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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ३ ] विवाहकाण्डम् ३५९

सर्गः ३ ] विवाहकाण्डम् ३५९

सीतादिभिर्वारिणीषु संस्थिताभिन्मवा पथि । प्रासादोपरि मध्याभिर्नारीभिः पुष्पवृष्टिभिः । ६६॥ हरिद्रापीतधान्यैश्च माङ्गल्यैर्मौक्तिकैरपि लाजभिर्हेमपुष्पैश्च वर्षितावीक्षितौ मुहुः ॥ ६७॥ जग्मतुर्वालकावेवं पश्यन्तौ कौतुकानि हि । ददर्शतुरवाटिकाश्च सुवर्णवृष्टिविनिर्मिताः ॥ ६८॥ तथा कृत्रिमवृक्षांश्च पताकाश्च ध्वजांस्तथा तथौषधिमयान्वृक्षांन् वह्निस्पर्शविदीपितान् । ६९॥ घाटस्थानौषधीभिः पूरितान्कृत्रिमान् जनान् । तथा व्याघ्रादिकान््रहिंस्रान्नेपथ्यैश्च प्रपूरितान् ॥७०॥ तडित्समभ नां न रूपने प्रासादानौषधीमयान् । केकिचक्रोपमादींश्च चन्द्रज्योत्स्नास्तु कृत्रिमाः ॥७१॥ एवं ददर्शतुर्नानाकौतुकानि नृपात्मजौ तन्पत्नौ भूरिकीर्तेश्च मन्त्रा मण्डपमुत्तमम् ॥७२। नानामहोत्सवैर्यक्तौ नानच्छत्रमण्डितौ अवतीर्य गजेन्द्राभ्यां नस्थतुर्मण्डपांगणे ॥७३। मधुपर्कविधानादि विधानेनि वै क्रमात् । विर्धुरू चक्रतुस्तौ ब्राह्मणैः पारेवेष्टितौ ॥७४। ततो वद्ध्वोः पूजनं च र्मात्यः रघुनन्दनः चकार गुरुणा युक्तस्तदा स मण्डपांगणे ॥७५॥ ततो लग्नमुहूर्ते नं कुत वशिष्ठस्य गुरुः । नया त्वं मुफ्यापि पृथग्वेदिकयोस्तदा ॥७६। कृत्वा सुसंस्थितौ चौतौ दम्पत्योरन्तरे पटो । धून्तोमयैः पृथक् चित्रौ नूतनौ हेमतन्तुजौ ॥७७॥ नानामगलरोषांश्च मुनेर्विक्रममुद्रैः । अगन्तवे जनास्तृष्णीं शृण्वंतो मंगलस्वनम् ॥७८।

इति श्रीशतकोटिकामचरित्रांर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे सुरासुरविवाहवर्णनं नाम तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥


एवं वन्दोजनोंकी स्तुतियां सुनते हुए राजा भूरिकीत्तिके महलोंकी ओर चले जा रहे थे ॥ ६५ ॥ सीतादिक माताएं हविशियोंपर बैठी थीं। प्रासादोंपर बैठी हुई नगरवासिनी नारियां उनपर फूल बरसा रही थीं। साथ बीचमें हल्दीसे रंगे पीले रंगके अन्न, मागुल्य मोक्तिक, धानके लावे और सुवर्णके बने फूल भी बरसते जा रहे थे। वे नारिया तृण लकी प्रेमभरी दृष्टिसे निहार रही थीं। इस तरहके कौतुक दखत हुए वे दोनों बालक चले जा रहे थे। रास्तेमें सुवर्णको वनी हुई स भी वाटिकाएं, कृत्रिम वृक्ष, पताका, ध्वजा, इस तरह बने जिसे देख जा आपकी चिनगारी पाकर जलने लगत थे ॥ ६६-६९ ॥ उन्हें और राहोंपर बैठे हुए ओषधिपूण बनावटी मनुष्यों, मसालेसे भरे हुए व्याघ्र आदि हिंस्र जन्तुओं, औषधि के संयोगसे बिजलीकी नाई चमकते हुए महलोंतथा मयूर आदिके छूटते हुए चत्रोको वे राज कौतूहल भरी आंखोंसे देखते जा रहे थे । ७० । ७१ । इस प्रकार मार्गमें अनेक कौतुकोंको देखते हुए वे राजा भूरिकीर्तिके उत्तम मंडपमें पहुंचे उस समय लाग में महान् उत्साह दिखायी पडता था। उन बच्चोंपर छत्र लगे थे और दिव्य चमर ढुल रहे थे। यहां पहुँचकर वे हाथी से उतरे और मण्डपाङ्गणम पहुंचे ॥ ७२॥ ७३ । उनके गुरुजनोने ब्राह्मणोंके साथ मधुपर्क विष्टर आदि विधि सम्पन्न किये । ७४ ।। इसके अनन्तर रामने सीता तथा गुरुजनोंके साथ उस मण्डपमें उन दोनों वधुओं की पूजा की ॥ ७५ ॥ तदनन्तर लग्नका मुहूर्त आनेपर गुरु वसिष्ठने कुशकी यम्विकाके साथ एवं लवको नृपतिके साथ अलग-अलग वेदीपर बिठाला ॥ ७६ ॥ इस तरह दोनों वर-वधुआंकी अच्छी तरह बिठाकर उनके बीचमें एक-एक पर्दा डाल दिया और सब लोग चुपचाप गुरु वसिष्ठके मुखसे उच्चरित नाना प्रकारके मागलिक श्लोकों सुनने लगे ॥ ७७ । ७८ । इति श्रीशतकोटिराम-चरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित 'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥

३६० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४ ]

चतुर्थः सर्गः

( लव-कुशके विवाहका वर्णन )

श्रीरामदास उवाच

श्रीमती रघुनाथश्च गिरिजा शंभुगणेशषण्मुखा
नन्दीगणेशलक्ष्मणौ च भरतः कजोद्भवः शत्रुहा।
सर्वे ते मुनयः सुराश्च दितिजान्तीर्थादिनद्यो नदाः
दिक्पालाः शशिभास्करौ च हनुमान् कुर्वन्तु वो मगलम् ॥ १ ।

तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चन्द्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव सीतापतेर्यत्स्मरणं विधेयम् ॥
एवं मङ्गलघोषैश्च नानावाद्यपुरःसरम् । ततःस्वंतःपटीं मुक्त्वा ऽऽपुण्याहमिति स्मरन् । ३ ॥
तयोस्ते पाणिग्रहणविधानं विधिपूर्वकम् । लाजहोमादिकं सर्वं चक्रतुर्मङ्गलपूर्वकम् ॥ ४ ॥
तदा महावाद्यघोषा निनेदुर्मंडपांगणे । ननृतुर्वारमुख्याश्च तदा मागधवन्दिनः ॥ ५ ।
जगुर्मङ्गलगीतानि तुष्टुवुस्ते महास्वनैः । तदा दानान्यनेकानि चक्रतुस्तौ नृपोत्तमौ ॥ ६ ॥
भूरिकीर्तिरामचंद्रौ महानंदप्रपूरितौ । अथ तौ बालको वध्वौ निजकटगोन्निवेश्य वै ॥ ७ ॥
सीतोर्मिलादिभिः स्त्रीभिर्जग्मतुर्भाजनगृहम् । तत्र गौरीहरौ पूज्य चक्रतुश्चाम्रसिंचनम् ॥ ८ ।
सतः कुशश्चांपिकया सुप्रत्या स लबोऽपि च । चक्रतुर्भोजनं चोभौ स्त्रीभिः सर्वत्र वेष्टितौ । ९ ।
मात्रा सहोपनयने विवाहे भार्यया सह । अन्येन नैव भोक्तव्यं भुक्तं चेत्पतितः स्मृतः । १०॥
रामोऽपि बन्धुभिः पौरैः सुहृद्भिः पार्थिवोत्तमै । चकार भोजनं भूरिकीर्तेः सद्मनि वै मुदा । ११॥
एवं सीताऽपि नारीभिश्चकार भोजनं तदा । भूरिकीर्तेः स्नुषाभिः सा प्रार्थिता वन्दिता मुहुः । १२।
ततो नानारथोत्साहान् भूरिकीर्तिश्चकार सः । अथ तौ बालको रम्यौ स्त्रीवाक्यैर्मातृसन्निधौ । १३॥
स्वश्वश्रूसन्निधौ चापि स्त्रीभिः सर्वत्र वेष्टितौ । स्वस्वपत्न्योः पदयोः शिरोभ्यां नमनं मुहुः । १४।


श्रीरामदास कहते हैं— सीता, राम, गिरिजा, शिव, गणेश, नन्दी, स्वामिकार्तिकेय, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, ब्रह्मा, समस्त ऋषि, देवता, दैत्य, सारे तीर्थ, नदी, दिक्पाल, चन्द्रमा, सूर्य एवं हनुमान्जी ये सब आप लोगोंका कल्याण करें ॥ १ ॥ वही लग्न है, वही सुदिन है और ताराबल तथा चन्द्रबल भी वही है, जिससे कि सीतापतिके स्मरण किया जाय ॥ अनेक प्रकारके बाजोंके साथ इस तरह मङ्गल-घोष करनेके अनन्तर 'अपुण्याहम्' ऐसा उच्चारण करते हुए कनिष्ठांत वस्त्रका दूर कर दिया ॥ ३ ॥ विधिसहित हवनादि कृत्यके साथ-साथ उन दोनों वर-वधुओंके पाणिग्रहण संस्कार किये ॥ ४ ॥ उस समय मण्डपमें महावाद्यघोष हुए, वेश्याएं नाचीं, मागध और वन्दी जनोंने स्तुतिपाठ हुए और गाने गाये गये। उस समय उन दोनों राजाओं (राम और भूरिकीर्ति) ने अनेक प्रकारके दान दिये ॥ ५ । ६ । दोनों सम्बन्धी उस समय बड़े आनन्दित थे। तदनन्तर दोनों बालक अपनी अपनी स्त्रीको कमरपर बिठाकर सीता-उर्मिलादिकाके साथ भोजनशाला गये। वहाँ उन्होंने शिव-पार्वतीकी पूजा की और आम्रसिञ्चन-विधि सम्पन्न की ॥ ७ ॥ ८ ॥ तब सब स्त्रियोंसे वेष्टित चम्पिकके साथ बैठकर कुशने और सुमतिके साथ लवने भोजन किया ॥ ९ ॥ क्योंकि शास्त्रका कहना है कि उपनयन संस्कारमें माताके साथ एवं विवाहमें अपनी स्त्रीके साथ बैठकर नर भोजन करे और किसीके साथ नहीं। यदि किसी औरके साथ भोजन करे तो भ्रष्ट पतित कहा जाता है ॥ १० ॥ उधर राम जी अपने भाइयों, पुरवासियों, सम्बन्धियों और राजाओंके साथ महाराज भूरिकीर्तिके भवनमें गये और वहाँ भोजन किया ॥ ११ ॥ उसी तरह सीताने भी स्त्रियोंके साथ जाकर भूरिकीर्तिकी बहुओंके प्रार्थना करनेपर उन्हींके यहाँ भोजन किया ॥ १२ ॥ इसके पश्चात् राजा भूरिकीर्तिने विविध प्रकारका उत्सव

सर्गः ४ ]

सर्गः ४ ] विवाहकाण्डम् २६१

चक्रतुस्तोषसम्पूर्णौ ते तत्रापि स्मिताननौ । वधूरथैश्च सर्वे निष्कपीता विरेजिरे ॥१५॥ कुङ्कुमाङ्कितपादी ते ददतुर्लक्ष्मरूपयोः । एवं नानामहोत्साहैर्गतास्तेषां दिनत्रयम् ॥१६॥ चतुर्थे दिवसे रात्रौ वध्वाप्तविराजिते । दर्पणेनार्त्तिजैर्नौ चांसौ बालको तौ विरेजतुः ॥१७॥ ततस्तौ बालकौ पत्न्योः स्वस्वस्याङ्के निवेश्य च । चक्रतुस्ताण्डवं नृत्यं कुशलौ मण्डपांगणे ॥१८॥ मातृश्वश्वादिकासु पश्यत्सु च समासदम् । यौतुकं भूरिकीर्त्तिः कुशाय च लवाय च ॥१९॥ ददौ तुष्टमनाः श्रीशं रामसम्बन्धहर्षितः । नियुतानां गजेन्द्रांश्च शिविकाश्चापि तन्मिताः ॥२०॥ तुरङ्गान्रथसंयुक्तान् नियुतान्सन्ददौ द्वयोः । ताभ्यां पृथक् पृथक् पौत्रीभवन्त्या द्रव्यपूरितान् ॥२१॥ नानालङ्कारवासांसि गा दासीः सेवकैस्तथा । ददौ ताभ्यां भूरिकीर्त्तिर्यत्संख्या सम्भवा न विद्यते ॥२२॥ एवं सम्मानितस्तेन धीमतो भूरिकीर्त्तिना । सपत्नीकाभ्यां पुत्राभ्यां गजारूढाभ्यो समन्वितः ॥२३॥ सीतया वधुभिः पौरैः सुहृद्भिर्भातृभिर्नृपैः । पूर्ववद्दुन्दुभ्याद्यैश्च स ययौ स्वकीयमण्डपम् ॥२४॥ अरण्ये ततो रामो मासमेकं विधाय सः । चकार सीतया क्रीडां नौकासंस्थो महोदधौ ॥२५॥ ततः स्नुषाभ्यां श्रीर मो ययौ निजपुरीं सुखम् । अयोध्याया विजितोऽपि श्रुत्वा रामं समागतम् ॥२६॥ स पुर्या रक्षणार्थं हि रामेणाज्ञापितः पुरा । स पुरीं शोभयामास पताकाध्वजतोरणैः ॥२७॥ वरेंद्रं पुरस्कृत्य नृत्यवादित्रनिःस्वनैः । विजयो गमनायेतो रामं प्रत्युद्गतो जवात् ॥२८॥ अथो नदत्सु वाद्येषु रामो दारैः सुहृज्जनैः । स्नुषाभ्यां सीतया वधूवन्तीभिर्भ्रातृभिः पुरीम् ॥२९॥ विवेश सेनया पौरैः पश्यद्भ्यश्चादिकं पथि । तदा वेश्या ननृतुस्तुष्टुवुर्वन्दिमागधाः ॥३०॥ स्वस्वपत्न्येयुतौ बालौ वरवारणयोः स्थितौ । तदा विरेजतुर्मेगि श्रीभिः पुष्पैः प्रवर्षिणौ ॥३१॥

... उन दोनों बालकों ... का ... वास बैठ गया अपना साम भूरिकीर्ति से वेष्टित होकर अपनी-अपनी स्त्रियोंकी वन्दना की ॥ १५-१६ ॥ उस समय वे वर वधु अतिशय प्रसन्न होकर मन्द-मन्द मुसका ... । रामके पीछे प्रकाशमय वे बड़े सुन्दर दीखते थे ॥ १५ ॥ इसके बाद उन दोनों बहुओंने कुमकुम- ... हुए अपने चरण पतिके गोदपर रख दिये । इस तरह नाना प्रकारके उत्सवके साथ तीन दिन बीते ॥ १६ ॥ चौथे दिन के समय ... कुशकी आरती की गयी । उस समय ... उनकी सुन्दरता देखने ही योग्य थी ॥ १७ ॥ इसके अनन्तर वे दोनों बालक अपनी अपनी स्त्रियोंको बैठ- ... कर ... ताण्डव नृत्य करने लगे ॥ १८ ॥ माताएं म... आदि स्त्रियाँ मण्डपमें बैठी यह कौतुक देख रही थीं । महाराज भूरिकीर्तिने अपने दोनों जामाताओको खूब दहेज आदि भी दिये ॥ १९ ॥ रामके सम्बन्धसे ... होकर उन्होंने उन्हें एक लाख हाथी, उतनी ही पालकियों, पाँच लाख घोड़े, एक लाख रथ, अश्रफि- ... तथा भारी सम्पत्ती ... द्रव्यसे भरकर दोनों बहुओंको दीं ॥ २०-२१ ॥ इनके सिवाय विविध ... के वस्त्र, गायें, दास, दासी और नौकर इतने दिये कि जिनकी गिनती सम्भव नहीं थी ॥ २२ ॥ ... सम्मानित होकर भाग्यवान् ... के साथ दोनों पुत्रोंके साथ हाथीपर सवार होकर ... नारियों, सुवासिनों, ... मण्डप- ... ॥ २३-२४ ॥ इसके अनन्तर रामने उस वटवृक्षमें एक मास बिताया । वहीं वे कभी कभी नौकापर ... क्रीड़ा किया । उधर अयोध्यामें उस विजयने, जिसको राम नगरकी रक्षाके लिए छोड़ आये थे, ... आगमनका हाल सुनी तो उसने ध्वजा-पताका-तोरण आदिसे नगरीको खूब सजाया । २५ ॥ २६ ॥ २७ ॥ ... हाथीको आगे करके रामका मंत्री विजय रामकी अगवानी करने जा पहुँचा ॥ २८ ॥ इसके अनन्तर ... विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे तब राम अपने स्त्री, सुहृज्जन, बहुओं, सीता, पुरवासियों तथा ... साथ पुरीमें प्रविष्ट हुए । २९ ॥ उस समय वेश्या नाच रही थीं और मागध तथा बन्दीजन ... कर रहे थे ॥ ३० ॥ अपनी अपनी पत्नीके साथ दोनों बालक (कुश और लव) हाथीपर बैठे हुए

३६२ आनन्दरामायणे [सर्गः ४

एवं रामो गृहं गत्वा बालाभ्यां स्वीयमब्रवीत्। कारयित्वा समाश्चर्यं मददीद्दानान्यनेकशः ॥३२॥
तदाऽलङ्कारवस्त्राद्यैः संपूज्य रघुनन्दनः । मुदः सकलांश्चापिनिशान् जानपदान्नृपान् ॥३३॥
आचांडालदिकान्त्सर्वान् संतुष्टानकरोन्मुदा । ततः स भूरिकीर्तिस्तान् मन्त्रिणः सैन्यसंयुतान् ॥३४॥
सम्पूज्य प्रेषयामास स्वदेशं रघुनन्दनः । तत स्मातुन् जानपदान् महदृश्च प्लवङ्गमान् ॥३५॥
विभीषणादिकांश्चाज्ञां संमु मान्यस्थल ददौ, ततः सर्वे राघवस्य ने संभाषणाद्युहिनैः ॥३६॥
स्वस्वकोशेषु संपूर्य ययुः स्वं स्वं गृहं मुदा । मृगंडेशैर्नभेश्चरैः सर्वैः संपूज्याश्च तिवारिवाः ॥३७॥
अथ रामः स्नुषाभ्यां च पुत्राभ्यां बन्धुभिःसिया । राज्यं चकार राज्यं स भक्तेणप्रतिभं चिरम् ॥३८॥
ततः श्रावणमासस्य दर्शमारभ्य षोडश । प्राप्तमन्वन्तरे यानि सनिमुख्यार्हदिनानि हि ॥ ३९॥
नेषु मासं सं राम मागरूपं सवानरम् । संपूज्य भूरिकीर्तिः स विनाय परमं पदम् ॥४०॥
ऋणभायै विविधैर्वस्त्रालङ्कारवाहनैः । कियद्दिनानि सम्भाव्य ददावाज्ञां पुनः पुनः ॥४१॥
मन्वन्तरप्रमुखार्हदिनानि षोडशाधुना । विष्णुद स मया तेऽग्रे कथ्यन्ते तानि वै शृणु ॥४२॥
श्रावणस्याथ मासस्य कुहः श्रेष्ठा प्रकीर्तिता । भाद्रशुक्लचतुर्थी तु विजया दशमी नरापुनः ॥४३॥
दीपावल्याश्च चत्वारि दिनान्यानि हि । मार्तंडार्य पदंमा च तथा षष्ठाऽथ पुनः ॥४४॥
मक्रान्तिर्महानवम्या तु तथा चैव नवम्यपि । ... षष्ठ्युत्सवाश्चाथ पुनस्तदा ॥४५॥
अक्षय्याख्या तृतीया च तथा वै ज्येष्ठपूर्णिमा । कार्त्तिके हुतशांडश्चैव पञ्चैतानि हि ॥४६॥
मन्वन्तरप्रमुख्यानि त्वाख्यातानि... । तस्मिन् सर्वान् जनान् रामः सादरं पर्यपूजयत् ॥४७॥
एवं कुशस्य च तथा लवस्यापि सविस्तरम् । विरहोऽती रतिर्भर्ते शिष्य यथा पूर्वं श्रुतौ मया ॥४८॥
यदा श्रीरामचन्द्रश्च वैकुण्ठारोहणं शुभम् भवितव्येति तदाऽयोध्यापुर्यां वै मग्न्युजले ॥४९॥

सुशोभित हो रहे थे और अनेक नगाड़े बजने लगे थे, उसपर फूल बरस रहा था ॥३२॥ इस तरह बड़े उत्साहके साथ वे अपने राजभवनमें पहुंच वहां उन्होंने आश्चर्य्य रूपसे संस्कार दूरस्त कराया और अनेक तरहके दान दिये ॥३३॥ उस समय रामने अपने सम्बन्धीगण, समस्त पुरवासियों, मित्रों जनपदवासियों और चाण्डालों से लेकर साधारण श्रेणीवाले पालोंको सबका नाना प्रकारके वस्त्रों और अङ्गलङ्कार समर्पण करके सबको प्रसन्न किया। इसके पश्चात् महाराज भूरिकीर्तिके मंत्रियों तथा सेनाकी पूजा करके उन्हें विदा किया। इसके बाद जनक आदि सम्बन्धियों, वानरों तथा विभीषण आदि मित्रोंको उच्च प्रमाण के आदर के साथ सम्मामित करके अपने नगरको जानेकी आज्ञा दी ॥३३-३६॥ इस प्रकार रामके आदर सत्कारको स्वीकार करके उन लोगोंने भी वैसे रामका पूजा की और अपन-अपने देशको लौटे ॥३७॥ इसके बाद राम सीता पुत्रों एवं वधुओंके साथ रहते हुए बहुत दिनों तक धर्मातुकुल राज्य करते रहे। ३८। तदनन्तर श्रावणकी अमावास्यासे लेकर वर्षमें षोडश बड़े त्योहारों और उत्साहके दिनोंमें हजार व परिवार के साथ पुर समेत सुग्रीवको अपने यहां सादर बुलाते थे । ३९ । ४०॥ वहां पहुंचनेपर वे वस्त्र अलंकारादि समर्पित करके उनकी पूजा करते थे। कुछ दिन राम वहां रहकर फिर उनको राज भवन और सुग्रीवको आज्ञापर फिर पहुंचा जाया करते थे ॥४१॥ हे विष्णुदास अब मैं तुम्हें वर्षके उन सोह दिनों के नाम सुनाता हूँ सो तुम उन्हें श्रवण करो ॥४२॥ हे श्रावण मासकी अमावसया, भाद्रपद शुक्लपक्षकी चतुर्थी व उसकी विजया दशमी ॥४३॥ और दीपावलीके आगे पाछवाले चार दिन बड़े महत्पूर्ण होते हैं ।४४। मार्गशीर्ष कृष्णपक्षकी पंचमी तथा षष्ठी, मकरकी संक्रान्ति रघुनवमी और चैत्र शुक्लकी हुताशनी प्रतिपदा का बड़ा पवित्र शिव योग है ॥४५॥ अक्षयतृतीया ज्येष्ठकी पूर्णिमा और श्रावणके शुक्लपक्षकी नागपंचमी व छटवें मान्यवर शिव योग हैं ॥४६॥ ये ही मन्वन्तरके बड़े बड़े उत्सव और इस मासमें पड़े हैं। इन्हीं दिनों भारण कि सपरिवार रामके अपने यहां बुलाकर पूजन करते थे ॥४७॥ हे शिष्य ! जैसा कि मैंने आजके बहुत दिनों पहिले कुश तथा लवका विवाह वृत्तान्त सुना था, उसी तरह वर्णन किया ॥४८। इसके

सर्गः ६ ] विवाहकाण्डम् ३६३

सर्गः ६ ] विवाहकाण्डम् ३६३

कुशः स्त्रिया चंपिकया जलक्रीडां करिष्यति । तस्य दक्षिणहस्तस्य कंकणं रुक्मनिर्मितम् ॥ ५० ॥ सरयूजलमध्ये तु पतिष्यति महोज्ज्वलम् । तत्र तोये कुमुदस्य पन्नगस्य कुमुद्वती ॥ ५१ ॥ स्वसा दृष्ट्वा कंकणं तद्गृहीत्वा सप्र यास्यति । कुशोऽपि कंकणार्थे हि बाणं संधायिष्यति ॥ ५२ ॥ सरयूशोषणाथं हि मनयुद्धो भविष्यति । ततः सा कुमुदं गत्वा सरयूः प्रार्थयिष्यति ॥ ५३ ॥ सोऽपि दृष्ट्वा कुशं क्रुद्धं स्वसामादाय सादरम् । कुजमागत्य तं नत्वा स्वसां तस्मै प्रदास्यति ॥ ५४ ॥ रत्नानि ककणं दत्त्वा तेन सख्यं करिष्यते । एवं कुमुद्वतीभार्याऽग्रे तस्यान्या भविष्यति ॥ ५५ ॥ तस्यां कुशान्मुतनयोऽतिथिर्नाम्ना भविष्यति । चंपिकाया दुहितरः समविष्यन्ति नो सुताः ॥ ५६ ॥ अतिथेः सूर्यवंशोऽग्रे चिरं विस्तारमेष्यति । एवं कुशस्य द्वे पत्न्यौ वर्णिते शिष्य वै मया ॥ ५७ ॥ अथ स्वीयगृहे पत्न्याऽकरोत्क्रीडां कुशः सुखम् । तथा स्वीयगृहे पत्न्याऽकरोत्क्रीडां लवोऽपि च ॥ ५८ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे कुशलवयोर्विवाहवर्णनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चमः सर्गः

( रामका गन्धर्वकन्याओं और नागकन्याओंको जलदेवीके पंजेसे छुड़ाना )

श्रीरामदास उवाच

एकदा रघुवीरः स सीतया बालवधुभिः । पौरैर्मन्त्रिजनैरिष्टैः पुष्पकस्थो ययौ वनम् ॥ १ ॥ पश्यमानान्कौतुकानि रञ्जयन् जानकीं मुदा । ययौ स दण्डकारण्‍यमगस्तेराश्रमान्तिकम् ॥ २ ॥ रामस्यागममाकर्ण्य कुम्भजन्मा मुनीश्वरः । प्रत्युद्गम्य रघुश्रेष्ठं निनाय स्वाश्रमं प्रति ॥ ३ ॥ ततः स मुनिवर्यस्तु स्नात्वा रहसि संस्थितः । अन्नपूर्णां महालक्ष्मीं चिंतयामास चेतसि ॥ ४ ॥


आगे जब कि रामचन्द्रजीका राज्यारोहण हो जायगा । तब एक समय अयोध्यापुरीके सरयूजलमें कुश अपनी स्त्री, चम्पिकाके साथ जलक्रीड़ा करते रहेंगे । उसी समय कुशके दाहिने हाथका सुवर्णकंकण जल-में गिर पड़ेगा । उस जन्म कुमुद नामक सर्पकी बहिन कुमुद्वती उस कङ्कणको लेकर घर चली जायगी और कुश अपने कङ्कणके लिए धनुषपर बाण चढ़ावेंगे ॥ ४९-५२ ॥ इस प्रकार क्रुद्ध कुश सरयूको सुखा देना चाहेंगे । इसपर सरयू कुमुदके पास जाकर प्रार्थना करेंगी । ५३ ॥ कुमुद भी सरयूके कथनानुसार कुशको कुपित देखकर उनके पास आयगा और उन्हें प्रणाम करके अपनी बहिन कुमुद्वती कुशको दे देगा और बहुतसे रत्न तथा वह खोया हुआ कङ्कण देकर उनसे मित्रता कर लेगा । इस तरह कुछ समय बाद कुशकी कुमुद्वती नामकी एक दूसरी भार्या भी होगी ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ उससे कुशका सुन्दर पुत्र अतिथि होगा । चम्पिकासे कन्यायें ही होंगी, पुत्र नहीं होंगे । ५६ ॥ आगे चलकर इसी अतिथिसे सूर्यवंशका विस्तार होगा । हे शिष्य ! इस प्रकार मैंने कुशकी दोनों पत्नियोंकी कथा यह सुनायी ॥ ५७ ॥ यह सब हो जानेपर कुश अपनी स्त्री चम्पिका तथा लव सुमतीके साथ आनन्दपूर्वक जीवनय पन करेंगे । ५८ । इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्द-रामायणे पण्डितरामतेजशास्त्रिविरचितभाषाटीकासहितं विवाहकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

श्रीरामदास बोले-एक बार रामचन्द्रजी बालवधुओ, पुरवासियों, मन्त्रियों तथा इष्टजनोंके साथ पुष्पकविमानपर बैठकर अनेक प्रकारके कौतुक देखते और सीताको प्रसन्न करते हुए वनमें गये । वहाँ दण्डकारण्यमें अगस्त्य ऋषिके आश्रमपर जा पहुंचे ॥ १ ॥ २ ॥ जब कि अगस्त्यजीको रामके आनेका समाचार मिला तो अगवानीके लिए स्वयं गये और उन्हें आदरपूर्वक अपने आश्रममे ले आये । ३ ॥ इसके अनन्तर स्नान करके अगस्त्यजी एकान्तमे बैठ गी मन ही मन महालक्ष्मी अन्नपूर्णाका ध्यान किया ॥ ४ ॥

३६४ आनन्दरामायणे [ सर्ग ५


तदा तत्तपसा तुष्टाऽऽविर्बभूव सुरेश्वरी । ददौ तस्मै पाथवेन पूरितं पात्रमुत्तमम् ॥ ५ ॥
अन्नपूर्णा मुनिं प्राह स्थाल्यास्मान् विद्धिधान हि । पक्वान्नानि यथेष्टानि निष्कास्य तव भामिनी ॥ ६ ॥
सर्वेषामग्रतः शीघ्रं करोतु परिवेषणम् । इत्युक्त्वा साऽन्नपूर्णा तं मुनेरन्तर्दधे तदा ॥ ७ ॥
लोपामुद्रा पुनः पत्नी स्थाल्या निष्कास्य वेगतः । दिव्यान्नानि विचित्राणि सर्वेषां पुरतस्तदा ॥ ८ ॥
सर्वार्चितानां विप्राणां चकार परिवेषणम् । अथ तुष्टो मुनेष्टुष्ट्यै कंकणं रत्ननिर्मितम् ॥ ९ ॥
ददौ मुदा कुम्भजन्मा सीतायै दिव्यकुण्डले । एव संपूजितस्तेन मुनिना रघुनन्दनः ॥ १० ॥
सहितोऽगस्तिना स्थित्वा पुष्पकै पूर्वकं पुनः । पश्यन्तौ दण्डकारण्य कौतुकानि समन्तः ॥ ११ ॥
विचचार रघुश्रेष्ठो दर्शयामास मैथिलीम् । नानादृक्षांश्चपर्वतांश्च नदीः पक्षिगणान्मृगान् ॥ १२ ॥
पञ्चाप्सरभगे नाम ददर्शाम्रे भ्रमन् सरः । तत्तटे राघवो रात्रौ निवासमकरोन्मुदा ॥ १३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे रात्रौ नृत्तमप्सरसां शुभम् । शुश्राव मधुरं गीतं सीतया मंचके प्रभुः ॥ १४ ॥
तेऽपि सर्वे शुश्रुवुस्तन्नृत्यं गीतं च सुस्वरम् । अदृष्टाऽप्सरसस्तत्र तदा स रघुनन्दनः ॥ १५ ॥
पप्रच्छ कुमजन्मानं गीतं नृत्यं कुतस्त्विदम् । श्रुतं मुनिशार्दूल वदस्व त्वं सविस्तरम् ॥ १६ ॥
इति रामवचः श्रुत्वा तमगस्त्योऽब्रवीन् । राम राजीवनेत्र त्वं किन्तं वेत्सि न वै स्विद्म् ॥ १७ ॥
सर्वानेतान्मन्मुखेन वृत्त श्रोतुमितुं मुदा । चेन्मां पृच्छसि महांश्र्व तवाग्रे प्रवदाम्यहम् ॥ १८ ॥
पुरा गन्धर्वराजस्य पुत्र्यः पञ्च मनोरमाः । अगञ्जुका मुदा कीडां चक्रुश्च सरोवरे ॥ १९ ॥
एतस्मिन्नन्तरे राम नागकन्याः सरोवरात् । क्रीडार्थ निर्ययुः सप्त बहिरप्राप्तयौवनाः ॥ २० ॥
तासां परस्परं मैत्री बभूव रघुनन्दन । तत्र ता नागकन्याश्च तथा गन्धर्वकन्यकाः ॥ २१ ॥
यथागतं सदा चक्रुः क्रीडार्थं मग्म्यतटे । तपसा मुनिना तत्र मुहुर्वाक्यैनिवारिताः ॥ २२ ॥

उसी समय उनका तपस्यासे प्रसन्न होकर देवलोकाध्यक्षी अन्नपूर्णा प्रकट हो गयीं। उन्होंने अगस्त्यजीको खीरसे भरा एक पात्र दिया ॥५॥ और कहा कि इस बटलोईमैसे विविध प्रकारके पक्वान निकाल-निकालकर तुम्हारी स्त्री सबको आगे परस दे। इतना कहकर अन्नपूर्णा अन्तर्धान हो गयीं ॥६-७॥ इसके अनन्तर जब कि अगस्त्यजी ने ऋषियों तथा विप्रों समेत रामकी पूजा कर ली, तब अगस्त्यजी की पत्नी लोपामुद्रान उसी पात्रमेसे पक्वान्न निकाल निकाल कर सबके आगे परस दिया। भोजनोपरान्त प्रसन्न मनवाले रामको अगस्त्याने एक जोडा कङ्कण और सीताको कुण्डल दिये ॥८-१०॥ इस प्रकार अगस्त्यसें सत्कृत होकर राम अगस्त्यको अपने साथ बिठा सबके साथ पुष्पक विमानपर जा बैठे और दण्डकारण्यम चारों ओर विविध प्रकारके कौतुक देखते हुए इधर-उधर घूमने लगे ॥११-१२॥ रामने नाना प्रकारके वृक्ष, पर्वत, नदी, पक्षी आदि सीताको दिखाये। दूर में पंचाप्सर नामक सरोवरपर पहुंचे और वहांपर रामने रात्रिभर निवास किया ॥१३॥ रात्रिके समय जबकि राम सीताके साथ अपनी शय्यापर सोयेथे, तब उन्ह मीठे-मीठे गीत और नृत्यकी ध्वनि सुन पड़ी १४। उनके सिवाय सबके मायकेवालोंने भी वह सुन्दर ध्वनि सुनी किन्तु अप्सरायें नहीं दीख पडी । तब रामने अगस्त्यसे पूछा हे मुनिश्रेष्ठ ! आप मुझ यह बतलाइये कि यह नृत्य गानकी ध्वनि कहाँसे आती सुनायी दे रही है म विस्तारपूर्वक मुझे बतलाइये ॥१५॥१६॥ रामकी बात सुनकर महर्षि अगस्त्यने कहा हे राजीवलोचन राम ! क्या आप यह वृत्तान्त नहीं जानते ? ॥१७॥ अथवा यदि व्योममरीलता चाहते हैं तो मै आपको सुना रहा हूँ ॥१८॥ प्राजन बहुत दिनों पहिले गन्धर्वराजकी पाँच सुन्दर कन्या जिनका कि रजोधर्म भी नहीं हुआ था, आनन्दपूर्वक इस सरोवरमे जलक्रीडा किया करती थी ॥१९॥ हे राम ! उसी समय एक बार उस सरोवरसे सात नाग-कन्यायें भी जलक्रीडा करनेको निकलीं। उनको भी वय-वय थी और यौवनका रंग अभी नहीं चढा था ॥२०॥ तदनन्तर उन गन्धर्वकन्याओं और नागकन्याओमें परस्पर मित्रता हो गयी और वे नित्य उस सरो-वरमें जलक्रीडा करनेको आनेजाने लगीं । उसी सरोवरपर तपस्या करते हुए एक तपस्वीने उनको कई बार

सर्गः ६ ] विवाहकाण्डम् ३३५

भाण्डप्रच्छन्नं मन्निस्तेने रोदिता बालभावतः । अता यचदनदुकथ्य समानासुभ्ररन्तसम् ॥२३॥
इन्द्रेण बोधिताश्चापि तपोध्वंसं प्रते । मुनिथापि नपोनाशं दृष्ट्वा शापादिना तदा ॥२४॥
बिना शापेन तासां म दण्डं सम्प्रवत्तहृत् । यन्तवृहन्तामाश्रयन् जलदेवीः प्रचोदयत् ॥२५॥
तद्वाक्याज्जलदेव्यस्ता मध्याह्ने स्वीयमह्निभू । निन्युर्यत्र बलादेव यत्र केषां गतिर्न हि ॥२६॥
गंधर्वाः पन्नगा यत्र गतुं शक्ता न चामराः । तपोबलेन मुनिः स्वर्ग गतस्ता ह्यत्र संस्थिताः ॥२७॥
ताः सर्वा जलदेवीनां गेहे सम्बभूवुः प्रजाः । एतद् वृत्तान्तमद्भुतं प्राङ् राम मयप्रदम् ॥२८॥
ता पत्र जलदेवीनां जलाभ्यन्तरमण्डने । कुर्वन्ति नृत्यगीतानि तासां संश्रूयते ध्वनिः ॥२९॥
एवं राम यथा पृष्टं त्वया सर्वं मया तथा । तुभ्यं तवऽग्रे कथितं कुरु येन हितं भवेत् ॥३०॥
सर्वासामेव नागकन्यानां गांधर्वीणां तथा विभो । मुनिना चोदितश्चेत्थं तदा शीघ्रात्तदर्तिमूढः ॥३१॥
लक्ष्मणं प्राह मे चापमानयाद्य धन्विदिह । मुक्त्वा बाणमाग्यापि दर्शया देवीर्जलास्थिताः ॥३२॥
कन्यकाः पन्नगानां च तथा गंधर्वकन्यकाः । इति तद्वाक्यमाकर्ण्य स श्रुत्वा सौमित्रिरादरात् ॥३३॥
शीघ्रं चापं सत्तूणीरं ददौ राघवयं प्रति । ततः कोदण्डमुद्यम्य टणत्कृत्य रघूद्वहः ॥३४॥
शुरं जग्राह तूणीरं निजनामाङ्कितं शरम् । तदा चचाल धरणी चुक्षुभे चाम सागराः ॥३५॥
ववौ घोरतरो वायु क्षोभ्याश्च दिशोऽभवन् । तारा निपतुर्रवरजी दुदुवुर्वनचारिणः ॥३६॥
पर्वताः कम्पना आसन् यत्रकुलोऽह्वनं पनाः । तज्जन्मथ्या जलदेव्यस्ताः श्रुत्वा चापध्वनिं महत् ॥३७॥
भयभीताः समागम्यास्ताभिः सर्वाभिरादरात् प्रणम्यस्ताम्तदा राम बालिकास्तास्तु द्वादश ॥३८॥
राघवायार्पयामासुर्दिव्यभूषणभूषिता । राघवं जलदेव्यस्ताः प्रार्थयामासुरादरात् ॥३९॥
राम राम महाबाहोऽस्माभिरवदपराधितम् । तत्क्षमस्व रघुश्रेष्ठ मा मुंच स्वपतत्रिणम् ॥४०॥


सककर कहा-॥ २१ ॥ २२ ॥ इसीपर मुझे बड़ा मत आया करोग। किन्तु बालभावसे मुग्ध वे कन्याएं ऋषिके बात न मानी, दूषित अपराध करती रहीं। २४॥ मा ऋषिका तपाभंग करनक लिए उन कन्याओको उभाड़ दिया था। अब ऋषि ने अपने मनम विचार किया कि शापादि द्वारा इन्हें दण्ड दूनस अपनी तपस्या क्षीण होगी, इसी लिए बिना शापके दण्ड मिल जाय । जलदेवियाँ उन कन्याओंको पकड़कर अपने घर ले गयीं। जहाँ कि गन्धर्वा तथा पन्नगोंकी भी गति नहीं थी। अपनी तपस्या पूर्ण करके ऋषि स्वर्गको चले गये, किन्तु वे कन्याए इस सरोवरमे जलदेवियोंके पास अब भी विद्यमान हैं ॥ २५-२८ ॥ पहले यह एक आश्चर्यमयी घटना घट गयी थी। वे ही गंधर्बो और पन्नगोंकी कन्यायें जलदेवियोंके घरमें नाच रही हैं, उन्हींके गानकी मधुर ध्वनि सुनायी देती है। २७ ॥ २६ ॥ हे राम! आपने जैसा पूछा, मैंने कह सुनाया, अब आप ऐसा करिए कि जिससे उन कन्याओका कल्याण हो। इस प्रकार अगस्त्यजीकी प्रणाम सुनकर श्रीरामने कहा हे लक्ष्मण मेरा धनुष तो ले आओ। मैं क्षण भरमे उन गंधर्वी और नागकी कन्याओंको जलसे बाहर निकालूँगा। इस तरह रामकी बात सुनकर लक्ष्मणने तुरंत आदरपूर्वक तूणीर तथा धनुष लाकर रामको दे दिया। इसके अनन्तर रामने धनुष उठाकर टंकोर किया। ३०-३४ ॥ तदनन्तर उन्होंने तूणीरसे एक बाण निकाला, जिसपर रामका नाम लिखा हुआ था। इससे पृथ्वी डगमगाने लगी और समुद्र क्षुब्ध होकर सूखने लगा ॥ ३५ ॥ जोरोसे वायु चलने लगी, दसों दिशायें धूलस भर गयीं, सारे ग्रह टूटकर गिरने लगे, वनके जीव वन छोड़कर भागने लगे, संसारका पर्वत-वृन्द काँपने लगा, और मेघगण रक्तकी वर्षा करने लगा। उस सरोवरकी जलदेविया धनुषका घनघोर टंकोर सुनकर भयभीत हो गयीं । वे तुरन्त उन बारहो कन्याओंका अपने साथ लिये बाहर आयीं और प्रणाम करके दिव्य अलंकारोंसे विभूषित उन कन्याओंको उन्होंने रामको सौंप दिया ॥ ३६-३९ ॥ वे इस प्रकार स्तुति करने लगीं। उन्होंने कहा-हे महाबाहो राम ! हमनें जोअपराध किया है, सो आप क्षमा

३६६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

न कश्चित्सूर्यवंशेऽभून्स्त्रीषु शस्त्रप्रहारकः । त्वयाऽपि रक्षिता पूर्वं स्त्रीत्वाज्ज्ञाह्नवीतटे ॥४१। पदारूढया तु शपथः कृतो मैथिलकन्यया । ताटकादिशरीरेषु यत्कृतं बाणमोचनम् ॥४२। ब्रह्मघ्नीषु त्वया पूर्वं वत्सवेर्षो दिताय च । इति तासां वचः श्रुत्वा विहस्य रघुनन्दनः ।४३। स्थापयामास तूणीरे पूर्ववच्च स्वमार्गणम् । ततस्ताभिः पूजितः स तदा दृष्टो रघूत्तमः ॥४४॥ जलदेवीर्हृदात्प्राप्तां स्वस्थलं गम्यतामिति । एतस्मिन्नन्तरे तत्र गंधर्वाश्चाथ पन्नगाः ।४५। विदित्वा सकलं रामकृत्यं रामांतिकं ययुः । नत्वा रामं सगीतं च तथा नं कुम्भसंभवम् ॥४६॥ उपायनान्यनेकानि समर्प्य रघुनन्दनम् । ऊचुस्ते मंजुलं वाक्यं प्रबद्धकरसम्पुटाः ॥४७॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे जलदेव्योजलदान बालिकाविमोचनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५॥


षष्ठः सर्गः

( गन्धर्वों तथा नागोंकी बारह कन्याओंका लक्ष्मणादिके पुत्रोंके साथ विवाह होनेका निश्चय )

गन्धर्वपन्नगा ऊचुः
राम कंजानन स्वामिन्मोचिता बालिकास्त्वया विवाहान्तास्त्वयास्तासां पुत्रैश्चैव कर्तुमर्हसि ॥ १ ॥
अद्य धन्या वयं सर्वे नः कुलं पावनं कृतम् । त्वया राम महाबाहो तारिताः स्मो वयं प्रभो २ ॥
सप्तजन्मसु यत्पुण्यं कृतमस्ति रघूद्वह अस्माभिस्तेन सम्बन्धस्त्वयाऽद्य भवतु प्रभो । ३ ।

श्रीरामदास उवाच
इति तेषां वचः श्रुत्वा सीतया स रघूद्वहः । अङ्गीकृत्य वचस्तेषामगस्तिमवलोकयत् ॥ ४ ॥
तदा प्राह कुम्भजन्मा राघवं वचनं मुनिः । रामान्याऽथ कुमुदस्य भार्या नाम्ना कुमुद्वती । ५ ॥
त्वयि प्राप्ते हि वैकुण्ठं कुशपत्नी भविष्यति । चम्पिकायां न तनयो भविष्यति रघूद्वह । ६ ॥


कर दें। हमपर इन बाणोंको आप मत छोड़िये । ४०॥ अब तक आपके सूर्यवंशमें स्त्रियोंपर शस्त्रका प्रहार करने-वाला कोई भी नहीं हुआ है । आपने भी उस समय गङ्गाके किनारे भीलोंके लिये जाती हुई पृथ्वीकी इसी लिए रक्षा की थी कि वह स्त्री थी । इसके सिवाय आपने जो ताड़कापर बाण छोड़ा उसका कारण यह था कि वह ब्रह्मघातिनी थी । उसे तो आपने ऋषियोंके कल्याणार्थ मारा था । उनका ऐसा विनीत बात सुनी तो मुस्कुराकर रामने अपने बाणको फिर तरकसमे रख दिया । इसके बाद उन जलदेवियोंसे पूजित रामत प्रसन्न होकर उनसे कहा कि अब तुम लोग अपने स्थानको जाओ इसके अनन्तर उन गन्धर्वों और पन्नगोंने (जिनकी कार्य्यार्थ जलदेवियोंके सदृश थी ) जब यह समाचार सुना तो रामके पास आये और सीता, राम तथा अगस्त्यको प्रणाम करके उन्होंने रामको विविध प्रकारकी भेंट दी तदनन्तर हाथ जोड़कर इस प्रकार कहने लगे - ॥ ४१-४७ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकाय पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे पञ्चमः सर्गः ५॥

गन्धर्व तथा पन्नगगण कहने लगे हे कमल सरीखे नेत्रोंवाले राम आपने हमारी पुत्रियोंको उन जलकन्याओंके हाथसे जैसे छुड़ाया है, उसी तरह अब इनका विवाह भी अपने पुत्रोंके साथ कर लीजिए ॥ १ ॥ आज हम अपनेको धन्य समझते हैं। आज हमारा कुल पवित्र हो गया । हे प्रभो ! आपने हमारा उद्धार कर दिया ॥ २ ॥ हमने अपने सात जन्ममें जो पुण्य किया था, उसके प्रतापसे आज हमारे और आपका सम्बन्ध हो जाय । ३।। श्रीरामदासने कहा- इस प्रकारकी बात सुनकर महारानी सीता और रामने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और अगस्त्यकी ओर निहारने लगे ॥ ४ ॥ अगस्त्यने कहा हे राम जब आप वैकुण्ठधामको चले जायेंगे, तब कुमुद्वती कुशकी पत्नी होगी । हे रघूद्वह ! कुशकी वर्तमान स्त्री चम्पिकाके

सर्गः ६ ] विवाहकाण्डम् १६७

सर्गः ६ ] विवाहकाण्डम् १६७


कुशात्पुत्रः कुमुद्वत्यामतिथिस्तु भविष्यति । राज्यकर्ता वंशकर्ता स एवार्थं भविष्यति ॥ ७ ॥
अतस्त्वमधुना राम नागकन्याः कुशं विना । सप्त स्वस्वसुपुत्रेभ्यः प्रयच्छ विधिना द्विजैः ॥ ८ ॥
पञ्चगन्धर्वकन्याश्च यूपकेतुं कुशं लवम् । विना स्वस्वसुपुत्रेभ्यः प्रयच्छ रघुनन्दन । ९ ॥
राक्षसेन विवाहेन यूपकेतुः शिशुस्ततः । अग्रे पत्नीं मदानेप कश्चित्पन्नगं शुभाम् ॥ १० ॥
एवं रामसुताः सर्वे स्वस्वस्त्रीभ्यां यथासुखम् । क्रीडयिष्यन्ति पौत्रांश्चान भवितान्ति प्रपौत्रकाः ॥ ११ ॥
प्रपौत्रस्य प्रपौत्रं स्वं दृष्ट्वा सीतासमन्वितः । सुखं यास्यसि वैकुण्ठं बन्धुभिर्नगरीजनैः ॥ १२ ॥
एवं श्रुत्वा मुनेर्वाक्यमङ्गीकृत्य रघूद्वहः । तासां नामानि पप्रच्छ गन्धर्वान्पन्नगानपि ॥ १३ ॥
तदाऽब्रवीत्स गन्धर्वः स्वपुत्रीणां च तन्मनान् । तासां नामानि रामाग्रे पञ्चानां सम्प्रहृष्टधीः ॥ १४ ॥
चन्द्रिका चन्द्रवदना चञ्चला चपला चला । एवं नामानि पञ्चानां क्रमेण रघुनन्दनः ॥ १५ ॥
श्रुत्वाऽवलोकयामास पन्नगांस्तेऽपि चाब्रुवन् । कजानना कजनेत्रा कजांघी च कजावती ॥ १६ ॥
कळिका कमला चैव मालती मम कीर्त्तिताः । एवं नामानि पञ्चानां क्रमेण रघुनन्दनः ॥ १७ ॥
श्रुत्वा ताः पुष्पके स्थाप्य नैर्ऋत्यां गर्तुमैच्छिभिः । अथ प्रभाते श्रीरामः हृष्ट्वा स्नात्वा यथाविधि ॥ १८ ॥
गन्धर्वपन्नगांश्चापि तदा वचनमब्रवीत् । यमर्त्येनैव म साकं विवाहार्यं रमान्तराम् ॥ १९ ॥
नैव योग्यं समागन्तुं नगलोकान्निवासिना । तस्माच्छृणुध्व मद्वाक्यं सुहृदः सकलाः शुभम् ॥ २० ॥
यूयं गत्वा निजस्थानं स्वस्त्रीभिश्च बहुप्रजाः । आगतय्य विवाहार्यमयोध्यां मे यथासुखम् ॥ २१ ॥
अधुनाऽहं तु गच्छामि पुरीमग्र शयेन कि । विहायसा विमानेन पताकाध्वजमालिना ॥ २२ ।
तथेति रामवचनात्त गताः कक्षकूल नि हि । सोऽपि मुनिना ताभिर्बालिकाभिः सुतैः श्रिया ॥ २३ ॥
विहायसा पुष्पकस्थो ययौ पश्चवदान्ति मः । अयोध्यां प्रहरेणैव मुदा प्राप रघूद्वहः ॥ २४ ॥


कोई पुत्र नहीं होगा ॥ ५ ॥ ६ । हाँ, कुमुद्वतीमें कुशके अतिथि नामका पुत्र उत्पन्न होगा और वही पुत्र राज्यकर्ता एवं वंशका बढ़ानेवाला होगा। इससे हे राम ! कुशको छोड़कर बाकी सब कुमारोंका विवाह इन कन्याओंके साथ कर दीजिए। इनमें पाँच गन्धर्व-कन्याओंको यूपकेतु तथा कुश-लवके अतिरिक्त शेष पुत्रोंको दे दीजिए । ९ ॥ आगे चलकर यूपकेतु राक्षसविवाहके क्रमसे एक अच्छी स्त्रीके साथ विवाह करेगा ॥ १० ॥ हे राम ! ऐसा करनेसे सब पुत्र अपन-अपनी स्त्रियोंके साथ सुखपूर्वक विहार करेंगे। उनके पौत्र-प्रपौत्र आदि भी होवेंगे ११ । पश्चात् आप भी प्रपौत्रके प्रपौत्रोंको देखकर सीता अपने बन्धुओं और पुरवासियोंके साथ वैकुण्ठधामको जाओगे। इस प्रकार अगस्त्यजीकी बात सुनी तो उन्होंने अङ्गीकार कर लिया और उन गन्धर्व-पन्नगोंसे उन कन्याओंके नाम पूछने लगे ॥ १२ ॥ १३ ॥ गन्धर्वराज अपनी पाँच कन्याओंका नाम बतलाने लगे कि वे—चन्द्रिका, चन्द्रवदना, चञ्चला, चपला और चला ये इनके नाम हैं ॥ १४ ॥ कन्याओंका नाम सुनकर राम उनके ओर देखने लगे फिर पन्नग इस प्रकार अपनी सात कन्याओंके नाम बतलाने लगे—कजानना, कजनेत्रा, कजांघ्री, कजावती, कलिका, कमला और मालती ये सात नाम हैं। इस रीतिसे सबका नाम सुनकर रामने उन कन्याओंको पुष्पक विमानपर चढ़ा लिया और सब सर्षियोंके साथ सो गये। इसके अनन्तर प्रातःकालके समय राम उठे और विधिवत स्नान-हवन आदि किया ॥ १५-१८॥ फिर वे उन गन्धर्वों तथा पन्नगोंको बुलाकर कहने लगे हे गन्धर्व तथा पन्नगगण ! मैं मर्त्यलोकका निवासी मनुष्य हूँ। इस कारण मैं अपने बन्धुओंके भवनपर वा पन्नगलोकमें नहीं जा सकूँगा और न गन्धर्वोक्त यहाँ स्वर्गलोकको ही अपने बच्चोंका विवाह करने जा सकूँगा। इसपर आप लोग सब मेरी बात सुनिए ॥ १९ ॥ २० ॥ आपलोग अपने-अपने घर जायें और इनका विवाह करनेके लिए वहाँसे स्त्रियों तथा बन्धु-बान्धवोंके साथ आनन्दपूर्वक अयोध्या पधारें ॥ २१ ॥ कुछ देर बाद मैं अपने विमान द्वारा आकाशमार्गसे अपनी नगरीका रास्ता पकड़ूँगा ॥ २२ ॥ "बहुत अच्छा" कहकर वे गन्धर्व तथा पन्नग अपने-अपने स्थानको चले गये। इधर रामचन्द्रजी भी

३६८आनन्दरामायणे[ सर्गः ६

नीराजितः पुरस्त्रीभिर्विवेश निजमन्दिरम् । वसिष्ठांस्ते ताः सर्वाः प्रेषयामास राघवः ॥२५॥
अथ रामः सभामध्ये मन्त्रिभिश्चिदमब्रवीत् । धावन्तु नगरे राजन् मुमुदश्च मुनीश्वराः ॥२६॥
सीतासुराः सरोगाश्च स्वस्वजानपदैः सह । मुहूर्त्तस्यावशेषेयं परिखाः सप्त सादरम् ॥२७॥
शोधनीयास्तथा सौधमद्मेषु सुधा शुभा । नया चित्राणि लेख्यानि प्रासादेषु मर्मन्तः ॥२८॥
देवालयेषु सर्वेषु सुधा देया मनोरमा । लेखनीयानि चित्राणि रत्नयःस्थापना पृथक् ॥२९॥
वन्दनीयाः पताकाश्च रोषणीया ध्वजा अपि । दर्भाश्चतोरणानि बन्धनीयानि लक्ष्मण ॥३०॥
वेद्यः कार्या ह्युदग्रराया बन्धनायाश्च मण्डपाः । शृङ्गार्णीया दशरथातिथिवत्काश्च सहस्रशः ॥३१॥
गन्धर्वभ्यः पन्नगेभ्यो वस्तु गेहानि वै पृथक् । कृकन्य नूतनान्यायस्तत्रार्थः पूरितानि च ॥३२॥
अन्यदपि यथायोग्यं यद्यजानसि लक्ष्मण । तत्कुरुष्व मयोक्तं मया तव रघूद्वह ॥३३॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स लक्ष्मणः । तथा चकार तत्सर्वं यथा रामेण निश्चितः ॥३४॥
अथ गन्धर्वराजन्तु तथा वै यम पन्नगाः । महाङ्गुः सगरोधाम्न ययु शीघ्र मुदान्विताः ॥३५॥
सर्वे मानवरूपेण हस्त्यश्वरथसंस्थिताः । गन्धर्वाश्चापि सैन्यैस्ते संहतोपवनं ययुः ॥३६॥
ततस्तानागतान् श्रुत्वा प्रत्युद्गम्य रघूद्वहः । नानाद्यानि नार्थश्च नृत्यैरङ्गरमां युगम् ॥३७॥
नीत्वा संस्थापयामास विस्तीर्णेषु गृहेषु सः । अथ वैकदा रामः सभायां संस्थितः सुखम् ॥३८॥
ज्योतिर्विदः समाहूय वसिष्ठं च पुरोधसम् । पृथग्विवाहानुकल्पे स मुहूर्तानभिमङ्गलान् ॥३९॥
सम्यग्विचारयामास सभामध्ये भविष्यतः । ज्योतिर्विदन्तदा प्रोचुर्मुहूर्तानतिमोददान् ॥४०॥
पक्षान्तरेण वैशाखे द्वौ मुहूर्ती शुभावहौ । तथा तदूर्ध्वतो द्वौ ज्येष्ठे पक्षान्तरेण ते ॥४१॥
शुक्लेन मार्गशीर्षेऽपि त्रीन् मार्गफान्गुनेऽपि च । एवं द्वादशकां स्त्री चकुलैगिनिश्चियम् ॥४२॥


उन बालकोंका अपन पूजी त । रथ कि साथ ... तिर ऊपर आकाशमगत गन्धर्व कलाका देखते हुए वहांसे चल दिये ओर एक प्रहरम अयोध्या आये ॥२३ । २४ । वहाँ पहुँचनेपर पुरवासिनी स्त्रियोंने उनकी आरती उतारी और उन स...लोग रामके वहाँ भेज दिया, २५ । तदनन्तर रामने रामजी लक्ष्मणसे कहा कि सभासो, मार्गिको ओर मुनिश्वरों यों निमन्त्रण भेज दो कि सब लोग अपनी स्त्रियों तथा पुरवासियोंके साथ अयोध्य । ध्यान । भागलगे अयोध्यानगरीका शृङ्गार करो ॥२६॥ अयोध्याके सब मकान चूनेसे पुतवाये जायं और उसपर नये और विचित्र प्रकारके चित्र बनाये जायें । २७ ॥ समस्त देवालयम अच्छी तरह पुताइके, ओर लोग गन्ध अक्षत और सिन्दू बनाकर पूजनका सुप्रबन्ध किया जाय ॥ २८ ।, २९ । पताका बांधो जायं ध्वजाहरोपण कि जायं और मन्दिरोंके चारों ओर तोरण बांधे जायें । जहाँ तहाँ सुगन्धित वेदियाँ बनवाई जायं । दशरथादि समस्त अतिथियोंका सत्कार किया जाय । गन्धर्व-पन्नगादि लोगोंके लिये नये-नये मकान बनवाकर नाना भांति तरह सब दस्त आbordersका प्रबन्ध कर दो ॥ ३०-३२ ॥ हे लक्ष्मण ! जो मैं कह चुका हूँ, वह और जो मैं नहीं कहपाया हूँ और तुम जानते होसो सो भी ठीक कर लो ॥ ३३ । रामकी बात सुनकर लक्ष्मणने तथा... ही किया था, तदनुसार सब प्रबंध कर दिया ॥ ३४ ॥ इसके अनन्तर चित्राङ्गद और तक्षकप्रभृत बन्धु सम्बन्धिाने यथायोग्यतया सब हर्षपूर्वक अयोध्याको चल दिये ॥ ३५ ॥ उस समय समस्त सर्वो ने मानव रूप धारण किया ओर घोड़े तथा रथपर सवार होकर अयोध्या आये । गंधर्व भी अपनी विशाल सेनाके साथ माहेन्द्रपुर आ पहुंचे ॥ ३६ ।... ३७ ॥ इसके बाद सब रामचन्द्रजीने सुना कि वे लोग अयोध्या आ गये हैं तो विविधप्रकार के बाजों और नाचके साथ नगरीमे ले जाये और खूब लम्बे चौड़े भवनमें उनको ठहराया । इसके अनन्तर एक समय राम सब लोगोंके साथ सभामें बैठे तो वशिष्ठ तथा अनेक ज्योतिर्विदोंको बुलाकर और विवाहके लिए अलग-अलग मुहूर्ताका अच्छी तरह विचार करनेको कहा । ज्योतिष्योने गगन आकाशगत अतिशय सुखकारी मुहूर्त विचारकर कहा कि एक पक्ष बीतनेपर वैशाख मासमें दो मुहूर्त हैं । एक पक्षके अनन्तर ज्येष्ठ मासमें भी दो ही मुहूर्त हैं। ३८-४१ ॥ दो

सर्गः ७ ] विवाहकाण्डम् २६९


लक्ष्मस्याथांगदस्यापि विवाहौ तैर्विनिश्चितौ । ज्योतिर्विद्भिर्गतेऽह्ने वैशाखे राघवाग्रतः ॥४३॥
चित्रकेतोः पुष्करस्य विवाहौ तैर्विनिश्चितौ । ज्येष्ठे मासि क्रमेणैव पक्षे पक्षे पृथक् पृथक् ॥४४॥
तक्षस्याथ सुबाहोश्च विवाहौ मार्गशीर्षके । पक्षान्तरेण रामाग्रे ज्योतिर्विद्भिर्विनिश्चितौ ॥४५॥
यूपकेतोर्भदस्य चित्रकेतोर्वि निश्चिताः । माघमासे विवाहाश्च ज्योतिःशास्त्रविशारदैः ॥४६॥
पुष्करस्याथ तक्षस्य सुबाहोः फाल्गुने शुभे । विवाहा निश्चिताः पूर्वं रामाग्रे गणकैस्तदा ॥४७॥
एवं निश्चिताः सर्वे विवाहा द्वादश क्रमात् । ज्योतिर्विद्भिर्निश्चितांश्च श्रुत्वा तानर्चयद्विभुः ॥४८॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकांडे
द्वादशविवाहलग्निर्निश्चयो नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥


सप्तमः सर्गः

( नागों तथा गंधर्वराजकी कन्याओंका विवाह )

श्रीरामदास उवाच
अथ ते गणकाः सर्वे वसिष्ठस्तत्पुरोधसः । कुमारीणां विभागार्थं चक्रुः श्रीराघवाग्रतः ॥ १ ॥
कञ्जाननां लक्ष्मणाथ कञ्जाक्षीमंगदाय च गणका निश्चयं चक्रुः कञ्जांघ्रीं चित्रकेतवे ॥ २ ॥
कलावतीं पुष्कराय तथा तक्षाय कालिकाए सुबाहवे च कमलां मालतीं यूपकेतवे ॥ ३ ॥
गणकैः सप्त ता एव नागकन्या विनिश्चिताः । चंद्रिकामंगदायाथ चंद्रास्यां चित्रकेतवे ॥ ४ ॥
चञ्चलाख्यां पुष्कराय तक्षाय चपलां तथा । सुबाहवे तु अचलां प्रोचुस्ते गणकादयः ॥ ५ ॥
एवं गंधर्वकन्यास्ताः पंच विप्रैर्विनिश्चिताः । एवं हि निश्चयं कृत्वा गणकादीन् रघूत्तमः ॥ ६ ॥
विसृज्य मैथिलीं गत्वा सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् । ततो ययुः कोटिसंख्ये पार्थिवाश्च मुनीश्वराः ॥ ७ ॥
सप्तद्वीपांतरस्थाश्च सावशेषाः समलकाः । नानावाहनसंस्थाश्च पौरैर्जानपदैर्निजैः ॥ ८ ॥


मुहूर्त मार्गशीर्षमें तीन मुहूर्त माघमें और तीन ही मुहूर्त फाल्गुनमें बतलाया । इस तरह उन बारहौ कन्याओंके विवाहका लग्न बन गया । तदनन्तर वसिष्ठके साथ-साथ उन ज्योतिर्विदों ने वैशाखवाली लग्नमें लक्ष्मण और अङ्गदके विवाहका मुहूर्त निश्चित किया । चित्रकेतु और पुष्करका विवाह ज्येष्ठमासकी लग्नपर निश्चित हुआ । तक्ष और सुबाहुका विवाह एक पक्ष बाद मार्गशीर्षके ही पक्षमें निश्चित किया ॥ ४२-४५ ॥ यूपकेतु, अङ्गद तथा चित्रकेतुका विवाह माघ मासमें निश्चित हुआ ॥ ४६ ॥ पुष्कर, तक्ष तथा सुबाहुका विवाह रामके समक्ष बैठे हुए ज्योतिर्विदों ने फाल्गुन मासकी शुभ लग्नमें निश्चित किया ॥ ४७ ॥ इस तरह क्रमशः बारहौ विवाहोंके निश्चित हो जानेपर रामने ज्योतिर्विदोंकी विधिवत् पूजा की ॥ ४८ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानंदरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचितभाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

श्रीरामदास कहने लगे - उपर्युक्त प्रकारसे विवाह निश्चित हो जानेपर रामके सामने ही वसिष्ठ तथा ज्योतिर्विदों ने उन कन्याओंका विवाह तय करनेके उद्देश्यसे विचार किया कि कौन-सी कन्या किसको दी जाय ॥ १ ॥ कञ्जानना नामकी कन्या लक्ष्मणके लिए, कञ्जाक्षी अंगदके लिए, कञ्जांघ्री चित्रकेतुके लिए, कलावती पुष्करके लिए, कालिका तक्षके लिए, कमला सुबाहुके लिए और मालती यूपकेतुके लिए देना निश्चित हुआ ॥ २ ॥ ३ ॥ इस प्रकार ज्योतिर्विदों ने इन सब कन्याओंको देखकर निश्चय कर दिया । चंद्रिका अङ्गदके लिए, चंद्रास्या चित्रकेतुके लिए, चंचला पुष्करके लिए, चपला तक्षके लिए और अचला सुबाहुके लिए देनेके लिए उन ज्योतिर्विदों ने निश्चित किया । इस तरह उन पाँचों गन्धर्वकन्याओंका वरका निश्चय हो जानेपर रामने आदरपूर्वक ज्योतिर्विदोंको विदा किया और स्वयम् सीताके पास जा पहुंचकर जो कुछ सभा में निश्चित हुआ था, सो उन्हें कह सुनाया । इसके बाद सातों द्वीपोंमें रहनेवाले करोड़ों मुनीश्वर तथा राजे अपने परिवार और प्रजा समेत नाना प्रकारकी सवारियोंपर सवार होकर अयोध्या आये ॥ ४-८ । उस समय उन लोगोंसे सारी अयोध्या भर

३७०आनन्दरामायणे[ सर्ग ७

यैः साऽप्योध्यापुरी व्योम्ना विरेजे निर्मला तदा । ययौ विभीषणश्चाथ सुग्रीवोऽपि प्लवंगमैः ॥ ९ ॥
ययौ स भूरिकीर्तिश्च पुत्राभ्यां संप्रमादतः । ययौ स जनकोऽपि युधाजिन्न ययौ तदा ॥ १० ॥
कौसल्यायाः सुमित्राया बांधवाद्याः समाययुः अथ रामस्तु वैशाखशुक्ले द्विजवरैः सह ॥ ११ ॥
पुरोधसा सुहृद्भिश्च स्नानमभ्यंगपूर्वकम् । कृत्वा लवाय मांगल्यस्नानार्थं स्त्रीः प्रचोदयत् ॥ १२ ॥
ततो मुहूर्तसमये वधूच्छिष्टां निशा लवम् सम्यग् लिप्त्व मुनैलाद्यैर्मान्याश्चा मगलग्रदाः ॥ १३ ।
स्वयं मन्मथप्रदा सर्वाश्चतुर्नार्यः स्वलंकृताः । अथ रामो देवकस्य प्रतिष्ठां ब्राह्मणैः सह १४॥
आदौ कृत्वा गणपतेः पूजां सम्यग्व्यधाद्विधि। पुण्याहादित्रयं चापि कृत्वा पूर्वं सविस्तरम् । १५ ।
चकार विधिनाऽऽसून पूजयामास वै मुनीन् ततो मुहूर्तसमये गत्वा पन्नगमदिरम् ॥ १६॥
लवस्य कञ्चननयनाविवाहं विनिर्वर्तयन् । चतुर्थे दिवसे वश्यान्तरस्थे मत्नदीपकैः ॥ १७ ।
नीराजितस्तदा रामो विरेजे मंडपे स्थितः । ततो निजगृहं गत्वा पूर्वोक्तनन्मवादिभिः । १८ ॥
लवेन कारयामास लक्ष्मीपूजनमुत्तमम् । ततो दानान्यनेकानि ददौ स रघुनन्दनः ॥ १९ ॥
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे तथा ते पन्नगा अपि । मुहृदश्चाथ गंधर्वाः पौरा जानपदादयः ॥ २० ॥
पूजयामासुः श्रीरामं वस्त्रैराभरणादिभिः । तथा तान् लक्ष्मणादींश्च कुशाद्यांश्चापि बालकान् ॥ २१॥
ततस्ता नृपपत्न्यश्च सुहृत्पत्न्यः पृथक्पृथक् । नागपत्न्यश्च गंधर्वापत्यस्त्वन्याश्चतथा स्त्रियः ॥ २२॥
सीतायाः पूजयामासुर्वस्त्रैराभरणादिभिः । सीताऽपि ताः सुहृत्पत्नीस्तथा वानिककामिनीः । २३ ।
पूजयामास विधिवद्वस्त्रैराभरणादिभिः । रामोऽपि सुहृदः पौरान् गन्धर्वान्पन्नगाभटान् । २४॥
वस्त्रैराभरणाद्यैस्तैः पूजयामास सादरम् । एवं वैशाखमासे तु सिते पक्षे लवस्य च ॥ २५॥
कृत्वा विवाहं रामः स कृष्णपक्षे तु माधवे । चकार पूर्वोक्तविवाहं अंगदस्य च ॥ २६॥
चित्रकेतोः पुष्करस्य विवाहो रघुनन्दनः ज्येष्ठमासे शुक्लकृष्णपक्षयोश्चक्रे मुदा ॥ २७॥

गयी और वह बहुत ही सुन्दर दीखने लगी। बहुतस वानरोंको साथ लिए हुए सुग्रीव, अपने दोनों बेटोंके साथ राजा भूरिकीर्ति, इनके सिवाय विभीषण, जनक, युधाजित्, कौसल्या तथा सुमित्राके बन्धु-बान्धव आदि भी अयोध्यामे आ पहुँचे। इसके बाद वैशाखके शुक्लपक्षमें पुरोहितों तथा विप्रोंके साथ रामने अभ्यङ्ग-पूर्वक स्नान किया और लवको मङ्गलस्नान करानेके लिए स्त्रियोंसे कहा ॥ ९-१२ ॥ सात दिक माताओंने जब मुहूर्त्त आया, तब वधूके जूठे हल्दी-तैल तथा उबटन लेकर लवके शरीग्मे लगाया और तदनन्तर वस्त्र गहने आदि माताक साथ अलङ्करण मन्त्र स्वयम् ही किया । विवाह से प्रथम श्रीमहाराजने शाख कुलदेवताका स्थापना का । १३ ॥ १४ । स्थापनाके पूर्व यथाविधि गणपतिजी की पूजा की और निम्नाशय तीन प्रकारका पुण्याहवाचन किया इसके अनन्तर मेहूपानीमे आये हुए मुनियोंका पूजन करके उन्हें सन्तुष्ट किया । शुभ मुहूत्तमे पन्नगोंके यहाँ गये और वहाँ कञ्चननयनाके साथ लवका विधिवत् विवाह सम्पन्न किया, चौथे दिन वामकों छिटनांमे बैठे हुए रत्न-दीपकाश रामकी आरती उतारी गयी । उस समय राम सीताके साथ बहुत ही सुन्दर दीख रहे थे। इसके अनन्तर पूर्वोक्त उत्सवोंके साथ राम अपने घर गये वहाँ लवके हाथोंसे अच्छी तरह लक्ष्मीपूजन कराया और अनेक प्रकारके दान दिये । १५-१९ ॥ इसके बाद उन देश देशान्तरस आये हुए राजाओ, पन्नगो, सम्बन्धियो, पुरवासिया और जनपदवासियोने विविध प्रकारके वस्त्रों और आभूषणोंसे राम-लक्ष्मण तथा सब बालकोंकी पूजा की। इसके पश्चात् रानियों, सम्बन्धियोकी स्त्रियों, नागपत्नियों तथा गंधर्व आदिकी स्त्रियोंको सीता आदि स्त्रियान वस्त्र और आभूषण देखकर विधिवत् सस्कृत किया । रामने भी सम्बन्धियों, पुरवासियो, गन्धर्वो और पन्नगोंकी वस्त्राभूषणसे भली भाँति पूजा की। इस तरह वैशाख मासके शुक्लपक्षमे लवका विवाह सम्पन्न किया और कृष्णपक्षमें पूर्ववत् उत्साह समेत अङ्गदका विवाह किया ॥ २०-२६ ॥ उसी प्रकार ज्येष्ठ शुक्ल और कृष्ण-

सर्गः ७ ] विवाहकाण्डम् २७१


ततः सर्वान्नृपादींश्च ददावाज्ञां सुहृज्जनान् । ततः पुनस्तानाहूय पूर्ववन्मार्गशीर्षके ॥२८॥
नभस्याथ सुबाहोश्च विवाहानकरोत्प्रभुः । ततः सर्वान्नृपान् रामो ददावाज्ञां सुहृज्जनान् ।२९।
ततः पुनस्तानाहूय माघमासे मुदन्नृपान् । गुरवेतारगदस्य चित्रकेतोर्महोत्सवैः ॥३०॥
विवाहानकरोद्रामः पथिराम्न व्यसर्जयत् । पुष्करस्याथ तक्षस्य सुबाहोश्च महोत्सवैः ॥३१॥
चकार फाल्गुने मासि विवाहान् जानकीधवः । एवं कृत्वा विवाहंश्च रामो द्वादश सादरम् ॥३२॥
नृपैः संपूजितः सर्वांन्नृप्याज्ञां नृपनान् ददौ । पूजयित्वा मुनींश्चापि विससर्ज रघूद्वहः ॥३३॥
गन्धर्वपन्नगाः सर्व ते सकेतेऽत्र मधिष्ठिताः । राम मुक्त्वा न ते नैजं स्थल जगमुर्मुदान्विताः ॥३४॥
मन्त्रिणः प्रेषयामासुः स्वस्वराज्येषु ते पृथक् । यदा रामः स वैकुण्ठमग्रे गच्छति कालतः ॥३५॥
तदासत्तानिकंल्लोकोन्ते गच्छन्ति न संशयः । अथ रामः पन्नगानां गन्धर्वाणां च सद्यसु ॥३६॥
वार्षकेषूत्सवेष्वत्र सावरोधः गृहज्जनेः । पौरैः स्वायैर्भोजनादे गत्वा पूर्णाकरोत्प्रदा ॥३७॥
सदा महोत्सवाद्यामन्नयोध्याया गृहे गृहे । आनन्दः सकलानामासीन्नकुत्राप्यमगलम् ॥३८॥
अथ तेषां गभ१ण पुत्राणां च पृथक् पृथक् । अह कृत्वा तु गेहानि पृथक्कृत्या च शनयः । ३९।
तेषु ते स्थापिताः स, स्वस्वस्त्रीभि पृथक्सुखम् । तथा ते लक्ष्मणाद्याश्च पृथग्गेहेषु चाधवाः । ४०॥
पूर्वमेव स्थापिताश्च स्वस्वपत्न्य। सुदान्विताः । सुमित्रायाः स सौमित्रिा स्वीयगेहेऽवसत्सुखम् । ४१॥
कैकेयी भरतस्याथ गेहे मसमवाम मा । तस्यो शत्रुघ्नगेहेऽपि नाममेकं पयाम्यम् ॥४२॥
एवं सा पुत्रयोर्गेहऽवसद्गम सुदान्विता, कौसल्या ना रामगेह तस्थौ सीतानिसेविता ।४३॥
ते सर्वे चाधवाः पुत्रा निजवानैश्च सेरुकैः । स्वदासीगोधनार्यैश्च सुखमापुः पृथक् पृथक् ॥४४॥
अथ ते लक्ष्मणाद्यश्च कुशाद्या बालका अपि। स्वस्वगेहेषु वै प्रातः स्नात्वा होमान् विचार्यनम् । ४५।


पसन्द त्रितासु हे सुत्रोंका विवाह ३२॥ इसके बाद सब राजाओं और मुनियोंको अपने-अपने घर जानेकी आज्ञा दी। फिर भरतजीके सब्रह्लद, कुमुदका तथा तर और सुबाहुका विवाह किया। बादमें सबको आज्ञा देकर राजा का अनुमति देकर माघ मासमे बुलाया और दधपुत्रोंका विवाह सम्पन्न किया ॥ २८-३० ॥ माघके बाद मेघनादका विवाह करके पुनः फाल्गुन मासमें पुष्कर, तक्ष तथा सुबाहुका विवाह किया। इस तरह बारह विवाहोंका प्रबन्ध कर सब महमानोंका यथायोग्य पूजा की और उनका पूजन स्वीकार किया। सब सेवक अपने-२ राज्यको चले गये। इसका अनुमान हो । इसी तरह उन मुनियोंका भी विधिवत् पूजन करके विदा किया। अयोध्याका राजाका नाम था ॥ ३१-३३ ॥ किन्तु गन्धर्व और पन्नगगण अयोध्यामे ही रहे। वे अपने-अपने मन्त्रियोंको राजधानी भेजकर रामके पास रहने लगे। ये सब तक अयोध्या में रहे जब तक राम अपने वैकुण्ठधामको नहीं चले जायेंगे। रामके चले जानेपर वे भी सत्तानिक लोकोंमें चले जायेंगे। इसके अतिरिक्त वार्षिक उत्सवों और त्योहारोंपर राम अपने घरकी स्त्रियों, मित्रों तथा सम्बन्धीयों के साथ पल्ली और गन्धर्वराजके यहाँ जाकर भोजन आदि करते थे ॥ ३४-३७ ॥ उन दिनों अयोध्या में घर-घर उत्सव मनाये जाते थे; उस समय सर्वत्र आनन्द था। कही भी किसी प्रकारका अमंगल नहीं दिखलाई पड़ता था ॥ ३८ ॥ इसके पश्चात् रामने उन बारह भाइयोंके लिए अलग-अलग घर बनवाये और विधिवत् शान्तिपाठ कराके उनको अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ उन घरोंमें बसा दिया। उसी तरह लक्ष्मण आदि भ्राता बहुत शुभ अलग-अलग महलोंमें अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ सुखपूर्वक रह रहे थे। सुमित्राके पुत्र लक्ष्मण अपने महलमें आनन्दपूर्वक रहते थे ॥ ३९-४१ ॥ कैकेयी एक महीना भरतके यहाँ और एक महीना शत्रुघ्नके यहाँ रहा करती थी, इस तरह अपने दोनों पुत्रोंके साथ रहती हुई वह सुखसे समय बिता रही थी। कौसल्या सीताका सदा ग्रहण करती हुई रामके महलमें रहती थीं ॥ ४२-४३ ॥ वे सब भ्राता और उनके पुत्र अलग-अलग अपनी सवारी, सेवक, दासी, गोधन आदि तथा सम्पत्तियाँ रखकर आनंद से रहते थे ॥ ४४ । यह सब का नियम था कि लक्ष्मण आदि सब भ्राता और कुश आदि

३७२आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

गोद्विजार्चादि संपाद्य ततस्ते राघवं ययुः । नत्वा रामं जानकीं ते तस्थुर्दिव्यासनेापरि ॥ ४६॥ तेषां भार्याः स्त्रियश्चापि स्नात्वा दुर्गां प्रपूज्य च । गत्वा सीतां प्रणेमुस्तास्तस्थू सीताव्र्याऽऽसने ॥४७॥ ततस्ते लक्ष्मणाद्याः कुशाद्याः स्वगुरोर्मुखात् । कथां पौराणिकीं श्रुत्वाऽऽयुः स्वं स्वं गृहं प्रति । ४८। ततः सर्वे रामगेहे समाहूता मुदान्विताः । उपाहारान् पृथक् चक्रुर्मध्याह्ने भोजनान्यपि ॥४९॥ एवं तेषां स्त्रियश्चापि समाहूतास्तु सीतया । उपाहारान् भोजनानि चक्रुः सीतागृहे सदा । ५०॥ कदा मुदा स्वीयगेहे राघवेणार्थ सीतया । उपाहारान् भोजनानि चक्रुस्ते ब्राह्मणादिभिः । ५१॥ एवं तैर्बन्धुभिश्चालैः प्रापतुर्नितरां सुखम् । सीताराभौ कदा नामोन्कलहः क्वापि कस्य हि । ५२॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे द्वादशविवाहवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( शत्रुघ्नतनय यूपकेतु द्वारा मदनसुन्दरीका हरण )

श्रीरामदास उवाच

अथैकदा दक्षिणे हि शिवकाञ्च्यां महापुरि । कम्बुकण्ठो नृपः श्रीमान्निजकन्यास्वयंवरम् । १ ॥
कर्तुकामो नृपान्सर्वानाह्वयामास सादरम् । तदा ते पार्थिवाः सर्व पत्राणि हि पृथक् पृथक् ॥ २ ॥
एवंरैरमनुस्मृत्य कुशस्यापि लवस्य च । स्वयंवरे स्वीयमानभङ्गेनोद्वग्नहिस्थतम् । ३ ।
प्रैषयामासुर्नृपतिं न ययुश्च स्वयंवरम् । तेषां पत्राणि सर्वाणि कम्बुकण्ठो ददर्श सः । ४ ।
सर्वेषु लिखितस्त्वेक एवार्थस्तं वदाम्यहम् । यदि नायाति रामस्य बालकास्ते स्वयंवरे ॥ ५ ॥
वयं सर्वे तर्हि यामो जंबूद्वीपान्तरस्थिताः । तेषामेवमभिप्रायं ज्ञात्वा स नृपविस्तदा ॥ ६ ॥
न ममाह्वय श्रीराममाह्वयामास पार्थिवान् । स्वयं चापि स्मरन्नैवं तद्वृत्तं रामपुत्रयोः । ७ ॥


बालक सबेरे स्नान करके हवन, शिवअर्चन एवं गो ब्राह्मणोंकी पूजा कर १ थे, तब रामके पास जाते और वहाँ सीता तथा रामको प्रणाम करके दिव्य आसनपर बैठते थे ॥ ४५ ॥ ४६। उसी तरह उनकी स्त्रियां भी सबेरे स्नान और दुर्गापूजनसे निवृत्त होकर सीताके पास जातीं उन्ह प्रणाम करती और आज्ञा पाकर दिव्य आसनोंपर बैठती थीं, ४७ ॥ इसके बाद वे सब लोग गुरु वसिष्ठके मुखसे पुराणोंकी कथा सुन सुनकर अपने भवनोको जाया करत थे। दोपहरको रामके बुलानेपर साथ साथ जलपान तथा भोजन करत थे। उसी तरह उनकी स्त्रियाँ भी सीताके बुलानेपर सीताके यहाँ ही आकर जलपान तथा भोजन करती थीं ॥ ४८-१० ॥ कभी-कभी वे लोग राम और बहुतसे ब्राह्मणोको अपने यहाँ बुलाकर भोजन कराते थे ॥ ५१ इस तरह उन बन्धुओं और बालकोंके साथ सीता तथा राम बड़े सुखसे जीवन व्यतीत कर रहे थे। किसीके साथ कभी किसी तरहका झगड़ा नहीं होता था ॥ ५२ । इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित-भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

श्रीरामदास कहने लगे—एक समय दक्षिणकी शिवकाञ्चीपुरीमें वहाँके राजा कम्बुकण्ठने अपने कन्याका स्वयंवर करनेके विचारसे सब राजाओंके यहाँ निमन्त्रणपत्र भेजकर बुलवाया। किन्तु कुश-लवके कारण वे महाराज कम्बुकण्ठके यहाँ नहीं आये और एक-एक पत्र लिखकर भेज दिया। कम्बुकण्ठने एक-एक करके सब राजाओंका पत्र देखा ॥ १-४ ॥ उन सब पत्रोंमें एक ही चर्चा थी। वह यह कि यदि रामचन्द्रके लड़के तुम्हारे स्वयंवर न आय तो हम सब जम्बूद्वीपके राज तुम्हारे यहाँ आयगें-अन्यथा नहीं। राजा कम्बुकण्ठने उनके अभिप्राय समझकर रामचन्द्रजाके पास निमन्त्रण न भेजकर बाकी सब राजाओंको बुलाया। कम्बुकण्ठको स्वयं भी वह बात याद थाार्थीकि रामके पुत्रोंने चम्पिका और सुमतिके स्वयंवरमे

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७३

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७३

चण्डिकासुमतिपाणिग्रहणार्थं पुरातनम् । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे श्वशुरस्य जिघांसवः ॥ ८ ॥ सप्तदीपाधिपस्याथ ययुः कान्तिपुरीं प्रति । अथ तां कम्बुकण्ठस्य कन्यां मदनसुन्दरीम् ॥ ९ ॥ प्रासादसंस्थितां दृष्ट्वा नारदः खात्समेययौ । सखीभिः सा मुनिं पूज्य विनयात्पुरतः स्थिता ॥ १० ॥ पप्रच्छ नारदं भक्त्या विनयानम्रा शनैः । कुतः समागतः स्वामिन् गम्यते क्वाधुना वद ॥ ११ ॥ भवतां दर्शनेनाद्य पवित्राऽहं परं गता, इति तस्या वचः श्रुत्वा किञ्चित् स्मित्वा मुनिस्तदा ॥ १२ ॥ तामाह बाले स्वलोकादागतोऽस्म्यधुना त्वहम् । अयोध्यायां गतश्चाद्य पुत्राणां तु पृथक् पृथक् ॥ १३ ॥ गेहे संभोक्तुकामोऽद्य निमन्त्रोऽस्मि विहायसा । एतस्मिन्नन्तरे कान्तिपुर्याः सैन्यानि वै बहि ॥ १४ ॥ दृष्ट्वा केषां हि सैन्यानि सन्तीति हृदि चिन्तितम् । ततः पाथमुखाच्छ्रुत्वा तत्र चात्र स्वयम्बरम् ॥ १५ ॥ तदा विनिश्चितं चित्ते मया रामः स्वयंवरे । अत्रैवास्ति ह्यागतश्च तत् पश्याम सबालकम् ॥ १६ ॥ नैवास्ति ह्यागतश्चेत् तर्हि यास्याम्यतः परम् । स्वयंवरे विना रामं न भविष्यति सान्द्रजम् ॥ १७ ॥ पश्याम्यथैवं तं राम वृथाऽग्रे गमनं मम । निश्चित्येत्थं समायातस्ततोऽदृष्ट्वा रघूत्तमम् ॥ १८ ॥ कथं रामो नागतोऽत्र चेति पृष्टा नृपा मया । नृपाभिप्रायमाकर्ण्य तदा खिन्नं मनो मम ॥ १९ ॥ सप्तद्वीपाधिपतिं रामं वधूबालकसंयुतम् । स्वयम्बरमनाहूय त्वत्पित्रा निश्चितं नृपैः ॥ २० ॥ अधुनाऽहं प्रगच्छामि साकेतञ्च रघूत्तमम् । मन्दभाग्याऽसि बाले त्वं स्नुषा राघवभूपतेः ॥ २१ ॥ यतो जाताऽसि नैवात्र विचित्रा कर्मणो गतिः । इत्युक्त्वा बालिकां पृष्ट्वा नारदो गन्तुमुद्यतः ॥ २२ ॥ ततः संप्राथयामास नारदं बालिका मुहुः । खिन्नचित्ताऽश्रुपूर्णाक्षी म्लानस्या स्फुरिताधरा ॥ २३ ॥ रोमांचिततनूर्मुग्धा गतार्थागद्गदस्वरा । येनाहं मुनिवर्यात्र स्नुषा धीराघवस्य च ॥ २४ ॥ भविष्यामि तथा कार्यं न्यथा त्वां शरणं गता । इत्युक्त्वा मुनिवर्यस्य पादयोः स्थाप्य सा शिरः ॥ २५ ॥ चकार करुणं बाला तदा तां मुनिरब्रवीत् । मा चिन्तां कुरु रम्भारु समुत्तिष्ठस्व बालिके ॥ २६ ॥

सबस वैर कर लिया ॥ ५-७ ॥ इसके अनन्तर जब सब राजाओने यह सुन लिया कि राम नहीं आयेंगे, तब वे कम्बुकण्ठके यहाँ पहुंचे । उधर कम्बुकण्ठकी कन्या मदनसुन्दरीको अट्टारीपर देखकर नारदजी आकाश-मार्गसे उतर आये । मदनसुन्दरीने सखियों के साथ आकर नारदकी पूजा की और उन मुनिके सामने जा बैठी ॥ ८-१० ॥ फिर भक्तिपूर्वक नारदसे पूछने लगा—स्वामिन् ! आप इस समय कहाँसे आ रहे हैं और अब कहाँ जायेंगे सो बताइए ॥ ११ ॥ आपके दर्शनसे मैं आज परम पवित्र हो गयी । इस प्रकार उसकी बात सुनी तो थोड़ा मुसकराकर नारद कहने लगे—हे बाले ! इस समय मैं स्वर्गलोकसे आ रहा हूँ और रामके सब पुत्रांके यहाँ अलग-अलग भोजन करनेके लिए अयोध्या जा रहा हूँ। आते समय मैंने कान्तिपुरी नगर के बाहर सेना देखी उसे देखकर मुझे बड़ा कौतूहल हुआ। रास्तेमें एक पथिकसे पूछनेपर ज्ञात हुआ कि यहाँ तुम्हारा स्वयंम्बर है तो यह सोचा कि जहाँ तक है, रामचन्द्रजी अपने बालकों समेत यहाँ अवश्य आये होंगे । चलो, वहीं ही दर्शन कर लूं। यह निश्चय करके मै यहाँ आया, किन्तु रामचन्द्रजीको नहीं देखा तो राजाओंस पूछा कि राम क्यों नहीं आये ? उन लोगोंने जो कारण बतलाया, उससे मेरा मन बहुत खिन्न हुआ ॥ १२-१९ ॥ सप्तद्वीपके अधिपति राम तथा उनके लड़कोंका न बुला सकनेका निश्चय करके ही तुम्हारे पिताने और-और राजाओंको बुलाया है ॥ २० ॥ अच्छा, अब मैं अयोध्यामें रामचन्द्रजीके पास जा रहा हूँ। हे बाले ! तुम अभागी हो, जो रामचन्द्रजी जैसे राजाकी पतोहू नहीं बन रही हो। कर्मकी भी बड़ी विचित्र गति होती है। ऐसा कह और कन्यासे पूछकर नारदजी जाने लगे। तब वह कन्या मदनसुन्दरी खिन्न मन, अन्सु भरी आँखों, म्लानमुख, काँपते हुए अधरो तथा रोमाञ्चित शरीर होकर गद्गद बाणीसे इस प्रकार विनय करती हुई कहने लगी—आप कोई ऐसी युक्ति करिए कि जिससे मैं उनकी ही पतोहू बनू । मैं आपकी शरणमें हूँ। ऐसा कहकर उसने अपना मस्तक मुनिराजके चरणोंमें रख दिया और रोने लगा। तब नारद मुनिने कहा-

३७४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

भविष्यसि त्वं रामस्य स्नुषा यत्नं करोम्यहम् । इत्युक्त्वा तां समाश्वास्य खमार्गेण मुनिर्ययौ ॥२७॥ एतस्मिन्नन्तरेऽथाऽऽयात्स्यन्दनं भूरिकेतनः । यूपकेतुर्नि... पश्यन्तमवतीर्याऽथायौ ॥२८॥ किञ्चित्सैन्ययुतो बालस्तमटव्यां दिदृक्षुः सः । यावन्सन्ध्याटिकं कर्तुमृषिविष्टस्तदा मुनिम् ॥२९॥ ददर्श नारदं नत्वा पूजयामास सादरम् । ततः पप्रच्छ मुनये यूपकेतुः पुरःस्थितः ॥३०॥ कुतः समागतं चेति सन्तुल्या नारदो मुनिः । सर्वं वृत्तं सविस्तारं कथयामास बालकम् ॥३१॥ तच्छ्रुत्वा सकलं वृत्तं नत्वा तं नारदं मुनिम् । अत्रायं क्रोलको वाक्यं सक्रोधः संभ्रमान्वितः ॥३२॥ मुने नृपाणां सर्वेषां द्वेषबुद्धिञ्च राघवे । वा अज्ञा माऽद्य सर्वेषां कुंभाण्डमयंकेणे जवात् ॥३३॥ कमुकटादिभूपानां सारं पश्याक्यहं रणे । मुने त्वत्कृपया सर्वान् जित्वानापामयाक्यहम् । ३४॥ इत्युच्यन्वा स ययौ कान्ति पञ्चमेऽहनि सेनया । नारदोऽपि ययौ रामं द्रष्टु प्रीतमनाम्तदा ॥३५॥ रामेण पूजितः प्रेम्णा भोजनार्थं निमन्त्रितः । अथ भोजनवेलायां यूपकेतुं रघूत्तमः ॥३६॥ अदृष्ट्वा लक्ष्मणं प्राह यूपकेतुर्न दृश्यते । बालेषु च भोजनार्थे लक्ष्मणात्र समाह्वय । ३७॥ तदा समालतीं गत्वा पप्रच्छ लक्ष्मणो जवात् । सा प्राह वनमध्येऽद्य किञ्चित्सैन्ययुतो गतः । ३८॥ श्रुत्वैतद्यथावत्स गत्वा रामं जगाद ह । अथ रामो भोजनादि सपाद्य मुनिना मुदा ॥३९॥ ययौ सभागयासीनस्तं मुनिं वाक्यमब्रवीत् । पञ्चप्रकृतिनान्यत्र स्थेयं मद्वचनान्मया ॥४०॥ तथेति नारदः प्राह सभायां संस्थितः सुखम् । अथ रात्रौ यूपकेतुमदृष्ट्वा रघुनन्दनः ॥४१॥ उपाहारं कृतुकामः पुनर्लक्ष्मणमब्रवीत् । आकारय यूपकेतुं मायं दृष्टो मया शिशुः ॥४२॥ तथेति रामवचनात्पुनर्गत्वा तु मालतीम् । पप्रच्छ यूपकेतुं म सा प्राह नागतस्त्विति ॥४३॥ स्वतः स विह्वलो भूत्वा रामं वृत्तं न्यवेदयत् । रामोऽपि नागतं श्रुत्वा बभूवार्त्ता विह्वलोऽभवत् ॥४४॥

हे ... ! तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करो, उठो ॥ २१-२७ ॥ तुम अवश्य रामकी पतोहू बनोगी । मैं इसके लिए उद्योग करूँगा - ऐसा कह और उसे इस तरह बंधाकर नारदजी आकाशमार्गसे चल दिये ॥ २७ ॥ इसी समय यूपकेतु रथपर बैठकर अटवी में निन्द्रेय और राहुल के पत्तोंको देखते हुए तमसा नदीके किनारे पहुंचे । २८ ॥ उस समय यावत्-पो सन् उन्मत्त मद्य थे । उसके साथ भृत्योंने तालाबमे स्नान किया और सन्ध्यावन्दन करनेको बैठे थे कि वि. नारदजी को देखा । तब उनको प्रणाम करके सादर पूजन किया । इसके बाद नारद मुनिने विस्तारपूर्वक उस कन्या मदनमुग्धा का सारा वृत्तान्त कहा। उसे सुनकर क्रोध और घबराहटसे पूर्ण होकर यूपकेतुने कहा - "हे देवर्षि मुने ! इस समय जो सब राजे रामसे द्वेषबुद्धि रखते हैं, वह उनके लिए अगोचरिणी विड होगी । ३३ ॥ कम्बुकण्ठ आदि राजाओका बल में संग्रामभूमिम पहुँचकर देखता हूँ। हे मुनिवर ! मैं आपकी कृपासे उन सबको बांधकर मदोन्मत्तीको लिये आता हूँ । ३४ ॥ ऐसा कहकर यूपकेतु अपनी सेनाके साथ पांचवें दिन कान्तिपुरीमें पहुंचे और नारदजी प्रसन्नतापूर्वक रामका दर्शन करनेके लिए अयोध्या चले गये । ३५ ॥ वहाँ पहुँचनेपर रामने प्रेमसे नारदजीका पूजन करके भोजनका निमन्त्रण दिया । जब भोजनका समय हुआ, तब यूपकेतुको न देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा कि इस समय यूपकेतु नहीं दिखायी देता । हे लक्ष्मण ! और-और बालकोंके साथ उसे भी भोजन करनेके लिए बुलाओ ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ रामके आज्ञानुसार लक्ष्मण मालतीके पास पहुंचे और यूपकेतुको पूछा । उसने कहा कि वे अपने साथ थोड़ी-सी सेना लेकर वनको गये हैं ॥ ३८ ॥ यह वृत्तान्त लक्ष्मणने जाकर रामको सुना दिया । तत्पश्चात् मुनिके साथ राम भोजन आदि करके अपने सभाभवनमें गये और वहाँ बैठकर नारद मुनिसे कहने लगे कि आप मेरे कहनेसे पाँच-सात दिन यहीं ही ठहर जाइये । 'तथास्तु' कहकर नारदजी भी ठहर गये । तदनन्तर भोजनके समय रात्रिमें भी यूपकेतुको न देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा- यूपकेतुको बुलाओ। आज मैंने दिनभर उस बच्चेको नहीं देख पाया है । ३६-४२ ॥ 'बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मण फिर मालतीके पास गये और यूपकेतुको पूछा उसने कहा कि वे अभी तक

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७५


हतः सा जानकी श्रुत्वा विह्वला क्षिप्तमानसा । दुद्राव राघवप्रेग्ने मा मद्ये तूष्णीं कथं स्थिताः ॥४५॥
इति तान् प्राह वैदेही तदा सर्वेऽनितिष्ठिताः । त्यक्त्वोपादाशनं वेगेन मन्तोद्यर्थे ममूद्यताः । ४६।
तदा तान्विह्वलान्दृष्ट्वा नारदः प्राह राधवम् कांतिश्च यूपकेतोः प्रयाणादिप्रसादरात् ॥४७॥
हास्यं राघवः धृत्वा किञ्चित्प्रत्ययमाददा लक्ष्मणं प्राह वेगेन शत्रुघ्नोऽथैः मऋतु । ४८
सेनया चतुरङ्गिण्या उवन्कांतिं द्रुतादिभिः मथेति लक्ष्मणाथोत्क्त्वा याग्राहागनिपाय सः॥ ४९॥
सेनया बालकंवंगारुहलूनं प्रैषयन्निति । शर्म नन्त्राऽथ शत्रुघ्नः शीघ्रं स्यन्दनमस्थितः ॥५०।
ययौ कांतिसमीपं स षष्ठेऽहनि मुदान्वितः एतस्मिन्नन्तरे कांतिपुर्यां तत्र स्वयंवरे । ५१॥
सभायां राजशार्दूलाः मस्थितास्ते मुदान्विताः । अथ सा शिविकामारु ह्यययौ मदनसुन्दरी । ५२॥
किञ्चिन्म्लानमुखी दुःखामस्मरन्ती नारदेरितम् । वृद्धोघवाता तां सर्वान् दर्शयामास पार्थिवान् ॥५३॥
यूपकेतुस्तदा वेगाद्गत्वा तूणीं सभांगणम् । मोहन स्त्रं विमुच्याथ मोहयामास तां सभाम् ॥५४॥
मोहितैर्मोहनास्त्रेण न्यस्तां तद्वाहकैर्भुवि । रथेन शिविकां गत्वा धृत्वा मदनसुन्दरीम् ॥५५॥
निजाभिधानं मथाऽथ तां तुष्टासकंगमद । अथ सा त्रपयामास वीर मदनसुन्दरी । ५६।
सुमोच मालो तन्कण्ठे नवरत्नमयीं शुभाम् । ततः स यूपकेतुहि रथे मदनमन्दरीम् ५७॥
निवेश्य कांतिपुर्याः सच वेगेन्यो स्थितोऽभवत् । नापाह द्य.तंतं वीरसुन्दरीं त्वं भयं त्यज । ५८।
जित्वा सर्वान्नृपानद्य मया गच्छाम्यहं पुरि तत्तस्य वचनं श्रुत्वा सा प्राह वचनं तदा । ५९।
वहवः सन्ति राजानस्त्वमेकः स्वल्पसेनया । असंख्यव्रातानि सैन्यानि तेषां पश्य समन्ततः ॥६०॥
कथ युद्धं भवेत्तत्र मा कुरुष्वद्य मंगरम् शीघ्रं मां नय स.फेन ततो रामेण सेनया । ६१।


गङ्गीलौटे ॥ ४३ ॥ यह सुन लक्ष्मण हँसकर हाथ थामकर वचन कहा। जब रामने यह सुना तो ज्ञातानों के साथ-साथ वे भी विह्वल हो उठे ॥ ४४ ॥ जानकीने सुन सा०ह्रै भी विह्वल तथा क्षिप्त होकर दौड़ती हुई रामके पास पहुंची और कहा कि आप लोग यूपकेतुका अशुभिन्वत देखकर भी चुपचाप बैठे हैं ? ॥ ४५ ॥ यह सुनकर सब लोग घबड़ा उठे और भोजन त्यागकर तुरंत उसका तैयारी कर दिये ॥ ४६ ॥ इस प्रकार सबको व्याकुल देखकर नारदजन रदन सहितराक्षस वृत्त यंत बतलाया और यूपकेतुके प्रस्थानकी भी बात कह सुनाई ॥ ४७ ॥ यह हास्य सुना ता रामको थोरा सन्तान हुआ और तुरंत लक्ष्मणको आज्ञा दी कि सग चतुरङ्गिणी सेना लेकर शत्रुघ्न अभी कांतिपुरी जायं । "बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मणने भोजन आदि करवाकर राजन ह् सेना और कुछ अरि वीर बालकोंके साथ शत्रुघ्नको कांतिपुरी भेजा रामको प्रणाम करके शत्रुघ्न रथपर सवार हुए और प्रसन्नता पूर्वक प्रस्थान कर दिये ॥ ४८-५० ॥ इस तरह अयोध्यासे चलकर छठे दिन शत्रुघ्न कांतिपुरीके पास पहुंच गये उधर कांतिपुरीमें स्वयंवर हो रहा था ॥ ५१ ॥ सभा मण्डपमें बहुतस राज हर्षपूर्वक बठे हुए थे। इतनेम मदनसुन्दरी पालकीमं बैठी हुई सभामें आयी ॥ ५२ । उस समय वह दुःखस नारदका वानीका स्मरण कर रही थीं। इस कारण उसका मुख कुम्हलाया हुआ था। सभामें पहुंचकर वृद्धा वार्या न सब राजाओंको दिखलाया ॥ ५३ ॥ इसी समय वेगके साथ यूपकेतु सभाभवनमें पहुंचे और मोहनास्त्रका प्रयोग करके उन्होंने सारी सभाको मूच्छित कर दिया । ५४ ॥ महनास्त्रसे मोहित होकर शिविकावाहकोने भी शिविका जमीनपर रख दी । इतनेम रथपर बैठे हुए यूपकेतु शिविकाके पास पहुंचे और मदनसुन्दरीका हाथ पकड़कर अपना नाम बताया, जिससे वह बहुत प्रसन्न हुई और वीर यूपकेतु-के वरकर उसन उनके गलयं वह नवरत्नमयी वरमाळा डाल दी। सब प्रसन्न होकर यूपकेतुने मदनसुन्दरीको रथमें बिठा लिया ॥ ५५-५७ ॥ तब कान्तिपुरीसे बाहर निकलकर वे एक स्थानपर रुक गये । वहाँपर उन्होंने मदनसुन्दरीसे कहा कि अब तुम किसी प्रकारका भय न करो, ॥ ५८ ॥ मैं सब राजाओंको जीतकर तुम्हारे साथ अयोध्यापुरी चलूंगा । यूपकेतुकी बात सुनकर उसने कहा - ॥ ५९ ॥ ये राज बहुतसे हैं और युद्ध अकेले हें, तुम्हारे साथ सेना भी थोड़ी सी है और देखों न उनकी असंख्य सेना चारों ओर दबी हुई हैं ॥ ६० ॥

३७६आनन्दरामायणे[ सर्ग ८

युद्धं कुरु नृपैर्घोरैः शृणु मद्वचनं प्रभो । मा साहसं कुरुष्वात्रार्थये त्वां मुहुर्मुहुः ॥६२॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा तामाश्वास्य पुनः पुनः । उपसंहारयामास मोहनास्त्रं स लीलया ॥६३॥
तदा ते पार्थिवाः सर्वे श्रुत्वान्योन्यं वधू छलन् । शत्रुघ्नतनयेनेति क्षोभात्स्वैः स्यन्दने स्थिताः ॥६४॥
निर्ययुः कोटिशो योद्धुं स्वस्वसेनायुता जवात् । चण्डिकायाः सुमन्त्राश्च पूर्ववैरेण दर्पिताः ॥६५॥
दृष्ट्वैनेमिमार्गेण ददृशुस्तं रथस्थितम् । युक्तं मदनसुन्दर्या बिभ्रतं मालिकां हृदि ॥६६॥
ततस्तं मुमुचुः सर्वे नानास्त्राणि सैनिकाः । यूपकेतुस्तदा वेगाद्गुणकृत्य महद्धनुः ॥६७॥
वायव्यास्त्रेण तत्सर्वानुद्धूय दशदिक्षु सः । प्रक्षिपत्पार्थिवान् सैन्यान्वाहनाग्र्यस्थितान् ॥६८॥
तदा स कंबुकण्ठोऽपि पूर्ववैरमनुस्मरन् । चण्डिकायाः सुमन्त्राश्च स्वयंवरसमुद्भवम् ॥६९॥
निमेषान्निजकन्याया वैभ्तो हरणं बलात् । महाक्रोधान्वितर्यद्यौ स स्वसैन्येन परिवेष्टितः ॥७०॥
कुर्वन् दुंदुभिनिर्घोषं युद्धार्थं यूपकेतुना । यूपकेतुरपि श्रुत्वा दुन्दुभीनां महन्स्वनम् ॥७१॥
कान्तिपुर्यूताद्द्वारपुरतः प्रस्थितो रथी । टङ्कृत्य महच्चापं सन्दधे शरमुत्तमम् ॥७२॥
ये ये वीराः पुरद्वारान्निर्गताश्च वहिः क्षणे । तान् जघान क्षणादेव प्रेतदुर्गं रुगोधमः ॥७३॥
तं दृष्ट्वा यूपकेतोश्च कंबुकण्ठः पराक्रमम् । ययौ स्वयं स्यन्दनेन प्रेतसंधं विदार्य च ॥७४॥
छेपसैन्येन संयुक्तो यूपकेतुं रुधा जगाद तदऽहं यूपकेतं म प्रथा म्वं मङ्गर कुरु ॥७५॥
किमेतान्मशकान् हत्वा पौरुषं मन्यसे जड । इत्युक्त्वा सप्तभिशार्यूपकेतुं जघान सः ॥७६॥
तान्बाणानागतान् दृष्ट्वा यूपकेतुर्निजैः शरैः । संछिन्त्वा नवबाणैस्तच्चापं सारथिनं ध्वजम् ॥७७॥
कवचं मुकुटं छित्वा जघान तुरगानपि पद्भ्यां तदा कंबुकण्ठो गदामादाय दुद्रुवे ॥७८॥

ऐसी अवस्था में युद्ध कैसे कराओगे ? आज तुम संग्राम न करो । मुझे शीघ्र अयोध्या पहुँचा दो और वहाँ से राम-चन्द्रजी की विशाल सेना लेकर आओ, तब युद्ध करो हे प्रभो ! ऐसा साहस इस समय करना ठीक नहीं है। मैं बार-बार यही विनती करती हूँ ॥६१। ६२। इस प्रकार मदनसुन्दरी का वचन सुनकर उन्होंने उसे आश्वासन दिया और मोहनास्त्र का संवरण कर लिया । ६३ ॥ जब उन राजाओं ने किसी के मुख से सुना कि शत्रुघ्न-के पुत्र यूपकेतुने मदनसुन्दरी का हरण किया है तो अपने-अपने रथों पर सवार हो-होकर बड़ी-बड़ी सेना लिये उसके साथ व लड़ने को निकल पड़े। एक तो चण्डेश और मन्त्रणाक्ष का ही वैर उन लोगों के मन में था, दूसरे अब मदनसुन्दरी के हरण से उनका क्रोध और भी अधिक हो गया ॥६४। ६५। फिर रथ या, शत्रु के रथके पहियाका रास्ता देखते हुए वे चले और थोड़ी ही दूर जाकर उन्होंने देखा कि यूपकेतु मदन-सुन्दरी के साथ बैठा है और उसके गले में वरमाला पड़ी हुई है ॥ ६६ ॥ देखते ही सब राजाओं ने एक साथ उस वीर बालक पर कितने ही शस्त्रोंका प्रहार कर दिया । तब यूपकेतु ने वेग के साथ अपने धनुष को टंकार किया । ६७ ॥ और वायव्य अस्त्र का प्रयोग करके इन सब राजाओं को रथ, वाहन तथा सेना समेत उठाकर दूर फेंक दिया ॥ ६८ । महाराज कम्बुकण्ठ भी पूर्वस्नेह को स्मरण करके विशेषकर उस समय चण्डिका अपनी कन्या का हरण देखकर अपनी सेना के साथ दुन्दुभिका युद्ध बजवाते हुए दुन्दुभी का घोष करते हुए निकले ॥६९। यूपकेतु ने भी जब दुंदुभीकी गर्जना सुनी तो कान्तीपुरके उनके द्वारपर पहुँचे और अपने धनुषका टंकार करके उसपर एक उत्तम बाणका संधान किया ॥ ६९-७२ । उस पुरद्वार से जो-जो योद्धा निकलते, उनको अपने बाणोंसे यूपकेतु बराबर मारते जाते थे । इतने थोड़े ही देर में वह द्वार मृतकों से भर गया । ७३ । इस तरह यूपकेतुका पराक्रम देखकर राजा कम्बुकण्ठ स्वयं अपने रथ पर सवार होकर उन शवों को चीरते हुए बड़ी वृद्ध सेना के साथ यूपकेतु के सामने जा पहुंचे और क्रोध में भरकर उन्होंने कहा-अब तू मेरे साथ संग्राम कर । ७४॥ ॥७५॥ अरे जड ! इन मच्छडोंको मारकर क्या तू अपने पौरुषको पौरुष मानता है ? ऐसा कहकर कम्बुकण्ठने सात बाणों से यूपकेतु पर प्रहार किया । ७६ ॥ उन बाणों को अपनी ओर आते देखकर यूपकेतुने अपने नौ बाणों से कम्बुकण्ठके बाणों, धनुष, सारथी, ध्वजा, कवच और मुकुट को काट डाला और घोड़ों को भी मार दिया । तब

सर्गः ८] विवाहकाण्डम् ३७७


तावन्महस्रधा बाणैर्यूपकेतुश्चकार ताम् । ततो बदध्वा दृढां मुष्टिं कम्बुकण्ठस्त्वरान्वितः ॥७९॥
हृदये यूपकेतोश्च जघानाचलसन्निभाम् । तदा स यूपकेतुस्त्वं श्वशुरं स्यन्दनोपरि । ८०।।
ध्वजे बबन्ध वेगेन खङ्गं जग्राह सम्भ्रमात् । कंबुकण्ठशिरश्छेदं कर्तुं तं समुपस्थितम् ॥ ८१॥
दृष्ट्वा धृत्वा करो तस्य सखड्गं सम्भ्रमान्विता । तमाह नत्वा माश्वश्रीमं तदा मदनसुन्दरी ॥८२॥
विह्वला विगतोत्साहा वेपती अश्रुलोचना । मम तातं कंबुकण्ठमंतं हंसि कथं प्रभो ॥८३॥
मक्षिकापतनं पूर्वं ग्रासे एतच्चया कृतम् । शुभारम्भे पूर्वमेव दुःस्वप्नंमिवलम्बिनम् ॥८४।
मद्वाक्याञ्चैव हंतव्यस्तन्ममत्वां प्रार्थयाम्यहम् । एवं मदनसुन्दर्या वचः श्रुत्वा विहस्य सः ॥८५॥
कराद्विमुच्य तं खङ्गं स्वसूतं चोदयन्मुदा । सेनया स ययौ यावत्त्वथाऽयोध्यां पुरीं प्रति ॥८६॥
तावद्दुन्दुभिनिर्घोषानग्रे शुश्राव सेनया । पुनश्चाथ दृढीकृप्य यूपकेतुस्तदा पथि ॥८७॥
कस्येयं वाहिनी चेति चिंतयामास चेतसि । ततः शरं सुमोचैकं निजनामांकितं वलात् ॥८८॥
योजनांतरसेनायां शरः शत्रुघ्नसन्निधौ । पपान तत्पदाग्रे तं दृष्ट्वा स चकितस्तदा ॥८९॥
शरपुच्छे यूपकेतोर्नाम दृष्ट्वाथ शत्रुहा । निश्चितवान्यूपकेतुर्मागेऽग्रे वर्तते ध्रुवम् ॥९०॥
ततश्चापे स शत्रुघ्नः स्वनाम कितमुत्तमम् शरं संधाय विमुञ्च यूपकेतुं सुमोच ह ॥९१॥
स शरो यूपकेतोश्च मम्नकादूर्ध्वतस्तदा । अपतत्पृष्ठभागे स तं ददर्श पितुः शरम् ॥९२॥
तदा हृष्टो यूपकेतुः कुर्वन्दुंदुभि निःस्वान् । गत्वा वेगेन शत्रुघ्नं दृष्ट्वोत्प्लुत्य रथादधः । ९३॥
ननाम पितरं पत्न्या कंबुकंठं प्रदर्शयन् । तदा तं सुहृद ज्ञात्वा मोचयामास शत्रुहा ॥९४॥
कंबुकंठमुखाच्छ्रुत्वा सर्वं वृत्तं सविस्तरम् । शत्रुघ्नः प्रापिनस्तेन सुहृदा तत्पुरो ययौ ॥९५॥


कम्बुकण्ठ पैदल ही गदा लेकर दौड़ पड़ा ॥ ७७ । ७८ ॥ यूपकेतुने अपने बाणोंसे उनकी गदाके भी हजार टुकड़े कर दिये । इसके बाद वह गदा फेंककर कटार घूंसा मारा । तब यूपकेतुने अपने ससुर कम्बुकण्ठको रथकी ध्वजामें बान्ध दिया और सिर काटनेके लिए वेगके साथ तलवार उठायी ॥ ७९-८१ ॥ इस तरह सिर काटना उद्यत एवं हाथमें खड्ग लिए यूपकेतुको देखकर मदनसुन्दरीने प्रणाम किया और आँखोंमें आँसू भरकर कहा - ॥ ८२ । हे प्रभो ! मेरे पिता कम्बुकण्ठको आप क्यों मारना चाहते हैं ? पहले ही ग्रासमें मक्खी गिर पड़नेके समान आपने शुभके स्थानमें इस दुःखदायी कर्मको क्यों अपनाया है ? ॥ ८३ ॥ ८४ । अतः मेरी बात मानकर इन्हें मत मारिए । मैं आपसे यही प्रार्थना करती हूँ। यह कहती हुई मदनसुन्दरी विह्वल हो गयी, उसका उन्माद नष्ट हो गया वा वह कांप रही थी और नेत्रोंमें आँसूकी धाराएँ बहाती जा रही थी । इस प्रकार मदनसुन्दरीकी बात सुनकर यूपकेतु मुसकराये और खड्ग फेंककर अपने सारथीको रथ चलानेका संकेत किया, वे अपनी सेनाके साथ अयोध्यापुरीकी ओर चले ही थे ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ इतनेमें आगेसे दुन्दुभीका घोष सुनाई पड़ा । अब अपना धनुष सम्हालकर सोचने लगे कि आगेसे यह किसकी सेना आ रही है। यह सोचकर उन्होंने अपने नामसे अंकित एक बाण वेगपूर्वक छोड़ा ॥ ८७ ॥ ८८ ॥ वह बाण उड़ता हुआ एक योजन तक गया और जहाँ सेना पड़ी हुई थी, वहाँ पहुंचकर शत्रुघ्नके चरणोंके आगे गिरा । उस बाणको देखकर शत्रुघ्न चकित हो गये । ८९ ॥ फिर बाणके पुच्छमें यूपकेतुका नाम देखकर शत्रुघ्नने निश्चय किया कि यूपकेतु आगे रास्ते में ही हैं ॥ ९० ॥ तदनन्तर शत्रुघ्नने भी अपने नामसे अंकित एक बाण उठाकर यूपकेतुकी ओर छोड़ दिया ॥ ९१ ॥ वह बाण यूपकेतुके ऊपरसे होता हुआ पीछे जा गिरा । यूपकेतु-ने अपने पिताका बाण देखा ॥ ९२ । तब प्रसन्न होकर दुन्दुभि जैसा गर्जन करते हुए वेगके साथ शत्रुघ्न-के पास पहुंचे । वहाँ पिताको देखते ही वे रथसे कूद पड़े और अपनी स्त्री मदनसुन्दरीके साथ जाकर शत्रुघ्न-को प्रणाम किया और ध्वजामें बँधे हुए कम्बुकण्ठको दिखाया । शत्रुघ्नने उन्हें अपना सम्बन्धी समझकर छुड़ा दिया ॥९३॥९४। फिर शत्रुघ्नने कम्बुकण्ठके मुखसे ही विस्तारके साथ समस्त वृत्तान्त सुना । इसके बाद कम्बुकण्ठके

३७८आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

कांतिपुर्यां बहिः स्थित्वा कंबुकंठमतेन सः । आकारणार्थं रामाय रामं दूतान्प्रचोदयत् ॥५६॥
तदा ते कंबुकंठस्य शत्रुघ्नस्यापि वेगतः आकारणार्थं श्रीराम ययुर्द्ता मुदान्विताः ॥५७॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे मदनसुन्दरीहरणं नामाष्टमः सर्गः । ८ ॥


नवमः सर्गः

(रामका वंशविस्तार)

श्रीरामदास उवाच
गत्वाऽयोध्यापुरीं दूता रामं वृत्तं न्यवेदयन् । रामोऽपि श्रुत्वा तद्वृत्तं सीतायै संन्यवेदयत् ॥ १ ॥
ततो मुहूर्ते श्रीरामः सावरोधोऽनुजैः सह । पौरैर्जानपदैः सर्वैः सुहृद्भिः सेनया सह ॥ २ ॥
नारदेन ययौ कान्तिमार्यां मुक्तिपुरीं प्रति । ततः श्रुत्वा कंबुकंठः शीघ्रं गन्धर्वमागतम् ॥ ३ ॥
स प्रत्युद्गम्य विनयान्नत्वा संपूज्यत्समुदा । यूपकेतुं ततः पूज्य वरञ्चाध्वं पुरीं शनैः ॥ ४ ॥
वारस्त्रीनृत्यगीतैश्च तूर्यघोषैर्निनाय सः । ततः कान्तिपुरीस्थान्नाः स्त्रियः प्रासादमस्थिताः ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा रामं यूपकेतुं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । ततो रामः शनैर्हस्त्युं कन्पिनं गृहमुत्तमम् ॥ ६ ॥
गत्वा दृष्ट्वा मुहूर्ते तु पूर्वोक्तकौतुकैः सुखम् । यूपकेतोर्विवाहं स चकार महोत्सवैः ॥ ७ ॥
ततो विवाहं निर्वर्त्य कंबुकंठन पूजिताः । हस्त्यश्वरथपादातदासदासीजनादिभिः ॥ ८ ॥
ययौ मदनसुन्दर्या रामोऽयोध्यापुरीं विजाप् । ततो विवेश नागरी नेदुर्वादित्राणि वै तदा ॥ ९ ॥
मङ्गलुवारनार्यश्च तुष्टुवुर्मागधादयः । प्रासादस्थाः स्त्रियो रामं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥ १० ॥
मार्गे नीराजितः स्त्रीभिर्विवेश निजमन्दिरम् । कारयित्वा रमापूजां ददौ दानान्यनेकशः ॥ ११ ॥
सुहृदः पूजयमास राघवो वस्त्रादिभिः । ततो विसर्जयामास सर्वान्वस्वस्थल प्रति ॥ १२ ॥


प्रार्थना करनेपर उनके साथ ही कांतिपुरी गये ॥ ५५ ॥ वहाँ कम्बुकण्ठकी सलाहसे शत्रुघ्न नगरके बाहर ही ठहरे और रामको बुलानेके लिए दूतोंको भेजा ॥ ५६ ॥ उसी समय शत्रुघ्न तथा कम्बुकण्ठके दूत श्रीरामको बुलानेके लिए प्रसन्नतापूर्वक चल पड़े ॥ ५७ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

श्रीरामदास कहने लगे वे दूत अयोध्यापुरीमें पहुंचे और रामको कान्तिपुरीका सब हाल कह सुनाया। सो सुनकर रामने सीतासे कहा ॥ १ ॥ इसके पश्चात् अच्छे मुहूर्त्तमें राम अपने अन्तःपुरकी नारियों, पुरवासियों, जनपदवासियों, समस्त सम्बन्धियों, नारद तथा सेनाके साथ आदिकुन्तिपुरी अर्थात् कांतिपुरीको चल पड़े। जब कम्बुकण्ठने सुना कि रामचन्द्र पुरके निकट आ पहुंचे हैं, तब आदरपूर्वक स्वागत करने गये। यहाँ पहुंचकर सविनय प्रणाम किया। इसके अनन्तर राम तथा यूपकेतुका पूजन करके हाथीपर बिठाकर धीरे-धीरे पुरोको चले ॥ २-४ ॥ रास्तेमें वेश्याएँ नाचती गाती थीं और दुन्दुभी आदि विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे। उधर जब नगरकी स्त्रियोंने आते देखा तो राम और यूपकेतुपर पुष्पवृष्टि करने लगीं। तत्पश्चात् राम जनवासेमें पहुंचे ॥ ५-६ ॥ वहाँ अच्छा मुहूर्त्त देखकर पूर्वोक्त कौतुकोंके साथ बड़े उत्साहसे यूपकेतुका विवाह किया ॥ ७ ॥ विवाहकी सब रीतियाँ पूरी हो जानेपर कम्बुकण्ठसे पूजित होकर कितने ही हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सेना, दास-दासी आदिके साथ मदनसुन्दरीको लेकर अपनी अयोध्यापुरीको चल दिये। सन्तोषकाक पार पहुंचकर व अपनी नगरी में घुसे तो विविध प्रकारके बाजे बजने लगे ॥ ८ ॥ ९ ॥ वेश्याएँ नाचने लगीं और मागध बन्दीजन स्तुति करने लगे। नगरवासिनी महिलाएँ अट्टालिकाओंपर चढ़-चढ़कर रामपर फूल बरसाने लगीं और कुछ स्त्रियाँ मार्गमें आरती उतारने लगीं। इस उत्साहसे राम अपने महल गये। वहाँ उन्होंने लक्ष्मीकी पूजा की और अनेक प्रकारके दान दिये ॥ १० ॥ ११ ॥ इसके अनंतर निमंत्रणमें आये हुए