श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| राममुद्राको पूर्ण करनेकी विधियाँ | ६११ | किस कामनाकी पूर्तिके लिए किस देवताकी आराधना करनी चाहिए | ६७० |
| महोत्तरशत रामलिङ्गतोभद्रके भेद | ६०२ | रामके रकारादि नामोंका महत्त्व | ६७१ |
| पञ्चम सर्ग | रामतारक मन्त्रका माहात्म्य | ६७२ | |
| रामलिङ्गतोभद्र आदि विविध मन्त्रोंकी रचनाविधि | ६०४ | दशम सर्ग | |
| षष्ठ सर्ग | चैत्रमासकी महिमा | ६७३ | |
| रामतोभद्रमें तत्तद्देवताओंकी स्थापनविधि | ६२७ | चैत्रस्नान करनेवालोंके लिए कुछ विशेष नियम | ६७४ |
| श्रीरामकी प्रिय वस्तुओंका विवरण | ६३० | स्त्रियोंके लिए शीतला गौरीस्नान तथा पूजन विधि | ६७९ |
| प्रतिदिन रामकी पूजाविधि | ६३२ | रामनवमीको रामचन्द्रके पूजनका विधान चैत्रमें आनन्दरामायणके पारायणका विधान | ६८० |
| रामनवमीका व्रत करनेवाले एक विप्रकी कथा | ६३७ | अन्य विधि-विधान | ६८१ |
| एक रात्रिमें राजसेवकोंका आकर उस विप्रको सताना | ६४० | एकादश सर्ग | |
| हनुमान्जीके गर्जनसे राज्यके सब पुरुषोंका मरण, तभीसे उस राज्यमें स्त्रीराज्य होना | ६४१ | चैत्रमासके महत्त्वका कारण | ६८३ |
| उस राज्यमें पुरुष उत्पन्न न होनेका कारण | ६४२ | रामका देवताओंको वरदान | ६८४ |
| रामनवमी व्रतकी फलश्रुति | ६४४ | चैत्रस्नान करनेवाले नृसिंह ब्राह्मणकी कथा | ६८५ |
| सप्तम सर्ग | शम्भु ब्राह्मणकी कथा | ६८८ | |
| रामशतनाम आदि लिखनेकी रीति और वस्त्रपत्रविधि | ६४४ | शम्भु विप्रका एक बहेलियेको उपदेश | ६८९ |
| रामनामकी महिमा | ६४५ | शम्भु द्वारा वहाँ आये हुए एक राक्षसका उद्धार | ६९१ |
| राजा युधिष्ठिरका श्रीकृष्णसे रामनामजप तथा पुरश्चरणविधि पूछना और श्रीकृष्णका बतलाना | ६४७ | शम्भु विप्र तथा व्याधकी अयोध्यायात्रा | ६९२ |
| आनन्दरामायणके पाठ और दानका माहात्म्य | ६४९ | शम्भुके मार्गमें एक सिंह तथा हाथीका सामने आना, उस सिंह तथा हाथीके पूर्वजन्मकी कथा | ६९३ |
| रामनामजपकी महिमा | ६५० | शम्भुका उन दोनोंके उद्धारका आश्वासन | ६९४ |
| कविताओंका स्वरूप और कवियोंकी श्रेणी | ६५२ | आगे बढ़नेपर शंभुकी एक कार्पटिक (अध्वारूढो) से भेंट और वार्तालाप | ६९५ |
| अष्टम सर्ग | शंभु द्वारा अयोध्याकी शोभाका वर्णन | ६९७ | |
| वेदादिके पाठका माहात्म्य | ६५३ | कार्पटिकके साथ शंभु विप्रका अयोध्यासे लौटकर उस पूर्व शापग्रस्त राक्षसका उद्धार करना | ७०१ |
| दानपात्रके विषयमें रामदास-विष्णुदासका प्रश्नोत्तर | ६५४ | द्वादश सर्ग | |
| शास्त्रोंके अध्ययनकी महिमा | ६५५ | मृगयाके प्रसंगमें रामकी एक शबरीसे भेंट | ७०२ |
| विविध रामायणोंकी चर्चा | ६५६ | रामका दुर्गामन्दिरमें जाकर बहुतसी स्त्रियोंकी पूजा स्वीकार करना और वरदान देना | ७०५ |
| रामायणके पाठ और रामसम्बन्धी कविता करनेका फल | ६५८ | रामनामकी महिमा | ७०६ |
| आयुर्वेदादिकोंके अध्ययनका फल | ६५९ | रामका मुनियोंको उपदेश | ७०७ |
| दानियोंको दानपात्रका विचार करना ही चाहिए और ब्राह्मणका धन हड़पनेका कुफल | ६६० | त्रयोदश सर्ग | |
| विष्णुदास-रामदासमें रामकी विशेष पूजाके विषयमें प्रश्नोत्तर, रामकी पूजाके मास तथा तिथियोंका निर्देश | ६६१ | हनुमत्कवच और उसका माहात्म्य | ७०८ |
| दोलापूजनकी विधि | ६६३ | रामकवच | ७१४ |
| बत्तीस पक्वान्नोंकी धारणा और पीनेका माहात्म्य | ६६७ | चतुर्दश सर्ग | |
| सीताकवचके विषयमें विष्णुदासका प्रश्न और सीताकवच | ७१७ | ||
| सीताहृदयसहस्रनामस्तोत्र | ७२० |
२० विषयानुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| दिक्पोके लिए कुछ उपयोगी फल | ७२१ | ब्रह्माका सोमवंशी राजाओंको साथ लेकर रामके पास जाना और क्षमा मँगवाना | ७७१ |
| रामनामस्तोत्रकी स्वरूपविधि | ७२३ | रामका ब्रह्माको वाल्मीकिके पास भेजना और वाल्मीकिके परामर्शसे सोमवंशी राजाओंकी स्त्रियोंका सीताके पास जाना | ७७२ |
| पंचदश सर्ग | सीताके अनुरोधपर युद्धविराम, ब्रह्माका रामसे वैकुण्ठधाम पधारनेकी प्रार्थना करना और रामकी स्वीकृति | ७७३ | |
| लक्ष्मणकवच | ७२५ | पञ्चम सर्ग | |
| भरतकवच | ७२७ | रामको परम धाम जानेके लिये उद्यत देखकर हरण, सुग्रीव, विभीषण आदिका अपने साथ ले चलनेके लिये आग्रह करना | ७७४ |
| शत्रुघ्नकवच | ७२९ | यज्ञमें आए हुए राजाओं, मित्रो तथा पुत्रोकी विदाई और उनकी स्थान स्थानपर नियुक्ति | ७७५ |
| मनन एवं कीर्तन करने योग्य राममन्त्र | ७३१ | रामके आज्ञानुसार कुशका अयोध्या आना | ७७६ |
| षोडश सर्ग | रामका लक्ष्मणको वरदान | ७७७ | |
| रामायणश्रवणके बादके कर्त्तव्य | ७३८ | षष्ठ सर्ग | |
| गरुड़की शंका और रामके द्वारा समाधान | ७३९ | दूसरे दिन सवेरे रामका नजलोकोंको बुलाकर अपने परम धाम आनेकी बात बतलाना | ७७८ |
| वानरोंकी उत्पत्तिका इतिहास और वानरोंको वरदान | ७४० | रामके आगमनकी बात जानकर स्वर्गके देवताओंमें उत्साहका सञ्चार | ७७९ |
| हनुमन्तसाकारोपासनविधि | ७४१ | सौमित्रिका रामके समक्ष स्तुति करना | ७८० |
| सप्तम सर्ग | गरुड़पर बैठकर रामका वैकुण्ठधाममें जाना और रामके साथ गये सभी अयोध्यावासियोंको सान्तानिक लोक प्राप्त होना | ७८१ | |
| श्रीरामचन्द्रीयादि साररामायण | ७४३ | सप्तम सर्ग | |
| अष्टादश सर्ग | कुशके बादवाले सूर्यवंशी राजाओंकी वंशावली | ७८२ | |
| अर्जुनके कपिध्वज नाम पड़नेका कारण | ७५१ | अन्य रामायणों तथा आनन्दरामायणमें भेदका कारण | ७८३ |
| पूर्णकाण्ड<br>प्रथम सर्ग | अष्टम सर्ग | ||
| रामकी सभामें हस्तिनापुरसे दूतका आना | ७५७ | विष्णुदासका रामदाससे आनन्दरामायणकी अनुक्रमणिका पूछना और रामदासका अनुक्रमणिकासूत्र कहना | ७८४ |
| वाल्मीकिका रामको चन्द्रवंशी राजाओंका इतिहास सुनाना | ७६० | नवम सर्ग | |
| द्वितीय सर्ग | आनन्दरामायण सुननेका फल | ७८८ | |
| रामका सामन्त राजाओंको बुलवाना | ७६१ | अनुष्ठानविधि | ७८९ |
| रामका भरतको मण्डोपाधिके पदपर अभिषेक करनेका सङ्कल्प करना, किन्तु भरतका यह पद स्वीकार न करना जिससे उस पदपर कुशका अभिषेक | ७६२ | पारायणविधि | ७९० |
| हस्तिनापुरीपर चढ़ाईके लिये परामर्श, रामका शरयू और अयोध्याको वरदान | ७६४ | आनन्दरामायणका संक्षिप्त माहात्म्य | ७९२ |
| रामका हस्तिनापुरको प्रस्थान | ७६५ | पार्वतीजी और शिवजीका रामदास-विष्णुदासके विषयमें प्रश्नोत्तर | ७९३ |
| तृतीय सर्ग | |||
| रामका हस्तिनापुर पहुँचना | ७६६ | ||
| राम और सोमवंशी राजाओंका युद्ध | ७६७ | ||
| उस भीषण युद्धको देखकर देवताओंमें घबराहट और शान्तिका उपाय सोचना | ७६८ | ||
| चतुर्थ सर्ग | |||
| कुशका ब्रह्मास्त्र संधान करना और ब्रह्माका आकर रोकना | ७७० |
इति आनन्दरामायणविषयानुक्रमणिका समाप्त
श्रीसीतापतये नमः
श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गतं
आनन्दरामायणम्
'ज्योत्स्ना'ह्वया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्
सारकाण्डम्
प्रथमः सर्गः
(दशरथ-कौसल्याविवाह तथा ऋष्यशृङ्ग द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ)
श्रीवाल्मीकिरुवाच
वामे भूमिसुता पुरस्तु हनुमान् पृष्ठे सुमित्रासुतः
शत्रुघ्नो भरतश्च पार्श्वदलयोर्वाय्वादिकोणेषु च ।
सुग्रीवश्च विभीषणश्च युवराट् तारासुतो जाम्बवान्
मध्ये नीलसरोजकोमलरुचिं रामं भजे श्यामलम् ॥ १ ॥
आदौ रावणमर्दनं द्विजगिरा तीर्थाटनं सीतया साकेते दशवाजिमेधकरणं पत्न्या विलासाटनम् ।
स्त्रीपुत्रग्रहण स्नुषार्थमटनं पृथ्व्याश्च संरक्षणं रामार्चादिनिरूपणं दयितया स्वीय स्थलारोहणम् ॥ २ ॥
एकदा पार्वती देवी शंकरं प्राह हर्षिता । कैलासवासिनं नत्वा रामभक्त्यैकवत्सला ॥ ३ ॥
पार्वत्युवाच
शंभो त्वया पुराणानि कथितानि ममांतिके । रघुनाथस्य चरितं जन्मकर्मसमन्वितम् ॥ ४ ॥
कथयस्वाधुना देव मम प्रीतिविवर्द्धनम् । आनन्ददायकं कर्म रघुवीरेण यत्कृतम् ॥ ५ ॥
श्रीवाल्मीकि मुनि कहते हैं कि जिनके बायें भागमें सीताजी, सामने हनुमान, पीछे लक्ष्मण, दोनों बगल शत्रुघ्न और भरत वायव्य ईशान अग्नि तथा नैऋत्यकोणमें क्रमशः सुग्रीव, विभीषण, तारापुत्र युवराज अङ्गद और जाम्बवान् हैं उनके बीच विराजमान श्याम कमलसदृश मनोहर कान्तिवाले परमपुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका मैं भजन करता हूँ ॥ १ ॥ इस ग्रन्थके सारकांडम ऋषिवाक्यसे दुष्ट रावणका हनन, दूसरे यात्राकांडमें सीताके साथ रामकी तीर्थयात्रा, तीसरे यागकांडमे अयोध्यामें दस अश्वमेध यज्ञ, चौथे विलासकांडमे पत्नीके साथ विलास, पाँचवें जन्मकांडमें लव-कुशकी उत्पत्ति तथा सीताकी पुनः स्वीकृति, छठें विवाहकांडमें लवकुशके विवाहके लिए प्रस्थान, सातवें राज्यकांडमें धर्मपूर्वक पृथ्वीका रक्षण, आठवें मनोहरकांडमें रामकी पूजा आदिका वर्णन और नवें पूर्णकांडमें सीतासहित भगवान् रामचन्द्रके स्वधाम पधारने आदिका सुन्दर चरित्र वर्णित है ॥ २ ॥ एक समय रामचन्द्रजीकी भक्तिमें तत्पर देवी पार्वतींने कहा हे शम्भो ! आपने बहुतसे पुराणोंकी सुन्दर कथा मुझे सुनायी । हे देव ! अब आप कृपा करके मेरी प्रीति बढ़ानेवाले रघुवीर रामचन्द्रके आनन्ददायक कर्म और उनके जन्म आदिकी मनोहर
२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १
सम्यक् पृष्टं त्वया कान्ते रामचन्द्रकथानकम् । कथयामि सविस्तारं महामंगलकारकम् ॥ ६ ॥ आदिनारायणाद्ब्रह्माऽभून्मरीचिर्विधेः सुतः । मरीचेः कश्यपः पुत्रस्तत्सूनुः सूर्य उच्यते ॥ ७ ॥ सूर्यपुत्रः श्राद्धदेवो मनुर्वैवस्वतस्त्विति । स एव प्रोच्यते तस्येक्ष्वाकुः पुत्रः प्रतापवान् ॥ ८ ॥ इक्ष्वाकोस्तु विकुक्षिर्हि शशादश्च स एव हि । विकुक्षेस्तु ककुत्स्यश्च स एवात्र पुरञ्जयः ॥ ९ ॥ स एवोक्तश्चेन्द्रवाहः ककुत्स्यनृपतेः सुतः । अनेनास्तस्य पुत्रोऽभूद्विश्वरन्धिश्च तत्सुतः ॥ १० ॥ चन्द्रश्चन्द्रस्य पुत्रोऽभूद्युवनाश्वः प्रतापवान् । शावन्तो युवनाश्वस्य शावन्तस्य सुतो महान् ॥ ११ ॥ बृहदश्व इति ख्यातस्तस्माज्जज्ञे नृपोत्तमः । कुवलाश्वो नृपतिर्दृढाश्वस्तत्सूनुतः स्मृतः ॥ १२ ॥ हर्यश्व इति तत्पुत्रो निकुम्भस्तत्सुतः स्मृतः । बर्हणाश्वो निकुम्भस्य बर्हणाश्वनृपोत्तमात् ॥ १३ ॥ कृताश्वो नृपतिः प्रोक्तः श्येनजित्तन्सुतः स्मृतः । युवनाश्वः श्येनजितो युवनाश्वनृपोत्तमात् ॥ १४ ॥ मान्धाता त्रसदस्युर्हि स एव कथितो भुवि । पुरुकुत्सश्च मान्धातुः पुरुकुत्सस्य वै पुत्रः ॥ १५ ॥ त्रसदस्युरिति ख्यातोऽनरण्यश्चापि तत्सुतः । अनरण्यस्य हर्यश्वो हर्यश्वस्यारुणः सुतः ॥ १६ ॥ त्रिबन्धनोऽरुणाज्जातस्त्रिबन्धनसुतो महान् । सत्यव्रतः स एवात्र त्रिशङ्कुरिति वै स्मृतः ॥ १७ ॥ सत्यव्रतस्य पुत्रोऽभूद्धरिश्चन्द्रः प्रतापवान् । रोहितस्तन्सुतः प्रोक्तस्तस्माच्च हरितः स्मृतः ॥ १८ ॥ हरितस्य सुतश्चम्पः सुदेवश्चम्पदङ्गजः । सुदेवाद्द्विजयः प्रोक्तस्तत्पुत्रो भरुक स्मृतः ॥ १९ ॥ भरुकस्य वृकः पुत्रो वृकपुत्रस्तु बाहुकः । बाहुकान्तत्सगो जज्ञेऽसमञ्जः सगरान्मजः ॥ २० ॥ असमञ्जसश्च पुत्रोऽभूदंशुमानिति नामतः । तस्य पुत्रो दिलीवस्तु दिलीपाच्च भगीरथः ॥ २१ ॥ भगीरथाच्छ्रुतो जातः श्रुतान्नाभः प्रकीर्त्यते । नाभस्य सिन्धुद्वीपश्व ह्ययुतायुश्च तत्सुतः ॥ २२ ॥ ऋतुपर्णस्त्वयुतायोः सुदासस्तस्य कीर्त्यते । मित्रसहः स एवात्र कल्माषांघ्रिः स एव हि ॥ २३ ॥ उदासमस्याश्मकः पुत्रो मूलकोऽश्मकदेहजः । स एव नारीकवचो मूलकस्य सुतो महान् ॥ २४ ॥ नाम्ना दशरथः प्रोक्तस्तस्य पुत्रः प्रतापवान् । नाम्ना त्वैडविडः प्रोक्तस्तस्य विश्वसहः स्मृतः ॥ २५ ॥ तस्य पुत्रश्च खट्वाङ्गः खट्वाङ्गाद्दीर्घबाहुकः । दिलीपश्व स एवात्र तस्य पुत्रो रघुः स्मृतः ॥ २६ ॥
कथा सुनाइये ॥ ३-५ ॥ शिवजी बोले-हे कान्ते ! तुमने श्रीरामचन्द्रका कथाविषयक बड़ा अच्छा प्रश्न किया है । मैं उस मङ्गलकारिणी कथाको विस्तारपूर्वक कहता हूँ ॥ ६ ॥ आदि नारायण विष्णुसे ब्रह्माजी जायमान हुए । ब्रह्मासे मरीचि, मरीचिसे कश्यप, कश्यपसे सूर्य और सूर्यसे श्राद्धदेव हुए ॥ ७॥८॥ उन्हींको वैवस्वत मनु भी कहते हैं । उनके बड़े प्रतापी इक्ष्वाकु, इक्ष्वाकुसे विकुक्षि अथवा शशाद और विकुक्षिके ककुत्स्य अर्थात् पुरञ्जय हुए । ककुत्स्यसे इन्द्रवाह, इन्द्रवाहसे अनेना, अनेनासे विश्वरन्धि, विश्वरन्धिसे चन्द्र और चन्द्रका युवनाश्व नामक प्रतापी पुत्र हुआ । युवनाश्वसे शावन्त, शावन्तसे बृहदश्व तथा बृहदश्वसे कुवलाश्व सर्वश्रेष्ट राजा हुए । कुवलयाश्वसे दृढाश्व, दृढाश्वसे हर्यश्व, हर्यश्वसे निकुम्भ, निकुम्भसे बर्हणाश्व, बर्हणाश्वसे कृताश्व, कृताश्वसे श्येनजित्, श्येनजित्से युवनाश्व, युवनाश्वसे मान्धाता हुए । जो संसारमे त्रसदस्यु नामसे प्रसिद्ध थे । मांधातासे पुरुकुत्स, पुरुकुत्ससे फिर दूसरे त्रसदस्यु हुए । त्रसदस्युसे अनरण्य, अनरण्यसे हर्यश्व, हर्यश्वसे अरुण, अरुणसे त्रिबन्धन, त्रिबन्धनसे सत्यव्रत हुए । उनका नाम त्रिशंकु भी था ॥ ६-१७ ॥ सत्यव्रतसे हरिश्चन्द्र नामके बड़े सत्यवादी और प्रतापी राजा हुए । हरिश्चन्द्रसे रोहित, रोहितसे हरित, हरितसे चंप, चंपसे सुदेव, सुदेवसे विजय, विजयसे भरुक, भरुकसे वृक, वृकसे बहुक, बाहुकसे सगर, सगरसे असमञ्जस, असमञ्जससे अंशुमान्, अंशुमान्से दिलीप, दिलीपसे भगीरथ, भगीरथसे श्रुत, श्रुतसे नाभ, नाभसे सिन्धुद्वीप, सिन्धुद्वीपसे अयुतायु, अयुतायुसे ऋतुपर्ण और ऋतुपर्णसे सुदास हुए । वे मित्रमह और कल्माषांघ्रि नामसे भी प्रसिद्ध थे ॥ १८-२३ ॥ सुदाससे अश्मक, अश्मकसे मूलक, मूलकसे नारीकवच, नारीकवचसे दशरथ,
सर्गः १ ] सारकाण्डम् ३
सर्गः १ ] सारकाण्डम् ३
रघोः पुत्रो ह्यजः प्रोक्तस्तस्माद्दशरथः स्मृतः । ततो दशरथाज्जातः श्रीरामः परमेश्वरः ॥२७॥
यस्य नामान्यनन्तानि गृणन्ति मुनयः सदा । विष्णोरारभ्य कथिता एकषष्टिर्नृपा मया ॥२८॥
एकषष्टिनृपाणाम्ते मध्ये रामो विराजते । तस्य ते चरितं कृत्स्नं संक्षेपाच्च ब्रवीम्यहम् ॥२९॥
इक्ष्वाकुकुलसम्भवः क्षत्रियो लोकविश्रुतः । बभूव सर्यूतारेऽप्योध्यायां पार्थिवोत्तमः ॥३०॥
नाम्ना दशरथः श्रीमान् जम्बूद्वीपपतिर्महान् । शशास राज्यं धर्मेण सैन्येन महताऽऽवृतः ॥३१॥
अयोध्यायास्तु सान्निध्ये देशे श्रीकोमलाह्वये । कोमलायां महापुण्यः कोसलाख्यो नृपो महान् ॥३२॥
तस्यासीद्दुहिता रम्या कौसल्या पतिकाम्यका । तस्या दशरथेनैव विवाहो निश्चितो मुदा ॥३३॥
लग्नार्थे तं समानेतुं दूता दशरथं नृपम् । पञ्चदिनिश्चयं कृत्वा विवाहदिवसस्य च ॥३४॥
तदा दशरथोऽपि साकेते सरयूजले । नौकास्थो जलजां क्रीडां चक्रे वै मन्त्रिभिर्बुधैः ॥३५॥
निशायां सेनपा युक्तः स्तुतो मागधवन्दिभिः । रत्नदीप्रप्रकाशैश्च ननृतुर्वारयोषितः ॥३६॥
तस्मिन्काले तु लङ्कायां विधिं पप्रच्छ रावणः । कस्मान्मे मरणं ब्रह्मन् सत्वं मां वक्तुमर्हसि ॥३७॥
तद्रावणवचः श्रुत्वा कथयामास तं विधिः । कौसल्यायां दशरथाद्रामः साक्षाज्जनार्दनः ॥३८॥
चतुर्धा पुत्ररूपेण भूत्वा न विहनिष्यति । पञ्चमेऽहनि लग्नस्य गतो दशरथस्य हि ॥३९॥
दिवसो निश्चितो विप्रैः कौसल्याख्येन रावण । तद्विधेर्वचनं श्रुत्वा पुष्पकस्थो दशाननः ॥४०॥
अयोध्यां सत्वरं गत्वा राक्षसैः परिवेष्टितः । नौकास्थं तं दशरथं जित्वा युद्धैः सुदारुणैः ॥४१॥
बभञ्ज निजपादेन तां नौकां सरयूजले । तदा सर्वे मृतास्तत्र मग्ना विमले जले ॥४२॥
दशरथसुमन्त्रौ द्वौ नौकाखण्डोपरि स्थितौ । शनैः शनैः प्रवाहेण गत्वा च गङ्गोदरीं नदीम् ॥४३॥
दशरथसे ऐन्दिरथ ऐन्दिरथसे विधार, विधारसे खट्वाङ्ग, खट्वाङ्गसे दीर्घबाहु हुए। उनका नाम दिलीप भी था। दिलीपसे रघु, रघुसे अज और अजसे बड़े प्रतापी महाराज दशरथ हुए। दशरथके भार्यात् परमेश्वर मर्यादापुरुषोत्तम रामचन्द्रजी जयमान हुए ॥ २४-२७॥ उनके अनन्त नाम हैं। जिनका मुनिगण सदा गुणगान करते हैं। विष्णुसे लेकर ६१ (इकसठ) राजे मैंने गिनाये। उन राजाओंके बाद रामचन्द्रजी प्रकट हुए। उनका चरित्र मैं तुमको संक्षेपमें बताता हूँ ॥ २८।२९॥ इक्ष्वाकुकुलमें श्रेष्ठ, अगाध प्रसिद्ध बलवान् क्षत्रिय, सरयू नदीके किनारे बसी हुई अयोध्या नगरीके राजा जम्बूद्वीपके स्वामी, बडभागी श्रीमान् राजा दशरथ विशाल सेना रखकर धर्म तथा न्यायपूर्वक राज्यका शासन करते थे ॥ ३० ॥ ३१ ॥ अयोध्याके पास ही कोसलदेशकी कोसलपुरीमें कोसल नामका एक बड़ा पुण्यात्मा राजा राज्य करता था ॥ ३२। उसकी विवाहके योग्य एक सुन्दरी कौसल्या नामकी पुत्री थी। उसका उसके पिता कोसलने दशरथके साथ विवाह निश्चित किया। बादमें आनन्दके साथ विवाहके दिनका निश्चय करके उन्होंने लग्नके निमित्त राजा दशरथको बुलानेके लिए दूतको भेजा ॥ ३३ ॥ ३४॥ उस समय राजा दशरथ सरयूनदीके बीच नौकापर बैठकर इष्टमित्रों तथा मन्त्रियोंके साथ जलक्रीड़ा कर रहे थे। रात्रिका समय था, चारों ओर सैनिक लगे थे, चारणगण स्तुति कर रहे थे और रत्नके दीपके प्रकाशमें सम्पन्न नाव जगमगा रही थी। वाराङ्गनायें नानाप्रकारके नृत्य गान कर रही थीं ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ उसी समय लङ्काके राजा रावणने ब्रह्मासे पूछा- हे ब्रह्मन् ! मेरा किसके हाथों मरण होगा ? यह आप स्पष्ट कहिये ॥ ३७॥ रावणका वचन सुनकर ब्रह्माने कहा कि दशरथकी स्त्री कौसल्यासे साक्षात् जनार्दन भगवान् राम आदि चार पुत्रोंके रूपमें उत्पन्न होंगे उनमेंसे राम तुमको मारेंगे। कोसलराजने ब्राह्मणोंसे पूछकर राजा दशरथके लग्नका आजसे पाँचवां दिन निश्चित किया है। ब्रह्माका यह वचन सुना तो रावण बहुतसे राक्षसोंको साथ लेकर शीघ्र अयोध्यानगरीको चल पड़ा। वहाँ जा और घोर युद्ध करके उसने नौकापर बैठे राजा दशरथको पराजित किया और पादप्रहारसे नावको तोड़कर सरयूके जलमें डुबो दिया। उस समय और सब तो जलमें डूबकर मर गये। परन्तु राजा दशरथ तथा सुमन्त्र नामका मन्त्री दैवेच्छासे नावके टुकड़ोंपर बैठकर धीरे-धीरे
४ | आनन्दरामायण | [ सर्गः १
ततः समुद्रमध्ये हि जीविनावान्धवरंहसा । गगणः कोशलं गत्वा कृत्वा परममङ्गरम् ॥४४॥ कोसलाख्यं नृपं जित्वा कौसल्यां तां जहार सः । ततः प्रमुदितो लङ्कां ययावाकाशवर्त्मना ॥४५॥ दृष्ट्वा तिमिङ्गिले मत्स्यं नयन लवणार्णवे । चिन्ते विचारयामास देवास्ते मम शत्रवः ॥४६॥ लङ्कायाश्च हरिष्यन्ति कौसल्यां गुप्तविग्रहाः । अतोऽन्तर्मिङ्गिलोपमेयं न्यासभूतां करोम्यहम् ॥४७॥ इति निश्चित्य मतिमि पेटिकायां विधाय ताम् । मत्स्यं समर्प्य हृष्टात्मा ययौ लङ्कां दशाननः ॥४८॥ तिमिङ्गिलोप तन्मत्स्ये धृन्वाऽब्धौ व्यचरन्मुदम् । अग्रे दृष्ट्वा रिपुं स्वायं तेन युद्धार्थमुद्यतः ॥४९॥ द्वीपे तां पेटिकां स्थाप्य सङ्ग्रामं रिपुणाऽकरोत् । एतस्मिन्नन्तरे नौकाखण्डं तं द्वीपमागतम् ॥५०॥ तदा तौ मन्त्रिणृपती द्वावेव समारुरुहतुः । तत्र तां पेटिकां दृष्ट्वा समुद्घाट्यातिविस्मितौ ॥५१॥ तस्यां दृष्ट्वाऽथ कौसल्यां ज्ञात्वा वृत्तं परस्परम् । नया मुहूर्त्तमद्ध्ये द्वीपे दशरथो नृपः ।५२। गान्धर्व्याख्यं विवाहं च चकार मुदिताननः । ततो राजाऽथ कौसल्या सुमन्त्रो मन्त्रिसत्तमः ॥५३॥ प्रप.स्थित्व। पेटिकायां तद्द्वारं पिदधुः पुनः । तिमिङ्गिलो रिपुं जित्वा वक्त्रास्ये तु पेटिकाम् ॥५४॥ लङ्कायां रावणश्चापि समाहूय विधिं पुनः । उवाच प्रहसन्वाक्यं सभायां संस्थितः सुखम् ॥५५॥ विप्र तव मृषा वाक्यं रावणेन मया कृतम् । हरी दशरथस्तोये कौसल्या मोषिता मया ॥५६॥ तद्रावणवचः श्रुत्वा सभायां पद्मसंभवः । दीर्घस्वरेण प्रोवाच ॐपुण्याहमिति स्फुटम् ॥५७। रणं संभ्रमान्प्राह किमिदं व्याहृतं त्वया । विधिः प्रोवाच लग्नं तु जातं दशरथस्य हि ।५८। तदा विधिं मृषा कर्तुं दूतान्संप्रेष्य मन्दगम् । तिर्मिङ्गिलात्समानाय्य पेटिकां मण्डपोऽन्तिके ॥५९॥ समुद्घाट्य दर्शामी तत्र तस्यां दशाननः । तदाऽनिचकिंतः क्रुद्धस्तान् हर्तु खड्गमाददे ॥६०।
नावकहरु सहित गगनदीम का पश्च । ३८-४३ ॥ वहाॅम बहत हुए वे दोनों समुद्रमें जा मिले । उधर शवण भी लङ्का से चलकर साम्मनगर में जा पहुॅचा और भयानक युद्ध करके राजा कोसलको जीत लिया। तदनन्तर कौसल्याका हरण करके वह आनन्दके साथ आकाशमार्गसे लङ्काको चला ॥ ४४॥ ४५ ॥ गगनमण्डर समुद्रम महारूप तिमिङ्गिल मण्डलको देखकर उसने सोचा कि सब देवता मेरे शत्रु हैं। कही रूप बदलकर वे लङ्का से कौसल्याको चरा न ले जायें। इसलिए इसको यहीं इस तिमिङ्गिलको धरोहररूपमें सौंप दूं तो ठीक हो ॥ ४६।४७ ॥ ऐसा सोचकर उसने कौसल्याको पिटारीमें बन्द करके तिमिङ्गिलको समर्पण कर दिया और स्वयं आनन्दके साथ लङ्का चला गया ॥ ४८ ॥ वह मछली उस पिटारी को मुखम रखकर सुखपूर्वक समुद्रम घूमने लगी । सहसा अपने शत्रुको सामने देखकर उसने अनुके साथ युद्ध करनेका निश्चय किया। ४९ ॥ तदनुसार पिटारीको एक टापूपर रखकर वह शत्रुसे युद्ध करने लगी। उसी समय वह नावका टुकडा भी उसी टापूक किनार आ लगा ॥ ५० ॥ तब राजा दशरथ तथा सुमन्त्र उस द्वीपपर उतर पड़े। वहाँ उनकी दृष्टि उस पिटारीपर पड़ी। खोलकर देखनेपर उसमें कौसल्याको देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ । ५१ ॥ बादमें एक दूसरेसे सब बालोंको जान करके प्रसन्न हुए और अच्छे मुहूत्तम वहींपर राजा दशरथने प्रसन्नतापूर्वक कौसल्याके साथ गान्धर्व विवाह कर लिया । पश्चात् राजा, कौसल्या तथा मन्त्रिवोर्यमें श्रेष्ठ मन्त्री सुमन्त्र ये तीनों पुनः पिटारीमें घुस गये और ढकना बन्द कर लिया। मछलीने शत्रुको जीतकर उस सन्दूकको फिर अपने मुखमें रख लिया । ५२-५४ ॥ उधर लङ्कामें रावण सुखपूर्वक सभाके बीचम बैठा और ब्रह्माजीको बुलाकर हँसते हुए बोला- । ५५ ॥ हे ब्रह्मन् ! मैंन आपके वचनको झूठा कर डाला। दशरथको जलमे डुबोकर कौसल्याको छुपा दिया ॥ ५६ ॥ भरी सभामें रावणके इस बचनको सुनकर ब्रह्माजीने जोरसे स्पष्ट शब्दोंमे "ॐ पुण्याहम्" ऐसा कहा ॥ ५७ ॥ यह सुनकर रावणने पूछा कि यह आपने क्या कहा ? ब्रह्माजी बोले- अरे ! राजा दशरथका विवाह हो गया ॥ ५८ ।, रावण ब्रह्माक वचनको असत्य प्रमाणित करनेके लिये दूतों द्वारा मछलीसे पेटी मंगवायी और ज्यों ही खोलकर ब्रह्माजीको दिखलाना चाहा त्यों ही उसमे सुमन्त्रके साथ दशरथ कौसल्याको देखकर
सर्गः १] सारकाण्डम् ५
सर्गः १] सारकाण्डम् ५
तदाऽतिभ्रभमाद्वीक्ष्य रावणं बह्मब्रवीत् । किं करोषि दशास्य त्वं माऽधुना साहसं कुरु ॥ ६१ ॥
कौसल्यैका स्थापिताऽस्यां पेटिकायां त्वया पुरा । त्रयस्त्वत्र तु संजाता मरिष्यन्त्यत्र कोटिशः ॥ ६२ ॥
भविष्यति वधस्तेऽद्य रामोऽद्यैव जनिष्यति । साहसं कुरु माऽद्य त्वं मन्द्यायुषि दशानन ॥ ६३ ॥
यद्भवष्यं तद्भवतु सदग्रे माऽस्तु साम्प्रतम् । एतान्दूतैः प्रेषयाद्य संकेते त्वं सुखी भव ॥ ६४ ॥
न भविष्यति मद्वाणी मृषा जानीहि निश्चयम् । यद्भाव्यं तद्भवत्येव गहना कर्मणो गतिः ॥ ६५ ॥
तद्विधेर्वचनं सत्यं मन्वा भीतो दशाननः । पेटिकां प्रेषयामास साकेतं स्वभटैर्जवात् ॥ ६६ ॥
साकेते पेटिकां त्यक्त्वा भटास्ते रावणं गताः । अयोध्ययाः महानासीत्संभ्रमो दूतदर्शनात् ॥ ६७ ॥
अयोध्यावासिनां राजा कोसलोऽधिपनेरपि । ततः स्वतनयाद्दस्य सद्यश्च कोसलोऽधिपः ॥ ६८ ॥
कृत्वा स्वराज्यं जामात्रे ददौ मान्या हि पुत्रिकाः । तदारभ्य कोसलेन्द्राः प्रोच्यन्ते राघवस्वसाः ॥ ६९ ॥
ततो राजा दशरथः सुमित्रां मगधेशजाम् । विवाहसूक्तपन्नां चकार दयितां प्रियाम् ॥ ७० ॥
कैकेयनृपतेः कन्यां कैकेयीं पद्मलोचनाम् । विवाहेनाकरोद्भार्यां तृतीयां परमादरात् ॥ ७१ ॥
एवाऽन्यानि सप्तशतकलत्राण्यकरोन्नृपः । एवं राजा दशरथः शशास जगतीतलम् ॥ ७२ ॥
दानभोगैर्वरष्ठो बभूव जरठो महान् । नाभवत्संततिस्तस्य धार्मिकस्यावनीपतेः ॥ ७३ ॥
कौसल्या च सुमित्रा च कैकेयी च सितांबुजे । एताः कलीराः सुभगा रूपयौवनसंयुताः ॥ ७४ ॥
तस्मिन् शासति राज्यं तु स्थितेऽयोध्यापुरि प्रिय । देवानां दानवानां च राज्यस्यै विग्रहो महान् ॥ ७५ ॥
तत्र वायववच्छीघ्रा बत्रायोध्यापतिर्महान् । जयस्तत्र न संदेहोमां श्रुत्वा पवनां दशान् ॥ ७६ ॥
प्रार्थयामस्य नृपात गत्वा युद्धाय सादरम् । ततो धन्वा दशरथश्चकार कटनं पदम् ॥ ७७ ॥
पहले तो बहुत चकित हुआ। फिर कट होकर उस मस्तक लिए उसने तलवार निकाल ली ॥ ५९ । ६० ॥
तब ब्रह्माजी रावणको रोककर कहा अरे दशवदन यह क्या करता है? इस समय ऐसा साहस मत कर ॥ ६१ ॥ देख तून केवल कौसल्याको ही इसम रक्खा था। किन्तु ये एकत्र एक तान हो गये। वैसे ही इन मानोने से तू ही हो जायेंग। ६२ । राम का आज ही जन्म हो गया और तू मारा जायगा। आयु क्षय हून क्या व्यर्थ मरना चाहता है? इसलिये तू ऐसा साहस मत कर ॥ ६३ ॥ जो होना होगा सो आज ही सही? अभी तू कुछ मत कर और इन तीनोंको दूत द्वारा इनके स्थानपर भिजवाकर सुखी हो ॥ ६४ ॥ मम बचन कभी झूठ न होंगे। इस बातका निश्चय रख। कर्मकी गति बड़ी गहन होती है। कर्मके अनुसार जो होनहार होता है, सो होकर ही रहता है ॥ ६५ ॥ इस घटनाको घटित हुवा देखकर रावण कुछ डर गया और ब्रह्माजीकी बातको सच्ची मानकर वह पिटारी अपने दूतों द्वारा शीघ्र अयोध्या भेज दी ॥ ६६ ॥ राजा दशरथ आदिको सकुशल आया देखकर सब प्रसन्न हुये। तथा कासलदेशके राजा आदिको बड़ा प्रसन्नता हुई और आश्चर्य भी हुआ। बादम कोसलोऽधिपतिने बड़े समारोहके साथ विधिसे विवाह करके अपनी कमनीय कन्या कौसल्या तथा अपना संपूर्ण राज्य अपने दामाद राजा दशरथको दहेजरूप दे दिया तबसे कोसलदेशके राज भी सूर्यवंशी कहलाने लग ॥ ६७-६९ ॥ तदनन्तर राजा दशरथने मगधदेशके राजाकी कन्या सुमित्राको व्याहकर अपनी दूसरा प्राणप्रिया स्त्री बनाया, ७० ॥ ककर देशके राजाकी कमलनयना कन्या कैकेयीको व्याहकर उन्हेंन बड़े आदरपूर्वक तीमरा पत्नी बनायी ॥ ७१ ॥ इन तीनोंके अतिरिक्त अन्य भी उनकी सात सौ स्त्रियें थीं। इस प्रकार आनन्दपूर्वक राजा दशरथ दान-मान-भाग-ऐश्वर्य आदिक द्वारा पृथ्वीका शासन करते हुए वृद्ध हो गये। परन्तु उन परम धार्मिक राजा दशरथके कोई सन्तान नहीं हुई ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ हे प्रिय पार्वती ! पुत्रके बिना राजाको कमलोदर तुल्य मनक्षी कौसल्या, कैकेयी तथा सुमित्रा आदि स्त्रिय, राज्य और विशाल अयोध्यापुरी सूना तथा व्यर्थ दीखने लगा। उसी समय देवताओं और दानवोंमें राज्य- के लिए बड़ा भारी युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ७४ ॥ ७५ ॥ उस युद्धमे यह आकाशवाणी हुई कि 'जिसके कान अयोध्यापति राजा दशरथ होंगे, उसी पक्षकी विजय होगी। उस वाणीको सुनकर पवनदेवने शीघ्र जाकर
६ आनन्दरामायणे [ सर्गः २
एतस्मिन्नन्तरे तत्र संग्रामेऽतिभयानहे। भिन्नाक्षं स्वरथं राजा नाविदाद्दैष्टसंभ्रमात् ॥७८॥ गङ्गाऽन्तिके स्थितागुप्तं कैकेयी रणकौतुकम् । पश्यन्ती स्वरथं भिन्नं ददर्श समरांगणे ।७९॥ अक्षत्वन्मा निजं हस्तं चकार जयहेतवे । तया तु पूर्वं बाल्यन्त्वाम्यस्यास्यं कस्याचेन्मुनेः ॥८०॥ कृष्णवर्णं कृतं तेन शप्ता नेऽप्यपवादतः। मुखमग्रे निर्गमिष्यन्ति नैव लोकाः कदाचन ॥८१॥ ततस्तं गन्तुमुद्युक्तं कैकेयी शुभहस्ततः। दंडादिकं ददौ तस्य मुनेर्हस्तोऽतिमक्तिकः ॥८२॥ तस्मै ददौ वरं विप्रस्तव वामकरा वरात्। भविता वज्रकठिन शस्त्रापि नाश न नैष्यति ॥८३॥ कैकेयी तं वरं स्मृत्वा स्वं चक्रागह्वरःकरम् । अथ जित्वा रणे दैत्यान् दृष्ट्वा तत्कर्म पार्थिवः ८४॥ ददौ वरो द्वौ तस्यै स न्यासरूपौ कृतो तया । यदाऽहं प्रार्थयिष्यामि तदा त्वं देहि तौ मम ॥८५॥ तथेत्युक्त्वा नृपः पत्नीं ययौ स्वनगरीं प्रति । एकदा स निशायां तु मृगयायां महावने ।८६। चकार वाणिवृधं चावधीद्वनचरान बहून् । एतस्मिन्नन्तरं तत्र वने वाणसमीपतः ॥८७॥ कांडरूढौ स्वपितरौ स्वस्कंधे श्रवणो वहन् । काशीं नेतुं ययौ वैश्यो धर्मबाधामपाम्निति ॥८८॥ नीरं पातु शिद्यो देहि चावयोश्चेति य थितः । तय्यो कांडेके न्यस्य तटाके जनसंनिधौ ॥८९॥ गत्वा जले स्वघ कुम्भं न्युन्जंतम्थी जले क्षणम् । कुम्भस्य न्युन्जतः शब्दो बमूत् करिणो यथा । ९०।। वनद्विपो न हंतव्यश्चेति जानन्नपि नृपः । वैश्यं राजा द्विपं मन्वा विव्याध म पत्रत्रिणा । ९१॥ पपात श्रवणस्तोये हा केन हं प्रनाडितः । मुवनश्चेति तद्वाक्यं श्रुत्वाऽभूद्विह्वलो नृपः । ९२। पन्वा जलाद्वहर्वगात्रं कृन्वाऽऽक्रूष्णं तांदृश । मयं दूतं विशुन्यं तं चकार भयविह्वलः । ९३॥
राजा दशरथ युद्धम संम्मानित उनका स द र प्रार्थना का । तदनुसार राजा दशरथ वहाँ जाकर दानवेश घोर युद्ध करम ०।। ७६ ।। ७७ ।। उस भयानक संगामम समय राजक रथका धूरा टूट गया, किन्तु दैववश राजाका पता नही लगा । उसार लाफ पास चम्न मुन्तर भी चत्रा गनी कैकयी संग्रामका कौतुक दख रही थी। उसने सहसा रणम अपन रथका धुरा टूटत दख लिया ॥ ७९ ।। त काल उसने विजयलाभक लिए अपने बायें हाथका धुरकी जगह लगा दिया बचपनम कैकेयीन किसी सोने हुए मुनिका मुँह स्याहीस काला कर दिया था। तब मुनिन उसे शाप द दिया कि जा, तम्र मुँह भा अपयशाके कारण ऐसा काला होगा कि कोई देखना नही चाहेगा, ८० ।। ८१ ।। जब मुनि वहाँम चश्न लगे, तब कंकेय न भक्तिपूर्वक दाय हाथसे उनका दण्ड कमण्डल उन्ह दे दिया ८२ । इस सेवाम प्रगन्न होकर मुनिने उसे वरदान दिया कि जा तेरा बायाँ हाथ समय पडनपर वज्र जैसा कठोर हो जायगा और किसी तरह घायलन होगा। ८३॥ कंकेयीने उस वरका स्मरण करक ही अपने हाथको धुरक सदृश बनाबर रथमे लगा दिया था। रणम दैत्याको जीतनेके बाद राजा दशरथन कैकेयीक इस साहस भरे कार्यको देखकर प्रसन्नतापूर्वक उससे दा वर मांगनेके लिए कहा। उसने भी उन दोनो वरोको राजाके पास ही धरोहररूपमे रख दिया और कहा कि जब मै मांगू तब आप ये दो वर मुझे दे दीजियेगा । ८४ ।। ८५ ।। 'इव अच्छा कहकर राजा अपनी स्त्रीक साथ अयोध्या लोट आये। एक दिन रात्रिक समय राजा दशरथ शिकार बग्नके लिये सरयूके किनारे गहन वनम जा पहुंचे। वहाँ उन्होने बाणोंकी वर्षा करके नदीका जलप्रवाह गक दिया और बहुतसे वनपशुओको मारा। उसी समय श्रवण अपने वृद्ध नया अन्ध माता पिताका कविरम बिठाकर कांधपर उठाये हुए उस वन्य भागसे काशी ले जा रहा था । तभी गर्मासे पीडित होकर वृद्ध माता पिताने अपने पुत्रसे जल पिलानेको कहा। उनकी आज्ञा पते ही श्रवण काँवरको जलके किनारे रख तथा घडेको टेढ़ा करके जल भरने लगा तो उस घड़से हाथीके शब्द जैसा शब्द निकला ॥ ८६-६० । बनके हाथीको नहीं मारना चाहिये' इस बातको जानते हुए भी राजा दशरथने उस वैश्य श्रवणको हाथीके भ्रमसे शब्दवेधी बाण मारकर बींध दिया ।। ९१ ।। 'हाय मुझ निरपराधको किसने मारा' ऐसा चिल्लाकर श्रवण इकामसे बालूमें गिर पड़ा । मनुष्यकी बोली सुनकर राजा दशरथ घबड़ा उठे और दौड़कर वहाँ गये। उसको बा-
सर्गः १ ] बालकाण्डम् ७
तातौचापि तपुत्रवचं श्रुत्वा रुरुदतुः । कारयित्वा नृपतिना चितिं पुत्रसमन्वितौ ॥ ९४ ॥
दशस्थाय तौ शापं ददतुः सुमहद्दुःखिनौ । पुत्रशोकादावयोर्हि यथा मृत्युस्तवास्त्विति ॥ ९५ ॥
ययौ नृपोऽपि नगरीं गुरुं वृत्तं न्यवेदयत् । वसिष्ठो नृपतेर्दोषशान्त्यर्थं तृष्णायाध्वरम् ॥ ९६ ॥
नृपेण कारयामास साङ्केते सम्यगुत्कृष्टे । रोमपाद इति ख्यातस्तस्मै दशरथः सखा ॥ ९७ ॥
शान्तां स्वकन्यां प्रायच्छत्सराष्ट्रेऽभूत्प्रवर्षकम् । विभाण्डकाश्रमं वाराङ्गनाः संप्रैष्य तत्सुतम् ॥ ९८ ॥
रोमपादो मोहयित्वा ऋष्यशृङ्गं समानयत् । वारास्त्रयो वने गत्वा यमानिन्युःऋषेः सुतम् ॥ ९९ ॥
नाट्यसंगीतवादित्रैर्विभ्रमालिङ्गनाद्यर्हणैः । तत्प्रतापात्प्रभूवृष्टिः पुत्रोऽपि नृपतेरभूत् ॥ १०० ॥
तन्तुष्टो रोमपादस्तस्मै शान्तां ददौ सुताम् । दशरथोऽपि स्वपुरीमानयामास तं मुनिम् ॥ १०१ ॥
स तु शृङ्गोऽपत्यस्य निरूप्येष्टिं मखन्वतः । प्रत्यक्षं हि चकाराग्निं यज्ञकुण्डान्यपायसम् ॥ १०२ ॥
आविर्भून्त्वा स्वयं वह्निर्ददौ राज्ञे सुपायसम् । राज्ञा विभक्तं कौसल्यैस्तत्कैकेय्या दृष्टमात्रतः ॥ १०३ ॥
अहरत्पायसं हृष्टाद्गृध्री शापविमोचकम् । सुप्रतीलाऽप्सरोगोलदा नृत्यसंगाच्छप्यभुवा । १०४ ॥
शप्ता जाता तु सा गृध्री तया वेधाः सुनोषितः । तस्मै तुष्टो विधिः प्राह कैकेयीपायसं यदा ॥ १०५ ॥
प्रक्षिपस्यर्जनगिरौ तदा ते भविता मतिः । अप्सरा त्वं पूर्ववच्च भविष्यसि न संशयः ॥ १०६ ॥
तस्मात्सा पायसं नीत्वाऽक्षिपदर्जनपर्वते निज स्वरूपं सा लब्ध्वा जगाम सुरमदिरम् ॥ १०७ ॥
ततस्ताभ्यां तु कैकेय्यै दत्तं किंचित्तु पायसम् । अथ ता भक्षयामासुरगर्भसंस्तदाऽभवन् ॥ १०८ ॥
से बाहर निकालकर उसके मुंहसे सब वृत्तान्त सुना तब अत्यन्त कपित हुए राजाने उस बाणवालकके शरीरसे बाण निकाला ॥ ९२ । ९३ ॥ राजाके मुखसे पुत्रप्राणकी बात सुनकर वे दोनों अन्ध अतिशय विलाप करने लगे और राजासे चिता बनवाकर पुत्रके साथ जलकर परलोक सिधार गये । मरते समय पुत्रवियोगसे दुःखित वे दोनों अन्धी-अन्ध राजा दशरथको यह शाप दे गये कि जैसे हम दोनों पुत्रशोकसे मर रहे हैं, वैसे ही तुम भी पुत्रशोकसे ही मरोगे । ९४ ॥ ९५ ॥ राजान नगरमें आकर यह सब हाल गुरु-वसिष्ठजीको सुनाया । कुछ दिनों बाद वसिष्ठजीने राजाकी दोषनिवृत्ति तथा पुत्रप्राप्तिके लिए उनसे साङ्केत दिलाकर ऋष्य श्रृङ्गको बुलवाकर अश्वमेध यज्ञ करवाया । राजा दशरथके मित्र अङ्गदेशक राजा रोमपादने अपनी शान्ता नामकी कन्या ऋष्यशृङ्गको दे दी थी । क्योंकि एक बार राजा रोमपादके देशमें वर्षा न होने तथा उन्हें कोई पुत्र न होनेके कारण मन्त्रियोंके कथनानुसार ऋष्यशृङ्गरूप पिता विभाण्डकके आश्रमसे वेश्याओंके द्वारा मोहित करवाकर उन्हें अपने देशमें बुलवाया । वेश्याये बनमें गयीं और नाचकर, गाना गाकर, बाजे बजाकर हावभाव, आलिङ्गन तथा पूजा आदिके द्वारा मोहित करके ऋष्यशृङ्गको ले आयीं । उनके यज्ञ करानेसे राज्यमे वृष्टि हुई और राजाको पुत्र भी प्राप्त हुआ ॥ ९६-१०० ॥ तब प्रसन्न होकर राजा रोमपादने ऋष्यशृङ्गको अपनी शान्ता नामकी कन्या दान करके दे दी । अतएव दशरथ भी उन ऋष्यशृङ्गको अपने नगरमें ले आये ॥ १०१ ॥ उन मुनिने सन्तानरहित राजा दशरथसे इष्टि (यज्ञ) करवाकर खीर लिये हुए अग्निदेवको यज्ञकुण्डसे प्रत्यक्ष प्रकट किया । १०२ ॥ इस प्रकार अग्निने स्वयं प्रकट होकर राजाको सुन्दर पुत्र देनेवाला पायस (खीर) दिया । राज ने वह खीर लेकर तीनों स्त्रियोंमें बाँट दी । तभी कैकेयीके भागको एक गृध्री यह सोचकर कि यदि इसका मै ले जाऊँगी तो मेरा शाप छूट जायगा । इस स्वार्थमे खीर छीन ले गयी । कथान्तर । एक समय सुपर्वा नामको अप्सराओमे उत्तम अप्सराको ऋष्यशृङ्गके अपराधसे ब्रह्माजीने गृध्री होनेका शाप दे दिया । अब फिर उसने स्तुतिके द्वारा ब्रह्माको प्रसन्न किया । तब ब्रह्माजीने कहा कि जब तुम कैकेयीके पासका खीर छीनकर मर्जनपर्वतपर फेकोगी । तब तुम्हारी धूत सुधृति हो जायगी और पूर्ववत् तुम अप्सरा हो जाओगी ॥ १०३-१०६ ॥ इसा कारण उस गृध्रीने खीर लेकर अंजनिगिरिपर डाल दी जिससे वह अपने अप्सरा-रूपको प्राप्त होकर पुनः स्वर्ग चली गयी ॥ १०७ ॥ बादमें कौसल्या तथा सुमित्राने अपने-अपने भागमेंसे
८ आनन्दरामायणे [ सर्गः २
आशंस्तास्तां दोहदास्ते पुत्राणां भाविंकर्मभिः । पुत्राणां भाविकर्माणि विदुस्ते दोहदैर्र्जनाः ॥१०९॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥ १ ।
द्वितीयः सर्गः
( राम लक्ष्मण भरत तथा शत्रुघ्नका जन्म )
श्रीशिव उवाच
एतस्मिन्नंतरे भूमिर्दशस्यादिपपीडिता । ब्रह्मण प्रार्थयामास विष्णुं सोऽपि तदाऽब्रवीत् ॥ १ ॥
भूम्यामवतरिष्यामि भवंतु कपयः सुराः । गंधर्वी दुंदुभीनाम्री भूम्याः कार्यार्थसिद्धये ॥ २ ॥
मंथराऽग्रे भवत्वद्वा राज्यविघ्नार्थसिद्धये पश्चात्पुनर्द्वापराते कुब्जात्वं कसमंदिरे ॥ ३ ॥
अथ विष्णुनक्षत्रमासि नवम्यां मध्यगे रवौ । सूतिकागृहमध्येऽथ कौसल्यायाः पुरोऽभवत् ।
चतुर्भुजः पीतवासा मेघश्यामो महाद्युतिः ॥ ४ ॥
माऽपि दृष्ट्वा बालभावं प्रार्थयामास तं हरिम् ततो जातस्तदा बालः क्षणाद्धेमविभूषितः ॥ ५ ॥
हेमवर्णः कंजनेत्रश्चन्द्रास्यस्तपनप्रभः अतः सुमित्रापुरतः शेषोऽभूद्बालरूपधृक् ॥ ६ ॥
आविर्भूतौ द्वौ यमलौ कैकेय्याः शंखचक्रके एवं ते जनिता बालाश्चत्वारः समये शुभे ॥ ७ ॥
देवदुंदुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः शुभाऽपतत् जातकर्मोदिसंस्कारान् गुरुणा नृपतिस्तदा ॥ ८ ॥
कारयामास विधिवन्नृत्यैर्वारयोषितः । ज्येष्ठं रामं तु कौसल्यातनयं प्राह वै गुरुः ॥ ९ ॥
सुमित्राननयं नाम्ना लक्ष्मणं गुरुरब्रवीत् । ततो भरतशत्रुघ्ननामनी प्राह वै गुरु ॥१०॥
थोड़ा-थोड़ा पायस कैकेयीको दे दिया इस प्रकार सबने पायस खाया और सबने गर्भ धारण किया ॥ १०८ ॥
अच्छी पुत्रोत्पत्तिके शुभचिह्नोंको देख तथा सुनकर होनहार पुत्राक द्वारा किये जानेवाले अद्भुत कार्योंको लोग पहले ही समझ गये ॥ १०९ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे भाषाटीकायां प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
श्रीशिवजी बोले-हे प्रिये ! इसी बीच रावण आदि दुष्ट राक्षसोंसे पीडित होकर पृथ्वी माता ब्रह्माके साथ विष्णुभगवान्के पास गयीं और उसने अपनी तथा धर्मकी रक्षाके लिये प्रार्थना की । तब विष्णुभगवान्ने कहा कि 'मैं तुम्हारे लिये भूमिपर अवतार लूंगा' । ऐसा कहकर उन्होंने देवताओंसे कहा हे देवताओ ! तुम लोग मेरी सहायताके लिये वानररूपसे पृथ्वीपर जन्म लो । दुन्दुभी गंधर्वी पृथ्वीकी रक्षाके लिये पहिलेसे जाकर मन्थरा रूपसे जन्म ले और रामके राज्याभिषेकमें विघ्न डाले । द्वापरके अन्तमे वही जाकर कंसके यहाँ कुब्जा बनेगी ॥ १-३ ॥ कुछ काल बाद साक्षात् विष्णुभगवान् चैत महीनेके कृष्णपक्षकी नवमी तिथिको मध्य सूर्यके समय प्रसूतिकागृहमे कौसल्याके सामने चार भुजाधारी पीताम्बर पहिने हुए वर्षाऋतुकालीन मेघके समान श्यामशरीर तथा तेजस्वी रूपमे प्रगटे ॥ ४ । कौसल्याने वह रूप देखकर भगवान्से बाल्यभाव स्वीकार करनेकी प्रार्थना की । तब भगवान् क्षण भरमे स्वर्णाभरणोंसे भूषित, सुवर्णके सदृश कान्तिसम्पन्न, कमलके समान नेत्र तथा चन्द्रतुल्य मुख एवं सूर्यके समान तेजस्वी बालक बन गये । बादमे सुमित्राके गर्भसे शेषावतार लक्ष्मणजी बालभावसे प्रकट हुए। फिर कैकेयीके गर्भसे विष्णुके शंख-चक्र अवतार लेकर एक साथ भरत-शत्रुघ्न पैदा हुए । इस प्रकार ये चारों बालक शुभ समय, अच्छे लग्न और शुभ नक्षत्रमें उत्पन्न हुए ॥ ५-७ ॥ देवताओने प्रसन्न होकर नगाड़े बजाये और पुष्पवृष्टि की । राजाने गुरु वसिष्ठसे बालकोंका जातकर्म (संतानके उत्पन्न होनेपर किया जानेवाला कर्म) आदि संस्कार विधिपूर्वक करवाया । उस उत्सवपर वेश्याओ द्वारा अनेक प्रकारका नृत्य भी करवाया गया । वसिष्ठज ने कौसल्याके सबसे बड़े पुत्रका नाम राम रक्खा । सुमित्राके पुत्रका नाम लक्ष्मण और कैकेयीके दोनों पुत्रोंके नाम भरत तथा शत्रुघ्न
॥ सर्गः १ ॥
बालकाण्डम्
रमणाद्राम एवासौ लक्षणैर्लक्ष्मणोऽभवत् । भरणाद्भरतो ज्ञेयः शत्रुघ्नः शत्रुनाशनात् ॥ ११॥
अथ ववृधिरे सर्वे लक्ष्मणो राघवस्य हि । शत्रुघ्नो भरतस्यापि चकार क्रीडनादिकम् ॥ १२॥
रत्नकङ्कणमञ्जीरनूपुरैस्ते विभूषिताः । केयूरग्रैवेयाङ्गदकुण्डलैर्विशोभिताः ॥ १३॥
शृङ्खलाबद्धरुक्मादिनिर्मितेषु वरेषु च । दोलकेषु च ते सर्वे दोलिता रेजिरे सुखम् ॥ १४॥
भाले स्वर्णमयाश्चन्द्रपाषाणप्रतिमास्त्विति च । मुक्ताफलप्रलम्बीनि शोभयन्ति स्म बालकान् ॥ १५॥
कण्ठे रत्नमणिव्रातमध्यदीपनखाञ्चिताः । कर्णयोः स्वर्णमयभ्राजद्रत्नार्जुनसुतारकाः ॥ १६॥
मिश्राननमणिभ्राजत्कटिसूत्रांगदेर्युताः । स्स्मितवक्त्राल्पदशना इन्द्रनीलमणिप्रभाः ॥ १७॥
अङ्गणे रिंगमाणाश्च मञ्जीरैः मञ्जुनाः शुभाः । ते तानं रञ्जयामासुर्मातृंश्चापि विशेषतः ॥ १८॥
कौशल्या नृपतिश्चापि नानावस्त्रैः सुभूषणैः । शोभय मासतुर्बालान्विगाह्यधनसादिभिः ॥ १९॥
रामः स्वपितरं दृष्ट्वा भोजनस्थं जगत्पतिः । दुद्राव कवलं पात्राद्गृहीत्वा स पुनर्बहिः ॥ २०॥
कौशल्या पालकं भर्तु दुद्राव सूनुतोदिता । न तस्याः करमभ्यागाद्योगिनामप्यगोचरः ॥ २१॥
परिवृत्य स्वयं रामः करेण मुदलेन च । कौशल्यायै नृपायैवापि कवलानकरेन्मुदा ॥ २२॥
एवं नानाकौतुकैश्च रात्रपाषाश्च राघवः । नाना शिशुक्रोडनकैश्चाहतंर्मुग्धभाषिणैः । २३॥
बालकृत्रिमपुत्रैश्च गमनैर्मुग्धगुम्फनैः । पितरौ निजचित्तार्थैर्वाह नारोहणादिभिः । २४॥
ततस्ते बालकाः सर्वे वस्त्रालंकारभूषिताः । समागत्य पितरं नत्वा तस्थुः सिहासनोपरि ॥ २५॥
अथ पित्रोपनातान्ते गुरुणा मुनिभिर्युता । गर्भाधानमरे षष्ठे जन्मतः पञ्चमे यमे ॥ २६॥
ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्ये विप्रस्य पञ्चमे । राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्यार्थार्थिनोऽष्टमे ॥ २७॥
श्लोक ११ - १७ ॥ मनोहर तथा आनन्ददायक होनेसे राम, शुभ लक्षणोंसे युक्त होनेसे लक्ष्मण, प्रजाका भरण-पोषण करनेके कारण इनका नाम भरत और शत्रुओंका नाश करनेके कारण उनका शत्रुघ्न नाम रक्खा ॥ ११ ॥ लक्ष्मण रामके साथ और शत्रुघ्न भरतके साथ सदा दूर वन्द कर ॥ १२ ॥ सुवर्णके कड़े तथा नूपुरोंसे भूषित केयूर, ग्रैवेय तथा कुण्डल भूषणोंसे माताके सिखलाएका वस्त्र पहन हुए वे बालक सुवर्ण घटित, रत्नजटित तथा सोनेके सांकलों द्वारा युक्त किए सुन्दर पलनोंमें झूलते हुए बहुत ही सुन्दर लगते थे ॥ १३ ॥ १४ ॥ उनके ललाटोंमें सुवर्णनिर्मित चन्द्रकलाके समान आकारवाले एवं जिनके अग्रभाग पर बड़े मोती लटक रहे थे, ऐसे सुन्दर आभूषणोंने उन बालकोंकी शोभा और भी बढ़ा दी ही ईश्वरी थी। उनके कण्ठमें विविध मणियोंके मध्यमें सुशोभित हो रहे थे। कानोंमें कनकके बने हुए ग्लर्जिन्त कुण्डल लटक रहे थे। सिरपर घुंघराले बाल बहुत अच्छे लगते थे। पाँवोंमें मणिमण्डित झांझर झनकता रहा। सुन्दर बाजूबन्द और कमरमें करधनी खनखना रही थी । चन्द्रमाके सदृश शुभ हास्य भरे सुन्दर किरणोंके समान छोटे-छोटे दाँत चमकना रहे थे। इन्द्रनीलमणिके समान श्याम कान्तिवाले, अङ्गणमें घुटनोंके बल रेंगते हुए, मञ्जीरोंसे मञ्जुल और बोलनमात्रसे मन मोह लेनेवाले वे कुमार अपने माता-पिताओंके मनोंको मुग्ध करने लगे ॥ १५ - १८ ॥ कौशल्या और राजा दशरथ भी अनेक प्रकारके वस्त्र तथा गहना आदि अलङ्कारोंसे अपने बालकोंको भूषित करने लगे ॥ १९ ॥ राम अपने पिताको भोजन करते देखते तो आकर उसमेंसे एक ग्रास हाथमें लेकर बाहर भाग जाते । राजाके कहनेपर कौशल्या रामको पकड़नेके लिए जब दौड़तीं तो योगियोंको भी अगम्य राम उनके हाथ नहीं आते थे। बादमें स्वयं ही राम आकर पीछेसे आनन्दपूर्वक अपने कोमल हाथोंसे माता-पिताके मुखमें वह कौर रख देते थे ॥ २०-२२ ॥ ऐसे अनेक कौतुकयुक्त बालकीड़ा, वत्सोत्क्षा प्रमुत्सहाहा भाषण, बालकोंके कृत्रिम पुत्र, नाना प्रकारकी चालें मुखगुम्फन, और तरह-तरहकी बनावटी सवारियोंपर सवार होकर राम आदि चारों बालक माता-पिताके मनको लुभाने तथा आनन्दित करने लगे ॥ २३ ॥ २४ ॥ कालान्तरमें सब बालक वस्त्र-आभूषण आदिसे भूषित हो पिताको प्रणाम करके उनके सिंहासनपर बैठ गये। तब राजाने ऋषियों द्वारा सानन्द उनका यज्ञोपवीत संस्कार करवाया।
| १० | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ३ |
|---|
विद्वद्भिर्योपनयनेऽयं शास्त्रेषु निर्णयः। गुरोस्त्वभ्यनुज्ञाते वेदान् सांगांश्चतुर्विधान् ॥२८॥
चक्रुर्मुखोद्गतानांच बालाः शास्त्रादिकान्यपि। ब्रह्मचर्यसमाप्तौ ते तीर्थानि जग्मुरादरात् ॥२९॥
सेनया मंत्रिसहिता वसिष्ठेन समन्विताः। षण्मासैः पुनरागत्य साकेतं विविशुर्मुदा ॥३०॥
एवं ते मतिमन्तश्च प्रिया राज्ञो वशे स्थिताः। पितरं रंजयन्त्यासुः पौरान् जानपदानपि ॥३१॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे रामजन्मनाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
तृतीयः सर्गः
( ताड़कावध-अहल्याोद्धार तथा सीतास्वयंवर )
श्रीशिव उवाच
एतस्मिन्नंतरेऽयोध्यां विश्वामित्रो ययौ मुनिः । यज्ञसंरक्षणार्थाय राजानं मुनिरब्रवीत् ॥ १ ॥
रामं च लक्ष्मणं चापि मह्यं देहि कियद्दिनम् । गुरुनामंत्र्य राजाऽपि प्रेषयामास तौ तदा ॥ २ ॥
जग्मतुर्यज्ञरक्षार्थं गाधिजेन रथस्थितौ । ततः प्रहृष्टो गाधेयः स्थित्वा कामाश्रमे पथि ॥ ३ ॥
प्रभाते स्नापयोः स्नातः प्रादाद्विद्यास्तयोर्मुदा । माहेश्वरीं च मद्दिद्यां धनुर्विद्यामनुत्तमाम् ॥ ४ ॥
शास्त्रीमस्त्रीं लौकिकीं च रथविद्यां गजोद्भवाम्। अश्वविद्यां गदाविद्यां मंत्राद्वानविसर्जने ॥ ५ ॥
क्षुत्तृट्श्रमविलोपिभ्यां बलामतिमलामपि । सर्वविद्यास्त्ववाप्याथ हन्तुमौ तौ रामलक्ष्मणौ ॥ ६ ॥
वनौकसां हितार्थाय जघ्नतुस्तत्र राक्षमान् । पथि पांथजनध्वंसकारिणीं नाम ताटिकाम् ॥ ७ ॥
राक्षसीमेकबाणेन जघान रघुनन्दनः । अप्सरा सा मुनि पूर्वं क्षोभयामास कानने ॥ ८ ॥
शास्त्रोंका भी यही सिद्धान्त है कि ब्रह्मवर्चस् (ब्रह्मतेज की इच्छावाले ब्राह्मणकुमारका यज्ञोपवीत गर्भसे छठे अथवा जन्मसे पांचवे वर्ष होना चाहिये। बल चाहनेवाले क्षत्रियका छठें और धन चाहनेवाले वैश्य-कुमारका यज्ञोपवीत आठवे वर्ष अवश्य हो जाना चाहिये ॥ २५-२७। तदनन्तर अच्छे मुहूर्त्तमें गुरुके मुखसे राम-लक्ष्मणने साङ्ग (शिक्षा कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष सहित) चारों वेद, छः शास्त्र (न्याय-वेदान्त आदि) और चौंसठ कला गाना-बजाना आदि) सीख-पढ़कर हृदयंगम कर लिया। ब्रह्मचर्यकी समाप्तिके बाद राम आदि चारो भ्राता सेनाको, मन्त्रियोंको तथा गुरु वसिष्ठको साथ लेकर सहर्ष तीर्थयात्रा करने गये। छः महीनेमें वहाँसे लौटे आये और आनन्दपूर्वक अयोध्यामे रहने लगे । २८-३०॥ इस प्रकार बुद्धिमान्, प्रजा रंजक परम भक्त, परम प्रिय तथा उनकी आज्ञापर चलनेवाले वे चारो बालक पिताको, नगरके लोगोंको तथा उस देशकी प्रजाको अपने सद्व्यवहारके द्वारा मोहित करने लगे ॥ ३१ ॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे पं० रामतेजपाण्डेयकृतभाषा-टीकायां रामजन्मनाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
श्रीशिवजी बोले—हे पार्वती ! तदनन्तर मुनि विश्वामित्र अयोध्या आये और राजा दशरथसे कहा कि यज्ञकी रक्षा करनेके लिए राम तथा लक्ष्मणको आप मुझे दे दीजिये । गुरु वसिष्ठके समझानेपर राजाने न चाहते हुए भी दोनों बालकोंको उनके साथ कर दिया ॥ १ ॥ २ ॥ तदनन्तर गाधिपुत्र विश्वामित्रके साथ रथपर बैठकर उनके यज्ञकी रक्षा करनेके लिए राम-लक्ष्मण चल दिये । रास्तेमें कामाक्षममें सबेरे स्नान करके प्रसन्न विश्वामित्रजीने स्नान किये हुए राम-लक्ष्मणको विविध विद्यायें सिखायीं। महेश्वर (शिवजीसे प्राप्त) माहेश्वरी धनुर्विद्या, शस्त्राविद्या, अस्त्रविद्या, लौकिकी विद्या रथविद्या, गजविद्या, अश्वविद्या, गदा चलानेकी विद्या, मन्त्रके द्वारा अस्त्रादिका आवाहन और विसर्जन करनेकी विद्या, भूख-प्यासको मिटानेवाली बला और अतिबला नामकी दो विद्याएं तथा अन्यान्य सब विद्याओंको प्राप्त करके राम-लक्ष्मण वनवासी ऋषि-मुनियोंके सुखके लिये राक्षसोंको मारने लगे । रास्तेमे पथिकोंको मारकर खा जानेवाली ताड़का नामकी राक्षसीको रघुनन्दन रामचन्द्रने एक ही बाणसे मार डाला । सुन्दकी स्त्री और सुकेतु यक्षकी
सर्गः ३] सारकाण्डम् २१
गान्धर्वी तस्य शापेन बभूव मुंडकामिनी । मारीचश्च सुबाहुश्च सुदातरख्याः सुतावुभौ ॥ ९ ॥
रामबाणार्तिसन्तप्ताः कीर्तिता मुनिना पुरा । मा प्राप्य दिव्यदेहन्वं नन्वा गर्म दिवं गता ॥ १० ॥
विश्वामित्राश्रमं रामो गत्वा तद्यज्ञघातकान् । राक्षसान्निशितैर्बाणैर्जघान रघुनन्दनः ॥ ११ ॥
प्रारम्भं रणयज्ञस्य चकार रघुनन्दनः । हत्वा सहस्रशः श्रीमान् राक्षसान् निशितैः शरैः ॥ १२ ॥
क्षिप्त्वा बाणेन मारीचं शतयोजनसागरे । हत्वा सुबाहुं चैकेन बाणेन रघूत्तमः ॥ १३ ॥
यः कृत्वा गाधिवंशस्य समाप्तिं रघुनन्दनः । नाकरोद्रणयज्ञस्य समाप्तिं स्वकृतस्य च ॥ १४ ॥
कालानलसमं तं दृष्ट्वा तन्मुनेर्हितवे । श्रुत्वा जनकगेहे वै जनकन्यायाः स्वयंवरम् ॥ १५ ॥
रामलक्ष्मणसंयुक्तो मुनिस्ते नगरं ययौ । गमनावसरे मार्गे भर्तृशप्तां शिलां मुनिः ॥ १६ ॥
मुनिरूपमिहेन्द्रेण भुक्तां रहसि शोभनाम् । गौतमस्यांगनां नाम ह्यहल्यां चारुदर्शयोः ॥ १७ ॥
ब्रह्मणा निर्मिताऽहल्या द्विमुख्यो गोः परिक्रमात् । दत्ता पुरा गौतमाय विसृज्येंद्रादिकान्सुरान् ॥ १८ ॥
तन्मस्मन् मघवा वैरी ना सुकन्या मुनिशापतः । सहस्रा भगवान् जातः सहस्रलोचनस्ततः ॥ १९ ॥
श्रीरामचन्द्रो निजपादपद्मस्पर्शेन तां गौतमधर्मपत्नीम् ।
निष्कल्मषामद्भुतरूपयुक्तां चकार देवः करुणाममुद्रः । २० ॥
नदारूपा जनस्थानेऽहल्या गौतमशापतः । रामेण भ्रमताप्येवं स्वकीयैश्चरणैःसमुद्धृता ॥ २१ ॥
कल्पभेदाद्वदन्तीत्थं मनयश्चापि केचन । नैव प्रापंऽस्ति सर्वषु कल्पेषु सत्कथा तथा ॥ २२ ॥
ततस्तौ मुण्डगन्धर्वराक्षसौ शुष्पवृष्टिभिः । दृथ्वाऽहल्यां र्ग नपान् जगमतुर्जान्हवी प्रति ॥ २३ ॥
यद्यपि ताड़का पहिले बड़ी सुन्दर अप्सरा थी । परन्तु बादमे जब उसने अगस्त्य ऋषिका वनमें सताया तब उनके शापसे वह कुकर राक्षसी बन गयी । उसके मारीच और सुबाहु ये दो राक्षस पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ९-५ ॥ रामके बाणसे दुखी मुक्ति द्वारा मुक्ति प्राप्त मुनिने उससे कहा था । इसलिए रामवाणसे इस समय अमर तथा दिव्य शरीर धारण करके वह स्वर्गको चली गयी ॥ १० ॥ तदनन्तर तथा विश्वामित्रके आश्रममें जाकर रघुनन्दनने यज्ञमें विघ्न डालनेवाले समस्त राक्षसोंको अपने तीक्ष्ण बाणोंसे मार डाला ॥ ११ ॥ इधर श्रीरामचन्द्रने वहाँ रणयज्ञ ( युद्धरूप यज्ञ ) प्रारम्भ कर दिया । श्रीमान् रामने हजारो राक्षसोको तीक्ष्ण बाणसे मारकर मारीचको एक बाणके साथ सौ योजन ( चार सौ कोस ) दूरपर समुद्रम फेंक दिया । इन्होने दूसरे बाणसे मारीचके भाई सुबाहुको मार डाला ॥ १२ ॥ १३ ॥ विश्वामित्रजीके यज्ञको तो उन्होंने राक्षसोंको मारकर निर्विघ्न समाप्तिकर दी । परन्तु अपने द्वारा प्रारम्भ युद्धयज्ञकी समाप्ति नहीं की अर्थात् उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ । १४ । श्रीरामके प्रलयकालीन अग्निके सदृश उस तथा युद्धसे अतृप्त देखकर मुनि विश्वामित्रने उनको तृप्तिके लिए राजा जनकके यहाँ उनकी कन्याका स्वयंवर सुनकर राम लक्ष्मणको लेकर जनकपुरको प्रयाण किया । चलते-चलते रास्तेमें मुनिने अहल्याको देखकर कहा कि यह मुनिवंशवारा इन्द्रके द्वारा भोगी गयी परमसुन्दर गौतमकी स्त्री है । यह भेद विश्वामित्रने राम लक्ष्मणको बताया ॥ १५-१७ ॥ इस अनन्य रूपवाली अहल्याको बनाकर ब्रह्माने पृथिवीका परिक्रमा करनेवाले गौतम ऋषिको दे दिया, किसी इन्द्रादि देवताको नहीं दी ॥ १८ ॥ इन्द्रने उस बैरका स्मरण करके कपटसे एकान्तमें उसके साथ भोग किया, तदनन्तर गौतम मुनिके शापसे इन्द्र हजार भग ( योनि ) वाले हो गये । फिर प्रार्थना करनेपर गौतमकी कृपासे वे हजार नेत्रवाले बन गये । अब विश्वामित्रके अनुरोधसे करुणानिधि एवं साक्षात् देवतास्वरूप रामचन्द्रने दया करके अपने चरणकमलके स्पर्शसे उस शिलास्वरूपिणी गौतमकी धर्म-पत्नी अहल्याको दोषसे मुक्त करके अति अद्भुत रूपवाली सुन्दरी स्त्री बना दिया । १९ । २० ॥ दण्डक वनके पास एक स्थानमें मुनिके शापसे शपित नदीरूपा अहल्याका अरण्यम भ्रमण करते हुए रामचन्द्रने अपने परम पवित्र चरणस्पर्शसे उद्धार कर दिया । २१ ॥ कुछ लोग इस कथाको कल्पभेदसे मानते और कहते हैं कि सब कल्पोंमें यह शापकी बात एक जैसी नहीं मिलती ॥ २२ । इसके बाद
१२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
रामं नौकां काङ्क्षमाणं नाविक्यो वाक्यमब्रवीत् । नाविक उवाच आदावहं क्षालयित्वा पादरजूंस्तव प्रभो ॥ २४ ॥ पश्चान्नावां समारोप्य तर पादौ रघूद्वह । नोचेत्पाद रजसा स्पृष्टा नारी भविष्यति । २५ ॥ क्षालयामि तव पादपङ्कजं नाथ दारुदृषदोः कियन्तरम् । मानुषीकरणचूर्णमस्ति ते इति लोके हि कथा प्रगीयते ॥ २६ ॥ अस्ति मे गृहिणी गेहे किं करिष्याम्यहं स्त्रियम् । इति तद्वाक्यमाकर्ण्य विहस्य रघुनन्दनः ॥२७॥ तेन प्रक्षालितपदो नौकां समारुरोह सः । ततस्तीर्त्वा जाह्नवीं ते मिथिलां मुनिभिर्ययुः ॥२८॥ मिथिलायां समाहूताः कोटिशः पार्थिवा ययुः । चापसज्जीकरणाख्योऽपि श्रुत्वाऽऽगच्छत्त्वरामितैः॥२९॥ अनाहूतः पुष्पकेण सेनया परिवारितः । न ययौ पुत्रविरहाद्राजा दशरथस्तदा ॥३०॥ अन्यादरेर्विदेहेन समाहूतोऽपि भक्तितः । श्रीरामलक्ष्मणाभ्यां च विश्वामित्रो मुनीश्वरः ॥३१॥ शनैर्बुद्धा स मिथिलां बहिश्चोपवनं ययौ विश्वामित्रं समानेतुं जनको मन्त्रिभिः सह ॥३२॥ यावद्गन्तुं मनश्चक्रे तावच्छिष्यः समाययौ । विश्वामित्रस्य तं दृष्ट्वा ननाम जनकस्तदा ॥३३॥ ततः शिष्यः करं धृत्वा जनकस्य रहोग हि नीत्वा रहसि प्रोवाच वचनं स्वगुरोः स्फुटम् ॥३४॥ त्वामाह गाधिनो राजन् राज्ञो दशरथस्य हि मया पुत्रौ समानीतौ वीरों श्रीरामलक्ष्मणौ ॥३५॥ तौ सीतोर्मिलयोः पाणिग्रहणं हि करिष्यतः पणीकृतं त्वया चापं रामोऽयं खण्डयिष्यति ॥३६॥ अतो वरविधानेन द्वौ पुरीं नेतुमर्हसि यावद्वै चापसंरोषपर्यन्तं मा स्फुटं कुरु ॥३७॥
देवताओं और गन्धवोंने जिनके ऊपर दिव्य पुष्पोंकी वृष्टि की थी, ऐसे राम तथा लक्ष्मण गौतमको बहुहरा सोपकर जाह्नवी (गङ्गा) का आर चल पड़े ॥२३॥ गङ्गातटपर पहुंचकर रामचन्द्र पार उतरनेके लिये नाव खोज ही रहे थे कि इतनेमें एक नाववाला बोला - हे प्रभो ! हे रघूद्वह रामचन्द्रजी ! यदि आप कहें तो मैं पहिले आपके चरणोंकी धूलि धो लूँ, बादमें आपको नावपर बैठाकर पार उतार दूँ। क्योंकि ऐसा न करनेपर कहीं आपकी पादरज छूनेसे मेरी नाव भी स्त्री न बन जाय । क्योंकि पत्थर और लकड़ीमें कोई बहुत अन्तर नहीं होता । यह बात जगत्में प्रसिद्ध है कि आपके चरणोंकी रजमें जड़को भी मनुष्य बनानेकी सामर्थ्य है। इसलिये आपका चरण धोना आवश्यक है ॥२४-२६ । क्योंकि मेरे घरमें एक स्त्री है। अतएव में दूसरीको लेकर क्या करूँगा । इस अटपटे वाक्यको सुनकर आनन्दकन्द रामचन्द्र हँस पड़े । २७ ॥ बादमें जब उस धीवरने पाँव धो लिया, तब रामचन्द्रजी मुनियोंके साथ नावपर सवार होकर गङ्गा पार हुए और वहाँसे मिथिलापुरीकी ओर चले ॥२८॥ मिथिलामें निमन्त्रित राजाओंका एक प्रकारका छोटा सा समुद्र एकत्र हो गया था । रावण भी बिना बुलाये चापभङ्ग सुनते सुनकर ही सेना तथा मन्त्रियोंसे घिरा हुआ पुष्पक विमानपर चढ़कर वहाँ जा पहुँचा । उस समय राजा दशरथ आदर तथा भक्ति- पूर्वक जनकके द्वारा बुलाये जानेपर भी पुत्रविरहसे दुखी होनेके कारण नहीं आये थे। उसी समय मुनियोंके ईश्वर विश्वामित्र भी राम और लक्ष्मणके साथ धीरे धीरे आनन्दपूर्वक मिथिलाके बाहर एक उपवनमें जा पहुंचे। राजा जनक विश्वामित्रको लिवा लानेके लिए जाना ही चाहते थे कि विश्वामित्रका एक शिष्य वहाँ आ पहुँचा। उसको विश्वामित्रका शिष्य जानकर राजाने नमस्कार किया ॥ २९-३३ ॥ शिष्यने राजाका हाथ पकड़ तथा एकान्तमें ले जाकर अपने गुरुकी भेजा हुआ सन्देश भलीभाँति कह सुनाया ॥ ३४ ॥ उसने कहा- गाधिपुत्र विश्वामित्रने कहा है कि मैं अपने साथ राजा दशरथके दो शूरवीर पुत्रों राम-लक्ष्मणको यहाँ ले आया हूँ ॥ ३५ । ये दोनों सीता तथा ऊर्मिलाका पाणिग्रहण करेंगे और आपका पणीकृत धनुष रामचन्द्रजी तोड़ेंगे । ३६ । इसलिये वरको ले आनेके विधानसे इन दोनोंको नगरमें लाना चाहिये । जबतक धनुष भङ्ग न हो, तबतक यह वृत्तान्त किसीको न बताइयेगा ॥ ३७॥ राजा
सर्गः १ ] बालकाण्डम् १३
इत्युक्त्वा जनकं शिष्यः स्वगुरुं बोधमाययौ। जनकोऽपि मुदं युक्तस्तूर्णमेवेत्युदीर्य्य निजाम् ॥३८॥
नगर्य्याद्यैः शोभयित्वा सैन्येन परिवेष्टितः। वाद्येन्द्रं पुरस्कृत्य समाजैर्नृपैः सह ॥३९॥
सुमेधादिप्रमदाभिर्नानाधैर्यमनोहरैः। विश्वामित्रान्तिकं गत्वा नत्वा संपूज्य तं मुनिम् ॥४०॥
भ्राता इव तौ दृष्ट्वा श्रुत्वा तद्वृत्तममादरात्। वस्त्राद्यलङ्कारैधैर्यैः सत्कृत्य विधिवन्नृपः ॥४१॥
गजपोतौ समाशेष्य चामरेण सुवीजितौ। विश्वामित्रेण मुनिना निनाय मिथिलां पुरीम् ॥४२॥
ननृतुर्वारनार्यश्च तूर्यवृन्दैर्मनोहराः। नेदुनानामृदङ्गाश्च जगुस्ते तु नटास्तपः ॥४३॥
तदा तौ दृष्टमार्गेण व्रजन्तौनातिनिभितौ। श्रुत्वा च पूजनं यच्च वार्त्तामायल्लक्ष्मणौ ॥४४॥
समागतवतिनि मुदा व्रजन्तौविशोभिनौ। संजनेत्रैर्ददृशुस्तां ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥४५॥
तदा परस्परं प्रोचुः सीतायोग्या वरस्त्वयम्। रामोऽस्माकं रोचते हि कुर्याच्चेत् विधिरुत्तमः ॥४६॥
उर्मिलायास्तु योग्यश्च लक्ष्मणोऽस्ति सुलक्षणः। अस्माकं सुकृतस्य नयोरन्तो पन्थां शुभां ॥४७॥
श्रीमल्लक्ष्मणौ रम्यौ नयनैर्भानमोनमौ। एव तासां कामिनीनां वचनानि नृपात्मजौ ॥४८॥
शुश्रुवतुः शुभांश्चैव पश्यास्यौ तौ ददृशतुः। ततस्ते मिलिताः सर्वे नृपाः प्रोचुः परस्परम् ॥४९॥
एतादृशो विदेहेन यदाऽस्माभिः समागतम्। तदोत्सवः कृतो नैव ह्यनयोः क्रियते कथम् ॥५०॥
किमतःस्येन राज्ञाऽथ सीता रामाय ताऽर्पिता। किमस्माकं समाह्रय मानभङ्गोऽय नः कृतः ॥५१॥
एवं तेषां नृपाणां च वचनानि नृपात्मजौ। जनको गाधिश्र्चादि शुश्रुवुस्ते समन्ततः ॥५२॥
ततः शनैः शनैर्वारौ ययतुः संविर्भागतैर्जनैः। जग्मतुर्वाद्यघोषायैर्जनकस्य सभां प्रति ॥५३॥
ततोऽवतार्यतुर्वीरौ गजाभ्यां मुनिना सह। तन्मध्यवरशालायामुपविष्टेषु राजसु ॥५४॥
जनकजीसे यह कहकर शिष्य तत्क्षण अपने गुरुजीके पास लौट गया। राजा भी इस बातको मनमे रखकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपना मिथिला नगरीको तोरण तथा रत्नविचित्र वस्त्रजातो आदिसे सजाकर वहन, अगोरी मृत तथा सामन्त होटके मुगोधित उभय एवं दशनं व हाथीको आगे करके सेना, सभी राजाआ, सुमेधा आदि स्त्रिया और जनक प्रकारके मनोहर वाद्यद्रव्य बाज लेकर अपनी भार्याके साथ विश्वामित्र मुनिके पास गये और उनका नमस्कार करके पूजा की । ३८- ४०। मुनिस अगजानकी तरह उन दानो बालकोंका परिचय पूछकर विधिवत् वस्त्र-आभूषणसे उनका सत्कार करके हाथियोंपर चढाकर चमर डुलाते हुए जनकजा विश्वामित्रके साथ दोना भाइयाको मिथिलापुरीम ले चले ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ उस समय बहुसश वाराङ्गनाएं सुन्दर नृत्य करने लगीं। चारण तथा भाट लोग मन्त्रिपाठ एवं जयजयकार करन लगे, नाना प्रकारके वाद्यका मधुर स्वरू दसों दिशामे गूंज उठी। गायकजन मनहर गायन गाने लगे ॥ ४३ ॥ इस प्रकार उपहार तथा अति सुन्दर राम-लक्ष्मण बाजारकी सडकपर आ पहुंचे। उन्हे आते देख तथा वीरोसे सुनकर आबालवृद्ध मार महिलाए ही नगरके सर्व स्त्रिय नगरके प्रधान दरवाजपर, अपन-अपन घरकी छतोंपर, झरोखो और अट्टालियोंपर जा बैठी और अपने कञ्जसदृश नेत्रोंसे उन्ह बडे चावसे देखती हुई उनपर फूलोंका वर्षा करन लगी ॥ ४४॥ ४५ ॥ फिर वे आपसमे कहने लगी कि यह राम सीताके योग्य वर है। हमको तो राम बहुत प्रिय लगते हैं। इस लिए ईश्वर भी वैसा ही करे तो अच्छा हो। वे शुभ लक्षणोसे युक्त लक्ष्मण उर्मिलाके योग्य वर हैं। हमारे भाग्यम वे दोना उत्तम, रमणीय तथा सुन्दर बाहुवाले राम और लक्ष्मण साता तथा उर्मिलाके पति हा तो बहुत अच्छा हा। इस प्रकार उनके मनोहर वचनोको सुनकर राम-लक्ष्मण दोनों भाई ऊपर मुख उठाकर उन्हे देखन लगे। बादमें वे सब राजे परस्पर कहने लगे—॥ ४६-४९ ॥ जब हम तब यहा आये, तब तो राजा जनकने ऐसा उत्सव नहीं किया। अब इन बालकोंके लिये ऐसा क्यों किया । ५० ॥ राजाने कहीं बुद्धिके सीता रामको तो नहीं दे दी ? ऐसा ही था तो हम लोगोंको बुलाकर अपमानित क्यों किया गया ॥ ५१ ॥ उनकी बातें राम-लक्ष्मण, राजा जनक तथा विश्वामित्रजीने भी सुनी ॥ ५२ ॥ इधर झरोखोंमें बैठी हुई स्त्रियोंके द्वारा अवलोकित वे दोनों वीर गजे एवं बाजेकी ध्वनि
| १४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ३ |
|---|
विश्वामित्रानुगौ तौ द्वि मुनिशालां प्रहर्षयुतः । ऋद्धायां मुनिशालायां मुनेरग्रे निषीदतुः ॥५५॥
एवं सभासमृद्धायां राज्ञा कन्याप्रतिग्रहे । प्रतिज्ञातं मम धनुस्तन्सज्जं त्वमुपस्थितम् ॥५६॥
यदाऽधीता धनुर्विद्या मत्त परशुधारिणा । तदा दत्तं मया तस्मै धनुस्त्रिपुरदाहकम् ॥५७॥
तेनैकविंशद्वारं हि निःक्षत्रा पृथिवी कृता । सहस्रबाहुर्निहतः स्वपितुर्घातकारणात् ॥५८॥
तन्मैथिलांगणे स्थाप्य जामदग्न्यो नृपं ययौ । अश्वाबद्धधनुः कृत्वा जानकी क्रीडनं व्यधात् ॥५९॥
जामदग्न्यस्तेन सीतां ज्ञात्वा लक्ष्मीं तदिच्छया । ददौ नृपं पणार्थं तद्धनुरन्यैर्दुरानदम् ॥६०॥
पणीकृतं धनुस्तच्च विदेहेन स्वयंम्बरे । ततः सभासमृद्धायां जनकः प्राह शंकितः ॥६१॥
संस्थाप्य राज्ञां पुरतस्तन्मे चापमनुत्तमम् । शस्त्रागारान्मयानीतं भृत्यैः पंचशतैस्तु यत् ॥६२॥
सीतास्वयंवरार्थं यन्न्यस्तं परशुधारिणा । नृपः प्राह सभाध्ये यो वीरस्त्वत्र सदसि ॥६३॥
करिष्यति धनुः सज्जं तं वै सीता वरिष्यति । तत्तस्य वचनं श्रुत्वा धनुर्दण्डावलोकनात् ॥६४॥
अधोमुखास्तदा सर्वे बभूवुः पृथिवीतमाः । केचित्स्तम्बेः समुद्बोढुं धनुः शक्ता न चाभवन् ॥६५॥
भूमेरुच्चालिते केचिदूर्ध्वं नेतुं न चाशकन् । सर्वेऽप्युत्थालने तस्य नृपाः शक्ता न चाभवन् ॥६६॥
सज्जीकारः कुतस्तस्य मनसाऽप्यविचिंतितः । धनुः सज्जीकृती सर्वान्नृपान् ज्ञात्वा पराङ्मुखान्॥६७॥
तदातिगर्वसंरूढः सभायां रावणोऽब्रवीत् । धनुषः सविधे गत्वा विहसन् जनकं प्रति । ६८ ।
येन वै निर्जिता देवास्त्रैलोक्यं स्ववशे कृतम् । आन्दोलितो भुजाभिर्हि कैलासो येन वै मया ॥६९॥
आदिके साथ धीरे-धीरे राजा जनकके सभामण्डपमें जा पहुंचे ॥५२॥ वहां दौर राम-लक्ष्मण तथा मुनिगण हाथीसे नीचे उतरे । पश्चात् सभामण्डपमे राजाओंके यथायोग्य बैठ जानेपर विश्वामित्रजीके साथ जाकर वे बालक भी मुनिमण्डपमे मुनिके आगे बैठ गये । ५४ ॥ ५५ ॥ इस प्रकार सभाके भर जानकर कन्यादानके लिये नियत किये हुए धनुषपर ज्या ( तांत या डोरी ) चढ़ानेके लिये राजाओंसे राजा जनकने कहा ॥ ५६ ॥ श्रीशिवजी कहते हैं-हे पार्वति जब परशुरामजीने मुझसे धनुर्विद्या प्राप्त की, उस समय मैंने उनको वह त्रिपुरको जलानेवाला धनुष दिया था ॥ ५७ ॥ उसके द्वारा उन्होंने इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य कर डाला और अपने पिताके घातक सहस्रबाहुको भी इस से मारा ॥ ५८ ॥ तदनन्तर परशुरामजी उस धनुषको राजा जनकके आंगनेमें रख जाये । बचपनमें जानकीजी उस धनुषकी लकड़ीका घोड़ा बनाकर खेल करती थी ॥ ५९ ॥ इस व्यवहारसे परशुराम सीताको लक्ष्मी समझने लग और इसी अभिप्रायसे दूर रहने के लिये दुर्लभ वह धनुष राजा जनकको प्रतिज्ञापालनार्थ दे दिया ॥ ६० । तद्नुसार विदेहने उस धनुषको सीतास्वयंवररूप प्रणकी जगहपर नियत किया । पश्चात् भरी सभामे सशंक भावसे जनकजीने इस मेरे सर्वोत्तम धनुषको सबके सामने रखकर राजाओंको अपनी प्रतिज्ञा कह सुनायी । वह धनुष शस्त्रागारसे पाँच सौ भृत्यों द्वारा खिंचवाकर राजा जनकने सीता स्वयंवरके लिये वहाँ स्थापित किया था। भरी सभाके मध्यमें राजा जनकने राजाओंसे कहा--जो राजा इन सभासदोंके सामने इस धनुषको सज्जित करेगा, उसीको सीता वरेगी । राजाके वचनको सुन तथा यमके समान अचल उस धनुषको देखकर सबके सब राजाओ तथा महाराजाओंने मुख नीचे कर लिया । उनमेंसे कुछ तो उस धनुषको जमीनसे तनिक भी नहीं उठा सके ॥ ६१-६५ ॥ कुछ लोगोंने कुछ ऊँचा भी किया तो जमीनसे बिल्कुल नहीं उठा सके। बादमे सबने सब मिलकर उठाना स्त्री तो भी वह जमीनसे तृण नहीं हिला। तब फिर उसपर डोरी चढ़ाना तो और भी कठिन काम था । सभामें धनुष चढ़ानेसे सब राजाओंको पराङ्मुख देखकर रावण गर्वके साथ धनुषके पास गया और हँसकर राजा जनकसे कहने लगा-॥ ६६-६८ ॥ हे राजन् ! जिस रावणने समस्त देवताओंको जीत लिया है, जिसने तीनों लोकोंको अपने वशमें कर लिया है तथा अपनी दो ही भुजाओंसे जिसने शिवजीके निवासस्थान कैलास पर्वतको हिला दिया है, उस रावणका यदि तुम राजाओंसे भरी सभामें बल देखना चाहते
सर्गः ३ ]
सर्गः ३ ] सारकाण्डम् १५
तस्य मे जनकाद्य स्वं बलं पार्थिवसंसदि । द्रष्टुमिच्छसि किंन्त्वस्मिन लघुचापे तृणोपमे ॥७०॥ एवं वदन् दशान्यः सन्नद्धो भूत्वा महद्धनुः । गृहीतुं वामहस्तेन चालयामास वै तदा ॥७१॥ न चचाल किंचिच्च तदा दक्षिणमन्कराम् । पुः कृत्वा गृहीतं तच्चालयामास वै पुनः ॥७२॥ न तञ्चचाल तदपि तदाश्चर्येण रावणः । भुजाभ्यां चालयामास तदा चापं चचाल न ॥७३॥ एवं क्रमेण सर्वाभिर्भुजाभिश्चालयन् धनुः । विशद्दोर्भिरंकदेशं चापस्योर्ध्वं चकार सः ॥७४॥ एकोनविंशद्दोर्भिञ्च धृत्वा चैव महद्धनुः । गुणे भूम्यां निपत्तिनं गृहीतुं हि दशाननः ॥७५॥ किंचिद्दुन्वा विनम्रः सदोष्षा जग्राह तं गुणम् । एतस्मिन्नन्तरे तच्च पपात त्वद्धृदये धनुः ॥७६॥ न तद्विशतिभुजामिश्च चचाल हृदयाद्धनुः । तदा सभायामूर्ध्वास्यः पपात स दशाननः ॥७७॥ मुकुटः पतितो भूमौ मुक्तकच्छोऽप्यभूत्तदा । तदा विजहसुः सर्वे सभायां पृथिवीजनाः ॥७८॥ तदा प्राणान्तिकं चासीद्रावणस्य सभांगणे । अक्षीणि भ्रामयामास लालास्येभ्यो विनिर्ययौ ॥७९॥ तदा तं वेष्टयामासुर्मंत्रिणो राक्षसास्तदा । धनुरुत्चालने शक्तास्तेऽभवन्नैव संमदि ॥८०॥ महत्क्रेषु दशत्वः स विष्टमृत्रे तदाऽकरोत् । ततः सभायां जनकः पुनः शङ्कान्वितोऽब्रवीत् ॥८१॥ कोऽपि वीरोऽस्ति भूमौ न किं निर्वीरं हि भूतलम् । चेदस्ति कश्चिन्मदसि तर्हि सोऽद्यसमांगणे ॥८२॥ जीवनदानं करोत्वस्मै दशान्याय नृपाग्रतः । इति वाक्यशराघातभिन्नौ तौ रामलक्ष्मणौ ॥८३॥ ददर्शतुर्गाधिजस्य मुखं तौ स्फुरितभ्रुवौ । विश्वामित्रस्तदा प्राह राम चोत्तिष्ठ राघव ॥८४॥ किमत रावणञ्चाद्य त्वं पश्यामि सभांगणे । जीवयंन् राक्षसेन्द्रं सज्जं कुरु धनूस्मि्वदम् ॥८५॥ तन्मुनेर्वचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स राघवः । तदोत्थायासनाद्वेगात्प्रणनाम मुनीश्वरम् ॥८६॥ निष्कास्य कण्ठाद्वारादीन् कटिं बद्ध्वा तदा प्रभुः । मुकुटादि दृढं कृत्वा शनैः प्राप सभांगणम् ॥८७॥
हो तो भले ही देख लो, किन्तु इस तिनकेके समान हल्के धनुषमे क्या वीरता देखना है ॥ ६३ । ७० ॥ ऐसा कह कर दशमुख रावणने उस बड़े भारी धनुषको पहिले अपने बायें हाथसे ही हिलाना चाहा ॥ ७१ ॥ लेकिन वह तणिक भी नहीं हिला। तब उसने दाहिने हाथसे पकड़कर हिलाना चाहा, तिसपर भी जब वह नहीं हिला, तब रावणको बड़ा आश्चर्य हुआ और एक साथ दोनो हाथोंसे उठाना चाहा। फिर तीनसे फिर चारसे इस प्रकार करते-करते जब बीसो भुजायें ऐक साथ लगा दीं, तब कहीं वह एक ओरसे कुछ ऊँचा हुआ ॥ ७२-७४ ॥ तब उसने उन्नीस भुजाओंसे उस महान् धनुषको सम्हाला तथा बीसवीं भुजासे जमीनपर लटकती हुई ताँतको पकड़कर ज्यों ही ऊपरको उठाना चाहा त्यों ही वह धनुष उचटकर उसकी छातीपर गिर पड़ा ॥ ७४ । ७६ ॥ सब बीसों हाथोने भी रावण उस धनुषको अपनी छातीपरसे नहीं हटा सका और ऊपर मुख किये पृथ्वीपर धड़ामसे गिर पड़ा ॥ ७७ ॥ उसके सिरका मुकुट दूर जा गिरा और धोतीकी लांग खुल गयी। यह देख सभाके सब राजे खिलखिलाकर हंस पड़े ॥ ७८ । रावण बेचारेके पसीना निकलने लगा, आँखें घूमने लगी और मुखसे लार गिरने लगी ॥ ७९ ॥ उसके सब मन्त्रियो तथा सैनिकोने आकर घेर लिया, परन्तु उन सबसे भी धनुष नहीं उठा ॥ ८० ॥ पहिने हुए सुन्दर वस्त्रोम रावणका मलमूत्र निकल पडा रावण जैसे वीरकी यह दशा देख राजा जनकको और भी शंका हुई और वे घबड़ाकर कहने लगे - ॥ ८१ । क्या कोई भी वीर पुरुष इस भूतलपर नहीं रहा ? क्या पृथ्वी वीरोंसे शून्य हो गयी ? यदि कोई हो तो इस सभा में राजाओंके सामने रावणको जीवनदान देकर बचाये उनके इस वाक्रूपबाणोसे पीड़ित होकर राम तथा लक्ष्मण जिनकी भौं हैं क्रोधके मारे फड़क रही थीं, विश्वामित्रके मुखकी ओर देखने लगे। तब विश्वामित्र बोले- हे राघव खड़े हो जाओ और इस रावणके प्राण बचाओ । तुम्हारे रहते रावण मर रहा है। सी ठीक नहीं है। इसे बचाकर धनुषको भी सज्जित करो ॥ ८२-८५ ॥ मुनिके वाक्य सुन तथा बहुत अच्छा कहकर राम तुरन्त आसनसे उठ खड़े हुए और मुनिको प्रणाम किया ॥ ८६ ॥ उन्होंने गलेमेसे हार आदि आभूषण उतारकर रख दिये, कमरको कस लिया,
१६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ३
तं राममागतं दृष्ट्वा जनाः सर्वेऽतिविस्मिताः । चकिताः पार्थिवाः सर्वे ददृशुर्नैत्रपङ्कजैः ॥८८॥
परस्परं तदा प्रोचुः किम्भूतोऽस्ति शिशुस्त्वयम् । यत्रास्माभिः स्थितं तूष्णीं तत्रायं किं करिष्यति ॥८९॥
केचिदाहुर्दर्शनाय हि द्रष्टुं बालः समागतः । केचिदूचुर्बालचेष्टा क्रियते शिशुनाऽद्य हि ॥९०॥
केचिदूचुः किमर्थ हि हारा मुक्तास्त्वनेन हि । केचिदन्दर्गाभिधेन चापं प्रति सुयोजितः ॥९१॥
केचिदूचुर्बर्बुरुदया चोदितः किं शिशुस्त्वयम् वधार्थं चापपातेन विश्वामित्रेण राघवः ॥९२॥
केचिदूचुर्बलं स्वस्य मुनिनाऽत्र निरीक्षितुम् । चोदितोऽस्त्यत्र श्रीरामश्चापेऽयं किं करिष्यति ॥९३॥
एवं नानाविधांस्तर्कानावर्तकुर्वन्ति पार्थिवाः । तावद्दृष्ट्वाऽग्रतो रामं जनकः प्राह गाधिसूनुम् ॥९४॥
किमर्थं प्रेषितस्त्वत्र मुने बालः सभागणे । यत्रैते रावणाद्याश्च नृपाः सर्वेऽपि कुण्ठिताः ॥९५॥
तस्मिंश्चापे स्वयं बालः किमागच्छ करिष्यति । यस्त्वया शिष्यवाक्येन पूर्वं चाहं प्रबोधितः ॥९६॥
तन्मूर्ख तु मयैवाद्य चापाग्रे मुनिसत्तम । क्वायं बालः कोमलाङ्गः स्वेतं चापं सुदुर्धरम् ॥९७॥
किं चातकस्तृषाक्रान्तः सागरं शोषयिष्यति । एतस्मिन्नन्तरे सर्वाः सुवेषाद्याः स्त्रियश्च ताः ॥९८॥
द्विजराजाननं बालदोर्दण्डद्वयशोभिनम् । हेमवर्णोपमंरुचिं शृंगवालनृपंगंधिणम् ॥९९॥
शृंखलाफेनकपदद्वयशोभितमन्वहम् । दिव्यकुण्डलमुक्तरत्नजालंकारशोभितम् ॥१००॥
सुजंघं सुपदां शूरं सुजानुं सुन्दरोदरम् मुत्कण्ठं सुतनुं कंबुकंठं त्रिवलिशोभितम् ॥१०१॥
स्मितास्यं कोमलोष्ठं च मुदंतावलिराजितम् । सुनासं मुकपालं च कञ्जपत्रादिनेक्षणम् ॥१०२॥
सुम्रुमावं च सुस्निग्धं कुंचितालकशोभितम् । मुक्तामाणिक्यराजादिनानालंकाशोभितम् ॥१०३॥
दुपट्टेको अच्छी प्रकार बांध लिया और रंगभूमि सभाके बीचमे आ खड़े हुए । ८७॥ रामको वहां खड़े देख सब लोग बड़े विस्मयमे पड़ गये और चकित होकर सबके सब राज उस अपने कमलसदृश नेत्रोंसे देखने हुए परस्पर कहने लगे कि यह बालक कैसा सुन्दर है । अरे, जहां हम लोगोंको भय होता रहा वहीं यह क्या करेगा ? ॥८८॥८९॥ कोई कहने लगा कि यह बालक केवल धनुषको देखनेके लिए आया है । किसीने कहा कि यह बालक सी मानो मल्लका खेल ही रचा लगता है ॥९०॥ कोई बोला-सब इसके गलेसे हार तथा माला उड़ा उतार दीं हैं, किसीने उत्तर दिया कि इसको विश्वामित्रने धनुष उखाड़नेके लिए भेजा है ॥९१॥ कोई बोला कि इस बालकको विश्वामित्रने बहुत बड़ा भेजा है, जिससे यह धनुषमें दबकर मर जाय ॥९२। दूसरेने कहा कि नहीं मुनिने इसका बल देखनेके लिए भेजा है । परन्तु राम इस धनुषके विषयमे क्या कर सकता है ॥९३॥ इस प्रकार राजा लोग अनेक तरहके तर्क वितर्क कर ही रहे थे कि रामको देखकर जनकने विश्वामित्रसे कहा-हे मुनिराज ! आपने इस बालकको क्यों भेजा है ? जिस धनुषके विषयमे बड़े-बड़े राज-महाराज तथा रावणकी भी शक्ति कुण्ठित हो गयी वहां यह बालक आकर क्या करेगा ? जो आपने धनुष तोड़नेके लिए इसको भेजा था, सो सब आज इस धनुषके सामने झूठा होगा । क्योंकि कहां यह कोमल अंगका बालक और कहां यह अति दुर्धर्ष तथा महान् धनुष ! चातक चाहे कितना ही प्यासा क्यों न हो तो भी क्या वह समुद्रको सोख सकता है ? इसी समय सुवेषा आदि स्त्रियें झरोखोंसे, जालियोंसे, चौको और छज्जोंपरसे मन्दर हवा कोमल अङ्गवाले, कमलके सदृश नेत्रवाले, चन्द्रमाके समान सुन्दर मुखवाले, महा बली भुजाओंसे शोभित, सुवर्णसदृश कान्तिसम्पन्न, नूपुर और किंकिणियोंका पादमे पहिने । ९४-९९॥ जिसके हाथोंमे सिकंडा और कड़े शोभित हो रहे थे। जिनके सिर-पर दिव्य मुकुट कानाम दिव्य कुण्डल, हृदयपर रत्न तथा मणियोंके विशाल हार झलक रहे थे, पेट तथा छातीपे त्रिवली पड़ी हुई थी। शंखके समान कंठ देखनेमे बड़ा ही अच्छा लगता था । जिसकी चिकनी ठोढ़ी, कोमल कपोल, हंसता हुआ मुखचन्द्र अनारकी पंक्तिके समान दांत, सुन्दर लम्बी और पतली नाक तथा अलकें लटक झांड थी। माणिक्य, मोती रत्न तथा हीरों आदिसे जड़े हुए अनेक अलंकारोसे अलंकृत,
सर्गः ३ ] सारकाण्डम् १७
सर्गः ३ ] सारकाण्डम् १७
मुक्कारत्नपुष्पमालान्यस्तमप्यतिशोभितम् । न्यस्तहारं न्यस्तवस्त्रं बद्धपीताम्बगन्वितम् ॥ १०४॥ दिव्यमुद्राङ्गुलिलसत्कङ्कणप्रभङ्करम् । एवं दृष्ट्वा स्त्रियो रामं सभासद्मविराजितम् ॥१०५॥ न्यस्तकोदण्डतूणीरं शिवचापाभिमुखम् । प्रार्थयामासुस्ताः सर्वा ऊर्ध्वास्या ऊर्ध्वसत्कराः ॥१०६॥ पश्यन्त्यो गगने शंभुं मोहान्नारायणं विधिम् । साक्षान्नारायणं शर्म न ज्ञात्वा ताश्च वै स्त्रियः ॥१०७॥ हे शंभो हे रमाकान्त हे विधेऽस्मत्पुराहृतैः । व्रतदानादिपुण्यैश्च चापं सज्जीकरोत्वयम् ॥१०८॥ युष्माभिर्नः सुकृतैश्च कर्तव्यं पुष्पवल्लघुः । अद्यास्य कण्ठदेशेऽत्र मालां सीता दधात्वियम् ॥१०९॥ नो भवत्वद्य नेत्राणां साफल्यं दर्शनेनहि । सीतया रामचंद्रस्य वेदिकायां स्थितस्य हि ॥११०॥ एतस्मिन्नन्तरे सीता रामं दृष्ट्वा सभागणे । दिव्यप्रासादसंरूढा सखीभिः परिवेष्टिता ॥१११॥ प्रोन्चलत्लासनाद्वेगादानन्दस्वेदसंप्लुता । सख्यास्तुलस्याः कण्ठे स्त्री दोर्लतां क्षिप्य सादरम् ॥११२॥ अब्रवीन्मधुरं वाक्यं रत्नालंकारमण्डिता । किंपणोऽत्र कृतः पित्रा मम शत्रुरूपिणा ॥११३॥ क्व रामः सुकुमाराङ्गः क्वेवेदं चापं नगोपमम् । हा विधे किं कृतोपद्य कियत्स्यंतर्गतं तव ॥११४॥ रामादिनान्यं पुरुषं मनसाऽहं न रोचये । यदि तातो बलादन्यं मां दास्यति तदा ह्यहम् ॥११५॥ त्यजामि जीवितं त्वद्य प्रासादात्पतनादिना । हे शम्भो हे विधे दुर्गे हे सावित्रि सरस्वति ॥११६॥ हे गायत्रि रवरे मान्नो मघवन्पम वोयप । हे कुवेरानल रमे हे विष्णो खगनायक ॥११७॥ हे फणीन्द्र निशानाथ हे सर्वे निर्जरादयः । युष्माकं प्रार्थयाम्यद्य प्रसार्य करपल्लवम् ॥११८॥ सर्वै रेतन्महच्चापं करणीयं तु पुष्पवत् । प्रवेशनीर्थं युष्माभिः श्रीरामभुजदण्डयोः ॥११९॥ धनुर्भङ्गं यन्मगपि मुनिवृत्त्याऽनुवर्तिनी । विशामि रने चाहं धनुः सज्जं करोत्वयम् ॥१२०॥
पन्ना, लाल, पुखराज, मुक्ता तथा हरे-नीले अनेक रत्नका पुष्पमालाओंसे मनोहर, पीताम्बर आदि सुन्दर वस्त्रोंको पहिन हुए, शङ्ख चक्र गदा पद्म आदि शुभ चिह्नोंसे चिह्नित करकमलवाले, सभामण्डपके बीच खड़े, दोनों कन्धोंपर धनुष और तूणीरको बाँधे तथा शिवधनुषके सामने मुख किये हुए रामको देख-कर उन्हें साक्षात् नारायण न समझती हुई वे महिलाय आकाशमे स्थित शिव, विष्णु और ब्रह्माको देख उनसे हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगीं-॥ १०४-१०७ ॥ हे शंभो ! हे रमाकान्त ! हे ब्रह्मन् हमारे पूर्वोपाजित व्रत-दानजन्य पुण्योंसे यह बालक धनुष चढ़ानेमे समर्थ हो । १०८। आप लोग हमारे पुण्यप्रतापसे इस धनुषको फूलके समान हल्का बना दें। जिससे हमारी सीता आज इनके गलेमे वरमाला डाले ॥ १०९ ॥ हमलोग सीतासहित रामचन्द्रका विदाहकी वेदीपर बैठे देखकर अपने नेत्रोंको सफल करें ॥ ११० ॥ उसी समय बच्ची हवा अलङ्कारोंसे सुशोभित सखियोंके साथ दिव्य भवनकी छतपर बैठी हुई सीता रामको सभाके बीच खड़े देख आनन्दके स्वेदसे परिप्लुत होकर शीघ्र आसनसे उठ खडी हुई । अपनी प्रिय सखी तुलसीके गलेमे हाथ डाल तथा तनिक अगाडी बढ़कर आदरपूर्वक यह मधुर वाक्य बोलीं-शत्रुस्वरूप मेरे पिताने यह कैसो प्रतिज्ञा की है ? कहाँ ये कमल अङ्गवाले बालक राम और कहाँ यह पर्वतके समान भारी तथा कठिन धनुष । यह इनमें कैसे चढ़ सकेगा ? हा ईश्वर ! तुमने यह क्या किया और क्या करनेका विचार है ? चाहे जो हो, मै रामको छोडकर दूसरे किसीको नहीं वरूँगी । यदि मेरे पिता मुझे दूसरे किसीको देंगे तो मै महाश्वरसे गिरकर अथवा विष आदिके द्वारा शीघ्र प्राण त्याग दूंगी। हे शम्भो ! हे विधे ! हे दुर्गे ! हे सरस्वतो ! हे सावित्री ! हे रवरे ! हे सूर्य ! हे इन्द्र ! हे जलपति वरुण ! हे कुबेर ! हे अग्ने ! हे रमे ! हे विष्णो ! हे गरुड ! हे फणीन्द्र ! हे चन्द्र ! हे समस्त देवताओं ! मै आंचल फैलाकर प्रार्थना करतो हूँ कि आप सब इस धनुषको फूलके समान हल्का बना दें और रामचन्द्रके भुजदण्डमें प्रवेश करके उन्हें बल प्रदान करें । जिससे राम धनुष चढ़ानेमें समर्थ हों और मुनिवृत्ति धारण करके रामकी
| १८ | आनन्दरामायणे |
|---|
एवं नानाविधैर्वाक्यैः सीता देवानतोषयत् । एवं प्रासादसंस्थायाः सीताया विविधानि च ॥ १२१ ॥ तथा ड्रामा हि नारीणां नृपाणां जनकस्य च । वाक्यानि शृण्वन् श्रीरामः किञ्चित्कृत्वा स्मिताननम् ॥ १२२ ॥ ययौ चापं नमस्कृत्य कृत्वा तं च प्रदक्षिणम् । पुनर्नत्वा शिवं ध्यात्वा गुरुं दशरथं नृपम् ॥ १२३ ॥ कौसल्यां च गुरुं ध्यात्वा वामहस्तेन तद्दधौ । सव्यहस्तेन चापस्य गुणं धृत्वा ऽसृजत्तपः ॥ १२४ ॥ वामहस्तेन नम्रं तच्चकार सदसि क्षणात् । तदा निनेदुर्वाद्वानि तुष्टुवुर्बन्दिमागधाः ॥ १२५ ॥ एतस्मिन्नन्तरे चापो वामहस्तचलाद्गतुः । मध्येऽभजन्त्रिखण्डं सञ्जातं प्राचीनमुत्तमम् ॥ १२६ ॥ चापभङ्गान्महाशब्दस्तदाऽभूद्गगनांगणं चकम्पे धरणी त्वं चालिङ्ग्यन्मां भयाद्द्रुतम् ॥ १२७ ॥ चुक्षुभुः सागराः सर्वे निनेदुरन्ता दिशो दश । तारा निपेतुर्धरणीं शिरः शेषोऽप्यचालयत् ॥ १२८ ॥ ववुर्वाताः सुगन्धाश्च देवास्ते गगने स्थिताः । वादयामासुर्वाद्यानि वर्षन्तः कुसुमौघिनम् ॥ १२९ ॥ स्वर्गस्त्रीभिर्ननृतुः सा हि देवास्तवोत्सवं परेदिरे । तदा निनेदुः सदसि भेर्यो दमध्यो वराः ॥ १३० ॥ नववाद्यध्वनाः सर्वे बभूवुर्जयनिःस्वनाः । ननृतुर्वारनार्यश्च तुष्टुवुर्मागधादयः ॥ १३१ ॥ स्त्रियो गवाक्षसंबद्धा रामं पुष्पैरवाकिरन् तदा स रावणस्तूष्णीं लज्जयाऽधोनतमस्तकः ॥ १३२ ॥ मुकुटैरपि हीनश्च मुक्तकच्छोऽतिविह्वलः । सभायां न क्षणं तस्थौ तूर्णं लङ्कापुरीं ययौ ॥ १३३ ॥ रामेण सह तच्चापं दृष्ट्वा नार्यो मुदान्विताः । चक्रुर्जयास्यनेधोपान्करैश्च करतालिकाः ॥ १३४ ॥ सीताऽपि मुदिता जाता हर्षरोमांचनिर्भरम् । अनिमेष कंजनेत्रा राममुत्कण्ठिताऽभूत् ॥ १३५ ॥ एतस्मिन्नन्तरे राजा जनकः प्राह मन्त्रिणः । करिणास्थायाग्र सीतामानयध्वं समन्ततः ॥ १३६ ॥
अनुगामिनी बनकर उनके साथ चौदह वर्ष तक वनम भ्रमण करूं ॥ १२१-१२२ ॥ इस प्रकार विविध वाक्य से सीता देवताओंको मनाने लगीं । प्रासादपर स्थित सीताके, उन स्त्रियोंके, राजा जनकके तथा अन्यान्य राजाओंके ऐसे-ऐसे वाक्योको सुनकर मुसकान हुए श्रीराम धनुषके पास गये । वहां जाकर उन्होंने धनुषको नमस्कार किया, प्रदक्षिणा की और शिवजीका मन ही मन ध्यान करके प्रणाम किया बादमे राजाधिराज श्री दशरथ राजा दशरथ माता कौशल्या तथा गुरु वसिष्ठका मन ही मन ध्यान करके प्रणाम किया । फिर बायें हाथसे धनुष और दाहिने हाथसे उनको डोरी पकड़कर क्षणभरम सभाके सामने बांये हाथसे धनुषको झुकाकर तांत चढ़ा दी उस समय बाजे बजने लगे, पुष्पवृष्टि होने लगी और चारणगण रामका यश गान लगे। इतनेम रामके बायें बाहुबलसे उस उत्तम तथा पुरातन शिवधनुषके बीचसे तीन टुकड हो गये ॥ १२३-१२६ ॥ धनुषके टूटनेसे बडा घोर शब्द हुआ । जिसमे समस्त गगनमण्डल गूँज उठा । धरती काप उठी । हे पार्वती ! तुम भी उस समय मारे डरके हमसे लिपट गयी थी । सब समुद्र चलायमान हो गये दिशाये क्षुभित हो गयीं । तारे टूट-टूटकर पृथ्वीपर गिरने लगे । शेषनागका सिर घूमने लगा । सुगन्धयुक्त वायु वहन लगी । देवता आकाशसे फूल बरसाने और बाजे बजाने लगे । स्वर्गकी स्त्रियां आकाशमे नृत्य करन लगी और देवता आनन्द मनाने लगे । उस समय सभामण्डपमे भी उत्तम ढोल तथा नगारे बजने लगे ॥ १२७-१३० ॥ नये-नये बजने तथा जयजयकारका घोष होने लगा । वाराङ्गनाएं नाचने लगीं । भांट आदि स्तुति करने लगे । झरोखोंसे स्त्रियें रामपर फूल बरसाने लगीं । तब रावण चुपचाप लज्जासे सिर नीचा किये हुए बिना सींग वाले मुकुटरहित हो घबराहटके साथ शीघ्र मिथिलापुरीसे निकलकर लङ्काको भाग गया । वहाँ वह क्षणभर भी नहीं ठहरा ॥ १३१-१३३ ॥ रामने धनुषको तोड़ डाला, यह देखकर स्त्रियें हर्षातिरेकसे जयजयकार करने और तालियां बजाने लगी ॥ १३४ ॥ सीताके तो शरीरमे मारे आनन्दके रोमांच हो आया । उत्कण्ठापूर्वक निमेषरहित होकर कमलसदृश नयनोंसे वे रामको निहारने लगी ॥ १३५ ॥ तभी राजा जनकने