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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages
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ध्यातव्यं मनसा हृद्यं कल्याणं संविजानता । अतः समझदार पुरुषको वैमनस्यके कारण प्राप्त हुए दुःखका निवारण करके मन-ही-मन हृदयस्थित कल्याणमय परमात्माका चिन्तन करना चाहिये ॥ ६½ ॥

यदा यदा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः । तदा तस्य प्रसिध्यन्ति सर्वार्था नात्र संशयः ॥ ७ ॥ पुरुष जब-जब कल्याणस्वरूप परमात्माके चिन्तनमें मन लगाता है, तब-तब उसके सारे मनोरथ सिद्ध होते हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ७ ॥

एकः शास्ता न द्वितीयोऽस्ति शास्ता गर्भे शयानं पुरुषं शास्ति शास्ता । तेनानुयुक्तः प्रवणादिवोदकं यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥ ८ ॥ जगत्का शासन करनेवाला एक ही है, दूसरा नहीं। वही शासक गर्भमें सोये हुए जीवका भी शासन करता है, जैसे जल निम्न स्थानकी ओर ही प्रवाहित होता है, उसी प्रकार प्राणी उस शासकसे प्रेरित होकर उसकी अभीष्ट दिशाको ही गमन करता है। उस ईश्वरकी जैसी प्रेरणा होती है, उसीके अनुसार मैं भी कार्यभार वहन करता हूँ ॥ ८ ॥

भवाभवौ त्वभिजानन् गरीयो ज्ञानाच्छ्रेयो न तु तद् वै करोमि । आशासु धर्म्यासु परासु कुर्वन् यथा नियुक्तोऽस्मि तथा वहामि ॥ ९ ॥ मैं प्राणियोंके अभ्युदय और पराभवको जानता हूँ। श्रेष्ठ तत्त्वसे भी परिचित हूँ और ज्ञानसे कल्याणकी प्राप्ति होती है, इस बातको भी समझता हूँ, तथापि उसका सम्पादन नहीं करता हूँ। इसके विपरीत धर्म-सम्मत अथवा अधर्मयुक्त आशाएँ मनमें लेकर जैसी अन्तर्यामीकी प्रेरणा होती है, उसके अनुसार कार्यभार वहन करता हूँ ॥ ९ ॥

यथा यथास्य प्राप्तव्यं प्राप्नोत्येव तथा तथा । भवितव्यं यथा यच्च भवत्येव तथा तथा ॥ १० ॥ पुरुषको जो वस्तु जिस प्रकार मिलनेवाली होती है, वह उस प्रकार मिल ही जाती है। जिस वस्तुकी जैसी होनहार होती है, वह वैसी होती ही है ॥ १० ॥

यत्र यत्रैव संयुक्तो धात्रा गर्भे पुनः पुनः । तत्र तत्रैव वसति न यत्र स्वयमिच्छति ॥ ११ ॥ विधाता जिस-जिस गर्भमें रहनेके लिये जीवको बार-बार प्रेरित करते हैं, वह जीव उसी-उसी गर्भमें वास करता है; किंतु वह स्वयं जहाँ रहनेकी इच्छा करता है, वहाँ नहीं रह पाता है ॥ ११ ॥

भावो योऽयमनुप्राप्तो भवितव्यमिदं मम ।

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इति यस्य सदा भावो न स मुह्येत् कदाचन ॥ १२ ॥ मुझे जो यह अवस्था प्राप्त हुई है, ऐसी ही होनहार थी। जिसके हृदयमें सदा इस तरहकी भावना होती है, वह कभी मोहमें नहीं पड़ता है ॥ १२ ॥

पर्यायैर्हन्यमानानामभियोक्ता न विद्यते । दुःखमेतत् तु यद् द्वेष्टा कर्ताहमिति मन्यते ॥ १३ ॥ कालक्रमसे प्राप्त होनेवाले सुख-दुःखोंद्वारा जो लोग आहत होते हैं, उनके उस दुःखके लिये दूसरा कोई दोषी या अपराधी नहीं है। दुःख पानेका कारण तो यह है कि पुरुष वर्तमान दुःखसे द्वेष करके अपनेको उसका कर्ता मान बैठता है ॥ १३ ॥

ऋषींश्च देवांश्च महासुरांश्च त्रैविद्यवृद्धांश्च वने मुनींश्च । कान्नापदो नोपनमन्ति लोके परावरज्ञास्तु न सम्भ्रमन्ति ॥ १४ ॥ ऋषि, देवता, बड़े-बड़े असुर, तीनों वेदोंके ज्ञानमें बढ़े हुए विद्वान् पुरुष तथा वनवासी मुनि—इनमेंसे किनके ऊपर संसारमें आपत्तियाँ नहीं आती हैं; परंतु जिन्हें सत्-असत्‌का विवेक है, वे मोह या भ्रममें नहीं पड़ते हैं ॥ १४ ॥

न पण्डितः क्रुद्ध्यति नाभिषद्यते न चापि संसीदति न प्रहृष्यति । न चार्थकृच्छ्रव्यसनेषु शोचते स्थितः प्रकृत्या हिमवानिवाचलः ॥ १५ ॥ विद्वान् पुरुष कभी क्रोध नहीं करता, कहीं आसक्त नहीं होता, अनिष्टकी प्राप्ति होनेपर दुःखसे व्याकुल नहीं होता और किसी प्रिय वस्तुको पाकर अत्यन्त हर्षित नहीं होता है। आर्थिक कठिनाई या संकटके समय भी वह शोकग्रस्त नहीं होता है; अपितु हिमालयके समान स्वभावसे ही अविचल बना रहता है ॥ १५ ॥

यमर्थसिद्धिः परमा न मोहयेत् तथैव काले व्यसनं न मोहयेत् । सुखं च दुःखं च तथैव मध्यमं निषेवते यः स धुरंधरो नरः ॥ १६ ॥ जिसे उत्तम अर्थसिद्धि मोहमें नहीं डालती, इसी तरह जो कभी संकट पड़नेपर धैर्य या विवेकको खो नहीं बैठता तथा सुखका, दुःखका और दोनोंके बीचकी अवस्थाका समान भावसे सेवन करता है, वही महान् कार्यभारको सँभालनेवाला श्रेष्ठ पुरुष माना जाता है ॥ १६ ॥

यां यामवस्थां पुरुषोऽधिगच्छेत् तस्यां रमेतापरितप्यमानः ।

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एवं प्रवृद्धं प्रणुदन्मनोजं संतापनीयं सकलं शरीरात् ॥ १७ ॥ पुरुष जिस-जिस अवस्थाको प्राप्त हो, उसीमें उसे संतप्त न होकर आनन्द मानना चाहिये। इस प्रकार संतापजनक बढ़े हुए कामको अपने शरीर और मनसे पूर्णतः निकाल दे ॥ १७ ॥ न तत्सदःसत्परिषत् सभा च सा प्राप्य यां न कुरुते सदा भयम् । धर्मतत्त्वमवगाह्य बुद्धिमान् योऽभ्युपैति स धुरंधरः पुमान् ॥ १८ ॥ न तो ऐसी कोई सभा है, न साधु-सत्पुरुषोंकी कोई परिषद् है और न कोई ऐसा जनसमाज ही है, जिसे पाकर कोई पुरुष कभी भय न करे। जो बुद्धिमान् धर्मतत्त्वमें अवगाहन करके उसीको अपनाता है, वही धुरंधर माना गया है ॥ १८ ॥ प्राज्ञस्य कर्माणि दुरन्वयानि न वै प्राज्ञो मुह्यति मोहकाले । स्थानाच्च्युतश्चैन्न मुमोह गौतम- स्तावत् कृच्छ्रामापदं प्राप्य वृद्धः ॥ १९ ॥ विद्वान् पुरुषके सारे कार्य साधारण लोगोंके लिये दुर्बोध होते हैं। विद्वान् पुरुष मोहके अवसरपर भी मोहित नहीं होता। जैसे वृद्ध गौतममुनि अत्यन्त कष्टजनक विपत्तिमें पड़कर और पदच्युत होकर भी मोहित नहीं हुए ॥ १९ ॥ न मन्त्रबलवीर्येण प्रज्ञया पौरुषेण च । न शीलेन न वृत्तेन तथा नैवार्थसम्पदा । अलभ्यं लभते मर्त्यस्तत्र का परिदेवना ॥ २० ॥ जो वस्तु नहीं मिलनेवाली होती है, उसको कोई मनुष्य मन्त्र, बल, पराक्रम, बुद्धि, पुरुषार्थ, शील, सदाचार और धन-सम्पत्तिसे भी नहीं पा सकता; फिर उसके लिये शोक क्यों किया जाय? ॥ २० ॥ यदेवमनुजातस्य धातारो विदधुः पुरा । तदेवानुचरिष्यामि किं मे मृत्युः करिष्यति ॥ २१ ॥ पूर्वकालमें विधाताने मेरे लिये जैसा विधान रच रखा है, मैं जन्मके पश्चात् उसीका अनुसरण करता आया हूँ और आगे भी करूँगा; अतः मृत्यु मेरा क्या करेगी? ॥ २१ ॥ लब्धव्यान्येव लभते गन्तव्यान्येव गच्छति । प्राप्तव्यान्येव चाप्नोति दुःखानि च सुखानि च ॥ २२ ॥ मनुष्यको प्रारब्धके विधानसे जो कुछ पाना है, उसीको वह पाता है। जहाँ जाना है, वहीं वह जाता है और जो भी सुख या दुःख उसके लिये प्राप्तव्य हैं, उन्हें वह प्राप्त करता

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है ॥ २२ ॥
एतद् विदित्वा कात्स्न्येन यो न मुह्यति मानवः ।
कुशली सर्वदुःखेषु स वै सर्वधनो नरः ॥ २३ ॥
यह पूर्णरूपसे जानकर जो मनुष्य कभी मोहित नहीं होता है, वह सब प्रकारके दुःखोंमें सकुशल रहता है और वही हर तरहसे धनवान् है ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शक्रनमुचिसंवादो नाम
षड्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें इन्द्र और नमुचिका संवादनामक दो सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२६ ॥

इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन

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सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे किं श्रेयः पुरुषस्य हि ।
बन्धुनाशे महीपाल राज्यनाशेऽथवा पुनः ॥ १ ॥
त्वं हि नः परमो वक्ता लोकेऽस्मिन् भरतर्षभ ।
एतद् भवन्तं पृच्छामि तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥ २ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भूपाल! जो मनुष्य बन्धु-बान्धवोंका अथवा राज्यका नाश हो जानेपर घोर संकटमें पड़ गया हो, उसके कल्याणका क्या उपाय है? भरतश्रेष्ठ! इस संसारमें आप ही हमारे लिये सबसे श्रेष्ठ वक्ता हैं; इसलिये यह बात आपसे ही पूछता हूँ। आप यह सब मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १-२ ॥

भीष्म उवाच

पुत्रदारैः सुखैश्चैव वियुक्तस्य धनेन वा ।
मग्नस्य व्यसने कृच्छ्रे धृतिः श्रेयस्करी नृप ॥ ३ ॥
धैर्येण युक्तस्य सतः शरीरं न विशीर्यते ।
भीष्मजीने कहा— राजा युधिष्ठिर! जिसके स्त्री-पुत्र मर गये हों, सुख छिन गया हो अथवा धन नष्ट हो गया हो और इन कारणोंसे जो कठिन विपत्तिमें फँस गया हो, उसका तो धैर्य धारण करनेमें ही कल्याण है। जो धैर्यसे युक्त है, उस सत्पुरुषका शरीर चिन्ताके कारण नष्ट नहीं होता ॥ ३ १/२ ॥

विशोकता सुखं धत्ते धत्ते चारोग्यमुत्तमम् ॥ ४ ॥
आरोग्याच्च शरीरस्य स पुनर्विन्दते श्रियम् ।
शोकहीनता सुख और उत्तम आरोग्यका उत्पादन करती है, शरीरके नीरोग होनेसे मनुष्य फिर धन-सम्पत्तिका उपार्जन कर लेता है ॥ ४ १/२ ॥

यच्च प्राज्ञो नरस्तात सात्त्विकीं वृत्तिमास्थितः ॥ ५ ॥
तस्यैश्वर्यं च धैर्यं च व्यवसायश्च कर्मसु ।
तात! जो बुद्धिमान् मनुष्य सदा सात्त्विक वृत्तिका सहारा लिये रहता है। उसीको ऐश्वर्य और धैर्यकी प्राप्ति होती है तथा वही सम्पूर्ण कर्मोंमें उद्योगशील होता है ॥ ५ १/२ ॥

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अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।। ६ ।। बलिवासवसंवादं पुनरेव युधिष्ठिर । युधिष्ठिर! इस विषयमें पुनः बलि और इन्द्रके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ।।

वृत्ते देवासुरे युद्धे दैत्यदानवसंक्षये ।। ७ ।। विष्णुक्रान्तेषु लोकेषु देवराजे शतक्रतौ । इज्यमानेषु देवेषु चातुर्वर्ण्ये व्यवस्थिते ।। ८ ।। समृद्धमात्रे त्रैलोक्ये प्रीतियुक्ते स्वयम्भुवि । पूर्वकालमें जब दैत्यों और दानवोंका संहार करनेवाला देवासुर-संग्राम समाप्त हो गया, वामनरूपधारी भगवान् विष्णुने अपने पैरोंसे तीनों लोकोंको नाप लिया और सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले इन्द्र जब देवताओंके राजा हो गये, तब देवताओंकी सब ओर आराधना होने लगी। चारों वर्णोंके लोग अपने-अपने धर्ममें स्थित रहने लगे। तीनों लोकोंका अभ्युदय होने लगा और सबको सुखी देखकर स्वयम्भू ब्रह्माजी अत्यन्त प्रसन्न रहने लगे ।।

रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यामपि चर्षिभिः ।। ९ ।। गन्धर्वैर्भुजगेन्द्रैश्च सिद्धैश्चान्यैर्वृतः प्रभुः । चतुर्दन्तं सुदान्तं च वारणेन्द्रं श्रिया वृतम् । आरुह्यैरावतं शक्रस्त्रैलोक्यमनुसंययौ ।। १० ।। उन्हीं दिनोंकी बात है, देवराज इन्द्र अपने ऐरावत नामक गजराजपर, जो चार सुन्दर दाँतोंसे सुशोभित और दिव्य शोभासे सम्पन्न था, आरूढ़ हो तीनों लोकोंमें भ्रमण करनेके लिये निकले। उस समय त्रिलोकीनाथ इन्द्र रुद्र, वसु, आदित्य, अश्विनीकुमार, ऋषिगण, गन्धर्व, नाग, सिद्ध तथा विद्याधरों आदिसे घिरे हुए थे ।। ९-१० ।।

स कदाचित् समुद्रान्ते कस्मिंश्चिद् गिरिगह्वरे । बलिं वैरोचनं वज्री ददर्शोपससर्प च ।। ११ ।। घूमते-घूमते वे किसी समय समुद्रतटपर जा पहुँचे। वहाँ किसी पर्वतकी गुफामें उन्हें विरोचनकुमार बलि दिखायी दिये। उन्हें देखते ही इन्द्र हाथमें वज्र लिये उनके पास जा पहुँचे ।। ११ ।।

तमैरावतमूर्धस्थं प्रेक्ष्य देवगणैर्वृतम् । सुरेन्द्रमिन्द्रं दैत्येन्द्रो न शुशोच न विव्यथे ।। १२ ।। देवताओंसे घिरे हुए देवराज इन्द्रको ऐरावतकी पीठपर बैठे देख दैत्यराज बलिके मनमें तनिक भी शोक या व्यथा नहीं हुई ।। १२ ।।

दृष्ट्वा तमविकारस्थं तिष्ठन्तं निर्भयं बलिम् । अधिरूढो द्विपश्रेष्ठमित्युवाच शतक्रतुः ।। १३ ।।

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उन्हें निर्भय और निर्विकार होकर खड़ा देख श्रेष्ठ गजराजपर चढ़े हुए शतक्रतु इन्द्रने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥

दैत्य न व्यथसे शौर्यादथवा वृद्धसेवया । तपसा भावितत्वाद् वा सर्वथैतत् सुदुष्करम् ॥ १४ ॥ ‘दैत्य! तुम्हें अपने शत्रु की समृद्धि देखकर व्यथा क्यों नहीं होती? क्या शौर्यसे अथवा बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करनेसे या तपस्यासे अन्तःकरण शुद्ध हो जानेके कारण तुम्हें शोक नहीं होता है? साधारण पुरुषके लिये तो यह धैर्य सर्वथा परम दुष्कर है ॥ १४ ॥

शत्रुभिर्वशमानीतो हीनः स्थानादनुत्तमात् । वैरोचने किमाश्रित्य शोचितव्ये न शोचसि ॥ १५ ॥ ‘विरोचनकुमार! तुम शत्रुओंके वशमें पड़े और उत्तम स्थान (राज्य) से भ्रष्ट हुए—इस प्रकार शोचनीय दशामें पड़कर भी तुम किस बलका सहारा लेकर शोक नहीं करते हो? ॥ १५ ॥

श्रैष्ठ्यं प्राप्य स्वजातीनां महाभोगाननुत्तमान् । हृतस्वरत्नराज्यस्त्वं ब्रूहि कस्मान्न शोचसि ॥ १६ ॥ ‘तुमने अपने जाति-भाइयोंमें सबसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया था और परम उत्तम महान् भोगोंपर अधिकार जमा रखा था; किंतु इस समय तुम्हारे रत्न और राज्यका अपहरण हो गया है, तो भी बताओ, तुम्हें शोक क्यों नहीं होता है? ॥ १६ ॥

ईश्वरो हि पुरा भूत्वा पितृपैतामहे पदे । तत्त्वमद्य हृतं दृष्ट्वा सपत्नैः किं न शोचसि ॥ १७ ॥ ‘पहले तो तुम अपने बाप-दादोंके राज्यपर बैठकर तीनों लोकोंके ईश्वर बने हुए थे। अब उस राज्यको शत्रुओंने छीन लिया; यह देखकर भी तुम्हें शोक क्यों नहीं होता है? ॥ १७ ॥

बद्धश्व वारुणैः पाशैर्वज्रेण च समाहतः । हृतदारो हृतधनो ब्रूहि कस्मान्न शोचसि ॥ १८ ॥ ‘तुम्हें वरुणके पाशसे बाँधा गया, वज्रसे घायल किया गया तथा तुम्हारी स्त्री और धनका भी अपहरण कर लिया गया; फिर भी बोलो, तुम्हें शोक कैसे नहीं होता है? ॥

नष्टश्रीर्विभवभ्रष्टो यन्न शोचसि दुष्करम् । त्रैलोक्यराज्यनाशे हि कोऽन्यो जीवितुमुत्सहेत् ॥ १९ ॥ ‘तुम्हारी राज्यलक्ष्मी नष्ट हो गयी। तुम अपने धन-वैभवसे हाथ धो बैठे। इतनेपर भी जो तुम्हें शोक नहीं होता है, यह दूसरोंके लिये बड़ा कठिन है। तीनों लोकोंका राज्य नष्ट हो जानेपर भी तुम्हारे सिवा दूसरा कौन जीवित रहनेके लिये उत्साह दिखा सकता है? ॥

एतच्चान्यच्च परुषं ब्रुवन्तं परिभूय तम् । श्रुत्वा सुखमसम्भ्रान्तो बलिर्वैरोचनोऽब्रवीत् ॥ २० ॥

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ये तथा और भी बहुत-सी कठोर बातें सुनाकर इन्द्रने बलिका तिरस्कार किया। विरोचनकुमार बलिने वे सारी बातें बड़े आनन्दसे सुन लीं और मनमें तनिक भी घबराहट न लाकर उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया।।

बलिरुवाच

निगृहीते मयि भृशं शक्र किं कत्थितेन ते । वज्रमुद्यम्य तिष्ठन्तं पश्यामि त्वां पुरंदर ॥ २१ ॥ बलिने कहा—इन्द्र! जब मैं शत्रुओं अथवा कालके द्वारा भलीभाँति बन्दी बना लिया गया हूँ, तब मेरे सामने इस प्रकार बढ़-बढ़कर बातें बनानेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? पुरंदर! मैं देखता हूँ, आज तुम वज्र उठाये मेरे सामने खड़े हो ॥ २१ ॥

अशक्तः पूर्वमासीस्त्वं कथञ्चिच्छक्ततां गतः । कस्त्वदन्य इमां वाचं सुक्रूरां वक्तुमर्हति ॥ २२ ॥ किंतु पहले तुममें ऐसा करनेकी शक्ति नहीं थी। अब किसी तरह शक्ति आ गयी है। तुम्हारे सिवा दूसरा कौन ऐसा अत्यन्त क्रूर वचन कह सकता है? ॥ २२ ॥

यस्तु शत्रोर्वशस्थस्य शक्तोऽपि कुरुते दयाम् । हस्तप्राप्तस्य वीरस्य तं चैव पुरुषं विदुः ॥ २३ ॥ जो शक्तिशाली होकर भी अपने वशमें पड़े हुए अथवा हाथमें आये हुए वीर शत्रुपर दया करता है, उसे अच्छे लोग उत्तम पुरुष मानते हैं ॥ २३ ॥

अनिश्चयो हि युद्धेषु द्वयोर्विवदमानयोः । एकः प्राप्नोति विजयमेकश्चैव पराजयम् ॥ २४ ॥ जब दो व्यक्तियोंमें विवाद एवं युद्ध छिड़ जाता है, तब किसकी जीत होगी—इसका कोई निश्चय नहीं रहता है। उनमेंसे एक पक्ष विजयी होता है और दूसरेको पराजय प्राप्त होती है ॥ २४ ॥

मा च तेऽभूत् स्वभावोऽयमिति ते देवपुङ्गव । ईश्वरः सर्वभूतानां विक्रमेण जितो बलात् ॥ २५ ॥ इसलिये देवराज! तुम्हारा स्वभाव ऐसा न हो, तुम ऐसा न समझ लो कि मैंने अपने बल और पराक्रमसे ही समस्त प्राणियोंके स्वामी मुझ बलिपर विजय पायी है ॥ २५ ॥

नैतदस्मत्कृतं शक्र नैतच्छक्र कृतं त्वया । यत् त्वमेवंगतो वज्रिन् यद्वाप्येवंगता वयम् ॥ २६ ॥ वज्रधारी इन्द्र! आज जो तुम इस प्रकार राज-वैभवसे सम्पन्न हो अथवा हमलोग जो इस दीन दशाको पहुँच गये हैं, यह सब न तो तुम्हारा किया हुआ है और न हमारा ही किया हुआ है ॥ २६ ॥

अहमासं यथाद्य त्वं भविता त्वं यथा वयम् ।

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मावमंस्था मया कर्म दुष्कृतं कृतमित्युत ॥ २७ ॥
आज जैसे तुम हो, कभी मैं भी ऐसा ही था और इस समय जिस दशामें हमलोग पड़े हुए हैं, कभी तुम्हारी भी वैसी ही अवस्था होगी; अतः तुम यह समझकर कि मैंने बड़ा दुष्कर पराक्रम कर दिखाया है, मेरा अपमान न करो ॥ २७ ॥
सुखदुःखे हि पुरुषः पर्यायेणाधिगच्छति ।
पर्यायेणासि शक्रत्वं प्राप्तः शक्र न कर्मणा ॥ २८ ॥
प्रत्येक पुरुष बारी-बारीसे सुख और दुःख पाता है। इन्द्र! तुम भी अपने पराक्रमसे नहीं, कालक्रमसे ही इन्द्रपदको प्राप्त हुए हो ॥ २८ ॥
कालःकाले नयति मां त्वां च कालो नयत्ययम् ।
तेनाहं त्वं यथा नाद्य त्वं चापि न यथा वयम् ॥ २९ ॥
काल ही मुझे कुसमयकी ओर ले जा रहा है और यह काल ही तुम्हें अच्छे दिन दिखा रहा है; इसलिये आज जैसे तुम हो, वैसा मैं नहीं हूँ और जैसे हमलोग हैं, वैसे तुम नहीं हो ॥ २९ ॥
न मातृपितृशुश्रूषा न च दैवतपूजनम् ।
नान्यो गुणसमाचारः पुरुषस्य सुखावहः ॥ ३० ॥
माता-पिताकी सेवा, देवताओंकी पूजा तथा अन्य सद्गुणयुक्त सदाचार भी बुरे दिनोंमें किसी पुरुषके लिये सुखदायक नहीं होता है ॥ ३० ॥
न विद्या न तपो दानं न मित्राणि न बान्धवाः ।
शक्नुवन्ति परित्रातुं नरं कालेन पीडितम् ॥ ३१ ॥
कालसे पीड़ित हुए मनुष्यको न विद्या, न तप, न दान, न मित्र और न बन्धु-बान्धव ही कष्टसे बचा पाते हैं ॥
नागामिनमनर्थं हि प्रतिघातशतैरपि ।
शक्नुवन्ति प्रतियोद्धुमृते बुद्धिबलान्नराः ॥ ३२ ॥
मनुष्य बुद्धि-बलके सिवा और किसी उपायसे सैकड़ों आघात करके भी आनेवाले अनर्थको नहीं रोक सकते ॥ ३२ ॥
पर्यायैर्हन्यमानानां परित्राता न विद्यते ।
इदं तु दुःखं यच्छक्र कर्ताहमिति मन्यसे ॥ ३३ ॥
कालक्रमसे जिनपर आघात होता है—स्वयं काल जिन्हें पीड़ा देता है, उनकी रक्षा कोई नहीं कर सकता। शक्र! तुम जो अपनेको इस परिस्थितिका कर्ता मानते हो, यही तुम्हारे लिये दुःखकी बात है ॥ ३३ ॥
यदि कर्ता भवेत् कर्ता न क्रियेत कदाचन ।
यस्मात्तु क्रियते कर्ता तस्मात् कर्ताप्यनीश्वरः ॥ ३४ ॥

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यदि कार्य करनेवाला पुरुष स्वयं ही कर्ता होता तो उसको उत्पन्न करनेवाला दूसरा कोई कभी न होता। वह दूसरेके द्वारा उत्पन्न किया जाता है; इसलिये कालके सिवा दूसरा कोई कर्ता नहीं है ॥ ३४ ॥ कालेनाहं त्वमजयं कालेनाहं जितस्त्वया । गन्ता गतिमतां कालः कालः कलयति प्रजाः ॥ ३५ ॥ कालकी सहायता पाकर मैंने तुमपर विजय पायी थी और कालके ही सहयोगसे अब तुमने मुझे पराजित कर दिया है। काल ही जानेवाले प्राणियोंके साथ जाता या उन्हें गमनकी शक्ति प्रदान करता है और वही समस्त प्रजाका संहार करता है ॥ ३५ ॥ इन्द्र प्राकृतया बुद्ध्या प्रलयं नावबुद्ध्यसे । केचित् त्वां बहु मन्यन्ते श्रैष्ठ्यं प्राप्तं स्वकर्मणा ॥ ३६ ॥ इन्द्र! तुम्हारी बुद्धि साधारण है; इसलिये उसके द्वारा तुम एक-न-एक दिन अवश्य होनेवाले अपने विनाशकी बात नहीं समझ पाते। संसारमें कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो तुम्हें अपने ही पराक्रमसे श्रेष्ठताको प्राप्त हुआ मानते और तुम्हें अधिक महत्त्व देते हैं ॥ ३६ ॥ कथमस्मद्विधो नाम जानन् लोकप्रवृत्तयः । कालेनाभ्याहतः शोचेन्मुह्येद् वाप्यथ विभ्रमेत् ॥ ३७ ॥ किंतु मेरे-जैसा पुरुष जो जगत्की प्रवृत्तिको जानता है-उन्नति और अवनतिका कारण काल-प्रारब्ध ही है; ऐसा समझता है, वह तुम्हें महत्त्व कैसे दे सकता है? जो कालसे पीड़ित है, वह प्राणी शोकग्रस्त, मोहित अथवा भ्रान्त भी हो सकता है ॥ ३७ ॥ नित्यं कालपरीतस्य मम वा मद्विधस्य वा । बुद्धिर्व्यसनमासाद्य भिन्ना नौरिव सीदति ॥ ३८ ॥ मैं होऊँ या मेरे-जैसा दूसरा कोई पुरुष हो। जब काल (प्रारब्ध) से आक्रान्त हो जाता है, तब सदा ही उसकी बुद्धि संकटमें पड़कर फटी हुई नौकाके समान शिथिल हो जाती है ॥ ३८ ॥ अहं च त्वं च ये चान्ये भविष्यन्ति सुराधिपाः । ते सर्वे शक्र यास्यन्ति मार्गमिन्द्रशतैर्गतम् ॥ ३९ ॥ इन्द्र! मैं, तुम या और जो लोग भी देवेश्वरके पदपर प्रतिष्ठित होंगे, वे सब-के-सब उसी मार्गपर जायँगे, जिसपर पहलेके सैकड़ों इन्द्र जा चुके हैं ॥ ३९ ॥ त्वामप्येवं सुदुर्धर्षं ज्वलन्तं परया श्रिया । काले परिणते कालः कलयिष्यति मामिव ॥ ४० ॥ यद्यपि आज तुम इस प्रकार दुर्धर्ष हो और अत्यन्त तेजसे प्रज्वलित हो रहे हो; किंतु जब समय परिवर्तित होगा, अर्थात् जब तुम्हारा प्रारब्ध खराब होगा, तब मेरी ही भाँति तुम्हें भी काल अपना शिकार बना लेगा—इन्द्रपदसे भ्रष्ट कर देगा ॥ ४० ॥ बहूनीन्द्रसहस्राणि दैवतानां युगे युगे ।

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अभ्यतीतानि कालेन कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ४१ ॥

युग-युगमें (प्रत्येक मन्वन्तरमें) इन्द्रोंका परिवर्तन होनेके कारण अबतक देवताओंके अनेक सहस्र इन्द्र कालके गालमें चले गये हैं; अतः कालका उल्लङ्घन करना किसीके लिये अत्यन्त कठिन है ॥ ४१ ॥

इदं तु लब्ध्वा संस्थानमात्मानं बहु मन्यसे ।
सर्वभूतभवं देवं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ॥ ४२ ॥
न चेदमचलं स्थानमनन्तं वापि कस्यचित् ।
त्वं तु बालिशया बुद्ध्या ममेदमिति मन्यसे ॥ ४३ ॥

तुम इस शरीरको पाकर समस्त प्राणियोंको जन्म देनेवाले सनातन देव भगवान् ब्रह्माजीकी भाँति अपनेको बहुत बड़ा मानते हो; किंतु तुम्हारा यह इन्द्रपद आजतक (किसीके लिये भी) अविचल या अनन्त कालतक रहनेवाला नहीं सिद्ध हुआ—इसपर कितने ही आये और चले गये। केवल तुम्हीं अपनी मूढ़बुद्धिके कारण इसे अपना मानते हो ॥ ४२-४३ ॥

अविश्वस्ते विश्वसिषि मन्यसे वाध्रुवे ध्रुवम् ।
नित्यं कालपरीतात्मा भवत्येवं सुरेश्वर ॥ ४४ ॥

देवेश्वर! नाशवान् होनेके कारण जो विश्वासके योग्य नहीं है, उस राज्यपर तुम विश्वास करते हो और जो अस्थिर है, उसे स्थिर मानते हो; किंतु इसमें कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि कालने जिसके हृदयपर अधिकार कर लिया हो, वह सदा ऐसी ही विपरीत भावनासे भावित होता है ॥ ४४ ॥

ममेयमिति मोहात् त्वं राजश्रियमीप्ससि ।
नेयं तव न चास्माकं न चान्येषां स्थिरा सदा ॥ ४५ ॥

तुम मोहवश जिस राजलक्ष्मीको 'यह मेरी है' ऐसा समझकर पाना चाहते हो, वह न तुम्हारी है, न हमारी है और न दूसरोंकी ही है। वह किसीके पास भी सदा स्थिर नहीं रहती ॥ ४५ ॥

अतिक्रम्य बहूनन्यांस्त्वयि तावदियं गता ।
कंचित् कालमियं स्थित्वा त्वयि वासव चञ्चला ॥ ४६ ॥
गौर्निपानमिवोत्सृज्य पुनरन्यं गमिष्यति ।

वासव! यह चञ्चला राजलक्ष्मी दूसरे बहुत-से राजाओंको लाँघकर इस समय तुम्हारे पास आयी है और कुछ कालतक तुम्हारे यहाँ ठहरकर फिर उसी तरह दूसरेके पास चली जायगी, जैसे गौ जल पीनेके स्थानका परित्याग करके चली जाती है ॥ ४६ १/२ ॥

राजलोका ह्यतिक्रान्ता यान्न संख्यातुमुत्सहे ॥ ४७ ॥
त्वत्तो बहुतराश्चान्ये भविष्यन्ति पुरंदर ।

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पुरंदर! अबतक इसने जितने राजाओंका परित्याग किया है, उनकी गणना मैं नहीं कर सकता। तुम्हारे बाद भी बहुत-से नरेश इसके अधिकारी होंगे॥ ४७ १/२ ॥
सवृक्षौषधिरत्नेयं सहसत्त्ववनाकरा ॥ ४८ ॥
तानिदानीं न पश्यामि यैर्भुक्तेयं पुरा मही।
जिन लोगोंने पहले वृक्ष, ओषधि, रत्न, जीव-जन्तु, वन और खानोंसहित इस सारी पृथ्वीका उपभोग किया है, उन सबको मैं इस समय नहीं देखता हूँ॥
पृथुरैलो मयो भीमो नरकः शम्बरस्तथा ॥ ४९ ॥
अश्वग्रीवः पुलोमा च स्वर्भानुरमितध्वजः।
प्रह्लादो नमुचिर्दक्षो विप्रचित्तिर्विरोचनः ॥ ५० ॥
हीनिषेवः सुहोत्रश्च भूरिहा पुष्पवान् वृषः।
सत्येषुर्ऋषभो बाहुः कपिलाश्वो विरूपकः ॥ ५१ ॥
बाणः कार्तस्वरो वह्निर्विश्वदंष्ट्रोऽथ नैर्ऋतिः।
संकोचोऽथ वरीताक्षो वराहाश्वो रुचिप्रभः ॥ ५२ ॥
विश्वजित् प्रतिरूपश्च वृषाण्डो विष्करो मधुः।
हिरण्यकशिपुश्चैव कैटभश्चैव दानवः ॥ ५३ ॥
दैतेया दानवाश्चैव सर्वे ते नैर्ऋतैः सह।
एते चान्ये च बहवः पूर्वे पूर्वतराश्च ये ॥ ५४ ॥
दैत्येन्द्रा दानवेन्द्राश्च यांश्चान्याननुशुश्रुम।
बहवः पूर्वदैत्येन्द्राः संत्यज्य पृथिवीं गताः ॥ ५५ ॥
कालेनाभ्याहताः सर्वे कालो हि बलवत्तरः।
पृथु, इलानन्दन पुरूरवा, मय, भीम, नरकासुर, शम्बरासुर, अश्वग्रीव, पुलोमा, स्वर्भानु, अमितध्वज, प्रह्लाद, नमुचि, दक्ष, विप्रचित्ति, विरोचन, हीनिषेव, सुहोत्र, भूरिहा, पुष्पवान्, वृष, सत्येषु, ऋषभ, बाहु, कपिलाश्व, विरूपक, बाण, कार्तस्वर, वह्नि, विश्वदंष्ट्र, नैर्ऋति, संकोच, वरीताक्ष, वराहाश्व, रुचिप्रभ, विश्वजित्, प्रतिरूप, वृषाण्ड, विष्कर, मधु, हिरण्यकशिपु और कैटभ—ये तथा और भी बहुत-से दैत्य, दानव एवं राक्षस सभी इस पृथ्वीके स्वामी हो चुके हैं। पहलेके और बहुत पहलेके ये पूर्वोक्त तथा अन्य अनेक दैत्यराज, दानवराज एवं दूसरे-दूसरे नरेश जिनका नाम हमलोग सुनते आ रहे हैं, कालसे पीड़ित हो सभी इस पृथ्वीको छोड़कर चले गये; क्योंकि काल ही सबसे बड़ा बलवान् हैं॥ ४९—५५ १/२ ॥
सर्वैः क्रतुशतैरिष्टं न त्वमेकः शतक्रतुः ॥ ५६ ॥
सर्वे धर्मपराश्चासन् सर्वे सततसत्रिणः।
अन्तरिक्षचराः सर्वे सर्वेऽभिमुखयोधिनः ॥ ५७ ॥

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केवल तुमने ही सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया हो, यह बात नहीं है। उन सभी राजाओंने सौ-सौ यज्ञ किये थे। सभी धर्मपरायण थे और सभी निरन्तर यज्ञमें संलग्न रहते थे। वे सभी आकाशमें विचरनेकी शक्ति रखते थे और युद्धमें शत्रुके सामने डटकर लोहा लेनेवाले थे।।
सर्वे संहननोपेताः सर्वे परिघबाहवः ।
सर्वे मायाशतधराः सर्वे ते कामरूपिणः ॥ ५८ ॥
वे सब-के-सब सुदृढ़ शरीरसे सुशोभित होते थे। उन सबकी भुजाएँ परिघ (लोहदण्ड) के समान मोटी और मजबूत थीं। वे सभी सैकड़ों माया जानते और इच्छानुसार रूप धारण करते थे ॥ ५८ ॥
सर्वे समरमासाद्य न श्रूयन्ते पराजिताः ।
सर्वे सत्यव्रतपराः सर्वे कामविहारिणः ॥ ५९ ॥
वे सब लोग समराङ्गणमें पहुँचकर कभी पराजित होते नहीं सुने गये थे। सभी सत्यव्रतका पालन करनेमें तत्पर और इच्छानुसार विहार करनेवाले थे ॥ ५९ ॥
सर्वे वेदव्रतपराः सर्वे चैव बहुश्रुताः ।
सर्वे सम्मतमैश्वर्यमीश्वराः प्रतिपेदिरे ॥ ६० ॥
सभी वेदोक्त व्रतको धारण करनेवाले और बहुश्रुत विद्वान् थे। सभी लोकेश्वर थे और सबने मनोवाञ्छित ऐश्वर्य प्राप्त किया था ॥ ६० ॥
न चैश्वर्यमदस्तेषां भूतपूर्वो महात्मनाम् ।
सर्वे यथार्हदातारः सर्वे विगतमत्सराः ॥ ६१ ॥
उन महामना नरेशोंको पहले कभी भी ऐश्वर्यका मद नहीं हुआ था। वे सब-के-सब यथायोग्य दान करनेवाले और ईर्ष्या-द्वेषसे रहित थे ॥ ६१ ॥
सर्वे सर्वेषु भूतेषु यथावत् प्रतिपेदिरे ।
सर्वे दाक्षायणीपुत्राः प्राजापत्या महाबलाः ॥ ६२ ॥
वे सभी सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ यथायोग्य बर्ताव करते थे। उन सबका जन्म दक्ष-कन्याओंके गर्भसे हुआ था और वे सभी महाबलशाली वीर प्रजापति कश्यपकी संतान थे ॥ ६२ ॥
ज्वलन्तः प्रतपन्तश्च कालेन प्रतिसंहृताः ।
त्वं चैवेमां यदा भुक्त्वा पृथिवीं त्यक्ष्यसे पुनः ॥ ६३ ॥
न शक्ष्यसि तदा शक्र नियन्तुं शोकमात्मनः ।
इन्द्र! वे सभी नरेश अपने तेजसे प्रज्वलित होनेवाले और प्रतापी थे, किंतु कालने उन सबका संहार कर दिया। तुम जब इस पृथ्वीका उपभोग करके पुनः इसे छोड़ोगे, तब अपने शोकको रोकनेमें समर्थ न हो सकोगे ॥ ६३ १/२ ॥
मुञ्चेच्छां कामभोगेषु मुञ्चेमं श्रीभवं मदम् ॥ ६४ ॥
एवं स्वराज्यनाशे त्वं शोकं सम्प्रसहिष्यसि ।

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तुम काम-भोगकी इच्छाको छोड़ो और राजलक्ष्मीके इस मदको त्याग दो। इस दशामें यदि तुम्हारे राज्यका नाश हो जाय तो तुम उस शोकको सह सकोगे ।। ६४ १/२ ।। शोककाले शुचो मा त्वं हर्षकाले च मा हृषः ।। ६५ ।। अतीतानागतं हित्वा प्रत्युत्पन्नेन वर्तय । तुम शोकका अवसर आनेपर शोक न करो और हर्षके समय हर्षित मत होओ। भूत और भविष्यकी चिन्ता छोड़कर वर्तमान कालमें जो वस्तु उपलब्ध हो, उसीसे जीवन-निर्वाह करो ।। ६५ १/२ ।। मां चेदभ्यागतः कालः सदा युक्तमतन्द्रितः ।। ६६ ।। क्षमस्व नचिरादिन्द्र त्वामप्युपगमिष्यति । इन्द्र! मैं सदा सावधान रहता था, तथापि कभी आलस्य न करनेवाले कालका यदि मुझपर आक्रमण हो गया तो तुमपर भी शीघ्र ही उस कालका आक्रमण होगा। इस कटु सत्यके लिये मुझे क्षमा करना ।। ६६ १/२ ।। त्रासयन्निव देवेन्द्र वाग्भिस्तक्षसि मामिह ।। ६७ ।। संयते मयि नूनं त्वमात्मानं बहु मन्यसे । देवेन्द्र! इस समय भयभीत करते हुए-से तुम यहाँ अपने वाग्बाणोंसे मुझे छेदे डालते हो। मैं अपनेको संयममें रखकर शान्त बैठा हूँ; इसीलिये अवश्य तुम अपनेको बहुत बड़ा समझने लगे हो ।। ६७ १/२ ।। कालः प्रथममायान्मां पश्चात् त्वामनुधावति ।। ६८ ।। तेन गर्जसि देवेन्द्र पूर्वं कालहते मयि । देवराज! जिस कालका पहले मुझपर धावा हुआ है, वही पीछे तुमपर भी चढ़ाई करेगा। मैं पहले कालसे पीड़ित हो गया हूँ; इसीलिये तुम सामने खड़े होकर गरज रहे हो ।। ६८ १/२ ।। को हि स्थातुमलं लोके मम क्रुद्धस्य संयुगे ।। ६९ ।। कालस्तु बलवान् प्राप्तस्तेन तिष्ठसि वासव । अन्यथा संसारमें कौन ऐसा वीर है, जो युद्धमें कुपित होनेपर मेरे सामने ठहर सके। इन्द्र! बलवान् काल (अदृष्ट) ने मुझपर आक्रमण किया है, इसीसे तुम मेरे सम्मुख खड़े हुए हो ।। ६९ १/२ ।। यत् तद् वर्षसहस्रान्तं पूर्णं भवितुमर्हति ।। ७० ।। यथा मे सर्वगात्राणि न सुस्थानि महौजसः । अहमैन्द्राच्च्युतः स्थानात् त्वमिन्द्रः प्रकृतो दिवि ।। ७१ ।। देवताओंका वह सहस्रों वर्षका समय अब पूरा होना ही चाहता है, जबतक कि तुम्हें इन्द्रके पदपर रहना है। कालके ही प्रभावसे मुझ महाबली वीरके अब सारे अंग उतने स्वस्थ

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नहीं रह गये हैं। मैं इन्द्रपदसे गिरा दिया गया और तुम स्वर्गमें इन्द्र बना दिये गये ॥ सुचित्रे जीवलोकेऽस्मिन्नुपास्यः कालपर्ययात् । किं हि कृत्वा त्वमिन्द्रोऽद्य किं वा कृत्वा वयं च्युताः ॥ ७२ ॥ कालके उलट-फेरसे ही इस विचित्र जीवलोकमें तुम सबके आराध्य बन गये हो। भला बताओ तो तुम कौन-सा शुभ कर्म करके आज इन्द्र हो गये और हम कौन-सा अशुभ कर्म करके इन्द्रपदसे नीचे गिर गये ॥ कालः कर्ता विकर्ता च सर्वमन्यदकारणम् । नाशं विनाशमैश्वर्यं सुखं दुःखं भवाभवौ ॥ ७३ ॥ विद्वान् प्राप्यैवमत्यर्थं न प्रहृष्येन्न च व्यथेत् । काल (प्रारब्ध) ही सबकी उत्पत्ति और संहारका कर्ता है। दूसरी सारी वस्तुएँ इसमें कारण नहीं मानी जा सकतीं; अतः विद्वान् पुरुष नाश-विनाश, ऐश्वर्य, सुख-दुःख, अभ्युदय या पराभव पाकर न तो अत्यन्त हर्ष माने और न अधिक व्यथित ही हो ॥ ७३ १/२ ॥ त्वमेव हीन्द्र वेत्थास्मान् वेदाहं त्वां च वासव ॥ ७४ ॥ किं कथसे मां किं च त्वं कालेन निरपत्रपः । इन्द्र! हम कैसे हैं, यह तुम्हीं अच्छी तरह जानते हो। वासव! मैं तुम्हें भली-भाँति जानता हूँ; फिर भी तुम लज्जाको तिलाञ्जलि दे क्यों मेरे सामने व्यर्थ आत्मश्लाघा कर रहे हो। वास्तवमें काल ही यह सब कुछ करा रहा है ॥ ७४ १/२ ॥ त्वमेव हि पुरा वेत्थ यत् तदा पौरुषं मम ॥ ७५ ॥ समरेषु च विक्रान्तं पर्याप्तं तन्निदर्शनम् । पहले मैं जो पुरुषार्थ प्रकट कर चुका हूँ, उसको सबसे अधिक तुम्हीं जानते हो। कई बारके युद्धोंमें तुम मेरा पराक्रम देख चुके हो। इस समय एक ही दृष्टान्त देना काफी होगा ॥ ७५ १/२ ॥ आदित्याश्चैव रुद्राश्च साध्याश्च वसुभिः सह ॥ ७६ ॥ मया विनिर्जिताः पूर्वं मरुतश्च शचीपते । त्वमेव शक्र जानासि देवासुरसमागमे ॥ ७७ ॥ शचीवल्लभ इन्द्र! पहले जब देवासुरसंग्राम हुआ था, उस समयकी बात तुम्हें अच्छी तरह याद होगी। मैंने अकेले ही समस्त आदित्यों, रुद्रों, साध्यों, वसुओं तथा मरुद्गणोंको परास्त किया था ॥ ७६-७७ ॥ समेता विबुधा भग्नास्तरसा समरे मया । पर्वताश्चासकृत् क्षिप्ताः सवनाः सवनौकसः ॥ ७८ ॥ सटङ्कशिखरा भग्नाः समरे मूर्ध्नि ते मया । किं नु शक्यं मया कर्तुं कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ७९ ॥

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मेरे वेगसे सब देवता युद्धका मैदान छोड़कर एक साथ ही भाग खड़े हुए थे। वन एवं वनवासियोंसहित कितने ही पर्वत, मैंने बारंबार तुमलोगोंपर चलाये थे। तुम्हारे सिरपर भी सुदृढ़ पाषाण और शिखरोंसहित बहुत-से पर्वत मैंने फोड़ डाले थे; किंतु इस समय मैं क्या कर सकता हूँ; क्योंकि कालका उल्लङ्घन करना बहुत कठिन है ॥ ७८-७९ ॥

न हि त्वां नोत्सहे हन्तुं सवज्रमपि मुष्टिना ।
न तु विक्रमकालोऽयं क्षमाकालोऽयमागतः ॥ ८० ॥
तुम्हारे हाथमें वज्र रहनेपर भी मैं केवल मुक्केसे मारकर तुम्हें यमलोक न पहुँचा सकूँ, ऐसी बात नहीं है। किंतु मेरे लिये यह पराक्रम दिखानेका नहीं, क्षमा करनेका समय आया है ॥ ८० ॥

तेन त्वां मर्षये शक्र दुर्मर्षणतरस्त्वया ।
तं मां परिणते काले परीतं कालवह्निना ॥ ८१ ॥
नियतं कालपाशेन बद्धं शक्र विकत्थसे ।
इन्द्र! यही कारण है कि मैं तुम्हारे सब अपराध चुपचाप सहे लेता हूँ। अब भी मेरा वेग तुम्हारे लिये अत्यन्त दुःसह है। किंतु जब समयने पलटा खाया है, कालरूपी अग्निने मुझे सब ओरसे घेर लिया है और मैं कालपाशसे निश्चितरूपसे बँध गया हूँ, तब तुम मेरे सामने खड़े होकर अपनी झूठी बड़ाई किये जा रहे हो ॥ ८१ ½ ॥

अयं स पुरुषः श्यामो लोकस्य दुरतिक्रमः ॥ ८२ ॥
बद्ध्वा तिष्ठति मां रौद्रः पशुं रशनया यथा ।
जैसे मनुष्य रस्सीसे किसी पशुको बाँध लेता है, उसी प्रकार यह भयंकर कालपुरुष मुझे अपने पाशमें बाँधे खड़ा है ॥ ८२ ½ ॥

लाभालाभौ सुखं दुःखं कामक्रोधौ भवाभवौ ॥ ८३ ॥
वधबन्धप्रमोक्षं च सर्वं कालेन लभ्यते ।
पुरुषको लाभ-हानि, सुख-दुःख, काम-क्रोध, अभ्युदयपराभव, वध, कैद और कैदसे छुटकारा—यह सब काल (प्रारब्ध) से ही प्राप्त होते हैं ॥ ८३ ½ ॥

नाहं कर्ता न कर्ता त्वं कर्ता यस्तु सदा प्रभुः ॥ ८४ ॥
सोऽयं पचति कालो मां वृक्षे फलमिवागतम् ।
न मैं कर्ता हूँ, न तुम कर्ता हो। जो वास्तवमें सदा कर्ता है, वह सर्वसमर्थ काल वृक्षपर लगे हुए फलके समान मुझे पका रहा है ॥ ८४ ½ ॥

यान्येव पुरुषः कुर्वन् सुखैः कालेन युज्यते ॥ ८५ ॥
पुनस्तान्येव कुर्वाणो दुःखैः कालेन युज्यते ।
पुरुष कालका सहयोग पाकर जिन कर्मोंको करनेसे सुखी होता है, कालका सहयोग न मिलनेसे पुनः उन्हीं कर्मोंको करके वह दुःखका भागी होता है ॥

न च कालेन कालज्ञः स्पृष्टः शोचितुमर्हति ॥ ८६ ॥

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तेन शक्र न शोचामि नास्ति शोके सहायता ।
इन्द्र! जो कालके प्रभावको जानता है, वह उससे आक्रान्त होकर भी शोक नहीं करता; क्योंकि विपत्ति दूर करनेमें शोकसे कोई सहायता नहीं मिलती, इसलिये मैं शोक नहीं करता हूँ ।। ८६ १/२ ।।
यदा हि शोचतः शोको व्यसनं नापकर्षति ।। ८७ ।।
सामर्थ्यं शोचतो नास्तीत्यतोऽहं नाद्य शोचिमि ।
जब शोक करनेवाले पुरुषका शोक उसके संकटको दूर नहीं हटा पाता है, उलटे शोकग्रस्त मनुष्यकी शक्ति क्षीण हो जाती है, तब शोक क्यों किया जाय? यही सोचकर मैं शोक नहीं करता हूँ ।। ८७ १/२ ।।
एवमुक्तः सहस्राक्षो भगवान् पाकशासनः ।। ८८ ।।
प्रतिसंहृत्य संरम्भमित्युवाच शतक्रतुः ।
बलिके ऐसा कहनेपर सहस्रनेत्रधारी पाकशासन शतक्रतु भगवान् इन्द्रने अपने क्रोधको रोककर इस प्रकार कहा— ।। ८८ १/२ ।।
सवज्रमुद्यतं बाहुं दृष्ट्वा पाशांश्च वारुणान् ।। ८९ ।।
कस्येह न व्यथेद् बुद्धिर्मृत्योरपि जिघांसतः ।
सा ते न व्यथते बुद्धिरचला तत्त्वदर्शिनी ।। ९० ।।
'दैत्यराज! मेरे हाथको वज्र एवं वरुणपाशसहित ऊपर उठा देखकर मारनेकी इच्छासे आयी हुई मृत्युका भी दिल दहल जाता है; फिर दूसरा कौन है जिसकी बुद्धि व्यथित न हो। तुम्हारी बुद्धि तत्त्वको जाननेवाली और स्थिर है; इसलिये तनिक भी विचलित नहीं होती है ।। ८९-९० ।।
ध्रुवं न व्यथसेऽद्य त्वं धैर्यात् सत्यपराक्रम ।
को हि विश्वासमर्थेषु शरीरे वा शरीरभृत् ।। ९१ ।।
कर्तुमुत्सहते लोके दृष्ट्वा सम्प्रस्थितं जगत् ।
'सत्यपराक्रमी वीर! तुम निश्चय ही धैर्यके कारण व्यथित नहीं होते हो। इस सम्पूर्ण जगत्को विनाशकी ओर जाते देखकर कौन शरीरधारी पुरुष धन-वैभव, विषय-भोग अथवा अपने शरीरपर भी विश्वास कर सकता है? ।। ९१ १/२ ।।
अहमप्येवमेवैतं लोकं जानाम्यशाश्वतम् ।। ९२ ।।
कालाग्नावाहितं घोरे गुह्ये सततगेऽक्षरे ।
'मैं भी इसी प्रकार सर्वव्यापी, अविनाशी, घोर एवं गुह्य कालाग्निमें पड़े हुए इस जगत्को क्षणभंगुर ही जानता हूँ ।। ९२ १/२ ।।
न चात्र परिहारोऽस्ति कालस्पृष्टस्य कस्यचित् ।। ९३ ।।
सूक्ष्माणां महतां चैव भूतानां परिपच्यताम् ।

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‘जो कालकी पकड़में आ चुका है, ऐसे किसी भी पुरुषके लिये उससे छूटनेका कोई उपाय नहीं है। सूक्ष्मसे सूक्ष्म और महान् भूत भी कालग्निमें पकाये जा रहे हैं, उनका भी उससे छुटकारा होनेवाला नहीं है॥ ९३ १/२ ॥

अनीशस्याप्रमत्तस्य भूतानि पचतः सदा ॥ ९४ ॥
अनिवृत्तस्य कालस्य क्षयं प्राप्तो न मुच्यते ।
‘कालपर किसीका भी वश नहीं चलता। वह सदा सावधान रहकर सम्पूर्ण भूतोंको पकाता रहता है। वह कभी लौटनेवाला नहीं है। ऐसे कालके अधीन हुआ प्राणी उससे छुटकारा नहीं पाता है॥ ९४ १/२ ॥

अप्रमत्तः प्रमत्तेषु कालो जागर्ति देहिषु ॥ ९५ ॥
प्रयत्नेनाप्यपक्रान्तो दृष्टपूर्वो न केनचित् ।
‘देहधारी जीव प्रमादमें पड़कर सोते हैं; किंतु काल सदा सावधान रहकर जागता रहता है। किसीके प्रयत्नसे भी कालको पीछे हटाया जा सका हो, ऐसा पहले कभी किसीने देखा नहीं है॥ ९५ १/२ ॥

पुराणः शाश्वतो धर्मः सर्वप्राणभृतां समः ॥ ९६ ॥
कालो न परिहार्यश्च न चास्यास्ति व्यतिक्रमः ।
‘काल पुरातन (अनादि), सनातन, धर्मस्वरूप और समस्त प्राणियोंके प्रति समान दृष्टि रखनेवाला है। कालका किसीके द्वारा भी परिहार नहीं हो सकता और न उसका कोई उल्लङ्घन ही कर सकता है॥

अहोरात्रांश्च मासांश्च क्षणान् काष्ठा लवान् कलाः ॥ ९७ ॥
सम्पीडयति यः कालो वृद्धिं वार्धुषिको यथा ।
जैसे ऋण देनेवाला पुरुष व्याजका हिसाब जोड़कर ऋण लेनेवालोंको तंग करता है, उसी प्रकार वह काल दिन, रात, मास, क्षण, काष्ठा, लव और कला तकका हिसाब लगाकर प्राणियोंको पीड़ा देता रहता है॥ ९७ १/२ ॥

इदमद्य करिष्यामि श्वः कर्तास्मीति वादिनम् ॥ ९८ ॥
कालो हरति सम्प्राप्तो नदीवेग इव द्रुमम् ।
‘जैसे नदीका वेग सहसा बढ़कर किनारेके वृक्षका हरण कर लेता है। उसी प्रकार ‘यह आज करूँगा और वह कल पूरा करूँगा।' ऐसा कहनेवाले पुरुषका काल सहसा आकर हरण कर लेता है॥ ९८ १/२ ॥

इदानीं तावदेवासौ मया दृष्टः कथं मृतः ॥ ९९ ॥
इति कालेन ह्रियतां प्रलापः श्रूयते नृणाम् ।
“अरे! अभी-अभी तो मैंने उसे देखा था। वह मर कैसे गया?' इस प्रकार कालसे अपहृत होनेवालोंके लिये अन्य मनुष्योंका प्रलाप सुना जाता है॥ ९९ १/२ ॥

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नश्यन्त्यर्थास्तथा भोगाः स्थानमैश्वर्यमेव च ॥ १०० ॥ जीवितं जीवलोकस्य कालेनागम्य नीयते । ‘धन और भोग नष्ट हो जाते हैं। स्थान और ऐश्वर्य छिन जाता है तथा इस जीव-जगत्‌के जीवनको भी काल आकर हर ले जाता है ॥ १०० १/२ ॥’

उच्छ्राया विनिपातान्ता भावोऽभावः स एव च ॥ १०१ ॥ अनित्यमध्रुवं सर्वं व्यवसायो हि दुष्करः । ‘ऊँचे चढ़नेका अन्त है नीचे गिरना तथा जन्मका अन्त है मृत्यु। जो कुछ देखनेमें आता है, वह सब नाशवान् है, अस्थिर है तो भी इसका निरन्तर स्मरण रहना कठिन हो जाता है ॥ १०१ १/२ ॥’

सा ते न व्यथते बुद्धिरचला तत्त्वदर्शिनी ॥ १०२ ॥ अहमासं पुरा चेति मनसापि न बुद्ध्यते । ‘अवश्य ही तुम्हारी बुद्धि तत्त्वको जाननेवाली तथा स्थिर है, इसीलिये उसे व्यथा नहीं होती। मैं पहले अत्यन्त ऐश्वर्यशाली था, इस बातको तुम मनसे भी स्मरण नहीं करते ॥ १०२ १/२ ॥’

कालेनाक्रम्य लोकेऽस्मिन् पच्यमाने बलीयसा ॥ १०३ ॥ अज्येष्ठमकनिष्ठं च क्षिप्यमाणो न बुद्ध्यते । ‘अत्यन्त बलवान् काल इस सम्पूर्ण जगत्‌पर आक्रमण करके सबको अपनी आँचमें पका रहा है। वह इस बातको नहीं देखता है कि कौन छोटा है और कौन बड़ा? सब लोग कालाग्निमें झोंके जा रहे हैं, फिर भी किसीको चेत नहीं होता ॥ १०३ १/२ ॥’

ईर्ष्याभिमानलोभेषु कामक्रोधभयेषु च ॥ १०४ ॥ स्पृहामोहाभिमानेषु लोकः सक्तो विमुह्यति । ‘लोग ईर्ष्या, अभिमान, लोभ, काम, क्रोध, भय, स्पृहा, मोह और अभिमानमें फँसकर अपना विवेक खो बैठे हैं ॥’

भवांस्तु भावतत्त्वज्ञो विद्वान् ज्ञानतपोऽन्वितः ॥ १०५ ॥ कालं पश्यति सुव्यक्तं पाणावामलकं यथा । कालचारित्रतत्त्वज्ञः सर्वशास्त्रविशारदः ॥ १०६ ॥ विवेचने कृतात्मासि स्पृहणीयो विजानताम् । सर्वलोको ह्ययं मन्ये बुद्ध्या परिगतस्त्वया ॥ १०७ ॥ ‘परंतु तुम विद्वान्, ज्ञानी और तपस्वी हो। समस्त पदार्थोंके तत्त्वको जानते हो। कालकी लीला और उसके तत्त्वको समझते हो। सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण हो। तत्त्वके विवेचनमें कुशल, मनको वशमें रखनेवाले तथा ज्ञानी पुरुषोंके आदर्श हो। इसीलिये हाथपर रक्खे हुए आँवलेके समान कालको स्पष्टरूपसे देख रहे हो। मेरा तो ऐसा विश्वास है कि तुमने अपनी बुद्धिसे सम्पूर्ण लोकोंका तत्त्व जान लिया है ॥ १०५—१०७ ॥’

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विहरन् सर्वतो मुक्तो न क्वचित् परिषज्जते ।

रजश्च हि तमश्च त्वां स्पृशते न जितेन्द्रियम् ॥ १०८ ॥

‘तुम सर्वत्र विचरते हुए भी सबसे मुक्त हो। कहीं भी तुम्हारी आसक्ति नहीं है। तुमने

अपनी इन्द्रियोंको जीत लिया है; इसलिये रजोगुण और तमोगुण तुम्हारा स्पर्श नहीं कर

सकते ॥ १०८ ॥

निष्प्रीतिं नष्टसंतापमात्मानं त्वमुपाससे ।

सुहृदं सर्वभूतानां निर्वैरं शान्तमानसम् ॥ १०९ ॥

‘जो हर्षसे रहित, संतापसे शून्य, सम्पूर्ण भूतोंका सुहृद्, वैररहित और शान्तचित्त है,

उस आत्माकी तुम उपासना करते हो ॥ १०९ ॥

दृष्ट्वा त्वां मम संजाता त्वय्यनुक्रोशिनी मतिः ।

नाहमेतादृशं बुद्धं हन्तुमिच्छामि बन्धने ॥ ११० ॥

‘तुम्हें देखकर मेरे मनमें दयाका संचार हो आया है। मैं ऐसे ज्ञानी पुरुषको बन्धनमें

रखकर उसका वध करना नहीं चाहता ॥ ११० ॥

आनृशंस्यं परो धर्मो ह्यनुक्रोशश्च मे त्वयि ।

मोक्ष्यन्ते वारुणाः पाशास्त्वेमे कालपर्ययात् ॥ १११ ॥

‘किसीके प्रति क्रूरतापूर्ण बर्ताव न करना सबसे बड़ा धर्म है। तुम्हारे ऊपर मेरा पूर्ण

अनुग्रह है। कुछ समय बीतनेपर तुम्हें बाँधनेवाले ये वरुणदेवताके पाश अपने आप ही तुम्हें

छोड़ देंगे ॥ १११ ॥

प्रजानामपचारेण स्वस्ति तेऽस्तु महासुर ।

यदा श्वश्रूं स्नुषा वृद्धां परिचारेण योक्ष्यते ॥ ११२ ॥

पुत्रश्च पितरं मोहात् प्रेषयिष्यति कर्मसु ।

ब्राह्मणैः कारयिष्यन्ति वृषलाः पादधावनम् ॥ ११३ ॥

शूद्राश्च ब्राह्मणीं भार्यामुपयास्यन्ति निर्भयाः ।

वियोनिषु विमोक्ष्यन्ति बीजानि पुरुषा यदा ॥ ११४ ॥

संकरं कांस्यभाण्डैश्च बलिं चैव कुपात्रकेः ।

चातुर्वर्ण्यं यदा कृत्स्नममर्यादं भविष्यति ॥ ११५ ॥

एकैकस्ते तदा पाशः क्रमशः परिमोक्ष्यते ।

‘महान् असुर! जब प्रजाजनोंका न्यायके विपरीत आचरण होने लगेगा, तब तुम्हारा

कल्याण होगा। जब पतोहू बूढ़ी साससे अपनी सेवा-टहल कराने लगेगी और पुत्र भी

मोहवश पिताको विभिन्न प्रकारके कार्य करनेके लिये आज्ञा प्रदान करने लगेगा, शूद्र

ब्राह्मणोंसे पैर धुलाने लगेंगे तथा वे निर्भय होकर ब्राह्मण जातिकी स्त्रीको अपनी भार्या

बनाने लगेंगे, जब पुरुष निर्भय होकर मानवेतर योनियोंमें अपना वीर्य स्थापित करने लगेंगे,

जब काँसेके पात्रमें ऊँच जाति और नीच जातिके लोग एक साथ भोजन करने लगेंगे एवं