको समझा; फिर उन्होंने मिथिलानगरीको पूर्ववत् सजीव एवं दाह-रहित कर दिया ।।
आत्मानं दर्शयामास वरं चास्मै ददौ पुनः ।
धर्मे तिष्ठतु सद्भावो बुद्धिस्तेऽर्थे नराधिप ।।
सत्ये तिष्ठस्व निर्विण्णः स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ।
साथ ही उन्होंने राजाको अपने साक्षात् स्वरूपका दर्शन कराया और उन्हें वर देते हुए पुनः कहा—'नरेश्वर! तुम्हारा मन सद्भावपूर्वक धर्ममें लगा रहे और बुद्धि तत्त्वज्ञानमें परिनिष्ठित हो। सदा विषयोंसे विरक्त रहकर तुम सत्यके मार्गपर डटे रहो। तुम्हारा कल्याण हो। अब मैं जाता हूँ' ।।
इत्युक्त्वा भगवांश्चैनं तत्रैवान्तरधीयत ।
एतत् ते कथितं राजन् किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ।।
उनसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि वहीं अन्तर्धान हो गये। राजन्! यह प्रसंग तुम्हें सुना दिया। अब और क्या सुनना चाहते हो? ।।

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पञ्चशिखवाक्यं नाम
एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २१९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पंचशिखका उपदेशनामक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २१९ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं)


* 'ये दोनों ज्ञान अथवा अज्ञानके विषय नहीं होते, इस कथनका अभिप्राय यों समझना चाहिये—जो श्रवणकालमें शब्दका अनुभव करता है, वह उसके साथ ही श्रोत्र और आकाशका अनुभव नहीं करता है। साथ ही उसे इन दोनोंका अज्ञान भी नहीं रहता; क्योंकि शब्दका श्रवणेन्द्रिय और आकाश दोनोंसे सम्बन्ध है। इन दोनोंके बिना शब्दका अनुभव हो ही नहीं सकता।

श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिम

Page 1423Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन

(युधिष्ठिर उवाच)
अस्ति कश्चिद् यदि विभो सदारो नियतो गृहे ।
अतीतसर्वसंसारः सर्वद्वन्द्वविवर्जितः ॥
तं मे ब्रूहि महाप्राज्ञ दुर्लभः पुरुषो महान् ।
**युधिष्ठिरने कहा—**महाप्राज्ञ! प्रभो! यदि कोई ऐसा पुरुष हो, जो गृहस्थ आश्रममें पत्नीसहित संयम-नियमके साथ रहता हो, समस्त सांसारिक बन्धनोंको पार कर चुका हो और सम्पूर्ण द्वन्द्वोंसे दूर रहकर उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करता हो तो उसका मुझे परिचय दीजिये, क्योंकि ऐसा महापुरुष दुर्लभ होता है ॥

भीष्म उवाच
शृणु राजन् यथावृत्तं यन्मां त्वं पृष्टवानसि ।
इतिहासमिमं शुद्धं संसारभयभेषजम् ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! तुमने मुझसे जो विषय पूछा है, उसे यथावत्रूपसे सुनो। यह विशुद्ध इतिहास जन्म-मरणरूप रोगका भय दूर करनेके लिये उत्तम औषध है ॥
देवलो नाम विप्रर्षिः सर्वशास्त्रार्थकोविदः ।
क्रियावान् धार्मिको नित्यं देवब्राह्मणपूजकः ॥
ब्रह्मर्षि देवलका नाम सर्वत्र प्रसिद्ध है। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण, क्रियानिष्ठ, धार्मिक तथा देवताओं और ब्राह्मणोंकी सदा पूजा करनेवाले थे ॥
सुता सुवर्चला नाम तस्य कल्याणलक्षणा ।
नातिह्रस्वा नातिकृशा नातिदीर्घा यशस्विनी ॥
उनके एक पुत्री थी, जो सुवर्चलाके नामसे पुकारी जाती थी। वह यशस्विनी कन्या सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थी। वह न तो अधिक नाटी थी और न अधिक लंबी, वह विशेष दुबली भी नहीं थी ॥
प्रदानसमयं प्राप्ता पिता तस्य ह्यचिन्तयत् ॥

Page 1424Permalink

अस्याः पतिः कुतो वेति ब्राह्मणः श्रोत्रियः परः ।
विद्वान् विप्रो ह्यकुटुम्बः प्रियवादी महातपाः ॥
धीरे-धीरे उसकी विवाहके योग्य अवस्था हो गयी। उसके पिता सोचने लगे, मेरी इस पुत्रीका पति श्रेष्ठ श्रोत्रिय ब्राह्मण होना चाहिये, जो विद्वान् होनेके साथ ही प्रिय वचन बोलनेवाला, महातपस्वी और अविवाहित हो; परंतु ऐसा पुरुष कहाँसे सुलभ हो सकता है? ॥

इत्येवं चिन्तयानं तं रहस्याह सुवर्चला ।
अन्धाय मां महाप्राज्ञ देह्यनन्धाय वै पितः ।
एवं स्मर सदा विद्वन् ममेदं प्रार्थितं मुने ॥
एकान्तमें बैठकर ऐसी ही चिन्तामें पड़े हुए पिताके पास जाकर सुवर्चलाने इस प्रकार कहा—‘पिताजी! आप परम बुद्धिमान्, विद्वान् और मुनि हैं। आप मुझे ऐसे पतिके हाथमें सौंपियेगा, जो अन्धा भी हो और आँखवाला भी हो। मेरी इस प्रार्थनाको सदा याद रखियेगा’ ॥

पितोवाच
न शक्यं प्रार्थितं वत्से त्वयाद्य प्रतिभाति मे ।
अन्धतानन्धता चेति विकारो मम जायते ॥
उन्मत्तेवाशुभं वाक्यं भाषसे शुभलोचने ।
पिता बोले—बेटी! तुम्हारी यह प्रार्थना पूर्ण हो सके, ऐसा तो मुझे नहीं प्रतीत होता है; क्योंकि एक ही व्यक्ति अन्धा भी हो और अन्धा न भी हो, यह कैसे सम्भव है? तुम्हारी यह बात सुनकर मेरे मनमें खेद होता है। शुभलोचने! तुम पगली-सी होकर अशुभ बात मुँहसे निकाल रही हो ॥

सुवर्चलोवाच
नाहमुन्मत्तभूताद्य बुद्धिपूर्वं ब्रवीमि ते ।
विद्यते चेत् पतिस्तादृक् स मां भरति वेदवित् ॥
सुवर्चला बोली—पिताजी! मैं पगली नहीं हूँ। खूब सोच-समझकर आपसे ऐसी बात कह रही हूँ। यदि ऐसा कोई वेदवेत्ता पति प्राप्त हो जाय तो वह मेरा भरण-पोषण कर सकता है ॥

येभ्यस्त्वं मन्यसे दातुं मामिहानय तान् द्विजान् ।
तादृशं तं पतिं तेषु वरयिष्ये यथातथम् ॥
आप जिन ब्राह्मणोंके हाथमें मुझे देना चाहते हैं, उन सबको यहाँ बुलवा लीजिये। मैं उन्हींमेंसे अपनी पसंदके अनुसार योग्य पतिका वरण कर लूँगी ॥

तथेति चोक्त्वा तां कन्यामृषिः शिष्यानुवाच ह ।