झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
by वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध
प्रारंभिक पृष्ठ एवं भूमिका
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झांसी की रानी—लक्ष्मीबाई ( ऐतिहासिक उपन्यास ) वृन्दावनलाल वर्मा ( लेखक—मृगनयनी, माधव जी सिन्धिया, अचल मेरा कोई, कचनार, हंस-मयूर, मुसाहिबजू, लगन, बिराटा की पद्मिनी, सोना, सङ्गम, प्रेम की भेंट, गढकुण्डार, अमरबेल, टूटे कांटे, राखी की लाज, पूर्व की ओर आदि ) मयूर प्रकाशन झांसी दिल्ली
प्रकाशक— सत्यदेव वर्मा बी. ए., एल-एल.बी. मयूर-प्रकाशन, झाँसी षष्ठमावृत्ति १६५६ अनुवाद, पुनर्मुद्रण सम्बन्धी अधिकार प्रकाशक के अधीन हैं तथा चित्रपट-निर्माण आदि के अधिकार लेखक को हैं । मूल्य-छः रुपया मुद्रक— स्वाधीन प्रेस, झांसी ।
क्रमांक 13445...
परिचय
दीवान आनन्दराय मेरे परदादा थे। रानी लक्ष्मीबाई की ओर से लड़ते लड़ते सन् १८५८ में मऊ की लड़ाई में मारे गये थे। जब मेरी पर- दादी का देहान्त हुआ, मैं आठ-दस वर्ष का था। तब परदादी से रानी के विषय में बहुत सी कहानियां सुना करता था। उन्होंने रानी को देखा था। उन कहानियो की धरोहर मेरी दादी के पास रही। वह समय-समय पर उनसे मुझको मिलती रही। जब दादी का देहान्त हुआ, मुझको वकालत आरम्भ किये छः वर्ष के लगभग हो चुके थे। वह धरोहर अद्भुत होते हुये भी अस्पष्ट थी और उसकी रूपरेखा धुंघली, तथा सत्य के आधार पर कम और भक्ति के ऊपर अधिक। इधर इतिहास के अध्ययन और तथ्य के अनुशीलन ने उस धरोहर के मूल्य को कम कर दिया। सामने केवल पारसनीस की पुस्तक 'रानी लक्ष्मीबाई का जीवन चरित्र' थी। वह इतिहास का कङ्काल मात्र न थी, परन्तु दादी-परदादी की बतलाई हुई परम्परा के विरुद्ध थी। पारसनीस के अन्वेषण काफी मूल्यवान होते हुये भी उनका विचार कि रानी झांसी का प्रबन्ध अङ्गरेजो की ओर से 'गदर' के जमाने में करती रही, परदादी और दादी की बतलाई हुई परम्पराओं के सामने मन में खपता नही था। तो भी मैं सोचता था, शायद ये परम्पराये जनता के इच्छा—संकल्पो (wishful thinking) का फल है, इसलिये छुटपन, से जिस मूर्ति की मन में निष्ठापूर्वक पूजा करता चला आ रहा था, उसके प्रति कुछ नास्तिकता उत्पन्न हो गई। सुनता रहता था कि रानी स्वराज्य के लिये लड़ी थी, पारसनीस के ग्रन्थ मे पढा कि उनका शौर्य विवशता की परिस्थिति में उत्पन्न हुआ था ! मैं जब वोर्डिंग हाऊस के जीवन में था, एक रात स्वप्न देखा कि हॉकी- ग्राउन्ड पर युद्ध हो रहा है और मैं रानी की तरफ से, 'स्वराज्य' के लिये लड़ता हुआ घायल हो गया हूँ, तब जागने पर बड़ा अचम्भा हुआ, क्योकि खेल में उस दिन हॉकी का डण्डा भी नही खाया था। यह स्वप्न भी मुझको प्राय दिक किया करता था।
[ ३ ] थानेदार थे। इनसे मुझको रानी के विषय में बहुत बातें मालूम हुईं - दादी परदादी की परम्पराओ की पोषक ' और अङ्गरेजो के दरोगा से " उन्ही दिनो झासी मे एक बुड्ढा और मिला। नाम अजीमुल्ला। यह रानी के विषय मे तुराबअली की अपेक्षा कही अधिक बातें जानता था। इसने रानी को देखा था, परन्तु वह उस समय छोटा था। तुराबअली ने' तो रानी को सैकडो ही बार देखा था। इसके उपरान्त मैने झाली के बुड्ढे-बुढियो को परेशान करना शुरू कर दिया। परन्तु वे जिस उत्साह और भक्ति के साथ रानी की बाते बतलाते थे उससे मै यह सोचता हू कि वे परेशान न हुये होगे। सवाल था रानी स्वराज्य के लिये लडी, या अङ्गरेजो की ओर से झासी ' का शासन करते करते उनको जनरल रोज से विवश होकर लडना पडा ? ' रानी ने बानपूर के राजा मर्दनसिंह को जो चिट्ठी युद्ध मे सहायता करने के लिये लिखी थी उसमें 'स्वराज्य' का शब्द आया है। यह चिट्ठी इस प्रश्न का सदा के लिये स्पष्ट उत्तर देती है। खेद है कि मै इस सस्करण में भी उस चिट्ठी का चित्र न दे सका-बानपूर के राजा के वशज ने वह चिट्ठी या उसका फोटो मेरे हवाले नही किया, परन्तु अगले सस्करण में दे सकने की मुझको आशा है। राजा गङ्गाधरराव का हस्ताक्षर मुझको राजा साहब कटेरा ने अपनी एक सनद दिखला कर सुलभ कर दिया। कृतज्ञ हू। सनद की नकल भी मेरे पास है। उस समय, ६५ वर्ष पहले लगभग आज ही की तरह की हिन्दी लिखी जाती थी, इस सनद से पता लगता है। मराठी में विष्णुराव गोडशे का 'माझा प्रवास' एक छोटा सा प्रबन्ध है। गोडशे रानी के साथ किले में था, जब रोज के मुकाबले में रानी लडी। मैने अपनी पुस्तक में माझा प्रवास का भी उपयोग किया है। मोतीबाई ऐतिहासिक है। मुझको उसका पता अकस्मात ही चला। ओर्छे दरवाजे एक मसजिद है। जिमीन का झगडा कचहरी में चला। मै मसजिद वालो की तरफ से वकील था। जिमीन का खेवट झासी में न था। ग्वालियर मे था। वहा से नकल मँगवाई। उसमें ज़मीन की पूर्व
[ २ ] सन् १६३२ तक यह उथल-पुथल अर्द्ध सुपुप्त रूप में मन के किसी कोने में पड़ी रही । एक दिन एक साहब ने कहा, 'जजी कचहरी की एक अलमारी में चालीस-पचास चिट्ठियाँ रखी हुई हैं जो १८५८ में किसी अङ्गरेज फौजी अफ़सर ने लै० गवर्नर के पास झाँसी को अधिकृत करने के बाद रोज़- रोज़ भेजी थी । मैने उन चिट्ठियो की नकल करवाई । उनमें कोई खास बात तो नही मिली, परन्तु एक विश्वास जगह करने लगा—रानी का शौर्य विवशता की परिस्थिन में उत्पन्न नही हुआ था । कचहरी में नवाब बन्ने नाम के एक अर्ज़ीनवीस काम करते थे । वह मुझको प्राय: रोज़ ही कचहरी मे मिलते थे । वह राजा रघुनाथराव के लड़के नवाब अलीबहादुर की लड़की के लड़के निकले ! मैने सोचा, शायद इनके पास रानी सम्बन्धी कोई सामग्री हो । पूछने पर उन्होने बतलाया कि नवाब अलीबहादुर का रोज़नामचा इत्यादि घर पर रखे हैं । मै उत्सुकता के मारे परेशान हो गया । रोज़नामचा देखने को मिला । उसको मैने पढ़वाया । नवाब अलीबहादुर कैसे थे और उनका नौकर पीरअली किस तरह का आदमी था यह तो उनके रोज़नामचे से प्रकट होता ही था, परन्तु रानी लक्ष्मीबाई की विलक्षणता और तत्कालीन समाज की प्रगति और रहन-सहन का भी उससे पता चला । रोज़नामचा दीमक के हमलो से जर्जर हो चुका था, और अब तो, उसके शुरू का भाग नष्ट ही हो गया है, परन्तु मैने नोट ले लिये । १८५८ में नवाब अलीबहादुर ने अपनी राजभक्ति के प्रमाण में कुछ बयान दिये थे । उन बयानो में पीरअली का भी ज़िकिर किया था । वे बयान भी मुझको मिल गये । इससे बढकर, मुझको एक व्यक्ति मिले—मु० तुराबअली दरोगा । ये, ८, १० वर्ष हुये तब परलोक गामी हुये ११५ वर्ष की आयु में । 'गदर' के जमाने में तुराबअली साहब अङ्गरेजो की ओर से पुलिस के
[ ४ ] स्वामिनी निकली मोतीबाई नाटकशाला वाली । गंगाधरराव को नाटक खेलने और खिलवाने का बहुत शौक था । स्त्रियो का अभिनय स्त्रिया ही करती थी । इनमें मोतीबाई भी थी । मोतीबाई का पता लगाते लगाते जूही, दुर्गा और मुगलखा भी निगाह में आये । इन सबके सम्बन्ध की घटनाओ का सार सच्चा है । सन् १६३२ से मै इन अनुसन्धानो मे लगा । एक दिन रानी लक्ष्मीबाई के भतीजे मुझको झांसी में घर पर ही मिले। वे रानी के ऊपर हिन्दी मे कुछ लिखना चाहते थे । रानी क्यो लड़ी, इस समस्या पर हम दोनो एक मत थे । फिर एक दिन डाक्टर सावरकर के एक सेक्रेटरी मुझको झांसी में ही मिले । वे मराठी में ‘सत्तावनी’ लिख रहे थे । रानी के सम्बन्ध की जो सामग्री उनके ग्रन्थ के लिए आवश्यक थी, मैंने दी । मै सोचता था कि रानी के विषय में बहुत लोगो ने कुछ न कुछ लिखा है और लिख रहे हैं, मै क्यो कुछ और प्रयत्न करू ? कुछ दिनो बाद मेरी यह धारणा बदल गई । कलक्टरी में कुछ सामग्री मिली । १८५८ मे लोगो के बयान लिये गये थे । इनको मैंने पढा । इनको पढकर मै अपने विश्वास में और दृढ हुआ—रानी ‘स्वराज्य’ के लिये लडी थी । मेरा वह स्वप्न जिसकी भूमिका होकी ग्राउण्ड पर थी, फिर ताजा हुआ । मैंने निश्चय किया कि उपन्यास लिखूगा, ऐसा जो इतिहास के रग-रेशे से सम्मत हो और उसके सदंर्भ में हो । इतिहास के ककाल में मास और रक्त का सचार करने के लिये मुझको उपन्यास ही अच्छा साधन प्रतीत हुआ । उस साधन को मैने जो कुछ रूप दे पाया है वह पाठको के सामने है । यदि आनन्दराव ने रानी के लिये गोली खाई और मेरी कलम ने थोडी सी स्याही—तो इस अन्तर को पाठक अवश्य ध्यान में रखने की कृपा करे । वृन्दावनलाल वर्मा
कृतज्ञता-ज्ञापन
कठिन परिस्थितियो में इस पुस्तक की छपाई हुई । टाईप ढालने वालो ने बेहद परेशान किया । फिर कागज वालो का नम्बर आया । इन सब हैरानियो से किसी प्रकार पार पा लिया । मैं अपने कम्पोजिटरो, प्रेस मैन, और अन्य कर्मचारियो को किन शब्दो में धन्यवाद दूॅ ? मुझे उनकी लगन को देखकर विस्मय होता था । पर वे अपनी रानी के सम्बन्ध की पुस्तक तैयार कर रहे थे । कभी कभी तो रो तक देते थे । मेरे पुत्र चिः सत्यदेव ने जो अथक परिश्रम, अपने थोडे से साधनो के प्रश्रय से किया है उसके लिये क्या कहू । नया रिवाज धन्यवाद का है, परन्तु हम दोनो ज़रा पुरानी संस्कृति में सने हैं, इसलिये उसकी पीठ पर केवल हाथ फेरता हूँ । श्री कालीचरण वर्मा झाँसी के होनहार चित्रकार हैं । रानी के युद्ध का उन्होने जो चित्र दिया है उस पर बहुत परिश्रम किया है । मै कृतज्ञ हूँ । हम दोनो झाँसी के हैं और वह मुझसे आयु में छोटे हैं, इसलिये वे नही चाहते कि कुछ और लिखूं । झाँसी } २४ अक्टूबर, १६४६ } वृन्दावनलाल वर्मा
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प्रस्तावना
[ १ ] ईस्ट इण्डिया कम्पनी के प्रतिनिधि ने झाँसी के शासक रामचन्द्रराव के पास खरीता भेजा, 'नवाब गवर्नर जनरल साहब, लार्ड विलियम- वेन्टिक ने आपको आज से राजा की उपाधि दी है। कम्पनी सरकार की मित्रता के प्रतीक रूप में यूनियन-जैक झण्डा आपको भेट किया जाता है। इसके गौरव की रक्षा कीजियेगा।' झाँसी के किले वाले महल के मैदान मे, धूमधाम और तडक-भडक के साथ जो दरबार सन् १८३२ में हुआ था उसमे उपरोक्त घोषणा सुनाई गई थी। रामचन्द्रराव ने उपाधि और पताका सहर्ष ग्रहण की। झाँसी के शासक के साथ कम्पनी की सबसे पहली सन्धि सन् १८२४ में हुई थी। उस समय पन्त प्रधान (पेशवा) बाजीराव द्वितीय की मातहती में शिवराव भाऊ झाँसी के शासक थे और वह सूबेदार कहलाते थे। यह सन्धि परस्पर मैत्री और सहायता के आधार पर की गई थी। पेशवाई निर्बल हो चुकी थी। सूबेदार सशक्त थे। बुन्देलखण्ड़ को अधिकृत करने के लिए अङ्गरेजो को झाँसी के सूबेदार की मित्रता अभीष्ट थी। इस सन्धि का बुन्देलखण्ड के रजवाडो पर प्रभाव पडा।
२ झाँसी की रानी सन् १८१७ के जून में पन्त प्रधान बाजीराव से अङ्गरेजो की अन्तिम सन्धि हुई। इस सन्धि ने पेशवा के सम्पूर्ण अधिकार, ठोस और खोखले, जो उसको बुन्देलखण्ड में प्राप्त थे, ईस्ट इन्डिया कम्पनी को दे दिये। बाजीराव को इस सन्धि द्वारा आठ लाख रुपये वार्षिक पैन्शन बिठूर खास की जागीर और पूना त्याग कर बिठूर का प्रवास मिला। उसी साल नवम्बर के महीने में शिवराव भाऊ के पौत्र रामचन्द्रराव के साथ, जो उस समय नाबालिग था, दूसरी सन्धि हुई, जिसमें पेशवा का स्थानापन्न कम्पनी सरकार को मनवाया गया। एक शर्त उस सन्धि में यह भी थी कि झाँसी का राज्य रामचन्द्रराव के कुटुम्ब मे 'दवाम' के लिये रहेगा, चाहे वारिस औरस सन्तान हो, चाहे सगोत्रज हो अथवा गोद लिये हुये हो। सन् १८३२ में रामचन्द्रराव और उसके वारिसो को राजा की उपाधि दी गई। उस दरबार में शिवराव भाऊ के लडके रघुनाथराव और गङ्गाधर- राव भी थे। शिवराव भाऊ का जेठा लडका कृष्णराव था। उसका देहान्त हो चुका था। रामचन्द्रराव कृष्णराव का पुत्र था। शिवराव भाऊ के जेठे लडके की सन्तान होने के कारण झासी की गद्दी उसको मिली थी। राजा की उपाधि मिलने के उपलक्ष में जो दरबार हुआ था, उसमें राज्य के छोटे-बडे सब जागीरदार पुरस्कृत किये गये। छोटे जागीरदारो मे मऊ का एक युवक आनन्दराय कायस्थ था। उसके घराने में ताम्रपत्रो की सनदो द्वारा जो माफी लगी थी, वह पुष्ट की गई। कुछ बढा भी दी गई। गायक, वादक और नर्तकियो पर भी पुरस्कार बरसाये गये। रामचन्द्रराव की नाबालिगी के ज़माने में शासनसूत्र उसकी मा सखूबाई के हाथ में था। जब वह वयस्क हो गया तब भी सखूबाई
लक्ष्मीबाई ~ ३ रामचन्द्रराव ने राजा की स्थायी उपाधि पाते ही शासनसूत्र, पूरे तौर पर, अपने हाथ में ले लिया और दो-एक दिन मे ही खजाने को लगभग रीता कर दिया । सखूबाई को खजाने का खाली होना इतना नही अखरा जितना अपने हाथ से राज्य की बागडोर का चला जाना । सखूबाई ज़रा ढली आयु की प्रचण्ड वेगमयी राजमाता थी । माथे और चेहरे की शिकने राजदण्ड के निरन्तर कठोर उपयोग और क्रोध के आवेशो के व्यवहार की कथा कहती थी । उसकी कठोरता विख्यात थी । सखूबाई से रामचन्द्रराव का राजा होना नही सहा गया । उसने रामचन्द्रराव को मरवा डालने का षडयन्त्र रचा । झाँसी के लक्ष्मी-फाटक के बाहर लक्ष्मी-तालाब के दक्षिण-पश्चिमी सिरे पर महालक्ष्मी का मन्दिर है । इस मन्दिर के चौपडे में सखूबाई ने अपने लडके का वध करने के लिये भाले गडवाये । रामचन्द्रराव को तैरने का बहुत शौक था—विशेषकर रात में। सखूबाई को विश्वास था कि उस रात रामचन्द्रराव चौपड़े में तैरने के लिये मुटार लगायगा—और समाप्त हो जायगा । परन्तु लालू कोदेलकर नाम के एक मराठा युवक और मऊ के उपरोक्त आनन्दराय की सहायता के कारण रामचन्द्रराव बच गया । आनन्दराय तो अपने घर मऊ निकल भागा, पर कोदेलकर को दो दिन बाद सखूबाई ने मरवा डाला । लालू कोदेलकर के तीन दरिद्र नातेदार थे । वे झाँसी से भागे । लालू के देहान्त के कुछ समय उपरान्त इन तीनो के एक-एक लडकी हुई । इन बालिकाओ के नाम थे काशी, सुन्दर और मुन्दर । तीनो बालिकाये सुन्दर थी । परन्तु इनका लालन- पालन बडी दरिद्रता में हुआ । सखूबाई का क्रोध कोदेलकर ही तक सीमित न था, उसके नातेदार भी आतङ्कग्रस्त थे और राज्याश्रय से वञ्चित । रामचन्द्रराव अपनी माँ के साथ, इतना सब होने पर भी, कठोर बर्ताव नही करना चाहता था । परन्तु उसके दोनो काका—रघुनाथराव
४ झाँसी की रानी और गङ्गाधरराव —तथा दीवान, सखूबाई को स्वतन्त्र नही छोडना चाहते थे । वह कैद कर दी गई । लालू कोदेलकर के नातेदार झाँसी बुला लिये गये और मऊ के आनन्दराव को सरक्षण मिल गया । रामचन्द्रराव सन् १८३५ मे निस्सन्तान मरा । उसकी विधवा रानी ने कृष्णराव नामक एक बालक को गोद लिया । कम्पनी सरकार ने इस गोद को नही माना । रघुनाथराव को, उत्तराधिकारी करार देकर, गद्दी दी । गङ्गाधरराव रघुनाथराव से छोटे थे । जब शिवराव भाऊ के जेठे भाई रघुनाथ हरि (१७५६-१७६६) झाँसी के सूबेदार होकर आये तब जो लगान किसानो पर बाधा गया, ज्यादा था । सबका-सब कभी वसूल नही होता था । पूरा बीस लाख रुपया साल सखूबाई ने ही रामचन्द्रराव की नाबालिगी के समय मे वसूल करने का प्रयास किया । गाँवटी पञ्चायते हाहाकार कर उठी । परन्तु उस सामन्त युग मे, विचारे किसान लुटेरो और बटमारो के सन्ताप के मारे कुछ कर ही नही सकते थे । रामचन्द्रराव के राज्यकाल में लगान उत्तरोत्तर कम वसूल किया जाने लगा । खजाने मे जो कुछ रुपया था उसका एक अश सखूबाई ने दाब लिया और अधिकाश रामचन्द्रराव ने खर्च कर डाला । बाकी रघुनाथराव के शिथिल शासन में साफ हो गया । रघुनाथराव रङ्गीली प्रकृति के रईस थे । उनकी वेश्याओ में से लच्छो नाम की एक मुसलमान वेश्या थी । इससे दो लडके और लडकियाँ हुई । बडे लडके का नाम नवाब अलीबहादुर था । जब रघुनाथराव सन् १८३५ में झाँसी के राजा हुये, अलीबहादुर की आयु २२ वर्ष की थी । लच्छो की कबर आँतिया ताल के बँध के नीचे मेहदी बाग में है ।* एक समय था जब लच्छो नईबस्ती के महल में रहती थी
- झाँसी के सदर अस्पताल के अहाते में जिस गजरा वेश्या की कबर है उसको गङ्गाधरराव के पिता शिवराव भाऊ रक्खे थे, न कि रघुनाथराव या गङ्गाधरराव, जैसा कि अनेक इतिहास लेखको का भ्रम है ।
लक्ष्मीबाई ५
और मेंहदी बाग के फूल उस पर न्योछावर होते थे—अब उसकी टूटी कबर पर घास और जङ्गली पौधे खड़े हुये हैं। रघुनाथराव और लच्छो के महल खण्डहर हो गये हैं और उनमे झाँसी म्युनिस्पैलटी की कूडा- ,गाडियाँ रक्खी जाती हैं, बैल बांधे जाते हैं और उनके लिये घास-चारा भरा जाता है। सखूबाई के शासनकाल मे रघुनाथराव और गङ्गाधरराव—दोनो भाइयो—की मनोवृत्तियाँ आमोद-प्रमोद की ओर झुकी, बढी और उसी मे तल्लीन हुई। लडाइयाँ लडनी नही थी कि जिस कारण प्रजा को— खास कर किसानो को—सतुष्ट रक्खा जावे । कुराज्य था, कुशासन था। परन्तु गाँवटी पञ्चायते बनी हुई थी। पूरा लगान वसूल नही होता था। पञ्चायत की रक्षा प्रत्येक ग्रामीण को सहज ही प्राप्य थी। पञ्चायतो के अधिकार जब्त होकर अदालतो के हवाले नही हुये थे। जरा-जरा सी सडी-गली बात के लिये राज्य के पदाधिका- रियो के घरो पर हाजिरी नही देनी पडती थी। बडे मामलो के लिये बँधे हुये-हक-दस्तूरो—रिश्वतरो—के छेदो मे होकर जनता अपने नित्य के जीवन में आराम और निभाव को खींचती-घसीटती चली जाती थी। शासन-शक्ति का केन्द्रीकरण नही हुआ था। लोगो को अपने औसान और पराक्रम का सहारा पकडने के बहुधा अवसर मिलते रहते थे। समाज में सन्तुलन यथेष्ट नही था—समानता, विषमता स्पष्ट थी। परन्तु, आर्थिक श्रृंखलाओ की कडियाँ मजबूती के साथ जुडी हुई थी। धन एक जगह इकट्ठा हो होकर बट-बट जाता था। एक एक आश्रय पर शत शत आश्रित टंगे हुये, लिप्त और सलग्न थे। आश्रय और आश्रित सब क्रियाशील। जहाँ आश्रय श्रमहीन, प्रयत्नरहित और दुश्शील हुआ कि गया और उसका स्थान दूसरे प्रबल सबल स्थानापन्न ने ग्रहण किया। खोखला गौरव अपनी कहानी बहुत अल्प समय तक ही कह सकता था।
६ झाँसी की रानी उस समय के इस प्रकार के वह आश्रय—रघुनाथराव—अपनी निष्क्रियता में मुश्किल से दो वर्ष टिक पाये थे कि झाँसी के अडोस-पडोस तक में लूटमार, भम्भड और दङ्गा-फसाद होने लगा । झाँसी राज्य पर अनेक साहूकारो का बहुत कर्जा चढ गया । इसलिये सन् १८३७ में झाँसी राज्य कोर्ट कर लिया गया । रघुनाथराव ने राज्य के कोर्ट होने के पहले ही झाँसी का बचा-खुचा खजाना भाड-भगतियों में वितरित कर दिया और अपने पुत्र नवाब अलीबहादुर को करेरा, पिछोर तथा डामरोन परगनो के ८५ गाँव जागीर में लगा दिये; जिसकी आय साढे छहत्तर हजार रुपये वार्षिक समझी जाती थी । रघुनाथराव ने एक काम और किया—सखूबाई को कैद से मुक्त कर दिया । सन् १८३८ में रघुनाथराव का देहान्त हो गया ।
महाराजा गंगाधरराव
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लक्ष्मीबाई ७ [ २ ] रघुनाथराव के उपरान्त राज्य के लिये चार मुख्य दावेदार खड़े हुये- गङ्गाधरराव ( भाई ) कृष्णराव ( रामचन्द्रराव का कथित दत्तक पुत्र ) अलीबहादुर और रघुनाथराव की विधवा रानी । कृष्णराव की पीठ पर सखूबाई थी । बन्दीगृह के जीवन ने सखूबाई का दमन नही कर पाया था, प्रत्युत वह अधिक सतर्क, सतेज, और सन- कीली हो गई थी । रघुनाथराव की अन्त्येष्टि क्रियायें भी साङ्गोपाङ्ग न हो पाई थी कि सखूबाई ने किले पर अधिकार कर लिया, खज़ाने पर अपने सन्त्री बिठला दिये, तोपो पर अपने तोपचियो को और सिलहखाने पर अपने सिलेदारो को नियुक्त कर दिया । गङ्गाधरराव शहर वाले महल में थे । उनको ऐसा लगता था जैसे अपने ही घर में कैद हो । सखूबाई को कैद करने का निर्णय जिन लोगो ने दिया था उनमें गङ्गाधरराव भी थे । सखूबाई की प्रतिहिंसा के भय से, और साधन-हीन होने के कारण गङ्गाधरराव झांसी से भागे और अङ्गरेजो के पास सीधे कानपूर पहुंचे । उस समय कानपूर अङ्गरेजो की बढ़ी हुई शक्ति का काफी बड़ा अड्डा था । अलीबहादुर ने करेरा के दुर्ग में शरण ली और वह वहा से सैन्य संग्रह करने लगे । उस समय मध्य भारत के लिये गवर्नर जनरल का एजेन्ट साइमन फ्रेज़र था—सन् १८५७ के विप्लवकाल में यह आगरे का लैफ्टि- नेंट गवर्नर हो गया था । इस गडबड की ख़बर पाकर फ्रेज़र झांसी आया । कम्पनी सरकार के प्रबल सगठन और बल के आतंक ने उसके कर्मचारियो को उद्धत बना दिया था । वह दो एक चोबदारो को लेकर सखूबाई के पास क़िले में पहुचा और उसने सखू को धमकाया ।
८ झाँसी की रानी सखू ने कोई परवाह नही की । मधुमास का महीना था । होली हो चुकी थी । जनता अपने रंग में मस्त थी । सखूबाई के इशारे पर फ्रेज़र की किले से बाहर निकलते ही बहुत दुर्गति हुई । फ्रेज़र सेना और तोपखाना लेकर लौटा । सखूबाई किला छोड़ कर भाग गई । अलीबहादुर करेरा त्याग कर कम्पनी की शरण में आगये, और उनको ५००) मासिक पेन्शन देना तै हो गया । झाँसी राज्य का मामला तै करने के लिये एक कमीशन बैठा । कमीशन ने उत्तराधिकार का निश्चय गङ्गाधरराव के हक में किया । गङ्गाधरराव कानपुर से झाँसी आ गये । धूमधाम के साथ उनका अभिषेक हुआ । परन्तु झाँसी राज्य पर कुप्रबन्ध और ऋण का इतना बोझ बढ गया था कि फिर कोर्ट हो गया । बात सन् १८३६ की है । गङ्गाधरराव साहित्य और ललित-कलाओ के पूरे रसिक थे । सुखलाल काछी उनका चित्रकार था । पढा लिखा कम, परन्तु कमल और कूची की सही विधि, कोमलता और हथौटी का आचार्य । गायक, वादक, खास कर ध्रुपद, वीणा और पखावज के उस्ताद और रीतिकाल तथा भक्ति- रस की ओट वाले कवि गङ्गाधरराव की महफिल को आबाद करने लगे । उन्होने दूर दूर से नाना-प्रकार के हस्त-लिखित ग्रन्थ इकट्ठे करवाये और विशाल पुस्तक भाण्डार से अपने पुस्तकालय को भर दिया । वेद, उपनि, षद्, दर्शन, पुरान, तन्त्र, आयुर्वेद, ज्योतिष, व्याकरण, काव्य इत्यादि के इतने ग्रन्थ उनके पुस्तकालय में थे कि लोग दूर दूर से उनकी प्रतिलिपि के लिये आने लगे । नाटको का उन्हे विशेष शौक था । वे संस्कृत नाटको का अनुवाद हिन्दी और मराठी में करवाया करते थे और उनका अभिनय भी करवाते थे । शहर के महल के ठीक पीछे पश्चिमी दिशा में नाटकशाला थी ।* *अब यह खंडहर है । गिरजाघर के उत्तर में केवल सडक बीच में है ।
लक्ष्मीबाई ६ गङ्गाधरराव स्वयं अभिनय करते थे। पुरुष के अभिनय से सन्तोष नही होता था, इसलिये स्त्री की भूमिका में भी आ जाते थे। स्त्रियो का अभिनय करने के लिये उन्होने बहुत सुन्दर नाचने-गाने वाली नियुक्त कर रक्खी थी। इनमें मोतीबाई बहुत प्रसिद्ध थी। ❊ उसका सौन्दर्य अप्सरा सा था। फूलो जैसी कोमलाङ्गी। स्वरलहरी सी मोहक और चंचल। परन्तु वेश्यापुत्री होने पर भी वह कुमारी थी और नाटकशाला के बाहर पर्दे में रहती थी। बहुत कुशल अभिनेत्री थी, परन्तु इसको भी गङ्गाधरराव अपने उदाहरण से यथावत् अभिनय सिखलाते थे। गंगाधरराव की नाटकशाला में मोतीबाई छोटी उम्र में आगई थी। जो लोग गंगाधरराव की कृपा से नाटकशाला में खेल देखने जाया करते थे वे बाहर आकर उसके रूप की, नृत्य और संगीत की, उसके हाव-भाव तथा अभिनय की प्रशंसा करते नही अघाते थे। ❊ झाँसी के खेवट में वह मोतीबाई नाटकशाला वाली के नाम से विख्यात है।