अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
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स्रोत: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (उद्गम)
अकबर बीरबल विनोद २०८
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का शिकार किया हो। बीरबल ने बादशाह से अनुमति लेकर गुप्त सुरंग के द्वार पर प्रसन्नता-पूर्वक जा बैठा और नाई के कथनानुसार उसके ऊपर घास फूसों का पुलंदा सजाकर चुना जाने लगा। बीर- बल समय की प्रतीक्षा कर रहा था। जब उसने देखा कि अब मैं घास के पुलिन्दों से भलीभाँति ढक दिया गया और यहाँ से खिसकने में किसी की दृष्टि नहीं पड़ सकती तो सुरंग का द्वार खोलकर उसके द्वारा कुशल-पूर्वक अपने घर जा पहुँचा। और फिर छद्म भेष धारण कर श्मशान की घटना देखने के लिये घाटपर जा पहुँचा। अभी तक घास चुनी जा रही थी। जब सब घास भलीभाँति चुन दी गयी तो बादशाह की आज्ञा से उसमें आग डाल दी गई, बहुतेरी हिन्दू जनता बादशाह की मूर्खता की समालोचना करने लगी कारण कि बीरबल की सुन्दर नीति से उन्हें बड़ा अनुराग था। इस प्रकार श्मशान पर एकत्रित जनता का एक बहुत बड़ा भाग बादशाह की आपकीर्ति फैलाने लगा-हाय ! हाय ! दीवान अब जीवित नहीं होगा, अब हमें फिर उसके दर्शन की आशा न रही। उसके कर्म में ब्रह्मा ने यही लिखा था।” बीरबल क्रमशः उपस्थित जनता में घूमता फिरता मुस- लमानों की टोली में जा पहुँचा। वे आपस में कह रहे थे-“हम लोगों के मार्ग का कंटक आज इस प्रकार से टला। अब कोई मुसलमान नया दीवान चुना जायगा। यह नालायक हम लोगों को कभी गर्दन सीधी करने का मौका ही नहीं देता। अब हमको आनन्द ही आनन्द का उपभोग होगा।”
२०६ अकबर बीरबल विनोद
२०६ अकबर बीरबल विनोद और आगे बढ़कर बीरबल ने देखा तो काना नाई खूब डींग मार रहा है और बहुतेरे ही मुसलमान एकत्रित होकर उसकी बातें सुन रहे हैं। उसने कहा-"यह मेरी ही करतूत से आज इस अधोगति को प्राप्त हुआ है; यदि मैं इतनी युक्ति न लड़ाता तो भला कोई उसका एक बाल भी बाँका कर सकता था। मीर खाँ, अब आप अपने कौल के अनुसार मुझे पुरस्कार दीजिये।" आपने अपनी आँखों देखा है कि वह भीतर ही भीतर जलकर खाक हो गया, अब किसी को उसकी हड्डी गुड्डी भी देखने को नसीब न होगी।" बीरबल उसकी डींग सुन सुनकर जहर की घूँट घोंट रहा था, कभी २ तो क्रोध के आवेश में आकर दाँतों तले ओठ दबाकर रह जाता था। वह मनही मन बोला-"न घबराओ, अबकी बीर- बल के हाथ से तुम्हारा छूटना कठिन है। मेरी ओसरी खतम हो गई; अब तुम्हारी बारी है। जब सब घास जल गई, तो लोग अपने अपने घर चले गये। बीरबल भी चुपके से अपनी गुप्त कोठरी में जा बैठा। परन्तु उसे चैन कहाँ। रातके समय नित्य नगर में फेरी लगाया करता था। गुप्तबास करते हुए जब कई महीने बीत गये तो बीरबल ने अपने प्रकट होने का निश्चय किया। इतने दिनों में उसको दाढ़ी और मूँछ पर्याप्त बढ़ चुकी थी। सिर पर बड़ी बड़ी जटाएँ उग आई थीं। इसी वेश में बीरबल ने दरबार में जाना उत्तम समझा। तब एक दिन वह दरबारी कपड़ों से सुसज्जित होकर बादशाह के पास गया। नगर में उसे बहुतेरे परिचित मिले; परन्तु उसका रूपान्तर हो जानेके कारण वे उसे पहचान १४
अकबर बीरबल विनोद २१०
अकबर बीरबल विनोद २१० ग सके । दरबार में पहुँचकर बीरबल बादशाहके सामने खड़ा होगया। जब बादशाह उसे न पहचान सके तो वह स्वयं बोला- "पृथ्वीनाथ! मेरा नाम बीरबल है, मैं आपकी आज्ञानुसार आपके पित्रों से मिलकर वापस आया हूँ।" बादशाह उस को भली- भाँति देखकर बोले- "वाहजी बीरबल, क्या तुम लौटकर आ गये ? जरा मेरे पित्रों का समाचार वर्णन करो, वे प्रसन्न तो हैं न ?" बीरबल ने कहा- "भला उनका क्या कहना है, आपके पुण्य प्रभाव से वे बड़े आनन्द से हैं, जब मैंने उनको आपका कुशल समाचार सुनाया तो वे बड़े हर्षित हुये और मुझे आपका दीवान जानकर तो मुझसे इतना प्रेम करने लगे कि मैं यहाँ आकर भी उन्हीं के प्रेम में विह्वल हो रहा हूँ। उनका सुख इन्द्रके सुखभोग को भी लजाने वाला है। वहाँ उन्हें सब बातों का सुख है केवल एकही बातकी कमी बतलाई है, वह यह कि उस लोक में हजामत बनवाने के लिये नाई नहीं मिलता। देखिये इसी से मेरी भी यह दशा हुई। मेरी तो केवल छ महीने में यह हाल है और उनके बाल तो इतने बढ़ गये हैं कि चलना फिरना दूभर हो रहा है। उनके सिर और दाढ़ी के बार जमीन पर लेटते चलते हैं। मेरे चलते समय उन्होंने आपसे एक चतुर नाई भेजने का अनुरोध किया है। मैं उन्हें आपकी तरफ से धीरज देकर आया हूँ। वहाँकी बहुतेरी सामग्रियाँ वे मेरे साथ भेजने वाले थे; परन्तु फिर इस विचार से ठिठक गये कि नाई आने पर उसीके हाथसे भेजा जायगा। मैं उनको एक चतुर नाई तुरत भेजनेका आश्वासन दे आया हूँ। अब भेजना न भेजना आप की इच्छा पर निर्भर
२११ अकबर बीरबल विनोद
२११ अकबर बीरबल विनोद है। मैं उनका सन्देश आपसे कह कर अपने पाप दोष से बरी होगया हूँ। तब बादशाह बोले-“बीरबल ! मैने तेरी बातें और अपने पित्रों का सन्देशा तो सुन लिया, परन्तु आखिर इसका उपाय क्या है, भला यहाँ पर ऐसा कौन नाई है जिसे भेजूं?” बीरबल बोला-“हाँ इस विषय पर मैंने पहले विचार किया था और अब भी आँखें फैलाकर देखता हूँ तो मुझे अपने काने नाऊ के सामने दूसरा कोई भी नहीं जँचता। वह घास के धुएँ के साथ स्वर्ग में बड़ी आसानी से पहुँच जायगा।” बादशाह को बीरबल की युक्ति जँच गई और वे काने नाऊ को बुलवाकर सब समाचार कह सुनाये। काने नाई को बीर- बल का सजीव लौटना सुनकर बड़ा दुख हुआ। उसे स्वर्ग जाने के लिये उसे बाध्य होना पड़ा। बिचारे को अपनी मृत्यु प्रत्यक्ष नाचती हुई दिखलाई पड़ी। जान बचाने का कोई दूसरा मार्ग न देखकर उसने बादशाह से एक मास की मुहलत ली। इस मुहलत से उसका प्रयोजन छिपकर भाग जाना था। बादशाह इतनी लम्बी छुट्टी स्वीकार नहीं किये और बोले-“स्वर्ग में क्षौर कराने के लिये हमारे पितर बड़े आकुल हो रहे हैं; इसलिये तू अपने घर का पूरा पूरा प्रबन्ध करके एक हफ्ते के भीतर जानेके लिये तय्यार होकर लौट आओ यदि तुझे स्वर्ग से पलटने में देर होगी तो मैं तेरे कुटुम्ब के खाने पहनने का प्रबन्ध सरकारी कोष से करवा दूँगा। नाई ने अपने मनमें विचार किया-“अच्छा आठही दिन कहाँ का थोड़ा है, इतने दिनों में तो मैं कहाँ का कहाँ पहुँच जाऊँगा। बीरबल की युक्ति मुझे फाँस
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न सकेगी। वह बादशाह को सलाम कर अपने घर का रास्ता लिया।" बीरबल भी परछाईं की तरह इसके पीछे पड़ गया था; वह इसकी सारी हरकतों को ध्यानपूर्वक देखता जा रहा था। उसने समझ लिया था कि यह खोटा नाई बात छोड़ने की युक्ति निकाल रहा है। अतएव इसपर बिना सच्ची चौकसी किये काम न चलेगा। बीरबल तो इसकी ताक में लगा ही था; ज्योंही काना नाई दरबार से बाहर निकला, वह अपने एक स्वामिभक्त नौकर को उसके पीछे लगा दिया। काना नाई रास्ते में अनेक प्रकार की युक्ति सोचता विचारता हुआ अपने घर पहुँचा। अपने कुटुम्बके स्त्री पुरुषों से दरबार की सारी बातें समझा कर बोला- "यदि हमलोग गुप्त रीतिसे आज रात में ही नगर को छोड़कर इस राज्य से बाहर निकल चलें तो बीरबल के कुचक्र से जीवन रक्षा हो सकती है।" इसी बीच उसका छोटा लड़का दौड़ता हुआ घर के भीतर आया और अपने पिता (काने नाई) से बोला-"पिता जी आप यहाँ क्या कर रहे हैं, द्वार पर एक सिपाही आकर बैठा है।" नाई का चेहरा फक् हो गया, उसने कहा- "अब निश्चय मरना पड़ा। यह काम उसी बीरबल का जान पड़ता है। इसको भयभीत देख उसकी स्त्री बोली- "स्वामी ! आप इतना डर क्यों रहे हैं; अभी चन्द रोज पहले बीरबल भी तो गया था। जैसे वह काम कर के सजीव लौटा उसी प्रकार आप भी लौट आइयेगा।" काने नाई ने कहा-"तू क्या जाने बीरबल कैसे लौट आया है, उसपर तो देवी की छाया है जिससे बच गया; मैं कदापि नहीं बच सकता। किसी
२१३ अकबर बीरबल विनोद
२१३ अकबर बीरबल विनोद
कवि का कहना है— “जैसा को तैसा मिले, मिले नीच को नीच। पानी को पानी मिले, मिले कींच को कींच॥” जैसी करनी वैसी पार उतरनी। मैंने दूसरे की बुराई की थी वह मेरे ही सिर बीती। खैर आगे का आगे देखा जायगा, आज ही से उसकी याद में क्यों मरूँ। सातवें दिन बादशाह ने उसे बुलाने के लिये अपना एक सिपाही भेजा। नाई हजामत बनाने का लुह्खर लेकर बादशाह के पास गया। यहाँ उसे स्वर्ग भेजने की सब तय्यारी हो चुकी थी। बादशाह की आज्ञा से बीरबल ने पहले ही से श्मशान पर घास के पुलिन्दों का ढेर लगवा चुका था। काने को लेकर बादशाह श्मशान पर पहुँचे और उसे एक जगह बैठाकर ऊपर से घास के पुलिन्दों को सजवा दिया। जब यह काम समाप्त हो गया तो एक सिपाहीको आग लगाने की आज्ञा मिली। वह उसमें तुरत आग लगा दी। बीरबल ने इस प्रकार अपने बुद्धि बल से काने नाई का अन्तिम संस्कार किया। जो दूसरे के लिये खंदक खोदता है उसके लिये ईश्वर मड़ार खोद देता है। हमें चाहिये कि दूसरों की बुराई से सदैव बचते रहें। कौन जानता है कि किस समय क्या का क्या हो जायगा। रुपये देने वालों को जैसे रुपयों के बदले रुपया और सूद नफा में मिलता है, उसी तरह सेर भर बुराई के बदले में सूद सहित सवा सेर भुगतनी पड़ती है, और उसकी सफाई मुफ्त में हो जाती है।
<u>अकबर बीरबल विनोद</u> २१४
<u>अकबर बीरबल विनोद</u> २१४ सौ गायों के एकमात्र अधिपति आप ही हैं एक दिन तानसेन और बीरबल में कुछ विवाद छिड़गया, वे प्रत्येक अपने २ को एकदूसरे से गुणी बतलाते थे । बादशाहने कहा-“इस प्रकार तुम्हारा विवाद नहीं मिट सकता, इसके लिये किसी को मध्यस्त बनाकर अपना न्याय करा लो ।” वे बोले- “पृथ्वीनाथ ! आपकी आज्ञा हमें सिरोधार्य है । हम दोनों इस बात पर सहमत हैं, परन्तु हमारी बुद्धि में नहीं आता कि हम किसको अपना मध्यस्थ बनावें । कृपया आपही इसका भी निपटारा कर दें । बादशाह ने कहा-“आपलोग महाराणा प्रतापसिंह के पास जावें ।” बीरबल और तानसेन दोनों ही एक साथ प्रतापसिंह से जा मिले। तानसेन तो गायनाचार्य्य था ही, वह वहाँ पहुँचतेही एक रागिनी छेड़ी । बीरबल अवसर की प्रतीक्षा करता हुआ खामोश बैठा रहा। जब उसने देखा कि तानसेन अपने गान वाद्य से राणा को मोहित कर बाजी मार लिया चाहता है तो बोला- “राणाजी! हम दोनों एकही साथ साही दरबार से चलकर आपके पास आये हैं और हम दोनोंही रास्ते में एक एक अलग अलग मन्नतें मान चुके हैं । मैंने पुष्करजी में पहुँचकर प्रार्थना करी है कि यदि मैं दरबार से मानपत्र प्राप्तकर लौटूँगा तो एकसौ गौ ब्राह्मणों को दान करूँगा और मिया तानसेनजी ने खाजेखिजिर की दरगाह में जाकर अपनी मन्नत की है कि जो मैं राणाजी से प्रसंशापत्र प्राप्त करूँगा तो यहाँ पर एक सौ गौवों की कुरबानी कराऊँगा । सौ गायों की जिन्दगी एकमात्र आपके हाथ है।
२१५ \hfill अकबर बीरबल विनोद
२१५ \hfill अकबर बीरबल विनोद \vskip 0.5em
आप चाहे उन्हें जीवदान दें वा बध करावें। यदि जिलाने का विचार हो तबतो मुझे प्रशंसापत्र दीजिये और यदि सौ गौवों को मरवाना हो तो तानसेन को दीजिये। राणासाहब हिन्दू होकर भला गौवों की कुरबानी कब पसन्द कर सकते थे उन्होंने तुरत अकबर को पत्र लिख भेजा-“बीरबल बड़ा गुणग्य है, इसकी जितनी प्रशंसा की जाय सब थोड़ी है।” विचारे तानसेन की गरदन झुक गई। वह चुपके से वहाँ से चलकर दिल्ली पहुँचे अपने जीवन में फिर उन्होंने कभी बीरबल का सामना नहीं किया।
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\begin{center} {\large\textbf{गरीब लड़की वेश्या के घर}} \end{center}
दिल्ली नगर में एक अति दरिद्री मनुष्य रहता था। उसकी हालत बड़ी अबतर थी। यहाँतक कि अन्न मिलता तो वस्त्र नहीं और यदि वस्त्र मिलता तो अन्न का ही अभाव रहता। उस मनुष्य को एक आठ वर्ष की कन्या थी, जो रूप रंग में भली और शरीर की सुडौल थी। एक दिन एक दुष्ट मनुष्य उस कन्या से मिला और उसे कुछ प्रलोभन देकर बहकाया। जब वह बालिका छोटी बुद्धि के कारण उसके बहकावे में आ गई तो वह उसे एक रंडी के घर ले जाकर बेच दिया। वेश्या के घर जाकर कन्या को सब उपभोग की सामग्रियाँ आसानीसे मिलने लगीं, खानेके लिये हरसमय नया नया और स्वादिष्ट पदार्थ मिलता था। ऐसे सुख के उपभोग में पड़कर
अकबर बीरबल विनोद २१६
अकबर बीरबल विनोद २१६
कन्या अपने पिता को एकदम भूलगई। इधर विचारा पिता अपनी कन्या के लिये बहुत हाय हाय किया और अपने भर सक उसकी बहुत खोज बीन की, परन्तु जब उसका कहीं भी पता न चला तो लाचार होकर बैठ रहा। वेश्या ने उस कन्या को नृत्य गान की शिक्षा दिलवाकर उसे अपने फन में गुणागरी बना दिया। वह धीरे धीरे सारे नगर में विख्यात हो गई। एक दिन ऐसी घटना घटी कि वह एक जगह महफिल में नाच रही थी और उसी बीच उसका पिता भी वहाँ पर जा पहुँचा। वह नाचने वाली कन्या को गौर करके देखा तो मालूम हुआ कि वह उसकी ही राम- पियारी नाम्नी कन्या है। उसके बदन में काटो तो खून नहीं; परन्तु उस समय छेड़खानी करने से अपना अपमान समझ कर वह चुप मार गया और उस वेश्या का पूरा परिचय लेकर बादशाह के पास पहुँचा। जब बादशाह दरबार में आये तो अपना एक अर्जीदावा पेश किया। बादशाह उसे पढ़ने के लिये बीरबल को दिया। तब बीरलब उसे पढ़कर बादशाह को सुनाया। बादशाह ने वेश्या को उसकी लड़की के सहित तलब करने की आज्ञा दी। दूसरे दिन वेश्या कन्या के सहित दरबार में उपस्थित हुई। बीरबल बादशाह की अनुमति से निम्नलिखित प्रश्न किया-“यह कन्या तुझे कहाँ से प्राप्त हुई है, और इसका पिता कौन है?” वेश्या तो वेश्या भला वह कब की चूकने वाली थी, इनकी पंडिताई सब पर विदित है, वह घर से ही कन्याको भलीभाँति सिखा पढ़ा कर दरबार में लाई थी। उसने
२१७ अकबर बीरबल विनोद
२१७ अकबर बीरबल विनोद कहा-“पृथ्वीनाथ ! यह एक फकीर की कन्या है, जब यह बहुत छोटी थी तभी वह फकीर इसे मेरे हाथ बेच गया था ।” इसकी उम्र उस समय दो तीन वर्ष की थी। भली भाँति बातचीत भी करना नहीं जानती थी। मेरे घर रहकर कई वर्षों के बाद अब सयानी हुई है। लालन पालन के अतिरिक्त और बहुत सा व्ययकरके मैंने इसे शिक्षिता बनाया है। बीरबल ने उस कन्या से पूछा-“क्यों री छोकरी ! तू अपने माता पिता को जानती है, तेरा जन्म किस जगह हुआ था ?” लड़की बोली-“ना सरकार ! मैं तो अपने माता पिता की सूरत भी नहीं पहचानती, जब से होश संभाले हूँ तब से आजतक बराबर इन्हीं का साथ है और मैं इन्हीं को अपनी माँ जानती हूँ ।” बीरबल ने वेश्या से पूछा-“तू इस लड़की का नाम जानती है ? वेश्या बोली-“हाँ मैं इसको काशी के नाम से पुकारती हूँ ?” बीरबल ने कहा-“अच्छा अब आज तुम अपने घर जावो कलह दरबार के समय फिर उपस्थित होना ।” दूसरे दिन बीरबल ने उससे पहले ही लड़की के पिता को तलब किया और उससे पूछा-“क्या तुम अपने लड़की का असली नाम बतला सकते हो ?” पिता बोला-“हाँ सरकार ! मैं उसे सुभद्रा नाम से पुकारता हूँ। यह हमारे अड़ोस पड़ोस के सभी लोग जानते हैं, आप उनसे भी पूछ सकते हैं। बीरबल को उनके नाम के सम्बन्ध में और पूछ ताछ करने की आवश्यकता नहीं जान पड़ी, इसलिये उसे वहीं तक रक्खा । इधर वेश्या भी समय पर उपस्थित हुई। इस मामले की
अकबर बीरबल विनोद २१८
अकबर बीरबल विनोद २१८ बड़ी शोहरत हो गई थी इसलिये दोनों तरफ से बहुतेरे लोग फैसला सुनने के लिये आये। बीरबल ने चुपके से एक सिपाही को आज्ञा दी कि इस भीड़ में घुसकर सुभद्रा सुभद्रा कई बार पुकारा, जो कोई नाम को सुनकर कुछ भी संकुचित हो उसे पकड़ कर मेरे पास हाजिर करो। सिपाही ने चिल्लाकर सुभद्रा को पुकारा। उसके पुकारते ही सब लोग सन्न हो गये; परन्तु वह कन्या चुपके से खड़ी होकर इधर उधर देखने लगी। सिपाही बीरबल की आज्ञानुसार उसका हाथ पकड़ लिया और उसे उस के पास ले आया। वेश्या भी लड़की के साथ हो ली।' बीरबल ने कन्यासे पूछा— "क्यों री! तेरा नाम तो काशी है न, फिर तू सुभद्रा के नाम से क्यों खड़ी हो गई।" लड़की ने उत्तर दिया- "सरकार! मेरे पिता मुझे सुभद्रा के नाम से ही पुकारते थे। अतएव सुभद्रा नाम के सुनते ही मेरे कान खड़े हो गये।" बीरबल ने कहा- "अभी तू कल अपने बयान में कह चुकी है कि मैं अपने पिता को नहीं जानती और आज इस प्रकार कहती है?" वह लड़की चक्कर में आ गई और डरवश थरथर काँपने लगी। वेश्या बीच बीचमें अपने बचन की पुष्टि के लिये बोलना चाहती थी; परन्तु बीरबल ने उसको डाटकर रोक दिया। वे बोले- "तू झूठी साबित हो चुकी है क्योंकि तेरे बयानों में अन्तर पड़ रहा है। मैं इस मिथ्या के बदले तुझे अभी दण्ड देता हूँ। यह कह कर बीरबल ने एक कर्मचारी से कुछ सांकेतिक
२१६ अकबल बीरबल विनोद
२१६ अकबल बीरबल विनोद
भाषण किया। कर्मचारी आज्ञा पाते ही एक कोड़ा हाथ में लेकर सामने आया। उसे देखकर वेश्या डर गई, और तुरत अपना कसूर गरदान लिया।” वह बोलो-“पृथ्वीनाथ ! मैं इस कन्या को आज से तीन चार वर्ष पहले एक आदमी से खरीदा था। वह आदमी मुझे झाँसा पट्टी पढ़ा इसके बदले में काफी धन हड़प ले गया है। आप मेरे अपराधों को क्षमा करें।” लड़की का पिता बीरबल के इसारे से अपनी कन्या के पास खड़ा हो गया; बीरबल ने उस लड़की से पूछा-“क्या तू इस आदमी को पहचानती है ? क्या इसकी शक्ल तेरे पिता से मिलती है ?” लड़की को डर उत्पन्न हो गया, उसने सोचा कि अगर झूठ बोलती हूँ तो बीरबल बीच सभा में कोड़े लगवावेगे। अतएव सच बोलना ही अच्छा है। उसने कहा-“हाँ हाँ यही मेरे जन्मदाता पिता हैं।” इतना कहकर वह अपने पिता के चरणों पर गिर पडी, पिता ने उसे उठाकर छाती से लगा लिया। बीरबल ने कहा-“वेश्या अब तेरे पास और कोई सफाई देने की बात नहीं रही, तू एक साथही तीन अपराधों में गिरफ्तार हुई है। पहला अपराध अबोध कन्या के फुसलाने का, दूसरा दास ब्योसाय को तरक्की देने का और तीसरा धोखा देने का है। इसलिये तुमको सात वर्ष की सजा दी जाती है।” वह सिपाहियों द्वारा तत्क्षण कैद करली गई और वे उसे लेकर कारागृह का मार्ग लिये। तब बीरबल उस वृद्ध पुरुष को समीप बुलाकर बोले-“मैं तुम्हारी कन्या को तुम्हें देता हूँ, परन्तु साथही इस बात की हिदायत भी करता हूँ कि अब यह लड़की तुम्हारे यहाँ न रह सकेगी, इसलिये
अकबर बीरबल विनोद २२०
अकबर बीरबल विनोद २२० तुम्हारो और इसकी इसी में भलाई है कि एक अच्छे बर की तलाश कर इसकी यथाशीघ्र शादी कर दो।” बूढ़े मनुष्य ने दीवानकी उचित सलाह को मानने का बचन दिया और उससे बिदा हो अपनी कन्या के साथ खुशी २ घर लौट आया। महाकाली के ठट्ठे एक दिन बीरबल को डराने के विचार से महाकाली ने अपना हजार मुख वाला विकराल रूप धारण कर रात्रि समय में उसको दर्शन दिया। बीरबल महामाया को देख हँसते हँसते उनको प्रणाम किया और फिर सन्न मार गया। इसका यह हाल देख देवी विचार-मग्न हो गई। उसने मन में विचारा—“पहले तो मेरे ऐसे भयानक स्वरूप को देखकर इसे डरना चाहिये था, सो यह कुछ भी भयभीत न हुआ। दूसरे मुझे देखकर हँसा, तीसरे तुरत ही गमगीन भी हो गया। इसलिये इसकी मार्मिक बातों का भेद लेना चाहिये। वह प्रगट में बोली-“भक्तवर बीरबल ! तू मुझे देखकर पहले तो हँसा फिर उदास क्यों हो गया।” बीरबल बड़ी दीनताई से बोला-“मातेश्वरी ! आप अन्तर- यामिनी हैं, आपसे किसीका कुछ छिपाव नहीं है। फिर भी आपके पूछने पर बिना बतलाये भी अनुचित है। मेरे हँसने का यह सबब है कि आपका दर्शन कर मैं बड़ा आनन्दित हुआ, परन्तु दूसरा कारण मैं नहीं बतलाऊँगा।” जब देवी ने उसे धीरज देकर अभयदान देने का वचन
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२२१ अकबर बीरबल विनोद दिया तो बीरबल बोला-“हे जगज्जननी जी! मैं अपने मन में अनुमान कर रहा था कि मुझे केवल दो हाथ एक सिर और एक नाक है और आपको हजार शिर हजार नाक और केवल दो ही हाथ हैं। मैं जोखाम होने पर एक ही नाक को अपने दोनों हाथों से साफ करते २ थक जाता हूँ, फिर जब आपको जुखाम होगा तो आप हजार नाकों को केवल दो ही हाथों से कैसे साफ करेंगी। मुझे इसी चिन्ता ने शोकित कर दिया था। देवी अपने भक्त बीरबल के उत्तर से सन्तुष्ट हुई और उसको आशीर्वाद देती हुईं अन्तर्धान हो गई। हम दोनों एक साथ आवेंगे एक दिन कोचीन नगर से चलकर दो व्यापारी दिल्ली शहर में आये और घूमते फिरते एक नगर सेठ के पास जापहुँचे। नगर सेठ के सात्विक और सरल स्वभाव को देख कर इनके मन में बेईमानी समाई और उसे ठगने का विचार किया। ये थोड़ेसे आभूषण भी अपने साथ लाये थे, उसे व्यापारीको दिख- लाकर बोले-“आप मेरे इन आभूषणों को बिकवा दें तो हमपर आपका बड़ा उपकार होगा।” व्यापारी आभूषणों को देखकर उत्तर दिया-“आपका कहना बहुत ठीक है, पर यह कोई लड़कों का खेल नहीं है जो इधर बनाया और उधर बिगाड़ दिया। जब मैं इसे कुछ लोगों को दिखलाऊँगा और उन्हें पसन्द आयेगा तब कहीं बिकेगा। आप लोग आभूषणों को मेरे यहाँ छोड़ जाइये, फिर दूसरे दिन दोपहर में आना।”
अकबर बीरबल विनोद २२२
अकबर बीरबल विनोद २२२ ठगों ने कहा-"बहुत अच्छा, हम कल दोपहर को आपके पास आवेंगे, परन्तु आप भी एक बातका ध्यान रखना कि जब हम दोनों ही एक साथ होकर आवें तो आभूषणों को देना अन्यथा नहीं।" वे ठग इस प्रकार उसे बातों में बाँधकर वहाँ से आगे बढ़े। कुछ दूर जाकर वे फिर वापस लौटे। उनमें से एक आदमी कुछ दूर मोड़ पर एक आदमी से झूठी गप्प मारने लगा और दूसरा उस सेठ की दूकान पर पहुँचकर बोला-"सेठजी ! हमारा विचार रास्ते में जाकर पलट गया इसलिये हमको फिर लौटकर आपके पास आना पड़ा। हम चाहते हैं कि इस समय आप हमारे आभूषणों को लौटा दें, कल दोपहर को हम इनको लेकर आपके पास आवेंगे, तबतक आप भी ग्राहक ठीक कर रक्खें।" सेठने कहा-"तुम्हारी चीज तुमको लौटाने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है परन्तु तुमारा दूसरा साथी कहाँ है; उसको भीअपने साथ लेकर आओ।" ठगने अँगुली का संकेत कर उसे नुक्कड़ पर एक दूसरे आदमी से बातचीत करते हुए दिखलाया। व्योपारी ने देखा तो बात सही थी। वह नुक्कड़ पर खड़ा होकर किसी से कुछ वार्तालाप कर रहा था। व्योपारी को अब कोई शक न रहा, वह आभूषणों को तत्काल उसे दे दिया और अपने काम में दत्तचित्त हुआ। उसको इनकी तरफ से कोई शंका नहीं थी क्योंकि उसका हृदय साफ था। इससे वह दूसरोंको भी अपने ही समान समझता था। दूसरे दिन दोपहर के समय दूसरा ठग आया और सेठ से अपने गहनों की माँग। सेठने कहा-"गहने तो कल ही
२२३ अकबर बीरबल विनोद
२२३ अकबर बीरबल विनोद यहाँ से ले गये अब फिर क्या माँगने आये हो। ठग बोला- “कौन ले गया ?” सेठने उत्तर दिया-“तुम्हारा साथी।” वह कुछ क्रुद्ध होकर बोला-“आपने यह अनुचित किया है हमने आपको उसी समय सचेत कर दिया था कि जब हम दोनों एक साथ होकर आवें तो आप गहनों को वापस देना; फिर आप अकेले एकको क्योंकर दिया। आपकी यह थोथी दलील है, हमारा आभूषण हमें दीजिये।” सेठने जवाब दिया-“आप भी तो उस नुकड़ पर खड़े थे, जब कि आपका भाई लेने आया था।” ठग बोला-“इससे क्या ! मैं उसे गहने वापस लेने को नहीं कहा था। आप मेरे आभूषणों को वापस दें नहीं तो मैं आप पर नालिश करूँगा और नाहक आपको भी जेरबार होना पड़ेगा।” सेठ भी कुछ कहता और यह भी कुछ कहता, यहाँतक कि कहासुनी में घण्टों बीत गया; परन्तु वह ठग किसी प्रकार राजी नहीं होता था। तब क्रुद्ध होकर नगर व्योपारी ने कहा-“जा जो तेरे जीमें हो सो कर, मैंने तेरा कुछ कर्ज नहीं खाया है जो मुझे धमकी देता है।” ठग का तो मन बढ़ा ही था वह तत्क्षण बीरबल के पास जाकर फर्यादी हुआ। बीरबल उसकी फर्याद सुनकर तुरत व्योपारी को बुलवाया, जब वह आया तो बोला-“यह क्या कहता है, इसका व्योरा बतला।” वह व्योपारी शुरू से आखीर तक जो जो बातें हुई थीं बयान किया और तीन चार प्रतिष्ठित पुरुषों को साक्षी दिलवाई। बीरबल सारी बातों को सुनकर निश्चित कर लिया कि नालिश झूठी है
अकबर बीरबल विनोद २२४
अकबर बीरबल विनोद २२४ परन्तु फिर भी बिना किसी अपराध में गिरफ्तार किये सजा भी नहीं दी जा सकती। अतएव वह नालिश करने वाले व्योपारी से बोला-“तुमने यही कहा था न कि हम दोनों जब एक साथ आवें तभी आभूषणों को वापस देना?” उसने कहा-“हाँ, जो आप कह रहे हैं बिल्कुल कौड़ी पाई सत्य है, यही बात पक्की हुई थी।” तब बीरबल बोला-“जब ऐसी शर्तें तय हुई हैं तो फिर तुम अकेले क्योंकर आये। आप अपने भाई को साथ लेकर आओ तो मिलेगा।” ठग की दाल न गली बीरबल की ऐसी आज्ञा सुन वह वहाँ से खिसक गया। बीरबल नगर सेठ से बोला-“सेठजी! देखना, यदि यह इतने पर भी न माने और कदाचित आपसे फिर आभूषण माँगने आवे तो दोनों को मेरे पास पकड़ कर लाना। यदि दोनों ही साथ आवे तो अति उत्तम हो, नहीं तो इसे तो कदापि न छोड़ना।” सब लोग बीरबल की अनुमति से अपने २ घर गये; परन्तु ठगों का फिर कहीं पता न चला।
सुनार के हथकोड़े एक रोज बादशाह ने बीरबल से पूछा-“क्या यह बात सही है कि कारीगर लोग मालिक की आँखों में धूल झोंककर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं? इस विषय की लोगों में बराबर चरचा सुनने में आती है।” बीरबल ने कहा-“पृथिवी- नाथ! यह तो आँख देखी और कान सुनी बात है। जो जिस काम को करता है, वह उसमें पंडित हो जाता है। बादशाह
२२५ अकबर बीरबल विनोद
२२५ अकबर बीरबल विनोद ने फिर पूछा-“तो क्या सुनार लोहार दर्जी पेशा के सभी चोर ही होते हैं ?” बीरबल ने उत्तर दिया-“मैं यह कैसे कह सकता हूँ कि सभी कारीगढ़ चोर ही होते हैं, परन्तु फिर भी कितनों की चोरी सब को विदित हो चुकी है। जैसे सुनार ही को लीजिये । इनके सम्बन्ध में लोगों का विश्वास है कि कोई चाहे कितनी ही इनकी चौकसी करे, परन्तु ये येनकेन प्रकारेण माल में से चोरी कर ही लेते हैं। इनकी इस कला की चालाकी संसार में विख्यात है, लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि दुनियाँ की बातें तो दरकिनारे रहीं। ये अपने माता पुत्री तथा बहनों के आभूषणों में से भी चोरी करते हैं। यदि कहीं चुराना भूल गये तो समझ लीजिये कि उस रात में उन्हें नींद हराम हो जाती है ये कपटमुद्रा कर जबतक उसमें से कुछ माल निकाल न लेंगे, तबतक इनके पेट में चूहे कूदा करेंगे । इस सम्बन्ध की एक घटना मेरी आँखों के सामने भी घटी है, उसपर जरा विचार कीजिये। एक गाँव में एक वृद्ध सुनार रहता था बुढ़ापे के कारण वह सुनारी का काम नहीं कर सकता था। इसलिये विवश होकर दूकान में बैठा बैठा अपने एकलौते लड़केको सोनारी का काम सिखाया करता था। यदि लड़का कहीं चूक करता तो वह तुरत उसकी भूल सुधरवा देता था। दैवयोग से उस वृद्ध सुनार की लड़की ससुराल से पीहर आई। उसे भी कुछ सोने के गहने बनवाये थे। अतएव अन्य जगह न देकर उसने अपने भाई से ही गहने बनवाना उत्तम समझा। उसका ख्याल था कि भाई के हाथ १५
अकबर बीरबल विनोद २२६
अकबर बीरबल विनोद २२६ से बने हुए गहनों में फरक नहीं पड़ेगा। दूसरे सुनारों का क्या विश्वास । वह अपना सब सोना भाई को देकर आप उसके पास बैठकर गहने बनवाने लगी। उसका बूढ़ा बाप भी वहीं दूकान में बैठा हुआ था। बूढ़े ने मन में अनुमान किया- "जो मैं लड़के से प्रगट रूप में कहता हूँ तो लड़की सारी बातें जान जायगी और यदि नहीं कहता हूँ तो लड़का बहन के गहने सोच कर उसमें से चोरी नहीं करेगा। तब तो मेरे इस पेशेका नाम कलंकित होगा।" वह अँगड़ाई लेता हुआ बोला-"अरे राम अपने लिये तो सभी एक समान हैं।" ठग जाने ठगही की भाषा, ताते उमा गुप्त करि राखा।" वाली घटना घटी। लड़का बाप की शिक्षा से धीरे धीरे पंडित हो चुका था। उसने अपने पिता के कहने का भावार्थ समझ लिया; परन्तु प्रगट रूप से पिता को कुछ उत्तर नहीं दिया । बूढ़े ने समझा कि शायद लड़के को मेरा सांकेतिक शब्द समझ में नहीं आया अतएव रह रह कर वही पहले वाला शब्द पुनःपुनः कहने लगा। लड़का दत्तचित्त हो अपनी बहन से बातें करता हुआ गहने गढ़ रहा था। पिता के बारबार के टोकारे से खीझ कर बोला-"पिता जी ! आज आप इतना राम राम क्यों कह रहे हैं। अरे राम ने तो बहुत पहले ही लंका नगरी को लूट लिया था, अब उसमें रक्खा ही क्या है। अपने लाड़िले से ऐसा सन्तोषप्रद उत्तर पाकर वृद्ध गद- गद हो गया और उसे अपने पुत्र पर बहुत भरोसा हुआ।
२२७ अकबर बीरबल विनोद
२२७ अकबर बीरबल विनोद वह लड़का “कौवा से कबेला चतुर ।” वालो कहावत पहले ही चरितार्थ कर सोने की एक गुल्ली माल में से कपट कर राख में छिपा दिये था। इस घटना को सुनकर बीरबलने कहा- “पृथ्वीनाथ! कारीगर बड़े बज्र बेहया होते हैं। वे अपने कला में जब तक चोरी करना नहीं जानते तबतक उनको अपने कारीगर होने में सन्देह ही बना रहता है। आप इसे पक्का समझें कि जो जितना बड़ा कारीगर होता है वह उतनाही चोर भी होता है। यही इनकी विशेषता है कि माल चुरा लेते हैं और दूसरों पर इनका भेद प्रकट नहीं होने पाता। सुनार तो शास्त्रों द्वारा इस फन में विख्यात हैं। इनका नाम शास्त्रकारों ने “पश्यतो हर” बतलाया है। इसका भावार्थ यह है कि यह आँख के सामने ही चोरी करते हैं, परन्तु देखने वालों की बुद्धि कुछ काम नहीं करती।” व्यसनी की लत एक दिन बादशाह बीरबल के साथ नगर में होकर हवा खोरी के लिये निकला था। एक जगह नुक्कड़ पर उसे एक औरत दिखाई पड़ी। वह महा फूहड़ देख पड़ती थी। उसके मोटे मोटे होठों के बीच से दो बड़े २ दाँत बाहर को झाँक रहे थे। नाक से पोटा जारी था। मलीन वस्त्र, खुले बाल और शरीर पर मिट्टी पानी मिश्रित दाग पड़े हुए थे। बात करते समय मुँह से थूक बाहर निकला आता था। कहाँ तक कहें वह सर्वांग फूहड़ थी। राजा की तो बात ही अलग है, उसके