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१०८ उपनिषद् (ब्रह्मविद्या खण्ड - भाग १)

108 Upanishads Part 1 - Brahmavidya Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished414 पृष्ठ

खण्ड ६ मन्त्र ४ ३२७ वेदानुशासनम् ॥ १५ ॥ यह (तुर्यातिरिक्त) ईश्वर सर्वज्ञ है, यह सर्वेश है, सर्वाधिपति है, अन्तर्यामी है और यही सबका उत्पत्ति स्थान है। समस्त सुखों के द्वारा यही उपास्य है, पर यह समस्त सुखों की उपासना नहीं करता। यह वेद और शास्त्रों का भी उपास्य है, पर यह वेद और शास्त्रों की उपासना नहीं करता। सभी अन्न इसके हैं, पर यह किसी का अन्न नहीं है। इसके अतिरिक्त यह सभी का नेत्र, सब को आज्ञा देने वाला, अन्नमय भूतों (प्राणियों) की आत्मा, प्राणमय इन्द्रियों की आत्मा, मनोमय संकल्प स्वरूप, विज्ञानमय कालरूप, आनन्दमय और लयात्मक है। उसमें अद्वैत (एकत्व) नहीं है, तो द्वैत कहाँ हो सकता है ? वह मर्त्य नहीं है, तो अमृत कैसे हो सकता है ? वह न अन्तःप्रज्ञ है और न बाह्यप्रज्ञ है। वह दोनों (अन्तर और बाह्य) में भी प्रज्ञ नहीं है। वह प्रज्ञानघन नहीं है, न प्रज्ञ (बहुत जानने वाला) ही है, न अप्रज्ञ (बिना जानने वाला) होकर भी इसे कुछ जानना शेष है। इसके अतिरिक्त निर्वाण के लिए और कोई उपदेश (अनुशासन) नहीं है अर्थात् मोक्ष के लिए यही अनुशासन है। यही वेद की शिक्षा व अनुशासन है ॥ १५ ॥ ॥ षष्ठःखण्डः ॥ नैवेह किंचनाग्र आसीदमूलमनाधारा इमाः प्रजाः प्रजायन्ते ॥ १ ॥ सृष्टि के पूर्व इस संसार में कुछ भी नहीं था। यह निर्मूल और निराधार था, (उसी से) इस प्रजा का आविर्भाव हुआ ॥ १ ॥ चक्षुश्च द्रष्टव्यं च नारायणः श्रोत्रं च श्रोतव्यं च नारायणो घ्राणं च घ्रातव्यं च नारायणो जिह्वा च रसयितव्यं च नारायणस्त्वक् च स्पर्शयितव्यं च नारायणो मनश्च मन्तव्यं च नारायणो बुद्धिश्च बोद्धव्यं च नारायणोऽहंकारश्चाहंकर्तव्यं च नारायणश्चित्तं च चेतयितव्यं च नारायणो वाक् च वक्तव्यं च नारायणो हस्तौ चादातव्यं च नारायणःपादौ च गन्तव्यं च नारायणः पायुश्च विसर्जयितव्यं च नारायण उपस्थश्चानन्दयितव्यं च नारायणो धाता विधाता कर्ता विकर्ता दिव्यो देव एको नारायणः ॥ २ ॥ चक्षु और द्रष्टव्य नारायण हैं, श्रोत्र और श्रोतव्य नारायण हैं, घ्राण शक्ति और घ्रातव्य नारायण हैं, जिह्वा और रस लेने का विषय नारायण हैं, त्वचा और स्पर्शयितव्य नारायण हैं, मन और मन्तव्य (मन का विषय) नारायण हैं, बुद्धि और बुद्धि का विषय नारायण हैं, अहंकार और अहंकर्तव्य नारायण हैं, चित्त और चिन्तन नारायण हैं, वाक् और वक्तव्य नारायण हैं, हाथ और दातव्य (देने का विषय) नारायण हैं, पैर और गन्तव्य नारायण हैं, पायु (गुदा) और विसर्जयितव्य नारायण हैं, उपस्थ और आनन्दयितव्य (आनन्द का विषय) नारायण हैं। नारायण ही धाता (धारण कर्ता), विधाता, कर्त्ता, विकर्ता (विशिष्ट रूप से रचना करने वाला) और एकमात्र दिव्य देव हैं ॥ २ ॥ आदित्या रुद्रा मरुतो वसवोऽश्विनावृचो यजूंषि सामानि मन्त्रोऽग्निराज्याहुतिर्नारायण उद्भवः संभवो दिव्यो देव एको नारायणः ॥ ३ ॥ आदित्य, रुद्र, वायु, वसु, अश्विनीकुमार, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदादि के मन्त्र, अग्नि और घृत की आहुति भी नारायण ही हैं। यही नारायण एक, दिव्य, देव और सभी के उत्पत्ति रूप हैं ॥ ३ ॥ माता पिता भ्राता निवासः शरणं सुहृद्गतिर्नारायणः ॥ ४ ॥

३२८ सुबालोपनिषद् नारायण ही माता-पिता, भाई, निवास, शरण, मित्र तथा गति (सद्गति) हैं ॥ ४ ॥ विराजा सुदर्शनाजितासौम्यामोधामृतासत्यामध्यमानासीराशिशुरासुरासूर्या- भास्वतीविज्ञेयानि नाडीनामानि दिव्यानि ॥ ५ ॥ नारायण ही विराजा, सुदर्शना, जिता, सौम्या, अमोघा (मोघा), कुमारा, अमृता, सत्या, मध्यमा, नासीरा, शिशुरा, असुरा, सूर्या, भास्वती—इन दिव्य नाड़ियों के रूप में हैं ॥ ५ ॥ गर्जति गायति वाति वर्षति वरुणोऽर्यमा चन्द्रमाः कालः कविर्धाता ब्रह्मा प्रजापतिर्मघवा दिवसाश्चार्धदिवसाश्च कलाः कल्पाश्चोर्ध्वं य दिशश्च सर्वं नारायणः ॥ ६ ॥ जो गरजता है, गाता है, (वायु रूप होकर) बहता है, बरसता है, जो वरुण, अर्यमा, चन्द्रमा, काल, कवि, धाता, प्रजापति, ब्रह्मा, मघवा (इन्द्र), दिवस, अर्ध दिवस, कलाएँ, कल्प, ऊर्ध्वभाग, दिशाएँ और सभी कुछ है, वे सब नारायण ही हैं ॥ ६ ॥ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति। तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् । तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् । तदेतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ ७॥ यह जो कुछ वर्तमान में है, जो पूर्व में हो चुका है और जो आगे भविष्य में होगा, वह सब पुरुष (परमेश्वर) ही है। इस अमर जीव-जगत् के भी वही स्वामी हैं। जो अन्न द्वारा वृद्धि प्राप्त करते हैं, उनके भी वही स्वामी हैं। वही विष्णु का परम पद है, जिसे विद्वज्जन सदैव देखते हैं। यह अन्तरिक्ष में फैले हुए चक्षु के समान है। क्रोधित न होने वाले तथा सतत जाग्रत् रहने वाले विप्रगण इसका साक्षात्कार करते हैं, यही विष्णु का परम पद है। यही निर्वाण का उपदेश है, यही वेद का अनुशासन है। यही वेद की सीख है ॥ ७ ॥ ॥ सप्तमः खण्डः ॥ अन्तःशरीरे निहितो गुहायामज एको नित्यो यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरे संचरन् यं पृथिवी न वेद। यस्यापः शरीरं योऽपोऽन्तरे संचरन्यमापो न विदुः । यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोन्तरे संचरन् यं तेजो न वेद। यस्य वायुः शरीरं यो वायुमन्तरे संचरन् यं वायुर्न वेद। यस्याकाशः शरीरं य आकाशमन्तरे संचरन् यमाकाशो न वेद। यस्य मनः शरीरं यो मनोन्तरे संचरन् यं मनो न वेद। यस्य बुद्धिः शरीरं यो बुद्धिमन्तरे संचरन् यं बुद्धिर्न वेद। यस्याहंकारः शरीरं योऽहंकारमन्तरे संचरन् यमहंकारो न वेद। यस्य चित्तं शरीरं यश्चित्तमन्तरे संचरन् यं चित्तं न वेद। यस्याव्यक्तं शरीरं योऽव्यक्तमन्तरे संचरन् यमव्यक्तं न वेद। यस्याक्षरं शरीरं योऽक्षरमन्तरे संचरन् यमक्षरं न वेद। यस्य मृत्युः शरीरं यो मृत्युमन्तरे संचरन् यं मृत्युर्न वेद। स एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्यो देव एको नारायणः ॥ १ ॥ जो शरीर के अन्दर हृदय रूपी गुहा में निवास करता है, वह आत्मा अज, एक और नित्य है। उसका शरीर पृथिवी है, जो पृथिवी में संचरित होता है; पर पृथिवी जिसे नहीं जानती। जल जिसका शरीर है, जो जल में संचरित होता है; पर जल जिसे नहीं जानता। तेज जिसका शरीर है, जो तेज में संचरित होता है; पर तेज जिसे नहीं जानता। वायु जिसका शरीर है, वायु में जो संचरित होता है; पर वायु जिसे नहीं जानता। आकाश जिसका शरीर है, जो आकाश में संचरित होता है; पर आकाश जिसे नहीं जानता। मन जिसका शरीर है, जो मन में

खण्ड ९ मन्त्र १ ३२९ संचरित होता है; पर मन जिसे नहीं जानता । बुद्धि जिसका शरीर है, जो बुद्धि में संचरित होता है; पर बुद्धि जिसे नहीं जानती। अहंकार जिसका शरीर है, जो अहंकार में संचरित होता है; पर अहंकार जिसे नहीं जानता। चित्त जिसका शरीर है, जो चित्त में संचरित होता है; पर चित्त जिसे नहीं जानता। अव्यक्त जिसका शरीर है, जो अव्यक्त में सञ्चरित होता है; पर अव्यक्त जिसे नहीं जानता। अक्षर जिसका शरीर है, जो अक्षर में संचरित होता है; पर अक्षर जिसे नहीं जानता। मृत्यु जिसका शरीर है, जो मृत्यु में संचरित होता है; पर मृत्यु जिसे नहीं जानती, वे सर्वभूतों के अन्तरात्मा, विनष्ट पाप वाले, एक, दिव्य, देव, नारायण हैं ॥ १ ॥ एतां विद्यामपान्तरतमाय ददावपान्तरतमो ब्रह्मणे ददौ ब्रह्मा घोराङ्गिरसे ददौ घोराङ्गिरा रैक्वाय ददौ रैक्को रामाय ददौ रामः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो ददावित्येवं निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ २ ॥ यह विद्या (नारायण ने) अपान्तरतम नामक ब्राह्मण (अति प्राचीन काल के सिद्ध ब्राह्मण) की दी थी। अपान्तरतम ने ब्रह्मा को, ब्रह्मा ने घोराङ्गिरस को, घोराङ्गिरस ने रैक्व को, रैक्व ने राम की और राम ने समस्त भूतों को प्रदान की। इस प्रकार यह निर्वाण का अनुशासन है, वेद का अनुशासन है और वेद की शिक्षा है ॥२॥ ॥ अष्टमः खण्डः ॥ अन्तःशरीरे निहितो गुहायां शुद्धः सोऽयमात्मा सर्वस्य मेदोमांसक्लेदावकीर्णे शरीर- मध्येऽत्यन्तोपहते चित्रभित्तिप्रतीकाशे गान्धर्वनगरोपमे कदलीगर्भवनिःसारे जलबुद्बुदव- च्चञ्चले निःसृतमात्मानमचिन्त्यरूपं दिव्यं देवमसङ्गं शुद्धं तेजस्कायमरूपं सर्वेश्वरमचि- न्त्यमशरीरं निहितं गुहायाममृतं विभाजमानमानन्दं तं पश्यन्ति विद्वांसस्तेन लये न पश्यन्ति ॥१ सभी शरीरों के अन्दर हृदय रूपी गुहा में यह शुद्ध आत्मा निवास करता है। शरीर तो मेद, मांस और रक्त से अभिपूरित है, जो अत्यन्त नश्वर और चित्रभित्ति (चित्रस्थ दीवार) के समान गन्धर्व नगर तुल्य, केले के गर्भ की तरह निस्सार, जल के बुलबुले की तरह चञ्चल है; किन्तु उससे परे रहने वाला आत्मा अचिन्त्यरूप, दिव्य, प्रकाशवान्, असङ्ग, शुद्ध, तेजःस्वरूप, अरूप, सर्वेश्वर, अचिन्त्य और अशरीर है। हृदय रूपी गुहा में निवास करने वाला वह (आत्मा) अमृत और देदीप्यमान है। विद्वान् उसको आनन्दरूप में देखते हैं और उसमें विलय हो जाने के पश्चात् उससे भिन्न कुछ भी नहीं देखते ॥ १ ॥ ॥ नवमः खण्डः ॥ अथ हैनं रैक्वः पप्रच्छ भगवन्कस्मिन्सर्वेऽस्तं गच्छन्तीति । तस्मै स होवाच चक्षुरेवाप्येति यच्चक्षुरेवास्तमेति द्रष्टव्यमेवाप्येति यो द्रष्टव्यमेवास्तमेत्यादित्यमेवाप्येति य आदित्यमेवास्त- मेति विराजमेवाप्येति यो विराजमेवास्तमेति प्राणमेवाप्येति यः प्राणमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेत्यानन्दमेवाप्येति य आनन्दमेवास्तमेति तुरीयमेवाप्येति यस्तुरीयमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्तन्निर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ १ ॥ इसके पश्चात् रैक्व ने घोराङ्गिरस से प्रश्न किया-हे भगवन् ! ये समस्त पदार्थ किसमें अस्त होते हैं ? (यह सुनकर) घोराङ्गिरस ने रैक्व को उत्तर दिया-जो पदार्थ चक्षु के प्रति प्राप्त (प्रकट) होते हैं (दिखाई देते हैं), वे चक्षु (अपने अन्तर्यामी) में ही अस्त हो जाते हैं। जो द्रष्टव्य पदार्थ आदित्य के प्रति प्रकट होता है, वह आदित्य में ही विलीन हो जाता है। जो आदित्य, विराजा (सुषुम्ना नामक नाड़ी का ही एक नाम) के प्रति प्रकट होता है,

३३० सुबालोपनिषद् वह विराजा में ही विलीन हो जाता है। जो विराजा प्राण के प्रति प्रकट होती है, वह प्राण में ही विलीन हो जाती है। जो प्राण, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। जो विज्ञान, आनन्द के प्रति प्रकट होता है, वह आनन्द में ही अस्त होता है। जो आनन्द, तुरीय के प्रति प्रकट होता है, वह तुरीय में ही अस्त होता है। वह तुरीय अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म को प्राप्त होता है॥ १॥ [जिस-जिस संज्ञा वाली नाड़ियाँ मनुष्य में होती हैं, वे सभी मूलतः विराट् पुरुष में भी होती हैं, जिस तरह विराट् पुरुष-परमात्मा का अंश आत्मा है, वैसे ही नाड़ियाँ भी विराट् के नाड़ी तंत्र की अंग हैं। आदित्य आदि देवों का प्राकट्य और विलय उन्हीं के प्रति कहा गया है। आगे के मंत्रों में भी अधिदेवता का विलय जिन नाड़ियों में कहा गया है, वे सभी विराट् की नाड़ियाँ ही मान्य हैं।] श्रोत्रमेवाप्येति यः श्रोत्रमेवास्तमेति श्रोतव्यमेवाप्येति यः श्रोतव्यमेवास्तमेति दिशमेवाप्येति यो दिशमेवास्तमेति सुदर्शनामेवाप्येति यः सुदर्शनामेवास्तमेत्यपानमेवाप्येति योऽपानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्त- निर्बीजमेवाप्येतीति होवाच ॥ २ ॥ इसी प्रकार जो श्रोत्र के प्रति प्रकट होता है, वह श्रोत्र में ही अस्त होता है। जो श्रोत्र, श्रोतव्य के प्रति प्रकट होता है, वह श्रोतव्य में ही अस्त होता है। जो श्रोतव्य, दिशाओं के प्रति प्रकट होता है, वह दिशाओं में ही अस्त होता है। जो दिशाएँ, सुदर्शना के प्रति प्रकट होती हैं, वे सुदर्शना में ही अस्त होती हैं। जो सुदर्शना, अपान के प्रति प्रकट होती है, वह अपान में ही अस्त होती है। जो अपान विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। वह विज्ञान अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म में विलीन हो जाता है॥ २॥ नासामेवाप्येति यो नासामेवास्तमेति घ्रातव्यमेवाप्येति यो घ्रातव्यमेवास्तमेति पृथिवीमेवाप्येति यः पृथिवीमेवास्तमेति जितामेवाप्येति यो जितामेवास्तमेति व्यानमेवाप्येति यो व्यानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत.................. होवाच ॥ ३ ॥ इसी प्रकार जो पदार्थ नासिका के प्रति (गन्धरूप में) प्रकट होते हैं, वे नासिका में ही अस्त होते हैं। जो नासिका, घ्रातव्य (सूँघे जाने योग्य) पदार्थों के प्रति प्रकट होती है, वह घ्रातव्य में ही अस्त हो जाती है। जो घ्रातव्य, पृथिवी के प्रति प्रकट होता है, वह पृथिवी में ही विलीन हो जाता है। जो पृथिवी, जिता नामक नाड़ी के प्रति प्रकट होती है, वह जिता में ही अस्त होती है। जो जिता, व्यान के प्रति प्रकट होती है, वह व्यान में ही विलीन हो जाती है। जो व्यान, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही विलुप्त हो जाता है। वह विज्ञान, अमृत, अभय, अशोक, अनन्त और निर्बीज ब्रह्म में लय हो जाता है ॥ ३ ॥ जिह्वामेवाप्येति यो जिह्वामेवास्तमेति रसयितव्यमेवाप्येति यो रसयितव्यमेवास्तमेति वरुणमेवाप्येति यो वरुणमेवास्तमेति सौम्यामेवाप्येति यः सौम्यामेवास्तमेत्युदानमेवाप्येति य उदानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत.................. होवाच ॥ ४ ॥ इसी प्रकार जो पदार्थ जिह्वा के प्रति प्रकट होते हैं, वे जिह्वा में ही विलीन हो जाते हैं। जो जिह्वा, रसयितव्य के प्रति प्रकट होती है, वह रसयितव्य में ही विलीन हो जाती है। जो रसयितव्य, वरुण को प्राप्त होता है, वह वरुण में ही विलीन हो जाता है। जो वरुण, सौम्या नामक नाड़ी को प्राप्त होता है, वह सौम्या में ही विलीन हो जाता है। जो सौम्या, उदान के प्रति प्रकट होती है, वह उदान में ही अस्त हो जाती है। जो उदान, विज्ञान के प्रति प्रकट होता है, वह विज्ञान में ही लय हो जाता है। वह विज्ञान अमृत, भयरहित, शोकरहित, अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म को प्राप्त होता है ॥ ४॥

खण्ड ९ मन्त्र ८ ३३१ त्वचमेवाप्येति यस्त्वचमेवास्तमेति स्पर्शयितव्यमेवाप्येति यः स्पर्शयितव्यमेवास्तमेति वायुमेवाप्येति यो वायुमेवास्तमेति मोघामेवाप्येति यो मोघामेवास्तमेति समानमेवाप्येति यः समानमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............. होवाच ॥ ५ ॥ जो पदार्थ त्वचा को प्राप्त होते हैं, वे त्वचा में ही विलीन हो जाते हैं। जो त्वचा, स्पर्शायितव्य के प्रति प्रकट होती है, वह स्पर्शायितव्य में ही अस्त हो जाती है। जो स्पर्शायितव्य, वायु को प्राप्त होता है, वह वायु में ही विलीन हो जाता है। जो वायु मोघा के प्रति प्रकट होती है, वह मोघा नामक नाड़ी में ही विलीन हो जाती है। जो मोघा, समान के प्रति प्राप्त होती है, वह समान में ही अस्त हो जाती है। जो समान, विज्ञान को प्राप्त होती है, वह विज्ञान में ही अस्त हो जाती है। वह अमर, अभय, अशोक, अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म में विलीन हो जाता है ॥५॥ वाचमेवाप्येति यो वाचमेवास्तमेति वक्तव्यमेवाप्येति यो वक्तव्यमेवास्तमेत्य- ग्रिमेवाप्येति योऽग्निमेवास्तमेति कुमारामेवाप्येति यः कुमारामेवास्तमेति वैरम्भमेवाप्येति यो वैरम्भमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत.............. होवाच ॥ ६ ॥ जो पदार्थ वाक् को प्राप्त होते हैं, वे वाक् में ही अस्त होते हैं। जो वाक्, वक्तव्य को प्राप्त होती है, वह वक्तव्य में ही अस्त होती है। जो वक्तव्य, अग्नि को प्राप्त होता है, वह अग्नि में ही विलीन हो जाता है। जो अग्नि, कुमारा नामक नाड़ी को प्राप्त होती है, वह कुमारा में ही विलीन हो जाती है। जो कुमारा, वैरम्भ को प्राप्त होती है, वह वैरम्भ में ही अस्त हो जाती है। जो वैरम्भ, विज्ञान को प्राप्त होता है, वह विज्ञान में ही अस्त होता है। वह विज्ञान अमर, भयरहित, शोकरहित, अन्तरहित और बीजरहित ब्रह्म में विलीन हो जाता है ॥ ६ ॥ हस्तमेवाप्येति यो हस्तमेवास्तमेत्यादातव्यमेवाप्येति य आदातव्यमेवास्तमे- तीन्द्रमेवाप्येति य इन्द्रमेवास्तमेत्यमृतामेवाप्येति योऽमृतामेवास्तमेति मुख्यमेवाप्येति यो मुख्यमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत....................... होवाच ॥ ७ ॥ (ऐसा कहने के पश्चात् उन घोराङ्गिरस ने पुनः कहना प्रारम्भ किया कि) जो हाथ को प्राप्त कर लेता है, वह हाथ में ही विलीन हो जाता है। यह हाथ, लेने योग्य पदार्थ के प्रति गमन करता है, अतः यह लेने वाले पदार्थ में ही लीन होता है, यह पदार्थ, इन्द्र के प्रति प्रस्थान करता है, इस कारण से यह इन्द्र में ही विलीन हो जाता है, यह इन्द्र, अमृता नाड़ी के प्रति जाता है, इस कारण यह अमृता में ही अस्त हो जाता है, यह अमृता, मुख्य के पास जाती है, अतः मुख्य में ही अस्त हो जाती है, यह मुख्य, विज्ञान के पास जाता है, इस कारण से विज्ञान में ही अपने को विलीन कर लेता है और यह विज्ञान, तुरीय के प्रति गमन करता है, इस कारण यह अमर, निर्भय, अशोक एवं अन्तरहित तथा बीजविहीन तुरीयावस्था को ही प्राप्त कर लेता है ॥ ७ ॥ पादमेवाप्येति यः पादमेवास्तमेति गन्तव्यमेवाप्येति यो गन्तव्यमेवास्तमेति विष्णुमेवाप्येति यो विष्णुमेवास्तमेति सत्यामेवाप्येति यः सत्यामेवास्तमेत्यन्तर्याममेवाप्येति योऽन्तर्याममेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तद्.............. होवाच ॥ ८ ॥ (इसी प्रकार) जो पैर के प्रति गमन करता है, वह पैर में ही विलीन होता है, यह पैर, गन्तव्य स्थान की ओर प्रस्थान करता है, इस कारण से यह गन्तव्य स्थान में विलीन हो जाता है, यह गन्तव्य स्थान विष्णु के प्रति जाता है, इस कारण से यह विष्णु में ही विलीन हो जाता है, यह विष्णु, सत्या नाड़ी की ओर प्रस्थान करता है, इसलिए यह सत्या नाड़ी में ही अपने को विलीन कर लेता है, यह सत्या, अन्तर्याम की ओर गमन करती है, इसलिए यह अन्तर्याम में ही लय ही जाती है, यह अन्तर्याम, विज्ञान की ओर गमन करता है, इसलिए यह

३३२ सुबालोपनिषद् विज्ञान में ही विलय हो जाता है तथा यह विज्ञान, तुरीय के समक्ष जाता है, इस कारण से यह मृत्युरहित, भयरहित, शोकरहित, अन्तरहित एवं अबीज तुरीयावस्था को प्राप्त कर लेता है ॥ ८ ॥ पायुमेवाप्येति यः पायुमेवास्तमेति विसर्जंयितव्यमेवाप्येति यो विसर्जंयितव्य- मेवास्तमेति मृत्युमेवाप्येति यो मृत्युमेवास्तमेति मध्यमामेवाप्येति यो मध्यमामेवास्तमेति प्रभञ्जनमेवाप्येति यः प्रभञ्जनमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तद्.......... होवाच ॥ ९॥ (ऐसा कहने के अनन्तर फिर उन्होंने कहा-) जो गुदा को प्राप्त करता है, वह गुदा में ही विलय को पाता है, यह गुदा, विसर्जन योग्य मल त्याग को प्राप्त करता है, अतः यह त्यागने योग्य में ही विलय को प्राप्त करता है, यह मलत्याग, मृत्यु को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्यु में ही विलीन हो जाता है,यह मृत्यु, मध्यमा नाड़ी को प्राप्त करती है, इसलिए यह मध्यमा में ही विलीन होती है,यह मध्यमा, प्रभञ्जन नामक वायु को प्राप्त करती है, अतः यह प्रभञ्जन वायु में ही विलय को प्राप्त होती है,यह प्रभञ्जन वायु विज्ञान को प्राप्त होती है, इस कारण प्रभञ्जन वायु का अस्त विज्ञान में ही होता है। यह विज्ञान, तुरीय के पास जाता है, इसलिए वह मृत्युरहित, भयविहीन, अशोक, अनन्त एवं निर्बीज तुरीयावस्था को प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥ उपस्थमेवाप्येति य उपस्थमेवास्तमेत्यानन्दयितव्यमेवाप्येति य आनन्दयितव्यमे- वास्तमेति प्रजापतिमेवाप्येति यः प्रजापतिमेवास्तमेति नासीरामेवाप्येति यो नासीरामेवास्तमेति कुर्मिरमेवाप्येति यः कुर्मिरमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत ........ होवाच ॥ १० ॥ (यह कहने के पश्चात् पुनः उन्होंने कहना प्रारंभ किया कि) जो उपस्थ को प्राप्त करता है, वह उपस्थ में ही लीन हो जाता है और यह उपस्थ, आनन्द स्वरूप विषयों को प्राप्त करता है, इस कारण यह आनन्द में विलय हो जाता है। यह आनन्द, प्रजापति के पास जाता है, इस कारण यह प्रजापति में विलीन हो जाता है। यह प्रजापति, नासीरा नाड़ी को ओर प्रस्थान करता है, अतः यह नासीरा में ही विलीन हो जाता है। यह नासीरा, कुर्मिर नाड़ी की ओर गमन करता है, इस कारण से यह कुर्मिर नाड़ी में ही लय होती है। यह कुर्मिर विज्ञान की ओर जाती है, इसलिए इसका विलय विज्ञान में ही हो जाता है। यह विज्ञान तुरीय को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्युरहित, भयरहित, शोकविहीन, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को ही प्राप्त करता है ॥ १० ॥ मन एवाप्येति यो मन एवास्तमेति मन्तव्यमेवाप्येति यो मन्तव्यमेवास्तमेति चन्द्रमेवाप्येति यश्चन्द्रमेवास्तमेति शिशुमेवाप्येति यः शिशुमेवास्तमेति श्येनमेवाप्येति यः श्येनमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............. होवाच ॥ ११ ॥ (इसके बाद उन्होंने पुनः कहा कि) जो मन को प्राप्त करता है, वह मन में ही विलीन हो जाता है। यह मन, विचारणीय विषय को प्राप्त करता है, इस कारण से यह विचारणीय विषयों में लीन हो जाता है, यह विचारणीय, चन्द्रमा को तरफ गमन कर जाता है, इसलिए यह चन्द्रमा में ही लय हो जाता है, यह चन्द्रमा, शिशु नाड़ी को ओर गमन करता है, इस कारण यह शिशु में ही विलीन हो जाता है, यह शिशु नाड़ी श्येन की ओर गमन करती है, इस कारण वह श्येन में ही लय होती है, यह श्येन, विज्ञान को तरफ गमन करता है, इस कारण से यह विज्ञान में ही विलीन हो जाता है तथा यह विज्ञान, तुरीय के प्रति गमन करता है, इस कारण से यह मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को प्राप्त होता है ॥ ११ ॥ बुद्धिमेवाप्येति यो बुद्धिमेवास्तमेति बोद्धव्यमेवाप्येति यो बोद्धव्यमेवास्तमेति ब्रह्माणमेवाप्येति यो ब्रह्माणमेवास्तमेति सूर्यामेवाप्येति यः सूर्यामेवास्तमेति कृष्णामेवाप्येति यः कृष्णामेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............. होवाच ॥ १२ ॥

खण्ड ९ मन्त्र १५ ३३३ (ऐसा कहने के उपरान्त उन्होंने फिर कहा कि) जो बुद्धि को प्राप्त करता है, वह बुद्धि में ही विलीन हो जाता है। यह बुद्धि, जानने योग्य विषयों की ओर प्रस्थान कर जाती है, इस कारण यह जानने योग्य विषयों में ही विलीन हो जाती है। यह जानने का विषय, ब्रह्मा की ओर गमन कर जाता है, इसलिए यह ब्रह्मा में ही अस्त हो जाता है, यह ब्रह्मा सूर्या नाड़ी को प्राप्त करता है, इसलिए इसका विलय सूर्या में ही हो जाता है, यह सूर्या कृष्ण को प्राप्त करती है, इसलिए यह कृष्ण में ही विलीन हो जाती है, यह कृष्ण, विज्ञान को प्राप्त करता है, इसलिए इसका विलय विज्ञान में ही हो जाता है और यह विज्ञान, तुरीय को प्राप्त हो जाता है, इस कारण यह मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं अबीज तुरीयावस्था को ही प्राप्त करता है ॥ १२ ॥ अहंकारमेवाप्येति योऽहंकारमेवास्तमेत्यहंकर्तव्यमेवाप्येति योऽहंकर्तव्यमेवास्तमेति रुद्रमेवाप्येति यो रुद्रमेवास्तमेत्यसुरामेवाप्येति योऽसुरामेवास्तमेति श्वेतमेवाप्येति यः श्वेतमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति तदमृत............. होवाच ॥ १३॥ (इस प्रकार कहने के पश्चात् उन महर्षि ने कहा कि) जो अहंकार को प्राप्त करता है, वह अहंकार में ही विलीन हो जाता है। यह अहंकार, कर्तव्य को प्राप्त करता है, इसलिए यह कर्त्तव्य में ही लय हो जाता है। यह कर्तव्य, रुद्र को प्राप्त करता है, इस कारण इसका लय रुद्र में ही होता है, यह रुद्र, असुरा नाड़ी को प्राप्त करता है, इसलिए इस रुद्र का विलय असुरा नाड़ी में ही हो जाता है। यह असुरा नाड़ी श्वेत को प्राप्त करती है, अतः इस असुरा का विलय श्वेत में ही होता है। यह श्वेत, विज्ञान को प्राप्त करता है, इसलिए इसका विलय विज्ञान में ही हो जाता है। यह विज्ञान, तुरीय को प्राप्त करता है, इस कारण यह मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं अबीज तुरीय को ही प्राप्त होता है ॥ १३॥ चित्तमेवाप्येति यश्चित्तमेवास्तमेति चेतयितव्यमेवाप्येति यश्चेतयितव्यमेवास्तमेति क्षेत्रज्ञमेवाप्येति यः क्षेत्रज्ञमेवास्तमेति भास्वतीमेवाप्येति यो भास्वतीमेवास्तमेति नागमेवाप्येति यो नागमेवास्तमेति विज्ञानमेवाप्येति यो विज्ञानमेवास्तमेत्यानन्दमेवाप्येति य आनन्दमेवास्तमेति तुरीयमेवाप्येति यस्तुरीयमेवास्तमेति तदमृतमभयमशोकमनन्तं निर्बीजमेवाप्येति तदमृत.............. होवाच ॥ १४ ॥ (इस प्रकार कहने के बाद पुनः उन्होंने कहना शुरू किया कि) जो चित्त को प्राप्त कर लेता है, वह चित्त में ही विलीन हो जाता है। यह चित्त, चिन्तन योग्य को पा लेता है, इस कारण यह चिन्तन करने योग्य में ही लय हो जाता है। यह चिन्तन करने योग्य, क्षेत्रज्ञ को प्राप्त कर लेता है, इस कारण इसका विलय क्षेत्रज्ञ में ही होता है। यह क्षेत्रज्ञ, भास्वती नाड़ी में गमन कर जाता है, इस कारण यह भास्वती नाड़ी में ही विलीन हो जाता है। यह भास्वती, नाग वायु के पास जाती है, इस कारण यह नाग वायु में ही अस्त हो जाती है। यह नाग वायु, विज्ञान की ओर जाती है, इस कारण यह विज्ञान में विलय हो जाती है। यह विज्ञान, आनन्द को प्राप्त कर लेता है, इस कारण यह आनन्द में ही विलीन हो जाता है और वह आनन्द मृत्युरहित, भयरहित, अशोक, अनन्त एवं निर्बीज तुरीय में जाता है, इस कारण से यह तुरीयावस्था को प्राप्त कर लेता है ॥ १४ ॥ य एवं निर्बीजं वेद निर्बीज एव स भवति न जायते न म्रियते न मुह्यते न भिद्यते न दह्यते न छिद्यते न कम्पते न कुप्यते सर्वदहनोऽयमात्मेत्याचक्षते ॥ १५॥ (उन घोराङ्गिरस जी ने पुनः कहा कि) जो भी मनुष्य इस तरह से निर्बीज रूपी तत्त्व को जान लेता है, वह निर्बीज हो जाता है। वह अजन्मा हो जाता है, मृत्यु एवं मोह को भी नहीं प्राप्त करता। उसका भेदन नहीं

३३४ सुबालोपनिषद् होता, जलता भी नहीं, छेदा भी नहीं जाता, कम्पायमान भी नहीं होता तथा कुपित भी नहीं होता है। इस प्रकार सभी कुछ दग्ध करने वाली यह आत्मा ही है, ऐसा शास्त्रवेत्ताओं का मत है॥ १५॥ नैवमात्मा प्रवचनशतेनापि लभ्यते न बहुश्रुतेन न बुद्धिज्ञानाश्रितेन न मेधया न वेदैर्न यज्ञैर्न तपोभिरुग्रैर्न सांख्यैर्न योगैर्नाश्रमैर्नान्यैरात्मानमुपलभन्ते प्रवचनेन प्रशंसया व्युत्थानेन तमेतं ब्राह्मणाः शुश्रुवांसोऽनूचाना उपलभन्ते शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति सर्वस्यात्मा भवति य एवं वेद ॥ १६ ॥ यह आत्मा सैकड़ों तरह के प्रवचन करने मात्र से नहीं प्राप्त होता, अनेकों शास्त्रों का अध्ययन करने से भी नहीं मिलता, बुद्धि तथा ज्ञान का सान्निध्य प्राप्त कर लेने से भी यह आत्मा प्राप्त नहीं होता। वैसे ही मेधा, वेदों, यज्ञों, उग्र-तपश्वर्या, सांख्यज्ञान, योग, आश्रम अथवा अन्य दूसरे प्रयत्नों से भी वह आत्मा प्राप्त नहीं होता। ब्रह्म में निष्ठा रखने वाला जो मनुष्य प्रवचन के द्वारा, प्रशंसा (गुरु सेवा) के द्वारा तथा व्युत्थान (सामान्य जीवन क्रम से ऊपर उठकर) के द्वारा आत्मज्ञानपरक शास्त्रों का श्रवण करता हुआ शम, दम, उपरति एवं तितिक्षा में स्थित होकर समाधिनिष्ठ हुआ आत्मा को आत्मा में ही देखता है, वही आत्म तत्त्व को प्राप्त कर पाता है। जो भी मनुष्य इस तरह से आत्मतत्त्व को जानता है, वह सभी का आत्मा हो जाता है॥ १६॥ ॥ दशमः खण्डः ॥ अथ हैनँ रैकः पप्रच्छ भगवन्कस्मिन्सर्वे संप्रतिष्ठिता भवन्तीति रसातललोकेष्विति होवाच कस्मिन्न्रसातललोका ओताश्च प्रोताश्चेति भूर्लोकेष्विति होवाच। कस्मिन्भूर्लोका ओताश्च प्रोताश्चेति भुवर्लोकेष्विति होवाच। कस्मिन्भुवर्लोका ओताश्च प्रोताश्चेति सुवर्लोकेष्विति होवाच। कस्मिन्सुवर्लोका ओताश्च प्रोताश्चेति महर्लोकेष्विति होवाच। कस्मिन्महर्लोका ओताश्च प्रोताश्चेति जनोलोकेष्विति होवाच। कस्मिन् जनोलोका ओताश्च प्रोताश्चेति तपोलोकेष्विति होवाच। कस्मिँस्तपोलोका ओताश्च प्रोताश्चेति सत्यलोकेष्विति होवाच। कस्मिन्सत्यलोका ओताश्च प्रोताश्चेति प्रजापतिलोकेष्विति होवाच। कस्मिन्प्रजापतिलोका ओताश्च प्रोताश्चेति ब्रह्मलोकेष्विति होवाच। कस्मिन्ब्रह्मलोका ओताश्च प्रोताश्चेति सर्वलोका आत्मनि ब्रह्मणि मणय इवौताश्च प्रोताश्चेति स होवाच ॥ १ ॥ इसके बाद पुनः रैक मुनि ने घोराङ्गिरस से प्रश्न किया कि "हे भगवन्! किसमें सभी प्रतिष्ठित हैं?" तदनन्तर उन घोराङ्गिरस ने कहना प्रारम्भ किया कि रसातल के लोकों में सभी कुछ रहता है। "यह रसातल का लोक किसमें स्थित है?" तब उन्होंने कहा कि यह 'भू लोक' में स्थित है। यह भूलोक किसमें स्थित है? उन्होंने कहा- "यह भुवः लोक में प्रतिष्ठित है।" यह भुवर्लोक किसमें ओत-प्रोत है? तब उन्होंने बताया कि "यह स्वर्लोक में स्थित है"। यह स्वर्लोक किसमें ओत-प्रोत है? उन्होंने उत्तर दिया कि "यह महर्लोक में प्रतिष्ठित है।" यह महर्लोक किसमें ओत-प्रोत है?" (उत्तर) यह जनोलोक में प्रतिष्ठित है।" इस प्रकार उन ऋषि ने पुनः कहा-यह जनोलोक किसमें ओत-प्रोत है?" (उत्तर) यह तपोलोक में स्थित है, ऐसा उन्होंने कहा। (प्रश्न) यह तपोलोक किसमें ओत-प्रोत है? उन्होंने कहा कि यह सत्यलोक में स्थित है। यह सत्य लोक किसमें ओत-प्रोत है? यह प्रजापति लोक में प्रतिष्ठित है, ऐसा उन्होंने कहा-"यह प्रजापति लोक किसमें ओत-प्रोत है?" यह ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित है" ऐसा उन्होंने बताया। यह ब्रह्मलोक किसमें ओत-प्रोत

खण्ड ११ मन्त्र १ ३३५ है ? (यह अन्य किसी में ओत-प्रोत नहीं है) "समस्त लोक आत्म स्वरूप परब्रह्म में माला के दानों की भाँति ओत-प्रोत हैं। इस प्रकार उन्होंने कहा" ॥ १ ॥ एवमेतान् लोकानात्मनि प्रतिष्ठितान्वेदात्मैव स भवतीत्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ २ ॥ जो पुरुष इन सभी लोकों की आत्मा में ही स्थित रहता है, वह आत्मस्वरूप ही हो जाता है। इस तरह यह निर्वाण (मोक्ष) विषय का अनुशासन है, यही वेद की शिक्षा है एवं यही वेद की आज्ञा है ॥ २ ॥ ॥ एकादशः खण्डः ॥ अथ हैनँ रैकः पप्रच्छ भगवन्त्योऽयं विज्ञानघन उत्क्रामन्स केन कतरद्वाव स्थानमुत्सृ- ज्यापक्रामतीति तस्मै स होवाच। हृदयस्य मध्ये लोहितं मांसपिण्डं यस्मिंस्तद्दहरं पुण्डरीकं कुमुदमवानेकधा विकसितं तस्य मध्ये समुद्रः समुद्रस्य मध्ये कोशस्तस्मिन्नाड्यश्चतस्रो भवन्ति रमारमेच्छाऽपुनर्भवेति तत्र रमा पुण्येन पुण्यं लोकं नयत्यरमा पापेन पापमिच्छया यत्स्मरति तदभिसंपद्यते अपुनर्भवया कोशं भिनत्ति कोशं भित्त्वा शीर्षकपालं भिनत्ति शीर्षकपालं भित्त्वा पृथिवीं भिनत्ति पृथिवीं भित्त्वाऽपो भिनत्त्यपो भित्त्वा तेजो भिनत्ति तेजो भित्त्वा वायुं भिनत्ति वायुं भित्वाकाशं भिनत्त्याकाशं भित्त्वा मनो भिनत्ति मनो भित्त्वा भूतादिं भिनत्ति भूतादिं भित्त्वा महान्तं भिनत्ति महान्तं भित्त्वाव्यक्तं भिनत्यव्यक्तं भित्त्वाक्षरं भिनत्त्यक्षरं भित्त्वा मृत्युं भिनत्ति मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणा- नुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ १ ॥ इसके बाद रैक मुनि ने पुनः प्रश्न किया-हे भगवन्! यह विज्ञानघन आत्मा जब शरीर से उत्क्रमण करता है, तब किस जगह का परित्याग करके, किस रास्ते से बाहर की ओर प्रस्थान करता है ? यह सुनकर घोरारङ्गिरस ने कहना प्रारम्भ किया कि "हृदय के मध्य भाग में मांस का लाल पिण्ड स्थित है। उस पिण्ड में चन्द्रमा के द्वारा विकसित होने वाले कमलिनी पुष्प की भाँति शुभ्र श्वेत एक सूक्ष्मातिसूक्ष्म कमल विद्यमान है। उस सूक्ष्म कमल का विभिन्न तरह से विकास हुआ है। उसके मध्य में समुद्र स्थित है, इस समुद्र के बीच में कोश (स्थान विशेष) स्थित है। उसमें चार प्रकार की नाड़ियाँ-रमा, अरमा, इच्छा एवं अपुनर्भवा हैं। इनमें से रमा नाड़ी पुण्य कृत्यों के माध्यम से पुण्य लोक में ले जाती है, अरमा नाड़ी पाप कृत्य के द्वारा पापलोक में ले जाती है, इच्छा नाड़ी के द्वारा जिसको याद किया जाता है, उसको प्राप्त किया जाता है तथा अपुनर्भवा नाड़ी के द्वारा इस हृदय के मध्य में स्थित कोश को खोला जाता है, कोश को खोलकर मस्तक के शीर्ष (ब्रह्मरन्ध्र) को खोला जाता है, मस्तक के शीर्ष को खोलकर पृथिवी का भेदन करता है, पृथिवी का भेदन करने के पश्चात् जल का भेदन करता है, जल का भेदन करने के बाद तेज (प्रकाश) को भेदता है, तेज का भेदन करने के पश्चात् वायु का भेदन करता है, वायु को भेदकर आकाश को भेदता है, आकाश को भेदकर मन का भेदन करता है, मन को भेदकर अहंकार का भेदन करता है, अहंकार का भेदन करने के पश्चात् वह महत्तत्त्व का भेदन करता है, महत्तत्त्व को भेद कर प्रकृति को भेदता है, प्रकृति का भेदन करने के पश्चात् वह अक्षर का भेदन करता है, अक्षर का भेदन करने के बाद वह मृत्यु का भेदन करता है और वह मृत्यु परमादिदेव परमात्मा में ही एक रूप रहती है। इस एकाकार के पश्चात् सत्, असत् तथा सदसत् आदि कुछ भी नहीं रहता।

॥ द्वादशः खण्डः ॥

३३६ सुबालोपनिषद् इस प्रकार से यह निर्वाण (मोक्ष) का अनुशासन है और यही वेद का अनुशासन है, वेद की आज्ञा है ॥ १ ॥ ॥ द्वादशः खण्डः ॥ ॐ नारायणाद्वा अन्नमागतं पक्वं ब्रह्मलोके महासंवर्तके पुनः पक्वमादित्ये पुनः पक्वं क्रव्यादि पुनः पक्वं जालकिलक्लिन्नं पर्युषितं पूतमन्नमयाचितमसंक्लृप्तमश्रीयान्न कंचन याचेत ॥ १ ॥ नारायण के द्वारा अन्न का आगमन हुआ है। वह (अन्न) महासंवर्तक (प्रलय काल में) ब्रह्म के लोक में पका है, इसके बाद वह आदित्य (कालाग्नि) में पका है और इसके पश्चात् वह क्रव्यादि (कल्याण- आवसथ्याग्नि) में पका है। पुनः (प्राणियों के द्वारा खाये जाने पर) जठराग्नि में पका है। इस गीले-बासी (अन्न) को संन्यासी (कभी न खाये, अपितु) पवित्र, अयाचित (बिना माँगे हुए), असंकल्पित (किसी घर विशेष से संकल्पपूर्वक न लेना) भिक्षा में प्राप्त अन्न को ही ग्रहण करे। इस तरह से संन्यासी को किसी से भी अन्न की याचना नहीं करनी चाहिए ॥ १ ॥ ॥ त्रयोदशः खण्डः ॥ बाल्येन तिष्ठासेद्बालस्वभावोऽसङ्गो निरवद्यो मौनेन पाण्डित्येन निरवधिकारतयोपलब्ध्येत कैवल्यमुक्तं निगमनं प्रजापतिरुवाच महत्पदं ज्ञात्वा वृक्षमूले वसेत कुचेलोऽसहाय एकाकी समाधिस्थ आत्मकाम आप्तकामो निष्कामो जीर्णकामो हस्तिनि सिंहे दंशे मशके नकुले सर्पराक्षसगन्धर्वे मृत्यो रूपाणि विदित्वा न बिभेति कुतश्चनेति वृक्षमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेतोलपलमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेताकाशमिव तिष्ठासेच्छिद्यमानोऽपि न कुप्येत न कम्पेत सत्येन तिष्ठासेत्सत्योऽयमात्मा ॥ १ ॥ (ज्ञानी के लिए) बाल्यकाल में ही सदैव बने रहने की कामना करना, बालकों जैसे स्वभाव वाला, असंग (आसक्ति रहित) रहना एवं निरवद्य (बिना दोष के) रहना, मौन रहना तथा पाण्डित्य को प्राप्त करना, अवधि रहित (वर्णाश्रम आदि से परे रहने वाले) अधिकार को प्राप्त करना, यही अन्तिम कैवल्य स्थिति बतलायी गयी है। प्रजापति ने कहा कि श्रेष्ठ पद को जान लेने के बाद वृक्षों के नीचे निवास करना, जीर्ण वस्त्रों को धारण करना, किसी की भी सहायता न प्राप्त करना तथा एकाकी ही समाधि अवस्था में लीन रहना चाहिए। इस तरह से पुरुष आत्मा को प्राप्त करने की इच्छा वाला, पूर्णकाम एवं कामनाओं से रहित होता है। उस पुरुष की समस्त इच्छाएँ जीर्ण-शीर्ण हो जाती हैं। फिर वह पुरुष हाथी, सिंह, डाँस, मच्छर, न्यौला, सर्प, राक्षस या गन्धर्व आदि में मृत्यु का रूप समझकर किसी से भी भयभीत नहीं होता। वृक्ष की भाँति स्थिर रहने की कामना करता रहता है। उसे यदि कोई काटकर नष्ट कर दे, तब भी वह क्रोधरहित रहता है, कम्पायमान नहीं होता, कमल की तरह निर्लिप्त रहना चाहता है। अस्त्र-शस्त्रादि से छेदा भी जाये, तब भी क्रोधित न हो, अपनी जगह पर स्थिर रहकर आकाश की तरह से वह (निर्लिप्त) रहना चाहता है। छिन्न-भिन्न कर देने पर क्रोधित न हो, कंपित न हो, सदैव सत्य के प्रति आरूढ़ रहना चाहता है। यही आत्मा का सत्य रूप है ॥ १ ॥ सर्वेषामेव गन्धानां पृथिवी हृदयं सर्वेषामेव रसानामापो हृदयं सर्वेषामेव रूपाणां तेजो हृदयं सर्वेषामेव स्पर्शानां वायुर्हृदयं सर्वेषामेव शब्दानामाकाशं हृदयं सर्वेषामेव गतीनामव्यक्तं हृदयं सर्वेषामेव सत्त्वानां मृत्युर्हृदयं मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न

खण्ड १५ मन्त्र १ ३३७ सदसदित्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ २ ॥ समस्त गन्धों का हृदय पृथ्वी है, सभी तरह के रसों का हृदय जल है, समस्त रूपों का हृदय तेज (प्रकाश) है, सभी स्पर्शों का हृदय वायु है, सभी प्रकार के शब्दों का हृदय आकाश है, समस्त गतियों का हृदय अव्यक्त (प्रकृति) है, सभी तरह के सत्त्वों (प्राणियों) का हृदय मृत्यु है तथा वह मृत्यु परमादिदेव परमात्मतत्त्व में एक रूप होकर रहता है। इसके बाद न सत् है, न असत् है और न ही सदसत् है। इस तरह यह मोक्ष का उपदेश है, यही वेदों की शिक्षा है, वेदों का अनुशासन है ॥ २ ॥ ॥ चतुर्दशः खण्डः ॥ पृथिवी वान्नमापोऽन्नादा आपो वान्नं ज्योतिरन्नादं ज्योतिर्वान्नं वायुरन्नादो वायुर्वान्नमाकाशोऽन्नाद आकाशो वान्नमिन्द्रियाण्यन्नादानीन्द्रियाणि वान्नं मनोऽन्नादं मनो वान्नं बुद्धिरन्नादा बुद्धिवन्नमव्यक्तमन्नादमव्यक्तं वान्नमक्षरमन्नादमक्षरं वान्नं मृत्युरन्नादो मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ १ ॥ पृथ्वी अन्न है, जल अन्न का भक्षण करने वाला है, जल अन्न है तथा ज्योति (तेज या अग्नि) अन्न का भक्षण करने वाली है, ज्योति ही अन्न है, वायु अन्न का भक्षण करने वाली है, वायु ही अन्न है और आकाश अन्न खाने वाला है, आकाश ही अन्न है तथा इन्द्रियाँ अन्न ग्रहण करने वाली हैं, इन्द्रियाँ ही अन्न हैं, मन अन्न ग्रहण करने वाला है, मन ही अन्न है और बुद्धि अन्न ग्रहण करने वाली है, बुद्धि ही अन्न है तथा प्रकृति अन्न ग्रहण करने वाली है, प्रकृति ही अन्न है और अक्षर अन्न को खाने वाला है, अक्षर ही अन्न है और मृत्यु अन्न को ग्रहण करने वाली है। यह मृत्यु ही परमदेव परब्रह्म में एक रूप हो जाती है। इसके पश्चात् सत् नहीं है, असत् भी नहीं है, सत्-असत् भी नहीं है। यही निर्वाण (मुक्ति) का उपदेश है, यही वेद का अनुशासन है, यही वेद की शिक्षा है ॥ १ ॥ ॥ पञ्चदशः खण्डः ॥ अथ हैनँ रैक्वः पप्रच्छ भगवन्त्योऽयं विज्ञानघन उत्क्रामन्स केन कतरद्वाव स्थानं दहतीति तस्मै स होवाच योऽयं विज्ञानघन उत्क्रामन्प्राणं दहत्यपानं व्यानमुदानं समानं वैरम्भं मुख्यमन्तर्यामं प्रभञ्जनं कुमारं श्येनं श्वेतं कृष्णं नागं दहति पृथिव्यापस्तेजोवाय्वाकाशं दहति जागरितं स्वप्नं सुषुप्तं तुरीयं च महतां च लोकं परं च लोकं दहति लोकालोकं दहति धर्माधर्मं दहत्यभास्करममर्यादं निरालोकमन्तः परंदहति महान्तं दहत्यव्यक्तं दहत्यक्षरं दहति मृत्युं दहति मृत्युर्वै परे देव एकीभवतीति परस्तान्न सन्नासन्न सदसदित्येतन्निर्वाणानुशासन मिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम् ॥ १ ॥ इसके पश्चात् रैक्व मुनि ने घोराङ्गिरस से पुनः प्रश्न किया-" हे भगवन् ! यह विज्ञान स्वरूप आत्मा जब शरीर से बाहर उत्क्रमण करता है, तब वह किसके द्वारा, किस स्थान को जलाता है ?'' ऐसा सुनकर उन घोराङ्गिरस ने कहा- “वह विज्ञानघन आत्मा बाहर उत्क्रमण करता है,” तब सबसे पहले प्राण को, क्रमशः अपान को, व्यान को, उदान को, समान को, वैरंभ को, मुख्य को, अन्तर्याम को, प्रभञ्जन को, कुमार को, श्येन को, श्वेत को, कृष्ण को एवं नाग को दग्ध करता है। तत्पश्चात् पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश को

३३८ सुबालापानषद दग्ध करता है, इसके बाद जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्या, महानता के लोक तथा परलोक को भी दग्ध कर देता है, तदनन्तर लोक एवं अलोक को दग्ध करता है, धर्म एवं अधर्म को दग्ध करता है, तत्पश्चात् बिना सूर्य के, बिना मर्यादा के और बिना आलोक के वह सभी स्थलों को दग्ध कर देता है, उसके बाद महत्तत्त्व को दग्ध कर देता है, प्रकृति को दग्ध करता है, अक्षर को दग्ध करता है तथा मृत्यु को भी दग्ध कर देता है। मृत्यु ही परमादिदेव परमतत्त्व में एकाकार हो जाती है, उसके बाद न सत् है, न असत् और न ही सत्-असत् है। यही निर्वाण (मुक्ति) का अनुशासन है, यही वेद की शिक्षा है, यही वेद का अनुशासन है॥ १ ॥ ॥ षोडशः खण्डः ॥ सौबालबीजब्रह्मोपनिषन्नाप्रशान्ताय दातव्या नापुत्राय नाशिष्याय नासंवत्सररात्रोषिताय नापरिज्ञातकुलशीलाय दातव्या नैव च प्रवक्तव्या। यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मन इत्येतन्निर्वाणानुशासनमिति वेदानुशासनमिति वेदानुशासनम्॥ १ ॥ सौबाल (सुबाल सम्बन्धी) जिस ब्रह्म का बीज है, ऐसे इस उपनिषद् को अन्य किसी को नहीं प्रदान करना चाहिए, जो अत्यधिक शान्त न हो, जो पुत्र न हो, जो शिष्य न हो तथा जो एक वर्ष तक पास में न रहा हो। इस प्रकार से अनजान कुलशील वाले मनुष्य को भी नहीं प्रदान करना चाहिए और न ही उसे बताना चाहिए। जिस व्यक्ति की परमात्मशक्ति के ऊपर तथा परमात्मा के सदृश ही गुरु के ऊपर परम श्रेष्ठ भक्ति हो, उसी के लिए ये अर्थ (विशेष ज्ञान) बतलाये गये हैं तथा ऐसे ही महान् आत्मा को ये प्रकाशित करते हैं। यही निर्वाण (मुक्ति) का आदेश है, यही वेदों की शिक्षा है तथा यही वैदिक अनुशासन है॥ १ ॥ ॐ पूर्णमदः ................................. इति शान्तिः ॥ ॥ इति सुबालोपनिषत्समाप्ता ॥

॥ स्वसवेद्यापानषद् ॥ 'स्व'-आत्मतत्त्व का, संवेद्य-अनुभव प्राप्त करना, इस उपनिषद् का प्रयोजन है। इसमें एक ही मन्त्र चार प्रखण्डों में विभक्त है। पहले प्रखण्ड में प्राणियों की उपमा जल बुद्बुद से दी गई है और कहा गया है, जैसे जल का बुद्बुद जल में विलीन होकर जल के साथ एकाकार हो जाता है, उसी प्रकार प्राणियों का समूह, अमृतसागर स्वरूप परब्रह्म में विलीन हो जाता है, परन्तु ऐसी स्थिति ज्ञान-प्राप्ति के बाद ही सम्भव होती है, अधिकांशतया तो प्राणी अज्ञान से ही आवृत होते हैं। दूसरे प्रखण्ड में बताया गया है कि सभी काल, कर्मात्मक और स्वभावात्मक होते हैं। यथार्थ में पाप- पुण्य, अच्छा-बुरा कोई नहीं होता, केवल 'मत' (आत्मतत्त्व की निष्ठा) की ही यथार्थता है। इसमें परिनिष्ठित व्यक्ति के लिए मोक्ष-नरक आदि कुछ भी नहीं होता। तीसरे प्रखण्ड में तत्त्वज्ञान को गुहा में प्रविष्ट बताते हुए कहा गया है कि सामान्य जनों की इस मार्ग में प्रवृत्ति ही नहीं हो पाती। साकार उपासना प्रधान लोग अज्ञान में भटकते रहते हैं। तत्त्वज्ञानी को ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा कुत्ते, गधे, बिल्ली में चैतन्यतत्त्व की दृष्टि से कोई अन्तर प्रतीत नहीं होता। अन्तिम चतुर्थ प्रखण्ड में सभी को आत्मतत्त्व सम्पन्न मानकर, सबकी सेवा करने का मर्म समझाया गया है। अन्त में 'गुरु' की महत्ता बताते हुए कहा गया है कि सब कुछ गुरु की कृपा से ही जाना जा सकता है, उनसे बढ़कर कोई भी नहीं-यह तथ्य जानने वाला ही जीवन्मुक्त हो पाता है। ॐ सर्वेषां प्राणिबुद्बुदानां निरंजनाव्यक्तामृतनिधौ विलयविलासः स्थितिर्विजृम्भते। तेषामेव पुनर्भवं नो इहास्ति। स यथा मृत्पिण्डे घटानां तन्तौ पटानां तथैवेति भवति। वस्तुतो नोपादानमत एव नोपादेयमत एव न निमित्तमत एव न विद्या न पुराणं नो वेदा नेतिहासा इति न जगदिति न ब्रह्मा नो विष्णुः नाथ रुद्रो नेश्वरो न बिन्दुः नो कलेति अग्रे मध्येऽवसाने सर्वं यथावस्थितं यथावस्थितज्ञानं तेषां नो भवत्यागमपुराणेतिहासधर्मशास्त्रेषु धृताभिमानास्ते। यत्तानि तु मुग्धतरमुनिशब्दवाच्यैः जीवबुद्बुदैः रचितानीति भवन्ति। तत्र ग्रामाण्यं तादृशानामेव। ते त्वज्ञानेनावृताः सयत्नेन गर्भास्तदप्येष श्लोको भवति। तदत्र श्लोको भवति ॥ १-क ॥ ॐ प्राणिस্বরূপ बुलबुलों (पानी के बुलबुलों) का निरञ्जन और अव्यक्त अमृत के सागर परब्रह्म में विलीन हो जाने की स्थिति प्रकट और सत्य है। यह अवश्य ही होती है। ब्रह्मलीन हो जाने वालों का पुनरागमन नहीं होता। उनकी स्थिति मृत्तिकापिण्ड में कुम्भ की तरह और धागों में कपड़े की तरह हो जाती है। वस्तुतः वह न उपादान है, न उपादेय और न निमित्त ही है। वह विद्या, पुराण, वेद, इतिहास भी नहीं है। न जगत् है, न ब्रह्मा, न विष्णु, न रुद्र, न ईश्वर न बिन्दु और न कला ही है। आगे (आदि), मध्य और अन्त में उन सबको (प्राणियों को) यथावस्थित ज्ञान नहीं होता, क्योंकि वे आगम, पुराण, इतिहास एवं धर्मशास्त्रों में अभिमान धारण करने वाले होते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि वे जीव मुनि द्वारा उच्चरित किये गये श्रेष्ठ वचनों रूपी बुद्बुदों द्वारा विनिर्मित होते हैं। वहाँ (उस सन्दर्भ में) वैसों की ही प्रामाणिकता मान्य होती है। वे तो

३४० स्वसवेद्यापानषद

अज्ञान से आवृत हैं। बहुत प्रयत्न करने पर कुछ ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं, फिर भी यह उक्ति प्रसिद्ध है, कि वे सब (जीव) अज्ञान युक्त हैं, मुग्धतर हैं ॥ १-क ॥ इह तेनाप्यज्ञानेन नो किञ्चित् । अथ यथावस्थितज्ञानेन किंचित् नेति यदस्ति तदस्ति यन्नास्ति नास्ति तत् । कालकर्मात्मकमिदं स्वभावात्मकं चेति। न सुकृतं नो दुष्कृतम्। अत एव सुमेरुदातारो गोदातारो वा गोघ्नैः ब्राह्मणघ्नैः सुरापानैः पश्यतोहरैः परोक्षहरैर्वा गुरुपापनिष्ठैः सर्वपापनिष्ठैः समानास्त एते । तैश्च न गौः न ब्राह्मणः न सुरा न पश्यतोहरः न परोक्षहरः न गुरुपापानि न लघुपापानि मत एव तन्निष्ठाः मत एव न निर्वाणं नो निरय इति तदप्येष श्लोको भवति ॥ १-ख ॥ यहाँ उस अज्ञान से कोई प्रयोजन नहीं है और उस यथावस्थित ज्ञान से भी कोई प्रयोजन नहीं है। जिसका अस्तित्व है, उसका है। जिसका अस्तित्व नहीं है, उसका नहीं है। ये सभी काल-कर्मात्मक और स्वभावात्मक हैं। पुण्य और पाप भी नहीं है। अतएव सुमेरु (स्वर्ण) दाता, गोदाता अथवा गोहन्ता, ब्राह्मणहन्ता, सुरापायी, डाकू, चोर, गुरु (महान्) पापनिष्ठ तथा सर्वपापनिष्ठ ये सभी एक ही समान हैं। उनके लिए न गौ है, न ब्राह्मण है, न शराब पीने वाला है, न डाकू है, न चोर है, न बड़े पाप हैं, न छोटे पाप हैं। उनके लिए तो (उनका) मत सर्वोपरि है, क्योंकि मत में ही उनकी निष्ठा है। मोक्ष और नरक भी उनके लिए कुछ भी नहीं है। ऐसा इस श्लोक का अर्थ है ॥ १-ख ॥ तत्त्वज्ञानं गुहायां निविष्टमज्ञानिकृतमार्गं सुष्ठु वदन्ति। ते तत्र साभिमाना वर्तन्ते । पुष्पितवचनेन मोहितास्ते भवन्ति । स यथातुरा भिषग्ग्रहणकाले बाला अपथ्याहितगुडादिना जनन्या वञ्चिता इति नानादेवता गुरुकर्मतीर्थनिष्ठाश्च ते भवन्ति । केचिद्वयं वैदिका इति वदन्ति। नान्येऽस्मभ्यम्। केचिद्वयं सर्वशास्त्रज्ञा इति। केचिद्वयं देवानुग्रहवन्तः। केचिद्वयं स्वप्ने उपास्यदेवताभाषिणः। केचिद्वयं देवा इति। केचिद्वयं श्रीमद्रमारमणनलिनभृङ्गा इति । केचित्तु नृत्यन्तु। केचित्तु मूर्खा वयं परमभक्ता इति वदन्तो रुदन्ति पतन्ति च । ये केचन्नैते ते सर्वेऽप्यज्ञानिनः । ये तु ज्ञानिनो भवन्ति ये तत्त्वज्ञानिनश्च तैस्तेषां को विशेषः। मत एव केषाञ्चित्कैश्चिद्भेदः। मत एव यत्र विरिञ्चिविष्णुरुद्रा ईश्वरश्च गच्छन्ति तत्रैव श्वानो गर्दभाः मार्जाराः कृमयश्च मत एव न श्वानगर्दभौ न मार्जारः न कृमिः नोत्तमाः न मध्यमाः न जघन्याः । तदप्येष श्लोको भवति ॥१-ग ॥ तत्त्वज्ञान को गुहा में प्रविष्ट कहा गया है। अज्ञानियों द्वारा किये गये (ज्ञान हेतु अपनाये गये) मार्ग को श्रेष्ठ कहा गया है; क्योंकि वे अभिमान सहित उस मार्ग पर चलते हैं। वे पुष्पित (मुग्ध) वचनों के द्वारा मोहित हो जाते हैं। जिस प्रकार माताएँ बच्चों को दवा खिलाते समय अपथ्य गुड़ आदि मिलाकर उन्हें दवा खिलाती हैं अर्थात् अपथ्य गुड़ का प्रलोभन देकर औषधि खिला देती हैं; उसी प्रकार अनेक देवों की उपासना, गुरुओं के प्रति निष्ठा, तीर्थ सेवन और विभिन्न सत्कर्म करने वाले भी इन्हें (देवों आदि को) ठगते हैं अर्थात् उनके उपर्युक्त कर्मों के पीछे भी उनकी यही इच्छा रहती है कि हमारी सद्गति हो। कुछ लोग हम वैदिक हैं, ऐसा कहते हैं। अन्य लोग ऐसा नहीं कहते। कुछ अपने को समस्त शास्त्रों का ज्ञाता कहते हैं, कुछ अपने को देव अनुग्रहवान् कहते हैं। कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि हम स्वप्न में अपने उपास्य देवता द्वारा बताई गई बात बता

मन्त्र १-घ ३४१ देते हैं (जैसे लोग चोरी का सामान मिलने आदि के विषय में बता देते हैं।) कुछ लोग अपने को देवता बताते हैं। कुछ कहते हैं कि हम भगवान् विष्णु रूपी कमल पर गुंजार करने वाले भ्रमर (अर्थात् वैष्णव) हैं। कुछ (परम भक्त होने की) प्रसन्नता में नृत्य करें, तो करें। कुछ मूर्खजन अपने को परम भक्त बताते हुए रोते हैं और पतित होते हैं। जो भी इस प्रकार के हैं, वे प्रायः सभी अज्ञानी हैं। जो ज्ञानी हैं और जो तत्त्वज्ञानी हैं, उनमें परस्पर कौन वरिष्ठ (विशेष) है (अर्थात् कोई नहीं)। किन्हीं का किन्हीं से केवल मत में ही भेद दृष्टिगोचर होता है। यह सर्वमान्य मत है कि जहाँ ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर जाते हैं, वहीं कुत्ते, गधे, बिल्लियाँ और कृमि भी जाते हैं। यह भी सर्वमान्य है कि कुत्ते, गधे, बिल्लियाँ और कृमि न उत्तम हैं, न मध्यम हैं और न नीच हैं (सबका सृष्टि में अपना-अपना उपयुक्त स्थान है)। इस श्लोक का यही अर्थ हुआ॥ १-ग॥ न तच्छब्दः न किंशब्दः न सर्वे शब्दाः न माता नो पिता न बन्धुः न भार्या न पुत्रो न मित्रं नो सर्वे तथापि साधकैरात्मस्वरूपं वेदितुमिच्छद्भिर्जीवन्मुमुक्षुभिः सन्तः सेव्याः। भार्या पुत्रो गृहं धनं सर्वं तेभ्यो देयम्। कर्माद्वैतं न कार्यं भावाद्वैतं तु कार्यं। निश्चयेन सर्वाद्धैतं कर्तव्यम्। गुरौ द्वैतमवश्यं कार्यम्। यतो न तस्मादन्यत्। येन सर्वमिदं प्रकाशितम्। कोऽन्यः तस्मात्परः। स जीवन्मुक्तो भवति स जीवन्मुक्तो भवति। य एवं वेद। य एवं वेद ॥१-घ॥ इसलिए न 'तत्' शब्द है, न 'किम्' शब्द है (अर्थात् प्रश्न और उत्तर कुछ नहीं है) और न सभी शब्द (अर्थात् अन्य कोई शब्द) हैं। न माता, न पिता, न बंधु, न पत्नी, न पुत्र, न मित्र और अन्य सब भी नहीं हैं, तो भी साधकों को आत्म स्वरूप को समझने की आकांक्षा से और जीवन्मुक्त होने की आकांक्षा से सन्त सेवा करनी चाहिए। स्त्री, पुत्र, धन, गृह सब कुछ उन्हें अर्पित कर देना चाहिए अर्थात् उनके निमित्त उनका मोह छोड़ देना चाहिए। कर्माद्वैत नहीं भावाद्वैत करना चाहिए। निश्चित ही सर्वाद्धैत करना चाहिए। गुरु में द्वैत अवश्य करना चाहिए, क्योंकि उनसे बढ़कर और कुछ भी नहीं है। उनके द्वारा ही सम्पूर्ण जगत् प्रकाशित होता है अर्थात् गुरु की कृपा से ही सब कुछ जाना जाता है। उनसे बढ़कर अन्य कौन है अर्थात् कोई नहीं। जो इस तथ्य को सम्यक् रूप से जानता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है ॥१-घ॥ ॥ इति स्वसंवेद्योपनिषत् समाप्ता ॥

॥ हंसोपनिषद् ॥ यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध है। इसमें कुल २१ मन्त्र हैं। ऋषि गौतम एवं सनत्कुमार के प्रश्नोत्तर रूप में यह उपनिषद् प्रकट हुई है। इसमें ऋषि गौतम द्वारा ब्रह्मविद्या की बात पूछे जाने पर सनत्कुमार जी ने वह प्रसंग सुनाया, जो महादेव जी ने श्री पार्वती जी को सुनाया था। यह बड़ा ही गुह्य ज्ञान है, जिसे महादेव ने शान्त (मनोनिग्रह युक्त), दान्त (इन्द्रियनिग्रह युक्त) और गुरुभक्त को ही देने की बात कही है। वह हंस (जीवात्मा) सभी शरीरों में उसी प्रकार विद्यमान है, जैसे काष्ठ में अग्नि और तिलों में तेल। उसकी प्राप्ति के लिए षट्चक्र वेधन की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। अष्टदल कमल से उसकी वृत्तियों का साम्य बताते हुए शुद्ध स्फटिक मणि सदृश ब्रह्म का स्वरूप वर्णित किया है। यही 'हंस' भी कहा जाता है। इसके ध्यान से नाद की उत्पत्ति कही गई है। जिसकी अनेक रूपों में अनुभूति होती है। इसी की चरमावस्था में परब्रह्म से साक्षात्कार होता है। यही अवस्था समाधि की स्थिति है। इसी स्थिति में शुद्ध-बुद्ध, नित्य, निरञ्जन, शान्त स्वरूप परब्रह्म के प्रकाशित होने का वेदानुवचन भी प्रसिद्ध है। ॥ शान्तिपाठः ॥ ॐ पूर्णमदः ................ इति शान्तिः । (द्रष्टव्य-अध्यात्मोपनिषद् ) गौतम उवाच-भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । ब्रह्मविद्याप्रबोधो हि केनोपायेन जायते ॥ ऋषि गौतम ने (सनत्कुमार से) प्रश्न किया-हे भगवन् ! आप समस्त धर्मों के ज्ञाता और समस्त शास्त्रों के विशारद हैं। आप यह बताने की कृपा करें कि ब्रह्म विद्या किस उपाय द्वारा प्राप्त की जा सकती है ॥ १ ॥ सनत्कुमार उवाच-विचार्य सर्वधर्मेषु मतं ज्ञात्वा पिनाकिनः । पार्वत्या कथितं तत्त्वं शृणु गौतम तन्मम ॥ २ ॥ सनत्कुमार ने कहा-हे गौतम ! महादेव जी ने समस्त धर्मों (उपनिषदों) के मतों को विचार कर श्री पार्वती जी के प्रति जो भी कहा (व्याख्यान दिया) उसे तुम मुझसे सुनो ॥ २ ॥ अनाख्येयमिदं गुह्यं योगिने कोशसंनिभम्। हंसस्याकृतिविस्तारं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ ३ ॥ यह गूढ़ रहस्य किसी अज्ञात (अनधिकारी) से नहीं बताना चाहिए। योगियों के लिए तो यह (ज्ञान) एक कोश के समान है। हंस (परम आत्मा) की आकृति (स्थिति) का वर्णन भोग एवं मोक्षफल प्रदाता है ॥ अथ हंसपरमहंसनिर्णयं व्याख्यास्यामः । ब्रह्मचारिणे शान्ताय दान्ताय गुरुभक्ताय। हंसहंसेति सदा ध्यायन् ॥ ४ ॥ जो गुरुभक्त सदैव हंस-हंस (सोऽहम्, सोऽहम्) का ध्यान करने वाला, ब्रह्मचारी, जितेन्द्रिय तथा शान्त मनःस्थिति (इन्द्रियों) वाला हो, उसके समक्ष हंस-परमहंस का रहस्य प्रकट करना चाहिए ॥ ४ ॥ सर्वेषु देहेषु व्यासो वर्तते । यथा ह्यग्निः काष्ठेषु तिलेषु तैलमिव तं विदित्वा मृत्युमत्येति ॥ ५ ॥ जिस प्रकार तिल में तेल और काष्ठ में अग्नि संव्याप्त रहती है। उसी प्रकार समस्त शरीरों में व्याप्त होकर यह जीव 'हंस-हंस' इस प्रकार जप करता रहता है। इसे जानने के पश्चात् जीव मृत्यु से परे हो जाता है ॥५॥ गुदमवष्टभ्याधाराद्वायुमुत्थाप्य स्वाधिष्ठानं त्रिः प्रदक्षिणीकृत्य मणिपूरकं गत्वा अनाहतमतिक्रम्य विशुद्धौ प्राणान्निरुध्याज्ञामनुध्यायन्ब्रह्मरन्ध्रं ध्यायन् त्रिमात्रोऽहमित्येव सर्वदा पश्यत्यनाकारश्च भवति ॥ ६ ॥

मन्त्र १४ ३४३ (हंस ज्ञान का उपाय-) सर्वप्रथम गुदा को खींचकर आधार चक्र से वायु को ऊपर उठा करके स्वाधिष्ठान चक्र की तीन प्रदक्षिणाएँ करे, तदुपरांत मणिपूरक चक्र में प्रवेश करके अनाहत चक्र का अतिक्रमण करे। इसके पश्चात् विशुद्ध चक्र में प्राणों को निरुद्ध करके आज्ञाचक्र का ध्यान करे, फिर ब्रह्मरंध्र का ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार ध्यान करते हुए कि मैं त्रिमात्र आत्मा हूँ। योगी सर्वदा अनाकार ब्रह्म को देखता हुआ अनाकारवत् हो जाता है अर्थात् तुरीयावस्था को प्राप्त हो जाता है ॥ ६ ॥ एषोऽसौ परमहंसो भानुकोटिप्रतीकाशो येनेदं सर्वं व्याप्तम् ॥ ७ ॥ वह परमहंस अनन्तकोटि सूर्य सदृश प्रकाश वाला है, जिसके प्रकाश से सम्पूर्ण जगत् संव्याप्त है ॥ ७ ॥ तस्याष्टधा वृत्तिर्भवति। पूर्वदले पुण्ये मतिः। आग्नेये निद्रालस्यादयो भवन्ति। याम्ये क्रौर्ये मतिः। नैर्ऋते पापे मनीषा। वारुण्यां क्रीडा। वायव्यां गमनादौ बुद्धिः। सौम्ये रतिप्रीतिः। ईशान्ये द्रव्यादानम्। मध्ये वैराग्यम्। केसरे जाग्रदवस्था। कर्णिकायां स्वप्नम्। लिङ्गे सुषुप्तिः। पद्मत्यागे तुरीयम्। यदा हंसे नादो विलीनो भवति तत् तुरीयातीतम् ॥ ८ ॥ उस (जीव भाव सम्पन्न) हंस की आठ प्रकार की वृत्तियाँ हैं। हृदय स्थित जो अष्टदल कमल है, उसके विभिन्न दिशाओं में विभिन्न प्रकार की वृत्तियाँ विराजती हैं। इसके पूर्व दल में पुण्यमति, आग्नेय दल में निद्रा और आलस्य आदि, दक्षिणदल में क्रूरमति, नैर्ऋत्य दल में पाप बुद्धि, पश्चिमदल में क्रीड़ा वृत्ति, वायव्य दल में गमन करने की बुद्धि, उत्तर दल में आत्मा के प्रति प्रीति, ईशान दल में द्रव्यदान की वृत्ति, मध्य दल में वैराग्य की वृत्ति, (उस अष्टदल कमल के) केसर (तन्तु) में जाग्रदवस्था, कर्णिका में स्वप्नावस्था, लिङ्ग में सुषुप्तावस्था होती है। जब वह हंस (जीव) उस पद्म का परित्याग कर देता है, तब तुरीयावस्था को प्राप्त होता है। जब नाद उस हंस में विलीन हो जाता है, तब तुरीयातीत स्थिति को प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ अथो नाद आधाराद्ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं शुद्धस्फटिकसंकाशः। स वै ब्रह्म परमात्मेत्युच्यते ॥ ९ ॥ इस प्रकार मूलाधार से लेकर ब्रह्मरंध्र तक जो नाद विद्यमान रहता है, वह शुद्ध स्फटिकमणि सदृश ब्रह्म है, उसी को परमात्मा कहते हैं ॥ ९ ॥ अथ हंस ऋषिः। अव्यक्तगायत्री छन्दः। परमहंसो देवता। हमिति बीजम्। स इति शक्तिः। सोऽहमिति कीलकम् ॥ १० ॥ इस प्रकार इस (अजपा मंत्र) का ऋषि हंस (प्रत्यगात्मा) है, अव्यक्त गायत्री छन्द है और देवता परमहंस (परमात्मा) है। 'हं' बीज और 'सः' शक्ति है। सोऽहम् कीलक है ॥ १० ॥ षट्संख्यया अहोरात्रयोरेकविंशतिसहस्त्राणि षट्शतान्यधिकानि भवन्ति। सूर्याय सोमाय निरञ्जनाय निराभासायातानुसूक्ष्म प्रचोदयादिति ॥११॥ अग्नीषोमाभ्यां वौषट् हृदयाद्यङ्गन्यासकरन्यासौ भवतः ॥१२॥ एवं कृत्वा हृदयेऽष्टदले हंसात्मानं ध्यायेत् ॥ १३ ॥ इस प्रकार इन षट् संख्यकों द्वारा एक अहोरात्र (अर्थात् २४ घंटों) में इक्कीस हजार छः सौ श्वास लिए जाते हैं। (अथवा गणेश आदि ६ देवताओं द्वारा दिन-रात्रि में २१,६०० बार सोऽहम् मंत्र का जप किया जाता है।) 'सूर्याय सोमाय निरञ्जनाय निराभासाय अतानु सूक्ष्म प्रचोदयात् इति अग्नीषोमाभ्यां वौषट्' इस मंत्र को जपते हुए हृदयादि अंगन्यास तथा करन्यास करे। तत्पश्चात् हृदय स्थित अष्टदल कमल में हंस (प्रत्यगात्मा) का ध्यान करे ॥ ११-१३ ॥ अग्नीषोमौ पक्षावोंकारः शिर उकारो बिन्दु स्त्रिणेत्रं मुखं रुद्रो रुद्राणी चरणौ । द्विविधं कण्ठतः कुर्यादित्यन्मनाः अजपोपसंहार इत्यभिधीयते ॥ १४ ॥

३४४ हंसोपनिषद्

अग्नि और सोम उस (हंस) के पक्ष (पंख) हैं, ओंकार सिर, बिन्दु सहित उकार (हंस का) तृतीय नेत्र है, मुख रुद्र है, दोनों चरण रुद्राणी हैं। इस प्रकार सगुण-निर्गुण भेद से-दो प्रकार से कण्ठ से नाद करते हुए, हंस रूप परमात्मा का ध्यान करना चाहिए। अतः नाद द्वारा ध्यान करने पर साधक को उन्मनी अवस्था प्राप्त हो जाती है। इस स्थिति को 'अजपोपसंहार' कहते हैं॥ १४॥ एवं हंसवशात्तस्मान्मनो विचार्यते॥ १५॥ समस्त भाव हंस के अधीन हो जाते हैं, अतः साधक मन में स्थित रहते हुए हंस का चिन्तन करता है॥ अस्यैव जपकोट्यां नादमनुभवति एवं सर्वं हंसवशान्नादो दशविधो जायते। चिणीति प्रथमः। चिञ्चिणीति द्वितीयः। घण्टानादस्तृतीयः। शङ्खनादश्चतुर्थम्। पञ्चमस्तन्त्रीनादः। षष्ठस्तालनादः। सप्तमो वेणुनादः। अष्टमो मृदङ्गनादः। नवमो भेरीनादः। दशमो मेघनादः॥ १६॥ नवमं परित्यज्य दशममेवाभ्यसेत्॥ १७॥ इसके (सोऽहम् मंत्र के) दस कोटि जप कर लेने पर साधक को नाद का अनुभव होता है। वह नाद दस प्रकार का होता है। प्रथम-चिणी, द्वितीय-चिञ्चिणी, तृतीय-घण्टनाद, चतुर्थ-शंखनाद, पंचम-तंत्री, षष्ठ- तालनाद, सप्तम-वेणुनाद, अष्टम-मृदङ्गनाद, नवम-भेरीनाद और दशम-मेघनाद होता है। इनमें से नौ का परित्याग करके दसवें नाद का अभ्यास करना चाहिए॥ १६-१७॥ प्रथमे चिञ्चिणीगात्रं द्वितीये गात्रभञ्जनम्। तृतीये खेदनं याति चतुर्थे कम्पते शिरः॥१८॥ पञ्चमे स्रवते तालु षष्ठेऽमृतनिषेवणम्। सप्तमे गूढविज्ञानं परा वाचा तथाऽष्टमे॥ १९॥ अदृश्यं नवमे देहं दिव्यं चक्षुस्तथाऽमलम्। दशमं परमं ब्रह्म भवेदब्रह्मात्मसंनिधौ॥ २०॥ इन नादों के प्रभाव से शरीर में विभिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं। प्रथम नाद के प्रभाव से शरीर में चिन-चिनी हो जाती है अर्थात् शरीर चिन-चिनाता है। द्वितीय से गात्र भंजन (अंगों में अकड़न) होती है, तृतीय से शरीर में पसीना आता है, चतुर्थ से सिर में कम्पन (कँप-कँपी) होती है, पाँचवें से तालु से स्राव उत्पन्न होता है, छठे से अमृत वर्षा होती है, सातवें से गूढ़ ज्ञान-विज्ञान का लाभ प्राप्त होता है, आठवें से परावाणी प्राप्त होती है, नौवें से शरीर को अदृश्य करने (अन्तर्धान करने) तथा निर्मल दिव्य दृष्टि की विद्या प्राप्त होती है और दसवें से परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करके साधक ब्रह्म साक्षात्कार कर लेता है॥ १८-२०॥ तस्मिन्मनो विलीयते मनसि संकल्पविकल्पे दग्धं पुण्यपापे सदाशिवः शक्त्यात्मा सर्वत्रावस्थितः स्वयंज्योतिः शुद्धो बुद्धो नित्यो निरञ्जनः शान्तः प्रकाशत इति वेदानुवचनं भवतीत्युपनिषत्॥ २१॥ जब मन उस हंस रूप परमात्मा में विलीन हो जाता है, उस स्थिति में संकल्प-विकल्प मन में विलीन हो जाते हैं तथा पुण्य और पाप भी दग्ध हो जाते हैं, तब वह हंस सदा शिवरूप, शक्ति (चैतन्य स्वरूप) आत्मा सर्वत्र विराजमान, स्वयं प्रकाशित, शुद्ध-बुद्ध, नित्य-निरञ्जन, शान्तरूप होकर प्रकाशमान होता है, ऐसा वेद का वचन है। इस रहस्य के साथ इस उपनिषद् का समापन होता है॥ २१॥ ॐ पूर्णमदः ................. इति शान्तिः॥ ॥ इति हंसोपनिषत्समाप्ता ॥

परिशिष्ट-१ परिभाषा-कोश -१०८ उपनिषद्-ब्रह्मविद्या खण्ड १. अक्षय — कोश ग्रन्थों के अनुसार अक्षय का अर्थ है-'नास्ति क्षयोऽस्य' अर्थात् जिसका कभी क्षय (क्षरण) न हो, जो अविनाशी हो। जो सदा रहने वाला शाश्वत और कल्पान्त स्थायी हो। उपर्युक्त सभी गुणों का ईश्वर में समावेश है। अतः परमात्मा को अक्षय कहते हैं। अक्षय अर्थ में ही 'अक्षर' शब्द भी प्रयुक्त होता है- 'न क्षरमिति अक्षरम्' अर्थात् जो कभी अपने स्वरूप से विचलित न हो, वह अक्षर है। कठोपनिषद् में कहा गया है कि जो इस 'अक्षर' (ब्रह्म) को (भलीप्रकार) जान लेता है, वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है-एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम्। एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् (कठो० १.२.१६)। वस्तुतः संसार में दो प्रकार की सृष्टि है-क्षर और अक्षर। सभी परिवर्तनशील, यहाँ तक जीव-जगत् भी 'क्षर' हैं; किन्तु जो सदैव एक सा ही रहता है, कूटस्थ है-वह 'अक्षर' है-द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च। क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते (गी० १५.१६)। कभी विनष्ट न होने के अर्थ में-विशेषण रूप में भी अक्षय शब्द कई शब्दों के साथ प्रयुक्त होता है, जैसे-अक्षय तृतीया, अक्षय चतुर्थी, अक्षय नवमी, अक्षय पात्र तथा अक्षय वट आदि। २. अग्निष्टोम —अग्निष्टोम एक श्रौत यज्ञ है। यह यज्ञ प्रायः दो प्रकार का होता है-१. सोमयज्ञ २. हविर्यज्ञ। जिस यज्ञ में सोमरस से आहुति प्रदान की जाती है, वह सोमयज्ञ तथा जिसमें दूध, दही, घी और पुरोडाश आदि पिष्टक आहुति देकर यजन किया जाता है, वह हविर्यज्ञ कहलाता है। 'अग्निष्टोम' सोमयज्ञ के अन्तर्गत आता है। इसमें प्रथम सोमरस से आहुति दी जाती है, तत्पश्चात् सोमरस का पान किया जाता है। इस यज्ञ का काल वसन्त ऋतु माना जाता है; क्योंकि वसन्त में सोम प्रचुर परिमाण में उपलब्ध होता रहा-वसन्ते अग्निष्टोमः इति कात्यायनः। इस यज्ञ में प्रमुखतः अग्निदेव का स्तवन किया जाता है, इसलिए इसका नाम अग्निष्टोम पड़ा है- अग्नीनां स्तोमः इति अग्निष्टोमः। इसमें अग्निदेव के अतिरिक्त कुछ विशेष उद्देश्यों से इन्द्र और वायु आदि देवताओं का स्तवन भी किया जाता है। ताण्ड्य महाब्राह्मण (६.१.१) में उल्लेख है कि प्रजापति ने बहु प्रजा के सृजन की इच्छा से अग्निष्टोम का दर्शन किया, उसे लाये और उसके माध्यम से प्रजा का सृजन किया-प्रजापतिरकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति स एतमग्निष्टोममपश्यत्तमाहरत्तेनेमाः प्रजा असृजत। ३. अग्निहोत्र — अग्निहोत्र एक यज्ञ विशेष है, जिसमें मात्र अग्निदेव के लिए ही आहुतियाँ प्रदान को जाती हैं-अग्नये हूयतेऽत्र (वाच० पृ० ६१)। तैत्तिरीय ब्राह्मण में उल्लेख है कि प्राचीन काल में एक बार प्रजापति के भय से अग्निदेव के पलायन करने पर प्रजापति ने उसी अग्नि में 'स्वाहा' पूर्वक आहुतियाँ देना प्रारम्भ कर दिया। प्रथम आहुति से पुरुष का प्रादुर्भाव हुआ, द्वितीय आहुति से अश्वादि जन्मे। इस पर अग्नि को यह भय उत्पन्न हो गया कि प्रजापति बारम्बार आहुतियाँ प्रदान करके अपना अभीष्ट प्राप्त करेंगे और उन्हें (अग्नि को) उन आहुतियों का भाग भी न देंगे। आहुतियों का भाग मात्र देवगण ही ग्रहण करेंगे, तब तो मैं भूखा ही रहूँगा। अतः इस बार अग्निदेव पलायन न करके प्रजापति के अन्दर ही प्रविष्ट हो गये। प्रजापति ने कहा कि हे अग्ने ! जन्म ग्रहण करो-जन्म ग्रहण करो। अग्निदेव ने कहा कि मुझे आहुतियों का भाग नहीं मिलता, अतः भूखा रहकर मैं सेवा करने में असमर्थ हूँ। प्रजापति ने यह कहकर उन्हें भाग प्रदान किया कि अग्निहोत्रगत वह हवि आपके लिए ही दी गई थी (अग्नये हूयते इति अग्निहोत्रम्)। इसके पश्चात् प्रजापति के उदर से अग्निदेव का पुनः प्राकट्य हुआ-सोऽग्निरबिभेत्। आहुतीर्भिर्वै माऽऽप्रीतीति। स प्रजापतिं पुनः प्राविशत्......... (तैत्ति० ब्रा० २.१.२.५)। अग्निहोत्र के दो प्रकार बताए गए हैं-एक तो प्रतिदिन चलते रहकर एक मास में पूर्ण होने वाला तथा दूसरा यावज्जीवन (जीवनभर) चलने वाला। आजीवन चलने वाले अग्निहोत्र में प्रातः-सायं दोनों समय अग्नि में आहुति प्रदान की जाती है और अन्त में अग्निहोत्री का दाह संस्कार भी उसी अग्नि से किया जाता है। विवाह के पश्चात् ब्राह्मण को वसन्त ऋतु में, क्षत्रिय को ग्रीष्म ऋतु में तथा वैश्य को शरद ऋतु में अग्नि स्थापन करके शास्त्र वर्णित मन्त्र से अग्निहोत्र प्रारम्भ करना चाहिए। प्राचीनकाल में तो विभिन्न प्रकार के हव्य पदार्थों से अग्निहोत्र होता था; पर अब दुग्ध, घृत आदि सुलभ द्रव्यों द्वारा ही अग्निहोत्र करने का प्रचलन है। ४. अजपा गायत्री — जो जप बिना प्रयत्न के ही स्वाभाविक रूप से चलता रहे, वह अजपा जप कहलाता है- प्रयत्नेन न जप्य अप्रयत्नोच्चारितत्वात् जप कर्मणि ....... (वाच० पृ० ८९)। इसे सोऽहम् तथा हंस साधना भी कहते हैं। सहज

अजपा जप ३४६ परिशिष्ट

श्वास-प्रश्वास के क्रम में जब हम श्वास को अन्दर खींचते हैं, तो वायु प्रवेश के साथ ही एक सूक्ष्म ध्वनि होती है, जिसका उच्चारण 'सो ऽऽऽ' जैसा होता है। कुछ देर श्वास अन्दर ठहरती है, उस समय 'अ ऽऽऽ' जैसी ध्वनि होती है तथा जब श्वास बाहर निकलती है, तो 'हं' जैसी ध्वनि होती है। इन्हीं तीनों ध्वनियों पर ध्यान केन्द्रित करने से 'सोऽहम्' के अजपा जप की स्थिति बन जाती है- श्वासप्रश्वासयोः बहिर्गमनागमनाभ्याम् अक्षर्निष्पादनरूपे जपे स च हंसः सोहमित्याकारस्यैव तदाकारमन्त्रे च (वाच०पृ०८९)। शास्त्रों के अनुसार रात्रि और दिन में कुल मिलाकर हम २१,६०० बार श्वास ग्रहण करते हैं। इस प्रक्रिया में स्वाभाविक रूप से जिस मन्त्र का जप चलता है, उसे हंस मन्त्र या अजपा मन्त्र कहते हैं। प्राणों की रक्षा करने वाली शक्ति का नाम गायत्री है-गयान् प्राणान् त्रायते इति गायत्री। इस साधना से प्राण शक्ति को रक्षा होती है। अतः इसे अजपा गायत्री कहते हैं। ५. अजपा जप - द्र० - अजपा गायत्री। ६. अजपा मन्त्र - द्र० - अजपा गायत्री। ७. अजर - अध्यात्म सम्बन्धी प्रकरणों में प्रायः 'अजर' शब्द का प्रयोग होता है। अजर का शाब्दिक अर्थ है- 'नास्ति जराऽस्याः' अर्थात् जिसकी वृद्धावस्था न हो। देवों को भी 'अजर' कहा जाता है; क्योंकि वे भी कभी वृद्ध नहीं होते। कोश ग्रन्थों में उल्लेख है कि 'नास्ति जरा यस्य, देवे। तेषां षड्भावविकारमध्ये जायतेऽस्ति वर्धते इति तिसृणामेव दशानां सद्भावात् तदुत्तरवर्त्तिनीनां 'विपरिणमते अपक्षीयते नश्यतीति' तिसृणामभावादजरत्वम् (वाच०पृ०९०)' अर्थात् जिसकी वृद्धावस्था न हो, जैसे देवता। उनमें छः भाव विकारों के बीच-जन्म,अस्तित्व तथा विकास इन तीन अवस्थाओं को स्थिति तथा परिवर्तन, क्षरण और नाश, इन तीन अवस्थाओं का अभाव होने से 'अजरता' सिद्ध होती है। आत्मा और परमात्मा के विशेषण रूप में भी 'अजर' शब्द का प्रयोग होता है; क्योंकि ये सभी अवस्थाओं (जन्म, शैशव, कैशोर्य, युवावस्था, जरावस्था और मृत्यु) से परे हैं। घृतकुमारी को भी अजरा कहते हैं; क्योंकि वह औषधि-वनस्पति कभी सूखती नहीं अर्थात् कभी वृद्ध नहीं होती। ८. अज्ञान-आवरण - नैयायिकों के अनुसार ज्ञान का अभाव ही अज्ञान है- अज्ञानञ्च ज्ञानाभाव इति नैयायिकाः। श्रीमद्भागवत में उल्लेख है कि सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्मा ने पाँच प्रकार के अज्ञान का सृजन किया था, ये हैं-तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र-सृष्टिकाले ब्रह्मा प्रथमं पञ्च प्रकारमज्ञानं ससर्ज। यथा तमः, मोहः, महामोहः, तामिस्रं, अन्धतामिस्रं इति श्रीभागवतम् (श०क० खं०१ पृ० २३)। ज्ञान के विरोधी भाव को अज्ञान कहते हैं, ऐसा वेदान्त का मत है। सत् और असत् के वास्तविक रूप को जानने के लिए त्रिगुणात्मक भावरूप ज्ञान आवश्यक है और जो इसमें अवरोध उत्पन्न करे, वही अज्ञान है। कई स्थलों पर 'अज्ञान' के साथ 'आवरण' शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि अज्ञान वस्तुस्थिति पर आवरण के समान होता है, जो मूल स्थिति से अवगत नहीं होने देता, इसी से जीव मोहित होते देखे जाते हैं। गीता (५.१५) में उल्लेख है- 'अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः'। वेदान्त के अनुसार अज्ञान की दो शक्तियाँ मानी गयी हैं- १. आवरण २. विक्षेप। अज्ञान अपनी प्रथम शक्ति-आवरण से रज्जु के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझने देता और अपनी द्वितीय शक्ति-विक्षेप से उसमें 'सर्प' होने को नवीन कल्पना उत्पन्न कर देता है। आवरण शक्ति के विषय में श्री नृसिंह सरस्वती ने लिखा है कि जो सच्चिदानन्द स्वरूप को आवृत कर लेती है, वह आवरण शक्ति है- सच्चिदानन्द - स्वरूपमावृणोत्यावरणशक्तिः (वे० सा० सू०पृ० १३)। ९. अद्वयानन्द - ब्रह्म और जीव तथा आत्मा और जगत् को एक ही मानने वाली विचारधारा को अद्वैतवाद कहते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार ये दोनों पृथक्-पृथक् हैं; पर आचार्य शंकर ने इन्हें एक ही माना है। वेदों और उपनिषदों में भी यही प्रतिपादन है कि ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। सर्वं खल्विदं ब्रह्म' (छान्दो० ३.१४.१); नेह नानास्ति किंचन (बृह०उ० ४.४.१९)। ऋग्वेद में उल्लेख है कि 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति' (ऋ० १.१६४.४६)। द्वित्व का भेद जहाँ नहीं है, उस भाव की अनुभूति का नाम ही अद्वयानन्द है। कोश ग्रन्थों में उल्लेख है--नास्ति द्वयं द्वित्वं भेदः तज्ज्ञानं वा यस्य यत्र वा तादृश आनन्दः (वाच० पृ० ११९)। ब्रह्मरूप आनन्द ही अद्वयानन्द है-ब्रह्मरूपानन्दे अद्वैतानन्दे। अर्थतो ऽप्यद्वयानन्दमतीतद्वैतभानत इति वे० सा० (वाच०पृ० ११९)। हिन्दी विश्वकोश में उल्लेख है कि अद्वय से उत्पन्न आनन्द या ब्रह्मज्ञान से उत्पन्न आनन्द या आत्मबोध से उत्पन्न आनन्द ही अद्वयानन्द है-अद्वयात् लब्धः आनन्दः। ब्रह्मानन्द, ब्रह्मज्ञानोदित आनन्द (हि०वि० को० खं०१पृ० ३४३)। इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान या आत्मबोध से उत्पन्न आनन्द को आत्मानन्द, ब्रह्मानन्द या परमानन्द कहते हैं। सतत स्थिर रहने के कारण इस आनन्द को अखण्डानन्द-सदानन्द भी