न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
ध्यवसायमात्रं संशयहेतुमुपाददीत स एवं वाच्य इति ।
८० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० १. आ०
विशेषं नोपलभे इति, कथं नु विशेषं पश्येयं येनान्यतरमवधारयेयम्' इति । न चैतत् समानधर्मोपलब्धौ धर्मधर्मिग्रहणमात्रेण निवर्तत इति । यच्चोक्तम्—'नार्थान्तराध्यवसायादन्यत्र संशयः' इति ? यो ह्यर्थान्तरा- ध्यवसायमात्रं संशयहेतुमुपाददीत स एवं वाच्य इति । यत्पुनेरतत्—'कार्यकारणयोः सारूप्याभावात्' इति ? कारणस्य भावा- भावयोः कार्यस्य भावाभावौ कार्यकारणयोः सारूप्यम् । यस्योत्पादाद् यदुत्पद्यते, यस्य चानुत्पादान्नोत्पद्यते तत्कारणम्, कार्यमितरदित्येतत्सारूप्यम् । अस्ति च संशयकारणे संशये चैतदिति ।१ एतेनानेकधर्माध्यवसायादिति प्रतिषेधः परिहृत इति । यत्पुनरेतदुक्तम्—'विप्रतिपत्त्यव्यवस्थाध्यवसायाच्च न संशयः' इति ? 'पृथक्प्रवादयोर्व्याहतमर्थमुपलभे विशेषं च न जानामि नोपलभे येनान्यतर- मवधारयेयम्, तत्कोऽत्र विशेषः स्याद्येनैकतरमवधारयेयम्'–इति संशयो विप्रति- पत्तिजनितः, अयं न शक्यो विप्रतिपत्तिसम्प्रतिपत्तिमात्रेण निवर्त्तयितुमिति । (विभेदक) नहीं जान पा रहा हूँ, कैसे इनका विभेदक जानूँ ताकि इन में से किसी एक की सत्ता का निश्चय कर सकूँ" यह विशेषाकांक्षा समानधर्म की उपलब्धि होने पर धर्म- धर्मी के ज्ञान मात्र से दूर नहीं हो सकती, उस दशा में संशय तो होगा ही । यह जो कहा—'अर्थान्तर रूप के संशयहेतु से स्पर्श में संशय नहीं हो सकता', तो जो अर्थान्तरज्ञानमात्र को संशयहेतु समझ रहा है, उससे ऐसा कहिये । पुनः यह जो कहा—'कार्य तथा कारण का सादृश्य न होने से संशय नहीं हो सकता', इसका उत्तर यह है कि कारण के होने या न होने पर कार्य का होना या न होना ही कार्यकारण का सादृश्य है । जिसके उत्पन्न होने से जो उत्पन्न होता हो तथा जिसके उत्पन्न न होने से उत्पन्न न होता हो वह कारण है, बाकी दूसरा कार्य है । यही सादृश्य है। यह सादृश्य संशय के कारण में तथा स्वयं संशय में रहता ही है। इसी युक्ति से पूर्वपक्षी के अनेकधर्माध्यवसायवान् कह कर जो प्रतिषेध किया था, उसका भी खण्डन हो जाता है। और यह जो पूर्वपक्षी ने कहा था—'विप्रतिपत्ति और अध्यवसाय से संशय नहीं हो सकता', उसका उत्तर यह है—" 'आत्मा हैं' तथा 'आत्मा नहीं हैं'—इन दो प्रवादों (मतों) में विरुद्ध धर्मों को पा रहा हूँ, विशेष को नहीं जान पा रहा हूँ, न मुझे मिल ही रहा है कि जिससे किसी एक के बारे में निश्चय कर सकूँ"—यह संशय विप्रतिपत्ति- जनित है, विप्रतिपत्ति या संप्रतिपत्तिमात्र कहने से वह दूर नहीं हटाया जा सकता ।
१. वार्त्तिककारस्तु सारूप्यान्तरमाह—विशेषानवधारणं सारूप्यमिति ।
६. सू० ] संशयपरीक्षाप्रकरणम् ८१
६. सू० ] संशयपरीक्षाप्रकरणम् ८१ एवमुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थाकृते संशये वेदितव्यमिति । यत्पुनरेतत्–‘विप्रतिपत्तौ च सम्प्रतिपत्तेः’ इति ? विप्रतिपत्तिशब्दस्य योऽर्थः– तदध्यवसायो विशेषापेक्षः संशयः, तस्य च समाख्यान्तरेण न निवृत्तिः । समाने- ऽधिकरणे व्याहतार्थौ प्रवादौ विप्रतिपत्तिशब्दस्यार्थः, तदध्यवसायश्च विशेषा- पेक्षः संशयहेतुः । न चास्य सम्प्रतिपत्तिशब्दे समाख्यान्तरे योज्यमाने संशय- हेतुत्वं निवर्तते । तदिदमकृतबुद्धिसम्मोहनमिति ! यत्पुनः ‘अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वाच्चाव्यवस्थायाः’ इति ? संशय- हेतोरर्थस्याप्रतिषेधादव्यवस्थाभ्यनुज्ञानाच्च निमित्तान्तरेण शब्दान्तरकल्पना । व्यर्था शब्दान्तरकल्पना, अव्यवस्था खलु व्यवस्था न भवति; अव्यवस्थात्मनि व्यवस्थितत्वादिति । नानयोरुपलब्ध्यनुपलब्ध्योः सदसद्विषयत्वं विशेषापेक्षं संशयहेतुर्न भवतीति प्रतिषिध्यते, यावता चाव्यवस्थाऽऽत्मनि व्यवस्थिता न इसी नय से 'उपलब्ध्यव्यवस्थाध्यवसायोपपन्न' संशय के बारे में भी पूर्वपक्षी का खण्डन समझ लेना चाहिये । पूर्वपक्षी ने यह जो 'विप्रतिपत्ति में संप्रतिपत्ति' ( २. १. ३ )—इस सूत्र में 'विप्र- तिपत्ति के कारण उसके सम्प्रतिपत्ति होने से यदि विप्रतिपत्ति से भी संशय माना जायेगा तो यह संप्रतिपत्ति से ही संशय मानना होगा' कहा था ? उसका उत्तर है—'विप्रतिपत्ति' इस शब्द का जो अर्थ है वह उसका विशेषधर्म के ज्ञान की अपेक्षा रखता हुआ संशय का हेतु है, उसका 'संप्रतिपत्ति' यह दूसरा नाम कर देने से संशय की निवृत्ति थोड़े हो जायेगी। समान अधिकरण में विरुद्ध अर्थ वाले दो मत ('आत्मा हैं', 'आत्मा नहीं हैं') 'विप्रतिपत्ति' कहलाते हैं, उनका ज्ञान विशेषधर्म ( ज्ञान ) की अपेक्षा रखने से संशय का कारण बनता है । इसकी 'संप्रतिपत्ति' यह अन्य संज्ञा कर देने से संशय की निवृत्ति कैसे हो जायेगी ! इस तरह तो मूर्खों को बहकाया जा सकता है ! यह जो कहा था—'अव्यवस्था अपने स्वरूप में व्यवस्थित होने के कारण अव्य- वस्थोपलब्धि से संशय नहीं हो सकता' ? इसका उत्तर है—पूर्वपक्षी द्वारा संशय के हेतु- भूत अव्यवस्थारूप अर्थ का प्रतिषेध न करने से तथा अव्यवस्था के स्वीकार करने से अन्य निमित्त को लेकर शब्दान्तर की कल्पना की जा रही है, परन्तु यह शब्दान्तरकल्पना व्यर्थ ही होगी; क्योंकि तब भी अव्यवस्था व्यवस्था नहीं बन सकेगी। वह तो 'अव्यवस्था' इस स्वरूपार्थ में ही व्यवस्थित है, नाम भले ही उसका कुछ रख लें। उन दोनों अव्य- वस्थाओं का सत् तथा असत् विषयों में होना विशेषधर्म (के ज्ञान) की अपेक्षा रखता हुआ संशय का कारण होता है—इसलिये ही उनका प्रतिषेध नहीं किया जा रहा है; अपितु न्या० द० ११
८२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० तावताऽऽत्मानं जहाति, तावता ह्यनुज्ञाताऽव्यवस्था। एवमियं क्रियमाणापि शब्दान्तरकल्पना नार्थान्तरं साधयतीति। यत्पुनरेतत्-‘तथाऽत्यन्तसंशयः तद्धर्मसातत्योपपत्तेः’ इति ? नायं समान- धर्मादिभ्य एव संशयः, किं तर्हि ? तद्विषयाध्यवसायाद् विशेषस्मृतिसहितादित्यतो नात्यन्तसंशय इति। अन्यतरधर्माध्यावसायाद्वा न संशय इति ? तन्न युक्तम्; ‘विशेषापेक्षो विमर्शः संशयः’ इति (१. १. २३) वचनात् । विशेषश्चान्यतरधर्मः, न तस्मिन्नध्यवसी- यमाने विशेषापेक्षा सम्भवतीति ॥ ६ ॥ यत्र संशयस्तत्रैवमुत्तरोत्तरप्रसङ्गः ॥ ७ ॥ यत्र यत्र संशयपूर्विका परीक्षा शास्त्रे कथायां वा, तत्र तत्रैवं संशये परेण प्रतिषिद्धे समाधिर्वाच्य इति। अतः सर्वपरीक्षाव्यापित्वात् प्रथमं संशयः परीक्षित इति ॥ ७ ॥ अव्यवस्थास्वरूप में व्यवस्थित रहने के कारण वे अपना अव्यवस्थात्व नहीं छोड़ पातीं । इस रूप में पूर्वपक्षी ने भी उनको 'अव्यवस्था' माना है। इसलिये इसकी शब्दान्तर- कल्पना से भी अर्थान्तर की सिद्धि नहीं हो सकेगी। यह जो कहा था—'उस धर्म की निरन्तरोपपत्ति से सदा संशय होने लगेगा' ? इसका उत्तर यह है—केवल समानधर्मादिकों के रहने से ही संशय नहीं होता, अपितु विशेष धर्मों के स्मृतिसहित तद्विषयक अध्यवसाय से होता है, अतः आत्यन्तिक संशय की उपपत्ति नहीं बनेगी । पूर्वपक्षी ने जो यह कहा था—'किसी एक के धर्माध्यवसाय से संशय नहीं होता' ? यह भी युक्त नहीं; हम ' 'विशेष धर्म ( के ज्ञान ) की अपेक्षा रखनेवाला विमर्श 'संशय' होता है" ( १.१.२३ ) ऐसा कह आये हैं । विशेष का मतलब है दो में अन्यतर धर्म, उसका निश्चय होने पर विशेषापेक्षा नहीं होती ॥ ६ ॥ जहां (जिस प्रमाणादि की परीक्षा में) संशय हो वहाँ वहाँ (वैसी परीक्षा में) इसी तरह उत्तरोत्तर प्रयोजनादि में परीक्षा-प्रसङ्ग करना चाहिये ॥ ७ ॥ जहाँ जहाँ, शास्त्र या कथा में, संशयपूर्वक परीक्षा का अवसर आये वहाँ वहाँ इस तरह संशय होने पर प्रतिवादी द्वारा खण्डन करने पर उत्तर देना चाहिये । अतः कथाङ्ग होने, तथा सभी प्रमाणादि पदार्थों की परीक्षा में व्यापक होने के कारण सर्वप्रथम संशय की परीक्षा की गयी है ॥ ७ ॥
११. सू०] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८३
११. सू०] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८३ प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् [ ८-२० ] अथ प्रमाणपरीक्षा । प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः ? ॥ ८॥ प्रत्यक्षादीनां प्रमाणत्वं नास्ति, त्रैकाल्यासिद्धेः । पूर्वापरसहभावानुप- पत्तेरित्यर्थः ॥ ८ ॥ अस्य सामान्यवचनस्यार्थविभागः— पूर्वं हि प्रमाणसिद्धौ नेन्द्रियार्थसन्निकर्षात्प्रत्यक्षोत्पत्तिः ? ॥ ९ ॥ गन्धादिविषयं ज्ञानं प्रत्यक्षम्, तद्यदि पूर्वम्, पश्चाद् गन्धादीनां सिद्धिः ? नेदं गन्धादिसन्निकर्षादुत्पद्यत इति ॥ ९ ॥ पश्चात्सिद्धौ न प्रमाणेभ्यः प्रमेयसिद्धिः ? ॥ १० ॥ असति प्रमाणे, केन प्रमीयमाणोऽर्थः प्रमेयः स्यात् ? प्रमाणेन खलु प्रमीय- माणोऽर्थः प्रमेयमित्येतत्सिध्यति ॥ १० ॥ युगपत्सिद्धौ प्रत्यर्थनियतत्वात् क्रमवृत्तित्वाभावो बुद्धीनाम् ॥ ११ ॥ अब प्रमाण की परीक्षा की जा रही है— प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द में प्रामाण्य नहीं बन सकता; क्योंकि प्रमेय पदार्थ की त्रिकाल (भूत, भविष्यत्, वर्तमान) में सिद्धि नहीं हो पाती ॥ ८ ॥ प्रत्यक्षादिकों में प्रमाणत्व नहीं घटेगा; क्योंकि उनके प्रमेय की त्रिकाल में सिद्धि नहीं हो सकती; यतः पूर्वोत्तरसामानाधिकरण्य अनुपपन्न होता है ॥ ८ ॥ पूर्वपक्षी के इस सामान्य वचन का अर्थ यों समझें— प्रमेय से पूर्वकाल में प्रमाण की सिद्धि मानें तो 'इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से प्रत्यक्ष होता है'—यह सिद्धान्ती का प्रत्यक्ष लक्षण नहीं बनेगा ॥ ९ ॥ गन्धादिविषयक ज्ञान ही प्रत्यक्ष है, वह यदि गन्धादि से पूर्वकाल में उत्पन्न होगा तो उस समय गन्धादि के न रहने से वहाँ सन्निकर्ष किसका बनेगा ? सन्निकर्ष न बनने से प्रत्यक्ष किसका होगा ? ॥ ९ ॥ गन्धादि प्रमेय के अपर (पश्चात्) काल में इस प्रत्यक्ष को सिद्धि मानें तो 'प्रमाणों से प्रमेयसिद्धि' यह सिद्धान्त खण्डित हो जायेगा ॥ १० ॥ गन्धादि प्रमेय के समय प्रमाण के न रहने पर प्रमेय किससे प्रमित होगा ? प्रमाण के सहारे ही प्रमीयमाण अर्थ प्रमेय सिद्ध होता है ॥ १० ॥ यदि उक्त प्रमाण-प्रमेय की एक काल में सिद्धि मानो जाये तो ज्ञान के प्रत्यर्थनियत होने से उसकी क्रमवृत्ति न हो पायेगी ॥ ११ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
८४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [२. अ० १. आ० यदि प्रमाणं प्रमेयं च युगपद्भवतः, एवमपि गन्धादिष्विन्द्रियार्थेषु ज्ञानानि प्रत्यर्थनियतानि युगपत्सम्भवन्तीति ज्ञानानां प्रत्यर्थनियतत्वात् क्रमवृत्तित्वाभावः । या इमा बुद्धयः क्रमेणार्थेषु वर्त्तन्ते तासां क्रमवृत्तित्वं न सम्भवतीति । व्याघात- श्च 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( १. १. १६ ) इति । एतावांश्च प्रमाणप्रमेययोः सद्भावविषयः, स चानुपपन्न इति । तस्मात्प्रत्यक्षादीनां प्रमाणत्वं न सम्भवतीति । अस्य समाधिः—उपलब्धिहेतोरुपलब्धिविषयस्य चार्थस्य पूर्वापरसहभावा- नियमाद् यथादर्शनं विभागवचनम् । क्वचिदुपलब्धिहेतुः पूर्वम्, पश्चादुपलब्धि- विषयः, यथा—आदित्यस्य प्रकाश उत्पद्यमानानाम् । क्वचित्पूर्वमुपलब्धिविषयः, पश्चादुपलब्धिहेतुः, यथा—अवस्थितानां प्रदीपः । क्वचिदुपलब्धिहेतुरुपलब्धि- विषयश्च सह भवतः, यथा—धूमेनाग्नेर्ग्रहणमिति । उपलब्धिहेतुश्च प्रमाणम्, प्रमेयं तूपलब्धिविषयः । एवं प्रमाणप्रमेययोः पूर्वापरसहभावेऽनियते यथा अर्थो दृश्यते, तथा विभज्य वचनीय इति । तत्रैकान्तेन प्रतिषेधानुपपत्तिः । सामान्येन खल्वविभज्य प्रतिषेध उक्त इति । यदि प्रमाण तथा प्रमेय की युगपद् सम्भूति मानें तो गन्धादि इन्द्रियार्थों में प्रत्यर्थ- नियत ज्ञान की भी युगपत् उत्पत्ति माननी पड़ेगी, परन्तु ज्ञान के प्रत्यर्थनियत होने से उसमें क्रमवृत्तित्व कैसे आयेगा ! तात्पर्य यह है कि जो बुद्धियाँ क्रमशः अर्थ का अवगाहन करती हैं उनका क्रमवृत्तित्व संभव नहीं है। और 'युगपज्ज्ञानानुत्पाद ही मन का इन्द्रिय- त्वसाधक हेतु हैं' (१.१.१६) इस मन के लक्षण का भी विरोध होने लगेगा । प्रमाण- प्रमेय में अस्तित्व यही विषय है, और यही अनुपपन्न होने लगेगा ! अतः प्रत्यक्षादि में प्रमाणत्व सम्भव नहीं—ऐसा पूर्वपक्षी का मत है । समाधान—शास्त्र में उपलब्धि-हेतु और उपलभ्यमान अर्थ का पूर्वकाल या उत्तर- काल में या एक साथ होना—यह नियम न देखा जाने के कारण दर्शनानुसार ही विभाग कहा गया है । कहीं उपलब्धि-हेतु पहले रहता है, उपलब्धि-विषय वाद में, जैसे—उत्पन्न होने वाले पदार्थों के पूर्व सूर्य का प्रकाश । कहीं उपलब्धि-विषय पहले रहता है, उपलब्धि-हेतु बाद में, जैसे—पहले से उपस्थित पदार्थों के लिए दीपक । कहीं उपलब्धि-हेतु तथा उपलब्धि-विषय एक साथ रहते हैं, जैसे धूम से अग्नि का ज्ञान । उपलब्धि-हेतु है प्रमाण तथा उपलब्धि-विषय है प्रमेय । इस प्रकार प्रमाण-प्रमेय का पूर्वापरसहभाव नियत न होने के कारण, अर्थ जैसा देखा जाता है उसी तरह विभाग करके कह दिया जाता है; अतः यहाँ पूर्वपक्षी द्वारा एक एक का नियम मान कर दिये गये दोष नहीं बन सकते । यों पूर्वपक्षी ने विवेचन न कर सामान्येन जो दोष कहे थे वे उक्त समाधान से निरस्त कर दिये गये ।
११. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८५
११. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८५ समाख्याहेतोस्त्रैकाल्ययोगात् तथाभूता समाख्या १ । यत्पुनरिदम्—'पश्चात् सिद्धावसति प्रमाणे प्रमेयं न सिध्यति, प्रमाणेन प्रमीयमाणोऽर्थः प्रमेयमिति विज्ञायते' इति ? प्रमाणमित्येतस्याः समाख्याया उपलब्धेर्हेतुत्वं निमित्तम्, तस्य त्रैकाल्ययोगः । उपलब्धिमकार्षीत्, उपलब्धिं करोति, उपलब्धिं करिष्य- तीति समाख्याहेतोस्त्रैकाल्ययोगात् समाख्या तथाभूता । प्रमितोऽनेनार्थः, प्रमीयते, प्रमास्यते, इति प्रमाणम् । प्रमितम्, प्रमीयते, प्रमास्यते इति च प्रमेयम् । एवं सति—'भविष्यत्यस्मिन् हेतुत उपलब्धिः', 'प्रमास्यतेऽयमर्थः', 'प्रमेयमिदम्'— इत्येतत् सर्वं भवतीति । त्रैकाल्यानभ्यनुज्ञाने च व्यवहारानुपपत्तिः । यश्चैवं नाभ्यनुजानीयात् तस्य 'पाचकमानय पक्ष्यति', 'लावकमानय लविष्यति' इति व्यवहारो नोप- पद्यत इति । 'प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः' ( २. १. ८) इत्येवमादिवाक्यं प्रमाणप्रतिषेधः । तत्रायं प्रष्टव्यः—अथानेन प्रतिषेधेन भवता किं क्रियत समाख्या (संज्ञा-शब्दों) के प्रवृत्तिरूप हेतु से जाति, गुण तथा द्रव्य में त्रैकाल्य-सम्बन्ध रहना चाहिए, तब समाख्या भी त्रैकाल्यसम्बन्ध रखती है। यह जो कहा था—'पश्चात्- काल में सिद्धि मानने पर उस समय प्रमाण के न रहने से प्रमेय सिद्ध नहीं होगा, जब कि प्रमाण से प्रमीयमाण अर्थ ही प्रमेय कहलाता है' ? इसका उत्तर है—'प्रमाण' इस संज्ञा का निमित्त है—'ज्ञान का कारण होना', यह 'ज्ञान का कारण होना' त्रिकाल- सम्बन्धी है । 'इसने उपलब्धि की', 'यह उपलब्धि कर रहा है', 'यह उपलब्धि करेगा' इस प्रकार से 'प्रमाण' संज्ञा त्रैकाल्यसम्बन्धवाली है। अर्थात् 'इससे प्रमेय जाना गया', 'जाना जाता है', 'जानेगा'—इसलिए यह प्रमाण कहलाता है। प्रमेय भी त्रैकाल्य- सम्बन्ध वाला है—'यह जाना गया', 'जाना जाता है' या 'जाना जायेगा।' ऐसा त्रैकाल्य-सम्बन्ध होने पर—'इसमें हेतु से उपलब्धि हो जायेगी', 'यह अर्थ को जानेगा' तथा 'यह जानने योग्य है' यह सब व्यवहार उपपन्न हो जायेंगे । त्रैकाल्य-सम्बन्ध न मानने पर समग्र लोकव्यवहार उच्छिन्न होने लगेगा। जो इस त्रैकाल्यसम्बन्ध को स्वीकार नहीं करता, उसके लिये 'पाचक लाओ, भोजन पकायेगा', 'घास काटनेवाले को लाओ, घास काटेगा'—यह व्यवहार कैसे बनेगा ! पूर्वपक्षी ने यह भी कहा था कि 'त्रिकाल-सम्बन्ध की असिद्धि के कारण प्रत्यक्षादि में प्रामाण्य नहीं बनेगा' ? उसके उत्तर में पूर्वपक्षी से यह पूछना चाहिये कि यह प्रतिषेध १. केषुचित्पुस्तकेषु वाक्यमिदं सूत्रत्वेनोपन्यस्तम्, परन्तु निकाये तथाऽप्रसिद्धत्वादस्मा- भिर्न स्वीकृतम् ।—स० ०
८६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० इति ? किं सम्भवो निवर्त्यते, अथासम्भवो ज्ञाप्यत इति ? तद्यदि सम्भवो निवर्त्यते, सति सम्भवे प्रत्यक्षादीनां प्रतिषेधानुपपत्तिः । अथासम्भवो ज्ञाप्यते, प्रमाणलक्षणं प्राप्तस्तर्हि प्रतिषेधः, प्रमाणासम्भवस्योपलब्धिहेतुत्वादिति ॥ ११ ॥ किं चातः ? त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ १२ ॥ अस्य तु विभागः । पूर्वं हि प्रतिषेधसिद्धावसति प्रतिषेध्ये किं तेन प्रतिषिध्यते ! पश्चात्सिद्धौ प्रतिषेधाभावादिति । युगपत्सिद्धौ प्रतिषेध्यसिद्धयभ्यनुज्ञानादनर्थकः प्रतिषेध इति । प्रतिषेधलक्षणे च वाक्येऽनुपपद्यमाने सिद्धं प्रत्यक्षादीनां प्रमाणत्वमिति ॥ १२ ॥ कथम् १ ? सर्वप्रमाणप्रतिषेधाच्च प्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ १३ ॥ 'त्रैकाल्यासिद्धेः' इत्यस्य हेतोर्यद्युदाहरणमुपादीयते, हेत्वर्थस्य साधकत्वं कर के आप क्या करना चाहते हैं ? क्या सम्भव की निवृत्ति कर रहे हैं या असम्भव को बतला रहे हैं ? यदि सम्भव की निवृत्ति कर रहे हैं तो सम्भव होने पर प्रत्यक्षादि की निवृत्ति कैसी ! यदि असम्भव बतला रहे हैं तो असम्भव का ज्ञापन कैसा ? क्योंकि आपका उक्त प्रकारका ज्ञापन भी उक्त प्रमाणों के लक्षण की परिधि में ही आ गया ! आपने ही तो कहा था कि प्रत्यक्षादि में प्रमाण का असम्भव उपलब्धि का कारण है ! ॥ ११ ॥ इससे क्या हुआ ? त्रैकाल्य की सिद्धि न बनने से पूर्वपक्षयुक्त प्रतिषेध नहीं बन सकता ॥ १२ ॥ ( पूर्वपक्षी को उत्तर देने के लिये ) इस सूत्र का वक्ष्यमाण विभागार्थ कर लेना चाहिये । प्रस्तुत प्रमाण की सिद्धि होने पर प्रतिषेध्य के न रहने से वह किसका प्रतिषेध करेगा ? पश्चात् काल में प्रतिषेध्य मानने पर उस समय प्रतिषेध न कर पाने से प्रतिषेध्य की असिद्धि ही रहेगी । युगपत् (एक काल में) सिद्धि मानने पर पूर्वपक्षी द्वारा प्रतिषेध्य की स्वीकृति दे देने से उसका प्रतिषेध निरर्थक हो जायेगा । प्रतिषेध-लक्षणार्थक वाक्य के अनुपपन्न होने से प्रत्यक्षादि में प्रमाणत्व रह ही जायेगा ॥ १२ ॥ कैसे ? क्योंकि सम्पूर्ण प्रमाणों का निषेध करने से भी प्रतिषेध नहीं बन सकेगा ॥ १३ ॥ यदि 'त्रैकाल्यासिद्धि' हेतु का उदाहरण देने का प्रयत्न करे तो उसमें हेत्वर्थसाधकत्व १. पदमिदं क्वचित् सूत्रस्यावतरणरूपेण गृहीतम्, क्वचिच्च व्याख्यानरूपेणेत्युभयथापि समञ्जसमेव प्रतिभाति ।
१५. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८७
१५. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८७ दृष्टान्ते दर्शयितव्यमिति, न च तर्हि प्रत्यक्षादीनामप्रमाण्यम् । अथ प्रत्यक्षादीना- मप्रामाण्यम् ? उपादीयमानमप्युदाहरणं नार्थं साधयिष्यतीति । सोऽयं सर्वप्रमाणै- र्व्याहतो हेतुरहेतुः 'सिद्धान्तमभ्युपेत्य तद्विरोधी विरुद्धः' ( १. २. ६) इति । वाक्यार्थो ह्यस्य सिद्धान्तः । स च वाक्यार्थः- प्रत्यक्षादीनि नार्थं साधयन्तीति । इदं चावयवानामुपादानमर्थस्य साधनायेति । अथ नोपादीयते ? अप्रदर्शितहेत्व- र्थस्य दृष्टान्ते न साधकत्वमिति निषेधो नोपपद्यते; हेतुत्वासिद्धेरिति ॥ १३ ॥ तत्प्रामाण्ये वा न सर्वप्रमाणविप्रतिषेधः ॥ १४ ॥ प्रतिषेधलक्षणे स्ववाक्ये तेषामवयवाश्रितानां प्रत्यक्षादीनां प्रामाण्येऽभ्यनु- ज्ञायमाने परवाक्येऽप्यवयवाश्रितानां प्रामाण्यं प्रसज्यते; अविशेषादिति । एवं च न सर्वाणि प्रमाणानि प्रतिषिध्यन्त इति । विप्रतिषेध इति 'वि' इत्ययमुपसर्गः संप्रतिपत्त्यर्थे, न व्याघाते; अर्थाभावादिति ॥ १४ ॥ त्रै काल्याप्रतिषेधश्च शब्दादातोद्यसिद्धिवत् तत्सिद्धेः ॥ १५ ॥ किमर्थं पुनरिदमुच्यते ? पूर्वोक्तनिबन्धनार्थम् । यत्तावत्पूर्वोक्तम्- 'उपलब्धि- दिखाना पड़ेगा । इससे प्रत्यक्षादि का अप्रमाणत्व फिर भी नहीं बनेगा । यदि प्रत्यक्षादि का अप्रामाण्य ही मान लें तो दिया हुआ उदाहरण अर्थ को सिद्ध न कर सकेगा- इसलिए वह हेतु हेतु नहीं होगा । अतः यह जिस 'सिद्धान्त का आश्रय लेकर प्रवृत्त है उसका विरोध करने वाला विरुद्ध' (१.२.६) हेत्वाभास होगा; क्योंकि 'प्रत्यक्षादि प्रमाण अर्थ की सिद्धि नहीं करते' यह वाक्यार्थ ही पूर्वपक्षी का सिद्धान्त है, और उसके द्वारा यह प्रतिज्ञादि पांचों अवयवों का ग्रहण भी अर्थसिद्धि के लिये ही करना पड़ता है । यदि इनका ग्रहण न किया जाय तो अप्रदर्शित हेत्वर्थ की दृष्टान्त में साधकता नहीं बनेगी, तब प्रतिषेध भी कैसे हो सकेगा; क्योंकि हेतुत्व ही सिद्ध नहीं हुआ ॥ १३ ॥ अवयवाश्रित प्रत्यक्ष आदि को प्रमाण मानने पर समग्र प्रमाणों का प्रतिषेध सिद्ध न होगा ॥ १४ ॥ प्रतिषेधलक्षणक स्ववाक्य में यदि पूर्वपक्षी उन अवयवों पर आश्रित प्रत्यक्षादि को प्रमाण मानता है तो सिद्धान्ती के वाक्य में अवयवाश्रितत्व समानता के कारण प्रत्यक्षादि को प्रमाण मानना पड़ेगा; इस तरह सब प्रमाण प्रतिषिद्ध कहाँ हुए ! 'विप्रतिषेध' शब्द में 'वि' यह उपसर्ग 'समग्र प्रमाणों के निषेध का यथार्थ ज्ञान' का बोधक है, न कि विरोध का; क्योंकि 'विरोध' अर्थ मानने का कोई प्रयोजन नहीं है ॥ १४ ॥ ध्वनिरूप शब्द से वाद्ययन्त्र की सिद्धि की तरह प्रमाणरूप कारण को सिद्धि होने से प्रमाणों में त्रैकाल्य-प्रतिषेध भी नहीं बनेगा ॥ १५ ॥ यह बात पहले ( २. १. ११ में ) कह ही आये, अब फिर क्यों कही जा रही है ?
८८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० हेतोरुपलब्धिविषयस्य चार्थस्य पूर्वापरसहभावानियमाद् यथादर्शनं विभाग- वचनम्' इति, तदितः समुत्थानं यथा विज्ञायेत । अनियमदर्शी खल्वयमृषि- र्नियमेन प्रतिषेधं प्रत्याचष्टे । त्रैकाल्यस्य१ चायुक्तः प्रतिषेध इति । तत्रैकां विधामुदाहरति-शब्दा- दातोद्यसिद्धिवदिति । यथा पश्चात्सिद्धेन शब्देन पूर्वसिद्धमातोद्यमनुमीयते । साध्यं चातोद्यम्, साधनं च शब्दः, अन्तर्हिते ह्यातोद्ये स्वनतोऽनुमानं भवतीति । 'वीणा वाद्यते', 'वेणुः पूर्यते' इति स्वनविशेषेण आतोद्यविशेषं प्रतिपद्यते । तथा पूर्वसिद्धमुपलब्धिविषयं पश्चात्सिद्धेनोपलब्धिहेतुना प्रतिपद्यते इति । निदर्शनार्थत्वाच्चास्य, शेषयोर्विध्योर्यथोक्तमुदाहरणं वेदितव्यमिति । कस्मात् पुनरिह तन्नोच्यते ? पूर्वोक्तमुपपाद्यत इति । सर्वथा तावदयमर्थः प्रकाशयितव्यः-स इह वा प्रकाश्येत, तत्र वा; न कश्चिद्विशेष इति ॥ १५ ॥ प्रमाणं प्रमेयमिति च समाख्या समावेशेन वर्त्तते; समाख्यानिमित्तवशात् । समाख्यानिमित्तं तूपलब्धिसाधनं प्रमाणम्, उपलब्धिविषयश्च प्रमेयमिति । पहले कही बात को ही पुष्ट करने के लिये । हमने जो पहले यह कहा था कि 'उपलब्धि- हेतु तथा उपलब्धि-विषय अर्थ में पूर्व-अपर काल या सहभाव का नियम न होने के कारण यथादर्शन विभाग कहा गया हैं' यह बात यहीं से आधार लेकर कही थी। प्रमाण- प्रमेय-नियम न मानने वाले सूत्रकार ने नियम से प्रतिषेधपक्ष का खण्डन किया हैं। त्रैकाल्य का प्रतिषेध अयुक्त है, इसमें एक उदाहरण देते हैं—ध्वनिरूप शब्द से वाद्ययन्त्र की सिद्धि की तरह । जैसे पश्चात्काल में सिद्ध ध्वनिरूप शब्द से पूर्वसिद्ध वाद्ययन्त्र की सिद्धि का अनुमान होता है। यहाँ शब्द साधन है, वाद्ययन्त्र साध्य है। अनभिव्यक्त वाद्ययन्त्र का ध्वनि से अनुमान होता है। 'वीणा बज रही हैं' या 'वंशी बज रही हैं'—ऐसा हम ध्वनिविशेष सुनकर ही अनुमान करते हैं। इसी प्रकार पूर्वसिद्ध उपलब्धिविषय का पश्चात्सिद्ध उपलब्धिहेतु से ज्ञान होता है। यह एक उदाहरण दे दिया है। (२. १. ११) सूत्र में अवशिष्ट दोनों प्रकारों का भी इसी तरह उदाहरण समझ लेना चाहिये । उन दोनों का भी यहाँ फिर से व्याख्यान क्यों नहीं किया गया ? यहाँ पूर्वोक्त बात ही समझायी जा रही हैं, कोई नयी बात नहीं कही जा रही; फिर उसे यहाँ कह दिया या वहाँ कह लें, क्या नयी बात हो जायेगी ॥ १५ ॥ 'प्रमाण' तथा 'प्रमेय'—ये संज्ञायें संज्ञानिमत्त की स्थिति रहने पर व्यापकता रहती हैं। जैसे संज्ञानिमित्त 'प्रमाण' उपलब्धि-साधन है, तथा 'प्रमेय' उपलब्धि-विषय। परंतु जब १. 'त्रैकाल्ये'—इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१६. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८९
१६. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८९ यदा च उपलब्धिविषयः क्वचिदुपलब्धिसाधनं भवति, तदा प्रमाणं प्रमेयमिति चैकोऽर्थोऽभिधीयते । अस्यार्थस्यावद्योतनार्थमिदमुच्यते— प्रमेया¹ च तुला प्रामाण्यवत् ॥ १६ ॥ गुरुत्वपरिमाणज्ञानसाधनं तुला प्रमाणम्, ज्ञानविषयो गुरुद्रव्यं सुवर्णादि प्रमेयम् । यदा सुवर्णादिना तुल्यान्तरं व्यवस्थाप्यते तदा तुलान्तरप्रतिपत्तौ सुवर्णादि प्रमाणम्, तुल्यान्तरं प्रमेयमिति । एवमनवयवेन तन्त्रार्थ उद्दिष्टो वेदितव्यः । आत्मा तावदुपलब्धिविषयत्वात् प्रमेये परिपठितः उपलब्धौ स्वातन्त्र्यात् प्रमाता । बुद्धिरुपलब्धिसाधनत्वात्² प्रमाणम् । उपलब्धिविषयत्वात् प्रमेयम् । उभयाभावात् तु प्रमितिः । एवमर्थविशेषे समाख्यासमावेशो योज्यः । तथा च कारक शब्दा निमित्तवशात् समावेशेन वर्तन्त इति । वृक्षस्तिष्ठतीति स्वस्थितौ स्वातन्त्र्यात् कर्ता । वृक्षं पश्यतीति दर्शनेनाप्तुमिष्यमाणतमत्वात् उपलब्धि-साधन ही कहीं उपलब्धि-विषय बन जाता है तो उस समय वह प्रमाण 'प्रमेय' भी बन जाता है और दोनों संज्ञाओं में से एक ही अर्थ लिया जाता है। इसी अर्थ को सूत्रकार स्पष्ट करते हैं— प्रमाणता के समान तुला प्रमेय भी है ॥ १६ ॥ गुरुत्व ( वजन ) तथा परिमाण के ज्ञान का साधन तुला 'प्रमाण' है, ज्ञान के विषय वजनी द्रव्य सुवर्णादि 'प्रमेय' है। जब उस तुले हुये सुवर्ण आदि से दूसरी चीज का तोल किया जाता है तब वही सुवर्णादि प्रमाण बन जाता है। इस प्रकार यहाँ शास्त्र ( सूत्र ) का अर्थ संघात ( व्यापक ) रूप से उपदिष्ट है—ऐसा समझना चाहिये । उपलब्धि विषय होने से प्रमेय में पढा गया 'आत्मा' उपलब्धि ( ज्ञान ) में स्वातन्त्र्य होने के कारण 'प्रमाता' भी कहलाता है, इसी तरह प्रमेयपरिपठित होते हुये भी ज्ञान- साधन होने से 'प्रमाण' है, उपलब्धिविषय होने से 'प्रमेय' है, दोनों ही विषय या साधन जब न हों तब वह 'प्रमिति' है। इस प्रकार अर्थविशेष में संज्ञा का समावेश लगा लेना चाहिए । इसी तरह कारक शब्द भी व्यवहृत होते हैं। जैसे—'वृक्ष खड़ा है' यहाँ वृक्ष अपनी स्थिति में स्वतन्त्र होने से 'कर्ता' है; परन्तु 'वृक्ष को देखता है'—इस वाक्य में दर्शन- १. 'प्रमेयता च'इति पाठ० । शब्दोऽयं तात्पर्यटीकानुसारमत्र स्थापितः । २. 'बुद्धिरूपोपलब्धिसाधनत्वात्' इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
९० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १ आ० कर्म । वृक्षेण चन्द्रमसं ज्ञापयतीति ज्ञापकस्य साधकतमत्वात् करणम् । 'वृक्षा- योदकमासिञ्चति' इति आसिच्यमानेनोदकेन वृक्षमभिप्रेतीति सम्प्रदानम् । वृक्षात्पर्णं पततीति 'ध्रुवमपायेऽपादानम्' इत्यपादानम् । वृक्षे वयांसि सन्तीति 'आधारोऽधिकरणम्' इत्यधिकरणम् । एवं च सति न द्रव्यमात्रं कारकम्, न क्रियामात्रम्, किं तर्हि ? क्रियासाधनं क्रियाविशेषयुक्तं कारकम् । यत्क्रिया- साधनं स्वतन्त्रः स कर्ता, न द्रव्यमात्रं न क्रियामात्रम् । क्रियया व्याप्तुमिष्य- माणतमं कर्म, न द्रव्यमात्रं न क्रियामात्रम् । एवं साधकतमादिष्वपि । एवं च कारकार्थान्वाख्यानं यथैव उपपत्तितः, एवं लक्षणतः कारकान्वाख्यानमपि न द्रव्यमात्रेण न क्रियया वा; किं तर्हि ? क्रियासाधने क्रियाविशेषयुक्त इति । कारकशब्दश्चायं प्रमाणं प्रमेयमिति, स च कारकधर्मं न हातुमर्हति ॥ १६ ॥ अस्ति भोः ! कारक शब्दानां निमित्तवशात् समावेशः । प्रत्यक्षादीनि च प्रमाणानि, उपलब्धिहेतुत्वात्; प्रमेयं चोपलब्धिविषयत्वात् । संवेद्यानि च क्रिया से ईप्सा का विषय होने के कारण वही 'कर्म' हो गया है। इसी प्रकार 'वृक्ष से चन्द्रमा को दिखाता है' यहाँ ज्ञप्ति का साधन होने से वही वृक्ष 'करण' है । 'वृक्ष को जल सींचता है' इस वाक्य में सींचे जाने वाले जल का वृक्ष अभिप्रेत है अतः वह 'सम्प्र- दान' है । 'वृक्ष से पत्ते गिरते हैं' इसमें 'ध्रुवमपायेऽपादानम्' ( पा० सू० १.४.२४ ) इस पाणिनि के नियम से वही वृक्ष 'अपादान' है ।'वृक्ष पर पक्षी बैठे हैं' इस वाक्य में 'आधारो- ऽधिकरणम्' ( पा० सू० ४. १. २५ ) इस नियम से पक्षियों का आधार बन जाने से वह 'अधिकरण' है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि द्रव्य या क्रिया ही कारक नहीं होते;' अपितु क्रिया ( व्यापार ) का साधन तथा क्रिया ( व्यापार ) विशेष से युक्त कारक होता है। जो स्वतन्त्र रहता हुआ क्रिया का साधन है वह 'कर्ता' कहलाता है न कि केवल द्रव्य या केवल क्रिया । इसी तरह क्रिया से ईप्सिततम कारक 'कर्म' कह- लाता है, न कि केवल द्रव्य या केवल क्रिया । इसी प्रकार साधकतम ( क्रिया का अत्यन्त साधक ) 'करण' आदि कारकों के विषय में भी समझ लेना चाहिये। इस प्रकार जैसे कारक के अर्थ का अन्वाख्यान युक्ति से किया गया है उसी तरह कारकों का स्वरूपकथन भी केवल द्रव्य या क्रिया से नहीं; अपितु 'क्रिया (व्यापार) विशेष से युक्त क्रियासाधन'- ऐसा कर लेना चाहिए। यह 'कारक' शब्द प्रमाण भी है, प्रमेय भी है, यह दोनों अवस्थाओं में अपने 'कारकत्व' को नहीं छोड़ता ॥ १६ ॥ शङ्का—हम उक्त रीति से कारकों का निमित्तों के सम्बन्धों से समावेश होना मान लेते हैं । प्रकृत में - प्रत्यक्षादि उपलब्धिहेतु होने से प्रमाण हैं, उपलब्धिविषय होने से प्रमेय हैं। ये प्रत्यक्षादि संवेद्य (विभाग से जानने योग्य) भी हैं, क्योंकि 'प्रत्यक्ष से जानता हूँ', 'अनुमान से जानता हूँ', 'उपमान से जानता हूँ' 'शब्द प्रमाण से जानता हूँ' —ऐसा CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१७ सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९१
१७ सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९१ प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि—प्रत्यक्षेणोपलभे, अनुमानेनोपलभे, उपमानेनोपलभे, आगमेनोपलभे; प्रत्यक्षम् मे ज्ञानम्, आनुमानिकं मे ज्ञानम्, औपमानिकं मे ज्ञानम्, आगमिकं मे ज्ञानमिति विशेषा१ गृह्यन्ते । लक्षणतश्च ज्ञाप्यमानानि ज्ञायन्ते विशेषेण—‘इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानम्’ इत्येवमादिना । सेयमुपलब्धिः प्रत्यक्षादिविषया किं प्रमाणान्तरतः, अथान्तरेण प्रमाणा- न्तरमसाधनेति ? कश्चात्र विशेषः ? प्रमाणतः सिद्धेः प्रमाणानां प्रमाणान्तरसिद्धिप्रसङ्गः ? ॥ १७ ॥ यदि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणेनोपलभ्यन्ते ? येन प्रमाणेनोपलभ्यन्ते तत् प्रमा- णान्तरमस्तीति प्रमाणान्तरसद्भावः प्रसज्यत इति अनवस्थामाह—तस्याप्यन्येन, तस्याप्यन्येनेति । न चानवस्था शक्याऽनुज्ञातुम्; अनुपपत्तेरिति ॥ १७ ॥ अस्तु तर्हि प्रमाणान्तरमन्तरेण निःसाधनेति ? विभक्त प्रमाणरूप से प्रत्यक्षादि का ग्रहण करता है। इसी तरह ‘मेरा यह ज्ञान प्रत्यक्ष से हुआ है’, ‘अनुमान से हुआ है’, ‘उपमान से हुआ है’, ‘आगम से हुआ है’, ऐसे भेद से भी ये प्रमाण गृहीत होते हैं। ये प्रत्यक्षादि, लक्षण से जाने जाते हुए ‘यह ज्ञान इन्द्रिया- र्थसन्निकर्षजन्य है, अतः प्रत्यक्ष है’—ऐसे अपनी विशेषताओं से पृथक् हैं। हमारा आशय यह है कि प्रत्यक्षादि का यह उपर्युक्त ज्ञान क्या किसी प्रमाणान्तर से होता है ? या किसी प्रमाणान्तर के बिना ही असाधन हैं ? सिद्धान्ती पूछता है—यह ज्ञान तुम्हारे बताये प्रकारों में से किसी भी प्रकार से हो, विशेषता क्या आयेगी ? प्रश्नकर्ता उत्तर देता है— यदि यह ज्ञान अन्य प्रमाण से सिद्ध होता है तो ( इनसे भिन्न ) प्रमाणान्तर मानना पड़ेगा ? ॥ १७ ॥ यदि प्रत्यक्षादि प्रमाण से उपलब्ध होते हैं तो ये जिस प्रमाण से उपलब्ध होते हों उस प्रमाणान्तर की सत्ता माननी पड़ेगी । इससे अनवस्था यह पैदा होगी कि उस उस ज्ञान के लिये पूर्व-पूर्व प्रमाणान्तर की अनन्त कल्पनायें करनी पड़ेंगी । प्रायः अयुक्त होने के कारण इस अनवस्था का मानना उचित नहीं है ॥ १७ ॥ तो दूसरा पक्ष—प्रमाणान्तर के बिना ही असाधन है—यह मान लें ? पूर्वपक्षी कहता है— १. ‘ज्ञानविशेषाः’ इति पाठ० । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
९२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० तन्निवृत्तेर्वा प्रमाणसिद्धिवत् प्रमेयसिद्धिः ? ॥ १८ ॥ यदि प्रत्यक्षाद्युपलब्धौ प्रमाणान्तरं निवर्तते, आत्माद्युपलब्धावपि प्रमाणान्तरं निवत्स्य॑ते, अविशेषात् ? ॥ १८ ॥ एवं च सर्वप्रमाणविलोप इत्यत आह— न; प्रदीपप्रकाशवत् तत्सिद्धेः ॥ १९ ॥ यथा प्रदीपप्रकाशः प्रत्यक्षाङ्गत्वात् दृश्यदर्शने प्रमाणम्, स च प्रत्यक्षान्तरेण चक्षुषः सन्निकर्षेण गृह्यते। प्रदीपभावाभावयोर्दर्शनस्य तथाभावाद् दर्शनहेतुर- नुमीयते। 'तमसि प्रदीपमुपाददीथाः' इत्याप्तोपदेशेनापि प्रतिपद्यते। एवं प्रत्यक्षा- दीनां यथादर्शनं प्रत्यक्षादिभिरेवोपलब्धिः। इन्द्रियाणि तावत् स्वविषयग्रहणेनैवानुमीयन्ते। अर्थाः प्रत्यक्षतो गृह्यन्ते। इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्त्वावरणेन लिङ्गेनानुमीयन्ते। इन्द्रियार्थसन्निकर्षोत्पन्नं ज्ञानमात्ममनसोः संयोगविशेषादात्मसमवायाच्च सुखादिवद् गृह्यते। एवं उक्त प्रत्यक्षादि के ज्ञान में प्रमाणान्तर न मानने पर आत्मादि प्रमेय की सिद्धि में भी प्रमाणान्तर नहीं मानना पड़ेगा ? ॥ १८ ॥ यदि इस प्रत्यक्षादि ज्ञान में प्रमाणान्तर निवृत्त हो जाता है तो प्रमेय (आत्मा आदि) के ज्ञान में भी प्रमाणान्तर मानने की क्या आवश्यकता है; क्योंकि बात दोनों जगह बराबर है ? ॥ १८ ॥ इस तरह आपका 'सब प्रमाणों का प्रकरण' ही समाप्त हो जायेगा ? (इसका सिद्धान्ती उत्तर देते हैं— ) नहीं; प्रदीपप्रकाश की तरह उसकी सिद्धि हो जायेगी ॥ १९ ॥ जैसे—दीपक का प्रकाश प्रत्यक्ष का अङ्ग ( साधन ) होने से दृश्य को दिखाने में प्रमाण है, और वह प्रत्यक्षान्तर—चक्षुःसन्निकर्ष—से गृहीत होता है। तथा 'दीपक के रहते अन्धकार में दृश्य का दिखायी देना, और दीपक के न रहने पर दिखायी न देना—' इस व्यतिरेकव्याप्ति से दीपक में दर्शनहेतुत्व अनुमान प्रमाण से, तथा 'अन्धकार में दीपक का सहारा लेना चाहिये'—इस आप्तोपदेश से भी सिद्ध किया जा सकता है ! अतः सिद्ध हो गया कि दीपक की तरह प्रत्यक्षादि प्रमाणों का भी दर्शन के अनुसार उन्हीं प्रत्यक्षादि प्रमाणों से ज्ञान हो जाता है। अतीन्द्रिय इन्द्रियों का स्वविषयग्रहणरूप हेतु से अनुमान होता है, अर्थों का प्रत्यक्ष होता है, इन्द्रिय और अर्थ का सम्बन्ध आवरण हेतु से अनुमित होता है, इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न ज्ञान भी सुखादि ज्ञान की तरह आत्मनःसंयोग, तथा आत्मा के साथ समवाय ( सम्बन्ध ) से होता है—इस प्रकार प्रमाणविशेष का विभागपूर्वक विवेचन करना CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
१९. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९३
१९. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९३ प्रमाणविशेषी विभज्य वचनीयः । यथा च दृश्यः सन् प्रदीपप्रकाशो दृश्यान्तराणां दर्शनहेतुरिति दृश्यदर्शनव्यवस्थां लभते, एवं प्रमेयं सत्किञ्चिदर्थजातमुपलब्धि- हेतुत्वात् प्रमाणप्रमेयव्यवस्थां लभते । सेयं प्रत्यक्षादिभिरेव प्रत्यक्षादीनां यथा- दर्शनमुपलब्धिर्न प्रमाणान्तरतः, न च प्रमाणमन्तरेण निःसाधनेति । तेनैव तस्याग्रहणमिति चेद् ? न; अर्थभेदस्य लक्षणसामान्यात् । प्रत्यक्षा- दीनां प्रत्यक्षादिभिरेव ग्रहणमित्ययुक्तम्, अन्येन ह्यन्यस्य ग्रहणं दृष्टमिति ? न; अर्थभेदस्य लक्षणसामान्यात् । प्रत्यक्षलक्षणेनानेकोऽर्थः सङ्गृहीतः, तत्र केनचित् कस्यचिद् ग्रहणमित्यदोषः । एवमनुमानादिष्वपीति । यथा—उद्धृतेनोदकेना- शयस्थस्य ग्रहणमिति । ज्ञातृमनसोश्च दर्शनात् । अहं सुखी, अहं दुःखी चेति तेनैव ज्ञात्रा तस्यैव ग्रहणं दृश्यते । 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( १. १. १६ ) इति च तेनैव मनसा तस्यैवानुमानं दृश्यते, ज्ञातुर्ज्ञेयस्य चाभेदो ग्रहणस्य ग्राह्यस्य चाभेद इति । चाहिये । और जैसे प्रदीपप्रकाश स्वयं दृश्य होता हुआ दृश्यान्तर का दर्शनहेतु बनकर दृश्य ( प्रमेय ) दर्शन ( प्रमाण ) व्यवस्था को प्राप्त कर लेता है, इसी प्रकार आत्मादि (पदार्थ) भी जब स्वयं ज्ञान का विषय होता है तो 'प्रमेय', तथा जब किसी अन्य पदार्थ के ज्ञान का साधन बन जाता है तो 'प्रमाण' कहलाता है । यों यह प्रत्यक्षादि का ज्ञान प्रत्यक्षादि की उपलब्धि के अनुसार गृहीत हो जाता है, इसके लिए न प्रमाणान्तर की आवश्यकता है, न प्रमाणान्तर के बिना यह असाधन ही है । यदि यह कहें कि उसी ( प्रत्यक्ष ) से उस ( प्रत्यक्ष ) का ग्रहण नहीं होगा ? तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि भिन्न-भिन्न प्रत्यक्षादि सभी रूप अर्थ प्रत्यक्ष के साधारण लक्षण से गृहीत हैं । तात्पर्य यह है कि प्रत्यक्षादि से प्रत्यक्षादि का ग्रहण युक्त नहीं, क्योंकि दूसरा दूसरे को देखता है—ऐसा ही लोक में देखा जाता है ? नहीं, क्योंकि भिन्न-भिन्न प्रत्यक्षादि रूप अर्थों में साधारण लक्षण समान है । उस प्रत्यक्ष के लक्षण में अनेक अर्थ संगृहीत हैं, अतः वहाँ किसी से किसी न किसी का ग्रहण हो जायेगा—अतः कोई दोष नहीं । इसी तरह अनुमानादि के विषय में भी समझना चाहिये; जैसे—जला- शय से उद्धृत जल का अनुमान होता है । ज्ञाता ( आत्मा ) तथा मन में अपने से ही अपना ज्ञान होता है । 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ'—यह उस ज्ञाता द्वारा उसका अपने विषय में ही ज्ञान देखा जाता है । 'युगपद् ज्ञान का अनुत्पाद मन की सत्ता में हेतु हैं' ( १. १. १६ ) इस लक्षण से उसी मन से उस मन का अनुमान देखा जाता है । आत्मा में ज्ञाता तथा ज्ञेय का, और मन में ग्रहण व ग्राह्य का अभेद ही है, अतः वे स्व से स्व का ज्ञान करने में असमर्थ नहीं होते । CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
९४ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० निमित्तभेदोऽत्रेति चेत् ? समानम् । न निमित्तान्तरेण विना ज्ञाताऽऽत्मानं जानीते, न च निमित्तान्तरेण विना मनसा मनो गृह्यत इति ? समानमेतत्; प्रत्यक्षादिभिः प्रत्यक्षादीनां ग्रहणमित्यत्राप्यर्थभेदो न गृह्यत इति । प्रत्यक्षादीनां चाविषयस्यानुपपत्तेः । यदि स्यात् किञ्चिदर्थजातं प्रत्यक्षा- दीनामविषयः-यत्प्रत्यक्षादिभिर्न शक्यं ग्रहीतुम्, तस्य ग्रहणाय प्रमाणान्तरमुपा- दीयेत, तत्तु न शक्यं केनचिदुपपादयितुमिति । प्रत्यक्षादीनां यथादर्शनमेवेदं सच्चासच्वं सर्वं विषय इति ॥ १९ ॥ केचित्तु दृष्टान्तमपरिगृहीतं हेतुना विशेषहेतुमन्तरेण साध्यसाधनायोपा- ददते-'यथा प्रदीपप्रकाशः प्रदीपान्तरप्रकाशमन्तरेण गृह्यते, तथा प्रमाणानि प्रमाणान्तरेण गृह्यते' इति । स चायम्— क्वचिन्निवृत्तिदर्शनादनिवृत्तिदर्शनाच्च क्वचिदनेकान्तः १ ॥ २० ॥ यथा चायं प्रसङ्गो निवृत्तिदर्शनात् प्रमाणसाधनायोपादीयते, एवं प्रमेयसाधनायाप्युपादेयः, अविशेषहेतुत्वात् । यथा च स्थाल्यादिरूपग्रहणे यदि कहें कि आत्मा तथा मन में तादृश ज्ञान के लिये एक सहकारिविशेष ग्राह्य- ग्राहकसम्बन्ध नियामक माना गया है ? तो प्रत्यक्षादि में भी बात वरावर है । तात्पर्य यह है कि यदि पूर्वपक्षी कहे कि दूसरे निमित्त के विना ज्ञाता अपने आप को कैसे जानेगा, या ज्ञानसाधनरूप अन्य निमित्त हुए विना मन स्वयं को कैसे जानेगा ? तो यह ठीक नहीं; क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाणों में भी यह बात समान ही है । 'प्रत्यक्षादिकों से प्रत्यक्षादि का ग्रहण होता है' यहाँ भी पूर्वोक्त रीति से अर्थभेद न होने पर भी अर्थ जाना ही जाता है । ऐसा भी सम्भव है कि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों को अगोचर विषय की सिद्धि में प्रमाणान्तर की अपेक्षा हो सकती है? नहीं, ऐसा कोई विषय नहीं है जो इन प्रमाणों में से किसी का विषय न हो । अतः, दर्शनानुसारेण सत् हो या असत् वह प्रत्यक्षादि का विषय है ही ॥ १९ ॥ कुछ विद्वान् हेतु से अपरिगृहीत दृष्टान्त को विशेष हेतु के विना साध्य की सिद्धि के लिए प्रयुक्त करते हैं, जैसे—प्रदीपप्रकाश प्रदीपान्तर के विना स्वयं दिखायी दे जाता है, उसी तरह प्रमाण भी प्रमाणान्तर के विना उपलब्ध हो सकते हैं ? वह यह— कहीं (प्रदीपादि में) निवृत्ति दीखने से, कहीं (पटरूपादि में) निवृत्ति न दीखने से (यह हेतु) अनेकान्तिक (व्यभिचारी) है ॥ २० ॥ जैसे प्रदीप के उदाहरण (दृष्टान्त) से प्रमाणान्तर के विना प्रत्यक्षादि प्रमाणों की सिद्धि करते हैं उसी प्रकार यह उदाहरण प्रमेय (स्थाली-आदि) की सिद्धि के समय में ग्रहण करना चाहिये; क्योंकि बात उभयत्र समान है । अथ च, स्थाल्यादि का रूप जानने १. क्वचिदिदं सूत्रत्वेन न लिखितम् ।
२०. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९५
२०. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ९५ प्रदीपप्रकाशः प्रमेयसाधनायोपादीयते, एवं प्रमाणसाधनायाप्युपादेयः; विशेष- हेत्वभावात् । सोऽयं विशेषहेतुपरिग्रहमन्तरेण दृष्टान्त एकस्मिन् पक्षे उपादेयो न प्रतिपक्ष इत्यनेकान्तः । एकस्मिंश्च पक्षे दृष्टान्त उपादेयो न प्रतिपक्षे दृष्टान्त इत्यनेकान्तः; विशेषहेत्वभावादिति । विशेषहेतुपरिग्रहे सति उपसंहाराभ्यनुज्ञानादप्रतिषेधः¹ । विशेषहेतुपरिगृही- तस्तु दृष्टान्त एकस्मिन् पक्षे उपसंह्रियमाणो न शक्योऽननुज्ञातुम् । एवं च सत्यनेकान्त इत्ययं प्रतिषेधो न भवति । प्रत्यक्षादीनां प्रत्यक्षादिभिरुपलब्धावनवस्थेति चेद् ? न; संविद्विषय- निमित्तानामुपलब्ध्या व्यवहारोपपत्तेः । प्रत्यक्षेणार्थमुपलभे, अनुमानेनार्थ- मुपलभे, उपमानेनार्थमुपलभे, आगमेनार्थमुपलभे इति, प्रत्यक्षं मे ज्ञानमानु- मानिकं मे ज्ञानमौपमानिकं मे ज्ञानमागम्रिकं मे ज्ञानमिति—संविद्विषयं संविन्निमित्तं चोपलभमानस्य धर्मार्थसुखापवर्गप्रयोजनस्तत्प्रत्यनीकपरिवर्जन- के लिए जैसे प्रदीपप्रकाश आवश्यक है, उसी प्रकार उन प्रमाणादि को जानने के लिये प्रमाणान्तर की आवश्यकता पड़ेगी ही—इस तरह विशेष हेतु के बिना ही परिगृहीत 'दृष्टान्त' एक ही पक्ष में उपादेय होता हैं, प्रतिपक्ष में नहीं—अतः अनैकान्तिक है । अर्थात् प्रमाणान्तर को न मानने में प्रदीपप्रकाश दृष्टान्त को लेना तथा स्थाल्यादि के रूपप्रकाश के लिये दूसरे प्रमाण की आवश्यकता में न लेना—यह इस हेतु में अनैकान्तिक दोष है; क्योंकि एक ही पक्ष का दृष्टान्त लेने में कोई विशेष हेतु नहीं है। यदि उपर्युक्त दोनों पक्षों में से किसी एक पक्ष का साधक कोई विशेष हेतु स्वीकार किया जाये तो उस पक्ष के दृष्टान्त के बल पर 'उपसंहार' (चतुर्थ अवयव) के स्वीकार होने से प्रतिषेध नहीं बनेगा । तात्पर्य यह है कि विशेषहेतु से परिगृहीत दृष्टान्त एक पक्ष में उपसंहृत होता है तो इसमें आपको क्या आपत्ति है ! ऐसा मान लेने से आपका उठाया 'अनैकान्तिक' वाला प्रतिषेध भी नहीं बन सकेगा । प्रत्यक्षादि प्रमाणों की उन्हीं प्रत्यक्षादिकों से सिद्धि मानने से अनवस्था दोष होने लगेगा ? नहीं; क्योंकि ज्ञानविषय कारणों की उपलब्धि होने से सम्पूर्ण व्यवहार चलते देखे जाते हैं। 'प्रत्यक्ष द्वारा विषय को जानता हूँ' 'अनुमान द्वारा साध्य को जानता हूँ', 'उपमान से उपमेय को जानता हूँ' 'आगम (शब्द) द्वारा विषय को जानता हूँ'—ऐसा, या 'मेरा ज्ञान प्रत्यक्ष है' 'आनुमानिक है', औपमानिक है', 'शब्द है'—ऐसे ज्ञान, तथा ज्ञानविषय को जानने वाले पुरुष के धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति के लिए तथा १. भाष्यमिदं सूत्रत्वेन क्वचिदुल्लिखितम् । प्रमाणं प्रमाणान्तरनिरपेक्षम्, प्रकाश- कत्वात्, प्रदीपवदिति विशेषहेतुपरिग्रहे सतीत्यर्थः ।
न्तरमनवस्थासाधनीयम्, येन प्रयुक्तोऽनवस्थामुपाददीतेति ॥ २० ॥
९६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० प्रयोजनश्च व्यवहार उपपद्यते । सोऽयं तावत्येव निर्वर्त्तते । न चास्ति व्यवहारा- न्तरमनवस्थासाधनीयम्, येन प्रयुक्तोऽनवस्थामुपाददीतेति ॥ २० ॥ प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् [ २१-३७ ] प्रत्यक्षलक्षणपरीक्षा सामान्येन प्रमाणानि परीक्ष्य विशेषेण परीक्ष्यन्ते । तत्र— [ पूर्वपक्षः ] प्रत्यक्षलक्षणानुपपत्तिरसमग्रवचनात् ॥ २१ ॥ आत्ममनःसन्निकर्षो हि कारणान्तरं नोक्तमिति । न चासंयुक्ते द्रव्ये संयोगजन्यस्य गुणस्योत्पत्तिरिति, ज्ञानोत्पत्तिदर्शनादात्म- मनःसन्निकर्षः कारणम् । मनःसन्निकर्षानपेक्षस्य चेन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ज्ञान- कारणत्वे युगपदुत्पद्येरन् बुद्धय इति मनःसन्निकर्षोऽपि कारणम् । तदिदं सूत्रं पुरस्तात् कृतभाष्यम्¹ ॥ २१ ॥ नात्ममनसोः सन्निकर्षाभावे प्रत्यक्षोत्पत्तिः ॥ २२ ॥ तद्विरुद्ध को छोड़ने के लिए किये गये समग्र व्यवहार चलते हैं । ये व्यवहार उतने पर आकर अपने व्यापार से निवृत्त हो जाते हैं । अन्य कोई व्यवहार अवशिष्ट नहीं जिसमें अनवस्था दी जा सके, या जिसके द्वारा अनवस्था का ग्रहण कर सके ॥ २० ॥ प्रमाणों की सामान्यरूप से परीक्षा की जा चुकी, अब विशेषरूप से परीक्षा कर रहे हैं । उनमें सर्वप्रथम प्रत्यक्ष के विषय में विचार करते हैं— लक्षण पूर्ण विषयविषयक न होने से प्रत्यक्ष का लक्षण नहीं बनता ॥ २१ ॥ आत्ममनःसन्निकर्ष भी प्रत्यक्ष में कारण है, वह आपने प्रत्यक्ष-लक्षण में नहीं दिखाया (अतः आपका प्रत्यक्षलक्षण पूर्ण नहीं है) । असंयुक्त द्रव्य संयोगजन्य गुण की उत्पत्ति नहीं होती; जब कि ज्ञानोत्पत्ति होती है तब आत्ममनःसन्निकर्ष से लोक में ज्ञानोत्पत्ति देखे जाने से यह भी प्रत्यक्ष का कारण है । मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा न रखते हुए इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को ही प्रत्यक्ष का कारण मानने पर अनेक ज्ञान एक साथ उत्पन्न होने लगेंगे, अतः मनःसन्निकर्ष भी प्रत्यक्ष में कारण है । इस सूत्र के व्याख्यान में कथनीय विषय का विस्तृत विवेचन हम पहले ( १. १. ४ ) कर चुके हैं ॥ २१ ॥ आत्ममनःसन्निकर्ष के बिना प्रत्यक्ष की उत्पत्ति नहीं होती ॥ २२ ॥ १. अत्र तात्पर्यकाराः—‘‘तदिदम् ‘नात्ममनसोः सन्निकर्षा०' इत्यादि सूत्रं पाठस्य पुरस्तात् कृतभाष्यम्''—एवं व्याचक्षते, तत् युक्तिपूर्वकं न्यायपरिशुद्धौ खण्डितम् ।
२४. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ९७
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२४. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ९७ आत्ममनसोः सन्निकर्षाभावे नोत्पद्यते प्रत्यक्षम्, इन्द्रियार्थसन्निकर्षाभाव- वदिति ॥ २२ ॥ सति चेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानोत्पत्तिदर्शनात् कारणभावं ब्रुवतः- दिग्देशकालाकाशेष्वप्येवं प्रसङ्गः ? ॥ २३ ॥ दिगादिषु सत्सु ज्ञानभावात् तान्यपि कारणानीति ? । अकारणभावेऽपि ज्ञानोत्पत्तिः, दिगादिसन्निधेरवर्जनीयत्वात् । यदाप्यकारणं दिगादीनि ज्ञानोत्पत्तौ, तदापि सत्सु दिगादिषु ज्ञानेन भवितव्यम्, न हि दिगा- दीनां सन्निधिः शक्यः परिवर्जयितुमिति । तत्र कारणभावे हेतुवचनम्-एतस्मा- द्धेतोर्दिगादीनि ज्ञानकारणानीति ॥ २३ ॥ आत्ममनःसन्निकर्षस्तर्ह्युपसङ्ख्येय इति ? [ सिद्धान्तपक्षः ] तत्रेदमुच्यते- ज्ञानलिङ्गत्वादात्मनो नानवरोधः१ ॥ २४ ॥ आत्मा तथा मन के सन्निकर्ष के बिना प्रमेय का प्रत्यक्ष नहीं होता, जैसे इन्द्रियार्थ- सन्निकर्ष के बिना उसका प्रत्यक्ष नहीं होता; अतः आत्ममनःसन्निकर्ष भी प्रत्यक्ष में कारण है ॥ २२ ॥ [मध्यस्थ पुरुष पूर्वपक्षी तथा सिद्धान्ती, दोनों को आपत्ति दे रहा है-] इन्द्रियार्थ- सन्निकर्ष की सत्ता से ज्ञान (प्रत्यक्ष) की उत्पत्ति देखी जाने से उक्त सन्निकर्ष को प्रत्यक्ष का कारण बतलानेवाले के मत में- दिशा देश, काल, आकाश में भी यही प्रसङ्ग होने लगेगा ॥ २३ ॥ प्रत्यक्ष के समय दिशा-आदि भी रहते हैं तो इन्हें भी प्रत्यक्ष का कारण मान लिया जाये ? [मध्यस्थ पुरुष को इस आपत्ति का भाष्यकार परिहार करते हैं-] यदि उक्त दिशा-आदि को ज्ञान का कारण न मानें तो भी उनके सामीप्य को हटाना दुःशक है अर्थात् उनको कारण मानने या न मानने पर भी ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व वे रहते ही हैं, अतः उनका सामीप्य निराकृत करना असम्भव है। उनका कारणत्व सिद्ध करने के लिए आप (मध्यस्थ) को कोई हेतु दिखाना चाहिये कि इस हेतु से वे दिगादिक प्रत्यक्ष में कारण हैं ॥ २३ ॥ [पूर्वपक्षी सिद्धान्ती से पूछता है-] तो प्रत्यक्षलक्षण में 'आत्ममनःसन्निकर्ष' का उपसङ्ख्यान कर देना चाहिये ? सिद्धान्ती उत्तर देता है- आत्मा की ज्ञानरूप हेतु से सिद्धि होने के कारण (प्रत्यक्ष-लक्षण में) उसका असंग्रह नहीं है ॥ २४ ॥ १. 'नाऽवरोधः' इति, 'नानवबोधः' इति च पाठ० । न्या०-द० ७
९८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ० ज्ञानमात्मलिङ्गम्; तद्गुणत्वात् । न चासंयुक्ते द्रव्ये संयोगजस्य गुणस्यो- त्पत्तिरस्तीति ॥ २४ ॥ तदयौगपद्यलिङ्गत्वाच्च न मनसः ॥ २५ ॥ अनवरोध इति वर्त्तते । 'युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्' ( १. १. १६ ) इत्युच्यमाने सिद्धत्येव मनःसन्निकर्षापेक्ष इन्द्रियार्थसन्निकर्षो ज्ञानकारण- मिति ॥ २५ ॥ प्रत्यक्षनिमित्तत्वाच्चेन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षस्य स्वशब्देन वचनम् ॥ २६ ॥ प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दानां निमित्तमात्ममनःसन्निकर्षः, प्रत्यक्षस्यैवेन्द्रियार्थ- सन्निकर्ष इत्यसमानः, असमानत्वात् तस्य ग्रहणम् ॥ २६ ॥ सुप्तव्यासक्तमनसां चेन्द्रियार्थयोः सन्निकर्षनिमित्तत्वात् ॥ २७ ॥ आत्मा का गुण होने से ज्ञान उसका (साधक) है। असंयुक्त द्रव्य में संयोजक गुण की उत्पत्ति नहीं देखी जाती । अतः प्रत्यक्षलक्षण में ज्ञान का निवेश होने से आत्ममनः- सन्निकर्ष भी उसमें आ जाता है, पृथक्पाठ की कोई आवश्यकता नहीं ॥ २४ ॥ और अनेक ज्ञान के एक काल में न होने का साधक होने से मन का भी (प्रत्यक्ष- लक्षण में असंग्रह) नहीं (है) ॥ २५ ॥ ऊपर (२४वें सूत्र) से 'अनवरोधः' की अनुवृत्ति आ रही है। 'एक साथ अनेक ज्ञानों की अनुत्पत्ति ही मन की सत्ता में हेतु हैं' (१. १. १६)—ऐसा जब हम कह चुके तो उसी से यह सिद्ध हो जाता है कि इन्द्रियार्थसन्निकर्षज प्रत्यक्ष भी मनःसन्निकर्ष की अपेक्षा रखता है ॥ २५ ॥ [यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि उक्त प्रकार से आत्मा तथा मन का प्रत्यक्षलक्षण में समावेश हो सकता है तो इन्द्रिय-अर्थ के सन्निकर्ष का भी प्रत्यक्षलक्षण में कारण होने से आत्ममनस्क सन्निकर्ष की तरह ग्रहण हो सकता था, फिर उसका प्रत्यक्षलक्षण में शब्दतः ग्रहण क्यों किया ? इसके उत्तर में सूत्रकार कहते हैं—] एकमात्र प्रत्यक्ष ज्ञान में कारण होने से इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष को शब्दतः (नामग्रहणपूर्वक) लक्षण में पढ़ा गया है ॥ २६ ॥ आत्ममनःसन्निकर्ष तो सामान्यतः प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द—चारों ही प्रमाणों के सहकारी कारण है; परन्तु इन्द्रियार्थसन्निकर्ष प्रत्यक्ष में ही कारण है—यह विशेषता है। अतः उसका कण्ठतः शब्दपूर्वक ग्रहण किया गया है ॥ २६ ॥ [सूत्रकार कण्ठतः ग्रहण में एक कारण और बतला रहे हैं—] सोये हुए तथा किसी एक विषय में आसक्त मन वाले पुरुषों के प्रत्यक्ष में इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष में निमित्त कारणत्व होने से भी ॥ २७ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri
२८. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ९९
२८. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् ९९ इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ग्रहणम्, नात्ममनसोः सन्निकर्षस्येति । एकदा खल्वयं प्रबोधकालं प्रणिधाय सुप्तः प्रणिधानवशात् प्रबुध्यते । यदा तु तीव्रौ ध्वनि- स्पर्शा प्रबोधकारणं भवतः, तदा प्रसुप्तस्येन्द्रियार्थसन्निकर्षनिमित्तं प्रबोधज्ञान- मुत्पद्यते, तत्र न ज्ञातुर्मनसश्च सन्निकर्षस्य प्राधान्यं भवति, किं तर्हि ? इन्द्रि- यार्थयोः सन्निकर्षस्य । न ह्यात्मा जिज्ञासमानः प्रयत्नेन मनस्तदा प्रेरयतीति । एकदा खल्वयं विषयान्तरासक्तमनाः सङ्कल्पवशाद्विषयान्तरं जिज्ञासमानः प्रयत्नप्रेरितेन मनसा इन्द्रियं संयोज्य तद्विषयान्तरं जानीते । यदा तु खल्वस्य निःसङ्कल्पस्य निर्जिज्ञासस्य च व्यासक्तमनसो बाह्यविषयोपनिपातनाज्ज्ञान- मुत्पद्यते तदेन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य प्राधान्यम् । न ह्यत्रासौ जिज्ञासमानः प्रयत्नेन मनः प्रेरयतीति । प्राधान्याच्चेन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य ग्रहणं कार्यम्, गुणत्वाद् नात्ममनसोः सन्निकर्षस्येति ॥ २७ ॥ प्राधान्ये च हेत्वन्तरम्— तैश्चापदेशो ज्ञानविशेषाणाम् ॥ २८ ॥ प्रत्यक्षलक्षण में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का ग्रहण है, आत्ममनःसन्निकर्ष का नहीं । कोई पुरुष 'मैं अमुक समय पुनः जग जाऊँगा'—ऐसा निश्चय करके सो जाता है, तो उस निश्चय के अनुसार जग जाता है । परन्तु जब कोई तीव्र शब्द या किसी वस्तु का स्पर्श जगने में कारण बन जायें तो उस सोये हुए को बीच में इन्द्रियसन्निकर्षहेतुक प्रबोध ज्ञान हो जाता है । उक्त प्रबोध ज्ञान में आत्मा या मन का सन्निकर्ष प्रधान (मुख्य) नहीं हैं; अपितु इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का ही प्राधान्य है; क्योंकि उस समय आत्मा किसी जिज्ञासा से प्रयत्नपूर्वक मन को कोई प्रेरणा नहीं करता । इसी प्रकार कभी आत्मा किसी समय किसी दूसरे विषय में चित्त के आसक्त होने पर भी संकल्पवश अन्य विषय की जिज्ञासा करता हुआ मन को इन्द्रिय से लगा कर विषयान्तर जान लेता है; परन्तु यही निःसङ्कल्प रहे या कोई जिज्ञासा न करे तथा अन्य विषय में आसक्त हो तो उस समय भी बाह्य विषय का जो अकस्मात् ज्ञान होता है— उसमें इन्द्रियार्थसन्निकर्ष ही प्रधान होता है, न कि आत्ममनःसन्निकर्ष; क्योंकि इसमें भी आत्मा कोई प्रयत्न करके मन को प्रेरणा नहीं करता । इस प्रकार उक्त प्रत्यक्षलक्षण में मुख्य होने के कारण इन्द्रियार्थसन्निकर्ष का ही ग्रहण करना चाहिये, न कि गौण आत्ममनःसन्निकर्ष का ॥ २७ ॥ इस इन्द्रियार्थसन्निकर्ष के मुख्य होने में एक और कारण है— ज्ञानविशेषों (चाक्षुष, घ्राणज आदि विभिन्न प्रत्यक्षज्ञानों) का उन्हीं इन्द्रियों से व्यवहार होता है ॥ २८ ॥ CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri