ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri शान्ति पाठः CC-0:Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.
पहला अध्याय १—( द्वादशाह ) के तीसरे दिन का देवता है विश्वेदेवा । स्तोम है सत्रहवां । साम है वैरूप । छन्द जगती । जो यह जानता है कि देवता कौन है, स्तोम कौन है, साम कौन है और छन्द कौन है उसका यज्ञ सफल हो जाता है । तृतीय दिन का रूप है "समानोदर्क"*। इसके अन्य रूप यह हैं :—अश्व, अंत, पुनरावृत्ति, पुनर्निर्नृत्ति ( अर्थात् अन्त के स्वरों में समानता ), रति या रमण करना, पर्यस्ति ( ढकना ), तीन की संख्या, 'अन्त' का रूप, पिछले पद में देवता का उल्लेख, दूसरे लोक की ओर संकेत, वैरूप साम, जगती छन्द और भूत काल की क्रिया । तीसरे दिन का आज्य शस्त्र यह है :— युक्ष्वा हि देव हूतमाँऽअश्वाँऽअग्नेरथीरिव... (ऋ० ८।७५ ) तीसरे दिन के कृत्य के द्वारा देव स्वर्ग लोक की ओर चल पड़े । असुर राक्षसों ने रोका । उन्होंने असुरों से कहा, "विरूप *उदर्क का अर्थ है समाप्ति । 'समानोदर्क' का अर्थ है समान समाप्ति वाला । अर्थात् समान वाक्य पर समाप्त होने वाले सूक्त । ( २८१ )
२८२ [पाँचवीं पञ्चिका अर्थात् कुरूप हो जाओ । कुरूप हो जाओ ।” जब असुर कुरूप होने लगे, देव स्वर्ग को चले गये । इससे वैरूप साम उत्पन्न हुआ । इसीलिये इसको वैरूप ( कुरूप ) कहते हैं । जो पाप के कारण कुरूप हो गया हो, वह इस रहस्य को समझकर पाप से छूट जाता है । असुरों ने देवों को फिर सताया । देवों ने घोड़ा बनकर अपनी टापों से उनको मार दिया । इसीलिये घोड़ों का नाम हैं अश्व, जो इस रहस्य को समझता हैं वह समृद्धि को पाता है ( अश्नुते ) । घोड़ों ने पिछली टांगों से मारा इस लिये घोड़े सब पशुओं में तेज होते हैं । जो इस रहस्य को समझता है उसका पाप छूट जाता है । इसीलिये तीसरे दिन के आज्यशस्त्र में 'अश्व' शब्द आता है । यह तीसरे दिन का रूप है । प्र-उग शस्त्र में नीचे के तीन तीन मंत्र हैं :— ( १ ) वायवा याहि वीतये जुषाणो हव्यदातये । पिबा सुतस्यान्धसो अभिप्रयः ॥ सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः । निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभिप्रयः । (ऋ० ५।५१।५-७) ( २ ) वायो याहि शिवा दिवो वहस्वा सु स्वश्व्यम् । वहस्व महः पृथु- पक्षसा रथे ॥ त्वां हि सुप्सरस्तमं नृषदनेषु हूमहे । ग्रावाणं नाश्वपृष्ठं संहना ॥ स त्वं नो देव मनसा वायो मन्दानो अग्रियः । कृधि वाजाँ अपो धियः ॥ (ऋ० ८।२६।२४-२५) ( ३ ) इन्द्रश्च वायवेषां सुतानां पीतिमर्हतः । ताञ्जुषेथामरेपसावभि प्रयः । सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः । निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभि प्रयः ।
पहला अध्याय ] २८३ सजूर्विश्वेभिर्देवैभिरश्विम्यामुषसा सजूः । आ याह्यग्ने 'अत्रिवत् सुते रण ॥ (ऋ० ५।५१।६-८) ( ४ ) आ मित्रे वरुणे वयं गीर्भिर्जुहुमो अत्रिवत् । नि बर्हिषि सदतं सोम पीतये ॥ व्रतेन स्थो ध्रुवच्चेमा धर्मणा यातयज्जना । नि बर्हिषि सदतं सोम पीतये ॥ मित्रश्च नो वरुणश्च जुषेतां यज्ञमिष्टये । नि बर्हिषि सदतां सोम पीतये ॥ (ऋ० ५।७२।१-३) ( ५ ) अश्विनावेह गच्छतं नासत्या मा वि वेनतम् । तिरश्चिदर्य्या परि- वर्त्तिर्यातमदाम्या माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥ अस्मिन्यज्ञे अदाभ्या जरितारं शुभस्पती । अवश्युमश्विना युवं गृणन्तमुप भूषथो माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥ अभूदुषा रुशत् पशुरारिग्रधाय्युत्वियः । अयोजि वां वृषण्वसू रथो दस्रावमर्त्यो माध्वी मम श्रुतं हवम् ॥ (ऋ० ५।७५।७-९) ( ६ ) आ याह्यद्रिभिः सुतं सोमं सोमपते पिब । वृषन्निन्द्र वृषभिर्वृत्र- हन्तम ॥ वृषा ग्रावा वृषा मदो वृषा सोमो अयं सुतः । वृषन्निन्द्र वृषभिर्वृत्र- हन्तम ॥ वृषा त्वा वृषणं हुवे वज्रिञ्चित्राभिरूतिभिः । वृषन्निन्द्र वृषभिर्वृत्र- हन्तम ॥ (ऋ० ५।४०। १-३) ( ७ ) सजूर्देवैभिरपां नपातं सखायं कृध्वं शिवो नो अस्तु ॥ अब्जामुक्थैरहिं गृणीषेबुध्ने नदीनां रजः सु षीदन् ॥ मा नोऽहिर्बुध्न्यो रिषे धान्मा यज्ञो अस्य स्रिधदृतायोः ॥ (ऋ० ७।३४।१५-१७) ( ८ ) उत नः प्रिया प्रियासु सप्तस्वसा सुजुष्टा । सरस्वती स्तोम्या भूत् । आपप्रुषी पार्थिवान्युरु रजो अन्तरिक्षम् । सरस्वती निदस्पातु ।
२८४ [पाँचवीं पञ्चिका त्रिषधस्था सप्तधातुः पञ्चजाता वर्धयन्ती । वाजे वाजे हव्या भूत् ॥ (ऋ० ६।६१।१०-१२) यह सब उष्णिक् छन्द में हैं और इनमें समानोदर्क है । यह तीसरे दिन का रूप है । मरुत्वतीय शस्त्र का प्रतिपद् यह है :— तन्तमिन्द्राधसे मह इन्द्रं चोदामि पीतये । यः पूर्व्यामनुष्टुतिमीशे कृष्टीनां नृतुः ॥ (ऋ० ८।६८।७) न यस्य ते शवसान सख्यमानंश मर्त्यः । नकिः शवांसि ते नशत् ॥ (ऋ० ८।६८।८) त्वोतासस्त्वा युजाऽप्सु सूर्ये महद्धनम् । जयेम पृत्सु वज्रिवः ॥ (ऋ० ८।६८।९) इसका अनुचर यह है :— त्रय इन्द्रस्य सोमाः सुतासः सन्तु देवस्य । स्वे क्षये सुतपान्व ॥ त्रयः कोशासः श्चोतन्ति तिस्रश्चम्वः सुपूर्णाः । समाने अधिमार्मन् ॥ शुचिरसि पुरुनिःष्ठाः क्षीरैर्मन्थत आशीर्तः । दध्ना मन्दिष्ठः शूरस्य ॥ (ऋ० ८।२।७-९) इनमें 'नृतुः' और 'त्रयः' यह शब्द आये हैं । यह तीसरे दिन का रूप है । इन्द्र-निहिव प्रगाथ वही है—इन्द्रनेदीय... (ऋ० ८।५३।५-७) ब्रह्मणस्पति प्रगाथ यह है :— प्रनूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम् । यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे ॥ तमिद्धोचेमा विदथेषु शम्भुवं मन्त्रं देवा अनेहसम् । इमां च वाचं प्रतिहर्यथा नरो विश्वेद् वामा वो अश्नवत् ॥ (ऋ० १।४०।५-६) इसमें स्वरों की समानता है । यह तीसरे दिन का रूप है । धाय्या वही है :— अग्निनेता (ऋ० ३।२०।४)
पहला अध्याय ] २८५ त्वं सोम क्रतुभिः ( १।६१।२ ) पिन्वन्त्यपो ( ऋ० १।६४।६ ) मरुत्वतीय प्रगाथ यह है :- नकिः सुदासो रथं पर्यासं न रीरमत् । इन्द्रो यस्याविता यस्य मरुतो गमत्स गोमति व्रजे ॥ ( ऋ० ७।३२।१० ) इसमें 'पर्यस्त' है, यह तीसरे दिन का रूप है । मरुत्वतीय शस्त्र का निविद् सूक्त यह है :- त्रयर्यमा मनुषो देवतात ( ऋ० ५।२९ ) इसमें 'त्रि' शब्द है । यह तीसरे दिन का रूप है । तीसरे दिन के वैरूप पृष्ठ यह हैं :- यद्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः । न त्वा वज्रिन्सहस्रं सूर्या अनु न जात मष्ट रोदसी ॥ आ पप्रथ महिना वृष्ण्या वृषन् विश्वा शविष्ठ शवसा । अस्माँ अव मघवन् गोमति व्रजे वज्रिञ् चित्राभिरूतिभिः ॥ ( ऋ० ८।७०।५-६ ) यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय । स्तोतारमिद्धिधिषेय रदावसो न पापत्वाय रासीय ॥ शिक्षेयमिन् महयते दिवे दिवे राय आ कुहचिद्विदे । नहि त्वदन्य- न्मघवन्न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन ॥ ( ऋ० ७।३२।१८-१६ ) यह रथन्तर दिन है । यह तीसरे दिन का रूप है । धाय्य वही हैं :- यद्वावान इत्यादि । "अभित्वा शूर नोनुम" ( ऋ० ७।३२।२२-२३ ) पढ़कर इस दिन की योनि को फेर देता है । क्योंकि यह दिन क्रम के अनुसार रथन्तर दिन है । और रथंतर साम इसकी योनि है । साम प्रगाथ यह है :- इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत् । छर्दिर्यच्छ मघवद्भ्यश्च मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः ॥
२८६ [ पाँचवीं पञ्चिका ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभि प्रघ्नन्ति धृष्णुया । अध स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव ॥ ( ऋ० ६।४६।९-१० ) इसमें त्रि शब्द आया है । यह तीसरे दिन का रूप है । ताक्ष्यं वही है अर्थात् त्यमूषु वाजिनं... (ऋ० १०।१७८) (१) २—निविद् यह है :— यो जात एव प्रथमो मनस्वान् (ऋ० २।१२ ) इसमें समानोदर्क है ( अर्थात् इसके अन्त में 'सजनास, इन्द्र आता है ) । समानोदर्कता तीसरे दिन का रूप है । इसमें 'स जन' और 'इन्द्र' शब्द आये हैं । इसके पढ़ने से इन्द्र को इन्द्रिय शक्ति प्राप्त होती है । इसलिये साम गाने वाले लोग कहते हैं कि ऋग्वेदी इन्द्र की इन्द्रिय की प्रशंसा करते हैं । इसका ऋषि गृत्समद है । इस सूक्त से गृत्समद ने इन्द्र के प्रिय धाम को पाया । उसने परम लोक जीत लिया । जो इस रहस्य को समझता है वह इन्द्र के परम धाम को पाता है और परम लोक को जीत लेता है । वैश्वदेव के प्रतिपद् और अनुचर यह हैं :— तत्सवितुर्वृणीमहे इत्यादि ( ऋ० ५।८२।१-३ ) और अद्या नो देव सवितः ( ऋ०५।८२।४-५ ) यह रथंतर चिन है और यह तीसरे दिन का रूप है । सविता का निविद् सूक्त यह है :— तद्देवस्य सवितुर्वार्यं महत्... ( ऋ० ४।५३ ) इसमें 'महत्' शब्द आया है । अन्त बड़ा है । तृतीय दिन अन्त है। इसलिये यह तीसरे दिन का रूप है । द्यावा पृथिवी का निविद् सूक्त है :—
पहला अध्याय ] २८७ "घृतेन द्यावापृथिवी अभीवृते घृतश्रिया घृतपृचा घृतावृधा"। (ऋ० ६।७०।४) इसमें तीन शब्द आये हैं "घृत श्रिया", "घृतपृचा", "घृता- वृधे।" यहाँ 'घृत' शब्द की पुनरावृत्ति है और ( अन्त में तीन बार 'आ' आया है ) इससे 'निवृत्त' भी है। यह पुनरावृत्ति और निवृत्ति तीसरे दिन के रूप हैं। ऋभुओं का निविद् सूक्त यह है :- "अनश्वो जातो अनभीशुरुक्थ्य यो ३ रथस्त्रिचक्रः परिवर्तते रजः।" (ऋ० ४।३६) इसमें "रथस्त्रिचक्र" में 'त्रि' शब्द आ गया। यह तीसरे दिन का रूप है। वैश्वदेव का निविद् सूक्त यह है :- परावतो ये दिधिषंत आप्यम्। (ऋ० १०।६३) 'परावत' में 'अन्त' है। तीसरा दिन अन्त है। तीसरे दिन का रूप है। यह 'गय' सूक्त है। इससे 'प्लत' के पुत्र 'गय' ने देवों के प्रियधाम को पाया और परम लोक को जीता। जो इस रहस्य को समझता है वह देवों के प्रियधाम को पाता है और परम लोक को प्राप्त होता है। अग्नि-मारुत शस्त्र का प्रतिपद् ( आरम्भ ) यह है :- वैश्वानराय धिषणामृतावूधे (ऋ० ३।२) धिषणा में 'अन्त' है। तीसरा दिन (त्र्यह) अन्त होता है। यह तीसरे दिन का रूप है। मरुतों का निविद् सूक्त यह है :- धारावरामरुतो धृष्णवोजसो (ऋ० २।३४) इसमें बहुवचन है। बहुवचन अन्त है। तीसरा दिन अन्त है। यह तीसरे दिन का रूप है।
२८८ [ पाँचवीं पञ्चिका जातवेद मंत्र वही है :- जातवेदसे सुनवाम ( ऋ० १।९९।१ ) जातवेद का निविद् सूक्त यह है :- त्वमग्ने प्रथमो अं गिरा ( ऋ० १।३१ ) यहाँ हर मंत्र के पहले 'त्वमग्ने' आता है । यह उदर्कं है । यह तीसरे दिन का रूप है । 'त्वं त्वं' बार बार कहने से अगले तीन दिनों ( चौथा, पाँचवाँ, छठा ) से तात्पर्य है । जो इस रहस्य को समझ कर यह पाठ करते हैं उनके त्र्यह बिना किसी विघ्न के निरन्तर समाप्त हो जाते हैं । ( २ ) ३-तीसरे दिन सब स्तोम खतम हो जाते हैं और सब छन्द । केवल एक चीज़ बच रहती है अर्थात् 'वाक्' । वाक् एक अक्षर है । इसमें तीन अक्षर सम्मिलित हैं । एक अक्षर में तीन अक्षर हैं । अगले त्र्यह में तीन दिन होते हैं । यह तीन अक्षर तीन के अगले दिनों को बताते हैं । यह अक्षर तीन यह हैं एक वाक्, एक गौ, एक द्यौ । इसलिये चौथे दिन का देवता 'वाग्' ही है । चौथे दिन इसी अक्षर का न्यूंख बनाते हैं । इसके स्वर को कुछ घटा बढ़ा कर । यह चौथे दिन को उठाने के लिये । न्यूंख अन्न है । अन्न के लिये गायक लोक इधर-उधर फिरते हैं और अन्न उत्पन्न होता है । चौथे दिन न्यूंख करके अन्न उत्पन्न करते हैं । क्योंकि यह कृत्य अन्न के लिये ही किया जाता है । इसलिये चौथा दिन जातवद् ( उपजाऊ-fertile ) होता है । कुछ लोग कहते हैं कि चार अक्षर का न्यूंख करना चाहिये क्योंकि पशुओं के चार पैर होते हैं और यह सब पशुओं की वृद्धि के लिये किया जाता है ।
पहला अध्याय ] .२८९ कुछ कहते हैं कि तीन अक्षरों से न्यूंख करना चाहिये । तीन लोक हैं और यह तीन लोकों की प्राप्ति के लिये किया जाता है। कुछ कहते हैं कि एक अक्षर का ही न्यूंख करे। मुद्गल के पुत्र लांगलायन ब्राह्मण ने कहा कि वाग् में एक ही अक्षर है इस लिये जो एक अक्षर से न्यूंख करता है वही ठीक करता है। कुछ कहते हैं कि दो अक्षरों से न्यूंख करे, प्रतिष्ठा के लिये। मनुष्य के दो पैर हैं और पशु के चार । इस प्रकार वह मनुष्यों को पशुओं में प्रतिष्ठित करता है। इस लिये दो अक्षरों से न्यूंख करे। पहले प्रातरनुवाक में न्यूंख होता है। क्योंकि पशु पहले मुँह से खाते हैं। इस प्रकार वह यजमान के मुँह को अन्न की ओर फेर देता है। आज्य शस्त्र में न्यूंख मध्य में किया जाता है। प्रजा अन्न को बीच में लेती है। बीच में अन्न को यजमान में धारण कराता है। दोपहर के सवन में न्यूंख आरंभ में किया जाता है क्योंकि पशु मुँह से खाना खाते हैं। इस प्रकार वह यजमान के मुँह को अन्न की ओर कर देता है। इस प्रकार दोनों सवनों में अन्न की प्राप्ति के लिये न्यूंख* करता है। (३) ४-चौथे दिन का देवता वाग् है। स्तोम इक्कीसवां है। वैराज साम है। अनुष्टुप् छन्द है। जो यह जानता है कि देवता कौन है, स्तोम कौन है, साम कौन है और छन्द कौन है उसका यज्ञ सफल होता है। 'आ' और 'प्र' चौथे दिन के रूप हैं। जो- जो पहले दिन के रूप हैं वही चौथे दिन के, जैसे-युक्त, रथ, आशु और पिब। पहले पद में देवता का स्पष्ट निर्देश है, और *न्यूंख की विधि आश्वलायन श्रौतसूत्र (७।११) में लिखी है। १९
· २९० [ पाँचवीं पञ्चिका इस लोक का उल्लेख । चौथे दिन के अन्य रूप यह हैं :— जात, ह्व, शुक्र, वाक् का रूप, विमद, चिरिष्टित विच्छंद ( अर्थात् भिन्न-भिन्न छन्द ), जिसमें अक्षर कम या अधिक हों ; वैरुप्य और अनुष्टुभ्, और भविष्यकाल की क्रिया ! चौथे दिन का आज्य सूक्त यह है :— अग्निं न स्ववृक्तिभिः ( ऋ० १०।२१ ) इसका ऋषि 'विमद' है और सूक्त के हर मंत्र में 'वि वो मदे' आता है। यह चौथे दिन का रूप है। इसमें आठ ऋचा हैं और पंक्ति छन्द है। यज्ञ पांच हिस्से वाला है। पशु भी पांच हिस्से वाले हैं, यह पशुओं की प्राप्ति के लिये किया जाता है। इन आठ मंत्रों के दस जगती होते हैं, क्योंकि मध्य के त्र्यह ( चौथा, पांचवां और छठा दिन ) का प्रातः सवन जगती में होता है। यह चौथे दिन का रूप है। इन आठ मंत्रों के १५ अनुष्टुभ् होते हैं, यह दिन अनुष्टुभ् का है। और अनुष्टुभ् चौथे दिन का रूप है। इन ८ मंत्रों में २० गायत्री होते हैं। क्योंकि यह फिर आरंभ का दिन है, यह चौथे दिन का रूप है। इसके साथ न तो स्तुति हैं, न प्रशस्ति । तथापि यह साक्षात् यज्ञ है इस लिये यह चौथे दिन का आज्य होता है। इस प्रकार वह यज्ञ से यज्ञ को तानते हैं और वाग् को प्राप्त करते हैं। यह काम संतति के लिये किया जाता है। जो इस रहस्य को समझ कर यज्ञ करते हैं वह त्र्यह में निर्विघ्न संतति ( सिलसिले ) को प्राप्त होते हैं। अनुष्टुभ् प्रउग यह हैं :— वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु । आ याहि सोम पीतये स्पार्हो देव नियुत्वता । ( ऋ० ४।४७।१ )
पहला अध्याय ] २९१ विहि होत्रा अवीता विपो न रायो अर्यः । वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये । (ऋ० ४।४८।१ ) वायो शतं हरीणां युवस्व पोष्याणाम् । उत वा ते सहस्रिणो रथ आ यातु पाजसा । ( ऋ० ४।४८।५ ) इन्द्रश्च वायवेषां सोमानां पीतिमर्हथः । युवां हि यन्तीन्दवो निम्न्न- मापो न सध्र्यक् ॥ वायविन्द्रश्च शुष्मिणा सरथं शवसस्पती । नियुत्वन्ता न ऊतय आ यातं सोमपीतये ॥ या वां सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा । अस्मे ता यज्ञवाहसेन्द्र- वायू नि यच्छतम् ॥ ( ऋ० ४।४७।२-५) आ चिकितान सुक्रतू देवौ मर्तं रिशादसा । वरुणाय ऋत पेशसे दधीत प्रयसे महे ॥ ता हि क्षत्रमविह्रुतं सम्यगसुर्यमाशाते । अध व्रतेव मानुषं स्वर्णधायि दर्शंतम् ॥ ता वामेषे रथानामुर्वी गव्यूतिमेषाम् । रातहव्यस्य सुष्टुतिं दधृक् स्तोमैर्मनामहे ॥ ( ऋ० ५।६६।१-३ ) आ नो विश्वाभिरूतिभिः सजोषो ब्रह्म जुषाणो हर्यश्व याहि । वरी- वृजत्स्थविरेभिः सुशिप्राऽस्मे दधद्वृषणं शुष्ममिन्द्र ॥ एष स्तोमो मह उग्राय वाहे धुरीवात्यो न वाजयन्नधायि । इन्द्र त्वायमर्क ईट्टे वसूनां दिवीव द्यामधिनः श्रोमत् धाः ॥ एवा न इन्द्र वार्यस्य पूर्धि प्र ते महीं सुमतिं वेविदाम । इषं पिन्व मघवद्भ्यः सुवीरां यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥ ( ऋ० ७।२४।४-६ ) त्यमु वो अप्रहणं गृणीषे शवसस्पतिम् । इन्द्रं विश्वासाहं नरं मंहिष्ठं विश्वचर्षणिम् ॥ यं वर्धयन्तीद् गिरः पतिं तुरस्य राधसः । तमन्न्वस्य रोदसी देवी शुष्मं सपर्यतः ॥
२९२ [ पाँचवीं पञ्चिका तद्व उक्थस्य बर्हणोन्द्रायोपस्तृणीबषि । विपो न यस्योतयो वि यद्रोहन्ति सक्षितः ॥ ( ६।४४।४-६ ) अप त्यं वृजिनं रिपुं स्तेनमग्ने दुराध्यम्। दविष्ठमस्य सत्पते कृधी सुगम् ॥ ग्रावाणः सोम नो हि कं सखित्वनाय वावशुः । जही न्यत्रिणं पणिं वृको हि षः ॥ यूयं हि ष्ठा सुदानव इन्द्रज्येष्ठा अभिद्यवः । कर्ता नो अध्वना सुगं गोपा अमा ॥ ( ऋ० ६।५१।१३-१५ ) अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि । त्वे विश्वा सरस्वति श्रितायूँ षि देव्याम् । शुनहोत्रेषु मत्स्व प्रजां देवि दिदिड्ढि नः ॥ इमा ब्रह्म सरस्वति जुषस्व वाजिनीवति । या ते मन्म गृत्समदा ऋतावरि प्रिया देवेषु जुह्वति ॥ ( ऋ० २।४१।१६-१८ ) इनमें 'आ', 'प्र' और 'शुक्र' आया है। यह चौथे दिन का रूप है । तं त्वा यज्ञेभिरीमहे तं गीर्भिर्गीर्वणस्तम । इन्द्र यथा चिदाविथ वाजेषु पुरुमाय्यम् ॥ ( ८।६८।१० ) यह मरुत्वतीय शस्त्र का प्रतिपद है । 'ईमहे' से तात्पर्य है कि आज का कृत्य लम्बा हो जाय । यह चौथे दिन का रूप है । नीचे दिये हुये मंत्र जो पहले दिन पढ़े जाते हैं चौथे दिन भी काम आते हैं :— इदं वसो सुतमन्धः ( ऋ० ८।२'-१२ ) इन्द्र नेदीय ( ऋ० ८।५३।५-७ ) प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः ( ऋ० १।४०।३ ) अग्निर्नैता ( ऋ० ३।२०।४ ) त्वं सोमक्रतुभिः ( ऋ० १।९१।२ )
पहला अध्याय ] २९३ पिन्वन्त्यपो ( ऋ० १।६४।६ ) प्रव इन्द्राय बृहते ( ऋ० ८।८९।३ ) यह चौथे दिन का रूप हैं। श्रुधी हवमिन्द्र मा रिषण्यः स्याम ते दावने वसूनाम्। इमा हि त्वामूर्जो वर्धयंन्ति वसूयवः सिन्धवो न क्षरन्तः॥ ( ऋ० २।११।१ ) इसमें 'हव' शब्द आया है। यह चौथे दिन का रूप है। मरुन्वाँ इन्द्र वृषभो••••••(ऋ० ३।४७) सूक्त में ५ वें मंत्र के अन्तिम पद में 'हुवेम' में 'हुव' शब्द आया है। यह चौथे दिन का रूप है। यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इस मंत्र के प्रतिष्ठित पदों के द्वारा सवन को कायम रखता है कि यह कहीं गिर न पड़े। इमं नु मायिनं हुव (ऋ० ८।७६।१) इस मंत्र में 'हुव' आया है। यह चौथे दिन का रूप है। इनका छन्द गायत्री है। इस त्र्यह के मध्यं सवन का गायत्री ही वाहक है। जिस छन्द में निविद् होता है वही छन्द वाहक समझा जाता है। इस लिये निविद् गायत्री छन्द में होता है। नीचे के मंत्र बृहत् दिनों के वैराज पृष्ठ हैं। पिब्रासोम••••••( ७।२२।१-२ ) श्रुधी हवं••••••( ७।२२।४-५ ) चौथा दिन बृहत् दिन है। यह चौथे दिन का रूप है। ,धाय्या वही है—यद्द् वावान•••••• त्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवः। त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः॥ ( ऋ० ६।४६।१ ) यह बृहत् की योनि है, इसकी ओर लौटाता है। क्रम के अनुसार बृहत् साम दिन है। साम प्रगाथ वही है :— त्वमिन्द्र प्रतूर्तिषु ( ८।६६।५ )
२९४ [ पाँचवीं पञ्चिका इसमें “अशस्तिहा जनिता” आया है। इसमें 'जात' आया है। यह चौथे दिन का रूप है। तार्क्ष्य वही है :-त्वमुषु वाजिनं देवजूतम् । (ऋ० १०।२२)(४) ५-विमद विरिफित वाला नीचे का सूक्त है :- कुह श्रुत इंद्रः कस्मिन्नद्य......( ऋ० १० । २२ ) इसमें ऋषि का नाम भी है और विरिफित भी है। यह चौथे दिन का रूप है। “युध्मस्य ते वृषभस्य स्वराज” ( ऋ० ३।४६ ) इस सूक्त में 'जनुषा' शब्द 'जा' धातु का आया है :-उरुं गभीरं जनुषाम्युग्रं ( ३।४६।४ ) । यह चौथे दिन का रूप है। छन्द त्रिष्टुभ् है। इसके द्वारा सवन को कायम रखता है कि कहीं गिर न पड़े। त्यमु वह सत्रासाहं विश्वासु गीर्ष्वायतम् । ( ऋ० ८।६२।७ ) यह पर्यास है। 'विश्वासु', 'गीर्षु', 'आयर्त' से मालूम होता है कि दिन का कृत्य बढ़ना है। यह चौथे दिन का रूप है। छन्द गायत्री है। इस त्र्यह में मध्य सवन के वाहक गायत्री छन्द हैं। जिस छन्द में निविद् होता है वही छन्द वाहक होता है। इसलिये निविद् को गायत्री छन्द में रखते हैं। वैश्वदेव शस्त्र के प्रतिपद और अनुचर यह हैं :- विश्वो देवस्य नेतुः ( ऋ० ५।५०।१ ) तत् सवितुर्वरेण्यम् ( ऋ० ३।६२।१० ) आ प विश्वदेवं सत्पतिम् । ( ऋ० ५।८२।७-९ ) यह चौथा बृहत् दिन है और चौथे दिन का रूप है। सविता का निविद् सूक्त यह है :- आ देवो यातु सविता सुरत्नः । ( ऋ० ७।४५ ) इसमें 'आ' है। यह चौथे दिन का रूप है।
पहला अध्याय ] २९५ द्यावा पृथिवी का निविद् सूक्त यह है :- प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी नमोभिः । ( ऋ० ७।५३ ) इसमें 'प्र' है जो चौथे दिन का रूप है :- ऋभुश्रों का निविद् सूक्त यह है :- प्र ऋभुभ्यो दूतमिव वाचमिष्ये । ( ऋ० ४।३३ ) इसमें 'प्र' और 'वाचमिष्ये' पड़ा है जो चौथे दिन का रूप है । विश्वेदेव का निविद् सूक्त यह है :- प्र शुक्रैतु देवी मनीषा । ( ऋ० ७।३४ ) इसमें 'प्र' और 'शुक्र' है जो चौथे दिन का रूप है । इसके छन्द भिन्न-भिन्न हैं । दो पद के और चार पदों के । यह चौथे दिन का रूप है । अग्नि-मारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :- वैश्वानरस्य सुमतौ, स्याम राजा हि कं भुवनानामभि श्रीः । इतो जातो विश्वमिदं विचष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण ॥ ( ऋ० १।९८ ) इसमें 'जात' शब्द आया है । यह चौथे दिन का रूप है । मरुतों का निविद् सूक्त यह है :- क इं व्यक्ता नरः सनीडा रुद्रस्य मर्या अधास्वश्वाः । नकिह्रै षां जनू षि वेद ते अङ्ग विद्र मिथों जनित्रम् ॥ ( ऋ० ७।५६ ) इसमें 'नकिह्रैषां जनू षि वेद' में 'जात' शब्द आया है यह चौथे दिन का रूप है । इसके छन्द भिन्न-भिन्न हैं । कोई दो पद के और कोई चार पद के । यह चौथे दिन का रूप है । जातवेद मंत्र वही है "जातवेदसे सुनवाम सोमम्” ( ऋ० १।९९।१ )। जातवेद का निविद् सूक्त यह है :- अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युती जनयन्त प्रशस्तम् । ( ऋ० ७।१ )
२९६ [ पाँचवीं पञ्चिका इसमें 'जनयन्त' शब्द आया है। यह चौथे दिन का रूप है। इसके छन्द भिन्न-भिन्न हैं। विराज् और त्रिष्टुभ् । यह चौथे दिन का रूप है। (५) ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त हुआ।
दूसरा अध्याय ६—पाँचवें दिन का देवता गौ है। स्तोम त्रिणव है। साम शक्वर है, छन्द पंक्ति है। जो यह जानता है कि कौन देवता है, कौन स्तोम है, कौन साम है और कौन छन्द है उसका यज्ञ सफल होता है। जिसमें 'आ' और 'प्र' न हो और जो 'स्थित' हो वह पांचवें दिन का रूप है। दूसरे दिन के रूप भी पांचवें दिन के रूप हैं, जैसे ऊर्ध्व, प्रति, अन्तः, वृषन्, वृधन्। बीच के पाद में देवता का निर्वचन और अन्तरिक्ष का उल्लेख। इनके सिवाय यह विशेषतायें और हैं:— दुग्ध, ऊध, धेनु, पृश्नि, मद, पशुओं का रूप, अभ्यास (अर्थात् घटना बढ़ना) क्योंकि पशु बड़े छोटे होते हैं। पांचवां दिन जागत है अर्थात् जगत् से सम्बन्ध रखता है, पशु जगत् है (चलता फिरता) है; यह बार्हत भी है क्योंकि बृहती छन्द पशुओं का है। यह पांक्त भी है क्योंकि पशु पंक्ति छन्द से सम्बन्ध रखते हैं। यह 'वाम' है क्योंकि पशु उलटे हैं। यह हविष्मत् है क्योंकि पशु हवि हैं। यह वसुमत है क्योंकि पशुओं ( २९७ )
२९८ [ पाँचवीं पञ्चिका के वसु या शरीर है। यह शाक्वर पांक्त है और दूसरे दिन के समान वर्तमान काल है। यह पांचवें दिन के रूप हैं। आज्य शस्त्र है "इममृधुवो अतिथि मुषुबु धम्" (ऋ० ६।१५) छन्द जगती है और छन्दों के साथ भी। यह पशुओं का रूप है। यह पांचवें दिन का रूप है। पांचवे' दिन के प्र-उग शस्त्र में जो बृहत् छन्द में हैं नीचे के मंत्र हैं :— आ नो यज्ञं दिविस्पृशं वायो याहि सुमन्मभिः। अन्तः पवित्र उपरि श्रीणानोयं शुक्नो अयामि ते॥ वेत्यध्वर्युः पथिभी रजिष्ठैः प्रति हव्यानि वीतये। अधा नियुत्व उभयस्य नः पिब शुचिं सोमं गवाशिरम्॥ (ऋ० ८।१०१।६-१०) आ नोने वायो महे तने याहि मखाय पाजसे। वयं हि ते चकृमा भूरि दावने सद्यश्चिन्महि दावने। (ऋ० ८।४६।२५) रथेन पृथु पाजसा दाश्वांसमुप गच्छतम्। इन्द्रवायू इहागतम्॥ इन्द्रवायू अयं सुतस्तं देवेभिः सजोषा। पिवतं दाशुषो गृहे॥ इह प्रयाणमस्तु वामिन्द्र वायू विमोचनम्। इह वां सोम पीतये॥ (ऋ० ४।४६।५-७) बहवः सूरचक्षसोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः। त्रीणि ये येमुर्विदथानि धीतिभिर्विश्वानि परिभूतिभिः॥ वि ये दधुः शरदं मासमादर्हर्यज्ञमक्तुं चाहृचम्। अनाप्यं वरुणो मित्रो अर्यमा क्षत्रं राजान आशत॥ तद्वो अद्य मनामहे सूक्तैः सूर उदिते। यदोहते वरुणो मित्रो अर्यमा यूयमृतस्य रथ्यः॥ (ऋ० ७।६६।१०-१२) इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना। अयं वामह्वे ऽवसे शचीवसू विशं विशं हि गच्छथः॥
दूसरा अध्याय ] २९९ युवं चित्रं ददथुर्भोजनं नरा चोदेथां सूनृतावते । अर्वाग्रथं समनसा नियच्छतं पिवतं सोम्यं मधु ॥ आ यातमुप भूषतं मध्वः पिवतमश्विना । दुग्धं पयो वृषणा जेन्या- वसू मा नो मर्धिष्टमा गतम् ॥ ( ऋ० ७।७४।१-३ ) पिवा सुतस्य रसिनो मत्सवा न इन्द्र गोमतः । आपिनों बोधि सध- माद्यो वृधेऽस्माँ अवन्तु ते धियः । भूयाम ते सुमतौ वाजिनो वयं मा नः स्तरभिमातये । अस्माञ् चित्राभिरवतादभीष्टिभिरा नः सुम्नेषु यामय ॥ इमां उ त्वा पुरुवसो गिरोवर्धन्तु या मम । पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितोऽभि स्तोमैरनूषत ॥ (ऋ० ८।३।१-३) देवन्देवं वोऽवसे देवन्देवमभिष्टये । देवन्देवं हुवेम वाजसातये . गृणन्तो देव्या धिया ॥ देवासो हिष्मा मनवे समन्यवो विश्वे साकं सरातयः । ते नो अद्य ते अपरं तुचे तु नो भवन्तु वीरवोविदः ॥ प्रवः शंसाम्यद्रुहः संस्थ· उपस्तुतीनाम् । न तं धूर्तिर्वरुण मित्र मर्त्यं यो वो धामभ्योऽविधत् ॥ (ऋ० ८।२७।१३-१५) बृहद्गायिषे वचोऽसुर्यान्नदीनाम् । सरस्वतीमिन् महया सुवृक्तिभिः स्तौमैर्वसिष्ठ रोदसी ॥ उभे यत् ते महिना शुभ्रे अन्धसी अधिक्षियन्ति पूरवः । सा नो चोधयित्री मरुत् सखा चोद राधो मघोनाम् ॥ भद्रमिद्भद्रा कृणवत् सरस्वत्यकवारी चेतति वाजिनीवती । गृणाना जमदग्निवत् स्तुवाना च वसिष्ठवत् ॥ (ऋ० ७।९६।१-३) मारुतीय शस्त्र का प्रतिपद् यह हैः- यत् पाञ्चजन्यया विशेन्द्र घोषा असृक्षत । अस्तृणाद्बर्हणा विपोऽ- र्यो मानस्य स क्षयः ॥ (ऋ० ८.६३।७) इसमें 'पांचजन्य' शब्द आया है । यह पाँचवें दिन का रूप है ।