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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेध-यज्ञका आरम्भविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

सप्ताशीतितमोऽध्यायः अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण और युधिष्ठिरकी बातचीत, अर्जुनका हस्तिनापुरमें जाना तथा उलूपी और चित्राङ्गदाके साथ बभ्रुवाहनका आगमन युधिष्ठिर उवाच श्रुतं प्रियमिदं कृष्ण यत् त्वमर्हसि भाषितुम् । तन्मेऽमृतरसं पुण्यं मनो ह्लादयति प्रभो ॥ १ ॥ युधिष्ठिर बोले—प्रभो! श्रीकृष्ण! मैंने यह प्रिय संदेश सुना, जिसे आप ही कहने या सुनानेके योग्य हैं। आपका यह अमृतरससे परिपूर्ण पवित्र वचन मेरे मनको आनन्दमग्न किये देता है ॥ १ ॥ बहूनि किल युद्धानि विजयस्य नराधिपैः । पुनरासन् हृषीकेश तत्र तत्र च मे श्रुतम् ॥ २ ॥ हृषीकेश! मेरे सुननेमें आया है कि भिन्न-भिन्न देशोंमें वहाँके राजाओंके साथ अर्जुनको कई बार युद्ध करने पड़े हैं ॥ २ ॥ किं निमित्तं स नित्यं हि पार्थः सुखविवर्जितः । अतीव विजयो धीमन्निति मे दूयते मनः ॥ ३ ॥ संचिन्तयामि कौन्तेयं रहो जिष्णुं जनार्दन । अतीव दुःखभागी स सततं पाण्डुनन्दनः ॥ ४ ॥ इसका क्या कारण है? बुद्धिमान् जनार्दन! जब मैं एकान्तमें बैठकर अर्जुनके बारेमें विचार करता हूँ, तब यह जानकर मेरा मन खिन्न हो जाता है कि हमलोगोंमें वे ही सदा सबसे अधिक दुःखके भागी रहे हैं। पाण्डुनन्दन अर्जुन सुखसे वंचित क्यों रहते हैं? यह समझमें नहीं आता ॥ ३-४ ॥ किं नु तस्य शरीरेऽस्ति सर्वलक्षणपूजिते । अनिष्टं लक्षणं कृष्ण येन दुःखान्युपाश्नुते ॥ ५ ॥ श्रीकृष्ण! उनका शरीर तो सभी शुभलक्षणोंसे सम्पन्न है। फिर उसमें अशुभ लक्षण कौन-सा है, जिससे उन्हें अधिक दुःख उठाना पड़ता है? ॥ ५ ॥ अतीवासुखभोगी स सततं कुन्तिनन्दनः । न हि पश्यामि बीभत्सोर्निन्द्यं गात्रेषु किंचन । श्रोतव्यं चेन्मयैतद् वै तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ६ ॥

कुन्तीनन्दन अर्जुन सदा अधिक कष्ट भोगते हैं; परंतु उनके अंगोंमें कहीं कोई निन्दनीय दोष नहीं दिखायी देता है। ऐसी दशामें उन्हें कष्ट भोगनेका कारण क्या है? यह मैं सुनना चाहता हूँ। आप मुझे विस्तारपूर्वक यह बात बतावें ॥ ६ ॥ इत्युक्तः स हृषीकेशो ध्यात्वा सुमहदुत्तरम् । राजानं भोजराजन्यवर्धनो विष्णुरब्रवीत् ॥ ७ ॥ युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर भोजवंशी क्षत्रियोंकी वृद्धि करनेवाले भगवान् हृषीकेश विष्णुने बहुत देरतक उत्तम रीतिसे चिन्तन करनेके बाद राजा युधिष्ठिरसे यों कहा — ॥ ७ ॥ न ह्यस्य नृपते किंचित् संश्लिष्टमुपलक्षये । ऋते पुरुषसिंहस्य पिण्डिकेऽस्याधिके यतः ॥ ८ ॥ ‘नरेश्वर! पुरुषसिंह अर्जुनकी पिण्डलियाँ (फिल्लियाँ) औसतसे कुछ अधिक मोटी हैं। इसके सिवा और कोई अशुभ लक्षण उनके शरीरमें मुझे भी नहीं दिखायी देता है’ ॥ ८ ॥ स ताभ्यां पुरुषव्याघ्रो नित्यमध्वसु वर्तते । न चान्यदनुपश्यामि येनासौ दुःखभाजनम् ॥ ९ ॥ ‘उन मोटी फिल्लियोंके कारण ही पुरुषसिंह अर्जुनको सदा रास्ता चलना पड़ता है। और कोई कारण मुझे नहीं दिखायी देता, जिससे उन्हें दुःख झेलना पड़े’ ॥ ९ ॥ इत्युक्तः पुरुषश्रेष्ठस्तदा कृष्णेन धीमता । प्रोवाच वृष्णिशार्दूलमेवमेतदिति प्रभो ॥ १० ॥ प्रभो! बुद्धिमान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उन वृष्णिसिंहसे कहा —‘भगवन्! आपका कहना ठीक है’ ॥ १० ॥ कृष्णा तु द्रौपदी कृष्णं तिर्यक् सासूयमैक्षत । प्रतिजग्राह तस्यास्तं प्रणयं चापि केशहा ॥ ११ ॥ सख्युः सखा हृषीकेशः साक्षादिव धनंजयः । उस समय द्रुपदकुमारी कृष्णाने भगवान् श्रीकृष्णकी ओर तिरछी चितवनसे ईर्ष्यापूर्वक देखा। केशिहन्ता श्रीकृष्णने द्रौपदीके उस प्रेमपूर्ण उपालम्भको सानन्द ग्रहण किया; क्योंकि उसकी दृष्टिमें सखा अर्जुनके मित्र भगवान् हृषीकेश साक्षात् अर्जुनके ही समान थे ॥ ११ १/२ ॥ तत्र भीमादयस्ते तु कुरवो याजकाश्च ये ॥ १२ ॥ रेमुः श्रुत्वा विचित्रां तां धनंजयकथां शुभाम् । उस समय भीमसेन आदि कौरव और यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणलोग अर्जुनके सम्बन्धमें यह शुभ एवं विचित्र बात सुनकर बहुत प्रसन्न हो रहे थे ॥ १२ १/२ ॥ तेषां कथयतामेव पुरुषोऽर्जुनसंकथाः ॥ १३ ॥ उपायाद् वचनाद् दूतो विजयस्य महात्मनः ।

उन लोगोंमें अर्जुनके सम्बन्धमें इस तरहकी बातें हो ही रही थीं कि महात्मा अर्जुनका भेजा हुआ दूत वहाँ आ पहुँचा ।। १३ ½ ।। सोऽभिगम्य कुरुश्रेष्ठं नमस्कृत्य च बुद्धिमान् ।। १४ ।। उपायातं नरव्याघ्रं फाल्गुनं प्रत्यवेदयत् । वह बुद्धिमान् दूत कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके पास जा उन्हें नमस्कार करके बोला —'पुरुषसिंह अर्जुन निकट आ गये हैं' ।। १४ ½ ।। तच्छ्रुत्वा नृपतिस्तस्य हर्षबाष्पाकुलेक्षणः ।। १५ ।। प्रियाख्याननिमित्तं वै ददौ बहुधनं तदा । यह शुभ समाचार सुनकर राजा युधिष्ठिरकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक आये और यह प्रिय वृत्तान्त निवेदन करनेके कारण उस दूतको पुरस्काररूपमें उन्होंने बहुत-सा धन दिया ।। १५ ½ ।। ततो द्वितीये दिवसे महान् शब्दो व्यवर्धत ।। १६ ।। आगच्छति नरव्याघ्रे कौरवाणां धुरंधरे । तदनन्तर दूसरे दिन कौरव-धुरंधर नरव्याघ्र अर्जुनके आते समय नगरमें महान् कोलाहल बढ़ गया ।। १६ ½ ।। ततो रेणुः समुद्भूतो विबभौ तस्य वाजिनः ।। १७ ।। अभितो वर्तमानस्य यथोच्चैःश्रवसस्तथा । उच्चैःश्रवाके समान वेगवान् और पास ही विद्यमान उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेकी टापसे उड़ी हुई धूल आकाशमें अद्भुत शोभा पा रही थी ।। १७ ½ ।। तत्र हर्षकरी वाचो नराणां शुश्रुवेऽर्जुनः ।। १८ ।। दिष्ट्यासि पार्थ कुशली धन्यो राजा युधिष्ठिरः । वहाँ अर्जुनने लोगोंके मुँहसे हर्ष बढ़ानेवाली बातें इस प्रकार सुनीं—'पार्थ! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम सकुशल लौट आये। राजा युधिष्ठिर धन्य हैं ।। कोऽन्यो हि पृथिवीं कृत्स्नां जित्वा हि युधि पार्थिवान् ।। १९ ।। चारयित्वा हयश्रेष्ठमुपागच्छेदृतेऽर्जुनात् । 'अर्जुनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर पुरुष है जो समूची पृथ्वीको जीतकर युद्धमें राजाओंको परास्त करके और अपने श्रेष्ठ अश्वको सर्वत्र घुमाकर उसके साथ सकुशल लौट आ सके ।। १९ ½ ।। ये व्यतीता महात्मानो राजानः सगरादयः ।। २० ।। तेषामपीदृशं कर्म न कदाचन शुश्रुम । 'अतीतकालमें जो सगर आदि महामनस्वी राजा हो गये हैं, उनका भी कभी ऐसा पराक्रम हमारे सुननेमें नहीं आया था ।। २० ½ ।।

नैतदन्ये करिष्यन्ति भविष्या वसुधाधिपाः ॥ २१ ॥ यत् त्वं कुरुकुलश्रेष्ठ दुष्करं कृतवानसि । 'कुरुकुलश्रेष्ठ! आपने जो दुष्कर पराक्रम कर दिखाया है, उसे भविष्यमें होनेवाले दूसरे भूपाल नहीं कर सकेंगे' ॥ २१ १/२ ॥ इत्येवं वदतां तेषां पुंसां कर्णसुखा गिरः ॥ २२ ॥ शृण्वन् विवेश धर्मात्मा फाल्गुनो यज्ञसंस्तरम् । इस प्रकार कहते हुए लोगोंकी श्रवणसुखद बातें सुनते हुए धर्मात्मा अर्जुनने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया ॥ २२ १/२ ॥ ततो राजा सहामात्यः कृष्णश्च यदुनन्दनः ॥ २३ ॥ धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य तं प्रत्युद्ययुस्तदा । उस समय मन्त्रियोंसहित राजा युधिष्ठिर तथा यदुनन्दन श्रीकृष्ण धृतराष्ट्रको आगे करके उनकी अगवानीके लिये आगे बढ़ आये थे ॥ २३ १/२ ॥ सोऽभिवाद्य पितुः पादौ धर्मराजस्य धीमतः ॥ २४ ॥ भीमादींश्चापि सम्पूज्य पर्यष्वजत केशवम् । अर्जुनने पिता धृतराष्ट्र और बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके चरणोंमें प्रणाम करके भीमसेन आदिका भी पूजन किया और श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया ॥ २४ १/२ ॥ तैः समेत्यार्चितस्तांश्च प्रत्यर्च्यथ यथाविधि ॥ २५ ॥ विशश्राम महाबाहुस्तीरं लब्ध्वेव पारगः । उन सबने मिलकर अर्जुनका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। महाबाहु अर्जुनने भी उनका विधिपूर्वक आदर-सत्कार करके उसी तरह विश्राम किया, जैसे समुद्रके पार जानेकी इच्छावाला पुरुष किनारेपर पहुँचकर विश्राम करता है ॥ २५ १/२ ॥ एतस्मिन्नेव काले तु स राजा बभ्रुवाहनः ॥ २६ ॥ मातृभ्यां सहितो धीमान् कुरूनेव जगाम ह । इसी समय बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहन अपनी दोनों माताओंके साथ कुरुदेशमें जा पहुँचा ॥ २६ १/२ ॥ तत्र वृद्धान् यथावत् स कुरूनन्यांश्च पार्थिवान् ॥ २७ ॥ अभिवाद्य महबाहुस्तैश्चापि प्रतिनन्दितः । प्रविवेश पितामह्याः कुन्त्या भवनमुत्तमम् ॥ २८ ॥ वहाँ पहुँचकर वह महाबाहु नरेश कुरुकुलके वृद्ध पुरुषों तथा अन्य राजाओंको विधिवत् प्रणाम करके स्वयं भी उनके द्वारा सत्कार पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। इसके बाद वह अपनी पितामही कुन्तीके सुन्दर महलमें गया ॥ २७-२८ ॥

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अर्जुनप्रत्यागमने सत्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अर्जुनका प्रत्यागमनविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥

अष्टाशीतितमोऽध्यायः

उलूपी और चित्राङ्गदाके सहित बभ्रुवाहनका रत्न-आभूषण

आदिसे सत्कार तथा अश्वमेध-यज्ञका आरम्भ

वैशम्पायन उवाच स प्रविश्य महाबाहुः पाण्डवानां निवेशनम् । पितामहीमभ्यवन्दत् साम्ना परमवल्गुना ।। १ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! पाण्डवोंके महलमें प्रवेश करके महाबाहु बभ्रुवाहनने अत्यन्त मधुर वचन बोलकर अपनी दादी कुन्तीके चरणोंमें प्रणाम किया ।। ततश्चित्राङ्गदा देवी कौरव्यस्यात्मजापि च । पृथां कृष्णां च सहिते विनयेनोपजग्मतुः ।। २ ।। इसके बाद देवी चित्रांगदा और कौरव्यनागकी पुत्री उलूपीने भी एक साथ ही विनीत भावसे कुन्ती और द्रौपदीके चरण छुए ।। २ ।। सुभद्रां च यथान्यायं याश्चान्याः कुरुयोषितः ।

ददौ कुन्ती ततस्ताभ्यां रत्नानि विविधानि च ॥ ३ ॥ फिर सुभद्रा तथा कुरुकुलकी अन्य स्त्रियोंसे भी वे यथायोग्य मिलीं। उस समय कुन्तीने उन दोनोंको नाना प्रकारके रत्न भेंटमें दिये ॥ ३ ॥ द्रौपदी च सुभद्रा च याश्चाप्यन्याऽददुः स्त्रियः । ऊषतुस्तत्र ते देव्यौ महार्हशयनासने ॥ ४ ॥ द्रौपदी, सुभद्रा तथा अन्य स्त्रियोंने भी अपनी ओरसे नाना प्रकारके उपहार दिये। तत्पश्चात् वे दोनों देवियाँ बहुमूल्य शय्याओंपर विराजमान हुईं ॥ ४ ॥ सुपूजिते स्वयं कुन्त्या पार्थस्य हितकाम्यया । स च राजा महातेजाः पूजितो बभ्रुवाहनः ॥ ५ ॥ धृतराष्ट्रं महीपालमुपतस्थे यथाविधि । अर्जुनके हितकी कामनासे कुन्तीदेवीने स्वयं ही उन दोनोंका बड़ा सत्कार किया। कुन्तीसे सत्कार पाकर महातेजस्वी राजा बभ्रुवाहन महाराज धृतराष्ट्रकी सेवामें उपस्थित हुआ और उसने विधिपूर्वक उनका चरण-स्पर्श किया ॥ ५ १/२ ॥ युधिष्ठिरं च राजानं भीमादींश्चापि पाण्डवान् ॥ ६ ॥ उपागम्य महातेजा विनयेनाभ्यवादयत् । इसके बाद राजा युधिष्ठिर और भीमसेन आदि सभी पाण्डवोंके पास जाकर उस महातेजस्वी नरेशने विनयपूर्वक उनका अभिवादन किया ॥ ६ १/२ ॥ स तैः प्रेम्णा परिष्वक्तः पूजितश्च यथाविधि ॥ ७ ॥ धनं चास्मै ददुर्भूरि प्रीयमाणा महारथाः । उन सब लोगोंने प्रेमवश उसे छातीसे लगा लिया और उसका यथोचित सत्कार किया। इतना ही नहीं, बभ्रुवाहनपर प्रसन्न हुए उन पाण्डव महारथियोंने उसे बहुत धन दिया ॥ ७ १/२ ॥ तथैव च महीपालः कृष्णं चक्रगदाधरम् ॥ ८ ॥ प्रद्युम्न इव गोविन्दं विनयेनोपतस्थिवान् । इसी प्रकार वह भूपाल प्रद्युम्नकी भाँति विनीत भावसे शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ ८ १/२ ॥ तस्मै कृष्णो ददौ राज्ञे महार्हमतिपूजितम् ॥ ९ ॥ रथं हेमपरिष्कारं दिव्याश्वयुजमुत्तमम् । श्रीकृष्णने इस राजाको एक बहुमूल्य रथ प्रदान किया जो सुनहरी साजोंसे सुसज्जित, सबके द्वारा अत्यन्त प्रशंसित और उत्तम था। उसमें दिव्य घोड़े जुते हुए थे ॥ ९ १/२ ॥ धर्मराजश्च भीमश्च फाल्गुनश्च यमौ तथा ॥ १० ॥ पृथक् पृथक् च ते चैनं मानार्थाभ्यामयोजयन् ।

तत्पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवने अलग-अलग बभ्रुवाहनका सत्कार करके उसे बहुत धन दिया ॥ १० १/२ ॥ ततस्तृतीये दिवसे सत्यवत्यात्मजो मुनिः ॥ ११ ॥ युधिष्ठिरं समभ्येत्य वाग्मी वचनमब्रवीत् । उसके तीसरे दिन सत्यवतीनन्दन प्रवचनकुशल महर्षि व्यास युधिष्ठिरके पास आकर बोले— ॥ ११ १/२ ॥ अद्यप्रभृति कौन्तेय यजस्व समयो हि ते । मुहूर्तो यज्ञियः प्राप्तश्चोदयन्तीह याजकाः ॥ १२ ॥ 'कुन्तीनन्दन! तुम आजसे यज्ञ आरम्भ कर दो। उसका समय आ गया है। यज्ञका शुभ मुहूर्त उपस्थित है और याजकगण तुम्हें बुला रहे हैं ॥ १२ ॥ अहीनो नाम राजेन्द्र क्रतुस्तेऽयं च कल्पताम् । बहुत्वात् काञ्चनाख्यस्य ख्यातो बहुसुवर्णकः ॥ १३ ॥ 'राजेन्द्र! तुम्हारे इस यज्ञमें किसी बातकी कमी नहीं रहेगी। इसलिये यह किसी भी अंगसे हीन न होनेके कारण अहीन (सर्वांगपूर्ण) कहलायेगा। इसमें सुवर्ण नामक द्रव्यकी अधिकता होगी; इसलिये यह बहुसुवर्णक नामसे विख्यात होगा ॥ १३ ॥ एवमत्र महाराज दक्षिणां त्रिगुणां कुरु । त्रित्वं व्रजतु ते राजन् ब्राह्मणा ह्यत्र कारणम् ॥ १४ ॥ 'महाराज! यज्ञके प्रधान कारण ब्राह्मण ही हैं; इसलिये तुम उन्हें तिगुनी दक्षिणा देना। ऐसा करनेसे तुम्हारा यह एक ही यज्ञ तीन यज्ञोंके समान हो जायगा ॥ १४ ॥ त्रीनश्वमेधानत्र त्वं सम्प्राप्य बहुदक्षिणान् । ज्ञातिवध्याकृतं पापं प्रहास्यसि नराधिप ॥ १५ ॥ 'नरेश्वर! यहाँ बहुत-सी दक्षिणावाले तीन अश्वमेध-यज्ञोंका फल पाकर तुम ज्ञातिवधके पापसे मुक्त हो जाओगे ॥ १५ ॥ पवित्रं परमं चैतत् पावनं चैतदुत्तमम् । यदाश्वमेधावभृथं प्राप्स्यसे कुरुनन्दन ॥ १६ ॥ 'कुरुनन्दन! तुम्हें जो अश्वमेध-यज्ञका अवभृथ-स्नान प्राप्त होगा, वह परम पवित्र, पावन और उत्तम है' ॥ १६ ॥ इत्युक्तः स तु तेजस्वी व्यासेनामितबुद्धिना । दीक्षां विवेश धर्मात्मा वाजिमेधाप्तये ततः ॥ १७ ॥ परम बुद्धिमान् व्यासजीके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा एवं तेजस्वी राजा युधिष्ठिरने अश्वमेध-यज्ञकी सिद्धिके लिये उसी दिन दीक्षा ग्रहण की ॥ १७ ॥ ततो यज्ञं महाबाहुर्वाजिमेधं महाक्रतुम् । बह्वन्नदक्षिणं राजा सर्वकामगुणान्वितम् ॥ १८ ॥

फिर उन महाबाहु नरेशने बहुत-से अन्नकी दक्षिणासे युक्त तथा सम्पूर्ण कामना और गुणोंसे सम्पन्न उस अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान आरम्भ कर दिया ॥ १८ ॥ तत्र वेदविदो राजंश्चक्रुः कर्माणि याजकाः । परिक्रमन्तः सर्वज्ञा विधिवत् साधुशिक्षितम् ॥ १९ ॥ उसमें वेदोंके ज्ञाता और सर्वज्ञ याजकोंने सम्पूर्ण कर्म किये-कराये। वे सब ओर घूम- घूमकर सत्पुरुषों-द्वारा शिक्षित कर्मका सम्पादन करते-कराते थे ॥ १९ ॥ न तेषां स्खलितं किंचिदासीच्चाप्यकृतं तथा । क्रममुक्तं च युक्तं च चक्रुस्तत्र द्विजर्षभाः ॥ २० ॥ उनके द्वारा उस यज्ञमें कहीं भी कोई भूल या त्रुटि नहीं होने पायी। कोई भी कर्म न तो छूटा और न अधूरा रहा। श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने प्रत्येक कार्यको क्रमके अनुसार उचित रीतिसे पूरा किया ॥ २० ॥ कृत्वा प्रवर्ग्यं धर्माख्यं यथावद् द्विजसत्तमाः । चक्रुस्ते विधिवद् राजंस्तथैवाभिषवं द्विजाः ॥ २१ ॥ राजन्! वहाँ ब्राह्मणशिरोमणियोंने प्रवर्ग्य नामक धर्मानुकूल कर्मको यथोचित रीतिसे सम्पन्न करके विधिपूर्वक सोमाभिषव—सोमलताका रस निकालनेका कार्य किया ॥ २१ ॥ अभिषूय ततो राजन् सोमं सोमपसत्तमाः । सवनान्यानुपूर्व्येण चक्रुः शास्त्रानुसारिणः ॥ २२ ॥ महाराज! सोमपान करनेवालोंमें श्रेष्ठ तथा शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले विद्वानोंने सोमरस निकालकर उसके द्वारा क्रमशः तीनों समयके सवन कर्म किये ॥ २२ ॥ न तत्र कृपणः कश्चिन्न दरिद्रो बभूव ह । क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानवः ॥ २३ ॥ उस यज्ञमें आया हुआ कोई भी मनुष्य, चाहे वह निम्न-से-निम्न श्रेणीका क्यों न हो, दीन-दरिद्र, भूखा अथवा दुखिया नहीं रह गया था ॥ २३ ॥ भोजनं भोजनार्थिभ्यो दापयामास शत्रुहा । भीमसेनो महातेजाः सततं राजशासनात् ॥ २४ ॥ शत्रुसूदन महातेजस्वी भीमसेन महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भोजनार्थियोंको भोजन दिलानेके कामपर सदा डटे रहते थे ॥ २४ ॥ संस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकार्याणि याजकाः । दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रानुदर्शनात् ॥ २५ ॥ यज्ञकी वेदी बनानेमें निपुण याजकगण प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिके अनुसार सब कार्य सम्पन्न किया करते थे ॥ २५ ॥ नाषडङ्गविदत्रासीत् सदस्यस्तस्य धीमतः । नाव्रतो नानुपाध्यायो न च वादाविचक्षणः ॥ २६ ॥

बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरके यज्ञका कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था जो छहों अंगोंका विद्वान्, ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाला, अध्यापनकर्ममें कुशल तथा वाद-विवादमें प्रवीण न हो ॥ २६ ॥ ततो यूपोच्छ्रये प्राप्ते षड् बैल्वान् भरतर्षभ । खादिरान् बिल्वसंमितांस्तावत् सर्ववर्णिनः ॥ २७ ॥ देवदारुमयौ द्वौ तु यूपौ कुरुपतेर्मखे । श्लेष्मातकमयं चैकं याजकाः समकल्पयन् ॥ २८ ॥ भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् जब यूपकी स्थापनाका समय आया, तब याजकोंने यज्ञभूमिमें बेलके छः, खैरके छः, पलाशके भी छः, देवदारुके दो और लसोड़ेका एक—इस प्रकार इक्कीस यूप कुरुराज युधिष्ठिरके यज्ञमें खड़े किये ॥ २७-२८ ॥ शोभार्थं चापरान् यूपान् काञ्चनान् भरतर्षभ । स भीमः कारयामास धर्मराजस्य शासनात् ॥ २९ ॥ भरतभूषण! इनके सिवा धर्मराजकी आज्ञासे भीमसेनने यज्ञकी शोभाके लिये और भी बहुत-से सुवर्णमय यूप खड़े कराये ॥ २९ ॥ ते व्यराजन्त राजर्षेर्वासोभिरुपशोभिताः । महेन्द्रानुगता देवा यथा सप्तर्षिभिर्दिवि ॥ ३० ॥ वस्त्रोंद्वारा अलंकृत किये गये वे राजर्षि युधिष्ठिरके यज्ञ सम्बन्धी यूप आकाशमें सप्तर्षियोंसे घिरे हुए इन्द्रके अनुगामी देवताओंके समान शोभा पाते थे ॥ ३० ॥ इष्टकाः काञ्चनीश्चात्र चयनार्थं कृताऽभवन् । शुशुभे चयनं तच्च दक्षस्येव प्रजापतेः ॥ ३१ ॥ यज्ञकी वेदी बनानेके लिये वहाँ सोनेकी ईंटें तैयार करायी गयी थीं। उनके द्वारा जब वेदी बनकर तैयार हुई तब वह दक्षप्रजापतिकी यज्ञवेदीके समान शोभा पाने लगी ॥ ३१ ॥ चतुश्चित्यश्च तस्यासीदष्टादशकरात्मकः । स रुक्मपक्षो निचितस्त्रिकोणो गरुडाकृतिः ॥ ३२ ॥ उस यज्ञमण्डपमें अग्निचयनके लिये चार स्थान बने थे। उनमेंसे प्रत्येककी लम्बाई- चौड़ाई अठारह हाथकी थी। प्रत्येक वेदी सुवर्णमय पंखसे युक्त एवं गरुड़के समान आकारवाली थी। वह त्रिकोणाकार बनायी गयी थी ॥ ३२ ॥ ततो नियुक्ताः पशवो यथाशास्त्रं मनीषिभिः । तं तं देवं समुद्दिश्य पक्षिणः पशवश्च ये ॥ ३३ ॥ ऋषभाः शास्त्रपठितास्तथा जलचराश्च ये । सर्वांस्तानभ्ययुञ्जंस्ते तत्राग्निचयकर्मणि ॥ ३४ ॥ तदनन्तर मनीषी पुरुषोंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार पशुओंको नियुक्त किया। भिन्न- भिन्न देवताओंके उद्देश्यसे पशु-पक्षी, शास्त्रकथित वृषभ और जलचर जन्तु—इन सबका

अग्निस्थापन-कर्ममें याजकोंने उपयोग किया ।। यूपेषु नियता चासीत् पशूनां त्रिशती तथा । अश्वरत्नोत्तरा यज्ञे कौन्तेयस्य महात्मनः ।। ३५ ।। कुन्तीनन्दन महात्मा युधिष्ठिरके उस यज्ञमें जो यूप खड़े किये गये थे, उनमें तीन सौ पशु बाँधे गये थे। उन सबमें प्रधान वही अश्वरत्न था ।। ३५ ।। स यज्ञः शुशुभे तस्य साक्षाद् देवर्षिसंकुलः । गन्धर्वगणसंगीतः प्रनृत्तोऽप्सरसां गणैः ।। ३६ ।। साक्षात् देवर्षियोंसे भरा हुआ युधिष्ठिरका वह यज्ञ बड़ी शोभा पा रहा था। गन्धर्वोंके मधुर संगीत और अप्सराओंके नृत्यसे उसकी शोभा और बढ़ गयी थी ।। ३६ ।। स किंपुरुषसंकीर्णः किंनरैश्चोपशोभितः । सिद्धविप्रनिवासैश्च समन्तादभिसंवृतः ।। ३७ ।। वह यज्ञमण्डप किम्पुरुषोंसे भरा-पूरा था। किन्नर भी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके चारों ओर सिद्धों और ब्राह्मणोंके निवासस्थान बने थे, जिनसे वह यज्ञ-मण्डप घिरा था ।। ३७ ।। तस्मिन् सदसि नित्यास्तु व्यासशिष्या द्विजर्षभाः । सर्वशास्त्रप्रणेतारः कुशला यज्ञसंस्तरे ।। ३८ ।। व्यासजीके शिष्य श्रेष्ठ ब्राह्मण उस यज्ञसभामें सदा उपस्थित रहते थे। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके प्रणेता और यज्ञकर्ममें कुशल थे ।। ३८ ।। नारदश्च बभूवात्र तुम्बुरुश्च महाद्युतिः । विश्वावसुश्चित्रसेनस्तथान्ये गीतकोविदाः ।। ३९ ।। गन्धर्वा गीतकुशला नृत्येषु च विशारदाः । रमयन्ति स्म तान् विप्रान् यज्ञकर्मान्तरेषु वै ।। ४० ।। नारद, महातेजस्वी तुम्बुरु, विश्वावसु, चित्रसेन तथा अन्य संगीतकलाकोविद, गाननिपुण एवं नृत्यविशारद गन्धर्व प्रतिदिन यज्ञकार्यके बीच-बीचमें समय मिलनेपर अपनी नाच-गानकी कलाओंद्वारा उन ब्राह्मणोंका मनोरंजन करते थे ।। ३९-४० ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे अष्टाशीतितमोऽध्यायः ।। ८८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधयज्ञका आरम्भविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८८ ।।

एकोननवतितमोऽध्यायः युधिष्ठिरका ब्राह्मणोंको दक्षिणा देना और राजाओंको भेंट देकर विदा करना वैशम्पायन उवाच श्रपयित्वा पशूनन्यान् विधिवद् द्विजसत्तमाः । तं तुरङ्गं यथाशास्त्रमालभन्त द्विजातयः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने अन्यान्य पशुओंका विधिपूर्वक श्रपण करके उस अश्वका भी शास्त्रीय विधिके अनुसार आलभन किया ॥ १ ॥ ततः संश्रप्य तुरगं विधिवद् याजकास्तदा । उपसंवेशयन् राजंस्ततस्तां द्रुपदात्मजाम् ॥ २ ॥ कलाभिस्तिसृभी राजन् यथाविधि मनस्विनीम् । राजन्! तत्पश्चात् याजकोंने विधिपूर्वक अश्वका श्रपण करके उसके समीप मन्त्र, द्रव्य और श्रद्धा—इन तीन कलाओंसे युक्त मनस्विनी द्रौपदीको शास्त्रोक्त विधिके अनुसार बैठाया ॥ २ १/२ ॥ उद्धृत्य तु वपां तस्य यथाशास्त्रं द्विजातयः ॥ ३ ॥ श्रपयामासुरव्यग्रा विधिवद् भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! इसके बाद ब्राह्मणोंने शान्तचित्त होकर उस अश्वकी चर्बी निकाली और उसका विधिपूर्वक श्रपण करना आरम्भ किया ॥ ३ १/२ ॥ तं वपाधूमगन्धं तु धर्मराजः सहानुजैः ॥ ४ ॥ उपाजिघ्रद् यथाशास्त्रं सर्वपापापहं तदा । भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार उस चर्बीके धूमकी गन्ध सूँघी, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाली थी ॥ ४ १/२ ॥ शिष्टान्यङ्गानि यान्यासंस्तस्याश्वस्य नराधिप ॥ ५ ॥ तान्यग्नौ जुहुवुर्धीराः समस्ताः षोडशर्त्विजः । नरेश्वर! उस अश्वके जो शेष अंग थे, उनको धीर स्वभाववाले समस्त सोलह ऋत्विजोंने अग्निमें होम कर दिया ॥ ५ १/२ ॥ संस्थाप्यैवं तस्य राजंस्तं यज्ञं शक्रतेजसः ॥ ६ ॥ व्यासः सशिष्यो भगवान् वर्धयामास तं नृपम् । इस प्रकार इन्द्रके समान तेजस्वी राजा युधिष्ठिरके उस यज्ञको समाप्त करके शिष्योंसहित भगवान् व्यासने उन्हें बधाई दी—अभ्युदयसूचक आशीर्वाद दिया ॥ ६ १/२ ॥

ततो युधिष्ठिरः प्रादाद् ब्राह्मणेभ्ये यथाविधि ॥ ७ ॥ कोटीः सहस्रं निष्काणां व्यासाय तु वसुंधराम् । इसके बाद युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक एक हजार करोड़ (एक खर्व) स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणामें देकर व्यासजीको सम्पूर्ण पृथ्वी दान कर दी ॥ ७ १/२ ॥ प्रतिगृह्य धरां राजन् व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ ८ ॥ अब्रवीद् भरतश्रेष्ठं धर्मराजं युधिष्ठिरम् । राजन्! सत्यवतीनन्दन व्यासने उस भूमिदानको ग्रहण करके भरतश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ८ १/२ ॥ वसुधा भवतस्त्वेषा संन्यस्ता राजसत्तम ॥ ९ ॥ निष्क्रयो दीयतां मह्यं ब्राह्मणा हि धनार्थिनः । 'नृपश्रेष्ठ! तुम्हारी दी हुई इस पृथ्वीको मैं पुनः तुम्हारे ही अधिकारमें छोड़ता हूँ। तुम मुझे इसका मूल्य दे दो; क्योंकि ब्राह्मण धनके ही इच्छुक होते हैं (राज्यके नहीं)' ॥ ९ १/२ ॥ युधिष्ठिरस्तु तान् विप्रान् प्रत्युवाच महामनाः ॥ १० ॥ भ्रातृभिः सहितो धीमान् मध्ये राज्ञां महात्मनाम् । तब महामनस्वी नरेशोंके बीचमें भाइयोंसहित बुद्धिमान् महामना युधिष्ठिरने उन ब्राह्मणोंसे कहा— ॥ १० १/२ ॥ अश्वमेधे महायज्ञे पृथिवी दक्षिणा स्मृता ॥ ११ ॥ अर्जुनेन जिता चेयमृत्विग्भ्यः प्रापिता मया । वनं प्रवेक्ष्ये विप्राग्र्या विभजध्वं महीमिमाम् ॥ १२ ॥ चतुर्धा पृथिवीं कृत्वा चातुर्होत्रप्रमाणतः । नाहमादातुमिच्छामि ब्रह्मस्वं द्विजसत्तमाः ॥ १३ ॥ इदं नित्यं मनो विप्रा भ्रातॄणां चैव मे सदा । 'विप्रवरो! अश्वमेध नामक महायज्ञमें पृथिवीकी दक्षिणा देनेका विधान है; अतः अर्जुनके द्वारा जीती हुई यह सारी पृथ्वी मैंने ऋत्विजोंको दे दी है। अब मैं वनमें चला जाऊँगा। आपलोग चातुर्होत्र यज्ञके प्रमाणानुसार पृथिवीके चार भाग करके इसे आपसमें बाँट लें। द्विजश्रेष्ठगण! मैं ब्राह्मणोंका धन लेना नहीं चाहता। ब्राह्मणो! मेरे भाइयोंका भी सदा ऐसा ही विचार रहता है' ॥ ११—१३ १/२ ॥ इत्युक्तवति तस्मिंस्तु भ्रातरो द्रौपदी च सा ॥ १४ ॥ एवमेतदिति प्राहुस्तद्भूल्लोमहर्षणम् । उनके ऐसा कहनेपर भीमसेन आदि भाइयों और द्रौपदीने एक स्वरसे कहा—'हाँ, महाराजका कहना ठीक है।' इस महान् त्यागकी बात सुनकर सबके रोंगटे खड़े हो गये ॥ १४ १/२ ॥

ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् साधु साध्विति भारत ॥ १५ ॥ तथैव द्विजसंघानां शंसतां विबभौ स्वनः । भारत! उस समय आकाशवाणी हुई—'पाण्डवो! तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया। तुम्हें धन्यवाद!' इसी प्रकार पाण्डवोंके सत्साहसकी प्रशंसा करते हुए ब्राह्मण-समूहोंका भी शब्द वहाँ स्पष्ट सुनायी दे रहा था ॥ १५ १/२ ॥ द्वैपायनस्तथा कृष्णः पुनरेव युधिष्ठिरम् ॥ १६ ॥ प्रोवाच मध्ये विप्राणामिदं सम्पूजयन् मुनिः । तब मुनिवर द्वैपायनकृष्णने पुनः ब्राह्मणोंके बीचमें युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए कहा — ॥ १६ १/२ ॥ दत्तैषा भवता मह्यं तां ते प्रतिददाम्यहम् ॥ १७ ॥ हिरण्यं दीयतामेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो धरास्तु ते । 'राजन्! तुमने तो यह पृथ्वी मुझे दे ही दी। अब मैं अपनी ओरसे इसे वापस करता हूँ। तुम इन ब्राह्मणोंको सुवर्ण दे दो और पृथ्वी तुम्हारे ही अधिकारमें रह जाय' ॥ १७ १/२ ॥ ततोऽब्रवीद् वासुदेवो धर्मराजं युधिष्ठिरम् ॥ १८ ॥ यथाऽऽह भगवान् व्यासस्तथा त्वं कर्तुमर्हसि । तब भगवान् श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा—'धर्मराज! भगवान् व्यास जैसा कहते हैं, वैसा ही तुम्हें करना चाहिये' ॥ १८ १/२ ॥ इत्युक्तः स कुरुश्रेष्ठः प्रीतात्मा भ्रातृभिः सह ॥ १९ ॥ कोटिकोटिकृतां प्रादाद् दक्षिणां त्रिगुणां क्रतोः । यह सुनकर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर भाइयोंसहित बहुत प्रसन्न हुए और प्रत्येक ब्राह्मणोंको उन्होंने यज्ञके लिये एक-एक करोड़की तिगुनी दक्षिणा दी ॥ १९ १/२ ॥ न करिष्यति तल्लोके कश्चिदन्यो नराधिपः ॥ २० ॥ यत् कृतं कुरुराजेन मरुत्तस्यानुकुर्वता । महाराज मरुत्तके मार्गका अनुसरण करनेवाले राजा युधिष्ठिरने उस समय जैसा महान् त्याग किया था, वैसा इस संसारमें दूसरा कोई राजा नहीं कर सकेगा ॥ २० १/२ ॥ प्रतिगृह्य तु तद् रत्नं कृष्णद्वैपायनो मुनिः ॥ २१ ॥ ऋत्विग्भ्यः प्रददौ विद्वांश्चतुर्धा व्यभजंश्च ते । विद्वान् महर्षि व्यासने वह सुवर्णराशि लेकर ब्राह्मणोंको दे दी और उन्होंने चार भाग करके उसे आपसमें बाँट लिया ॥ २१ १/२ ॥ धरण्या निष्क्रयं दत्त्वा तद्धिरण्यं युधिष्ठिरः ॥ २२ ॥ धूतपापो जितस्वर्गो मुमुदे भ्रातृभिः सह ।

इस प्रकार पृथ्वीके मूल्यके रूपमें वह सुवर्ण देकर राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंसहित बहुत प्रसन्न हुए। उनके सारे पाप धुल गये और उन्होंने स्वर्गपर अधिकार प्राप्त कर लिया ॥ २२ ½ ॥ ऋत्विजस्तमपर्यन्तं सुवर्णनिचयं तथा ॥ २३ ॥ व्यभजन्त द्विजातिभ्यो यथोत्साहं यथासुखम् । उस अनन्त सुवर्णराशिको पाकर ऋत्विजोंने बड़े उत्साह और आनन्दके साथ उसे ब्राह्मणोंको बाँट दिया ॥ २३ ½ ॥ यज्ञवाटे च यत् किंचिद् हिरण्यं सविभूषणम् ॥ २४ ॥ तोरणानि च यूपांश्च घटान् पात्रीस्तथेष्टकाः । युधिष्ठिराभ्यनुज्ञाताः सर्वं तद् व्यभजन् द्विजाः ॥ २५ ॥ यज्ञशालामें भी जो कुछ सुवर्ण या सोनेके आभूषण, तोरण, यूप, घड़े, बर्तन और ईंटें थीं, उन सबको भी युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर ब्राह्मणोंने आपसमें बाँट लिया ॥ २४-२५ ॥ अनन्तरं द्विजातिभ्यः क्षत्रिया जहिरे वसु । तथा विट्शूद्रसंघाश्च तथान्ये म्लेच्छजातयः ॥ २६ ॥ ब्राह्मणोंके लेनेके बाद जो धन वहाँ पड़ा रह गया, उसे क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा म्लेच्छ जातिके लोग उठा ले गये ॥ २३ ॥ ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे मुदिता जग्मुरालयान् । तर्पिता वसुना तेन धर्मराजेन धीमता ॥ २७ ॥ तदनन्तर सब ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक अपने घरोंको गये। बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने उन सबको उस धनके द्वारा पूर्णतः तृप्त कर दिया था ॥ २७ ॥ स्वमंशं भगवान् व्यासः कुन्त्यै साक्षाद्धि मानतः । प्रददौ तस्य महतो हिरण्यस्य महाद्युतिः ॥ २८ ॥ उस महान् सुवर्णराशिमेंसे महातेजस्वी भगवान् व्यासने जो अपना भाग प्राप्त किया था, उसे उन्होंने बड़े आदरके साथ कुन्तीको भेंट कर दिया ॥ २८ ॥ श्वशुरात् प्रीतिदायं तं प्राप्य सा प्रीतमानसा । चकार पुण्यकं तेन सुमहत् संघशः पृथा ॥ २९ ॥ श्वशुरकी ओरसे प्रेमपूर्वक मिले हुए उस धनको पाकर कुन्तीदेवी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं और उसके द्वारा उन्होंने बड़े-बड़े सामूहिक पुण्य-कार्य किये ॥ २९ ॥ गत्वा त्ववभृथं राजा विपाप्मा भ्रातृभिः सह । सभाज्यमानः शुशुभे महेन्द्रस्त्रिदशैरिव ॥ ३० ॥ यज्ञके अन्तमें अवभृथस्नान करके पापरहित हुए राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंसे सम्मानित हो इस प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे देवताओंसे पूजित देवराज इन्द्र सुशोभित होते हैं ॥ ३० ॥

पाण्डवाश्च महीपालैः समेतैरभिसंवृताः । अशोभन्त महाराज ग्रहास्तारागणैरिव ॥ ३१ ॥ महाराज! वहाँ आये हुए समस्त भूपालोंसे घिरे हुए पाण्डवलोग ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो तारोंसे घिरे हुए ग्रह सुशोभित हों ॥ ३१ ॥ राजभ्योऽपि ततः प्रादाद् रत्नानि विविधानि च । गजानश्वानलंकारान् स्त्रियो वासांसि काञ्चनम् ॥ ३२ ॥ तदनन्तर पाण्डवोंने यज्ञमें आये हुए राजाओंको भी तरह-तरहके रत्न, हाथी, घोड़े, आभूषण, स्त्रियाँ, वस्त्र और सुवर्ण भेंट किये ॥ ३२ ॥ तद् धनौघमपर्यन्तं पार्थः पार्थिवमण्डले । विसृजन् शुशुभे राजन् यथा वैश्रवणस्तथा ॥ ३३ ॥ राजन्! उस अनन्त धनराशिको भूपालमण्डलमें बाँटते हुए कुन्तीकुमार युधिष्ठिर कुबेरके समान शोभा पाते थे ॥ ३३ ॥ आनीय च तथा वीरं राजानं बभ्रुवाहनम् । प्रदाय विपुलं वित्तं गृहान् प्रास्थापयत् तदा ॥ ३४ ॥ तत्पश्चात् वीर राजा बभ्रुवाहनको अपने पास बुलाकर राजाने उसे बहुत-सा धन देकर विदा किया ॥ ३४ ॥ दुःशलायाश्च तं पौत्रं बालकं भरतर्षभ । स्वराज्येऽथ पितुर्धीमान् स्वसुः प्रीत्या न्यवेशयत् ॥ ३५ ॥ भरतश्रेष्ठ! अपनी बहिन दुःशलाकी प्रसन्नताके लिये बुद्धिमान् युधिष्ठिरने उसके बालक पौत्रको पिताके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया ॥ ३५ ॥ नृपतींश्चैव तान् सर्वान् सुविभक्तान् सुपूजितान् । प्रस्थापयामास वशी कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ ३६ ॥ जितेन्द्रिय कुरुराज युधिष्ठिरने सब राजाओंको अच्छी तरह धन दिया और उनका विशेष सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया ॥ ३६ ॥ गोविन्दं च महात्मानं बलदेवं महाबलम् । तथान्यान् वृष्णिवीरांश्च प्रद्युम्नाद्यान् सहस्रशः ॥ ३७ ॥ पूजयित्वा महाराज यथाविधि महाद्युतिः । भ्रातृभिः सहितो राजा प्रास्थापयदरिंदमः ॥ ३८ ॥ महाराज! इसके बाद महात्मा भगवान् श्रीकृष्ण, महाबली बलदेव तथा प्रद्युम्न आदि अन्यान्य सहस्रों वृष्णिवीरोंकी विधिवत् पूजा करके भाइयोंसहित शत्रुदमन महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरने उन सबको विदा किया ॥ ३७-३८ ॥ एवं बभूव यज्ञः स धर्मराजस्य धीमतः । बह्वन्नधनरत्नौघः सुरामैरेयसागरः ॥ ३९ ॥

सर्पिःपङ्का ह्रदा यत्र बभूवुश्चान्नपर्वताः । रसालाकर्दमा नद्यो बभूवुर्भरतर्षभ ॥ ४० ॥ इस प्रकार बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरका वह यज्ञ पूर्ण हुआ। उसमें अन्न, धन और रत्नोंके ढेर लगे हुए थे। देवताओंके मनमें अतिशय कामना उत्पन्न करनेवाली वस्तुओंका सागर लहराता था। कितने ही ऐसे तालाब थे, जिनमें घीकी कीचड़ जमी हुई थी और अन्नके तो पहाड़ ही खड़े थे। भरतभूषण! रससे भरी कीचड़रहित नदियाँ बहती थीं ॥ ३९-४० ॥

महाराज युधिष्ठिरके अश्वमेधयज्ञमें एक नेवलेका आगमन

भक्ष्यखाण्डवरागाणां क्रियतां भुज्यतां तथा । पशूनां बध्यतां चैव नान्तं ददृशिरे जनाः ॥ ४१ ॥ (पीपल और सोंठ मिलाकर जो मूँगका जूस तैयार किया जाता है, उसे 'खाण्डव' कहते हैं। उसीमें शक्कर मिला हुआ हो तो वह 'खाण्डवराग' कहा जाता है।) भक्ष्य-भोज्य पदार्थ और खाण्डवराग कितनी मात्रामें बनाये और खाये जाते हैं तथा कितने पशु वहाँ बाँधे हुए थे, इसकी कोई सीमा वहाँके लोगोंको नहीं दिखायी देती थी ।। ४१ ।। मत्तप्रमत्तमुदितं सुप्रीतयुवतीजनम् । मृदङ्गशङ्खनादैश्च मनोरममभूत् तदा ॥ ४२ ॥ उस यज्ञके भीतर आये हुए सब लोग मत्त-प्रमत्त और आनन्द विभोर हो रहे थे। युवतियाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ विचरण करती थीं। मृदंगों और शंखोंकी ध्वनियोंसे उस यज्ञशालाकी मनोरमता और भी बढ़ गयी थी ।। ४२ ।। दीयतां भुज्यतां चेष्टं दिवारात्रमवारितम् । तं महोत्सवसंकाशं हृष्टपुष्टजनाकुलम् ॥ ४३ ॥ कथयन्ति स्म पुरुषा नानादेशनिवासिनः । 'जिसकी जैसी इच्छा हो, उसको वही वस्तु दी जाय। सबको इच्छानुसार भोजन कराया जाय'—यह घोषणा दिन-रात जारी रहती थी—कभी बंद नहीं होती थी। हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस यज्ञ-महोत्सवकी चर्चा नाना देशोंके निवासी मनुष्य बहुत दिनोंतक करते रहे ॥ ४३ १/२ ॥ वर्षित्वा धनधाराभिः कामै रत्नै रसैस्तथा । विपाप्मा भरतश्रेष्ठः कृतार्थः प्राविशत् पुरम् ॥ ४४ ॥ भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उस यज्ञमें धनकी मूसलाधार वर्षा की। सब प्रकारकी कामनाओं, रत्नों और रसोंकी भी वर्षा की। इस प्रकार पापरहित और कृतार्थ होकर उन्होंने अपने नगरमें प्रवेश किया ।। ४४ ।। इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधसमाप्तौ एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधकी समाप्तिविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८९ ।।