शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
(xvii) | प्रसूताविकार-गणना | 81 | शीत आदि उपद्रव | 83 | | बालरोग-गणना | 81 | विष-विवेचन | 83 | | बालग्रह-गणना | 82 | जङ्गमविष-भेद | 83 | | पादरोग-गणना | 82 | कृत्रिम-विष | 83 | | दोष-भेद | 82 | अन्य उपद्रव | 83 | | पञ्चकर्म-व्यापद् | 82 | मद-विचार | 83 | | स्नेहादि व्यापद् | 82 | अध्यायोपसंहार | 84 | मध्यमखण्ड | प्रथमोऽध्यायः | | चावल का धोवन बनाने की विधि | 88 | | पञ्च-कषाय | 85 | अरलूत्वक् पुटपाक | 88 | | स्वरस-निर्माण-विधि | 85 | तित्तिर पुटपाक | 88 | | स्वरस की दूसरी विधि | 85 | दाड़िम पुटपाक | 88 | | स्वरस की तीसरी विधि | 85 | बीजपूरादि पुटपाक | 88 | | स्वरस-पान की मात्रा | 85 | वासा पुटपाक | 88 | | प्रक्षेप द्रव्यों का मान | 86 | कण्टकारी पुटपाक | 88 | | अमृता-स्वरस | 86 | बिभीतक पुटपाक | 88 | | वासक-स्वरस | 86 | शुण्ठी पुटपाक | 89 | | त्रिफलादि का स्वरस | 86 | दूसरा शुण्ठी पुटपाक | 89 | | तुलसी आदि का स्वरस | 86 | सूरण पुटपाक | 89 | | जम्ब्वादि पत्र-स्वरस | 86 | मृगशृंग पुटपाक | 89 | | बब्बूलादि स्वरस | 86 | द्वितीयोऽध्यायः | | | आर्द्रक-स्वरस | 86 | क्वाथ बनाने की विधि | 90 | | बीजपूर-स्वरस | 86 | क्वाथ-पान की विधि | 90 | | शतावरी आदि का स्वरस | 86 | क्वाथ में मधु आदि का परिमाण | 90 | | अलम्बुषादि स्वरस | 86 | क्वाथ में जीरा आदि का परिमाण | 90 | | मुण्डी-स्वरस | 87 | क्वाथ में दूध आदि का परिमाण | 90 | | ब्राह्मी आदि का स्वरस | 87 | क्वाथ पकाने को विधि | 90 | | सोमरोग-चिकित्सा | 87 | गुडूच्यादिगण क्वाथ | 91 | | उदर्द-चिकित्सा | 87 | गुडूच्यादि क्वाथ | 91 | | उष्णोपद्रव-चिकित्सा | 87 | शालपर्ण्यादि क्वाथ | 91 | | कूष्माण्ड-स्वरस | 87 | काश्मर्यादि क्वाथ | 91 | | गाङ्गेरुकी-स्वरस | 87 | कट्फलादि क्वाथ | 91 | | पुटपाक-विधि | 87 | पर्पटादि क्वाथ | 91 | | कुटज पुटपाक | 88 | द्राक्षादि क्वाथ | 91 |
(xviii) पर्पटादि क्वाथ ९१ | पुनर्नवादि क्वाथ ९६ बीजपूरादि क्वाथ ९२ | वासादि क्वाथ ९६ भूनिम्बादि क्वाथ ९२ | वासादि तथा क्षुद्रा क्वाथ ९७ पटोलादि क्वाथ ९२ | क्षुद्रादि क्वाथ ९७ पञ्चभद्र क्वाथ ९२ | रेणुकादि क्वाथ ९७ कण्टकार्यादि क्वाथ ९२ | बिल्वत्वक् क्वाथ ९७ आरग्वधादि क्वाथ ९२ | गृध्रसीनाशक क्वाथ ९७ अमृताष्टक क्वाथ ९२ | रास्नापञ्चक क्वाथ ९७ पटोलादिगण क्वाथ ९२ | रास्नासप्तक क्वाथ ९७ कण्टकार्यादि क्वाथ ९३ | महारास्नादि क्वाथ ९७ दशमूल क्वाथ ९३ | एरण्डादि क्वाथ ९८ अभयादि क्वाथ ९३ | नागरादि क्वाथ ९८ पिप्पल्यादि क्वाथ ९३ | त्रिफलादि क्वाथ ९८ किरातादि क्वाथ ९४ | एरण्ड क्वाथ ९८ कट्फलादि क्वाथ ९४ | दशमूल क्वाथ ९८ गुडूची क्वाथ ९४ | हरीतक्यादि क्वाथ ९८ निदिग्धिकादि क्वाथ ९४ | वीरतर्वादि क्वाथ ९८ देवदार्वादि क्वाथ ९४ | एलादि क्वाथ ९९ क्षुद्रादि क्वाथ ९४ | गोक्षुरादि क्वाथ ९९ मुस्तादि क्वाथ ९४ | वरादि क्वाथ ९९ पटोलादि क्वाथ ९४ | फलत्रिकादि क्वाथ ९९ गुडूच्यादि क्वाथ ९५ | दार्व्यादि क्वाथ ९९ देवदार्वादि क्वाथ ९५ | न्यग्रोधादि क्वाथ ९९ बृहद्गुडूच्यादि क्वाथ ९५ | बिल्वादि क्वाथ १०० नागरादि क्वाथ ९५ | त्रिफला क्वाथ १०० धान्यपञ्चक क्वाथ ९५ | चव्यादि क्वाथ १०० धान्यनागर क्वाथ ९५ | पुनर्नवादि क्वाथ १०० वत्सकादि क्वाथ ९५ | पथ्यादि क्वाथ १०० कुटजाष्टक क्वाथ ९५ | पुनर्नवादि क्वाथ १०० ह्रीबेरादि क्वाथ ९६ | फलत्रिक क्वाथ १०० धातक्यादि क्वाथ ९६ | रास्नादि क्वाथ १०० शालपर्ण्यादि क्वाथ ९६ | काञ्चनार क्वाथ १०० गुडूच्यादि क्वाथ ९६ | शाखोटक क्वाथ १०१ इन्द्रयवादि क्वाथ ९६ | पुनर्नवादि क्वाथ १०१ त्रिफलादि क्वाथ ९६ | वरुणादिगण में ऊषकादिगण का योग १०१ फलत्रिकादि क्वाथ ९६ | वरुणादि क्वाथ १०१
(xix) खदिरादि क्वाथ १०१ | पेया तथा यूष १०६ पटोलादि क्वाथ १०१ | भक्त-निर्माण-विधि १०६ अमृतादि क्वाथ १०१ | मण्ड-निर्माण-विधि १०६ पटोलादि क्वाथ १०२ | अष्टगुण मण्ड १०७ धात्रीखदिर क्वाथ १०२ | यवमण्ड १०७ लघुमञ्जिष्ठादि क्वाथ १०२ | लाजमण्ड १०७ बृहन्मञ्जिष्ठादि क्वाथ १०२ | तृतीयोऽध्यायः पथ्यादि क्वाथ १०२ | फाण्ट-निर्माण-विधि १०८ वासादि क्वाथ १०२ | बृहत् मधूकपुष्पादि फाण्ट १०८ अमृतादि क्वाथ १०३ | आम्रादि फाण्ट १०८ पञ्चवल्कल क्वाथ १०३ | लघुमधूकपुष्पादि फाण्ट १०८ पाठादि क्वाथ १०३ | मन्थ-विधि १०८ निम्बादि क्वाथ १०३ | खर्जूरादि मन्थ १०९ काञ्चनार क्वाथ १०३ | मसूर सक्तु मन्थ १०९ शतपुष्पादि क्वाथ १०३ | यवसक्तु मन्थ १०९ लंघन या अपतर्पण १०३ | चतुर्थोऽध्यायः लंघन के अयोग्य व्यक्ति १०३ | हिम-निर्माण-विधि ११० लंघन का फल १०३ | आम्रादि हिम ११० सुलंघित का लक्षण १०३ | मरिचादि हिम ११० अति लंघन के दोष १०३ | नीलोत्पलादि हिम ११० लंघन का सदुपयोग १०३ | अमृता हिम ११० प्रमथ्यापाक-विधि १०३ | धान्यक हिम ११० मुस्तकादि प्रमथ्या १०४ | धान्यकादि हिम ११० यवागू-निर्माण-विधि १०४ | पञ्चमोऽध्यायः आम्रादि यवागू १०४ | कल्क-निर्माण-विधि ११२ यूष-निर्माण-विधि १०४ | वर्द्धमानपिप्पली कल्क ११२ सप्तमुष्टिक यूष १०४ | निम्बपत्र कल्क ११२ पानादि विधि १०५ | महानिम्ब कल्क ११२ षडङ्ग-पानीय १०५ | रसोन कल्क ११२ उष्णोदक-विधि १०५ | द्वितीय रसोन कल्क ११३ उष्णोदक के गुण १०५ | पिप्पल्यादि कल्क ११३ क्षीरपाक-विधि १०५ | विष्णुक्रान्ता कल्क ११३ पञ्चमूलपक्व-क्षीर १०५ | शुण्ठ्यादि कल्क ११३ त्रिकण्टकपक्व-क्षीर १०५ | अपामार्गबीज कल्क ११३ यवागू आदि की निर्माण-विधि १०६ | बदरीमूल कल्क ११४ विलेपी-विधि १०६
(xx) लाक्षा कल्क 114 | वृद्धगङ्गाधर चूर्ण 121 तण्डुलीय कल्क 114 | अजमोदादि चूर्ण 121 अङ्कोट कल्क 114 | मरिचादि चूर्ण 121 वन्ध्याकर्कोटकादि कल्क 114 | कपित्थाष्टक चूर्ण 121 अभयादि कल्क 114 | दाडिमाष्टक चूर्ण 121 त्रिवृतादि कल्क 114 | बृहद् दाडिमाष्टक चूर्ण 122 तिल कल्क 114 | पिप्पल्यादि चूर्ण 122 शुण्ठी कल्क 115 | लवङ्गादि चूर्ण 122 षष्ठोऽध्यायः | जातीफलादि चूर्ण 122 | महाखाण्डव चूर्ण 123 चूर्ण-निर्माण-विधि 116 | नारायण चूर्ण 123 चूर्ण में गुड़ आदि का मान 116 | हपुषादि चूर्ण 124 चूर्ण-सेवन-विधि 116 | पञ्चसम चूर्ण 124 चूर्ण का अनुपान 116 | नाराच चूर्ण 124 अनुपान का फल 116 | लवणत्रितयादि चूर्ण 124 चूर्ण-भावना-विधि 117 | तुम्ब्रुवादि चूर्ण 125 आमलकादि चूर्ण 117 | चित्रकादि चूर्ण 125 पिप्पली चूर्ण 117 | वडवानल चूर्ण 125 त्रिफला चूर्ण 117 | अजमोदादि चूर्ण 125 त्र्यूषण चूर्ण 117 | शुण्ठ्यादि चूर्ण 126 पञ्चकोल चूर्ण 117 | हिंग्वादि चूर्ण 126 त्रिगन्ध-चतुर्जात चूर्ण 118 | यवानीखाण्डव चूर्ण 126 कृष्णादि चूर्ण 118 | तालीसादि चूर्ण 127 जीवनीयगण चूर्ण 118 | सितोपलादि चूर्ण 127 अष्टवर्ग चूर्ण 118 | लवणभास्कर चूर्ण 127 लवणपञ्चक चूर्ण 118 | एलादि चूर्ण 128 क्षारद्वय चूर्ण 119 | व्याघ्री चूर्ण 128 सुदर्शन चूर्ण 119 | पञ्चनिम्ब चूर्ण 128 त्रिफलापिप्पली चूर्ण 120 | शतावर्यादि चूर्ण 128 कट्फलादि चूर्ण 120 | अश्वगन्धादि चूर्ण 128 बृहत्कट्फलादि चूर्ण 120 | मुसल्यादि चूर्ण 129 तृतीय कट्फलादि लेह 120 | नवायस चूर्ण 129 शृंग्यादि चूर्ण 120 | आकारकरभादि चूर्ण 129 यवक्षारादि चूर्ण 120 | पञ्चवल्कल चूर्ण 129 शुण्ठ्यादि चूर्ण 120 | माषादि चूर्ण 129 हरीतक्यादि चूर्ण 121 | बकुलत्वक् चूर्ण 129 लघुगङ्गाधर चूर्ण 121 |
(xxi) सप्तमोऽध्यायः | कूष्माण्डावलेह 141 वटी के पर्याय नाम 130 | सूरणावलेह 142 वटी-निर्माण की विधि 130 | अगस्त्यहरीतकी अवलेह 142 वटी-निर्माण की दूसरी विधि 130 | कुटजावलेह 142 वटी में सिता आदि का मान 130 | कुटजाष्टकावलेह 143 बाहुशाल गुड़ 130 | नवमोऽध्यायः मरिचादि गुटिका 131 | स्नेहपाक की विधि 144 गुडादि गुटिका 131 | स्नेहपाकार्थ क्वाथ-विधि 144 आमलक्यादि गुटिका 131 | क्वाथ में जल का परिमाण 144 सञ्जीवनी वटी 132 | अन्य प्रकार से जल का मान 144 व्योषादि वटी 132 | स्नेह में कल्क का परिमाण 144 गुड़ के चार योग 132 | स्नेह में द्रवद्रव्यों का परिमाण 145 वृद्धदारुक मोदक 132 | केवल क्वाथ से स्नेहपाक 145 सूरण-पिण्डी 132 | कल्कहीन स्नेहपाक 145 सूरण-बटक 132 | पुष्पकल्क से स्नेहपाक-विधि 145 मण्डूर-बटक 133 | स्नेहसिद्धि का लक्षण 145 पिप्पली मोदक 133 | स्नेहपाक के प्रकार 146 चन्द्रप्रभा वटी 133 | मृदुपाक आदि के गुण 146 कांसायन वटी 134 | घृतादि पाक में काल-निर्देश 146 योगराज गुग्गुलु 135 | पिप्पल्यादि घृत 146 कैशोर गुग्गुलु 136 | चाङ्गेरी घृत 146 त्रिफला गुग्गुलु 137 | मसूर घृत 147 गोक्षुरादि गुग्गुलु 137 | कामदेव घृत 147 त्रिफला मोदक 137 | पानीयकल्याणक घृत 148 काञ्चनार गुग्गुलु 137 | अमृता घृत 148 गूगलशोधन विधि 138 | महापञ्चतिक्त घृत 148 माषादि मोदक 138 | कासीसादि घृत 149 उदर्दनाशक मोदक 138 | जात्यादि घृत 149 अष्टमोऽध्यायः | षड्बिन्दु घृत 149 अवलेह-निर्माण-विधि 139 | त्रिफला घृत 150 अवलेह में सिता आदि का मान 139 | गौराद्य घृत 150 अवलेह-सिद्धि का लक्षण 139 | मयूर घृत 151 अवलेह के अनुपान 140 | फलघृत 151 कण्टकारी अवलेह 140 | दूसरा फल घृत 152 च्यवनप्राशावलेह 140 | पञ्चतिक्त घृत 152
अङ्गारक तैल 153 | सन्धान-कल्पना 164
(xxii) लाक्षादि तैल 152 | दशमोऽध्यायः अङ्गारक तैल 153 | सन्धान-कल्पना 164 नारायण तैल 153 | आसव तथा अरिष्ट का भेद 164 वारुणी तैल 154 | अरिष्टों में जल, गुड़ तथा मधु का मान 164 बलादि तैल 154 | सीधु का लक्षण 165 प्रसारिणी तैल 155 | सुरा आदि का लक्षण 165 माषादि तैल 155 | वारुणी का लक्षण 165 शतावरी तैल 156 | शुक्त बनाने की विधि 165 कासीसादि तैल 157 | विनष्ट तथा चुक्र लक्षण 166 पिण्ड तैल 157 | मधुशुक्त बनाने की विधि 166 अर्क तैल 157 | गुड़शुक्त का लक्षण 166 मरिचादि तैल 157 | शुक्त का लक्षण 166 त्रिफलादि तैल 158 | तुषाम्बु तथा सौवीर का लक्षण 166 निम्बबीज तैल 158 | काञ्जिक का लक्षण 166 यष्टीमधुक तैल 158 | उशीरासव निर्माण-विधि 167 करञ्ज तैल 158 | कुमार्यासव 167 नीलिकादि तैल 158 | पिप्पल्यासव 168 भृङ्गराज तैल 159 | लोहासव 168 इरिमेदादि तैल 159 | मृद्वीकारिष्ट 168 जात्यादि तैल 159 | कुटजारिष्ट 169 हिंग्वादि तैल 159 | विडङ्गारिष्ट 169 बिल्व तैल 160 | देवदार्वादि अरिष्ट 169 क्षार तैल 160 | खदिरारिष्ट 170 पाठादि तैल 160 | बब्बूलारिष्ट 170 व्याघ्री तैल 160 | द्राक्षारिष्ट 171 कुष्ठादि तैल 160 | रोहीतकारिष्ट 171 गृहधूम तैल 160 | दशमूलारिष्ट 171 वज्री तैल 160 | एकादशोऽध्यायः करवीरादि तैल 161 | धातुओं की संख्या 173 चन्दनादि तैल 161 | धातुओं के शोधन की विधि 173 वचा तैल 161 | सुवर्ण भस्म की विधि 173 निर्गुण्डी लांगली तैल 162 | सुवर्ण भस्म की दूसरी विधि 174 चक्रमर्द तैल 162 | तीसरी विधि 174 धत्तूर तैल 162 | चौथी विधि 175 कटुतैलमूर्च्छन-विधि 163 | पाँचवीं विधि 175 तैल की गन्धवृद्धि 163 | छठी विधि 175 पत्रकल्क 163
(xxiii)
सुवर्ण भस्म के गुण ..................................... 175 | क्षार बनाने की विधि ..................................... 185 रजत भस्म की विधि .................................... 175 | पानीय प्रतिसारणीय क्षार ................................. 185 रजत भस्म की दूसरी विधि ............................ 176 | आर भस्म की विधि ..................................... 176 | द्वादशोऽध्यायः ताम्र, पीतल, कांस्य भस्म-विधि ..................... 177 | पारद के गुण ................................................ 187 ताम्र भस्म की विधि ..................................... 177 | पारद के नाम ................................................ 187 नाग भस्म ................................................... 178 | ग्रहानुसार धातु-नाम ...................................... 187 नाग भस्म की विधि .................................... 178 | पारद की शोधन-विधि .................................... 187 वंग भस्म की विधि ..................................... 178 | गन्धक शोधन-विधि ....................................... 188 लोह भस्म की विधि .................................... 178 | शिंगरफ शोधन-विधि .................................... 188 दूसरी विधि ................................................ 178 | शिंगरफ से पारा निर्माण-विधि .......................... 188 तीसरी विधि ................................................ 179 | डमरू यन्त्र-निर्माण-विधि ................................ 188 उपधातु संख्या ........................................... 179 | पारद को बुभुक्षित करने की विधि .................... 188 स्वर्णमाक्षिक शोधन-विधि ............................ 179 | दूसरी विधि ................................................... 189 स्वर्णमाक्षिक मारण-विधि ............................. 180 | तीसरी विधि ................................................... 189 विमला शोधन-विधि ................................... 180 | गन्धक-जारण-विधि ........................................ 189 तुत्थ-शोधन-विधि ..................................... 180 | पारद-मारण-विधि ......................................... 189 अभ्रक-शोधन-विधि ................................... 180 | पारद-मारण-विधि ......................................... 190 अभ्रक मारण-विधि ..................................... 180 | अन्य विधि .................................................... 191 अभ्रक मारण-विधि ..................................... 181 | अन्य विधि .................................................... 191 अभ्रक सत्व प्रकार ...................................... 181 | ज्वराङ्कुश रस ............................................... 191 नीलाञ्जन-शुद्धि .......................................... 181 | ज्वरारि रस .................................................... 191 मनःशिला-शुद्धि ......................................... 182 | शीतारि रस .................................................... 191 हरिताल-शोधन .......................................... 182 | ज्वरघ्नी गुटिका ............................................. 192 दोलायन्त्र ................................................... 182 | लोकनाथ रस ................................................. 192 रसक-शुद्धि .............................................. 183 | लघु लोकनाथ रस .......................................... 194 उपधातुओं से सत्व निकालने की विधि ........... 183 | मृगाङ्कपोट्टली रस ......................................... 194 रत्नशोधन-विधि ......................................... 183 | हेमगर्भपोट्टली रस .......................................... 195 वज्रभस्म की विधि ...................................... 183 | दूसरा हेमगर्भपोट्टली रस ................................. 195 दूसरी विधि ................................................ 183 | द्वितीय ज्वरांकुश रस ...................................... 196 तीसरी विधि ................................................ 183 | आनन्दभैरव रस ............................................ 196 वैक्रान्त-मारण ........................................... 184 | सूचिकाभरण रस ........................................... 197 रत्नों का शोधन-मारण ................................ 184 | जलबन्धु रसं ................................................. 197 शिलाजतु शोधन-विधि ............................... 184 | पञ्चवक्त्र रस ................................................ 197 शिलाजतु निर्माण-विधि .............................. 184 | उन्मत्त रस .................................................... 198 मण्डूर भस्म निर्माण-विधि ............................ 185 | सन्निपाताञ्जन ................................................ 198 | नाराच रस ..................................................... 198
(xxiv) इच्छाभेदी रस १९८ | अजीर्णकण्टक रस २०४ वसन्तकुसुमाकर रस १९८ | मन्थानभैरव रस २०५ राजमृगाङ्क रस १९९ | वातनाशन रस २०५ स्वयमग्नि रस १९९ | कनकसुन्दर रस २०५ अमृतार्णव रस २०० | सन्निपातभैरव रस २०५ सूर्यावर्त रस २०० | ग्रहणीकपाट रस २०६ स्वच्छन्दभैरव रस २०० | ग्रहणीवज्रकपाट रस २०६ हंसपोट्टली रस २०१ | मदनकामदेव रस २०७ त्रिविक्रम रस २०१ | कन्दर्पसुन्दर रस २०८ महातालेश्वर रस २०१ | लोह रसायन २०८ कुष्ठकुठार रस २०१ | जैपाल-शुद्धि की विधि २०९ उदयादित्य रस २०२ | विष-शुद्धि की विधि २०९ सर्वेश्वर रस २०२ | अहिफेन-शोधन २१० स्वर्णक्षीरी रस २०३ | भंगा-शोधन २१० मेहबद्ध रस २०३ | विषमुष्टि शोधन २१० महावह्नि रस २०३ | लांगली-शोधन २१० विद्याधर रस २०४ | गुञ्जा-शोधन २१० त्रिनेत्र रस २०४ | करवीर-शोधन २१० गजकेसरी रस २०४ | अर्क-सेहुण्ड दुग्ध-शोधन २१० अग्नितुण्डवटी रस २०४ | उत्तरखण्ड प्रथमोऽध्यायः स्नेह के भेद, उनके पान का समय २११ | तैलपान के योग्य व्यक्ति २१२ स्नेह की दो योनियाँ २११ | वसापान के योग्य व्यक्ति २१३ मिलित स्नेहों के नाम २११ | मज्जापान के योग्य व्यक्ति २१३ स्नेह-सेवन की कालावधि २११ | स्नेहपान का काल २१३ स्नेह की मात्राएँ २१२ | घृत तैल की उपयोग-विधि २१३ विधिहीन स्नेहपान के दोष २१२ | स्नेहों के अनुपान २१३ दोषशान्ति के उपाय २१२ | स्नेह-सेवन २१३ स्नेह-मात्रा-विचार २१२ | यवागू से स्नेह-सेवन २१३ अन्य प्रकार से मात्रा का निश्चय २१२ | धारोष्ण दुग्ध से स्नेह-पान २१३ मात्राओं के गुण २१२ | स्नेहाजीर्ण की चिकित्सा २१३ दोष-भेद से स्नेह का विधान २१२ | स्नेहाजीर्ण का उपचार २१४ घृतपान के योग्य व्यक्ति २१२ | स्नेहपान-जनित तृष्णा-चिकित्सा २१४ | स्नेहपान से हानि २१४
(xxv) स्नेहपान के अयोग्य रोगी 214 | वमन के योग्य रोग 221 स्नेहपान के योग्य रोगी 214 | वमन के अयोग्य रोग 221 स्निग्ध तथा रूक्ष के लक्षण 214 | वमन के अयोग्य रोगी 221 अतिस्निग्ध के लक्षण 214 | वमन के अयोग्यों को भी वमन का विधान 222 रूक्ष तथा अतिस्निग्ध का उपचार 215 | सुकुमार आदि के वमन की विधि 222 रूक्षण द्रव्य 215 | वमन का विशेष विधान 222 स्नेह-सेवन का फल 215 | वमन के सहायक द्रव्य 222 स्नेह-सेवन में त्याज्य 215 | वमन-विरेचन-स्वरूप 222 द्वितीयोऽध्यायः | वमन-द्रव्यों का परिमाण 222 स्वेद की संख्या और गुण 216 | क्वाथ-पान की मात्रा 222 स्वेद के भेद तथा प्रयोग 216 | कल्कादि की मात्रा 222 दोष भेद से स्वेद के भेद 216 | वमन के वेग 222 पूर्व स्वेदनीय रोगी 216 | वमनादि में प्रस्थ का मान 222 पश्चात् स्वेदनीय रोगी 216 | दोष-भेद से द्रव्य-भेद 222 उभयविध स्वेदनीय रोगी 217 | पित्त में वमन 223 स्वेद की व्यवस्था 217 | कफवातज रोगों में वमन 223 स्वेद का फल 217 | वमन के उपद्रवों की चिकित्सा 223 स्वेदन-काल में रोगी की रक्षा 217 | वमन करते समय कर्तव्य 223 स्वेद के अयोग्य रोगी 217 | दुर्दान्त के लक्षण 223 मृदुस्वेद के स्थान 217 | अतिवान्त के लक्षण 223 अतिस्वेद के उपद्रव 217 | वमन के उपद्रवों की चिकित्सा 223 तापस्वेद-विधि 218 | सम्यग् वात के लक्षण 224 ऊष्मस्वेद-विधि 218 | वान्त का पथ्य 224 उपनाह-स्वेद-विधि 218 | वमन के लाभ 224 द्रवस्वेद-विधि 219 | वमन में परिहार्य 224 द्रवद्रव्य का परिमाण 219 | वमन-विरेचन के पूर्व स्नेहन-स्वेदन 224 स्नेहकृत स्वेद का काल 219 | चतुर्थोऽध्यायः स्वेद का लाभ-प्रकार 219 | विरेचन-योग्य रोगी 225 स्वेद से धातुवृद्धि 219 | वमन-रहित विरेचन के दोष 225 स्वेदन की अवधि 219 | विरेचन का काल 225 सुस्विन्न का आहार-विहार 219 | संशोधन का फल 225 उष्ण जल से स्नान-विधि 220 | विरेचन-योग्य रोग 225 तृतीयोऽध्यायः | विरेचन के अयोग्य रोगी 225 वमन-विरेचन का काल 221 | विरेचन-योग्य रोगी 226 वमन के योग्य पुरुष 221 | विरेचन के लिए कोष्ठ-भेद 226 | कोष्ठ-भेद से मात्रा-विचार 226
(xxvi)
कोष्ठ-भेद से द्रव्यों का विचार 226 | अनुवासन-वस्ति के द्रव्य 232 वेग-भेद से विरेचन-मात्रा 226 | विरेचन के पश्चात् वस्ति 232 विरेचन-द्रव्यों का मान-विचार 226 | वस्ति देने की विधि 232 दोष-भेद से द्रव्य-विधान 226 | वस्ति-प्रयोग में काल-निर्देश 233 एरण्ड तैल-प्रयोग 227 | मात्रा-काल-प्रमाण 233 सब ऋतुओं के योग्य विरेचन 227 | वस्ति-प्रयोग में पश्चात् कर्म 233 अभयादि मोदक 227 | सम्यक् अनुवासित के लक्षण 233 विरेचन-काल में कर्तव्य 228 | वस्ति के पश्चात् पथ्य 233 सम्यग् विरेचन का लक्षण 228 | अनुवासन की व्यापत्ति की चिकित्सा 233 दुर्विरिक्त का लक्षण 228 | उष्णोदक के गुण 233 दुर्विरिक्त की चिकित्सा 228 | धान्यशुण्ठी जल का गुण 233 अति विरेचन के उपद्रव 228 | स्नेह वस्ति के साथ निरूहण-वस्ति 233 विरेकातियोग में कर्तव्य 228 | वस्तियों के फल 233 सुविरिक्त के लक्षण 228 | वातरोगी के लिए स्नेह-वस्ति 234 विरेचन से लाभ 229 | स्नेह तथा निरूहवस्ति की प्रशंसा 234 विरेचन में परिहार्य 229 | स्नेह-वस्ति के निकलने पर 234 विरेचन में पथ्य 229 | स्नेह-वस्ति के उपद्रव और प्रतिकार 234 | उपद्रवहीन स्नेह-वस्ति 234 पञ्चमोऽध्यायः | स्नेह के न लौटने पर उपाय 235 वस्तियों के दो भेद 230 | स्नेह-वस्ति के लिए गुडूच्यादि तैल 235 वस्तियों के लक्षण 230 | स्नेहपानादि उपचार 235 वस्ति-क्रम का निर्देश 230 | धान्यशुण्ठी क्वाथ 235 अनुवासन का भेद मात्रावस्ति 230 | वस्ति-फलश्रुति 235 अनुवासन के योग्य रोगी 231 | वस्ति-सेवनक्रम 235 अनुवासन के अयोग्य रोगी 231 | वस्ति-व्यापत्तियाँ 235 वस्ति-नेत्र के द्रव्य 231 | पथ्यापथ्य-निर्देश 235 वयस्-भेद से नेत्र-परिमाण 231 | वस्ति-नेत्र का छिद्र तथा आकार 231 | षष्ठोऽध्यायः वस्ति-नेत्र का परिणाह 231 | निरूहण-वस्ति-परिचय 237 वस्ति-नेत्र की कर्णिका 231 | निरूहण-वस्ति की मात्रा 237 वस्ति के योग्य द्रव्य 231 | निरूहण के अयोग्य रोगी 237 व्रणवस्ति का नेत्र 231 | निरूहण-वस्ति के योग्य रोगी 237 वस्ति के सम्यग्योग का फल 232 | निरूहण की विधि 237 वस्ति के लिए समय-निर्देश 232 | सुनिरूढ के लक्षण 238 वस्ति के पूर्व भोजन-निर्देश 232 | दुर्निरूढ के लक्षण 238 वस्ति की मात्रा के दोष 232 | अतिनिरूढ के लक्षण 238 वस्ति-मात्रा-निर्देश 232 | आस्थापन तथा निरूहण का प्रयोग 238
(xxvii)
दोष-भेद से वस्ति-विधान २३८ दोष-भेद से भोजन-व्यवस्था २३८ एकाधिक वस्तियों का विधान २३८ दोषभेद से भोजन-व्यवस्था २३९ सुकुमारादि के लिए वस्ति २३९ वस्तियों का क्रम २३९ उत्क्लेशन-वस्ति २३९ दोषहर-वस्ति २३९ शोधन-वस्ति २३९ शमन-वस्ति २३९ लेखन-वस्ति २३९ बृंहण-वस्ति २३९ पिच्छिल-वस्ति २३९ प्रमाणानुसार द्रव्यमिश्रण-विधि २४० दोष-भेद से स्नेह, मधु का प्रमाण २४० माधुतैलिक-वस्ति २४० दीपन-वस्ति २४० युक्तरथ वस्ति २४० सिद्ध-वस्ति २४० मुस्तादि-वस्ति २४१ वस्ति-कल्पना २४१ त्रिदोषहर-वस्तियाँ २४१ रक्तविकार-वस्ति २४१ निरूहण-वस्ति में पथ्यापथ्य २४१
सप्तमोऽध्यायः उत्तरवस्ति-विधान २४२ वस्ति-मात्रा-निर्धारण २४२ पुरुषों में वस्ति-प्रयोग-विधि २४२ स्त्रियों में वस्ति-प्रयोग-विधि २४२ बालकों में वस्ति-प्रयोग-विधि २४३ विशेष मात्रा-निर्देश २४३ स्त्रियों में वस्ति-प्रयोग विधि २४३ फलवर्त्ति-प्रयोग-विधि २४३ फलवर्त्ति-निर्माण-विधि २४३ लक्षण-समन्वय २४४ फलवर्त्ति का नामभेद २४४
अष्टमोऽध्यायः नस्य की निरुक्ति २४५ नस्य के भेद २४५ नस्य-प्रयोग का काल २४५ नस्य के अयोग्य काल और रोगी २४५ नस्य के योग्य-अयोग्य वय २४५ विरेचन-नस्य २४५ विरेचन-नस्य की मात्रा २४६ नस्य के लिए द्रव्यों का परिमाण २४६ विरेचन-नस्य के दो भेद २४६ अवपीड, प्रधमन का स्वरूप २४६ विरेचन-नस्य के योग्य रोग २४६ स्नेहन-नस्य २४६ अवपीड-नस्य के योग्य रोगी २४६ प्रधमन के योग्य रोग २४६ गुडादि-नस्य २४६ मधूकसारादि नस्य २४७ सैन्धवादि नस्य २४७ प्रधमन-नस्य २४७ बृंहण-नस्य-कल्पना २४७ मर्श-शिरोविरेचन २४७ बृंहण-नस्य के योग्य रोग २४७ कुंकुम-नस्य २४८ बृंहण-नस्य के द्रव्य २४८ दोष-भेद से स्नेह-व्यवस्था २४८ माषादि-नस्य २४८ प्रतिमर्श-नस्य-विधि २४८ प्रतिमर्श की मात्रा २४९ प्रतिमर्श के काल २४९ प्रतिमर्श की विधि २४९ प्रतिमर्श के योग्य रोगी २४९ पलित में नस्य २४९ नस्य-ग्रहण-विधि २४९ नस्य-धारण-काल २५० नस्य के तीन योग २५० नस्य-शुद्धि के लक्षण २५०
(xxviii)
| नस्य का हीनयोग | 250 | शोथनाशक लेप | 258 |
| नस्य का अतियोग | 250 | दाहनाशक लेप | 258 |
| हीनातिषोग में उपचार | 250 | दशाङ्ग लेप | 258 |
| अतिस्निग्ध का लक्षण | 251 | भल्लातक-शोथहर लेप | 258 |
| पञ्चकर्म | 251 | लाङ्गल्यादि लेप | 258 |
| चिकित्सा-विषय विचार | 251 | रक्तचन्दनादि लेप | 259 |
| नवमोऽध्यायः | मातुलुङ्गादि लेप | 259 | |
| धूमपान-विधि | 252 | लोध्रादि लेप | 259 |
| धूमपान के अयोग्य व्यक्ति | 252 | सिद्धार्थकादि लेप | 259 |
| धूमपान-निषेध का कारण | 252 | अश्वखुरमसी लेप | 259 |
| धूमपान की अवधि | 252 | वटपत्रादि लेप | 259 |
| सुप्रयुक्त धूम-प्रशंसा | 253 | अरुषिकाहर लेप | 259 |
| धूमयन्त्र-परिचय | 253 | दूसरा लेप | 259 |
| प्रकार-भेद से धूमपान | 253 | दारुणरोगहर लेप (1) | 259 |
| व्रणधूपन-विधि | 253 | दारुणरोगहर लेप (2) | 259 |
| विविध धूपन-प्रयोग | 253 | इन्द्रलुप्तहर लेप | 260 |
| बालग्रहनाशक-धूपन | 254 | केशवर्द्धक लेप | 260 |
| पथ्य-अपथ्य आदि निर्देश | 254 | रोमोत्पादक लेप | 260 |
| दशमोऽध्यायः | इन्द्रलुप्तहर लेप | 260 | |
| गण्डूष-कवल-विधि | 255 | रोमसंजनन लेप | 260 |
| गण्डूष तथा कवल में भेद | 255 | पलितनाशक लेप (1) | 260 |
| गण्डूषादि सेवन में वय का विचार | 255 | पलितनाशक लेप (2) | 260 |
| स्नैहिक गण्डूष | 255 | पलितनाशक लेप (3) | 260 |
| मधु-गण्डूष के गुण | 256 | पलितनाशक लेप (4) | 260 |
| विविध रोगों में गण्डूष | 256 | पलितनाशक लेप (5) | 261 |
| दार्वादि-गण्डूष | 256 | रोमनाशक लेप (1) | 261 |
| प्रतिसारण और कवल | 256 | रोमनाशक लेप (2) | 261 |
| मातुलुङ्गकेसरादि कवल | 256 | अर्शोलेप | 261 |
| प्रतिसारण के भेद | 256 | शोथनाशक लेप | 261 |
| कुष्ठादि प्रतिसारण | 256 | कर्णमूल शोथ-चिकित्सा | 261 |
| गण्डूषादि के हीनयोग-अतियोग | 256 | श्वित्रहर लेप (1) | 261 |
| गण्डूषादि का सम्यग् योग | 256 | श्वित्रहर लेप (2) | 262 |
| दतवन या दातून | 257 | श्वित्रहर लेप (3) | 262 |
| ताम्बूल-सेवन | 257 | श्वित्रहर लेप (4) | 262 |
| एकादशोऽध्यायः | सिध्महर लेप (1) | 262 | |
| आलेप के नाम तथा परिमाण | 258 | सिध्महर लेप (2) | 262 |
(xxx) शम्बूक तैल — 270 | रक्तमोक्षण में अपथ्य — 276 कर्णस्रावहर योग — 270 | तुम्बी-प्रयोग-विधि — 276 स्वर्जिका योग — 271 | जलौका-प्रयोग — 277 आम्रादि तैल — 271 | सिरावेध — 277 कर्णकीटहर योग (1) — 271 | त्रयोदशोऽध्यायः कर्णकीटहर योग (2) — 271 | नेत्ररोगनाशक उपचार — 278 द्वादशोऽध्यायः | सेचन-विधि — 278 रोगानुसार रक्त-निर्हरण — 272 | वाताभिष्यन्द पर सेचन (1) — 278 रक्त-निर्हरण काल तथा लाभ — 272 | वाताभिष्यन्द पर सेचन (2) — 278 शुद्ध तथा अशुद्ध रक्त का लक्षण — 272 | वाताभिष्यन्द पर सेचन (3) — 278 रक्तदुष्टि के लक्षण — 272 | रक्ताभिष्यन्द पर सेचन (1) — 279 रक्तवृद्धि के लक्षण — 272 | रक्ताभिष्यन्द पर सेचन (2) — 279 रक्तक्षय के लक्षण — 272 | नेत्रशूलनाशक योग — 279 वातदूषित रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन-विधि — 279 पित्तदूषित रक्त के लक्षण — 273 | वातादि भेद से आश्च्योतन — 279 कफदूषित रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन का धारण काल — 279 द्विदोष तथा त्रिदोष से दूषित रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन के योग (1) — 279 विषदूषित रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन के योग (2) — 279 शुद्ध रक्त के लक्षण — 273 | आश्च्योतन के योग (3) — 279 रक्तस्राव के योग्य रोग — 273 | पिण्डिकाविधान — 280 रक्तस्राव की विधियाँ — 274 | पिण्डी के योग (1) — 280 किनका रक्त नहीं निकालना चाहिये — 274 | पिण्डी के योग (2) — 280 रक्तस्रावण यन्त्र — 274 | पिण्डी के योग (3) — 280 शृंग आदि द्वारा रक्तस्रावण — 274 | पिण्डी के योग (4) — 280 रक्तस्राव के अयोग्य काल एवं रोगी — 274 | बिडालक-विधि — 280 रक्तस्रावकारक उपाय — 274 | बिडालक के योग (1) — 280 रक्तस्राव का समय — 274 | बिडालक के योग (2) — 280 रक्तातिस्राव परिहार — 275 | बिडालक के योग (3) — 281 रक्त की अतिप्रवृत्ति में चिकित्सा — 275 | बिडालक के योग (4) — 281 रक्तरोधन के उपाय — 275 | बिडालक के योग (5) — 281 अग्निदाह-विधि — 275 | बिडालक के योग (6) — 281 अधिक रक्तस्राव का निषेध — 275 | तर्पण-विधि — 281 रक्त का महत्त्व — 276 | तर्पण का निषेध — 281 रक्तस्रावजनित दोष का प्रतिकार — 276 | तर्पण-विधि — 281 रक्तस्राव का फल — 276 | तर्पण के पश्चात् कर्म — 282 CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA | तर्पणकाल तथा सम्यक् तर्पण का लक्षण — 282
(xxxi) अतितर्पण हीनतर्पण तथा उनका उपचार २८२ | रसाञ्जनादि रसक्रिया २८६ पुटपाक-विधि २८२ | गुडूची रसक्रिया २८६ पुटपाक के भेद २८२ | पुनर्नवा रसाञ्जन २८६ पुटपाक के योग २८२ | बब्बूल रसक्रिया २८६ अञ्जन-विधि २८३ | हिज्जल-रसक्रिया २८६ अञ्जन के भेद २८३ | कतक-रसक्रिया २८६ अञ्जन के अन्य तीन भेद २८३ | शिरोत्पात में रसक्रिया २८६ अञ्जन का निषेध २८३ | कृष्णसर्प वसाञ्जन २८७ गुटिकाञ्जन की मात्रा २८३ | लेखनाञ्जन २८७ रसरूप अञ्जन की मात्रा २८३ | कणा-अञ्जन २८७ चूर्णरूप अञ्जन की मात्रा २८४ | चूर्णाञ्जन (लेखन) २८७ शलाका-निर्माण-विधि २८४ | चूर्णाञ्जन (रोपण) २८७ अञ्जन प्रयोग विधि एवं काल २८४ | चूर्णाञ्जन (प्रसादन) २८७ चन्द्रोदयावर्ति २८४ | शलाका-निर्माण-विधि २८७ करञ्जवर्ति २८४ | प्रत्यञ्जन-विधि २८८ समुद्रफेनादिवर्ति २८४ | नयनामृताञ्जन २८८ दन्तवर्ति २८५ | सर्पविषनाशक अञ्जन २८८ नीलोत्पलवर्ति २८५ | नेत्र-प्रसादन-विधि २८८ कुसुमिकावर्ति २८५ | नेत्र-सिंचन-विधि २८८ रसाञ्जनवर्ति २८५ | नेत्र-रक्षा का महत्त्व २८८ धात्र्यादिवर्ति २८५ | ग्रन्थकार की प्रार्थना २८८ तुत्थादि-रसक्रिया २८५ | शुभकामना २८९ वटक्षीर-रसाञ्जन २८५ | ग्रन्थ की उपयोगिता २८९ अतिनिद्रानाशक योग २८५ | प्रतिसंस्कर्ता का निवेदन २८९ तन्द्रानाशक योग २८५ | अञ्जननिदानम् २९० प्रबोधाञ्जन २८६ | रोग-परक सूची (अकारादि क्रमानुसार) २९७ दार्व्यादि रसक्रिया २८६ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
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पूर्वखण्डे
।। श्रीः।। श्रीशाङ्ग्र्धरेण प्रणीता शाङ्ग्र्धरसंहिता 'दीपिका' व्याख्यया विशेषवक्तव्यादिभिश्च विराजिता पूर्वखण्डे प्रथमोऽध्यायः परिभाषा
मङ्गलाचरणम् श्रियं स दद्याद् भवतां पुरारिर्यदङ्गतैजःप्रसरे भवानी। विराजते निर्मलचन्द्रिकायां महौषधीव ज्वलिता हिमाद्रौ ॥ 1 ॥ टीकाकर्तुः मङ्गलाचरणम् जयति साम्बशिवः सगणेश्वरः सकलरोगहरः सुखशान्तिदः। चरकसुश्रुतसारसदाशया जयति शार्ङ्गधराभिधसंहिता॥ आयुर्वेदमहाम्भोधेः पारगं छिन्नसंशयम्। लालचन्द्रं गुरुं नत्वा दीपिकां सन्तनोम्यहम्॥ पुर नामक असुर के विनाशक वे भगवान् शंकर आप सभी (प्राणियों) को श्री (कल्याण, मंगल, धन-धान्य) प्रदान करें, जिनकी शारीरिक कान्ति के विस्तार में हिमालय पर्वत पर निर्मल चाँदनी में प्रकाशमान दिव्य औषधी के सदृश भगवती भवानी (पार्वती) विशेष रूप से सुशोभित हो रही हैं। वक्तव्य-मंगलाचरण का प्रयोग पाठकों के कल्याण के लिए करने की प्राचीन परम्परा है। आयुर्वेद का उपदेश प्राणिमात्र के कल्याण के लिए होता है। यहाँ शिव (कल्याण-स्वरूप देव) को पुर नामक (अमंगलकारक रोग) का विनाशक कहा गया है। ओषधियों के स्वामी चन्द्रमा के प्रकाश को चन्द्रिका (चाँदनी) कहा जाता है। इसमें रोगशान्ति की अतुलनीय शक्ति है। भवानी को यहाँ महौषधि (दिव्य औषधि) की उपमा दी गयी है। आयुर्वेद में दिव्यौषधियों के अलौकिक प्रभावों की चर्चाएँ सुप्रसिद्ध हैं। इस प्रकार उक्त मंगलाचरण द्वारा लोक-कल्याण की सर्वतोमुखी कामना की गयी है।
महर्षि आत्रेय ने भी यह संकेत किया है कि हिमालय प्रदेश उत्तम औषधियों का आकर (खजाना) है। देखें-‘हिमवान् औषधभूमीनाम्।’-च० सू० अ० 25.40। और भी-‘औषधीनां परा भूमिर्हिमवान् शैलसत्तमः।’-च०चि०अ० 1.38। चन्द्रमा की थोड़ी बहुत चाँदनी सदैव रहती ही है, परन्तु निर्मल चन्द्रिका तभी प्राप्त होती है, जब चन्द्रमा पूर्ण रहता है। तभी औषध द्रव्यों का संग्रह किया जाता है, तभी उनसे पूर्ण गुणों की भी प्राप्ति होती है, क्योंकि चन्द्रमा ही औषधियों का राजा है। उनमें अमृतत्व गुण इसी से प्राप्त होता है। अतएव वेद में कहा है-‘ओषधयः समवदन्त सोमेन सह राज्ञा। यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन् पारयामसि’॥-शुक्लयजुर्वेद अ० 12 मं० 96। अर्थात् औषधियाँ अपने राजा चन्द्रमा से कहती हैं-‘विद्वान् चिकित्सक हमारा प्रयोग जिस रोगी के लिए करता है, हम उसे रोगों से मुक्त कर देती हैं।
ग्रन्थ का महत्त्व प्रसिद्धयोगा मुनिभिः प्रयुक्ताश्चिकित्सकैर्ये बहुशोऽनुभूताः। विधीयते शार्ङ्गधरेण तेषां सुसङ्ग्रहः सज्जनरञ्जनाय॥2॥ जो प्रसिद्ध अतएव उत्तम औषधयोग प्राचीन महर्षियों (चरक, सुश्रुत आदि) ने अपनी-अपनी संहिताओं में कहे हैं तथा जिन योगों का चिकित्सकों ने अनेक बार रोगियों पर अनुभव किया है, उन्हीं योगों का भली-भाँति संग्रह सज्जनों (परोपकारी पुरुषों) की प्रसन्नता के लिए श्रीशार्ङ्गधराचार्य ने अपनी इस संहिता में किया है।
2 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे वक्तव्य- उक्त पद्य द्वारा ग्रन्थकार ने यह प्रमाणित कर दिया है कि यह ग्रन्थ प्राचीन आयुर्वेदज्ञ महर्षियों के महत्त्वपूर्ण वचनों का संग्रह है। इसमें उन्हीं योगों का संग्रह किया गया है, जिनको चिकित्सकों ने अनेक बार प्रयोग करते हुए उन्हें सदैव सफल पाया और यह ग्रन्थ सज्जनों के मन को प्रसन्न करने के लिए, न कि किसी प्रकार के अभिमान को प्रकट करने के लिए लिखा गया है। निदान के बाद चिकित्सा-निर्देश हेत्वादिरूपाकृतिसात्म्यजातिभेदैः समीक्ष्यातुरसर्वरोगान् । चिकित्सितं कर्षणबृंहणाख्यं कुर्वीत वैद्यो विधिवत् सुयोगैः ॥ ३ ॥ चिकित्सक का परम कर्तव्य है कि वह निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय तथा सम्प्राप्ति की संख्या, विकल्प आदि भेदों की सहायता से रोगी के सभी रोगों (मूल रोग, सहयोगी रोग तथा उसके उपद्रव-स्वरूप उत्पन्न अन्य रोग इन सभी) को भली-भाँति बुद्धिपूर्वक देख (परीक्षा) कर शास्त्रोक्त विधि से सद्यः फलप्रद उत्तम औषधयोगों द्वारा कर्षण (बढ़े हुए दोष को घटाना) तथा बृंहण (घटे हुये दोष को बढ़ाकर सम स्थिति पर लाना) विधि से चिकित्सा करे। वक्तव्य- निदान आदि से सम्यक् परिचित होने के लिए 'माधवनिदान' का अवलोकन तथा मनन करें। विशेष जानकारी के लिए चरक तथा सुश्रुत के निदानस्थान का परिशीलन करें। यहाँ ग्रन्थकार ने रोग-चिकित्सा की अपेक्षा दोष- चिकित्सा पर अधिक बल दिया है, क्योंकि दोषों की विषमता को ही रोग कहते हैं और दोषों के समान रहने की स्थिति को आरोग्य, नीरोग या स्वस्थ कहा जाता है। यथा-'रोगस्तु दोषवैषम्यं दोषसाम्यमरोगता' ।-अ०हृ०सू०अ० 1.20। उक्त सम्पूर्ण विषय को महर्षि आत्रेय ने इस प्रकार कहा है-'यस्तु रोगमविज्ञाय कर्माण्यरभते भिषक्। अप्यौषधविधानज्ञस्तस्य सिद्धिर्यदृच्छया' ।। च० सू०अ० 20.21। निष्कर्ष यह है कि निदान-विधि से दोषों की स्थिति का भली-भाँति ज्ञान कर लेने के बाद ही तदनुसार सिद्ध एवं सफल योगों द्वारा चिकित्सा प्रारम्भ करनी चाहिये। रोग का निदान करते समय यह भी निर्णय कर लेना चाहिये कि यह दोषजनित है या आगन्तुक है, साध्य है या असाध्य है। कर्षण तथा बृंहण चिकित्सा का वर्णन प्राचीन संहिताओं में विस्तारपूर्वक किया गया है। आप उसका इन सन्दर्भों को देखकर अनुशीलन करें-च० सू० अ० 21, 22, 23। सु० सू० अ० 15, सु० चि० अ० 1 श्लोक 11-13, सु० उ० अ० 39 श्लोक 102-105। अ० सं० सू० अ० 24। अ० हृ० सू० अ० 14। दिव्यौषधियों के प्रभाव दिव्यौषधीनां बहवः प्रभेदा वृन्दारकाणामिव विस्फुरन्ति। ज्ञात्वेति सन्देहमपास्य धीरैः सम्भावनीया विविधप्रभावाः ॥ 4 ॥ देवताओं की विलक्षण शक्तियों के समान दिव्य (लोकोत्तरशक्ति-सम्पन्न) औषधियों की भी अनन्त शक्तियाँ स्फुरित होती (देखी जाती) हैं। यह जानकर तथा सन्देह को छोड़कर अर्थात् विश्वासपूर्वक धीर (धैर्य-सम्पन्न) चिकित्सकों को चाहिये कि वे उन औषधियों की विलक्षण शक्तियों की सम्भावना किया करें। वक्तव्य- आचार्य शार्ङ्गधर निदान के पश्चात् चिकित्सा की दृष्टि से द्रव्यों के गुण-धर्मों की ओर संकेत कर रहे हैं। सम्भवतः उनका दृष्टिकोण यह रहा है कि योग के बीच में परिगणित द्रव्य प्रधान द्रव्य के गुण-धर्म को बढ़ाने में सहयोगी होता है। यदि उसी द्रव्य का स्वतन्त्र प्रयोग किया जाता है, तो वहाँ उसका विशेष महत्त्व होता है, क्योंकि सभी औषधियों का राजा चन्द्रमा सबमें समान रूप से समय पर अमृत की वर्षा किया करता है। यह तो संग्रहकर्त्ता तथा प्रयोगकर्त्ता की योग्यता एवं अयोग्यता पर निर्भर है कि उसके द्वारा संगृहीत द्रव्य अपने पूर्ण गुणों को दे या न दे। स्मरणीय है कि आज भी अष्टवैद्यन् परम्परा में नारायण नम्बूदरीपाद की केरलप्रदेशीय 'एकौषधीयचिकित्सापद्धति' औषधियों के दिव्य प्रभाव का डंका पीट रही है। उक्त पद्य में दिव्य औषधियों की तुलना देवताओं के साथ केवल उनकी शक्तिमत्ता दिखलाने के लिए ही की गयी है। यही कारण है कि तुलसी आदि पौधे तथा पीपल आदि वृक्ष देवता के रूप में अपने गुणों के कारण आज भी पूजे जाते हैं। सन्देह अज्ञानमूलक होता है, अतः शास्त्राध्ययन द्वारा उसे हटा देना चाहिये। देखें-सु० सू० अ० 40 श्लोक 19-20। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
चिकित्सा-विधि-निर्देश
प्रथमोऽध्यायः ] परिभाषा 3 चिकित्सा-विधि-निर्देश स्वाभाविकागन्तुकायिकान्तरा रोगा भवेयुः किल कर्मदोषजाः। तच्छेदनार्थं दुरितापहारिणः श्रेयोमयान् योगवरान्नियोजयेत् ॥5॥ स्वाभाविक, आगन्तुक, कायिक तथा मानसिक रोग पूर्वजन्म-कृत अशुभ कर्मों के फलस्वरूप अथवा वात आदि दोषों के कारण प्राणिमात्र में निश्चित रूप से होते हैं। उनको नष्ट करने के लिए पापनाशक धर्मशास्त्रोक्त विविध प्रकार के प्रायश्चित्त आदि का अथवा वात आदि दोषों को समभाव में लाने के लिए उत्तमोत्तम (शास्त्रानुमोदित) योगों का प्रयोग करे। वक्तव्य- ऊपर चार प्रकार की व्याधियों का परिगणन किया गया है। उनका परिचय इस प्रकार है- 1. स्वाभाविक- स्वभाव (प्रकृति) के अनुसार होने वाली व्याधियाँ। जैसे-भूख, प्यास, नींद, बुढ़ापा आदि। ध्यान दें, ये भी रोग हैं, क्योंकि इनसे शरीर में पीड़ा होती है और इनकी चिकित्सा है-भोजन, जलपान, शयन तथा रसायन-सेवन। इन उपचारों से तात्कालिक लाभ होता है। 2. आगन्तुक- जो रोग बाहरी कारणों-अभिघात, भूतावेश तथा जहरीले प्राणियों के दंश आदि से उत्पन्न हों, उन्हें आगन्तुक कहते हैं। जैसे-चोट लगना, मारण, मोहन, उच्चाटन, भूत-प्रेतबाधा, साँप, बिच्छू, बर्रे आदि द्वारा डँसा जाना। 3. कायिक- काय=शरीर से सम्बन्धी सभी रोग। जैसे-ज्वर, अतिसार आदि। इनकी उत्पत्ति मिथ्या आहार-विहार के प्रयोग से तथा दूषित वात आदि दोषों से होती है, अतएव इसे 'आन्तरिक' कहा गया है। इन रोगों की परिधि में आने वाले रोग हैं-काम, क्रोध आदि तथा उन्माद, अपस्मार आदि। इनमें पूर्वजन्म में किये गये पापों के फल स्वरूप होने वाले रोग उक्त पापकर्मों के क्षय हो जाने पर अथवा उनको दूर करने वाले उपवासादि प्रायश्चित्तों को करने से उक्त रोगों का शमन हो जाता है। वात आदि दोषों के प्रकुपित (विषम) हो जाने के कारण उत्पन्न होने वाले ज्वर आदि रोग विधिपूर्वक उत्तम योगों द्वारा चिकित्सा करने से शान्त हो जाते हैं। विशेष- देखें-सु० सू० अ० 1.23 से 27 तक। ग्रन्थ की प्रामाणिकता प्रयोगानागमात् सिद्धान् प्रत्यक्षादनुमानतः। सर्वलोकहितार्थाय वक्ष्याम्यनतिविस्तरात् ॥6॥ प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम (शास्त्र) प्रमाण से सिद्ध (सदैव सफलता को देने वाले) प्रयोगों का मैं (शार्ङ्गधर) प्राणिमात्र के हित के लिए संक्षेप से वर्णन कर रहा हूँ। वक्तव्य- आत्मा, मन तथा बुद्धि के सहयोग से जो यथार्थज्ञान उत्पन्न होता है, उसे 'प्रत्यक्ष' कहते हैं। देखें-च० सू० अ० 11.20। व्याप्तिग्रहण के अनन्तर जिस अव्यभिचारी हेतु से हेतुमान् का ज्ञान होता है, उसे 'अनुमान' कहते हैं। जैसे-धूम के दर्शन से अग्नि का अनुमान तथा गर्भ-दर्शन से स्त्री-पुरुष के सहवास का अनुमान। देखें-च० सू० अ० 11.21-22। आगम शब्द का अर्थ है 'वेद' अथवा आप्त (प्रामाणिक)। ऋषि-महर्षियों द्वारा रचित शास्त्र को भी आगम कहते हैं, क्योंकि आप्त पुरुष रजोगुण तथा तमोगुण से मुक्त होते हैं। अतएव उनका ज्ञान सर्वदा शुद्ध एवं सत्य होता है। वे कभी असत्य भाषण नहीं करते। अतएव उनके रचित शास्त्र आगम कोटि के माने जाते हैं। देखें-च० सू० अ० 11.27। पूर्वखण्ड के अध्याय प्रथमं परिभाषा स्याद् भैषज्याख्यानकं तथा। नाडीपरीक्षाविधिरतस्तो दीपन-पाचनम् ॥7॥ ततः कलादिकाख्यानमाहारादिगतिस्तथा। रोगाणां गणना चैव पूर्वखण्डोऽयमीरितः ॥8॥ इस शार्ङ्गधरसंहिता के पूर्वखण्ड में सात अध्याय हैं। इसके पहले अध्याय में-परिभाषा (शास्त्र द्वारा निश्चित विषयों का विवरण), दूसरे में-औषध योगों के सेवन का समय एवं रस, गुण आदि का वर्णन, तीसरे में-नाड़ी-परीक्षा-विधि आदि विषयों का वर्णन, चौथे में-दीपन, पाचन, लेखन, भेदन आदि द्रव्यशक्तियों का वर्णन, पाँचवें में-कला, आशय आदि शारीरिक विषयों का वर्णन, छठे में-आहार, पाक आदि की गति का वर्णन और सातवें में-रोगों की गणना की गयी है। मध्यमखण्ड के अध्याय स्वरसः क्वाथफाण्टौ च हिमः कल्कश्च चूर्णकम्। तथैव गुटिकालेहौ स्नेहः सन्धानमेव च॥9॥ धातुशुद्धी रसाश्चैव खण्डोऽयं मध्यमः स्मृतः। मध्यमखण्ड में बारह अध्याय हैं। इसके पहले अध्याय में-स्वरस बनाने की विधि, उसके भेद एवं कुछ योग दिये गये हैं। दूसरे में-क्वाथ बनाने की विधि, उसके भेद और कुछ योग, तीसरे में-फाण्ट बनाने की विधि तथा उसके अनुरूप कुछ योग, चौथे में-हिम निर्माण-विधि, तत्सम्बन्धित कुछ योग, पाँचवें में-कल्क (चटनी) बनाने की विधि तथा कुछ
४ | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे
| ४ | शार्ङ्गधरसंहिता | [पूर्वखण्डे |
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[बायाँ स्तम्भ]
योग, छठे में-चूर्ण बनाने का विधि, कुछ प्रसिद्ध चूर्णयोग, सातवें में-गुटिका (गोलियाँ) तथा कतिपय योग, आठवें में-अवलेह निर्माण-विधि, कुछ प्रसिद्ध च्यवनप्राश आदि अवलेह योग, नवें में-स्नेह (घी-तेल आदि) पाक-विधि तथा कुछ चिकित्सोपयोगी स्नेह योग, दसवें में-सन्धान-विधि, आसव, अरिष्ट, सिरका आदि के निर्माण की विधि तथा कुछ प्रसिद्ध आसव-अरिष्टयोग एवं परस्पर भेद-विवरण, ग्यारहवें में-विविध प्रकार की धातुओं के शोधन तथा मारण की विधि और बारहवें में-रस (पारद), गन्धक का शोधन-मारण तथा सिद्ध रसयोगों का वर्णन किया गया है।
उत्तरखण्ड के अध्याय
स्नेहपानं स्वेदविधिरुर्वमनं च विरेचनम् ॥ १० ॥ ततस्तु स्नेहवस्तिः स्यात् ततश्चापि निरूहणम्। ततश्चाप्युत्तरो वस्तिस्ततो नस्यविधिर्मतः ॥ ११ ॥ धूमपानविधिश्चैव गण्डूषादिविधिस्तथा। लेपादीनां विधिः ख्यातस्तथा शोणितविस्रुतिः ॥ १२ ॥ नेत्रकर्मप्रकारश्च खण्डः स्यादुत्तरस्त्वयम्।
उत्तरखण्ड में तेरह अध्याय हैं। इसके पहले अध्याय में-स्नेहपान-विधि, स्नेहपाक-विधि और कुछ स्नेहयोग; दूसरे में-स्वेदन (शरीर से पसीना निकालने की) विधि, स्वेदन के विविध भेद; तीसरे में-वमन (उलटी कराने की) विधि, वामक (वमनकारक) योगों का वर्णन, वमन के लक्षण; चौथे में-विरेचन (दस्त कराने की) विधि, विरेचक योगों का वर्णन, विरेचन के लक्षण; पाँचवें में-अनुवासनवस्ति, उसकी विधि; अनुवासन योग; छठे में-निरूहणवस्ति, उसकी विधि, निरूहण योग; सातवें में-उत्तरवस्ति (यह वस्ति पुरुषों के मूत्रमार्ग में और स्त्रियों की योनि में दी जाती है), उत्तरवस्ति-विधि, उत्तरवस्ति में प्रयुक्त होने वाले योग; आठवें में-नस्य (नाक द्वारा ली जाने वाली औषधि) विधि, विविध नस्य योग; नवें में-धूमपान-विधि तथा उसके विविध योग; दसवें में-गण्डूष (कुल्ले करने की) विधि, विविध गण्डूष योग, कवल-धारण-विधि, अनेक प्रकार के कवल योग; ग्यारहवें में-लेप का विधि, विविध प्रकार के रोगों में प्रयुक्त होने वाले लेपयोग; बारहवें में-रक्तस्राव-विधि, रक्त-परिचय, रक्तस्रावहर योग तथा तेरहवें में-नेत्ररोगों की चिकित्सा-विधि नेत्ररोग-नाशक विविध योग आदि दिये गये हैं।
[दायाँ स्तम्भ]
अध्यायों तथा श्लोकों की गणना
द्वात्रिंशत्सम्मिताध्यायैर्युक्तेयं संहिता स्मृता ॥ १३ ॥ षड्विंशतिशतान्यत्र श्लोकानां गणितानि च।
प्रस्तुत शार्ङ्गधरसंहिता में बत्तीस अध्याय हैं (पूर्वखण्ड में ७, मध्यमखण्ड में १२ और उत्तरखण्ड में १३) और श्लोकों की संख्या २६०० (छब्बीस सौ) है।
वक्तव्य- इसका स्पष्टीकरण आलेख में देखें।
मान-परिभाषा
न मानेन विना युक्तिर्द्रव्याणां जायते क्वचित् ॥ १४ ॥ अतः प्रयोगकार्यार्थं मानमत्रोच्यते मया।
मान (परिमाण, नाप या तौल) के बिना औषधद्रव्यों की युक्ति (प्रयोग या व्यवहार) कहीं भी नहीं की जा सकती है। इसलिये प्रयोग करने के लिए मेरे द्वारा यहाँ विविध मानों का वर्णन किया जा रहा है।
वक्तव्य- आयुर्वेदीय आर्षसंहिताओं में दिये गये मागध तथा कालिङ्ग मानों की तुलना आधुनिक मानों के साथ हो सके, इसके लिए उक्त प्राचीन मानों का परिचय यहाँ दिया जा रहा है। वैसे आर्षग्रन्थों में दिये गये इन आर्यमानों की सत्ता मुगलशासन काल में ही समाप्त हो चली थी। आज जिन नाप-तौलों का व्यवहार है, उनसे हमें प्राचीन मानों का समन्वयात्मक ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिये। आचार्य भावमिश्र ने इस प्रकरण को शार्ङ्गधरसंहिता से प्रायः उद्धृत किया है-आप जरा मिला कर देखें-भा० प्र० निघण्टु मानपरिभाषा-प्रकरण।
मागधमान-परिभाषा
त्रसरेणुर्बुधैः प्रोक्तस्त्रिंशता परमाणुभिः ॥ १५ ॥ त्रसरेणुस्तु पर्यायेनाम्ना वंशी निगद्यते।
विद्वानों ने तीस परमाणुओं का एक त्रसरेणु स्वीकार किया है। 'त्रसरेणु' का ही पर्याय 'वंशी' कहा जाता है।
वक्तव्य- यद्यपि यहाँ तीस परमाणु परिमित एक परिमाण का नाम 'त्रसरेणु' है, तथापि इसका पारिभाषिक अर्थ इस प्रकार है-त्रस=चर या चल या चलायमान जो रेणु=धूल का कण। 'त्रसः च असौ रेणुः च=त्रसरेणुः'। इसका अन्यत्र परिचय इस प्रकार है-'जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः। प्रथमं तत्प्रमाणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते' ॥ -मनुस्मृति ८.१३२। तथा याज्ञवल्क्यस्मृति १.३६१।