वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
सूक्ष्मशरीर निरूपण १९१ 'चन्द्रिका' - पञ्चज्ञानेन्द्रिय बुद्धि और मन तथा इनसे निर्मित विज्ञानमय एवं मनोमयकोशों की उत्पत्ति का कथन करने के उपरान्त प्रस्तुत गद्यखण्ड में ग्रन्थकार प्राणमयकोश की सृष्टि को कहते हैं। प्राणमयकोश में आकाशादि सूक्ष्मभूतों के रजोंऽशों से अलग-अलग उत्पन्न हुई वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ नामक पञ्चकर्मेन्द्रियाँ तथा उन्हीं आकाश आदि सूक्ष्मभूतों के रजोगुण के मिश्रित अंशों से उत्पन्न होने वाली प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान नामक पञ्चवायुओं का समूह होता है। प्राणमयकोश में क्रियाशीलता का प्राधान्य ही इसमें रजोगुण की प्रमुखता को प्रदर्शित करता है। इस आधार पर पञ्चकर्मेन्द्रिय एवं पञ्चप्राण इन दोनों की उत्पत्ति आकाशादि सूक्ष्मभूतों के रजोगुण द्वारा मानी गयी है। इसका यही तात्पर्य है कि इनकी उत्पत्ति में यद्यपि सत्त्व, रजस् एवं तमस् तीनों गुण अपनी-अपनी भूमिका निर्वाह करते हैं, किन्तु प्रधानता इनमें रजोगुण की ही होती है, क्योंकि अन्य गुणों के सहयोग के अभाव में कोई भी अकेला गुण किसीप्रकार की सृष्टि करने में समर्थ नहीं होता है, न ही उसका अस्तित्व ही सम्भव है। पञ्चकर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति सूक्ष्म आकाश आदि के रजोगुण के अंश से क्रमशः अलग-अलग होती है। इसका अभिप्राय यही है कि सूक्ष्म आकाशगत रजोगुण से वाक् नामक कर्मेन्द्रिय, वायुगत रजोगुण से हस्त, अग्निगत रजोगुण से पाद, जलगत रजोगुण से पायु अर्थात् गुदाद्वार तथा पृथिवीगत रजोगुण से उपस्थ अर्थात् मूत्रेन्द्रिय की उत्पत्ति होती है। इन सभी में कर्म की प्रधानता होने से इनका रजोगुणनिर्मित होना सिद्ध होता है। इनमें वाणी द्वारा बोलना, हाथों द्वारा आदान-प्रदान, पैरों द्वारा चलना, पायु द्वारा मलनिस्सारण तथा उपस्थ द्वारा मूत्रनिस्सारण, सन्तति उत्पन्न करना तथा आनन्द प्रदान करना रूप कार्य सम्पादित किए जाते हैं। तत्पश्चात् ग्रन्थकार प्राण, अपानादि पञ्चवायुओं के शरीर में स्थान तथा कार्य के विषय में कहते हैं-इनमें प्राण नामक वायु नासिका के अग्रभाग पर विद्यमान रहती है तथा शरीर में सामने की ओर चलती है। श्वास-प्रश्वास द्वारा हम इसका प्रतिदिन अनुभव करते हैं। अपानवायु शरीर में गुदा स्थान पर निवास करती है तथा इसकी गति नीचे की ओर होती है। शरीर के सभी अङ्गों में समानरूप 'से व्याप्त रहते हुए विचरण करने वाली वायु ही व्यान है। इसके द्वारा शरीर में रक्त संचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त
१९२ वेदान्तसार कण्ठस्थान में रहने वाली तथा प्राण निकलने के समय ऊपर की ओर गति करने वाली वायु को उदान कहते हैं। शरीर के अन्दर खाए हुए अन्नादि तथा पीये हुए जलादि को पचाने वाली वायु ही वस्तुतः 'समान' है, क्योंकि यह भक्ष्य एवं पेय पदार्थों का समानीकरण (पचाना) रूप कार्य सम्पादित करती है। पञ्चवायुओं के कथन के प्रसङ्ग में ही ग्रन्थकार सांख्यमत के अनुसार बतायी गयी नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनञ्जय नामक अन्य पाँच वायुओं का उल्लेख, उनका कार्य बताते हुए 'केचित्' इत्यादि कहकर करते हैं। तदनुसार-छींक लाने वाली अथवा वमन कराने वाली वायु 'नाग' है। कूर्म नामक वायु पलकों को झपकाकर नेत्रों के मीलन एवं उन्मीलनरूप कार्य को करती है। कृकल नामक वायु क्षुधा को बढ़ाती है। इसके अतिरिक्त जम्भाईं लाने का कार्य देवदत्त नामक वायु द्वारा किया जाता है। जबकि धनञ्जय नामक वायु द्वारा शरीर को पुष्ट किया जाता है। किन्तु वेदान्तशास्त्री इन अतिरिक्त पाँच वायुओं का अन्तर्भाव पूर्वकथित वायुओं में ही इसप्रकार करके इन्हें अलग से मान्यता प्रदान नहीं करते हैं-उद्गिरण का कार्य उदान नामक वायु द्वारा ही सम्पादित करने से 'नाग' नामक वायु की पृथक् से मानने की आवश्यकता नहीं है। इसीप्रकार अंग विशेष के संकोच-विकोचरूपी उन्मीलन का कार्य व्यान द्वारा कर दिये जाने से 'कूर्म' की पृथक् मान्यता उचित नहीं है। अन्नादि का समीकरण करने वाली समान वायु में भूख को बढ़ाने वाली कृकल नामक वायु का अन्तर्भाव हो जाता है। इसीप्रकार जृम्भण आदि की कारणभूत देवदत्त नामक वायु का, विकृत वायु को निकालने की हेतुरूप अपान में एवं पोषण करने वाली धनञ्जय नामक वायु का 'समान' में सहज ही अन्तर्भाव हो जाने से इनको पृथक्रूप में मानना न्यायसंगत नहीं है। विशेष-(1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में 'प्राणमयकोश' का कथन किया गया है। (2) पञ्चकर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति उनमें क्रियाशीलता की प्रधानता के कारण सूक्ष्म आकाशादिभूतों के रजोंऽश से क्रमशः पृथक्-पृथक् बतायी गई है, जबकि पञ्चवायु को इन्हीं सूक्ष्मभूतों के मिश्रित रजोंऽशों से उत्पन्न बताया है, क्योंकि रजोगुण क्रियाशील माना गया है-उपष्टम्भं चलं च रजः (सांख्यकारिका)
सूक्ष्मशरीर निरूपण १९३. (३) यहाँ प्रयुक्त प्रथम 'केचित्' पद सांख्यमतावलम्बी विद्वानों के लिए तथा द्वितीय 'केचित्' वेदान्तमतावलम्बी विद्वानों के लिए प्रयुक्त हुआ है। (४) प्राणमयकोश भी सूक्ष्मशरीर का एक अंग है। अतः यहाँ इसका विस्तृतवर्णन किया गया है। (५) प्रस्तुत प्रकरण को चित्रात्मकरूप में समझने के लिए द्रष्टव्य भूमिका में चित्रसंख्या चार, पाँच एवं छः। अवतरणिका-सूक्ष्मशरीर के कोषत्रय के बाह्यस्वरूप का कथन करके दैनिकव्यवहार में उनकी भूमिका का कथन करते हैं- एतेषु कोशेषु मध्ये विज्ञानमयो ज्ञानशक्तिमान् कर्तृरूपः। मनोमय इच्छाशक्तिमान् करणरूपः। प्राणमयः क्रियाशक्तिमान् कार्यरूपः। योग्यत्वादेवमेतेषां विभाग इति वर्णयन्ति। एतत्कोशत्रयं मिलितं सत्सूक्ष्मशरीरमित्युच्यते॥१३॥ पदच्छेद- एतेषु कोशेषु मध्ये विज्ञानमयः शक्तिमान् कर्तृरूपः। मनोमयः इच्छाशक्तिमान् करणरूपः। प्राणमयः क्रियाशक्तिमान् कार्यरूपः। योग्यत्वात् एवम् एतेषाम् विभागः इति वर्णयन्ति। एतत् कोषत्रयम् मिलितम् सत् सूक्ष्मशरीरम् इति उच्यते॥13॥ अनुवाद-इन (तीन) कोशों के बीच ज्ञानशक्ति से युक्त विज्ञानमयकोश कर्तारूप है। इच्छाशक्ति से युक्त मनोमयकोश करणरूप है। क्रियाशक्ति से युक्त प्राणमयकोश कार्यरूप है। इनकी योग्यता के आधार पर ही (विद्वान् लोग) इसप्रकार इनका विभागरूप में वर्णन करते हैं। ये तीनों कोश मिलकर ही 'सूक्ष्मशरीर' इसप्रकार कहे जाते हैं। 'चन्द्रिका'-यहाँ तक ग्रन्थकार ने सत्रह अवयवों से युक्त सूक्ष्मशरीर, जिसे लिङ्गशरीर भी कहते हैं, का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया। साथ ही बताया कि इसमें विज्ञानमय, मनोमय एवं प्राणमय कुल तीन कोश होते हैं। ये तीनों कोश ही वस्तुतः कर्ता, करण एवं क्रियारूप हैं, इस बात का प्रस्तुत गद्यखण्ड में प्रतिपादन करते हैं- विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय इन तीनों कोशों के अन्तर्गत प्रथम विज्ञानमयकोश, जिसका निर्माण पञ्चज्ञानेन्द्रिय तथा बुद्धि इन छः तत्त्वों द्वारा होता है, ज्ञानशक्ति से सम्पन्न होने के कारण दैनिक कार्यव्यवहार का कर्ता कहलाता है, क्योंकि ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से विषयों को ग्रहण करके मन
१९४ वेदान्तसार के संकल्प-विकल्पात्मक सहयोग द्वारा बुद्धि ही वस्तु के विषय में 'ग्राह्य' अथवा 'त्याज्य' निर्णय करती है। इसके अतिरिक्त इसी विज्ञानमयकोश में ही चैतन्यतत्त्व के साथ अपेक्षाकृत अधिक निकटता होती है। अतः इसकी प्रधानता स्वतःसिद्ध है। बुद्धि का प्राधान्य होने से यह ज्ञानशक्तिसम्पन्न माना गया है। साथ ही प्रत्येक वस्तु के साथ भोक्ताभाव होने एवं कर्तृत्व का अभिमान होने के कारण यही कोश कर्ता कहा जाता है। श्रुतिवचन भी इसमें प्रमाण है- “योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिःपुरुषः” इसीप्रकार मनोमयकोश इच्छाशक्तिसम्पन्न होता है। विषय को बुद्धि के पास तक पहुँचाने में मन एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करता हैं, क्योंकि बुद्धि एवं इन्द्रियों के कार्य करने पर भी मन के इधर-उधर होने अर्थात् उस विषय में सम्यक्रूप से उपस्थित न होने से बुद्धि, विषय को ग्रहण नहीं कर पाती है। 'मेरा मन अन्यत्र था, अतः मैंने नहीं सुना' इत्यादि अनुभव इस कथन की पुष्टि में प्रमाण है। इसलिए सिद्ध होता है कि ज्ञान के होने अथवा न होने में मन 'साधकतम' की भूमिका का निर्वाह करता है। इसीलिए उसे यहाँ करणरूप में प्रतिपादित किया गया है। प्राणमयकोश के अन्तर्गत पञ्चकर्मेन्द्रियाँ एवं पञ्चप्राण आते हैं। सूक्ष्म भूत आकाशादि के रजोंऽशों से इनका निर्माण होता है। गीता एवं सांख्यदर्शन ने रजोगुण को क्रियाशील माना है-‘रजः कर्मणि भारत’-गीता, 'उपष्टम्भकं चलं च रजः' (सांख्यकारिका)। रजोंऽश का कार्य होने के कारण प्राणमय कोश में क्रियाशीलता के दर्शन होते हैं। वाणीरूप कर्मेन्द्रिय बोलने का, हाथ आदान-प्रदान का, पैर चलने का तथा पायु एवं उपस्थ मलमूत्र के निस्सारण का कार्य करती हैं। ठीक इसीप्रकार शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में निवास करने वाले प्राण, आदि वायु भी शरीर को स्वस्थ रखते हुए उसे गतिशील बनाए रखने में सहायक होते हैं। इसीलिए क्रियाशक्ति सम्पन्न होने से प्राणमयकोश को कार्यरूप बताया गया है। श्रुति का यह वचन भी इसके कार्यरूपत्व को सिद्ध करता है- “तौ मिथुनं समेतां ततः प्राणोऽजायत” इसप्रकार विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय इन तीन कोशों में अलग-अलग क्रमशः कर्ता, करण एवं क्रियारूप योग्यता होने के कारण ही
सूक्ष्मशरीर निरूपण १९५ इनकी अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार ही इन्हें शास्त्रों में उक्त कर्ता आदि नामों के रूप में विभक्त किया गया है। अर्थात् उपर्युक्त विभाग एवं नामकरण का आधार मुख्यतया इन कोशों की अपनी योग्यता एवं क्षमता ही है। अन्य कुछ नहीं। अतः विज्ञानमय, मनोमय एवं प्राणमय ये तीनों कोश मिलकर ही 'सूक्ष्मशरीर' कहलाते हैं। विशेष- (1) प्रस्तुत गद्यखण्ड में विज्ञानमयकोश को कर्ता, मनोमय को करण तथा प्राणमयकोश को क्रियारूप में प्रतिपादित किया गया है। (2) इनके इन कर्ता आदि के लिए उनकी योग्यता को ही आधार माना है। (3) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र-४० सूक्ष्मशरीर बुद्धि+पञ्चज्ञानेन्द्रिय मन+पञ्चज्ञानेन्द्रिय पञ्चकर्मेन्द्रिय+पञ्चप्राण विज्ञानमय कोश मनोमय कोश प्राणमय कोश शक्तिमान् इच्छाशक्तिमान् क्रियाशक्तिमान् कर्तृरूप करणरूप क्रियारूप अवतरणिका-तत्पश्चात् सम्पूर्ण चराचरजगत् के सूक्ष्मशरीरों में एकत्व की विवक्षा से समष्टिरूप एवं अलग-अलग कहने की दृष्टि से व्यष्टिरूप में क्रमशः जलाशय और जल में प्रतिबिम्बित आकाश के समान एकता का प्रतिपादन करते हैं- अत्राप्यखिलसूक्ष्मशरीरमेकबुद्धिविषयतया वनवज्जलाशयवद्वा समष्टिरनेकबुद्धिविषयतया वृक्षवज्जलवद्वा व्यष्टिरपि भवति। एतत्समष्ट्युपहितं चैतन्यं सूत्रात्मा हिरण्यगर्भः प्राण श्चेत्युच्यते सर्वत्रानुस्यूतत्वाज्ज्ञानेच्छाक्रियाशक्तिमदुपहितत्वाच्च। अस्यैषा समष्टिः स्थूलप्रपञ्चापेक्षया सूक्ष्मत्वात्सूक्ष्मशरीरं विज्ञानमयादिकोशत्रयं जाग्रद्वासनामयत्वात्स्वप्नोऽत एव स्थूलप्रपञ्चलयस्थानमिति चोच्यते। एतद्व्यष्ट्युपहितं चैतन्यं तैजसो भवति तेजोमयान्तःकरणोपहितत्वात्। अस्यापीयं व्यष्टिः स्थूलशरीरापेक्षया सूक्ष्मत्वादिति हेतोरेव सूक्ष्मशरीरं
१९६ वेदान्तसार विज्ञानमयादिकोशत्रयं जाग्रद्वासनामयत्वात्स्वप्नोऽत एव स्थूलशरीरलयस्थानमिति चोच्यते। एतौ सूत्रात्मतैजसौ तदानीं मनोवृत्तिभिः सूक्ष्मविषयाननुभवतः ‘प्रविविक्तभुक्तैजस’ इत्यादिश्रुतेः। अत्रापि समष्टिव्यष्ट्योस्तदुपहितसूत्रात्म- तैजसयोर्वनवृक्षवत्तदवच्छिन्नाकाशवच्च जलाशयजलवत्तद् तप्रतिबिम्बा- काशवच्चाभेदः। एवं सूक्ष्मशरीरोत्पत्तिः॥१४॥ पदच्छेद-अत्र अपि अखिलसूक्ष्मशरीरम् एकबुद्धिविषयतया वनवत् जलाशयवत् वा समष्टिः अनेकबुद्धि-विषयतया वृक्षवत् जलवत् वा व्यष्टिः अपि भवति। एतत् समष्टि उपहितम् चैतन्यम् सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भः प्राणः च इति उच्यते। सर्वत्र अनुस्यूतत्वात् ज्ञानेच्छा-क्रिया शक्तिमद् उपहितत्वात् च अस्य एषा समष्टिः स्थूलप्रपञ्च-अपेक्षया सूक्ष्मत्वात् सूक्ष्मशरीरम्, विज्ञानमयादि कोशत्रयम् जाग्रद् वासनामयत्वात् स्वप्नः, अत एव स्थूल-प्रपञ्चलयस्थानम् इति च उच्यते। एतद् व्यष्टि-उपहितम् चैतन्यम् तेजसः भवति, तेजोमय-अन्तःकरण-उपहितत्वात्। अस्य अपि इयम् व्यष्टिः स्थूलशरीर-अपेक्षया सूक्ष्मत्वाद् इति हेतोः एव सूक्ष्मशरीरम्, विज्ञानमयादि कोशत्रयम्, जाग्रद्वासनामयत्वात् स्वप्नः अतः एव स्थूलशरीर-लयस्थानम् इति च उच्यते। एतौ सूत्रात्मतेजसौ तदानीम् मनोवृत्तिभिः सूक्ष्मविषयान् अनुभवतः ‘प्रविविक्तभुक् तेजसः’ इत्यादि श्रुतेः। अत्र अपि समष्टि-व्यष्ट्योः तद् उपहित-सूत्रात्मतैजसयोः वनवृक्षवत् तद् अवच्छिन्न-आकाशवत् च जलाशय-जलवत् तद्गत-प्रतिबिम्ब-आकाशवत् च अभेदः। एवम् सूक्ष्मशरीरोत्पत्तिः।।14।। अनुवाद-यहाँ भी सम्पूर्ण चराचर के सूक्ष्मशरीर, एकत्व के ज्ञान का विषय होने से वन अथवा जलाशय के समान समष्टि एवं अनेकत्व के ज्ञान का विषय होने से वृक्ष अथवा जल के समान व्यष्टि वाला भी होता है। इस समष्टि से उपहित चैतन्य सर्वत्र व्याप्त होने तथा ज्ञान, इच्छा एवं क्रियाशक्ति से सम्पन्न होने के कारण (क्रमशः) सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ और प्राण इसप्रकार कहा जाता है। इसकी यह समष्टि स्थूलप्रपञ्च की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण ‘सूक्ष्म-शरीर’, विज्ञानमय आदि कोशत्रय से युक्त, जाग्रत् अवस्था में
सूक्ष्मशरीर निरूपण १९७ वासनायुक्त होने से 'स्वप्न', इसीलिए स्थूलप्रपञ्च का 'लयस्थान' भी कही जाती है। व्यष्टिरूप उपाधि से युक्त यह चैतन्य, तेजोयुक्त अन्तःकरण उपाधि से युक्त होने से 'तैजस्' होता है। इसकी भी यह व्यष्टि स्थूलशरीर की अपेक्षा सूक्ष्म होने रूपकारण से ही सूक्ष्मशरीर, विज्ञानमय आदि कोशत्रय से युक्त, एवं जाग्रत अवस्था में वासनायुक्त होने से स्वप्न, अतएव स्थूलशरीर का लयस्थान इस रूप में भी कहलाता है। सूत्रात्मा और तेजस् ये दोनों उससमय (भी) मनोवृत्तियों द्वारा सूक्ष्मविषयों का अनुभव करते हैं। "सूक्ष्मभोग करने वाला तैजस् है" इत्यादि श्रुति का वचन (इसमें प्रमाण है।) यहाँ भी समष्टिव्यष्टि एवं उनकी उपाधि से युक्त - सूत्रात्मा तथा तैजस् दोनों में वन और वृक्ष, उससे अवच्छिन्न आकाश के समान, जलाशय एवं जल तथा उसमें प्रतिबिम्बित आकाश के समान अभेद ही है। इसप्रकार सूक्ष्मशरीर की उत्पत्ति होती है। 'चन्द्रिका'-पूर्ववर्णित समष्टि एवं व्यष्टि के समान यहाँ भी सम्पूर्ण चराचरजगत् के अनन्तसंख्या वाले सूक्ष्मशरीरों को जब एक मानकर व्यवहार करते हैं, तो एकत्व की विवक्षा में वे सब एक बुद्धि का विषय होने के कारण वन अथवा जलाशय के समान 'समष्टि' इस रूप में व्यवहृत होते हैं तथा उनको ही जब हम अलग-अलग अनेक मानकर व्यवहार करते हैं तो अनेक जीवों के स्व-स्व बुद्धि का विषय होने के कारण ये वृक्ष अथवा जल के समान 'व्यष्टि' इस पद द्वारा व्यवहृत होते हैं। सूक्ष्मशरीरों की इस समष्टि से युक्त चैतन्यात्मा सर्वत्र व्याप्त होने तथा ज्ञान, इच्छा एवं क्रियाशक्ति से युक्त होने के कारण क्रमशः सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ तथा प्राण कहा जाता है, क्योंकि विज्ञानमयकोश ज्ञान का, मनोमयकोश इच्छाशक्ति का तथा प्राणमयकोश क्रियाशक्ति का प्रतीक है। इन सबमें चैतन्यात्मा माला में सूत्र के समान विद्यमान रहता है, इसीलिए इसे सूत्रात्मा कहा जाता है। सूत्रात्मा एवं हिरण्यगर्भ की यह समष्टि स्थूलप्रपञ्च की अपेक्षा सूक्ष्म होती है। इसीलिए सूक्ष्मशरीर भी कहलाती है। इसके अतिरिक्त इस समष्टि में विज्ञानमय, मनोमय एवं प्राणमय तीन कोश होने से 'कोशत्रय' तथा विराट्रूप में अनुभव की गई स्थूलप्रपञ्च से सम्बन्धित वासना से युक्त होने के कारण 'स्वप्न' कहलाती है, क्योंकि चैतन्य स्थूलसृष्टि के अन्तर्गत दैनिक व्यवहार में जिस-जिसप्रकार की अनुभूति करता है वे सभी भाव वासनारूप
१९८ वेदान्तसार में उसके अन्दर विद्यमान रहते हैं। उन्हीं भावों को वह स्वप्नावस्था में अनुभव करता है। इसके अलावा प्रलयकाल की अवस्था में सम्पूर्ण स्थूल प्रपञ्च का विलय भी इसी सूक्ष्मशरीर में होता है। इसलिए इसे 'लयस्थान' भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त तेजोमय अन्तःकरण से विशिष्ट, अलग-अलग सूक्ष्मशरीर से उपलक्षित चैतन्य की 'तैजस्' संज्ञा होती है। समष्टि के समान ही यह भी स्थूलशरीर की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण 'सूक्ष्मशरीर', विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय इन तीन कोशों से युक्त होने से 'कोशत्रय' तथा चैतन्य द्वारा अनुभव की गई स्थूलशरीर सम्बन्धित वासनाओं से युक्त होने से 'स्वप्न' तथा स्थूलशरीर का लय होने से 'लयस्थान' कहलाती है। सूत्रात्मा और तेजस् ये दोनों सूक्ष्ममनोवृत्तियों द्वारा स्थूलशरीर में अनुभव किए गए वासनामय शब्दादि विषयों का स्वप्नावस्था में भी ठीक उसीप्रकार अनुभव करते हैं, जिसप्रकार ईश्वर और प्राज्ञ अज्ञान की सूक्ष्मवृत्तियों द्वारा सुषुप्ति अवस्था में भी आनन्द का अनुभव करते हैं। अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार श्रुतिवचन को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं, जिसका पूर्णवाक्य इसप्रकार है- 'स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्गः एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तेजसः' अर्थात् बाह्यविषयों से असम्बद्ध 'तैजस्' संज्ञा वाला चैतन्य स्वप्नावस्था में भी अपने सात अंगों एवं उन्नीस मुखों से वासनामय सूक्ष्मशब्द आदि विषयों का उपभोग करता है। यहाँ उन्नीस मुखों से अभिप्राय पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चप्राण तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार कुल उन्नीस तत्त्वों से है तथा सात अंग-अग्नि, सूर्य, चन्द्र, वायु, वेद, दिशा, आकाश तथा पृथिवी को माना गया है। इसप्रकार यहाँ भी विज्ञानमय आदि कोशत्रय की समष्टि तथा उससे उपहित सूत्रात्मारूप चैतन्य की तथा इसी की व्यष्टिरूप विज्ञानमय आदि कोशत्रय तथा उससे अवच्छिन्न तैजस् संज्ञा वाले चैतन्य की, ठीक उसीप्रकार अभिन्नता मानी गयी है, जैसे-वन एवं वृक्ष तथा उनसे अवच्छिन्न आकाश में अभिन्नता होती है। इसीप्रकार जैसे-जल एवं जलाशय तथा उनमें प्रतिबिम्बित आकाश में ऐक्य है। अतः सूत्रात्मा एवं तैजस् इन दोनों का भेद समष्टि एवं व्यष्टि की दृष्टि से नाममात्र का भेद है। वास्तविकदृष्टि से समष्टि एवं व्यष्टि तथा उनमें स्थित सूत्रात्मा एवं तैजसरूप चैतन्य वस्तुतः एक ही हैं। इसप्रकार
सूक्ष्मशरीर निरूपण १९९ अपञ्चीकृत पञ्चभूतों की सृष्टि 'सूक्ष्मशरीर' का समष्टिव्यष्टि की दृष्टि से भी विवेचन किया गया एवं उनकी परस्पर एकता भी प्रदर्शित की गई। विशेष-(1) स्वप्न-जाग्रत अवस्था में सांसारिकविषयों का अनुभव करने के परिणामस्वरूप बनी वासनाएँ ही चित्त में विद्यमान रहती हैं, जो स्वप्न में अनुभव की जाती हैं। इसप्रकार स्वप्न केवल वासनामय ही होता है। सूक्ष्मशरीर को भी जाग्रत अवस्था में विषयों के अनुभवरूप वासनाओं से उत्पन्न होने से 'स्वप्न' माना गया है। (2) समष्टिरूप चैतन्य को 'सूत्रात्मा' तथा व्यष्टिरूप चैतन्य को 'तैजस्' कहा गया है, जिसमें वन एवं वृक्ष के समान ऐक्य बताया गया है। (3) सम्पूर्ण चराचर के अनन्त सूक्ष्मशरीरों में माला के सूत्र के समान विद्यमान होने से समष्टिरूप चैतन्य को 'सूत्रात्मा' कहा गया है। (4) इसीप्रकार तेजोमय अन्तःकरण से विशिष्ट होने के कारण पृथक्-पृथक् सूक्ष्मशरीरों में स्थित व्यष्टिरूप चैतन्य को 'तैजस्' संज्ञा प्रदान की गई है। (5) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रस्तुत कर सकते हैं- सूक्ष्मशरीर ┌───────────────────────────┴───────────────────────────┐ समष्टि व्यष्टि │ │ एक ही ज्ञान का विषय तवच्छिन्न अनेक उपलब्धियों का विषय ↗ ↖ जलाशय आकाश जल ↓ चैतन्य वन ───► वत् ◄─── वृक्ष चैतन्य │ ↓ │ सूत्रात्मा अभेद तैजस् हिरण्यगर्भ प्राण │ │ │ │ (माला में सूत्र के ──► प्राण ज्ञान इच्छा क्रिया समान स्थित होने से) हिरण्यगर्भ │ │ │ │ │ (तेजोमय विशिष्ट │ │ ज्ञान इच्छा क्रिया◄── अन्तःकरण सम्पन्न) │ │ │ │ │ └───────┬───────┘ └─────┬───────┘ शक्ति सम्पन्न होने से शक्ति सम्पन्न होने से ───► सूक्ष्मशरीर कोशत्रय स्वप्न लयस्थान अवतरणिका-सूक्ष्मशरीर एवं उसकी समष्टिव्यष्टि के ऐक्य का प्रतिपादन करने के पश्चात् ग्रन्थकार स्थूलसृष्टि के लिए आवश्यक पञ्चीकरणप्रक्रिया का उल्लेख करते हैं-
२०० वेदान्तसार स्थूलभूतानि तु पञ्चीकृतानि। पञ्चीकरणं त्वाकाशादिपञ्चस्वेकैकं द्विधा समं विभज्य तेषु दशसु भागेषु प्राथमिकान्पञ्चभागान्प्रत्येकं चतुर्धा समं विभज्य तेषां चतुर्णां भागानां स्वस्वद्वितीयार्धभागपरित्यागेन भागान्तरेषु संयोजनम्। तदुक्तम्- “द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः। स्वस्वेतरद्वितीयांशैर्योजनात्पञ्चपञ्च ते” इति॥ पदच्छेद- स्थूलभूतानि तु पञ्चीकृतानि। पञ्चीकरणम् तु-आकाशादि पञ्चसु एकैकम् द्विधा समम् विभज्य तेषु दशसु भागेषु प्राथमिकान् पञ्चभागान् प्रत्येकम् चतुर्धा समम् विभज्य, तेषाम् चतुर्णाम् भागानाम् स्व-स्वद्वितीय-अर्धभाग-परित्यागेन भागान्तरेषु संयोजनम्। तद् उक्तम्- अन्वय- “प्रथमम् (प्रत्येकम्) द्विधा विधाय, पुनः एक-एकम् चतुर्धा (विधाय) स्व-स्व-इतर द्वितीयांशैः योजनात् ते पञ्च-पञ्च एव भवन्ति।” अनुवाद-पञ्चीकृत (महाभूतों) को ही स्थूलभूत (कहा जाता है)। पञ्चीकरण तो (वह है जिसमें) आकाश आदि सूक्ष्मपञ्चभूतों में से प्रत्येक को दो भागों में बराबर विभाजित करके, उन दस भागों के, प्रथम पञ्च भागों में से प्रत्येक को पुनः चार बराबर भागों में विभाजित करके, उन चार भागों को अपने-अपने द्वितीय अर्धभाग को छोड़कर दूसरे भागों में मिलाया जाता है। इसीलिए कहा भी गया है- सर्वप्रथम (प्रत्येक सूक्ष्मभूत को) समान दो भागों में विभाजित करके, तत्पश्चात् (प्रथम पाँच में से) प्रत्येक को चार भागों में विभक्त करके, अपने-अपने अंश को छोड़कर, अन्य भूतों के अर्धांश के साथ जोड़ने से वे पाँच (सूक्ष्मभूत) पाँच (स्थूलभूत) हो जाते हैं। 'चन्द्रिका'-यहाँ तक ग्रन्थकार ने अपञ्चीकृतसूक्ष्मभूतों से सूक्ष्मप्रपञ्च की उत्पत्ति का विस्तारपूर्वक कथन किया। तदनन्तर स्थूलप्रपञ्च की उत्पत्ति के प्रतिपादन का उपक्रम करते हैं, किन्तु इससे पूर्व वेदान्त के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त पञ्चीकरण की प्रक्रिया को कहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण स्थूल प्रपञ्च की उत्पत्ति पञ्चीकृतमहाभूतों द्वारा ही होती है। तदनुसार- पञ्चीकरण प्रक्रिया-आकाश आदि सूक्ष्मभूतों के सर्वप्रथम दो-दो भाग किए जाते हैं। इसप्रकार प्राप्त हुए दस भागों में से प्रथम पाँच भागों को पुनः चार-चार भागों में विभाजित किया जाता है। इसके परिणामस्वरूप एक
पञ्चीकरण प्रक्रिया
पञ्चीकरण प्रक्रिया २०१ सूक्ष्मभूत अपने पाँच भागों में विभक्त हो जाता है-प्रथम 1/2+1/8+1/8+ 1/8+1/8=एक (एक आधा भाग तथा शेष चार 1/8 भाग)। पुनः इन सब भागों में से अपने-अपने आधे भाग को छोड़कर अन्य सूक्ष्मभूत का एक-एक अष्टमांश 1/8 भाग दूसरे चारों भागों में मिला दिया जाता है। परिणामस्वरूप प्रत्येक महाभूत में आधा अपना तथा शेष चार सूक्ष्मभूतों का 1/8 अष्टमांश मिलने पर प्रत्येक आकाश आदि भूत पूर्णता को प्राप्त करके, पञ्चीकृतमहाभूत की संज्ञा को प्राप्त कर लेता है। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को निम्नप्रकार भी प्रदर्शित किया जा सकता है- चित्र-४१ पञ्चीकरण प्रक्रिया | | आकाश | वायु | अग्नि | जल | पृथिवी | | | 1/2 | 1/2 | 1/2 | 1/2 | 1/2 | | 1/8 | वायु | आकाश | आकाश | आकाश | आकाश | | 1/8 | अग्नि | अग्नि | वायु | वायु | वायु | | 1/8 | जल | जल | जल | अग्नि | अग्नि | | 1/8 | पृथिवी | पृथिवी | पृथिवी | पृथिवी | जल | पञ्चीकृत पञ्चमहाभूत इन्हीं पञ्चीकृतमहाभूतों से स्थूलसृष्टि का निर्माण होता है। जिसका वर्णन आगे किया जाएगा। अपनी बात की पुष्टि में ग्रन्थकार पञ्चदशी की कारिका को प्रमाणरूप में प्रयुक्त करते हैं। इस कारिका का अभिप्राय भी वही है जो ऊपर गद्यखण्ड में प्रतिपादित किया गया है। विशेष-(1) उपर्युक्त प्रक्रिया को अपेक्षाकृत अधिक विस्तारपूर्वक चित्रात्मक ढंग से समझने के लिए द्रष्टव्य चित्र संख्या 9 एवं 10 (भूमिका)। (2) आचार्य सुरेश्वर ने इसी पञ्चीकरणप्रक्रिया को अपने वार्तिक में इसप्रकार प्रतिपादित किया है, जो अपेक्षाकृत अधिक सरल प्रतीत होता है- पृथिव्यादीनि भूतानि प्रत्येकं विभजेद् द्विधा। एकैकं भागमादाय चतुर्धा विभजेत् पुनः॥ एकैकं भागमेकस्मिन् भूते संवेशयेत्क्रमात्। ततश्चाकाशभूतस्य भागाः पञ्च भवन्ति हि॥
२०२ वेदान्तसार वाय्वादि भागांश्चत्वारो वाय्वादिष्वेवमादिशेत्। पञ्चीकरणमेतत्सstructure/word: पञ्चीकरणमेतत्स्यादित्याहुस्तत्त्ववेदिनः॥ अवतरणिका-पञ्चीकरणप्रक्रिया का निरूपण करने के प्रसङ्ग में ही उपनिषद् प्रतिपादित त्रिवृत्करण की प्रक्रिया को पञ्चीकरणप्रक्रिया का ही उपलक्षण बताते हुए ग्रन्थकार कहते हैं- अस्याप्रामाण्यं नाशङ्कनीयं त्रिवृत्करणश्रुतेः पञ्चीकरणस्याप्युप- लक्षणत्वात्। पञ्चानां पञ्चात्मकत्वे समानेऽपि तेषु च “वैशेष्यात्तद्वादस्तद्वाद” इतिन्यायेनाकाशादिव्यपदेशः सम्भवति। तदानीमाकाशे शब्दोऽभिव्यज्यते वायौ शब्दस्पर्शावग्नौ शब्दस्पर्शरूपाण्यप्सु शब्दस्पर्शरूपरसाः पृथिव्यां शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाश्च॥१५॥ पदच्छेद-अस्य अप्रामाण्यम् न आशङ्कनीयम् त्रिवत्करणश्रुतेः पञ्चीकरणस्य अपि उपलक्षणत्वात्। पञ्चानाम् पञ्चात्मकत्वे समाने अपि तेषु च “वैशेष्यात् तद्वादः तद्वादः” इति न्यायेन आकाशादि व्यपदेशः सम्भवति। तदानीम् आकाशे-शब्दः अभिव्यज्यते, वायौ-शब्दस्पर्शौ अग्नौ-शब्द-स्पर्श- रूपाणि, अप्सु-शब्द-स्पर्श-रूप-रसाः, पृथिव्याम्-शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धाः च॥।15॥ अनुवाद- श्रुति का त्रिवृत्करण (यहाँ बताए गए) पञ्चीकरण का भी उपलक्षण होने के कारण, इसके अप्रामाण्य की आशङ्का नहीं करनी चाहिए। पाँचों (महाभूतों) में पाँचों के समानभाग मिले हुए होने पर भी उन सबमें प्रधान अंश के आधार पर उस-उसको कहे जाने रूप न्याय से ही (उनमें) आकाश आदि का व्यवहार सम्भव होता है। उस समय ही आकाश में शब्द, वायु में शब्द एवं स्पर्श, अग्नि में शब्द, स्पर्श एवं रूप, जलों में शब्द, स्पर्श, रूप एवं रस तथा पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध की अभिव्यक्ति होती है। ‘चन्द्रिका'-छान्दोग्योपनिषद् (6.3.3) में सर्वप्रथम अग्नि की उत्पत्ति कही गई है तथा उसके बाद अग्नि से जल एवं जल से पृथिवी की उत्पत्ति का कथन करके, उनके त्रिवृत्करण द्वारा स्थूलसृष्टि की उत्पत्ति बतायी गयी है- “सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवताः, अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि। तासां त्रिवृतं त्रिवृतमेकैकां करवाणि, इति सेयं देवते- मास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् (6.3.2-3)
पञ्चीकरण प्रक्रिया २०३ त्रिवृत्करण के अनुसार अग्नि, जल और पृथिवी इन तीनों को सर्वप्रथम दो बराबर भागों में विभाजित किया जाता है। पुनः प्रथम तीन अर्धांशों को फिर से दो भागों में विभाजित करके, उनका एक-एक भाग पूर्व के अर्धांश में जोड़ दिया जाता है। जिससे त्रिवृत्भूत का निर्माण होता है। ठीक इस प्रकार- चित्र-४२ 1/4 जल 1/4 पृथिवी 1/4 अग्नि 1/4 अग्नि 1/2 जल 1/2 पृथिवी 1/2 पृथिवी 1/4 अग्नि 1/4 जल 1/4 अग्नि जल पृथिवी किन्तु आचार्य सदानन्द ने यहाँ पञ्चीकरणप्रक्रिया द्वारा सृष्टि की उत्पत्ति का कथन किया है। अतः इस विषय में शङ्का होना स्वाभाविक है कि त्रिवृत्करण को स्थूलसृष्टि का कारण माना जाए अथवा पञ्चीकरण की प्रक्रिया को? इसी शङ्का के समाधान में ग्रन्थकार कहते हैं कि उपनिषद् में प्रतिपादित त्रिवृत्करण प्रस्तुत पञ्चीकरण का उपलक्षण है अर्थात् वह अपना भी बोध कराता है तथा प्रस्तुत पञ्चीकरण का भी द्योतक है। वस्तुतः स्थूलसृष्टि का निर्माण पञ्चसूक्ष्मभूतों की पञ्चीकरणप्रक्रिया द्वारा ही होता है। अतः छान्दोग्योपनिषद् में प्रतिपादित त्रिवृत्करण को पञ्चमहाभूतों की सृष्टि में प्रयुक्त पञ्चीकरण का उपलक्षण मानना चाहिए। इस प्रसङ्ग में पुनः एक शङ्का की जा सकती है कि यदि पञ्चीकरण प्रक्रिया के परिणामस्वरूप स्थूलमहाभूतों की सृष्टि के सिद्धान्त को मान भी लिया जाए तो, वायु में पृथिवी का अंश होने के कारण हमें उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष होना चाहिए। इसीप्रकार आकाश में जल एवं पृथिवी का अंश होने के कारण उसका स्पर्श द्वारा प्रत्यक्ष होने के साथ-साथ चाक्षुषप्रत्यक्ष एवं गन्ध की उपलब्धि भी होनी चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं होता है। अतः पञ्चीकरण की प्रामाणिकता पर संदेह किया जा सकता है। इस शङ्का के समाधान के लिए ग्रन्थकार कहते हैं कि पञ्चीकरण प्रक्रिया द्वारा यद्यपि पाँचों महाभूतों में पाँचों सूक्ष्मभूतों के अंश विद्यमान रहते
स्थूलसृष्टि-निरूपण
२०१४ वेदान्तसार हैं, किन्तु इनमें अपने-अपने अंश की अधिकता के कारण ही तत्-तत् नाम से उनका व्यवहार किया जाता है एवं तत्-तत् अंश की अधिकता से अपने-अपने गुणों की अनुकूलता के आधार पर ही सम्बन्धित इन्द्रियों द्वारा उसका प्रत्यक्ष किया जाता है। इसीलिए पञ्चीकृत आकाश में शब्द। वायु में शब्द एवं स्पर्श। अग्नि में शब्द, स्पर्श एवं रूप। जल में शब्द, स्पर्श, रूप एवं रस तथा पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध आदि अपने-अपने कारणों के अनुसार स्पष्टरूप से अनुभव किए जा सकते हैं। विशेष-(1) पञ्चीकरणप्रक्रिया का उल्लेख न तो बादरायण ने शारीरकसूत्रों में किया है और न ही आचार्य शङ्कर ने अपने भाष्य में इसकी चर्चा की है। (2) अपितु सर्वप्रथम इसका वर्णन उत्तरकालीन टीकाकार आनन्दज्ञान ने किया है। (3) इसीकारण पाश्चात्यविद्वान् डयूसन ने उपनिषदों में प्रतिपादित त्रिवृत्करण के सिद्धान्त को भारतीयदर्शनों की विकासपरम्परा में अपेक्षाकृत पूर्व अवस्था का द्योतक स्वीकार किया है। (4) यहाँ प्रयुक्त 'उपलक्षण' से अभिप्राय निर्देशन अथवा संकेतमात्र से ग्रहण करना चाहिए। (5) वैशेष्यात्तद्वादस्तद्वाद न्याय-यदि किसी एक वस्तु में एकाधिक तत्त्व विद्यमान हो तो अधिकता के आधार पर उसका सम्बोधन किया जाता है-इसीको 'वैशेष्यात् तद्वादः' कहा जाएगा। आकाश आदि पञ्चीकृत महाभूतों के नामकरण का भी यही सिद्धान्त आधाररूप में बताया गया है, क्योंकि जिस नाम से महाभूत को जाना जाता है, उसमें उसका आधा भाग विद्यमान रहता है। (6) त्रिवृत्करण को अपेक्षाकृत विस्तारपूर्वक समझने के लिए भूमिका में चित्रसंख्या-12 भी द्रष्टव्य है। अवतरणिका-पञ्चीकरण एवं इसी प्रसङ्ग में त्रिवृत्करण का उल्लेख करने के बाद ग्रन्थकार पञ्चीकरण की प्रक्रिया के पश्चात् उत्पन्न पञ्चमहाभूतों से होने वाली स्थूलसृष्टि का कथन करते हैं- एतेभ्यः पञ्चीकृतेभ्यो भूतेभ्यो भूर्भुवःस्वर्महर्जनस्तपः सत्यमित्येतन्नामकानामुपर्य्युपरिविद्यमानानामतलवितलसुतलरसातलतलातल-
स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २०५ महातलपातालनामकानामधोऽधोविद्यमानानां लोकानां ब्रह्माण्डस्य तदन्तर्वर्तिचतुर्विधस्थूलशरीराणां तदुचितानामन्नपानादीनां चोत्पत्तिर्भवति। चतुर्विधशरीराणि तु जरायुजाण्डजोद्भिज्जस्वेदजाख्यानि। जरायुजानि जरायुभ्यो जातानि मनुष्यपश्वादीनि। अण्डजान्यण्डेभ्यो जातानि पक्षिषन्नगादीनि। उद्भिज्जानि भूमिमुद्भिद्य जातानि लतावृक्षादीनि। स्वेदजानि स्वेदेभ्यो जातानि यूकामशकादीनि॥१६॥ पदच्छेद- एतेभ्यः पञ्चीकृतेभ्यः भूतेभ्यः भूभुवः-स्वः-महः-जनः-तपः- सत्यम्-इति एतत् नामकानाम् उपर्युपरि विद्यमानानाम् अतल-वितल-सुतल-रसातल- तलातल-महातल-पाताल-नामकानाम् अधोऽधः विद्यमानानाम् लोकानाम्, ब्रह्माण्डस्य तद् अन्तर्वर्ति-चतुर्विध-स्थूलशरीराणाम् तद् उचितानाम् अन्नपान-आदीनाम् च उत्पत्तिः भवति। चतुर्विध-शरीराणि तु जरायुज-अण्डज-उद्भिज्ज-स्वेदज-आख्यानि। जरायुजानि-जरायुभ्यः जातानि, मनुष्य-पशु-आदीनि। अण्डजानि-अण्डेभ्यः जातानि, पक्षि-पन्नग-आदीनि। उद्भिज्जानि-भूमिम् उद्भिद्य जातानि लता वृक्ष-आदीनि। स्वेदजानि-स्वेदेभ्यः जातानि, यूका मशक-आदीनि।।16।। अनुवाद-इन पञ्चीकृत महाभूतों में भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् इत्यादि नाम वाले ऊपर-ऊपर विद्यमान लोकों की और अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल नामक अधोवर्ती भुवनों की, ब्रह्माण्ड की तथा उनमें विद्यमान चार प्रकार के स्थूलशरीरों की एवं उनके योग्य अन्नपान आदिकों की उत्पत्ति होती है। जबकि जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज एवं स्वेदज नामक चार प्रकार के (स्थूल) शरीर हैं। जरायु से उत्पन्न होने वाले मनुष्य, पशु आदि जरायुज (नामक स्थूलशरीर) हैं। अण्डों से उत्पन्न होने वाले पक्षी, सर्प आदि अण्डज हैं। पृथिवी को भेदकर उत्पन्न होने वाले लता, वृक्ष आदि उद्भिज्ज हैं तथा पसीने से पैदा होने वाले जूँ, मच्छर आदि स्वेदज (नामक स्थूल शरीर) हैं। 'चन्द्रिका'-उपर्युक्त गद्यखण्ड का अर्थ स्पष्ट होने से व्याख्या की आवश्यकता नहीं है। विशेष-(1) प्रस्तुत अंश में भूः आदि सात ऊर्ध्वलोक, पाताल आदि सात अधोलोक, इसप्रकार कुल चौदहभुवन, उनसे निर्मित सम्पूर्णब्रह्माण्ड तथा उन लोकों में विद्यमान चार प्रकार के स्थूलशरीर-जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज
२०६ वेदान्तसार तथा स्वेदज के साथ-साथ इनके पोषण के योग्य भोगपदार्थों अन्नपान आदि की उत्पत्ति का कथन किया गया है। (२) प्रस्तुत गद्यखण्ड को चित्रात्मकदृष्टि से समझने के लिए द्रष्टव्य भूमिका में चित्र संख्या-11 एवं 17 । अवतरणिका-तत्पश्चात् स्थूलप्रपञ्च का समष्टिव्यष्टि की दृष्टि से निरूपण करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं- अत्रापि चतुर्विधसकलस्थूलशरीरमेकानेकबुद्धिविषयतया वनवज्जलाशयवद्वा समष्टिर्वृक्षवज्जलवद्वा व्यष्टिरपि भवति। एतत्समष्ट्युपहितं चैतन्यं वैश्वानरो विराडित्युच्यते सर्वनराभिमानित्वाद्विविधं राजमानत्वाच्च। अस्यैषा समष्टिः स्थूलशरीरमन्नविकारत्वादन्नमयकोशः स्थूल भोगायतनत्वाच्च स्थूलशरीरं जाग्रदिति च व्यपदिश्यते। एतद्व्यष्ट्युपहितं चैतन्यं विश्व इत्युच्यते सूक्ष्मशरीराभिमानपरित्यज्य स्थूलशरीरादि- प्रविष्टत्वात्। अस्याप्येषा व्यष्टिः स्थूलशरीरमन्नविकारत्वादेव हेतोरन्नमयकोशो जाग्रदिति चोच्यते। तदानीमेतौ विश्ववैश्वानरौ दिग्वातार्कवरुणाश्विभिः क्रमान्नियन्त्रितेन श्रोत्रादीन्द्रियपञ्चकेन क्रमाच्छब्दस्पर्शरूपरसगन्धानग्नीन्द्रोपेन्द्रयम- प्रजापतिभिः क्रमान्नियन्त्रितेन वागादीन्द्रियपञ्चकेन क्रमाद्वचनादानगमन- विसर्गानन्दां श्चन्द्रचतुर्मुखशङ्कराच्युतैः क्रमान्नियन्त्रितेन मनोबुद्ध्यहङ्कार- चित्ताख्येनान्तरिन्द्रियचतुष्केण क्रमात्सङ्कल्पनिश्चयाहङ्कार्याचैतांश्च सर्वानैतान् स्थूलविषयाननुभवतो "जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञ" इत्यादिश्रुतेः। अत्राप्यनयोः स्थूलव्यष्टिसमष्ट्योस्तदुपहितविश्ववैश्वानरयोश्च वनवृक्ष- वत्तदवच्छिन्नाकाशवच्च जलाशयजलवत्तद् तप्रतिबिम्बाकाशवच्च पूर्ववद्भेदः। एवं पञ्चीकृतपञ्चभूतेभ्यः स्थूलप्रपञ्चोत्पत्तिः॥१७॥ पदच्छेद-अत्र अपि चतुर्विध-सकल-स्थूल-शरीरम् एक-अनेक-बुद्धि विषयतया वनवद् जलाशयवद् वा समष्टिः, वृक्षवद् जलवद् वा व्यष्टिः अपि भवति। एतत् समष्टि-उपहितम् चैतन्यम् वैश्वानरः विराट् इति उच्यते, सर्वनराभिमानित्वाद्, विविधं राजमानत्वात् च। अस्य एषा समष्टिः स्थूलशरीरम्, अन्नविकारत्वाद् अन्नमयकोषः, स्थूल भोगायतनत्वात् च स्थूलशरीरम्, जाग्रद् इति च व्यपदिश्यते। एतत् व्यष्टि-उपहितम् चैतन्यम् विश्वः, इति उच्यते, सूक्ष्मशरीर-अभिमानम्
स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २०७ अपरित्यज्य स्थूलशरीरादि-प्रविष्टत्वात्। अस्य अपि एषा व्यष्टिः स्थूलशरीरम्, अन्नविकारत्वाद् एव हेतोः अन्नमयकोशः, जाग्रद् इति च उच्यते। तदानीम् एतौ विश्व-वैश्वानरौ दिग्-वात-अर्क-वरुण-अश्विभिः क्रमात् नियन्त्रितेन श्रोत्रादि इन्द्रियपञ्चकेन क्रमात्, शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गन्धान्, अग्नि-इन्द्र-उपेन्द्र-यम-प्रजापतिभिः क्रमात् नियन्त्रितेन वाग् आदि इन्द्रियपञ्चकेन क्रमाद् वचन-आदान-गमन-विसर्ग-आनन्दान्, चन्द्र-चतुर्मुख- शङ्कर-अच्युतैः क्रमात् नियन्त्रितेन, मनः-बुद्धि-अहङ्कार-चित्त-आख्येन अन्तरिन्द्रिय-चतुष्केण क्रमात् सङ्कल्प-निश्चय-अहङ्कार्य-चैत्तान् च सर्वान् एतान् स्थूलविषयान् अनुभवतः, “जागरितस्थानः बहिःप्रज्ञ” इत्यादि श्रुतेः। अत्र अपि अनयोः स्थूलव्यष्टि-समष्ट्योः, तद् उपहित विश्व-वैश्वानरयोः, च, वन-वृक्षवत् तद् अवच्छिन्न-आकाशवत् च जलाशय-जलवत् तद्गत प्रतिबिम्ब-आकाशवत् च पूर्ववद् अभेदः। एवम् पञ्चीकृत पञ्चभूतेभ्यः स्थूल प्रपञ्च-उत्पत्तिः।।17।। अनुवाद- यहाँ भी चार प्रकार के सभी स्थूलशरीर, एक और अनेक बुद्धियों का विषय होने से वन अथवा जलाशय के समान समष्टि, वृक्ष अथवा जल के समान व्यष्टि भी होते हैं। इस समष्टिरूप उपाधि से उपहित हुआ चैतन्य, सभी प्राणियों का अधिष्ठाता होने एवं विविध रूपों में विराजमान होने के कारण वैश्वानर एवं विराट् कहा जाता है। समष्टिरूप इसका यह स्थूलशरीर (माता-पिता द्वारा खाए हुए) अन्न का विकार होने से अन्नमयकोश, स्थूलभागों का आश्रय होने से स्थूलशरीर तथा (विषयों का भोग करने वाला होने के कारण) जाग्रद् इसप्रकार कहा जाता है। इस व्यष्टिरूप उपाधि से उपहित चैतन्य, सूक्ष्मशरीर के अभिमान का परित्याग किए बिना स्थूलशरीर में प्रविष्ट होने के कारण 'विश्व' इसप्रकार कहा जाता है। इसका भी यह व्यष्टिरूप स्थूलशरीर, अन्न का विकार होने से ही अन्नमयकोश तथा जाग्रद् इसप्रकार कहलाता है। ये दोनों विश्व और वैश्वानर उससमय, दिशा, वायु, सूर्य, वरुण तथा अश्विनीकुमारों द्वारा क्रमशः नियन्त्रित श्रोत्र आदि पाँच इन्द्रियों से क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध का; अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, यम, प्रजापति द्वारा क्रमशः नियन्त्रित वाक् आदि पाँच कर्मेन्द्रियों से क्रमशः बोलना, लेना, चलना, विसर्जन और आनन्द का; चन्द्र, ब्रह्मा, शिव और विष्णु द्वारा क्रमशः नियन्त्रित मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्त नामक चार अन्तरिन्द्रियों (के
२०८ वेदान्तसार समूह) से क्रमशः संकल्प-विकल्प, निश्चय, अहङ्कार तथा स्मरण आदि इन सम्पूर्ण स्थूलविषयों का अनुभव करते हैं। “जाग्रत अवस्था से युक्त चैतन्य ही बाह्यविषयों से परिचित है” इत्यादि श्रुतिवचन भी (यहाँ प्रमाण है)। यहाँ भी इन दोनों स्थूल व्यष्टि एवं समष्टि में तथा उनसे उपहित विश्व और वैश्वानर में, वन और वृक्ष एवं उससे अवच्छिन्न आकाश के समान, जलाशय और जल तथा उसके प्रतिबिम्बित आकाश के समान पूर्ववत् अभेद होता है। इसप्रकार पञ्चीकृत पाँच महाभूतों से स्थूलप्रपञ्च की उत्पत्ति होती है। ‘चन्द्रिका’-स्थूलसृष्टि का कथन करने के उपरान्त समष्टि-व्यष्टि की दृष्टि से ग्रन्थकार चैतन्य का नामकरण करते हुए उनमें अभेद की स्थापना करते हैं-सम्पूर्ण स्थूलसृष्टि के अन्तर्गत बताए गए जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज एवं स्वेदज चार प्रकार के स्थूलशरीर एकत्व अथवा अनेकत्व की विवक्षा में प्रत्येक प्राणी की एक बुद्धि तथा अलग-अलग प्राणियों की अलग-अलग अनेक बुद्धियों का विषय होने से, वन एवं जलाशय के समान समष्टि तथा वृक्ष एवं जल के समान व्यष्टिरूप में व्यवहृत होते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जिसप्रकार सभी वृक्षों को एक साथ कहने की इच्छा से वन एवं सभी जलों को एक साथ कहने की भावना से जलाशय इसरूप में कहा जाता है, ठीक उसीप्रकार विभिन्नप्रकार के स्थूलशरीरों को एक साथ कहने की दृष्टि से एक बुद्धि का विषय तथा अनेकरूप में कहने की विवक्षा से भिन्न-भिन्न शरीर मानकर विभिन्न बुद्धियों का विषय स्वीकार किया जाता है। यही क्रमशः समष्टि एवं व्यष्टि कहलाती है। इस समष्टि से उपहितचैतन्य को वैश्वानर अथवा विराट् कहा जाता है। इसका मुख्यकारण यही है कि समष्टि से उपहित यह चैतन्य सभी प्राणियों में ‘मैं’ इस अभिमान को धारण किए हुए विविधप्रकार से सुशोभित हो रहा है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत विद्यमान अज्ञान की उपाधियुक्त, चार प्रकार के स्थूलशरीरों की यह समष्टि विद्वानों द्वारा ‘स्थूलशरीर’ इस नाम से कही जाती है। इसके अतिरिक्त यह स्थूलशरीर माता-पिता द्वारा खाए गए अन्न द्वारा उत्पन्न होता है, इसलिए ‘अन्नमय’ भी कहलाता है। साथ ही आत्मा का आच्छादक होने के कारण ‘कोश’ एवं सुखदुःख आदि के भोग का आधार होने एवं इन्द्रियों द्वारा तत्तत् विषयों को भोगने के कारण ‘जाग्रत्’ भी कहा जाता है।
स्थूलसृष्टि प्रक्रिया २०९ इसके अलावा उन्हीं चार प्रकार के स्थूलशरीरों की व्यष्टि से उपहित चैतन्य यहाँ ‘विश्व’ कहलाता है। इसका भी मुख्यकारण यही है कि इन अलग-अलग स्थूलशरीरों में रहता हुआ भी वह अपने-अपने सूक्ष्मशरीर के प्रति ‘मैं’ रूप अभिमान को धारण किए हुए, प्रत्येक स्थूलशरीर में विद्यमान रहता है। अज्ञान की यह व्यष्टि भी समष्टि के समान ही ‘स्थूलशरीर’, माता-पिता द्वारा खाए हुए अन्न का विकार होने के कारण ‘अन्नमय’, आत्मा अथवा चैतन्य का आच्छादक होने से ‘कोश तथा सुखदुःख आदि के भोग का आधार होने एवं इन्द्रियों द्वारा उस-उसके विषयों का भोग करने के कारण ‘जाग्रत्’ इन नामों से व्यवहृत होता है। प्रस्तुत गद्यखण्ड के इतने अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी समझाया जा सकता है- चित्र-४३ चतुर्विध स्थूलशरीर की समष्टि व्यष्टि एकत्व विवक्षा अनेकत्व विवक्षा समष्टि वन अभेद वृक्ष व्यष्टि चैतन्य जलाशय जल चैतन्य वैश्वानर (विराट्) तदवच्छिन्नाकाश विश्व समस्त प्राणियों के विविधरूप में सम्पूर्ण शरीरों में प्रविष्ट होकर मैं इस अभिमान से युक्त स्थूल शरीर अन्नमय कोश जाग्रत (सुख-दुःख के भोग (माता-पिता द्वारा (आत्मा का आच्छादक (इन्द्रियों द्वारा विषयों का आधार) खाए गए अन्न होने से) का भोग करने से) से उत्पन्न होने से) इसप्रकार स्थूलशरीरों की समष्टिव्यष्टि का कथन करने के पश्चात् पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय तथा चार अन्तरिन्द्रियों के अधिष्ठातृ देवताओं का उल्लेख करते हुए ग्रन्थकार उनके कार्यों का विस्तारपूर्वक कथन करते हैं-
२१० वेदान्तसार इस जाग्रत अवस्था में समष्टिरूप उपाधि से उपहित हुआ वैश्वानर अथवा विराट् नामक यह चैतन्य एवं व्यष्टि-उपाधिरूप 'विश्व' ये दोनों-दिशा, वायु, सूर्य, वरुण तथा अश्विनीकुमार देवों से अधिष्ठित क्रमशः श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा तथा घ्राण इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन गुणों को ग्रहण करते हैं। इसीप्रकार अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, यम और प्रजापति इन देवताओं से नियन्त्रित क्रमशः वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन पाँच कर्मेन्द्रियों से क्रमशः बोलना, ग्रहण करना (आदानप्रदान), चलना, मलत्याग एवं आनन्दरूप कार्यों को सम्पादित करते हैं। इसके अतिरिक्त चन्द्र, ब्रह्मा, शङ्कर तथा विष्णु इन देवों द्वारा अधिष्ठित क्रमशः मन, बुद्धि, अहङ्कार तथा चित्तरूपी चार अन्तः इन्द्रियों के माध्यम से क्रमशः संकल्प-विकल्प, निश्चय, गर्व एवं स्मरणरूपी सभी स्थूलविषयों का अनुभव करते हैं। अपने कथन की पुष्टि में माण्डूक्योपनिषद् की उक्ति को प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि-“जाग्रत अवस्था से युक्त यह चैतन्य ही सम्पूर्ण बाह्यविषयों से अवगत रहता है।” इस स्थिति में भी अर्थात् स्थूल समष्टि एवं व्यष्टि में, उनसे उपहित 'विश्व' और वैश्वानररूप चैतन्य में वन से अवच्छिन्न आकाश तथा वृक्ष से अवच्छिन्न आकाश, जलाशय में प्रतिबिम्बित आकाश एवं जल में प्रतिबिम्बित आकाश के समान परस्पर किसी भी प्रकार का भेद नहीं है, अपितु शुद्धचैतन्य की दृष्टि से दोनों समान हैं। तत्पश्चात् अन्त में प्रकरण का उपसंहार करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि इसप्रकार पञ्चीकृत महाभूतों से स्थूलप्रपञ्च की सृष्टि होती है। विशेष-(1) 'अभिमानी' शब्द का प्रयोग यहाँ 'अधिष्ठाता' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए हुआ है। (2) प्रस्तुत गद्यखण्ड के प्रारम्भिक अंश में प्रयुक्त 'नर' शब्द समस्त प्राणियों का उपलक्षण है। (3) छान्दोग्य एवं श्वेताश्वतरोपनिषद् में भी वैश्वानर एवं विराट् शब्दों का ही प्रयोग हुआ है।