मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
चौथा अध्याय । ११६
चौथा अध्याय । ११६ नवेमानर्चिता ह्यस्य पशुहव्येन चाग्नयः । प्राणानेवात्तुमिच्छन्ति नवान्नामिषगार्द्धितः ॥ २८ ॥ आसनाशनशय्याभिरद्भिर्मूलफलेन वा । नास्य कश्चिद्वसेद्गेहे शक्तितोऽनर्चितोऽतिथिः ॥२९॥ पाखण्डिनो विकर्मस्थान् वैडालव्रतिकान् शठान् । हैतुकान् बकवृत्तींश्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ॥ ३० ॥ वेदविद्याव्रतस्नातान् श्रोत्रियान् गृहमेधिनः । पूजयेद्धव्यकव्येन विपरीतांश्च वर्जयेत् ॥ ३१ ॥ नवीन अन्न से इष्टि करके नया अन्न और पशुयाग करके मांस खाने से दीर्घायु होती है। यदि नवीन अन्न और मांस से यज्ञ किये विना कोई नया अन्न और मांस खाता है उसकी प्रजा को ही अग्निदेव खाने की इच्छा करते हैं। गृहस्थ के यहां आसन, भोजन, शय्या, जल, फल और फूल से यथाशक्ति अतिथि का सत्कार ज़रूर होना चाहिए इसके बिना वह न रहने पावे। वेद के ख़िलाफ़ आचरण करनेवाले पाखण्डी, आश्रम के विरुद्ध वृत्ति से जीविका करनेवाले, दम्भ से वैडालव्रत-बिल्ली के भांति मौन साधनेवाले शठ, कुतर्की और वगलाभक्त इन सब कपटियों का ज़बान से भी सत्कार गृहस्थ को न करना चाहिए ॥ २७-३१ ॥ शक्तितोऽपचमानेभ्यो दातव्यं गृहमेधिना । संविभागश्च भूतेभ्यः कर्त्तव्योऽनुपरोधतः ॥ ३२ ॥ राजतो धनमन्विच्छेत् संसीदन् स्नातकः क्षुधा । याज्यान्तेवासिनोर्वापि नत्वन्यत इति स्थितिः॥ ३३ ॥ विद्यास्नातक, व्रतस्नातक और विद्याव्रतस्नातक इन तीन प्रकार के श्रोत्रिय गृहस्थों का देव-पितृकर्म में सत्कार करना चाहिए। जो ऐसे न हों उनको पूछना न चाहिए। गृहस्थ को
१२० मनुस्मृति । चाहिए, अपने हाथ से भोजन न बनानेवाले ब्रह्मचारी-संन्यासी को पक्वान्न आदि देवे और जहां तक होसके जड़-चेतन सब प्राणियों को अन्न, जल से आदर करे । स्नातक गृहस्थ यदि भोजन के लिए दुःखी हो तो वह क्षत्रिय राजा, यजमान और शिष्य से धन लेने की इच्छा करे, परन्तु पतित-अधर्मियों से कभी न लेय, यह धर्मशास्त्र की मर्यादा है ॥ ३२-३३ ॥ न सीदेत् स्नातको विप्रः क्षुधाशक्तः कथंचन । न जीर्णमलवासा भवेच्च विभवे सति ॥ ३४ ॥ कॢप्तकेशनखश्मश्रुर्दान्तः शुक्लाम्बरः शुचिः । स्वाध्याये चैव युक्तः स्यान्नित्यमात्महिते रतः ॥ ३५ ॥ वैणवीं धारयेद्यष्टिं सोदकं च कमण्डलुम् । यज्ञोपवीतं वेदं च शुभे रौक्मे च कुण्डले ॥ ३६ ॥ स्नातक ब्राह्मण को किसी प्रकार भी क्षुधा से पीड़ित न रहना चाहिए । यदि धन न हो तो पुराने और मैले कपड़ों को भी न पहने । केश, नख और दाढ़ी को कटवाया करे, सफेद वस्त्र पहने और पवित्र होकर रहा करे । अपने स्वाध्याय में लगा रहे और अपनी शरीररक्षा के लिए उपाय किया करे । बांस की लकड़ी, जलपूर्ण कमण्डलु, यज्ञोपवीत, वेदपुस्तक और सोने के सुन्दर कुण्डल को धारण करे ॥ ३४-३६ ॥ नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं नास्तं यान्तं कदाचन । नोपसृष्टं न वारिस्थं न मध्यं नभसो गतम् ॥ ३७ ॥ न लङ्घयेद्वत्सन्त्रीं न प्रधावेच्च वर्षति । न चोदके निरीक्षेत स्वं रूपमिति धारणा ॥ ३८ ॥ मृदं गां दैवतं विप्रं घृतं मधु चतुष्पथम् । प्रदक्षिणानि कुर्वीत प्रज्ञातांश्च वनस्पतीन् ॥ ३६ ॥
चौथा अध्याय । १२१
चौथा अध्याय । १२१ नोपगच्छेत् प्रमत्तोऽपि स्त्रियमार्तवदर्शने । समानशयने चैव न शयीत तया सह ॥ ४० ॥ उदय और अस्त होतेहुए सूर्य को जानकर कभी न देखना चाहिए । और ग्रहणसमय में, जल में और दोपहर में भी न देखना चाहिए। बछड़ा बांधने की रस्सी को लांघना न चाहिए, वर्षा होते समय रास्ते में दौड़ना और जल में अपना मुख देखना न चाहिए। यह धर्मशास्त्र की आज्ञा है। मिट्टी का टीला, गौ, देवमूर्ति, ब्राह्मण, घी, शहद, चौराहा और वट, पीपल वगैरह वृक्ष, मार्ग में जातेहुए देख पड़ें तो उनको दाहिनी तरफ़ करके जाना चाहिए। कामातुर पुरुष को भी रजस्वला स्त्री के साथ भोग न करना चाहिए और न एक शय्या पर सोना ही चाहिए ॥ ३७-४०॥ रजसाभिप्लुतां नारीं नरस्य ह्युपगच्छतः । प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रहीयते ॥ ४१ ॥ तां विवर्जयतस्तस्य रजसा समभिप्लुताम् । प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रवर्धते ॥ ४२ ॥ नाश्नीयाद्भार्यया सार्धं नैनामीक्षेत चाश्नतीम् । क्षुवतीं जृम्भमाणां वा न चासीनां यथासुखम् ॥४३॥ नाञ्जयन्तीं स्वके नेत्रे न चाभ्यक्तामनावृताम् । न पश्येत्प्रसवन्तीं च तेजस्कामो द्विजोत्तमः ॥ ४४ ॥ जो पुरुष रजस्वला स्त्री के साथ भोग करता है उसकी बुद्धि, तेज, बल, नेत्र और आयु नष्ट होती है। जो उससे बचा रहता है उसकी बुद्धि, तेज, बल, नेत्र और आयु बढ़ते हैं। स्त्री और पुरुष साथ बैठकर भोजन न करें। स्त्री को भोजन करती, छींकती, जंभाई लेती और मनमानी बैठी हुई कभी न देखना चाहिए। अंजन लगाती, तैल मलती, नंगी और बालक पैदा होता हो तो उस समय भी न देखे ॥ ४१-४४ ॥ १६
१२२ मनुस्मृति । नान्नमद्यादेकवासा न नग्नः स्नानमाचरेत् । न मूत्रं पथि कुर्वीत न भस्मनि न गोव्रजे ॥ ४५ ॥ न फालकृष्टे न जले न चित्यां न च पर्वते । न जीर्णदेवायतने न वल्मीके कदाचन ॥ ४६ ॥ न ससत्त्वेषु गर्तेषु न गच्छन्नपि च स्थितः । न नदीतीरमासाद्य न च पर्वतमस्तके ॥ ४७ ॥ गृहस्थ को एक वस्त्र से भोजन, नंगा होकर स्नान, मार्ग में, राख के ढेर पर और गोशाला में पेशाब न करना चाहिए । हल से जोती जमीन में, जल में, चिता में, पर्वत में, पुराने देव- मन्दिर में और बामी पर पेशाब कभी न करना चाहिए। जीवजन्तु वाले गढों में, चलतेहुए, खड़ा होकर, नदी के किनारे पर और पहाड़ की चोटी पर पेशाब न करना चाहिए ॥ ४५-४७ ॥ वाय्वग्निविप्रमादित्यमपः पश्यंस्तथैव गाः । न कदाचन कुर्वीत विण्मूत्रस्य विसर्जनम् ॥ ४८ ॥ तिरस्कृत्योच्चरेत्काष्ठलोष्ठपत्रतृणादिना । नियम्य प्रयतो वाचं संवीताङ्गोऽवगुण्ठितः ॥ ४९ ॥ मूत्रोच्चारसमुत्सर्गं दिवा कुर्यादुदङ्मुखः । दक्षिणाभिमुखो रात्रौ सन्ध्ययोश्च यथा दिवा ॥ ५० ॥ छायायामन्धकारे वा रात्रावहनि वा द्विजः । यथा सुखमुखः कुर्यात्प्राणबाधाभयेषु च ॥ ५१ ॥ वायु, अग्नि, ब्राह्मण, सूर्य, जल और गौ को सामने देखकर कभी मल-मूत्र का त्याग न करना चाहिए। शरीर और शिर को वस्त्र से ढँककर, मौन होकर, लकड़ी, ढेला, वृक्ष का गिरा पत्ता या तिनका से भूमि को ढककर मल-मूत्र त्याग करने को बैठना
चौथा अध्याय । १२३
चौथा अध्याय । १२३ चाहिए। दिन में उत्तर दिशा और रात में दक्षिण दिशा को मुख करके मल-मूत्र करना चाहिए। दिन हो या रात हो, छांया में, अंधेरा में या जहां प्राण का भय हो, तब जिस दिशा में इच्छा हो उसी तरफ़ मुख कर सकता है ॥ ४८-५१ ॥ प्रत्यग्निं प्रतिसूर्यं वा प्रतिसोमोदकद्विजान् । प्रतिगां प्रतिवातं च प्रज्ञा नश्यति मेहतः ॥ ५२ ॥ नाग्निं मुखेनोपधमेन्नग्नां नेक्षेत च स्त्रियम् । नामेध्यं प्रक्षिपेदग्नौ न च पादौ प्रतापयेत् ॥ ५३ ॥ अधस्तान्नोपद्ध्याच्च न चैनमभिलङ्घयेत् । न चैनं पादतः कुर्यान्न प्राणाबाधमाचरेत् ॥ ५४ ॥ जो गृहस्थ अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, जल, ब्राह्मण, गौ और वायु के संमुख होकर मल-मूत्र करता है, उसकी बुद्धि बिगड़ जाती है। अग्नि को मुख से फूँकना और नंगी स्त्री को देखना अनुचित है। अग्नि में कोई अपवित्र चीज़ डालना और पैर के तलवा को उसमें सेंकना न चाहिए। खाट के नीचे आग रखना, उसको उलांघ कर जाना और पैर के नीचे दबाना न चाहिए। जिसमें प्राणबाधा का भय हो ऐसा परिश्रम न करना चाहिए ॥ ५२-५४ ॥ नाश्नीयात्सन्धिवेलायां न गच्छेन्नापि संविशेत् । न चैव प्रलिखेद्भूमिं नात्मनोपहरेत् स्रजम् ॥ ५५ ॥ नाप्सु मूत्रं पुरीषं वा ष्ठीवनं वा समुत्सृजेत् । अमेध्यलिप्तमन्यद्वा लोहितं वा विषाणि वा ॥ ५६ ॥ नैकः स्वपेच्छून्यगेहे शयानं न प्रबोधयेत् । नोदक्ययाभिभाषेत यज्ञं गच्छेन्न चावृतः ॥ ५७ ॥ सायंकाल और प्रातःकाल भोजन, एक गाँव से दूसरे गाँव को जाना और सोना न चाहिए। ज़मीन नख से लिखना और गले
१२४ मनुस्मृति। में से खुदही अपनी माला निकालना न चाहिए। मूत्र, मल, थूक, जिस वस्तु में अपवित्र कुछ लगा हो और ज़हर इन सब को जल में न डालना चाहिए। सूने घर में अकेला सोना, अपने से बड़े को उपदेश देना, रजस्वला स्त्री से बातचीत करना और बिना निमन्त्रण यज्ञ में जाना यह सब अनुचित है॥ ५५-५७॥ अग्न्यगारे गवां गोष्ठे ब्राह्मणानां च सन्निधौ । स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं पाणिमुद्धरेत् ॥ ५८ ॥ नावारयेद् गां धयन्तीं न चाचक्षीत कस्यचित्। न दिवीन्द्रायुधं दृष्ट्वा कस्यचिद्दर्शयेद्बुधः ॥ ५६ ॥ नाधार्मिके वसेद्ग्रामे न व्याधिबहुले भृशम् । नैकः प्रपद्येताध्वानं न चिरं पर्वते वसेत् ॥ ६० ॥ न शूद्रराज्ये निवसेन्नाधार्मिकजनावृते । न पाखण्डिगणाक्रान्ते नोपसृष्टेऽन्त्यजैर्नृभिः ॥ ६१ ॥ अग्निस्थान, गोशाला, ब्राह्मण के पास, स्वाध्याय के समय और भोजन के समय दाहना हाथ बाहर करलेना चाहिए। बच्चे को दूध पिलाती गौ को देखकर उसको हटाना नहीं और न किसी से कहना। और आकाश में इन्द्रधनुष् देखकर किसीको दिखाना न चाहिए। जहां अधर्मी रहते हों ऐसे ग्राम में और जहां रोग फैला हो, उसमें न रहना। अकेला दूरदेश की यात्रा न करे और पर्वत के ऊपर बहुत दिनतक निवास न करना चाहिए शूद्रके राज्य में बसना न चाहिए और अधर्मी, पाखण्डी तथा चाण्डाल सेवित ग्राम आदि में न रहना चाहिए ॥ ५८-६१ ॥ न भुञ्जीतोद्धृतस्नेहं नातिसौहित्यमाचरेत् । नातिप्रगे नातिसायं न सायं प्रातराशितः ॥ ६२ ॥ न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्यञ्जलिना पिवेत्।
नोत्सङ्गे भक्षयेद्भक्ष्यान्न जातु स्यात्कूतूहली ॥ ६३ ॥ न नृत्येदथवा गायेन्न वादित्राणि वादयेत् । नास्फोटयेन्न च श्वेडेन्न च रक्तो विरावयेत् ॥ ६४ ॥ जिस वस्तु से चिकनापन निकला हो उसको न खाना और बहुत घबड़ाहट से भोजन न करना। बहुत सुबह और साम को भी भोजन न करना, और जिसने सुबह भोजन कर लिया हो वह साम को भोजन न करे। मुख, हाथ, पाँव से व्यर्थ चेष्टा न करना। अञ्जुली से पानी पीना, गोद में अन्न रखकर खाना और बिना मतलब दूसरे की बातों को जानने की आदत रखना, नाचना, गाना, बजाना, किसी चीज़ को ठोंकना, ज्यादा हँसना, खुशी से ज्यादा चिल्लाना-यह सब काम न करना चाहिए ॥ ६२-६४ ॥ न पादौ धावयेत्कांस्ये कदाचिदपि भाजने । न भिन्नभाण्डे भुञ्जीत न भावप्रतिदूषिते ॥ ६५ ॥ उपानहौ च वासश्च धृतमन्यैर्न धारयेत् । उपवीतमलङ्कारं स्रजं करकमेव च ॥ ६६ ॥ नाविनीतैर्व्रजेद्धुर्यैर्न च क्षुद्व्याधिपीडितैः । न भिन्नशृङ्गाक्षिकुरैर्न बालधिविरूपितैः ॥ ६७ ॥ विनीतैस्तु व्रजेन्नित्यमाशुगैर्लक्षणान्वितैः । वर्णरूपोपसंपन्नैः प्रतोदेनातुदन् भृशम् ॥ ६८ ॥ कांस के बर्तन में पैर धोना, फूटे पात्र व जिसमें संदेह हो, उस में भोजन न करना । दूसरे के पहनेहुए जूता, कपड़ा, जनेऊ, गहना, फूल की माला और कमण्डलु को धारण न करना । जो बैल सीधा हो, भूखा न हो, सींग, आँख, खुर ठीक हो, पूंछ वगै- रह कटजाने से खराब न दीखता हो। ऐसे बैल की सवारी में बैठना चाहिए । जो सधगये हों, तेज हों, सुन्दर हों, उनकी सवारी में बैठना और ज्यादा हाँकना व मारना न चाहिए ॥६५-६८॥
१२६ मनुस्मृति । बालातपः प्रेतधूमो वर्ज्यं भिन्नं तथासनम् । न छिन्द्यान्नखलोमानि दन्तैर्नोत्पाटयेन्नखान् ॥ ६९ ॥ न मृल्लोष्ठं च मृद्नीयान्न छिन्द्यात्करजैस्तृणम् । न कर्म निष्फलं कुर्यान्नायत्यामसुखोदयम् ॥ ७० ॥ लोष्ठमर्दी तृणच्छेदी नखखादी च यो नरः । स विनाशं व्रजत्याशु सूचकोऽशुचिरेव च ॥ ७१ ॥ न विगर्ह्य कथां कुर्याद्वहिर्माल्यं न धारयेत् । गवां च यानं पृष्ठेन सर्वथैव विगर्हितम् ॥ ७२ ॥ प्रातःकाल का धूप, चिताका धूम, और फटा आसन इनको बचाना चाहिए । नख और बालों को उखाड़ना और दांतों से नख का काटना अच्छा नहीं है । मिट्टीके टुकड़ों को हाथ से न तोड़े, नख से तिनुका न तोड़े और जिसका नतीजा खराब हो ऐसा काम न करे । जो मनुष्य ढेला तोड़ता है, तृण तोड़ता है, नख चबाता है, चुगली खाता है और भीतर-बाहर से मलिन रहता है वह शीघ्र नष्ट होजाता है । निन्दाकी कोई कथा न करें, वस्त्र के ऊपर फूल- माला न पहने और गौ की पीठपर बैठकर कहीं न जावे ॥६९-७२॥ अद्वारेण च नातीयाद् ग्रामं वा वेश्म वा वृतम् । रात्रौ च वृक्षमूलानि दूरतः परिवर्जयेत् ॥ ७३ ॥ नाक्षैः क्रीडेत् कदाचित्तु स्वयं नोपानहौ हरेत् । शयनस्थो न भुञ्जीत न पाणिस्थं न चासने ॥ ७४ ॥ सर्वं च तिलसम्बद्धं नाद्यादस्तमिते रवौ । न च नग्नः शयीतेह न चोच्छिष्टः क्वचिद्व्रजेत् ॥ ७५ ॥ जो गाँव का रास्ता हो उसको छोड़कर किसी खराब गली से उसमें न घुसना और जो घर बन्द हो उसमें सीढ़ी आदि लगाकर
चौथा अध्याय । १२७
चौथा अध्याय । १२७ भीतर न जाना । रात में वृक्षों की जड़ से दूर रहना । जुआ कभी न खेलना। अपना जूता खुदही हाथ में लेकर न चलना। सोते हुए न खाना, हाथ में रखकर दूसरे हाथसे न खाना और बैठने के आसन पर रखकर भी न खाना चाहिए। सूर्य अस्त होजाने के बाद जिसमें तिल मिला हो वह चीज़ न खाना नंगा होकर न सोना और जूठे मुँह कहीं इधर उधर न जाना चाहिए ॥ ७३-७५ ॥ आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत नार्द्रपादस्तु संविशेत् । आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो दीर्घमायुरवाप्नुयात् ॥ ७६ ॥ अचक्षुर्विषयं दुर्गं न प्रमाद्येन कर्हिचित् । न विण्मूत्रमुदीक्षेत न बाहुभ्यां नदीं तरेत् ॥ ७७ ॥ अधितिष्ठेन्न केशांस्तु न भस्मास्थिकपालिकाः । न कार्पासास्थि न तुषान्दीर्घमायुर्जिजीविषुः ॥ ७८ ॥ न संवसेच्च पतितैर्न चाण्डालैर्न पुल्कसैः । न मूर्खैर्न विलिप्तैश्च नान्त्यैर्नान्त्यावसायिभिः ॥ ७९ ॥ गीला पाँव से अर्थात् पैर धोकर भोजन करना । पर गीले पैरों से सोना न चाहिए। जो हाथ पैर धोकर पवित्रता से भोजन क- रताहै वह दीर्घ आयुष्य पाता है । वेजानेहुए किला वगैरह में कभी न जाना। मल-मूत्र को न देखना और दोनों भुजाओं से नदी तैर कर पार न जाना चाहिए। बाल, राख, हड्डी, टूटा ठीकरा, बि- नौल और भूसी के ऊपर न बैठना चाहिए। इनपर जो नहीं बैठता उसकी उमर बढ़ती है। पतित, चाण्डाल, मूर्ख, अभिमानी, चमार आदि हीन जाति और नट वगैरह के साथ उठना-बैठना कभी न चाहिए ॥ ७६-७९ ॥ न शूद्राय मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम् । न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत् ॥ ८० ॥
१२८ मनुस्मृति । यो ह्यस्य धर्ममाचष्टे यश्चैवादिशति व्रतम् । सोऽसंवृतं नाम तमः सह तेनैव मज्जति ॥ ८१ ॥ न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः । न स्पृशेच्चैतदुच्छिष्टो न च स्नायाद्विना ततः ॥ ८२ ॥ शूद्र को वेद आदि शास्त्र न पढ़ाना, जूठा अन्न, हविष्य न देना। उसको धर्मका उपदेश न देना। उसको चान्द्रायण आदि व्रतों का उपदेश वेदमन्त्रों से न बतलाना। जो पुरुष, शूद्र को धर्म, व्रत आदि का उपदेश देता है, वह उस शूद्र के साथ, असंवृत नामक नरक में पड़ता है। दोनों हाथों से अपना शिर न खुजलाना, जूंठे मुख शिर को न छूना और शिर भिगोए विना स्नान न करना अर्थात् नित्य शिर से स्नान करना चाहिए ॥ ८०-८२ ॥ केशग्रहान्प्रहारांश्च शिरस्येतान् विवर्जयेत् । शिरःस्नातस्य तैलेन नाङ्गं किञ्चिदपि स्पृशेत् ॥ ८३ ॥ न राज्ञः प्रतिगृह्णीयादराजन्यप्रसूतितः । सूनाचक्रध्वजवतां वेशेनैव च जीवताम् ॥ ८४ ॥ दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः । दशध्वजसमो वेशो दशवेशसमो नृपः ॥ ८५ ॥ दशसूनासहस्राणि यो वाहयति सौनिकः । तेन तुल्यः स्मृतो राजा घोरस्तस्य प्रतिग्रहः ॥ ८६ ॥ किसी के शिर के बाल खींचना या उसपर मारना अनुचित है। जिस हाथ से शिरपर तेल छोड़े उस हाथ से दूसरे अङ्ग का स्पर्श न करे। जो राजा, क्षत्रिय के वीर्य से न पैदा हुआ हो उसका दान न लेना चाहिए। कसाई, तेली, कलवार, और वेश्याओं के जरिये जो जीविका चलाते हैं इन सबसे दान न लेना चाहिए !
चौथा अध्याय । १२६
चौथा अध्याय । १२६ दश कसाई के बराबर एक तेली, दश तेली के समान एक कल- वार, दश कलवारों के बराबर एक वेश्याजीवी, और दश वेश्या- जीवियों के बराबर एक राजा होता है। दस हज़ार कसाई खाना चलानेवाले एक कसाई के समान राजा कहा गया है। इसलिए उसका दान बड़ा भयानक है॥ ८३-८६ ॥ यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिनः । स पर्यायेण यातीमान्नरकानेकविंशतिम् ॥ ८७ ॥ तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ । नरकं कालसूत्रं च महानरकमेव च ॥ ८८ ॥ संजीवनं महावीचिं तपनं संप्रतापनम् । संहातं च सकाकोलं कुड्मलं प्रतिमूर्तिकम् ॥ ८९ ॥ लोहशङ्कुमृजीषं च पन्थानं शाल्मलीं नदीम् । असिपत्रवनं चैव लोहदारकमेव च ॥ ९० ॥ जो ब्राह्मण लोभी और शास्त्र के विरुद्ध कर्म करनेवाले राजा से दान लेता है वह क्रम से, नीचे लिखे इक्कीस नरकों में पड़ता है। तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, कालसूत्र, महानरक, संजीवन, महावीची, तपन, संप्रतापन, संहात, सकाकोल, कुड्मल, प्रतिमूर्तिक, लोहशङ्कु, ऋजीष, पंथा, शाल्मली, वैतरणी नदी, असिपत्रवन और लोहदारक ॥ ८७-९० ॥ एतद्विदन्तो विद्वांसो ब्राह्मणा ब्रह्मवादिनः । न राज्ञः प्रतिगृह्णन्ति प्रेत्य श्रेयोऽभिकाङ्क्षिणः ॥ ९१ ॥ ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिन्तयेत् । कायक्लेशांश्च तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च ॥ ९२ ॥ उत्थायावश्यकं कृत्वा कृतशौचः समाहितः । १७
१३० । मनुस्मृति । पूर्वा सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत् स्वकाले चापरां चिरम् ॥ ९३॥ ऋषयो दीर्घसन्ध्यात्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुयुः । प्रज्ञां यशश्च कीर्तिं च ब्रह्मवर्चसमेव च ॥ ९४ ॥ इस प्रकार जो सब विषय जानते हैं वे वेदज्ञ-विद्वान्-ब्राह्मण परलोक में सुख पाने की इच्छा से राजा का दान नहीं लेते हैं । ब्राह्ममुहूर्त्त-दो घड़ी सवेरे उठकर अपना धर्म और अर्थ का और उसके लिए आवश्यक शरीर श्रम का विचार करना । वेदचिन्तन और परमात्मा का स्मरण करना । प्रातःकाल उठकर शौच आदि से निवृत्त होकर स्नान और सन्ध्या करके गायत्रीजप करना। और सायंकाल को भी नक्षत्र दर्शन तक सन्ध्या-गायत्री का अनुष्ठान करना । ऋषियों ने चिरकाल तक सन्ध्या, गायत्री की उपासना से दीर्घायु, बुद्धि, यश, कीर्ति और ब्रह्मतेज को पाया था ॥ ९१-९४ ॥ श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाप्युपाकृत्य यथाविधि । युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान् विप्रोऽर्धपञ्चमान् ॥९५॥ पुष्ये तु छन्दसां कुर्याद्बहिरुत्सर्जनं द्विजः । माघशुक्लस्य वा प्राप्ते पूर्वाह्णे प्रथमेऽहनि ॥ ९६ ॥ यथाशास्त्रं तु कृत्वैवमुत्सर्गं छन्दसां बहिः । विरमेत् पक्षिणीं रात्रिं तदैवैकमहर्निशम् ॥ ९७ ॥ अत ऊर्ध्वं तु छन्दांसि शुक्लेषु नियतः पठेत् । वेदाङ्गानि च सर्वाणि कृष्णपक्षेषु संपठेत् ॥ ९८ ॥ श्रावण की पूर्णी या भाद्र की पूर्णी को विधि से उपाकर्म करके, ब्राह्मण साढ़े चार महीने तक नियम से वेदाध्ययन करे। फिर पौष की पूर्णी को या माघ की प्रतिपदा को नगर के बाहर जाकर, पूर्वाह्न में वेद का उत्सर्ग करना । उसके बाद दो दिन और बिचली रात,
चौथा अध्याय । १३१
[header] चौथा अध्याय । १३१ [/header]
या एक दिन रातही अनध्याय रखना चाहिए। फिर, नियम से शुक्लपक्ष में वेदों का अध्ययन और कृष्णपक्ष में वेद के अङ्गों का अध्ययन करना चाहिए ॥ ९५-९८ ॥ नाविस्पष्टमधीयीत न शूद्रजनसन्निधौ । न निशान्ते परिश्रान्तो ब्रह्माधीत्य पुनः स्वपेत् ॥ ९९ ॥ यथोदितेन विधिना नित्यं छन्दस्कृतं पठेत् । ब्रह्म छन्दस्कृतं चैव द्विजो युक्तो ह्यनापदि ॥ १०० ॥ इमान्नित्यमनध्यायानधीयानो विवर्जयेत् । अध्यापनं च कुर्वाणः शिष्याणां विधिपूर्वकम् ॥ १०१ ॥ कर्णश्रावेऽनिले रात्रौ दिवा पांसुसमूहने । एतौ वर्षास्वनध्यायावध्यायज्ञाः प्रचक्षते ॥ १०२ ॥ विद्युत्स्तनितवर्षेषु महोल्कानां च संप्लवे । आकालिकमनध्यायमेतेषु मनुरब्रवीत् ॥ १०३ ॥ अनध्याय और वेदपाठ-नियम । वेदपाठ साफ़ करना। शूद्र के पास में न करना। पिछली रात में वेदाध्ययन से थककर, फिर न सोना चाहिए। इस प्रकार नित्य मन्त्र भाग का अध्ययन करना, या होसके तो मन्त्र और ब्राह्मण दोनों भागका अध्ययन करना। वेदाध्ययन और शिष्योंको अध्यापन करानेवालों को अनध्यायों में वेदपाठ न करना चाहिए। रात में वायु की सनसनाहट कान में सुन पड़े और दिन में धूल की वर्षा हो तब वर्षाकाल में अनध्याय करना। बिजली की चमक, मेघ की गरज और जलवर्षा, बड़ा उल्कापात यह जबतक हो तबतक अनध्याय रखना। यह मनुजी की आज्ञा है ॥ ९९-१०३ ॥ एतांस्त्वभ्युदितान्विद्याद्यदा प्रादुष्कृताग्निषु । तदा विद्यादनध्यायमनृतौ चाभ्रदर्शने ॥ १०४ ॥
३३२ मनुस्मृति । निर्घाते भूमिचलने ज्योतिषां चोपसर्जने । एतानाकालिकान् विद्यादनध्यायानृतावपि ॥ १०५ ॥ वर्षाकाल में प्रातःकाल और सायंकाल होमार्थ अग्नि प्रज्वलित करते समय, बिजली, वर्षा और मेघगर्जना होने पर, या वर्षा के सिवा असमय बादल होजाने पर, अनध्याय करना चाहिए। आ- काश में कड़ाका, भूकम्प और सूर्य, चन्द्र का ग्रहण होने पर, उतने काल के लिए अनध्याय जानना । और वर्षार्ऋतु में इन बातों के होनेपर भी 'आकालिक अनध्याय' जानना चाहिए ॥ १०४-१०५ ॥ प्रादुष्कृतेष्वग्निषु तु विद्युत्स्तनितनिःस्वने । सज्योतिः स्यादनध्यायः शेषरात्रौ यथा दिवा ॥१०६॥ नित्यानध्याय एव स्याद्ग्रामेषु नगरेषु च । धर्मनैपुण्यकामानां पूतिगन्धे च सर्वदा ॥ १०७॥ अन्तर्गतशवे ग्रामे वृषलस्य च सन्निधौ । अनध्यायो रुद्यमाने समवाये जनस्य च ॥ १०८ ॥ उदके मध्यरात्रे च विण्मूत्रस्य विसर्जने । उच्छिष्टःश्राद्धभुक् चैव मनसापि न चिन्तयेत् ॥ १०६॥ प्रतिगृह्य द्विजो विद्वानेकोद्दिष्टस्य केतनम् । त्र्यहं न कीर्तयेद्ब्रह्म राज्ञो राहोश्च सूतके ॥ ११० ॥ होम के लिए अग्नि जल जाने पर प्रातःकाल विजली चमके और मेघ गर्जे तब सायंकाल तक और सायंकाल को हो तब आ- काश में नक्षत्र देखने तक अनध्याय करना । और यह सब उपद्रव एकबारगी हो तो दिन-रात का अनध्याय होता है। जो विशेष धर्म का अनुष्ठान किया चाहते हैं उनको गांव, नगर और अपवित्र स्थान में रोज़ही अनध्याय करना चाहिए अर्थात्; ऐसे स्थान में धर्मकृत्य ठीक नहीं बन पड़ता । गांव में मुरदा पड़ा हो, शूद्र के
चौथा अध्याय । १३३
चौथा अध्याय । १३३ समीप, कोई रोता हो उसके पास, और जहां बहुत मनुष्यों की भीड़ हो, ऐसे स्थानों में अनध्याय करना । जल के बीच, आधी रात को, मल-मूत्र करते, जूठे मुख से और श्राद्ध में भोजन करके, मन से भी वेद मन्त्रों का स्मरण न करना । एकोद्दिष्ट श्राद्ध का नेवता मानकर, राजमृत्यु होने पर और सूर्य-चन्द्र के ग्रहण होने पर तीन दिन वेदाध्ययन न करना चाहिए ॥ १०६-११० ॥ यावदेकानुदिष्टस्य गन्धो लेपश्च तिष्ठति । विप्रस्य विदुषो देहे तावद्ब्रह्म न कीर्तयेत् ॥ १११ ॥ शयानः प्रौढपादश्च कृत्वा शौचावसक्थिकाम् । नाधीयीतामिषं जग्ध्वा सूतकान्नाद्यमेव च ॥ ११२ ॥ नीहारे बाणशब्दे च सन्ध्ययोरेव चोभयोः । अमावास्याचतुर्दश्योः पौर्णमास्यष्टकासु च ॥ ११३ ॥ जबतक एकोद्दिष्ट श्राद्ध का चन्दन और लेप का गन्ध शरीर में रहे तबतक विद्वान् ब्राह्मण को अनध्याय करना चाहिए । सोता, पांव पसारकर, दोनों घुटनों को बांधकर, मांस खाकर और जन्म- मरण के सूतक का अन्न खाकर, अनध्याय करना । कोहिरा पड़े, बाण शब्द हो, प्रातःकाल और सायंकाल की सन्धिमें, अमावास्या, चतुर्दशी, पूर्णिमा और अष्टमी को अनध्याय मानना चाहिए॥१११-११३॥ अमावास्या गुरुं हन्ति शिष्यं हन्ति चतुर्दशी । ब्रह्माष्टमीपौर्णमास्यौ तस्मात्ताः परिवर्जयेत् ॥ ११४ ॥ पांशुवर्षे दिशां दाहे गोमायुविरुते तथा । श्वखरोष्ट्रे च रुवति पंक्तौ च न पठेद्द्विजः ॥ ११५ ॥ नाधीयीत श्मशानान्ते ग्रामान्ते गोव्रजेऽपि वा । वसित्वा मैथुनं वासः श्राद्धिकं प्रतिगृह्य च ॥ ११६ ॥
१३४ मनुस्मृति। प्राणि वा यदि वाऽप्राणि यत्किञ्चिच्छाद्धिकं भवेत् । तदालभ्याप्यनध्यायःप्राण्यास्योहिद्विजःस्मृतः ॥११७॥ अमावास्या को वेदाध्ययन करने से गुरु का और चतुर्दशी को शिष्य का नाश होता है। अष्टमी को पढ़ने से वेद भूल जाता है। इस लिए इन सब अनध्यायों में वेदपाठ मना है। धूल की वर्षा, दिशाओं का दाह, शृगाल, कुत्ता, गधा और ऊंटों के रोने पर और ये सब पांत बांधकर बैठे हों, उस समय अनध्याय करना। श्म- शान के पास, गांव के हद्द पर, गौओं के चरने के स्थान में, मैथुन- समय के वस्त्र पहनकर और श्राद्ध में भोजन करके वेदपाठ न क- रना चाहिए। कोई पदार्थ जीवधारी हो या जड़ हो, कुछभी श्राद्ध में वस्तु देकर अनध्याय करना चाहिए। क्योंकि शास्त्र में ब्राह्मण का हाथ ही मुखरूप है, इस लिए लेना ही भोजन माना जाता है ॥ ११४-११७ ॥ चौरैरुपप्लुते ग्रामे संभ्रमे चाग्निकारिते । आकालिकमनध्यायं विद्यात्सर्वाद्भुतेषु च ॥ ११८ ॥ उपाकम्मणि चोत्सर्गे त्रिरात्रं क्षेपणं स्मृतम् । अष्टकासु त्वहोरात्रमृत्वन्तासु च रात्रिषु ॥ ११९ ॥ नाधीयीताश्वमारूढो न वृक्षं न च हस्तिनम् । न नावं न खरं नोष्ट्रं नेरिणस्थो न यानगः ॥ १२० ॥ चोरों के उपद्रववाले गांव में आग लगजाने पर और आकाश किंवा पृथिवी में आश्चर्य घटना होने पर, उस काल तक अनध्याय मानना। उपाकर्म और वेद के उत्सर्ग में तीन रात अनध्याय मानना। अष्टका * और ऋतु के अन्त में एक दिन रात अनध्याय करना। घोड़े पर, वृक्ष पर, हाथी पर, नाव पर, गधे पर, ऊंट पर, ऊसर भूमि में और सवारी में बैठकर वेद न पढ़ना चाहिए ॥ ११८-१२० ॥
- मार्गशीर्ष की पूर्णा के बाद कृष्णपक्ष की चार अष्टमी को 'अष्टका श्राद्ध' होता है।
चौथा अध्याय । १३५
चौथा अध्याय । १३५ न विवादे न कलहे न सेनायां न सङ्गरे । न भुक्तमात्रे नाजीर्णे न वमित्वा न सूतके ॥ १२१ ॥ अतिथिंचाननुज्ञाप्य मारुते वाति वा भृशम् । रुधिरे च स्रुते गात्राच्छस्त्रेण च परिक्षते ॥ १२२ ॥ सामध्वनावृग्यजुषी नाधीयीत कदाचन । वेदस्याधीत्य वाप्यन्तमारण्यकमधीत्य च ॥ १२३ ॥ ऋग्वेदो देवदैवत्यो यजुर्वेदस्तु मानुषः । सामवेदः स्मृतः पित्र्यस्तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनिः ॥१२४॥ एतद्विदन्तो विद्वांसस्त्रयीनिष्कर्षमन्वहम् । क्रमशः पूर्वमभ्यस्य पश्चाद्वेदमधीयतें ॥ १२५ ॥ जहां किसी बातकी बहस होती हो, झगड़ा हो, सेनामें, लड़ाई में, भोजन करते, अजीर्ण होने पर, वमन करके और सूतक में वेद न पढ़ना चाहिए । अतिथि की आज्ञा विना लिए, ज़ोर से हवा च- लती हो, शरीर से खून गिरता हो और शस्त्र से घायल हो जाने पर वेदाध्ययन न करना चाहिए । सामवेद का पाठ होता हो, तब ऋग्वेद और यजुर्वेद का पाठ न करना । वेदको समाप्त करके और आरण्यक का पाठ करके, एक दिन रात वेदान्तर को न पढ़ना । ऋग्वेद का देव देवता है अर्थात् उसमें देव स्तुतियां हैं । यजुर्वेद मानुष है, अर्थात् उसमें मनुष्यों का कर्मकाण्ड कहा है । सामवेद पितृदैवत है अर्थात् पितरों का माहात्म्य उसका मुख्य विषय है। इस लिए सामवेद की ध्वनि ऋक् और यजु की अपेक्षा अशुचि, अपवित्रसी है। इन सब बातों को जाननेवाले विद्वानों को नित्य तीनों वेद के सारभूत ॐकार, तीन व्याहृति 'भूः भुवः स्वः' और गायत्री का क्रम से उच्चारण करके वेदाध्ययन करना चाहिए ॥ १२१-१२५ ॥ पशुमण्डूकमार्जारश्वसर्पनकुलाखुभिः ।
१३६ मनुस्मृति ।
अन्तरागमने विद्यादनध्यायमहर्निशम् ॥ १२६ ॥ द्वावेव वर्जयेन्नित्यमनध्यायौ प्रयत्नतः । स्वाध्यायभूमिं चाशुद्धामात्मानं चाशुचिं द्विजः ॥१२७॥ पशु, गौ आदि, मेंडक, कुत्ता, सांप, नौला और चूहा ये पढ़ते समय गुरु-शिष्यके बीच में होकर निकल जायें तो एक दिन-रात का अनध्याय करना । पढ़नेका स्थान या आप अपवित्र हो, इन दो अनध्यायों को ज़रूर मानना चाहिए ॥ १२६-१२७ ॥ अमावास्यामष्टमीं च पौर्णमासीं चतुर्दशीम् । ब्रह्मचारी भवेन्नित्यमप्यृतौ स्नातको द्विजः ॥ १२८ ॥ न स्नानमाचरेद्भुक्त्वा नातुरो न महानिशि । न वासोभिः सहाजस्रं नाविज्ञाते जलाशये ॥ १२६ ॥ देवतानां गुरो राज्ञः स्नातकाचार्ययोस्तथा । नाक्रामेत् कामतश्छायां बभ्रु णो दीक्षितस्य च ॥१३०॥ मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे च श्राद्धं भुक्त्वा च सामिषम् । सन्ध्ययोरुभयोश्चैव न सेवेत चतुष्पथम् ॥ १३१ ॥ विधि और निषेध । स्नातक द्विज अमावास्या, अष्टमी, पूर्णिमा और चतुर्दशी के दिन ऋतु हो तो भी स्त्री-सहवास न करे । भोजन करने के बाद रोगी शरीर में और आधी रात को स्नान न करना । बहुत कपड़े पहन कर और विना जाने तालाब आदि में स्नान न करना । देव- मूर्त्ति, गुरु, राजा, स्नातक, आचार्य, कपिला गौ और यज्ञ में दी- क्षित पुरुष की छाया को कभी न उलांघना । दोपहर, आधीरात, श्राद्ध में मांस आदिक भोजन करके, प्रातःसंध्या और सायंसंध्या के समय, चौराहा में अधिक समय न रहना चाहिए ॥१२८-१३१॥
चौथा अध्याय । १३७
चौथा अध्याय । १३७ उद्वर्त्तनमपस्नानं विण्मूत्रे रक्तमेव च । श्लेष्मनिष्ठ्यूतवान्तानि नाधितिष्ठेत्तु कामतः ॥ १३२ ॥ वैरिणं नोपसेवेत साहाय्यं चैव वैरिणः । अधार्मिकं तस्करं च परस्यैव च योषितम् ॥ १३३ ॥ नहीदृशमनायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते । यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ॥ १३४ ॥ उबटन, स्नान से बचा जल, विष्ठा, मूंज्र, रुधिर, खखार, थूक और वमन इनको जानकर छूना न चाहिए । शत्रु, शत्रु का मददगार, अधर्मी, चोर और परस्त्री इनका साथ न करना। इस संसार में मनुष्य के आयु का नाश करनेवाला जैसा परस्त्री सहवास है वैसा दूसरा कोई पदार्थ नहीं है ॥ १३२-१३४ ॥ क्षत्रियञ्चैव सर्प च ब्राह्मणं च बहुश्रुतम् । नावमन्येत वै भूष्णुः कृशानपि कदाचन ॥ १३५ ॥ एतत्त्रयं हि पुरुषं निर्दहेदवमानितम् । तस्मादेतत्त्रयं नित्यं नावमन्येत बुद्धिमान् ॥ १३६ ॥ नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः । आमृत्योःश्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम् ॥१३७॥ सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् । प्रियञ्च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः ॥ १३८ ॥ जो पुरुष अपना भला चाहे उसको क्षत्रिय, सांप और वेदज्ञ ब्राह्मण यदि दुर्बल हों तो भी इनका अपमान न करना चाहिए । ये तीनों अपमानित होकर पुरुष का नाश कर देते हैं, इस लिये बुद्धिमान् को इनका अपमान कभी न करना चाहिए। पूर्वजों की सम्पत्ति नहीं है, या कोई उपार्जन की रीति सफल नहीं हुई- इन
१३८ मनुस्मृति । सब बातों के होते भी पुरुष को अपना अपमान—अर्थात् मैं अ- भागी हूं, किसी लायक नहीं हूं इत्यादि कहकर अपमान न करना चाहिए। वरन सदा उद्योग करते रहना और लक्ष्मी को दुर्लभ न मानना चाहिये। सत्य वचन बोलना और प्रिय मीठा बोलना चाहिए। जो प्रिय न लगे ऐसा सत्य भी न कहना चाहिए और प्रिय लगनेवाली झूठी बात भी न कहनी। यह सनातन धर्म है ॥ १३५-१३८ ॥ भद्रं भद्रमिति ब्रूयाद् भद्रमित्येव वा वदेत् । शुष्कवैरं विवादं च न कुर्यात् केनचित् सह ॥ १३६ ॥ नातिकल्यं नातिसायं नातिमध्यन्दिने स्थिते । नाज्ञातेन समं गच्छेत् नैको न वृषलैः सह ॥ १४० ॥ हीनाङ्गानतिरिक्ताङ्गान् विद्याहीनान् वयोऽधिकान् । रूपद्रव्यविहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत् ॥ १४१ ॥ जहां अभद्र हो वहां भी भद्रशब्द से ही बोलना। सब से मिल कर 'अच्छे हो' 'कुशल है, इत्यादि बोलना चाहिए। व्यर्थ झगड़ा वखेड़ा किसी से न करना चाहिए। न बहुत सबेरे और न बहुत शाम को और न दोपहर कोही अकेला कहीं जाना। और अनजान के साथ, अकेला और शूद्रों के साथ कहीं न जाना चाहिए। काना, लुला, छंगुला वगैरह विद्याहीन, अपने से अधिक उमरवाला, कुरूप, निर्धन और हीनजातिवाले को कभी कुवाच्य काना, मूर्ख, कर्भाना आदि न कहना चाहिए ॥ १३६-१४१ ॥ न स्पृशेत्पाणिनोच्छिष्टो विप्रो गोब्राह्मणानलान् । नचापि पश्येदशुचिः सुस्थोज्योतिर्गणान् दिवि ॥ १४२ ॥ स्पृष्ट्वैतानशुचिर्नित्यमद्भिः प्राणानुपस्पृशेत् । गात्राणि चैव सर्वाणि नाभिं पाणितलेन तु ॥ १४३ ॥