अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ७: वानरोंका प्रायोपवेशन और सम्पाति-से भेंट
| १८८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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| श्रुत्वा रघूत्तमवचोऽमृतसारकल्पं<br> गत्वा तदैव बदरीतरुखण्डजुष्टम् ।<br>तीर्थं तदा रघुपतिं मनसा स्मरन्ती<br> त्यक्त्वा कलेवरमवाप परं पदं सा ॥८४॥ | रघुनाथजीके ये अमृतके समान मधुर वचन सुनकर स्वयंप्रभा उसी समय पुण्यक्षेत्र बद्रिकाश्रमको चली गयी, जहाँ बहुत-से बेरीके वृक्ष लगे हुए हैं। वहाँ अपने अन्तःकरणमें श्रीरघुनाथजीका स्मरण करती हुई वह अन्तमें शरीर-पात होनेपर परमपदको प्राप्त हुई ॥८४॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥
सप्तम सर्ग
वानरोंका प्रायोपवेशन और सम्पातिसे भेंट।
| श्रीमहादेव उवाच | |
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| अथ तत्र समासीना वृक्षखण्डेषु वानराः ।<br>चिन्तयन्तो विमुह्यन्तः सीतामार्गणकर्शिताः ॥१॥ | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! इधर, सीताजीकी खोजसे थके हुए वानरगण उस गुहाके समीप सघन वृक्षोंवाले स्थानपर बैठकर (सीताको न पानेके कारण) मोहित होकर आपसमें सोचने लगे ॥ १ ॥ |
| तत्रोवाचाङ्गदः कांश्चिद्वानरान् वानरर्षभः ।<br>भ्रमतां गह्वरेऽस्माकं मासो नूनं गतोऽभवत् ॥२॥ | उस समय वानरश्रेष्ठ अंगदजीने कुछ वानरोंसे कहा—"मालूम होता है इस कन्दरामें घूमते-घूमते हमारा एक मास अवश्य पूरा हो गया ॥ २ ॥ |
| सीता नाधिगतास्माभिर्न कृतं राजशासनम् ।<br>यदि गच्छाम किष्किन्धां सुग्रीवोऽस्मान् हनिष्यति | परन्तु अभीतक हमें सीताजी नहीं मिलीं । हम वानरराज सुग्रीवकी आज्ञाका पालन नहीं कर सके । अब यदि हम किष्किन्धापुरीको लौट चलें तो वह हमें अवश्य मार डालेगा ॥ ३ ॥ |
| विशेषतः शत्रुसुतं मां मिषाच्चिहनिष्यति ।<br>मयि तस्य कुतः प्रीतिरहं रामेण रक्षितः ॥ ४ ॥ | विशेषतः, अपने शत्रुके पुत्र मुझे तो वह इस मिषसे अवश्य ही मार डालेगा । मुझमें उसका प्रेम कहाँ हो सकता है ? मेरी रक्षा तो श्रीरामचन्द्रजीने ही की है ॥ ४ ॥ |
| इदानीं रामकार्यं मे न कृतं तन्मिषं भवेत् ।<br>तस्य मद्हनने नूनं सुग्रीवस्य दुरात्मनः ॥ ५ ॥ | अब मुझसे श्रीरघुनाथजीका कार्य नहीं सधा; अतः मेरा वध करनेके लिये उस दुरात्मा सुग्रीवको निश्चय ही यह अच्छा बहाना मिल जायगा ॥ ५ ॥ |
| मातृकल्पां भ्रातृभार्यां पापात्मानुभवत्यसौ ।<br>न गच्छेयमतः पार्श्वं तस्य वानरपुङ्गवाः ॥ ६ ॥<br>त्यक्ष्यामि जीवितं चात्र येन केनापि मृत्युना । | वह पापात्मा अपने बड़े भाईकी पत्नीको, जो उसकी माताके समान है, भोगता है; अतः हे वानरश्रेष्ठो ! मैं अब उसके पास तो जाऊँगा नहीं ॥ ६ ॥ किसी-न-किसी उपायसे यहीं अपने जीवनका अन्त कर दूँगा ।” |
| इत्यश्रुनयनं केचिद्दृष्ट्वा वानरपुङ्गवाः ॥ ७ ॥<br>व्यथिताः साश्रुनयना युवराजमथाब्रुवन् ॥ ८ ॥ | इस प्रकार उन्हें नेत्रोंमें जल भरे देखकर कितने ही प्रमुख वानरोंको बड़ा खेद हुआ और उन्होंने आँखोंमें आँसू भरकर युवराजसे कहा—॥ ७-८ ॥ |
| किमर्थं तव शोकोऽत्र वयं ते प्राणरक्षकाः ।<br>भवामो निवसामोऽत्र गुहायां भयवर्जिताः ॥ ९ ॥ | “आप इतना शोक क्यों करते हैं, हम सब आपके प्राणोंकी रक्षा करेंगे और निर्भय होकर इस गुहामें ही रहेंगे ॥ ९ ॥ इसमें जो नगर है वह अमरावतीपुरीके |
सर्ग ७] किष्किन्धाकाण्ड १८९
| सर्वसौभाग्यसहितं पुरं देवपुरोपमम् ।<br>शनैः परस्परं वाक्यं वदतां मारुतात्मजः ॥१०॥<br><br>श्रुत्वाऽऽङ्गदं समालिङ्गय प्रोवाच नयकोविदः ।<br>विचार्यते किमर्थं ते दुर्विचारो न युज्यते ॥११॥<br><br>राज्ञोऽत्यन्तप्रियस्त्वं हि तारापुत्रोऽतिवल्लभः ।<br>रामस्य लक्ष्मणात्प्रीतिस्त्वयि नित्यं प्रवर्धते ॥१२॥<br><br>अतो न राघवाद्भीतिस्तव राज्ञो विशेषतः ।<br>अहं तव हिते सक्तो वत्स नान्यं विचारय ॥१३॥<br><br>गुहावासश्च निर्भेद्य इत्युक्तं वानरैस्तु यत् ।<br>तदेतद्रामवाणानामभेद्यं किं जगत्त्रये ॥१४॥<br><br>ये त्वां दुर्बोधयन्त्येते वानरा वानरर्षभ ।<br>पुत्रदारादिकं त्यक्त्वा कथं स्थास्यन्ति ते त्वया ॥१५॥<br><br>अन्यद्गुह्यतमं वक्ष्ये रहस्यं शृणु मे सुत ।<br>रामो न मानुषो देवः साक्षान्नारायणोऽव्ययः ॥१६॥<br><br>सीता भगवती माया जनसम्मोहकारिणी ।<br>लक्ष्मणो भुवनाधारः साक्षाच्छेषः फणीश्वरः ॥१७॥<br><br>ब्रह्मणा प्रार्थिताः सर्वे रक्षोगणविनाशने ।<br>मायामानुषभावेन जाता लोकैकरक्षकाः ॥१८॥<br><br>वयं च पार्षदाः सर्वे विष्णोर्वैकुण्ठवासिनः ।<br>मनुष्यभावमापन्ने स्वेच्छया परमात्मनि ॥१९॥<br><br>वयं वानररूपेण जातास्तस्यैव मायया ।<br>वयं तु तपसा पूर्वमाराध्य जगतां पतिम् ॥२०॥<br><br>तेनैवानुगृहीताः स्मः पार्षदत्वमुपागताः ।<br>इदानीमपि तस्यैव सेवां कृत्वैव मायया ॥२१॥<br><br>पुनर्वैकुण्ठमासाद्य सुखं स्थास्यामहे वयम् ।<br><br>इत्यङ्कदमथ आश्वास्य गता विन्ध्यं महाचलम् ॥२२॥ | समान समस्त सुख-सामग्रियोंसे सम्पन्न है।” इस प्रकार उनके आपसमें धीरे-धीरे कहे हुए ये शब्द नीतिनिपुण श्रीहनुमान्जीके कानोंमें पड़े तो उन्होंने अंगदजीको हृदयसे लगाकर कहा—“अंगद ! तुम ऐसी चिन्ता क्यों करते हो, तुम्हें किसी प्रकारकी दुर्भावना न करनी चाहिये। तुम ताराके अत्यन्त लाडिले लाल हो, अतः महाराज सुग्रीवको भी तुम बहुत प्रिय हो। और श्रीरामचन्द्रजी-की तो तुममें नित्यप्रति लक्ष्मणजीसे भी अधिकं प्रीति बढ़ती जाती है ॥ १०-१२॥ इसलिये तुम्हें श्रीरघुनाथजी या राजा सुग्रीवसे किसी प्रकारका खटका न होना चाहिये। और फिर मैं भी सब प्रकार तुम्हारा हित करनेमें तत्पर हूँ। अतः हे वत्स ! तुम किसी ऐसी-वैसी बातकी चिन्ता मत करो ॥ १३ ॥ और इन वानरोंने जो कहा कि 'गुहामें किसी प्रकारका खटका न होगा' सो त्रिलोकीमें ऐसी कौन-सी वस्तु है जो भगवान् रामके बाणोंके लिये अभेद्य हो ? ॥ १४ ॥ हे कपिश्रेष्ठ ! जो वानरगण तुम्हें यह बुरी सलाह दे रहे हैं वे भी अपनी स्त्री और बालकोंको छोड़कर तुम्हारे साथ कैसे रह सकेंगे ? ॥ १५ ॥<br><br>इसके सिवा, बेटा ! एक अत्यन्त गुप्त रहस्य और बताता हूँ, सावधान होकर सुनो—भगवान् राम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं वे साक्षात् निर्विकार नारायणदेव हैं ॥ १६ ॥ भगवती सीताजी जगन्मोहिनी माया हैं और लक्ष्मणजी त्रिभुवनाधार साक्षात् नागनाथ शेषजी हैं ॥ १७ ॥ ये सब ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे राक्षसोंका नाश करनेके लिये माया-मानवरूपसे उत्पन्न हुए हैं। इनमेंसे प्रत्येक त्रिलोकीकी रक्षा करनेमें समर्थ है ॥ १८॥ हम सब भी वैकुण्ठलोकमें रहनेवाले भगवान् विष्णुके पार्षद हैं। जब परमात्माने अपनी इच्छासे मनुष्यरूप धारण किया तो हम भी उन्हींकी माया-शक्तिसे वानररूपसे उत्पन्न हो गये। पूर्वकालमें हमने तपस्याद्वारा श्रीजगदीश्वरकी आराधना की थी; तब उन्हींकी कृपासे हम उनके पार्षद हुए थे। अब भी हम मायाकी प्रेरणासे उन्हींकी सेवा करते हुए अन्तमें फिर वैकुण्ठमें जाकर आनन्दपूर्वक ( उन्हींके साथ ) रहेंगे।”<br><br>इस प्रकार अंगदजीको ढाँढस बँधाकर वे सब |
| १९० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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विचिन्वन्तोऽथ शनकैर्जानकीं दक्षिणाम्बुधेः ।<br>तीरे महेन्द्राख्यगिरेः पवित्रं पादमाययुः ॥२३॥ | विन्ध्याचल पर्वतपर गये ॥ १९—२२ ॥ फिर धीरे-धीरे श्रीजानकीजीको खोजते हुए दक्षिण-समुद्रके तटपर महेन्द्रपर्वतकी पवित्र तराईमें पहुँचे ॥ २३ ॥ दृष्ट्वा समुद्रं दुष्पारमगाधं भयवर्धनम् ।<br>वानराः भयसन्त्रस्ताः किं कुर्म इति वादिनः ॥२४॥ | वहाँ पहुँचनेपर वे अपार, अगाध और भयको बढ़ानेवाले समुद्रको देखकर भयभीत हो गये और एक-दूसरेसे कहने लगे कि अब क्या करना चाहिये ? ॥२४॥ निषेधुरुदधेस्तीरे सर्वे चिन्तासमन्विताः ।<br>मन्त्रयामासुरन्योन्यमङ्गदाद्या महाबलाः ॥२५॥ | अंगद आदि समस्त महापराक्रमी वानर अति चिन्ता-ग्रस्त होकर समुद्रतटपर बैठ गये और आपसमें सलाह करने लगे—॥२५॥ भ्रमतो मे वने मासो गतोऽत्रैव गुहान्तरे ।<br>न दृष्टो रावणो वाऽद्य सीता वा जनकात्मजा ॥२६॥ | 'अहो ! वनमें घूमते-घूमते हमें एक मास तो उस गुहामें ही बीत गया । परन्तु रावण अथवा जनक-नन्दिनी सीताजीको हम अभीतक नहीं देख सके ॥ २६ ॥ सुग्रीवस्तीक्ष्णदण्डोऽस्मान्निहन्त्येव न संशयः ।<br>सुग्रीववधतोऽस्माकं श्रेयः प्रायोपवेशनम् ॥२७॥ | राजा सुग्रीव बड़ा दुर्दण्ड है, वह हमें निस्सन्देह मार डालेगा । सुग्रीवके हाथसे मरनेकी अपेक्षा तो प्रायोपवेशन ( अन्न-जल छोड़कर मर जाने) हीमें हमारा अधिक कल्याण है' ॥ २७ ॥ इति निश्चित्य तत्रैव दर्भानास्तीर्य सर्वतः ।<br>उपाविवेशुस्ते सर्वे मरणे कृतनिश्चयाः ॥२८॥ | ऐसा निर्णय करके वे सब जहाँ-तहाँ कुशा बिछाकर मरनेका निश्चय कर वहीं बैठ गये ॥ २८ ॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र महेन्द्राद्रिगुहान्तरात् ।<br>निर्गत्य शनकैरागाद्गृध्रः पर्वतसन्निभः ॥२९॥ | इसी समय महेन्द्रपर्वतकी कन्दरासे निकलकर वहाँ एक पर्वताकार गृध्र धीरे-धीरे चलकर आया ॥ २९ ॥ दृष्ट्वा प्रायोपवेशेन स्थितान्वानरपुङ्गवान् ।<br>उवाच शनकैर्गृध्रः प्राप्तो भक्ष्योऽद्य मे बहुः ॥३०॥ | उन बड़े-बड़े वानरोंको प्रायोपवेशनके लिये बैठे देख वह मन्द स्वरमें कहने लगा—"आज मुझे ( एक साथ ही ) बहुत-सा भक्ष्य प्राप्त हो गया ॥ ३० ॥ एकैकशः क्रमात्सर्वान् भक्ष्यामि दिनेदिने ।<br>श्रुत्वा तद्गृध्रवचनं वानरा भीतमानसाः ॥३१॥ | अब मैं इन सबको नित्यप्रति क्रमशः एक-एक करके खाऊँगा ।" भक्षयिष्यति नः सर्वानसौ गृध्रो न संशयः ।<br>रामकार्यं च नास्माभिः कृतं किञ्चिच्छरीश्वराः ॥३२॥ | गृध्रके ये वचन सुनकर वे समस्त वानर भयभीत होकर कहने लगे—॥ ३१ ॥ "अहो ! निस्सन्देह अब यह गृध्र हम सबको खा जायगा । हे वानरेश्वरगण ! हमसे न तो भगवान् रामका ही कुछ काम सधा और न सुग्रीवस्यापि च हितं न कृतं स्वात्मनामपि ।<br>वृथाऽनेन वधं प्राप्ता गच्छामो यमसादनम् ॥३३॥ | राजा सुग्रीवका या अपना ही कुछ हित हुआ; अब हम व्यर्थ इसके हाथसे मरकर यमलोकको जायेंगे ॥ ३२-३३ ॥ अहो जटायुर्धर्मात्मा रामस्यार्थे मृतः सुधीः ।<br>मोक्षं प्राप दुरावापं योगिनामप्यरिन्यमः ॥३४॥ | अहो ! धर्मात्मा जटायु धन्य है जिस बुद्धिमान्ने श्रीरामके कार्यमें अपने प्राण दे दिये । देखो, उस शत्रुदमनने वह मोक्षपद प्राप्त कर लिया जो योगियोंको भी दुर्लभ है" ॥ ३४ ॥ सम्पातिस्तु तदा वाक्यं श्रुत्वा वानरभाषितम् ।<br>के वा यूयं मम भ्रातुः कर्णपीयूषसन्निभम् ॥३५॥ | वानरोंके कहे हुए इस वाक्यको सुनकर सम्पाति बोला—"हे कपिश्रेष्ठगण ! आपलोग कौन हैं जो आपसमें, मेरे कानोंको अमृतके समान प्रिय लगने-
सर्ग ७ ] किष्किन्धाकाण्ड १९१
जटायुरिति नामाद्य व्याहरन्तः परस्परम् ।
उच्यतां वो भयं माभून्मत्तः प्लवगसत्तमाः ॥३६॥
तमुवाचाङ्गदः श्रीमानुत्थितो गृध्रसन्निधौ ।
रामो दाशरथिः श्रीमान् लक्ष्मणेन समन्वितः ॥३७॥
सीतया भार्यया सार्धं विचचार महावने ।
तस्य सीता हृता साध्वी रावणेन दुरात्मना ॥३८॥
मृगयां निर्गते रामे लक्ष्मणे च हृता बलात् ।
रामरामेति क्रोशन्ती श्रुत्वा गृध्रः प्रतापवान् ॥३९॥
जटायुर्नाम पक्षीन्द्रो युद्धं कृत्वा सुदारुणम् ।
रावणेन हतो वीरो राघवार्थे महाबलः ॥४०॥
रामेण दग्धो रामस्य सायुज्यमगमत्क्षणात् ।
रामः सुग्रीवमासाद्य सख्यं कृत्वाऽग्निसाक्षिकम् ४१
सुग्रीवचोदितो हत्वा वालिनं सुदुरासदम् ।
राज्यं ददौ वानराणां सुग्रीवाय महाबलः ॥४२॥
सुग्रीवः प्रेषयामास सीतायाः परिमार्गणे ।
अस्मान्यानरवृन्दान्यै महासत्त्वान्महाबलः ॥४३॥
मासादार्वाङ्निवर्तध्वं नोचेत्प्राणान्हरामि वः ।
इत्याज्ञया भ्रमन्तोऽस्मिन्वने गह्वरमध्यगाः ॥४४॥
गतो मासो न जानीमः सीतां वा रावणं च वा ।
मर्तुं प्रायोपविष्टाः स्मस्तीरे लवणवारिधेः ॥४५॥
यदि जानासि हे पक्षिन्सीतां कथय नः शुभाम् ।
अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा सम्पातिर्हृष्टमानसः ॥४६॥
उवाच मत्प्रियो भ्राता जटायुः प्लवगेश्वराः ।
बहुवर्षसहस्रान्ते भ्रातृवार्ता श्रुता मया ॥४७॥
वाक्साहाय्यं करिष्येऽहं भवतां प्लवगेश्वराः ।
वाला मेरे भाईका 'जटायु' नाम ले रहे हैं । आप मुझसे किसी प्रकारका भय न करके अपना वृत्तान्त कहिये ।" ॥ ३५-३६ ॥
तब श्रीमान् अंगदजी उठकर उस गृध्रके पास गये और बोले—"दशरथकुमार श्रीरामचन्द्रजी भाई लक्ष्मण और प्राणप्रिया सीताके सहित घोर दण्डकारण्यमें विचर रहे थे । वहाँ उनकी साध्वी भार्या सीताको दुरात्मा रावण हर ले गया ॥३७-३८॥ जिस समय राम और लक्ष्मण मृगयाके लिये गये हुए थे उसी समय वह बलात्कारसे उन्हें ले चला। उस समय वे 'हा राम ! हा राम !' कहकर रोने लगीं । उनका शब्द सुनकर महाप्रतापी पक्षिराज गृध्रवर जटायुने श्रीरघुनाथजीके लिये रावणसे घोर युद्ध किया, किन्तु अन्तमें वे महाबलवान् वीरवर रावणके हाथसे मारे गये ॥ ३९-४० ॥ फिर स्वयं श्रीरामचन्द्रजीने उनका दाह-संस्कार किया और उन्होंने तत्काल भगवान् राममें ( लीन होकर ) सायुज्यमोक्ष प्राप्त किया । तदनन्तर श्रीरघुनाथजी सुग्रीवके पास आये और अग्निको साक्षी बनाकर उनसे मित्रता की ॥ ४१ ॥ फिर सुग्रीवके कहनेसे महाबली रामजीने अति दुर्जय वालीको मारा और वानरोंका राज्य सुग्रीवको दिया ॥ ४२ ॥ महाबली सुग्रीवने हमारे-जैसे अनेकों महापराक्रमी वानरोंको सीताकी खोजके लिये भेजा है ॥ ४३ ॥ और यह कह दिया है कि 'सब लोग एक मासके भीतर ही लौट आना नहीं तो मैं तुम्हारे प्राण हर लूँगा ।' उनकी आज्ञासे इस वनमें घूमते हुए हम एक गुहामें चले गये ॥ ४४ ॥ वहाँ हमारा मास समाप्त हो गया, किन्तु अभीतक हमें न तो सीताका पता चला है और न रावणका । अतः अब हम प्रायोपवेशन करके मरनेके लिये इस क्षार (खारी) समुद्रके तटपर बैठे हैं ॥ ४५ ॥ हे पक्षिन् ! यदि तुम्हें शुभलक्षणा सीताका कुछ पता हो तो बतलाओ ।"
अंगदके ये वचन सुनकर सम्पाति चित्तमें प्रसन्न होकर बोला—"हे कपीश्वरो ! जटायु मेरा परम प्रिय भाई था । आज कई सहस्र वर्षोंके अनन्तर मैंने भाईका समाचार सुना है ॥ ४६-४७ ॥ हे वानरो ! मैं बातोंसे अवश्य आपलोगोंकी कुछ सहायता करूँगा । पहले भाईको जलाञ्जलि देनेके लिये मुझे जलके पास ले
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| भ्रातुः सलिलदानाय नयध्वं मां जलान्तिकम् ॥४८॥<br>पश्चात्सर्वं शुभं वक्ष्ये भवतां कार्यसिद्धये ।<br>तथेति निन्युस्ते तीरं समुद्रस्य विहङ्गमम् ॥४९॥<br>सोऽपि तत्सलिले स्नात्वा भ्रातुर्दत्त्वा जलाञ्जलिम् ।<br>पुनः स्वस्थानमासाद्य स्थितो नीतो हरीश्वरैः ।<br>सम्पातिः कथयामास वानरान्परिहर्षयन् ॥५०॥<br>लङ्कानाम नगर्य्यास्ते त्रिकूटगिरिमूर्धनि ।<br>तत्राशोकवने सीता राक्षसीभिः सुरक्षिता ॥५१॥<br>समुद्रमध्ये सा लङ्का शतयोजनदूरतः ।<br>दृश्यते मे न सन्देहः सीता च परिदृश्यते ॥५२॥<br>गृध्रत्वादूरदृष्टिर्मे नात्र संशयितुं क्षमम् ।<br>शतयोजनविस्तीर्णं समुद्रं यस्तु लङ्घयेत् ॥५३॥<br>स एव जानकीं दृष्ट्वा पुनरायास्यति ध्रुवम् ।<br>अहमेव दुरात्मानं रावणं हन्तुमुत्सहे ।<br>भ्रातुर्हन्तारमेकाकी किन्तु पक्षविवर्जितः ॥५४॥<br>यतध्वं मतियत्नेन लङ्घितुं सरितां पतिम् ।<br>ततो हन्ता रघुश्रेष्ठो रावणं राक्षसाधिपम् ॥५५॥<br>उल्लङ्घ्य सिन्धुं शतयोजनायतं<br>लङ्कां प्रविश्याथ विदेहकन्यकाम् ।<br>दृष्ट्वा समाभाष्य च वारिधिं पुन-<br>र्त्तर्तुं समर्थः कतमो विचार्यताम् ॥५६॥ | चलो ॥४८॥ फिर आपलोगोंकी कार्य-सिद्धिके लिये जो ठीक होगा वह सब बतलाऊँगा।"<br><br>तब 'बहुत अच्छा' कहकर वे सम्पातिको समुद्रतटपर ले गये ॥४९॥ वहाँ पहुँचकर उसने जलमें स्नान कर भाईको जलाञ्जलि दी। तदनन्तर वानरगण उसे उसके स्थानपर ले गये। वहाँ बैठकर सम्पाति (अपने वचनसे) वानरोंको आनन्दित करता हुआ बोला—॥५०॥ "त्रिकूट-पर्वतपर लंका नामकी एक नगरी है। वहाँ श्रीसीताजी अशोकवनमें राक्षसियोंकी देख-रेखमें रहती हैं ॥५१॥ वह लंकापुरी यहाँसे सौ योजनकी दूरीपर समुद्रके बीचमें है। इसमें सन्देह नहीं मुझे तो वह और सीताजी यहींसे दीख रही हैं ॥५२॥ आपलोग इसमें सन्देह न करें। गृध्र होनेके कारण मेरी दृष्टि बहुत दूरतक जाती है। आपमेंसे जो कोई सौ योजन समुद्रको लाँघ सकता हो वही निश्चय जानकीजीको देखकर आ सकता है। मेरे भाईको मारनेवाले इस दुरात्मा रावणको मारनेमें तो मैं अकेला ही समर्थ हूँ; परन्तु (करूँ क्या?) मेरे पंख नहीं रहे ॥५३-५४॥ आपलोग किसी-न-किसी तरह समुद्र लाँघनेका प्रयत्न कीजिये; फिर राक्षसराज रावणको तो श्रीरघुनाथजी स्वयं मार डालेंगे ॥५५॥ आपलोग, अब यह विचार करें कि आपमेंसे ऐसा शक्तिशाली कौन है जो सौ योजन विस्तारवाले समुद्रको लाँघकर लंकामें जाय और श्रीजानकीजीसे मिलकर तथा उनके साथ सम्भाषण कर फिर समुद्र पार करके लौट आवे" ॥५६॥ |
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥७॥
</div>किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ८: सम्पातीकी आत्मकथा
सर्ग ८ ] किष्किन्धाकाण्ड १९३
अष्टम सर्ग सम्पातिकी आत्मकथा।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहान्देवजी बोले—हे पार्वति ! यह सुनकर उन सब वानरोंने बड़े कुतूहल में भरकर सम्पातिसे पूछा—"भगवन् ! आप आरम्भसे ही अपना वृत्तान्त सुनाइये" ॥ १ ॥ तब सम्पातिने पहले जैसा-जैसा किया था वह सब वृत्तान्त सुनाते हुए कहा— पूर्वकालमें मैं और भाई जटायु जिस समय पूर्ण युवा थे बलके गर्वसे उन्मत्त होकर यह जाननेके लिये कि हममें कितना बल है, बड़े घमण्डसे आकाशमें सूर्यमण्डलपर्यन्त जानेको उड़े ॥ २-३ ॥ जब हम कई सहस्र योजन ऊँचे चले गये तो जटायु ( सूर्यके तेजसे ) जलने लगा। मैं उसकी रक्षाके लिये मोहवश उसे अपने पंखोंसे ढँककर चलने लगा और अन्तमें सूर्यकी किरणोंसे पंख जल जानेके कारण यहाँ विन्ध्याचलके शिखरपर गिर पड़ा और हे कपीश्वरो ! बहुत ऊँचेसे गिरनेके कारण मूर्च्छित हो गया ॥ ४-५ ॥ जब तीन दिन पश्चात् मुझे चेत हुआ तो पंख जल जानेसे मेरा चित्त भ्रममें पड़ गया और मैं यह कुछ भी न जान सका कि यह कौन-सा देश अथवा गिरिशिखर है ॥ ६ ॥ |
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| अथ ते कौतुकाविष्टाः सम्पातिं सर्ववानराः।<br>पप्रच्छुर्भगवन् ब्रूहि स्वमुदन्तं त्वमादितः॥ १ ॥ | |
| सम्पातिः कथयामास स्ववृत्तान्तं पुरा कृतम्।<br>अहं पुरा जटायुश्च भ्रातरौ रूढयौवनौ॥ २ ॥ | |
| बलेन दर्पितावावां बलजिज्ञासया खगौ।<br>सूर्यमण्डलपर्यन्तं गन्तुमुत्पतितौ मदात्॥ ३॥ | |
| बहुयोजनसाहस्रं गतौ तत्र प्रतापिताः।<br>जटायुस्तं परित्रातुं पक्षैराच्छाद्य मोहतः ॥ ४ ॥ | |
| स्थितोऽहं रश्मिभिर्दग्धपक्षोऽस्मिन्विन्ध्यमूर्धनि।<br>पतितो दूरपतनान्मूर्च्छितोऽहं कपीश्वराः॥ ५ ॥ | |
| दिनत्रयात्पुनः प्राणसहितो दग्धपक्षतः।<br>देशं वा गिरिकूटान्वा न जाने भ्रान्तमानसः॥ ६ ॥ | |
| शनैरून्मील्य नयने दृष्ट्वा तत्राश्रमं शुभम्।<br>शनैः शनैराश्रमस्य समीपं गतवानहम् ॥ ७ ॥ | फिर धीरे-धीरे नेत्र खोलनेपर मुझे वहाँ एक सुन्दर आश्रम दिखायी दिया। तब मैं शनैः-शनैः उस आश्रमके पास गया ॥ ७ ॥ वहाँ चन्द्रमा नामक मुनीश्वर रहते थे। उन्होंने मुझे देखकर विस्मयपूर्वक कहा—"सम्पाते ! यह क्या, तुम्हें आज इस प्रकार विरूप किसने कर दिया ? ॥ ८ ॥ मैं तुम्हें पहलेसे ही जानता हूँ; तुम तो बड़े बलवान् हो, फिर तुम्हारे पंख कैसे जल गये ? यदि तुम ठीक समझो तो अपना सब वृत्तान्त कहो" ॥ ९ ॥ |
| चन्द्रमा नाम मुनिराड् दृष्ट्वा मां विस्मितोऽवदत्।<br>सम्पाते किमिदं तेऽद्य विरूपं केन वा कृतम् ॥ ८ ॥ | |
| जानामि त्वामहं पूर्वमत्यन्तं बलवानसि।<br>दग्धौ किमर्थं ते पक्षौ कथयतां यदि मन्यसे ॥ ९ ॥ | |
| ततः स्वचेष्टितं सर्वं कथयित्वातिदुःखितः।<br>अब्रवं मुनिशार्दूलं दग्धोऽहं दाववह्निना ॥१०॥ | तब मैंने उन मुनिश्रेष्ठको अपनी सब करतूत सुनायी और फिर अति दुःखित होकर उनसे कहा—"अब मैं दावाग्निमें जल मरूँगा ॥ १० ॥ क्योंकि हे प्रभो ! बिना पंखोंके मैं किस प्रकार जीवन धारणकर सकता हूँ ?" |
| कथं धारयितुं शक्तो विपक्षो जीवितं प्रभो। | |
| इत्युक्तोऽथ मुनिर्वीक्ष्य मां दयार्द्रविलोचनः॥११॥ | मेरे इस प्रकार कहनेपर मुनिवर दयावश नेत्रोंमें |
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| १९४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ८ |
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शृणु वत्स वचो मेऽद्य श्रुत्वा कुरु यथेप्सितम् ।<br>देहमूलमिदं दुःखं देहः कर्मसमुद्भवः ॥१२॥ | जल भरकर मेरी ओर देखते हुए बोले—॥ ११ ॥<br>“वत्स ! अब तुम मेरी बात सुनो । उसे सुनकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा करना । इस दुःखका आश्रय देह ही है और देह कर्मजन्य है ॥ १२ ॥ कर्म प्रवर्तते देहेऽहंबुद्ध्या पुरुषस्य हि ।<br>अहङ्कारस्त्वनादिः स्यादाविद्यासम्भवो जडः॥१३॥ | पुरुष जब देहमें अहं-बुद्धि करता है तभी कर्मकी प्रवृत्ति होती है; और यह अविद्या-जनित जड अहंकार अनादि है ॥ १३ ॥ चिच्छायाया सदा युक्तस्तप्तायःपिण्डवत्सदा ।<br>तेन देहस्य तादात्म्याद्देहश्चेतनवान्भवेत् ॥१४॥ | ( अग्निसे व्याप्त ) तप्त लोहपिण्डके समान यह अहंकार सर्वदा चिदाभाससे व्याप्त है । उस चिदाभासविशिष्ट अहंकारका देहसे तादात्म्य (ऐक्य) होनेके कारण देह चेतनायुक्त होता है ॥ १४ ॥ देहोऽहमिति बुद्धिः स्यादात्मनोऽहङ्कृतेर्बलात् ।<br>तन्मूल एष संसारः सुखदुःखादिसाधकः ॥१५॥ | अहंकारके कारण ही आत्माको ‘मैं देह हूँ’ यह बुद्धि होती है और उसके कारण यह सुख-दुःखादिका देनेवाला जन्म-मरणरूप संसार प्राप्त होता है ॥ १५ ॥ आत्मनो निर्विकारस्य मिथ्या तादात्म्यतः सदा ।<br>देहोऽहं कर्मकर्ताहमिति सङ्कल्प्य सर्वदा ॥१६॥<br>जीवः करोति कर्माणि तत्फलैर्बद्ध्यतेऽवशः ।<br>ऊर्ध्वाधो भ्रमते नित्यं पापपुण्यात्मकः स्वयम् ॥१७॥ | निर्विकार आत्माके साथ देहके इस मिथ्या तादात्म्यसे ही जीव सर्वदा यह संकल्प करके कि ‘मैं देह हूँ और कर्मोंका करनेवाला हूँ’ नाना प्रकारके कर्म करता है तथा विवश होकर उनके फलोंसे बँधता है । और इस प्रकार पाप-पुण्यके वशीभूत होकर सदा ऊँची-नीची योनियोंमें भ्रमता रहता है ॥ १६-१७ ॥ कृतं मयाऽधिकं पुण्यं यज्ञदानादि निश्चितम् ।<br>स्वर्गं गत्वा सुखं भोक्ष्य इति सङ्कल्पवान्भवेत्॥१८॥ | वह ऐसे संकल्प करने लगता है कि मैंने यज्ञ, दान आदि बहुत-से पुण्य-कर्म किये हैं अतः मैं निश्चय ही स्वर्गमें जाकर सुख भोगूँगा ॥ १८ ॥ तथैवाध्यासतस्तत्र चिरं भुक्त्वा सुखं महत् ।<br>क्षीणपुण्यः पतत्यर्वागनिच्छन्कर्मचोदितः ॥१९॥ | ऐसे अध्याससे वह वहाँ ( जाकर ) चिरकालतक महान् सुख भोगता है और अन्तमें पुण्यक्षय हो जानेपर प्रारब्धकी प्रेरणासे, इच्छा न रहते हुए भी, नीचे गिरता है ॥ १९ ॥ पतित्वा मण्डले चेन्दोस्ततो नीहारसंयुतः ।<br>भूमौ पतित्वा व्रीह्यादौ तत्र स्थित्वा चिरं पुनः॥२०॥ | “पहले वह चन्द्रमण्डलपर गिरता है । वहाँसे (चन्द्र-रश्मियोंके द्वारा) कुहरेके रूपमें पृथ्वीपर आकर बहुत दिनोंतक व्रीहि आदि धान्योंमें रहता है ॥२०॥ भूत्वा चतुर्विधं भोज्यं पुरुषैर्भुज्यते ततः ।<br>रेतो भूत्वा पुनस्तेन ऋतौ स्त्रीयोनिसिञ्चितः॥२१॥ | फिर वह (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य और चोष्य) चार प्रकारके अन्न रूपसे पुरुषोंद्वारा खाया जाता है और वीर्यरूपमें परिणत हो जाता है तदनन्तर वह उसके द्वारा ऋतुकालमें स्त्रीकी योनिमें डाला जाता है ॥ २१ ॥ योनिरक्तेन संयुक्तं जरायुपरिवेष्टितम् ।<br>दिनेनैकेन कललं भूत्वा रूढत्वमाप्नुयात् ॥२२॥ | योनिमें स्थित रजसे मिलकर वह एक दिनमें ही झिल्लीसे लिपटे हुए कललके रूपमें परिणत होकर कुछ कठिन-सा हो जाता है ॥ २२ ॥ तत्पुनः पञ्चरात्रेण बुद्बुदाकारतामियात् ।<br>सप्तरात्रेण तदपि मांसपेशित्वमाप्नुयात् ॥२३॥ | फिर पाँच रात्रिमें वह बुद्बुदाकार हो जाता है और सात रात्रि बीतनेपर मांसपेशीके समान ( अण्डाकार ) हो जाता है ॥ २३ ॥ पन्द्रह दिनके
सर्ग ८ ] किष्किन्धाकाण्ड १९५
पक्षमात्रेण सा पेशी रुधिरेण परिप्लुता ।
तस्या एवाङ्कुरोत्पत्तिः पञ्चविंशतिरात्रिषु ॥२४॥
भीतर उस पेशीमें रुधिर भर जाता है और पच्चीस रात्रिके पश्चात् उसमें अंकुर उत्पन्न होने लगते हैं ॥ २४ ॥
ग्रीवा शिरश्च स्कन्धश्च पृष्ठवंशस्तथोदरम् ।
पञ्चधाङ्गानि चैकैकं जायन्ते मासतः क्रमात् ॥२५॥
एक मास हो जानेपर उसमें एक-एक करके क्रमशः ग्रीवा, शिर, कन्धे, रीढ़की हड्डी और पेट ये पाँच अङ्ग उत्पन्न हो जाते हैं ॥ २५ ॥
पाणिपादौ तथा पार्श्वः कटिर्जङ्घे तथैव च ।
मासद्वयात्प्रजायन्ते क्रमेणैव न चान्यथा ॥२६॥
फिर दो महीनेमें क्रमशः हाथ, पाँव, पसलियाँ, कमर और घुटने बन जाते हैं। इस क्रममें कभी भेद नहीं पड़ता ॥ २६ ॥
त्रिभिर्मासैः प्रजायन्ते अङ्गानां सन्धयः क्रमात् ।
सर्वाङ्गुल्यः प्रजायन्ते क्रमान्मासचतुष्टये ॥२७॥
इसी क्रमसे तीन महीनेमें उसमें अङ्गोंकी सन्धियाँ तथा चार महीनेमें समस्त अङ्गुलियाँ उत्पन्न हो जाती हैं ॥ २७ ॥
नासा कर्णौ च नेत्रे च जायन्ते पञ्चमासतः ।
दन्तपङ्क्तिर्नखा गुह्यं पञ्चमे जायते तथा ॥२८॥
पाँच मास होनेपर नाक, कान और नेत्र बनते हैं तथा पाँचवें मासमें ही दन्तावली, नख और गुह्य स्थान भी उत्पन्न होते हैं ॥ २८ ॥
अर्वाक्पण्मासतश्छिद्रं कर्णयोर्भवति स्फुटम् ।
पायुर्मेढ्रमुपस्थं च नाभिश्चापि भवेन्नृणाम् ॥२९॥
छठे मासके आरम्भमें ही कानोंके छिद्र स्पष्ट हो जाते हैं तथा इसी समय गुदा, स्त्री-पुरुषके भेदसे योनि अथवा लिंग तथा नाभि उत्पन्न होते हैं ॥ २९ ॥
सप्तमे मासि रोमाणि शिरः केशास्तथैव च ।
विभक्तावयवत्वं च सर्वं सम्पद्यतेऽष्टमे ॥३०॥
सातवें महीनेमें रोम और शिरके केश प्रकट होते हैं तथा आठवें महीनेमें सब अङ्गोपांग अलग-अलग स्पष्ट हो जाते हैं ॥ ३० ॥
जठरे वर्धते गर्भः स्त्रिया एवं विहङ्गम ।
पञ्चमे मासि चैतन्यं जीवः प्राप्नोति सर्वशः ॥३१॥
"हे पक्षिन् ! इस प्रकार स्त्रीके गर्भाशयमें गर्भ बढ़ता है। जिस समय पाँचवाँ महीना होता है उसी समय जीवको चेतना-शक्ति प्राप्त हो जाती है ॥ ३१ ॥
नाभिद्युन्नालपरन्ध्रेण मातृभुक्तान्नसारतः ।
वर्धते गर्भंगः पिण्डो न म्रियेत स्वकर्मतः ॥३२॥
गर्भस्थित पिण्ड अपनी नाभिमें लगे हुए नालके सूक्ष्म छिद्रसे प्राप्त माताके खाये हुए अन्नके रससे बढ़ता है और अपने कर्म-वश मरता नहीं है ॥ ३२ ॥
स्मृत्वा सर्वाणि जन्मानि पूर्वकर्माणि सर्वशः ।
जठरानलतप्तोऽयमिदं वचनमब्रवीत् ॥३३॥
उस समय अपने सम्पूर्ण पूर्व-जन्मोंका और कर्मोंका स्मरण करके जठरानलसे सन्तप्त हुआ यह जीव इस प्रकार कहता है—॥ ३३ ॥
नानायोनिसहस्रेषु जायमानोऽनुभूतवान् ।
पुत्रदारादिसम्बन्धं कोटिशः पशुबान्धवान् ॥३४॥
"पहले कई सहस्र योनियोंमें उत्पन्न होकर मैंने करोड़ों बन्धु-बान्धव, पशुवर्ग और स्त्री-पुत्रादिके सम्बन्धका अनुभव किया है ॥ ३४ ॥
कुटुम्बभरणासक्त्या न्यायान्यायैरथार्जनम् ।
कृतं नाकरवं विष्णुचिन्तां स्वप्नेऽपि दुर्भगः ॥३५॥
मुझ अभागेने उस समय स्वप्नमें भी भगवान् विष्णुका स्मरण नहीं किया; बस, अपने कुटुम्बके भरण-पोषणमें आसक्त होकर न्याय अथवा अन्यायसे धन कमानेमें ही लगा रहा ॥ ३५ ॥
इदानीं तत्फलं भुङ्गे गर्भदुःखं महत्तरम् ।
अशाश्वते शाश्वतवद्देहे तृष्णासमन्वितः ॥३६॥
अब उसका फलरूप यह अति महान् गर्भ-दुःख भोग रहा हूँ और इस नश्वर देहको नित्य-सा समझकर इसकी तृष्णामें फँसा हुआ हूँ ॥ ३६ ॥
अकार्याण्येव कृतवान्न कृतं हितमात्मनः ।
इत्येवं बहुधा दुःखमनुभूय स्वकर्मतः ॥३७॥
मैं सदा अकार्य कर्म ही करता रहा, कभी अपना हित-साधन नहीं किया। अतः अपने कर्मानुसार मैं इसी प्रकार बहुत-से दुःख भोगता रहा ॥ ३७ ॥ अब
| १९६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ८ |
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कदा निष्क्रमणं मे स्याद्गर्भान्नरकसन्निभात् ।<br> इत ऊर्ध्वं नित्यमहं विष्णुमेवानुपूजये ॥३८॥
इत्यादि चिन्तयन् जीवो योनियन्त्रप्रपीडितः ।<br> जायमानोऽतिदुःखेन नरकात्पातकी यथा ॥३९॥
पूतिव्रणान्निपतितः कृमिरेष इवापरः ।<br> ततो बाल्यादिदुःखानि सर्व एवं विभुङ्क्ते ॥४०॥
त्वया चैवानुभूतानि सर्वत्र विदितानि च ।<br> न वर्णितानि मे गृध्र यौवनादिषु सर्वतः ॥४१॥
एवं देहोऽहमित्यस्मादभ्यासान्निरयादिकम् ।<br> गर्भवासादिदुःखानि भवन्त्यभिनिवेशतः ॥४२॥
तस्माद्देहद्वयादन्यमात्मानं प्रकृतेः परम् ।<br> ज्ञात्वा देहादिममतां त्यक्त्वात्मज्ञानवान् भवेत् ४३
जाग्रदादिविनिर्मुक्तं सत्यज्ञानादिलक्षणम् ।<br> शुद्धं बुद्धं सदा शान्तमात्मानमवधारयेत् ॥४४॥
चेदात्मनि परिज्ञाते नष्टे मोहेऽज्ञसम्भवे ।<br> देहः पततु वाऽऽरब्धकर्मवेगेन तिष्ठतु ॥४५॥
योगिनो नहि दुःखं वा सुखं वाऽज्ञानसम्भवम् ।
तस्माद्देहेन सहितो यावत्प्रारब्धसङ्क्षयः ॥४६॥
तावत्तिष्ठ सुखेन त्वं धृतकञ्चुकसर्पवत् ।<br> अन्यद्वक्ष्यामि ते पक्षिन् शृणु मे परमं हितम्॥४७॥
त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा नारायणोऽव्ययः ।<br> रावणस्य वधार्थाय दण्डकानागमिष्यति ॥४८॥
सीतया भार्यया सार्धं लक्ष्मणेन समन्वितः ।<br> तत्राश्रमे जनकजां भ्रातृभ्यां रहिते वने ॥४९॥
रावणश्चोरवन्नीत्वा लङ्कायां स्थापयिष्यति ।<br> तस्याः सुग्रीवनिर्देशाद्वानराः परिमार्गणे ॥५०॥
हिन्दी अनुवाद
"न जाने इस नरकतुल्य गर्भसे मैं कब निकलूँगा । फिर तो मैं सर्वदा श्रीविष्णुभगवान्की ही उपासना करूँगा" ॥ ३८ ॥ ऐसा ही चिन्ता करते-करते वह जीव योनियन्त्रसे पीड़ित होता हुआ अति कष्टसे जन्म लेता है, जैसे कोई पापी जीव नरकसे निकलता हो ॥ ३९ ॥ उस समय यह दुर्गन्धित व्रण (घाव) से गिरे हुए एक कीड़ेके समान होता है। फिर इसे बाल्यादि अवस्थाओंके क्लेश भोगने पड़ते हैं। इस प्रकार सभी देहधारियोंको ये कष्ट उठाने पड़ते हैं ॥४०॥
"हे गृध्र ! इसके पीछे होनेवाले युवावस्था आदिके सब दुःख तूने भी स्वयं देखे ही हैं और भी सब इन्हें जानते ही हैं, इसलिये मैंने इनका वर्णन नहीं किया ॥ ४१ ॥ इस प्रकार 'मैं देह हूँ' इस अभ्याससे उत्पन्न हुए देहाभिमानके कारण जीवको नरक और गर्भवास आदि अनेक दुःख उठाने पड़ते हैं ॥ ४२ ॥ अतः मनुष्यको चाहिये कि अपने आत्माको प्रकृतिसे अतीत तथा स्थूल-सूक्ष्म दोनों प्रकारके शरीरोंसे पृथक् जानकर देहादिकी ममता छोड़कर आत्मज्ञानसम्पन्न हो ॥ ४३ ॥ आत्माको सर्वदा जाग्रत् आदि अवस्थाओं- से रहित, सत्-चित्स्वरूप तथा शुद्ध, बुद्ध और शान्त-रूप जाने ॥ ४४ ॥ चेतनस्वरूप आत्माका ज्ञान हो जानेपर जब अज्ञानजनित मोह नष्ट हो जाता है तो फिर यह देह प्रारब्ध-कर्मके वेगसे रहे अथवा जाय योगीको किसी प्रकारका अज्ञान-जन्य सुख-दुःख नहीं होता ।
"अतः जबतक तेरा प्रारब्ध क्षय न हो तबतक काँचुलीसहित सर्पके समान आनन्दपूर्वक देह धारण करके रह । इसके अतिरिक्त हे पक्षिन् ! तेरे परम हितकी एक बात और बतलाता हूँ, सुन ॥ ४५--४७ ॥ त्रेतायुगमें अविनाशी नारायणदेव महाराज दशरथके यहाँ अवतार लेकर रावणका वध करनेके लिये अपनी भार्या सीता और भाई लक्ष्मणके सहित दण्डकारण्यमें आयेंगे ॥ ४८ ॥ वहाँ दोनों भाइयोंके तपोवनसे चले जानेपर रावण श्रीजानकीजी- को सूने आश्रमसे चोरके समान ले जाकर लंकामें रखेगा । तदनन्तर वानरराज सुग्रीवकी आज्ञासे उन्हें खोजते हुए कुछ वानरगण समुद्रतटपर आयेंगे, वहाँ
किष्किन्धाकाण्ड - सर्ग ९: समुद्रोलङ्घनकी मन्त्रणा
| सर्ग ९ ] | किष्किन्धाकाण्ड | १९७ |
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आगमिष्यन्ति जलधेस्तीरं तत्र समागमः।
त्वया तैः कारणवशाद्भविष्यति न संशयः ॥५१॥
तदा सीतास्थितिं तेभ्यः कथयस्व यथार्थतः।
तदैव तव पक्षौ द्वावुत्पत्स्येते पुनर्नवौ ॥५२॥
सम्पातिरुवाच
बोधयामास मां चन्द्रनामा मुनिकुलेश्वरः।
पश्यन्तु पक्षौ मे जातौ नूतनावतिकोमलौ ॥५३॥
स्वस्ति वोऽस्तु गमिष्यामि सीतान्द्रक्ष्यथ निश्चयम्।
यत्नं कुरुध्वं दुर्लङ्घ्यसमुद्रस्य विलङ्घने ॥५४॥
यन्नामस्मृतिमात्रतोऽपरिमितं संसारवारान्निधिं
तीर्त्वा गच्छति दुर्जनोऽपि परमं विष्णोः पदं शाश्वतम्।
तस्यैव स्थितिकारिणस्त्रिजगतां रामस्य भक्ताः प्रिया
यूयं किं न समुद्रमात्रतरणे शक्ताः कथं वानराः ॥५५॥
किसी कारण-विशेषसे तेरे साथ उनका समागम होगा—इसमें सन्देह नहीं ॥४९-५१॥ तब तू उन्हें सीताजीका ठीक-ठीक पता बतला देना। बस, उसी समय तेरे फिर नये पंख उत्पन्न हो जायेंगे” ॥५२॥
सम्पाति बोला—हे वानरेश्वरगण ! इस प्रकार मुझे चन्द्र नामक मुनीश्वरने समझाया। (इससे मैं शान्त होकर इस समयकी प्रतीक्षामें रहने लगा।) देखिये, अब मेरे यह अति कोमल नवीन पंख निकल आये हैं ॥५३॥ आपलोगोंका कल्याण हो, अब मैं जाना चाहता हूँ। इसमें सन्देह नहीं आपलोग सीताजीको अवश्य देखेंगे। केवल इस दुर्लङ्घ्य समुद्रके लाँघनेका प्रयत्न कीजिये ॥५४॥ हे वानरगण ! जिनके नामके स्मरणमात्रसे बड़े दुष्टजन भी इस अपार संसार-सागरको पार करके भगवान् विष्णुके सनातन परमपदको प्राप्त कर लेते हैं, आपलोग तो, त्रिलोकीकी स्थिति करनेवाले उन्हीं भगवान् रामके प्रिय भक्तगण हैं। फिर इस क्षुद्र समुद्रमात्रको पार करनेमें आप क्यों समर्थ न होंगे ? ॥५५॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
किष्किन्धाकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥८॥
नवम सर्ग
समुद्रोल्लङ्घनकी मन्त्रणा।
श्रीमहादेव उवाच
गते विहायसा गृध्रराजे वानरपुङ्गवाः।
हर्षेण महताऽऽविष्टाः सीतादर्शनलालसाः ॥१॥
ऊचुः समुद्रं पश्यन्तो नक्रचक्रभयङ्करम्।
तरङ्गादिभिरुन्नद्धमाकाशमिव दुर्ग्रहम् ॥२॥
परस्परमवोचंस्ते कथमेनं तरामहे।
उवाच चाङ्गदस्तत्र शृणुध्वं वानरोत्तमाः ॥३॥
भवन्तोऽत्यन्तबलिनः शूराश्च कृतविक्रमाः।
श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! गृध्रराज सम्पातिके आकाश-मार्गसे चले जानेपर सीताजीके दर्शनोंके लिये अति उत्कण्ठित वानरगण (उनका पता लग जानेके कारण) अत्यन्त हर्षित हुए ॥१॥ किन्तु जब उन्होंने नाकों और भँवर आदिके कारण अत्यन्त भयङ्कर, उत्ताल तरङ्गोंसे उछलते हुए तथा आकाशके समान दुर्लङ्घ्य समुद्रकी ओर देखा तो वे आपसमें कहने लगे कि हम इसे किस प्रकार पार कर सकेंगे। तब अंगदजीने कहा—"हे वानरश्रेष्ठगण ! सुनिये—॥२-३॥ आपलोग सभी अत्यन्त बलवान्, शूरवीर और पराक्रमी हैं। अतः आपमेंसे ऐसा कौन है जो समुद्र लाँघकर
| १९८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९ |
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को वाऽत्र वारिधिं तीर्त्वा राजकार्यं करिष्यति ॥४॥
एतेषां वानराणां स प्राणदाता न संशयः ।
तदुत्तिष्ठतु मे शीघ्रं पुरतो यो महाबलः ॥५॥
वानराणां च सर्वेषां रामसुग्रीवयोरपि ।
स एव पालको भूयान्नात्र कार्या विचारणा ॥६॥
इत्युक्ते युवराजेन तूष्णीं वानरसैनिकाः ।
आसन्नोचुः किञ्चिदपि परस्परविलोकिनः ॥७॥
अङ्गद उवाच
उच्यतां वै बलं सर्वैः प्रत्येकं कार्यसिद्धये ।
केन वा साध्यते कार्यं जानीमस्तदनन्तरम् ॥८॥
अङ्गदस्य वचः श्रुत्वा प्रोचुर्वीरा बलं पृथक् ।
योजनानां दशारभ्य दशोत्तरगुणं जगुः ॥९॥
शतादर्वाग्जाम्बवांस्तु प्राह मध्ये वनौकसाम् ।
पुरा त्रिविक्रमे देवे पादं भूमानलक्षणम् ॥१०॥
त्रिःसप्तकृत्वोऽहमगां प्रदक्षिणविधानतः ।
इदानीं वार्धकग्रस्तो न शक्नोमि विलङ्घितुम् ॥११॥
अङ्गदोऽप्याह मे गन्तुं शक्यं पारं महोदधेः ।
पुनर्लङ्घनसामर्थ्यं न जानाम्यस्ति वा न वा ॥१२॥
तमाह जाम्बवान्वीरस्त्वं राजा नो नियामकः ।
न युक्तं त्वां नियोक्तुं मे त्वं समर्थोऽसि यद्यपि ॥१३॥
अङ्गद उवाच
एवं चेत्पूर्ववत्सर्वे स्वप्स्यामो दर्भविष्टरे ।
केनापि न कृतं कार्यं जीवितुं च न शक्यते ॥१४॥
तमाह जाम्बवान्वीरो दर्शयिष्यामि ते सुत ।
येनासाकं कार्यसिद्धिर्भविष्यत्यचिरेण च ॥१५॥
| राजकार्य सम्पन्न करे ॥४॥ वह निःसन्देह इन समस्त वानरोंको प्राण-दान करनेवाला होगा । अतः जो महाबलवान् वीर ऐसा हो वह शीघ्र ही मेरे सामने आवे ॥५॥ इसमें कोई सन्देह नहीं, वही सम्पूर्ण वानरोंकी, सुग्रीवकी और स्वयं भगवान् रामकी भी रक्षा करनेवाला होगा" ॥६॥
<br>युवराज अंगदके इस प्रकार कहनेपर समस्त वानर-सेनापति चुपचाप बैठे रहे, किसीके मुखसे एक शब्द भी न निकला, परस्पर एक-दूसरेका मुख ताकते रह गये ॥७॥
<br>अंगद बोले—अच्छा, इस कार्यको सिद्ध करनेके लिये सब लोग अपनी शक्तिका वर्णन करो। तब इस बातका पता चल जायगा कि इसे कौन साध सकेगा ॥८॥
<br>अंगदजीकी यह बात सुनकर सब वानर-वीर पृथक्-पृथक् अपना बल बतलाने लगे । उनमेंसे एक-एकने दश योजनसे लेकर क्रमशः दश-दश योजन अधिक जानेतककी अपनी सामर्थ्य बतायी ॥९॥ अन्तमें, उन सब वनचरोंमेंसे जाम्बवान्ने अपनी शक्ति सौ योजनके भीतरतक जानेकी बतायी। वे बोले—"पूर्वकालमें जब भगवान्ने त्रिविक्रम अवतार लिया था तो मैं, उनके पृथिवीके बराबर परिमाणवाले चरणके चारों ओर परिक्रमा करनेके लिये, इक्कीस बार फिरा था। किन्तु अब मुझे वृद्धावस्थाने दबा लिया है इसलिये मैं समुद्रको नहीं लाँघ सकता" ॥१०-११॥
<br>अंगदजीने भी कहा—"मैं इस महासागरके पार तो जा सकता हूँ, किन्तु फिर लौटनेकी सामर्थ्य है या नहीं यह नहीं जानता" ॥१२॥ तब वीरवर जाम्बवान्ने उनसे कहा—"अंगदजी ! इस कार्यके करनेमें यद्यपि आप सर्वथा समर्थ हैं तथापि आपको इस कार्यमें नियुक्त करना हमें ठीक नहीं जँचता, क्योंकि आप हमारे नायक और नियामक हैं" ॥१३॥
<br>अंगद बोले—"यदि ऐसी बात है, तो हम सबको (प्रायोपवेशनका संकल्प करके) फिर पूर्ववत् कुशासनों पर ही पड़ रहना चाहिये; क्योंकि यह काम तो किसीसे हुआ नहीं, फिर जीवन भी कैसे रह सकता है ?"॥१४॥
<br>तब वीरवर जाम्बवान्ने कहा—"बेटा ! जिसके हाथसे हमारा यह कार्य बहुत शीघ्र ही सिद्ध होगा उस वीरको मैं तुझे दिखलाता हूँ" ॥१५॥
| सर्ग ९ ] | किष्किन्धाकाण्ड | १९९ | | :--- | :--- |
| इत्युक्त्वा जाम्बवान्प्राह हनूमन्तमवस्थितम्।<br>हनूमन्किं रहस्तूष्णीं स्थीयते कार्यगौरवे ॥१६॥<br>प्राप्तेऽज्ञेनेव सांमर्थ्यं दर्शयाद्य महाबल।<br>त्वं साक्षाद्वायुतनयो वायुतुल्यपराक्रमः ॥१७॥<br>रामकार्यार्थमेव त्वं जनितोऽसि महात्मना।<br>जातमात्रेण ते पूर्वं दृष्ट्वोद्यन्तं विभावसुम् ॥१८॥<br>पक्वं फलं जिघृक्षामीत्युत्प्लुतं बालचेष्टया।<br>योजनानां पञ्चशतं पतितोऽसि ततो भुवि ॥१९॥<br>अतस्त्वद्बलमाहात्म्यं को वा शक्नोति वर्णितुम्।<br>उत्तिष्ठ कुरु रामस्य कार्यं नः पाहि सुव्रत ॥२०॥ | यों कहकर जाम्बवान्ने वहाँ बैठे हुए हनूमान्जीसे कहा—"हे हनूमन् ! इस महान् कार्यके उपस्थित होनेपर आप इस प्रकार अनजानके समान चुपचाप एकान्तमें क्यों बैठे हैं? हे महावीर! आप साक्षात् पवनदेवके पुत्र हैं और उन्हींके समान पराक्रमी हैं, अतः आज अपनी सामर्थ्य दिखलाइये ॥१६-१७॥ महात्मा वायुने राम-कार्यके लिये ही आपको उत्पन्न किया है। जिस समय आपका जन्म हुआ था उसी समय आप सूर्यको उदय हुआ देखकर 'इस पके फलको लेना चाहिये' इस इच्छासे बाललीलासे ही पाँच सौ योजन ऊँचे उछलकर पृथिवीपर गिरे थे ॥१८-१९॥ अतः, ऐसा कौन है जो आपके बलका माहात्म्य वर्णन कर सके। हे सुव्रत! आप खड़े हो जाइये और यह राम-कार्य करके हम सबकी रक्षा कीजिये" ॥२०॥ |
| श्रुत्वा जाम्बवतो वाक्यं हनूमानतिहर्षितः।<br>चकार नादं सिंहस्य ब्रह्माण्डं स्फोटयन्निव ॥२१॥<br>बभूव पर्वताकारस्त्रिविक्रम इवापरः।<br>लङ्घयित्वा जलनिधिं कृत्वा लङ्कां च भस्मसात् ॥२२॥<br>रावणं सकुलं हत्वाऽऽनेष्ये जनकनन्दिनीम्।<br>यद्वा बध्वा गले रज्ज्वा रावणं वामपाणिना ॥२३॥<br>लङ्कां सपर्वतां धृत्वा रामस्याग्रे क्षिपाम्यहम्।<br>यद्वा दृष्ट्वैव यास्यामि जानकीं शुभलक्षणाम् ॥२४॥ | जाम्बवान्के ये वचन सुनकर हनूमान्जी अति प्रसन्न हुए और उन्होंने समस्त ब्रह्माण्डको मानो कम्पायमान करते हुए घोर सिंहनाद किया॥२१॥ दूसरे त्रिविक्रम भगवान्के समान वे पर्वताकार हो गये, (और कहने लगे) "हे वानरो! मैं समुद्रको लाँघकर लंकाको भस्म कर डालूँगा और रावणको उसके कुलसहित मारकर श्रीजानकीजीको ले आऊँगा; अथवा कहो तो, रावणके गलेमें रस्सी डालकर और लंकाको त्रिकूट-पर्वतसहित बायें हाथपर उठाकर भगवान् रामके आगे ले जाकर डाल दूँ, या केवल शुभलक्षणा जानकीजीको देखकर ही चला आऊँ" ॥२२-२४॥ |
| श्रुत्वा हनुमतो वाक्यं जाम्बवानिदमब्रवीत्।<br>दृष्ट्वावागच्छ भद्रं ते जीवन्तीं जानकीं शुभाम्॥२५॥<br>पश्चाद्रामेण सहितो दर्शयिष्यसि पौरुषम्।<br>कल्याणं भवताद्भद्र गच्छतस्ते विहायसा ॥२६॥<br>गच्छन्तं रामकार्यार्थं वायुस्त्वामनुगच्छतु। | हनूमान्जीके ये वचन सुनकर जाम्बवान्ने कहा— "हे वीर ! तुम्हारा शुभ हो, तुम केवल शुभलक्षणा जानकीजीको जीती-जागती देखकर ही चले आओ ॥२५॥ फिर रामचन्द्रजीके साथ जाकर अपना पुरुषार्थ दिखलाना। हे भद्र! आकाशमार्गसे जाते हुए तुम्हारा कल्याण हो ॥२६॥ रामकार्यके लिये जाते समय वायु तुम्हारा अनुगमन करें।" |
| इत्याशीर्भिः समामन्त्र्य विसृष्टः प्लवगाधिपैः॥२७॥<br>महेन्द्राद्रिशिरो गत्वा बभूवाद्भुतदर्शनः ॥२८॥ | इस प्रकार आशीर्वादोंसे अभिनन्दन करते हुए वानर-यूथपोंके विदा करनेपर हनुमान्जी महेन्द्रपर्वतके शिखरपर चढ़ गये। वहाँ उन्होंने अद्भुत रूप धारण |
| २०० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९ |
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महानगेन्द्रप्रतिमो महात्मा सुवर्णवर्णोऽरुणचारुवक्त्रः ।<br>महाफणीन्द्राभसुदीर्घबाहु-र्वातात्मजोऽदृश्यत सर्वभूतैः ॥२९॥ | किया ॥ २७-२८ ॥ उस समय समस्त प्राणियोंको वायुपुत्र महात्मा हनूमान्जी महान् पर्वतराजके समान विशालकाय, सुवर्णवर्ण अरुण (बालसूर्य) के समान मनोहर मुखवाले और महान् सर्पराजके समान दीर्घ भुजाओंवाले दिखलायी देने लगे ॥ २९ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे किष्किन्धाकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
समाप्तमिदं किष्किन्धाकाण्डम्
सुन्दरकाण्ड
श्रीसीतारामाभ्यां नमः
अध्यात्मरामायण
सुन्दरकाण्ड
यद्ध्याननिर्धूतवियोगवह्रिर्विदेहबाला विबुधारिवन्याम् । प्राणान्दधे प्राणमयं प्रभुं तं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥
२६
text श्रीराम विजय
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अशोक-वाटिकामें सीता
ततः सीतां नमस्कृत्य हनूमानब्रवीद्वचः ।
आज्ञापयतु मां देवि भवती रामसन्निधिम् ॥ (अ० रा० सु० ५ । १)
सुन्दरकाण्ड - सर्ग १: हनुमान्जीका समुद्रोलङ्घन और लंका-प्रवेश
ॐ
अध्यात्मरामायण
सुन्दरकाण्ड
प्रथम सर्ग
हनुमान्जीका समुद्रोल्लङ्घन और लंका-प्रवेश।
श्रीमहादेव उवाच
शतयोजनविस्तीर्णं समुद्रं मकरालयम्।
लिलङ्घयिषुरानन्दसन्दोहो मारुतात्मजः ॥ १ ॥
ध्यात्वा रामं परात्मानमिदं वचनमब्रवीत्।
पश्यन्तु वानराः सर्वे गच्छन्तं मां विहायसा ॥ २ ॥
अमोघं रामनिर्मुक्तं महाबाणमिवाखिलाः।
पश्याम्यद्यैव रामस्य पत्नीं जनकनन्दिनीम् ॥ ३ ॥
श्रीमहादेवजी बोले— हे पार्वति ! आनन्दघन श्रीहनुमान्जी सौ योजनतक फैले हुए और मकरादि दुष्ट जल-जन्तुओंसे पूर्ण समुद्रको लाँघनेके लिये उद्यत हो परमात्मा रामका स्मरण कर इस प्रकार बोले—"हे वानरगण ! तुम सब इस ओर देखो। मैं भगवान् रामके छोड़े हुए अमोघ बाणके समान आकाश-मार्गसे जाता हूँ। मैं आज ही रामप्रिया जनकनन्दिनी श्रीसीताजीको देखूँगा ॥ १–३ ॥
कृतार्थोऽहं कृतार्थोऽहं पुनः पश्यामि राघवम्।
प्राणप्रयाणसमये यस्य नाम सकृत्स्मरन् ॥ ४ ॥
नरस्तीर्त्वा भवाम्भोधिमपारं याति तत्पदम्।
किं पुनस्तस्य दूतोऽहं तदङ्गाङ्गुलिमुद्रिकः ॥ ५ ॥
तमेव हृदये ध्यात्वा लङ्घयिष्याल्पवारिधिम्।
इत्युक्त्वा हनुमान्बाहु प्रसार्रायतवालधिः ॥ ६ ॥
ऋजुग्रीवोर्ध्वदृष्टिः सन्नाकुञ्चितपदद्वयः।
दक्षिणाभिमुखस्तूर्णं पुप्लुवेऽनिलविक्रमः ॥ ७ ॥
निश्चय ही, अब मैं कृतकार्य होकर ही पुनः श्रीरघुनाथजीका दर्शन करूँगा। प्राण-प्रयाणके समय जिनके नामका एक वार स्मरण करनेसे ही मनुष्य अपार संसार-सागरको पार कर उनके परमधामको चला जाता है, फिर मैं उन्हींका दूत उनके अवयव-रूप अँगुलिकी अँगूठी लिये हुए अपने हृदयमें उन्हीं-का ध्यान करता हुआ इस तुच्छ समुद्रको लाँघ जाऊँ तो इसमें कौन बड़ी बात है?" ऐसा कह श्रीहनुमान्जीने अपनी बाँहें फैलायीं और पूँछको सीधा किया तथा तुरन्त ही गरदनको सीधा एवं दृष्टिको ऊपरकी ओर कर पाँव सिकोड़ लिये और दक्षिणकी ओर मुख करके वायु-वेगसे उड़ान लगायी ॥ ४–७ ॥
आकाशाच्चरितं देवैर्वीक्ष्यमाणो जगाम सः।
दृष्ट्वाऽनिलसुतं देवा गच्छन्तं वायुवेगतः ॥ ८ ॥
परीक्षणार्थं सत्त्वस्य वानरस्येदमब्रुवन्।
गच्छत्येष महासत्त्वो वानरो वायुविक्रमः ॥ ९ ॥
उस समय वे देवताओंके देखते-देखते आकाश-मार्गसे बड़े तीव्र वेगसे जा रहे थे। पवनपुत्र हनुमान्जीको इस प्रकार वायु-वेगसे जाते देख देवताओंने उनकी सामर्थ्यकी परीक्षाके लिये आपसमें इस प्रकार कहा—"यह महाशक्तिशाली वानर वायुके समान तीव्र वेगसे जा रहा है ॥ ८-९ ॥ किन्तु पता
| २०४ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग १ |
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लङ्कां प्रवेष्टुं शक्तो वा न वा जानीमहे बलम् ।<br>एवं विचार्य नागानां मातरं सुरसाभिधाम् ॥१०॥<br>अब्रवीद्देवतावृन्दः कौतूहलसमन्वितः ।<br>गच्छ त्वं वानरेन्द्रस्य किञ्चिद्विघ्नं समाचर ॥११॥<br>ज्ञात्वा तस्य बलं बुद्धिं पुनरेहि त्वरान्विता ।<br>इत्युक्ता सा ययौ शीघ्रं हनुमद्विघ्नकारणात् ॥१२॥<br>आवृत्य मार्ग पुरतः स्थित्वा वानरमब्रवीत् ।<br>एहि मे वदनं शीघ्रं प्रविशस्व महामते ॥१३॥<br>देवैस्त्वं कल्पितो भक्ष्यः क्षुधासम्पीडितात्मनः ।<br>तामाह हनुमान्मातरहं रामस्य शासनात् ॥१४॥<br>गच्छामि जानकीं द्रष्टुं पुनरागम्य सत्वरः ।<br>रामाय कुशलं तस्याः कथयित्वा त्वदाननम् ॥१५॥<br>प्रवेक्ष्ये देहि मे मार्गं सुरसायै नमोऽस्तु ते ।<br>इत्युक्ता पुनरेवाह सुरसा क्षुधितास्म्यहम् ॥१६॥<br>प्रविश्य गच्छ मे वक्त्रं नो चेत्त्वां भक्षयाम्यहम् ।<br>इत्युक्तो हनुमानाह मुखं शीघ्रं विदारय ॥१७॥<br>प्रविश्य वदनं तेऽद्य गच्छामि त्वरान्वितः ।<br>इत्युक्त्वा योजनायामदेहो भूत्वा पुरः स्थितः ॥१८॥ | नहीं यह लंकामें घुस सकेगा या नहीं । अतः इसके बलका पता लगाना चाहिये।” परस्पर ऐसा विचारकर उन्होंने कुतूहलवश नागमाता सुरसासे कहा— “सुरसे ! तुम अभी जाकर इस वानरश्रेष्ठके मार्गमें कुछ विघ्न खड़ा करो और इसकी बल-बुद्धिका पता लगाकर तुरन्त लौट आओ ।” देवताओंके इस प्रकार कहनेपर वह तुरन्त ही हनुमान्जीको विघ्न उपस्थित करनेके लिये गयी ॥१०–१२॥ वह उनके मार्गको सामनेसे रोककर खड़ी हो गयी और बोली—“हे महामते ! आओ, शीघ्र ही मेरे मुखमें प्रवेश करो; मैं भूखसे अत्यन्त व्याकुल थी, अतः देवताओंने तुम्हें मेरा भक्ष्य बनाया है ।” तब हनुमान्जीने उससे कहा—“हे मातः ! मैं श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञासे जानकीजीको देखनेके लिये जा रहा हूँ । वहाँसे शीघ्र ही लौटकर श्रीरघुनाथजीको उनका कुशल-समाचार सुनाकर फिर मैं तेरे मुखमें प्रवेश करूँगा । हे सुरसे ! मैं तुझे प्रणाम करता हूँ, तू मेरा मार्ग छोड़ दे ।” इसपर सुरसाने फिर कहा—“मुझे बड़ी भूख लगी है । अतः एक बार मेरे मुखमें प्रवेश करके फिर चले जाना, नहीं तो मैं तुम्हें खा जाऊँगी ।” तब हनुमान्जीने कहा— “अच्छा तो शीघ्र ही अपना मुख खोल । मैं अभी तेरे मुखमें घुसकर तुरन्त ही लंकाको चला जाऊँगा ।” ऐसा कह हनुमान्जी अपना शरीर एक योजन लम्बा-चौड़ा बनाकर सामने खड़े हो गये ॥ १३–१८ ॥ दृष्ट्वा हनुमतो रूपं सुरसा पञ्चयोजनम् ।<br>मुखं चकार हनुमान् द्विगुणं रूपमादधत् ॥१९॥<br>ततश्चकार सुरसा योजनानां च विंशतिम् ।<br>वक्त्रं चकार हनुमान्त्रिंशद्योजनसम्मितम् ॥२०॥<br>ततश्चकार सुरसा पञ्चाशद्योजनायतम् ।<br>वक्त्रं तदा हनूमांस्तु बभूवाङ्गुष्ठसन्निभः ॥२१॥<br>प्रविश्य वदनं तस्याः पुनरेत्य पुरः स्थितः ।<br>प्रविष्टो निर्गतोऽहं ते वदनं देवि ते नमः ॥२२॥<br>एवं वदन्तं दृष्ट्वा सा हनूमन्तमथाब्रवीत् ।<br>गच्छ साधय रामस्य कार्यं बुद्धिमतां वर ॥२३॥ | हनुमान्जीका वह रूप देखकर सुरसाने अपना मुख पाँच योजन फैलाया; तब हनुमान्जीने अपना शरीर उससे दूना कर लिया ॥ १९ ॥ फिर सुरसाने अपना मुख बीस योजन किया तो हनुमान्जीने अपना देह तीस योजनका कर लिया ॥ २० ॥ इसपर जब सुरसाने अपना मुख पचास योजन फैलाया तो हनुमान्जी अँगूठेके समान छोटे-से आकारके हो गये और चट उसके मुखमें जाकर बाहर निकल आये तथा उसके सामने खड़े होकर बोले—‘हे देवि ! मैं तुम्हारे मुखमें जाकर फिर निकल आया हूँ, अब तुम्हें नमस्कार है” ॥ २१-२२ ॥ हनुमान्जीको इस प्रकार कहते देख सुरसा बोली—“हे बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ ! जाओ, श्रीरामचन्द्रजीका कार्य सिद्ध करो । हे वानर ! देवता-लोग तुम्हारा बल जानना चाहते थे अतः उन्होंने मुझे
सर्ग १ ] | सुन्दरकाण्ड | २०५
देवैः सम्प्रेषिताऽहं ते बलं जिज्ञासुभिः कपे ।
दृष्ट्वा सीतां पुनर्गत्वा रामं द्रक्ष्यसि गच्छ भोः ॥२४॥
इत्युक्त्वा सा ययौ देवलोकं वायुसुतः पुनः ।
जगाम वायुमार्गेण गरुत्मानिव पक्षिराट् ॥२५॥
समुद्रोऽप्याह मैनाकं मणिकाञ्चनपर्वतम् ।
गच्छत्येष महासत्त्वो हनूमान्मारुतात्मजः ॥२६॥
रामस्य कार्यसिद्ध्यर्थं तस्य त्वं सचिवो भव ।
सगरैर्वर्धितो यस्मात्पुराऽहं सागरोऽभवम् ॥२७॥
तस्यान्वये बभूवासौ रामो दाशरथिः प्रभुः ।
तस्य कार्यार्थसिद्ध्यर्थं गच्छत्येष महाकपिः ॥२८॥
त्वमुत्तिष्ठ जलात्तूर्णं त्वयि विश्रम्य गच्छतु ।
स तथेति प्रादुरभूज्जलमध्यान्महोन्नतः ॥२९॥
नानामणिमयैः शृङ्गैस्तस्योपरि नराकृतिः ।
प्राह यान्तं हनूमन्तं मैनाकोऽहं महाकपे ॥३०॥
समुद्रेण समादिष्टस्त्वद्विश्रामाय मारुते ।
आगच्छामृतकल्पानि जग्ध्वा पक्वफलानि मे ॥३१॥
विश्रम्यात्र क्षणं पश्चाद्गमिष्यसि यथासुखम् ।
एवमुक्तोऽथ तं प्राह हनूमान्मारुतात्मजः ॥३२॥
गच्छतो रामकार्यार्थं भक्षणं मे कथं भवेत् ।
विश्रामो वा कथं मे स्याद्गन्तव्यं त्वरितं मया ॥३३॥
इत्युक्त्वा स्पृष्टशिखरः कराग्रेण ययौ कपिः ।
किञ्चिद्दूरं गतस्यास्य छायां छायाग्रहोऽग्रहीत् ॥३४॥
सिंहिका नाम सा घोरा जलमध्ये स्थिता सदा ।
आकाशगामिनां छायामाक्रम्याकृष्य भक्षयेत् ॥३५॥
तया गृहीतो हनुमांश्चिन्तयामास वीर्यवान् ।
केनेदं मे कृतं वेगरोधनं विघ्नकारिणा ॥३६॥
तुम्हारे पास भेजा था । मुझे निश्चय है कि तुम सीताजीको देखकर फिर शीघ्र ही रघुनाथजीसे मिलोगे । अब तुम जाओ” ॥ २३-२४ ॥
ऐसा कहकर सुरसा देवलोकको चली गयी और श्रीहनुमान्जी फिर आकाश-मार्गसे पक्षिराज गरुड़के समान चलने लगे ॥ २५ ॥ इसी समय समुद्रने भी सुवर्ण और मणियोंसे युक्त मैनाक पर्वतसे कहा— “देखो, ये महाशक्तिशाली पवनपुत्र हनुमान्जी राम-कार्यके लिये जा रहे हैं; तुम उनकी सहायता करो । पूर्वकालमें मुझे सगर-पुत्रोंने बढ़ाया था, इसीसे मैं सागर कहलाता हूँ ॥ २६-२७ ॥ ये दशरथनन्दन भगवान् राम उन्हींके वंशमें प्रकट हुए हैं और ये कपिराज उन्हींका कार्य सिद्ध करनेके लिये जा रहे हैं ॥ २८ ॥ तुम तुरन्त ही जलसे ऊपर उठ जाओ, जिससे ये तुम्हारे ऊपर कुछ देर विश्राम लेकर आगे जायँ ।” तब मैनाक पर्वत ‘बहुत अच्छा’ कह तुरन्त अपने अनेक मणिमय शिखरोंसे पानीसे ऊपर बहुत ऊँचा निकल आया । और उन शृङ्गोंके ऊपर मनुष्याकारसे स्थित होकर उसने जाते हुए हनुमान्जीसे कहा— “हे महाकपे ! मैं मैनाक हूँ । हे मारुते ! समुद्रने मुझे तुम्हें विश्राम देनेके लिये आज्ञा दी है । आओ, मेरे ये अमृत-तुल्य फल खाओ ॥ २९-३१ ॥ कुछ देर यहाँ विश्राम करके फिर आनन्दपूर्वक चले जाना ।” मैनाकके इस प्रकार कहनेपर पवनपुत्र हनुमान्जी बोले—॥ ३२ ॥ “राम-कार्यके लिये जाते हुए मैं भोजनादि कैसे कर सकता हूँ ? और मुझे जल्दी ही जाना है, अतः विश्रामका अवकाश भी कहाँ है ?”॥ ३३॥
ऐसा कह कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी (मैनाकका मान रखनेके लिये) उसके शिखरको केवल अँगुल़ीसे छूकर आगे चल दिये । वे कुछ ही आगे बढ़े थे कि उनकी छायाको एक छायाग्रहने पकड़ लिया ॥ ३४ ॥ वह सिंहिका नामकी एक घोर राक्षसी थी जो सदा जलमें रहकर आकाशमें जाते हुए जीवोंकी छाया पकड़कर उन्हें खींच लेती थी और खा जाया करती थी ॥ ३५ ॥ उससे पकड़े जानेपर महापराक्रमी श्रीहनुमान्जी सोचने लगे—‘यह ऐसा कौन विघ्न-कारक है जिसने मेरा वेग रोक लिया ? दिखायी