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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

एकरस हो गए। जितना भारतीय उतना एक विलक्षण चेतना की हवा से तांडव करने लगा। व्यक्तिगत स्वार्थ, सुख, जीवन की तुच्छ आशा प्रायः नष्ट हो गई और एक उदात्त ध्येय में सारा हिंदुस्थान अपूर्व एकता में बंध गया। देश-सेवा के लिए इस भयानक स्थिति से पत्थर भी पिघलने लगा। कैसा भयंकर विस्फोट! और कितने अकस्मात् तड़ित वेग से ! एक क्षण में यह शांत दिखनेवाला ज्वालामुखी दिग्गजों के कान के परदे फट जाए, ऐसे कड़कड़ाहट से तड़क-फूटकर दुर्भंग, शतभंग, सहस्रभंग हो गया। शत्रु जहां पैर रखे वहां उसका भस्म। एक अंग्रेज इतिहासकार लिखता है-“जिनकी जान पर हमारी सुरक्षा टिकी हुई थी वे सरकारी नौकर ही एक ही समय पर नागों की तरह टूटने लगे। विश्वासघात किए हुए सरकारी नौकरों की सूची तैयार करूं तो विद्रोह कर रहे विस्तृत प्रदेश के सभी सरकारी नौकरों के नाम-पते मुझे देने पड़ेंगे। अपवाद हैं ही नहीं।” उन सरकारी नौकरों में अत्यंत प्रमुख काजी उदल, कुजल, उत्तर पश्चिम प्रदेश का मुख्य अधिकारी, आगरा का प्रिंसिपल सदर अमीन, कानपुर का प्रिंसिपल सदर अमीनए कानपुर का डिप्टी कलेक्टर, फतेहपुर का डिप्टी कलेक्टर, जिसने रॉबर्ट टक्कर को मारा, फतेहपुर के अन्य सारे अधिकारी, इलाहाबाद का मुंसिफ, उसी प्रदेश का और एक मुंसिफ, बरेली का प्रिंसिपल सदर अमीन, आजमगढ़ का डिप्टी कलेक्टर, वहां J का प्रिंसिपल सदर अमीन, G का प्रिंसिपल सदर अमीन और यह सूची बहुत ही अधूरी-केवल नमूने के लिए दी है- ऐसा प्रलय विस्फोट कड़कड़ाया, पुलिस विद्रोह कर उठी, सिपाही बंद कर उठे। गांववाले विद्रोह कर उठे। अंग्रेजों से ईमानदारी का अर्थ धर्मद्रोह और देशद्रोह है, ऐसी एक मिनट में धर्म की व्याख्या हो गई। जो कोई भी अंग्रेजों के यहां रहेगा उसका तत्काल जाति बहिष्कार होने लगा। उसकी पंगत में कोई बैठेगा नहीं-उससे विवाह कोई करेगा नहीं। उसके यहां पूजा के लिए ब्राह्मण नहीं आएगा। सबसे बड़ी और सबसे अपमानजनक गाली हो गई-‘फिरंगियों का नौकर’। एक अंग्रेजी लेखक कहता-‘सरकारी कर्मचारियों में हम यदि बिद्रोहियों की सूची तैयार करने लग जाएं तो संभवतः विद्रोही प्रदेशों के सभी कर्मचारियों के नाम इसमें सम्मिलित करने पड़ेंगे। उनमें अपवाद रूप ही किसी का नाम इस सूची में पृथक् रह पाएगा।” ऐसी परिस्थिति होने से, ऊपर से बिलकुल शांत दिखनेवाला ज्वालामुखी इतना प्रज्वलित हो गया था कि किसी भी क्षण उसका विस्फोट हो सकता था। क्रांतिदूत आकाश मार्ग से जाकर जल्द ही प्रारंभ होनेवाले उस समारोह में उपस्थित रहने का 1857 का स्वातंत्र्य समर – 231

निमंत्रण हर एक को दे रहे थे। उस आक्रमण को स्वीकार क रवह पवित्र ध्येय साध्य करने दस दिशाओं का युद्ध देवता तुरंत निकला। रणवाद्य, युद्धघोष, समर गर्जना आदि आवश्यक सारे साधन यथोचित स्थान पर सजाकर मंडप तैयार कर लिया गया है। ज्वालामुखी के पार्श्व में अत्याचारों का कहर निर्भयता से उबल रहा है। परंतु क्रांति का क्षण जैसे-जैसे पास आ रहा है, ऊपर हरित दिखनेवाले पर्वतों के अंतर में अत्याचार का कहर आ गिरा और उसी के साथ ज्वालामुखी का विस्फोट हो गया। हां, अब होशियार! क्रांति का विस्तार हो गया है। क्रांति की ज्वालाएं बाहर फैलने लगी हैं, रक्त का रिसाव होने लगा है, कान के परदे फाड़नेवाली चीत्कार, तलवारों की खनखनाहट, भूत बेसुध होकर नाच रहे हैं, योद्धा वीर गर्जना कर रहे हैं। ऊपर से हरित और ठंडा दिखनेवाला ज्वालामुखी पर्वत दो-फाड़ हो गया, उसके सैकड़ों टुकड़े हो गए और हजारों जगह पर सुलगकर भड़क उठा है, सारी पृथ्वी पर आग और तलवार की खनखनाहट व्याप्त हो गई। काठियावाड़ के किसी भाग में 'विठरूरू' नामकचमत्कारक जलप्रवाह है। उसका पृष्ठ भाग कड़े भूभाग जैसा लगता है। पर इसकी जानकारी न रखनेवाले मनुष्य सहज विश्वास से उसपर पैर रखते हैं। और वह ऊपर से कड़ा दिखता पृष्ठ भाग थोड़ा सा हिलते ही वह मनुष्य उसपर अधिक दृढ़ता से खड़े होने का प्रयास करता है। ऐसा करते ही वह पृष्ठ भाग झुकने लगता है और वह अजनबी गहरे पानी में डूब जाता है। विठरूरू की तरह ही यह क्रांति प्रवाह सारे हिंदुस्थान में व्याप्त हो गया है। ऊपर से दिखता काला रंग देखकर, अत्याचारी को ऐसा लगा कि कुछ भी शिकायत न करते हुए अन्याय सहता यह हमेशा का सरल पृष्ठ है, इसलिए अत्याचारी ने अपना कदम उसपर बिना हिचक रखा, तभी वह काला पृष्ठ भाग हिलने लगा! तब अत्याचारी अन्याय ने गर्व से उस भू-पृष्ठ पर और जोर से पैर रखा। और अब ध्यान से देखें। वह भू-पृष्ठ झुक गया और उसके नीचे लहरों-पर-लहरें उठने लगीं, रक्त के झाग को असीम सागर उछलकर ऊपर आने लगा। अत्याचारी अन्याय उसमें डूब गया। अत्याचारी अन्याय, तू कहीं भी पैर रख, कड़ा पृष्ठ भाग तुझे मिलेगा ही नहीं। अब अंतकाल में तुम्हें समझ में आएगा कि ऊपर से काले दिखते भू-पृष्ठ के नीचे रक्त के-लाल-लाल रक्त के-प्रवाह होते हैं और उस कान के परदे फाड़नेवाले ज्वालामुखी के प्रस्फोट की वह प्रचंड ध्वनि अब तो सुन। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 232

भाग-3 अग्नि-कल्लोल

प्रकरण-9 दिल्ली लड़ती है 11 मई को अपनी स्वतंत्रता घोषित करने के बाद दिल्ली शहर उस प्रचंड लड़ाई की तैयारी करने और मची हुई अंधाधुंधी को अनुशासित करने में लगा रहा। दिल्ली के परंपरागत तख्त पर मुगल बादशाह को बैठाकर क्रांतिकारियों ने जो एक शक्ति केंद्र तैयार किया, वह इतना शक्तिशाली था कि उसके नाम के प्रभाव से स्वतंत्रता संग्राम स्थिर हो गया। परंतु पुराने मुगलों को यह तख्तारोहण पुरानी मुगल सत्ता फिर से स्थापित करने के लिए या पुरानी जंगली परंपरा चालू करने के लिए भी नहीं था। हिंदुस्थान के बादशाह के पद पर बूढ़े बहादुरशाह को बैठाना-संकुचित अर्थ में परंपरागत तख्त पर मुगल सत्ता स्थापित करना लग सकता था, पर व्यापक अर्थ में और सत्यार्थ में देखें तो वैसा नहीं था। पुरानी मुगल सत्ता इस देश के लोगों ने स्वयं नहीं चुनी थी। हिंदुस्थान पर विजय भावना और आक्रामक वृत्ति से एवं स्वाभिमानशून्य देशद्रोही कार्यवाहियों के कारण वह मुगल सत्ता पर हमपर जबरन लादी गई थी। आज कोई ऐसे बल से बहादुरशाह को बादशाही पर नहीं बैठाया गया था। नहीं! वैसा करना तो असंभव था, क्योंकि वैसे सिंहासन तो जीतने पड़ते हैं। वे स्वागत योग्य नहीं माने जाते। वैसा करना आत्मघाती होता, क्योंकि वैसा करने का अर्थ था गत तीन-चार शताब्दियों तक हिंदू शहीदों, हुतात्माओं ने अपनी स्वतंत्रता के लिए जो खून बहाया था वह व्यर्थ गया, ऐसा माना जाता। अरबस्तान की जंगली टोलियों ने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 235

इस्लाम को स्वीकार करते ही आक्रमण वृत्ति और पश्चिम में आक्रमण करके प्रदेश को पदाक्रांत किया था। कहीं उनका प्रतिकार हुआ ही नहीं, इस कारण देश के बाद देश, एक मानव जाति के बाद दूसरी मानव जाति को जबरन मुसलमान बनाते इस्लामी सत्ता दौड़ती चली। इस अविरोध आंधी का पहले-पहल किसी भी तरह का समझौता न करते महान् पराक्रम और निर्भयतापूर्ण निश्चय से किसी ने विरोध किया हो तो वह भारत ने ही किया था। अन्य राष्ट्रों के इतिहास में ऐसा विरोध अपवाद में ही दिखता है। यह युद्ध पांच शताब्दियों से अधिक चलता रहा था। इन विदेशी आक्रमणकारियों से स्वयं के जन्मसिद्ध अधिकार के लिए हिंदुओं ने पांच शताब्दियों से अधिक समय संरक्षणात्मक युद्ध चालू रखा था। पृथ्वीराज की मृत्यु से लेकर औरंगजेब की मृत्यु तक समझौतों और संधियों की परवाह न करते हुए युद्ध के बाद युद्ध चला और असंख्य वर्ष चले इस दीप्तिमंत द्वंद्व में भारत के पश्चिमी घाट में सह्याद्रि में एक नई शक्ति का उदय हुआ, अपनी जाति की मान-रक्षा के लिए जिन हजारों हिंदुओं ने बलिदान किया उस सम्मान की परिपूर्णता करने का कंकण उस नई हिंदू सत्ता ने अपने हाथ में बांधा। पुणे से एक हिंदू वीर भाऊसाहब पेशवा समर्थ सेना के साथ आक्रमण करते निकला और उसने दिल्ली के तख्त-सिंहासन-पर कब्जा किया और हिंदू संस्कृति पर लगा गुलामी का कलंक धो डाला। हिंदुस्थान गुलामी उतारकर और पराजय पोंछकर फिर से स्वतंत्र हुआ। हिंदुभूमि के हिंदू ही फिर से मालिक हुए-धनी हुए। इसलिए बिलकुल सच्चे भाव से कहें तो हम यह कहते हैं कि हिंदुस्थान के तख्त पर, सिंहासन पर बहादुरशाह को जो बैठाया गया वह पुरानी मुगल सत्ता की पुनर्स्थापना नहीं थी। परंतु दीर्घकाल तक इस देश के हिंदू-मुसलमानों के बीच जो युद्ध चल रहा था वह युद्ध समाप्ति की घोषणा का प्रतीक, जुल्म, अत्याचार समाप्त होने की निशानी था। इसी देश की मिट्टी में जन्में देश बंधुओं को अपना राजा कौन हो, यह चुनने की स्वतंत्रता आदि के प्रतीक रूप में वह राज्यारोहण था। क्योंकि हिंदू और मुसलमान दोनों ही जातियों, नागरिकों और सेना ने एकमत होकर बहादुरशाह को इस समय बादशाही तख्त पर आरूढ किया था, और स्वतंत्रता समर का नेतृत्व भी उसी को दिया था, इसलिए 11 मई को दिल्ली के सिंहासन पर बहादुरशाह ने जो आरोहण किया था वह प्राचीन मुगल परंपरा के अकबर या औरंगजेब की तरह का आरोहण नहीं था। क्योंकि वह मुग़लिया तख्ता वीर मराठे बहादुरों ने घन की चोटों से कभी का छिन्न-विच्छिन्न कर दिया था। परंतु विदेशी आक्रमणकर्ताओं से स्वतंत्रता युद्ध चलाने के लिए लोगों ने उसको राजा चुना था। इसलिए हिंदू-मुसलमान जनता ने वास्तविक समझ से, पूरे मन और निष्ठा से 11 मई, 1857 के दिन अपनी मातृभूमि के बादशाही पद पर बहादुरशाह की मान-वंदना करने सब आगे आए-ऐसी घोषणा की। इस घोषणा के अनुसार पास और दूर के स्थानों से, अनेक रियासतों से, अनेक 1857 का स्वातंत्र्य समर – 236

सैनिक टोलियों से और हिंदुस्थान के प्रमुख शहरों-नगरों से दिल्ली के राजा के लिए नजराने (उपहार) आने लगे। पंजाब में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह करनेवाली नेटिव सिपाहियों की पलटनें तथा अवध, नीमच, रूहेलखंड और दूसरी जगह के विद्रोही अपने-अपने झंडे और निशान लिये दिल्ली की ओर चलने लगे और क्रांति के नेता बहादुरशाह जफर के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने लगे। अनेक सैनिक टोलियों ने दिल्ली की ओर आते समय रास्ते में जो अंग्रेजी खजाने लूटे थे, वह संपत्ति उन्होंने बादशाह के खजाने में ईमानदारी से जमा की। इतनी सालंकृत सिद्धता होते ही सारे हिंदुस्थान देश के नाम एक घोषणापत्र-जाहिरनामा-प्रसारित किया गया और उसमें स्पष्टता से घोषित किया गया-''अब विदेशियों के साम्राज्य और फिरंगियों की राज्यसत्ता का अंत हो चुका है और सारा देश अब सवतंत्र और परदासता से मुक्त हो गया है।'' प्रारंभ में ही इतनी सफल हुई यह क्रांति पूरी करने के लिए हर एक इस क्रांतियुद्ध में अपना एक ईश्वरीय कर्तव्य मानकर, झूठे (व्यक्ति संबंधी) अभिमान भूलकर दैवी प्रेरणा से सहभागी हो, ऐसा आह्वान लोगों का किया गया। उसमें कहा गया कि “हर व्यक्ति यह ध्यान में रखे कि अपना यह विद्रोह केवल स्वधर्म रक्षा के लिए ही है, दूसरा कोई भी लालच इसके पीछे नहीं है। जिस-जिसको परमेश्वर से निश्चय एवं इच्छाशक्ति का वरदान मिला है, वे सब ही ऐहिक लाभ और क्षणभंगुर देह की आशा छोड़कर अपने प्राचीन धर्म का रक्षण करने के लिए हमसे सहयोग करें। सार्वजनिक हित के लिए लोग अपने स्वार्थ को तिलांजलि देने की ठान लें तो अपनी इस पवित्र भामि पर एक भी अंग्रेज मनुष्य रह न पाए। हर एक यह ध्यान में रखे कि अपने जीवन की डोर टूटे बिना कोई भी मरता नहीं और जब काल की कृपा हो जाए तब कोई भी अपने प्राण बचा नहीं सकता। शीतला की बीमारी और अनेक रोगों में आदमी मरते रहते हैं, पर स्वधर्म युद्ध में प्राण अर्पण करनेवाला शहीद हो जाता है, हुतात्मा होता है और इसीलिए हिंदुस्थान की पवित्र भूमि से हर एक फिरंगी को भगा देना या उसे मार डालना हर एक स्त्री-पुरुष का पवित्र कर्तव्य है। ऐहिक लाभ की कोई भी आशा न रखते हुए जो धार्मिक कर्तव्य-भावना से प्रेरित हैं, वे हमसे आकर मिलें।'' उपर्युक्त उद्धरण समय-समय पर अवध और दिल्ली से समान अर्थ के जो जाहिरनामे (घोषणापत्र) प्रसारित हुए थे, उनमें से ही लिये गए हैं। एक जाहिरनामा स्वयं दिल्ली के बादशाह ने प्रकाशित किया था और उसकी प्रसिद्धि सारे हिंदुस्थान भर में व्यापक रूप से हुई थी। देश के सुदूर दक्षिण सिरे तक उसकी प्रतियां हाथोहाथ बाजार और सेना में भी पहुंच गई थी। उसमें कहा गया था-''हे हिंदू और मुसलमान भाइयों! अपने पवित्र धार्मिक कर्तव्य की पूर्ति करने के लिए हमने जनता से हाथ मिलाया है। इस समय कोई डरपोकपना दिखाए या ढोंगी अंग्रेजों के झूठे आश्वासनों पर विश्वास करे, उसके मुंह पर कुछ ही समय बाद कालिख पोती जाएगी और इंग्लैंड का स्वामित्व स्वीकार कर उससे मित्रता जोड़नेवाले लखनऊ के नवाब को जैसा दंड मिला वैसा ही 1857 का स्वातंत्र्य समर – 237

उसको मिलेगा। इसलिए इसके बाद सारे हिंदू और मुसलमान-अंग्रेजों से चल रहे इस झगड़े में इकट्ठे आकर अपने किसी भी आदरणीय नेता की नीति पर चलने को तैयार हो जाएं। इस तरह देश में शांति और सुव्यवस्था स्थापित करने में हमारी सहायता करें। गरीब लोगों को संतुष्ट रखने के लिए प्रयास करें और उनको अधिक अधिकार व प्रतिष्ठा प्राप्त करने का अवसर उपलब्ध कराएं। जिस-जिसको संभव हो, वह इस घोषणापत्र की प्रतियां बनाकर गांव के मुख्य स्थानों पर चिपकाएं। ऐसा करते समय उचित युक्ति का उपयोग करें और पकड़े न जाने की दक्षता रखें और उसका प्रचार होते-न-होते अपनी तलवारें निकाल फिरंगियों पर प्रहार करें।" अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध स्वतंत्रता युद्ध घोषित करने के कुछ ही समय बाद वह युद्ध चालू रखने के लिए दिल्ली के क्रांतिकारियों ने शस्त्र और गोला-बारूद का उत्पादन करना आरंभ कर दिया, तोपें, बंदूकें और छोटे हथियार बनाने के लिए एक बड़ा कारखाना चालू किया गया और इस शस्त्र उत्पादन पर देखरेख के लिए कुछ फ्रेंच लोगों को नौकरी पर रखा। गोला-बारूद रखने के लिए दो-तीन गोदाम बनाए गए और रात-दिन काम चालू रखकर कामगारों से भरपूर गोला-बारूद्ध निर्माण करने की व्यवस्था की गई। सारे देश में कानून से गो वध बंदी लागू की गई और एक बार जब कुछ सिरफिरे मुसलमानों ने हिंदुओं का अपमान करने के लिए उनके विरूद्ध जेहाद की घोषणा की तब उस बूढ़े बादशाह ने अपने लवाजमे के साथ हाथी पर बैठकर सारे शहर से एक विशाल जुलूस निकालकर यह घोषित कर प्रकट किया कि अपना यह जेहाद केवल विदेशी फिरंगियों के लिए है, हिंदुओं के विरूद्ध नहीं है। जो कोई भी गाय की हत्या करता पाया जाएगा उसे तोप से उड़ा दिया जाएगा या उसके हाथ काट दिए जाएंगे। अलग-अलग रेजिमेंटों व टोलियों को भिन्न-भिन्न राजपुत्रों के नाम दिए गए। अंग्रेजों के विरूद्ध क्रांतिकारियों की इस लड़ाई में कुछ यूरोपियनों ने भी सहयोग दिया। बुंदेल की सराय की लड़ाई के बाद अंग्रेजी सेना को आगे की सैनिक कार्यवाही करने के लिए बहुत उचित स्थान मिल गए थे। दिल्ली की चारदीवारी के एक छोर तक आकर भिड़ी और यमुना नदी के आगे चार मील तक दूर फैली हुई टेकरियों की एक श्रृंखला थी-अंग्रेज जिसे Ridge कहते हैं-उन टेकरियों की प्राकृतिक ऊंचाई युद्ध की दृष्टि से बहुत लाभदायक थी। पासस-पड़ोस के समतल प्रदेश की अपेक्षा टेकरियों की ऊंचाई पचास-साठ फीट होने से वहां से तोपों की निरंतर और प्रभावी मार करने के लिए उस स्थान का अच्छा उपयोग हो सकता था। इन टेकरियों के प्रदेश से लगी हुई यमुना की चौड़ी नहर थी, जिसमें इस वर्ष जोरदार वर्षा होने से जून माह में भी अच्छा पानी था। वह नहर पीछे की ओर होने से अंग्रेजों के शत्रुओं की ओर से भी उस नहर को कोई धोखा नहीं होना था, केवल सामने से, दिल्ली की ओर से क्रांतिकारियों के जैसे हमले होते थे वैसे ही पीछे की ओर से, पंजाब की ओर से, यदि हमले हुए होते तो अंग्रेजों की शामत आ जाती। अंग्रेजों के सौभाग्य से पंजाब ने उनकी ओर से ही लड़ने की ठानी। नाभा, जींद और 1857 का स्वातंत्र्य समर - 238

पटियाला के राजाओं द्वारा पंजाब के राजमार्गों की सुरक्षा किए जाने से अंग्रेजों को धान्य, आदमी एवं गोला-बारूद्ध की आपूर्ति बिना धोखे के हो सकी। इस सारी घटना के इस तरह बन जाने से, हिंदुस्थान के अभाग्य से अंग्रेजों को अति अनुकूल परिस्थिति परिस्थिति प्राप्त हुई। दिल्ली पर मार की जा सके-ऐसी ऊंचाई, शत्रु की मार से अंग्रेजी डेरा सुरक्षित रहे-ऐसा समतल प्रदेश, शत्रु के जासूसों को भी प्रवेश नहीं मिल पाए-ऐसी चारदीवारी, पास में ही ताजा और भरपुर पानी, पंजाब की ओर से आ रहे मार्ग-और वे मार्ग निष्ठावान् रियासती सैनिकों द्वारा अपनी गांठ का खाकर सुरक्षित रहे और खुले, ऐसी सारी अनुकूल परिस्थिति के कारण ब्रिटिश कमांडर बर्नार्ड और उसके अधीनस्थ अधिकारियों का आत्मविश्वास बढ़ा और वे गर्व से कहने लगे-‘‘अब दिल्ली जीतने के लिए एक दिन भी नहीं लगेगा!’’ और फिर जिस दिल्ली को जीतना एक दिन का भी काम नहीं है उसके लिए दो दिन क्यों रूका जाए? अभी इसी क्षण उस पापी और देशद्रोही शहर को चारों ओर से आक्रमण करके धूल में मिला देने का आदेश अंग्रेजी सिपाहियों को क्यों न दिया जाए? पंजाब अपनी सेना की रीढ़ की हड्डी है और वह स्वामी-निष्ठा से सहयोग को तत्पर है तब दिल्ली जीतने के लिए अधिक देर तक घेरा डाकलकर बैठने का दुर्बलों जैसा रास्ता क्यों अपनाया जाए? उस नादान शहर पर सीधे हमला करके एक ही धमाके में उसे जमींदोज कर डालना अधिक बुद्धिमानी है। अपनी सेना के दो भाग करें-एक भाग लाहौर दरवाजे पर हमला करे और दूसरा भाग काबुल दरवाजे को नष्ट करे और शेष सब एक ही समय में दिल्ली में घुसकर रास्ते के सारे स्थान एक के बाद जीतते रास्ते में कहीं भी विश्राम न करते सीधे राजमहल पर हमला करें। बिल्वर फोर्स, ग्रेट हेड एवं हडसन जैसे वीरोग्रणी साहस और धड़ाके की लड़ाई करने के लिए बहुत आतुर थे और उन्होंने हमले का विजयी करने का दायित्व लिया हुआ था। फिर राह किसकी देखी जाए? इस तरह 12 जून को जनरल बर्नार्ड ने हमला करने का गुप्त आदेश दिया। कौन सैनिकों को इकट्ठा करेगा, सेनाएं कहां से और कैसे बढ़ेंगी, दायां-बांया नेतृत्व किस-किसके पास होगा? ऐसी सारी योजना पहले ही बन गई। हमले की सारी योजना इस तरह निश्चित की गई और भोर दो बजे से अंग्रेजी सेना पहले से नियोजित परेड मैदान पर इकट्ठी होने लगी। कल रात का बादशाह के राजमहल में ही सोना है, यह विश्वास होने के कारण आज रात नींद न हो पाने का दुःख करते बैठनेवाले वे मूर्ख थोड़े ही थे! निश्चय से असंभव, पर अंग्रेजों के दुर्भाग्य से ऐन मौके पर उनकी सेना का कुछ भाग लापता हुआ दिखाई दिया। ऐसी धोखादायक स्थिति में दिल्ली पर हमला करना उतावलापन होगा-ऐसा ब्रिगेडियर ग्रेव्ज को लगा और अन्य कुछ अधिकारियों ने भी ऐसा ही सुझाया कि ऐसी उतावली हिंदुस्थान की सारी ब्रिटिश हुकूमत के लिए मारक सिद्ध होगी। अतः सीधे हमले और तुरंत विजय के जो स्वप्न ब्रिटिश सेना को आ रहे थे वे दिल्ली के राजमहल में सच न होकर उस रात अपने डेरे के बिछौने में ही समाप्त हुए। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 239

दूसरे दिन प्रातः बिल्वर फोर्स और ग्रेट हेड ने अगले हमले की योजना बनाकर सेनापति बर्नार्ड के विचार के लिए उसके पास भेजी। सेनापति बर्नार्ड की पहचान क्रिमियन युद्ध के एक नामवर योद्धा के रूप में थी। पर इस अवसर पर वह बहुत धीमा और दब्बू-सा लग रहा था। 14 जून को उसने युद्ध परिषद् (वार काउंसिल) की बैठक बुलाकर अपने अधिकारियों से आक्रमण के विषय पर चर्चा की। आक्रमण की योजना का जोरदार भाषा में ग्रेट हेड से समर्थन किया, तब भी अन्य अधिकारियों को विजय का विश्वास नहीं होता था, इसलिए उन्होंने यह प्रतिपादन किया कि इसमें प्रत्यक्ष पराभव जितनी ही शक्ति की और प्रतिष्ठा की हानि होने वाली है। दूसरा यह कि सीधे हमला कर दिल्ली जीत भी ली तो भी उसकी रक्षा कैसे करें? रास्ते-रास्ते और घर-घर विद्रोहियों की ओर से चलती गोलीबारी में से कितने सोल्जर बचे रहेंगे? इस संबंध में अपना पक्का विचार बर्नार्ड भी कह नहीं पर रहा था। इस सारी चर्चा के बाद हमले के संबंध में भिन्न मत होने में ही इस युद्ध परिषद का एकमत हुआ। और इस तरह 12 जून को रात में आए स्वप्न की तरह 15 जून को भी आक्रमण की योजना त्यागकर तात्त्विक मत पक्का पकड़कर उसके विदास्पप्न भी वहा हो गए। 16 जून को युद्ध परिषद् की बैठक हुई। मर मत-भिन्नता और मन का धीरज कम होने में ही उसका अंत हुआ। अंग्रेज अधिकारी जिस समय एक ओर जोरदार और सीधे हमले की योजना बना रहे थे उसी समय दूसरी ओर दिल्ली में नए तरूण रक्त, नए खजाने, संपत्ति और नए उत्साह की बाढ़ आ रही थी और क्रांतिकारियों ने आज तक की बचाव की रणनीति छोड़कर अवसर के अनुरूप आक्रमण की नीति स्वीकार कर बीच-बीच में अंग्रेजी सेना पर छापे डाले और कभी-कभी उसमें सफल भी रहे। सारे हिंदुस्तान में जिन सिपाहियों ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया था उन सिपाहियों द्वारा अपने साथ लाए हुए खजाने, शस्त्रास्त्र, गोला-बारूद की दिल्ली में निरंतर आवक हो रही थी। इस कारण क्रांतिकारियों को युद्ध सामग्री या सिपाहियों की कमी नहीं थी। ऐसी स्थिति में उन्होंने आक्रमण की नीति अपनाई और अंग्रेजी सेना को एक कदम भी आगे नहीं बढ़ने दिया। बीच में ही एकाध साहसी आक्रमण शत्रु पर करना, शत्रु को सताने की नीति होने से अंग्रेजी सेना पर उन्होंने अपनी दहशत बैठा दी और उन्हें आक्रामक नीति छोड़ने को बाध्य किया। 12 जून को कुछ क्रांतिकारी शहर से बाहर निकले, झाड़ियों, झुरमुटों और गड्ढे आदि के सहारे-सहारे अंग्रेजों की अगाड़ी को पर कर पचास गज से भी अधिक अंदर चले गए और अंग्रेजों को आहट होने के पहले ही उन्होंने उनपर हल्ला किया। अंग्रेजी 1857 का स्वातंत्र्य समर – 240

तोपखाने के बहुत लोग गारद हो गए और सिपाहियों को अचूक गोली लगने से नॉक्स मारा गया। उसी समय क्रांतिकारियों की दूसरी टोली ने अंग्रेजों की पिछाड़ी पर भी हमला किया। पर वहां उन्हें बड़े प्रतिकार का सामना करना पड़ा। बाड़ा हिंदूराव और अंग्रेजी सो की दाईं बगल पर भी सिपाहियों ने बड़े जोर का हमला किया। जिनकी राजनिष्ठा पर अंग्रेजों को पूर्ण विश्वास था, ऐसी एक नेटिव पैदल टुकड़ी शत्रु पर हमला करने गई। परंतु उन्होंने विश्वासघात किया, यह स्पष्ट होते ही हमने उनपर गोलीबारी चालू की, पर वे बहुत तीव्रता से गोलीबारी से सुरक्षित निकल गए ˙ ˙ ।111 उस स्थान पर नियुक्त मेजर रीड कहता है-‘’मानो वे सिपाही शत्रु पर हमला करने जा रहे लें, ऐ लगता था; पर शत्रु से भिड़ते ही वे उनके साथ ही चलने लगे-यह देखते ही मैं डर गया। मैंने उपपर तोपें दागने का आदेश दिया; पर उतनी देर में वे विश्वासघाती इतने दूर चले गए कि उनमें से कोइ पांच-छह सिपाही ही मारे गए होंगे, ऐसा मुझे लगता है।‘‘ इस आक्रमण के बाद विद्रोही शत्रु पर हमला करने के लिए शहर के बाहर जा रहे हैं, ऐसा हर दिन दीखने लगा और हमला निपटाकर वे शहर में लौट रहे हैं, यह हर शाम दिखता था। सिपाहियों का जो-जो दल विद्रोहियों से मिलने दिल्ली में प्रवेश करता वह दल तुरंत दूसरे दिन शत्रु पर हमला करने बाहर जाता। 13 जून को बाड़ा हिंदूराव पर फिर से हमला किया गया। 12 जून को ब्रिद्रोहियों से जो सेना आकर मिली थी उसी ने यह हमला किया था। मेजर रीड लिखता है-‘’गैंड ट्रंक मार्ग से वे सिपाही सीधे टुकड़ियों का संचालन करते आ रहे थे। उस पलटन का नेता सरदार बहादुर था। अपनी बाईं बगल की ओर मुड़ने का उनका हेतु होने से अपने लोगों को पीछे रहने को कहकर वह स्वयं आगे हो गया। उस दिन वे सिपाही जान की परवाह न करते हुए लड़ रहे थे। परंतु सरदार बहादुर उसके अर्दली लाल सिंह के हाथों मारा गया। उसके सीने पर की हिंदुस्थानी सेना क निशानी की पट्टी निकालकर उसने मेरी पत्नी के पास भेज दी। 17 जून को भारतीय सेना ने ईदगाह भवन पर तोपों का मोरचा जमाना चालू किया; क्योंकि वहां से अंग्रेजों की रिज पर -सामने पर-जोरदार गोलागरी हो सकती थी। यह सब देखते ही मेजर रीड और हेनरी टॉब्स ने विद्रोहियों पर दो तरफ से हमला बोल दिया। और प्रतिकार हो ही नहीं सकता। ऐसी शक्ति से उन्हें घेरने का प्रयास किया। पर ईदगाह भवन में बंद वे मुट्ठी भर विद्रोही शरणागत नहीं हुए। जब उनके पास का गोला-बारूद समाप्त हो गया तब उन्होंने बंदूकें फेंककर अपनी तलवारें निकालीं और अपने अंग्रेज शत्रु पर प्राणपण से टूट पड़े। अपना अंतिम सैनिक अपने-अपने स्थान पर लड़ाई लड़ते मरने तक उन्होंने ईदगाह भवन में शत्रु को प्रवेश नहीं करने दिया।‘‘ 18 जून को नसीराबाद के विद्रोही सिपाही दिल्ली पहुंच गए और अपने साथ 1857 का स्वातंत्र्य समर - 241 111 के कृत-इंडियन म्यूटिनी', पृष्ठ 411 ।

लाया हुआ खजाना उन्होंने शाही प्रतिनिधि को दे दिया। उनके प्रतिनिधियों का बादशाह ने अपने राजमहल में स्वागत किया और उनका यथायोग्य आदर एवं मान-मर्तबा रखा। भरे दरबार में उस पलटन के सिपाहियों के प्रतिनिधि ने 20 जून को अंग्रेजी सेना पर हमला करने की शपथ ली। 20 जून को प्रातः शत्रु पर हमला करने जाने के लिए विद्रोही सेना शहर के दरवाजे से बाहर निकली, यह देखा गया। अंग्रेजों की छावनी के पिछाड़ी के बाजू पर हल्ला करने के हेतु से सिपाही सब्जी मंडी से छिपते-छिपते चले और अंग्रेज कुद सोचें, इसके पहले ही उनपर अचानक गोलियों की बौछार शुरू की और अंग्रेजों पर जोरदार हमला किया। स्कॉर्ट, मनी, टॉम्ब्स और अन्य अंग्रेज अधिकारियों ने तोपों की जोरदार मार करके यह हमला रोकने का प्रयास किया । पर भारतीय सेना इतनी लगन से हमला कर रही थी कि उसक प्रतिकार करना कठिन हो गया। नसीराबाद की पलटन का किया हुआ हमला इतना प्रभावी और भयानक था कि बहादुर टॉब्स भी रूआंसा होकर चिल्लाया-“दौड़ों, डॉली दौड़ो-अन्यथा मेरी तोपों पर शत्रुओं का कब्जा हो गया समझो।” पंजाबी नेटिव सिपाहियों के साथ डॉली दौड़कर भी आया। परंतु विद्रोहियों की ओर से छोड़ी गई एक गोली से उसके कंधे को चोट लगने से उसे पीछे घूमना पड़ा। शाम हो गई और सैनिकों की जीत स्पष्ट दिख रही थी। उन्होंने फिर हमला किया और अंग्रेजी सेना की तोपें हथिया लीं। 9वीं भाला सेना टुकड़ी (लांसर) और पंजाबी टुकड़ी बार-बार आगे घुसने का प्रयास करती और पराभूत होकर पीछे हट जाती। रात हो गई तब भी लड़ाई का रंग भीषण ही बना रहा। अंग्रेजों ने भी बहुत पराक्रम किया, पर वे अपनी तोपें बचाने से अधिक कुछ नहीं कर पाए। लॉर्ड रॉबर्ट्स लिखता है-“विद्रोहियों के कारण हममें भगदड़ मची (The mutineers routed us)। होप ग्रांट का घोड़ा मर गया। वह स्वयं भी बहुत घायल हो गया। उसके बाजू में ही एक राजनिष्ठ मुसलमान घुड़सवार खड़ा न होता तो वह उसी समय मर जाता। मध्य रात तक ऐसे झपट्टे चालू रहे। सिपाहियों के हमलों को रोकना असंभव हो जाने से अंत में अंग्रेज युद्धक्षेत्र से पीछे हट गए और अंग्रेजी छावनी की पिछाडी का एक प्रमुख स्थान विद्रोहियों के हाथ लग गया।” उस रात अंग्रेज कमांडर को चिंता के कारण नींद आना संभव नहीं था। क्रांतिकारियों द्वार जोर लगाकर जीता हुआ स्थान यदि उनके कब्जे में बना रहता तो अँजों की पंजाब की ओर से आवाजाही टूट जाती। यह संकट टालने के लिए उस विजयी स्वदेशी सेना का प्रतिकार करने को अंग्रेजों ने बड़ी भोर से ही तैयारी की। गोला-बारूद और सेना की अधिक सहायता प्राप्त करने वे सिपाही शहर लौट रहे थे, इसलिए अंग्रेज हाथ से `नकंला अपना स्थान फिर प्राप्त कर सके। इस लड़ाई की विजय और सिपाहियों की टक्कर के समाचार से दिल्लीवासियों का उत्साह बढ़ गया और उस उत्साह में उन्होंने किले पर लंबी मार की तोपें भी चढ़ाकर उससे अंग्रेजी सेना पर गोलों की भरमार कर दी। दिल्ली 1857 का स्वातंत्र्य समर - 242

की सेना ने इस प्रभावी आक्रमण नीति के कारण ब्रिटिश सेना के आक्रमण को रोक दिया और अपने संरक्षण की चिंता ही उन्हें सताती रही। अपने कब्जे के मुकाम कैसे सुरक्षित रखें, इस चिंता में डूबे अंग्रेजों को पंजाब से नई कुमुक मिले बिना एक कदम भी आगे बढ़ना असंभव हो गया और ऐसी बाधा को बढ़ाने के लिए 23 जून, 1857 का दिन उदय हुआ। 23 जून, 1857-प्लासी की लड़ाई के सौ वर्ष पूरे करनेवाला दिन। सौ वर्ष पूर्व ठीक इसी दिन रणनीति के जुए में प्लासी के रणक्षेत्र पर हिंदुस्थान का पासा उलटा पड़ा था। नए-नए अपमान, नई-नई मानहानि में बढ़ोतरी होते-होते सौ वर्ष पूरे हो गए। इस सौ वर्ष में जमा हुए अपमान का प्रतिशोध लेने, राष्ट्र का अपमान धो सकने और राष्ट्र की होने वाली दुर्गति रक्तपात से पोंछ डालने योग्य भयानक प्रतिशोध अंग्रेजों से लेने की प्रबल लालसा से, दिल्ली शहर के सभी सिपाहियों की आंखे आग बरसाने लगीं। हवा की हर लहर से, सूर्य की प्रत्येक किरण से, तोप के धूम-धड़ाके से और तलवार की खनखनाहट से प्लासी का प्रतिशोध, प्लासी का बदला-ऐसी एक ही ध्वनि घनघोर होकर बाहर आ रही थी। प्लासी के दुःखदायी रणक्षेत्र का यह शत सांवत्सरिक (शत वर्षीय) दिन उदय होते ही क्रांतिकारियों की टुकड़ियां शहर के लाहौरी दरवाजे से बाहर निकलने लगीं। अंग्रेजी को भी जिस भयानक संकट का सामना पड़ना है, इसकी पूरी-पूरी जानकारी थी, इसलिए वे रात से ही युद्ध की तैयारी में लगे हुए थे और उन्होंने अपनी सैनिक व्यूह रचना पूरी कर रखी थी। इतना ही नहीं, इस भयानक संकट की जानकारी उन्हें पूर्व में ही हो जाने से उन्होंने कुछ दिन पूर्व ही पंजाब सरकार से सेना की कुमुक मंगा ली थी और उनके भाग्य से भोर ह ीवह कुमुक आ गई थी। पंजाब से नई सेना आने के समाचार के साथ ही अंग्रेजों के मन में आत्मविश्वास जागा। अंग्रेजों को सेना की नई कुमुक मिली, इस समाचार से या अंग्रेजों ने पिछाड़ी का एक पुल उड़ा दिया, इस समाचार से क्रांतिकारियों के उत्साह पर कुछ भी प्रभाव पड़ा। सब्जी मंडी से वे सीधे आगे बढ़े और अंग्रेजों पर बंदूकों की गोलियों की मार करने लगे। अंग्रेज पैदल सेना ने हमले-पर-हमले किए; पर जैसे वे आगे बढ़ आते वैसे ही क्रांतिकारी भी हर बार पीछे धकेल देते। किले की दीवार का तोपखाना भी अपना काम सही कर रहा था। हिंदुराव बाड़े की भी क्रांतिकारी यथायोग्य सेवा कर रहे थे। दोपहर 12 बजे लड़ाई पूरे रंग में आ गई। पंजाबी टुकड़ियों, गुरखा पलटन और अंग्रेजों की गोरी सेना पर क्रांतिकारियों ने एक के बाद एक हमले किए। मेजर रीड कहता है-“मेरे सारे स्थानों पर विद्रोहियों ने बड़ी दृढ़ता से लड़ाई लड़ी, इससे अधिक पराक्रम से कोई लड़ नहीं सकता। राइफलधारी सिपाहियों पर, मार्गदर्शकों पर और खास मेरे पास के आदमियों पर उन्होंने बार-बार

हमले किए और एक बार तो मुझे लगा कि आज हम हार गए।‘‘ प्रत्यक्ष रणक्षेत्र पर लड़ते एक वीर अंग्रेज अधिकारी द्वारा ऐसे शब्दों में लिखना क्रांतिकारियों के हमले कितने प्रखर होंगे, इसका प्रमाण था। उसमें भी अग्नि जैसा प्रज्वलित और शक्तिशाली, फैले हुए घटकों को केंद्रित कर सके, ऐसा प्रबल नेता क्रांतिकारियों को मिला नहीं था। स्वदेश को फिर से स्वतंत्र कराने की दुर्दम्य इच्छा और प्लासी के अपमान का गुस्सा-इन दो समान बंधनों से वे क्रांतिकारी एकत्रित हुए थे। भारतीय सेना के हाथों अंग्रेजों का तोपखाना पड़ जाने का भ्रम निर्मित हो गया था और अंत में अपनी सेना को उत्साह देनेवाला मुख्य अधिकारी कर्नल वेल्शमन भी मारा गया। पूरे दिन अंग्रेजी छावनी का हर आदमी दृढ़ता से लड़ता रहा और थकता रहा और अ बवह खड़ा नहीं रह सकता, ऐसा लगने लगा। ऐसा है तब भी अंग्रेज सेनापति को आशा छोड़ देने का कोई कारण नहीं। क्योंकि उसी प्रातः वहां आकर पहुंची ताजा दम स्वामीनिष्ठ पंजाबी टुकड़ी उसे लड़ने के लिए कब अवसर मिलता है, इसके लिए बड़ी उत्सुक या उतावली है। उसको तुरंत हमला करने का आदेश दिया गया और इन ताजे तगड़े सिपाहियों के नए हमले से सारे दिन अविरत लड़ते क्रांतिकारियों को असमान लड़ाई लड़ना अनिवार्य हो गया। फिर भी उस विषम स्थिति में भी रात होने तक क्रांतिकारी निरंतर लड़ते ही रहे और बाद में हम ही जीते हैं, ऐसा कहते दोनों ही पक्ष की सेनाएं अपनी-अपनी शूरता और धीरज की प्रशंसा करते अपने तल पर लौट पड़ी। जैसे-जैसे दिन हो रहे थे वैसे-वैसे नए सैनिक पथक दोनों पक्षों को मिलते गए। पंजाब से निरंतर सैनिक भरती होते जाने से इस समय अंग्रेजों की ओर सैनिकों की संख्या 7 हजार से अधिक हो गई थी। दूसरी ओर रूहेलखं डमें विद्रोह कर उठे सिपाहियों की पलटन बख्त खान के नेतृत्व में दिल्ली आ गई थी। लॉर्ड रॉबर्ट्स कहता है-‘’रूहेलखंड की विद्रोही सेना नौका पुल पारकर कलकत्ता दरवाजे से शहर में प्रवेश करने लगी। हाथों में बड़े-बड़े झंडे और पताकाएं फहराते, युद्ध घोषणा करते हुए और बड़े ही अनुशासन में संचलन करते शहर में प्रवेश कर रहे हजारों सिपाही हमें अपनी छावनी की टोही टेकरी से दिख रहे थे।’’ दिल्ली के भिन्न-भिन्न जातियों और धर्मों के, पहले कभी एक-दूसरे का मुंह न देखे हुए और केवल संयोग से और क्षोभ की आंधी के कारण एक जगह पर आए हजारों सिपाही एकत्र रह ही नहीं सकते थे। शहर की लूटमार और आपाधापी रोकने बादशाह और उसके सलाहकार मंत्रिगण यद्यपि लगातार प्रयत्न कर रहे थे और उपदेशा भी कर रहे थे तब भी हर दिन सिपाहियों की लूटमार, आपाधापी और दंगल मचाने के समाचार आ ही रहे थे। क्रांतिकारियों में ऐसा होना स्वाभाविक होता है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 243

ऐसी परिस्थिति में इन असंख्य और भिन्न-भिन्न सैनिकों पथकों को संगठित कर एकरूपता निर्माण कर सके, ऐसे किसी नेता की आवश्यकता होती है। इस समय क्रांति काल में सहजता से प्रकट होनेवाली लोगों की दुष्ट प्रवृत्तियों और वाममार्गी मनोवृत्तियों में यद्यपि भयानक उफान कर उनमें अपने लिए भय का निर्माण कर उन्हें अपने काबू में रखा था। परकीय शत्रु को देश के बाहर भगा देने की जो अति उत्कट इच्छा सैनिकों और समान्य नागरिकों में निर्मित हुई थी उसके बल पर ये हमले हो रहे थे। परंतु अंतिम विजय प्राप्त करना हो तो केवल प्रबल इच्छाशक्ति से काम नहीं होता, उसके लिए संगठित और विधिवत् प्रयास और कर्तव्यनिष्ठ नेतृत्व की आवश्यकता होती है। इसलिए अपनी सेना सहित और अपार संपति सहित रुहेलखंड का शूर बख्त खान दिल्ली पहुंचा-अर्थात् उसे ईश्वर ने भेजा, ऐसा लगने लगा। इसका वर्णन उसी समय दिल्ली में ही रहते एक सज्जन ने अपनी दैनंदिनी (डायरी) में लिखा है। उस दैनंदिनी का एक उद्धरण उस काल की दिल्ली का केवल दर्शन ही नहीं कराता बल्कि वह लोगों की कुल विचारधारा और घटनाओं पर भी प्रकाश डालता है- "रुहेलखंड की विद्रोही सिपाही टुकड़ियां जल्दी ही आने वाली हैं, इस अपेक्षा में यमुना का पुल ठीक कर लिया गया। तारीख 2 जुलाई को प्रातः नवाब अहमद कुली खान अपने सरदारों और नागरिकों के साथ रुहेलखंड की सेना का स्वागत करने सामने गया। उस समय हकीम अहसनुल्ला खान, सेनापति सनद खान, इब्राहिम अली खान, गुलाम कुली खान और अन्य नामवर नेता भी उपस्थित थे। रुहेलखंड की सेना के सेनापति मोहम्मद बख्त खान ने बादशाह को अपनी सेवाएं स्वीकार कर लेने का निवेदन किया। बादशाह को उसकी क्या इच्छा है, यह कहन का बख्त खान ने जब आग्रह किया तब बादशाह ने कहा, 'लोगों को पूरी सुरक्षा मिले, उनकी जान और माल की हिफाजत हो और अंग्रेज शत्रु को नष्ट करने का कार्य सफलता से पार पड़े, यह मेरी तीव्र इच्छा है।' उसपर सेनापति ने कहा कि आपकी इच्छा हो तो क्रांतिकारी सेना के सरसेनापति के पद पर मैं काम करने को तैयार हूं। उस समय बादशाह ने बड़े प्यार से सेनापति का हाथ दबाया। वैसे ही भिन्न-भिन्न पलटनों के प्रमुखों को इकट्ठा बुलाकर पूछा गया कि-सारी सेना के सेनापति पद पर बख्त खन का चयन करने को वे तैयार हैं क्या? सब लोगों ने 'हां, हां, कहा। और सरसेनापति के आदेशों का पालन करने की लश्करी और सैनिकी शपथ भी सबने ली। "यह शपथ विधि पूरी हो जाने पर बादशाह ने फिर से बख्त खान से निजी भेंट 1857 का स्वातंत्र्य समर – 244

की। सारे शहर में डोंडी पीटी गई कि सरदार बख्त खान को सरसेनापति के पद पर नियुक्त किया गया है। तलवार, एक पदक और सेनापति का पद उन्हें अर्पण कर उनका सम्मान किया गया। राजपुत्र मिर्जामुगल को सेनापति पद दिया गया। उसने बादशाह को सूचित किया कि-'शहर में लूटपाट या रक्तपात करते हुए प्रत्यक्ष राजपुत्र भी दिखाई दिया तो तत्काल उसके कान-नाक काटने में मैं आगे-पीछे नहीं देखूंगा। बादशाह ने उत्तर दिया, 'आपको सारे अधिकार दे दिए गए हैं, जरा भी ढील न देते हुए आपको जो उचित लगे वह करो।' शहर कोतवाल को डांटा गया कि उसकी ढिलाई के कारण यदि गांव में लूटपाट या दंगा हुआ तो उसे भी फांसी दे दी जाएगी। बख्त खाने ने कहा कि वह अपने साथ चार पैदल टुकड़ियां, सात सौ घुड़सवार, घोड़ों पर चढ़ी छह तोपें, तीन जमीनी तोपें आदि लश्करी सामग्री लाया है। उसके साथ के सिपाहियों को छह माह का वेतन पहले ही दे दिया गया है और अभी उसके पास चार लाख रूपयों की नगदी होने से सिपाहियों के वेतन या पैसों की आवश्यकता के लिए बादशाह चिंता न करें-ऐसा भी बख्त खान ने कहा। इतना ही नहीं, जो कुछ पैसा लड़ाई में उसके हाथ आएगा वह भी बादशाह के खजाने में तुरंत भरा जाएगा। उसके बाद बादशाह ने चार हजार रूपए मूल्य की मेवा-मिठाई सारी सेना में बांटी। आगरा के सिपाही, नसीराबाद और जालंधर की पलटनें-इन सबपर सरसेनापति बख्त खान का अधिकार था। शहर के हर आदमी को शस्त्र धारण करना पड़ेगा, ऐसा पहला आदेश उसने सरसेनापति के नाते से जारी किया। हर गृहस्थ और दुकानदार भी शस्त्र रखे। जिसके पास शस्त्र न होगा वह वरिष्ठ थाने में जाकर पूछताछ करे तो उसे तत्काल शस्त्र रखे। जिसके पास शस्त्र न होगा वह वरिष्ठ थाने में जाकर पूछताछ करे तो उसे तत्काल शस्त्र दिया जाएगा। पर कोई भी बिना हथियार न रहे। कोई सिपाही लूटपाट करता दिखे तो तुरंत उसका हाथ काट दिया जाएगा। बख्त खान शस्त्रागार में गया और उसने निरीक्षण कर शस्त्रों और गोला-बारूद निर्माण को गति दी। रात आठ बजे और अहमद कुली खान के साथ राज्य के हालचाल पर चर्चा की। 3 जुलाई के दिन सामान्य परेड के संचलन के समय लगभग बीस हजार सिपाही उपस्थित थे।''¹¹² बख्त खान के आगमन के कारण दिल्ली के क्रांतिकारी पक्ष को जब उसने कुछ संगठनात्मक रूप देना प्रारंभ किया-उसी समय दूसरी ओर अंग्रेजी पक्ष को भी पंजाब और अन्य हिस्सों से भी उत्साही और साहसी नई कुमुक मिल रही थी। पंजाब से हाल ही में पहुंचे ब्रिगेडियर जनरल चेंबरलेन की शूरता, उत्साह और कल्पनाशील में बराबरी कर सकें, ऐसे बहुत ही कम आदमी अंग्रेज सरकार के पास थे। प्रख्यात लश्करी इंजीनियर बेअर्ड स्मिथ भी उनसे आ मिला। सिखों से कुछ ही समय पूर्व हुई लड़ाई में जिन्होंने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 246 ¹¹² मेटकॉफ कृत-'नेटिव नैरेटिव्स', पृष्ठ 60 ।

नाम कमाया था ऐसे सारे जॉन लॉरेंस ने दिल्ली में अंग्रेजों की सहायता के लिए भेज दिए थे। सेनापति बर्नार्ड ने पहले कई बार दिल्ली पर हमला करने की बात सोची थी, पर उसे पूरा नहीं किया गया था। अब नई कुमुक मिल जाने से उसने दिल्ली पर सीधे और साहसी आक्रमण करने का निश्चय किया। पहले जैसी ही इस हमले की सारी योजना बनाई गई और 3 जुलाई को हमले की तैयारी के साथ अंग्रेजी सेना कूच कर गई। पर यह क्या? किसी ने यह समाचार दिया कि सरसेनापति बख्त खान ने अंग्रेजों के दिल्ली पर चढ़ाई करने का श्रम बचा दिया! क्योंकि वह स्वयं ही उनपर हमला करने आ रहा है। तारीख 4 जुलाई को बख्त खान फिर चढ़ आया और उसने अंग्रेजों को अलीपुर तक पीछे ढकेला। दिल्ली गए, दिल्ली शहर पर केवल नजर फेंकी, दृष्टि पड़ी कि उसे सहज ही हमने जीता, ऐसी गर्वोक्तियां दिल्ली को घेरने के पहले जो अंग्रेज करते थे वे पंजाब से नई प्रबल पलटनें आने के बाद भी-पूरे एक माह में एक कदम भी-आगे नहीं बढ़ा पाए। यह देखकर भावना प्रधान सेनापति बर्नार्ड को अति दुःख और शर्म लगती। अंग्रेज दिल्ली जीतने को जितने आतुर थे उससे भी अधिक उनका आत्मविश्वास उसे सहज ही जीतने का था। वह ऐसा आत्मविश्वास था कि मुंबई, कलकत्ता और मद्रास तक दिल्ली जीत लेने का समाचार फैल गयां और जब अंग्रेजों को बार-बार यह दिखाई दिया कि ये समाचार निराधार हैं तब सारे हिंदुस्थान के लोग एक-दूसरे से पूछने लगे- "दिल्ली में अंग्रेजी सेना कर क्या रही है?" यही चिंता और शर्म बर्नार्ड के मन में बस गई थी और पहले की इस अंधकारमय परिस्थिति से कुछ भिन्ना हो सकेगा, उस समय ऐसा उसे नहीं लगता था। उलटे भावी समय का विचार करते हुए उसे वह अधिक अंधियारा ही लगता। सिपाहियों के लगातार होनेवाले हमलों के कारण उसे रत्ती भर विश्राम नहीं मिलता था। इतना ही नहीं, क्रांतिकारियों की उस राजधानी पर सीधा और साहसी हमला करने की उसकी महत्त्वाकांक्षा उगते हर नए दिन धुलती जा रही है, उसे ऐसा दिखता था। अंत में शरीर से थका, मानसिक चिंता से ग्रस्त और निराशा में डूबा हुआ अंग्रेज सेनापति बर्नार्ड 5 जुलाई को हैजे की महामारी की बलि चढ़ गया। इस समाचार से अंग्रेजी छावनी की सेना पर जैसे दुःख का पहाड़ ही टूट पड़ा। दिल्ली में प्रवेश करने का प्रयास करनेवाला यह दूसरा अंग्रेज सेनापति दिल्ली में तो नहीं, कब्र में प्रवेश करने में सफल हुआ। उसके बाद सेनापति रीड ने सेना के अधिकार सूत्र अपने हाथ लिये और वह अंग्रेजी सेना का तीसरा सेनापति हो गया। अंग्रेजी छावनी में हमला करने की जब योजनाएं बन रही थीं, दिल्ली के नागरिकों तब प्रत्यक्ष कृति कर रहे थे। स्थानाभाव के कारण उन सबका वर्णन यहां नहीं कर सकते। ऐसा होते हुए भी 9 जुलाई और फिर से 14 जुलाई के दिन जिस दृढ़ता से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 247

क्रांतिकारी लड़े और अंग्रेजों की तरह ही क्रांतिकारियों ने शूरता का कमाल दिखाया–वे अवसर महत्त्वपूर्ण और स्फूर्तिदायक होने से उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता। पहले दिन अंग्रेजी घुड़सवार को हराकर उन्हें भगा दिया गया। अंग्रेजी तोपखाना बंद कर दिया गया। एक शूर सिपाही ने हिल और उसके घोड़े दोनों को ही मार गिराया। हिल ने मरते–मरते अपनी तलवार निकाली, तभी तीन सिपाही उसपर झपट पड़े। हिल ने दो बार गोली दागने का असफल प्रयास किया। एक सिपाही अपनी तलवार निकालने में सफल हुआ। दोनों की लड़ाई हुई, दोनों नीचे गिरे। हिल भूमि पर सीधी गिरा और उसके सीने पर एक पैर रखकर हाथ में तलवार लिये एक सिपाही खड़ा था। मेजर टॉब्स ने तीस फीट दूर से यह दृश्य देखा और उसने निशाना साधकर सिपाही पर गोली चलाई और उसे मार डाला। मेजर टॉब्स ने हिल को भूमि पर से उठाया और वह उसे हिलाने लगा था। उसी समय दूसरा सिपाही हिल की पिस्तौल हाथ में लेकर उसपर हमला करने चला आ रहा है, यह देखकर वह आश्चर्यचकित हो गया। उस सिपाही ने दो–तीन अंग्रेजों से अकेले ही लड़ते हुए एक को तलवार से घायल कर दिया, दूसरे को मार डाला और तीसरे की तलवार से वह स्वयं ही बलि हो गया। टॉब्स और हिल को उनके द्वारा दिखाई गई शूरता के लिए 'विक्टोरिया क्रॉस' दिए गए और सर जॉन के कहता है कि उस बहादुर सिपाही को भी 'बहादुर शाह क्रॉस' मिलना चाहिए था। उस स्वतंत्रता संग्राम में शहीद हुए, हुतात्मा हुए कितने ही वीर 'बहादुर शाह चक्र प्रत्यक्ष मृत्यु देवता की ओर से मिलने का सौभाग्य उन्हें मिलता है, यह बात सत्य थी! उस दिन अंग्रेजी सिपाहियों का अपमान भरा पराभाव हुआ, पर इसका प्रतिशोध क्रांतिकारियों से ले न सकने के कारण वे शूर अंग्रेज अपनी छावनी में लौट गए और वह प्रतिशोध अपनी सेवा कर रहे निरपराध भिश्तियों और अन्य भारतीय लोगों को मार उनके टुकड़े–टुकड़े करके रक्त कुंड में डाल लिया। 113 सच में देखा जाए तो इन्हीं भिश्तियों और अन्य भारतीय लोगों ने अंग्रेजी सेना को उसकी उत्तम सेवा–चाकरी कर लड़ने की स्थिति में बनाए रखा था। पर 14 जुलाई के आक्रमण में इससे बुरी स्थिति हुई। क्योंकि इसी दिन शूर चेंबरलेन को एक सिपाही 1857 का स्वातंत्र्य समर – 248 113 “बताया जाता है कि सामने शत्रुओं के न होने पर कतिपय गोरे सिपाहियों ने उन निरीह, निरपराध कर्मचारियों और नौकरों तथा अन्य लोगों की ही हत्याएं कर डालीं, जो ईसाई श्मशान के समीप भयभीत होकर एकत्रित हो रहे थे। कितनी भी निष्ठा कोई प्रदर्शित करे, उसका जी भरकर ढिंढोरा पीटे, कष्ट उठाए, पूरब की मैली वरदी पहने प्रत्येक व्यक्ति से गोरे जो द्वेष रखते हैं, वह तो कदापि कम नहीं होगा।” –के एवं मैलसन कृत–‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 2, पृष्ठ 438

ने गोली चलाकर मार डाला। चेंबरलेन की मृत्यु के कारण हुई राष्ट्रीय हानि एवं दुःख का वर्णन अंग्रेज इतिहासकार इन शब्दों में करते हैं-"हमारे पक्ष का श्रेष्ठ योद्धा, कीर्ति से पहला और सम्मान में प्रथम! चेंबरलेन का शव जिस हमारे शिविर में फिर से लाया गया वह हमारे इतिहास का एक अति दुःखदायी दिन था।" इस तरह 15 जुलाई बीत गई, फिर भी दिल्ली के प्रासाद-शिखर अपने मस्तकों पर सूर्य किरण-से चमचमाते ध्वज, पताका, झंडियां खड़े कर विश्व को चिल्लाकर कह रहे थे कि दिल्ली शहर दे रही थी, इसलिए स्वयं रीड ने इस्तीफा दिया, अधिकार-त्याग किया और हिमालय की टेकरियों में जाकर वहां रहने लगा। अंग्रेजी सेना का यह तीसरा सेनापति था। दो को भूमि में गाड़ा गया और तीसरे ने अपना अधिकार छोड़कर अपने प्राण बचाए। इतना हुआ तब भी दिल्ली अजित ही बनी रही। क्वार्टर मास्टर जनरल बेचर एवं अॅडज्यूटंट जनरल चेंबरलेन अपने शिविर में ही पड़े मृत्यु के पल गिन रहे थे तब भी दिल्ली जीत न सके। इतना ही नहीं, क्रांतिकारियों की ओर से होनेवाले निरंतर और त्रासदायक हमलों से कैसे बचा जाए, यह प्रश्न अंग्रेजों को सता रहा था; क्योंकि क्रांतिकारियों की संख्या इस समय 20 हजार तक हो गई थी। क्रांतिकारियों द्वारा किए जानेवाले हर हमले में उनका काफी मनुष्य-बल खर्च हो जाता था, फिर भी उसका अंग्रेजों को कोई लाभ नहीं था। पर उनके मुट्ठी भर सैनिक मर जाने से अंग्रेजों का संख्या-बल घटता जा रहा था। इसलिए अंग्रेजों ने अब सुरक्षात्मक नीति अपनाई। आक्रमण में होनेवाली मृत्यु से क्रांतिकारियों की शक्ति विशेष दुर्बल नहीं होती थी और उनके आक्रमणों में भी बाधा नहीं आती थी, उलटे वे अधिक निश्चयी और निर्भय होकर अभिमानपूर्वक कहने लगे कि "अंग्रेजों की विजय का मूल्य पराभव जितना ही है।" सारे हिंदुस्थान में फैले हुए अंग्रेज भी टीका करने लगे, शिकायतें करने लगे और स्पष्टता से लिखने लगे- "घेरा डालनेवाले ही घेरे में फंस गए हैं।" और ऐसी स्थिति में जब तीसरा सेनापति निवृत्त हुआ तब ग्रेट हेड, चेंबरलेन और रॉटन जैसे रणवीरों को दिल्ली पर हमला करने की आशा छोड़ देनी पड़ी। प्रत्यक्ष मुख्यालय में, मुख्य छावनी में ही त्यागपत्र दिया और उसके स्थान पर चौथा सेनापति ब्रिगेडियर जनरल विल्सन आया, तब दिल्ली में अंग्रेजों की ऐसी करूणास्पद स्थिति हो गई थी। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 249

प्रकरण-2 हैवलॉक जब सिख सिपाहियों ने इलाहाबाद का किला क्रांतिकारियों को न सौंपकर अंग्रेजों को दे दिया, तभी से अंग्रेजों ने उसे अपनी कार्यवाही का मुख्य शिविर बनाया। उत्तर हिंदुस्थान की मुलुकी और लश्करी कार्यवाहियां कलकत्ता जैसे दूरस्थ केंद्र से करनी पड़ती थीं और उसमें धोखा था, जो इस नए केंद्र के कारण नहीं रहा। विद्रोह का शमन होने तक राजधानी इलाहाबाद में ही रखने का निर्णय लॉर्ड केनिंग ने किया और कुछ ही दिनों में वह स्वयं इलाहाबाद रहने के लिए चला आया। परंतु तभी कानपुर के अंग्रेजों की भागम-भाग के समाचार और उनके द्वारा सहायता के लिए मचाई गई चिल्लपों सुनाई देने लगी, इसलिए जनरल नील ने इलाहाबाद की सुरक्षा के लिए थोड़ी सी सेना रखकर शेष सारी सेना को मेजर रेनॉल्ड के नेतृत्व में कानपुर का घेरा तोड़ने के लिए भेज दिया। यह सेना रास्ते के गांवों में मन मरजी आग लगाते बढ़ी। उस समय कानपुर की अंग्रेजी सेना के सेनापति पद पर नील के स्थान पर हैवलॉक की नियुक्ति हुई। वह जून के अंत में इलाहाबाद आया। वह सैनिक कार्यवाहियों में पारंगत और अनुभवी अधिकारी था। अंग्रेजों के सौभाग्य से इधर विद्रोह के प्रत्यक्ष फूट पडत्रने के समय अंग्रेजों का ईरान से चल रहा युद्ध समाप्त हो गया और उस अभियान में लगी सारी यूरोपियन सेना हैवलॉक जैसे सेनानी सहित हिंदुस्थान में ऐन आपात स्थिति में आ पहुंची। हैवलॉक के इलाहाबाद में मुख्य अधिकारी होकर आ जाने से उसके अधीन काम करना पड़ेगा, यह देखकर नील के मन में यद्यपि बड़ा मत्सर जागा, फिर भी उसने सार्वजनिक कर्तव्य में 1857 का स्वातंत्र्य समर — 250

मत्सर या खेद के कारण कोई ढिलाई नहीं आने दी। हैवलॉक के साथ जानेवाली सेना की उसने स्वयं की सेना जैसी ही उत्तम व्यवस्था की। उसे दाने-चारे की सहायता की और हैवलॉक के आते ही अपना चार्ज उसको बिना किसी विवाद के सौंप दिया। इस सेना के कानपुर के अंग्रेजों की सहायता के लिए जाने की तैयारी होने पर हैवलॉक बड़े उत्साह से उधर जाने को था कि उसे समाचार मिला कि कानपुर में सर हो व्हीलर ने पराजित होकर विद्रोहियों के सामने समर्पण कर दिया और उसके सहित अंग्रेज पुरूषों का गंगा किनारे भयानक कत्ल हो गया। जीवित अवस्था में जिसे सुरक्षा प्रदान करना असंभव हुआ अब उसकी मृत्यु का निष्ठुर प्रतिशोध लेना ही होगा, ऐसी प्रबल इच्छा से हैवलॉक इलाहाबाद से कानपुर की ओर तेजी से निकला। उसके चुने हुए एक हजार यूरोपियन पैदल, सौ-डेढ़ सौ सिख, यूरोपियन घुड़सवारों की छोटी सी एक टुकड़ी और छह तोपें-इतनी सेना क्रोधित हो जान की बाजी लगाने निकली थी-नए अधिकारियों और सिपाहियों को उस प्रदेश की जानकारी देने के लिए, लड़ाई में स्वयं लड़ने के लिए और लड़ाई के बाद क्रूर प्रतिशोध लेने के लिए। विद्रोही सिपाहियों की रेजिमेंट में से या विद्रोही नागरिकों द्वारा दया भाव से जान-बूझकर जीवित छोड़े या लापरवाही से जीवित छूटे हुए कितने ही लश्करी और मुलुकी अधिकारी उस सेना के साथ चल रहे थे। जो अकेले-अकेले हाथ पड़ते तो एक शब्द के साथ ही विद्रोहियों द्वारा जला दिए जाते, वे ही अंग्रेज लोग आज फिर से इकट्ठे होते ही, उनके कारण गांव-के-गांव राख होने लगे। रीड के अधीन एक टुकड़ी फतेहपुर की ओर आ रही है, यह समाचार करनपुर पहुंचते ही नाना साहब ने विद्रोहियों में से बहुत सी सेना उधर भेज दी। ज्वाला प्रसाद, टीका सिंह और इलाहाबाद के मौलवी के नेतृत्व में रीड में मुट्ठी भर अंग्रेजों का पहले ही प्रहार में चित करके विजयश्री के साथ तुरंत ही कानपुर लौट आएंगे, इस उत्साह से निकली विद्रोहियों की सेना फतेहपुर के पास आ पहुंची। उसी समय अचानक रीड की टुकड़ी से हैवलॉक की सेना आ मिली। और इस सम्मिलित अंग्रेजी सेना ने विद्रोहियों की सेना आ गई-यह सुनते ही अपनी तोपों को बत्ती दी। यह लड़ाई 12 जुलाई को हुई। रीड की टुकड़ी को बात-की-बात में नष्ट कर देंगे, इस विश्वास से विद्रोहियों द्वारा अंग्रेजी सेना पर हमला करते ही मुट्ठी भर लोगों के स्थान पर तोपखाने के साथ सर्वांगपूर्ण हैवलॉक की गोरी सेना रणांगण में कूद आई। यह धोखा एकाएक सामने आ जाने से विद्रोहियों में दहशत बैठ गई और वे अपनी तोपें रणांगण में छोड़कर भागने लगे। उनका पीछा करना संभव न होने से उन्हें छोड़ अंग्रेजी सेना फतेहपुर शहर में घुस गई। इस फतेहपुर शहर ने जब विद्रोह किया था तब वहां की अगुवाई अंग्रेज सरकार के नौकर, डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर आसीन हिकमतुल्ला नामक एक मुसलमान ने की थी। और इस शहर में यूरोपियन अधिकारियों का रक्त भी विद्रोही नागरिकों की तलवारों ने पिया था। उस रक्तप्रिय शहर पर अब प्रतिशोध की तलवार आ पड़ी। विद्रोह होने पर लोगों 1857 का स्वातंत्र्य समर - 251