आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
माड़ोका युद्ध । ८७ ३६ बेटा अनूपी आगे ह्वैकै आयो जहाँ उदयसिंहराय ॥ कहाँ से आयो औ कहँ जैहौ आपनहाल देउ बतलाय १४२ कौन बहादुर अस दुनियाँ माँ जो बबुरीबन रहा कटाय ॥ बेटा अनूपी की बातें सुनि तुरतै ब्वला बनाफरराय १४३ फौज हमारी माड़ो जैहै यहु बनबड़ा घना है भाय ॥ हैं परिमालिक जो मोहबे के जिनकाकही चंदेलाराय १४४ हमतो नौकर तिन घर केरे हमरो नाम उदयसिंहराय ॥ बेटा अनूपी तब समुझायो ऊदन लौटि मोहोबे जाय १४५ इतनी सुनिकै ऊदन बोले क्षत्री मानो कही हमार ॥ घोड़ा पपीहा लाखा पातुरि औ मँगवाउ नौलखा हार १४६ दै पचशब्दा हाथी देवो बिजमा ब्याह देउ करवाय ॥ मूड़ काटिकै नृपजम्बा का हमरी नजरि गुजारो आय१४७ बेटा अनूपी सुनि रिसहा भा औ क्षत्रिन ते कहा सुनाय ॥ जान न पावैं मोहबे वाले टेंटुवाटायर लेउ छिनाय १४८ बेटा अनूपी की बातें सुनि रिसहा भयो बनाफरराय ॥ तुरत दरोगा को ललकार्यो चरखिन तोपैं देउ चढ़ाय १४६ बत्ती दैद्यो मोरि तोपनमाँ इन पाजिन को देउ उड़ाय ॥ सुनिकै बातें बघऊदन की गोलंदाज पहुंचे आय १५० गोला डारे तिन तोपनमाँ सुम्मा मारैं फेरि चलाय ॥ धरिकै रंजक फिरि प्यालन में ऊपर बत्तीदई लगाय १५१ सवैया ॥ गोलाचले तब ओलासमान मनो घनसावनको चढ़िआयो। भूमि अकाश न सूझिपरै धुँवना दोउफौजनमें अतिछायो॥ घावपरै बहुहाथिन वाजिन ऊंटन के दलको विचलायो।
४० आल्हाखण्ड । ८८ कौन कहैग तिक्षत्रिनकी ललितपर जात कछूनहिंगायो १५२ पहिले मारुइ भइँ तोपन की पाछे चलनलागि तलवार ॥ पैदरि पैदरि का झुरमुटभा औ असवारसाथ असवार १५३ चारिघरीभरि चली सिरोही बीरन रहे बीर ललकार ॥ भाला बरछिन की मारुइ भइँ कोताखानी चलीं कटार १५४ बड़ी मारुभइ बबुरीवनमाँ जूझनलागि सुघरूवा ज्वान ॥ कटि कटि शिरधरतीपर गिरिगे सबकाछूटिगयोअभिमान१५५ खट खट खट खट तेगा बोलै रणमाँ छपक छपक तलवार ॥ सन सन सन सन गोलीबरसैं खन खन कड़ाबीनकी मार१५६ मर मर मर मर ढालैं बोलैं ठन ठन भालन को झनकार ॥ झल्झल्झल्झल्छूरीझलकैं बोलैं मारु मारु सब मार १५७ मूड़न केरे मुड़चौरा भे औ रुंडन के लाग पहार ॥ कटि भुजदंडैं गईँ क्षत्रिन की कल्लाकटे बलेरन क्यार १५८ रकतकिनदियातहँबहिनिकरीं जूझे बड़े बड़े सरदार ॥ बहे बार तहँ जायँ क्षत्रिन के जैसे नदिया बहै सिवार १५६ गोहैं ऐसी भुजदण्डैं तहँ ढालैं कछुवा सम उतरायँ ॥ छुरी कटारी मछली मानो औ धड़ नैयासमबहिजायँ १६० काककंक तिन ऊपर बैठे मानो नदिया ख्यलें नेवार ॥ बेटा अनूपी आगे आयो सुरखा घोड़े पर असवार १६१ औ ललकार्यो बघऊदन को ओ द्यावलि के राजकुमार ॥ मेरे सिपाहिन के का पड़हौ ऊदन तोरिमोरि तलवार१६२ बेटा अनूपी की बातें सुनि भा मन खुशी लहुरवा भाय ॥ ऊदन बोले त्यहि क्षत्री ते तुम्हरी अवधिपहुँची आय १६३ पहिले कैले समरभूमि में नाहर टोंडर के सरदार ॥
माड़ौका युद्ध । ८६ ४१. पहिलै लोहै तुम्हरी राखैं फिरिकचलोहियादेखुहमार १६४ सुनिकै बातें ये ऊदन की अनुपी भाला लीन उठाय ॥ दूनों अँगुरिन भाला तौलै कालीनाग ऐस मन्नाय १६५ छुटिगा भाला जो हाथेते कम्मर मचा ठनाका जाय ॥ घोड़ा बेंदुला बायें दैगा औबचिगयो लहुरवाभाय १६६ हँसिकै बोल्यो तब अनुपीते यहु रणबाघु उदयसिंहराय ॥ दूधु लरिकई माँ पायो ना तुम्हरे मरे चढ़ै ना घाय १६७ अब तुम सुमिरौ यहिसमयामाँ जो गाढ़े माँ होयसहाय ॥ वार हमारी ते बचिजायो घरमाँ छठी धरायौ जाय १६८ अब ना बचिहौ रणखेतनमें अनुपी सम्हरि होउ हुशियार ॥ इतना कहिकै बघऊदन ने नंगी खैंचिलीन तलवार १६६ मरी सिरोही तब अनुपी के धरती गिरयो भरहराखाय ॥ मरिगा अनुपी रणखेतन माँ टोंडरमलौ पहुँचा आय १७० औ ललकारा बघऊदन का अब तुम खबरदार ह्वैजाय ॥ धोखे अनुपी के भूल्यो ना अबहीं सरगदेउँपहुँचाय १७१ खैंचि सिरोही लइ कम्मर से औ ऊदन पर दई चलाय ॥ वार ढालपर ऊदन लीन्ह्यो टोंडर हाथ मूठि रहिजाय १७२ टूटि सिरोही गै टोंडर कै तब मनसोचभयो अधिकाय ॥ ऐँड़ लगायो फिरि बेंदुलके टोंडरपास पहुँच्यो आय १७३ ढाल कि औझड़हनिकै मारयो औ घोड़ाते दियो गिरायं ॥ बाँधिकै मुशकें फिरि टोंडर की लशकरतुरतदीनपहुँचाय १७४ मारु बन्दभै तब हुँवना पर सायंकाल पहुँचा आय ॥ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय १७५ परे आलसी निज निज शय्या घों घों कण्ठ रहा घरांय ॥
४२ आल्हखण्ड । ६० माथ नवावों पितु अपने का जिनमोहिंविद्यादीनपढ़ाय १७६ करों तरंग यहाँसों पूरण तव पद सुमिरि भवानी कन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवो इच्छायही मोरि भगवन्त १७७ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशी नवलकिशोरआत्मज बाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भवबुधकृपाशङ्करसूनु पं० ललिताप्रसादकृत अनूपीवधोनामत्त्रतीयस्तरंगः ३ ॥ कवित्त ॥ चन्द्रभालमुण्डमाललोचनविशाललाल ओढ़ेतनवाघखाल पोढ़ेभक्तपाल है । मोहमार दामजार बैलके सवार यार मोर रखवारहोहु नाम जक्तपाल है ॥ सोहैं शीशगंगा फिरै भंगके उमंगा नंगा संग अर्द्धांगा गौरि दीननको घालहै । ध्यावैं औमनावै गावैं ललितहमेश शेष पावैं नहिं पार शिवकालहूको काल है १ सुमिरन ॥ दुर्गामाता तुमका ध्यावों नितप्रति दुर्गापाठ सुनाय ॥ तुम असिमाता को त्रिभुवनमाँ ड्योढ़ी जासु जुहारों जाय १ भयू यशोदाके पेटे सों त्रिभुवन जान तुम्हारी गाथ ॥ तुम्हरे भाई कृष्णचन्द्र भे त्रिभुवनपती चराचरनाथ २ जिनकी कीरति महभारत में पर्वै रची अठारह ब्यास ॥ मथा समुन्दर गा सतयुग में पूरी तबै सबैकी आश ३ भारत मथिकै मच्छोदर सुत गीता ताते कीन प्रकाश ॥ गीता धीता जो कोउ कीन्ह्यो लीन्ह्योजिति जगतकी फाँस ४ छूटि सुमिरनी गै देवनकै शाका सुनो बनाफर क्यार ॥ जम्बै राजा जो माड़ो का सूरज लड़िहै तासु कुमार ५
माड़ोका युद्ध । ६१ ४३ अथ कथाप्रसंग ॥ गा हरकारा फिरि माड़ो को बारहदरी पहुँचा जाय ॥ बेटा जम्बै को सूरजमल तहँपर रहा रामको ध्याय १ खबरि सुनाई हरकाराने अनूपी मरण गयो सबगाय ॥ सुनिकै बातें हरकारा की मनजरिमरयो बघेलाराय २ तुरत नगड़ची को बुलवायो डंका तुरत दीन बजवाय ॥ हाथी घोड़ा औ तोपन को बबुरीबन का दीन हँकाय ३ हरियल घोड़ाकी पीठी पर आपो फांदिभयो असवार ॥ माथ नायके श्रीगणेश को औ मन सुमिरयो नन्दकुमार ४ सुमिरि भवानी जगदम्बाको औ शिव रामचन्द्रको ध्याय ॥ सूरज चलिभा बबुरीबनको औ रणखेत पहुँचा आय ५ आगे लश्कर के सूरजमल गरुई हांक दीन ललकार ॥ काकी माता नाहर जायो काके जमे करेजे बार ६ को कटवावत है बबुरीबन औ को मोहबेका सरदार ॥ कौन कहावत उदयसिंह है किसने डरा अनूपी मार ७ घोड़ा बेंदुला पर टहलत रहै यहु रणबाघु लंहुरवा भाय ॥ सुनिकै बातें सूरजमल की तुरतै बोला बनाफरराय ८ हमरी माता नाहर जायो हमरे जमे करेजे बार ॥ हम कटवावत हैं बबुरीबन हमहीं डरा अनूपी मार ६ कही सुना भा जब दूनों माँ दूनों कुँवर गये अलगाय ॥ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतनभाय १० बम्ब के गोला छूटन लागे धुँवना रहा सरग में छाय ॥ गोली ओलासम बरसत भइँ भन भन भन्न भन्न भन्नाय ११ छाय अँधरिया गै दिनही में औ तिलडरा भुईं ना जाय ॥
४४ आल्हखण्ड । ६२ कौंधालपकनिविजुलीचमकनि रणमाँचमकिचमकिरहिजाय१२ ऐसि सिरोही मलखाने कै ठाकुर समरधनी मलखान ॥ काटि गिरायो राजपूतन को हाथिनमारि कीन खरिहान १३ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठे जैसे अहिर विडारै गाय ॥ जैसे भाई आसमान में चन्दै राहु गरासै जाय १४ जैसे अर्ज्जुन के देखत में कौरव फौज जाय थराय ॥ जैसे पूजे शिवशंकर के दारिद तुरतै जाय नशाय १५ तैसे मलखे ज्यहिदिशि जावैं सो गलियार परै दिखलाय ॥ मलखे केरे भइ मुर्चा में कउ राजपूत न रोकै पायँ १६ सूरजमल औ ऊदन बाँकुड़ा दोऊ करें बराबर मार ॥ बैस बराबर है दोऊ कै दोऊ समरधनी सरदार १७ गदा बनेठी दोऊ खेलें कसरत करें नटन के साथ ॥ भाला बलछी दोनों बाँधे लीन्हे कड़ाबीन दोउहाथ १८ करें पैतड़ा रण खेतन में दोऊ रहे दुहुँन ललकार ॥ हनि हनि मारैं एक एक को दोऊ लेयँ ढालपर वार १६ बड़ी लड़ाई दोऊ कीन्ह्यो मानो छुटे जँगल के बाघ ॥ हारि न मानैं कोउ कोऊ ते दोऊ बड़े लड़ैया घाघ २० खेंचि सिरोही सूरज लीन्ह्यो करिकै रामचन्द्रको ध्यान ॥ ऐंचि कै मारा बघऊदन के दोऊ हाथ सँभरिकै ज्वान २१ टूटि सिरोही गै सूरज कै खाली मूठि हाथ रहिजाय ॥ सूरज सोच्यो अपने मनमाँ हमरी मृत्यु गई नगच्याय २२ ऊदन बोल्यो तब सूरज सों मानो कही बघेलोराय ॥ कोदो देकें बाढ़ी धरायो तुम्हरे मरे चढ़ै ना घाय २३ सँभरिके बैठो अब घोड़ापर क्षत्री खबरदार है जाय ॥
माड़ोका युद्ध । ६३ ४५ वार हमारी ते बचिजाये घरमाँ छठी धराये जाय २४ यह कहि मारा तलवारी को शिरपर परी सूर्य के जाय ॥ फटिकै खुपरी दुइ . टूका भै सूरज गिरा भरहराखाय २५ सूरज गिरतै परलय हैगै लशकर तितिरबितिरहैजाय ॥ भागि सिपाही गढ़ माड़ो को जम्बै शरण पहुँचे आय २६ सुनी सिपाहिन की बातें जब राजा जम्बै उठा रिसाय ॥ हुक्म लगायो फिरि करियाको बबुरीबनै पहुँचे जाय २७ करिया बोल्यो त्यहि समया में हमरे सुनो शूर सरदार ॥ तुरत नगड़ची को बुलवावो सबियाँ फौज होय तय्यार २८ बजो नगाड़ा तब माड़ो में भादों मेघ सरिस हहराय ॥ हथी महावत हाथी लैकै तुरतै भूमि दीन बैठाय २९ चुम्बक पत्थर के हौदा धरि जिनमाँ सेल बरौंचा खाय ॥ धरी अँबारी तिन हाथिन पर हौदन कलशदीन धरवाय ३० घंटा बांधे गलहाथिन के भारी देत चलत झनकार ॥ यक यक हाथी के हौदापर दुइ दुइ बीर भये असवार ३१ तुरत दरोगा घोड़न वाला ताजी तुरकी कीन तयार ॥ नकुला सब्जा पँचकल्यानी सुर्खा सुरँगा रङ्ग अपार ३२ गंगा यमुनी डरी रकाबैं मुहँमाँ दीन लगाम लगाय ॥ डरी हयकल्लैं तिन घोड़नके रेशम तंग दीन कसबाय ३३ पुट्ठन बुट्टा रचि मेहँदी के सुम्मन नालैं दीन बँधाय ॥ पूंजी पट्ठा कसि घोड़न के तिनपर काठी दीन धराय ३४ नवल बछेड़ा घोड़शारे में ते सब बेगि भये तय्यार ॥ यक यक भाला दुइ दुइ बलछी कम्मर कसी तीन तलवार ३५ अगल बगल में दुइ पिस्तौलैं दहिने हाथे लीन कटार ॥
[Page Header] ४६ आल्हाखण्ड । ६४
बड़े सजीला जे क्षत्री थे घोड़न उपर भये असवार ३६ धरे नगाड़ा गे ऊंटन पर तोपैं होन लगीं तय्यार ॥ गर्भ गिराविनि कुँवासुखाविनि लछिमिन तोप बड़ी हहकार ३७ ते सब तोपैं रणखेतन को करिया तुरत दीन हँकवाय ॥ बजे नगाड़ा फिरि ऊंटन पर हाहाकारी शब्द सुनाय ३८ औरि बयरिया डोलन लागीं औरै होन लगे व्यवहार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे बिप्रन कीन वेद उच्चार ३६ घोड़ पपीहा पचशब्दागज कोतल कीन गये तय्यार ॥ बैठिंग हाथी करिया वाला तापर होन लाग असवार ४० छींक तड़ाका भै सनमुखमाँ पंडित बोला शकुन विचार ॥ तुम ना जावो रणखेतन को करिया माड़ो के सरदार ४१ राहु वारहें अठयें बेप्फै तुम्हरे दृष्टि शनीचर भाय ॥ घात चन्द्रमा दशयें आयो तुम ना धरो अगाड़ी पाँयँ ४२ सुनिकै बातें ये पण्डित की तुरतै बोला करिंगाराय ॥ शकुन विचारै रयत रेजा जो धरि मौर बियाहन जाय ४३ शकुन विचारैं कछु क्षत्री ना जो रण चढ़िकै लोह चबायँ ॥ कूचके डंका बाजन लागे मारू शब्द रहे हहराय ४४ रंगा बंगा शहाबाद के दोऊ घोड़न चढ़े पठान ॥ रण की मौहरि बाजन लागी घूमनलागे लाल निशान ४५ करिया चलिभो समरभूमि को मनमें श्रीगणेश को ध्याय ॥ सुमिरि भवानी शिवशङ्कर को औ सूर्यन को माथ नवाय ४६ किह्यो कीर्त्तन कृष्णचन्द्र को जिन अर्जुनकी करी सहाय ॥ दोउ पद बन्द्यो रामचन्द्र के लङ्का फते करी जिन जाय ४७ पूत अंजनी को हनुमत जो ताको बार बार शिरनाय ॥
[Header] माड़ोका युद्ध ६५ । ४७
सुमिरिकै अंगद बाली वालो करिया चला समरको जाय ४८ आगे हलका है हाथिन का बलका जिनके नाहिं ठिकान ॥ पहिया दुरकैं उन तोपन के तड़कतिअवैं सिंडरियाबान ४६ पछे रिसाला घोड़न वाला आला चला समरको जाय ॥ खर खर खर खर कै रथ दौरैं चह चह रहीं धुरी चिल्लाय ५० छाय अँधेरिया गै मारग में बंजर खेत मुहा है जायँ ॥ लक्ष पताका यकमिल हैगे नभ माँ गई लालरी छाय ५१ ऐसी फौजैं मलखाने की वैसी माड़ो का सरदार ॥ सूँड़ि लपेटा हाथी भिड़िगे अंकुश भिड़े महौतन क्यार ५२ हौदा हौदा यकमिल हैगे ऊंटन भिड़िगे ऊंट कतार ॥ भाला छूटे असवारन के पैदर चलन लागि तलवार ५३ सूँड़ि लपेटे जंजीरन को हाथी रणमाँ रहे घुमाय ॥ मस्तक गजके गज हनिमारैं अद्भुत समर कहा नाजाय ५४ क्षत्री गर्जे गज हौदन ते जो सुनि गर्भपात है जायँ ॥ कँधालपकनि बिजुलीचमकनि कहूँ कहूँ परै खड्गके घाय ५५ मर मर मर मर ढालैं बोलैं गोली सन्न सन्न सन्नायँ ॥ खट खट खट खट तेगा बोलैं लपलपलपकि लपकि रहि जायँ ५६ झम् झम् झम् झम् झीलम बोलैं नीलम रंग परै दिखराय ॥ धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ५७ झल् झल् झल् झल् छुरी झलकैं चम्चम्चमकि चमकि रहि जायँ ॥ बल् बल् बल् बल् क्षत्री बलकैं हब् हब् हबकि हबकिकै खायँ ५८ धर् धर् धर् धर् क्षत्री दौरैं सर् सर् तीर चलावत जायँ ॥ फर् फर् फर् फर् घोड़ा दौड़ैं हिन् हिन् हिन् हिन् हिन्नायँ ५९ टिट् टिट् टिट् टिट् टिटुई हांकैं टिल् टिल् टिल्ल टिल्ल चलि जायँ ॥
४८ आल्हखण्ड । ६६ चम् चम् चम् चम् खड्गचमकै खद् पद् खद् पद् रहीं मचाय ६० रन् रन् रन् रन् फिरैं योगिनी बम् बम् बम्ब बम्बको गाय ॥ सन् सन् सन् सन् बायू सनकै मन् मन् मन्त्र मन्त्र मन्नायँ ६१ मारु मारु करि तुरही ब्वालै ब्वालै हाव हाव करनाल ॥ सुनि सुनि बँचकैं बहु क्षत्रीगण बहुतक जूभिगये नरपाल ६२ बहुतक करहैं रण सरिता में नदिया बही रक्तके धार ॥ मुंडन केरे मुड़चौरा में औ रुंडन के लगे पहार ६३ परीं लहाशैं जो हाथिन की तिनका नदी किनारा मान ॥ परे बछेड़ा ऊँटनी तिनपर तिनसों नदीकगारा जान ६४ जैसे नदिया डोंगिया सोहैं तैसे स्वहैं नरनकी देह ॥ जैसे नदिया सावन बाढ़ै बसैं बहुत गरजिकै मेह ६५ तैसे डोंगिया नरदेही में नेही जौन सनेही जीय ॥ काक कंक तिन ऊपर बैठे फारैं जियत नरनके हीय ६६ झूरी जानो तुम मछलिनको कछुवा मनो ढाल दिखरायँ ॥ नचीं योगनी त्यहि सरिता में तारी भूतन दीन बजाय ६७ बड़ी लड़ाई भै बबुरीवन हमरे बूत कही ना जाय ॥ जो हम बाँधैं ह्याँ रूपक सब गाये उमर पार ह्वैजाय ६८ करिया ऊदन के मुर्चा माँ औ परिहा रामते काम ॥ बड़ा लड़ैया माड़ो वाला ठाकुर जबर्दस्त सरनाम ६६ करिया बोला वहि समया में गरुई हांक करत ललकार ॥ तुम टरिजावो म्वरे सम्मुखते ठाकुर उदयसिंह सरदार ७० बाप तुम्हारे को हमहीं ने कोल्हू डारा रहै पिराय ॥ तैसे मारौं तलवारी सों मानो कही बनाफरराय ७१ सुनिकै बातें ये करिया की करिया भये उदयसिंहराय ॥
माड़ोका युद्ध । ६७ ४६ डाटिकै बोल्यो फिरि करियासों ठाकुर खबरदार है जाय ७२ सोवत मारे देशराज को औ फिरि बच्छराजको जाय ॥ जागत मारों जो करिया ना तौ ना कहे उदयसिंहराय ७३ सुनिकै बातें ये ऊदन की करिया खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचिकै मारा उदयसिंह को रोंका तुरत ढाल पर वार ७४ बचा दुलरुआ ग्यावलिवाला आला उदयसिंह सरदार ॥ करिया बोला फिरि ऊदन ते ठाकुर बेंदुल के असवार ७५ अबती आवै जो हौदा पर तौ यमपुरी देउँ दिखराय ॥ सुनिकै बातें ये करिया की करिया जौन उदयसिंहराय ७६ ऐँड़ा मसका रसबेंदुल का हौदा उपर पहुंचा जाय ॥ खैंचि सिरोही को कम्मर ते मारा तुरत बनाफरराय ७७ धरी सिरोही गज शुण्डा में खण्डा तुरत भई त्यहिंघाय ॥ खण्डा शुण्डा हाथी दीख्यो करिया गयो सनाकाखाय ७८ कोतल हाथी पचशब्दा था तापर तुरत भयो असवार ॥ औ यह बोल्यो फिरि हाथी ते हाथी साथी अहिउ हमार ७६ निमक हमारो बहु खायो है बांधे रहे हमारे द्वार ॥ हम जो बांधें बघऊदन को हमरे निमक होउ उद्धार ८० कहिकै बातें ये हाथी सों गरुई हाँक कीन ललकार ॥ बार तीसरी जो तू आवै ठाकुर बेंदुल के असवार ८१ कुशल न जावै तू हौदा ते खुपड़ी टँगै बरगदे डार ॥ सुनिकै बातें ये करिया की ठाकुर मोहबे का सरदार ८२ डाटिकै बोला फिरि करिया सों का तू बकै बकै जस बाल ॥ कोल्हू पिरावों मैं जम्बा को माड़ो खोदि करावों ताल ८३ मूड़ काटिकै करिया तेरो मल्हना महल देउँ पहुंचाय ॥
५० आल्हखण्ड । ६८ तौ तौ लरिका देशराजका साँचो नाम उदयसिंहराय ८४ सवैया ॥ या कहिकै ऊदन त्यहि बार सो बेंदुल को लय ऊपर धाये । शुण्डसों दाबि लियो पचशबदा बापके बाहन बंधन आये ॥ कर बांधिलियो तबहीं करिया तहँ लै हौदा पै कूच कराये । ललिते मलखान तहां बलखान गुमानभरे रणखेतन आये ८५ जैसे भेड़िन भेड़हा पैठे जैसे सिंह बिडारै गाय ॥ तैसे मारै औ ललकारै यहु रणबाघु बनाफरराय ८६ मलखे ठाकुरके मोर्चा पर कउ रजपूत न रोकै पायँ ॥ मारति मारति मलखाने जी पहुंचे जहां करिंगाराय ८७ देखिकै करिया राहुट हैगा औ मलखे से लगा बतान ॥ जो गति कीन्ह्यों बच्छराजकी सोई जानु अपनि मलखान ८८ त्यहिते तुमका समुझाइत है सम्मुख अवो न हमरे ज्वान ॥ सुनिकै बातें ये करिया की रिसहाभयो वीर मलखान ८६ ऐँड़ा मसके जब घोड़ी कें हौदा उपर पहुंची जाय ॥ पैर पकरिकै तब करियों के औ हौदा ते दीन गिराय ६० उतरिकै घोड़ा ते देवा तब औ हाथी पर भयो सवार ॥ छोरी मुशकें बघऊदन की यहु भीषमको राजकुमार ६१ रुपना वारी बेंदुल लीन्हे तापर बैठ´ लहुरवा भाय ॥ घोड़ा पपीहा की पीठी माँ तुरतै बैठ करिंगाराय ६२ मलखे ठाकुर ने ललकारा करिया खबरदार ह्वै जाय ॥ जियत न जैहौ तुम माड़ो को तुम्हरो कालरहा नगच्याय ६३ सुनिकै बातें मलखाने की तब जरिमरा करिंगाराय ॥
माड़ोका युद्ध । ६६ ५१ खैंचि सिरोही ली कम्मर से औ मलखे पर दई चलाय ९४ वार बचायो मलखाने ने करिया निकट पहूँच्यो जाय ॥ ढालकि औझरि मलखे मारा तब गिरपरा करिङ्गाराय ९५ घोड़ा पपीहा मलखे लीन्ह्यो औ क्षत्रिनते कह्यो सुनाय ॥ मारो मारो ओ रजपूतो तौ मिलिजाय बापका दायँ ९६ सुनिकै बातें मलखाने की ज्वानन खूब कीन घमसान ॥ रङ्गा बङ्गा शहाबाद के साथ म आये जौन पठान ६७ ते दउ मारैं दिशि करिया के रणमाँ बड़े लड़ैया ज्वान ॥ तिनके मुर्च्चा पर देवा रहे ठाकुर मैनपुरी चौहान ९८ सो- ललकारै तहँ रंगा को औ बंगाको दियो हटाय ॥ को गति बरणै तहँ देवा कै हमरे बूत कही ना जाय ६६ बड़ा लड़ैया रंगा रंगी जंगी खैंचि लीन तलवार ॥ ऐंचिकै मारा सो देवा को देवा लीन ढालपर वार १०० औ ललकारा फिरि रंगा को रंगा खबरदार ह्वैजाय ॥ खैंचि सिरोही देवा मारा रंगा गिरा भरहराखाय १०१ रंगा मरिगा जब मुर्च्चा पर बंगा चला तड़ाका धाय ॥ नंगी लीन्हें तलवारी को देवा पास पहूँचा आय १०२ सँभरिकै बैठो अब घोड़ापर तुम्हरो काल गयो नियराय ॥ यह कहि मारा तलवारी को बखतर काटि पार ह्वै जाय १०३ बचा दुलरूवा भीषमवाला ज्यहिका राखिलीन भगवान ॥ खैंचि सिरोही ली कम्मर ते औ हनिदियो बंगपरज्वान १०४ बंगा जूझा रणखेतन में तब जरिमरा करिङ्गाराय ॥ औ ललकारा रजपूतन को हमरे सुनो सिपाहिउ भाय १०५ जाय न पावैं मुहुबे वाले इनकी कटा लेउ करवाय ॥
५२ आल्हाखण्ड । १०० पिंशन देवे सब शूरन को दुहरी तलब देव करवाय १०६ सुनिकै बातें ये करिया की ठाकुर मोहबे का सरदार ॥ रिसहा ह्वैकै मलखाने तब गरुई हांक दीन ललकार १०७ जान न पावैं माड़ो वाले ओ रजपूतो बात बनाउ ॥ देव जगीरैं हम मुहबे माँ बैठे तीनि शाखिलौं खाउ १०८ सुनि सुनि बातें सरदारन की खूब लरिमेरे सिपाही जवान ॥ लालच लाग्यो अति रुपियाका सम्मुख लोहा लगे चवान १०६ सवैया ॥ सूमन को धन प्यार भलीविधि शूरन को धन नेक न भावै । शूर शिरोमणि भक्तनको धन प्रान द्वऊन को मोह न आवै ॥ सांच विभीषण की कहिये रहिये नहिं मौन यही मन भावै । प्रान धनौपर आनपरी ललिते तजि शान स्वई ढिग आवै ११० कौन गुमान करी अपने मन मान अमान लिये दुख पावै । मान वही रघुनाथ मिलैं नतु है अपमान यही कहि आवै ॥ ⊛ चार के साथ बचै नहिं एक विवेक से नेक यही मन भावै । गावै अमान न मानचहै ललिते रघुनाथ स्वई जन पावै १११ शूर सिपाही ईजतिवाले बोले द्वऊ दिशाके ज्वान ॥ काह बखानंत महराजा हौ यहनहिंसुनाचहैं हमकान ११२ देही नेही नरगेही के पाल्यो सदा द्रव्यसों प्रान ॥ मब भय आई नृपदेही में नेही नहीं हमारे प्रान ११३ ⊛ काम १ क्रोध २ लोभ ३ मोह ४ इन चारोंकी प्रबलता में एक देह नहीं बचसक्ती ॥
माड़ोका युद्ध । १०१ ५३ नालति त्यंहिकी रजपूती का पैदा होबे का धिकार ॥ सनमुख बैरी जो मारै ना रणमाँ लागैं प्राणपियार ११४ सुनिकै बातें रजपूतनकी दोऊ लड़न लाग सरदार ॥ मलखे करिया का मुर्चा है दोऊ विषधर बड़े जुझार ११५ करिया ठाकुर माड़ोवाला गरुई हांक देय ललकार ॥ सँभरिकै बैठो अब घोड़े पर ठाकुर मोहबे के सरदार ११६ इतना कहिकै करिया ठाकुर तुरतै ऐंचिलीन तलवार ॥ खैंचि कै मारा मलखाने को मलखे लीन ढालपर वार ११७ ढाल छूटिगै मलखाने कै दूनों हाथ गही तलवार ॥ ताकिकै मारा फिरि करिया को काटिकैगलानिकलिगैपार ११८ जूझिग करिया माड़ोवाला फौजैं रोईं छाँड़ि डिंडकार ॥ घोड़ बेंदुला की पीठी सों फाँदा उदयसिंह सरदार ११९ मूड पकरिकै सो करिया को धड़ते डारा तुरत उखार ॥ आल्हा ऊदन मलखे देवा सय्यद बनरस का सरदार १२० पांचो मिलिकै गे तम्बू में जहँपर रहै दिवलदे माय ॥ हाल बतायो सब द्यावलि को करियाशीशदीनदिखलाय १२१ शीश देखिकै त्यहि करिया को भइ मन खुशी देवलदे माय ॥ बड़ी बड़ाई की सय्यद की तुम्हरीदया जीति भै आय १२२ बड़ी सहाई की लरिकन की धर्मसों देवर लगो हमार ॥ सखा तुम्हारे की नारीहन सय्यद बनरस के सरदार १२३ कियो सहाई जस हमरी है तैसे भला करी कर्त्तार ॥ सय्यद बोले तब द्यावलिते सांची मानो कही हमार १२४ खुदा सहाई सब दुनियाँ का बिसमिल भलाकरैं सब क्यार ॥ बार न बांका इनका जाई अच्छा धर्म निबाहन हार १२५
५४ आल्हखण्ड । १०२ सुनिकै बातैं ये सय्यद की बोला उदयसिंह सरदार ॥ । आठमहीना कहि आये त्यन त्यहिते ह्वैगै बहुत अवार १२६ यहु शिर पठवो तुम मोहबे को दादा मानो कही हमार ॥ हार लयआयो यहु मल्हना को जामें मिलै जाय इउ हार १२७ सुनिकै बातैं ये ऊदन की रूपन बारी लीन बुलाय ॥ करिया ठाकुर को शिर लै कै आल्हा मोहवे दीन पठाय १२८ पूरि तरंग यहाँ सों ह्वैगै शारद तुही लगावै पार ॥ डगमग नैया भवसागर में माता तुही निवाहनहार १२६ पार को पावै यहु आल्हाकहि थाल्हा जौन शूरमनक्यार ॥ शारदमाता ज्यहि जिह्वा में ताको खेय लगावै पार १३० बन्दनकरिकै तिन शारद को ह्याँते करौं तरंग को अन्त ॥ सुनै सुनावै हरिगुण गावै ललिते स्वई जगतमें सन्त १३१ इति श्रीलखनऊनवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरआत्मजबाबू प्रयागनारा- यणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुध कृपाशंकरसूनुपं० ललिताप्रसादकृतकरियाबधोनामचतुर्थस्तरंगः ॥ ४ ॥ सवैया ॥ कूप तड़ाग औ मंदिर सुन्दर वृक्ष चिलौलहुके बहु राजैं। मंदिर में शिव मूरति थापित देखतही दुख दारिद भाजैं ॥ जानतहौं नहिं कौनैहिंथाप्यो भूरिदिनोंसे तहां सो बिराजैं। ग्रामक नाम बड़ी पड़री तहँ मंदिर में सगरेश्वर गाजैं १ सुमिरन ॥ वेनु बाँसुरी अब बाजै ना नाकहुँ फिरैं गलिनमें श्याम ॥ रहिगै ठकुरी ना दशरथ की ना रहिगयो धनुर्धर राम १
माड़ोका युद्ध । १०३ ५५ पैदा होई सो मरजाई आई कछू नहीं फिर काम ॥ भलो बुरो जो जग में करिहै सोई बना रही नितनाम २ परमसनेही रघुनन्दन बिन नेही और जगत में कौन ॥ तिनहित देही नरगेही तज जावै राम भौनको तौन ३ आलस देही नरगेही तज सो यमपुरी पहुँचे जाय ॥ पार न जावै बैतरणी के धरि धरि चील्हगीधसबखायँ ४ छूटि सुमिरनी गै देवनकै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ कल्हू पिरायी नृप जम्बै को ठाकुर उदयसिंह सरदार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ माहिल चलिभे ह्याँ उरई ते लिल्ली घोड़ीपर असवार ॥ तिक तिक हाँकै त्यहि घोड़ीका एँड़ी करें भड़ाभड़ मार १ थोड़ी देरी के अरसा माँ माहिल अटे मोहोबे आय ॥ पहिले मिलिकै परिमालिकको मल्हना भवन पहुँचे जाय २ दीख्यो मल्हना जब माहिलको उठिकै बड़ा कीन सत्कार ॥ पूँछन लागी फिरि भैयासों राजा उरई के सरदार ३ आल्हा ऊदन मलखे सुलखे बोरेसे स्यये चारिहू भाय ॥ आठ महीना का कहिकै गे आयो एक साल नगच्याय ४ खबरि जो पाई कहुँ भाई हो हमको बेगि देउ बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये मल्हना की माहिल बोले बचन बनाय ५ मरे बनाफरगे माड़ो में खुपरी टँगी बरगदे डार ॥ सुनिकै बातें ये माहिल की मल्हना रोई छाँड़ि डिंडकार ६ स्वने कै लंका म्वारि जरिबरिगै अबधों कौन लगाई पार ॥ माहिल बोला फिरि बहिनीसों कीन्हे चुगुलिन का ब्यौपार ७ अब बुलवावो तुम पंडित को सूतक साइति करै बिचार ॥
५६ आल्हखण्ड । १०४ करो तिलाञ्जलि तिनपुत्रनको तुम्हरे हाथ होयँ उद्धार ८ इतना कहते भइ माहिल के रूपना अटा बराबरि आय ॥ मूड देखिकै त्यहि करिया का राजा गिरा पछाराखाय ६ हाथ जोरिकै रूपना बोला ओ महरजा रजापरिमाल ॥ मूड लयआये हम करिया को माड़ो कुशल तुम्हारे बाल १० जैसे पियासा जलको पावै सूखत परै धान में वारि ॥ रूपना बारी की बातें सुनि तैसे खुशीभये नर नारि ११ हल्ला सुनिकै नर नारिन सों मल्हना रूपना लीन बुलाय ॥ विदा मांगिकै माहिल चलिभे उरई तुरत पहुँचे जाय १२ मल्हना पूंछे तब रूपना ते बेटन हाल देउ बतलाय ॥ बदी सुनायो सब लड़िकनकै माहिल जौन हमारो भाय १३ सुनिकै बातें ये मल्हना की रूपना बोला शीशनवाय ॥ बेटा अनूपी टोंडर सूरज करिया सहित चारिहू भाय १४ चारो लड़का नृपजम्बा के बबुरीबन माँ गये नशाय ॥ खबरि तुम्हारी म्वहिं लेबे को पठयो वेगि उदयसिंहराय १५ हम चलि जावैं अब बबुरीबन हमको हुकुमदेव फर्माय ॥ कुशल तुम्हारी बिनपायेते ब्याकुल रहें चारिहू भाय १६ सुनिकै बातें ये रूपना की मल्हना हुकुम दीन फर्माय ॥ करो बियारी तुम महलन में माड़ो फेरि पहुँचो जाय १७ सुनिकै बातें ये मल्हना की रूपना जेयँ लीन ज्यँवनार ॥ सजा बछेड़ा तहँ ठाढ़ो थो रूपना फाँदि भयो असवार १८ सत्रहदिनकै मैजलि करिकै माड़ो फेरि पहुँचा जाय ॥ कही खबरिया सबमोहबेकी जहँ पर बैठ बनाफ़रराय १६ पाँचो मिलिकै सम्मत कीन्ह्यो यह फिरि ठीकलीन ठहराय ॥
माड़ोका युद्ध । १०५ ५७
किला घरेरैं अब लोहागढ़ लश्कर कूच देयँ करवाय २० पांचो मिलिकै सम्मत करिकै डंका तुरत दीन बजवाय ॥ घोड़ बेंदुला ऊदन बैठे मलखे चढ़े कबुतरी जाय २१ घोड़ मनोहर पर देवा है सय्यद सिरगा पर असवार ॥ आल्हा बैठे पत्रशब्दा पर सुमिरिकैदेव मोहोबे क्यार २२ कूच करायो बबुरीवनते लोहा गढ़ै पहुंचे जाय ॥ तोप लगायो तहँ फाटक पर बत्ती तुरत दीन करवाय २३ फाटक गाँसा जम्बै दीख्यो रानी महल पहुंचा जाय ॥ चारो पुत्रन कै सुधि करिकै रोवनलाग तहां पर आय २४ बंश बूड़िगा म्वर पापी का मेरो काल रहा नगञ्याय ॥ बड़ो लड़ैया सब शूरन में आल्हाकेर लहुरवाभाय २५ म्वहिं भय आई त्यहि ऊदनते ताते प्राण मोर घबड़ायँ ॥ सुनिकै बातें ये राजाकी बिजमाबोली बचन सुनाय २६ करिकै जादू मैं ऊदनको राखौं झारखण्ड में जाय ॥ इतनाकहिकै चली बिजैसिनि लश्कर तुरत पहुंची आय २७ डाखो गुटका मुखभीतर माँ जासों नजरबन्द हैजाय ॥ गायब ह्वैकै तहँ पर पहुँची जहँ पर रहै लहुरवाभाय २८ नारसिंह औ भैरों वाली तीसर जौन महमदा वीर ॥ पुरिया डारी तहँ जादू की ह्वैगे सबै बीर आधीर २९ डारि मशान दयो लश्कर में नाहीं मसा तलक भन्नाय ॥ जादू मारी बंगाले की ऊदन मेढ़ा लयो बनाय ३० लैके मेढ़ा बिजमाँ चलिभै पहुँची झारखण्ड में आय ॥ गुरू झिलमिलाकी मढ़ियामाँ मेढ़ा बँधा बिजैसिनिजाय ३१ हाथ जोरिकै गुरुबाबा के औ सब हाल दीन्ह समुझाय॥
५८ आल्हखण्ड । १०६ चली बिजैसिनि झारखण्डते पहुँची रङ्गमहल में आय ३२ जितने जादू बिजमाँ डारे सो लश्कर ते लये उतार ॥ उतरी जादू जब लश्कर ते चेते सबै शूर सरदार ३३ आल्हा बोले तब मलखेते नहिं लखिपरे लहुरवा भाय ॥ सुनिकै बातैं मलखे बोले देवा शकुनदेव बतलाय ३४ लैके पोथी ज्योतिष वाली देवा हाल गयो सब गाय ॥ गुरुझिलमिलाकी मढ़ियामाँ बांधा तहां लहुरवा भाय ३५ सुनिकै बातैं ये देवा की आल्हा बहुत गयो घबड़ाय ॥ देवा बोला फिरि मलखेते मानो कही बनाफरराय ३६ बाना छोरो रजपूती का अँगमाँ लेवो भस्म लगाय ॥ योगी बनिकै हम तुम जावैं तौ सबकाम सिद्ध है जायँ ३७ बातैं सुनिकै ये देवा की योगी बने बीर मलखान ॥ तुरतै चलिभे झारखण्ड को पहुँचे तहाँ दूनहू ज्वान ३८ गुरुझिलमिलाकी मढ़ियाढिग गावैं तान वीर मलखान ॥ बाजै डमरू भल देवाकै सो परिगई भनक त्याहिकान ३६ गुरु झिलमिला बाहर आयो योगी लखा तहाँ दुइ ज्वान ॥ हाथ पकरिकै लै मढ़िया में बाबा बड़ा कीन सनमान ४० बोले योगी हम दोउभाई ऐसा कह्यो वीर मलखान ॥ अब हम जावैं हरद्वार को चाहैं कछू नहीं सनमान ४१ रमता योगी बहता पानी ये नहिं करैं कतौ बिश्राम ॥ नहिं अभिलाषा क्यहू बातकी केवल जपें रामको नाम ४२ सुनिकै बातें ये योगी की बोला तुरत झिलमिला ज्वान ॥ जो कछु मांगो सो कछु पावो हमरे वचन करो परमान ४३ सुनिकै बातें ये बाबा की बोले तुरत बनाफरराय ॥