भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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सचित ज्योतिष-शिक्षा

सच्चित्त ज्योतिष-शिक्षा

फलित खण्ड [ द्वितीय भाग ]

बी०एल० ठाकुर ज्योतिषाचार्य

मोतीलाल बनारसीदास दिल्ली वाराणसी पटना बंगलौर मद्रास

द्वितीय संशोधित एवं परिवर्धित संस्करण : वाराणसी, १९८३ पुनर्मुद्रण : दिल्ली, १९९१, १९९५

© मोतीलाल बनारसीदास

बंगलो रोड, जवाहरनगर, दिल्ली ११० ००७ १२० रॉयपेट्टा हाई रोड, मैलापुर, मद्रास ६०० ००४ १६ सेन्ट मार्क्स रोड, बंगलौर ५६० ००१ अशोक राजपथ, पटना ८०० ००४ चौक, वाराणसी २२१ ००१

मूल्य : रु० २२५ (सजिलद) रु० १४५ (अजिलद)

नरेन्द्रप्रकाश जैन, मोतीलाल बनारसीदास, बंगलो रोड, दिल्ली ११० ००७ द्वारा प्रकाशित तथा जैनैनन्दप्रकाश जैन, श्री जैनैनन्द प्रेस, ए-४५ नारायणा, फेस-१, नई दिल्ली ११० ०२८ द्वारा मुद्रित

सचित्र ज्योतिष-शिक्षा

विषय सूची

अध्याय विषयपृष्ठ संख्या
१— ग्रहों की दृष्टि का फल१-२४
२— अनेक ग्रहों के राशि में होने का फल२५-४७
३—योग विचार४८-५८
४— षड्वर्ग विचार५९-९२
५— अष्टक वर्ग विचार९२-१४७
६— गोचर विचार१४७-१७६
७— सर्वतोभद्र चक्र१७७-१९६
८— आयुदाय विचार१९७-२४७
९— मारक स्थान२४७-२९३
१०— नीरोगता२९३-३४१
११— राजयोग३४२-३८९
१२— नामस आदि योग३९०-४४२

Page 8 Illustration

(चित्र / चक्र पृष्ठ 8)

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अध्याय १

ग्रहों की दृष्टि का फल

( १) सूर्य पर भिन्त-भिन्त ग्रहों की दृष्टि का फल

(१) भौम स्थानी ( १-८ राशि के ) सूर्य पर दृष्टि

चन्द्र की दृष्टि--दान धर्म युक्त, बहुत नौकरों वाला, कोमल, निर्मेछ देह, अपना

घर उसको वडा प्यारा

मंगल की--कऋर, संग्राम में धीर, आंखे पैर लाळवणं, पूर्ण वलवान्‌ ।

बुध की-- सुख और पराक्रम तथा धन से हीन, दूतों का काम करने वाला

परदेशवासी, सदा मलिन, शत्रु युक्त ।

गुरु की-राजा का मंत्री, दानी, दयावान्‌, बहुत धन वाला, अपने कुटुम्व में श्रेष्ठ ।

शुक्र की-हीन वर्ण की स्त्री का प्रेमी, अत्यन्त दीन, धनहीन, दुष्ट मित्रों वाला,

त्वचा में विकार ।

शनि की-उत्साह रहित, मलिन, अत्यन्त दीन, दुःख सहित, बुद्धि हीन ।

(२) शुक्र स्थानी (२-७ राशि के ) रवि पर दृष्टि

चन्द्र की दृष्टि-श्रेष्ठ स्त्रियों का प्रेमी, बहुत स्त्रियों वाला, जळ सम्बन्धी पदार्थ के

व्यापार से जीविका करने वाला ।

मंगल की-संग्राम में धीरज, अत्यन्त तेज, श्रेष्ठ, साहस से धन प्राप्त, यशवान्‌ ।

बुध की-संगीत विद्या और सत्काव्य की कलाओं का प्रेमी, लेखन कला में कुशल,

प्रसन्त चित्त ।

गुरु की-अपने वंश के समान, राजा का प्रधान मंत्री, श्रोष्ठ रत्न आभूषण तथा

धन सहित, डरपोक ।

शुक्र की-सुन्दर नेत्र, शो मायमान देह व प्रधान होता है, शत्रु-मित्र सहित, चिता

युक्त ।

शनि की-दीन, धनहीन, आळसी, स्त्रियों के साथ भिन्त मन वाला, दुष्ट आजी-

विका करने वाला रोग युक्त ।

(३) वुध स्थानी ३-६ राशि के ) सूर्य पर दृष्टि

चन्द्र की दृष्टि-मित्र और शत्रुओं से परिपीडित, परदेश जाने वाला, धनहीन,

सदा उदास !

मंगल की-शत्रुओं से भयभीत, कलह आदि से युक्त, अत्यन्त दीन, संग्राम में हारने

वाला, अत्यन्त लज्जालु, आलसी ।

२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

बुध की--राजा की कृपा, पुत्रों से ऐश्वर्य, उसके मित्र और शत्रु सदा सन्ताप को

प्राप्त हों । i

गुरु की--छिपे हुए मन्त्र वाला, अत्यन्त स्वत त्र, स्त्री पुत्रोदि के गवं सहित ।

शुक्र की -परदेशवासी, चपल, विलासी, देह अग्नि या शस्त्र से अंकित हो, राजा

का दूत हो ।

शनि की-धूतं, बहुत नोकरों वाला बुद्धिहीन, उद्विग्न चित्त ।

(४) ककं के रवि पर दृष्टि

चन्द्र की--जल सम्बन्धी व्यापार करके वड़ा धनवान, राजा का राजमंत्री, वड़ा

उग्र ।

मंगल की-अपने वन्धुओं से चित्त को दूर करने वाळा, सूजन का रोग व भगन्दर

से पीडित ।

बुध की-विद्या यश तथा मान से विराजित, राजा की कूपा से मन की अभिलाषा

को प्राप्त, शत्रु रहित

गुरु की-अपने कुल में श्रेष्ठ, निर्मल यश, राजा से बड़ा पद प्राप्त ।

शुक्र की=स्त्री के आश्रय से वस्त्र और धन प्राप्त, पराये काम में हृदय से विषाद

पैदा करता है।

शनि की-कफ ओर वात से दुःखी और पराये कार्य में विघ्न डालने वाळा, चपल

स्वभाव, कलेशी ।

(५) स्वस्थानी सूर्यं पर दृष्टि

चन्द्र की-धूतं और गम्भीर, राजा से मान प्राप्त, धन की प्राप्ति से धनवान,

प्रसिद्ध ।

मंगल की-अनेक स्त्रियों से प्रीति करने वाला, अत्यन्त धूते, कफ प्रकृति, वड़ा शूर

चीर, उदासी।

बुध की-धूतं, राजा की आज्ञा में चलने वाला, पंडितों से प्रीति, लेख कंरने में

तत्पर ।

गुरु को-देव स्थान और तालाव वावड़ी का बनाने वाला, स्वजनों से प्रीति ।

शुक्र की--त्वचा फे दोष वाला, क्रोधी, अपयश का भागी, उत्सव रहित, स्वजनों का त्यागा हुआ, सत्य और दया रहित ।

शनि की-शठ, काम को बिगाड़ने वाला, स्वजनों से सन्ताप को प्राप्त ।

(६) गुरु स्थानी (६-१२ राशि के ) सूर्य पर दृष्टि

चन्द्र की दृष्टि-शोभायमान देह, पुत्र सौख्य युक्त, वाणी के विलास में कुशल, कुलवान्‌ ।

मंगल की-संग्राम में विशेष यश, वक्ता, स्वजनों के संग से रहित, स्थिर आजी- विका करने वाला, प्रचंड ।

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ग्रहो की दृष्टि का फल : ३

वुध की-धातु क्रिया, काव्य कला और कथाओं का जानने वाला, श्रेष्ठ वाकय, श्रेष्ठ मंत्र आदि की विधि में चतुर, सत्पुरुषों की सम्मति सहित ।

गुरु की-राजा का मन्त्री, अपने कुल में राजा, कला की विधि जानने वाला, धन￾धान्य सहित, विद्वान्‌ ।

शुक्र की-सुगन्ध माला, सुगन्ध वस्त्र धारण करने वाला, सुन्दर स्त्री और आभूषणों

का सौख्य भोगता है ।

शनि की--पराये अन्न का भोगी, नीच पुरुषों में प्रवृत्ति, चौपायों से प्राति।

(७) शनि स्थानी ( १०-११ राशि के ) सूर्य पर दृष्टि

चन्द्र की दृष्टिस्त्री के संग से धन और सौख्य का नाश, माया में चतुर, चंचल

चित्त ।

मंगल की--शत्रु से झगड़ा कर धन नाग करने वाला, व्याधि, वैर से सन्तापित,

अत्यन्त व्याकुल देह वहुत चिन्ता ।

बुध की--हिजड़ों ऐसा स्वभाव, पराये चित्त को हरण करने वाला, साधुओं से

रहित, शूरवीर ।

गुरु की--श्रेष्ठ कमं कता, वृद्धिमान्‌, वहुत पुरुषों का पालने वाला ।

शुक्र की--शंख, मूँगा, निर्मेल रता, धन, सुन्दर, स्त्रियों से धन की प्राप्ति ।

शनि की--बड़े प्रताप से शत्रुओं को जीतने वाला, राजा की प्रीति से प्रसन्नता,

प्रसन्न मूर्ति । (८) सूर्यं को शुभ ग्रह देखे--राजा को सेवा से धन प्राप्त ।

सूर्य को शत्रु ग्रह देखे झगड़ा, दुःख, पेट और आँबों में रोग ।

सूर्य को मित्र ग्रह देखे--जय तथा वांधवों से लाभ ।

सूर्य को पाप ग्रह देखे--रोगी हो ।

(९) पंचम भाव में सूर्य हो और भिन्न-भिन्न ग्रहों से दुष्ट हो तो फल

पाप दुष्ट हो--बुद्धि स्थिर हो, अल्प सन्तान हो ।

पाप ग्रहों की दृष्टि हो-मृत सन्तान हो ।

शनि की दृष्टि हो-लोह अग्नि से उत्पन्न पीड़ा ओर सन्तान से उत्पन्न पीड़ा हो ।

मंगल की दृष्टि हो-शर्भ च्युत हो या पुत्र नाश हो ।

बुध की दृष्टि हो--२ पुत्र ५ कन्या हों ।

राहु की दृष्टि हो--गर्भपात हो या कस्या का मरण हो या निःसन्तान हो ।

केतु की दृष्टि हो-गर्भपात हो या काकवंध्या हो । ( जा० सं० )

२--चंद्र पर भिन्न-भिन्न ग्रहों को दुष्टि का फल

( १ ) मेष के चन्द्र पर दृष्ट

सूर्यं की--उग्र स्वभाव, नम्र जनों से नम्र, धैर्यवान्‌, राजा से गौरव, संग्राम में

डरपोक (जा० भ०)। गरीब (निर्धन) हो (फल दी०) (वृ० जा०) ( जा०पारि०) ।

४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

मंगल को-विष अग्नि पात व शस्त्र से भय, कभी कभी मूत्रकुच्छु रोग हो । बड़े

आश्रय सहित, दाँत व नेत्र की पीड़ा ( जा० भ० ) । कुलानुमान राजा (वृ० जा०) ।

बुध की-प्रकाशवान्‌, निर्मळ यश, सब विद्याओं में प्रवीण, धन ओर गुण से युक्त

सज्जनों की सम्मति सहित, श्रेष्ठ सम्पत्ति से प्रतिष्ठित ( जा० भ० ) । विद्वान्‌ पंडित ( व्‌» जा० ) । गुरु की- राजाका मंत्री या सेना का स्वामी, कुलानुसार बहुत सम्पदाओं से युक्त

( जा० भ० ) । राजा तुल्य ( वृ० जा० ) ।

शुक्र की--स्त्री भूषण धन और पुत्र का सुख भोगे, श्रेष्ठ वक्ता, क्रोध रहित, गुणी

( जा० भ० ) । गुणवान्‌ ( वृ० जा० ) राजा तुल्य ( फल० ) ।

शनि की--रोगी, मित्र की उन्नति से नष्ट, धनहीन, मिथ्या भाषी, दुष्ट पुत्र

( जा० भ०) । चोर ( वृ० जा० ) ।

(२) वृष क॑ चंद्र पर दृष्टि

सूर्य को-खेती के काम पर तत्पर, खेती की विधि जानने वाळा, मंत्री वाहन और

घान्य से युक्त ( जा? भ० )। दास या नौकर ( वृ० जा० ) दूत ( जा० परि० ) ।

मंगल की--कामातुर, स्त्रियों का चित्त हरणकर्त्ता, सत्पुरुषों का मित्र, सदा पवित्र,

प्रसन्न मूर्ति ( जा० भ० ) । निर्धन ( दरिद्री ) ( वु० जा० ) ।

बुध की-चतुर विधियों को जानने वाला, कृपा सहित, हर्षयुक्त, जीवों का हितेषी,

गुणयुक्त ( जा० भ० ) । चोर ( वृ० जा० ) । राजा ( जा० परि०) ।

गुरु की--स्त्री और पुत्रों के आनन्द सहित, श्रेष्ठ कीतिमान्‌, धमं क्रिया में तत्पर,

माता-पिता की भक्ति में चित्त ( जा० भ० ) । राजमान्य ( वृ० जा० ) ।

शुक्र की--आभूषण, वस्त्र, गृह, भोजम, सुगन्धित द्वव्यों वाला,चौपायों का सुख ।

राजा ( वृ० जा० ) ।

शनि की-माता की मृत्यु ( जा० भ० ) । धनी ( जा० पारि० ) (वृ० जा०)। वृष के पराद्धं में चन्द्र हो और शनि की दृष्टि-पिता का नाश ( जा० भ० )। (३) मिथुन के चंद्र पर दृष्टि

सूर्य की दृष्टि -चतुर, श्रेष्ठशील, धनहीन, निरन्तर क्लेश, सम्पूर्ण उत्सवों को प्राप्त ( जा० भ० ) । दरिद्री ( वृ० पा० ) ।

मंगल की- उदार चित्त, चतुर, शूरवीर, वुद्धिमान्‌, सुज्ञ, धन-वाहन आदि से युक्त ( जा० भ०.) । लोहे के औजारों का व्यापार ( वृ० जा० ) । विकल ( जा० पारि० ) |

वुध को धैयंवान्‌, सदा आचारयुक्त, उदार, राजा से घन प्राप्त ( जा० भ० ) । राजा ( वृ० जा० ) । गुर की विद्या और विवेकयुक्त, धतवान्‌, प्रसिद्ध, नम्रतायुक्त, निरन्तर पुण्यवान्‌ ( जा० भ० ) । विद्वान ( बृ० जा० ) । ई

शुक्र की--वस्त्र, पुष्प, घन, अन्न श्रेष्ठ सत्री. के सहित, श्रेष्ठ वाहन, आभूषणों

ग्रहों को दृष्टि का फल : ५

का सौख्य ( जा० भ० ) । भयरहित ( वृ० जा० ) धीर ( जा० पारि० )1

शनि की--धन, स्त्री, वाहन और पुत्रादि से हीन, निन्दक ( जा० भऽ ) । कपड़ा

चुनने वाला ( वृ० जा० ) ।

(४) ककं के चंद्र पर दृष्टि

सूर्य की--निष्प्रयोजन नीच जाति के मनुष्यों से क्लेश, राजा के आश्रय से किले

मपर अधिकार करने वाला ( जा० भ० ) । नेत्र रोगी ( वु० जा० ) ।

मंगल की-- चतुर, श्रवीर, माता के विरुद्ध, दुर्बल देह ( जा० भ० )। युद्ध

जीतने वाला योद्धा ( वु० जा० ), पराक्रमी ( जा० पारि० ) ।

बुध की--स्त्री धन पुत्र की उन्नति, नीति के सौख्य सहित, सेना का स्वामी या

राजा का मंत्री ( जा० भ० )। कविता करने वाला ( वृ० जा० ) विद्वान्‌ (फल) ।

गुरु की--राजा से अधिकार प्राप्त, गुणवान्‌, नीति का जानने वाला, सुखी, श्रेष्ठ

पराक्रम वाला, राजा ( जा? भ० ) पंडित ( वृ० जा० ) चतुर (फल०) ।

शुक्र की-श्रे ष्ठ रत्न और सुवणंयुक्त, रत्न आभूषण व श्रेष्ठ स्त्री का निरन्तर

सुख ( जा० भ० ) । राजा ( वृ० जा० ) ।

शनि की--सत्य रहित, माता का विरोधी, सदा भ्रमण, पाप में तत्पर, धन￾हीन ( जा० भ० ) शस्त्र का व्यापारी वु० जा० ) लोहा आदि का व्यापारी

( फल० ) ॥

(५) सिंह के चंद्र पर दृष्टि

सूर्य की--गुणयुक्त, सदा राजा का प्यारा, अधिकार को प्राप्त, विलम्ब से सन्तान

प्राप्ति ( जा० भ? ) 1 राजा ( वृ० जा० ) ।

मंगल की--राजा या मंत्री, धन वाहन पुत्र स्त्री के सुख से युक्त ( जा० भ० )

राजा ( वृ० जा० ) ।

बुध की--धन स्त्री तथा वाहन पुत्रादिकों के सुख से पूर्ण (जा० भ०) । ज्योतिषी

( वृ० जा० )।

गुरु की-बहुश्रूत, साधु वृत्त, भूलने वाला, राजा का मंत्री ( जा० भ० ) । धनी

( वृ० जा० ) ।

शुक्र की-स्त्री प्रयुक्त, वैभव सहित, गुणवान्‌ गुणों को जानने वाला, चतुर

“विधियों को जानने वाला ( जा० भ० ) । राजा ( वृ० पा० )।

शनि की-स्त्री रहित, खेती में चतुर, राजा के किले का स्वामी, थोड़ा धन

( जा० भ० ) । पापी ( जा० पारि० ) । नाई ( फल० ) 1

(६) कन्यो के चन्द्र पर दृष्टि डु

सूर्य की--राजखंजाने का मालिक, श्रेष्ठ वृत्ति वाला, स्त्री रहित, भक्ति में

तत्पर ( जा० भ०.)। स्त्री के आश्रय से जीवन ( वृ० पा० ) । राजा ( फल० ) ।

सुखी ( जा० पारि० ) ।

६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

मंगल की--हिंसा में तत्पर, शूरवीर, क्रोध सहित, राजा का आश्रय करने वाला,

संग्राम में जय प्राप्ति ( जा० भ० ) । स्त्री के आश्रय से जीवन ( वृ० जा० )। चतुर

( फल० ) । धनिक ( जा० पारि० ) । ही

वध की--ज्योतिष शास्त्र और काव्य तया संगीत विद्याओं का ज्ञाता, चतुर,

संग्राम में यश प्राप्ति, नम्रता सहित ( जा० भ० )। राजा ( वृ० जा० ) । विभु

( जा० पारि० ) । हु सद

गुरु की--वहुत भाइयों वाला, राजा का प्यारा, श्रेष्ठ वृत्ति से सुन्दर यश वाला

( जा० भ० ) । सेनापति ( वृ० जा० ) । प्रभु सदृश ( जा० पारि ) ।

शुक्र की--वेश्या विलास में चित्त, स्त्री का आश्रित, राजा से धन प्राप्त ( जा० भ० ) | सब बातों में निपुण ( वृ० जा० ) । विद्वान्‌ ( जा० पारि० )।

शनि की--धनहीन, बुद्धिरहित, निरन्तर स्त्री के आश्रय से धन प्राप्त करने

वाला, माता से हीन ( जा० भ० )। स्त्री के आश्रित जीवन ( वृ० पा० )। राजा

(फल०) शक्ति रहित ( जा० पारि० ) ।

(७) तुला के चन्द्र पर दृष्टि

सूर्य की दृष्टि--सदा भ्रमणकर्त्ता, सुख और धन से हीन, श्रेष्ठ स्त्री और पुत्रों से रहित, मित्र और शत्रुओं से सन्ताप ( जा० भ० ) । जीवघांती ( वृ० फो० ) ठग ( जा० पारि० ) । दुष्ट ( फल० ) । मंगल की--बुद्धि से दूसरे के धन में चित्त, माया सहित, विषयों से सन्ताप ( जा० भ० )। जोवघाती (वृ० जा०) । ठग (जा० पारि«) । शठ ( फल दीप ) । वुध की-कलाओं का ज्ञाता, धन धान्य सहित, वोलने की विद्या और वैभव सहित ( जा० भ० ) । राजा ( वृ० जा० )।

गुरु की-वस्त्र ओर भूषण के कायं में चतुर, इनके खरीदने बेचने में चतुर ( जा० भ० ) । सुनार ( वृ० जा० ) । री

शुक्र की--अनेक उद्यम से अर्थ सिद्ध करनेवाला, राजाओं का कृपापात्र, प्रसन्न चित्त, पुष्ट देह ( जा० भ० ) । व्यापारी वैश्य ( वृ० जा० ) । शनि की-धनधान्य श्रेष्ठ वाहनों से युक्त, विषय भोग से रहित, ( जा० भ० ) । जीवघाती ( वृ० जा० ) | चुगलखोर ( फल० ) । ठग ( जा० पारि० ) । (5) वृश्चिक के चन्द्र पर दृष्टि

सूर्य की--श्रेष्ठ वृत्ति रहित, धनवान्‌, मनुष्यों को असह्य, अत्यन्त उद्यम करने वाला, सेना में रहने वाला ( जा० भ० ) धनहीन दरिद्रो ( वृ० जा० ) ।

मंगल को- युद्ध में विशेषकर यश को प्राप्त; गंभीरता और गौरव से राजा की कृपा से धन पैदा करने वाला ( जा० भ० )। राजा ( वृ० जा० ) । राजा का मन्त्री ( जा? पारि० )।

बुध की--बोलने में चतुर, युद्ध करने वाला, गीत और हत्या में तत्पर, निरन्तर झूठ कर्मों में चतुर ( जा० भ० ) । यमल (जुड़वां लड़कों) का पिता या २ पिता

ग्रहों की दृष्टि का फल : ७

(वृ० जा०) । २ माता (जा० पारि)।

गुरु की--संसार की इच्छा के समान चलने वाला, सुन्दर रूप, श्रेष्ट कमं, धन

और भूषण युक्त (जा० भ०) । दृष्टि से नम्र (वृ० जा०) । राजा (फल०) । राजप्रिय

(जा० पारि०) ।

शुक्र की-- प्रसन्नचित्त, उदार यश, छल-छिद्र का ज्ञाता, धन वाहनों से युक्त

मित्रो से धन कपट (जा० भ०) । धोबी (वृ० जा०) । नीच कर्म (जा० पारि०) ।

शनि की--कोई अंग विकृत ( फल० )। अंगहीन ( वृ० जा» ) । रोगी ( जा०

पारि०) ।

( ९) धन के चन्द्र पर दृष्टि

सूर्य की--बड़ा प्रतापी, उत्तम यश, सम्पदा युक्त, श्रेष्ठ वाहन, संग्राम में यशस्वी,

राजऊपा युक्त (जा० भ०) । पाखण्ड धर्म वाला (वृ० जा०) । दरिद्र (जा० पारि०)।

मंगल की--सेना का स्वामी, वड़ा प्रताप वाला, लक्ष्मी का स्थान, आभूषणों का

लाभ (जा० भ०) । पराये कार्य में विमुख (वृ० जा०) । दगाबाज (फल०) ।

बुध की--श्रेष्ठ वाणी के विलास और बहुत नौकरों वाला, ज्योतिषी, शिल्प

विद्या जानने वाला, (जा० भ०) । स्वकुळ में श्रेष्ठ (वृ० जा०) । स्वजन रक्षक

(फल०) ।

गुरु की- वड़ा अधिकार प्राप्त, धनवान, श्रेष्ठ वृत्ति, सुन्दर शरीर (जा० भ०) ।

राजा (वृ० जा०) ।

शुक्र की--संतान धन धर्म प्राप्त, निरन्तर सोख्ययुक्त (जा० भ०) । कई पुरुषों

को आश्रय देने वाला (वृ० जार) ।

शनि की--बल युक्त, सदा शास्त्र में आसक्त, श्रेष्ठ वक्ता, प्रचंड प्रतापी

(जा० भ०) । दंभी, झूठा (वृ० जा०)। शठ (फल०)। शुभ दृष्टि से विद्या

ज्ञान तथा धन में बली । पाप से सभा शठ, वेश्याओं का प्रेमी (जा० पारि०) ।

(१०) मकर के चन्द्र पर दृष्टि

सूर्यं की--धनहीन, मलिन, भ्रमण का प्रेमी, बुद्धि हीन, दुदिन

(जा०भ०) । दरिद्री (वृ० जा०) ।

मंगल की- अत्यन्त प्रचण्ड, धन वाहन, युक्त, चतुर, स्त्री ओर पुत्रों से

युक्त, निरन्तर वैभव युक्त (जा० भ०) | राजा तुल्य (वृ० जा०) ।

बुध की--बुद्धि हीन, धन रहित घर का त्यागने बाला, स्त्री पुत्रों से त्यक्त

(जा० भ०) । राजा (वृ० जा०) 1

गुरु की--राज्य पुत्र एवं सत्य सहित, गुणों को जानने वाला, स्त्री पुत्र

युक्त, राजा (वृ० जा०) ।

शुक्र की--सुन्दर नेत्र, धन वाहन युक्त, पुत्र, भूषण, वस्त्र का सुख

(जा० भ०) । विद्वात्‌ पण्डित (वृ० जा०) ।

८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

शनि--बड़ा आलसी, घन हीन, सत्य रहित, मालिन, व्यसनों से युक्त

(जा० भ०) । धनी (वृ० जा०) ।

(११)कुम्भ के चन्द्र पर दृष्टि

सूर्य की--खेती के वळ सहित, जुआ खेलने वाला, राजा का आश्रित, धर्म

मैं तत्पर (जा० भ०) ! परस्त्री गामी (वृ० जा०) !

मंगल की--मकान, धन तथा माता-पिता के वियोग को प्राप्त, बड़े कठिन

पदार्थों को पैदा करने वाला, बहुत बोलने वाला, मलिन चित्त, अत्यन्त धूर्त

(जा० भ०) । परस्त्री रत (वृ० जा०) ।

बुध की--विषय और सोख्य सहित, भोजन विद्या जानने वाला, अत्यन्त

पवित्र, प्यारी वाणी (जा० भ०) । राजा (वृ० जा०) ।

गुरु की--धरती, नगर, ग्राम आदि के सुख से युक्त, भोगों से युवत, सत्पुरुषो में प्रवृत्ति करने वाला; श्रेष्ठ पुरुष (जा० भ०) | राजा तुल्य (वृण्जा) ।

शुक्र की- मित्र, पुत्र, स्त्री तथा भकान के सोख्य से रहित, दीन, गौरव

हीन, (जा० भ०) । पराई स्त्री में तत्पर (वृ० जा०) ।

शनि की--गधा, ऊँचे नवीन घोड़ों का लाम करने वाला, खोटी स्त्री में तत्पर धर्मे के विरुद्ध वृत्ति वाला (जा? भ०) । परस्त्रीगामी (वृ जा०) । शुभ अह की दृष्टि से, यश धन युक्त । पाप ग्रह की दृष्टि हो तो, परस्त्रीगामी (जा० पारि०) !

(१२) मोन के चन्द्र पर दृष्टि

सूर्ये की--कामदेव का सौख्य अत्यन्त प्राप्त, सेना का स्वामी, बहुधन कौ वृद्धि, श्रेष्ठ कर्मों की सिद्धि को प्राप्त (जा० भ०) । पापी (वृ० जा०) । मंगल कौ--शत्रु युक्त, कुलटा स्त्री से मित्रता, सुख से हीन, पाप में तत्पर (जा० भ० । पापी (वृ० जा०) ।

बुध की--श्रेष्ठ स्त्री पुरुषों के सुख को प्राप्त, मान और.घन राजा की कृपा से प्राप्त (जा० भ०) । मशखरा (वृ० जा०) । गुरु की- उदार चित्त, सुकुमार शरीर, श्री, स्त्री और पुत्रादि का सौख्य, राजा (जा० भ०) । राजा (वृ० जा०) ।

शुक्र की--श्रेष्ठ गति, श्रेष्ठ विद्या में तत्पर, श्रेष्ठ वृत्ति वाला, स्त्री के साथ विलास करने में शक्ति, विद्वान्‌ (वृ० जा०)।

शनि-कामातुर, स्त्री और पुत्र रहित, नीच स्त्रियों के साथ मित्रता (जा० भ०) पापी (वृ० जा०) ।

शुभ दृष्टि से हास्य प्रिय, राजा या विद्वान्‌ हो । पाप दृष्टि से कठोर वचन भाषी ओर पापात्मा हो । (जा० पारि०) 1 चन्द्र पर पाप ग्रह की दृष्टि से धन हानि, सिर व नेत्र में रोग । २ शत्रु „ ५7 पापकर्म, धननाश, गमागम होता है ।

ग्रहों की दृष्टि का फल: ९

चन्द्र पर शुभ ग्रह दृष्टि सुखी, रोग रहित, बांधवों के हारा लाभ ।

४१२ मित्र ,, „ लाभ, जय क्षेत्र तथा देश का लाम ।

पापांशक में चन्द्र हो या पाप ग्रह की दृष्टि हो तो शठ बुद्धि, परस्त्रीरमण ।

शुभांशक में चन्द्र हो या शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो यशस्वी (जा० पारि०) ।

राशि का जो फल कहा है वही नवांशक में भी विचारे, शुभग्रह की दृष्टि या

योग से शुभ फल होता है ।

उपरोक्त दृष्टि विचार में इन राशियों का चन्द्र हो और उपरोक्त ग्रहों की दृष्टि

हो तो क्या फल होता है । परन्तु चन्द्र के स्थान पर, लग्न पर भी इन ग्रहों की दृष्टि

का उपरोक्त फल विचारना । संक्षिप्त में चन्द्र पर ग्रहों की दृष्टि या चन्द्र की इन ग्रहों

पर दृष्टि होने का फल यहाँ दिया है ।

चाहे चन्द्र द्रष्टा हो या दृश्य इस प्रकार फल होगा चन्द्र

राशि मेष वृष मिथुन कर्के सिंह कन्या तुला वृश्चिक धन मकर कुम्म मीन

सूर्य दरिद्री नौकर दरिद्री हृदय राजा स्त्रियों धानको दरिद्री दंभिक दरिद्री पर पाप

रोग का स्त्री कर्मी

आश्रय रत

मंगल अधि-दरिद्री शास्त्र झग-राजा ,, » राजा ,, राजा ,, # कारी बेचे ड्रालू

शनि चोर धनवान्‌ कपटी शत्रु माली ,, » अँगहीन ,, द्रव्यवान्‌ ,,. „,

बुध पण्डित चोर राजा काव्य जोगी सेना- राजा यमल पोषण राजा राजा भट

कर्ता पति संतान करता

गुरु काम- साहू- प डित पंडित साहु- सपं सुनार नम्र हो राजा ,, कार--राजा

दार कार कार कर्म साधक बारी

शुक्र गुमास्ता राजा निर्भय राजा राजा जोशी बनिया धोबी आश्रय पंडित परस्त्री पंडित

दाता आधीन

चन्द्र के नवांश पर ग्रहों की दृष्टि का फल

(१) चन्द्र मंगल (१-८ र[०) के नवांश में हो उसपर इन ग्रहों की दृष्टि का--

“फल सूर्यं की-नगर रक्षक, मंगल की-प्राणघाती,बुध की-युद्ध कुशल, गुरु की-राजा या

धनवान्‌, शुक्र की-कलहकारी ।

(२) चन्द्र शुक्र (२-७ रा०) के नवांश में हो उस पर दृष्टि का फल--सूर्य की-

मूर्ख, मंगल की-परस्त्रीगामी, बुध की-सुकवि, गुरु को-अच्छा लेखक या सूकवि,

शुक्र की-सब सुख प्राप्त, शनि की-परस्त्री से संग ।

(३) चन्द्र बुध (३-६ रा०) के नवांश में हो उस पर दृष्टि का फल-ूर्ये

की-नट या मल्ल, मंगलकी-चोर, बुध की-श्रेष्ठ कवि, गुरु की-मंत्री, शक्र की--

संगीतज्ञ, शनि की यन्त्र कलादक्ष यो शिल्पी ।

१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

४) चन्द्र [श में हो उस पर ग्रह दृष्टि-सूर्य की दृष्टि-देह दुर्बल, मंगळ

का 28% क ba गुरु की-मुख्य प्रधान हो, शुक्र की-स्त्रियों का

सेवक या स्त्रियों से पाला जावे, शनि की-कतंव्य परायण ।

(५) चन्द्र सिंह के नवांश में हो उस पर ग्रह दृष्टि--सुयं की-क्रोधी, मंगल की- राजा का मित्र, बुध को-निधियों (छिपे धन) का स्वामी, गुरु की-वड़ा स्वामी, शुक्र

की-सन्तान रहित, शनि की-क्रूर कमं कर्त्ता ।

(६) चन्द्र गुरु के नवांश ( ९-१० रा० ) में हो उस पर ग्रह दृष्टि का फल--

सूर्य की-प्रसिद्ध, शूरता वाला, मंगल की-चतुर योद्धा, बुध की-हास्यज्ञ ( मशखरा ),

गुरु की-भन्त्री, शुक्र की-काम रहित, (नपुंसक), शनि की शील युक्त या धर्म मति ।

(७) चन्द्र यदि शनि के नवांश (१०-११ रा०) में हो उस पर दृष्टि का फल -- सूयं की-अल्प सन्तान, मंगल की-अल्प धन, दुःखी जीवन, या घन प्राप्ति में दुःख, बुध की-क्रोधी या घमण्डी, गुरु की-कमं निष्ठ, (कर्म में आसक्त), शुक्र की-दुष्ट स्त्रियों का प्यारा, शनि की-सहुज क्रोधी, कृपण (वृ० जा०) 7 चन्द्र दृष्टि पर विशेष विचार

(१) हादशांश फल-कई राशियों के चन्द्र पर जो दृष्टि फल बताया है वह द्वाद- शांश में भी विचारना ।

(२) प्रभाव दृष्टि नवांश दृष्टि फल शुभाशुभ २ प्रकार का कहा है जैसे (१) आारक्षिक (२) वध रुचि अर्थात्‌ ऊपर जो ग्रह दृष्टि का शुभाशुभ फल कहा है वह-- शुभ फल--वर्गोत्तम मै स्वनवांश में अन्य नवांश में अति शुभ मध्यम शुभ अल्प शुभ अशुभ फल-अल्प फल मध्यम फल अति अशुभ फल अर्थात्‌ उपरोक्त प्रकार से शुभ फल होता है परन्तु बुरे प्रभाव से इसका उल्टा फल होता है ।

(३) बली नवांशेश का फल- चन्द्र का नवांशेश बली हो तो भिन्न-भिन्न राशियों के चन्द्र पर जो ग्रहों की दृष्टि का प्रभाव कहा है वह फल नहीं देगा । केवल वे ही . फल होंगे जो किसी विशेष अंश पर विशेष ग्रहों की दृष्टि में कहे हैं । अर्थात्‌ जिस नवांश में चन्द्रमा हो उसका स्वामी वली हो तो चन्द्र नवाशक दष्टि फल प्रबळ होगा और पूर्वोक्त राशि दृष्टि फल,होरा द्रेष्काण फल, द्वादशांश फल आदि को दबा कर अंश दृष्टि फल ही देगा ।

कहा है

(४)

वही

परस्पर दृश्य द्रष्टा फल विचार--यहाँ जो चन्द्र पर सूर्य आदि ग्रहों का फल

चन्द्र पर

फल सूर्यादि ग्रहों पर उस विशेष चन्द्र की दृष्टि का भी समझना अर्थात

द्रष्टा सातकर

जिस ग्रह की दृष्टि का फल बताया है उस ग्रह को दृश्य मानकर चन्द्र को उसी प्रकार फल का विचार करना |

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ग्रहों की दृष्टि का फछ 1 ११

इसी प्रकार चन्द्र पर दृष्टि के अनुसार लग्न पर भिन्न भिन्न ग्रहों की दृष्टि का

विचार करना ।

(५) बली ग्रह की दृष्टि का फल प्रथम होगा--चन्द्र सूयं जो अधिक वली हो

वह वली ग्रह दूसरों के फल को दवाकर अपने फल देगा ।

३--मंगल पर भिन्न-भिन्न ग्रहों की दृष्टि का फल

(१) स्वस्थानी ( १-८ राशि ) के मंगल पर दृष्टि

सूर्य की--चतुर श्रेष्ठ वक्ता, माता पिता का भक्त, धनवानों में श्रेष्ठ, अत्यन्त उदार ।

चन्द्र की--परस्त्री से. प्रेम, वड़ा शूर वीर, कृपा रहित, चोरों को मारने वाला।

वुध की--वेश्या के अलंकार और वस्त्र बनाने में एक चित्त, बड़ा चतुर, पराया

धन हरने वाला ।

गुरु की--स्वनवांश में राजा, धनवान्‌, क्रोध युक्त, राज चिन्हो मे युक्त, औरों से मित्रता करने वाला [

शुक्र की--वारम्वार भोजन की इच्छा, स्त्री के निमित्त सदा यात्रा की चिता । शनि कौ--मित्रों से परित्यक्त, माता के वियोग से सन्ताप, दुर्वल देह, कुटुम्ब का विरोधी, अति ईर्ष्या युक्त 7

(२) शुक्र स्थानी ( २-७ राशि के ) मंगल पर दृष्टि

सूर्ये की--स्त्री के मन की वृत्ति से रहित, बड़े-बड़े वन और पर्वत में रहने की

इच्छा, शत्रु हीन, बड़ा क्रोधी ।

चन्द्र की--माता के विरुद्ध, संग्राम में डरपोक बहुत स्त्रियों का स्वामी । वुध की--शास्त्र में प्रवृत्ति, बड़ाई का प्रिय, बहुत बोलनेवाला, अल्पधन का

आगम, शोभायमान रहे ।

गुरु की-भाइयों की प्रीत में तत्पर, अत्यन्त भाग्यवान्‌, गीत नृत्य आदि में चतुर ।

शुक की--प्रशंसा के योग्य, राजा का मंत्री या सेनापति, बहुत सौख्य । शनि की-प्रसिद्ध, नग्नता युक्त, धनवान्‌, श्रेष्ठ मित्रों वाला, पवित्र बुद्धि, शास्त्र में यत्न करने वाळा, नगर या ग्राम का स्वामी ।

(३) वुध स्थानी ( ३-६ राशि के ) मंगल पर दुष्ट

सूर्ये की--विद्या धन, ऐश्वर्य युक्त, बल युक्त, वन पर्वत तथा किले में रहने वाला 1

न्द्र की--अपनी रक्षा के लिए राजा से नियुक्त किया हुआ, स्त्री में तत्पर मन युक्त, सन्तोषी ।

वुध की--वहुत बोलने वाला, गणित शास्त्र में चतुर, काव्य जिसको प्यार हो,

झूठी रचना कर सुन्दर वाणी बोले । दूतों का काम करने में बड़ा उद्यमी ! गुरु की--परदेश में भ्रमण, व्यसनी, उच्च स्थान को प्राप्त ।

१२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

शक्र की--चस्त्र, अन्न, जल. के सुख से युक्‍त, स्त्री में आसक्त. निरन्तर समृद्धियों

223 की--बड़ा शूर वीर, मलिन, आलसी, किला कोट वन वंत में विलास

करे |

(४) ककं के मंगल पर दृष्टि

सूर्य की--पित्त प्रकोप से दुःखी, अत्यन्त धैथंवान्‌, फौजदारी का अधिष्ठाता

(दण्डाधिकारी) निरन्तर बड़े यश वाला ।

चन्द्र की--रोग युक्त, नयी चीज का सोच करने वाला, कुरूप, साधुवृत्त से हीन ।

बुध की--पित्त रहित, थोड़ा कुटुम्ब, पाप का प्रचारक, दुष्ट चित्त ।

गुरु की--राजा का मंत्री, गुण और गौरव युक्त, बड़े मान युक्त, प्रसिद्ध ।

शुक्र की- बुरे कर्मों में धन नाश, सदा बुरे कर्मों का विचार कर्ता ।

शनि की--जलोत्पन्न धान्य से धन की प्राप्ति, श्रेष्ठ क्रांति, राजा से धन प्राप्त ।

(५) सिह के मंगल पर दृष्टि `

सूयं की दृष्टि--अपने प्यारों से प्रीत, शत्रुओं से वेर कत्ता, वन पर्वत कुंजों में

रहने वाला ।

चन्द्र की--पुष्ट स्वरूप, कठिन स्वभाव, माता से नञ्ज, कार्य में चतुर, तीव्र

सुन्दर बुद्धि ।

बुध को--श्रेष्ठ काव्य शिल्पादि कलाओं का ज्ञाता, लोभी, चंचल चित्त, अपने

साधन में चतुर |

गुरु की-श्रेष्ठ बुद्धि, राजा का मित्र, सेना का स्वामी, बहुत मनुष्यों के मनोरथ

पूर्ण करने वाला, विद्या में प्रवीण ।

जोती शुक्र पता की--अभिमान चनि धित से । ऊंचा, अत्यन्त सुन्दर, रों सुन्दर, शोभायमान देह, अनेक स्त्रियों का

शनि की--पराये घर वास, अत्यन्त चिन्ता, बूढ़ों के समान रूप, धन हीन । (६) गुरु स्थानी (९-१२ राशि कें) मंगल पर दृष्टि सुर्य की--वन पर्वत किला कोट में वास, क्रूर स्वभाव, मनुष्यों में पूजित । क्त बल की--पंडितों की विधि का ज्ञाता, राजा को नहीं मानने वाला, लड़ाई

बुध की- चतुर, शिल्प विद्या में भो न क के. द्या में निपुण, श्रेष्ठ शील, सव विद्याओं में चतुर,

सम 'गुरु मा की--स्त्री की अत्यन्त त्यन्त चिन्ता करने वाला, शत्रुओं से सदा लडाई करने वाला

शुक्र की--उदार चित्त, विषयों में आसक्त अनेक प्रकार के गहने, भाग्यवान्‌ । | शनि कोते काति हीन, अनेक स्थानों मं मण, बी, पराये कायं मेतत्पर ।