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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः २० ] गव्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५२३

सर्गः २० ] गव्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५२३

सुमेधासदृशी यत्र मे श्वश्रूः स्नेहवर्धिनी। विद्रुहः शमुग यत्र विवादो यत्र गाधिनः ॥७७॥ लक्ष्मणो यत्र मे मन्त्री सरयूश्च मे नदी। पार्षदा छत्रपाद्याश्च चतुरन्तो गजो महान् ॥७८॥ द्विजेच्छानुरूपं यत्र मन्नं मेऽङ्गुष्ठितं सदा। इदं वैकुण्ठसदृशं गृहं यत्राणिमागुणः ॥७९॥ चिन्तामणिलकारो हृदये यत्र वर्तते । एकादश सहस्राणि वर्षाण्यायुश्चिरं मम । ८० । अनशं मे शिरच्छेदं केषामप्यवनीभृताम्। एष मया सुख भुक्तमिह जन्मनि भूयसः ॥८१॥ नाऽल्पा बाष्पपुरिवाऽस्ति सुगेच्छा मम भूतले । जनएवायतारो ऽयं पूर्णकाममया धृतः ॥८२॥ भूतनाम्भावनाय चे तेऽंशादेव मया धृताः । यदन तु बने पूर्वं सीतया बन्धुना यया ॥८३॥ तच्च लोकोपदेशार्थं भूभारहरणाय च । जनोपदेशः कीदृक् म कृतस्तं प्रवदाम्यहम् ॥८४॥ पितुर्वचो मानमीय यद्यप्यनिशश्रमप्रदम् । पुत्रैग्गिपूपदशार्थं मया वाक्यं पितुः कृतम् ॥८५॥ न तदा कि मया कृते पितुर्वाक्य बल मयि । तथापि लोकशिक्षार्थ तद्वाक्यं पालित मया ॥८६॥ न हन्तव्या मया क्रोशाद्दुष्टाकि कैकयी तदा । तथा मा मंथरा चापि मे गञ्जे विघ्नकारिणी ॥८७॥ कि तदा कुंठिता शक्तिः कैकेयीमंथराबधे । स्त्रीहत्या नैव कर्तव्या चेति सर्वान्युशिक्षितम् ॥८८॥ सापत्नमातृवाक्यं तु पालनीयं स्वमातृवत् । स्वसुखार्थं वधोऽन्यस्य न कर्तव्यो जनेरिति ॥८९॥ उपदेष्टुं मया नैव कैकेयीमंथरे हते । न बहुदिंसा कर्तव्या परराज्यं न काङ्क्षयेत् । ९० ॥ अहमूंपदिशंश्चित्यं जनान्द्यधर्तो न म । मृते पितर्यपि ह्यंतं न तद्राज्यं स्वतान्मया ॥९१॥ राज्यासक्ता नरा भूम्यां भोगासक्ता भवन्तुन । उपदेष्टुं जनेभ्यस्त्वहं पूर्वं वनं गतः । ९२ । मातृपितृसुहृत्पुत्रस्नेहाद्कर्मिक न कामयेत् । इत्थ मयोपदिष्टास्त्यक्तः स्नेहस्तदा द्विजाः । ९३ ॥

माता है, जहाँ कि मैं सदा सावधान रहता हूँ ॥७६॥ स्मरण हटाने का रास्ता जहाँ पास है विरह जैसे समुद्र है, विश्वामित्र जैसे विवादाता गुरु हैं । ७७॥ लक्ष्मण जैसे मन्त्री, सरयू जैसी नदी है, अङ्गादि वीर अह्रक्षक हैं, बड़ा भारी चतुरंग्रन्त हाथी है ॥ ७८ ॥ दूसरा इष्ट गुण करना तथा अङ्गुष्ठित व्रत है वैकुण्ठके समान सुन्दर भवन है ॥ ७९ ॥ चिन्तामणि ज्ञेय अनुसार सदा हृदयपर रहता है, ग्यारह हजार वर्षोंकी लम्बा आयु है ॥ ८० । किसी भी राजाके सामने झुकना यह मस्तक है। यहाँ जो सुख है, सो क्या अन्यत्र मिल सकता है ? हे विप्रा ! इस संसारमें मैंने जिन सुखोंका भोग किया है, सो बतला दिया ॥ ८१ ॥ अब मेरे हृदयमें किसी प्रकारका भी सुखभोग करने की वासना शेष नहीं रह गयी है। इसीलिये मैंने पूर्णरूपसे इस अवतारको धारण किया था, भूत मात्रोंके लिये अनन्त रोग जो अंश बाकी रह गये थे, उनके समत यह अवतार लिया है। जो बाल्यावस्थामें तथा भरतके साथ वनकी यात्रा की थी वह दुःख भोगनेके लिए नहीं। बल्कि दुनियाँके लोगोंको उपदेश देनेके लिए की थी। उसमें मैंने संसारके लोगोंको कौन-सा उपदेश दिया है, सो भी बतला रहा हूँ । ८२-८४ । चाहे बाक्यशय परिश्रमसाध्य हो, फिर भी पिताकी बात माननी चाहिये। यह उपदेश देनेके लिए मैंने उस समय पिताकी आज्ञाका पालन किया था ॥८५॥ क्या पिताकी बात टालनेकी सामर्थ्य मुझमे नहीं था ? था, पर लोकशिक्ष के लिये उनकी बात मान ली थी ॥८६॥ क्या उस समय दुष्टा कैकेयी तथा राज्यातिलवमे विघ्न डालने वाली पापिनी मन्थराके वध करने-का पराक्रम मुझमे नहीं था ? था, पर उनको दण्ड न देकर मैंने संसारको यह शिक्षा दी कि स्त्रीका वध कभी भी न करना चाहिए और अपनी सौतली माँको बाक,का भी उसी तरह पालन करना चाहिए, जैसे लोग अपनी सगी माताका करते हैं। दूसरे मुझे लोगोंको यह भी उपदेश देना था कि अपने सुखके लिए परायेका वध न करना चाहिए। इससे कैकेयी और मन्थराको नही मारा ॥ ८७-८९॥ अपने भाईकी हिंसान करे जोर दूसरेका राज्य न हड़पना चाहे। यह उपदेश देनहूं.क लिये मैंने परारार माँक नहीं उठारो, उन्हें नहीं मारना चाहा। पिताके स्वर्गवासी हो जानेपर भी मैंने उस राज्यको नहीं स्वीकार किया । ९० । ९१ ॥ राज्यमें आसक्त लोग सर्वथा विलासी न हो जायें, यह उपदेश देनेके लिए ही मैं वनको गया था । ९२ ॥ माता, पिता, मित्र,

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६२४आनन्दरामायणे[ सर्गः २०

सुख दुःखं समं ज्ञेयं सुखं हर्षो न मानयेत् ।
शोकः कार्यो विपत्तौ न चेति लोकान् प्रदर्शितम् ॥९४॥

राज्यभोग्यं मया त्यक्त्वा भुक्ताः क्लेशास्सदा वने।
कामक्रोधां रिपूणां च दुष्टानां हि वशो भुवि ॥९५॥

जनैः कार्यं सदा चेति ह्युपदेशं मया वने।
बहवो निहतास्तत्र राक्षसा मुनिहिंसकाः ॥९६॥

स्त्रीसङ्गः सर्वदा त्याज्यस्त्वेकाकी च तपेश्चरेत्।
नाभक्त निस्रुतिश्च हि स्त्रीषु कार्यं नरैः सदा ॥९७॥

इत्थं मयोपदिशता सीतयाऽथ तदा वने ।
वियोगो दर्शितो लोकान् मत्तो भिन्ना न जानकी ॥९८॥

कदापि जायते विप्राः सत्यं चेदं ब्रवीम्यहम् ।
आर्त्तस्य रक्षणं कार्यं कार्यो दुष्टस्य निग्रहः ॥९९॥

मयोपदिशता चेत्थं जनान्सूर्य्यसुतस्तथा।
दृप्तौ निहतौ वालिरावणावितरे हताः ॥१००॥

कीर्तिः कार्या जनेष्वत्र मयोपदिशता त्विति ।
पारमपारात्सिन्धोस्तीरे किंमात्राद्यगतेने मे ॥१०१॥

यद्यपि शुद्धं स्वे चित्ते विरुद्धं च जनेषु यत् ।
त्यक्तव्यं तत्प्रियं चापि मयोपदिशता त्विति ॥१०२॥

जनापवादात्तु सुन्द्धाऽपि लक्ष्यापि दिव्यदर्शनात् ।
लोकापवादभीत्या सा पुरा त्यक्ताऽत्र जानकी ॥१०३॥

स्वयमेवात्र यत्त्यक्तं शुद्धं ज्ञात्वा हि तत्पुनः ।
अङ्गीकार्यं जनैर्बुद्ध्या मयोपदिशता त्विति ॥१०४॥

जनापवावृता सीता पुनः स्वीकृता मया शुभा ।
एकपत्नीव्रतादानं राजकर्त्तान्यनेकधाः ॥१०५॥

अश्वमेधादियज्ञश्च सदाचारो जगद्गुरः ।
स्नानमध्याधिकं यच्चन्मयाऽत्र क्रियते सदा ॥१०६॥

तन्मवै जनशिक्षार्थं मुक्तसङ्गस्य किं मम ।
कर्मणांनन्वयं मोक्षविद्याः सदानन्दस्वरूपिणः ॥१०७॥

अहं सदानन्दमयः सुखात्मा सुखदो नृणाम्।
अवतारस्त्ववेन सुखं दुःखं मयाऽकारि ॥१०८॥

यदत्र भवतामग्रे कौतुकार्यं न संशयः ।
उत्तरोत्तरोत्तमाश्वंमवताराः स्मृतं मया ॥१०९॥


पुत्र अधिक होनेसे अधिक त्यागना न जाना चाहिए। यह स्वदेश देश हुए मैंने भरतका परित्याग कर दिया था ॥९३॥ सुख दुःख शोक समान समझना चाहिए। सुखमें न विषय हर्षित हो, न दुःखमें घबराय। यह उपदेश जनके लिए ही मैंने जानकीको छोड़कर मयूर दम्पती संप्रतीको अपनाया था। काम-क्रोध आदि दुष्ट शत्रुओंको मारना चाहिए ॥९४॥९५॥ यह उपदेश देनेके लिए ही मैंने वनमें रहकर बहुतसे मुनिहिंसक राक्षसों को मारा था। ९६। विषयमें अधिक आसक्त होना ठीक नहीं बल्कि उनका सङ्ग त्यागकर दूर रहना हुआ तपस्या करे। ९७। यह उपदेश देनेके लिए मैंने वनमें सीताको तजकर उनसे वियोग दर्शाया था। वास्तवमें सीता हमसे पृथक् कदापि नहीं हो सकतीं। ९८॥ हे ब्राह्मणो ! यह सब बात मैंने सर्वथा सत्य कहा है। मनुष्यमात्रको चाहिए कि जो दुःखी, जनका रक्षा करे और दुष्टोंको दण्ड दे ॥९९॥ सुग्रीव और विभीषणकी रक्षा करके दुष्ट बाली और रावणको मारकर संसारको मैंने यही उपदेश दिया है ॥१००॥ इस संसारमें मनुष्यको चाहिए कि वह अपना सुयशका विस्तार करे। इसलिए मैंने समुद्रके पारसे पत्थर मँगाये थे। वैसे तो क्या पाषाणको जलकर लङ्का नहीं पहुंच सकता था? ॥१०१॥ यदि कोई वस्तु अपनेको प्रिय हो किन्तु दुनियॉकी दृष्टिमें विरुद्ध हो तो उस प्रिय वस्तुका भी परित्याग कर देना चाहिए। यह नियम देनेके लिए ही मैंने सुलोभा आत्मसाक्षात् द्रष्टा तथा पवित्र जानकर भी लोक अपवादके भयवश सीताका परित्याग कर दिया था ॥१०२।१०३॥ अथवा यदि किसी पवित्र वस्तुका त्याग दे और बादमें ज्ञात हो कि वह शुद्ध है तो उसको फिरसे अङ्गीकार कर लेना चाहिये। यह उपदेश देनेके लिए ही मैंने पूर्वमें त्याग हुई सीताको फिर स्वीकार कर लिया। उसी प्रकार एकपत्नीव्रत, अनेक तरहके राजकार्य अश्वमेध यज्ञ, सदाचार, जप, तप, स्नान, संध्या आदि जितना भी काम हम करते हैं, सो सब लोगोंकी उपदेश देनेके लिए ही कर रहे हैं ॥१०४-१०६॥ वैसे तो हमारी मायाजालसे अलग सदा आनन्दस्वरूप, कर्मसे परे, सदा आनन्दमय, सुखात्मा और समस्त मनुष्योंके सुखदाता मुझ रामके लिए इन सब कृत्योंसे क्या मतलब ? ये सुख दुःख जो बताये, वे भवतारक आधारपर आप लोगोंके कौतुकके लिए कहे हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। अपने भक्तके सन्तोषार्थ विशेष-गुणसम्पन्न ये अवतार गिनाये, वास्तवमें मेरे लिए सब अवतार बराबर हैं। किन्तु अपनी बुद्धिसे भली भाँति

सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२५

सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२५

विशेषगुणवानुक्तः सन्ति सर्वे समा मम। सम्यग्युद्ध्या विचार्यात्र चरित्रैः सकलैश्वयम् ॥ १०९॥ द्वावतारौ जलचरौ तथा वनचरौ च द्वौ। द्वौ तौ च वल्कलाधारी एको वैश्यश्च गोपकः ॥ ११० । एकस्तु मलिनश्चापि परश्च क्षणिकस्तथा। एवं भूता मन्त्रिपाश्चावतारास्तोषदा न मे ॥ १११। अयं सर्वविशिष्टोऽत्र ह्युपासकजनप्रियः अवतारस्त्वहं वेद्मि सेवनान्मङ्गलप्रदः ॥११३॥ चरित्राण्यतिरम्याणि पातकान्तानि वै मया। कुर्वन्त्यस्मिन्नवतारे श्रवणान्मुक्तिदानि हि ॥११४। सदा जना भजन्त्यत्र ह्यवतारममूं मम। भक्ता येऽस्यावतारस्य ते मेऽतीव प्रियाः सदा ॥ ११५ एवं सर्वमिदं विप्रा आनन्देन मयोदितम्। दोषमारोपयन्त्यस्मिन्नवतारेऽथ ये जनाः ॥११६॥ ते मद्भवेष्या नरकेषु पतंति सह पूर्वजैः। श्रीरामदास उवाच एवमुक्त्वा रामचन्द्रः सम्पूज्य हि मुनीश्वरान् ॥११७। विसृज्य सकलान्सीतां रंजयामास राघवः। एवं शिष्य मया प्रोक्तमवतारप्रवर्णनम् ॥११८ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकांडे उत्तरार्धे अवतारवर्णनं नाम विंशः सर्गः ॥ २० ।


एकविंशः सर्गः

( रामका अपने दासको वरदान देते हुए दो रूप धारण करना )

श्रीरामदास उवाच

एकदा जानकीं द्रष्टुं सप्तद्वीपांतरस्त्रियः। मुनीनां पार्थिवानां च सुहृदां व्यवसायिनाम् ॥ १ ॥ सामान्यक्षत्रियाणां च वैश्यानां च सहस्रशः। चैत्रस्नानमिषेणैव ह्युद्यद्वाहनसंस्थिताः ॥ २ ॥ दृष्ट्वा समागतास्ताश्च जानकी गजगामिनी। प्रत्युद्गम्यानयामास स्वान्तागारमतिसादरात् ॥ ३ ॥

विचार करके मैं इस निश्चयपर पहुंचा हूं कि समस्त अवतारोंमें यह रामावतार सर्वश्रेष्ठ है । १०७-११० ॥ दो अवतार जलचर हुएके, दो वनचर, दो वल्कलधारी, एक वैश्यवर्णका गायहरू, एक मलिनवंश-वाला और एक क्षणिक ये भूत तथा भविष्यके सारे अवत र मर मनक नहा हैं—इनम मैं प्रसन्न नहीं हूँ ॥१११॥ ॥ ११२ ॥ मै जहांनक जानता हूं, समस्त अवतार म उपासक जनांका प्रिय तथ सेननम मङ्गलप्रद यहा रामावतार है ॥ ११३ ॥ इस अवतारम मॅन जितने कम किय हे व सब अतिशय रम्य, पातकोंका नष्ट करनवाल तथा सुननेस मुक्ति देनवाले हैं ॥ ११४ ॥ अताहा चाहिये कि मर इसा अवत रका भजन कर जो लोग इसकी उपासना करते हैं, वे मुझे सदासे अत्यन्त प्रिय हैं ॥ ११५ ॥ हे विप्रो ! यह सब रहस्य मँन आनन्दक साथ आप लोगोंको सुनाया। जो लोग मेरे इस अवतारम भी दोषारोप करत है, व मेर शत्रु हन्कर अपन पूवर्जाक साथ नरकमें गिरत हैं ॥ ११६ ॥ श्रीरामदास कहत है—इस प्रक रका बात करक रामन उन मुनिपांका पूजन किया और सबको विदाई दी । ११७ ॥ तत्पश्चात् साताको प्रसन्न करनवाली बात करन लग । ह शिष्य ! मैने इस तरह तुम्हारे समक्ष सभी अवतारोंका वणन किया । ११८ । इति श्रीमदानन्दरामायण वाल्मीकीये पं० रामतेज-पाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते राज्यकाण्ड उत्तरार्द्धे अवतारवर्णन नाम विंशः सर्गः । २० ॥

श्रीरामदास कहन लगे-एक बार सीताको देखनके लिये साता द्वीपांका स्त्रियां जिनम मुनियांकी, राजाओं-की, मित्रोंकी, व्यवसायियोंकी ॥ १ ॥ साधारण श्रणके क्षत्रियोंकी तथा वैश्योंका हजारोका संख्यामे नारियां चैत्रस्नानके व्याजसे अनेक प्रकारके वाहनोपर सवार होकर अयोध्यामे आयीं ॥ २ ॥ उन्हें आती देखकर गजके समान मन्दगतिसे चलनेवाली सीता शीघ्र उनके आगे पहुंचीं और आदरके साथ अपनी रंगशालामें ले गयीं ॥३॥

५२६ आनन्दरामायणे [ सर्गः २१


पूजयामास ताः सर्वा नानालङ्कारभूषणैः । ताः सर्वाः पूजयामासुः सीतां सिंहासनस्थिताम् ॥ ४ ॥
दिक्पालकारवस्त्राद्यैर्नानादेशोद्भवैर्वरैः । परिवार्थ ततः सीतां तस्थुः सर्वाः स्त्रियश्च ताः । ५ ॥
श्रुत्वा सीतामुखाद् रामचरित्राणि महत्तरः । तास्तुष्टाः श्रोतुमुद्युक्तास्तत्पाणिग्रहणं शुभम् ॥ ६ ॥
स्मितास्यास्ताः स्त्रियः सर्वास्तदा प्रोचुर्विदेहजाम् स्वत्पाणिग्रहणोत्साहं श्रोतु मिच्छामहे वयम् ॥ ७ ॥
तत्सर्वं विस्तरेणाद्य ब्रूमहेहि जानकि । इतितासां वचः श्रुत्वा लज्जया जानकी तदा ॥ ८ ॥
स्वां सखीं नोदयामास तुलसीं रुक्मभूषिताम् ।

तुलस्युवाच

शृणुध्वं सकला नार्यः पाणिग्रहणमुत्तमम् । ९ ॥
जानक्याः कथयिष्याद्य महामङ्गलदायकम् । वक्ष्योपाद्यं हि संक्षेपाच्छ्रवणाम्पुण्यवर्धनम् । १०॥
साकेताद्रघुनन्दनेन स मुनिर्भ्रात्रा युतेनाश्रमं स्वं गत्वा विनिहत्य राक्षसबलं तेनैव यज्ञं निजम्
संपाद्याथ रथस्थितश्च मिथिलामार्गे हरेरङ्घ्रिभिः संस्पर्शाद्वनकल्मषां समकरोद्भार्यां मुनेर्गाधिजः । ११ ।
गत्वा गाधिजसंयुतश्च मिथिलां भ्रात्रा समागत्यश्चापाधः पतितं निरीक्ष्य च रिपु स्तोपं मुनेराज्ञया ।
तं नत्वा गिरिजेश्वरस्य च धनुः कृत्वा त्रिखण्डं क्षणांन्माताहस्त विसर्जितां निजगले मालां दधौ राघवः १२
बन्धूनां च निजं विधाय मिथिलापुर्यां विवाहान् शुभान् पितृभ्यां सह भार्यया रघुपती राज्ञाऽतिसंपूजितः
त्यक्त्वा तां मिथिलां ययौ निजपुरीं मार्गे क्रुधा निर्गतो दुर्दर्पं जमदग्निजस्य धनुषा मोपाहरल्लीलया १३॥
एवं नार्यश्च सीताया विवाहः कथितो मया । युष्माभिः कौतुकात्पृष्टो यः सर्वमङ्गलप्रदः ।।१४।।

श्रीरामदास उवाच

एवं स्त्रियम ताः श्रुत्वा परमां मुदमाप्नुयुः । ततस्ताः पूजयामासुः पुनः सीतां मुदान्विताः ॥१५।


सीताने अनेक तरहके भूषणोंसे उनकी पूजा की और उन स्त्रियाने भी सिंहासनपर बिठाकर दिव्य अलङ्काराम सीताका पूजन किया। इसके अनन्तर वे सब सीताका चारा ओरस घेरकर बैठ गयीं । ४ । ५ ॥ सीताके मुखसे रामके महत्ता चरित्र सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुई और उन्हान साताक मुखस ही सीताका विवाहसम्बन्धी वृत्तान्त सुननेकी इच्छा प्रकट की । ६ । वे मुस्कुराता हुई सातास कहने लगीं कि हम आपके विवाह-समारोहका वृत्तान्त सुनना चाहती हैं । ७ । हे सानि ! वह सारा हाल विस्तारपूर्वक हमको सुनाइए। इस प्रकार उनका प्रश्न सुनकर सीता लज्जायश कुछ नही बोली और अपना सहेली तुलसीको जो कि सुवर्णमय आभूषण पहने बैठी थी, संकेत किया और तुलसी कहन लगा — आप लोग साताक मङ्गलमय विवाहका वृत्तान्त सुनै ॥ ८ ॥ ९ । आप लोगांका प्रसन्न करनक लिए उस महामङ्गलदायी और सुननेसे पुण्य बढ़ाने-वाले विवाहका में संक्षेपमे वर्णन करना हूँ ॥ १० ॥ अयोध्यापुरास विश्वामित्र राम और लक्ष्मणको साथ लिये हुए अपने आश्रम पहुँचे। वहाँ राम लक्ष्मणस राक्षसाका प्रवल सेनाका संहार किया और मुनि विश्वामित्रके यज्ञ कर लेनेके बाद रथपर बैठकर मुनिके साथ दोनों भाई मिथिलाकी ओर चले । रास्तेमे विश्वामित्रने रामके चरणोंका स्पर्श कराकर गौतम ऋषिक पत्नी अहल्याको शापसे मुक्त कराया ॥ ११ ॥ फिर मुनिके साथ जनकपुर पहुँचे । स्वयंवरके समय रामने सभाम मुनि विश्वामित्रका आज्ञासे शिवके धनुषको प्रणाम किया और क्षण भरमें उसे तोड़कर तीन टुकड़े कर डाले । फिर सीताके हाथोकी वरमालाको रामने अपने गलेमें धारण किया ॥ १२ ॥ इसके अनन्तर रामन मिथिलापुरीमे ही अपना और अपने सब भाइयोंका विवाह किया। फिर पत्नी, पिता, माता आदिके साथ जनकसे पूजित होकर राम मिथिलासे अयोध्याको चले। रास्तेमें क्रोधी परशुराम मिले और उनके वैष्णव धनुषको चढ़ाकर रामने उनके दुर्दर्पको दूर कर दिया ॥ १३ ॥ हे नारियो ! तुमने कौतुक वश सीताके जिस सर्वमङ्गलप्रद विवाह-वृत्तान्तको पूछा था, सो मैंने कह सुनाया ॥ १४ ॥ श्रीरामदास कहते है कि इस प्रकार सीताके विवाहका वर्णन सुनकर वे स्त्रियां बहुत

सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२७

सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५२७


सीतया पूजिताः सर्वास्तां नत्वामन्त्र्य जानकीम्। पंचस्नान मथाप्याय जग्मुः स्वं स्वं स्थलं प्रति ॥१६॥ अथैकदा गुरोरास्याद्भावाग्रे संस्थितो लवः। शृण्वन्पुराणं पप्रच्छ श्रोतॄ सर्वान् ज्ञानान्गुरूम् ॥१७॥ शृण्वे ते प्रष्टुमिच्छामि तन्मे वद मुनीश्वर । पुस्तकेषु च सर्वत्र पत्रे पत्रे पृथक् पृथक् ॥१८॥ एकत्र लिख्यते श्रीति रामेत्येकत्र लिख्यते । किमर्थं धारवैन्तन्मे कथयस्व माम् ॥१९॥ इति तद्वचनं श्रुत्वा गुरुस्तं वाक्यमब्रवीत् । वसिष्ठ उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स लोकसंदेहहन्परम् । २०॥ श्रीरामचरितं पूर्वं व्यासेन मुनिना पृथक् । अष्टादश पुराणानि तथोपपुराणानि च ॥२१॥ कृतान्यन्यैश्च मुनिभिः षट्शास्त्रादीन्यनेकशः । श्रीरामचरितादेव श्लोकमात्रमपीह यत् ॥२२॥ सर्वमस्तीति दृष्ट्वैवमुभयोरेकत्र श्रीति च । विनिश्चयैकत्र रामेति तन्मध्येषु परिलिख्यते ॥२३॥ अनया संज्ञया सर्वे ज्ञास्यन्त्यग्रे जना भुवि । श्रीराम मध्ये लिखितं श्रीरामचरितादिदम् ॥२४॥ कृतमस्ति पृथक् भिन्नं पुरा व्यासादिभिस्त्विति । एतत्सन्कामनाद्वाल सूचनार्थं विलिख्यते ॥२५॥ श्रीरामेति पृथक् पत्रे सर्वत्र जगतीतले । अन्यच्च कारणं वच्मि तच्छृणुष्व प्रियो लव ॥२६॥ अशुद्धं लिखितं पश्चादज्ञानतो भ्रान्तिशोऽपि हि । पत्र तच्चाप्यतिशुद्धं हि भवत्विति मनीषिणा ॥२७॥ श्रीरामेति च सर्वत्र पत्रे पत्रे विलिख्यते । यदङ्कितं श्रीरामेति नाम्ना पत्रं तु लेखकैः ॥२८॥ ज्ञेयं तच्चाति शुद्धं हि गतदोषस्तु लेखकः । सर्वत्र्यत्र जगत्त्यां हि सत्यं लव वदाम्यहम् ॥२९॥ इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं वसिष्ठं प्रणिपत्य च । लवः स गतसन्देहस्तूष्णीमासीन्मुदान्वितः ॥३०॥ एकदा रघुनाथस्तु मंचकोपरि संस्थितः । मुखात्ताम्बूलस्य रक्तं प्रथमे दोषकारकम् ॥३१॥ त्यक्तुकामो न ददर्श पात्रं निष्ठीवनस्य सः । तस्यांतिके स्थिता दासी नाम्ना वै सुगुणेति च ॥३२॥


प्रसन्न हुईं और उन्होंने फिरस सीताका पूजन किया ॥ १५ ॥ साताने भी फिर उनका पूजन किया और वे सीताको प्रणाम करके और उनसे आज्ञा लेकर पंचस्नान समाप्त हो जानेपर अपने-अपने घर चली गयीं ॥ १६ ॥ इसके बाद एक दिन गुरु वसिष्ठ बड़े पुराणोंकी कथा सुना रहे थे। रामचन्द्रजी और लव भी बैठे हुए थे । कथा सुनते-सुनते लवने सब बातोंको ज्ञान प्राप्त करनेके लिए वसिष्ठसे कहा—॥ १७ ॥ हे गुरो ! मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ, सो बताइए । प्रायः ऐसा देखा जाता है कि सब पुस्तकोके पन्ने-पन्नेमें एक ओर 'श्री' और दूसरी ओर 'राम' ऐसा लिखा जाता है। लोग ऐसा क्यों करते हैं? यह कृपया हमें बता दीजिये ॥ १८ ॥ १९ ॥ इस प्रकार लवका प्रश्न सुनकर वसिष्ठने कहा—हे वत्स तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है। इससे बहुतोंका सन्देह दूर हो जायगा ॥ २० ॥ पहले व्यास मुनिने श्रीरामचन्द्रके चरित्रात्मक अट्ठारह पुराण और अट्ठारह ही उपपुराण बनाये ॥ २१ ॥ उसी तरह और-और ऋषियोंने षट्शास्त्र आदि बनाकर तैयार किये । सब ग्रंथोंके सभी श्लोक श्रीरामचरित्स बने हैं। इसी बातको बतलानेके लिए प्रत्येक पन्नेमें 'श्री' लिखकर 'राम' लिखा जाता है ॥ २२ ॥ २३ ॥ इस संकेतसे संसारके मनुष्य पुस्तक देखकर यह समझेंगे कि ये सब ग्रंथ श्रीरामचरितके अन्तर्गत हैं, हे वत्स ! श्रीराम लिखनेका एक कारण यह है, जो बता चुका । दूसरा भी बतलाता हूँ—हे लव ! सो भी सुन लो ॥ २४-२६ ॥ अज्ञानतासे वा भ्रमवश ग्रन्थमें जो कोई शब्द अशुद्ध लिखा गया हो, वह पन्ना अत्यन्त शुद्ध हो जाय । इस विचारसे भी पन्नेमें लेखकगण श्रीराम लिखते हैं ॥ २७ ॥ २८ ॥ ऐसा करनेसे अशुद्ध भी शुद्ध हो जाता है और लेखकको कोई दोष नहीं लगता। हे लव ! मैं तुमको यह सब सच्ची बातें बतला रहा हूँ ॥ २९ ॥ इस प्रकार समाधान सुनकर लवका सन्देह निवृत्त हो गया और वे चुपचाप बैठ गये ॥ ३० ॥ एक बार राम मंचपर बैठे थे । मुखमें ताम्बूल था । ताम्बूलका प्रथम रस दोषकारक होता है, इस ख्यालसे उन्होंने थूकना चाहा । किन्तु निष्ठीवनपात्र (पीकदान) नहीं दिखायी पड़ा । रामके पास ही खड़ी सुगुणा नामकी दासी रामकी इच्छा

५२८ आनन्दरामायणे [सर्गः २१

तादृशं राममालोक्यं पात्रं दूरं विलोक्य च । कृत्वा पात्रं स्वहस्ताभ्यामंजलावथ तद्ग्रसम् ॥३३॥ रामेण मुक्तमास्याच्च जग्राह वेगतोभृशं । ततः सा प्राशनं रामोच्छिष्टं दासी चकार तत् ॥३४॥ महाप्रसादं तं मत्वा देवालब्धं विचिन्त्य च । तदाऽतितुष्टः श्रीरामस्तस्यै तत्कर्मणाऽब्रवीत् ॥३५॥ वरयस्व वरं दासि यत्ते मनसि वर्तते तद्रामवचनं श्रुत्वा दासी प्राह रघूत्तमम् ॥३६॥ एकपत्नीव्रतं तेऽस्ति सांप्रतं विह जन्मनि जन्मांतरे त्वया संगं वाञ्छामि रघुनायक ॥३७॥ तत्तस्या वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् । यदाऽग्रे कृष्णरूपेण गोकुलेऽवतराण्यहम् ॥३८॥ तदा राधेति नाम्नी त्वं गोपिकासु भविष्यसि । तदा मया चिरं क्रीडां त्वं भोक्ष्यसि न संशयः ॥३९॥ सदा ममातिप्रीता त्वं गोपिकासु भविष्यसि । इति दासी रामचन्द्राद्वरं लब्ध्वा तुतोष सा ॥४०॥ अन्यच्छृणु विष्णुदास रामचन्द्रकथानकम् । सम्प्रोच्यते मया तेऽग्रे महत्कौतुककारकम् ॥४१॥ एकदा राघवः श्रीमान्त्सभायामासनोपरि । मन्त्रिभिर्बन्धुभिः पुत्रैर्मन्त्रिभिः पूज्यसंनिधौ ॥४२॥ एतस्मिन्नन्तरे कश्चिद्ब्रह्मचारी समाययौ युवा दण्डधरः श्रेष्ठः कमंडलुकरः शुचिः ॥४३॥ ऐणकृष्णाजिनधरः काषायवसनो व्रती तं दृष्ट्वा राघवः श्रीमानुत्थाय वरासनात् ॥४४॥ प्रत्युद्गम्याथ तं नत्वाऽऽसने समुपवेश्य च । पूजयामास विधिना धेनुमग्रे निवेद्य च ॥४५॥ ततः सम्पूजितं विप्रं राघवो वाक्यमब्रवीत् । अद्य धन्योऽस्म्यहं विप्र यत्ते दर्शनं मम ॥४६॥ कार्यमाज्ञाप्यतां किंचिद्यदर्थं भवनाऽऽगतम् । तद्राघववचः श्रुत्वा ब्रह्मचारी वचोऽब्रवीत् ॥४७॥ वाल्मीकिना प्रेषितोऽहं यस्त्वात्तच्छृणु राघव । चिकीर्षामी महायज्ञं स वाल्मीकिर्महामुनिः ॥४८॥ त्वामाकारयितुं मां स्वानिकटे वरात्मजम् । प्रेषितवानतस्त्वं हि सीतया बन्धुभिः सह ॥४९॥ प्रस्थानं कुरु राजेन्द्र मुहूर्तस्त्वद्य वर्तते । एवं वदति श्रीरामं भूसुरे सदसि स्थिते ॥५०॥


समक्ष गयी, किन्तु पात्र दूर था। इसलिए ग्रासको रोकनेके लिए उसने अपनी अञ्जली फैला दी ॥ ३१-३३॥ रामने भा वह ग्रास उसके हाथम फेंक दिया। दासी उसको लेकर तुरन्त खा गयी। उसने मनम सोचा कि यह महाप्रसाद है और भगवन्न आज मुझे मिल गया है। उसके इस व्यवहारसे राम बडे प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा - ॥ ३४। ३५ ॥ अरी दासी तेरा जो इच्छा हो, वह वर मांग ले। रामकी बात सुनकर उसने कहा - इस समय आप एकपत्नीव्रती हैं। इसलिए हे रघुनायक मैं दूसरे जन्मस आपके साथ एकान्त सहवास करना चाहती हूँ। ३६ । ३७॥ उसकी यह बात सुनकर रामने कहा कि अगले जन्मम मैं कृष्णरूपस गोकुलम अवतार लूँगा, तब तुम राधा नामस विख्यात एक गोपपत्नी होओगी। उस समय बहुत दिना तक तुम मेरे साथ क्रीडाका सुख भोगोगी, इसम कोई संशय नहीं है ॥ ३८। ३९ । सूतका सारा गोपियम तुम मुझे भत्रमे प्रिय होओगी। दासी इस तरह रामचन्द्रजीसे वरदान पाकर प्रसन्न हो गया । ४० । हे विष्णुदास रामचन्द्रजीकी एक दूसरी कथा भी मैं तुम्हारे आगे कह रहा हूँ, वह बड़ा कौतुकजनक है। ४१ ॥ एक समय राम भगवान सिंहासनपर भाइयों, पुत्रों तथा मन्त्रियोंके साथ बैठे थे ॥ ४२ ॥ उसो समय एक युवा ब्रह्मचारी दण्ड धारण किये और हाथमें कमण्डलु तथा पवित्र मृगछाला लिये और काषाय वस्त्र धारण किये वहाँ आ पहुंचा। उसे देखते ही श्रीमान् रामचन्द्रजी आसनसे उठ खड़े हुए। थोड़ा आगे बढ़कर उसे प्रणाम किया और एक अच्छे आसनपर बिठलाया। फिर गोदान देकर उन्होंने उसका पूजा का । ४३-४५ ॥ पूजन कर लेनेके पश्चात् रामने कहा-हे विप्र ! आज आपके दर्शन- से मैं अपनेको धन्य समझता हूँ ॥ ४६ । अच्छा, अब आप मुझे वह आज्ञा दीजिए कि जिसके लिए आप यहाँ आये हों। रामकी यह बात सुनकर ब्रह्मचारी कहने लगा । ४७ । श्रीवाल्मीकिजीने मुझे आपके पास भेजा है। वे एक महायज्ञ करना चाहते हैं। इसीलिए आपको बुलानेके लिए मुझे भेजा है। हे राजेन्द्र ! आज बड़ा अच्छा मुहूर्त है। अतएव सीता तथा अपने भ्राताओंके साथ आप शीघ्र प्रस्थान कर दीजिए। इस प्रकार वह

सर्गः २१] गद्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५२९

समाययौ ब्रह्मचारी द्वितीयो गाधिजाश्रमात् ।
तं दृष्ट्वा पूर्ववद्रामः प्रत्युद्गम्य द्विजोत्तमम् ॥५१॥
आसनेऽन्ये चोपवेश्य पूजयामास सादरम् ।
ततस्तत्पुरतः स्थित्वा स प्रचच्छ रघूत्तमः ॥५२॥
यदर्थं श्रामितोऽसि त्वं तन्ममाज्ञापयन् इतः ।
तद्राघववचः श्रुत्वा ब्रह्मचारी बभाषिवान् ५३।
राम त्वां गाधिजेनार्त्तं प्रेषणाऽस्मि जवेन हि ।
यत्कर्त्तारौ महायज्ञं विश्वामित्रोऽस्ति राघव । ५४ ।
त्वं तेनाकारितश्चासि प्रस्थानं कुरु सत्वरम् ।
ब्रह्मचारिणोस्तद्वाक्यमृषयोः स रघूत्तमः । ५५।
श्रुत्वा विहस्य प्रोवाच द्विताभ्यां वै तथेति च
तदाश्चर्यं जनाः प्रापुः शृण्वन्ते नु परस्परम् ५६।
कथंमयोमयोः सक्तं रामो गच्छति सत्वरौः ।
केचिदूचु गघवाय किमशक्य तथाऽत्र हि । ५७।
यथा स्त्रीणां वने पूर्वं यथाऽस्माकं हि दर्शनम् ।
यथा गतोऽस्ति लङ्कायाः पुनः भरतदर्शने ॥५८
भिन्नरूपेण रामेण सर्वेषामर्पितं पृथक् ।
तद्वदत्रापि द्विविधा भूत्वा गन्ता न तन्मयी । ५९।
किमाश्चर्यमिदं चाद्य किमशक्यं परात्मनि ।
एवं वदत्सु पौरेषु लक्ष्मणं प्राह राघवः । ६०॥
अद्यैवाहं गमिष्यामि मे जनान्तं च बहिः ।
वासो गेहानि नेयानि बहिः सेनां प्रबोधय ॥६१।
आज्ञापनीयं वाद्यानां ध्वनिं कर्तुं हे सेवकान् ।
तद्राघववच श्रुत्वा तथेत्युक्तवां स लक्ष्मणः ॥६२॥
कारयामास वाद्यानां ध्वनिं तूर्णं भृशमान् ।
सँश्च प्रचोदयामास वहिर्वासोगृहाण्यपि ॥६३।
नेतुमाज्ञापयामासुर्देतास्ते निन्युरादरात् ।
ततो रामोऽपि विप्राभ्यां गृहं गत्वा विदेहजाम् ॥६४॥
सर्वं वृत्तं निवेद्याशु कृत्वा विप्रैर्हि भोजनम् ।
सीतां च करिणीपृष्ठे बंधूनाऽऽरोहयन् प्रभुः ॥६५॥
पुष्पके पौरनारीश्च करिण्युर्मिलादिकाः ।
समारोप्य-तुरागमः स्वयं तस्यां गजोपरि । ६६॥
लक्ष्मणाद्या गजेष्वेव ते समारुरुहुस्तदा ।
निनेदुश्चाथ वाद्यानि ननृतुर्नार्योऽपिचः ॥६७॥


ब्राह्मण कह ही रहा था कि इतनेमें एक दूसरा ब्रह्मचारी विश्वामित्रके आश्रमसे आ पहुँचा । पहलेकी तरह रामने उसका भी स्वागत किया । ४८-५१॥ उस एक दूसरे आसनपर बिठाकर श्रीयुत उसको भी उसी तरह पूजा की । इसके अनन्तर उसके भी आगे बैठकर उन्होंने कहा कि जिस कामके लिए आपने कष्ट किया हो, मुझे आज्ञा दीजिए। रामकी बात सुनकर ब्रह्मचारीने कहा -॥ ५२ ॥ ५३ ॥ हे राम ! मुझे विश्वामित्र-जीने आपके पास भेजा है। वे एक महायज्ञ करना चाहते हैं। उसमें उन्होंने आपको बुलाया है, इसलिए आप शीघ्र प्रस्थान कीजिए। रघूत्तम राम उन दोनों ब्रह्मचारियोंके सन्देश सुनकर मुस्कराए ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ उन दोनोंसे कहा - अच्छा चलेंगे'। इस बातको सुनकर सभाके लोगोंको बड़ा विस्मय हुआ। वे परस्पर कहने लगे--॥ ५६ ॥ राम इन दोनोंके साथ जाकर कैसे उन दोनों यज्ञोंमें सम्मिलित हो सकेंगे। किसीने कहा कि रामके लिए असम्भव कौन सा काम है, वे क्या नहीं कर सकते ? ॥ ५७॥ जैसे वनमें उन्होंने उन हजारों स्त्रियोंको हजारों रूपोंमें दर्शन दिया था। जिस प्रकार लंकासे लौटकर आनेपर भरत-मिलापके समय प्रत्येक मनुष्यसे मिले थे ॥ ५८ ॥ उसी तरह इस समय भी राम अपना दो रूप बनाकर दोनों जगह चले जायेंगे ॥ ५९ ॥ इसमें आश्चर्य करनेकी बात ही कौन-सी है, जिनका आत्मा इतने ऊँचे दर्जेपर पहुँच गयी है और जो साक्षात् परमात्मा है, उनके लिए असम्भव कोई काम नहीं है। इस तरह लोग आपसमें बातचीत कर रहे थे, तभी रामने लक्ष्मणसे कहा-॥ ६० ॥ लक्ष्मण ! आज ही भोजन करनेके पश्चात् हमलोग बाहर चलेंगे तम्बू कनात आदि भेजवा दो और सेना भी तैयार करवाओ ॥ ६१ ॥ वाद्य बजानेके लिए सेवकोंको आज्ञा दे दो। रामकी आज्ञा सुनकर लक्ष्मणने "एवमस्तु" कहा । ६२ । तत्काल उन्होंने तूर्योको सुदुरी बजानेकी आज्ञा दी। लक्ष्मणके आज्ञानुसार सेवक सब सामान ठीक करने लगे। इसके अनन्तर राम उन दोनों ब्रह्मचारियोंके साथ सीताके महलोंमें गये ॥६३॥ ६४॥ जानकीजी को भी निमन्त्रणका समाचार सुनाया और दोनों ब्राह्मणोंके साथ भोजन किया। फिर बन्धुओंके साथ सीताको हाथीपर सवार कराया। बाकी पुरवासिनी नारियोंको पुष्पक विमानपर एवं ऊर्मिलादिको हाथीपर बिठाया। उन सबको सवारियोंपर बिठाकर स्वयं भी एक हाथीपर सवार हुए और लक्ष्मणादि भी हाथीपर बैठे, इस समय विविध प्रकारके बाजे बजने लगे और

५३०आनन्दरामायणे[ सर्गः २१

तुष्टुवुर्मार्गगाद्याश्च प्रजगुः सुस्वरं नटाः । एवं प्रशंस्यो रामस्तदा नामोद्ग्राह्याणि सः ॥ ६८ ॥
तां रात्रिं समतिक्रम्य प्रभाते रविनन्दनः । स्नात्वा नित्यक्रियां कृत्वा गजारूढोऽभवत्पुनः ॥ ६९ ॥
क्रोशद्वयं गतो गत्वाऽग्रे द्वौ मार्गौ निरीक्ष्य च । चक्रे वै द्वे निजे देहे चकार रघुनन्दनः ॥ ७० ॥
सदा द्वयोर्मार्गयोश्च गच्छन्तौ सीतया सह । पुत्राद्यैर्बन्धुभिर्युक्तौ द्वौ रामौ सकला जनाः ॥ ७१ ॥
ददृशुः पुष्पकं द्वे च द्वौ जातौ ब्रह्मचारिणौ । मन्त्री विप्रश्चैकः स स्वं गृहं ययौ ॥ ७२ ॥
विश्वामित्राश्रमं चान्यः श्रीरामेण युतः मुदा । वाल्मीकेश्चाश्रितश्चैकः स स्वं गृहं ययौ ॥ ७३ ॥
वाल्मीकेश्छात्र चान्यः श्रीरामेण युतः मुदा । एवं तौ राघवौ तत्र सर्वद्रव्यैर्युतावुभौ ॥ ७४ ॥
द्विजान्वि ददृशुस्तत्र गच्छन्तौ राघवावुभौ । तयोर्मार्गे हि तयोर्मुन्न्योस्तदाश्रमे ॥ ७५ ॥
ससैन्यौ सीतया युक्तौ बन्धुपुत्रवधूर्जनैः । सम्पूज्य मुनिभिर्हृष्टैः प्रत्युत्थानादिपूजितौ ॥ ७६ ॥
तयोर्यागं विधायाथ परितुष्टौ पुनः पुनः । समाजग्मुः श्रीरामौ ससैन्यौ पूर्ववन्मुदा ॥ ७७ ॥
यत्र द्वे निजदेहे वै कृते तत्र रघूत्तमो । समागत्य पुनश्चैकं निजदेहं चकार सः ॥ ७८ ॥
वाल्मीकीयो ब्रह्मचारी विश्वामित्राङ्घ्रिसम्भवः । भिन्नदेहे स्वैकरूपं भजतस्स्म तदा द्विजौ ॥ ७९ ॥
ससैन्यं पुष्पकं चापि बभूवैकं तु पूर्ववत् । ततः श्रीरामचन्द्रश्च विवेश नगरीं निजाम् ॥ ८० ॥
तदा निनेदुर्वादित्राणि ननृतुर्वारयोषितः । पौरनार्यो विमानस्था ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥ ८१ ॥
तुष्टुवुर्मार्गगाद्याश्च प्रजगन्तं भटादयः । एवं नानाकौतुकानि पश्यन्मार्गे शनैः शनैः ॥ ८२ ॥
ययौ निजगृहं रामः सभायां संविवेश ह । सीताऽपि निजगेहं मा प्रविवेशोर्मिलादिभिः ॥ ८३ ॥
एवं भूरूप रामेण कौतुकानि महान्ति च । अमानुषाणि यान्यत्र कृतानि च सहस्रशः ॥ ८४ ॥
वाल्मीकिना विस्तरेण वर्णितानि हि कृत्स्नशः । सारं सारं मया तेभ्यः संगृह्याद्य कथानकम् ॥ ८५ ॥

वेश्यायें नाचने लगीं ॥ ६५-६७ ॥ बन्दीजन रामकी विरुदावली सुनने तथा नटगण मीठे-मीठे स्वरोंमें गाने लगे । इस प्रकार अपने रामभवनमें प्रस्थान करके राम रास्तेमें बने हुए डेरेपर पहुंचे ॥ ६८ ॥ वह रात्रि रामने वहीं बितायी । सवेरे उठे तो स्नानादि नित्यक्रिया को और फिर हाथीपर बैठकर चल दिये ॥ ६९ ॥ दो कोस आगे जानकर जहांसे विश्वामित्र तथा बाल्मीकिके आश्रमके रास्ते अलग होते थे, वहांसे उन्होंने सेना समेत आत्मा दो स्वरूप बना लिया ॥ ७० ॥ उस समय दोनों रास्तेमें राम सेना, सीता तथा पुत्रवधू आदिये युक्त होकर चले। उस समय जितने भी मनुष्य गाय थे, वे सब रामने दो दिखायी दिये ॥ ७१ । पुष्पक विमान भी दो हो गया और दोनों ब्रह्मचारियोंमेंसे एक रामको विश्वामित्रके आश्रमकी ओर ले चला, दूसरा बाल्मीकिके आश्रमको ॥ ७२ । ७३ । उस समय मनुष्यसे लेकर सांपके कुले तक दो-दो होकर दिखाई दे रहे थे। वे लोग उन दो शरीरोंको सब देखकर बड़े विस्मित हुए ॥ ७४ ॥ इस प्रकार वे दोनों राम अपनी-अपनी सेना, सीता और बन्धुओंके साथ दोनों आश्रमोंको चले । जब कि आश्रमपर पहुंचे तो दोनों ऋषियोंने अगवानी करके उनकी पूजा की ॥ ७५ ॥ इस प्रकार पहुंच-पहुंचकर उन दोनोंका यज्ञ समाप्त हो जानेपर फिर वे दोनो राम पहलेकी तरह अयोध्याको लौटे । ७६ ॥ ७७ ॥ जाते समय जिस स्थानपर रामने अपना दो रूप बनाया था, वहां पहुंचकर फिर एक हो गये । विश्वामित्रका ब्रह्मचारी तथा बाल्मीकिका ब्राह्मण ये दोनों भी एक ही एक हो गये । ७८ । ७९ । उसी तरह पुष्पकविमान और सेना भी एक हो गयी। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी आनन्दपूर्वक अपनी अयोध्या नगरमें प्रविष्ट हुए ॥ ८० ॥ उस समय भी नाना प्रकारके बाजे बजे और वेश्यायें नाचीं । पुरवासियोंने नारियल द्वारा विमानसे रातभर फूलोंकी वर्षा की, बन्दीजनोंने स्तुति की और गानेवालोंने अच्छे-अच्छे राग गाये । इस प्रकार रास्तेमें तरह-तरहके कौतुक देखते हुए धीरे-धीरे ॥ ८१ ॥ ८२ । वे अपने भवनमें गये और प्रणाम परचकर राजसिंहासनपर बैठे । सीता उर्मिला आदिके साथ महलके भीतर गयीं ॥ ८३ ॥ हे शौनक ! रामने संसारमें एकान्तके जिन महान् और अलौकिक कामोंको किया था, उनको बाल्मीकिने विस्तृत वर्णन किया है और मैंने तो उसमेंसे सारभागमात्र लेकर सब कथा सुनायी

सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५३१

सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५३१

तवाग्रे कथ्यते शिष्य सङ्क्षेपेणाद्यया प्रभोः । न शक्तोऽहं यदर्थं च रामेणाज्ञापितस्त्वरम् ॥८६॥ वक्तुं स्वचरितं पुण्यं रम्यमानन्ददायकम् । वाल्मीकिश्चरितं रम्यं आवयोः संवादमात्रयोः ॥८७॥ यः पूर्वं विरचितवान् स्वीयकालेऽत्र भूतवत् । यथा रामस्य चरितं पूर्वं रामावतारतः ॥८८॥ एवं संवर्णितं कृत्स्नं गोप्यं यच्च कृतं रहः । न वाल्मीकिप्रभः कश्चित्केवलो भविष्यति ॥८९॥ इति श्रीमत्कोटीरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डेऽत्तराधे रामोत्तरज्ञानं तथा रामादीनां वंद्यकरणं नामैकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥


द्वाविंशः सर्गः

(सीता द्वारा टूटा तुलसीपत्र पुनः डालमें जोड़ना)

श्रीरामदास उवाच

इदानीं रामचन्द्रस्य लीलाकौतूहलावहाम् । अन्यद्रम्यं कथ्यते हि मया तच्छृणु सादरम् ॥ १ ॥ एकदा राघवस्तस्थौ सभाशालायां चोपरि । बन्धुभिर्मन्त्रिभिश्चैव पौरैर्जानपदैः सह ॥ २ ॥ पुत्राभ्यां च सुहृद्भिश्च मित्रैर्मन्त्रिजनेः सह । एतस्मिन्नन्तरे भूरिकीर्त्तिना सुहृदा चरैः ॥ ३ ॥ द्राक्षाफलादिभिः पूर्णास्तथा पुष्पैः सुतूलिताः । करण्डिकाः प्रेषिताश्च रम्यार्थे मन्त्रतः ॥ ४ ॥ ताः सर्वा राघवो दृष्ट्वा प्रेषयामास चान्तिके । युक्ता यामविना सीता क्रीडाभवनसंस्थिता मुदा ॥ ५ ॥ दृष्ट्वा करण्डिकाः सन्ति चेत्यभूत्कुतूहला । ततो रामोपलभ्यन्तं दृष्ट्वा पद्मं हि जानकी ॥ ६ ॥ करेणादाय पद्मं च राघवायानर्पणं विना । सा तन्मुगन्ध्यं जिघ्रन्ती वारं वारं मुदान्विता ॥ ७ ॥ काण्डिकां पूर्ववच्च समाच्छाद्य विहस्तया । स्थापयामास गेहेऽथ मोचयित्वा करण्डकाः ॥ ८ ॥ तद्वृत्तं रामचन्द्रोऽथ ज्ञात्वा सभास्थितः । विममर्श विचारं च मनसा मुदान्वितः ॥ ९ ॥ नातश्चेदं कृतं कर्म योग्यं शुचे स्मृतं न हि । घ्राणार्थं मे निवेद्यान्ते कृतं कार्य्यार्थं तथा ॥१०॥


हैं ॥८४॥८५॥ क्योंकि प्रभुन मुझे आज्ञा दी थी कि शीघ्र जा कर कहो। इसलिए भगवान्‌ने स्वयं मुख कथा सुननेकी आज्ञा की थी। और वाल्मीकिजीका ही जो चरित्र है सिर्फ हम दोनोंके परस्पर सुनानेके लिए भूतकालकी तरह भविष्यका सारा वृत्त पूर्व रामके जन्मसे ही लिख दिया था॥८६-८८॥ वह वर्णन भी इतना अच्छा किया कि रामने जो गुप्त में किया था, वह भी सब लिख दिया। वाल्मीकिके समान न कोई कवि हुआ है न होगा। इस प्रकार आनन्दरामायणान्तर्गत राज्यकाण्डोत्तर-रामोत्तरज्ञान वन्दिकरण नामक इक्कीसवां सर्ग समाप्त हुआ॥२१॥

श्रीरामदासने कहा- अब मैं तुम्हें रामकथा एक दूसरा आनन्द और कौतुकका सुनाता हूँ। उसे आदरपूर्वक सुनो ॥१॥ एक समय रामचन्द्रजी सिंहासनपर बैठे हुए थे। उस समय उनके समस्त भ्राता, मन्त्री, पुरवासी, दोनों पुत्र सम्बन्धी तथा मित्र आदि भी उपस्थित थे। उस समय उनके सुहृद् राजा भूरिकीर्तिने दूतों द्वारा अंगूर आदि विविध प्रकारके फलोंसे भरी हुई बहुमूल्य पेटियां भेजीं ॥२-४॥ उनको देखकर रामने उसे भीतर सीताके पास भेजवा दिया। उस समय सीता अपने सखियोंके साथ क्रीडाभवनमें थीं ॥५॥ उन पिटारियोंको देखा तो बड़ी उत्सुकताके साथ खोल-खोलकर कुछ पिटारियाँ देखीं, किन्तु उनके भीतर कमलका फूल भरा दीख पड़ा ॥ ६॥ तब प्रसन्न मनसे उसने उनमें से एक कमलका फूल निकाला और रामको अर्पण किये बिना ही सूंघ लिया ॥७॥ तदनन्तर पिटारियोंको पहलेकी तरह ठीक करके घरमें रखवा दिया ॥ ८॥ सभा में बैठे-बैठे ही रामको यह बात मालूम हो गयी। उन्होंने बार-बार इसपर विचार किया ॥९॥ तब उन्होंने सोचा कि सीताने यह ठीक नहीं किया, जो मेरे सूंघे बिना ही कमल सूंघ

५३२ आनन्दरामायणे [ सर्गः २२

अग्रेऽप्येवं स्त्रियः सर्वाः करिष्यन्त्यत्र वै भुवि। मत्कार्यदर्शनार्थाय तस्मात्किञ्चित्करोम्यहम् ॥११॥ एवं मनसि निश्चित्य ततः स रघुनन्दनः । हर्षयंश्च गृहं गत्वा पूर्ववज्जानकीं मुदा ॥१२॥ रञ्जयामास विविधैर्नानाच्छाद्यादिकौतुकैः । संप्रदर्श्य पेटिकाश्च सर्वास्तच्चक्रे महन्महः ॥१३॥ आनीय दर्शयामास फलपुष्पादिपूरिताः । रामोऽपि दृष्ट्वा ताः सर्वाः समुद्घाट्य पृथक् पृथक् ॥१४॥ प्रेषयामास भवने गेहेषु दश पञ्च च । फलादीनां पेटिकाश्च नानावाद्यैर्विचित्रिताः ॥१५॥ मातृणां सकलानां च गृहेष्वपि तथा पुनः । गुरुयोः सुहृदां चापि मन्त्रिणां च गृहेस्तथा ॥१६॥ पौराणां चापि गेहेषु सेवकानां गृहेष्वपि । दासीभ्यश्च शुभा दत्त्वा पेटिकाः सप्त पञ्च च ॥१७॥ सीतायै शतशो दत्त्वा मुदा तभ्यो रघूत्तमः। फलानि दश पञ्चाथ स्वयं भुक्त्वा तत परम् ॥१८॥ पद्मादीनि सुपुष्पाणि विभज्य पूर्ववत्पुनः । सीतायै धनशो दत्त्वा स्वयमङ्गीचकार ताम् ॥१९॥ अज्ञात इव तद्वृत्तं गोपयन्मायि चेतसि । अथैकदा जनकजा हरिदिन्यामुपोषणम् ॥२०॥ कृत्वाऽपरे दिने स्नात्वा ययौ वृन्दावनं द्रुतम् । तुलसीं पूजयित्वा तां सा चकार प्रदक्षिणाः । २१॥ एतस्मिन्नन्तरे सीता त्रिगुणाङ्ग श्रमान्विता । त्यक्त्वा प्रदक्षिणामार्गं किंचिदेव चचाल सा ॥२२॥ चलितायाश्च सीतायाः पल्लवेन हि वाससः । पत्रमेकं तुलस्याश्च पपात भुवि वै तदा ॥२३॥ तन्दृष्ट्वा जानकी दृष्ट्वा द्वादश्यां त्रुटितं शुभम् । ज्ञात्वाऽधर्मः कृतश्चेति संप्राप्ताऽऽप्तत्रसा तदा ॥२४॥ ततः सा तत्करेणैव गृहीत्वा पत्रमुत्तमम् । नत्वा वृन्दावनं सीता चिक्षेप पश्चादरात् ॥२५॥ ततः प्रदक्षिणां कृत्वा प्रार्थयित्वा मुहुर्मुहुः । तुलसीं सा ययौ गेहं रञ्जनाय राघवम् ॥२६॥ एतस्मिन्नन्तरे तत्र नारदश्च समाययौ । वीणावाद्यस्वनेनैव कुर्वन्कीर्तनमुत्तमम् ॥२७॥ पालय मां दीनेमिति राघवेति पुनः पुनः । पालय मां दीनेमिति मनुं पञ्चदशाक्षरम् २८॥


लिया । १० । यदि मैं इस समय ना रह जाता हूँ तो सीताके दिखाये हुए मार्गपर चलकर सब स्त्रियाँ ऐसा ही करने लगेंगी। इसलिए मन्ताका हलका करना बचा है । ११ । ऐसा निश्चय करके राम पूर्ववत् सीताके घर पहुंचे ॥ १२ ॥ वहां सदाकी तरह विविध प्रकारके फल-कौतुक करके उन्होंने सीताको प्रसन्न किया। सीताने भी वह सब पिटारियां मँगवाकर उनके आगे रख दीं। वे सब नाना प्रकारके फलों फूलोंसे भरी थीं। रामने भी उन्हें अलग-अलग खोलकर देखा । १३ । १४ । उनमेंसे पन्द्रह पिटारियाँ भाइयोंके यहाँ भिजवा दीं। इसके बाद सब माताओंके पास भेजीं। तथा वैसी ही जोड़ों सुग्रीवादि के, मन्त्रियों, गुरुजनों, पुरवासियों, सबको तथा दासियोंके घर भी पांच सात पिटारियाँ भिजवायीं । इसके अनन्तर सैकड़ों पिटारियां सीताको दीं और उनमेंसे स्वयं भी दस पाँच फल निकालकर खाए ॥ १५ ॥ १८ ॥ इसके बाद कमल आदि श्रेष्ठ-श्रेष्ठ फूलोंका पूर्ववत् विभक्त करके सैकड़ों फूल सीताका दिये और स्वयं भी लिये ॥ १९ ॥ किन्तु सीताने रामकी शपथ दिला दी थी अतः मुंह मूंद लिया था उस बातको जानते हुए भी राम अनजान जैसे बन रहे। इसके अनन्तर एक दिन सीताने एकादशीका व्रत किया २०। दूसरे दिन वे वृन्दावन ( तुलसीका बगीचा ) में गयीं। वहाँ तुलसीकी पूजा करके प्रदक्षिणा करने लगीं ॥ २१ ॥ उस समय एकादशीका व्रत करनेसे उन्हें थकावट-सी लगी थी। उसस प्रदक्षिणाका मार्ग छोड़कर वे दूसरी ओर चलने लगीं ॥ २२ ॥ चलते-चलते सीताके कपड़ेका पल्ला लगनेसे तुलसीका एक पत्र टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ २३ ॥ द्वादशीके दिन उस गिरे पत्रको देखकर सीताने सोचा—'ओह ! मैनें बड़ा भारी अधर्म कर डाला' यह सोचकर वे कुछ भयभीता-सी हो गयीं ॥ २४ ॥ इसके पश्चात् सीताने वह पत्र उठा लिया और उसे प्रणाम करके आदरसे उसी वृन्दावनमें फेंक दिया ॥ २५ ॥ ऐसा करनेके बाद प्रदक्षिणा करके बारम्बार प्रार्थना की, फिर महलमें जाकर रामचन्द्रजीका मनोरंजन करने लगीं ॥ २६ ॥ इसी समय वीणा बजाते और हरिकीर्तन करत हुए नारदजी वहाँ आ पहुँचे ॥ २७ ॥ वे आते ही "मुझ दीन-

सर्गः २१] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) २५३

कीर्तयामास स मुनिर्वारं वारं मुदान्वितः । कलकण्ठस्वरेणैव महापातकनाशनम् ॥ २९॥
॥ पालय मां दीनं राघव पालय मां दीनम् ॥ इति मन्त्रः
तं मुनिं राघवो दृष्ट्वा प्रत्युद्गम्याथ भक्तितः । नत्वाऽऽसने मणिनये वासयामास सादरम् ॥३०॥
ततः प्रक्षाल्य दम्पती सीतया रघुनन्दनः । धेनुं निवेद्य गायेन्द्रीं पूजयामास तं मुनिपुङ्गवम् ॥३१॥
हेमपात्रं भोजनार्थं मुनेरग्रे निवेश्य च । परिवेशणार्थं श्रीरामः प्राह सीतां जानकीम् ॥३२॥
सीताऽपि कामधेनूत्थपरमान्नानि विगृह्य सा । हेमपात्रे नरोत्कृष्टानानेतुं परिवेशकम् ॥३३॥
कर्तुं कङ्कणमञ्जीरकिङ्किणीनूपुरस्वना । सा ययौ नारदः प्राह श्रीरामवं तदा ॥३४॥
राम राजीवपत्राक्ष नाहं सीतासमर्पितम् । दिव्यमन्नमहं चाद्य करिष्यामि नृपोत्तम ॥३५॥
तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा सीताऽऽसीच्चकिता तदा । प्रहृतं च समादाय भ्रमेण मुन तदा ॥३६॥
पप्रच्छ कारणं व्यग्रः सर्वकर्ता स्वयं प्रभुः । किं कारणं वद मुने किमर्थमनयाऽर्पितैः ॥३७॥
अभुङ्क्त्वं भोजनं नाद्य करोषि मुनिपुङ्गव । इति रामवचः श्रुत्वा नारदो वाक्यमब्रवीत् ॥३८॥

नारद उवाच
सीतयाऽद्य कृतं पापं किन्न वेत्सि नृपै प्रभो । यदि त्वं नैव जानासि तर्हि शृणु वदामि त ॥३९॥
द्वादश्यां तुलसीपत्रमनयाऽद्य निकृन्तितम् । यद्यसत्यं तर्हि पश्य गत्वा वृन्दावने प्रभो ॥४०॥
संक्रमेषु चतुर्दश्योर्द्वादश्योः पानपर्वसु । तुलसीं न हरेन्मर्त्योभृग्वङ्गारकवासरे ॥४१॥
नष्टे सूर्येन्दुग्रहणे प्रसूतावशचे तथा । तुलसीं ये निकृन्वन्ति च्छिन्दन्ति हरेः शिरः ॥४२॥
द्वादश्यां तुलसीपत्रं धात्रीपत्रं तु कार्तिके । लुनाति यो नरो गच्छेन्नारकानतिगर्हितान् ॥४३॥
अकाले तुलसीपत्रं छेदयेत्तपः श्रियः पुमान् । पत्रमेकं ब्रह्महत्यासममाहुर्मनीषिणः ॥४४॥
एवं तु वचनं सर्वमुनिभिर्हि प्रकीर्तितं । पुरुषाणामयं दोषस्तत्र स्त्रीणां कथाऽत्र का ॥४५॥


की रक्षा करो, हे राघव ! मेरा पालन करो" इस महापातक नाशक पञ्चदशाक्षर मन्त्रका सहर्ष उच्चारण करने लगे ॥ २८ ॥ २९ ॥ 'पालय मां दीनम्, राघव पालय मां दीनम्' यह पञ्चदशाक्षर मन्त्रका स्वरूप है । राम नारदको देखते ही उठ खड़े हुए । उन्होंने आगे बढ़कर प्रणाम किया और आसनपर बिठाला । तब सादर पूजन किया ॥ ३० ॥ सीताके साथ रामने मुनिवर पैर धोय और गोदान दिया इसके पश्चात् उनके सामने सुवर्णका पात्र रक्खा और सीतासे परोसनेके लिये साम्प्रत कहा ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ सीता भा कामधेनुसे उत्पन्न अच्छे अच्छे मिष्टान्न परोसनेके लिये कङ्कण मञ्जीर तथा नूपुरका ध्वनि करती हुई चलीं। सीताको चलती देखकर नारदने रामसे कहा हे राम ! हे राजन्पद्माक्ष !! मैं आज सीताके हाथसे परोसे हुए दिव्यान नहीं खाऊंगा ॥ ३३-३५ ॥ मुनिकी बात सुनकर सीता घबरा गयी और सब कुछ करनेवाले स्वयं प्रभु राम-ने भी अनजान बनकर विस्मित हो व्यग्रभावसे पूछा-कहो मुनिराज ! आज आप सीताके हाथका अन्न क्यों नहीं ग्रहण करते ? इस प्रकार रामकी बात सुनकर नारदने कहा-॥ ३६-३८ ॥ आज इन्होंने एक बड़ा पाप किया है। सो क्या आपको नहीं मालूम है ? अच्छा मैं ही सुनाता हूं ॥ ३९ ॥ आज द्वादशीको इन्होंने तुलसी-पत्र तोड़ डाला है। यदि आप मेरी बात सच न मानते हों तो स्वयं चलकर देख लीजिये ॥ ४० ॥ संक्रान्ति, चतुर्दशी, द्वादशी, प्रतिदिन सबेरे-सांझके समय, भृगु और मङ्गलके दिन तथा दोपहरके बाद, सूर्य-चन्द्रग्रहणके समय, घरमें सन्तति होनेपर या किसीका देहान्त होनेपर जो लोग तुलसीका पत्र तोड़ते हैं, वे मानो तुलसीका पत्र न तोड़कर भगवान्का सिर काटते हैं ॥ ४१ । ४२ । जो द्वादशीको तुलसीपत्र तोड़ता है या कात्तिकमासमें आंवलेकी पत्तियां तोड़ता है, वह अतिशय निन्दित नरकमें जाता है ॥ ४३ ॥ जो लोग असमयमें तुलसीका एक भी पत्र तोड़ते हैं। विद्वान् लोग ऐसोंको ब्रह्महत्यारा कहते हैं ॥ ४४ ॥ इस प्रकारका वचन समस्त मुनियोंने कहा है। फिर जब पुरुषोंके लिये ऐसा नियम बना हुआ है तो स्त्रियोंके लिये क्या

५३४ आनन्दरामायणे [ सर्गः २२


एतन्निमित्तं श्रीराम सीतया परिकीर्तितैः । स्रानभोजन मद्य करिष्यामि नसंशयः ॥४६। तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह तं पुनः मुने त्वमेव सीतां मे पूतां कर्तुमिहार्हसि ॥४७। वरदानं व्रतं वाऽपि येन पूता भवेच्छुभाम् । त्वामहं प्रार्थयाम्यद्य स्वीयं पल्लवमुत्तमम् ॥४८। इत्युक्त्वा शिरसा चापि नमस्कृत्य पुनः पुनः । तद्रामवचनं श्रुत्वा नारदो वाक्यमब्रवीत् ॥४९। ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृत्यर्थे मुनीश्वरैः । प्रायश्चित्तानि चोक्तानि संति नानाविधानि च ॥५०॥ द्वादश्यां तुलसीपत्रच्छेदनाद्यप्रशंसये । प्रायश्चित्तं मया नैव दृष्टं रघूत्तमोत्तम ॥५१॥ उपायस्त्वेक एवात्र वर्तते रघुनन्दन । पातिव्रत्यबलाम्भोता पत्रं तत्तुलसीं पुनः ॥५२॥ योजयिष्यति संजोड्य तदि पूता भविष्यति क्षणादेव न सन्देहः सत्यमेत द्वचो मम ॥५३॥ तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा रामः सीतां व्यलोकयत् । तदा सीताऽब्रवीद्वाक्यं शृणु ब्रह्मसुतोत्तम ॥५४॥ अद्याहं योजयिष्यामि पत्रं तज्जलसीं पुनः । पातिव्रत्यबलेनैव तथाद्य पश्य कौतुकम् । ५५॥ इत्युक्त्वा जानकी देवी यन्पात्रमन्तपूर्णकम् । पाकस्थाने पुनर्नीत्वा स्थापयामास वेगतः ।५६॥ ततो वृंदावनं सीता ययौ नूपुरनिश्वना । नारदो रामचन्द्राद्या ययुर्वृन्दावनं प्रति ।५७। तदा ता ऊर्मिलाद्याश्च शषिकाद्याः स्त्रियो ययुः । लक्ष्मणाद्या बंधवश्च कुशश्चाथ लवस्तथा ॥५८॥ तेषां मध्यगता सीता तदा वृंदावनस्थिता । नत्वा तां तुलसीं भक्त्या प्राह वाक्यं मयीयुता ।५९। भो भो तुलसि मद्वाक्यं शृणुष्याद्य सुशोभने । पातिव्रतबलं पूर्ण मयि यद्यस्ति पावनम् ॥६०। तर्ह्यस्य तव पत्रस्य मयि सन्धिरर्भविष्यति । एवमुक्त्वा जानकी मा यात्रन्पश्यन्ति वै पुरः ॥६१। तावत्पत्रं तुलस्यां मत्सन्धि नैव गतं तदा । तदा खिण्णा मा सीता बभूव चकिताऽपि च । ६२ । तदा देवाः सगंधर्वा यक्षा नागाः सकिन्नराः । गुह्यका ऋषयः सर्वे तद्द्रष्टुं कौतुकं ययुः ।६३। एतः सीतां विषण्णां तां दृष्ट्वास नारदो मुनिः । एकांते जानकीं नीत्वा बोधयामास सादरम् ।६४॥


कहना ॥ ४१ ॥ इसी कारण आज व्रतका पारण करके समय में सीताका दर्शन अब नहीं करूंगा ॥ ४६ ॥ इस प्रकार नारदकी बात सुनकर रामने कहा हे मुने ! तब तुम ही सीताको पवित्र कर दो । ४७ ॥ यह वरदान तथा व्रत जिस उपायसे पवित्र हो सके, वैसा कर । एतदर्थ में हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ और मस्तक झुकाकर पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ । रामका विनय सुनकर नारदने कहा- ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ ब्रह्महत्यादि पापोंसे छुटकारा पानेके लिये तो मुनीश्वरोंने अनेक प्रकारके प्रायश्चित्त बतलाये हैं ॥ ५० ॥ किन्तु द्वादशीको तुलसीपत्र तोड़नेसे जो पातक होता है। उसका प्रायश्चित्त तो मैंने कहीं देखा ही नहीं ॥ ५१ ॥ हे रघुनन्दन ! इस विषयमें केवल एक उपाय है । वह यह कि माता अपने पातिव्रत्यके बलसे वह पत्र फिर वृक्षमें जोड दें तो ये क्षणमात्रमें पवित्र हो सकती हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है। मैं जो कह रहा हूँ सो सत्य है ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ नारदके ऐसा कहनेपर रामने सीता की ओर देखा । तब सीताने कहा-हे ब्रह्माके पुत्रोमें श्रेष्ठ पुत्र नारद ! ॥ ५४ ॥ अभी मैं आपके सामने ही अपने पातिव्रत्यके बलसे उस तुलसीपत्रको दालमें जोड़ दूंगी आप यह कौतुक देखें ॥५५॥ ऐसा कहकर सीता उस अन्नपात्र वेगके साथ लौटा ले गयी और रख दिया ।५६।। इसके अनन्तर वे वृन्दा- वनमें गयीं । नारद और राम भी वहाँ पहुंचे ॥ ५७ ॥ ऊर्मिलादिक स्त्रियां तथा लक्ष्मणादि बन्धु एवं लव कुश आदि पुत्र भी वृन्दावनमें पहुंचे ॥ ५८ ॥ उन सबके बीचमें सीताने उस तुलसीके वृक्षको प्रणाम किया और भक्तिपूर्वक कहने लगी - ॥ ५९ ॥ हे सुशोभने तुलसि ! मेरी बात सुनो । यदि मुझम पातिव्रतका बल हो तो यह टूटा हुआ पत्र फिर तुम्हारे अङ्गमें जुड़ जाय ऐसा कहकर सीताने सामने पत्र देखा तो वह जुटा नहीं, यों ही पड़ा रहा । उस समय आश्चर्यके साथ-साथ सीताको बड़ा विषाद भी हुआ ॥ ६०-६२ ॥ समस्त देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, किन्नर, गुह्यक तथा महर्षिगण वह कौतुक देखनेको एकत्रित हो गये थे । ६३ ॥ जब सीताको इस प्रकार कुत्सित देखा तो नारद मुनि उन्हें एकान्तमें ले गये और आदरपूर्वक समझाया । नारदने

सर्गः २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५३५


शृण्वत्र कारणं सीते सर्वं त्वां मददावहम् । पतिव्रताभिनिर्णीतिर्विना स्वपतिना मुदा ॥ ६५ ॥
पुष्पादीनां सुगन्धोऽपि नान्यग्राह्यः कदाचन । सोऽद्यैकादिनः पूर्वं मुदा नाघ्रातमस्य च ॥ ६६ ॥
तद्वृत्तं बुद्ध्य्वा रामचन्द्रो मयैषा रचिताऽद्य हि । उद्दिश्यैतां तुलस्याश्च तन्पत्रं पतितं भुवि ॥ ६७ ॥
स्वद्भक्त्यैवापराधेन शिक्षां कर्तुं दयालु हि । रामस्यांतर्गतं ज्ञात्वा दोषारोपः कृतस्त्वयि ॥ ६८ ॥
मया सीते क्षमस्वाद्य मा क्रोधं भज मां प्रति । नारीणामुपकारार्थं तेन त्वमद्य शिक्षितम् ॥ ६९ ॥
नोचेद्वदहितं पथा स्त्रियः सर्वाः पतिं विना । लभेयुश्चान्नपुष्पादि नानाभोगांस्तदान्विताः ॥ ७० ॥
इदानीं शृणु मद्वाक्यं येन श्रीराघवप्रभोः । पत्रस्य च तुलस्याश्च दृढो मन्धर्भविष्यति ॥ ७१ ॥
वृन्दावने पुनर्गत्वा त्वं ब्रूहि कमलेक्षणे । विना पद्मसुगन्धस्याद्यपत्राद्यदे गभितम् ॥ ७२ ॥
पातिव्रत्यं मयाऽम्यत्र तद्यनूत्कुरमादलम् । तुलस्यां माऽम्रानातु नायकाप्नोतुवै विषयम् ॥ ७३ ॥
अनेन वचनेनाथ तत्पत्रं सन्धिनिपुणम् तुलस्याः क्षमभावण पूर्ववच्च भविष्यति ॥ ७४ ॥
अतस्त्वं याहि तुलसीं विषादं भज मा रमे । इत्युक्त्वा सीतया शीघ्रं तुलसी नाब्दो ययौ । ७५ ॥
सीताऽपि तुलसीं नत्वा शृण्वत्सु सकलेष्वपि । समक्षेषु सुराणां च देवादीनां वचोऽब्रवीत् ॥ ७६ ॥
विना पद्मसुगन्धस्याऽघ्राणाद्यदि रक्षितम् पातिव्रत्यं मयाऽप्यत्र तर्ह्येतत्तुलसीदलम् ॥ ७७ ॥
तुलस्याः सन्धिमाप्नोतु नोचेन्नाप्नोतु वै विदः । एवं वदति जानक्यां तत्त्वमेव समेन तत् ॥ ७८ ॥
प्राप्तं सन्धिं पूर्ववच्च पश्यत्सु सकलेष्वपि । तदा निनेदुर्वादित्राणि देवानामश्चतस्त्य च ॥ ७९ ॥
देवनार्यो विमानस्थे संस्थिताः पुष्पवृष्टिभिः । वर्णयामासुरूवी शमं विशा उच्चैर्जयस्वनान् ॥ ८० ॥
तदा सीतां समालिङ्ग्य राघवो मुदिताननान् । आह तुष्टमनः श्रीमान् प्रमनाह्यभूपिता ॥ ८१ ॥
हे सीते कञ्जनयने मुनीनामपि मोहिनि । नेदं मया शिक्षितं ते सर्वस्त्रीणां सुशिक्षितम् ॥ ८२ ॥
धर्मसस्थापनार्थाय साधूनां पालनाय च । दुष्टानां च विनाशाय मयेदं रूपमाश्रितम् ॥ ८३ ॥


कहा-हे सीते ! इस पत्रक न जुड़नेका जो कारण है वह मैं बतलाता हूँ। पतिव्रता स्त्रियोंको चतुर कि यिः उनके पतिने सौंप के सुगन्धन दिया हो तो स्वंय भी पुष्पादिकका सगन्ध न लें। आपने इस रोज़ रातके सूघे बिना ही कमलका फूल सूंघ लिया था ॥ ६४-६६ ॥ रामका यह बात मालूम हो गयी थी। इसीसे उन्होंने यह मया रची है तुलसीका पत्र भी उन्हींकी इच्छासे गिर गया था ॥ ६७ ॥ आपको शिक्षा देने ही के लिए उन्होंने ऐसा किया है। रामकी इच्छा देखकर ही मैंने आपपर दोषारोप किया है। सां क्षमा करो। मेरे ऊपर कुपित न हो नारीजातिको शिक्षा दनक लिए ही उन्होंने यह कौतुक रचकर आपको उपदेश दिया है ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ व यदि ऐसा न करेंगे तो आपके बनाये मार्गके अनुसार संसारकी समस्त स्त्रियां अपने-अपने पतिको अल्य करके स्वयं विविध प्रकारके भोगोंका उपभोग करने लगेंगी ॥ ७० ॥ सुनिए, अब मैं बतलाता हूँ कि किस तरह यह पत्र वृक्षमें जुड़ेगा ॥ ७१ ॥ आप फिर वृन्दावनेमें जाकर कह कि उस कमलका फूल सूंघनेके सिवाय यदि मेरा पतिव्रत धर्म सुरक्षित हो तो यह पत्र जुड़ जाय और यदि मैं अपने धर्मको सुरक्षित न रख सकी होऊँ तान जुड़े ॥ ७२ । ७३ । आपके इस बचनसे तत्काल वह जुड़कर पहिलेकी तरह हरा-भरा हो जायगा ॥ ७४ । हे लक्ष्मीस्वरुपिणी सीते अब चलें किसी प्रकारका विषाद न करें। ऐसा कहकर नारदजी सीताके साथ-साथ उस कुञ्जमें वाग गये ॥ ७५ ॥ सीता जी जर समस्त परिवारके सभी लोग तथा सारे देवता एकत्र होकर सुन रहे थे, तब उन्होंने कहा--॥ ७६ ॥ यदि उस कमलका सुगन्ध लेनेके अतिरिक्त मेरा पातिव्रत धर्म सुरक्षित हो तो यह तुलसीदल अपने स्थानपर जुड़ जाय, अन्यथा नहीं जुड़े । सीत।के ऐसा कहते ही क्षणामात्रमें वह पत्र वैसे ही तरह पूर्ववत् जुड़ गया। सब लोग खड़े यह कौतुक देख रहे थे। पत्रके जुड़ते ही देवताओंने बाजे बजाये और देवांगनाओंने पुष्पवृष्टि की एवं ब्राह्मणोंने एक स्वरसे जयजयकार किया। ७७-८० । इसके बाद रामने सताको हृदयसे लगा लिया और प्रसन्न मनसे कहा कि हे मुनियोंके भी मनको मोहनेवाली सीते ! यह मैने तुम्हींको नहीं समस्त नारीजातिको शिक्षा दी है। धर्मकी

५३६ आनन्दरामायणे [ सर्ग २२

पातिव्रत्यं सदा स्त्रीभिः पालनीयं विशेषतः । मया ते शिक्षितं सीते मा विषादं भज प्रिये ॥८४॥ इत्याश्वास्य मुहुः सीतां कृत्वा ह्यपदिशङ्किताम् । विसर्जयामास तदा रङ्गाग्रतः सुग्रीवप्रमुखान्हरीन् ।८५। ततः सर्वाङ्गसुन्दरीम् ताञ्श्री परिवेषणम् । वेगाच्चकार मुदिता स्वेदबिन्दूङ्कितानना ।८६। ततः सर्वे व्यमृदंस्तत् भुक्त्वाऽऽचमनमुत्तमम् । ततो मुखवासं ताम्बूलं रामं तुष्टाव नारदः ॥८७॥

श्रीनारद उवाच

धीमन्तं मुनिश्रिञ्जमं जगदण्डं हृद्गतम् सीताऽऽननेन्द्यनयननगराजारामं घनश्यामम् । नागेन्द्रान्तकसिद्धिदं नितान्तं प्रविपन्नपालं रामं त्वां शिष्या मननं प्रणाम्यच्छेदेनमनालम् ।८८। नाना राक्षसदूषनं शरधृतं जलनाथार्चनीमदभसागरबन्धननानाकीतुककनारम् पाँगनन्दननारीतोषससुरापुनमद्रालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ॥८९ श्रीकान्तं जगतीकान्तं स्तुतमद्भक्तं षट्षट्कं सद्गृहदेवप्सितपूरकप्रयासं नृपजाकान्तम् । पूष्णीजपनिधिं मित्रमुनिविश्वादायनमच्छीलं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ९० । सीतातोषितविश्वेशं धृतभूमाशं सुरलोकेशं प्रशमितरावणभयमपगतरावणकुलकेशम् । किष्किन्धाकृतसुग्रीवं प्लवगवृन्ताधिपमन्पालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ९१ । श्रीनाथं जगती नाथं जगतानाद्यं नृपतीनाथं भुजंगासुरनिर्जग्गदगन्धर्वाधिकारमन्नाधम् । कोदण्डधृततूणीरन्तिरुपप्रमे कृतभूशालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् । ९२ । रामेशं जगतामीशं जम्बूद्दीपेशं नवलोकेंशं वन्दीकृतमन्मथमहर्षितभीतालालितवागीशम् । पृथ्वीसद्दहभूभारं नतयोगौद्र जगतीपालं रामं त्वां शिरसा मननं प्रणमामिच्छेदितमनालम् ॥९३॥

स्थापना करने, सज्जनोंका रक्षा तथा दुष्टोंका विनाश करनेके लिए ही मैने यह अवतार लिया है। स्त्रियोंको अपना दुर्लभे पातिव्रत्य धर्मकी रक्षा करनी चाहिए। यह मैंने तुम्हें उपदेश दिया है। इससे कहीं कुपित न हो जाना ॥८१-८४॥ इस प्रकार वारम्बार सीताको आश्वासन देकर रामने उन्हें फिर हर्षित कर दिया और उन भये हुए हृदयके भयको दूर किया। फिर उन्होंने मद्यपियोंको साथ लेकर मङ्गलमय मद्य। यहाँ मन्त्रीमंण्डलके भाषण परस्पर ॥८५॥ इस अवसर पर महान् भोजन किया। फिर ताम्बूल खाकर नारद रामकी स्तुति करने लगे ॥८७॥ नारदने कहा- मैं उन रामको मस्तक नवाकर प्रणाम करता हूँ जो मुनियों के विश्रामस्थान हैं, नियन्त्रकके हृद्गत हैं, उन का आनन्द देनेवाले, माताको प्रसन्न रखनेवाले, सुन्दर, सनातन, राजा राम, मेघके सदृश श्याम वर्णवाले, नागा आदिके वरदाता, विद्वान् प्रचित्र उन भूपाल रामको, जिनका प्रभाव आप देवताओं तक पहुँचाया गया, को प्रणाम करता हूँ । ८८ ।। अनेक राक्षसोंके बाण लगानेवाले, जलधके आधार, बाणोंके धारक, समुद्रपर सेतु बाँधने और अनेक प्रकारके कौतुक करनेवाले, सुग्रीवादिओको आनन्ददाता, नारियोंके प्रसन्नकर्ता और मध्यम कस्तूरीका तिलक लगानेवाले आप रामको मैं प्रणाम करता हूँ । ८९ ॥ लक्ष्मीके पति, जगत्पति, अच्छे-अच्छे भक्तोंके वन्दित, जिनके स्तुतसे सन्त हैं, जो मागनेपर मनोरथ पूर्ण करनेवाले तथा पृथ्वीकी पुत्री सीताके पति हैं विश्वामित्रकी सृष्टि से जिनका संकोच नष्ट हो गया है, ऐसे महान् सात तालके वृक्षोंको काटने-वाले आप रामको मैं मस्तक नवाकर प्रणाम करता हूँ ॥९०। सीताको प्रसन्न करनेवाले समस्त विश्वके ईश, पृथ्वीके ईश देववृन्दोंके अधिपति, (सुग्रीवको) का भय दूर करनेवाले, रावणके विनाशकारी, रावणके भ्राता विभीषणका लंकाका राज्य देनेवाले, सुग्रीवको किष्किन्धाका अधिपति बनानेवाले, वानरोंके अधिपति सुग्रीवका भली भाँति रक्षण करनेवाले और महान् सात वृक्षोंको काटनेवाले रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ९१ ॥ लक्ष्मीके नाथ, जगत्के नाथ, नृपनाथके नाथ, राजाओंके राजा, चित्र, असुर, देवता, पन्नग तथा गन्धर्वोके नायक, धनुष और तरकस लेकर तीव्रगमन महोत्साह से गता राम जिन्होंने महान् तालवृक्षोंको काट गिराया था, मैं उनको प्रणाम करता हूँ ॥ ९२ । ईश, जगत्के ईश, जम्बूद्वीपके ईश, समस्त लोकपालोंके

सर्गः २२ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५३७

सर्गः २२ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५३७

विद्रूपं जितभूरूपं नतसद्दिक्पं नतमद्रूपं सप्तद्वीपजवर्षजकामिनिसन्नीराजितपृथ्वीपम् । नानापार्थिवनानौपायनमभ्यर्चिततोषितमद्रूपं रामं त्वां शिरसा सततं प्रणमामि च्छेदितसप्ततालम् ॥९४॥ सत्सेव्यं मुनिभिर्गेयं कविभिः स्तुत्यं हृदि संधार्यं नानापण्डिततर्कपुराणजवाक्यादिकृतसत्काव्यम् । साकेतस्थितकौसल्यासुतगन्धाद्यङ्कितमद्भालं रामं त्वां शिरसा सततं प्रणमामि च्छेदितसप्ततालम् ॥९५॥ भूपालं घनसन्नीलं नृपसद्बालं कलिमञ्जालं सीताजानिवरोत्पललोचनमन्त्रीमोचितसत्कालम् । श्रीमतीवरुतोपाय्यास्वादनसम्यक्शिक्षितसत्कालं रामं त्वां शिरसा सततं प्रणमामि च्छेदितसप्ततालम् ९६॥ हे राजन् नवभिः श्लोकैर्भुवि पापघ्नं नवकं रूपं मे बुद्धया कृतमुत्तमन्तनमेतद्राघव मन्वीनाम् । स्त्रीपौत्रान्नादिकक्षेमप्रदमस्मन्मन्दरदक्षालं रामं त्वां शिरसा सततं प्रणमामि च्छेदितसप्ततालम् ॥९७॥

श्रीरामचन्द्र उवाच

एवं स्तुत्वा रमानायं राघवं भक्तवत्सलम् । प्रणम्याज्ञां प्रभोः प्राप्य प्रययौ नारदो मुदा ॥९८॥ अमरा मुनयः सर्वे जग्मुस्ते स्वस्थलानि वै । एवं श्रीरामचन्द्रेण नररूपधरेण च ॥९९॥ कौतुकानि विचित्राणि कृतानि जगतीतले । कस्तान्वत्र क्षमो वक्तुं विस्तरेण द्विजोत्तम ॥१००॥ तेषु यद्यद्राघवेण स्मारितं स्निह वै मम । तत्प्रकथ्यते शिष्य तवाग्रे राघवोत्तम ॥१०१॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे सीतया तुलसीपत्रप्रसाधनं नाम द्वाविंश सर्ग ॥ २२ ॥


प्रभु वाल्मीकिसे नमस्कृत, प्रसन्न सीताके द्वारा लालित, दानीश पृथ्वीश, भ्रमरहारी, योगीन्द्राम नमस्कृत, जगतोके पालक और विशाल तालवृक्षोको काट गिरानेवाले रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ । ९३ । विद्रूप, अच्छे-अच्छे राजाओको भी परास्त करनेवाले, अच्छे-अच्छे दिक्पालानसे नमस्कृत, बड़े-बड़े राजाओसे नमस्कृत, सप्तद्वीप तथा समस्त देशम उत्पन्न नारियोंसे नीराजित, पृथ्विके पालक, अनेक राजाओके द्वारा अनेक प्रकारके उपहार देकर प्रसन्न किये गये राजा राम जिन्होंने विशाल तालके वृक्षोको काट गिराया था, उन रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९४ ॥ जो मुनियोंके सेव्य, मत्रियोंमें गेय, हृदयमें धारण करने योग्य, अनेक पंडितों द्वारा विविध प्रकारके तर्क पुराण तथा काव्योमें संस्कृत एवं साकेत-निवासिनी कौसल्याके पुत्र हैं और गन्धादि द्रव्योंसे जिनका मस्तक अर्चतस है, सात तालके वृक्षोको काट गिरानेवाले आप रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९५ । भूपाल, मेघके समान श्यामस्वरूप, महाराज दशरथके अच्छे पुत्र, पापोंके लिए कालस्वरूप सीतापति, सुन्दर, कमलकी नाईं वालोवाले प्रबल कामके जालसे अपने मन्त्राको तत्काल छुड़ानेवाले पतिको बिना अर्पण किये कमलका फूल सूंघ लेनेपर सीताको भलीभांति शिक्षाके दाता, विशाल तालके वृक्षोंको काट गिरानेवाले उन रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९६ ॥ हे राजन् संसारके दायिनांका पाप नष्ट करनेवाले इन नौ श्लोकोंसे मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार आपकी स्तुति का है। मेरे वरदानसे यह स्तुति स्त्री-पुत्र आदि सब वस्तुओंको देनेवाली होगी। विशाल तालके वृक्षोका भेदन करनेवाले रामको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ ९७ ॥ श्रीरामदासने कहा— इस प्रकार भक्तवत्सल, रमानाथ, राघव, रामचन्द्रकी स्तुति करके और उनसे आज्ञा लेकर नारदजी प्रसन्नतापूर्वक यहाँसे विदा हुए ॥ ९८ ॥ तब सब देवता तथा मुनिगण भी अपने-अपने स्थान-को चले गये । नररूपधारी रामचन्द्रने ऐसे-ऐसे कितने ही कौतुक किये हैं। हे द्विजोत्तम ! विस्तारपूर्वक उनका वर्णन करनेके लिए इस संसारमें कौन समर्थ हो सकता है ? ॥ ९९ ॥ १०० । उन चरित्रामेसे स्वयं रामचन्द्रजीने जो जो चरित्र हमें स्मरण कराया है वह-वह उन्हींकी आज्ञासे मैंने तुम्हारे आगे कहा है ॥ १०१ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषा-टीकासहिते राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे द्वाविंशः सर्गः ॥ २२ ॥

५३८आनन्दरामायणे[ सर्गः १३

त्रयोविंशः सर्गः

(आनन्दरामायणकी महिमा)

श्रीरामदास उवाच

अथ रामः स वैदेह्या पञ्चभिस्तनयादिभिः । चकार राज्यं धर्मेण लोकवन्द्यपदाम्बुजः । १ ।
एतस्मिन्नन्तरेऽयोध्यापुर्यां श्रीरघुनायकम् । नत्वैकदाऽब्रवीद्दूतो हे राम कञ्जलोचन ।। २ ।।
करोमि तव सेवां न तपश्चर्यां करोम्यहम् । ददस्वाज्ञां मम त्वं हि गच्छामि निजमन्दिरम् ।। ३ ।।
तथेति राघवेणोक्तः स ययौ निजमन्दिरम् । तत्र गत्वा शुचिर्मन्वाऽऽनन्दरामायणं शुभम् ।। ४ ।।
पठित्वा नवरात्रं तु ततस्तूर्णं बहिर्ययौ । एतस्मिन्नन्तरे एकदेशे पौरा मृतं नृपम् ।। ५ ।।
दृष्ट्वा तस्य सुतं बालं तान्वा कर्तुं हि मन्त्रिणम् । चक्रिरे निश्चयं तत्र केचिद्दुष्टगुणं शुभः ।। ६ ।।
केचिद्दुष्टगुणं नैष कार्यो मन्त्री खलस्त्वयम् । एवं विवदमानास्ते चक्रुर्वै निश्चयं तदा ।। ७ ।।
करिणी निजशुण्डाग्रमालया यं वरिष्यति । सोऽस्तु मन्त्री निश्चयेन ततस्तां करिणीं वरैः ।। ८ ।।
वस्त्रालङ्कारभूषाद्यैः शोभयामासुरादरात् । तत्तुण्डायां रत्नमालां दत्त्वा तां मुमुचुस्तदा ।। ९ ।।
ततस्ते नववाद्यानि वाद़यामासुरादरात् । तदा सा करिणा ग्रामाद्बहिस्तूर्णं ययौ शनैः ॥१०॥
अयोध्यायाः पश्चाद्योध्यां ययौ देशान् विलङ्घ्य सा । तन्पृष्ठे सकलाः पौरा नानाव्याहनमस्थिताः ॥११॥
ययुस्तूर्णं कौतुकेन कोटिशो मुदिताननाः । ततः सा कारिणी गत्वाऽयोध्यां दृष्ट्वा स्थितं तदा ।। १२ ।।
तं दूतं वरयामास येन पारायणं कृतम् । आनन्दरामचरितस्याहो तन्कौतुकं महत् ।। १३ ।।
बभूव सकलान् लोकान् ततस्तं माल्याङ्कितम् । करिण्या मन्त्रिणं चक्रुस्ते पौरा ये समागताः ।। १४ ।।
तं निन्युः करिणीमस्थं पत्नीपुत्रसमन्वितम् । स्वदेशे मन्त्रिणं चक्रुस्तदद्भूतमिवाभवत् । १५ ।।


श्रीरामदास कहने लगे—इसके अनन्तर सहाससे वन्दित राम जब सीता, पुत्रों और भ्राताओंके साथ धर्मपूर्वक राज्य कर रहे थे । १ ॥ उसी समय एक दूतने अयोध्यापुरीमें रामके पास आकर कहा कि हे कमललोचन राम ! अब आपकी सेवा न करके मैं तपस्या करना चाहता हूँ । मुझे आज्ञा दीजिए तो अपने घर जाऊँ ॥ २ ॥ ३ ॥ रामने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और वह अपने घर चला गया । वहाँ पवित्र मनसे उसने नौ रात्रि तक इस कल्याणदायक आनंदरामायणका पाठ किया और बादमें घरके बाहर निकला उसी समय एक देशका राजा मर गया था ॥ ४ ॥ ५ ॥ उसका पुत्र बालक था। सो उसके लिये किसीको मंत्री बनानेकी आवश्यकता पड़ी। अब पुरवासियोंमें मंत्रणा होने लगी कि किसको मंत्री बनाया जाय । कोई किसीको कहता कि अमुक मनुष्य अच्छा है, उसे मंत्री बना दिया जाय । किन्तु उसकी बात काटकर दूसरा कहता कि नहीं, वह बड़ा दुष्ट है । उसे मंत्री नहीं बनाया जा सकता । इस तरह परस्पर झगड़ा करते-करते यह निश्चय हुआ कि ॥ ६ ॥ ७ ॥ राजाकी हथनी अपनी सूँड़में माला लेकर जिसके गलेमें डाल दे वही व्यक्ति राजकुमारका मंत्री बनाया जाय । तदनुसार अच्छे-अच्छे वस्त्र-आभूषण आदि पहिनाकर हथितीको सुसज्जित किया गया और उसकी सूँड़में एक माला देकर उसे छोड़ दिया ॥ ८ ॥ ९ ॥ इसके बाद वे लोग हर्षसे बाजे बजाने लगे । वह हथिती धीरे-धीरे नगरसे बाहर निकली ॥ १० ॥ वहाँसे चलकर वह अयोध्या पहुंची । उसके पीछे अनेक प्रकारके वाहनोपर सवार होकर नागरिक लोग भी कौतुकवश बड़े वेगके साथ प्रसन्न मनसे अयोध्या तक चले आये । उस हथितीने बाजारमें खड़े उस मनुष्यके गलेमें माला डाल दी जिसने नौ रात तक आनंदरामायणका पाठ किया था । इन लोगोंके लिये यह एक असाधारण कौतुककी बात हुई ॥ ११-१३ ॥ तब माला पहिने हुए उस दूतको लोगोंने राजकुमारका मंत्री चुन लिया । उसी हथितीपर बिठाकर पत्नी-पुत्र समेत उसे अपने देश ले गये और राजकुमारके

सर्ग २३ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५३९

सर्ग २३ ] राज्यकाण्डम् (उत्तरार्द्धम्) ५३९

तः परस्परं श्रुत्वा राजदूताः सहस्रशः । नानादेशेषु सर्वत्र वार्तेनेऽपि तदा सुता ॥१६॥ राजसेवां परित्यज्य अगमंस्ते स्वगृहाणि हि । ततः सर्वे स्वगृहेष्वानन्दरामायणस्य च ॥१७॥ केचित्पारायणं चक्रुः केचित्छ्रवणं मुदा । कचित्पठनं राजन् केचिच्चक्युश्च कीर्तनम् ॥१८॥ केचिच्चक्युश्च व्याख्यामेवं तन्निष्टमानसाः । बभूवुः सकला दूताः कोटिशो जगतितले ॥१९॥ तदा केन धनं लब्धं केन लब्धं महद्धनम् । केन राजपदं लब्धं केन लब्धं गृहं वरम् ॥२०॥ केन ग्रामाधिकारश्च केन लब्धा कपिर्बरा । केन वृत्तिः शुभा लब्धा केन स्वर्गे मनोरथः ॥२१॥ केन लब्धं तु पाताल केनांशा विविधाः शुभाः । लब्धं कैश्चिन्मखपदं लब्धं स्वर्गे मनोरथम् ॥२२॥ केचिदिन्द्रपदं प्राप्ताः केचिदग्निपुरं गताः । केचिद्ये धर्मराजस्य लोकं वा निर्ययुस्त्वपि ॥२३॥ वरुणस्याथ वायोश्च कुबेरस्येश्वरस्य च । लोकान् जग्रमुस्तदा दूतास्तद्गुताभिकामवत् ॥२४॥ केचिन्जाम्बूपदलोकं केचित्सुवपदं गताः । केचिते ब्रह्मलोकं च वैकुण्ठं चापि केचन ॥२५॥ एवं यथा यस्य पुण्यं दूतस्यान्यजनस्य च । आनन्दरामचरितपाठश्रवणतश्चभूत् ॥२६॥ तथा तस्य गतिर्जाता सर्व एवातरातले । तदा कोऽपि न राज्याद्योदूतो देशान्तरेष्वपि ॥२७॥ त्यक्त्वा सेवां समस्ताश्च राजरस्याथ ते गताः । रामं दृष्ट्वा गताः केचिदपृष्ट्वैव गताः परे ॥२८॥ एवं सर्वत्र देशेषु दूताभावोऽभवत्तदा । एकदा राघव द्रष्टुं गन्तुं सर्वे नृपास्तथाः ॥२९॥ सैन्यान्याज्ञापयामासु र्स्थानानि तु पृथक्पृथक् । तदा कुत्रापि सैन्यानि ददृशुर्न नृपासमाः ॥३०॥ आः किमेतदिति प्रोक्तवास्त्वहूद्भिः सुतादिभिः । दद्युस्ते राघवं द्रष्टुं विस्मयाविष्टमानसाः ॥३१॥ तावागतान्नृपान् ज्ञात्वा नान्पुरा गन्तुमादरात् । आकारयन्स्वसैन्यानि न तदा प्राप लक्ष्मणः ॥३२॥


मन्त्रियेश्वर बिदा किया। यह घटना एक अद्भुत प्रकारका घट गया ॥ १४ ॥ व १५ ॥ फिर क्या था, जब रामके दूतोंका यह खबर मिला तो सब राजपुत्र तथा अन्यान्य दूतगण दूताङ्ग दूत प्रसन्नतापूर्वक अपना अपना नौकरी छोड़कर घर चले गये। परस्पर पूछकर आनन्दरामायणका पाठ करना प्रारम्भ किया ॥ १६ ॥ १७ ॥ कुछ इसे दूसरेके मुखसे सुनने लगा, कुछ इसका पारायण करने लगे और कुछ लोग इसके संकीर्तनमें लग गये ॥ १८ ॥ कुछ लोग इसकी व्याख्या करने लगे और कुछन लोग आत्म भावना चित्तवृत्ति हटाकर इसी आनन्दरामायणमें लगा दी। इस तरह राजमज छोड़कर आनन्दरामायणका आधार रखनेवालोंकी संख्या संसारके कण्टाकके समान हो गयी ॥ १९ ॥ ऐसा प्रभाव हुआ कि फल मिला, कुछ बहुत अधिक सम्पदा मिली, किसीको राज्यपद प्राप्त हुआ और किसका उच्चकोटिका घर मिला ॥ २० ॥ कुछका ग्रामका अधिकार मिला, किसको अच्छी सती मिली, किसीको सुन्दर आजीविका मिली और जिसका मनोरथ स्वर्गलोक प्राप्त हुआ ॥ २१ ॥ किसको पाताललोक मिला और कुछ लोगोंको विविध प्रकारके अच्छे अच्छे लोक प्राप्त हुए और कुछ लोगोंको सूर्यलोक मिला ॥ २२ ॥ कुछ लोगोंको इन्द्रपद प्राप्त हुआ, कुछ अग्निदेवताका रूप, कुछ धर्मराजके लोक तथा कितने ही लोग निर्ऋतिदेवका लोक बन गये ॥ २३ ॥ कुछ वरुणलोकका, कुछ वायुलोकका, कुछ चन्द्रलोकका, कुछ सूर्यलोककी, कुछ ब्रह्मलोकका तथा कुछ लोग वैकुण्ठलोकमें जा पहुंचे ॥ २४ ॥ २५ ॥ इस तरह आनन्दरामायणके पाठसे उन दूतों तथा अन्य लोगोंको भी वे ही लोक प्राप्त हुए, जिनका जैसा पुण्य था। इस प्रकार पृथ्वीलोकमें सबका शुभ गति प्राप्त हुई। उस समय अयोध्या तथा देशान्तरमें भी कोई सिपाही नहीं रहा ॥ २६ ॥ २७ ॥ सब रामके यहां सेवा त्याग हटाकर चले गये थे। उनमेंसे कुछ लोग तो रामसे पूछकर गये थे, कुछ बिना पूछे-जांचे ही चले गये ॥ २८ ॥ इस तरह उस समय सारा देश दूतविहीन हो रहा था। एक बार संसारके जितने अच्छे-अच्छे राजे थे, वे सब रामचन्द्रजीके दर्शनमें जानेके लिये तैयार हुए। उन्होंने जब साथ चलनेके लिए सेना बुलायी तो पता चला कि सेना है ही नहीं ॥ २९ ॥ ३० ॥ यह खबर पाकर राजा लोग कहा-आहू, यह क्या हुआ, विस्मितभावसे वे अपने-अपने मित्रों और पुत्रोंको साथ लेकर अयोध्या आये ॥ ३१ ॥ जब श्रीरामके सन्मुखका यह सम्बाद मिलना

५४० आनन्दरामायणे [ सर्गः १३

ततो निवेदयामास तद्वृत्तं राघवाय सः । तच्छ्रुत्वा राघवोऽप्यासीद्विस्मयाविष्टमानसः ॥३३॥ सुहृज्जनैर्युतं बन्धुं लक्ष्मणं प्रेष्य पार्थिवान् । स्वपुरीमानयामास ते नेमु रघूनायकम् ॥३४॥ ततस्ते नृपशुः सदसि सेनात्तृत्तं न्यवेदयन् । रामोऽपि कथयामास स्वसेनात्तृत्तमादरात् ॥३५॥ तदा विहस्य श्रीरामः समाहूय निजं गुरुम् । पृष्टवान्मम सैन्यानि नृपाणां चापि वै गुरो ॥३६॥ किं जातानि क्व वै सन्ति तद्वदस्व सविस्तरम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा कृत्वा ध्यानं क्षणं गुरुः ॥३७॥ तदा प्राह महामन्त्री विहस्य रघुनन्दनम् । राम राम महाबाहो सर्वं वेत्सि त्वमेव हि ॥३८॥ यदि पृच्छसि मां राम तर्हि सर्वं वदाम्यहम् । शतकोटिमितं रामचरितं तव पावनम् ॥३९॥ वाल्मीकिना कृतं पूर्वं तन्मध्ये रघुनन्दन । आनन्दरामचरितं नवकाण्डसमन्वितम् ॥४०॥ तस्य श्रवणपाठाद्यैः सर्वसैन्येषु ये नराः । ते गतास्त्वत्पदं केचित्केचित्श्लोकोक्तरादिषु ॥४१॥ न संति भुवि सैन्यानि सत्यं राम वचो मम । नवकाण्डमितं तच्च रम्यमानन्ददायकम् ॥४२॥ तस्यैकश्रवणादिद्धि फलं रघुकुलोद्भव । येन ते हीनजातित्वा दृप्ताश्च मुक्तिगामिनः ॥४३॥ सारकाण्डश्रवादेव संसारात्मुच्यते नरः । यात्राकाण्डेन यात्राणां लभ्यते मानवैः फलम् ॥४४॥ यागकाण्डेन यज्ञानां लभ्यते फलमुत्तमम् । विलासकाण्डश्रवणादप्सरोभिर्नमोदने ॥४५॥ जन्मकाण्डेन चाप्नोति नरः पुत्रादिमंततिम् । विवाहकाण्डश्रवणाद्भुवि रम्यां स्त्रियं लभेत् ॥४६॥ राज्यकाण्डेन राज्यं हि मानवैर्रुवि लभ्यते । कांडं मनोहर श्रुत्वा लभ्यते मानसेप्सितम् ॥४७॥ पूर्णकाण्डश्रवाद्देव [त्तै] पूर्णस्य पदं लभेत् । सर्वं तान्मानवैः श्रुत्वाऽऽनन्दरामायणं भुवि । ४८। सच्चिदानन्दरूपे ते लीनो भवति मानवः । एवं राम त्वया पृष्टं तन्मयं कथित मया ॥४९॥ यदग्रेऽद्य चिकीर्षा ते तत्कुरुष्व रघूत्तम । इति रामं वसिष्ठस्तु यावत्प्राह नृपाग्रतः ॥५०॥


उन्होंने राजाओंकी अगवानी करनेके लिए सेना बुलवायी तो उन्हं भी सेना नहीं मिली ॥ ३२ ॥ लक्ष्मणने रामको यह वृत्तान्त सुनाया तो राम भी चौंक से रह गये ॥ ३३ ॥ अन्तमें रामने भी अपने परिवारके लोगोंको भेजकर राजाओंकी आगवानी करायी । राजाओंने अपनी-अपनी सेनाका समाचार सुनाया । सो सुनकर रामने आदरपूर्वक अपना सा सब हाल कहा ॥ ३४ । ३५ ॥ तदनन्तर रामने अपने कुलगुरु वसिष्ठको बुलवाया और हंसकर उनसे कहा हे गुरो ! हमारा तथा इन राजाओंकी सेना कहाँ चली गयी है, सो विस्तारपूर्वक बतलाइए । रामकी बात सुनकर वसिष्ठने कहा-हे राम ! हे महाबाहो ! आप स्वयं सब बातोंको जानते हैं ॥ ३६-३८ । फिर भी यदि मुझसे पूछ रहे हैं तो बतलाता हूँ बहुत दिनों पहले महर्षि वाल्मीकिने सौ करोड़ श्लोकोंमें आपके पावन चरितका वर्णन किया था । उसके मध्यम नौ काण्डोंका आनन्दरामायण है ॥ ३६ ॥ ४० ॥ उसका श्रवण तथा पाठ करनेसे आपकी सेनाके सारे सैनिकोंमेसे कुछ तो आपके परमपद (वैकुण्ठ) को और कुछ अन्यान्य लोकोंको चले गये हैं ॥ ४१ ॥ हे राम ! आप मेरी इस बातको सच मानिए । इस समय संसारमें कोई भी सेना नहीं है। नौ काण्डोंवाला आनन्ददायक एवं रमणीक वह आनन्दरामायण है ॥ ४२ ॥ उसका श्रवण करनेसे नीच जातिकाले लोग भी मुक्तिपद प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४३ ॥ सारकाण्डके श्रवणसे प्राणी संसारसे मुक्त हो जाता है। यात्राकाण्डके श्रवणसे तीर्थोंकी यात्राका पुण्य प्राप्त होता है ॥ ४४ ॥ यागकाण्डसे यज्ञोंका शुभ फल प्राप्त होता है । विलासकाण्डके श्रवणसे प्राणी स्वर्गकी अप्सराओंके साथ आनन्द करता है ॥ ४५ ॥ जन्म-काण्डके श्रवणसे पुत्रादि सन्तति पाता है । विवाहकाण्डको सुननेसे मनुष्य संसारमें सुन्दरी स्त्री पाता है ॥ ४६ ॥ राज्यकाण्डके सुननेसे प्राणी राज्यपद पाता है और मनोहरकाण्डके सुननेसे अपनी अभिलाषाके अनुसार सब वस्तुयें पा जाता है ॥ ४७ ॥ पूर्णकाण्डके श्रवणसे पूर्णपद प्राप्त होता है और समस्त आनन्दरामायण श्रवण करके मनुष्य सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मामे लीन हो जाता है । हे राम ! आपने मुझसे जो पूछा, सो सब मैंने

सर्ग. २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५४१

सर्ग. २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५४१

शत्रुघ्ने याति किं जातं तच्छृणुष्व सविस्तरात् । गते शून्या तु दूतानां वाग्भिर्देशेषु ये नराः ॥५१॥ तेऽपि सर्वे वरानन्दरामायणश्रवादिभिः । नानाविमानसंस्थास्ते ययुः स्वलोकमुत्तमम् ॥५२॥ शून्यं दृष्ट्वा निजं लोकं यमो विधिमन्वितः । कैलासे शङ्करं गत्वा सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥५३॥ शिवः श्रुत्वा निशम्याथ यमेन सह दुर्गया । ययौ स वृषमारूढः साकेतं वेष्टितोऽमरैः ॥५४॥ शिवमागतमाज्ञाय प्रत्युद्गम्य रघूद्वहः । वरासनं शिवं देव्या निवेश्य पूजनं व्यधात् ॥५५॥ ससीतो ब्रह्मशक्रापि सुराणां च यमस्य च । एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा राघवं प्राह वै तदा ॥५६॥ राम राजीवपत्राक्ष यमं पश्य निरामयम् । शून्या ह्ययमनी जाताऽऽनन्दरामायणश्रवात् ॥५७॥ शून्यो जातोऽस्तिभूलोकः खेऽवकाशो न दृश्यते । सर्वेषां तत्र वै वस्तुमग्र किंचिद्विधारय ॥५८॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा समाहूय रघूत्तमः । शत्रुघ्नं प्रेष्य गम्भीरि तस्मै वृत्तं न्यवेदयत् ॥५९॥ सोऽपि श्रुत्वा विहस्याथ राघवं वाक्यमब्रवीत् । येन मत्कार्यतानाशो न भविष्यति वै भुवि ॥६०॥ तथा सुखं च सर्वेषां तेन तत्कुरु राघव । तथेति राघवश्चोक्त्वा तदा वचनमब्रवीत् ॥६१॥ सप्तजन्मार्जितं पुण्यं ममार्चनसमुद्भवम् । यस्य स्यात्तस्य चानन्दरामायणकथारुचिः ॥६२॥ भविष्यति न सर्वेषां भवन्त्वत्र कदाचन । इति रामवचः श्रुत्वा सर्वे स्तुष्टमानसाः ॥६३॥ ययुः स्वं स्वं पदं देवाः स्वं स्वं देशं नृपाः ययुः । तदारभ्य विष्णुदास मुक्काटामत शुभे ॥६४॥ रामायणे शिवेनोक्तमानन्दाख्यामिदं शुभम् । रामायणं क्वचिन्मूर्त काश्रद्वेत्स्यति मानवः ॥६५॥ न भूम्यां सकला लोका वेत्स्यंति द्वापरे कलौ । सप्तजन्मार्जितं पुण्यं येषां वेत्स्यंति ते नराः ॥६६॥

कह सुनाया ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ भविष्यम अब जो कुछ करना चाहत हो, सो करत चलिए । इस प्रकार वसिष्ठ रामसे कह ही रहे थे, तब तक पृथ्वीमण्डलमें क्या हुआ सो कहते हैं । उन दूतांकी गति सुनकर संसारके जितने मनुष्य थे ॥ ५० ॥ वे सब आनन्दरामायणक पढन और श्रवणस अनेक प्रकारके विमानांपर चढ़-चढ़कर उत्तम स्वर्गलोकको चल गये ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ अपन लोकको शून्य देख यमराज ब्रह्माको साथ लेकर शङ्करजीके पास पहुँचे और प्रणाम करके उन्हें सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ५३ ॥ शिवजी यह समाचार सुनकर ब्रह्मा, पार्वती और यमराजको साथ ले तथा बहुतसे देवताओंसे वेष्टित होकर अयोध्यामें रामके पास गये ॥ ५४ ॥ जब रामको यह समाचार मिला कि शिवजी आये हैं तो प्रेमपूर्वक अगवानी करक गवतीक साथ शिवजीको एक दिव्य सिंहासनपर बिठाकर उनकी पूजा की ॥ ५५ ॥ इसके अनन्तर ब्रह्मा तथा शक्रादि देवताओंकी भी पूजा की। वांहीं बैठ बार ब्रह्माने रामसे कहा—॥ ५६ ॥ हे राजीवपत्राक्ष राम अथवा निरामय इस यमराजको ओर निहारिए । आनन्दरामायणके श्रवणसे इनका सयमनी पुरी शून्य हो गयी है ॥ ५७ ॥ भूलोक खाली हो चुका है और स्वर्गमें उन सबके रहनक लिए कुछ जगह ही नहीं रह गयी है । अब उनको रहनेके लिए कोई और स्थान सोचिये ॥ ५८ ॥ इस प्रकार शिवजीकी बात सुनकर रामने शत्रुघ्नको बुलाया और उनको यह समाचार सुनानेके लिये वाल्मीकिक पास भेजा ॥ ५९ ॥ शत्रुघ्न गये और वाल्मीकिको बुला लाये । रामके मुखसे यह वृत्तान्त सुना तो वाल्मीक हंसकर कहने लगे—जिस तरह संसारमें मेरी कविताका नाश न हो ॥ ६० ॥ और सब लोग प्रसन्न भी रह ऐसा कोई उचित उपाय सोचकर करिये । रामने उनकी बात मान श्री ओर बोले—॥ ६१ ॥ मेरा पूजन करत-करत जिनके पास सात जन्मोंका पुण्य एकत्रित होगा, उनको ही रुचि आनन्दरामायण सुननेकी होगी ॥ ६२ । भविष्यम साधारण लोगोंकी रुचि ही इस ओर नहीं होगी। इस प्रकार रामकी वाणी सुनकर सबका मन प्रसन्न हो गया ॥ ६३ । तब देवतागण अपने-अपने लोकोंको तथा राजा लोग अपन-अपन देशोंको लोट गये । तभीसे हे विष्णुदास ! मत्तकटारामचरितान्तर्गत इस आनन्दरामायणके विषयमें ऐसा हो गया कि कहीं-कहीं कोई ही कोई मनुष्य आनन्दरामायणको जानने लगा ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ द्वापर और कलिमं तो बहुत ही कम लोग इसे जाननवाल होंगे। क्योंकि उस समयसे यह नियम बन गया है कि रामचन्द्रके पूजनसे सात जन्मोंके पुण्य जब एकत्रित होंगे, तब आनन्दरामायणमें

५४२आनन्दरामायणे[ सर्गः २४

तद्रामवचनाद्भ्रान्त्या बभूव पूर्ववत्सदा । नाभूकस्य कदा मेधाऽऽनन्दरामायणं प्रति ॥ ६७॥
सहस्रेषु नरः कश्चित्सप्तजन्मसु पुण्यवान् । आनन्दरामचरितं वेद स्तोत्रं न चापरः ॥६८॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे
उत्तरार्द्धे आनन्दरामायणमहिमावर्णनं नाम त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥


चतुर्विंशः सर्गः

( रामका यमको उपदेश, सुमन्त्रका वैकुण्ठगमन और प्रजाको रामकी शिक्षा )

श्रीरामदास उवाच
एकदा संस्थितं रामं सभायां सेवकोऽब्रवीत् । राजराज महाराज रविवंशैकभूषण ॥ १ ॥
सुमन्त्रस्तेऽन्वितोवृद्धः स मन्त्री नाकं गतः प्रभो । तपन्त्यस्तं गन्तुमन्वाज्ञां पृच्छन्ति राघव ॥ २ ॥
तद्दूतवचनं श्रुत्वा चकितः हृष्टमानसः । शीघ्रं सुमन्त्रगेहं स ययौ यानेन राघवः ॥ ३ ॥
सुमन्त्रजन्मपट्टं तस्यायुःसंख्यां ददर्श सः । जन्मकालात्सहस्राणि नव नवशतानि च ॥ ४ ॥
नवनवतिवर्षाणि मासांस्त्वेकादशैव हि । एकविंशद्दिनान्यास्तांस्तथा शेषा दिना नव ॥ ५ ॥
ज्ञात्वैवं रामचन्द्रः स तदा प्राह गुरुं प्रति । कृत युगे तु लक्षायुः सहस्रं द्वापरे स्मृतम् ॥ ६ ॥
शतवर्षं कलौ प्रोक्तं सहस्राणि दशाथ वा । त्रेतायां कायतं चायुस्तन्मद्राज्ये मृषा कृतम् ॥ ७ ॥
यमेन मामवज्ञाय महद्दण्डं लघ्वामहेच्छता । दिनानिनव शेषाणि सांत मे मन्त्रिणः कथम् ॥ ८ ॥
यमेन नीतस्त्वद्यैव यमं दण्ड्या नयाम्यहम् । सुमन्त्रं त्रापयाम्यद्य पश्य मे त्वं पराक्रमम् ॥ ९ ॥
इत्युक्त्वा गरुडारूढः कोदण्डं कलयन् करे । वेगेन रघुनन्दनः स ययौ संयमनीं पुरीम् ॥ १०॥
तावन्मार्गे सुमन्त्रं तं पाशबद्धं यमानुगाः । गच्छन्तं राघवो दृष्ट्वा तान्त्सर्वांस्ताडयन्मुहुः ॥११॥
सुमन्त्रं मोचयामास लिंगरूपधरो प्रभुः । तदा तं राघवं प्रोचुश्चापराधं तवाद्य किम् ॥१२॥


लोगोंके हाथ होंगे और तथा लोग इस जानग । तबस रामके कथनानुसार किसीकी बुद्धि आनन्दरामायणकी ओर नहीं गयी ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ क्योंकि हजारोंमे कोई एक-आध मनुष्य ही संत जन्मोंका पुण्यवान् होगा और वही आनन्दरामायणको जान पायगा ॥ ६८ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयरचित व्याख्याभावाटीकासहित राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥

श्रीरामदास कहते लग—एक बार राम अपनी सभामें बैठे थे । तभी एक सेवकने आकर कहा—हे राज-राज ! हे सूर्यवंशके अलङ्कारस्वरूप महाराज आपका वृद्ध मन्त्री सुमन्त्रस्वर्ग चल गये। उनकी स्त्रियां सती होकर पतिकी अनुसरण करनेके लिये आपकी आज्ञा चाहती हैं ॥ १ ॥ २ ॥ इस प्रकारका सन्देश सुनकर राम एक रथपर सवार होकर सुमन्त्रके घर गय ॥ ३ ॥ वहाँ उन्होने उनकी जन्मकुण्डली मँगाकर देखा, जिससे ज्ञात हुआ कि ९९९९ वर्ष ग्यारह महीना सुमन्त्रकी आयु थी । जिसमे सब तो बीत गये, केवल नौ दिन बाकी रह गय थे ॥ ४ ॥ ५ ॥ ऐसा जानकर रामने गुरु वशिष्ठको बुलवाकर उनसे कहा कि सत्ययुगमें मनुष्यकी वायु लाख वर्षोंकी, द्वापरमें हजारकी, कलियुगमे सो वर्षकी तथा त्रेतायुगमें दस हजार वर्षकी कही गयी है । सो यमराजने मेरे राज्यमें मेरा अपमान करके उस नियमका उल्लङ्घन किया है ॥ ६ ॥ ७ ॥ ऐसा ज्ञात होता है कि वह मेरे द्वारा दण्ड पाना चाहता है । मेरे मन्त्रीकी वायुके अभी नौ दिन बाकी हैं तो यम उसे यहाँसे क्या ले गया ? मैं आज यमको दण्डकर लाता हूँ और सुमन्त्रको जिलाता हूँ। मेरा पराक्रम देखिए ॥ ८ ॥ ९ ॥ ऐसा कहकर राम गरुड़पर बैठ और धनुषको टङ्कार करत हुए यमकी संयमनी पुरीको चल दिये । तब तक रास्ते ही में उन्होंने पाशबद्ध सुमन्त्रको ले जात हुए कुछ यमदूतोंको दृष्टा । देखते ही रामने मुष्टियोंका मारकर लिंगरूपधारण सुमन्त्रको छुड़ा लिया। तब यमदूतोंने विनयपूर्वक