१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
२४० ] [ प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् आदि दर्जनों के ज्ञान के संसार की निवृत्ति ( संसार से निवृत्ति ) पराङ्मुखता ( मोक्ष प्राप्ति ) हो जाती है ॥ १ ॥ बाह्य प्राणाग्नि- होत्र की विधि अपनी-अपनी विधि के अनुसार पृथ्वी में बनाई वेदिका में शाकयुक्त अन्न रख कर 'या ओषधय' या फलिनी......जीवला नया- रिशां......'इन तीन तथा' अन्नपते अन्नस्य......यदन्नमग्नि......इन दो से अभिमन्त्रित करे ॥ २ ॥ अब क्रमशः वह उपर्युक्त तीन व दो ऋचायें लिखी जाती हैं—जो सोम देवता प्रधान शतवीर्यं बहुशाखा वाली वृहस्पति प्रसूत ओषधियां हैं वह हमें पापमुक्त करदें ॥ ३ ॥ जो फल- युक्त, फलहीन, पुष्पहीन, अथवा पुष्प ( फूल ) युक्त वृहस्पति प्रसूत ( उत्पन्न ) ओषधियां हैं, वह हमें पापमुक्त करदें ॥ ४ ॥ इन दो मन्त्रों तथा 'जीवला......रक्षांसि चातयान्'—इस तीसरे मन्त्र द्वारा एवं......अन्नपते......द्विपदे चतुष्पदे यदंग्निना......ईशानाय स्वाहा, इन दो मन्त्रों से अभिषेक करना चाहिये । अर्थात् क्रमशः दिये इन पांच मन्त्रों से उस पिण्ड पर जलाभिषेक करना चाहिये ॥ ५ ॥ अन्नेपतेऽन्नस्य नो धेह्यनमीवस्य शुष्मिणः । प्रप्रदातारं तारिष ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे ॥६ यदन्नमग्निर्बहुधा विरुदं रुद्रैः प्रजाधं यदि वा पिशाचैः । सर्वं तदीशानो अभयं कृणोतु शिवमीशानाय स्वाहा ॥७ अन्तश्चरसि भूतेषु गुहायां विश्वतोमुखः । त्वं तज्ञस्त्वं ब्रह्मा त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं वषट्कार आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः सुवर्रों नमः ॥८ आपः पुनन्तु पृथिवीं पूता पुनातु माम् । पुनन्तु ब्रह्मणस्पतिर्ब्रह्मा पूता पुनातु माम् ॥
प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् [ २४१ यदुच्छिष्टमभोज्यं यद्वा दुश्चरितं मम । सर्वं पुनन्तु मामापोऽसतां च प्रतिग्रहं स्वाहा ॥६॥ अमृतमस्त्वमृतोपस्तरणमस्यमृतं प्राणे होम्यमाशिष्यन्त्योऽसि ॐ प्राणाय स्वाहा ॐ अपानाय स्वाहा ॐ व्यानाय स्वाहा ॐ उदानाय स्वाहा ॐ समानाय स्वाहा ॐ ब्रह्मसो स्वाहा ॐ ब्रह्मणि म आत्माऽमृतत्वायति ॥ १० ॥ इन मन्त्रों से अन्न को छूकर अभिमन्त्रित कर दाहिने हाथ में जल लेकर 'अन्न श्वरसि...' 'आपः पुनन्तु' इन दो मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर अन्न का प्रोक्षण करे (जल के छींटे दे) तू प्राणियों के हृदय में सर्वतोमुख रूप होकर (सर्वत्र व्यापक) स्थित है, भ्रमण करता है। तू ही यज्ञ, ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, वषट्कार, जलराशि, ज्योतिः, रस, अमृत, ब्रह्म तथा भू भुवः एवं स्वः है, तुझे नमस्कार है ॥ ८ ॥ हे जल ! तुम पृथिवी को पवित्र करो और पवित्र हुई जो पृथ्बी वह मुझे पवित्र करे। ब्रह्मणस्पति भी पवित्र करे, ब्रह्मपूत पृथ्बी मुझे पवित्र करे। जो उच्छिष्ट, अभक्ष्य या दुश्चरित मेरा हो, उन सबको जल पवित्र कर दें और पापों को रोक दें ॥ ६ ॥ इस प्रकार प्रोक्षण करके दो बार अभिषेक कर बाँये हाथ से वेदिका को छूता हुआ दाहिने हाथ में ग्रहण कर 'अमृतभस्त्वमृतोपस्तरणमसि' यह कह कर उसे पी कर 'अमृत प्राणे होम्यभाशिष्यन्नोसि' यह कहकर मृतोपम होम करने योग्य वस्तु को तूने आस्वादित किया है यह समझ आत्मानुसन्धान पूर्वक प्राण में आहुतियाँ करे-ॐ प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान ये इन आहुतियों को प्राप्त करें। ब्रह्म भी आहुतियाँ प्राप्त करें। ब्रह्म में मेरी आत्मा अमृतत्व का आस्वादन करे ॥ १० ॥ कनिष्ठिकाऽङ्गुष्ठेनप्राणे जुहोति अनामिकयाऽपाने मध्यमिकया व्याने सर्वाभिरुदाने प्रदेशिन्या समाने ॥ ११ ॥ तूष्णीमेकामेकऋचा जुहोति द्वे आहवनीये एकां दक्षिणाग्नौ
२४२ ] [ प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् एकां गार्हपत्ये एकां सर्वप्रायश्चित्तीये ॥ १२॥ अथापिधानमस्य मृतत्वायोपस्पृश्य पुनरादाय पुनः स्पृशेत् ॥ १३ ॥ सव्ये पाणा- वापो गृहीत्वा हृदयमन्वालभ्य जपेत्— प्राणोऽग्निः परमात्मा पञ्चवायुभिरावृतः । अभयं सर्वभूतेभ्यो न मे भीतिः कदाचन ॥१४ विश्वोऽसि वैश्वानरो विश्वरूपं त्वया धार्यते जायमानम् । विश्वं त्वाहुतयः सर्वा यत्र ब्रह्माऽमृतोऽसि ॥१५ कनिष्ठिका अँगुली तथा अंगूठे से प्राण में अनामिका से, अपान में मध्यमा से, व्यान में सभी अँगुलियों से, उदान में तर्जनी से, समान में आहुति डाले ( कल्पना करो ) ॥ ११ ॥ मौन होकर एक आहुति 'प्राणाय स्वाहा' इस एक ऋचा से 'अपानाय स्वाहा' ये दो आहुतियाँ आहवनीय में होम करे। एक दक्षिणाग्नि, एक गार्हपत्य तथा एक सर्व प्रायश्चितीय अग्नि में होम करे ॥ १२ ॥ इस प्रकार पांच आहुतियां करके यथानियम खाकर ( आहुति शेष ) 'अथ पुरस्तात् चोप रिष्टाच्च अद्भिः परिदधाति' इति श्रुति के अनुरोध से— अपिधान स्वरूप को अमृतत्व के लिए छूकर फिर ग्रहण कर पुनः स्पर्श करे ॥ १३ ॥ बाँये हाथ में जल ग्रहण कर हृदयालम्भन कर ( हृदय के पास हाथ रख ) जप करे— मुख्य प्राण ही अग्नि है स्वगत विशेष अंशों की समाप्ति पर वही परमात्मा है विराड् आदि स्थानीय पांच वायुओं के द्वारा आवृत है। मुझे सब प्राणियों से अभय प्रदान करें, मुझे उनसे कभी भय उत्पन्न न हो ॥ १४ ॥ हे मुख्य प्राण ! व्यष्टि ( एक-एक ) समष्टि ( समूह रूप ) के उपाधि भेद से तू ही विश्व ( व्यावहारिक ) वैश्वानर ( विराड् ) होकर विश्व रूप को धारण करता है 'अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । जिस रूप में कि तू ब्रह्मामृत स्वरूप है, तेरे से
प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् ] [ २४३ प्रादुर्भूत होने वाला विश्व तो तुरीयाग्नि में सभी आहुतियां हो जाता है (विलीन हो जाता है) ॥१५॥ महानवोऽयं पुरुषो योऽङ्गुष्ठाग्रे प्रतिष्ठितः । तमद्भिः परिषिञ्चामि सोऽस्यान्ते अमृताय च ॥१६॥ अनादित्येष बाह्यात्मा ध्यायेताग्निहोत्रं जुहोति । सर्वेषा मेव सूनुर्भवतु । अस्य यज्ञपरिवृता आहुतीर्होमयंति ॥१७॥ स्वे शरीरे यज्ञं परिवर्तयामीति । चत्वारोऽग्नयस्ते किं कामरवंयाः ॥१८॥ तत्र सूर्याग्निर्नामि सूर्यमण्डलाकृतिः हसस्र- रश्मिपरिवृत एकऋषिर्भूत्वा मूर्धनि तिष्ठति यस्मादुक्तो दर्शना- ग्निर्नाम चतुराकृतिराहवनीयो भूत्वा मुखे तिष्ठति । शारीरोग्नि- र्नाम जराप्रणुदा हविरवस्कन्दति अधचन्द्राकृतिर्दक्षाग्निर्भूत्वा हृदये तिष्ठति । तत्र कोष्ठाग्निरिति-कोष्ठाग्निर्नामाश्चितपीतलीढ स्वादितं सम्यग्व्यष्टयं विषचित्वा गार्हपतयो भूत्वा नाभ्यां तिष्ठति ॥ १८ ॥ प्रायश्चित्तयस्तवधस्तात्तिर्यक् तिस्रो हिमांशुः प्रभुः प्रजननकर्मा ॥२०॥ “त प्रपदाभ्यां प्रापद्यत ब्रह्मेमं पुरुषम्” इस श्रुति के अनुरोध से जो पैर के दोनों अँगूठों के आगे प्राण रूप से प्रतिष्ठित है वह तू प्रतिक्षण अभिनव ( नया २ ) पुरुष होता है अर्थात् नित्य नवीन रूप में रहता है। इस भोजन के (प्राशन के) अन्त में अमृतत्व की प्राप्ति के लिये उस व्यापक अन्न जल द्वारा सिञ्चित करता हूँ (अर्थात् उच्छ्वास निवास रूप से अभिषिक्त करता हूँ ) तेरा अभिषेक करता हूँ ॥ १६ ॥ ये चेष्टा विशिष्ट है अतः बाह्यात्मा इनका ध्यान करे। यह पुरुष प्रतिदिन प्राण रूपी अग्निहोत्र करता है क्योंकि सभी तुझ परमात्मा (अग्निरूप) का पुत्रवत् पोषण करते हैं अतः तू सब का पुत्र भी होता है, इस प्रकार
२४४ ] [प्राणाग्निहोत्रोपनिषत्] जो तू तेरी यह लोक आहुतियों का होम करता है ॥ १७ ॥ अपने शरीर में यज्ञ की कल्पना की जाती है । इन शरीर निर्वर्त्य अग्नियों की संख्या चार है । उनका स्वरूप अत्यन्त (सूक्ष्म छोटा) है । ये सब अर्धमात्रिक मात्र हैं ॥ १८ ॥ इन चार में से सूर्याग्नि नामक अग्नि जो कि सूर्य मण्डल की आकृति का है, हजारों अत्यन्त तेजस्वी किरणों से युक्त व्यापक रूप होकर सिर में स्थित रहता है जैसे कि प्रसिद्ध है ‘तुरीयं मूर्धिन संस्थितम्’ । क्योंकि यह जीवात्मा सर्वज्ञ ईश्वर रूप में दीखता है, इसी कारण यह एक दर्शनाग्नि कहलाता है जो कि बीज, विराड् आदि चार आकृति वाला आहवनीय होकर (होम का आधार स्थल बनकर) मुख में रहता है । (स्थूल शरीर का दाह करने वाली) शरीर अग्नि (हिरण्यगर्भ) स्थूल शरीराश्रित जरादि (वृद्धावस्था) द्वारा क्षीण किया जाता है स्थूल प्रपंच रूप हवि को ग्रसित करता है जो कि अर्धचन्द्र की आकृति वाला दक्षिणाग्नि होकर सब प्राणियों के हृदय में स्थिर रहता है । ‘अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः प्राणायाम समायुक्त। पंचाभ्यन्नं चतुर्विधम्’ इस रूप में सिद्ध ‘कोष्ठाग्नि’ है जो कि खाई, पी हुई, चाटी तथा आस्वादित वस्तु को भली भाँति पकाकर गार्हपत्य रूप में नाभि स्थल में रहता है ॥ १९ ॥ प्रायः चित्तोपाधि स्वरूप विराड् आदि के नीचे प्रतिष्ठित वक्र, तीन (पराग वृत्तियाँ) जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति इन तीन अवस्था के प्रकाशक हिमांशु अर्थात् चिद्रूप चन्द्र सभी प्रकार प्रभु हैं । [समर्थ] है सब कुछ प्रकाशित कर देने वाला है ॥२०॥ अस्य शारीरयज्ञस्य यूपरशनाऽशोभितस्य को यजमानः का पत्नी के ऋत्विजः के सदस्याः कानि यज्ञपात्राणि कानि हवींषि का वेदिः कान्तर्वेदिः को द्रोणकलशः को रथः कः पशुः कोऽध्वर्युः को होता को ब्रह्मा को उद्गाता कः प्रति-
प्राणाग्निहोत्रोपनिषत् [ २४५ प्रस्थाता कः प्रस्तोता को मैत्रावरुणः क उद्गाता का धारा कः पोता के दर्भाः कः स्रुवः काऽऽज्यस्थाली कावाधारौ कावाज्य- भागौ के प्रयाजाः के अनुयाजाः केडा कः सूक्तवाकः कः शंयोर्वाकः के पत्नीसंयाजाः को यूपः का रशना का इष्टयः का दक्षिणा किमवभृथमिति ॥२१॥ अस्य शारीरयज्ञस्य यूपरशना- ऽशोभितस्यात्मा यजमानः बुद्धिः पत्नी वेदा महर्त्विजः अहंकारोऽध्वर्युः चित्तं होता प्राणो ब्राह्मणाच्छंसी अपानः प्रतिप्रस्थाता व्यानः प्रस्तोता उदान उद्गाता समानो मैत्रा- वरुणः शरीरं वेदिः नासिकाऽन्तर्वेदिः मूर्धा द्रोणकलशः पादो रथः दक्षिणहस्तः स्रुवः सव्य आज्यस्थाली श्रोत्रे आधारौ चक्षुषी आज्यभागौ ग्रीवा धारा पोता तन्मात्राणि सदस्याः महाभूतानि प्रयाजाः गुणा अनुयाजाः जिह्वोडा दन्तोष्ठौ सूक्त- वाकः तालुः शंयोर्वाकः स्मृतिदया क्षान्तिरहिंसा पत्नीसंयाजाः ओंकारो यूपः आशा रशना मनो रथः कामः पशुः केशा दर्भाः इन्द्रियाणि यज्ञपात्राणि कर्मेन्द्रियाणि हवींषि अहिंसा इष्टयः त्यागो दक्षिणा अवभृथं मरणात् सर्वाण्यस्मिन् देवता शरीरे- ऽधिसमाहिताः ॥२२॥ वाराणस्यां मृतो वाऽपि इदं वा ब्राह्मणः पठेत् । एकेन जन्मना जन्तुर्मोक्षं च प्राप्नुयादित्यपनिषत् ॥२३ इस शरीर यज्ञ का, जो कि खम्भे तथा रशनाहीन है, कौन यजमान है ? तथा पत्नी, ऋत्विज, सदस्य कौन है ? यज्ञ-पात्र हवि, वेदि अन्तर्वेरदिका ( छोटी ) द्रोण कलश, रथ, पशु ( बलिपशु ) अध्वर्युं, होता, ब्राह्मणच्छंसी, प्रतिस्थाता, प्रस्तोता, मैत्रावरुण उद्गाता, धारा, पवन करने वाला, दर्भ ( कुश ) स्रुवा, आज्यस्थाली ( घृतपात्र ) आधार, आज्यभाग, प्रयाज, अनुयाज, इडा, सूक्तवाक् शंयोवाक्, पत्नीसंयाज, यूप, ( खम्भा ), रशना इष्ट दक्षिणा एवं यज्ञ के
[Header] २४६ ] CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ प्राणाग्निहोत्रोपनिषत्
[Body] अन्त में किये जाने वाला अवभृथ ( एक स्नान विशेष ) कौन कौन हैं ? अर्थात् जैसे यज्ञ में उपर्युक्त सभी वस्तुयें अपेक्षित हैं वैसे ही इस शरीर यज्ञ के लिये भी ये अवश्य अपेक्षित हैं, फिर ये कहाँ हैं तथा कौन हैं ? ॥ २१ ॥ इस शरीर यज्ञ का आत्मा यजमान है, बुद्धि पत्नी है, वेद ही महा ऋत्विज है, अहङ्कार तत्त्व ही अध्वर्यु है, चित्त ही होता है, प्राण ब्राह्मणच्छंसी है, अपान प्रतिप्रस्थाता है, व्यान प्रस्तोता, उदान उद्गाता, समान, मैत्रावरुण, शरीर वेदि, नाक, अन्त, वेदी, सिर द्रोण कलश, पैर, रथ, दाहिना हाथ स्रुवा, बाँया हाथ घृतपात्र, कान आधार (प्रणिया प्रोक्षणीपात्र) आंख आज्यभाग, गर्दन धारा, तन्मात्राएँ [पाँच] पोता, पञ्चमहाभूत सदस्य, गुण प्रयाज अनुयाज, जीभ इडा, दांत ओष्ट सूक्तवाक, बालु शंयोर्वाक, स्मृति दया शान्ति अहिंसा, पत्नीसंयाज, ॐकार खम्भा, आशा रशना, मन रथ, काम ही पशु, काल ही कुशायें इन्द्रियां यज्ञपात्र, कर्मेन्द्रियां हवि, अहिंसा इष्टकायें, त्याग ही दक्षिण मृत्यु ही अवभृथ स्नान है । अर्थात् उपर्युक्त वस्तुओं में तत्तद् वस्तु की स्थिति समझ उन्हीं के अनुसार क्रियायें भी समझनी चाहिये । तभी यह यज्ञ पूरा फलदायक होता है [ मोक्ष की प्राप्ति का साधन होता है ] तथा सभी देवता इस शरीर में समाहित होते हैं ॥ २२ ॥ यदि किसी का शरीर काशी में छूटे अथवा यदि कोई ब्राह्मण इसे पढ़े तो एक ही जन्म से चित्त शुद्धि करने वाले ज्ञान तथा मोक्ष को प्राप्त करले ॥२३॥
॥ प्राणाग्निहोत्रोपनिषद् समाप्त ॥
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योगकुण्डल्युपनिषत्
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ब्रह्म हम दोनों की रक्षा करे, वह हम दोनों का पालन करे, हम दोनों एक साथ सामर्थ्य को प्राप्त हों, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो हम परस्पर द्वेष न करे । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । प्रथमोऽध्यायः हेतुद्वयं हि चित्तस्य वासना च समीरणः । तयोर्विनष्ट एकस्मिंस्तद्द्वावपि विनश्यतः ॥१॥ तयोरादौ समीरस्य जयं कुर्यान्नरः सदा । मिताहारश्चसनं च शक्तिचालस्तृतीयकः ॥२॥ एतेषां लक्षणं वक्ष्ये शृणु गौतम सादरम् । सुस्निग्धमधुराहारश्चतुर्थां शावशेषकः ॥३॥ भुज्यते शिवसंप्रीत्यै मिताहारः स उच्यते । आसनं द्विविधं प्रोक्तं पद्मं वज्रासनं तथा ॥४॥ ऊर्वोरुपरि चेद्धत्ते उभे पादतले यथा । पद्मासनं भवेदेतत्सर्वपापप्रणशनम् ॥५॥ हरि ॐ। चित्त की अस्थिरता के दो कारण होते हैं, एक वासना, दूसरा श्वास ( प्राण ) इनमें से एक के नष्ट हो जाने पर Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२४८ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत्
दूसरा भी नष्ट हो जाता है ॥ १ ॥ इसलिये साधक को पहले प्राण को जय करना चाहिये और इसके लिये मिताहार, आसन और शक्ति- चालन को करना चाहिये ॥ २ ॥ हे गौतम ! अब मैं तुझको इनके लक्षण बताता हूँ, उन्हें तू ध्यानपूर्वक सुन । सर्वं प्रथम स्निग्ध और मधुर आधार करना चाहिये तथा पेट के एक चौथाई भाग को खाली छोड़ देना चाहिये ॥ ३ ॥ इस प्रकार का भोजन भगवान के उद्देश्य से किया जाय, यही मिताहार है । आसनों में दो प्रकार के मुख्य हैं— पद्मासन और वज्रासन ॥ ४ ॥ दोनों जांघों पर एक दूसरे पैर के तलवों को सीधा रखने से पद्मासन होता है, जो सब पापों का नाश करने वाला है ॥ ५ ॥
वामाङ्घ्रिमूलं कन्धाधः अन्यं तदुपरि क्षिपेत् । समग्रीवशिरःकायो वज्रासमनमितीम् ॥६ कुण्डल्येव भवेच्छक्तिस्तां तु संचालयेद्बुधः । स्वस्थानादाभ्रुवोर्मध्यं शक्तिचालनमुच्यते ॥७ तत्साधने द्वयं मुख्यं सरस्वत्यास्तु चालनम् । प्राणरोधमधाभ्यासाहृज्वी कुण्डलिनी भवेत् ॥८ तयोरादौ सरस्वत्याश्चालनं कथयामि ते । अरुन्धत्येव कथिता पुराविद्भिः सरस्वती ॥६ यस्याः संचालने नैव स्वयं चलति कुण्डली । इडायां वहति प्राणे बद्ध्वा पद्मासनं दृढम् ॥१०
बांये पैर की एड़ी को योनि स्थान में रखे और दाहिने की एड़ी उसके ऊपर रखे, गर्दन तथा शिर को समान और सीधा रखे तो यह वज्रासन होता है ॥ ६ ॥ कुण्डली ही मुख्य शक्ति है, ज्ञानी साधक उसको चालन करके दोनों भौंहों के मध्य में ले जाता है तो वही
प्रथम अध्याय [ २४६ ]
प्रथम अध्याय [ २४६ ] शक्तिचालन है ॥ ७ ॥ कुण्डलिनी को चलाने के दो मुख्य साधन हैं, सरस्वती का चालन और प्राण निरोध, अभ्यास द्वारा लिपटी हुई कुण्डलिनी सीधी हो जाती है ॥ ८ ॥ पहले तुझको सरस्वती के चालन के विषय में समझाता हूं, प्राचीनता वाले सरस्वती को अरुन्धती कहते हैं। इस सरस्वती नाड़ी का चालन करने से कुण्डलिनी अपने आप चलने लगती है। इसके लिए जब श्वांस इड़ा [ बाँयी ] नाड़ी से बहती हो तो पद्मासन लगाकर बैठे ॥९-१०॥ द्वादशांगुलदैर्ध्यं च अम्बरं चतुरङ्गुलम् । बिस्तीर्य तेन तन्नाडीं वेष्टयित्वा ततः सुधीः ॥११ अंगुष्ठतर्जनीभ्यां तु हस्ताभ्यां धारयेहढ़म् । स्वशक्त्या चालयेद्वामे दक्षिणेन पुनः पुनः ॥१२ मुहूर्तद्वयपर्यन्तं निर्भयाच्चालयेत्सुधीः । ऊर्ध्वमाकर्षयेत्किञ्चित्सुषुम्नां कुण्डलीगता ॥१३ तेन कुण्डलिनी तस्याः सुषुम्नाया मुखं व्रजेत् । जहाति तस्मात्प्राणोऽयं सुषुम्नां व्रजति स्वतः ॥१४ तुन्दे तु ताणं कुर्याच्च कण्ठसंकोचने कृते । सरस्वत्याश्चालनेन वक्षः स्यादूर्ध्वंगो मरुत् ॥१५ तब बारह अंगुल लम्बे ओर चार अंगुल चौड़े आकाश के टुकड़े से ( कल्पित करके ) कुण्डलिनी को लपेटे ॥ ११ ॥ तब बांयी और दाहिनीं नासिका को अँगूठे और तर्जनी से दृढ़तापूर्वक पकड़े और पहले दाहिनीं से और फिर बांयी नासिका से बार बार रेचक और पूरक करे । साथ ही उसको मानसिक भावना द्वारा दांयी और बांयी ओर बार-बार चालन करता रहे ॥ १२ ॥ इस प्रकार दो मुहूर्त तक सरस्वती का चालन करता रहे । इसके पश्चात् सुषुम्ना नाड़ी को
२५० ] योगकुण्डल्युपनिषत् जो कुण्डलिनी के समीप ही रहती है किंचित ऊपर की तरफ खींचे ॥ १३ ॥ इस विधि से अभ्यास करने पर कुण्डलिनी सुषुम्ना के मुख में चढ़ने लगती है और प्राण भी स्वयं ही उस स्थान को छोड़कर सुषुम्ना में चलने लगता है ॥ १४ ॥ पेट को ऊपर की तरफ खींच कर तथा कण्ठ को संकोचन कर सरस्वती को चलाने से वायु वक्षस्थल से ऊपर चला जाता है ॥ १५ ॥ सूर्येण रेचयेद्वायुं सरस्वत्यास्तु चालने । कण्ठसंकोचनं कृत्वा वक्षः स्यादूर्ध्वगो मरुत् ॥१६ तस्मात्संचालयेन्नित्यं शब्दगर्भां सरस्वतीम् । यस्याः संचालनैनैव योगी रोगैः प्रमुच्यते ॥१७ गुल्मं जलोदरप्लीहो ये चान्ये तुन्दमध्यगाः । सर्वे ते शक्तिचालेन रोगा नश्यन्ति निश्चयम् ॥१८ प्राणरोधमथेदानीं प्रवक्ष्यामि समासतः । प्राणश्च देहगो वायुरायामः कुम्भकः स्मृतः ॥१९ स एव द्विविधः प्रोक्तः सहितः केवलस्तथा । यावत्केवलसिद्धिः स्यात्तावत्सहितमभ्यसेत् ॥२० जब सरस्वती का चालन किया जाय तो सूर्य नाड़ी ( दाहिनी ) से वायु का रेचक करे, कण्ठ से संकोचन कर ले तो वायु वक्षस्थल से ऊपर चला जाता है ॥ १६ ॥ इस प्रकार शब्दगर्भा सरस्वती का लगातार चालन करते रहना चाहिये । इसके चालन से योगी सब प्रकार के रोगों से छूट जाता है ॥ १७ ॥ गुल्म, जलोदर, प्लीहा तथा पेट सम्बन्धी अन्य रोग शक्तिचालन से निश्चयपूर्वक नष्ट हो जाते हैं ॥१८॥ आगे प्राण निरोध ( प्राणायाम ) को बतलाते हैं । देह में चलने वाले वायु को प्राण कहते हैं और जब वह स्थिर हो जाता है तब वह कुम्भक कहा जाता है ॥ १९ ॥ यह कुम्भक दो प्रकार का
प्रथम अध्याय ] [ Public Domain. Digitization by eGangotri ] २५१ बतलाया गया है--सहित और केवल । जब तक केवल कुम्भक सिद्ध न हो तब तक सहित-कुम्भक का अभ्यास करना चाहिये ॥ २० ॥ सूर्योज्जायी शीतली च भस्त्री चैव चतुर्थिका । भेदैरेव समं कुम्भो यः स्यात्सहितकुम्भकः ॥२१ पवित्रे निर्जने देशे शर्करादिविवर्जिते । धनुःप्रमाणपर्यन्ते शीताग्निजलवर्जिते ॥२२ पवित्रे नात्युच्चनीचे ह्यासने सुखदे सुखे । बद्धपद्मासन कृत्वा सरस्वत्यास्तु चालनम् ॥२३ दक्षनाड्या समाकृष्य बहिष्ठं पवनं शनैः । यथेष्टं पूरयेद्वायुं रेचयेदिडया ततः ॥२४ कपालशोधने वाऽपि रेचयेत्पवनं शनैः । चतुष्कं वातदोषं तु कृमिदोषं निहन्ति च ॥२५ सूर्यभेदी, शीतली और भस्त्रिका इन चार प्रकार के प्राणायामों के साथ सहित कुम्भक किया जाता है ॥ २१ ॥ एकान्त और पवित्र स्थान में जहां कंकड़-पत्थर आदि न हों और पास में ही घास, अग्नि, जल आदि न हों, वहां न अधिक ऊँचा न अधिक नीचा ऐसे पवित्र सुखदायक आसन पर बद्ध-पद्मासन लगाकर बैठे और सरस्वती का चालन करे ॥ २२--२३ ॥ दाहिनी नासिका से बाहर की वायु को धीरे-धीरे खींचे और पर्याप्त परिमाण में वायु के भीतर जाने पर बांयी नासिका से रेचन करे ॥ २४ ॥ कपाल शोधन की क्रिया में भी वायु को धीरे-धीरे बाहर निकाले । इससे चारों प्रकार के वातदोष और कृमिदोष नष्ट हो जाते हैं ॥२५॥ पुनः पुनरिदं कार्यं सूर्यभेदमुदाहृतम् । मुखं संयम्य नाडीभ्यामाकृष्य पवनं शनैः ॥२६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२५२ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् यथा लगति कण्ठात्तु हृदयावधि सस्वनम् । पूर्ववत्कुम्भयेत्प्राणं रेचयेदिडया ततः ॥२७ शीर्षोदिता नलहरं गलश्लेष्महरं परम् । सर्वरोगहरं पुण्यं देहानलविवर्धनम् ॥२८ नाडीजलोदरं धातुगतदोषविनाशनम् । गच्छतस्तिष्ठतः कार्यमुज्जय्याख्यं तु कुम्भकम् ॥२६ जिह्वया वायुमाकृष्य पूर्ववत्कुम्भकादनु । शनैस्तु घ्राणरन्ध्राभ्यां रेचयेदनिलं सुधीः ॥३० गुल्मप्लीहादिका दोषाः क्षयं पित्तं ज्वरं तृषाम् । विषाणि शीतली नाम कुम्भकोऽयं निहन्ति च ॥३१ इस क्रिया को सूर्य भेदन कहते हैं, इसका अभ्यास बार-बार करते रहना चाहिये । अब उज्जायी को बतलाते हैं कि मुख बन्द करके दोनों नासिकाओं से वायु को धीरे से खींचे जिससे वह शब्द करती हुई कण्ठ से लेकर हृदय तक भर जाय । तब पूर्ववत् कुम्भक करके बाँयी नासिका से रेचक करे, इससे मस्तक की उष्णता, गले का कफ और अन्य अनेक रोग दूर हो जाते हैं और देह की अग्नि की वृद्धि होती है । इससे नाड़ी सम्बन्धी जलोदर और धातु सम्बन्धी रोग भी दूर हो जाते हैं । इस उज्जायी कुम्भक को चलते-फिरते, स्थिर रहते सदैव करते रहना चाहिये ॥ ३६--२६ ॥ शीतली नामक प्राणायाम करते समय वायु को जिह्वा द्वारा खींचकर पूर्ववत् कुम्भक किया जाता है फिर नासिका के छिद्रों से वायु को शनैः निकाल दिया जाता है । इससे गुल्म, प्लीहा, पित्त ज्वर, तृषा आदि दूर होते हैं ॥ ३०--३१ ॥ ततः पद्मासनं बद्ध्वा समग्रीवोदरः सुधीः । मुखं संयम्य यत्नेन प्राणं घ्राणेन रेचयेत् ॥३२.
प्रथम अध्याय ] [ २५३
प्रथम अध्याय ] [ २५३ यथा लगति कण्ठात्तु कपाले सस्वनं ततः । वेगेन पूरयेत् किञ्चिद्धृत्पद्मावधि मारुतम् ॥ ३३ पुनर्विरचेयत्तद्वत्पूरयेच्च पुनः पुनः । यथैव लोहकाराणां भस्त्रावेगेन चाल्यते ॥३४ तथैव स्वशरीरस्थं चालयेत्पवनं शनैः । यथा श्रमो भवेद्देहे तथा सूर्येण रेचयेत् ॥३५ यथोदरं भवेत्पूर्णंपवनेन तथा लघु । धारयन्नासिकामध्यं तर्जनीभ्यां बिना दृढम् ॥३६ कुम्भक पूर्ववत्कृत्वा रेचयेदिडयाऽनिलम् । कण्ठोत्थितानलहरं शरीराग्निविवर्धनम् ॥३७ कुण्डलीबोधकं पुण्यं पापघ्नं शुभदं सुखम् । ब्रह्मनाडीमुखान्तस्थक फाद्यर्गलनाशनम् ॥३८ गुणत्रयसमुद्भू तग्रन्थित्रयविभेदकम् । विशेषेणैव कर्तव्यं भस्त्राख्यंकुम्भक त्विदम् ॥३६ अब भस्त्रिका प्राणायाम को बतलाते हैं कि पद्मासन लगाकर गर्दन और देह को सीधा रखते हुए, मुख को बन्द करके वायु को सावधानी पूर्वक नासिका से रेचन करे । फिर वायु को वेगपूर्वक शब्द करते हुए ऐसे खींचे कि कण्ठ, तालु, कपाल तथा हृदय को उसका स्पर्श जान पड़े । फिर उसे बाहर निकालकर पुनः पूरक करे, इस प्रकार वायु को बार-बार वेग पूर्वक इस प्रकार खींचे और भरे जैसे लुहार की भाथी चलती है । इसी विधि से शरीर स्थित वायु को सँभालकर चलावे । जब श्रम जान पड़े तब सूर्य नाड़ी से पूरक करे और तर्जनी के अतिरिक्त चारों ओर अँगुलियों से नासिका को मध्य से दृढ़तापूर्वक पकड़ कर कुम्भक करे तथा फिर बांयी नाक से रेचक करदे यह अभ्यास कण्ठ की जलन को मिटाता है और शरीर की अग्नि को बढ़ाता है, कुण्डली को जगाता है, पुण्यकारी, पाप नाशक
२५४ ] [ योगकुण्डल्युपनिषत् शुभ और सुखदायक है। ब्रह्मनाड़ी (सुषुम्ना) के मुख पर जो कफ आदि रहता है उसको नष्ट करने वाला है। यह सत् आदि तीनों गुणों से उत्पन्न तीनों ग्रन्थियों का भेदन करने वाला है। इसीलिये इस भस्त्रिका नामक प्राणायाम का विशेष रूप से अभ्यास करना चाहिये ॥३२-३६॥ चतुर्णामपि भेदानां कुम्भके समुपस्थिते । बन्धत्रयमिदं कार्यं योगिभिर्वीतकल्मषैः ॥४० प्रथमो मूलबन्धस्तु द्वितीयोड्डीयणाभिधः । जालन्धरस्तृतीयस्तु तेषां लक्षणमुच्यते ॥४१ अधोगत्तिमपानं वै ऊर्ध्वगं कुरुते बलात् । आकुञ्चनेन तं प्राहुर्मूलबन्धोऽयमुच्यते ॥४२ अपाने चोर्ध्वगे याते संप्राप्ते वह्निमण्डले । ततोऽनलशिखा दीर्घा वर्धते वायुना हृता ॥४३ ततो यातौ वह्न्यपानौ प्राणमुष्णस्वरूपकम् । तेनात्यन्तप्रदीप्तेन ज्वलनो देहजस्तथा ॥४४ तेन कुण्डलिनी सुप्ता संतप्ता संप्रबुध्यते । दण्डाहतभुजङ्गीव निश्वस्य ऋजुतां व्रजेत् ॥४५ इस प्रकार इन चारों प्रकार के प्राणायामों को रोकने के साथ- साथ योगी को तीन 'बन्ध' भी करने चाहिए । इनमें से पहला मूलबन्ध, दूसरा उड्डियाण और तीसरा जालन्धरबन्ध कहा जाता है ॥४०-४१॥ अधोगति वाले अपान को शक्तिपूर्वकं गुदा के आकुंचन द्वारा ऊपर ले जाने से मूलबन्ध होता है। अपान ऊपर जाकर वह्निमंडल से मिलता है तो उसके प्रभाव से अग्नि की तीव्रता बहुत अधिक हो जाती है। उस ज्वाला से संतप्त होकर सोई हुई कुण्डलिनी जागृत होती है और
प्रथम अध्याय ] [ २५५
प्रथम अध्याय ] [ २५५ दण्डे से मारी जाने वाली सर्पिणी के समान फुत्कार कर सीधी हो जाती है ॥४२-४५॥ बिलप्रवेशतो यत्र ब्रह्मनाड्यन्तरं व्रजेत् । तस्मान्नित्यं मूलबन्धः कर्तव्यो योगिभिः सदा ॥४६॥ कुम्भकान्ते रेचकादौ कर्तव्यस्तूड्डियाणकः । बन्धो येन सुषुम्नायां प्राणस्तूड्डीयते यतः ॥४७॥ तस्मादुड्डियणाख्योऽयं योगिभिः समुदाहृतः । सति वज्रासने पादौ कराभ्यां धारयेद्दृढम् ॥४८॥ गुल्फदेशसमीपे च कन्दं तत्र प्रपीडयेत् । पश्चिमं ताणमुदरे धारयेद्ध दये गले ॥४९॥ शनैः शनैर्यदा प्राणस्तुन्दसंधिं निगच्छति । तुन्ददोषं विनिर्धूय कर्तव्यं सततं शनैः ॥५०॥ तब वह बिल में प्रवेश करने के समान सुषुम्ना के भीतर जाती- है। इस कारण योगियों को मूलबन्ध का अभ्यास सदैव करना चाहिये- ॥ ४६ ॥ कुम्भक के पश्चात् रेचक करने के पूर्व उड्डियानबन्ध करना चाहिए, जिससे प्राण वायु सुषुम्ना के भीतर उड़ती है । इसलिए योगीजन इसको उड्डियाण कहते हैं। इसके लिये वज्रासन लगाकर पैरों- को हाथों से दृढ़तापूर्वक पकड़े। जहाँ गुल्फ (टखना) रखा जाता है वहाँ कन्द स्थानों को दबाये, पेट को ऊपर की तरफ खींचे और हृदय- तथा गले को भी तनाव देकर खींचे। इस विधि से प्राण क्रमशः पेट की संधियों में प्रवेश करता है और पेट के सब दोषों को दूर करता है। इस- कारण यह अभ्यास सदैव करते रहना चाहिये ॥४७-५०॥ पूरकान्ते तु कर्तव्यो बन्धो जालन्धराभिधः । कण्ठसंकोचरूपोऽसौ वायुमार्गनिरोधकः ॥५१॥ अधस्तात्कुञ्चनेनाशु कण्ठसंकोचने कृते । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२५६ [CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri] योगकुण्डल्युपनिषत् मध्ये पश्चिमताणेन स्यात्प्राणो ब्रह्मनाडिगः ॥५२॥ पूर्वोक्तेन क्रमेणैव सम्यगासनमास्थितः । चालनं तु सरस्वत्याः कृत्वा प्राणं निरोधयेत् ॥५३॥ प्रथमे दिवसे कार्यं कुम्भकानां चतुष्टयम् । प्रत्येकं दशसंख्याकं द्वितीये पञ्चभिस्तथा ॥५४॥ विंशत्यलं तृतीयेऽह्नि पञ्चवृद्ध्या दिने दिने । कर्तव्यः कुम्भको नित्यं बन्धत्रयसमन्वितः ॥५५॥ जालन्धरबंध में कंठ का संकोचन वायु को रोकने के निमित्त किया जाता है, वह बंध पूरक के अन्त में करना होता है ॥ ५१ ॥ अधोभाग में मूलबंध द्वारा गुदा का आकुंचन करे और ऊपर से जालंधर बन्ध द्वारा कण्ठ का संकोचन करे और मध्य में पश्चिमतान(उड्डीयान) से प्राण को खींचे। इस प्रकार सब तरफ से रोका जाकर प्राण ब्रह्मनाड़ी (सुषुम्ना) में चढ़ता है ॥ ५२ ॥ जैसे पहले बतलाया गया है सम्यक प्रकार से आसन पर बैठकर सरस्वती का चालन करके प्राण का निरोध करना चाहिये ॥ ५३ ॥ प्रथम दिन चारों कुम्भकों को दस-दस बार करना चाहिए और दूसरे दिन पन्द्रह-पन्द्रह बार करना चाहिये। तीसरे दिन बीस-बीस करना चाहिये, इसी प्रकार प्रतिदिन पाँच-पाँच बढ़ाता जाय। इन कुम्भकों का अभ्यास प्रतिदिन तीन बन्ध सहित करना चाहिये ॥५४-५५॥ दिवा सुप्तिर्निशायां तु जागरादतिमैथुनात् । बहुसंक्रमणं नित्यं रोधान्मूत्रपुरीषयोः ॥५६॥ विषमासनदौषाश्च प्रयासप्राणचिन्तनात् । शीघ्रमूत्पद्यते रोगः स्तम्भयेद्यदि संयमी ॥५७॥ योगाभ्यासेन मे रोग उत्पन्न इति कथ्यते । ततोऽभ्यासं त्यजेदेवं प्रथमं विघ्नमुच्यते ॥५८॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
प्रथम अध्याय ] [ २५७
प्रथम अध्याय ] [ २५७ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri द्वितीयं संशयाख्यं च तृतीयं च प्रमत्तता । आलस्याख्यं चतुर्थं च निद्रारूपं तु पञ्चमम् ॥५९ षष्ठं तु विरतिर्भ्रान्तिः सप्तमं परिकीर्तितम् । विषयं चाष्टमं चैव अनाख्यं नवमं स्मृतम् ॥६० अलब्धिर्योंगतत्त्वस्य दशमं प्रोच्यते बुधैः । इत्येतद्विघ्नदशकं विचारेण त्यजेद्बुधः ॥६१ दिन का सोना, रात का जगना, अति मैथुन, ज्यादा चलना, मलमूत्र का सदैव रोकना, आसन की विषमता, हठपूर्वक प्राण का अभ्यास आदि दोषों से शीघ्र ही रोगों का आक्रमण होता है ॥ ५६ ॥ यदि कोई कहे कि मुझे योगाभ्यास ही से रोग हुआ, तो उसे समझ लेना चाहिए कि योगाभ्यास का त्याग ही सबसे पहला विघ्न है, दूसरा विघ्न संशय करते रहना, तीसरा प्रमत्तता, चौथा आलस्य, पाँचवां अधिक निद्रा, छठा प्रेम न रहना, सातवां भ्रान्ति, आठवां विषमता, नवां अनाख्य और दसवां योगतत्व की अप्राप्ति है। बुद्धिमान साधक इन सबको विचार कर इनका त्याग कर दे ॥ ५७-६१ ॥ प्राणाभ्यासस्ततः कार्यों नित्यं सत्त्वास्थया धिया । सुषुम्ना लीयते चित्तं न च वायुः प्रधावति ॥६२ शुष्के मले तु योगी च स्याद्नतिश्चालिता ततः । अधोगतिमपानं वै ऊर्ध्वंगं कुरुते बलात् ॥६३ आकुञ्चनेन तं प्राहूर्मू'लबन्धोऽयमुच्यते । अपानश्चोर्ध्वगो भूत्वा वह्निना सह गच्छति ॥६४ प्राणस्थानं ततो वह्निः प्राणापानौ च सत्वरम् । मिलित्वा कुण्डलीं यति प्रसुप्ता कुण्डलाकृतिः ॥६५ तेनाग्निना च संतप्ता पवनेनैव चालिता । प्रसार्य स्वशरीर तु सुषुम्नाबदनान्तरे ॥६६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
२५८ [ योगकुण्डल्युपनिषत् इस प्रकार प्राणायाम का अभ्यास नियमित रूप से सत्वमयी बुद्धि से करना चाहिए। इसके फलस्वरूप चित्त सुषुम्ना में संलग्न रहता है और उसमें प्राणवायु दौड़ता है ॥ ६२ ॥ जब मलशोधन हो जाय और प्राण चलने लगे तब प्रयत्नपूर्वक अपान की ऊर्ध्वगति करनी चाहिए ॥ ६३ ॥ इसके लिए जो गुदा का आकुंचन किया जाता है, उसे मूलबन्ध कहते हैं। यह अपान ऊपर आकर अग्नि के साथ संयुक्त होता है और ऊपर चढ़ता है ॥ ६४ ॥ जब यह अग्नि प्राण स्थान में पहुँच प्राणवायु से मिलता है और वे सोती हुई कुण्डलिनी को प्राप्त होते हैं तो उसकी उष्णता से तप्त होकर तथा वायु से चलित होकर कुण्डलिनी सीधी हो जाती है और सुषुम्ना के मुख में प्रवेश करती है ॥ ६५-६६ ॥ ब्रह्मग्रन्थिं ततो भित्त्वा रजोगुणसमुद्भवम् । सुषुम्ना वदने शीघ्रं विद्युल्लेखेव संस्फुरेत् ॥६७ विष्णुग्रन्थिं प्रयात्युच्चैः सत्वरं हृदि संस्थिता । ऊर्ध्वं गच्छति यच्चास्ते रुद्रग्रन्थिं तदुद्भवम् ॥६८ भ्रुवोर्मध्यं तु संभिद्य याति शीतांशुमण्डलम् । अनाहताख्यं यच्चक्रं दलैः षोडशभिर्युतम् ॥६९ तत्र शीतांशुसंजातं द्रवं शोषयति स्वयम् । चलिते प्राणवेगेन रक्तं पित्तं रविर्गृहात् ॥७० रजोगुण से उत्पन्न ब्रह्मग्रन्थि को भेदकर यह कुण्डलिनी शक्ति सुषुम्ना के भीतर बिजली की रेखा की तरह चढ़ती है ॥ ६७ ॥ शीघ्र ही यह हृदय स्थिति विष्णु-ग्रन्थि को प्राप्त होती हुई और भी ऊपर ( आज्ञा चक्र ) जाती है और वहाँ रुद्र-ग्रन्थि को प्राप्त होती है ॥ ६८ ॥ वहाँ से यह भौंहों के मध्य स्थान को भेदती हुई चन्द्रमा के स्थान में पहुँचती है, जहाँ सोलह पंखुरियों वाला अनाहत चक्र स्थित है ॥ ६९ ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
प्रथम अभ्यास ] [ २५६ यहाँ यह चन्द्रमा से उत्पन्न द्रव को सोख लेती है तथा प्राणवायु के वेग से रक्त और पित्त को सूर्य ग्रहण कर लेता है ॥ ७० ॥ यातेन्दुचक्रं यत्रास्ते शुद्धश्लेष्मद्रवात्मकम् । तन्न सिक्तं ग्रसत्युष्णं कथं शीतस्वभावकम् ॥७१ तथैव रभसा शुक्लं चन्द्ररूपं हि तप्यते । ऊर्ध्वं प्रहवति क्षुब्धा तदैव स्रवतेतराम् ॥७२ तस्यास्वादवशाच्चित्तं बहिष्टं विषमेषु यत् । तदेव परमं भुक्त्वा स्वस्थस्यात्मरतो युवा ॥७३ प्रकृत्यष्टकरूपं च स्थानं गच्छति कुण्डली । क्रोडीकृत्य शिवं याति क्रोडीकृत्य विलीयते ॥७४ इत्यधोध्वंरजः शुक्ले शिवे तदनु मारुतः । प्राणापानौ समौ याति सह जातौ तथैव च ॥७५ यह चन्द्र मंडल में जाकर वहाँ के द्रव पदार्थ को शोषण कर लेती है और उसे उष्ण कर देती है । तब वहाँ शीतलता कैसे रह सकती है ? ॥ ७१ ॥ यह चन्द्रमा के शुक्ल रूप को तप्त कर देती है और क्षुब्ध होती हुई ऊपर चढ़ती है ॥ ७२ ॥ इसके प्रभाव से जो चित्त पहले बाहरी पदार्थों में संलग्न रहता था, वह परमार्थ में लग कर आत्मानन्द का उपभोग करने लगता है ॥ ७३ ॥ इस प्रकार कुण्डलिनी अष्टधा प्रकृति को प्राप्त होकर शिव के साथ मिलती है और उसी के साथ लय को प्राप्त हो जाती है ॥ ७४ ॥ इससे अधोभाग का रज और ऊपर का शुक्ल मिलकर शिव में लीन हो जाते हैं, तथा प्राण और अपान भी उन्हीं में लीन हो जाते हैं, क्योंकि वे समान रूप से उत्पन्न होते हैं ॥ ७५ ॥ भूतेऽल्पे च मनोल्पे वा वाचके त्वतिवर्धते । धावयत्यखिला वाता अग्निमूषाहिरण्यवत् ॥७६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi