ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri १५० [ दूसरी पञ्चिका हैं। अनुष्टुभ् छन्द का शस्त्र इस प्रकार स्तोत्र के गायत्री छन्दों के बराबर हो जाता है। होता के आज्य शस्त्र का याज्य मन्त्र यह है। अग्न इन्द्रश्च दाशुषो दुरोणे सुता॒वतो य॒ज्ञमिहोप॑ यातम्। अमर्धन्ता सोम॑ पेयाय देवा ॥ (ऋ० ३।२५।४) (यहाँ 'इन्द्राग्नी' के बजाय अग्नि-इन्द्र कहा है। इसका कारण यह है कि) इन्होंने इन्द्राग्नी के रूप में विजय नहीं पाई किन्तु "अग्नीन्द्रौ" के रूप में। अग्नीन्द्र का याज्य वह विजय पाने के लिये पढ़ता है। यह मन्त्र विराट् छन्द में है जो तेतीस अक्षर का होता है। देव तेतीस हैं, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य ; एक प्रजापति और एक वषट्कार । इस प्रकार वह पहले ही शस्त्र में एक एक अक्षर एक एक देवता के लिये कह देता है। अक्षरों के क्रम से ही देव सोमपान करते हैं। इस प्रकार देवपात्र से देवता तृप्त हो जाते हैं। अब प्रश्न यह है कि जब याज्य मन्त्र शस्त्र के अनुकूल होना चाहिये तो आज्य शस्त्र केवल अग्नि का है, फिर याज्य मन्त्र अग्नीन्द्र का क्यों है ? इसका उत्तर यह है कि अग्नि-इन्द्र याज्य वही है जो इन्द्राग्नी याज्य है। यह इन्द्राग्नी का शस्त्र है जैसा ग्रह और तूष्णींशंस से प्रकट होता है। अध्वर्यु नीचे के मन्त्र से ग्रह को लेता है :– इन्द्राग्नी आ गतं सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्। अस्य पातं धियेषि॒ता ॥ (ऋ० ३।१२।१) "हे इन्द्र और अग्नि, स्तुतियों के साथ बादल के समान पवित्र सोम के पास आओ। और बुद्धि से प्रेरित होकर इसको पियो"। होता की तूष्णीं-शंस या "चुपचाप प्रार्थना" यह है:–
पांचवाँ अध्याय ] १५१ “भूरग्निज्योतिरग्निर्इन्द्रो ज्योतिर्भुवो ज्योतिरिन्द्रः सूर्योज्योतिर्ज्योतिः स्वः सूर्यः” । (५) ३८—होता का जप रेत या वीर्य है । वीर्य सिंचन चुपचाप होता है । इसी प्रकार जप भी चुपचाप होता है । यह भी वीर्य- सिंचन ही है । 'आहाव' से पहले जप होता है । आहाव से पीछे जो कुछ होता है वह शस्त्र है । होता 'आहाव' को अध्वर्यु के प्रति उस समय कहता है जब अध्वर्यु चारों पैरों पर ( पशु के समान ) भूमि पर पड़ा होता है । और उसका मुँह दूसरो ओर होता है । चौपाये मुँह को फेर कर वीर्यसिंचन करते हैं । अब अध्वर्यु दो पैरों पर खड़ा हो जाता है और सामने मुँह कर लेता है क्योंकि मनुष्य (दुपाये) सामने मुँह करके वीर्य सिंचन करते हैं । जप के भिन्न-भिन्न भाग यह हैं :— “पिता मातरिश्वा” प्राण पिता है । प्राण मातरिश्वा है । प्राण वीर्य है । इन शब्दों को कहकर मानो वीर्यसिंचन करता है । “अच्छिद्रा पदाद्या” वीर्य छिद्र-रहित है । इस लिये इस छिद्ररहित या पूर्ण का जन्म होता है । “अच्छिद्रोक्थाकवयः शंसन” जो पढ़े हुये हैं वह कवि हैं । उन्होंने इस पूर्ण वीर्य को उत्पन्न किया । अब कहता है :— “सोमो विश्वविन् नीथानिनेषदू बृहस्पतिरुक्था मदानि शंसिषदू ।” बृहस्पति ब्राह्मण है । स्तुति किया गया सोम क्षत्रिय है । “नीथानि” और “उक्था मदानि” शस्त्र हैं । दैवी ब्राह्मण और
१५२ [ दूसरी पञ्चिका दैवी क्षत्रिय से प्रेरित होकर होता शस्त्र पढ़ता है। यह दोनों (बृहस्पति और सोम) समस्त जगत् या जो कुछ है उस पर शासन करते हैं। इन दोनों की प्रेरणा के बिना होता जो कुछ करता है वह न करने के बराबर है। जैसे कहा जाता है कि इसका किया बेकिया हो गया ! जो इस रहस्य को समझता है उसका सब किया हुआ सुकृत होता है, अकृत नहीं होता। अब कहता है :— “वागायुर्विश्वायुर्विश्वमायुः” आयु प्राण है। प्राण वीर्य है। वाणी योनि है। यह पढ़कर मानो वह योनि में वीर्य सींचता है। अब कहता है :— “क, इदं शंसिष्यति स इदं शंसिष्यति”। ‘कः’ प्रजापति है। इसके कहने का तात्पर्य यह है कि प्रजा- पति उत्पन्न करेगा। (६) ३९—'आहाव' के बाद तूष्णी-शंस (“चुपचाप प्रार्थना”) कहता है। मानो सींचे हुये वीर्य में विकार उत्पन्न करता है। पहले वीर्य सींचा जाता है फिर उसमें विकार उत्पन्न होता है। 'तूष्णी-शंस' चुपके-चुपके होती है। वीर्य सिंचन भी चुपके- चुपके होता है। जैसे चुपके से तूष्णी-शंस कही जाती है उसी प्रकार चुपके से वीर्य भी विकृत होते हैं। वह 'तूष्णी-शंस' को छः पदों में (ठहर-ठहर कर) कहता है। पुरुष छः वाला है अर्थात् उसके छः अङ्ग होते हैं। इस प्रकार वह आत्मा को छः वाला अर्थात् छः अंगों वाला बना देता है। 'तूष्णी-शंस' को कह कर वह “पुरोरुक्” कहाता है। इस प्रकार वह विकृत वीर्य को जन्म देता है। पहले विकार होता है फिर जन्म। 'पुरोरुक्' को उच्च स्वर से कहता है। इस प्रकार वह इसको उच्च स्वर से जन्म देता है (अर्थात् बच्चा पैदा होते ही रोता है) !
पांचवाँ अध्याय ] १५३ 'पुरोरुक्' को बारह पदों में कहता है। बारह मास का संवत्सर होता है। संवत्सर प्रजापति है। वह सब सृष्टि को बनाता है। जो इस सब जगत् को उत्पन्न करता है वही यजमान को उत्पन्न करता है और वही उसको सन्तान और पशुओं से युक्त करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशुओं से युक्त होता है। वह 'पुरोरुक्' को जातवेद के लिये पढ़ता है। जातवेद का नाम अंतिम पद में आता है। इस पर प्रश्न उठाते हैं कि जब जातवेद तीसरे सवन का देवता है तो प्रातः सवन में जातवेद के प्रति 'पुरोरुक' क्यों पढ़ते हैं। इसका उत्तर यह है कि जातवेद प्राण हैं। जातवेद कहते हैं उसको जो उत्पन्न हुओं को जाने (जात = उत्पन्न हुआ; वेद = जाने)। जितने उत्पन्न हुओं को वह जानता है, उतने ही होते हैं। जिनको वह नहीं जानता वह कैसे हो सकते हैं? जिसने समझ लिया कि "आज्य शस्त्र" द्वारा मेरी आत्म- संस्कृति (आत्म-सुधार) हो गई वही ज्ञानी है। (७) ४०—अब वह इस आज्य सूक्त को पढ़ता है :— प्र वो देवायाग्नये बर्हिष्ठमर्चास्मै। गमद् देवेभिरा स नो यजिष्ठो बर्हिरा सदत् ॥१॥ शृतावा यस्य रोदसी दक्षं सचन्त ऊतयः। हविष्मन्तस्तमीलते तं सनिष्यन्तोऽवसे ॥२॥ स यन्ता विप्र एषां स यज्ञानामथा हि षः। अग्निं तं वो दुवस्यत दाता यो वनिता मघम् ॥३॥ स नः शर्माणि वीतयेऽग्निर्यच्छतु शन्तमा। यतो नः प्रुष्यावद् वसु दिवि क्षितिभ्यो अप्स्वा ॥४॥ दीदिवांसमपूर्व्यं वस्वीभिरस्य धीतिभिः। ऋक्वाणो अग्निमिन्धते होतारं विश्पतिं विशाम् ॥५॥
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri १४५ [ दूसरी पञ्चिका उत नो ब्रह्मन्नविष उक्थेषु देवहूतमः । शं नः शोचा मरुद् वृधोऽग्ने सहस्रसातमः ॥६॥ नू नो रास्व सहस्रवत् तोकवत् पुष्टिमद् वसु । द्युमदग्ने सुवीर्यं वर्षिष्ठमनुपक्षितम् ॥७॥ (ऋ० ३।१३।१-७) 'प्र' का अर्थ है प्राण। सब जीव प्राण पाकर ही चलते फिरते हैं। इस प्रकार होता ( यजमान में ) प्राण धारण कराता है और प्राणों को सुसंस्कृत करता है। वह कहता है “दीदि- वांसमपूर्व्यं” (३।१३।५) क्योंकि मन ही चमकने वाला है। मन से पहले कुछ नहीं। इस प्रकार वह मन को उत्पन्न करता है और मन का सस्कार करता है। वह कहता है “स नः शर्माणि वीतये” (३।१३।४)। वाणी ही ही शर्म है। जो दूसरों की बात को दुहराता है, उसके लिये कहते हैं कि हमने इस को चुप कर दिया। इसको पढ़कर वह वाणी को उत्पन्न करता है और वाणी का संस्कार करता है। कहता है “उत नो ब्रह्मन्नविषः” (३।१३।६)। श्रोत्र ब्रह्म है। श्रोत्र से ही ब्रह्म को सुनता है। श्रोत्र में ब्रह्म प्रतिष्ठित है। इस प्रकार वह श्रोत्र को उत्पन्न करता है और श्रोत्र का संस्कार करता है। वह कहता है “स यन्ता विप्र एषां” ( ३।१३।३ ) अपान यंता (नियंता) है। क्योंकि प्राण अपान के द्वारा नियंत्रित होता है और पीछे नहीं लौट सकता। इस प्रकार वह अपान को उत्पन्न करता और अपान का संस्कार करता है। वह कहता है “ऋतवा यत्य रोदसी” ( ३।१३।२ ) । चक्षु ऋत है। अगर दो आदमियों में से एक कहे “मैंने स्वयं अपनी आँख से देखा है” तो उसका विश्वास कर लेते हैं। इस प्रकार चक्षु को उत्पन्न करता और चक्षु का संस्कार करता है। CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
पाँचवाँ अध्याय ] १५५ “नूनो रास्व सहस्रवत् तोकवत् पुष्टिमत् वसु” (ऋ० ३।१३।७) यह पढ़कर समाप्त करता है। आत्मा ही 'समस्त' है, सहस्रवान् है तोकवान् है, पुष्टिमान् है। इस को पढ़कर वह 'समस्त आत्मा' को उत्पन्न करता और समस्त आत्मा को सुसंस्कृत करता है। अब वह एक याज्य संत्र पढ़ता है। याज्य पूर्ति है। याज्य पुण्य है। याज्य लक्ष्मी है। इस प्रकार पुण्य लक्ष्मी को उत्पन्न करता है और उसका संस्कार करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह छन्दों, देवताओं, ब्रह्म और अमृत से युक्त होकर देवताओं में मिल जाता है। जो जानता है कि मैं इस प्रकार छन्दों, देवताओं, ब्रह्म और अमृत से युक्त हो गया वही ज्ञानी है। यही अध्यात्म विद्या है। यही आधिदैवत विद्या है। (८) ४१—'तूष्णींशंस' को छः पदों में पढ़ता है। छः ऋतुएं होती हैं। इस प्रकार वह ६ ऋतुओं को बनाता और उन्हीं में प्रवेश करता है ! 'पुरोरुक्' को बारह पदों में पढ़ता है। बारह महीने होते हैं। इस प्रकार वह महीनों को बनाता और उनमें प्रवेश करता है। “प्रवो देवाय अग्नये” (ऋ० ३।१३।१) पढ़ता है। 'प्र' अन्तरिक्ष है। यह सब भूत अन्तरिक्ष में ही रहते हैं। वह अन्तरिक्ष को बनाता है और अन्तरिक्ष में प्रवेश करता है। “दीदिवांसमपूर्व्यं” (३।१३।५) पढ़ता है। यह सूर्य ही 'दीदिव' या चमकने वाला है। इससे पूर्व कोई नहीं है। वह इस प्रकार सूर्य को बनाता है और सूर्य्य में ही प्रवेश करता है। “स नः शर्माणि वीतये” (३।१३।४) पढ़ता है। अग्नि शर्माणि है। यही अन्न आदि को देती है। इस प्रकार अग्नि को ही बनाता है और उसी में प्रवेश करता है !
१५६ [ दूसरी पञ्चिका “उतनो ब्रह्मन्नविषः” (३।१३।६) पढ़ता है। चन्द्रमा ही ब्रह्म है, इस प्रकार चन्द्रमा को बनाता है और चन्द्रमा में ही प्रवेश करता है। “स यंता विप्र एषाम्” (३।१३।३) इसको पढ़ता है। वायु ही नियंता है। वायु से ही अन्तरिक्ष नियंत्रित है, और इधर उधर नहीं हो सकता। इसको पढ़कर वह वायु को बनाता और वायु में प्रवेश करता है। “ऋतावा यस्य रोदसी” ( ३।१३।२ ) इसको पढ़ता है। द्यौ और पृथिवी रोदसी हैं। इस प्रकार वह द्यौ और पृथिवी को बनाता है और उन्हीं में प्रवेश करता है। “नूनो रास्वसहस्रवत् तोकवत् पुष्टिमत् वसु” ( ३।१३।७ ) इसको पढ़ कर समाप्त करता है। संवत्सर ही ‘समस्त’ है “सहस्रवान्, तोकवान् और पुष्टिमान्” है। वह समस्त संवत्सर को बनाता है और उसी में प्रवेश करता है। “याज्य” पढ़ता है। वृष्टि याज्य है। विद्युत् ही याज्य है। क्योंकि विद्युत् ही वर्षा और अन्न को उत्पन्न करती है। इस प्रकार वह विद्युत् को बनाता और उसमें प्रवेश करता है। जो इस रहस्य को समझता है वह इस सब से युक्त होकर देवतामय हो जाता है। (९) एतरेय ब्राह्मण की दूसरी पंचिका का पांचवां अध्याय समाप्त।
तीसरी पञ्चिका
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पहला अध्याय १— यह जो प्रउग शस्त्र है वह ग्रहों☸ में से सोम की आहु- तियां देने के लिये उपयुक्त है। प्रातः काल के नौ ग्रह हैं। बहिष्पवमान सूक्त के नौ मंत्रों से इनकी आहुति की जाती है। इस स्तुति के पश्चात् अध्वर्यु दसवें ग्रह को लेता है। हर एक मंत्र के साथ जो हिंकार बोली जाती हैं वह दसवां मंत्र मान लिया जाता है। इस प्रकार दश ग्रह और दश मंत्रों का समन्वय हो जाता है। होता वायु वाले तीन मंत्रों को पढ़ता है :— वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृताः । तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥ वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः । सुतसो'मा अहर्विदः ॥ वायो तव प्रपृञ्चती धेना जिगाति दाशुषे । उरूची सोमपीतये ॥ ( ऋ० १।२।१-३ ) ☸ग्रह उस प्याले को कहते हैं जो पात्र अर्थात् कलश के ऊपर रक्खा जाता है, और जिसमें से लेकर सोम की आहुतियां दी जाती हैं। नौ ग्रह यह हुये —(१) उपांशु (२) अन्तर्याम (३) वायव (४) ऐन्द्र- वायव (५) मैत्रावरुण (६) अश्विन (७) शुक्र (८) मन्थी (६) आग्रायण । ( १५९ )
१६० [ तीसरी पञ्चिका इससे वायु के ग्रह की स्तुति की जाती है । नीचे के तीन इन्द्र-वायु वाले मंत्र पढ़ता है :- इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरा गतम्। इन्दवो वामुशन्ति हि ॥ वायविन्द्रश्च चेतथः सुतानां वाजिनीवसू। तावा यातमुप द्र॒वत् ॥ वायविन्द्रश्च सुन्वत आ यातमुप निष्कृतम्। मक्ष्वित्था धिया नरा ॥ ( ऋ० १।२।४-६ ) यह इन्द्र-वायु के ग्रह की स्तुति हुई । नीचे के तीन मित्रा-वरुण के मंत्र पढ़ता है :- मित्रं हुवे पूतदक्षं वरुणं च रिशादसम्। धियं घृताचीं साधन्ता ॥ ऋतेन मित्रावरुणावृतावृधावृतस्पृशा । क्रतुं बृहन्तमाशाथे ॥ कवी नो मित्रावरुणा तुविजाता उरुक्षया । दक्षं दधाते अपसम् ॥ ( ऋ० १।२।७-६ ) इससे मित्रावरुण के ग्रह की स्तुति हुई । नीचे के तीन मंत्र दो अश्विनों के लिये पढ़े गये :- अश्विना यज्वरीरिषो द्रवत् पाणी शुभस्पती । पुरुभुजा चनस्यतम् ॥ अश्विना पुरुदंससा नरा शवीरया धिया । धिष्ण्या वनतं गिरः ॥ दस्रा युवाकवः सुता नासत्या वृक्तबर्हिषः । आ यातं रुद्रवर्तनी ॥ ( ऋ० १।३।१-३ ) इससे अश्विनों के ग्रहों की स्तुति की गईँ । नीचे के तीन इन्द्र के मंत्र पढ़ता है :- इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः । अण्वीभिस्तना पूतासः ॥ इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः । उप ब्रह्माणि वाघतः ॥ इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः । सुते दधिष्व नश्चनः ॥ ( ऋ० १।३।४-६ ) इससे शुक्र और मन्थी ग्रह की स्तुति हुई । अब विश्वेदेवों के तीन मंत्र पढ़ता है :- ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वेदेवास आ गत । दाश्वांसो दाशुषः सुतम् ॥
पहला अध्याय ] १६१ विश्वे देवासो अप्तुरः सुतमा गन्त तूर्णयः । उस्रा इव स्वसराणि ॥ विश्वे देवासो अस्निध एहि मायासो अद्रुहः । मेधं जुषन्त वह्नयः ॥ ( ऋ० १।३।७-९ ) इससे आग्रायण ग्रह की स्तुति हुई । अब सरस्वती के तीन मंत्र पढ़ता है :— पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥ चोदयित्री सूनृतानां चेतन्ती सुमतीनां । यज्ञं दधे सरस्वती ॥ महो अर्णः सरस्वती प्र चेतयति केतुना । धियो विश्वा वि राजति ॥ ( ऋ० १।३।१०-१२ ) कोई सरस्वती का ग्रह ही नहीं । सरस्वती वाणी है । वाणी से जो कोई ग्रह लिये जाते हैं उन्हीं की इन शब्दों से स्तुति हो जाती है । जो इस रहस्य को समझता है वह कीर्ति पाता है । (१) २—यह जो प्रउग है इससे अन्न की प्राप्ति करता है । प्रउग में अन्य देवता की स्तुति होती है । और प्रउग में अन्य का ही कृत्य होता है । जो इस रहस्य को समझता है वह ग्रहों में अन्यान्य खाद्य पदार्थों को रखता है । यह जो प्रउग शस्त्र है वह यजमान का सबसे निकटस्थ सम्बन्धी है । इस लिये उसको इसका बहुत ध्यान रखना चाहिये । ऐसा कहा जाता है, क्योंकि इसी से होता संस्कार करता है । वह वायु के तीन मंत्रों को पढ़ता है । इसीलिये कहते हैं कि वायु प्राण है । प्राण वीर्य है । शरीर में वीर्य पहले उत्पन्न होता है, फिर मनुष्य पैदा होता है । यह जो वायु के मंत्रों को पढ़ता है उससे यजमान में प्राण का संस्कार करता है । इन्द्र और वायु के तीन मंत्र इसलिये पढ़ता है कि जहाँ प्राण है, वहाँ अपान है । इनके पढ़ने से यजमान में प्राण और अपान का संस्कार करता है । ११
१६२ [ तीसरी पञ्चिका वह मित्र और वरुण के लिये तीन मंत्र पढ़ता है । यह इस लिये कि कहते हैं कि जब आदमी बनता है तो पहले आंख बनती है। मित्र और वरुण के लिये मंत्र पढ़ कर वह मानों यजमान की आंख का संस्कार करता है । वह अश्विनों के तीन मंत्र पढ़ता है क्योंकि बच्चे के पैदा होने पर कहते हैं कि यह सुनने की इच्छा करता है। यह ध्यान दे रहा है। अश्विन के मंत्र पढ़कर वह यजमान के कानों का संस्कार करता है । इन्द्र के तीन मंत्र पढ़ता है क्योंकि उत्पन्न हुये बच्चे के विषय में कहा करते हैं कि यह पहले गर्दन उठाता है, फिर सिर । इन्द्र के मंत्र पढ़कर मानो वह यजमान में वीर्य्य का संस्कार करता है। विश्वेदेवों के तीन मंत्र पढ़ता है क्योंकि जब बच्चा पैदा होता है तो पीछे से हाथ पैर हिलाता है। अङ्ग विश्वेदेवों के हैं। इन मंत्रों को पढ़ कर मानो वह यजमान के अंगों का सस्कार करता है । वह सरस्वती के लिये तीन मंत्र पढ़ता है। क्योंकि जब बच्चा पैदा होता है तो वाणी सब से पीछे आती है। सरस्वती वाणी है। सरस्वती के तीन मंत्र बोलकर मानो वह यजमान में वाणी का संस्कार करता है । जो होता इस रहस्य को समझता है या जिस यजमान के लिये होता मंत्र पढ़ता है, वह एक बार उत्पन्न होने पर भी इन सब देवताओं, सब स्तुतियों, सब छन्दों, सब प्रउगों, सब सवनों द्वारा फिर नया जन्म पाता है। (२) ३—यह जो प्रउग शस्त्र है वह प्राणों के लिये है। सात देव के लिये मंत्र पढ़े जाते हैं। सिर में सात प्राण हैं। इनको पढ़कर मानो (होता यजमान के) सिर में सात प्राणों को रखता है।
पहला अध्याय ] १६३ यहां प्रश्न करते हैं कि क्या होता यजमान के लिये पाप या भद्र कर सकता है ? इसका उत्तर यह है कि जो जिसका होता होता है वह उसके लिये जो चाहे कर सकता है । यदि वह चाहे कि यजमान को प्राणों से वंचित करदे तो वायु के मंत्रों में गड़बड़ कर दे या एक पद छोड़ दे जिससे मंत्रों में गड़बड़ हो जाय । बस यजमान प्राणों से वंचित हो जायगा । यदि वह चाहे कि यजमान को प्राण और अपान से वंचित कर दे तो इन्द्र-वायु के मंत्रों में गड़बड़ करदे या एक पद छोड़ दे जिससे मंत्रों में गड़बड़ हो जाय । बस यजमान प्राण और अपान से वंचित हो जायगा । अगर चाहे कि आंख से उसे वंचित कर दे तो मित्र-वरुण के मंत्रों में गड़बड़ कर दे या एक पद छोड़ दे जिससे मंत्रों में गड़बड़ हो जाय । बस यजमान आंख से वंचित हो जायगा । अगर चाहे कि कान से उसे वंचित कर दे तो अश्विनों के तीन मंत्रों में गड़बड़ कर दे या एक पद छोड़ दे जिससे मंत्रों में गड़बड़ हो जाय । बस यजमान कान से वंचित हो जायगा । अगर चाहे कि उसे वीर्य से वंचित करदे तो इन्द्र के तीन मंत्रों में गड़बड़ कर दे या एक पद छोड़ दे जिससे मंत्रों में गड़- बड़ हो जाय । बस यजमान वीर्य से वंचित हो जायगा । अगर चाहे कि उसको अंगों (हाथ पैर) से वंचित कर दे तो विश्वेदेवों के मंत्रों में गड़बड़ कर दे या एक पद छोड़ दे जिस से मंत्रों में गड़बड़ हो जाय । बस यजमान अंगों से वंचित हो जायगा । अगर वह चाहे कि उसे वाणी से वंचित करदे तो सरस्वती के मंत्रों में गड़बड़ कर दे या एक पद छोड़ दे जिससे मंत्रों में गड़बड़ हो जाय और यजमान वाणी से वंचित हो जायगा ।
१६४ [ तीसरी पञ्चिका अगर वह चाहे कि उसको सब अंगों और आत्मा से युक्त रक्खूँ तो वह उन मंत्रों को यथाविधि ठीक ठीक पढ़े । इस प्रकार वह उसको सब अंगों और आत्मा से युक्त रखता है। जो इस रहस्य को समझता है वह सब अंगों और आत्मा से अपने को युक्त रखता है। (३) ४—यहाँ प्रश्न होता है कि जब शस्त्र स्तोत्र के अनुकूल होना चाहिये तो सामगान करने वाले जिन अग्नि वाले मंत्रों को पढ़ते हैं उनको होता वायु वाले मंत्र से कैसे प्रतिपादन करता है। अग्नि के मंत्र वायु के मंत्रों के अनुकूल कैसे हो सकते हैं ? इसका उत्तर यह है कि यह जो देवता है वह अग्नि के ही शरीर हैं। यह जो अग्नि जलता है वह उसका वायु रूप है। इस प्रकार वायु के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। अग्नि जो जलता है वह दो भागों में जलता है। इन्द्र और वायु दो हैं। यह उसका ऐन्द्र-वायु रूप है। इस प्रकार वह ऐन्द्र-वायु के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। यह जो अग्नि जलने में ऊपर नीचे होता है यह मित्र और वरुण का रूप है। इस प्रकार वह मित्रावरुण के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। अग्नि का जो भयानक स्पर्श है वह वरुण का रूप है। यह जो भयानक स्पर्श होते हुये भी मित्र के समान उसके पास बैठते हैं यह उसका मित्र रूप है। इस प्रकार वह मित्रावरुण के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। यह जो दो भुजाओं और दो अरणियों से घिस कर अग्नि जलाते हैं यह अग्नि का अश्विन-रूप है। इस प्रकार वह अश्विनों के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। यह जो बड़े जोर से बबबब करके जलता है जिससे डरकर लोग भाग जाते हैं यह उसका इन्द्र का रूप है। इस प्रकार वह इन्द्र के रूप में अग्नि की स्तुति करता है।
पहला अध्याय ] १६५ यह जो एक अग्नि को कई जगह ले जाकर कई भाग कर देते हैं यह उसका विश्वेदेवों का रूप है। इस प्रकार विश्वेदेवों के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। जब अग्नि शोर करके बातचीत करने के समान जलता है, यह उसका सरस्वती रूप है। इस प्रकार होता सरस्वती के रूप में अग्नि की स्तुति करता है। इस प्रकार जिन तीन-तीन मंत्रों को पढ़ते हैं उनमें भिन्न- भिन्न देवते होते हुये भी सामगान करने वाली स्तुति को वायु के मंत्र से आरंभ करके अनुकूलता दिखाते हैं। विश्वेदेवों के लिये शस्त्र पढ़कर नीचे का याज्य विश्वेदेवों के प्रति पढ़ता है :- विश्वेभिः सोम्यं मध्वऽग्न इन्द्रेण वायुना। पिबा मित्रस्य धामभिः ॥ (ऋ० १।१४।१०) इस प्रकार सब देवतों को भाग देकर वह सन्तुष्ट करता है। (४) ५-यह जो वषट्कार है वह देवों का पात्र है। वषट्कार रूपी देवपात्र से वह देवतों को तृप्त करता है। अनुवषट्कार से वह देवों को पुनः तृप्त करता है, जैसे लोग घोड़ों या गायों को बार बार घास या पानी देते हैं। इस पर शंका करते हैं कि जिस अग्नि में पहले आहुति दी थी उसी में फिर क्यों आहुति देते हैं और धिष्ण्या अग्नि के पास वषट्कार करते हैं ? इसका उत्तर यह है कि अनुवषट्कार "सोमस्याग्ने वीहि" करके वह वषट्कार भी करता है और धिष्णियों को तृप्त भी करता है। प्रश्न करते हैं कि सोम का वह स्विष्टकृत भाग कौन सा है जिसमें से बिना समाप्त किये हुये भक्षण कर लेते हैं और अनु- वषट्कार करते हैं ? इसका उत्तर यह है कि 'सोमस्याग्ने वीहि'
१६६ [ तीसरी पञ्चिका इस अनुवषट्कार से वह कृत्य को समाप्त कर देते हैं और सोम पान कर लेते हैं। यही सोम का स्विष्टकृत भाग है। अब वह वषट्कार करता है। (५) ६—यह जो वषट्कार है वह वज्र है। यदि उसका कोई शत्रु हो तो वषट्कार करते हुये उस शत्रु का ध्यान करले, बस वह वषट्कार वज्र के रूप में शत्रु का हनन कर देगा। वषट्कार में "षट्" (छः) शब्द आया है। छः ऋतुयें हैं। इस प्रकार वह ऋतुओं को बनाता और स्थापित करता है। जो ऋतुओं में स्थापित हो गया वह दूसरी चीज़ों में भी स्थापित हो जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह भली भांति स्थापित हो जाता है। वेद के पुत्र हिरण्यदन ने इस सम्बन्ध में यह कहा है :— वषट्कार में 'षट्' (छः) से होता इन छः चीज़ों को स्थापित करता है। द्यौ अंतरिक्ष में प्रतिष्ठित हैं। अंतरिक्ष पृथ्वी में। पृथिवी जलों में। जल सत्य में। सत्य ब्रह्म में। ब्रह्म तप में। यदि यह चीजें स्थापित हो गईं तो शेष सब कुछ स्थापित हो जाता है। जो इस रहस्य को समझता है वह भली भांति स्थापित हो जाता है। "वौषट्" का 'वौ' छः ऋतुओं का बोधक है। वषट्कार कहकर होता यजमान को ऋतुओं में भली भांति स्थापित करता है। जैसा वह देवों के साथ करता है वैसा देव उसके साथ करते हैं। (६) ७—वषट्कार तीन होते हैं। (१) वज्र (२) धामच्छद् (३) रिक्त। यह जो उच्चस्वर से और बल से वषट्कार करते हैं वह वज्र है। इससे वह जब चाहे तब अपने शत्रु और अहित- कारी को जिसको वह दबाना चाहे दबा सकता है। जिस यज-
पहला अध्याय ] १६७ मान के शत्रु हों उसके लिये वह वषट्कार रूपी इस वज्र का प्रयोग करे। यह धामच्छद् इसलिये हैं कि जिस ऋचा के साथ बोला जाता है उसी का भाग हो जाता है बिना कुछ भाग छोड़े हुये। प्रजा और पशु उसके पास होते हैं। इसलिये प्रजा और पशु की कामना वाले को यह वषट्कार करना चाहिये। जिसमें 'षट्' धीरे से कहा जाता है वह रिक्त है। इस प्रकार वह आत्मा और यजमान दोनों को रिक्त (शून्य) कर देता है। जो ऐसा वषट्कार करता है, वह स्वयं भी पापी है और वह भी जिसके लिये यह वषट्कार किया जाय। इसलिये उसको यह वषट्कार न करना चाहिये। यहां प्रश्न होता है कि क्या होता यजमान को पापी या भद्र बना सकता है? इसका उत्तर यह है कि हां, यदि वह किसी का होता है तो ऐसा कर सकता है। इस समय होता यजमान के लिये जो चाहे कर सकता है। यदि वह चाहे कि यजमान को यज्ञ का फल न मिले तो ऋचा और वषट्कार दोनों को एक स्वर से पढ़े। वह उसको यज्ञ के फल से वंचित कर देगा। अगर वह यजमान को बहुत पापी बनाना चाहे तो याज्य को जोर से पढ़े और वषट्कार को धीरे से। इससे यजमान पापी हो जायगा ! यदि वह यजमान को प्रसन्न करना चाहे तो याज्य मंत्र को धीरे से पढ़ कर वषट्कार को जोर से पढ़े। यह श्री के लिये किया जाता है। इससे वह यजमान को कल्याण युक्त कर देता है। मंत्र और वषट् को मिला देना चाहिये। बीच में रुकना* *विषय यह है कि मंत्र को बोलकर पीछे से 'ओ३म्' लगा देते हैं। और सबसे पिछला स्वर छोड़ देते हैं। जैसे अगर मंत्र के अंत में 'य' आया तो 'य' और 'ओ३म्' मिलकर 'योम्' बोलेंगे।
१६८ [ तीसरी पञ्चिका नहीं चाहिये । जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशु से युक्त होता है। (७) ८-वषट्कार करते समय जिस देवता के लिये आहुति दी जाय उसी का ध्यान करे । इस प्रकार साक्षात् देवता को प्रसन्न करता है, और उसके लिये प्रत्यञ्च रूप से याज्य मन्त्र पढ़ता है। वषट्कार ही वज्र है। इस वज्र को अगर बिना शांत किये फेंका जाय तो वह बिजली के समान हानिकारक होता है। इसको शांत करना सभी नहीं जानते, न उसकी प्रतिष्ठा को सभी जानते हैं। इसलिये जब बहुतों की मृत्यु होती हो तो वषट्कार के पश्चात् होता 'वागोजः' अनुमन्त्र बोलता है। इस प्रकार शांत होकर वषट्कार यजमान को हानि नहीं पहुँचाता। यजमान इस अनुमन्त्र को बोले :- “वषट्कार मा मां प्रमृक्षो माहंत्वां प्रमृक्षं बृहामनऽउपह्वये व्यानेते शरीरं प्रतिष्ठासि प्रतिष्ठां गच्छ प्रतिष्ठा मा गमय ।” “हे वषट्कार ! मुझे मत नष्ट कर । मैं तुझे नहीं नष्ट करूँगा। मैं तेरे मन को कोशिश कर के बुलाता हूँ । व्यान रूप से तू शरीर में प्रतिष्ठित है । प्रतिष्ठा को प्राप्त कर और मुझे प्रतिष्ठा को प्राप्त करा ।” कुछ लोग कहते हैं कि यह अनुमन्त्र बहुत बड़ा है और इसका कोई प्रभाव नहीं। इसके स्थान में “ओजः सह ओजः” ऐसा अनुमन्त्र वषट्कार के बाद बोलना चाहिये। ओज और सह वषट्कार के दो बड़े प्यारे शरीर हैं। इस प्रकार वह यज- मान को प्रियधाम प्राप्त कराता है। जो इस रहस्य को समझता है वह प्रिय धाम को प्राप्त होता है। वषट्कार वाणी है और प्राण और अपान है। जब वषट्- कार किया जाता है तो यह तीनों शरीर से बाहर निकलते हैं।
पहला अध्याय ] १६९ इसलिये यह अनुमन्त्र पढ़ना चाहिये "वागोजः सह ओजो मयि प्राणापानौ" । इस प्रकार होता अपने में वाणी, प्राण और अपान को स्थापित करता है और पूर्ण आयु भोगता है । जो इस रहस्य को समझता है वह पूर्ण आयु भोगता है । (८) ९—यज्ञ देवताओं के पास से चला गया । उन्होंने उसको 'प्रैष' मन्त्रों से बुलाना चाहा । इन मन्त्रों का नाम "प्रैष" इसी लिये है कि इनके द्वारा यज्ञ को चाहा (प्र+इष्) । 'पुरोरुक्' मन्त्रों के द्वारा उन्होंने इसको चमकाया (प्रारोचयन्) । इसी लिये इनको 'पुरोरुक' कहते हैं । उन्होंने उसको वेदी में पाया (विद्-प्रापणे) इसीलिये इसको वेदी कहते हैं। उसको पाकर ग्रहों में ग्रहण किया । इसीलिये इनको 'ग्रह' कहते हैं। उसको पाकर उन्होंने 'निविद्' के द्वारा देवताओं से निवेदन किया इसलिये इनका नाम 'निविद्' हुआ । जब कोई किसी खोई हुई चीज को पाना चाहता है तो इसका अधिक भाग चाहता है या कम भाग । जो बड़ा ( या बुद्धिमान् ) होता है वह अच्छा भाग चाहता है । जो समझता है कि 'प्रैष' बलवान हैं वह यह भी जानता है कि वह श्रेष्ठ हैं । 'प्रैष' का अर्थ है खोये हुये को चाहना । इसलिये 'प्रैष' को सिर झुका कर बोलते हैं । (९) १०—निविद् जो हैं वह 'उक्थ' अर्थात् शस्त्रों के गर्भ हैं । प्रातः सवन में वे उक्थ या शस्त्रों से पहले रक्खे जाते हैं । क्योंकि गर्भ में बच्चे नीचे को सिर किये रहते हैं और नीचे को सिर किये पैदा होते हैं । दोपहर के सवन में वे शस्त्र के मध्य में रक्खे जाते हैं । क्योंकि गर्भ योनि के मध्य में होते हैं । सायं के सवन में निविद् पीछे रक्खे जाते हैं । क्योंकि गर्भ ऊपर से पैदा होते हैं । जो इस रहस्य को समझता है वह प्रजा और पशु से युक्त होता है ।