भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

मेधावी श्रीकृष्णने उन सबका आदर करके उनका कुशल-समाचार पूछा और प्रसन्नतापूर्वक अपने माता-पिताके चरणोंमें प्रणाम किया ॥ १९ ॥ ताभ्यां स सम्परिष्वक्तः सान्त्वितश्च महाभुजः । उपोपविष्टैः सर्वैस्तैर्वृष्णिभिः परिवारितः ॥ २० ॥ उन दोनोंने उन महाबाहु श्रीकृष्णको अपनी छातीसे लगा लिया और मीठे वचनोंद्वारा उन्हें सान्त्वना दी। इसके बाद सभी वृष्णिवंशी उनको घेरकर आस-पास बैठ गये ॥ २१ ॥ स विश्रान्तो महातेजाः कृतपादावनेजनः । कथयामास तत्सर्वं पृष्टः पित्रा महाहवम् ॥ २१ ॥ महातेजस्वी श्रीकृष्ण जब हाथ-पैर धोकर विश्राम कर चुके, तब पिताके पूछनेपर उन्होंने उस महायुद्धकी सारी घटना कह सुनायी ॥ २१ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि कृष्णस्य द्वारकाप्रवेशे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ॥ ५९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकाप्रवेशविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ १/२ श्लोक मिलाकर कुल २४ १/२ श्लोक हैं)

षष्टितमोऽध्यायः वसुदेवजीके पूछनेपर श्रीकृष्णका उन्हें महाभारत-युद्धका वृत्तान्त संक्षेपसे सुनाना वसुदेव उवाच श्रुतवानस्मि वार्ष्णेय संग्रामं परमाद्भुतम् । नराणां वदतां तत्र कथं वा तेषु नित्यशः ॥ १ ॥ वसुदेवजीने पूछा—वृष्णिनन्दन! मैं प्रतिदिन बातचीतके प्रसंगमें लोगोंके मुँहसे सुनता आ रहा हूँ कि महाभारत-युद्ध बड़ा अद्भुत हुआ था। इसलिये पूछता हूँ कि कौरवों और पाण्डवोंमें किस तरह युद्ध हुआ? ॥ १ ॥ त्वं तु प्रत्यक्षदर्शी च रूपज्ञश्च महाभुज । तस्मात् प्रब्रूहि संग्रामं याथातथ्येन मेऽनघ ॥ २ ॥ महाबाहो! तुम तो उस युद्धके प्रत्यक्षदर्शी हो और उसके स्वरूपको भी भलीभाँति जानते हो; अतः अनघ! मुझसे उस युद्धका यथार्थ वर्णन करो ॥ २ ॥ यथा तदभवद् युद्धं पाण्डवानां महात्मनाम् । भीष्मकर्णकृपद्रोणशल्यादिभिरनुत्तमम् ॥ ३ ॥ महात्मा पाण्डवोंका भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य और शल्य आदिके साथ जो परम उत्तम युद्ध हुआ था, वह किस तरह हुआ? ॥ ३ ॥ अन्येषां क्षत्रियाणां च कृतास्त्राणामनेकशः । नानावेषाकृतिम तां नानादेशनिवासिनाम् ॥ ४ ॥ दूसरे-दूसरे देशोंमें निवास करनेवाले, भाँति-भाँतिकी वेशभूषा और आकृतिवाले जो अस्त्र-विद्यामें निपुण बहुसंख्यक क्षत्रिय वीर थे, उन्होंने भी किस प्रकार युद्ध किया था? ॥ ४ ॥ वैशम्पायन उवाच इत्युक्तः पुण्डरीकाक्षः पित्रा मातुस्तदन्तिके । शशंस कुरुवीराणां संग्रामे निधनं यथा ॥ ५ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—माताके निकट पिताके इस प्रकार पूछनेपर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण कौरव वीरोंके संग्राममें मारे जानेका वह प्रसंग यथावत् रूपसे सुनाने लगे ॥ ५ ॥ वासुदेव उवाच अत्यद्भुतानि कर्माणि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।

बहुलत्वान्न संख्यातुं शक्यान्यब्दशतैरपि ॥ ६ ॥ श्रीकृष्णने कहा—पिताजी! महाभारत-युद्धमें काममें आनेवाले मनस्वी क्षत्रिय वीरोंके कर्म बड़े अद्भुत हैं। वे इतने अधिक हैं कि यदि विस्तारके साथ उनका वर्णन किया जाय तो सौ वर्षोंमें भी उनकी समाप्ति नहीं हो सकती ॥ ६ ॥ प्राधान्यतस्तु गदतः समासेनैव मे शृणु । कर्माणि पृथिवीशानां यथावदमरद्युते ॥ ७ ॥ अतः देवताओंके समान तेजस्वी तात! मैं मुख्य-मुख्य घटनाओंको ही संक्षेपसे सुना रहा हूँ, आप उन भूपतियोंके कर्म यथावत् रूपसे सुनिये ॥ ७ ॥ भीष्मः सेनापतिरभूदेकादशचमूपतिः । कौरव्यः कौरवेन्द्राणां देवानाामिव वासवः ॥ ८ ॥ जैसे इन्द्र देवताओंकी सेनाके स्वामी हैं, उसी प्रकार कुरुकुलतिलक भीष्म भी श्रेष्ठ कौरववीरोंके सेनापति बनाये गये थे। वे ग्यारह अक्षौहिणी सेनाके संरक्षक थे ॥ ८ ॥ शिखण्डी पाण्डुपुत्राणां नेता सप्तचमूपतिः । बभूव रक्षितो धीमान् श्रीमता सव्यसाचिना ॥ ९ ॥ पाण्डवोंके सेनानायक शिखण्डी थे, जो सात अक्षौहिणी सेनाओंका संचालन करते थे। बुद्धिमान् शिखण्डी श्रीमान् सव्यसाची अर्जुनके द्वारा सुरक्षित थे ॥ ९ ॥ तेषां तदभवद् युद्धं दशाहानि महात्मनाम् । कुरूणां पाण्डवानां च सुमहल्लोमहर्षणम् ॥ १० ॥ उन महामनस्वी कौरवों और पाण्डवोंमें दस दिनोंतक महान् रोमांचकारी युद्ध हुआ ॥ १० ॥ ततः शिखण्डी गाङ्गेयं युध्यमानं महाहवे । जघान बहुभिर्बाणैः सह गाण्डीवधन्वना ॥ ११ ॥ फिर दसवें दिन शिखण्डीने महासमरमें जूझते हुए गङ्गानन्दन भीष्मको गाण्डीवधारी अर्जुनकी सहायतासे बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बहुत घायल कर दिया ॥ ११ ॥ अकरोत् स ततः कालं शरतल्पगतो मुनिः । अयनं दक्षिणं हित्वा सम्प्राप्ते चोत्तरायणे ॥ १२ ॥ तत्पश्चात् भीष्मजी बाणशय्यापर पड़ गये। जबतक दक्षिणायन रहा है, वे मुनिव्रतका पालन करते हुए शरशय्यापर सोते रहे हैं। दक्षिणायन समाप्त होकर उत्तरायणके आनेपर ही उन्होंने मृत्यु स्वीकार की है ॥ १२ ॥ ततः सेनापतिरभूद् द्रोणोऽस्त्रविदुषां वरः । प्रवीरः कौरवेन्द्रस्य काव्यो दैत्यपतेरिव ॥ १३ ॥ तदनन्तर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोण कौरवपक्षके सेनापति बनाये गये। वे कौरवराजकी सेनाके प्रमुख वीर थे, मानो दैत्यराज बलिके सेनाके प्रधान संरक्षक

शुक्राचार्य हों ।। १३ ।। अक्षौहिणीभिः शिष्टाभिर्नवभिर्द्विजसत्तमः । संवृतः समरश्लाघी गुप्तः कृपवृषादिभिः ।। १४ ।। उस समय मरनेसे बची हुई नौ अक्षौहिणी सेना उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ी थी। वे स्वयं तो युद्धका हौसला रखते ही थे, कृपाचार्य और कर्ण भी सदा उनकी रक्षा करते रहते थे ।। १४ ।। धृष्टद्युम्नस्त्वभून्नेता पाण्डवानां महास्त्रवित् । गुप्तो भीमेन मेधावी मित्रेण वरुणो यथा ।। १५ ।। इधर महान् अस्त्रवेत्ता धृष्टद्युम्न पाण्डवसेनाके अधिनायक हुए। जैसे मित्र वरुणकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार भीमसेन मेधावी धृष्टद्युम्नकी रक्षा करने लगे ।। १५ ।। स च सेनापरिवृतो द्रोणप्रेप्सुर्महामनाः । पितुर्निकारान् संस्मृत्य रणे कर्माकरोन्महत् ।। १६ ।। पाण्डवसेनासे घिरे हुए महामनस्वी वीर धृष्टद्युम्नने द्रोणके द्वारा अपने पिताके अपमानका स्मरण करके उन्हें मार डालनेके लिये युद्धमें बड़ा भारी पराक्रम दिखाया ।। १६ ।। तस्मिंस्ते पृथिवीपाला द्रोणपार्षतसंगरे । नानादिगागता वीराः प्रायशो निधनं गताः ।। १७ ।। धृष्टद्युम्न और द्रोणके उस भीषण संग्राममें नाना दिशाओंसे आये हुए भूपाल अधिक संख्यामें मारे गये ।। १७ ।। दिनानि पञ्च तद् युद्धमभूत् परमदारुणम् । ततो द्रोणः परिश्रान्तो धृष्टद्युम्नवशं गतः ।। १८ ।। उन दोनोंका वह परम दारुण युद्ध पाँच दिनोंतक चलता रहा। अन्तमें द्रोणाचार्य बहुत थक गये और धृष्टद्युम्नके वशमें पड़कर मारे गये ।। १८ ।। ततः सेनापतिरभूत् कर्णो दौर्योधने बले । अक्षौहिणीभिः शिष्टाभिर्वृतः पञ्चभिराहवे ।। १९ ।। तत्पश्चात् दुर्योधनकी सेनामें कर्णको सेनापति बनाया गया, जो मरनेसे बची हुए पाँच अक्षौहिणी सेनाओंसे घिरकर युद्धके मैदानमें खड़ा था ।। १९ ।। तिस्रस्तु पाण्डुपुत्राणां चम्वो बीभत्सुपालिताः । हतप्रवीरभूयिष्ठा बभूवुः समवस्थिताः ।। २० ।। उस समय पाण्डवोंके पास तीन अक्षौहिणी सेनाएँ शेष थीं, जिनकी रक्षा अर्जुन कर रहे थे। उनमें बहुत-से प्रमुख वीर मारे गये थे; फिर भी वे युद्धके लिये डटी हुई थीं ।। २० ।। ततः पार्थं समासाद्य पतङ्ग इव पावकम् । पञ्चत्वमगमत् सौतिर्द्वितीयेऽहनि दारुणः ।। २१ ।।

कर्ण दो दिनतक युद्ध करता रहा। वह बड़े क्रूर स्वभावका था। जैसे पतंग जलती आगमें कूदकर जल मरता है, उसी प्रकार वह दूसरे दिनके युद्धमें अर्जुनसे भिड़कर मारा गया ॥ २१ ॥ हते कर्णे तु कौरव्या निरुत्साहा हतौजसः । अक्षौहिणीभिस्तिसृभिर्मद्रेशं पर्यवारयन् ॥ २२ ॥ कर्णके मारे जानेपर कौरव हतोत्साह होकर अपनी शक्ति खो बैठे और मद्रराज शल्यको सेनापति बनाकर उन्हें तीन अक्षौहिणी सेनाओंसे सुरक्षित रखकर उन्होंने युद्ध आरम्भ किया ॥ २२ ॥ हतवाहनभूयिष्ठाः पाण्डवाऽपि युधिष्ठिरम् । अक्षौहिण्या निरुत्साहाः शिष्टया पर्यवारयन् ॥ २३ ॥ पाण्डवोंके भी बहुत-से वाहन नष्ट हो गये थे। उनमें भी अब युद्धविषयक उत्साह नहीं रह गया था तो भी वे शेष बची हुई एक अक्षौहिणी सेनासे घिरे हुए युधिष्ठिरको आगे करके शल्यका सामना करनेके लिये बढ़े ॥ २३ ॥ अवधीन्मद्रराजानं कुरुराजो युधिष्ठिरः । तस्मिंस्तदार्धदिवसे कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥ २४ ॥ कुरुराज युधिष्ठिरने अत्यन्त दुष्कर पराक्रम करके दोपहर होते-होते मद्रराज शल्यको मार गिराया ॥ २४ ॥ हते शल्ये तु शकुनिं सहदेवो महामनाः । आहर्तारं कलेस्तस्य जघानामितविक्रमः ॥ २५ ॥ शल्यके मारे जानेपर अमित पराक्रमी महामना सहदेवने कलहकी नींव डालनेवाले शकुनिको मार दिया ॥ २५ ॥ निहते शकुनौ राजा धार्तराष्ट्रः सुदुर्मनाः । अपाक्रामद् गदापाणिर्हतभूयिष्ठसैनिकः ॥ २६ ॥ शकुनिकी मृत्यु हो जानेपर राजा दुर्योधनके मनमें बड़ा दुःख हुआ। उसके बहुत-से सैनिक युद्धमें मार डाले गये थे। इसलिये वह अकेला ही हाथमें गदा लेकर रणभूमिसे भाग निकला ॥ २६ ॥ तमन्वधावत् संक्रुद्धो भीमसेनः प्रतापवान् । ह्रदे द्वैपायने चापि सलिलस्थं ददर्श तम् ॥ २७ ॥ इधरसे अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए प्रतापी भीमसेनने उसका पीछा किया और द्वैपायन नामक सरोवरमें पानीके भीतर छिपे हुए दुर्योधनका पता लगा लिया ॥ २७ ॥ हतशिष्टेन सैन्येन समन्तात् परिवार्य तम् । अथोपविविशुर्हृष्टा ह्रदस्थं पञ्च पाण्डवाः ॥ २८ ॥

तदनन्तर हर्षमें भरे हुए पाँचों पाण्डव मरनेसे बची हुई सेनाके द्वारा उसपर चारों ओरसे घेरा डालकर तालाबमें बैठे हुए दुर्योधनके पास जा पहुँचे ॥ २८ ॥ विगाह्य सलिलं त्वाशु वाग्बाणैर्भृशविक्षतः । उत्थाय स गदापाणिर्युद्धाय समुपस्थितः ॥ २९ ॥ उस समय भीमसेनके वाग्बाणोंसे अत्यन्त घायल होकर दुर्योधन तुरंत पानीसे बाहर निकला और हाथमें गदा ले युद्धके लिये उद्यत हो पाण्डवोंके पास आ गया ॥ २९ ॥ ततः स निहतो राजा धार्तराष्ट्रो महारणे । भीमसेनेन विक्रम्य पश्यतां पृथिवीक्षिताम् ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् उस महासमरमें सब राजाओंके देखते-देखते भीमसेनने पराक्रम करके धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधनको मार डाला ॥ ३० ॥ ततस्तत् पाण्डवं सैन्यं प्रसुप्तं शिबिरे निशि । निहतं द्रोणपुत्रेण पितुर्वधममृष्यता ॥ ३१ ॥ इसके बाद रातके समय जब पाण्डवोंकी सेना अपनी छावनीमें निश्चिन्त सो रही थी, उसी समय द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने अपने पिताके वधको न सह सकनेके कारण आक्रमण किया और सबको मार गिराया ॥ ३१ ॥ हतपुत्रा हतबला हतमित्रा मया सह । युयुधानसहायेन पञ्च शिष्टास्तु पाण्डवाः ॥ ३२ ॥ उस समय पाण्डवोंके पुत्र, मित्र और सैनिक सब मारे गये। केवल मेरे और सात्यकिके साथ पाँचों पाण्डव शेष रह गये हैं ॥ ३२ ॥ सहैव कृपभोजाभ्यां द्रौणिर्युद्धादमुच्यत । युयुत्सुश्चापि कौरव्यो मुक्तःपाण्डवसंश्रयात् ॥ ३३ ॥ कौरवोंके पक्षमें कृपाचार्य और कृतवर्माके साथ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा युद्धसे जीवित बचा है। कुरुवंशी युयुत्सु भी पाण्डवोंका आश्रय लेनेके कारण बच गये हैं ॥ ३३ ॥ निहते कौरवेन्द्रे तु सानुबन्धे सुयोधने । विदुरः संजयश्चैव धर्मराजमुपस्थितौ ॥ ३४ ॥ बन्धु-बान्धवोंसहित कौरवराज दुर्योधनके मारे जानेपर विदुर और संजय धर्मराज युधिष्ठिरके आश्रयमें आ गये हैं ॥ ३४ ॥ एवं तदभवद् युद्धमहान्यष्टादश प्रभो । यत्र ते पृथिवीपाला निहताः स्वर्गमावसन् ॥ ३५ ॥ प्रभो! इस प्रकार अठारह दिनोंतक वह युद्ध हुआ है। उसमें जो राजा मारे गये हैं, वे स्वर्गलोकमें जा बसे हैं ॥ ३५ ॥ वैशम्पायन उवाच

शृण्वतां तु महाराज कथां तां लोमहर्षणाम् । दुःखशोकपरिक्लेशा वृष्णीनामभवंस्तदा ॥ ३६ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! रोंगटे खड़े कर देनेवाली उस युद्ध-वार्ताको सुनकर वृष्णिवंशी लोग दुःख-शोकसे व्याकुल हो गये ॥ ३६ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वासुदेववाक्ये षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६० ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णद्वारा युद्धवृत्तान्तका कथनविषयक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६० ॥

एकषष्टितमोऽध्यायः

श्रीकृष्णका सुभद्राके कहनेसे वसुदेवजीको अभिमन्युवधका वृत्तान्त सुनाना

वैशम्पायन उवाच कथयन्नेव तु तदा वासुदेवः प्रतापवान् । महाभारतयुद्धं तत्कथान्ते पितुरग्रतः ॥ १ ॥ अभिमन्योर्वधं वीरः सोऽत्यक्रामन्महामतिः । अप्रियं वसुदेवस्य मा भूदिति महामतिः ॥ २ ॥ मा दौहित्रवधं श्रुत्वा वसुदेवो महात्ययम् । दुःखशोकाभिसंतप्तो भवेदिति महामतिः ॥ ३ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! प्रतापी वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण जब पिताके सामने महाभारतयुद्धका वृत्तान्त सुना रहे थे, उस समय उन्होंने उस कथाके बीचमें जान-बूझकर अभिमन्युवधका वृत्तान्त छोड़ दिया। परम बुद्धिमान् वीर श्रीकृष्णने सोचा, पिताजी अपने नातीकी मृत्युका महान् अमंगलजनक समाचार सुनकर कहीं दुःख-शोकसे संतप्त न हो उठें। इनका अप्रिय न हो जाय। इसीसे वह प्रसंग नहीं सुनाया ॥ १—३ ॥ सुभद्रा तु तमुत्क्रान्तमात्मजस्य वधं रणे । आचक्ष्व कृष्ण सौभद्रवधमित्यपतद् भुवि ॥ ४ ॥ परन्तु सुभद्राने जब देखा कि मेरे पुत्रके निधनका समाचार इन्होंने नहीं सुनाया, तब उसने याद दिलाते हुए कहा—‘भैया! मेरे अभिमन्युके वधकी बात भी तो बता दो।’ इतना कहकर वह मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ४ ॥ तामपश्यन्निपतितां वसुदेवः क्षितौ तदा । दृष्ट्वैव च पपातोर्व्यां सोऽपि दुःखेन मूर्च्छितः ॥ ५ ॥ वसुदेवजीने बेटी सुभद्राको पृथ्वीपर गिरी हुई देखा। देखते ही वे भी दुःखसे मूर्च्छित हो धरतीपर गिर पड़े ॥ ५ ॥ ततः स दौहित्रवधदुःखशोकसमाहतः । वसुदेवो महाराज कृष्णं वाक्यमथाब्रवीत् ॥ ६ ॥ महाराज! तदनन्तर दौहित्रवधके दुःख-शोकसे आहत हो वसुदेवजीने श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— ॥ ६ ॥ ननु त्वं पुण्डरीकाक्ष सत्यवाग् भुवि विश्रुतः ॥ ७ ॥ यद् दौहित्रवधं मेऽद्य न ख्यापयसि शत्रुहन् ।

तद् भागिनेयनिधनं तत्त्वेनाचक्ष्व मे प्रभो ॥ ८ ॥ 'बेटा कमलनयन! तुम तो इस भूतलपर सत्यवादीके रूपमें प्रसिद्ध हो। शत्रुसूदन! फिर क्या कारण है कि आज तुम मुझे मेरे नातीके मारे जानेका समाचार नहीं बता रहे हो। प्रभो! अपने भानजेके वधका वृत्तान्त तुम मुझे ठीक-ठीक बताओ ॥ ७-८ ॥ सदृशाक्षस्तव कथं शत्रुभिर्निहतो रणे । दुर्मरं बत वार्ष्णेय कालेऽप्राप्ते नृभिः सह ॥ ९ ॥ यत्र मे हृदयं दुःखाच्छतधा न विदीर्यते । 'वृष्णिनन्दन! अभिमन्युकी आँखें ठीक तुम्हारे ही समान सुन्दर थीं। हाय! वह रणभूमिमें शत्रुओंद्वारा कैसे मारा गया? जान पड़ता है, समय पूरा होनेके पहले मनुष्यके लिये मरना अत्यन्त कठिन होता है, तभी तो यह दारुण समाचार सुनकर भी दुःखसे मेरे हृदयके सैकड़ों टुकड़े नहीं हो जाते हैं ॥ ९ १/२ ॥ किमब्रवीत् त्वां संग्रामे सुभद्रां मातरं प्रति ॥ १० ॥ मां चापि पुण्डरीकाक्ष चपलाक्षः प्रियो मम । आहवं पृष्ठतः कृत्वा कच्चिन्न निहतः परैः ॥ ११ ॥ कच्चिन्मुखं न गोविन्द तेनाजौ विकृतं कृतम् । 'पुण्डरीकाक्ष! संग्राममें अभिमन्युने तुमको और अपनी माता सुभद्राको क्या संदेश दिया था? चंचल नेत्रोंवाला वह मेरा प्यारा नाती मेरे लिये क्या संदेश देकर मरा था? कहीं वह युद्धमें पीठ दिखाकर तो शत्रुओंके हाथसे नहीं मारा गया? गोविन्द! उसने युद्धमें भयके कारण अपना मुख विकृत तो नहीं कर लिया था ॥ १०-११ ॥ स हि कृष्ण महातेजाः श्लाघन्निव ममाग्रतः ॥ १२ ॥ बालभावेन विनयमात्मनोऽकथयत् प्रभुः । 'श्रीकृष्ण! वह महातेजस्वी और प्रभावशाली बालक अपने बालस्वभावके कारण मेरे सामने विनीतभावसे अपनी वीरताकी प्रशंसा किया करता था ॥ १२ १/२ ॥ कच्चिन्न निकृतो बालो द्रोणकर्णकृपादिभिः ॥ १३ ॥ धरण्यां निहतः शेते तन्ममाचक्ष्व केशव । स हि द्रोणं च भीष्मं च कर्णं च बलिनां वरम् ॥ १४ ॥ स्पर्धते स्म रणे नित्यं दुहितुः पुत्रको मम । 'मेरी बेटीका वह लाड़ला अभिमन्यु रणभूमिमें सदा द्रोणाचार्य, भीष्म तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ कर्णके साथ भी लोहा लेनेका हौसला रखता था। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि द्रोण, कर्ण और कृपाचार्य आदिने मिलकर उस बालकको कपटपूर्वक मार डाला हो और इस प्रकार धोखेसे मारा जाकर धरतीपर सो रहा हो। केशव! यह सब मुझे बताओ' ॥ १३-१४ १/२ ॥ एवंविधं बहु तदा विलपन्तं सुदुःखितम् ॥ १५ ॥

पितरं दुःखिततरो गोविन्दो वाक्यमब्रवीत् । इस प्रकार पिताको अत्यन्त दुःखित होकर बहुत विलाप करते देख श्रीकृष्ण स्वयं भी बहुत दुःखी हो गये और उन्हें सान्त्वना देते हुए इस प्रकार बोले— ।। १५१/२ ।। न तेन विकृतं वक्त्रं कृतं संग्राममूर्धनि ।। १६ ।। न पृष्ठतः कृतश्चापि संग्रामस्तेन दुस्तरः । 'पिताजी! अभिमन्युने संग्राममें आगे रहकर शत्रुओंका सामना किया। उसने कभी भी अपना मुख विकृत नहीं किया। उस दुस्तर युद्धमें उसने कभी पीठ नहीं दिखायी ।। १६१/२ ।। निहत्य पृथिवीपालान् सहस्रशतसंघशः ।। १७ ।। खेदितो द्रोणकर्णाभ्यां दौःशासनिवशं गतः । 'लाखों राजाओंके समूहोंको मारकर द्रोण और कर्णके साथ युद्ध करते-करते जब वह बहुत थक गया, उस समय दुःशासनके पुत्रके द्वारा मारा गया ।। १७१/२ ।। एको ह्येकेन सततं युध्यमाने यदि प्रभो ।। १८ ।। न स शक्येत संग्रामे निहन्तुमपि वज्रिणा । 'प्रभो! यदि निरन्तर उसे एक-एक वीरके साथ ही युद्ध करना पड़ता तो रणभूमिमें वज्रधारी इन्द्र भी उसे नहीं मार सकते थे (परन्तु वहाँ तो बात ही दूसरी हो गयी) ।। १८१/२ ।। समाहृते च संग्रामात् पार्थे संशप्तकैस्तदा ।। १९ ।। पर्यावार्यत संक्रुद्धैः स द्रोणादिभिराहवे । 'अर्जुन संशप्तकोंके साथ युद्ध करते हुए संग्राम-भूमिसे बहुत दूर हट गये थे। इस अवसरसे लाभ उठाकर क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्य आदि कई वीरोंने मिलकर उस बालकको चारों ओरसे घेर लिया ।। १९१/२ ।। ततः शत्रुवधं कृत्वा सुमहान्तं रणे पितः ।। २० ।। दौहित्रस्तव वार्ष्णेय दौःशासनिवशं गतः । 'वृष्णिकुल भूषण पिताजी! तो भी शत्रुओंका बड़ा भारी संहार करके आपका वह दौहित्र युद्धमें दुःशासन-कुमारके अधीन हुआ ।। २०१/२ ।। नूनं च स गतः स्वर्गं जहि शोकं महामते ।। २१ ।। न हि व्यसनमासाद्य सीदन्ति कृतबुद्धयः । 'महामते! अभिमन्यु निश्चय ही स्वर्गलोकमें गया है; अतः आप उसके लिये शोक न कीजिये। पवित्र बुद्धिवाले साधु पुरुष संकटमें पड़नेपर भी इतने खिन्न नहीं होते हैं ।। २११/२ ।। द्रोणकर्णप्रभृतयो येन प्रतिसमासिताः ।। २२ ।। रणे महेन्द्रप्रतिमाः स कथं नाप्नुयाद् दिवम् ।

'जिसने इन्द्रके समान पराक्रमी द्रोण, कर्ण आदि वीरोंका युद्धमें डटकर सामना किया है, उसे स्वर्गकी प्राप्ति कैसे नहीं होगी? ।। २२ १/२ ।। स शोकं जहि दुर्धर्ष मा च मन्युवशं गमः ।। २३ ।। शस्त्रपूतां हि स गतिं गतः परपुरंजयः । 'दुर्धर्ष वीर पिताजी! इसलिये आप शोक त्याग दीजिये! शोकके वशीभूत न होइये। शत्रुओंके नगरपर विजय पानेवाला वीरवर अभिमन्यु शस्त्राघातसे पवित्र हो उत्तम गतिको प्राप्त हुआ है ।। २३ १/२ ।। तस्मिंस्तु निहते वीरे सुभद्रेयं स्वसा मम ।। २४ ।। दुःखार्ताथो सुतं प्राप्य कुररीव ननाद ह । द्रौपदीं च समासाद्य पर्यपृच्छत दुःखिता ।। २५ ।। आर्ये क्व दारकाः सर्वे द्रष्टुमिच्छामि तानहम् । 'उस वीरके मारे जानेपर मेरी यह बहिन सुभद्रा दुःखसे आतुर हो पुत्रके पास जाकर कुररीकी भाँति विलाप करने लगी और द्रौपदीके पास जाकर दुःखमग्न हो पूछने लगी —'आर्ये! सब बच्चे कहाँ हैं? मैं उन सबको देखना चाहती हूँ' ।। २४-२५ १/२ ।। अस्यास्तु वचनं श्रुत्वा सर्वास्ताः कुरुयोषितः ।। २६ ।। भुजाभ्यां परिगृह्यैनां चुक्रुशुः परमार्तवत् ।। २७ ।। 'इसकी बात सुनकर कुरुकुलकी सारी स्त्रियाँ इसे दोनों हाथोंसे पकड़कर अत्यन्त आर्त-सी होकर करुण विलाप करने लगीं ।। २६-२७ ।। उत्तरां चाब्रवीद् भद्रे भर्ता स क्व नु ते गतः । क्षिप्रमागमनं मह्यं तस्य त्वं वेदयस्व ह ।। २८ ।। 'सुभद्राने उत्तरासे भी पूछा—'भद्रे! तुम्हारा पति वह अभिमन्यु कहाँ चला गया? तुम शीघ्र उसे मेरे आगमनकी सूचना दो ।। २८ ।। ननु नामाद्य वैराटि श्रुत्वा मम गिरं सदा । भवनान्निष्पतत्याशु कस्मान्नाभ्येति ते पतिः ।। २९ ।। 'विराटकुमारी! जो सदा मेरी आवाज सुनकर शीघ्र घरसे निकल पड़ता था, वही तुम्हारा पति आज मेरे पास क्यों नहीं आता है? ।। २९ ।। अभिमन्यो कुशलिनो मातुलास्ते महारथाः । कुशलं चाब्रुवन् सर्वे त्वां युयुत्सुमिहागतम् ।। ३० ।। 'अभिमन्यो! तुम्हारे सभी महारथी मामा सकुशल हैं और युद्धकी इच्छासे यहाँ आये हुए तुमसे उन सबने तुम्हारा कुशल-समाचार पूछा है ।। ३० ।। आचक्ष्व मेऽद्य संग्रामं यथापूर्वमरिंदम । कस्मादेवं विलपतीं नाद्येह प्रतिभाषसे ।। ३१ ।।

‘शत्रुदमन! पहलेकी भाँति आज भी तुम मुझे युद्धकी बात बताओ। मैं इस प्रकार विलाप करती हूँ तो भी आज यहाँ तुम मुझसे बात क्यों नहीं करते हो?’ ।। ३१ ।। एवमादि तु वार्ष्णेय्यास्तस्यास्तत्परिदेवितम् । श्रुत्वा पृथा सुदुःखार्ता शनैर्वाक्यमथाब्रवीत् ।। ३२ ।। सुभद्रे वासुदेवेन तथा सात्यकिना रणे । पित्रा च लालितो बालः स हतः कालधर्मणा ।। ३३ ।। ‘सुभद्राका इस प्रकार विलाप सुनकर अत्यन्त दुःखसे आतुर हुई बुआ कुन्तीने शनैः- शनैः उसे समझाते हुए कहा—‘सुभद्रे! वासुदेव, सात्यकि और पिता अर्जुन—तीनों जिसका बहुत लाड़-प्यार करते थे, वह बालक अभिमन्यु कालधर्मसे मारा गया है (उसकी आयु पूरी हो गयी, इसलिये मृत्युके अधीन हुआ है) ।। ३२-३३ ।। ईदृशो मर्त्यधर्मोऽयं मा शुचो यदुनन्दिनि । पुत्रो हि तव दुर्धर्षः सम्प्राप्तः परमां गतिम् ।। ३४ ।। ‘यदुनन्दिनि! मृत्युलोकमें जन्म लेनेवाले मनुष्योंका धर्म ही ऐसा है—उन्हें एक-न-एक दिन मृत्युके वशमें होना ही पड़ता है, इसलिये शोक न करो। तुम्हारा दुर्जय पुत्र परम गतिको प्राप्त हुआ है ।। ३४ ।। कुले महति जातासि क्षत्रियाणां महात्मनाम् । मा शुचश्चपलाक्षं त्वं पद्मपत्रनिभेक्षणे ।। ३५ ।। “बेटी! कमलदललोचने! तुम महात्मा क्षत्रियोंके महान् कुलमें उत्पन्न हुई हो; अतः तुम अपने चंचल नेत्रोंवाले पुत्रके लिये शोक न करो ।। ३५ ।। उत्तरां त्वमवेक्षस्व गुर्विणीं मा शुचः शुभे । पुत्रमेषा हि तस्याशु जनयिष्यति भाविनी ।। ३६ ।। “शुभे! तुम्हारी बहू उत्तरा गर्भवती है, तुम उसीकी ओर देखो, शोक न करो। वह भाविनी उत्तरा शीघ्र ही अभिमन्युके पुत्रको जन्म देगी” ।। ३६ ।। एवमाश्वासयित्वैनां कुन्ती यदुकुलोद्वह । विहाय शोकं दुर्धर्षं श्राद्धमस्य ह्यकल्पयत् ।। ३७ ।। ‘यदुकुलभूषण पिताजी! इस प्रकार सुभद्राको समझा-बुझाकर दुस्तर शोकको त्यागकर कुन्तीने उसके श्राद्धकी तैयारी करायी ।। ३७ ।। समनुज्ञाप्य धर्मज्ञं राजानं भीममेव च । यमौ यमोपमौ चैव ददौ दानान्यनेकnames -> दानान्यनेकशः ।। ३८ ।। ‘धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिर और भीमसेनको आदेश देकर तथा यमके समान पराक्रमी नकुल-सहदेवको भी आज्ञा देकर कुन्तीदेवीने अभिमन्युके उद्देश्यसे अनेक प्रकारके दान दिलाये ।। ३८ ।। ततः प्रदाय बह्वीर्गा ब्राह्मणाय यदूद्वह ।

समाहृष्य तु वार्ष्णेयी वैराटीमब्रवीदिदम् ।। ३९ ।। 'यदुकुलभूषण! तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको बहुत-सी गौएँ दान देकर कुन्तीने विराटकुमारी उत्तरासे कहा— ।। ३९ ।। वैराटि नेह संतापस्त्वया कार्यो ह्यनिन्दिते । भर्तारं प्रति सुश्रोणि गर्भस्थं रक्ष वै शिशुम् ।। ४० ।। 'अनिन्द्य गुणोंवाली विराटराजकुमारी! अब तुम्हें यहाँ पतिके लिये संताप नहीं करना चाहिये। सुन्दरि! तुम्हारे गर्भमें जो अभिमन्युका बालक है, उसकी रक्षा करो' ।। ४० ।। एवमुक्त्वा ततः कुन्ती विरराम महाद्युते । तामनुज्ञाप्य चैवेमां सुभद्रां समुपानयम् ।। ४१ ।। 'महाद्युते! ऐसा कहकर कुन्तीदेवी चुप हो गयीं। उन्हींकी आज्ञासे मैं इस सुभद्रा देवीको साथ लाया हूँ ।। ४१ ।। एवं स निधनं प्राप्तो दौहित्रस्तव मानद । संतापं त्यज दुर्धर्ष मा च शोके मनः कृथाः ।। ४२ ।। 'मानद! इस प्रकार आपका दौहित्र अभिमन्यु मृत्युको प्राप्त हुआ है। दुर्धर्ष वीर! आप संताप छोड़ दें और मनको शोकमग्न न करें' ।। ४२ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वसुदेवसान्त्वने एकषष्टितमोऽध्यायः ।। ६१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें वसुदेवको सान्त्वनाविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६१ ।।

द्विषष्टितमोऽध्यायः वसुदेव आदि यादवोंका अभिमन्युके निमित्त श्राद्ध करना तथा व्यासजीका उत्तरा और अर्जुनको समझाकर युधिष्ठिरको अश्वमेधयज्ञ करनेकी आज्ञा देना वैशम्पायन उवाच एतच्छ्रुत्वा तु पुत्रस्य वचः शूरात्मजस्तदा । विहाय शोकं धर्मात्मा ददौ श्राद्धमनुत्तमम् ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपने पुत्र श्रीकृष्णकी बात सुनकर शूरपुत्र धर्मात्मा वसुदेवजीने शोक त्याग दिया और अभिमन्युके लिये परम उत्तम श्राद्धविषयक दान दिया ॥ १ ॥ तथैव वासुदेवश्च स्वस्त्रीयस्य महात्मनः । दयितस्य पितुर्नित्यमकरोदौर्ध्वदेहिकम् ॥ २ ॥ इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने भी अपने महामनस्वी भानजे अभिमन्युका, जो उनके पिता वसुदेवजीका सदा ही परम प्रिय रहा, श्राद्धकर्म सम्पन्न किया ॥ २ ॥ षष्टिं शतसहस्राणि ब्राह्मणानां महौजसाम् । विधिवद् भोजयामास भोज्यं सर्वगुणान्वितम् ॥ ३ ॥ उन्होंने साठ लाख महातेजस्वी ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक सर्वगुणसम्पन्न उत्तम अन्न भोजन कराया ॥ ३ ॥ आच्छाद्य च महाबाहुर्धनतृष्णामपानुदत् । ब्राह्मणानां तदा कृष्णस्तदभूल्लोमहर्षणम् ॥ ४ ॥ महाबाहु श्रीकृष्णने उस समय ब्राह्मणोंको वस्त्र पहनाकर इतना धन दिया, जिससे उनकी धनविषयक तृष्णा दूर हो गयी। यह एक रोमांचकारी घटना थी ॥ ४ ॥ सुवर्णं चैव गाश्चैव शयनाच्छादनानि च । दीयमानं तदा विप्रा वर्धतामिति चाब्रुवन् ॥ ५ ॥ ब्राह्मणलोग सुवर्ण, गौ, शय्या और वस्त्रका दान पाकर अभ्युदय होनेका आशीर्वाद देने लगे ॥ ५ ॥ वासुदेवोऽथ दाशार्हो बलदेवः ससात्यकिः । अभिमन्योस्तदा श्राद्धमकुर्वन् सत्यकस्तदा ॥ ६ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण, बलदेव, सत्यक और सात्यकिने भी उस समय अभिमन्युका श्राद्ध किया ॥ ६ ॥

अतीव दुःखसंतप्ता न शमं चोपलेभिरे । तथैव पाण्डवा वीरा नगरे नागसाह्वये ॥ ७ ॥ नोपागच्छन्त वै शान्तिमभिमन्युविनाकृताः । वे सबके सब अत्यन्त दुःखसे संतप्त थे। उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी। उसी प्रकार हस्तिनापुरमें वीर पाण्डव भी अभिमन्युसे रहित होकर शान्ति नहीं पाते थे ॥ ७ १/२ ॥ सुबहूनि च राजेन्द्र दिवसानि विराटजा ॥ ८ ॥ नाभुङ्क्त पतिदुःखार्ता तदभूत् करुणं महत् । कुक्षिस्थ एव तस्याथ गर्भो वै सम्प्रलीयत ॥ ९ ॥ राजेन्द्र! विराटकुमारी उत्तराने पतिके दुःखसे आतुर हो बहुत दिनोंतक भोजन ही नहीं किया। उसकी वह दशा बड़ी ही करुणाजनक थी। उसके गर्भका बालक उदरहीमें पड़ा- पड़ा क्षीण होने लगा ॥ ८-९ ॥ आजगाम ततो व्यासो ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा । समागम्याब्रवीद् धीमान् पृथां पृथुलोचनाम् ॥ १० ॥ उत्तरां च महातेजाः शोकः संत्यज्यतामयम् । भविष्यति महातेजाः पुत्रस्तव यशस्विनि ॥ ११ ॥ उसकी इस दशाको दिव्य दृष्टिसे जानकर महान् तेजस्वी बुद्धिमान् महर्षि व्यास वहाँ आये और विशाल नेत्रोंवाली कुन्ती तथा उत्तरासे मिलकर उन्हें समझाते हुए इस प्रकार बोले—'यशस्विनि उत्तरे! तुम यह शोक त्याग दो। तुम्हारा पुत्र महातेजस्वी होगा ॥ १०-११ ॥

प्रभावाद् वासुदेवस्य मम व्याहरणादपि । पाण्डवानामयं चान्ते पालयिष्यति मेदिनीम् ॥ १२ ॥ ‘भगवान् श्रीकृष्णके प्रभावसे और मेरे आशीर्वादसे वह पाण्डवोंके बाद सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन करेगा’ ॥ १२ ॥ धनंजयं च सम्प्रेक्ष्य धर्मराजस्य शृण्वतः । व्यासो वाक्यमुवाचेदं हर्षयन्निव भारत ॥ १३ ॥ भारत! तत्पश्चात् व्यासजीने धर्मराज युधिष्ठिरको सुनाते हुए अर्जुनकी ओर देखकर उनका हर्ष बढ़ाते हुए-से कहा— ॥ १३ ॥ पौत्रस्तव महाभागो जनिष्यति महामनाः । पृथ्वीं सागरपर्यन्तां पालयिष्यति धर्मतः ॥ १४ ॥ तस्माच्छोकं कुरुश्रेष्ठ जहि त्वमरिकर्शन । विचार्यमत्र न हि ते सत्यमेतद् भविष्यति ॥ १५ ॥ ‘कुरुश्रेष्ठ! तुम्हें महान् भाग्यशाली और महामनस्वी पौत्र होनेवाला है, जो समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीका धर्मतः पालन करेगा; अतः शत्रुसूदन! तुम शोक त्याग दो। इसमें कुछ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है। मेरा यह कथन सत्य होगा ॥ १४-१५ ॥

यच्चापि वृष्णिवीरेण कृष्णेन कुरुनन्दन । पुरोक्तं तत् तथा भावि मा तेऽत्रास्तु विचारणा ॥ १६ ॥ ‘कुरुनन्दन! वृष्णिवंशके वीर पुरुष भगवान् श्रीकृष्णने पहले जो कुछ कहा है, वह सब वैसा ही होगा। इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’ ॥ १६ ॥ विबुधानां गतो लोकानक्षयानात्मनिर्जितान् । न स शोच्यस्त्वया वीरो न चान्यैः कुरुभिस्तथा ॥ १७ ॥ ‘वीर अभिमन्यु अपने पराक्रमसे उपार्जित किये हुए देवताओंके अक्षय लोकोंमें गया है; अतः उसके लिये तुम्हें या अन्य कुरुवंशियोंको क्षोभ नहीं करना चाहिये’ ॥ १७ ॥ एवं पितामहेनोक्तो धर्मात्मा स धनंजयः । त्यक्त्वा शोकं महाराज हृष्टरूपोऽभवत् तदा ॥ १८ ॥ महाराज! अपने पितामह व्यासजीके द्वारा इस प्रकार समझाये जानेपर धर्मात्मा अर्जुनने शोक त्यागकर संतोषका आश्रय लिया ॥ १८ ॥ पितापि तव धर्मज्ञ गर्भे तस्मिन् महामते । अवर्धत यथाकामं शुक्लपक्षे यथा शशी ॥ १९ ॥ धर्मज्ञ! महामते! उस समय तुम्हारे पिता परीक्षित् शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति यथेष्ट वृद्धि पाने लगे ॥ १९ ॥ ततः संचोदयामास व्यासो धर्मात्मजं नृपम् । अश्वमेधं प्रति तदा ततः सोऽन्तर्हितोऽभवत् ॥ २० ॥ तदनन्तर व्यासजीने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञ करनेके लिये आज्ञा दी और स्वयं वहाँसे अदृश्य हो गये ॥ २० ॥ धर्मराजोऽपि मेधावी श्रुत्वा व्यासस्य तद् वचः । वित्तस्यानयने तात चकार गमने मतिम् ॥ २१ ॥ तात! व्यासजीका वचन सुनकर बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने धन लानेके लिये हिमालयकी यात्रा करनेका विचार किया ॥ २१ ॥ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वासुदेवसान्त्वने द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णकी सान्त्वनाविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥

त्रिषष्टितमोऽध्यायः युधिष्ठिरका अपने भाइयोंके साथ परामर्श करके सबको साथ ले धन ले आनेके लिये प्रस्थान करना जनमेजय उवाच श्रुत्वैतद् वचनं ब्रह्मन् व्यासेनोक्तं महात्मना । अश्वमेधं प्रति तदा किं भूयः प्रचकार ह ॥ १ ॥ रत्नं च यन्मरुत्तेन निहितं वसुधातले । तदवाप कथं चेति तन्मे ब्रूहि द्विजोत्तम ॥ २ ॥ जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! महात्मा व्यासका कहा हुआ यह वचन सुनकर राजा युधिष्ठिरने अश्वमेध यज्ञके सम्बन्धमें फिर क्या किया? राजा मरुत्तने जो रत्न पृथ्वीतलपर रख छोड़ा था, उसे उन्होंने किस प्रकार प्राप्त किया? द्विजश्रेष्ठ! यह सब मुझे बताइये ॥ १-२ ॥ वैशम्पायन उवाच श्रुत्वा द्वैपायनवचो धर्मराजो युधिष्ठिरः । भ्रातृन् सर्वान् समानाय्य काले वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥ अर्जुनं भीमसेनं च माद्रीपुत्रौ यमावपि । वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! व्यासजीकी बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव—इन सभी भाइयोंको बुलवाकर यह समयोचित वचन कहा— ॥ ३ १/२ ॥ श्रुतं वो वचनं वीराः सौहृदाद् यन्महात्मना ॥ ४ ॥ कुरूणां हितकामेन प्रोक्तं कृष्णेन धीमता । ‘वीर बन्धुओ! कौरवोंके हितकी कामना रखनेवाले बुद्धिमान् महात्मा श्रीकृष्णने सौहार्दवश जो बात कही थी, वह सब तो तुमने सुनी ही थी ॥ ४ १/२ ॥ तपोवृद्धेन महता सुहृदां भूतिमिच्छता ॥ ५ ॥ गुरुणा धर्मशीलेन व्यासेनाद्भुतकर्मणा । भीष्मेण च महाप्राज्ञा गोविन्देन च धीमता ॥ ६ ॥ संस्मृत्य तदहं सम्यक् कर्तुमिच्छामि पाण्डवाः । आयत्यां च तदात्वे च सर्वेषां तद्धि नो हितम् ॥ ७ ॥ ‘सुहृदोंकी भलाई चाहनेवाले महान् तपोवृद्ध महात्मा धर्मशील गुरु व्यासने, अद्भुत पराक्रमी भीष्मने तथा बुद्धिमान् गोविन्दने समय-समयपर जो सलाह दी है, उसे याद करके

मैं उनके आदेशका भलीभाँति पालन करना चाहता हूँ। महाप्राज्ञ पाण्डवो! उन महात्माओंका यह वचन भविष्य और वर्तमानमें भी हम सबके लिये हितकारक है ॥ ५— ७॥ अनुबन्धे च कल्याणं यद् वचो ब्रह्मवादिनः । इयं हि वसुधा सर्वा क्षीणरत्ना कुरूद्वहाः ॥ ८ ॥ तच्चाचष्ट तदा व्यासो मरुत्तस्य धनं नृपाः । 'ब्रह्मवादी महात्मा व्यासजीका वचन परिणाममें हमारा कल्याण करनेवाला है। कौरवो! इस समय इस सारी पृथिवीपर रत्न एवं धनका नाश हो गया है; अतः हमारी आर्थिक कठिनाई दूर करनेके लिये व्यासजीने उस दिन हमें मरुत्तके धनका पता बताया था ॥ ८ १/२ ॥ यद्येतद् वो बहुमतं मन्यध्वं वा क्षमं यदि ॥ ९ ॥ तथा यथाऽऽह धर्मेण कथं वा भीम मन्यसे । 'यदि तुमलोग उस धनको पर्याप्त समझो और उसे ले आनेकी अपनेमें सामर्थ्य देखो तो व्यासजीने जैसा कहा है, उसीके अनुसार धर्मतः उसे प्राप्त करनेका यत्न करो। अथवा भीमसेन! तुम बोलो, तुम्हारा इस सम्बन्धमें क्या विचार है?' ॥ ९ १/२ ॥ इत्युक्तवाक्ये नृपतौ तदा कुरुकुलोद्वह ॥ १० ॥ भीमसेनो नृपश्रेष्ठं प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् । रोचते मे महाबाहो यदिदं भाषितं त्वया ॥ ११ ॥ व्यासाख्यातस्य वित्तस्य समुपानयनं प्रति । कुरुकुलशिरोमणे! राजा युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर भीमसेनने हाथ जोड़कर उन नृपश्रेष्ठसे इस प्रकार कहा—'महाबाहो! आपने जो कुछ कहा है, व्यासजीके बताये हुए धनको लानेके विषयमें जो विचार व्यक्त किया है, वह मुझे बहुत पसंद है ॥ १०-११ १/२ ॥ यदि तत् प्राप्नुयामेह धनमाविक्षितं प्रभो ॥ १२ ॥ कृतमेव महाराज भवेदिति मतिर्मम । 'प्रभो! महाराज! यदि हमें मरुत्तका धन प्राप्त हो जाय तब तो हमारा सारा काम बन ही जाय। यही मेरा मत है ॥ १२ १/२ ॥ ते वयं प्रणिपातेन गिरीशस्य महात्मनः ॥ १३ ॥ तदानयाम भद्रं ते समभ्यर्च्य कपर्दिनम् । 'आपका कल्याण हो। हम महात्मा गिरीशके चरणोंमें प्रणाम करके उन जटाजूटधारी महेश्वरकी सम्यक् आराधना करके उस धनको ले आवें ॥ १३ १/२ ॥ तद् वित्तं देवदेवेशं तस्यैवानुचरांश्च तान् ॥ १४ ॥ प्रसाद्यार्थमवाप्स्यामो नूनं वाग्बुद्धि कर्मभिः ।

'हम बुद्धि, वाणी और क्रियाद्वारा आराधनापूर्वक देवाधिदेव महादेव तथा उनके अनुचरोंको प्रसन्न करके निश्चय ही उस धनको प्राप्त कर लेंगे ।। १४ १/२ ।। रक्षन्ते ये च तद् द्रव्यं किन्नरा रौद्रदर्शनाः ।। १५ ।। ते च वश्या भविष्यन्ति प्रसन्ने वृषभध्वजे । 'जो रौद्ररूपधारी किन्नर उस धनकी रक्षा करते हैं, वे भी भगवान् शंकरके प्रसन्न होनेपर हमारे अधीन हो जायेंगे ।। १५ १/२ ।। (स हि देवः प्रसन्नात्मा भक्तानां परमेश्वरः । ददात्यमरतां चापि किं पुनः काञ्चनं प्रभुः ।। 'सदा प्रसन्नचित्त रहनेवाले वे सर्वसमर्थ परमेश्वर महादेव अपने भक्तोंको अमरत्व भी दे देते हैं; फिर सुवर्णकी तो बात ही क्या? ।। वनस्थस्य पुरा जिष्णोरस्त्रं पाशुपतं महत् । रौद्रं ब्रह्मशिरश्चादात् प्रसन्नः किं पुनर्धनम् ।। 'पूर्वकालमें वनमें रहते समय अर्जुनपर प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने उन्हें महान् पाशुपतास्त्र, रौद्रास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र भी प्रदान किये थे। फिर धन दे देना उनके लिये कौन बड़ी बात है ।। वयं सर्वे च तद्भक्ताः स चास्माकं प्रसीदति । तत्प्रसादाद् वयं राज्यं प्राप्ताः कौरवनन्दन ।। अभिमन्योर्वधे वृत्ते प्रतिज्ञाते धनंजये । जयद्रथवधार्थाय स्वप्ने लोकगुरुं निशि ।। प्रसाद्य लब्धवानस्त्रमर्जुनः सहकेशवः । 'कौरवनन्दन! हम सब लोग उनके भक्त हैं और वे हम लोगोंपर प्रसन्न रहते हैं। उन्हींकी कृपासे हमने राज्य प्राप्त किया है। अभिमन्युका वध हो जानेपर जब अर्जुनने जयद्रथको मारनेकी प्रतिज्ञा की थी, उस समय स्वप्नमें अर्जुनने श्रीकृष्णके साथ रहकर रातमें उन्हीं लोकगुरु महेश्वरको प्रसन्न करके दिव्यास्त्र प्राप्त किया था ।। ततः प्रभातां रजनीं फाल्गुनस्याग्रतः प्रभुः ।। जघान सैन्यं शूलेन प्रत्यक्षं सव्यसाचिनः । 'तदनन्तर जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब भगवान् शिवने अर्जुनके आगे रहकर अपने त्रिशूलसे शत्रुओंकी सेनाका संहार किया था। यह बात अर्जुनने प्रत्यक्ष देखी थी ।। कस्तां सेनां महाराज मनसापि प्रधर्षयेत् ।। द्रोणकर्णमुख्यैर्युक्तां महेष्वासैः प्रहारिभिः । ऋते देवान्महेष्वासाद् बहुरूपान्महेश्वरात् ।।