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अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

[पृष्ठ पर केवल पुष्प-चित्र (Decorative Illustration) अंकित है, कोई पाठ नहीं है।]

अध्यात्मरामायण-माहात्म्य

अध्यात्मरामायण

माहात्म्य

रामं विश्वमयं वन्दे रामं वन्दे रघूद्वहम् । रामं विप्रवरं वन्दे रामं श्यामाग्रजं भजे ॥
यस्य वागांशुतश्च्यूतं रम्यं रामायणामृतम् । शैलजासेवितं वन्दे तं शिवं सोमरूपिणम् ॥
सच्चिदानन्दसन्दोहं भक्तिभूतिविभूषणम् । पूर्णानन्दमहं वन्दे सद्गुरुं शङ्करं स्वयं ॥
अज्ञानध्वान्तसंहर्त्री ज्ञानालोकविलासिनी । चन्द्रचूडवचश्चन्द्रचन्द्रिकेयं विराजते ॥


अप्रमेयत्रयातीतनिर्मलज्ञानमूर्तये ।
मनोगिरां विदूराय दक्षिणामूर्तये नमः ॥ १ ॥

जो प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे परे, त्रिगुणातीत, मलहीन, ज्ञानस्वरूप और मन, वाणी आदिके अविषय हैं उन दक्षिणामूर्ति भगवान् (सदाशिव) को नमस्कार है ॥ १ ॥

सूत उवाच
कदाचिन्नारदो योगी परानुग्रहवाञ्छया ।
पर्यटन्सकलाँल्लोकान्सत्यलोकमुपागमत् ॥ २ ॥
तत्र दृष्ट्वा मूर्तिमद्भिश्छन्दोभिः परिवेष्टितम् ।
बालार्कप्रभया सम्यग्भासयन्तं सभागृहम् ॥ ३ ॥
मार्कण्डेयादिमुनिभिः स्तूयमानं मुहुर्मुहुः ।
सर्वार्थगोचरज्ञानं सरस्वत्या समन्वितम् ॥ ४ ॥
चतुर्मुखं जगन्नाथं भक्ताभीष्टफलप्रदम् ।
प्रणम्य दण्डवद्भक्त्या तुष्टाव मुनिपुङ्गवः ॥ ५ ॥

**श्रीसूतजी बोले—**एक समय योगिराज नारदजी दूसरोंपर कृपा करनेके लिये समस्त लोकोंमें विचरते हुए सत्यलोकमें पहुँचे ॥ २ ॥ वहाँ मूर्तिमान् वेदोंसे घिरे हुए, अपनी बालसूर्यके समान प्रभासे सभाभवनको पूर्णतया देदीप्यमान करते हुए, मार्कण्डेय आदि मुनिजनोंसे बारम्बार स्तुति किये जाते हुए, सम्पूर्ण पदार्थोंका ज्ञान रखनेवाले और भक्तोंको इच्छित फल देनेवाले सरस्वतीयुक्त जगत्पति ब्रह्माजीको देखकर मुनिश्रेष्ठ नारदजीने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और भक्तिभावसे स्तुति की ॥ ३–५ ॥

सन्तुष्टस्तं मुनिं प्राह स्वयम्भूर्वैष्णवोत्तम् ।
किं प्रष्टुकामस्त्वमसि तद्गदिष्यामि ते मुने ॥ ६ ॥

तब स्वयम्भू ब्रह्माजीने प्रसन्न होकर वैष्णवाग्रणी श्रीनारदजीसे कहा—"मुने ! तुम क्या पूछना चाहते हो ? मैं तुमसे वह सब कहूँगा" ॥ ६ ॥

इत्याकर्ण्य वचस्तस्य मुनिर्ब्रह्माणमब्रवीत् ।
त्वत्तः श्रुतं मया सर्वं पूर्वमेव शुभाशुभम् ॥ ७ ॥
इदानीमेकमेवास्ति श्रोतव्यं सुरसत्तम ।
तद्रहस्यमपि ब्रूहि यदि तेऽनुग्रहो मयि ॥ ८ ॥

ब्रह्माजीके ये वचन सुनकर नारदजीने उनसे कहा, "हे देवश्रेष्ठ ! शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन तो मैं आपसे पहले ही सुन चुका हूँ। अब मुझे एक ही बात और सुननी है; यदि मुझपर आपकी कृपा है तो गोपनीय होनेपर भी वह सुनाइये ॥ ७-८ ॥ अब घोर कलियुगके आनेपर

मा अध्यात्मरामायण


प्राप्ते कलियुगे घोरे नराः पुण्यविवर्जिताः ।
दुराचाररताः सर्वे सत्यवार्तापराङ्मुखाः ॥ ९ ॥

मनुष्य पुण्यकर्म छोड़ देंगे और सत्यभाषणसे विमुख होकर दुराचारमें प्रवृत्त हो जायँगे ॥ ९ ॥


परापवादनिरताः परद्रव्याभिलाषिणः ।
परस्त्रीसक्तमनसः परहिंसापरायणाः ॥ १० ॥

वे दूसरोंकी निन्दामें तत्पर रहेंगे, दूसरोंके धनकी इच्छा करेंगे, परस्त्रीमें चित्त लगावेंगे और परायी हिंसा करेंगे ॥ १० ॥


देहात्मदृष्टयो मूढा नास्तिकाः पशुबुद्धयः ।
मातापितृकृतद्वेषाः स्त्रीदेवाः कामकिङ्कराः ॥ ११ ॥

ये मूढ़ देहमें ही आत्मबुद्धि करेंगे, शास्त्र और ईश्वरसे विमुख होंगे, उनकी बुद्धि पशुओंके समान होगी और वे कामके गुलाम होकर स्त्रीके भक्त और माता-पिताके द्रोही बनेंगे ॥ ११ ॥


विप्रा लोभग्रहग्रस्ता वेदविक्रयजीविनः ।
धनार्जनार्थमभ्यस्तविद्या मदविमोहिताः ॥ १२ ॥

ब्राह्मणगण लोभरूपी ग्रहसे ग्रस्त और वेद बेचकर अपनी आजीविका चलानेवाले होंगे, वे धनोपार्जनके लिये ही विद्याभ्यास करेंगे और (विद्या तथा ब्राह्मणत्वके) मदमे उन्मत्त हो जायँगे ॥ १२ ॥


त्यक्तस्वजातिकर्माणः प्रायशः परवञ्चकाः ।
क्षत्रियाश्च तथा वैश्याः स्वधर्मत्यागशीलिनः ॥ १३ ॥

क्षत्रिय और वैश्यगण भी स्वधर्मको त्यागनेवाले तथा अपने जाति-कर्मोंको छोड़कर प्रायः दूसरोंको ठगनेवाले ही होंगे ॥ १३ ॥


तद्वच्छूद्राश्च ये केचिद्ब्राह्मणाचारतत्पराः ।
स्त्रियश्च प्रायशो भ्रष्टा भर्तृवज्ञाननिर्भयाः ॥ १४ ॥

इसी प्रकार जो शूद्र होंगे वे भी ब्राह्मणोंके आचारमें तत्पर हो जायँगे तथा स्त्रियाँ प्रायः भ्रष्टाचारिणी और अपने पतिके अपमान करनेमें निडर होंगी ॥ १४ ॥


श्वशुरद्रोहकारिण्यो भविष्यन्ति न संशयः ।
एतेषां नष्टबुद्धीनां परलोकः कथं भवेत् ॥ १५ ॥

निस्सन्देह वे अपने सास-ससुरोंसे द्रोह करेंगी। इन नष्ट-बुद्धियोंका परलोक किस प्रकार सुधरेगा ? ॥ १५ ॥


इति चिन्ताकुलं चित्तं जायते मम सन्ततम् ।
लघूपायेन येनैषां परलोकगतिर्भवेत् ।
तमुपायमुपारूढि सर्वं वेत्ति यतो भवान् ॥ १६ ॥

इस चिन्तासे मेरा चित्त निरन्तर व्याकुल रहता है। जिस सुगम उपायसे इनका परलोक सुधर सकता हो वह आप मुझे बतलाइये, क्योंकि आप सभी कुछ जानते हैं" ॥ १६ ॥


इत्युपर्षेर्वाक्यमाकर्ण्य प्रत्युवाचाम्बुजासनः ।
साधु पृष्टं त्वया साधो वक्ष्ये तच्छृणु सादरम् ॥ १७ ॥

देवर्षि नारदजीके ये वचन सुनकर कमलासन ब्रह्माजी बोले—"हे साधो ! तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। मैं उसे बतलाता हूँ, तुम श्रद्धापूर्वक सुनो ॥ १७ ॥


पुरा त्रिपुरहन्तारं पार्वती भक्तवत्सला ।
श्रीरामतत्त्वं जिज्ञासुः पप्रच्छ विनयान्विता ॥ १८ ॥

"पूर्वकालमें भक्तवत्सला पार्वतीजीने श्रीराम-तत्त्वकी जिज्ञासासे त्रिपुर-विनाशक भगवान् शंकरसे विनयपूर्वक प्रश्न किया था ॥ १८ ॥


प्रियायै गिरिशस्तस्यै गूढं व्याख्यातवान्स्वयम् ।
पुराणोत्तममध्यात्मरामायणमिति स्मृतम् ॥ १९ ॥

तब अपनी प्रियासे श्रीमहादेवजीने जिस गूढ़ रहस्यका वर्णन किया था वह उत्तम पुराण अध्यात्मरामायणके नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ १९ ॥


तत्पार्वती जगद्धात्री पूजयित्वा दिवानिशम् ।
आलोचयन्ती स्वानन्दमग्ना तिष्ठति साम्प्रतम् ॥ २० ॥

अब जगज्जननी पार्वतीजी उसका पूजन कर रात-दिन उसीका मनन करती आत्मानन्दमें मग्न रहती हैं ॥ २० ॥


प्रचरिष्यति तल्लोके प्राण्यदृष्टवशाद्यदा ।
तस्याध्ययनमात्रेण जना यास्यन्ति सद्गतिम् ॥ २१ ॥

जिस समय प्राणियोंके सौभाग्यसे उसका लोकमें प्रचार होगा उस समय उसके अध्ययनमात्रसे लोग शुभगति प्राप्त करेंगे

माहात्म्य
तावद्विजृम्भते पापं ब्रह्महत्यापुरःसरम् ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२२॥॥२१॥ संसारमें ब्रह्म-हत्यादि पाप तभीतक रहेंगे जबतक अध्यात्मरामायणका प्रादुर्भाव नहीं होगा ॥ २२ ॥
तावत्कलिमहोत्साहो निःशङ्कं सम्प्रवर्तते ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२३॥कलियुगका महान् उत्साह तभीतक निःशंक रहेगा जबतक संसारमें अध्यात्मरामायणका उदय न होगा ॥ २३ ॥
तावद्यमभटाः शूराः सञ्चरिष्यन्ति निर्भयाः ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२४॥यमराजके शूरवीर दूत तभीतक निर्भय विचरते रहेंगे जबतक जगत्में अध्यात्मरामायण प्रकट नहीं होगी ॥ २४ ॥
तावत्सर्वाणि शास्त्राणि विवदन्ते परस्परम् ॥२५॥<br>तावत्स्वरूपं रामस्य दुर्बोधं महतामपि ।<br>यावज्जगति नाध्यात्मरामायणमुदेष्यति ॥२६॥और सम्पूर्ण शास्त्रोंमें परस्पर विवाद तभीतक रहेगा तथा महापुरुषोंको भी भगवान् रामका स्वरूप तभीतक दुर्बोध रहेगा जबतक संसारमें अध्यात्मरामायणका प्रकाश नहीं होगा ॥ २५-२६ ॥
अध्यात्मरामायणसङ्कीर्तनश्रवणादिजम् ।<br>फलं वक्तुं न शक्नोमि कार्त्स्न्येन मुनिसत्तम ॥२७॥<br>तथाऽपि तस्य माहात्म्यं वक्ष्ये किञ्चित्तवानघ।<br>शृणु चित्तं समाधाय शिवेनोक्तं पुरा मम ॥२८॥"हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं अध्यात्मरामायणके कीर्तन और श्रवणसे होनेवाले फलका पूर्णतया वर्णन नहीं कर सकता, तथापि हे अनघ ! मैं तुम्हें उसका थोड़ा-सा माहात्म्य सुनाता हूँ। इसे पूर्वकालमें मुझसे शिवजीने कहा था; तुम सावधान होकर सुनो—॥२७-२८॥
अध्यात्मरामायणतः श्लोकं श्लोकार्धमेव वा ।<br>यः पठेद्भक्तिसंयुक्तः स पापान्मुच्यते क्षणात्॥२९॥जो पुरुष अध्यात्मरामायणका एक अथवा आधा श्लोक भी भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह तत्क्षण पापमुक्त हो जाता है ॥२९॥
यस्तु प्रत्यहमध्यात्मरामायणमनन्यधीः ।<br>यथाशक्ति वदेद्भक्त्या स जीवन्मुक्त उच्यते ॥३०॥जो इस अध्यात्मरामायणको नित्यप्रति अनन्य बुद्धिसे भक्तिपूर्वक यथाशक्ति सुनाता है वह जीवन्मुक्त कहलाता है ॥३०॥
यो भक्त्यार्चयतेऽध्यात्मरामायणमतन्द्रितः।<br>दिनेदिनेऽश्वमेधस्य फलं तस्य भवेन्मुने ॥३१॥हे मुने ! जो पुरुष आलस्य छोड़कर भक्तिभावसे प्रतिदिन अध्यात्मरामायणका पूजन करता है उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ ३१ ॥
यदृच्छयापि योऽध्यात्मरामायणमनादरात्।<br>अन्यतः शृणुयान्मर्त्यः सोऽपि मुच्येत पातकात् ३२जो मनुष्य दूसरोंसे अनियमपूर्वक अनादरसे भी अध्यात्मरामायण श्रवण करता है वह भी पातकसे छूट जाता है ॥ ३२ ॥
नमस्करोति योऽध्यात्मरामायणमदूरतः ।<br>सर्वदेवार्चनफलं स प्राप्नोति न संशयः ॥३३॥जो कोई अध्यात्मरामायणके निकट जाकर उसे नमस्कार करता है वह समस्त देवताओंकी पूजाका फल पाता है—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३३ ॥
लिखित्वा पुस्तकेऽध्यात्मरामायणमशेषतः ।<br>यो दद्याद्रामभक्तेभ्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु ॥३४॥"जो पुरुष अध्यात्मरामायणकी सम्पूर्ण पुस्तक लिखकर राम-भक्तोंको देता है उसे जो पुण्य होता है उसका फल सुनो ॥३४॥
अधीतेषु च वेदेषु शास्त्रेषु व्याकृतेषु च ।<br>यत्फलं दुर्लभं लोके तत्फलं तस्य सम्भवेत् ॥३५॥उसे वह फल मिलता है जो वेदोंके पढ़नेसे और शास्त्रोंकी व्याख्या करनेसे भी संसारमें दुर्लभ है ॥ ३५ ॥
एकादशीदिनेऽध्यात्मरामायणमुपोषितः ।<br>यो रामभक्तः सदसि व्याकरोति नरोत्तमः ॥३६॥जो नरश्रेष्ठ रामभक्त एकादशीको उपवास करके सभामें अध्यात्मरामायणकी व्याख्या करता है, हे वैष्णवश्रेष्ठ ! उसके

अध्यात्मरामायण


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये शृणु वैष्णवसत्तम ।<br>प्रत्यक्षरं तु गायत्रीपुरश्चर्याफलं भवेत् ॥३७॥पुण्यका फल बतलाता हूँ, सुनो। उसे एक-एक अक्षर के पढ़नेमें गायत्रीके पुरश्चरणका फल मिलता है ॥३६-३७॥
उपवासव्रतं कृत्वा श्रीरामनवमीदिने ।<br>रात्रौ जागरितोऽध्यात्मरामायणमनन्यधीः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि तस्य पुण्यं वदाम्यहम् ॥३८॥जो पुरुष रामनवमीके दिन निराहार रहकर और फिर रात्रिको जागरण कर अनन्य बुद्धि-से अध्यात्मरामायणको पढ़ता या सुनता है, अब मैं उसका पुण्य बतलाता हूँ ॥३८॥
कुरुक्षेत्रादिनिखिलपुण्यतीर्थेष्वनेकंशः ।<br>आत्मतुल्यं धनं सूर्यग्रहणे सर्वतोमुखे ॥३९॥<br>विप्रेभ्यो व्यासुल्येभ्यो दत्त्वा यत्फलमश्नुते ।<br>तत्फलं सम्भवेत्तस्य सत्यं सत्यं न संशयः ॥४०॥कुरुक्षेत्रादि सम्पूर्ण पवित्र तीर्थोंमें सर्वग्रस्त सूर्यग्रहणके समय अनेकों बार व्यासजीके समान ब्राह्मणोंको अपने बराबर धन देनेसे जो फल होता है उसे वही फल मिलता है; इसमें कोई सन्देह नहीं, यह सर्वथा सत्य है, सर्वथा सत्य है ॥३९-४०॥
यो गायते मुदाऽध्यात्मरामायणमहर्निशम् ।<br>आज्ञां तस्य प्रतीक्षन्ते देवा इन्द्रपुरोगमाः ॥४१॥जो मनुष्य अहर्निश प्रसन्नचित्तसे अध्यात्मरामायणका गान करता है उसकी आज्ञाकी इन्द्रादि देवगण प्रतीक्षा किया करते हैं ॥४१॥
पठन्प्रत्यहमध्यात्मरामायणमनुव्रतः ।<br>यद्यत्करोति तत्कर्म ततः कोटिगुणं भवेत् ॥४२॥अध्यात्मरामायणका नित्यप्रति नियमपूर्वक पाठ करने-से मनुष्य जो कुछ पुण्य-कर्म करता है वह करोड़-गुना हो जाता है ॥४२॥
तत्र श्रीरामहृदयं यः पठेत्सुसमाहितः ।<br>स ब्रह्मघ्नोऽपि पूतात्मा त्रिभिरेव दिनैर्भवेत् ॥४३॥“इस (अध्यात्मरामायण) मेंसे जो पुरुष खूब समाहित होकर श्रीरामहृदयका पाठ करता है वह ब्रह्महत्यारा भी हो तो भी तीन दिनमें ही पवित्र हो जाता है ॥४३॥
श्रीरामहृदयं यस्तु हनूमत्प्रतिमान्तिके ।<br>त्रिः पठेत्प्रत्यहं मौनी स सर्वेप्सितभाग्भवेत् ॥४४॥जो पुरुष हनुमान्‌जीकी प्रतिमाके समीप प्रतिदिन तीन बार मौन होकर श्रीरामहृदयका पाठ करता है वह समस्त इच्छित फल प्राप्त करता है ॥४४॥
पठन् श्रीरामहृदयं तुलस्यश्वत्थयोर्यदि ।<br>प्रत्यक्षरं प्रकुर्वीत ब्रह्महत्यानिवर्तनम् ॥४५॥और यदि कोई पुरुष तुलसी या पीपलके निकट श्रीराम-हृदयका पाठ करे तो वह एक-एक अक्षरपर (अपनी) ब्रह्महत्या (जैसे पापों) को दूर कर देता है ॥४५॥
श्रीरामगीतामाहात्म्यं कृत्स्नं जानाति शङ्करः ।<br>तदर्धं गिरिजा वेत्ति तदर्धं वेद्म्यहं मुने ॥४६॥“हे मुने ! श्रीरामगीताका माहात्म्य पूरा-पूरा तो श्रीमहादेवजी ही जानते हैं; उनसे आधा पार्वतीजी जानती हैं और उनसे भी आधा मैं जानता हूँ ॥४६॥
तत्ते किञ्चित्प्रवक्ष्यामि कृत्स्नं वक्तुं न शक्यते ।<br>यज्ज्ञात्वा तत्क्षणालोकश्चित्तशुद्धिमवाप्नुयात्।४७।सो उसे पूरा कह भी नहीं सकता, उसमेंसे थोड़ा-सा तुम्हें सुनाता हूँ जिसके जाननेमात्रसे चित्त तत्काल शुद्ध हो जाता है ॥४७॥
श्रीरामगीता यत्पापं न नाशयति नारद ।<br>तन्न नश्यति तीर्थादौ लोके क्वापि कदाचन ।<br>तन्न पश्याम्यहं लोके मार्गमाणोऽपि सर्वदा ॥४८॥हे नारद ! जिस पापको श्रीरामगीताने नष्ट नहीं किया वह संसारमें कभी किसी तीर्थादिसे भी नष्ट नहीं हो सकता, मैं सदा ढूँढ़नेपर भी उस पापको नहीं देख पाता ॥४८॥
रामेणोपनिषत्सिन्धुमुन्मथ्योत्पादितां मुदा ।जिस गीतामृतको भगवान् रामने उपनिषत्सागरका

माहात्म्य \qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad मः


लक्ष्मणायार्पितां गीतासुधां पीत्वाऽमरो भवेत् ४९
जमदग्निसुतः पूर्वं कार्तवीर्यवधेच्छया ।
धनुर्विद्यामभ्यसितुं महेशस्यान्तिके वसन् ॥५०॥
अधीयमानां पार्वत्या रामगीतां प्रयत्नतः ।
श्रुत्वा गृहीत्वाऽऽशु पठन्नारायणकलामागात्॥५१॥
ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं यदि वाञ्छति।
रामगीतां मासमात्रं पठित्वा मुच्यते नरः ॥५२॥
दुष्प्रतिग्रहदुर्भोज्यदुरालापादिसम्भवम् ।
पापं यत्तत्कीर्तनेन रामगीता विनाशयेत् ॥५३॥
शालग्रामशिलाग्रे च तुलस्यश्वत्थसन्निधौ ।
यतीनां पुरतस्तद्वद्रामगीतां पठेत्तु यः ॥५४॥
स तत्फलमवाप्नोति यद्वाचोऽपि न गोचरम्॥५५॥
रामगीतां पठन्भक्त्या यः श्राद्धे भोजयेद्द्विजान् ।
तस्य ते पितरः सर्वे यान्ति विष्णोः परं पदम् ॥५६॥
एकादश्यां निराहारो नियतो द्वादशीदिने ।
स्थित्वाऽगस्त्यतरोर्मूले रामगीतां पठेत्तु यः ।
स एव राघवः साक्षात्सर्वदेवैश्च पूज्यते ॥५७॥
विना दानं विना ध्यानं विना तीर्थावगाहनम् ।
रामगीतां नरोऽधीत्य तदनन्तफलं लभेत् ॥५८॥
बहुना किमिहोक्तेन शृणु नारद तत्त्वतः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासागमशतानि च ।
अर्हन्ति नाल्पमध्यात्मरामायणकलामपि ॥५९॥
अध्यात्मरामचरितस्य मुनीश्वराय
माहात्म्यमेतदुदितं कमलासनेन ।
यः श्रद्धया पठति वा शृणुयात्स मर्त्यः
प्राप्नोति विष्णुपदवीं सुरपूज्यमानः॥६०॥


मन्थन कर निकाला और फिर बड़ी प्रसन्नतासे लक्ष्मण-जीको दिया (मनुष्यको चाहिये कि) उसका पान करके अमर हो जाय ॥ ४९ ॥ पूर्वकालमें सहस्रार्जुनके वधकी इच्छासे जमदग्निनन्दन परशुरामजी धनुर्विद्याका अभ्यास करनेके लिये श्रीमहादेवजीके पास रहते थे ॥५०॥ उस समय रामगीताका अध्ययन करती हुई पार्वतीजीसे इसे यत्नपूर्वक सुनकर और तुरन्त ही हृदयंगम कर इसका पाठ करते-करते वे श्रीनारायणकी कलारूप हो गये ॥ ५१ ॥ यदि कोई पुरुष ब्रह्महत्या आदि घोर पापोंसे मुक्त होना चाहे तो केवल एकमास रामगीताका पाठ करनेसे छूट सकता है ॥५२॥ बुरे दान, निषिद्ध भोजन और खोटी बोलचाल आदिसे जो पाप होता है उसे रामगीता पाठमात्रसे नष्ट कर देती है ॥५३॥ जो पुरुष शालग्राम शिलाके आगे, तुलसी या पीपलके पास अथवा यतिजनोंके सामने रामगीताका पाठ करता है उसे वह फल मिलता है जो वाणीका भी विषय नहीं है ॥५४-५५॥ जो मनुष्य श्राद्धमें रामगीताका भक्तिपूर्वक पाठ करके ब्राह्मणोंको भोजन कराता है उसके वे समस्त पितृगण भगवान् विष्णुके परम धामको जाते हैं ॥५६॥ जो पुरुष एकादशीके दिन निराहार और जितेन्द्रिय रहकर द्वादशीको अगस्त्य वृक्षके नीचे बैठकर रामगीताका पाठ करता है वह साक्षात् रामरूप ही है, उसकी समस्त देवगण पूजा करते हैं ॥५७॥ रामगीताका पाठ करनेसे मनुष्य बिना किसी दान, ध्यान अथवा तीर्थस्नानके ही अक्षय फल पाता है ॥५८॥ हे नारद ! और अधिक क्या कहा जाय जो वास्तविक बात है वह सुन—श्रुति, स्मृति, पुराण और इतिहास आदि सैकड़ों शास्त्र श्रीअध्यात्मरामायणकी एक तुच्छ कलाके समान भी नहीं हैं” ॥५९॥

यह अध्यात्मरामायणका माहात्म्य श्रीब्रह्माजीने मुनिराज नारदसे कहा है । इसे जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक पढ़ता या सुनता है वह देवताओंसे पूजित होकर श्रीविष्णुभगवान्का पद प्राप्त करता है ॥६०॥


इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे उत्तरखण्डेऽध्यात्मरामायण-
माहात्म्यं सम्पूर्णम्

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बालकाण्ड

श्रीसीतारामाभ्यां नमः

अध्यात्मरामायण


बालकाण्ड

आलोक्य यस्यातिललामलीलां सद्भाग्यभाजौ पितरौ कृतार्थौ । तमर्भकं दर्पकदर्पचौरं श्रीजानकीजीवनमानतोऽस्मि ॥

[चित्र: ध्यानस्थ भगवान् शिव]

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सदाप्रसन्न राम

सोऽयं परात्मा पुरुषः पुराणः एकः स्वयंज्योतिरनन्त आद्यः।
मायातनुं लोकविमोहनीयां धत्ते परानुग्रह एष रामः॥
(अ० रा० बाल० ५ । ४६)

बालकाण्ड - सर्ग १: रामहृदय

अध्यात्मरामायण

बालकाण्ड


प्रथम सर्ग

रामहृदय

संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
यः पृथ्वीभरवारणाय दिविजैः<br>  संप्रार्थितश्चिन्मयः<br>संजातः पृथिवीतले रविकुले<br>  मायामनुष्योऽव्ययः ।<br>निश्चक्रं हतराक्षसः पुनरगाद्<br>  ब्रह्मत्वमाद्यं स्थिरां<br>कीर्तिं पापहरां विधाय जगतां<br>  तं जानकीशं भजे ॥ १ ॥जिन चिन्मय अविनाशी प्रभुने पृथिवीका भार उतारनेके लिये देवताओंकी प्रार्थनासे पृथिवीतलपर सूर्यवंशमें माया-मानवरूपसे अवतार लिया और जो राक्षसोंके समूहको मारकर तथा संसारमें अपनी पापविनाशिनी अविचल कीर्ति स्थापितकर पुनः अपने आद्य ब्रह्मस्वरूपमें लीन हो गये उन श्रीजानकीवल्लभका मैं भजन करता हूँ ॥ १ ॥
विश्वोद्भवस्थितिलयादिषु हेतुमेकं<br>  मायाश्रयं विगतमायमचिन्त्यमूर्तिम् ।<br>आनन्दसान्द्रममलं निजबोधरूपं<br>  सीतापतिं विदिततत्त्वमहं नमामि ॥ २ ॥जो विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और लय आदिके एकमात्र कारण हैं, मायाके आश्रय होकर भी मायातीत हैं, अचिन्त्यस्वरूप हैं, आनन्दघन हैं, उपाधिकृत दोषोंसे रहित हैं, तथा स्वयंप्रकाशस्वरूप हैं उन तत्त्ववेत्ता श्रीसीतापतिको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥
पठन्ति ये नित्यमनन्यचेतसः<br>  शृण्वन्ति चाध्यात्मिकसंज्ञितं शुभम् ।<br>रामायणं सर्वपुराणसंमतं<br>  निर्धूतपापा हरिमेव यान्ति ते ॥ ३ ॥जो लोग इस सर्व-पुराण-सम्मत पवित्र अध्यात्मरामायणका एकाग्र-चित्तसे नित्य पाठ करते हैं और जो इसे सुनते हैं वे पापरहित होकर श्रीहरिको ही प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥
अध्यात्मरामायणमेव नित्यं<br>  पठेद्यदीच्छेद्भवबन्धमुक्तिम् ।<br>गवां सहस्रायुतकोटिदानात्<br>  फलं लभेद्यः शृणुयात्स नित्यम् ॥ ४ ॥यदि कोई संसार-बन्धनसे मुक्त होना चाहता हो तो वह अध्यात्मरामायणका ही नित्य पाठ करे। जो कोई मनुष्य इसका नित्य श्रवण करता है वह लाखों करोड़ गो-दानका फल प्राप्त करता है ॥ ४ ॥
पुरारिगिरिसंभूता श्रीरामार्णवसंगता ।<br>अध्यात्मरामगङ्गेयं पुनाति भुवनत्रयम् ॥ ५ ॥श्रीशंकररूप पर्वतसे निकली हुई रामरूप समुद्रमें मिलनेवाली यह अध्यात्मरामायणरूपिणी गंगा त्रिलोकीको पवित्र कर रही है ॥ ५ ॥
अध्यात्मरामायण[ सर्ग १

कैलासाग्रे कदाचिद्रविशतविमले मन्दिरे रत्नपीठे
संविष्टं ध्याननिष्ठं त्रिनयनमभयं सेवितं सिद्धसंघैः ।
देवी वामाङ्कसंस्था गिरिवरतनया पार्वती भक्तिनम्रा
प्राहैदं देवमीशं सकलमलहरं वाक्यमानन्दकन्दम् ॥ ६ ॥

पार्वत्युवाच
नमोऽस्तु ते देव जगन्निवास सर्वात्मदृक् त्वं परमेश्वरोऽसि ।
पृच्छामि तत्त्वं पुरुषोत्तमस्य सनातनं त्वं च सनातनोऽसि ॥ ७ ॥
गोप्यं यदत्यन्तमनन्यवाच्यं वदन्ति भक्तेषु महानुभावाः ।
तदप्यहोऽहं तव देव भक्ता प्रियोऽसि मे त्वं वद यत्तु पृष्टम् ॥ ८ ॥
ज्ञानं सविज्ञानमथाशुभक्ति-वैराग्ययुक्तं च मितं विभास्वत् ।
जानाम्यहं योषिदपि त्वदुक्तं यथा तथा ब्रूहि तरन्ति येन ॥ ९ ॥
पृच्छामि चान्यच्च परं रहस्यं तदेव चाग्रे वद वारिजाक्ष ।
श्रीरामचन्द्रेऽखिललोकसारे भक्तिर्दृढा नौर्भवति प्रसिद्धा ॥ १० ॥
भक्तिः प्रसिद्धा भवमोक्षणाय नान्यत्ततः साधनमस्ति किञ्चित् ।
तथापि हृत्संशयबन्धनं मे विभेत्तुमर्हस्यमलोक्तिभिस्त्वम् ॥ ११ ॥
वदन्ति रामं परमेकमाद्यं निरस्तमायागुणसंप्रवाहम् ।
भजन्ति चाहर्निशमप्रमत्ताः परं पदं यान्ति तथैव सिद्धाः ॥ १२ ॥
वदन्ति केचित्परमोऽपि रामः स्वाविद्यया संवृतमात्मसंज्ञम् ।
जानाति नात्मानमतः परेण सम्बोधितो वेद परात्मतत्त्वम् ॥ १३ ॥


हिन्दी-अनुवाद

एक समय कैलाशपर्वतके शिखरपर सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान शुभ्र भवनमें रत्नसिंहासनपर ध्यानावस्थित बैठे हुए, सिद्ध-समूह-सेवित, नित्यनिर्भय, सर्वपापपहारी आनन्दकन्द देवदेव भगवान् त्रिनयनसे उनके वामाङ्कमें विराजमान श्रीगिरिराजकुमारी पार्वती ने भक्तिभावसे नम्रतापूर्वक ये वाक्य कहे ॥ ६ ॥

श्रीपार्वतीजी बोलीं—हे देव! हे जगन्निवास! आपको नमस्कार है; आप सबके अन्तःकरणोंके साक्षी और परमेश्वर हैं। मैं आपसे श्रीपुरुषोत्तम भगवान्‌का सनातन-तत्त्व पूछना चाहती हूँ, क्योंकि आप भी सनातन हैं ॥ ७ ॥ महानुभावलोग जो अत्यन्त गोपनीय विषय होता है तथा अन्य किसीसे कहने योग्य नहीं होता उसे भी अपने भक्तजनोंसे कह देते हैं। हे देव! मैं भी आपकी भक्त हूँ, मुझे आप अत्यन्त प्रिय हैं। इसलिये मैंने जो कुछ पूछा है वह वर्णन कीजिये ॥ ८ ॥ जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य संसार-समुद्रसे पार हो जाते हैं उस भक्ति और वैराग्यसे परिपूर्ण प्रकाशमय आत्मज्ञानका वर्णन आप विज्ञानसहित इस प्रकार स्वल्प शब्दोंमें कीजिये जिससे मैं स्त्री होनेपर भी आपके वचनोंको (सहज ही) समझ सकूँ ॥ ९ ॥ हे कमलनयन! मैं एक परम गुह्य रहस्य आपसे और पूछती हूँ, कृपया आप पहले उसे ही वर्णन करें। यह तो प्रसिद्ध ही है कि अखिल-लोक-सार श्रीरामचन्द्रजीकी विशुद्ध भक्ति संसार-सागरको तरनेके लिये सुदृढ़ नौका है ॥ १० ॥ संसारसे मुक्त होनेके लिये भक्ति ही प्रसिद्ध उपाय है उससे श्रेष्ठ और कोई भी साधन नहीं है; तथापि आप अपने विशुद्ध वचनोंसे मेरे हृदयकी संशय-ग्रन्थिका छेदन कीजिये ॥ ११ ॥ प्रमादरहित सिद्धगण श्रीरामचन्द्रजीको परम अद्वितीय, सबके आदिकारण और प्रकृतिके गुण-प्रवाहसे परे बतलाते हैं तथा वे अहर्निश उनका भजन करके परमपद भी प्राप्त करते हैं ॥ १२ ॥ परन्तु कोई-कोई कहते हैं कि राम परब्रह्म होनेपर भी अपनी मायासे आवृत्त हो जानेके कारण अपने आत्मस्वरूपको नहीं जानते थे। इसलिये अन्य (वशिष्ठादि) के उपदेशसे उन्होंने आत्मतत्त्वको जाना ॥ १३ ॥ (अतः मैं पूछती

सर्ग १ ]बालकाण्ड

यदि स्म जानाति कुतो विलापः सीताकृतेऽनेन कृतः परेण। जानाति नैवं यदि केन सेव्यः समो हि सर्वैरपि जीवजातैः ॥१४॥ अत्रोत्तरं किं विदितं भवद्भि- स्तद्ब्रूत मे संशयभेदि वाक्यम् ॥१५॥

श्रीमहादेव उवाच

धन्यासि भक्तासि परात्मनस्त्वं यज्ज्ञातुमिच्छा तव रामतत्त्वम्। पुरा न केनाप्यभिचोदितोऽहं वक्तुं रहस्यं परमं निगूढम् ॥१६॥ त्वयाद्य भक्त्या परिनोदितोऽहं वक्ष्ये नमस्कृत्य रघूत्तमं ते। रामः परात्मा प्रकृतेरनादि- रानन्द एकः पुरुषोत्तमो हि ॥१७॥ स्वमायया कृत्स्नमिदं हि सृष्ट्वा नभोवदन्तर्बहिरस्थितो यः। सर्वान्तरस्थोऽपि निगूढ आत्मा स्वमायया सृष्टमिदं विचेष्टे ॥१८॥ जगन्ति नित्यं परितो भ्रमन्ति यत्सन्निधौ चुम्बकलोहवद्धि। एतन्न जानन्ति विमूढचित्ताः स्वाविद्यया संवृतमानसा ये ॥१९॥ स्वाज्ञानमप्यात्मनि शुद्धबुद्धे- स्वारोपयन्तीह निरस्तमाये। संसारमेवानुसरन्ति ते वै पुत्रादिसक्ताः पुरुकर्मयुक्ताः ॥२०॥ जानन्ति नैवं हृदये स्थितं वै चामीकरं कण्ठगतं यथाऽज्ञाः। यथाऽन्धकारो न तु विद्यते रवौ ज्योतिःस्वभावे परमेश्वरे तथा। विशुद्धविज्ञानघने रघूत्तमे- ऽविद्या कथं स्यात्परतः परात्मनि ॥२१॥ यथा हि चाक्ष्णा भ्रमता गृहादिकं विनष्टदृष्टेर्भमतीव दृश्यते।


हूँ कि) यदि वे आत्मतत्त्वको जानते थे, तो उन परमात्माने सीताके लिये इतना विलाप क्यों किया? और यदि उन्हें आत्मज्ञान नहीं था, तो वे अन्य सामान्य जीवोंके समान ही हुए; फिर उनका भजन क्यों किया जाना चाहिये? इस विषयमें आपका क्या विचार है सो ऐसे वाक्योंमें कहिये जिससे मेरा सन्देह निवृत्त हो जाय ॥१४-१५॥

श्रीमहादेवजी बोले—देवि! तुम धन्य हो, तुम परमात्माकी परम भक्त हो, जो तुम्हें रामका तत्त्व जाननेकी इच्छा हुई है। इससे पूर्व, इस परमगूढ़ रहस्यका वर्णन करनेके लिये मुझसे और किसीने नहीं कहा ॥१६॥ आज तुमने मुझसे भक्तिपूर्वक प्रश्न किया है इसलिये मैं श्रीरघुनाथजीकी वन्दनाकर तुम्हारे प्रश्नका उत्तर देता हूँ। श्रीरामचन्द्रजी निःसन्देह प्रकृतिसे परे, परमात्मा, अनादि, आनन्दघन, अद्वितीय और पुरुषोत्तम हैं ॥१७॥ जो अपनी मायासे ही इस सम्पूर्ण जगतको रचकर इसके बाहर-भीतर सब ओर आकाशके समान व्याप्त हैं तथा जो आत्मारूपसे सबके अन्तःकरणमें स्थित हुए अपनी मायासे इस विश्वको परिचालित कर रहे हैं ॥१८॥ चुम्बकके निकट होनेसे जिसप्रकार जड लोहेमें गति उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार जिनकी सन्निधिमात्रसे यह विश्व सदा सब ओर भ्रमता रहता है उन परमात्मा रामको, जिनका हृदय आत्माके अज्ञानसे ढँका हुआ है वे मूढ़जन नहीं जान सकते ॥१९॥ वे मूढ़ उन मायातीत शुद्ध-बुद्ध परमात्मामें भी अपने अज्ञानको आरोपित करते हैं अर्थात् उन्हें भी अपने समान ही अज्ञानी मानते हैं, तथा वे सर्वदा स्त्री-पुत्रादिमें आसक्त रहनेवाले पामर जीव बहुत-से कर्मोंमें लगे रहकर संसार-चक्रमें ही पड़े रहते हैं ॥२०॥ वे अज्ञान अपने गलेमें पड़े हुए कण्ठेको न जाननेके समान अपने ही हृदयमें स्थित परमात्मा रामको नहीं जानते (इसीलिये उनमें अज्ञानादिका आरोप करते हैं)। वास्तवमें तो जिस प्रकार सूर्यमें कभी अन्धकार नहीं रहता उसी प्रकार प्रकृत्यादिसे अतीत, विशुद्ध-विज्ञानघन, ज्योतिःस्वरूप, परमेश्वर परमात्मा राममें भी अविद्या नहीं रह सकती ॥२१॥ और जिस प्रकार चक्कर लगाते समय मनुष्यको नेत्रोंके घूमनेसे गृह आदि भी घूमते हुए प्रतीत होते हैं उसी प्रकार लोग अपने देह और इन्द्रियरूप कतकि

बालकाण्ड - सर्ग २: भारपीडिता पृथिवीका ब्रह्मादि देवताओंके पास जाना...

अध्यात्मरामायण [ सर्ग १


तथैव देहेन्द्रियकर्तुरात्मनः
कृतं परेऽध्यस्य जनो विमुह्यति ॥२२॥
किये हुए कर्मोंका आत्मामें आरोप करके मोहित हो जाते हैं ॥२२॥


नाहो न रात्रिः सवितुर्यथा भवेत्
प्रकाशरूपान्यभिचारतः क्वचित् ।
ज्ञानं तथाऽज्ञानमिदं द्वयं हरौ
रामे कथं स्थास्यति शुद्धचिद्धने ॥२३॥
प्रकाश-रूपताका कभी व्यभिचार न होनेसे जिस प्रकार सूर्यमें रात-दिनका भेद नहीं होता—वह सर्वदा एक समान प्रकाशमान रहता है—उसी प्रकार शुद्धचेतनघन भगवान् राममें ज्ञान और अज्ञान दोनों कैसे रह सकते हैं ? ॥२३॥


तस्मात्परानन्दमये रघूत्तमे
विज्ञानरूपे हि न विद्यते तमः ।
अज्ञानसाक्षिण्यरविन्दलोचने
मायाश्रयत्वान्न हि मोहकारणम् ॥२४॥
अतएव परानन्दस्वरूप विज्ञानघन अज्ञान-साक्षी कमलनयन भगवान् राममें अज्ञानका लेश भी नहीं है क्योंकि वे मायाके अधिष्ठान हैं इसलिये वह उन्हें मोहित नहीं कर सकती ॥२४॥


अत्र ते कथयिष्यामि रहस्यमपि दुर्लभम् ।
सीताराममरुत्सूनुसंवादं मोक्षसाधनम् ॥२५॥
हे पार्वति ! इस विषयमें मैं तुम्हें सीता, राम और हनुमान्‌जीका मोक्षका साधन-रूप संवाद सुनाता हूँ जो अत्यन्त गोपनीय और परम दुर्लभ है ॥२५॥


पुरा रामायणे रामो रावणं देवकण्टकम् ।
हत्वा रणे रणश्लाघी सपुत्रबलवाहनम् ॥२६॥
सीतया सह सुग्रीवलक्ष्मणाभ्यां समन्वितः ।
अयोध्यामगमद्रामो हनूमत्प्रमुखैर्वृतः ॥२७॥
पूर्वकालमें रामावतारके समय जब युद्धप्रिय श्रीरामचन्द्रजी देवताओंके कण्टकरूप रावणको संतान, सेना और वाहनोंके सहित युद्धमें मारकर सीता, सुग्रीव और लक्ष्मणके सहित हनुमान् आदि वानरोंसे घिरे हुए अयोध्यापुरीमें आये ॥ २६-२७ ॥


अभिषिक्तः परिवृतो वसिष्ठाद्यैर्महात्मभिः ।
सिंहासने समासीनः कोटिसूर्यसमप्रभः ॥२८॥
दृष्ट्वा तदा हनूमन्तं प्राञ्जलिं पुरतः स्थितम् ।
कृतकार्यं निराकाङ्क्षं ज्ञानापेक्षं महामतिम् ॥२९॥
रामः सीतामुवाचेदं ब्रूहि तत्त्वं हनूमते ।
निष्कल्मषोऽयं ज्ञानस्य पात्रं नौ नित्यभक्तिमान् ॥३०
और वहाँ आकर राज्याभिषेक होनेपर वसिष्ठ आदि महात्माओंसे घिर कर करोड़ों सूर्योंकी प्रभा धारणकर जब सिंहासनपर विराजमान हुए ॥२८॥ उस समय कृतकृत्य और भोगेच्छारहित महामति हनुमान्‌जीको ज्ञानाभिलाषासे अपने सम्मुख हाथ जोड़े खड़े देखकर श्रीरामचन्द्रजीने सीताजीसे ऐसा कहा—"सीते ! यह हनुमान् हम दोनोंमें अत्यन्त भक्ति रखता है, इसलिये यह निष्पाप है और ज्ञानका सुयोग्य पात्र है। अतः तुम इसे मेरे तत्त्वका उपदेश करो" ॥ २९-३० ॥


तथेति जानकी प्राह तत्त्वं रामस्य निश्चितम् ।
हनूमते प्रपन्नाय सीता लोकविमोहिनी ॥३१॥
तब लोक-विमोहिनी जनकनन्दिनी सीताजी श्रीरामचन्द्रजीसे 'बहुत अच्छा' कह शरणागत हनुमान्‌को भगवान् रामका निश्चित तत्त्व बताने लगीं।३ १


रामं विद्धि परं ब्रह्म सच्चिदानन्दमद्वयम् ।
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं सत्तामात्रमगोचरम् ॥३२॥
आनन्दं निर्मलं शान्तं निर्विकारं निरञ्जनम् ।
सर्वव्यापिनमात्मानं स्वप्रकाशमकल्मषम् ॥३३॥
सीताजीने कहा—"वत्स हनुमान् ! तुम रामको साक्षात् अद्वितीय सच्चिदानन्दघन परब्रह्म समझो; ये निःसन्देह समस्त उपाधियोंसे रहित, सत्तामात्र, इन्द्रियोंके अविषय, आनन्दघन, निर्मल, शान्त, निर्विकार, निरञ्जन, सर्व-व्यापक, स्वयंप्रकाश और पापहीन परमात्मा ही हैं ॥३२-३३॥


मां विद्धि मूलप्रकृतिं सर्गस्थित्यन्तकारिणीम् ।
तस्य सन्निधिमात्रेण सृजामीदमतान्द्रता ॥३४॥
और मुझे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और अन्त करनेवाली मूल-प्रकृति जानो। मैं ही निरालस्य होकर इनकी सन्निधिमात्रसे इस विश्वकी रचना किया

सर्ग १ ] बालकाण्डे


तत्सान्निध्यान्मया सृष्टं तस्मिन्नारोप्यतेऽबुधैः।<br>अयोध्यानगरे जन्म रघुवंशेऽतिनिर्मले ॥३५॥<br>विश्वामित्रसहायत्वं मखसंरक्षणं ततः।<br>अहल्याशापशमनं चापभङ्गो महेशितुः ॥३६॥<br>मत्पाणिग्रहणं पश्चाद्भार्गवस्य मदक्षयः।<br>अयोध्यानगरे वासो मया द्वादशवार्षिकः॥३७॥<br>दण्डकारण्यगमनं विराधवध एव च।<br>मायामारीचमरणं मायासीताहृतिस्तथा ॥३८॥<br>जटायुषो मोक्षलाभः कबन्धस्य तथैव च।<br>शबर्याः पूजनं पश्चात्सुग्रीवेण समागमः ॥३९॥<br>वालिनश्च वधः पश्चात्सीतान्वेषणमेव च।<br>सेतुबन्धश्च जलधौ लंकायाश्च निरोधनम् ॥४०॥<br>रावणस्य वधो युद्धे सपुत्रस्य दुरात्मनः।<br>विभीषणे राज्यदानं पुष्पकेण मया सह ॥४१॥<br>अयोध्यागमनं पश्चाद्राज्ये रामाभिषेचनम्।<br>एवमादीनि कर्माणि मयैवाचरितान्यपि।<br>आरोपयन्ति रामेऽस्मिन्निर्विकारेऽखिलात्मनि ४२<br>रामो न गच्छति न तिष्ठति नानुशोच-<br>त्याकाङ्क्षते त्यजति नो न करोति किञ्चित्।<br>आनन्दमूर्तिरचलः परिणामहीनो<br>मायागुणाननुगतो हि तथा विभाति ॥४३॥<br><br>ततो रामः स्वयं प्राह हनूमन्तमुपस्थितम्।<br>शृणु तत्त्वं प्रवक्ष्यामि ह्यात्मानात्मपरात्मनाम् ४४<br>आकाशस्य यथा भेदस्त्रिविधो दृश्यते महान्।<br>जलाशये महाकाशस्तदवच्छिन्न एव हि।<br>प्रतिबिम्बाख्यमपरं दृश्यते त्रिविधं नभः ॥४५॥करती हूँ ॥३४॥ तो भी इनकी सन्निधिमात्रसे की हुई मेरी रचनाको बुद्धिहीन लोग इनमें आरोपित कर लेते हैं। अतएव, अयोध्‍यापुरीमें अत्यन्त पवित्र रघुकुलमें इनका जन्म लेना ॥ ३५ ॥ फिर विश्वामित्रजीकी सहायता करना, उनके यज्ञकी रक्षा करना, अहल्याको शाप-मुक्त करना, श्रीमहादेवजीके धनुषको तोड़ना ॥ ३६ ॥ तत्पश्चात् मेरा पाणिग्रहण करना, परशुरामजीका गर्व-खण्डन करना तथा बारह वर्षतक मेरे साथ अयोध्‍यापुरीमें रहना ॥ ३७॥ फिर दण्डकारण्यमें जाना, विराधका वध करना, माया-मृगरूप मारीचका मारा जाना, मायामयी सीताका हरा जाना ॥ ३८ ॥ तदनन्तर जटायु और कबन्धका मुक्त होना, शबरीद्वारा भगवान्‌का पूजित होना और सुग्रीवसे मित्रता होना ॥ ३९ ॥ फिर बालिका वध करना, सीताजीकी खोज कराना, समुद्रका पुल बँधवाना और लङ्कापुरीको घेर लेना ॥ ४० ॥ तथा पुत्रोंके सहित दुरात्मा रावणको युद्धमें मारना एवं विभीषणको लङ्काका राज्य देकर पुष्पक-विमानद्वारा मेरे साथ अयोध्या लौट आना, फिर श्रीरामजीका राज्यपदपर अभिषिक्त होना—इत्यादि समस्त कर्म यद्यपि मेरे ही किये हुए हैं तो भी अज्ञानी लोग उन्हें इन निर्विकार सर्वात्मा भगवान् राममें आरोपित करते हैं ॥ ४१-४२ ॥ ये राम तो (वास्तवमें) न चलते हैं, न ठहरते हैं, न शोक करते हैं, न इच्छा करते हैं, न त्यागते हैं और न कोई अन्य क्रिया ही करते हैं। ये आनन्दस्वरूप, अविचल और परिणामहीन हैं, केवल मायाके गुणोंसे व्याप्त होनेके कारण ही ये वैसे प्रतीत होते हैं॥ ४३ ॥<br><br>तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने सम्मुख खड़े हुए पवनपुत्र हनुमान्‌से स्वयं कहा—"मैं तुम्हें आत्मा, अनात्मा और परमात्माका तत्त्व बताता हूँ, (सावधान होकर) सुनो ॥ ४४ ॥ जलाशयमें आकाशके तीन भेद स्पष्ट दिखायी देते हैं—एक महाकाश¹, दूसरा जला‌वच्छिन्न आकाश² और तीसरा प्रतिबिम्बाकाश³। जैसे आकाशके ये तीन बड़े-बड़े भेद दिखायी देते हैं ॥४५॥ उसी प्रकार चेतन भी तीन प्रकारका

¹ १, जो सर्वत्र व्याप्त है। ² २, जो केवल जलाशयमें ही परिमित है। ³ ३, जो जलमें प्रतिबिम्बित है।

अध्यात्मरामायणं[ सर्ग १

बुद्धयवच्छिन्नचैतन्यमेकं पूर्णमथापरम्।
आभासस्त्वपरं विम्बभूतमेवं त्रिधा चितिः॥४६॥

साभासबुद्धेः कर्तृत्वमविच्छिन्नेऽविकारिणि।
साक्षिण्यारोप्यते भ्रान्त्या जीवत्वं च तथाऽबुधैः॥४७

आभासस्तु मृषा बुद्धिरविद्याकार्यमुच्यते।
अविच्छिन्नं तु तद्ब्रह्म विच्छेदस्तु विकल्पतः ४८

अविच्छिन्नस्य पूर्णेन एकत्वं प्रतिपाद्यते।
तत्त्वमस्यादिवाक्यैश्च साभासस्याहमस्तथा॥४९॥

ऐक्यज्ञानं यदोत्पन्नं महावाक्येन चात्मनोः।
तदाऽविद्या स्वकार्यैश्च नश्यत्येव न संशयः॥५०॥

एतद्विज्ञाय मद्भक्तो मद्भावायोपपद्यते।
मद्भक्तिविमुखानां हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम्।
न ज्ञानं न च मोक्षः स्यात्तेषां जन्मशतैरपि॥५१॥

इदं रहस्यं हृदयं ममात्मनो
मयैव साक्षात्कथितं तवानघ।
मद्भक्तिहीनाय शठाय न त्वया
दातव्यमैन्द्रादपि राज्यतोऽधिकम्॥५२॥

श्रीमहादेव उवाच
एतत्तेऽभिहितं देवि श्रीरामहृदयं मया।
अतिगुह्यतमं हृद्यं पवित्रं पापशोधनम्॥५३॥
साक्षाद्रामेण कथितं सर्ववेदान्तसंग्रहम्।
यः पठेत्सततं भक्त्या स मुक्तो नात्र संशयः॥५४॥
ब्रह्महत्यादिपापानि बहुजन्मार्जितान्यपि।
नश्यन्त्येव न सन्देहो रामस्य वचनं यथा॥५५॥


है—एक तो बुद्धयवच्छिन्न चेतन (जो बुद्धिमें व्याप्त है), दूसरा जो सर्वत्र परिपूर्ण है और तीसरा जो बुद्धिमें प्रतिबिम्बित होता है—जिसको आभासचेतन कहते हैं॥४६॥ इनमेंसे केवल आभास-चेतनके सहित बुद्धिमें ही कर्तृत्व है अर्थात् चिदाभासके सहित बुद्धि ही सब कार्य करती है। किन्तु अज्ञजन भ्रान्तिवश निरवच्छिन्न, निर्विकार, साक्षी आत्मामें कर्तृत्व और जीवत्वका आरोप करते हैं अर्थात् उसे ही कर्त्ता-भोक्ता मान लेते हैं॥४७॥ (हमने जिसे जीव कहा है, उसमें) आभास-चेतन तो मिथ्या है (क्योंकि सभी आभास मिथ्या ही हुआ करते हैं)। बुद्धि अविद्याका कार्य है और परब्रह्म परमात्मा वास्तवमें विच्छेदरहित है अतः उसका विच्छेद भी विकल्पसे ही माना हुआ है॥४८॥ (इसी प्रकार उपाधियोंका बाध करते हुए) साभास अहंकरूप अवच्छिन्न चेतन (जीव) की 'तत्त्वमसि' (त. वह है) आदि महावाक्योंद्वारा पूर्ण चेतन (ब्रह्म) के साथ एकता बतलायी जाती है॥४९॥ जब महावाक्यद्वारा (इस-प्रकार) जीवात्मा और परमात्माकी एकताका ज्ञान उत्पन्न हो जाता है उस समय अपने कार्योंसहित अविद्या नष्ट हो ही जाती है—इसमें कोई सन्देह नहीं॥५०॥ मेरा भक्त इस उपर्युक्त तत्त्वको समझ-कर मेरे स्वरूपको प्राप्त होनेका पात्र हो जाता है; पर जो लोग मेरी भक्तिको छोड़कर शास्त्ररूप गढ़ेमें पड़े भटकते रहते हैं उन्हें सौ जन्मतक भी न तो ज्ञान होता है और न मोक्ष ही प्राप्त होता है॥५१॥ हे अनघ! यह परम रहस्य मुझ आत्मस्वरूप रामका हृदय है; और साक्षात् मैंने ही तुम्हें सुनाया है। यदि तुम्हें इन्द्रलोकके राज्यसे भी अधिक सम्पत्ति मिले तो भी तुम इसे मेरी भक्तिसे हीन किसी दुष्ट पुरुषको मत सुनाना"॥५२॥

श्रीमहादेवजी बोले—हे देवि! मैंने तुम्हें यह अत्यन्त गोपनीय, हृदयहारी, परम पवित्र और पापनाशक 'श्रीरामहृदय' सुनाया है॥५३॥ यह समस्त वेदान्तका सार-संग्रह साक्षात् श्रीरामचन्द्रजीका कहा हुआ है। जो कोई इसे भक्तिपूर्वक पढ़ता है वह निस्सन्देह मुक्त हो जाता है॥५४॥ इसके पठन-मात्रसे अनेक जन्मोंके सञ्चित ब्रह्महत्यादि समस्त पाप निस्सन्देह नष्ट हो जाते हैं, क्योंकि श्रीरामके वचन

सर्ग २ ] बालकाण्ड


योऽतिभ्रष्टोऽतिपापी परधनपरदा-<br>    रेषु नित्योद्यतो वा<br>स्तेयी ब्रह्मघ्नमातापितृवधनिरतो<br>    योगिवृन्दोपकारी।<br>यः संपूज्याभिरामं पठति च हृदयं<br>    रामचन्द्रस्य भक्त्या<br>योगीन्द्रैरप्यलभ्यं पदमिह लभते<br>  सर्वदेवैः स पूज्यम् ॥ ५६॥ऐसे ही हैं ॥ ५५ ॥ जो कोई अत्यन्त भ्रष्ट, अतिशय पापी, परधन और परस्त्रियोंमें सदा प्रवृत्त रहनेवाला, चोर, ब्रह्म-हत्यारा, माता-पिताका वध करनेमें लगा हुआ और योगिजनोंका अहित करनेवाला मनुष्य भी श्रीरामचन्द्रजीका पूजनकर इस रामहृदयका भक्तिपूर्वक पाठ करता है वह समस्त देवताओंके पूज्य उस परमपदको प्राप्त होता है जो योगिराजोंको भी परम दुर्लभ है ॥५६॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे बालकाण्डे<br>श्रीरामहृदयं नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥


द्वितीय सर्ग

भारपीडिता पृथिवीका ब्रह्मादि देवताओंके पास जाना और भगवान्‌का उनकी प्रार्थनासे प्रकट होकर उन्हें धैर्य बँधाना।

पार्वत्युवाच<br>धन्यास्म्यनुगृहीतास्मि कृतार्थास्मि जगत्प्रभो।<br>विच्छिन्नो मेऽतिसन्देहग्रन्थिर्भवदनुग्रहात् ॥ १ ॥<br>त्वन्मुखाद्गलितं रामतत्त्वामृतरसायनम्।<br>पिबन्त्या मे मनो देव न तृप्यति भवापहम् ॥ २ ॥<br>श्रीरामस्य कथा त्वत्तः श्रुता संक्षेपतो मया।<br>इदानीं श्रोतुमिच्छामि विस्तरेण स्फुटाक्षरम् ॥ ३ ॥<br><br>श्रीमहादेव उवाच<br>शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत्।<br>अध्यात्मरामचरितं रामेणोक्तं पुरा मम ॥ ४ ॥<br>तदद्य कथयिष्यामि शृणु तापत्रयापहम्।<br>यच्छ्रुत्वा मुच्यते जन्तुरज्ञानोत्थमहाभयात्।<br>प्राप्नोति परमासृद्धिं दीर्घायुः पुत्रसन्ततिम् ॥ ५ ॥<br>भूमिर्भारेण मग्ना दशवदनमुखा-<br>    शेषरक्षोगणानां<br>धृत्वा गोरूपमादौ दिविजमुनिजनैः<br>    साकमब्जासनस्य।पार्वतीजी बोलीं— हे जगत्प्रभो ! आपकी कृपासे अनुगृहीत होकर मैं धन्य और कृतकृत्य हो गयी तथा मेरी कठिन सन्देहग्रन्थि टूट गयी ॥ १ ॥ हे देव ! आपके मुखसे चूते हुए भवभयहारी रामतत्त्वरूप अमृतमय रसायनका पान करते-करते मेरा मन तृप्त नहीं होता ॥ २ ॥ मैंने आपके मुखसे श्रीरामचन्द्रजीकी कथा संक्षेपसे सुनी। अब मैं उसे स्पष्ट शब्दोंमें विस्तारपूर्वक सुनना चाहती हूँ ॥ ३ ॥<br><br>श्रीमहादेवजी बोले— हे देवि ! सुनो, मैं तुम्हें गुह्यसे भी गुह्य महान् अध्यात्मरामायण सुनाता हूँ जो पहले मुझे श्रीरामचन्द्रजीने ही सुनायी थी ॥ ४ ॥ अब मैं तुम्हें वह तापत्रयहारिणी अध्यात्मरामायण सुनाता हूँ, सावधान होकर सुनो। इसके सुननेसे जीव अज्ञानजन्य महाभयसे छूट जाता है और परम ऐश्वर्य, दीर्घ आयु तथा पुत्र-पौत्रादि प्राप्त करता है ॥ ५ ॥<br>एक बार रावण आदि राक्षसोंके भारसे व्यथित हो पृथिवी गौका रूप धारणकर देवता और मुनिजनोंके सहित श्रीब्रह्माजीके लोकको गयी। वहाँ पहुँचकर उसने रोते हुए, अपनेपर पड़ा हुआ सारा दुःख

· १० अध्यात्मरामायण [ सर्ग २


· गत्वा लोकं रुदन्ती व्यसनमुपगतं<br>    ब्रह्मणे प्राह सर्वं<br>ब्रह्मा ध्यात्वा मुहूर्तं सकलमपि हृदा-<br>    ऽवेदशेषामकत्वात् ॥ ६ ॥ब्रह्माजीसे कहा। तब ब्रह्माजीने एक मुहूर्ततक ध्यानस्थ हो अपने मनमें उसकी दुःख-निवृत्तिका सम्पूर्ण उपाय जान लिया क्योंकि वे सर्वान्तर्यामी हैं॥ ६ ॥ तत्पश्चात्
तस्मात्क्षीरसमुद्रतीरमगमद्<br>    ब्रह्माथ देवैर्वृतो<br>देव्या चाखिललोकहृत्स्थमजरं<br>    सर्वज्ञमीशं हरिम् ।<br>अस्तौषीच्छ्रुतिसिद्धनिर्मलपदैः<br>    स्तोत्रैः पुराणोद्भवै-<br>र्भक्त्या गद्गदया गिरातिविमलै-<br>    रानन्दवाष्पैर्वृतः ॥ ७ ॥वहाँसे समस्त देवताओंके सहित श्रीब्रह्माजी पृथिवीको साथ लेकर क्षीरसागरके तटपर गये और वहाँ उन्होंने अत्यन्त निर्मल आनन्दाश्रुओंसे परिप्लुत हो अखिल-लोकान्तर्यामी, अजर, सर्वज्ञ, भगवान् हरिकी अति निर्मल भक्तियुक्त गद्गद-वाणीसे श्रुतिसिद्ध विमल पदों और पुराणोक्त स्तोत्रोंद्वारा स्तुति की ॥ ७ ॥ तब सहस्रों
ततः स्फुरत्सहस्रांशुसहस्रसदृशप्रभः ।<br>आविरासीद्धरिः प्राच्यां दिशं व्यपनयंस्तमः ॥८॥देदीप्यमान सूर्योंके समान प्रभावान् भगवान् हरि (अपने तेजसे) सब दिशाओंके अन्धकारको दूर करते हुए पूर्व-दिशामें प्रकट हुए ॥ ८ ॥ पुण्य-
कथंचिद्ददृशूवान्ब्रह्मा दुर्दर्शमकृतात्मनाम् ।<br>इन्द्रनीलप्रतीकाशं सितास्यं पद्मलोचनम् ॥ ९ ॥हीन पुरुषोंके लिये अत्यन्त दुर्दर्शनीय भगवान् हरिको (उनके अमित तेजके कारण) ब्रह्माजीने भी बड़ी कठिनतासे देख पाया। इन्द्रनीलमणिके समान उनका तेजोमय श्याम वर्ण था, मुखपर मधुर मुसकान थी और कमलके समान विशाल और मनोहर नेत्र थे ॥ ९ ॥
किरीटहारकेयूरकुण्डलैः कटकादिभिः ।<br>विभ्राजमानं श्रीवत्सकौस्तुभप्रभयान्वितम् ॥१०॥वे किरीट, हार, केयूर, कुण्डल और कटक आदि आभूषणोंसे सुशोभित तथा श्रीवत्स और कौस्तुभमणिकी प्रभासे युक्त थे॥ १० ॥
स्तुवद्भिः सनकाद्यैश्च पार्षदैः परिवेष्टितम् । ·<br>शङ्खचक्रगदापद्मवनमालाविरोजितम् ॥११॥उन्हें स्तुति करते हुए सनकादि पार्षद चारों ओरसे घेरे हुए थे और उनकी शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमालासे अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ ११ ॥
स्वर्णयज्ञोपवीतेन स्वर्णवर्णाम्बरेण च ।<br>श्रिया भूम्या च सहितं गरुडोपरि संस्थितम् ॥१२॥वे सुनहरे यज्ञोपवीत और पीताम्बरसे सुशोभित एवं लक्ष्मी और भूमिके सहित गरुडपर विराजमान थे।
हर्षगद्गदया वाचा स्तोतुं समुपचक्रमे ॥१३॥(उनकी ऐसी दिव्य छविको देखकर) पितामह ब्रह्माजी हर्षसे गद्गदकण्ठ हो स्तुति करने लगे ॥ १२-१३ ॥
ब्रह्मोवाच<br>नतोऽस्मि ते पदं देव प्राणबुद्धीन्द्रियात्मभिः ।<br>यच्चिन्त्यते कर्मपाशाद्दृष्टदि नित्यं मुमुक्षुभिः॥१४॥**ब्रह्माजी बोले—**हे देव ! कर्म-पाशसे मुक्त होनेके लिये मुमुक्षुजन अपने प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय और मनसे जिनका नित्य चिन्तन करते हैं आपके उन चरणारविन्दों-को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १४ ॥
मायया गुणमय्या त्वं सृजस्यवसि लुम्पसि ।<br>जगत्वेन न ते लेप आनन्दानुभवात्मनः ॥१५॥आप अपनी त्रिगुणमयी मायाका आश्रय करके ही इस जगत्‌की उत्पत्ति, पालन और लय करते हैं; किन्तु ज्ञानानन्दस्वरूप आप इससे लिप्त नहीं होते ॥ १५ ॥
तथा शुद्धिर्न दुष्टानां दानाध्ययनकर्मभिः ।<br>शुद्धात्मता ते यशसि सदा भक्तिमतां यथा ॥१६॥हे भगवन् ! आपके विमल यशमें सदा प्रेम रखनेवाले भक्तोंका अन्तःकरण जैसा शुद्ध होता है वैसी शुद्धि मलिन अन्तःकरणवाले पुरुष दान और अध्ययन आदि शुभ कर्मोंसे नहीं प्राप्त कर सकते ॥ १६ ॥ अतः भक्त मुनि-

सर्ग २] बालकाण्ड ११


अतस्तवाङ्घ्रिर्मे दृष्टश्चित्तदोषापनुत्तये ।<br>सद्योऽन्तर्हृदये नित्यं मुनिभिः सात्वतैर्वृतः ॥ १७॥जन जिनका निरन्तर अपने हृदयमें ध्यान करते हैं ऐसे आपके चरण-कमलोंका आज मैंने अपने अन्तःकरणके दोषोंका तत्क्षण नाश करनेके लिये दर्शन किया है ॥ १७ ॥
ब्रह्माद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थमस्माभिः पूर्वसेवितः ।<br>अपरोक्षानुभूत्यर्थं ज्ञानिभिर्हृदि भावितः ॥ १८॥आपके इन चरण-कमलोंका पहले भी हम ब्रह्मा आदि देवगणने अपनी स्वार्थ-सिद्धिके लिये सेवन किया है और ज्ञानी मुनिजनोंने अपरोक्षानुभवके लिये अपने हृदयमें निरन्तर ध्यान किया है ॥ १८ ॥
तवाङ्घ्रिपूजानिर्माल्यतुलसीमालया विभो ।<br>स्पर्धते वक्षसि पदं लब्ध्वापि श्रीः सपत्निवत् ॥ १९॥हे विभो ! लक्ष्मीजी आपके वक्षःस्थलमें स्थान पाकर भी आपकी चरणपूजाके समय चढ़ी हुई तुलसीकी मालासे सौतकी तरह डाह करती हैं ॥ १९ ॥
अतस्त्वत्पादभक्तेषु तव भक्तिः श्रियोऽधिका ।<br>भक्तिमेवाभिवाञ्छन्ति त्वद्भक्ताः सारवेदिनः ॥ २०॥आपके चरण-कमलोंमें प्रेम रखनेवाले भक्तोंमें आपका प्रेम लक्ष्मीजीसे भी बढ़कर है । इसलिये आपके सारग्राही भक्तजन केवल आपकी भक्तिकी ही इच्छा करते हैं ॥ २० ॥
अतस्त्वत्पादकमले भक्तिरेव सदाऽस्तु मे ।<br>संसारामयतप्तानां भेषजं भक्तिरेव ते ॥ २१॥अतएव हे देव ! आपके चरण-कमलोंमें मेरी सर्वदा भक्ति रहे क्योंकि संसार-रोगके रोगियोंके लिये आपकी भक्ति ही एकमात्र औषध है ॥ २१ ॥
इति ब्रुवन्तं ब्रह्माणं बभाषे भगवान् हरिः ।<br>किं करोमीति तं वेधाः प्रत्युवाचातिहर्षितः ॥ २२॥इस प्रकार स्तुति करते हुए ब्रह्मासे भगवान् हरिने कहा, “मैं तुम्हारा क्या कार्य करूँ?” तब ब्रह्माने अत्यन्त प्रसन्न होकर उनसे कहा ॥ २२ ॥
भगवन् रावणो नाम पौलस्त्यतनयो महान् ।<br>राक्षसानामधिपतिर्मद्दत्तवरदर्पितः ॥ २३॥“भगवन् ! पुलस्त्य-नन्दन विश्रवाका पुत्र रावण राक्षसोंका राजा है। वह मेरे वरके प्रभावसे अत्यन्त अभिमानी हो गया है ॥ २३ ॥
त्रिलोकीं लोकपालांश्च बाधते विश्वबाधकः ।<br>मानुषेण मृतिस्तस्य मया कल्याण कल्पिता ॥<br>अतस्त्वं मानुषो भूत्वा जहि देवरिपुं प्रभो ॥ २४॥वह सम्पूर्ण विश्वका बाधक तीनों लोकों और लोक-पालोंको पीड़ा पहुँचाता है। हे कल्याणरूप ! मैंने उसकी मृत्यु मनुष्यके हाथ रखी है। इसलिये हे प्रभो ! आप मनुष्य-रूप धारणकर उस देवशत्रुका वध कीजिये” ॥ २४ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>कश्यपस्य वरो दत्तस्तपसा तोषितेन मे ॥ २५॥<br>याचितः पुत्रभावाय तथेत्यङ्गीकृतं मया ।<br>स इदानीं दशरथो भूत्वा तिष्ठति भूतले ॥ २६॥**श्रीभगवान् बोले—**मैंने कश्यपकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर उन्हें वर दिया था। उन्होंने मुझसे पुत्ररूपसे उत्पन्न होनेकी प्रार्थना की थी, तब मैंने ‘बहुत अच्छा’ कह उसे स्वीकार कर लिया था। इस समय वे पृथिवीपर राजा दशरथ होकर विद्यमान हैं ॥ २५-२६ ॥
तस्याहं पुत्रतामेत्य कौसल्यायां शुभे दिने ।<br>चतुर्धात्मानमेवाहं सृजामीतरयोः पृथक् ॥ २७॥उन्हींके यहाँ पुत्ररूपसे पृथक्-पृथक् चार अंशोंमें प्रकट होकर मैं शुभ दिनमें कौशल्याके और अन्य दो माताओंके गर्भसे जन्म लूँगा ॥ २७ ॥
योगमायापि सीतेति जनकस्य गृहे तदा ।<br>उत्पत्स्यते तया सार्धं सर्वं सम्पादयाम्यहम् ॥<br>इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे विष्णुर्ब्रह्मा देवानथाब्रवीत् ॥ २८॥उसी समय मेरी योगमाया भी जनकजीके घरमें सीतारूपसे उत्पन्न होगी; उसको साथ लेकर मैं तुम्हारा सम्पूर्ण कार्य सिद्ध करूँगा। ऐसा कह भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये; तब ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा ॥ २८ ॥