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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

by श्रीमती हिमांशु द्विवेदी

DevanagariHindipublished208 pages
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कथा- 63

"शकटाल और चाणक्य की कथा"

शुक ने प्रभावती से कहा कि- जिस प्रकार शकटाल ने अपने कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिए उत्पन्न दुःख को चाणक्य के द्वारा नन्दकुल को उच्छिन्न कर दुःख का शमन किया उसी प्रकार यदि तुम भी करना जानती हो तो जाओ। अन्यथा तुम्हारा दूसरे के घर जाना युक्त नहीं है।

कहा गया है- जिसका परिवार तारागण है, जो औषधियों का स्वामी है, शरीर जिसका अमृतमय, जो कान्ति से युक्त है- ऐसा चन्द्रमा भी सूर्यमण्डल में जाकर कान्तिरहित हो जाता है। अतः यह सत्य है कि दूसरे के घर जाकर सभी लघुता को प्राप्त होते हैं।¹

कथा- 64

"मण्डुका और उसकी सखी देविका की कथा"

शुक ने प्रभावती से कहा कि-कूटपुर नामक गाँव में सोमराज नामक राजपूत था। जिसकी पत्नी मण्डुका बड़ी सुन्दर तथा परपुरुषों में आसक्त रहती थी। उसका उपभोग, संकेतित एक मनुष्य, घण्टा लिए, रात मे घर के आँगन में किया करता। एक दिन उसके पति ने घण्टे का शब्द सुनकर बैल के आने का सन्देह कर हाथ में लाठी लेकर दौड़ा।

मण्डुका के पति को घण्टा के शब्द का अनुसरण कर आता देखकर देविका नामक सखी ने उसे भगाकर घण्टा हाथ में ले लिया और कहा-


1 उडुगणपरिवारो नायकोऽप्योषधीना-
ममृृतमयशरीरः कान्तियुक्तोऽपि चन्द्रः।
भवति विकलमूर्तिमण्डलं प्राप्य भानोः
परसदननिविष्टः को न धत्ते लघुत्वम् ।।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 307, पेज सं० 257

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कामुक बैल घबड़ाकर भाग गया। वह लौटकर पत्नी से अपने पौरूष का वर्णन करने लगा।

कथा- 65

"श्रावक श्रीवत्स की कथा"

शुक ने प्रभावती से कहा कि– जनस्थान नामक नगर में नन्दन नामक राजा नाम के अनुसार गुणवाला था। उसी नगर में परम शिव भक्त श्रीवत्स नामक साधु था। एक बार वह शिष्यों समेत वाराणसी नगर को जा रहा था। रास्ते में एक शिष्य को मांस लाने के लिए भेजा। अन्य साधुओं ने उसे ऐसा करते देख लिया। जब सभी साधु बैठ गये तब वह साधु हँसने लगा और सभी साधुओं से पूछने पर कहा– यह ऐसा विचित्र शिष्य है। मैंने कहा–"मां संवर्तते" इति, इसने नासमझी से इस वाक्य के 'मां' के साथ संवर्तते के सम् को मिलाकर वाक्य का विच्छेद यों कर दिया–'मांसं वर्तते'। तदुनसार व्यवहार में प्रवृत्त हुआ।

कथा- 66

"हंसराट् शङ्खधवल की कथा"

भूतल पर निर्जन, पक्षियों को रुचिकर एवं प्रिय, दशयोजन विस्तृत एक रम्य वन है। उसमें दो कोस विस्तृत शीतल छाया वाले, जलाशय के तीर पर स्थित बरगद के वृक्ष पर हंसधवल नामक हंसराज कुटुम्ब समेत दिन भर विचरण करके शाम को विश्राम करता था। एक दिन वे हंस शिकारी की जाल में फँस गये। अपने कुटुम्ब को उस प्रतार जाल में बंधा जानकर शंखधवल ने कहा–पुत्रों! जब वह व्याध प्रातः तुम लोगों को देखे तो तुम सब मुर्दे के समान श्वांस छोड़कर लेट जाना और वह तुम्हें मरा हुआ समझकर भूमि पर फेंक देगा तो तुम सब उड़ जाना। बहेलिया प्रातः आया और उसने उनको मरा हुआ समझकर फेंक दिया और वे सब उड़कर अभीष्ट देश को चले गये।

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कथा- 67

"मकर और प्लवङ्गम (बन्दर) की कथा"

शुक ने प्रभावती से कहा कि- पुष्पाकर वन में वनप्रिय नाम का एक बौना वानर था। उसने समुद्र सीमा के जल में लोटते-पोटते घड़ियाल को देखकर कहा हे मित्र! क्या तुम जीवन से ऊब गये हो जो पृथ्वी तल पर आये हो।

उसने कहा- हे वानर! विधाता ने जिसके लिए जो स्थान और जो आजीविका विदित कर दी है, उसका मन उसी में रमता है अन्यत्र नहीं।¹

कहा भी गया है- (श्री रामचन्द्र जी कह रहे हैं) हे लक्ष्मण! सर्वतः स्वर्ण निर्मित लङ्का मुझे पसन्द नहीं, वंश परम्परा प्राप्त अयोध्या धन रहित भी मुझे सुखकर है।²

यह सुनकर उसने कहा-स्थल पर उत्पन्न प्राणी धन्य हैं जहाँ आप सरीखे प्रियवादी मित्र हैं। यह सुनकर वानर ने कहा-आज से तुम मेरे प्राणो से भी अधिक प्रिय मित्र हुए और उसे अमृत सदृश पके फल दिये।

मकर की पत्नी ने जब पके फलों का वृतान्त जाना तो उसने गर्भ के प्रभाव से वानर के हृदय का मांस खाने की अभिलाषा व्यक्त की।

मकर ने वानर से कहा-मित्र! मेरी पत्नी ने तुम्हें बुलाया है जरा चलकर मेरे घर की परिचर्या का भी अनुभव कीजिए। ऐसा विश्वास दिलाकर उसे पीठ पर बिठाकर चल दिया। शङ्कित वानर ने कहा-मित्र! वहाँ चलकर मुझे क्या करना होगा।

ऐसा सुनकर मगर ने सोचा अब तो मैं इसे उस स्थान पर ला चुका हूँ जहाँ से यह समुद्रतट, को वापस नहीं जा सकेगा इसलिए साफ-साफ बता दिया।


1 यस्य यद्विहितं स्थानं यस्य यद्वेतनं कृतम्।
तत्रैव रमते चित्त तस्य नान्यत्र वानर।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 313, पृ०सं० 263

2 सर्वस्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
पितुक्रमागतायोध्या निर्धनापि सुखायते।।
शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 314, पृ०सं० 263

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वानर ने कहा—मगर! तो तुम मुझे बेकार ले जाते हो क्योंकि मैं हृदयहीन हूँ। मेरा हृदय गूलर अथवा बरगद के पेड़ पर रहता है, उसे लेकर मैं पुनः जल में वापस आता हूँ।

ऐसा कहने पर मूर्ख मगर समुद्र के किनारे वापस आया। वानर भी उसकी पीठ से उछलकर वृक्ष पर चढ़ गया और मगर से बोला— अब पेड़ पर स्थित मुझे तुझ ऐसे लोग नही ग्रहण कर सकते।

कथा- 68

"वचचेवति की कथा"

विद्यास्थान नामक एक ब्राह्मणों का गाँव है। जहाँ पर केशव नामक ब्राह्मण ने स्नान के लिये गये हुए सरोवर पर एक सुन्दर बनिये की पुत्री देखी। वह उसके साथ रति करना चाहता था। वणिक् पुत्री ने ब्राह्मण से सिर पर दूसरा घड़ा रखने को कहा। घड़ा रखते समय उसने उसके ओठ चूम लिए। ऐसा करता हुआ वह उसके पति द्वारा देख लिया गया और राजा के पास लाया गया। उसका वितर्क नामक मित्र था। उसने उसके पास आकर यह कहा—मित्र!—राजा के पास पहुँचकर 'वचचेवति' वाक्य ही कहना और कुछ नहीं। वैसा करने पर मन्त्री ने कहा— यह निर्दोष है। इसकी ऐसी प्रकृति ही है। उसी उत्तर से लेकर लोक में विर्तक की सहायिका बुद्धि से वह सज्जनता को प्राप्त माना गया।

कथा- 69

"वेजिका की कथा"

कलास्थान नामक स्थान है, वहाँ एक बनिया था जिसकी भार्या वेजिका अत्यन्त प्रिय थी। एक दिन जब वह पति को स्नान करा रही थी तो उपपति को मार्ग पर जाता देखकर यहाँ काफी पानी नहीं है— ऐसा बहाना बनाकर पानी लेने घर से निकल पड़ी और उपपति के साथ बहुत समय लगा दिया। तब जार से उपभोग की

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गयी उसने अपने पति को धोखा देना सोचकर कुएँ में कूद गयी। बहुत शोरगुल मचा। कुएँ मे स्त्री गिर गयी-ऐसा प्रवाद फैल गया। उसके पति ने यह प्रवाद सुनकर अवश्य मेरी पत्नी कुएँ में गिर गयी होगी। वह जल्दी से आया और अपनी पत्नी को कुएँ में से निकाला और सम्मान किया।

कथा- 70

"प्रभावती और मदन की कथा"

इतनी कथाओ के अन्त होते-होते उसका पति मदन विनोद विदेश से आ गया। उसके आ जाने वह उसी प्रकार पूर्ववत् उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करने लगी। और बोली-आर्यपुत्र! आप वन्दनीय है जिनके घर में त्रिविक्रम के लाये हुए दो पक्षियों में से एक शुक सब लोगों का हितभाषी है, विशेषतः मेरा तो बन्धु के समान है, ज्यों-ज्यो वह शुक की प्रशंसा करती त्यों-त्यों शुक लज्जित होता जाता था।

तब मदन उसका वचन सुनकर बोला-शुक ने तुम्हारा क्या उपकार किया है। यह कैसे इस प्रकार गुणशाली हो गया।

उसने कहा-स्वामिन्! तुम्हारे विदेश चले जाने पर कुछ समय तक मैंने तुम्हारा वियोग सहा, बाद में दुष्ट सखियों की सङ्गति में पड़ गयी। अन्य पुरूष से रमण करने की इच्छा वाली मेरे गमन में बाधा डालने वाली सारिका को मैंने मारना चाहा, लेकिन वह उडकर दूर चली गयी। इस शुक ने अपने वाग्रपञ्च से मुझे सत्तर दिनों तक रोक रक्खा, अतः मैने कर्म से तो पाप नही किया केवल मनसा पाप किया।¹ आज से तुम मेरे जीवन-मरण के स्वामी हो-मेरा जीवन मरण आपके हाथ में हैं। ऐसा सुनकर मदनविनोद ने शुक से पूछ तो उसने कहा-


¹ अतो मया कर्मणा पापं नं विहितं मनसा तु कृतम्।
शुकसप्ततिः पेज सं० 276,

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दुष्टो की सङ्गति से सज्जन भी विकार को प्राप्त हो जाते हैं। दुर्योधन का साथ करने से भीष्म गायो को हरने के लिए गये थे।¹

क्योकि प्राचीन काल मे छल से विद्याधर ने राजा की पुत्री का उपभोग किया था। विद्याधर के द्वारा उपभुक्त उस कन्या को उसके पति ने निर्दोष ही माना और शुक ने मदन के आगे इस कथा को कहा-

भूतल पर मलय पर्वत है। उसके अङ्क पर मनोहर नाम गन्धर्वपुर है। उसमें मदन नामक गन्धर्व रहता था। उसकी रत्नावली नाम की पत्नी थी।

उनकी पुत्री मदनमञ्जरी थी। उसके रूप को देखकर देव अथवा दानव सभी उधोमुख अथवा पतनोन्मुख हो मुग्ध हो जाते थे।

एक दिन नारद जी आये। वे भी इसके रूप को देखकर मूर्च्छित और सकाम हो गये और वाद में होश आने पर शाप दिया कि इसका शील अवश्य भङ्ग होगा। तब राजा ने कहा-स्वामिन्! प्रसन्न होकर अनुग्रह करें।

नारद ने कहा-इसके शील के भङ्ग होने से इसे दोष नही होगा और न इसका पति परित्याग करेगा और कहा कि मेरु पर्वत पर विपुलापरी में रहने वाला कनकप्रभ नाम गन्धर्व है, वही तुम्हारी पुत्री का वर होगा।

तब मुनि के कथनानुसार उसका विवाह गन्धर्व के साथ हुआ। वह एक बार उसे छोड़कर कैलाश को गया। तब किसी विद्याधर ने उसके पति का गन्धर्व रूप धारण कर उसका भोग किया। उसे दुष्ट मानकर उसका पति देवी के सामने उसे मारने लगा तो उसने कहा स्वामी! तुमने मुझे वर दिया था कि तुम्हें गन्धर्व चक्रवर्ती पुत्र होगा तो क्यों बिना पुत्र का मुख देखे मर रही हूँ।


1 असतां सङ्गदोषेण साधवो यान्ति विक्रियाम्।
दुर्योधनप्रसङ्गेन भीष्मो गोहरणे गतः।
शुकसप्ततिः श्लोक सं० 338, पेज सं० 279

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इस प्रकार विलाप करती मदनमञ्जरी के सामने उसके विषय में देवी ने कनकप्रभ से कहा-हे गन्धर्व वीर इसका कोई दोष नही है, विद्याधर ने माया से तुम्हारा रूप धारण कर इसका उपभोग किया तो रहस्य न जानने वाली इसका दोष नही है और नारदमुनि का ऐसा शाप भी था।

हे वणिक् पुत्र! यदि मेरा वचन सत्य समझते हो तो इस निर्दोष के प्रति अनुग्रह करो। इस प्रकार शुक के कहने से मदन ने उसे अङ्गीकार किया। हरिदत्त ने भी पुत्र के आगमन से बडा भारी उत्सव किया। उस महोत्सव में एक दिव्यमाला आकाश से आ गिरी। उस माला का दर्शन होने पर शुक, सारिका और त्रिविक्रम शाप मुक्त हो स्वर्ग को गये। मदन भी प्रिया प्रभावती के साथ सुख भोगने लगा।

कथाओं का वर्गीकरण एवं उद्देश्य :

उपर्युक्त कहानियों में 69 कथायें शिक्षापरक हैं। 70 वी कथा भी जो कि उपसहार के रुप मे शुक द्वारा कही गयी भी शिक्षा प्रद तो है ही साथ ही निश्चित उद्देश्य को ध्यान मे रखकर कही गयी है। प्रत्येक कहानी का एक लक्ष्य है, एक उद्देश्य है। ये कहानियाँ आकर्षक एवं मनोरञ्जक होने के साथ ही एक उद्देश्य को भी व्यक्ति के समक्ष रखती हैं- वह है कुमार्ग से बचने का।

यदि इन कहानियो का वर्गीकरण किया जाय तो इनमें से लगभग आधे से अधिक अर्थात 40 से 45 कथाये व्यभिचारिणी स्त्रियों की कथायें हैं। इन कहानियों के मुख्य पात्र विवाहिता स्त्रियाँ है जो पति के रहने पर भी उपपति के साथ रति भोग करती है और पकडे जाने पर उसे किसी न किसी बहाने बड़े चालाकी के साथ छिपाने का प्रयत्न करती हैं। यशोदेवी, राजिका, धनश्री, श्रियादेवी आदि इसी श्रेणी की विवाहित स्त्रियाँ है। कुछ कथाये वेश्या स्त्रियों से सम्बन्धित हैं जो व्यभिचार के माध्यम से पुरुषों को धोखा देती हैं। जैसे-कलावती, मदनावेश्या आदि इसी श्रेणी के अंतर्गत आती हैं। कतिपय कथायें कुलटा स्त्रियों से भी सम्बन्धित हैं जो परपुरुषों का

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व्यभिचार के माध्यम से अपना स्वार्थ सिद्ध करती हैं जैसे- केलिका एवं धूर्तमाया कुट्टिनी की कथा। जो चौर्यरति सम्बन्धी शिक्षा देने के माध्यम से वणिक् पुत्र का सम्पूर्ण धन ग्रहण कर लेती हैं।

इन कहानियों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि 'शुकसप्तति' कालीन (14 वीं शताब्दी के आस-पास) समाज में विवाहित स्त्रियों की दाशा सुदृढ़ नहीं थी। पति के कार्यवश विदेश चले जाने पर पत्नियाँ अपने मनोरञ्जन हेतु व्यभिचार रूप कुमार्ग का अवलम्ब लेती थीं और उस घृणित कार्य का पता लग जाने पर उसे छिपाने के लिए कभी चतुरता पूर्वक, कभी बुद्धि-कौशल द्वारा और कभी व्यवहार-कौशल द्वारा उसे छिपाने का हर संभव उपाय करती थीं किन्तु समाज में एक ऐसा भी प्रबुद्ध वर्ग था जो इन स्त्रियो के विषय में यह चिन्ता करता था एवं प्रयत्न करता था कि वे कुमार्ग पर न जायें। वस्तुतः इसी भावना को लेकर शुकसप्तति की रचना हुई है। कवि शुक के माध्यम से यह अथक प्रयास कर रहा है कि कथा की नायिका प्रभावती मदनविनोद के परदेश चले जाने पर यह प्रयत्न कर रही है कि वह व्यभिचारिणी न बने, जिसके फलस्वरूप 70 कहानियों का जन्म हुआ। यद्यपि ये कहानियाँ कल्पित ही अधिक हैं किन्तु इस बात से भी नकारा नहीं जा सकता कि कवि इस प्रकार की स्त्रियों के आचरण से प्रभावित है। कुछ कथायें पशुओं से भी सम्बन्धित हैं। जैसे-शशक और पिङ्गलनाम सिंह की कथा, व्याघ्रचारी और सिंह की कथा, व्याघ्रमारी और जम्बुक की कथा, जम्बुक की मुक्ति की कथा, हंसराट् शङ्खधवल की कथा, आदि।

उपर्युक्त पशुओं की कथाओं के माध्यम से कवि सबल पर निर्बल प्राणी के विजय को द्योतित करना चाहता है। शश, वानर आदि निर्बल प्राणी होते हुये भी अपनी बुद्धि पराक्रम द्वारा शक्तिशाली, पराक्रमी सिंह जैसे पशुओं को कैसे परास्त करते हैं तथा अपने प्राणों की रक्षा करते हैं इत्यादि भावना को लक्ष्य में रखकर ये कथाये लिखी गयी हैं।

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चतुर्थ अध्याय : कथा में पात्रों का विधान एवं शुकसप्तति के पात्रें का परिचय

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कुछ जगह पक्षियों से सम्बन्धित कथाये भी हैं जैसे मन्दोदरी और उसके मयूर भक्षण की कथा।

एकादिक कथायें चोरो से सम्बन्धित हैं जैसे-सर्षपचौर की कथा।

कुछ कथायें भूत एवं पिशाचों से सम्बन्धित हैं- जैसे मूलदेव एवं पिशाच की कथा, करगरा एवं करगरानाथ की कथा।

इन पक्षियो एव भूत-प्रेतों की कथा के माध्यम से कवि ने सबल पर निर्बल की विजय किस प्रकार होती है आदि भावना का प्रदर्शन किया है।

इस प्रकार समस्त 70 कहानियों का पर्यालोचन करने के बाद दो ही प्रमुख विचार सम्मुख आते हैं-

  1. विवाहित स्त्री द्वारा कुमार्ग का अनुसरण न करना।
  2. पराक्रमी, शूरवीर किन्तु धोखेबाज प्राणियों से कमजोर व्यक्ति किस प्रकार अपनी रक्षा करें।

प्राचीन काल से चली आ रही ये दोनों ही भावनायें आज भी समाज में देखी जा सकती है।


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चतुर्थ अध्याय

कथा में पात्रों का विधान एवं

शुकसप्तति के पात्रों

का परिचय

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“कथा में पात्रों का विधान एवं शुकसप्तति के पात्रों का परिचय”

(अ) कथा में पात्र विधान

(1) कथा में पात्रों की उपयोगिता :

किसी भी काव्य का मूलाधार पात्र ही होता है। दशरूपक में धनञ्जय ने रुपक के प्रमुख तीन भेदक तत्व माना (1) वस्तु, (2) नेता, (3) रस। “वस्तु नेता रसस्तेषां भेदकः”।

वस्तु के पश्चात् पात्र कथा का अनिवार्य तत्व है क्योंकि पात्रों के अभाव में कथा का विकास असम्भव है। कथानक के अन्तर्गत पात्रों के आचरण, पात्रों के व्यवहार, उनके कथोपकथन, उनकी जीवनचर्या तात्कालिक सामाजिक एवं सास्कृतिक परिस्थितियों का बोध कराते हैं, साथ ही साथ कर्ता, कवि के जीवन आदि का रहस्योद्घाटन करते हैं।

पात्र रसभिव्यक्ति के केन्द्र बिन्दु होते है। वहीं कथा का आदि और अन्त कर्ता होता है। अतएव कथा में पात्रो की उपस्थिति तो और भी अनिवार्य हो जाती है। लघु कथाओ के अन्तर्गत विस्तृत विविधरूपो का दिग्दर्शन कर पाना तो कवि के लिए कठिन हो जाता है, किन्तु कवि पात्रों के चरित्र चित्रण के माध्यम से विविध प्रकार के जीवन संदेश देने का प्रयास करता है।

'शुकसप्तति' के कथाओं के अन्तर्गत विविध प्रकार के पात्रों का कथन हुआ है। इसमें राज परिवार, ब्राह्मण, राजा-महारानियाँ, राजकुमार, मन्त्री, सेनापति, स्वामीभक्त, सेवक, चोर, कपटी, दास-दासियाँ, गणिकायें गन्धर्व इत्यादि सभी वर्गों के पात्रों का इन कथाओं के माध्यम से वर्णन हुआ है।

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(2) पात्रों का वर्गीकरण :

पात्रो का वर्गीकरण कई आधारो पर किया गया है। सामान्यतया पात्र दो वर्गों मे रखे जाते है, (1) पुरुष पात्र, (2) स्त्रीपात्र। शुकसप्तति के समस्त पात्रों को प्रमुख रूप से चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है -

(1) समस्त पुरूष पात्र, (2) समस्त स्त्री पात्र, (3) पशु एवं पक्षी श्रेणी के पात्र, (4) भूत, पिशाच आदि। यद्यपि कथाओं में प्रधानता स्त्री और पुरुष पात्रों की है।

(क) इतिवृत्त के आधार पर :

कथावस्तु किसी भी रचना का मूलाधार है। कथावस्तु के स्वरूप के अनुसार ही उसके अन्तर्गत आने वाले समस्त पात्रों का स्वरूप निर्धारित होता है। कथावस्तु भी कई प्रकार की होती है दिव्य, अदिव्य अर्थात् मर्त्य और दिव्यादिव्य। दिव्य कथावस्तु के पात्र दिव्ययोनि के, अदिव्य में पृथ्वी लोक के तथा दिव्यादिव्य के अन्तर्गत पृथ्वीलोक से सम्बन्धित ऋषि, मुनि इत्यादि पात्र आते हैं।

शुकसप्तति के अधिकांश पात्र मर्त्य अर्थात् अदिव्य श्रेणी के हैं। कुछ पात्र जैस-गन्धर्व आदि दिव्य कोटि के है। जिनका परिचय आगे दिया जायेगा।

(ख) घटनाओं के आधार पर :

कथावस्तु की आवश्यकता एवं रसपरिपोषण की दृष्टि से अनेक प्रकार की घटनाओं की संरचना कवि करता है। जैसी घटनायें होती हैं उसी के अनुसार पात्रों का भी सृजन किया जाता है। कुछ घटनाओं का विषय राजवर्गीय होता है। कुछ प्रजावर्गीय अर्थात लोक या समाज से सम्बन्धित होती हैं। कुछ आर्षवर्गीय पात्रों को लेकर के उपदेशात्मक होती हैं। इस प्रकार घटनाओं के आधार पर पात्रों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है- (1) राजवर्गीय, (2) प्रजावर्गीय (लोक एवं समाज), (3) आर्षवर्गीय।

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राजा, मन्त्री, महारानियाँ, राजपुरूष इत्यादि राजवर्गीय पात्रो के अंतर्गत आते है जिनका पर्याप्त वर्णन शुकसप्तति मे हुआ है। जैसे- पुष्पहास और रानी, राजा सुदर्शन, राजा शत्रुमर्दन एव पुत्री मदनरेखा आदि की कथायें।

प्रजावर्गीय पात्रो मे साधारण कोटिक स्त्रियाँ, ब्राह्मण, वणिक्, कृषक, चोर, धूर्त, सेवक, (मास विक्रेता) अधिकांश कथाओं के पात्र इसी श्रेणी के हैं।

अनेक कथाओ मे शुकसप्तति में इस प्रकार के पात्रों का वर्णन है।

आर्षवर्गीय पात्रो मे ऋषि, मुनि, सन्यासी इत्यादि पात्र आते है। जिनका वर्णन भी शुकसप्तति मे यत्र-तत्र प्राप्त होता है। ये समस्त पात्र कथानक के मुख्य पात्र (नायक-नायिका) से व्यतिरिक्त सहायक पात्र रूप मे प्रयुक्त होते है।

(ग) नाट्यशास्त्रीय लक्षणों के आधार पर :

कथावस्तु के अन्तर्गत गौण पात्रो से व्यतिरिक्त मुख्यपात्र जिन्हें हम नायक-नायिका कह सकते हैं, का वर्णन होता है। नाट्यशास्त्र के अनुसार नायक मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं-

(1) धीरोद्धत, (2) धीरललित, (3) धीरोदात्त, (4) धीरप्रशान्त¹

नाट्यशास्त्रीय अन्य ग्रन्थों में भी नायक भेद देखे जा सकते है।²

सभी प्रकार के नायकों में धीर शब्द जुडा हुआ है। धीर का वस्तुतः अर्थ है - धैर्ययुक्त अर्थात् महान संकट मे भी कातर न होने वाला।³

दशरूपक के अनुसार नायक चार प्रकार के बतलाये गये हैं-


1 नाट्यशास्त्र- 24.16-17
2 नाट्यदर्पण- चतुर्थ विवेक सा०द० तृतीय परिच्छेद।
3 नाट्य दर्पण- 16

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(1) धीर ललित :

चिन्तरहित गीत आदि कलाओं का प्रेमी, सुखी और कोमल स्वभाव तथा आचार वाला नायक धीरललित कहलाता है।¹ जिस नरेश का भोग अर्थात् अप्राप्त वस्तु की प्राप्त (अप्राप्तस्य प्राप्तिर्योगः) तथा क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा- प्राप्तस्य परिरक्षण क्षेमः) की सिद्धि अमात्य इत्यादि के द्वारा कर दी जाती है। चिन्तरहित होने के कारण वह गीत आदि कलाओं मे संलग्न रहता है, और भोगों में आसक्त रहता है। श्रृंगार भाव की प्रधानता होने के कारण वह कोमल स्वभाव (सत्व = चित्त) तथा व्यवहार वाला होता है। इसी से इसे "मृदु" कहा गया है। यही ललित नायक है। यथा (कथा नं० 15) मे गुणाकर, (कथा नं० 19) में धनपाल, (कथा नं० 20) मे सूर नामक कृषक आदि भी धीरललित श्रेणी के नायक हैं।

(2) धीर प्रशान्त :

सामान्य गुणों से युक्त द्विज आदि नायक धीर प्रशान्त कहलाता है।² विनय इत्यादि जो नायक के सामान्य गुण³ कहे गये हैं उनसे युक्त द्विज, ब्राह्मण, वणिक्, मंत्री आदि धीरप्रशान्त नायक कहलाते हैं। निश्चिन्तता आदि गुणो से युक्त होने पर भी विप्र इत्यादि में शान्तता ही होती है, लालित्य प्रधान नही होता। यदि किसी विप्र मे धीरललित नायक के गुण विद्यमान हो तो वह भी धीर-प्रशान्त ही माना जायेगा। किन्तु यह नियम सर्वत्र चरितार्थ नहीं होता है, अन्य क्षत्रिय आदि भी धीर प्रशान्त हो सकते हैं जैसे बुद्ध धीर प्रशान्त नायक ही हैं। यथा - केशव (कथा न० 7) धीर प्रशान्त कोटि का पात्र है। ये कथा का प्रधान नायक नहीं है।


1   > निश्चिन्तो धीरललित कलासक्त सुखीमृदुः।

दशरूपक, द्वितीय प्रकाश,3 कारिका

2   > सामान्यगुणयुक्तस्तु धीरशान्तो द्विजादिकः ।

दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, 4 कारिका

3   > नेता विनीतो मधुरस्त्यागी दक्ष प्रियवदः।

रक्तलोकः शुचिर्वाग्मी रूढवंशः स्थिरो युवा।।
बुद्ध्युत्साहस्मृति प्रज्ञाकलामानसमन्वितः ।
शूरो दृढश्च तेजस्वी शास्त्रचक्षुश्च धार्मिकः।।
दशरूपक, द्वितीय प्रकाश,1 कारिका

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(3) धीरोदात्त :

उत्कृष्ट अन्त.करण वाला, अत्यन्त गम्भीर, क्षमाशील, आत्मश्लाघा न करने वाला, स्थिर अहभाव को दबाकर रखने वाला, दृढ़व्रती नायक धीरोदात्त कहलाता है। अर्थात् जिसका अन्त.करण शोक, क्रोध आदि से अभिभूत नही होता, अपनी प्रशंसा स्वय न करने वाला, उसका गर्व नम्रता से छिपा रहता है, जो स्वीकृत बात का निर्वाह करता है इस प्रकार का नायक धीरोदात्त नायक होता है। यथा - राजाविक्रमादित्य (कथा नं० 9) धीरोदात्त कोटि का नायक है।

(4) धीरोद्धत्त :

जिसमे घमण्ड और डाह अधिक होता है, जो माया और कपट में तत्पर होता है, अहंकारी, चंचल, क्रोधी तथा आत्मश्लाघा करने वाला है, वह धीरोद्धत्त नायक है। दर्प, शूरता इत्यादि का घमण्ड मात्सर्य (दूसरों की समृद्धि को) न सहना, मन्त्र की शक्ति से अविद्यमान वस्तु को प्रकट कर देना माया कहलाती है और किसी को छलना मात्र ही छद्म है, चल का अर्थ है- अस्थिर (चञ्चल), चण्ड- क्रोधयुक्त, विकत्थन अपने गुणों की प्रशंसा करने वाला, ऐसा धीरोद्धत नायक होता है। यथा- रावण, परशुराम आदि धीरोद्धत कोटि के नायक है।

इसी प्रकार शुकसप्तति ग्रन्थ मे विष्णु नामक पात्र (कथा न० 44) में धीरोद्धत कोटि का नायक है।

शृंगार रस सम्बन्धी अवस्थाओ के आधार पर नायक के चार भेद किये जा सकते है। (1) अनुकूल, (2) दक्षिण, (3) धृष्ट, (4) शठ¹ जिस नायक की एक ही नायिका होती है वह अनुकूल नायक है।² जैसे- शुकसप्तति का प्रमुख पात्र मदन विनोद, माधव सेठ (कथा नं० 32), महाधन वणिक् (कथा नं० 29), आर्य नामक वणिक्


1 सा०द० 3/35
2 “डनुकूलस्त्वेकनायिक.” । दशरूपक द्वितीय प्रकाश 11 वीं कारिका

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(कथा नं० 27), सुदर्शन नामक राजा आदि (कथा नं० 23) अनुकूल नायक हैं। जो नायक अन्य नायिका के द्वारा अपहृत चित्त होकर भी पूर्व नायिका के प्रति सहृदय रहता है वह दक्षिण नायक है।¹ यथा— शम्भु नामक विप्र (कथा न० 38), शम्बक नामक तिल-विक्रेता (कथा न० 35), प्रियवद नामक विप्र (कथा नं० 38) आदि दक्षिण नायक है। जिस नायक के अङ्गों मे अन्य नायिका के साथ किये गये रमण आदि चिन्ह विकार रूप मे स्पष्ट व्यक्त होते हैं वे धृष्ट नायक हैं।² पूर्वनायिका के प्रति गुप्त रूप से अप्रिय करने वाला शठ नायक होता है।³ इस प्रकार नायक के 48 भेद हैं। धीरललित इत्यादि चारो प्रकार के नायकों में ये चारों भेद देखे जाते हैं। 4 × 4 = 16 ये समस्त नायक ज्येष्ठ, मध्यम और अधम के भेद से 48 प्रकार के होते हैं।

अनेक प्रकार के नायकों के अतिरिक्त प्रधान नायक की सहायता करने वाले, कथानक के विकास में सहायक तथा प्रासंगिक इतिवृत्त के नायक के रूप में अनेक पात्र होते हैं, ये मुख्यतः नायक के सहायक के रूप में जाने जाते हैं। जैसे पताका नायक⁴ विदूषक⁵ आदि। शुकसप्तति में सहायक श्रेणी के पात्र अल्प हैं। प्रधान नायक के सहायक पात्रो के वर्णन का इसमे अभाव है क्योंकि अधिकांश कथायें नायिका प्रधान है।

कथावस्तु मे नायिका का एक प्रमुख एवं महत्वपूर्ण स्थान होता है। लक्षणकारो ने कथानक, चरित्र तथा शरीर की अवस्थाओ इत्यादि के आधार नायिकाओं के भी अनेक भेद किये हैं। "धनिक" के अनुसार सामान्यगुणों से युक्त नायिका होती है, वह तीन प्रकार की होती है। (1) स्वकीया (स्वस्त्री) (2) परकीया (परस्त्री) (3) साधारण


1 "दक्षिणोऽस्या सहृदयः" दशरूपक द्वितीय प्रकाश 8 वीं कारिका
2 व्यक्ताङ्गवैकृतो धृष्टो। दशरूपक द्वितीय प्रकाश 10 वीं कारिका
3 "गूढविप्रियकृच्छठः" दशरूपक द्वितीय प्रकाश 9 वीं कारिका
4 "पताकानायकस्त्वन्य पीठमर्दो विचक्षणः।
तस्यैवानुचरो भक्ताः किञ्चिदूनश्च तदगुणैः" दशरूपक द्वितीय प्रकाश 12 वीं कारिका
5 "एकविद्यो विटश्चान्यो हास्यकृच्च विदूषकः" दशरूपक द्वितीय प्रकाश 13 वीं कारिका

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स्त्री (गणिकाआदि)¹ शारीरिक अवस्था और कामचेष्टा की निपुणता के आधार पर नायिकाओ के तीन भेद होते है- (1) मुग्धा, (2) मध्या, (3) प्रौढा। नाट्य दर्पण में कुलजा, दिव्या, क्षत्रिया और पण्यस्त्री ये चार प्रकार की नायिकायें कही गयी हैं।²

स्वकीया नायिका शील, सरलता आदि गुणों से युक्त होती है। जैसे शुकसप्तति की प्रमुख पात्र प्रभावती स्वकीया नायिका है। स्वकीया नायिका तीन प्रकार की होती है- (1) मुग्धा, (2) मध्या, (3) प्रगल्भा।³ जिसकी अवस्था नवीन होती है जो रतिक्रीड़ा में झिझकने वाली और क्रोध करने मे कोमल होती है वह मुग्धा नायिका है।⁴ जिसमें यौवन और काम का उदय हो रहा हो, जो बेसुधी पर्यन्त रति में समर्थ है, वह मध्या नायिका है।⁵ जैसे धनश्री (कथा न० 14), सज्जनी (कथा नं० 24), मोहिनी (कथा नं० 27) देविका पुश्चली (कथा नं० 28) आदि मध्या नायिका की श्रेणी में आती हैं। जो यौवन में अन्धी सी, काम से उन्मत्त सी, आनन्द के कारण प्रियतम के अंङ्गो में प्रविष्ट होती हुई सी सुरत के आरम्भ में भी चेतना रहित हो जाती है। वह प्रगल्भा नायिका हैं⁶ जैसे- शशिप्रभा (कथा नं० 2), विषकन्या (कथा नं० 4), सुभगा (कथा न० 10), रम्भिका (कथा न० 11), राजिका (कथा नं० 13), जयिका (कथा नं० 15), स्वच्छन्दा (कथा नं० 19), केलिका (कथा न० 20), मन्दोदरी (कथा न० 21), मादुका (कथा नं० 22), सुन्दरी (कथा न० 29), रत्ना देवी (कथा न० 26) राजिनी (कथा नं० 32), सुभगा (कथा नं० 37), रुक्मिणी (कथा न० 59), तेजुका (कथा नं० 61), मण्डुका (कथा नं० 64) आदि प्रगल्भा नायिकाओं की श्रेणी में आती हैं।


1 साहित्यदर्पण 3/56, भाव प्रकाश 94, पक्ति, काव्यानु० 7/26
2 नाट्य दर्पण 4/255
3 मुग्धा मध्या प्रगल्भेति स्वीया शीलार्जवादियुक्।
4 मुग्धा नववय कामा रतौ वामा मृदु क्रुधि। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, 26 वीं कारिका।
5 मध्योद्भूतौवनानङ्गा मोहान्तसुरतक्षमा। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, 27 वीं कारिका।
6 यौवनान्धा स्मरोत्मत्ता प्रगल्भा ययिताङ्गके।
विलीयमानेवानन्दाद्गतारम्भेऽप्चेतना।। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, 29 वीं कारिका।

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परकीया नायिका दो प्रकार की होती है - कन्या तथा विवाहिता। विवाहिता स्त्री को कभी भी प्रधान रस की नायिका नहीं बनाना चाहिए, जबकि कन्या को कवि मुख्य या अमुख्य रस का आधार बना सकता है।¹

साधारण स्त्री तो गणिका होती है जो कला, प्रगल्भता और धूर्तता से युक्त होती है।² वह छिपकर प्रेम करने वाले, सुखपूर्वक धन प्राप्त करने वाले, अज्ञानी, स्वच्छन्द, अहङ्कारी और पण्डक (नपुंसक) आदि को, यदि धनवान हो तो अनुरक्ता के समान प्रसन्न करती है और धनरहित होने पर इनको (नि.स्वान) माता के द्वारा निकलवा देती है।³ जैसे- कलावती नामक वेश्या (कथा नं० 23), कुटनी (कथा नं० 17) साधरण स्त्री की श्रेणी में आती है। भाव-प्रकाश तथा साहित्य दर्पण में भी सामान्य नायिका का विस्तृत वर्णन किया गया है।⁴

उपर्युक्त वर्णित नायक नायिकाओं के लक्षण एवं स्वरूप का अवलोकन करने के पश्चात् यही कहना उचित प्रतीत होता है कि शुकसप्तति की प्रत्येक कथा में धीरललित या धीरप्रशान्त या धीरोदात्त या धीरोद्धत एवं अनुकूल तथा दक्षिण नायक पाये जाते हैं किन्तु अधिकता दक्षिण नायक की है, ठीक इसी प्रकार शुकसप्तति की प्रत्येक कथा नायिका प्रधान है और प्रत्येक कथा में नायिका का स्वरूप शृङ्गारी है किन्तु कुछ ही कथाये ऐसी है जिनकी नायिकायें मध्या श्रेणी की हैं। इसके अतिरिक्त यदि यह कहा जाय कि अधिकतर कथाओं की नायिकायें प्रगल्भा श्रेणी की नायिका के अन्तर्गत आती है तो शायद यह गलत नहीं होगा।


1 अन्यस्त्री कन्यकोढा च नान्योढाऽङ्गिरसे क्वचित्।
कन्यानुरागमिच्छात कुर्यादङ्गाङ्गिरसश्रयम्। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश 32 वीं कारिका
2 साधरणस्त्री गणिका कलाप्रागल्भ्यधौर्त्ययुक्। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश 33 वीं कारिका
3 छन्नकामसुखार्थाज्ञस्वतन्त्राह्युपण्डकान्
रक्तेव रञ्जयेदाढ्यान्निःस्वान्मात्र विवासयेत। दशरूपक, द्वितीय प्रकाश 34 वीं कारिका
4 भाव-प्रकाश (95 4), सा० द० (3.67-71),

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(ब) शुकसप्तति के प्रमुख पात्रें का परिचय :

(1) मुख्य पात्र :

(क) मदन विनोद :

मदनविनोद धीरोदात्त श्रेणी का नायक है। यद्यपि इस ग्रथ के अन्तर्गत मदन विनोद का प्रारंभिक जीवन विषयासक्त कुपुत्र का है किन्तु बाद मे सन्मार्ग का अवलम्ब कर देशान्तर जाना एवं अर्थ सचय इत्यादि करके लौटना आदि कार्य उसे धीरोदात्त नायक की श्रेणी मे स्थापित करते है। शुकसप्तति का यह प्रमुख पात्र है, यद्यपि कवि ने इसका अत्यल्प शब्दो में वर्णन किया है एव अन्य कथाओं के विकास मे इसका योगदान भी नगण्य है तथापि अन्य कथाओ को जन्म देने मे इस पात्र की अभावमूलक भूमिका अवश्य है।

मदनविनोद हरिदत्त नामक सेठ का पुत्र है जो विषयासक्त किन्तु पिता के प्रयास से एव शुक के उपदेश से कुमार्गगामी वह पुत्र माता-पिता के प्रति विनयशील बन जाता है। तदन्तर माता-पिता को प्रणाम कर, अनुज्ञा लेकर और पत्नी से पूछकर देशान्तर को चला जाता है।

मदनविनोद एक बुद्धिमान एवं चतुर पति है। वह एक पत्नीव्रती है। उसे इस बात की आशङ्का रहती है कि उसकी अनुपस्थिति में उसकी शोक-ग्रस्त पत्नी वियोग के दिन किस प्रकार काट पायेगी। उसके कुमार्गगामी होने का भय भी उसे है अतः वह शुक एवं सारिका जो कि एक कुशल, उपदेशक के रूप मे काव्य में वर्णित हैं उन पर अपनी पत्नी की रक्षा का भार उसे सौंप जाता है।

मदनविनोद की ऐतिहासिकता संदिग्ध है क्योंकि इस पात्र का इतिहास में कहीं कोई वर्णन नही मिलता। यह कवि द्वारा एक कल्पित पात्र है। जो अपरोक्ष रूप में प्रमुख पात्र के रूप मे ग्रंथ मे वर्णित है।

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