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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages
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३४ राजयोग

दिन बीतता है और रात आती है, इन दो समयो मे प्रकृति अपेक्षाकृत शान्त भाव धारण करती है। ब्राह्ममुहूर्त और गोधूलि ये दो समय मन की स्थिरता के लिए अनुकूल हैं। इन दो समय शरीर बहुत-कुछ शान्तभावापन्न रहता है। इस समय साधना करने से प्रकृति हमारी काफी सहायता करेगी, इसलिए इन्ही दो समयो में साधना करना आवश्यक है। यह नियम बना लो कि साधना समाप्त किए बिना भोजन न करोगे। ऐसा नियम बना लेने पर भूख का प्रबल वेग ही तुम्हारा आलस्य नष्ट कर देगा। भारत-वर्ष मे बालक यही शिक्षा पाते है कि स्नान-पूजा और साधना किए बिना भोजन नही करना चाहिए। कालान्तर मे यह उनके लिए स्वाभाविक हो जाता है, उनकी जब तक स्नान-पूजा और साधना समाप्त नही हो जाती, तब तक उन्हे भूख नही लगती।

तुममे से जिनको सुभीता हो, वे साधना के लिए यदि एक स्वतंत्र कमरा रख सके, तो अच्छा हो। इस कमरे को सोने के काम मे न लाओ। इसे पवित्र रखो। बिना स्नान किए और शरीर-मन को बिना शुद्ध किए इस कमरे मे प्रवेश न करो। इस कमरे मे सदा पुष्प और हृदय को आनन्द देनेवाले चित्र रखो। योगी के लिए ऐसे वातावरण मे रहना बहुत उत्तम है। सुबह और शाम वहाँ धूप और चन्दन-चूर्ण आदि जलाओ। उस कमरे में किसी प्रकार का क्रोध, कलह और अपवित्र चिन्तन न किया जाय। तुम्हारे साथ जिनके भाव मिलते है, केवल उन्ही को उस कमरे मे प्रवेश करने दो। ऐसा करने पर शीघ्र वह कमरा सत्त्वगुण से पूर्ण हो जायगा, यहाँ तक कि, जब किसी प्रकार का दुख या सशय आए अथवा मन चचल हो, तो उस समय उस कमरे मे प्रवेश करते ही तुम्हारा मन शान्त हो जायगा। मन्दिर, गिरजाघर

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साधना के प्राथमिक सोपान ३५

आदि के निर्माण का सच्चा उद्देश्य यही था। अब भी बहुत से मन्दिरो और गिरजाघरो मे यह भाव देखने को मिलता है; परन्तु अधिकतर स्थलो मे लोग इनका उद्देश्य तक भूल गए हैं। चारो ओर पवित्र चिन्तन के परमाणु सदा स्पन्दित होते रहने के कारण वह स्थान पवित्र ज्योति से भरा रहता है। जो इस प्रकार के स्वतन्त्र कमरे की व्यवस्था नही कर सकते, वे जहाँ इच्छा हो वही बैठकर साधना कर सकते है। शरीर को सीधा रखकर बैठो। ससार मे पवित्र चिन्तन का एक स्रोत बहा दो। मन-ही-मन कहो—ससार मे सभी सुखी हो, सभी शान्ति लाभ करे, सभी आनन्द पावे। इस प्रकार पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, चहुँ ओर पवित्र चिन्तन की धारा बहा दो। ऐसा जितना करोगे, उतना ही तुम अपने को अच्छा अनुभव करने लगोगे। बाद मे देखोगे, 'दूसरे सब लोग स्वस्थ हो,' यह चिन्तन ही स्वास्थ्य-लाभ का सहज उपाय है। 'दूसरे लोग सुखी हो,' ऐसी भावना ही अपने को सुखी करने का सहज उपाय है। इसके बाद जो लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं, वे ईश्वर के निकट प्रार्थना करे—अर्थ, स्वास्थ्य अथवा स्वर्ग के लिए नही, वरन् हृदय मे ज्ञान और सत्य-तत्त्व के उन्मेष के लिए। इसके छोड बाकी सब प्रार्थनाएँ स्वार्थ से भरी हैं। इसके बाद भावना करनी होगी 'मेरा शरीर वज्रवत् दृढ़, सबल और स्वस्थ है। यह देह ही मेरी मुक्ति मे एकमात्र सहायक है। इसी की सहायता से मै यह जीवन-समुद्र पार कर लूँगा।' जो दुर्बल है वह कभी मुक्ति नही पा सकता। समस्त दुर्बलताओ का त्याग करो। देह से कहो, 'तुम खूब बलिष्ठ हो।' मन से कहो, 'तुम अनन्त शक्तिधर हो।' और स्वयं पर प्रबल विश्वास और भरोसा रखो।

तृतीय अध्याय

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तृतीय अध्याय

प्राण

बहुतों का विचार है, प्राणायाम श्वास-प्रश्वास की कोई क्रिया है। पर असल में ऐसा नहीं है। वास्तव में तो श्वास-प्रश्वास की क्रिया के साथ इसका बहुत थोड़ा सम्बन्ध है। यथार्थ प्राणायाम की साधना में अधिकारी होने के लिए बहुत से अलग-अलग उपाय हैं। श्वास-प्रश्वास की क्रिया उनमें से एक उपाय मात्र है। प्राणायाम का अर्थ है प्राणों का संयम। भारतीय दार्शनिकों के मतानुसार सारा जगत् दो पदार्थों में निर्मित है। उनमें से एक का नाम है आकाश। यह आकाश एक सर्वव्यापी, सर्वानुस्यूत सत्ता है। जिस किसी वस्तु का आकार है, जो कोई वस्तु कुछ वस्तुओं के मिश्रण से बनी है, वह इस आकाश से ही उत्पन्न हुई है। यह आकाश ही वायु में परिणत होता है, यही तरल पदार्थ का रूप धारण करता है, यही फिर ठोस आकार को प्राप्त होता है यह आकाश ही सूर्य, पृथ्वी, तारा, धूमकेतु

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प्राण ३७

वाष्पीय पदार्थ पुन आकाश मे लय हो जाते है। बाद की सृष्टि फिर से इसी तरह आकाश से उत्पन्न होती है।

किस शक्ति के प्रभाव से आकाश का जगत् के रूप में परिणाम होता है? इस प्राण की शक्ति से। जिस तरह आकाश इस जगत का कारणस्वरूप, अनन्त, सर्वव्यापी मूल पदार्थ है, प्राण भी उसी तरह जगत् की उत्पत्ति की कारणस्वरूपा, अनन्त सर्वव्यापी विक्षेपकरी शक्ति है। कल्प के आदि मे और अन्त में सम्पूर्ण सृष्टि आकाशरूप मे परिणत होती है, और जगत् की सारी शक्तियाँ प्राण में लीन हो जाती है, दूसरे कल्प मे फिर इसी प्राण से समुदय शक्तियों का विकास होता है। यह प्राण ही गति-रूप मे प्रकाशित हुआ है—यही गुरुत्वाकर्षण या चुम्बक-शक्ति के रूप मे प्रकाशित हो रहा है। यह प्राण ही स्नायविक शक्तिप्रवाह (nerve current) के रूप मे, विचार-शक्ति के रूप में और समुदय दैहिक क्रिया के रूप मे प्रकाशित हुआ है। विचार-शक्ति से लेकर अति सामान्य दैहिक शक्ति तक सब कुछ प्राण का ही विकास है। वाह्य और अन्तर्जगत् की समस्त शक्तियाँ जब अपनी मूल अवस्था मे पहुँचती है, तब उसी को प्राण कहते हैं। "जब अस्ति और नास्ति कुछ भी न था, जब तम से तम आवृत था, तब था क्या? * यह आकाश ही गतिशून्य होकर अवस्थित था।" यह ठीक है कि प्राण का किसी प्रकार का प्रकाश न था, परन्तु तब भी प्राण का अस्तित्व था। हम आधुनिक विज्ञान द्वारा भी समझ सकते हैं कि संसार में जितने


* नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्—इत्यादि,
तम आसीत् तमसागूढमग्रेऽप्रकेतम्—इत्यादि।
—ऋग्वेद संहिता, दशम मण्डल।

३८ राजयोग

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३८ राजयोग

प्रकार की शक्तियो का विकास हुआ है, उनकी समष्टि चिरकाल समान रहती है, वे शक्तियाँ कल्प के अन्त मे शान्तभाव धारण करती है—अव्यक्त अवस्था मे गमन करती है, और दूसरे कल्प के आदि मे वे ही फिर से व्यक्त होकर आकाश पर कार्य करती रहती है। इसी आकाश से परिदृश्यमान साकार वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, और आकाश के परिणाम-प्राप्त होने पर यह प्राण भी नाना प्रकार की शक्तियो मे परिणत होता रहता है। इस प्राण के यथार्थ तत्त्व को जानना और उसको सयत करने की चेष्टा करना ही प्राणायाम का प्रकृत अर्थ है।

इस प्राणायाम मे सिद्ध होने पर हमारे लिए मानो अनन्त शक्ति का द्वार खुल जाता है। मान लो, किसी व्यक्ति की समझ मे यह प्राण का विषय पूरी तरह आ गया और वह उस पर विजय प्राप्त करने मे भी कृतकार्य हो गया, तो फिर ससार में ऐसी कौनसी शक्ति है, जो उसके अधिकार मे न आए ? उसकी आज्ञा से चन्द्र-सूर्य अपनी जगह से हिलने लगते है, क्षुद्रतम परमाणु से बृहत्तम सूर्य तक सभी उसके वशीभूत हो जाते है, क्योकि उसने प्राण को जीत लिया है। प्रकृति को वशीभूत करने की शक्ति प्राप्त करना ही प्राणायाम की साधना का लक्ष्य है। जब योगी सिद्ध हो जाते है, तब प्रकृति मे ऐसी कोई वस्तु नही, जो उनके वश मे न आ जाय। यदि वे देवताओ का आह्वान करेगे, तो वे उनकी आज्ञामात्र से आ उपस्थित होगे, यदि मृत व्यक्तियो को आने की आज्ञा देगे, तो वे तुरन्त हाजिर हो जायेंगे। प्रकृति की समुदाय शक्ति उनकी आज्ञा से दासी की तरह काम करने लगेगी। अज्ञ जन योगी के इन कार्यकलापो को अलौकिक समझते है। हिंदुओ का यह एक विशेषत्व है कि वे

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प्राण ३९

जिस किसी तत्त्व की आलोचना करते हैं, पहले उसके भीतर, यथासम्भव, एक साधारण भाव का अनुसन्धान करते हैं, और उसके भीतर जो कुछ विशेष है, उसको बाद में मीमांसा के लिए रख देते हैं। वेद में यह प्रश्न बार-बार पूछा गया है, “कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिद विज्ञात भवति ?”†—ऐसी कौनसी वस्तु है, जिसका ज्ञान होने पर सब कुछ ज्ञात हो जाता है? इस प्रकार, हमारे जितने शास्त्र हैं, जितने दर्शन हैं, सब-के-सब उसी के निर्णय में लगे हुए हैं, जिसके जानने से सब कुछ जाना जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति जगत् का तत्त्व थोडा-थोडा करके जानना चाहे, तो उसे अनन्त समय लग जायगा, क्योकि फिर तो उसे बालू के एक-एक कण तक को भी अलग-अलग रूप से जानना होगा। अत यह स्पष्ट है कि इस प्रकार सब कुछ जानना एक प्रकार से असम्भव है। तब फिर इस प्रकार के ज्ञानलाभ की सम्भावना कहाँ है? एक-एक विषय को अलग-अलग रूप से जानकर मनुष्य के लिए सर्वज्ञ होने की सम्भावना कहाँ है? योगी कहते हैं, इन सब विशिष्ट अभिव्यक्तियों के पीछे एक साधारण सत्ता है। उसको पकड सकने या जान लेने पर सब कुछ जाना जा सकता है। इसी प्रकार, वेदो में सम्पूर्ण जगत् को उस एक अखण्ड निरपेक्ष सत्स्वरूप में पर्यवसित किया है। जिन्होने इस ‘अस्ति’-स्वरूप को पकड़ा है वे ही सम्पूर्ण विश्व को समझ सके हैं। उक्त प्रणाली से ही समस्त शक्तियो को भी इस प्राणरूप साधारण शक्ति में पर्यवसित किया है। अतएव जिन्होने प्राण को पकड़ा है, उन्होने ससार में जितनी आधिभौतिक या आध्यात्मिक शक्तियाँ हैं, सबको पकड़ लिया है। जिन्होने प्राण


† मुण्डक उपनिषद्—१।३

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४० राजयोग

को जीता है, उन्होने अपने मन को ही नही, वरन् सबके मन को भी जीत लिया है। उन्होने अपनी देह और दूसरी जितनी देह हैं, सबको अपने अधीन कर लिया है, क्योकि प्राण ही सारी शक्तियो का मूल है।

किस प्रकार इस प्राण पर विजय पाई जाय, यही प्राणायाम का एकमात्र उद्देश्य है। इस प्राणायाम के सम्बन्ध में जितनी साधनाएँ और उपदेश हैं, सबका यही एक उद्देश्य है। हर एक साधनार्थी को, उसके सबसे समीप जो कुछ है, उसी से साधना शुरू करनी चाहिए—उसके निकट जो कुछ है, उस सब पर विजय पाने की चेष्टा करनी चाहिए। ससार की सारी वस्तुओ मे देह हमारे सबसे निकट है, मन उससे भी निकटतर है। जो प्राण ससार मे सर्वत्र क्रीडा कर रहा है, उसका जो अश इस शरीर और मन को चलाता है, वही अश हमारे सबसे निकट है। यह जो क्षुद्र प्राण-तरग है—जो हमारी शारीरिक और मानसिक शक्तियो के रूप से परिचित है, वह अनन्त प्राण-समुद्र में हमारे सबसे पास की तरग है। यदि हम उस क्षुद्र तरग पर विजय पा ले, तभी हम समस्त प्राण-समुद्र को जीतने की आशा कर सकते हैं। जो योगी इस विषय मे कृतकार्य होते हैं, वे सिद्धि पा लेते हैं, तब कोई भी शक्ति उन पर प्रभुत्व नही जमा सकती। वे एक प्रकार से सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हो जाते हैं। हम सभी देशो मे ऐसे सम्प्रदाय देखते है, जो किसी-न-किसी उपाय से इस प्राण पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा कर रहे है। इसी देश मे (अमेरिका में) हम मन शक्ति से आरोग्य करनेवाले (Mind-healers), विश्वास से आरोग्य करनेवाले (Faith-healers), प्रेततत्त्ववित् (Spiritualists), ईसाई

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प्राण

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'क्रिश्चियनवित् (Christian Scientists)*, वशीकरणविद्यावित् (Hypnotists), आदि अनेक सम्प्रदाय देखते है। यदि हम इन मतो का विशेष रूप से विश्लेषण करे, तो देखेंगे कि इन सब मतो के मूल मे—वे फिर जाने या न जाने—प्राणायाम ही है। उन सब मतो के मूल मे एक ही बात है। वे सब एक ही शक्ति को लेकर कार्य कर रहे हैं, पर हाँ, वे उसके सम्बन्ध मे कुछ जानते नही। उन लोगो ने एकाएक मानो एक शक्ति का आविष्कार कर डाला है, परन्तु उस शक्ति के स्वरूप के सम्बन्ध में बिलकुल अनभिज्ञ है। योगी जिस शक्ति का परिचालन करते है, ये भी बिना जाने-बूझे उसी का परिचालन कर रहे है। वह प्राण की ही शक्ति है।

यह प्राण ही समस्त प्राणियो के भीतर जीवनी-शक्ति के रूप मे विद्यमान है। मनोवृत्ति इसकी सूक्ष्मतम और उच्चतम अभिव्यक्ति है। जिसे हम साधारणत मनोवृत्ति की आख्या देते है, मनोवृत्ति कहने से केवल उसका बोध नही होता। मनो-वृत्ति के अनेक प्रकार हैं। जिसे हम सहज ज्ञान (instinct) अथवा ज्ञानरहित चित्त-वृत्ति अथवा मन की अचेतन भूमि कहते हैं, वह हमारा निम्नतम कार्यक्षेत्र है। मान लो, मुझे एक मच्छड़ ने काटा, तो मेरा हाथ अपने ही आप उसे मारने को उठ जाता है। उसे मारने के लिए हाथ को उठाते-गिराते मुझे कोई विशेष सोच-विचार नही करना पड़ता। यह एक प्रकार की मनोवृत्ति है। शरीर की समस्त ज्ञानरहित प्रतिक्रियाएँ


* टिप्पणी के लिए पृष्ठ २५ देखिए।

४२ राजयोग

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४२ राजयोग

(reflex actions*) इसी श्रेणी की मनोवृत्ति के अन्तर्गत है।* इससे ऊँची एक दूसरी श्रेणी की मनोवृत्ति है, उसे सज्ञान मनोवृत्ति अथवा मन की चेतन भूमि कहते है। हम युक्ति-तर्क करते है, विचार करते है, सब विषयो के दोनो पहलू सोचते है। परन्तु इतने से ही समस्त मनोवृत्तियो की समाप्ति नही हो जाती। हमे मालूम है, युक्ति या विचार बिल्कुल छोटीसी सीमा के अन्दर विचरण करता है। वह हम लोगो को कुछ ही दूर तक ले जा सकता है, इसके आगे उसका और अधिकार नही। जितनी जगह के अन्दर वह चक्कर काटता है, वह बहुत छोटी, बहुत सकीर्ण है। परन्तु हम यह भी देख रहे है कि बहुत से विषय, जो उसके अधिकार के बाहर है, उसके भीतर आ रहे है। पुच्छल तारा जिस प्रकार सौर-जगत् के अधिकार के भीतर न होने पर भी कभी-कभी उसके भीतर आ जाता है और हमे दीख पडता है, उसी प्रकार बहुत से तत्त्व, हमारी युक्ति के अधिकार के बाहर होने पर भी, उसके भीतर आ जाते है। यह अवश्य है कि वे सब तत्त्व इस सीमा के बाहर से आते है, पर विचार-शक्ति इस सीमा को पार नही कर सकती। इस छोटीसी सीमा के भीतर उनके इस अनधिकार प्रवेश का कारण यदि हम खोजना चाहे, तो हमें अवश्य इस सीमा के बाहर जाना होगा। हमारे विचार, हमारी युक्तियाँ वहाँ नही पहुँच सकती। योगियो का कहना है कि यह सज्ञान या चेतन भूमि ही हमारे ज्ञान की चरम सीमा नही है। मन तो पूर्वोक्त दोनो भूमियो से भी उच्चतर भूमि पर विचरण


* बाहर की किसी प्रकार की उत्तेजना से शरीर का कोई यन्त्र, समय-समय पर, ज्ञान की सहायता लिए बिना अपने आप जब काम करता है, तो उस कार्य को reflex action कहते है।

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प्राण ४३

कर सकता है। उस भूमि को हम ज्ञानातीत या पूर्णचेतन भूमि कहते हैं—वही समाधि नामक पूर्ण एकाग्र अवस्था है। जब मन उस अवस्था में उपनीत होता है, तब वह युक्ति-राज्य के परे चला जाता है तथा सहज ज्ञान और युक्ति के अतीत विषयों को प्रत्यक्ष करता है। शरीर की सारी सूक्ष्म से सूक्ष्म शक्तियाँ, जो प्राण की ही विभिन्न अवस्था मात्र हैं, यदि सही रास्ते से परिचालित हों, तो वे मन पर विशेष रूप से कार्य करती हैं, और तब मन भी पहले से ऊँची अवस्था में अर्थात् ज्ञानातीत या पूर्णचेतन भूमि में चला जाता है और वहाँ से कार्य करता रहता है।

बहिर्जगत् हो अथवा अन्तर्जगत्, जिधर भी दृष्टि दौड़ाई जाय, उधर ही एक अखण्ड वस्तुराशि दीख पड़ती है। भौतिक संसार की ओर दृष्टिपात करने पर दिखता है कि एक अखण्ड वस्तु ही मानो नाना रूपों में विराजमान है। वास्तव में, तुममें और सूर्य में कोई भेद नहीं। वैज्ञानिक के पास जाओ, वे तुम्हें समझा देंगे कि वस्तु-वस्तु में भेद केवल काल्पनिक है। इस टेबुल से वास्तव में मेरा कोई भेद नहीं। यह टेबुल अनन्त जड़राशि की मानो एक बूँद है और मैं उसी की एक दूसरी बूँद। प्रत्येक साकार वस्तु इस अनन्त जड़-सागर में मानो एक भँवर है। भँवर सारे समय एकरूप नहीं रहते। मान लो, किसी नदी में लाखों भँवर हैं, प्रत्येक भँवर में प्रति क्षण नई जलराशि आती है, कुछ देर घूमती है और फिर दूसरी ओर चली जाती है। उसके स्थान में एक नई जलराशि आ जाती है। यह जगत् भी इसी प्रकार सतत परिवर्तनशील एक जड़राशि मात्र है और ये सारे रूप उसके भीतर मानो छोटे-छोटे भँवर हैं। कोई भूत-समष्टि किसी मनुष्य-देहरूपी भँवर में घुसती है, और वहाँ कुछ

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-४४ राजयोग

काल तक चक्कर काटने के बाद वह बदल जाती है और एक दूसरी भँवर में—किसी पशु-देहरूपी भँवर मे—प्रवेश करती है। फिर वहाँ कुछ वर्ष तक घूमती रहने के बाद, हो तो इस वार खनिज पदार्थ नामक भँवर में चली जाती है। बस, सतत परिवर्तन होता रहता है। कोई भी वस्तु स्थिर नही। मेरा शरीर, तुम्हारा शरीर नामक वास्तव मे कोई वस्तु नही। वैसा कहना केवल मुख की बात है। है केवल एक अखण्ड जडराशि। उसी के किसी विन्दु का नाम है चन्द्र, किसी का सूर्य, किसी का मनुष्य, किसी का पृथ्वी, कोई विन्दु उद्भिद् है, तो कोई खनिज पदार्थ। इनमे से कोई भी सदा एक भाव से नही रहता, सभी वस्तुओ का सतत परिवर्तन हो रहा है, जड का एक बार संश्लेषण होता है, फिर विश्लेषण। अन्तर्जगत् के सम्बन्ध में भी ठीक यही बात है। ससार की समस्त वस्तुएँ 'ईथर' (आकाश-तत्त्व) से उत्पन्न हुई हैं, अतएव इसको हम सारी जड वस्तुओ के प्रतिनिधि के रूप मे ग्रहण कर सकते हैं। प्राण की सूक्ष्मतर स्पन्दनशील अवस्था में इस ईथर को मन का भी प्रतिनिधिस्वरूप कहा जा सकता है। अतएव सम्पूर्ण मनोजगत् भी एक अखण्डस्वरूप है। जो अपने मन में यह अति सूक्ष्म कम्पन उत्पन्न कर सकते हैं, वे देखते हैं कि सारा जगत् सूक्ष्मातिसूक्ष्म कम्पनो की समष्टि मात्र है। किसी-किसी औषध में हमको इस सूक्ष्म अवस्था मे पहुँचा देने की शक्ति रहती है, यद्यपि उस समय हम इन्द्रिय-राज्य के भीतर ही रहते हैं। तुममे से बहुतो को सर हम्फ्री डेवी के प्रसिद्ध प्रयोग की बात याद होगी। हास्योत्पादक वाष्प (Laughing Gas) ने जब उनको अभिभूत कर लिया, तब वे स्तब्ध और नि स्पन्द होकर खडे रहे। कुछ देर बाद जब होश आया, तो बोले, 'सारा

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प्राण ४५.

जगत् भावराशि की समष्टि मात्र है।' कुछ समय के लिए सारे स्थूल कम्पन (gross vibrations) चले गए थे और केवल सूक्ष्म कम्पन, जिनको उन्होने भावराशि कहा था, बच रहे थे। उन्होने चारो ओर केवल सूक्ष्म कम्पन देखे थे। सम्पूर्ण जगत् उनकी आँखो मे मानो एक महान् भाव-समुद्र मे परिणत हो गया था। उस महासमुद्र मे वे और जगत् की प्रत्येक व्यष्टि मानो एक-एक छोटा भाव-भँवर बन गई थी।

इस प्रकार हम देखते है कि अन्तर्जगत् मे भी एक अखण्ड भाव विद्यमान है। और अन्त मे जब हम वाह्य, अन्तर—सम्पूर्ण जगत् को छोडकर उस आत्मा के समीप जाते है तब वहाँ एक अखण्ड के अतिरिक्त और कुछ नही अनुभव करते। स्थूल और सूक्ष्म सब प्रकार की गतियो के पीछे वही एक अखण्ड सत्ता अपनी महिमा में विराजमान है। यहाँ तक कि इन परिदृश्यमान गतियो के भीतर भी—शक्ति की स्थूल अभिव्यक्तियो के भीतर भी—केवल एक अखण्ड भाव विद्यमान है। इन सत्यो को अब अस्वीकार नही किया जा सकता, क्योकि ये सब विज्ञान द्वारा प्रमाणित हो चुके है। आधुनिक पदार्थविज्ञान ने यह प्रमाणित कर दिया है कि शक्ति-समष्टि सर्वत्र समान है और यह भी सिद्ध हो चुका है कि यह शक्ति-समष्टि दो तरह से अवस्थित है—कभी स्तिमित या अव्यक्त अवस्था मे और कभी व्यक्त अवस्था मे। व्यक्त अवस्था में वह इन नानाविध शक्तियो के रूप धारण करती है। इस प्रकार वह अनन्त काल से कभी व्यक्त और कभी अव्यक्त भाव धारण करती आ रही है। इस शक्तिरूपी प्राण के सयम का नाम ही प्राणायाम है।

इस प्राणायाम के साथ श्वास-प्रश्वास की क्रिया का सम्बन्ध

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४६ राजयोग

बहुत थोडा है। यथार्थ प्राणायाम का अधिकारी होने मे यह श्वास प्रश्वास की क्रिया एक उपाय मात्र है। मनुष्य-देह मे प्राण का सबसे स्पष्ट प्रकाश है—फेफडे की गति। यदि यह गति रुक जाय, तो देह की सारी क्रियाएँ तुरन्त बन्द हो जायेंगी, शरीर के भीतर जो अन्यान्य शक्तियाँ कार्य कर रही थी, वे भी शान्त भाव धारण कर लेगी। पर ऐसे भी व्यक्ति हैं, जो अपने को इस प्रकार शिक्षित कर लेते हैं कि उनके फेफडे की गति रुक जाने पर भी उनका शरीर नही जाता। ऐसे बहुत से व्यक्ति हैं, जो बिना सांस लिए कई महीने तक जमीन के अन्दर गडे रह सकते हैं, पर तो भी उनका देह-नाश नही होता। सूक्ष्मतर शक्ति के पास जाने के लिए हमें स्थूलतर शक्ति की सहायता लेनी पडती है। इस प्रकार क्रमश सूक्ष्म से सूक्ष्मतर शक्ति मे जाते हुए अन्त में हम चरम लक्ष्य पर पहुँच जाते है। शरीर मे जितने प्रकार की क्रियाएँ है, उनमे फेफडे की क्रिया ही सबसे सहज रूप से प्रत्यक्ष है। वह मानो देह के भीतर गतिनियामक चक्र के रूप मे अन्य सब शक्तियो को चला रही है। प्राणायाम का यथार्थ अर्थ है—फेफड़े की इस गति का रोध करना। इस गति के साथ श्वास का निकट सम्बन्ध है। यह गति श्वास-प्रश्वास द्वारा उत्पन्न नहीं होती, वरन् वही श्वास-प्रश्वास की गति को उत्पन्न कर रही है। यह गति ही, पम्प की भाँति, वायु को भीतर खीचती है। प्राण इस फेफडे को चलाता है और फेफडे की यह गति फिर वायु को खींचती है। इस तरह यह स्पष्ट है कि प्राणायाम श्वास-प्रश्वास की क्रिया नही है। पेशियो की जो शक्ति फेफड़े को चलाती है, उसको वश मे लाना ही प्राणायाम है। जो शक्ति स्नायुओं के भीतर से मांसपेशियो के पास जाती है और जो फेफड़े का

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प्राण ४७

संचालन करती है, वही प्राण है। प्राणायाम की साधना मे हमे उसी को वश मे लाना है। जब प्राण पर विजय प्राप्त हो जायगी, तब हम देखेंगे कि शरीरस्थ प्राण की अन्यान्य सभी क्रियाएँ हमारे अधिकार मे आ गई है। मैने स्वय ऐसे व्यक्ति देखे है, जिन्होने अपने शरीर की सारी पेशियो को वंशीभूत कर लिया है अर्थात् वे उनको इच्छानुसार चला सकते है। और वे ऐसा कर भी क्यो न सकेगे ? यदि कुछ पेशियाँ हमारी इच्छा के अनुसार चलाई जा सकती हो, तो दूसरी सब पेशियो और स्नायुओ को हम इच्छानुसार क्यो न चला सकेगे ? इसमे असम्भव क्या है ? कभी हमारी इस सयम-शक्ति का लोप हो गया है, और वे पेशियाँ इच्छानुग न हो स्वैर हो गई हैं। हम इच्छानुसार कानो को नही हिला सकते, परन्तु हम जानते है कि पशुओ मे यह शक्ति है। हममे यह शक्ति इसलिए नही है कि हम इसे काम मे नही लाते। इसी को क्रम-अवनति अथवा पूर्वावस्था की ओर पुनरावर्तन (atavism) कहते है।

फिर, हम यह भी जानते है कि जिस शक्ति ने अभी अव्यक्त भाव धारण किया है, उसे हम फिर से व्यक्तावस्था में ला सकते हैं। दृढ अभ्यास के द्वारा शरीर की अनेक क्रियाएँ, जो अभी हमारी इच्छा के अधीन नही, फिर से पूरी तरह वश मे लाई जा सकती है। इस प्रकार विचार करने पर दीख पडता है कि शरीर का प्रत्येक अश हम पूरी तरह अपनी इच्छा के अधीन कर सकते हैं, इसमें कुछ भी असम्भव नही, बल्कि यह तो पूर्णरूपेण सम्भव है। योगी प्राणायाम द्वारा इसमे कृतकार्य होते हैं। तुम लोगो ने योगशास्त्र के बहुत से ग्रन्थो मे लिखा देखा होगा कि श्वास लेने के समय सम्पूर्ण शरीर को प्राण से पूर्ण

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४८ राजयोग

कर लो। अँगरेजी अनुवाद मे प्राण शब्द का अर्थ किया गया है श्वास। इससे तुम्हे सहज ही सन्देह हो सकता है कि श्वास से सम्पूर्ण शरीर को कैसे पूरा किया जाय। वास्तव मे यह अनुवादक का दोष है। देह के सारे अगो को प्राण अर्थात् इस जीवनी-शक्ति द्वारा भरा जा सकता है, और जब तुम इससे कृतकार्य होगे, तो सम्पूर्ण शरीर तुम्हारे वश हो जायगा, देह की समस्त व्याधियां, सारे दुख तुम्हारी इच्छा के अधीन हो जायेंगे। इतना ही नही, दूसरे के शरीर पर भी अधिकार जमाने मे तुम कृतकार्य हो जाओगे। ससार मे भला-बुरा जो कुछ है, सभी सक्रामक है। यदि तुम्हारा शरीर किसी विशेष अवस्था में हो, तो उसकी प्रवृत्ति दूसरो में भी वही अवस्था उत्पन्न करने की होगी। यदि तुम सबल और स्वस्थकाय रहो, तो तुम्हारे समीपवर्ती व्यक्तियों में भी मानो कुछ स्वस्थ भाव, कुछ सबल भाव आयगा। और यदि तुम रुग्ण और दुर्बल रहो, तो देखोगे, तुम्हारे निकटवर्ती दूसरे व्यक्ति भी मानो कुछ रुग्ण और दुर्बल हो रहे है। तुम्हारी देह का कम्पन मानो दूसरे के भीतर सचारित हो जायगा। जब एक व्यक्ति दूसरे को रोगमुक्त करने की चेष्टा करता है, तब उसका पहला प्रयत्न यह होता है कि उसका स्वास्थ्य दूसरे में सचारित हो जाय। यही आदिम चिकित्साप्रणाली है। ज्ञातभाव से हो या अज्ञातभाव से, एक व्यक्ति दूसरे की देह में स्वास्थ्य सचार कर दे सकता है। यदि एक बहुत बलवान व्यक्ति किसी दुर्बल व्यक्ति के साथ सदैव रहे, तो वह दुर्बल व्यक्ति कुछ अंशों में अवश्य सबल हो जायगा। यह बल-सचारण-क्रिया ज्ञातभाव से हो सकती है तथा अज्ञातभाव मे भी। जब यह क्रिया ज्ञात-भाव से की जाती है, तब इसका कार्य और भी शीघ्र तथा

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प्राण ४९

उत्तम रूप से होता है। एक और दूसरे प्रकार की भी आरोग्य-प्रणाली है, जिसमें आरोग्यकारी स्वयं बहुत स्वस्थकाय न होने पर भी दूसरे के शरीर मे स्वास्थ्य का संचार कर दे सकता है। इन स्थलो में उस आरोग्यकारी व्यक्ति को कुछ परिमाण में प्राणजयी समझना चाहिए। वह कुछ समय के लिए अपने प्राण मे मानो एक विशेष कम्पन उत्पन्न करके दूसरे के शरीर में उसका सञ्चार कर देता है।

अनेक स्थलो मे यह कार्य बहुत दूरसे भी साधित हुआ है। यदि सचमुच में दूरत्व का अर्थ क्रमविच्छेद ( Break ) हो, तो दूरत्व नामक कोई चीज नही। ऐसा दूरत्व कहाँ है, जहाँ परस्पर कुछ भी सम्बन्ध, कुछ भी योग नही ? सूर्य मे और तुममें क्या वास्तविक कोई क्रमविच्छेद है ? नही, यह तो समस्त एक अविच्छिन्न अखण्ड वस्तु है, तुम उसके एक अश हो और सूर्य उसका एक दूसरा अश। नदी के एक भाग और दूसरे भाग मे क्या क्रम-विच्छेद है ? तो फिर शक्ति भी एक जगह से दूसरी जगह क्यों न भ्रमण कर सकेगी ? इसके विरोध मे तो कोई युक्ति नही दी जा सकती। दूर से आरोग्य करने की घटनाएँ बिलकुल सत्य हैं। इस प्राण को बहुत दूर तक सचालित किया जा सकता है। पर हाँ, इसमे धोखेबाजी बहुत है। यदि इसमे एक घटना सत्य हो, तो अन्य सैकड़ो असत्य और छल-कपट के अतिरिक्त और कुछ नही। लोग इसे जितना सहज समझते है, यह उतना सहज नही। अधिकतर स्थलो में तो देखोगे कि आरोग्य करनेवाले चगा करने के लिए मानव-देह की स्वाभाविक स्वस्थता की ही सहायता लेते हैं। एक ऐलोपैथ चिकित्सक आता है, हैजे के रोगियो की चिकित्सा करता है और उन्हे दवा देता है; एक होमियोपैथ चिकित्सक

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५० राजयोग

आता है, वह भी रोगियो को अपनी दवा देता है और शायद लोपैथ की अपेक्षा अधिक रोगियो को चगा कर देता है। ऐसा क्यो? इसलिए कि वह रोगी के शरीर मे किसी तरह का विपर्यय न लाकर प्रकृति को अपनी चाल से काम करने देता है। और विश्वास के बल से आरोग्य करनेवाला तो और भी अधिक रोगियो को चगा कर देता है, क्योकि वह अपनी इच्छाशक्ति द्वारा कार्य करके विश्वास-बल से रोगी की प्रसुप्त प्राण-शक्ति को प्रबुद्ध कर देता है।

परन्तु विश्वास-बल से रोगो को अच्छा करनेवालो को सदा एक भ्रम हुआ करता है, वे सोचते है कि साक्षात् विश्वास ही लोगो को रोगमुक्त करता है। वास्तव मे यह नही कहा जा सकता कि केवल विश्वास इसका कारण है। ऐसे भी रोग है, जिसमें रोगी स्वय नही समझ पाता कि उसके कोई रोग है। रोगी का अपनी नीरोगता पर अतीव विश्वास ही रोग का एक प्रधान लक्षण है, और इससे आसन्नमृत्यु की सूचना होती है। इन सब स्थलो मे केवल विश्वास से रोग नही टलता। यदि विश्वास ही रोग की जड काटता हो, तो वे रोगी मौत के मुँह न गए होते। वास्तव में रोग तो इस प्राण की शक्ति से ही दूर होता है। प्राण-जित् पवित्रात्मा पुरुष अपने प्राण को एक निर्दिष्ट कम्पन मे ले जा सकते है और उसे दूसरे मे सञ्चारित करके, उसके भीतर भी उसी प्रकार का कम्पन पैदा कर सकते हैं। तुम प्रतिदिन की घटना से यह प्रमाण ले सकते हो। मै वक्तृता दे रहा हूँ। वक्तृता देते समय मै क्या कर रहा हूँ? मै अपने मन के भीतर मानो एक विशिष्ट कम्पन पैदा कर रहा हूँ। और मै इस विषय में जितना ही कृतकार्य होऊँगा, तुम मेरी बात सुनकर उतने ही प्रभावित

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५० राजयोग

आता है, वह भी रोगियों को अपनी दवा देता है और शायद लोगों की अपेक्षा अधिक रोगियों को चंगा कर देता है। ऐसा क्यों? इसलिए कि वह रोगी के शरीर में किसी तरह का विपर्यय ऐन लाकर प्रकृति को अपनी चाल से काम करने देता है। और विश्वास के बल से आरोग्य करनेवाला तो और भी अधिक रोगियों को चंगा कर देता है, क्योंकि वह अपनी इच्छाशक्ति द्वारा कार्य करके विश्वास-बल से रोगी की प्रसुप्त प्राण-शक्ति को प्रबुद्ध कर देता है।

परन्तु विश्वास-बल से रोगों को अच्छा करनेवालों को सदा एक भ्रम हुआ करता है, वे सोचते हैं कि साक्षात् विश्वास ही लोगों को रोगमुक्त करता है। वास्तव में यह नहीं कहा जा सकता कि केवल विश्वास इसका कारण है। ऐसे भी रोग हैं, जिसमें रोगी स्वयं नहीं समझ पाता कि उसके कोई रोग है। रोगी का अपनी नीरोगता पर अतीव विश्वास ही रोग का एक प्रधान लक्षण है, और इससे आसन्नमृत्यु की सूचना होती है। इन सब स्थलों में केवल विश्वास से रोग नहीं टलता। यदि विश्वास ही रोग की जड़ काटता हो, तो वे रोगी मौत के मुँह न गए होते। वास्तव में रोग तो इस प्राण की शक्ति से ही दूर होता है। प्राण-जित् पवित्रात्मा पुरुष अपने प्राण को एक निर्दिष्ट कम्पन में ले जा सकते हैं और उसे दूसरे में संचारित करके, उसके भीतर भी उसी प्रकार का कम्पन पैदा कर सकते हैं। तुम प्रतिदिन की घटना से यह प्रमाण ले सकते हो। मैं वक्तृता दे रहा हूँ। वक्तृता देते समय मैं क्या कर रहा हूँ? मैं अपने मन के भीतर मानो एक विशिष्ट कम्पन पैदा कर रहा हूँ। और मैं इस विषय में जितना ही कृतकार्य होऊँगा, तुम मेरी बात सुनकर उतने ही प्रभावित

५० राजयोग

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५० राजयोग

आता है, यह भी रोगियों को अपनी दवा देता है और शायद लोपैथ की अपेक्षा अधिक रोगियों को चंगा कर देता है। ऐसा क्यो ? इसलिए कि वह रोगी के शरीर मे किसी तरह का विपर्यय ऐन लाकर प्रकृति को अपनी चाल से काम करने देता है। और विश्वास के बल से आरोग्य करनेवाला तो और भी अधिक रोगियों को चंगा कर देता है, क्योकि वह अपनी इच्छाशक्ति द्वारा कार्य करके विश्वास-बल से रोगी की प्रसुप्त प्राण-शक्ति को प्रबुद्ध कर देता है।

परन्तु विश्वास-बल से रोगो को अच्छा करनेवालो को सदा एक भ्रम हुआ करता है, वे सोचते है कि साक्षात् विश्वास ही लोगो को रोगमुक्त करता है। वास्तव मे यह नही कहा जा सकता कि केवल विश्वास इसका कारण है। ऐसे भी रोग है, जिसमे रोगी स्वय नही समझ पाता कि उसके कोई रोग है। रोगी का अपनी नीरोगता पर अतीव विश्वास ही रोग का एक प्रधान लक्षण है, और इससे आसन्नमृत्यु की सूचना होती है। इन सब स्थलो मे केवल विश्वास से रोग नही टलता। यदि विश्वास ही रोग की जड काटता हो, तो वे रोगी मौत के मुँह न गए होते। वास्तव में रोग तो इस प्राण की शक्ति से ही दूर होता है। प्राण-जित् पवित्रात्मा पुरुष अपने प्राण को एक निर्दिष्ट कम्पन मे ले जा सकते है और उसे दूसरे में सचारित करके, उसके भीतर भी उसी प्रकार का कम्पन पैदा कर सकते है। तुम प्रतिदिन की घटना से यह प्रमाण ले सकते हो। मै वक्तृता दे रहा हूँ। वक्तृता देते समय मै क्या कर रहा हूँ? मैं अपने मन के भीतर मानो एक विशिष्ट कम्पन पैदा कर रहा हूँ। और मै इस विषय मे जितना ही कृतकार्य होऊँगा, तुम मेरी बात सुनकर उतने ही प्रभावित

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प्राण ५१

होगे। तुम लोगो को मालूम है, वक्तृता देते-देते मे जिस दिन मस्त हो जाता हूँ, उस दिन मेरी वक्तृता तुमको बहुत अच्छी लगती है, पर जब कभी मेरी उत्तेजना घट जाती है, तो तुम्हें मेरी वक्तृता मे उतना आनन्द नही मिलता।

जगत् को हिला-डुला देनेवाले तीव्र इच्छाशक्तिसम्पन्न महापुरुष अपने प्राण मे बहुत ऊँचा कम्पन उत्पन्न करके उस प्राण के वेग को इतना अधिक कर सकते है और उसको इतनी शक्ति से युक्त कर सकते है कि वह दूसरे को पल भर मे लपेट लेती है, हजारो मनुष्य उनकी ओर खिच जाते है और ससार के आधे लोग उनके भाव से परिचालित हो जाते है। जगत् मे जितने महापुरुष हुए है, सभी प्राणजित् थे। इस प्राण-सयम के बल से वे प्रबल इच्छाशक्तिसम्पन्न हो गए थे। वे अपने प्राण के भीतर अति उच्च कम्पन पैदा कर सकते थे, और उसी से उन्हे समस्त ससार पर प्रभाव विस्तार करने की क्षमता प्राप्त हुई थी। ससार मे तेज या शक्ति के जितने विकास देखे जाते है, सभी प्राण के संयम से उत्पन्न होते है। मनुष्य को यह तथ्य भले ही मालूम न हो, पर और किसी तरह इसकी व्याख्या नही हो सकती। तुम्हारे शरीर मे यह प्राण कभी एक ओर अधिक और दूसरी ओर कम हो जाता है। प्राण के इस प्रकार असामजस्य से ही रोग की उत्पत्ति होती है। अतिरिक्त प्राण को हटाकर, जहाँ प्राण का अभाव है, वहाँ का अभाव भर सकने से ही रोग अच्छा हो जाता है। प्राण कहाँ अधिक है और कहाँ अल्प, इसका ज्ञान प्राप्त करना भी प्राणायाम का अग है। अनुभव-शक्ति इतनी सूक्ष्म हो जायगी कि मन समझ जायगा, पैर के अँगूठे मे या हाथ की उँगली मे जितना प्राण आवश्यक है, उतना वहाँ नही है, और मन उस