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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

६ आल्हखण्ड । तम्बू गड़िगे सब राजन के झण्डा आसमान फहरायँ ४१ भोर भरहरे मुरगा बोलत जागा कनउज का नरपाल ॥ दिशा फराकत सों छुट्टी करि मज्जनकरतभयोतिहिकाल ४२ पहिरिकै धोती रेशमवाली आसन बैठ चँदेलाराय ॥ संध्या करिकै त्यहि अवसर की औ जपमाली लीन उठाय ४३ मन्त्र गायत्री को जपिकै फिरि तर्पण करन लाग महराज ॥ अक्षत चन्दन धूप दीप औ लै पकवान शम्भु के काज ४४ भोग लगायो शिवशङ्कर को ध्यायो रामचन्द्र को नाम ॥ फिर बुलवायो तिन बिप्रन को जिनके जपै तपै का काम ४५ गऊ मँगायो पैंतालिस फिर ब्याई एक बेर की जोन ॥ बछरा नीचे हैं जिनके फिरि सोने सींग मढ़ी हैं तौन ४६ खुरौ मढ़े हैं जिन चांदी के पीठ म परीं बनातन झूल ॥ पूँछ पकरिकै तिन गौवन की राजा दानदेत मनफूल ४७ भूसा दाना एकमास को बिप्रन घरे दीन पहुँचाय ॥ जायकै पहुँच्च्यो फिरि मंदिरमें यकईस बिप्रनलीन बुलाय ४८ दही दूध औ पेरा बरफी चटनी भांति भांति तय्यार ॥ भोजन दीन्ह्यो तिन बिप्रन को राजा कनउजका सरदार ४९ सीध मँगायो पैंतालिस फिर औरे बिप्रन लीन बुलाय ॥ सहित दक्षिणा के दीन्ह्यो सो राजा बड़ा प्रेम मनलाय ५० ऐसो दान नित्यप्रति देवै राजा बिप्रन घरै बुलाय ॥ पाछे भोजन आपौ करिकै तब दरबार पहुँचै जाय ५१ ऐसो दानी महाराजा यहु राजा कनउज का सरदार ॥ जायकै पहुँच्च्यो तिहि मंदिरमाँ जहँपर भरीलाग दरबार ५२ आवत देख्यो जब राजा को ठाढ़े भये शूर सरदार ॥

संयोगिनिस्वयम्बर । ७

बैठि सिंहासन पर राजागे दहिने लिये ढाल तलवार ५३ बैठे क्षत्रिय निज निज आसन मनमें रामचन्द्र को ध्याय ॥ हाथ जोरिकै मन्त्री बोल्यो वो महराज कनउजी राय ५४ देश देश के राजा आये एक न अयो पिथौराराय ॥ सुनिकै बातें ये मन्त्री की जल्दी हुकुम दीन फर्माय ५५ मूरति बनावो तुम कपड़ा की भीतर पैरा देव भराय ॥ जहाँ उतारे जूता जावैं तहँ पर खड़ा देव करवाय ५६ हुकुम पायकै महाराजा को मन्त्री कीन तैसही जाय ॥ मूरति पिथौरा की बनवायो तहँपर खड़ा दीन करवाय ५७ बैठक बैठे सब राजा तहँ आपौ गयो चँदेलाराय ॥ बाजन बाजे चौगिर्दाते हाहाकार शब्दगा छाय ५८ सजिगाकनउजत्यहिऔसरमाँ शोभा कही बूत ना जाय ॥ बन्दनवारे घर घर बाँधे घर घर रहे पताकाछाय ५६ सजीं सुहागिलैं चौगिर्दा ते गावैं गीत मंगलाचार ॥ त्यही समइया त्यहि औसरमाँ बोल्यो कनउजका सरदार ६० जल्दी लावो संयोगिनि को साइति आयगई नगच्याय ॥ हुकुमपायकै महाराजा का चकरन खबरि जनाई जाय ६१ खबरि पायकै संयोगिनि फिरि महलन तुरत भई हुशियार ॥ औ बुलवायो फिरि बाँदियनको सोलह करनलागि श्रृंगार ६२ सवैया ॥ मज्जेन चीरै औ कुण्डल अंजनै नाकमें मौक्तिकै बेसरसवाँरी । कंचुकि औ क्षुद्रावलि कंकण कुसुमित अम्बरं चन्दनधारी ॥ खायकै पान औ धारिमेंहदीनको हार औ नूपुरे की झनकारी । सिंदुरे भाल विशाल लखे ललितेमनलज्जितमन्मथनारी ६३

८ आल्हखण्ड । सजि सँयोगिनि गै पलमाँ इक बँदियन हुकुम दीन फरमाय ॥ डोला लावो अब जल्दी सों बँदिया चलीं हुकुमकोपाय ६४ लाई डोला सो जल्दी सों औ त्यहि खबरि सुनाई जाय॥ सुनिकै बातैं सो बांदी की मनमें श्रीगणेशको ध्याय ६५ सुमिरि भवानी शिवशंकरको औ सूर्य्यन को माथ नवाय ॥ बैठी डोला में संयोगिनि सीता रामचरण मनलाय ६६ चारि कहरवा मिलिडोला लै तुरतै चले पूर्व दिशिधाय ॥ आगे डोला संयोगिनि को पाछे चलीं सहेली जाँय ६७ दौरति जावैं पुरबासी सब दासिन भीर भई अधिकाय ॥ चढ़िगे मंचन नर नारी सब राजन देखि देखि हर्षाय ६८ बड़ी भीर भय तब कनउज में औ तिल डरे भुई ना जाय ॥ शोभा गावैं जो कनउज की तौफिरिएकसाल लगिजाय६९ डोला लैके संयोगिनि का महरन तहाँ उतारा जाय ॥ जहँना बैठे सब राजा हैं एकते एक रूप अधिकाय ७० उतरिकै डोला सों संयोगिनि माला दहिन हाथ लै लीन्ह ॥ सुमिरिभवानीसुत गणेश को महिफिलमध्यगमनतबकीन्ह७१ बैठे राजा सब महिफिल में एक ते एक शूर सरदार ॥ कोउ कोउ राजा तीस बरसका कोउ कोउ वर्षअठारहक्यार७२ काले नीले पीले लाले उजले शोभा के अधिकाय ॥ जामा पहिरे रेशमवाले चम् चम् चमकिकर हिंजाँय ७३ सोहैं दुपट्टा तिन जामन पर गल में परे मोतियन हार ॥ रंगबिरंगी पगड़ी शिर पर तिनपर कलँगी करै बहार ७४ हाथ लगाये हैं मुच्छन पर दहिने परी ढाल तलवार ॥ पीठ दिखावैं नहिं बैरी को ऐसे सबै शूर सरदार ७५

[Header] •संयोगिनिस्वयम्बर। ६ लैकै माला संयोगिनि तहँ घूमत फिरै सखिन के साथ ॥ मन नहिं भावै कोउ राजा त्यहि जाको करै आपनो नाथ ७६ देखैं राजा संयोगिनि तहँ औ शिर नीचे लेयँ नवाय ॥ माला डालै नहिं काहू के क्षत्री गये सबै शर्माय ७७ सोतो देखै पृथीराज को नहिं तहँ देखि परै महराज ॥ चकृत ह्वैकै चौगिर्दा ते देखनलागि छांडिकै लाज ७८ जब नहिं देख्यो दिल्लीपतिको तब मन सोचि सोचि रहिजाय॥ काह विधाता कै मर्जी है जो नहिं अयो पिथौराराय ७९ क्वारी रहिबे हम दुनिया में या फिरि ब्याहकरब तिनसाथ॥ त्यहिते तुमका हम ध्याइत है सुनिल्यो दीनबन्धु रघुनाथ८० जइस मनोरथ तुम सीताको पुरयो आप चराचर नाथ ॥ तइस मनोरथ अब हमरो है ब्याही जायँ पिथौरा साथ ८१ त्वही गोसइयाँ दीनबन्धु है ओ दशरथ के राजकुमार ॥ बेगि मिलावो दिल्लीपति को तब सब होवै काज हमार ८२ चरण तुम्हारे जो मनलावै गावै राम राम श्री राम ॥ सो फल पावै मनभावै जो पूरण होयँ तासु के काम ८३ यह सुनि राखा हम बिप्रन ते ताको सत्य करो भगवान ॥ मूरति दीख्यो फिरि कपड़ाकी तामें करनलागि अनुमान८४ है यह मूरति पृथीराजकी मनमाँ ठीक लीन ठहराय ॥ लैकै माला संयोगिनि सो मूरति गले दीन पहिराय ८५ देखि तमाशा सब राजा यह आशा छाँड़ि हृदयते दीन ॥ बिदा मांगिकै महराजाते राजन गमन तहाँते कीन ८६ कूचके डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ चलिभेराजा निज निज घरका करिकै शम्भुचरणको ध्यान८७

८ आल्हाखण्ड । सजि संयोगिनि गै पलमाँ इक बाँदियन हुकुम दीन फरमाय ॥ डोला लावो अब जल्दी सों बाँदिया चलीं हुकुमकोपाय ६४ लाई डोला सो जल्दी सों औ त्यहि खबरि सुनाई जाय॥ सुनिकै बातें सो बांदी की मनमें श्रीगणेशको ध्याय ६५ सुमिरि भवानी शिवशंकरको औ सूर्यन को माथ नवाय ॥ बैठी डोला में संयोगिनि सीता रामचरण मनलाय ६६ चारि कहरवा मिलिडोला लै तुरतै चले पूर्व दिशिधाय ॥ आगे डोला संयोगिनि को पांछे चलीं सहेली जाँय ६७ दौरति जावैं पुरवासी सब दासिन भीर भई अधिकाय ॥ चढ़िगे मंचन नर नारी सब राजन देखि देखि हर्षाय ६८ बड़ी भीर भय तब कनउज में औ तिल डरे भुईं ना जाय ॥ शोभा गावैं जो कनउज की तौफिरिएकसाल लगिजाय६६ डोला लैकै संयोगिनि का महरन तहाँ उतारा जाय ॥ जहँना बैठे सब राजा हैं एकते एक रूप अधिकाय ७० उतरिकै डोला सों संयोगिनि माला दहिन हाथ लै लीन्ह ॥ सुमिरिभवानीसुत गणेश को महिफिलमध्यगमनतबकीन्ह७१ बैठे राजा सब महिफिल में एक ते एक शूर सरदार ॥ कोउ कोउ राजा तीस बरसका कोउ कोउ वर्ष अठारहकप्यार७२ काले नीले पीले लाले उजले शोभा के अधिकाय ॥ जामा पहिरे रेशमवाले चम्चम् चमकि २ रहिजाँय ७३ सोहैं दुपट्टा तिन जामन पर गल में परे मोतियन हार ॥ रंगाविरंगी पगड़ी शिर पर तिनपर कलँगी करै बहार ७४ हाथ लगाये हैं मुच्छन पर दहिने परी ढाल तलवार ॥ ⁻ ० दिखावैं नहिं बैरी को ऐसे सबै शूर सरदार ७५

संयोगिनिस्वयम्बर। ६ लैकै माला संयोगिनि तहँ घूमत फिरै सखिन के साथ ॥ मन नहिं भावै कोउ राजा त्यहि जाको करै आपनो नाथ ७६ देखैं राजा संयोगिनि तहँ औ शिर नीचे लेयं नवाय ॥ माला डालै नहिं काहू के क्षत्री गये सबै शर्माय ७७ सोतो देखै पृथीराज को नहिं तहँ देखि परै महराज ॥ चकृत ह्वैकै चौगिर्दा ते देखनलागि छांड़िकै लाज ७८ जब नहिं देख्यो दिल्लीपतिको तब मन सोचि सोचि रहिजाय॥ काह विधाता कै मर्जी है जो नहिं अयो पिथौराराय ७६ क्वारी रहिबे हम दुनिया में या फिरि ब्याहकरब तिनसाथ॥ त्यहिते तुमका हम ध्याइत है सुनिल्यो दीनबन्धु रघुनाथ८० जइस मनोरथ तुम सीताको पुरयो आप चराचर नाथ ॥ तइस मनोरथ अब हमरो है ब्याही जायँ पिथौरा साथ ८१ त्वही गोसइयाँ दीनबन्धु है ओ दशरथ के राजकुमार ॥ बेगि मिलावो दिल्लीपति को तब सब होवैं काज हमार ८२ चरण तुम्हारे जो मनलावै गावै राम राम श्री राम ॥ सो फल पावै मनभावै जो पूरण होयँ तासु के काम ८३ यह सुनि राखा हम बिप्रन ते ताको सत्य करो भगवान ॥ मूरति दीख्यो फिरि कपड़ाकी तामें करनलागि अनुमान८४ है यह मूरति पृथीराजकी मनमाँ ठीक लीन ठहराय ॥ लैकै माला संयोगिनि सो मूरति गले दीन पहिराय ८५ देखि तमाशा सब राजा यह आशा छाँड़ि हृदयते दीन ॥ बिदा मांगिकै महराजाते राजन गमन तहाँते कीन ८६ कूचके डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान ॥ चलिभेराजा निज निज घरका करिकै शम्भुचरणको ध्यान८७

१० आल्हखण्ड। चढ़िकै डोलामें संयोगिनि सोऊ चली महल को जाय ॥ उठि महराजा फिरिमहफिलते औ दरबार पहुंचे आय ८८ मंत्री बैठत भो बाँयेंपर दहिने बैठि विप्र सब जाय ॥ त्यही समइया त्यहि औसर में राजा बोल्यो भुजा उठाय ८६ कौन पिथौरा को जानत है सन्मुख ठाढ़ होय सो आय ॥ सुनिकै बातें महराजाकी बूढ़ो विप्र उठा हर्षाय ६० हमसों परचय पृथीराजसों ओ महराज कनौजीराय ॥ पाँच बरस हम दिल्ली रहिकै पूजाकीन तासु घर जाय ६१ । भोजन पाये त्यहि महलनमें बैठ्यन संग तासु महराज ' पूँछन चाहो का महराजा सो तुम कहौ आपनो काज ६२ सुनिकै बातें त्यहि ब्राह्मण की बोला तुरत कनौजीराय ॥ कस रजधानी है दिल्ली की कैसो वीर पिथौराराय ६३ सुनिकै बातें ये जयचंद की बोला विप्र बहुत सुख पाय ॥ नाम हस्तिनापुर दिल्लीका जानो आपु कनौजीराय ६४ आगे राजा शन्तनु ह्वैगे गंगा भई जासु की नारि ॥ तिनसुत भीषम फिरि पैदा भे कीन्ह्यो परशुराम सों रारि ६५ दिन सत्ताइस का संगरभा दूनों तरफ चले तहँ तीर ॥ मूर्च्छित ह्वैगे परशुराम जब गंगा आय छिडिक्यो नीर ६६ सनमुख ह्वैगे फिरि दोऊमिलि युद्धको होनलाग सामान ॥ तब समुझायो बहु गंगाने अब नहिं करो युद्ध को ठान ६७ तुम्हरो चेला यहु भीषम है ओ जमदग्नितनय बलवान॥ नाम तुम्हारो जग में ह्वैहै मानो सत्यबचन भगवान् ६८ चेला जिनको अस बलवन्ता है भगवन्ता के अनुमान ॥ धन्य बखानों तिन गुरु केरी रहिहै सदा जगतमें मान ६६

कहि ये बातें परशुराम सों फिरि बहुपुत्र सिखावनदीन ॥ सुनिकै बातें निज माताकी भीषमकहाबचनछलहीन १०० विजयपत्र जो म्वाहिं लिखिदेवैं तौ हम लौटि धामको जायँ ॥ नाहिं तो टरिहौं ना संगर ते बहुतनधजीधजीउड़िजाय१०१ सुनिकै बातें ये भीषम की औ हठ दीख टरै को नाहिं ॥ तब तो गंगा परशुराम सों बोलींहाथजोरित्यहिठाहिं १०२ लरिका अरुझो विजयपत्र को ओ जमदग्नितनय महराज ॥ विजयपत्र अब याको दीजै कीजैआपशिष्यकोकाज १०३ सुनिकै बिनती बहु गंगाकी तबतिनविजयपत्रलिखिदीन॥ विजयपत्र लै तहँ भीषमने औ पैलगी गुरुको कीन १०४ माथ नायकै फिरि गंगा को भीषम दीन्ह्यो शंख बजाय ॥ परशुराम निज आश्रम गमने भीषम घरै पहुंचे आय १०५ चित्र बिचित्रबीर्य रहें राजा भीषमकेर छोट दोउभाय ॥ तेऊ मरिगे विना पूत के तिनघरब्यास पहुंचे आय १०६ आँधर पांडु बिदुर तिनलरिका जिनकारहा जगतयशछाय ॥ अँधरे केरे दुर्योधन भे पांडुकेभये युधिष्ठिरराय १०७ दोऊ मिलिकै संगर ठान्यो तहँ सब क्षत्री गये बिलाय ॥ भयो परीक्षित फिरि दिल्लीपति ज्यहिभागवतसुन्योहर्षाय१०८ कलियुगआयो त्यही राज में ओ महराज कनौजीराय ॥ को गतिबरणैत्यहि कलियुगकै हमरे बूत कही ना जाय १०६ ऐसी दिल्ली की रजधानी जामें बसै पिथौराराय ॥ रूपउजागर सब गुण आगर शोभाकही तासु ना जाय ११० नित प्रति पूजै शिवशंकेर का नाहर दिल्ली का सरदार ॥ गदका बाना पटा बनेठी इनमाँबहुतभांतिहुशियार १११

१२    , आल्हखण्ड । चढ़ी जवानी पृथीराजकी कुश्ती लड़ै अखाड़े जायँ ॥ खनखनठनठन भनभनमनमन कैसो शब्द कानमें जाय ११२ बाण चलावैं जहाँ तानिकै ताको तुरतै देयँ नशाय ॥ ऐसे राजा पृथीराज हैं ओमहराज कनौजीराय ११३ सुनिकै बातें त्यहि बाम्हन की फिरि ना बोल्यो चँदेलाराय ॥ सभा विसर्जन करि जल्दी सों महलमें तुरतपहूंच्यो जाय ११४ कियो बियारी फिरि मंदिर में सोयो रामचन्द्रको ध्याय ॥ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडागड़ानिशाकोआय ११५ तारागण सब चमकन लागे पक्षिन चुप्पसाधि तब लीन ॥ चलेआलसीखटिया तकितकि नाहकजन्म विधातै दीन ११६ आगे लड़ि हैं पृथुइराज अब करि हैं घोर शोर घमसान ॥ बैठो यारो अब थकिआयन मानो सत्यबचनपरमान ११७ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण जीकीआज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपैंड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत संयोगिनि स्वयंवरोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ सवैया ॥ भो शरणागतपाल कृपाल उदार अपार सबै गुण तेरे । यांचि भयौ शरणागत में न लह्यौ अजहूं तुमको कहुँ हेरे ॥ गावत संत महंत सबै कि हृदय बिच रामरहें सबै केरे । सो नहिं टेरे सुनैं ललिते फलिते न भयेहैं मनोरथमेरे १ सुमिरन ॥ बलेश्वरी पँड़री की गड़ये जिनकाविदितजगतपरताप ॥ मन औ बाणी सों जो ध्यावै ताके छूटिजायँ सब ताप १

संयोगिनिस्वयंम्बर । १३ नित प्रति पाठ होयँ दुर्गाके औ तहँ करैं यती नित बास ॥ विधिसों पूजन जोकोउ कीन्ह्यो पूरणभई तासु की आस २ आगे दरखत है नींबी का बायें पीलूका अधिकार ॥ बरगद पीपर गूलर दहिने जिनकीशोभा अमितअपार ३ प्रातःकाल नारि सब जावैं ध्यावैं देवी चरण मन लाय ॥ सायंकाल पुरुष सब जावैं गावैं वेद ऋचन को जाय ४ पिता हमारे किंरपाशङ्कर तहँपर पाठकीन बहुकाल ॥ फिरिम्बेहिं सौंप्यो तिनदेवीका मानो सत्य सत्य सब हाल ५ तेरह बरसें हमका गुजरीं चाकरभये नवल दरबार ॥ छुट्टी लैकै नवरात्रन में जावैं अवशि महीना कार ६ पाठ सुनावैं श्री दुर्गा की बालेश्वरी शरण में जाय ॥ जो कुछ मनमें हमरे होवै सो अभिलाष पूरी है जाय ७ प्रथम भागवत तहँपर बाँची साँची कथा कहाँ सब गाय ॥ रुक्यो न काहू पदमें तहँ पर देवी कृपामई अधिकाय ८ छूटि सुमिरनी गै देवी कै सुनिये जयचँद क्यारहँवाल॥ चन्दभाट दिल्लीको जाई आई दिल्लीका नरपाल ६ अथ कथाप्रसंग ॥ भोर भ्वरहरे पह फाटत खने सोयकै उठा कनौजीराय ॥ प्रातक्रिया करि सब जलदी सों फिरि दरबार पहुंचा आय १ बैठ्यो राजा सिंहासन पर भारी लागि गयो दरबार ॥ किह्यो पैलगी सब बिप्रनको क्षत्रिन कीन्ह्यो राम जुहार २ बूढ़ बिप्रसों फिरि बोलतभा दिल्ली कौन पठावा जाय ॥ सुनिकै बातें चन्देले की बोल्यो बिप्र बचन हर्षाय ३ चन्दभाटको तुम पठवो अब सो पिरथीका लवै बुलाय ॥

१४ आल्हखण्ड। देखन केरी अभिलाषा जो ओ महराज कनौजीराय ४ बूढ़े बाम्हन की बातें सुनि लीन्ह्यो चन्दभाट बुलवाय ॥ औसमुझायो फिरित्यहिकोसब यहु रणबाधु चँदेलोराय ५ सुनिकै बातें चंदेले की चलिभो चन्दभाट शिरनाय ॥ चढ़िकै घोड़ाकी पीठौमाँ दिल्ली शहर पहुंचा जाय ६ जायकै पहुँच्च्यो त्यहिफाटकमाँ जहँ दरबार पिथौरा क्यार ॥ दीख पौरिया चन्दभाट को गरुई हांक दीन ललकार ७ हुकुम दर्रो हुकुम दर्रो साहेबजादे बात बनाव ॥ कहाँते आयो औ कहँ जैहौ जल्दी आपन नाम बताव ८ सुनिकै बातें दरवानी की बोल्यो चन्दभाट ततकाल ॥ देश हमारो कनउज जानो जावैं जहाँ बैठ नरपाल ६ मोहिं पठायो जयचंद राजा हमरो चन्दभाट है नाँउ ॥ खवरि जनावो पृथुइराज को ओ दरवानी बात बनाउ १० सुनिकै बातें चन्दभाट की सो दर्बार पहुंचा जाय ॥ हाथ जोरिकै दोउ बोलतभा औ चरणनमें शीशनवाय ११ चन्दभाट कनउज ते आयो ओ महराज पिथौराराय ॥ हुकुम जो पावैं महराजा को तो मैं लावों साथ लिवाय १२ सुनिकै बातें दरवानी की बोले पृथीराज महराज ॥ लावो लावो त्यहि जल्दी सों आयोचन्दभाटक्यहिकाज १३ सुनिकै बातें महराजा की दौरत चला पौरिया जाय ॥ सँग माँ लैके चन्दभाट को औ दर्बार पहुंचा आय १४ चन्दभाट तब लखि पिरथी का दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ कह्यो सँदेशा चन्देला जो सो पिरथीका दियो सुनाय १५ सुनि संदेशा चन्देले का भा मन खुशी पिथौराराय ॥

संयोगिनिस्वयम्बर । १५

साल दुसाला दिह्यो भाट को गल माँ हार दीन पहिराय १६ आगे पठयो चन्द भाट को पाछे हिरसिंह लियो बुलाय ॥ चन्द कबीश्वर को बुलवायो तासों कह्यो हाल समुझाय १७ बाना बदल्यो पृथुइराज ने मन माँ श्रीगणेशको ध्याय ॥ सुमिरि भवानी शिवशङ्कर को औ सुर्यन को माथनवाय १८ तीनों चलिभे फिरि दिल्लीसों सीता राम चरण मन लाय ॥ आठ रोज को धावा करिकै कनउज धुरादबाइनिआय १९ त्यही समइया त्यहि अवसर माँ राजा कन उज का सरदार ॥ मन्त्री बैठरहे बायें माँ तासों बोल्यो बचन उदार २० एक मना सोना को लै कै औ कारीगर लेव बुलाय ॥ मूरति रचिकै दरवानी की सो द्वारे पर देव धराय २१ सुनिकै बातें महराजा की मन्त्री तुरत उठा शिरनाय ॥ मूरति पौरिया की बनवायी औ द्वारे पर दियो रखाय २२ त्यही समइया त्यहि अवसरमाँ पहुँचा चन्दभाट फिरिआय ॥ खबरि सुनायो सब दिल्ली की औ चरणनमें शीशनवाय २३ हिरसिंह ठाकुर चन्द कबीश्वर तिनके साथ पिथौराराय ॥ तीनों मिलिकै त्यहि पाछे सों औ दरबार पहुंचे आय २४ दीख सिंहासनपर जयचँदको भारी तहां दीख दरबार ॥ बैठै क्षत्री अरूझ्वारा सों एक सों एक शूर सरदार २५ दयर मुकदिमा बहु खूनी हैं बहुतक ठाढ़े तहां वकील ॥ अऊ जेहल को पहुँचायेगे काहुकि दीन हथकड़ी ढील २६ त्यही समइया त्यहिअवसर माँ आगे चन्दकवीश्वर जाय ॥ बहु पद गायो सभा मध्य में आपन दीन्ह्यो नाम बताय २७ कह्यो सँदेशा पृथुइराज ने ओ महराज कनौजीराय ॥

१६ आल्हखण्ड । बहुत कामहैं यहि समया में ताते सक्यों नहीं मैं आय २८ सुनि संदेशा दिल्लीपति का बोला तुरत कनौजीराय ॥ सरबरि हमरी का नहीं हैं ह्वाँ मुहँ कौन दिखावैं आय २६ सुनिकै बातें चन्देले की हिरसिंह ठाकुर उठा रिसाय ॥ ऐसी तुमको पै चहिये ना जैसी कहौ कनौजीराय ३० आज पिथौरा सब लायक है ठाकुर समरधनी चौहान ॥ सनमुख लरिहै जो संगर में रहिहै नहीं तासु को मान ३१ हम तो नौकर पृथुइराज के तैसे नौकर अहिन तुम्हार ॥ कच्ची बातें पै कहिये ना राजा कनउज के सरदार ३२ हमें बताइये अब टिकने को ओ महराज कनौजीराय ॥ थके थकाये हम आये हैं दोऊ नैन रहे अलसाय ३३ पाछे ठाढ़े पृथुइराज हैं तिनको दीख चँदेलाराय ॥ मन अनुमान्यो तब बहुविधिसों औ मन्त्रीको लियोबुलाय ३४ सुखिया बांदी को बुलवाओ तासों पान दिवाओ आय ॥ वह पहिचानै भल पिरथी को सनमुख जातै गई लजाय ३५ सुनिकै बातें महाराजा की मन्त्री चाकर लीन बुलाय ॥ तिनसों मंत्री यह बोलत भा सुखिया बांदी लयोबुलाय ३६ पाहुन आये हैं दिल्ली सों तिन को पान खवावै आय ॥ एक के कहतै तब दुइदौरे चाकर तीन पहुंचे जाय ३७ सुखिया सुखिया कै गोहरावा सुखिया बांदी बात बनाउ ॥ तुम्हें बुलावा महाराजा है जल्दीनिकरि महलतेआउ ३८ सुनिकै हल्ला तिन चकरन को सुखिया - चलीतड़ाकाधाय ॥ दौरे आई दरवाजे के पूंछनलागिहालसबआय ३९ हाल पायकै सब चकरन ते मनमाँ गई सनाका खाय ॥

संयोगिनिस्वयंम्बर। १७

लज्जा करिहौं यहि समया में मारा जाय पिथौराराय ४० यहै सोचिकै मन अपनेमाँ महलन तुरत पहुँची आय ॥ लैके डिब्बा. सोनेवालो तामें बीरा धरे लगाय ४१ लैके डिब्बा फिरि महलन सों चकरन साथ चली हर्षाय ॥ जायकै पहुँची त्यहि मन्दिर में जहाँ पर बैठ कनौजीराय ४२ औ रुख दीख्यो महाराजा को सब को दीन्हो पान गहाय ॥ रंचक लज्जा जब दीख्यो ना तब मनरुचा कनौजीराय ४३ नहीं पिथौरा इन तीनोंमाँ नाहक गयो हृदय भ्रमछाय ॥ यहै सोचि कै मन अपने माँ फिरि मंत्रीकोलियोबुलाय ४४ इन्हें टिकावो लै बगिया माँ खीमा तहाँ देव गड़वाय ॥ हुकुम पायकै महाराजा का तीनों निकर द्वारपर आय ४५ मूरति दीख्यो फिरि द्वारपर जो अनुहारि पिथौरा केरि ॥ बार बार तहँ तीनों मिलिकै सब अँग रहे तासुके हेरि ४६ मूरति दीख्यो निज सूरतिकै तब जरिमरा पिथौराराय ॥ जायकै पहुँच्यो फिरि बगियामें तम्बू गड़ा तहाँपर आय ४७ बिछेउ पलँगरा तहँ निवारि को मखमल गद्दा दियो डराय ॥ धरेउ उशीशे में गिरदा को तामें ल्यट्यो पिथौराराय ४८ त्यही समइया त्यहि औसरमाँ औ पदमिनिका सुनो हवाल ॥ त्यहिसुनिपावानिजमहलनमाँ बगियाटिक्योआयनरपाल ४६ तब ललकारा निज बांदिनका अबहीं पलकी लवो लिवाय ॥ सुनिकै बातें संयोगिनि की तेसब पलकी लई सजाय ५० सुमिरि भवानी शिवशंकर को मनमें श्रीगणेश को ध्याय ॥ बैठि पालकी में संयोगिनि मनमें सियामातु पदलाय ५१ जायकै पहुँची त्यहि बगिया में जहाँ पर टिका पिथौराराय ॥

६८ आल्हखण्ड ।

उतरिकै पलकी सों जल्दीसों माला गले दीन पहिराय ५२ बिरा खवायो पृथुइराज को आपन नाम दीन बतलाय ॥ हाथजोरिकै संयोगिनि फिरि बोली आरतवचन सुनाय ५३ देवी देवता हम सब ध्याये ओ महराज पिथौराय ॥ दर्शन तुम्हरे तब हम पाये तुवमन काह देउ बतलाय ५४ बातें सुनिकै संयोगिनि की बोल्यो पृथुइराज महराज ॥ लड़ब चँदेले सों सँगरामरि पद्मिनिजवशितुम्हारेकाज ५५ मानभंग करि चन्देले को डोला लै दिल्ली तब जाउँ ॥ जो अस कनउज माँ करिहौंना तौ नहिं कह्यो पिथौरा नाउँ ५६ धीरज राखो अपने मनमाँ अबतुम लौटि महलको जाउ ॥ पन्द्रह सोलह दिनके भीतर हम तुम होब एकही ठाउँ ५७ बातें सुनिकै महाराजा की तब चरणन में शीश नवाय ॥ बैठि पालकी में संयोगिनि सीता रामचरण पदध्याय ५८ चारि कहरवा मिलि डोला लै महलन तुरत दीन पहुँचाय ॥ गै संयोगिनि जब महलन को पौढ़ी तुरत पलँग पर जाय ५६ खेत छूटिगो दिननायक सों झण्डा गड़ो निशा कोआय ॥ तारागण सब चमकन लागे सन् सन् सनासन गाव्वाय ६० सोय पिथौरा गे तम्बू में महलन सूता चँदेलाराय ॥ पक्षी बोले चौगिर्दाते मुरगन बाँग दीन हर्षाय ६१ जगा चँदेला तब महलन में तम्बू जगा पिथौराराय ॥ प्रातक्रिया करि तब दोनों नृप आपन आपन इष्ट मनाय ६२ बैठ्यो महलन में चन्देला तम्बू बैठ पिथौराराय ॥ अपने मन्त्री को बुलवायो यहु महराज कनौजीराय ६३ सात ढलाला मोतिन् माला हीरा पन्ना लीन मँगाय ॥

संयोगिनिस्वयंम्बर । ९६ चन्दकवीश्वर के मिलने को तुरतै चला चँदेलाराय ६४ जायकै पहुँच्यो त्यहि तम्बू में जहाँ पर बैठ बीर चौहान ॥ चन्दकबीश्वर के आगेधरि कीन्ह्यो बहुतभांतिसनमान ६५ उठा पिथौरा तब आसन ते आयो जहाँ चँदेलाराय ॥ हाथ पकरिकै चन्देले को अपने हाथे दियो चपाय ६६ देखि बीरता पृथुइराज की तब पहिचना कन्नौजीराय ॥ चन्दकबीश्वर को दैकै सब फिरि दरबार पहुँचा आय ६७ हुकुम लगायो निज मन्त्री को बहुतक मल्ल लेउ बुलवाय॥ जाय न पावैं दिल्हीवाले इनका कट्टा देउ करवाय ६८ त्यही समय्या त्यहि अवसरमाँ पृथुइ कूच दीन करवाय ॥ कनउज तेरी उत्तर दिशिमाँ पहुंचे पांच कोसपर जाय ६९ हिरसिंह ठाकुरको तहँते फिरि तुरतै दिल्ही दीन पठाय ॥ साजिकै फौजे चतुरंगिनि को हमको यहाँ मिलौ तुम आय ७० सुनिकै बातें पृथुइराज की हिरसिंह चला तुरत शिरनाय ॥ जायकै पहुँच्यो फिरे दिल्ही में औ सब खबरि सुनाई जाय ७१ सुनिकै बातें सब हिरसिंह की मनमाँ कान्हकुँवर मुसुकाय ॥ हुकुम लगायो निज मन्त्री को पुरमें दौंड़ी दो बजवाय ७२ हुकुम पायकै कान्हकुँवर को पुरमें बजन नगारा लाग ॥ धम् धम् धम् धम् बाजन लाग्यो मानों मेघ गरज्जन लाग ७३ शब्द नगारा का सुनतै खन क्षत्री सबै भये हुशियार ॥ अपने अपने तब चकरनको क्षत्रिन गरू दीन ललकार ७४ सवैया ॥ कोऊ कहैँदल हाथिन लाउ सजाउ बछेड़न को गोहरावैं । कोऊ कहैं रथ बैल सँवारु गँवारु अबे का देर लगावैं ॥

२० आल्हखण्ड । कोऊ तहॉ नलकी पलकी सजि सुन्दर तापर सेज लगावैं । गावैं कहाँलों कवीललिते फलिते रघुनाथके जे गुणगावैं ७५ बन्दन करिकै श्रीगणेश को दशरथ नन्दन हृदय मनाय ॥ तब हम गावैं फिरि आल्हाको जामें काज सिद्धि है जाय ७६ सजा रिसाला घोड़नवाला लगभग तीसलाख अनुमान ॥ पन्द्रहलाख सजे हाथी तहँ पैंतिसलाख सिपाही ज्वान ७७ साजि सजि तोपैं अष्टधातु की सोऊ होन लगीं तय्यार ॥ बैल नहायेंगे तोपन में गाड़िन गोला भरे अपार ७८ हथी महावत हाथी लै कै औ पृथ्वीमाँ देयँ बिठाय ॥ धरिकै सीढ़ी साँखूवाली हौदा तिनपर देयँ चढ़ाय ७९ बारह कलशा सोनेवाले ते हौदापर देयँ धराय ॥ डरें अँबारी जिन हाथिन के तिनकीशोभाकही न जाय ८० को गति बरौँ तिन हाथिनकें घण्टा गरे रहे हहराय ॥ छाय अँधेरिया गै दिल्ली में हाथी हाथी परैं दिखाय ८१ अंगद पंगद मकुना भौंरा सोहैं श्वेत वरण गजराज ॥ मैनकुंज मलया धौरागिरि कहूँ दुइदन्ता रहे विराज ८२ सवैया ॥ हाथिन के दल बादलसों नभ छायगयो रजभानु लुकाने । मेरु समान महान सबै जिनके पदभार अहीश सकाने ॥ नाद करें तिन ऊपर वीर अधीर भये सुरराज छिपाने । ललिते गजराज लखेमहराज तबै मनमें अतिही हर्षाने ८३ सजिगे हाथी जब सबियों तहँ घोड़ासजनलागि त्यहिकाल ॥ कोउ कोउ घोड़ा हंस चालपर कोउकोउजात मोरकी चाल ८४ रण की मौहरि बाजन लागी रणका होन लाग व्यवहार ॥

संयोगिनिस्वयंम्बर । २१ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन बेद् उच्चार ८५ कूच के डंका बाजन लागे घूमन लागे लाल निशान॥ को गति बरणै त्यहि समया कै एकते एक सुघरूत्रा ज्वान ८६ हुकुम पाय कै कान्ह कुँवरको हिरासिंह कूच दीन करवाय ॥ आगे हलका भा हाथिन का पाछे चला रिसाला जाय ८७ चले सिपाही त्यहि पाछे सों एक सों एक दई के लाल ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरैं रब्बा चलैं हवा की चाल ८८ जैसे नदियाँ चलैं समुंदर तैसे चली फौज त्यहि काल ॥ डगमग डगमग पृथ्वी हाली मारग बासी भये बिहाल ८६ शूर सिपाही ईजति वाले दहिनी धरैं मूछ पर हाथ॥ मनै मनावैं रामचन्द्र को बारम्बार नाय कै माथ ६० कायर सोचैं यह मनमाँ सब लैके बड़ी बड़ी तहँ श्वास ॥ हम मरिइबे समरभूमि में होई वंश हमारो नाश ६१ हम भगिजावैं जो रस्ताते तोहू नहीं जीव की आश ॥ लौटि पिथौरा जब घर जैहै करिहै अवशिहमारो नाश ६२ कुंडलिया ॥ यारो सायर दशभले कायर भले न पचास । सायर रणसम्मुख लड़ैं कायरप्राण कि आश ॥ कायर प्राण कि आश भागि रणते द्वैआवैं । आपु हँसावहिं और कुटुंब को नाम धरावैं ॥ कहि गिरिधरकबिराय बातचारहुयुग जाहिर । सायर भलेहैं पांच संग सौ भले न कायर ६३ ऐसे कायर सब सोचत भे जिनकी कही कथा ना जाय ॥ परैं नगारन में चोटैं जब उनके होयँ करेजे घाय ९४

६२ आल्हाखण्ड। शूर सिपाही बाजा सुनि सुनि मनमाँ अधिकअधिक हरषायँ ॥ मारु मारु कै कोउ बोलत भै कोऊ दांतन ओठ चबायँ ६५ या बिधि फौजैं सब दिल्ली की दावति चली कनौजे जायें ॥ आठ दिनौना के अर्सा में पहुँचीं जहाँ पिथौरा राय ६६ देखिकै फौजैं दिल्ली वालो ठाकुर समरधनी चौहान ॥ गले लगायो फिर हिरासिंह को कीन्ह्यो बहुतभांति सनमान ६७ गोबिंद राजै कान्ह कुँवर को भेंटत भयो पिथौरा राय ॥ कुँजधर ठाकुर और मुकुन्दा येऊ मिले शीश को नाय ६८ तम्बू गड़िगे महराजन के डेरा गड़े सिपाहिन केर ॥ बीचम तम्बू पृथुइराज को चारो तरफ रहे सब घेर ६६ गड़िगे झण्डा सब तम्बुन ढिग ते सब आसमान फहरायँ ॥ को गति बरौँ तिन झण्डन कै हमरे बून कही ना जाय १०० तंग बछेड़न के छूटतभे क्षत्रिन छोरिधरा हथियार ॥ ह्याँ महराजा कनउज वाला आला शूरवीर सरदार १०१ बहु ढुँढ़वावा त्यहि पिरथी का पावा कतों न पता निशान ॥ तब बुलवावा फिरि मंत्री को करिकै बहुतभांति सनमान १०२ हम सुनिपावा हरकारा सों मंत्री सुनो वचन धरिध्यान ॥ चढ़िकै आवा दिल्लीवाला ठाकुर समरधनी चौहान १०३ कालिह सबेरे संगर द्वैहै सीताराम लगइहैं पार ॥ पुरमें डौंडी को बजवावो सबियाँ होय फौज तय्यार १०४ सुनिकै बातें महराजा की मंत्री चला शीशको नाय ॥ जाय नगरची को बुलवायो ताको दीन्ह्यो हुकुम सुनाय १०५ ब्यारी करिकै फिरि संध्याको सोये तुरत पलँगपर जाय ॥ यहु महराजा कनउजवाला सोऊ महल पहुँचा जाय १०६

संयोगिनिस्वयंम्बर । २३ चौकी परिगै तहँ सोने की तापर बैठ राम को ध्याय ॥ मधुर मिठाई औ मेवा कछु भोजनकीन बहुतसुखपाय १०७ खबरि सुनई सब रानी को जो चढ़िआ पिथौराराय ॥ सुनिकै बातें महराजा की रानी बोली शीश नवाय १०८ तुम ना भाग्यो समरभूमि ते बहुतन धजीधजी उड़िजाय ॥ कोउ अमरौती ना खावा है नाकउआवा पीठिमढ़ाय १०९ कालके हाथ कमान चढ़ी है ना कोउ बची बूढ़ ना ज्वान ॥ यकदिन मरना है सबही को स्वामीकरो बचन परमान ११० जो तुम भगिहौ समरभूमिते बूड़ी तीनिसाखिको नाम ॥ लड़िकै मरिहौ जो सम्मुख में जैहौ तुरत राम के धाम १११ बचिकै अइहौ जो कनउज में पैहौ सदा नृपन में मान ॥ जीवन ताही को भलजानो जाकी रहै जगतमें शान ११२ ऐसी बातें रानी कहिकै पलँगापरै गई अलसाय ॥ राजौ सोये फिरि महलन में औअतिबिकृदनींदकोपाय११३ खेत छूटिगो दिननायक सों झंडागड़ा निशा को आय ॥ तारागण सब चमकन लागे चोरनखुशीभई अधिकाय ११४ होई लड़ाई अब आगे जस तब तस देबे गाय सुनाय ॥ बैठो यारो अब दमलेवो सीताराम चरणको ध्याय ११५ इति श्रीलखनऊ निवासि (सी, आई, ई) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजी की आज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत पृथुइराज की चढ़ाई वर्णनंनाम द्वितीयस्तरंगः २ ॥