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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

आठवां अध्याय। २७७

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आठवां अध्याय। २७७ कुलजे वृत्तसंपन्ने धर्मज्ञे सत्यवादिनि । महापक्षे धनिन्यार्ये निक्षेपं निक्षिपेद्बुधः ॥ १७६ ॥ यो यथा निक्षिपेद्धस्ते यमर्थं यस्य मानवः । स तथैव ग्रहीतव्यो यथा दायस्तथा ग्रहः ॥ १८० ॥ यो निक्षेपं याच्यमानो निक्षेतुर्न प्रयच्छति । स याच्यः प्राङ्‌विवाकेन तन्निक्षेपुरसन्निधौ ॥ १८१ ॥ साक्ष्यरूपे प्रणिधिभिर्वयोरूपसमन्वितैः । अपदेशैश्च संन्यस्य हिरण्यं तस्य तत्त्वतः ॥ १८२ ॥ स यदि प्रतिपद्येत यथान्यस्तं यथाकृतम् । न तत्र विद्यते किंचिद्यत्परैरभियुज्यते ॥ १८३ ॥ निक्षेप-धरोहर-अमानत रखना । कुलीन, सदाचार, धर्मज्ञ, सत्यवादी, कुटुम्बी, धनी और प्रति- ष्ठित पुरुष के पास निक्षेप-धरोहर रखना चाहिए। जो मनुष्य जिसके यहां जो द्रव्य जिसप्रकार रक्खे, उसको उसीप्रकार लेना उचित है। क्योंकि-जैसा देना, वैसा लेना। जो धरोहर रखनेवाले की वस्तु मांगने पर नहीं देता, उससे न्यायकर्त्ता राज- पुरुष रखनेवाले के पीछे मांगे। धरोहर के समय साक्षी न हो, तो राजा किसी वृद्ध-प्रामाणिक कर्मचारी से कुछ वस्तु किसी बहाने से उसके यहां रखवावे और थोड़ेही दिनों में मँगवाले। यदि वह राजकर्मचारी अपनी रक्खी वस्तु ठीक ठीक मांगने पर पा जावे तो जो धरोहर न पाने की नालिश करे उसको झूठा समझे ॥ १७६-१८३ ॥ तेषां न दद्याद्यदि तु तद्धिरण्यं यथाविधि । उभौ निगृह्य दाप्यःस्यादिति धर्मस्य धारणा ॥ १८४ ॥

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२७८ मनुस्मृति। निक्षेपोपनिधी नित्यं न देयौ प्रत्यनन्तरे । नश्यन्ते विनिपाते तावनिपाते त्वनाशिनौ ॥ १८५ ॥ स्वयमेव तु यो दद्यान्मृतस्य प्रत्यनन्तरे । न स राज्ञा नियोक्तव्यो न निक्षेतुश्च बन्धुभिः ॥१८६॥ अच्छलेनैव चान्विच्छेत्तमर्थं प्रीतिपूर्वकम् । विचार्य तस्य वा वृत्तं साम्नैव परिसाधयेत् ॥ १८७ ॥ निक्षेपेष्वेषु सर्वेषु विधिः स्यात्परिसाधने । समुद्रे नाप्नुयात्किञ्चिद्यदि तस्मान्न संहरेत् ॥ १८८ ॥ चौरैर्हृतं जलेनोढमग्निना दग्धमेव वा । न दद्याद्यदि तस्मात्स न संहरति किंचन ॥ १८६ ॥ निक्षेपस्यापहर्त्तारमनिक्षेप्तारमेव च । सर्वैरुपायैरन्विच्छेच्छपथैश्चैव वैदिकैः ॥ १६० ॥ यो निक्षेपं नार्पयति यश्चानिक्षिप्य याचते । तावुभौ चौरवच्छास्यौ दाप्यौ वा तत्समं दमम् ॥ १६१ ॥ और यदि वह ठीक ठीक न देवे तो राजा पकड़कर दोनों की धरोहर दिलवावे। खुली या मुहर लगी धरोहर या मांगी वस्तु रखनेवाले की वस्तु उसके वारिसों को न देवे, क्योंकि रखनेवाले की मृत्यु होजाने से धरोहर नष्ट हो जाती है। जीता हो तो मिल सकती है। परन्तु धरोहर रखनेवाले की मृत्यु होजाने पर, यदि साहूकार खुशी से उसके वारिसों को दे देय, तो कम देने का दावा वारिस या राजा न चलावे। उस धन को प्रसन्नता से कम ज्यादा का कपट छोड़कर, स्वीकार करले। यही सब धरोहरों का नियम है जोकि बिना मुहर रक्खी गई है और मुहरवाली में कोई शक नहीं होती। अमानत की वस्तु को चोर ले जाय, जल में

आठवां अध्याय । २७६

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आठवां अध्याय । २७६ बह जाय, आग में जल जाय तो यदि साहूकार ने उसमें से कुछ न लिया हो, तो देनी नहीं पड़ती। जो धरोहर न लौटावे या जो बिना रक्खेही जाल से मांगे उन दोनों का साम आदि उपाय और वैदिक शपथों (हलफ़) से राजा निर्णय करे। जो धरोहर नहीं देता, या जो बिना रक्खे ही मांगता है, उन दोनों को राजा चोर के समान दण्ड देवे और धरोहर के बराबर जुर्माना करे ॥ १८४-१६१ ॥ निक्षेपस्यापहर्त्तारं तत्समं दापयेद्दमम् । तथोपनिधिहर्त्तारमविशेषेण पार्थिवः ॥ १६२ ॥ उपदाभिश्च यः कश्चित्परद्रव्यं हरेन्नरः । स सहायः स हन्तव्यः प्रकाशं विविधैर्वधैः ॥ १६३ ॥ निक्षेपो यः कृतो येन यावांश्च कुलसन्निधौ । तावानेव स विज्ञेयो विब्रुवन् दण्डमर्हति ॥ १६४ ॥ मिथोदायः कृतो येन गृहीतो मिथ एव वा । मिथ एव प्रदातव्यो यथादायस्तथा ग्रहः ॥ १६५ ॥ निक्षिप्तस्य धनस्यैवं प्रीत्योपनिहितस्य च । राजा विनिर्णयं कुर्यादक्षिपन्न्यासधारिणम् ॥ १६६ ॥ धरोहर और उपनिधि मारलेनेवालों को भी राजा यही दण्ड देवे। छल, कपट करके पराया धन हरनेवालों को उनके मदद- गारों के साथ सबके सामने अनेक पीड़ा दण्ड देवे। गवाहों के सामने जितना धरोहर हो उतना स्वीकार करने से पीछे, बखेड़ा करनेवाला दण्डनीय होता है। जिसने एकान्त में धरोहर रक्खी और एकान्त में ली हो, वह एकान्त में ही देना चाहिए। जैसे लेवे, वैसे देवे। धरोहर और प्रेमसे भोगार्थ दिए धन का फ़ैसला ऐसा करना चाहिए, जिसमें धरोहर करनेवाले को कोई दुःख न पहुँचे ॥ १६२-१६६ ॥

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२८० मनुस्मृति । विक्रीणीते परस्य स्वं योऽस्वामी स्वाम्यसंमतः । न तं नयेत साक्ष्यं तु स्तेनमस्तेनमानिनम् ॥ १९७ ॥ अवहार्यो भवेच्चैव सान्वयः षट्शतं दमम् । निरन्वयोऽनपसरः प्राप्तः स्याच्चौरकिल्विषम्॥ १९८॥ अस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एव वा । अकृतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथास्थितिः ॥ १९६ ॥ दूसरे की वस्तु विना मालिक की आज्ञा जिसने बेंची हो उस चोर व साहूकार को विना गवाह चोर की भांति दण्ड देवे । दूसरे की वस्तु बेंचनेवाला यदि उस धन के मालिक के वंश में हो तो छः सौ पण दण्ड देवे और सम्बन्धी या बेंचने का अधिकार न रखता हो तो चोर के मुवाफ़िक़ दण्ड योग्य है । इस प्रकार विना मालिक की आज्ञा, बेंचा या दियाहुआ कोई पदार्थ नाजायज़ है । यही धर्मशास्त्र (क़ानून) की मर्यादा है ॥ १९७–१९६ ॥ सम्भोगो दृश्यते यत्र न दृश्येतागमः क्वचित् । आगमः कारणं तत्र न सम्भोग इति स्थितिः ॥ २०० ॥ विक्रियाद्यो धनं किञ्चिद् गृह्णीयात्कुलसन्निधौ । क्रयेण स विशुद्धं हि न्यायतो लभते धनम् ॥ २०१ ॥ अथ मूलमनाहार्यं प्रकाशक्रयशोधितः । अदण्ड्यो मुच्यते राज्ञा नाष्टिको लभते धनम् ॥ २०२ ॥ नान्यदन्येन संसृष्टरूपं विक्रयमहति । न चासारं न च न्यूनं न दूरेण तिरोहितम् ॥ २०३ ॥ जिसको कोई वस्तु भोगते देखे पर खरीदते न देखा हो तो दूसरे का खरीद का लेख आदि प्रमाण होगा। भोग प्रमाण न होगा। यह व्यवहार की मर्यादा है। जो ज़ाहिर तौर से विकती

आठवां अध्याय । २८१

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आठवां अध्याय । २८१ चीज़ को कुछ खरीद करे और पीछे कोई बखेड़ा उठे तो खरीदार निर्दोष है और उसको वह वस्तु पानी चाहिए। माल का मालिक न होकर बेंचनेवाले को यदि खरीदनेवाला न ला सके पर बहुतों के सामने खरीदना साबित करदे तो दण्ड योग्य नहीं है। और उस खोई वस्तु का मालिक वापस ले सकता है। एक वस्तु दूसरी के रूप में मिलती हो तो उसको दूसरे के धोखे बेंचना ठीक नहीं है और सड़ी, तौल में कम, बिना दिखलाये, अच्छी वस्तु के नीचे खराब ढककर बेंचना अनुचित है ॥ २००-२०३ ॥ अन्यां चेद्दर्शयित्वान्यां वोढुः कन्या प्रदीयते । उभे ते एकशुल्केन वहेदित्यब्रवीन्मनुः ॥ २०४ ॥ नोन्मत्ताया न कुष्ठिन्या न च या स्पृष्टमैथुना । पूर्वं दोषानभिख्याप्य प्रदाता दण्डमर्हति ॥ २०५ ॥ ऋत्विग् यदि वृतो यज्ञे स्वकर्म परिहापयेत् । तस्य कर्मानुरूपेण देयोऽंशः सहकर्तृभिः ॥ २०६ ॥ दक्षिणासु च दत्तासु स्वकर्म परिहापयन् । कृत्स्नमेव लभेतांशमन्येनैव च कारयेत् ॥ २०७ ॥ एक कन्या दिखाकर दूसरी किसी का विवाह करदे तो दोनों का एकही मूल्य में विवाह कर लिया जाय, मनु की आज्ञा है। पागल, कोढ़िन, किसी से भुक्त हो तो न बतलाने से कन्यादान वाला दण्ड योग्य होता है। यज्ञ में वरण किया हुआ ऋत्विक् किसी कारण से अपना कर्म न पूरा करसके तो दूसरों के साथ में उसको भी कर्मानुसार दक्षिणा देवे। सब दक्षिणा दी गई हों और रोगादिवश कर्म छोड़ दे तो दूसरे से पूरा कराले ॥ २०४-२०७॥ यस्मिन्कर्मणि यास्तु स्युरुक्ताः प्रत्यङ्गदक्षिणाः । स एव ता आददीत भजेरन् सर्व एव वा ॥ २०८ ॥ ३६

तृतीयिनस्तृतीयांशाश्चतुर्थांशाश्च पादिनः ॥ २१० ॥

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३८२ मनुस्मृति । रथं हरेत वाध्वर्युर्ब्रह्माधाने च वाजिनम् । होता वापि हरेदश्वमुद्गाता चाप्यनःक्रये ॥ २०६ ॥ सर्वेषामर्थिनो मुख्यास्तदर्धेनार्थिनोऽपरे । तृतीयिनस्तृतीयांशाश्चतुर्थांशाश्च पादिनः ॥ २१० ॥ संभूय स्वानि कर्माणि कुर्वद्भिरिह मानवैः । अनेन विधियोगेन कर्तव्यांशप्रकल्पना ॥ २११ ॥ आधान आदि कर्मों के जिन अङ्गों की जो दक्षिणा हों उनको कर्म करानेवाले अलग अलग लें अथवा बाँट लेवें। आधान में रथ अध्वर्यु, घोड़ा ब्रह्मा या होता लेवे और सोम खरीदकर गाड़ी में आया हो तो गाड़ी उद्गाता पावे । यज्ञ के सोलह ऋत्विजों में होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा ये चार मुख्य ऋत्विज् पूर्ण दक्षिणा में आधी के अधिकारी हैं-४८ गौ देवे। दूसरे, मैत्रावरुण आदि चार को उसका आधा-२४ गौ, तीसरे अच्छावाक् आदि चार को तृतीयांश-१६ गौ और चौथे ग्रावस्तुत आदि को चतु- र्थांश-१२ गौ देय । इस प्रकार सोलह ऋत्विज् मिलकर कर्म करें तो अपना अपना भाग बाँट लेवें ॥ २०८-२११ ॥ धर्मार्थं येन दत्तं स्यात्कस्मैचिद्याचते धनम् । पश्चाच्च न तथा तत्स्यान्न देयं तस्य तद्भवेत् ॥ २१२ ॥ यदि संसाधयेत्तत्तु दर्पाल्लोभेन वा पुनः । राज्ञा दाप्यः सुवर्णं स्यात्तस्य स्तेयस्य निष्कृतिः॥२१३॥ दत्तस्यैषोदिता धर्म्या यथावदनपकिया । अतऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वेतनस्यानपक्रियाम् ॥ २१४ ॥ . किसी याचक को धर्मार्थ किसी ने कुछ देना कहा हो पर वह कर्म न करे तो उसको प्रतिज्ञात धन न देवे । जो याचक गर्व या

आठवां अध्याय । २८३

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आठवां अध्याय । २८३ लोभ से उस धन का दावा करे तो राजा, चोर मान कर एक सुवर्ण उस पर जुर्माना करे। इस प्रकार दिये धन को लौटाने का निर्णय धर्मानुसार किया है। अब नौकर को वेतन न देने का निर्णय कहा जायगा ॥ २१२-२१४ ॥ भृतोऽनार्त्तो न कुर्याद्यो दर्पात्कर्म यथोदितम् । स दण्ड्यः कृष्णलान्यष्टौ न देयं चास्य वेतनम्॥२१५॥ नौकर का वेतन-तनख्वाह । जो नौकर बिना बीमारी के घमंड से ठहराव के अनुसार काम न करे तो उसपर आठ कृष्णल जुर्माना करे और वेतन न देय ॥ २१५ ॥ आर्त्तस्तु कुर्यात्स्वस्थः सन् यथाभाषितमादितः । स दीर्घस्यापि कालस्य तल्लभेतैव वेतनम् ॥ २१६ ॥ यथोक्तमार्त्तः सुस्थो वा यस्तत्कर्म न कारयेत् । न तस्य वेतनं देयमल्पोनस्यापि कर्मणः ॥ २१७ ॥ एष धर्मोऽखिलेनोक्तो वेतनादानकर्मणः । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि धर्मं समयभेदिनाम् ॥ २१८ ॥ परन्तु जो बीमार हो और नीरोग होकर ठहराव के अनुसार काम करे तो अधिक दिन बीमार रहा हो तो भी वेतन पावेगा । रोगी हो या नीरोग हो ठहरें हुए काम को न करे या दूसरे से न करा दे अथवा कुछ कम काम करे तो उसको वेतन न देये । यह धर्मानुसार वेतन न देने का निर्णय कहा है । अब प्रतिज्ञाभङ्ग करनेवालों का निर्णय किया जायगा ॥ २१६-२१८ ॥ यो ग्रामदेशसङ्घानां कृत्वा सत्येन संविदम् । विसंवदेन्नरो लोभात्तं राष्ट्राद्विप्रवासयेत् ॥ २१९ ॥

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३८४ मनुस्मृति । निगृह्य दापयेच्चैनं समयव्यभिचारिणम् । चतुःसुवर्णान् षण्णिष्काञ्छतमानं च राजतम् ॥२२०॥ एतद्दण्डविधिं कुर्याद्धार्मिकः पृथिवीपतिः । ग्रामजातिसमूहेषु समयव्यभिचारिणाम् ॥ २२१ ॥ प्रतिज्ञाभङ्ग-इकरार तोड़ना । जो मनुष्य गाँव या देश के लोगों से किसी काम के लिए सत्य- प्रतिज्ञा करके लोभ से उसको छोड़ देवे तो राजा उसको राज्य से निकाल दे और उस नियमभङ्ग करनेवाले को पकड़कर चार निष्क वा छः सुवर्ण या एक चांदी का शतमान दण्ड करे । धार्मिक राजा गाँव या जातिमण्डल में प्रतिज्ञाभङ्ग करनेवाले को इस भांति दण्ड करे ॥ २१६-२२१ ॥ क्रीत्वा विक्रीय वा किञ्चिद्यस्येहानुशयो भवेत् । सोऽन्तर्दशाहात्तद्द्रव्यं दद्याच्चैवाददीत च ॥ २२२ ॥ परेण तु दशाहस्य न दद्यान्नापि दापयेत् । आददानो ददच्चैव राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट् ॥ २२३ ॥ किसी वस्तु को खरीद वा बेंचकर जिसको पसंद न हो वह दश दिन के भीतर उसको वापस कर दे या लेवे । परन्तु दश दिन के बाद न वापस करे न करावे । क्योंकि समय-भङ्ग करने से ६०० पण दण्ड उस पर किया जायगा ॥ २२२-२२३ ॥ यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति । तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं स्वयं षण्णवतिं पणान् ॥२२४॥ अकन्येति तु यः कन्यां ब्रूयाद् द्वेषेण मानवः । स शतं प्राप्नुयाद्दण्डं तस्या दोषमदर्शयन् ॥ २२५ ॥

· आठवां अध्याय । २८५

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· आठवां अध्याय । २८५ पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः । नाकन्यासु कचित्नॄणां लुप्तधर्मक्रिया हि ताः॥२२६॥ पाणिग्रहणिका मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् । तेषां निष्ठा त विज्ञेया विद्वद्भिः सप्तमे पदे ॥ २२७ ॥ यस्मिन् यस्मिन् कृते कार्ये यस्येहानुशयो भवेत् । तमनेन विधानेन धर्म्ये पथि निवेशयेत् ॥ २२८ ॥ जो पुरुष दोषवाली कन्या के दोष बिना बतलाए विवाह करदे उसपर राजा ९६ पण दण्ड करे। किसी ईर्षा से कन्या में दोष लगावे, पर उसको न दिखलावे तो उस पर सौ १०० पण दण्ड करे। विवाहसम्बन्धी वैदिक मन्त्र कन्याओं के लिए ही कहे हैं जो कन्या नहीं हैं उनके लिए नहीं क्योंकि उनका कन्यापन लोप होगया। विवाह के मन्त्र कन्या में स्त्रीत्व लाते हैं और उन मन्त्रों की समाप्ति सप्तपदी हो जाने पर होती है-ऐसा धर्मशास्त्रियों का निर्णय है। इस जगत् में जिस जिस काम के करने पर जिसको अफ़सोस पैदा होउसका निर्णयकही रीति से राजा करे॥२२४-२२८॥ पशुषु स्वामिनां चैव पालानां च व्यतिक्रमे । विवादं संप्रवक्ष्यामि यथावद्धर्मतत्त्वतः ॥ २२६ ॥ दिवा वक्तव्यता पाले रात्रौ स्वामिनि तद्गृहे । योगक्षेमेऽन्यथा चेत्तु पालो वक्तव्यतामियात्॥ २३०॥ गोपः क्षीरभृतो यस्तु स दुह्याद्दशतोऽवराम् । गोस्वाम्यनुमते भृत्यः सा स्यात्पालेऽभृते भृतिः॥२३१॥ पशु के मालिक और चरवाह में प्रतिज्ञाभङ्ग होने पर इस प्रकार निर्णय करे-पशुओं की रक्षा का भार दिन में चरवाह और रात में उनके मालिक पर है और चारे की कमी पर चरवाह उत्तर-

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२८६ मनुस्मृति । दाता है। जो चरवाह दूध मात्र का वेतन पाता हो वह स्वामी की आज्ञा से दश गौओं में जो उत्तम हो उसको दुह लेय। यह बिना तनख्वाह के चरवाह की तनख्वाह है ॥ २२६-२३१ ॥ नष्टं विनष्टं कृमिभिः श्वहतं विषमे मृतम् । हीनं पुरुषकारेण प्रदद्यात्पाल एव तु ॥ २३२ ॥ विघुष्य तु हृतं चौरैर्न पालो दातुमर्हति । यदि देशे च काले च स्वामिनः स्वस्य शंसति ॥२३३॥ कर्णौ चर्म च बालांश्च बस्तिं स्नायुं च रोचनाम् । पशुषु स्वामिनां दद्यान्मृतेष्वङ्गानि दर्शयेत् ॥ २३४ ॥ अजाविके तु संरुद्धे वृकैः पाले त्वनायति । यां प्रसह्य वृको हन्यात्पाले तत्किल्बिषं भवेत् ॥२३५॥ तासां चेदवरुद्धानां चरन्तीनां मिथो वने । यामुत्प्लुत्य वृको हन्यान्न पालस्तत्र किल्बिषी ॥२३६॥ जो पशु खो जाय, कीड़े पड़कर मरजाय, कुत्तों से मारा जाय, गढ़े में गिरकर मरजाय, चरवाह की असावधानी से चोर लेजायँ तो उसको चरवाह मालिक को देवे । जो चोर हमला करके कोई पशु लेजायँ तो चरवाह ठीक समय पर मालिक से इत्तिला करे तो चरवाह दण्ड न देय । यदि पशु खुद मरजाय तो उसके कान, चमड़ा, बाल, वस्ति, स्नायु और रोचना वगैरह से कोई अङ्ग मालिक को दे देय और कोई अङ्ग दिखला दे । बकरों और भेड़ को भेंडिया घेर ले और चरवाह उनको छोड़कर भग जावे तो जिसको मारेगा उसका पातक चरवाह को लगेगा और यदि बकरी, भेड़ को चरवाहने घेर रक्खा हो और अचानक भेंडिया आकर मारडाले तो चरवाह पातकी न होगा ॥ २३२-२३६ ॥ धनुःशतं परीहारो ग्रामस्य स्यात्समन्ततः ।

आठवां अध्याय । २८७

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आठवां अध्याय । २८७ शम्यापातास्त्रयो वापि त्रिगुणो नगरस्य तु ॥ २३७ ॥ तत्रापरीवृतं धान्यं विहिंस्युः पशवो यदि । न तत्र प्रणयेद्दण्डं नृपतिः पशुरक्षिणाम् ॥ २३८ ॥ गाँव के चारों तरफ़ चार सौ हाथ या तीन लकड़ी फेंकने पर जितनी दूर गिरें वहां तक और नगर के आसपास उसकी तिगुनी भूमि पशुओं के लिए छोड़ रखना उचित है, इस भूमि को 'परिहार' कहते हैं । उस भूमि में बाड़ न होने से अन्न कोई पशु खालें तो राजा चरवाह को दण्ड न देय ॥ २३७-२३८॥ वृत्तिं तत्र प्रकुर्वीत यामुष्ट्रो न विलोकयेत् । छिद्रं च वारयेत्सर्वं श्वसूकरमुखानुगम् ॥ २३६ ॥ पथि क्षेत्रे परिवृते ग्रामान्तीयेऽथवा पुनः । स पालः शतदण्डार्हो विपालांश्चारयेत्पशून् ॥ २४० ॥ क्षेत्रेष्वन्येषु तु पशुः सपादं पणमर्हति । सर्वत्र तु सदो देयः क्षेत्रिकस्येति धारणा ॥ २४१ ॥ अनिर्दशाहां गां सूतां वृषान् देवपशूंस्तथा । स पालांवाविपालान्वानदण्ड्यान्मनुरब्रवीत्॥२४२। क्षेत्रियस्यात्यये दण्डो भागाद्दशगुणो भवेत् । ततोऽर्धदण्डो भृत्यानामज्ञानात्क्षेत्रियस्य तु ॥ २४३ ॥ एतद्विधानमातिष्ठेद्धार्मिकः पृथिवीपतिः । स्वामिनां च पशूनां च पालानां च व्यतिक्रमे ॥ २४४ ॥ उस भूमि के बचाने को इतनी ऊंची वाड़ करे जिसमें ऊंट न देख सकें और छोटे छेदों को बंद करदें जिसमें सुअर, कुत्ता का मुँह न जासके। गाँव के या रास्ते के पास बाड़ से घिरे खेतों का

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२८८ मनुस्मृति । अन्न पशु खालें तो चरवाह को सौ पण दण्ड करे और विना चर- वाह के पशुओं को हाँक देवे। दूसरे खेतों में पशु हानि करे तो चरवाह पर सवां पण दण्ड करे। और खेत के स्वामी की हानि तो सब हालत में देनो ही चाहिए। दश दिन के भीतर की वियाई गो, सांड़ और देवार्पण करके छोड़े हुए पशु खेत खालें तो चर- वाह साथ हो या न हो, दण्ड नहीं होसकता-मनुजी फ़रमाते हैं। यदि खेतवालेही के पशु खेत चरें तो राजा हानि से दश- गुणा दण्ड करे और हलवाहों की भूल से हो तो उसका आधा दण्ड करे। इसभांति पशुओं के स्वामी, पशु और चरवाह के अपराध होनेपर धार्मिक राजा न्याय करे ॥ २३६-२४४ ॥ सीमां प्रति समुत्पन्ने विवादे ग्रामयोर्द्वयोः । ज्येष्ठे मासि नयेत्सीमां सुप्रकाशेषु सेतुषु ॥ २४५ ॥ सीमावृक्षांश्च कुर्वीत न्यग्रोधाश्वत्थकिंशुकान् । शाल्मलीन्सालतालांश्च क्षीरिणश्चैव पादपान्॥२४६॥ सीमा-सरहद् का निर्णय । यदि दो गाँवों के हद का झगड़ा उठे तो जेठ मास में जब ज़मीन साफ़ हो तब उसका निश्चय करना। हद जानने के लिए बड़, पीपल, ढाक, सैमर, साल, ताल और दूधवाले कोई वृक्ष स्थापित करे ॥ २४५-२४६ ॥ गुल्मान्वेणूंश्च विविधाञ्छमीवल्लीस्थलानि च । शरान् कुब्जक गुल्मांश्च तथा सीमा न नश्यति॥२४७॥ तडागान्युदपानानि वाप्यः प्रस्रवणानि च । सीमासंधिषु कार्याणि देवतायतनानि च ॥ २४८ ॥ उपच्छन्नानि चान्यानि सीमलिङ्गानि कारयेत् । सीमाज्ञाने नृणां वीक्ष्य नित्यं लोके विपर्ययम् ॥ २४६॥

आठवां अध्याय । २८६

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आठवां अध्याय । २८६ अश्मनोऽस्थीनि गोवालांस्तुषान्भस्मकपालिकाः । करीषमिष्टकाङ्गारान्छर्करा बालुकास्तथा ॥ २५० ॥ यानि चैवंप्रकाराणि कालान्भूमिर्न भक्षयेत् । तानि संधिषु सीमायामप्रकाशानि कारयेत् ॥ २५१ ॥ एतैर्लिङ्गैर्नयेत्सीमां राजा विवदमानयोः । पूर्वभुक्त्या च सततमुदकस्यागमेन च ॥ २५२ ॥ गुल्म, बांस, शमी, लता, रामशर, कुब्जक की वेल वगैरह लगावे तो सीमा नहीं बिगड़ती । तालाब, कुआं, बावली, झरना, देवम- न्दिर सीमा के मेल पर बनवावे । सीमा के लिए लोक में प्रायः झगड़ा हुआ करता है इसलिए उसके जानने के लिए छिपा चिह्न भी कर रक्खे । पत्थर, हड्डी, गौके बाल, भूसी, राख, ठीकरा, सूखा गोबर, ईंट, कोयला, रोड़ा, रेता आदि वस्तुओंको जो बहुत दिनों तक ज़मीन में छिपजाने लायक न हों उनको सीमाके नीचे रखदेवे। राजा इन चिह्नों से पुराने भोग से, नदी आदि जल मार्ग से, सीमा निर्णय करे ॥ २४७-२५२ ॥ यदि संशय एव स्याल्लिङ्गानामपि दर्शने । साक्षिप्रत्यय एव स्यात्सीमावादविनिर्णयः ॥ २५३ ॥ ग्रामीणककुलानां च समक्षं सीम्नि साक्षिणः । प्रष्टव्याः सीमलिङ्गानि तयोश्चैव विवादिनोः ॥ २५४ ॥ चिह्नों के देखने पर भी अगर कोई संदेह हो तो साक्षी-गवाहों के विश्वास पर निर्णय होगा । वादी, प्रतिवादी, गांवके कुलीन पंचों के सामने सब बातें पूंछे और फ़ैसला करे ॥ २५३-२५४ ॥ ते पृष्टास्तु यथा ब्रूयुः समस्ताः सीम्नि निश्चयम् । निबध्नीयात्तथा सीमां सर्वांस्तांश्चैव नामतः ॥ २५५ ॥ ३७

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२६० मनुस्मृति । शिरोभिस्ते गृहीत्वोर्वीं स्रग्विणो रक्तवाससः । सुकृतैः शापिताः स्वैः स्वैर्नयेयुस्ते समञ्जसम् ॥ २५६ ॥ यथोक्तेन नयन्तस्ते पूयन्ते सत्यसाक्षिणः । विपरीतं नयन्तस्तु दाप्याः स्युर्द्विशतं दमम् ॥ २५७ ॥ साक्ष्याभावे तु चत्वारो ग्रामाः सामन्तवासिनः । सीमाविनिर्णयं कुर्युः प्रयता राजसन्निधौ ॥ २५८ ॥ सामन्तानामभावे तु मौलानां सीम्नि साक्षिणाम् । इमानप्यनुयुञ्जीत पुरुषान्वनगोचरान् ॥ २५६ ॥ व्याधाञ्छाकुनिकान्गोपान्कैवर्तान्मूलखानकान् । व्यालग्रहानुञ्छवृत्तीनन्यॉंश्च वनचारिणः ॥ २६० ॥ ते पृष्टास्तु यथा ब्रूयुः सीमां संधिषु लक्षणम् । तत्तथा स्थापयेद्राजा धर्मेण ग्रामयोर्द्वयोः ॥ २६१ ॥ वे लोग पूँछने पर जैसा कहें उसीके मुताबिक सीमा बांधे और उन पञ्चों का नाम लिखले । वे साक्षी लाल फूलों की माला, लाल वस्त्र पहनकर शिर पर मिट्टी का ढेला रखकर अपने अपने पुण्य की शपथ खाकर ठीक बात कहें । वे सत्य साक्षी यथार्थ निर्णय करने से निष्पाप होते हैं और असत्य निर्णय करें तो दो सौ पण दण्ड उन पर करे । यदि साक्षियों का अभाव हो तो आसपास के चार ज़मींदार धर्म से राजा के सामने सीमा निर्णय करें । यदि ज़मींदार और गांव के पुराने वाशिन्दा सीमा के साक्षी न मिलें तो वनमें रहनेवाले मनुष्यों से पूंछे । व्याध, चिड़ीमार, ग्वाल, मछुए, जड़ खोदनेवाले, कना बीनकर जीनेवाले आदि मनुष्यों से सब बातें निश्चित करे । वे लोग जैसा बतलावें उसी भांति राजा दो गावोंके बीच सीमाका स्थापन करे ॥ २५५-२६१ ॥

आठवां अध्याय । २६१

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आठवां अध्याय । २६१ क्षेत्रकूपतडागानामारामस्य गृहस्य च । सामन्तप्रत्ययो ज्ञेयः सीमासेतुविनिर्णयः ॥ २६२ ॥ खेत, कुआं, तालाब, बगीचा और घरों की सीमा का निर्णय आसपास के गवाहों से करना चाहिए ॥ २६२ ॥ सामन्ताश्चेन्मृषा ब्रूयुः सेतौ विवदतां नृणाम् । सर्वे पृथक् पृथग्दण्ड्याः राज्ञा मध्यमसाहसम्॥ २६३॥ गृहं तडागमारामं क्षेत्रं वा भीषया हरन् । शतानि पञ्च दण्ड्यः स्यादज्ञानाद् द्विशतो दमः॥२६४॥ सीमायामविषह्यायां स्वयं राजैव धर्मवित् । प्रविशेद्भूमिमेतेषामुपकारादिति स्थितिः ॥ २६५ ॥ एषोऽखिलेनाभिहितो धर्मः सीमाविनिर्णये । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि वाक्पारुष्यविनिर्णयम् ॥ २६६ ॥ यदि सीमाके झगड़े में पास के सामन्त झूठ बोलें तो हर एक को पांच पांच सौ पण दण्ड करे । घर, तालाब, बगीचा वा खेत को डर दिखा कर कोई छीनले तो पांचसौ पण उसपर दण्ड करे और अजान में ले तो दोसौ पण दण्ड करे । सीमा के निर्णय का कोई भी ठीक सबूत न मिले तो धर्मज्ञ राजा स्वयं सीमा को बांध दे यही मर्यादा है इस भांति सब सीमा निर्णय का विषय कहा गया है, अब कठोर वचन का निर्णय कहा जायगा ॥ २६३-२६६ ॥ शतं ब्राह्मणमाक्रुश्य क्षत्रियोदण्डमर्हति । वैश्योऽप्यर्धशतं द्वे वा शूद्रस्तु वधमर्हति ॥ २६७ ॥ पञ्चाशद् ब्राह्मणो दण्ड्यः क्षत्रियस्याभिशंसने । वैश्ये स्यादर्धपञ्चाशच्छूद्रे द्वादशको दमः ॥ २६८ ॥

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२६२ मनुस्मृति। समवर्णो द्विजातीनां द्वादशैव व्यतिक्रमे । वादेष्ववचनीयेषु तदेव द्विगुणं भवेत् ॥ २६६ ॥ एकजातिर्द्विजातींस्तु वाचा दारुणया क्षिपन् । जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्यप्रभवो हि सः॥ २७० ॥ कठोर वचन-गाली आदि का निर्णय । ब्राह्मण को क्षत्रिय गाली दे तो सौ पण दण्ड करे, वैश्य को डेढ़ सौ या दो सौ पण दण्ड करे । शूद्र को तो पीटनाही योग्य है। क्षत्रिय को गाली ब्राह्मण दे तो पचास पण, वैश्य को दे तो पचीस और शूद्र को गाली दे तो बारह पण दण्ड करे । द्विजाति अपने समान वर्ण को गाली दे तो बारह पण और गंदी गाली दे तो इसका दूना दण्ड करे। कोई शूद्र, द्विजाति का कठोर वाणी से अपमान करे तो उसकी जीभ काट ले । क्योंकि शूद्र पैर से पैदा हुआ है ॥ २६७-२७० ॥ नामजातिग्रहं त्वेषामभिद्रोहेण कुर्वतः। निक्षेप्योऽयोमयः शङ्कुर्ज्वलन्नास्येदशाङ्गुलः॥२७१॥ धर्मोपदेशं दर्पेण विप्राणामस्य कुर्वतः। तप्तमासेचयेत्तैलं वक्त्रे श्रोत्रे च पार्थिवः ॥ २७२ ॥ श्रुतं देशं च, जातिं च, कर्म शारीरमेव च । वितथेन ब्रुवन्दप्यादाप्यः स्याद् द्विशतं दमम् ॥ २७३ ॥ काणं वाप्यथवा खञ्जमन्यं वापि तथाविधम्। तथ्येनापि ब्रुवन् दाप्यो दण्डं कार्षापणावरम् ॥ २७४ ॥ मातरं पितरं जायां भ्रातरं तनयं गुरुम् । आक्षारयञ्छतं दाप्यः पन्थानं चाददद्गुरोः॥ २७५ ॥

आठवां अध्याय । २६३

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आठवां अध्याय । २६३ ब्राह्मणक्षत्रियाभ्यां तु दण्डः कार्यो विजानता । ब्राह्मणे साहसः पूर्वः क्षत्रिये त्वेव मध्यमः ॥ २७६॥ विट्शूद्रयोरेवमेव स्वजातिं प्रति तत्त्वतः । छेदवर्जं प्रणयनं दण्डस्येति विनिश्चयः ॥ २७७॥ एष दण्डविधिः प्रोक्तो वाक्पारुष्यस्य तत्त्वतः । अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दण्डपारुष्यनिर्णयम् ॥ २७८ ॥ यदि नाम और जाति को घोलकर द्वेष से द्विजातियों को गाली दे तो उस शूद्र के मुख में अग्नि में तपाई दश अंगुल की कील डाले। शूद्र, अभिमान से द्विजों को धर्मोपदेश करे तो राजा उसके मुख और कान में खौलता तेल छोड़वावे। यदि अभिमान से कहे कि तू वेद नहीं पढ़ा है, अमुक देश का नहीं है, तेरी यह जाति नहीं है, तेरे संस्कार नहीं हुए हैं तो राजा दो सौ पण दण्ड करे। काना, लूला अंधा आदि किसी को सच भी कहे तो एक कार्षापण दण्ड करे। माता, पिता, स्त्री, भाई, पुत्र, गुरु को गाली देनेवाला और गुरु को मार्ग न छोड़नेवाला सौ पण दण्ड योग्य है। ब्राह्मण, क्षत्रिय आपस में गाली दें तो राजा ब्राह्मण पर अढ़ाई सौ और क्षत्रिय पर पांच सौ पण दण्ड करे। वैश्य शूद्र आपस में गाली दें तो वैश्य को साधारण दण्ड और शूद्र की जीभ न काटकर कोई दूसरा दण्ड करे इस प्रकार कठोर वचन का दण्ड निर्णय कहा गया है, अब मारपीट का दण्डनिर्णय कहा जायगा ॥ २७१-२७८ ॥ येन केनचिदङ्गेन हिंस्याच्चेच्छ्रेष्ठमन्त्यजः । छेत्तव्यं तत्तदेवास्य तन्मनोरनुशासनम् ॥ २७९ ॥ पाणिमुद्यम्य दण्डं वा पाणिच्छेदनमर्हति । पादेन प्रहरन् कोपात्पादच्छेदनमर्हति ॥ २८० ॥

अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः ।

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२६४ मनुस्मृति । सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः । कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचंचास्यावकर्त्तयेत् ॥ २८१ ॥ अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः । अवमूत्रयतो मेढ्रमवशर्धयतो गुदम् ॥ २८२ ॥ केशेषु गृह्णतो हस्ता च्छेदयेदविचारयन् । पादयोर्दाढिकायां च ग्रीवायां वृषणेषु च ॥ २८३ ॥ दण्डपारुष्य-मार पीट का निर्णय । शूद्र, द्विजों को अपने जिस अङ्ग से मारे उसी अङ्ग को कटवा डाले यही मनुजी की आज्ञा है। हाथ, डंडा उठाकर मारे तो हाथ और कोप से पैर से मारे तो पैर काटने योग्य है। नीच जाति का ऊंची जातिवाले के साथ अभिमान से बैठना चाहे तो उसकी कमर में दागकरके देश से निकाल दे। हीनवर्ण ऊंचे वर्ण के ऊपर थूके तो दोनों ओठ कटवावे, मूते तो लिङ्ग और पादे तो गुदा कटवावे बाल पकड़े, पैर पकड़े, घसीटे, दाढ़ी गर्दन और अण्डकोष में हाथ लगावे तो बिना विचार झट हाथ कटवादे ॥ २७६-२८३ ॥ त्वग्भेदकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः । मांसभेत्ता तु षण्निष्कान्प्रवास्यस्त्वस्थिभेदकः ॥ २८४ ॥ वनस्पतीनां सर्वेषामुपभोगं यथा यथा । तथा तथा दमः कार्यों हिंसायामिति धारणा ॥ २८५ ॥ मनुष्याणां पशूनां च दुःखाय प्रहृते सति । यथा यथा महद्दुःखं दण्डं कुर्यात्तथा तथा ॥ २८६ ॥ 'खाल खींचने और खून निकालने पर सौ पण दण्ड करे । मांस काटे तो छः निष्क और हड्डी तोड़े तो देशनिकाले की सज़ा करे । संपूर्ण वृक्षों का उपयोग विचार कर उनके काटनेवाले को दण्ड देवे । मनुष्य और पशुओं को मारने पर जैसा अधिक दुःख हो

आठवां अध्याय । २६५

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आठवां अध्याय । २६५ उसीके अनुसार अपराधी को दण्ड भी दुःखदायी करना चाहिये ॥ २८४-२८६ ॥ अङ्गवपीडनायां च व्रणशोणितयोस्तथा । समुत्थानव्ययं दाप्यः सर्वदण्डमथापि वा ॥ २८७ ॥ द्रव्याणि हिंस्याद्यो यस्य ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपि वा । स तस्योत्पादयेत्तुष्टिं राज्ञो दद्याच्च तत्समम् ॥ २८८ ॥ चर्मचार्मिकभाण्डेषु काष्ठलोष्ठमयेषु च । मूल्यात्पञ्चगुणो दण्डः पुष्पमूलफलेषु च ॥ २८६ ॥ यानस्य चैव यातुश्च यानस्वामिन एव च । दशातिवर्तनान्याहुः शेषे दण्डो विधीयते ॥ २६० ॥ छिन्नास्ये भग्नयुगे तिर्यक्प्रतिमुखागते । अक्षभङ्गे च यानस्य चक्रभङ्गे तथैव च ॥ २६१ ॥ छेदने चैव यन्त्राणां योक्त्ररश्म्योस्तथैव च । आक्रन्दे चाप्यपैहीति न दण्डं मनुरब्रवीत् ॥ २६२ ॥ हाथ, पैर आदि अङ्ग तोड़ने वा घायल करनेवाले से उसके अच्छे होने के लिए खर्च दिलवावे अथवा सब प्रकार का दण्ड देय । जो जानकर वा न जानकर किसी की कोई वस्तु बिगाड़े तो उसको दाम वगैरह देकर खुश करे और राजा को उतनाही दण्ड देय । चमड़ा, चाम के पात्र-मशक आदि, काठ और मिट्टी के पात्र, फूल, मूल और फलों की हानि करने पर मूल्य से पाँच गुना दण्ड करे । सवारी सारथि और सवारी के मालिक को दश हालतों में छोड़कर बाक़ी में दण्ड दिया जाता है। नाथ टूटने, जुवा टूटने, नीचे ऊंचे के कारण, टेढ़े वा अड़कर चलने, रथ का धुरा टूटने, पहिया टूटने, रस्सी टूटने, गले की रस्सी टूटने, लगाम टूटने और 'हटो-बचो' आदि कहने पर भी यदि किसी

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२६६ मनुस्मृति । का नुक़सान होजाय तो मनुजी ने दण्ड नहीं कहा ॥ २८७-२६२ ॥ यत्रापवर्त्तते युग्यं वैगुण्यात्प्राजकस्य तु । तत्र स्वामी भवेद्दण्ड्यो हिंसायां द्विशतं दमम् ॥ २६३ ॥ प्राजकश्चेद्भवेदाप्तः प्राजको दण्डमर्हति । युग्यस्थाः प्राजकेऽनाप्ते सर्वेदण्ड्याः शतं शतम् ॥२६४॥ जहां सारथि के चतुर न होने से रथ इधर उधर चलता है उस से नुक़सान होने पर स्वामी को दो सौ पण दण्ड होना चाहिए । और सारथि चतुर-होशियार हो तो उसीको दो सौ पण दण्ड करे । सारथि कुशल न होने पर जो सवारी करते हैं वे सब सौ सौ पण दण्ड क़ाबिल हैं ॥ २६३-२६४ ॥ स चेत्तु पथि संरुद्धः पशुभिर्वा रथेन वा । प्रमापयेत् प्राणभृतस्तत्र दण्डोऽविचारितः ॥ २६५ ॥ मनुष्यमारणे क्षिप्रं चौरवत्किल्बिषं भवेत् । प्राणभृत्सु महत्स्वर्धं गोगजोष्ट्रहयादिषु ॥ २६६ ॥ क्षुद्रकाणां पशूनां तु हिंसायां द्विशतो दमः । पञ्चाशत्तु भवेद्दण्डः शुभेषु मृगपक्षिषु ॥ २६७ ॥ गर्दभाजाविकानां तु दण्डः स्यात्पञ्चमाषिकः । माषकस्तु भवेद्दण्डः श्वसूकरनिपातने ॥ २६८ ॥ भार्या पुत्रश्च दासश्च प्रेष्यो भ्राता च सौदरः । प्राप्तापराधास्ताड्याः स्यू रज्ज्वा वेणुदलेन वा ॥२६६॥ पृष्ठतस्तु शरीरस्य नोत्तमाङ्गे कथञ्चन । अतोऽन्यथा तु प्रहरन्प्राप्तः स्याच्चोरकिल्विषम् ॥ ३०० ॥