अनुरागसागर वाणी
Anuragsagar Vani
स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
विष्णु बने ठाकुर
धर्मदास ने पूछा
हे साहब यह जान्यो भेदा। अब आगे का करहु उछेदा ॥
कहा कि अब आगे का भेद समझाकर कहें।
साहिब ने कहा
पुनि माता कहि विष्णु दुलारा। मरदयो मान जेठनिजबारा ॥
अहो बिस्नु तुम लेहु असीसा। सब देवन में तुमही ईसा ॥
प्रथम पुत्र ब्रह्मा दुरि गयऊ। अकरम झूठ ताहि प्रिय भयऊ ॥
देवन श्रेष्ठ तुमहिं कहैं मानहिं। तुम्हरी पूजा सब कोइ ठानहिं ॥
माता ने विष्णु को आशीर्वाद दिया कि तुम सब देवताओं में श्रेष्ठ होंगे, क्योंकि बड़े पुत्र ब्रह्मा ने झूठ और कुकर्म जैसे पाप किये, इसलिए अब सब तुम्हारी ही पूजा करेंगे।
रूद्र पास गयी तब माता। तुम शिव कहो हृदय की बाता ॥
माँगहु जो तुम्हरे चित भावे। सो तोहि देऊँ मात फरमावे ॥
अद्या ने फिर शिवजी से पूछा कि तुम क्या चाहते हो, माँग लो।
जोरि पानि शिव कहबे लीन्हा। देहु जननि जो आज्ञा कीन्हा ॥
कबहुँ न बिनसे मेरी देही। हे माता माँगों बर ऐही ॥
हे जननी यह कीजै दाय। कबहु न बिनसै मेरी काया ॥
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विष्णु बने ठाकुर
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साहिब बन्दगी
शिवजी ने कहा-हे माता! मेरा शरीर कभी न मिटे।
कह अष्टंगी अस नहीं होई। दूसरा अमर भयो नहीं कोई॥
करहु योग तप पवन सनेहा। रहै चार युग तुम्हरी देहा॥
जौ लौं पृथ्वी अकाश सनेही। कबहुँ न विनशै तुम्हरी देही॥
आद्य शक्ति ने कहा-हे शिव! दूसरा अमर कोई नहीं हुआ, तुम पवन योग करो, जब तक पृथ्वी, आकाश, ब्रह्माण्ड रहेगा, तुम्हारा शरीर रहेगा।
ब्रह्मा मन में भयो उदासा। तब चलि गयो विष्णु के पास॥
जाय विष्णु सो विनती ठाना। तुम हो बंधु देव परधाना॥
तुम पर माता भई दयाला। शाप विवश हम भये बिहाला॥
निज करनी फल पाये हो भाई। किहि विधि दोष लगाऊँ माई॥
अब अस जतन करो हो भ्राता। चले परिवार वचन रहे माता॥
ब्रह्मा जी उदास होकर विष्णु के पास गये और विनती करते हुए कहा कि माता तुम पर दयाल हुई और शाप के कारण मेरा बुरा हाल हुआ, तुमने अपनी करनी का फल ही पाया है, इसलिए माता को भी दोष नहीं लगाया जा सकता है, पर अब कोई ऐसा यत्न करो कि माता की बात भी रह जाए और मेरा वंश भी चले।
कहे विष्णु छोड़ो मन भंगा। मैं करिहौं सेवकाई संग॥
तुम जेठे हम लहुरे भाई। चित संशय सब देहु बहाई॥
जो कोई होवे भक्त हमारा। सो सेवै तुम्हरो परिवारा॥
विष्णु ने कहा-हे ब्रह्मा! तुम बड़े भाई हो और मैं छोटा हूँ, मैं
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आपकी सेवा करूँगा, इसलिए दुखी मत होवो। जो भी हमारा भक्त होगा, वो जो-2 पुण्य आदि कर्म(यज्ञ, कीर्तन, दान आदि)करेगा, सो तुम्हारे परिवार के द्वारा ही। यानी ब्राह्मणों द्वारा ही सब लोग शुभ कर्म करवाते हैं।
ब्रह्मा भये आनंद, जबहि विष्णु अस भासेऊ ॥
मेटेउ चित कर द्वंद, सखा मोर सब सुखी भौ ॥
यह सुन ब्रह्मा बहुत प्रसन्न हुए, उनके चित्त का क्लेश समाप्त हुआ, क्योंकि वे जान गये कि अब मेरी संतान सुखी हो जायेगी, छल-कपट करके भी सुख से रहेगी।
चलो चलो सब कोउ कहै, मोहि अंदेशा और। साहिब से परिचय नहीं, जायेंगे किस ठौर॥
चौरासी लाख योनियाँ बनीं
चौरासी लाख योनियाँ बनीं
यह सब द्वंद बाद है गयऊ। तब पुनि जग की रचना भयऊ॥ चौरासी लख योनिन भाऊ। चार खानि चारहु निर्माऊ॥
जब यह झगड़ा समाप्त हो गया तो फिर जगत की रचना की गयी, चौरासी लाख योनियाँ और चार खानि बनाई गयीं।
प्रथम अंडज रच्यो जननी, चतुरमुख पिंडज कियो॥
विष्णु उष्मज रच्यो तबही, रुद्र अस्थावर लियो॥
लीन्ह रचि जेहि खानि चारो, जीव बंधन दीन्ह हो॥
माता ने अंडज खानि की उत्पत्ति की, ब्रह्मा ने पिंडज खानि की उत्पत्ति की, विष्णु ने उकमज खानि के जीवों को रचा और शिवजी ने अस्थावर जीवों की रचना की। इस तरह चार खानि की रचना करके जीवों को बाँध दिया।
नौ लख जल के जीव बखानी। चौदह लाख पक्षी परवानी॥
किरम कीट सत्ताइस लाख। तीस लाख पिंडज भाखा॥
चतुर लक्ष मानुष परमाना। मानुष देह परम पद जाना॥
और योनि परिचय नहीं पावे। कर्म बंध भव भटका खावे॥
नौ लाख जल के जीव(अस्थावर)हैं, 14 लाख अंडज हैं, 27 लाख उकमज खानि के जीव(कीट-पतंगे)हैं, 30 लाख पिंडज खानि हैं और चार लाख मानुष योनि हैं। इनमें मनुष्य ही परम पद(मोक्ष) की प्राप्ति कर सकते हैं, बाकी नहीं।
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चार खानि के तत्व भेद
चार खानि के तत्व भेद
धर्मदास ने पूछा
धर्मदास नायो पद शीशा। यह समुझाय कहो जगदीशा॥
सकल योनि जिव एक समाना। किमि कारण नहिं इक सम ज्ञाना॥
सो चरित्र मुहि कहौ बुझाई। जाते चित संशय मिट जाई॥
धर्मदास ने पूछा-हे सदगुरु! सभी योनियों में यदि एक ही जीव है तो क्या कारण है कि सबमें एक समान ज्ञान नहीं है?
साहिब ने कहा
चार खानि जिव एकै आहीं। तत्व वशेष अहैं सुन ताहीं॥
सो अब तुमसों कहो बखानी। तत्व एक अस्थावर जानी॥
ऊष्मज दौय तत्व परमाना। अंडज तीन तत्वगुणजाना॥
पिंडज चार तत्व गुण कहिये। पाँच तत्व मानुष तन लहिये॥
तासों होय ज्ञान अधिकारी। नर की देह भक्ति अनुसारी॥
साहिब ने कहा कि यद्यपि चारों खानि में एक ही जीव है, पर तत्वों के कारण सबमें कम-ज्यादा ज्ञान है, चेतना है। अस्थावर खानि के जीवों की रचना एक तत्व से हुई है, उकमज में दो तत्व हैं, अंडज में तीन तत्व हैं, पिंडज में चार तत्व हैं और मनुष्य में पाँचों तत्व हैं। इसी कारण मनुष्य में ज्ञान अधिक है, यह भक्ति-ध्यान के अनुकूल है।
धर्मदास ने पूछा
हे साहिब मुहि कहु समुझाई। कौन कौन तत्व इन सब पाई॥
अंडज अरु पिंडज के संग। ऊष्मज और अस्थावर अंगा॥
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साहिब बन्दगी
सो साहिब मोहि वरणि सुनाओ । करो दया जनि मोहि दुराओ ॥
धर्मदास ने कहा कि कौन-2 सी खानि में कौन-2 से तत्व हैं, कृपा करके मुझे समझाकर कहिए, छिपाइए मत।
साहिब ने कहा
खानि अंडज तीन तत्व हैं, अप वायु अरु तेज हो।
अचल खानि एक तत्वहि, तत्व जल का थेग हो ॥
साहिब ने कहा कि अंडज खानि में तीन तत्व हैं-पानी, हवा और अग्नि। दूसरी ओर अस्थार में एक ही तत्व है-जल।
ऊष्मज तत हैं दोय, वायु तेज सम जानिये।
पिंडज चारहिं सोय, पृथ्वी तेज अप वायु सम ॥
उकमज में दो तत्व हैं-वायु और अग्नि। पिंडज में चार तत्व हैं-पृथ्वी, अग्नि, जल और वायु।
पिंडज नर की देह सँवारा । तामें पाँच तत्व विस्तारा ॥
ताते ज्ञान होय अधिकाई । गहे नाम सत लोकहिं जाई ॥
पिंडज की मनुष्य खानि में पाँच तत्व हैं, इसलिए उसमें अधिक ज्ञान है और वो नाम के सहारे अमर लोक जा सकता है।
दुर्लभ मानुष जन्म है, मिले न बारम्बार। तरुवर ज्यों पत्ती झड़े बहुरि न लागे डार ॥
ज्ञान विभिन्नता का कारण
ज्ञान विभिन्नता का कारण
धर्मदास पूछते हैं
कहे धर्मदास सुन बंदीछोरा । इक संशय प्रभु मेटो मोरा ॥ सब नर नारि तत्व सम आहीं । इक सम ज्ञान सबन को नाहीं ॥ दया सील संतोस छमा गुन । कोई शून्य कोई होय संपुरन ॥ कोई मनुष्य होय अपराधी । कोई सीतल कोई काल उपाधी ॥ नाना गुन किहि कारण होई । साहिब बरन सुनाओ सोई ॥
धर्मदास ने पूछा-हे साहिब! सभी नर-नारियों में भी एक समान ज्ञान क्यों नहीं है, जबकि सबमें तत्वों की समानता है। कोई पापी है तो कोई पुण्यात्मा, कोई ज्ञान शून्य है तो कोई बहुत ज्ञानवान। विभिन्न गुणों वाले नर-नारी क्यों हैं!
साहिब कहते हैं
धर्मदास परखहुँ चित्त लायी । नर नारि गुन कहुँ समझायी ॥ चारि खानि जीव भरमाया । तब ले नर की देही पाया ॥ देह धरे छोड़े जस खाना । तैसे का कहुँ ज्ञान बखाना ॥
साहिब धर्मदास से कहते हैं कि चार खानि में भरमने के बाद जीव को मनुष्य तन मिलता है और जिस खानि की देह को छोड़कर वो मानव तन में आता है, उसी के अनुसार उसमें ज्ञान और गुणों का समावेश हो जाता है।
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विभिन्न योनियों से मानव तन में आए हुएओं की पहचान
विभिन्न योनियों से मानव तन में आए
हुओं की पहचान
प्रथम अंडज की कहीं मैं बानी। एकहि एक कहो बिलछानी ॥ आलस निद्रा ता कहँ होइ। काम क्रोध दरिद्री सोइ ॥ चोरी चुगली निंदा ठाने। ज्ञान ध्यान कछु मनहिं न आनै ॥ गुरु सतगुरु चीन्हें नहिं भाई। वेद शास्त्र सब देइ उठाई ॥ आपन नीच ऊँच मन होई। हम सम दूसर और ना कोई ॥ मैंले बस्तर नहीं नहाई। आँख कीच मुख लार बहाई ॥ पाँसा जुवा चित्त मन आने। गुरु चरनन निसि नहिं जाने ॥ कुबरा मूढ़ ताहि का होई। लम्बा होय पाव पुनि सोई ॥
साहिब कह रहे हैं कि जो अंडज खानि से मानव तन में आए हैं, उनकी पहचान बताता हूँ। उनमें निद्रा होती है, काम, क्रोध, से ग्रस्त होते हैं, दरिद्री होते हैं, चोरी, चुगली, परायी निंदा आदि ही उनका काम होता है, दूसरों के घर में आग लगाते हैं। सबसे बहस करते हैं, पर कुछ भी ज्ञान, ध्यान उनमें नहीं होता। गुरु-सतगुरु की पहचान उन्हें नहीं होती, वेद-शास्त्रों का कुछ पता नहीं होता, तुच्छ होते हुए भी खुद को बड़ा समझते हैं, मैंले कपड़े पहने रखते हैं, आँखों से कीच और मुँह से लार टपकती रहती है, जुए में मस्त रहते हैं, सिर उनका कुबड़ा और पाँव लम्बे होते हैं।
कहेँ कबीर सुनो धर्मदासा। ऊष्मज भेद कहैं परकासा ॥ जाइ शिकार जीव बहु मारे। बहुत आनंद होय तिमि वारे ॥ मार जीव जब घर कहँ आयी। बहु विधि रांध ताहि कहँ खाई ॥ निंदे शब्द और गुरु देवा। निंदे चौका नरियर भेवा ॥
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झूठे वचन सभा में कहई। टेढ़ी पाग छोर उरमई ॥ दया धरम मनहीं नहिं आवे। करें पुण्य तेहि हाँसी लावे ॥ भाला तिलक अरु चंदन करई। हाट बजार चिकन पट फिरई ॥ अन्तर पापी ऊपर दया। सो जिव यम के हाथ बिकाया ॥ लंब दाँत अरु वदन भयावन। पीरे नेत्र ऊँच अति पावन ॥
उकमज खानि से मानव तन में जो आए होते हैं, उन्हें शिकार खेलने में बड़ा आनन्द आता है। शिकार मारकर लाते हैं, और बड़े यत्न से पकाकर खाते हैं। गुरु और उनके नाम की निंदा करते हैं, झूठ बोलते हैं, टेढ़ी पगड़ी पहनते हैं, जिसका छोर लम्बा लटकता रहता है, उनके हृदय में दया-धर्म कुछ भी नहीं होता और दूसरों को पुण्य कर्म करते देख उनकी हँसी उड़ाते हैं। खुद माथे पर तिलक और चन्दन लगाकर बाजार में मटक-2 कर चलते हैं, उनके हृदय में कपट होता है, हृदय उनका कठोर होता है और ऊपर से कोमल बनते हैं, उनके दाँत लम्बे और शरीर डरावना होता है, उनकी आँखें आगे को उभरी होती हैं।
अचल खानि को कहौँ सँदेसा। देह धरे जस होवें भेसा ॥ छनिक बुद्धि होवे जिव कैरी। पलटत बुद्धि न लागे बेरी ॥ झंगा फेटा सिर पर पागी। राज द्वार सेवा भल लागी ॥ इत उत चितवत सैन जुमारहि। पर नारी कहँ सैन बुलावहि ॥ रस सों बात कहें मुख जानी। काम बान लागे उर आनी ॥ पर घर ताकहिं चोरों जायी। लाज सर्म उपजे नहिं भाई ॥ छन इक मन महँ बिसरे देवा। छन इक मन महँ कीजे सेवा ॥ छन इक ज्ञानी पोथी बाँचा। छन इक माहिं सबन घर नाचा ॥ छन इक मन में कीजे धर्मा। छन इक मन में करे अकर्मा ॥ भोजन करत माथ खजआई। बाँह जाँघ पुनि भींजत भाई ॥
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साहिब बन्दगी
भोजन करत सोय पुनि जाई । जो जगाय तिहि मारन धाई ॥ आँखें लाल होहिं पुनि जाकी । कहैं लग भेद कहौं मैं ताकी ॥
अस्थावर खानि से मनुष्य योनि में आने वालों की बुद्धि स्थिर नहीं होती, उनका निर्णय बदलता रहता है, सिर पर पगड़ी बाँधे रहते हैं, सरकारी नौकरी करते हैं, दूसरे की स्त्री की तरफ नज़र रखते हैं, इशारे से बुलाते हैं, कामुक बातें करते हैं और चोरों की तरह दूसरों के घर में घुसते हैं, यदि पकड़ लिए जाते हैं तो भी कोई शर्म नहीं होती, हँसते रहते हैं, एक क्षण में तो अपने ईष्ट को भूल जाते हैं और दूसरे ही क्षण उनकी सेवा करने लग जाते हैं, एक क्षण में तो पोथियाँ पढ़ने लगते हैं और दूसरे ही क्षण सबके घर में मौका मिलने पर नाचने लग जाते हैं, एक पल में तो शूरवीर हो जाते हैं और दूसरे ही पल कायर हो जाते हैं, एक पल तो अच्छे हो कर्म करने लगते हैं और दूसरे ही पल कुकर्मों में लग जाते हैं। भोजन करते हुए अपना माथा खुजलाते हैं, बाँह और जाँघ मलते हैं, भोजन के बाद सो जाते हैं और यदि कोई जगाए तो उसे मारने दौड़ते हैं, उनकी आँखें लाल होती हैं, उनका भेद कहाँ तक कहा जाए!
पिंडज खानिक लच्छ सुनाऊँ । गुन औगुन का भेद बताऊँ ॥ बैरागी उनमुनि मति धारी । करे धर्म पुनि वेद विचारी ॥ तीरथ औ पुनि योग समाधि । गुरु के चरण चित्त भल बाँधी ॥ वेद पुराण कथे बहु ज्ञाना । सभा बैठि बातें भल ठाना ॥ राज भोग कामिनि सुख माने । मन शंका कबहुँ नहिं आने ॥ उत्तम भोजन बहुत सुहाई । लौंग सुपारी बीरा खाई ॥ चच्छु तेज जाकर पुनि जानी । पराक्रम देही बल ठानी ॥ देखो स्वर्ग सदा तेहि हाथा । देखे प्रतिमा नावे माथा ॥
पिंडज खानि से मानव तन में आने वालों में वैराग्य होता है, वे वेद के अनुसार धर्म कार्य करते हैं, तीर्थ, योग आदि करते हैं और गुरु से प्रेम
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करते हैं, वेद, पुराण पढ़कर ज्ञान चर्चा करते हैं, राज भोग और स्त्री से प्रसन्न रहते हैं, मन में शंका नहीं आने देते हैं, उत्तम भोजन अच्छा लगता है, उनकी आँखों में तेज होता है, देह में पराक्रम होता है, स्वर्ग तो उनके हाथ ही होता है यानी अपने कर्मों से वे स्वर्ग तो हासिल कर ही लेते हैं।
छूटे नर की देह, जन्म धरे फिर आय के ॥
ताको कहैं संदेश, धर्मदास सुन कान दे ॥
साहिब कहते हैं कि जो मानव शरीर छोड़कर पुनः मानव तन पाता है, अब उसकी पहचान बताता हूँ।
आइ अछत जो नर मर जाई। जन्म धरे मानुस को आई ॥
सूरा होवे नर के माँहीं। भय डर ताके निकट न जाहीं ॥
माया मोह ममता नहिं व्यापे। दुश्मन ताहिं देख डर काँपे ॥
सत्य शब्द प्रतीत कर माने। निंदा रूप न कबहीं जाने ॥
सतगुरु चरण सदा चित राखे। प्रेम प्रीति सो दीनन भाखे ॥
ज्ञान अज्ञान दोइ कहैं बूझे। सत्य नाम परिचय नित सूझे ॥
जो मानुस अस लछन होई। धर्मदास लिख राखो सोई ॥
जो कुछ मानव तन पाने के बाद जल्दी शरीर छोड़ देते हैं, अपनी पूरी आयु से पहले शरीर त्याग देते हैं, वे वीर पुरुष होते हैं, उनके पास भय नाम की कोई वस्तु टिकती भी नहीं, उन्हें माया, मोह, ममता आदि भी नहीं सताती और उनके दुश्मन भी उनसे डरते हैं। वे सत्य शब्दों को प्रेम पूर्वक मान लेते हैं और दूसरों की निंदा नहीं करते। वे गुरु चरणों में चित लगाए रखते हैं, सत्य नाम को पहचान लेते हैं। ऐसे लक्षण जिनमें होते हैं, वे मानुष से मानुष तन में अपनी छूटी हुई आयु पूरी करने आए होते हैं।
चौरासी की धारा क्यों बनी?
चौरासी की धारा क्यों बनीं !
धर्मदास पूछते हैं
चौरासी योनिन की धारा । किह कारण यह कीन्ह पसारा ॥
नर कारण यह सृष्टि बनाई । कै कोइ और जीव भुगताई ॥
धर्मदास जी साहिब से पूछ रहे हैं कि मनुष्य के कारण यह सृष्टि बनाई गयी, फिर दूसरी योनियाँ क्यों बनीं ! यानी चौरासी लाख योनियाँ क्यों बनाई गयीं !
साहिब ने कहा
धर्मनि नर देही सुखदायी । नर देही गुरु ज्ञान समायी ॥
नर तनु काज कीन्ह चौरासी । शब्द न गहे मूढ़ मति नाशी ॥
चौरासी की चाल न छाड़े । सत्य नाम सो नेह न माड़े ॥
लै डारे चौरासी माहीं । परचै ज्ञान जहाँ कछु नाहीं ॥
पुनि पुनि दौड़ काल मुख जाहीं । ताहू ते जिव चेतत नाहीं ॥
यह तन पाय गहे सतनामा । नाम प्रताप लहे निजधामा ॥
साहिब धर्मदास से कहते हैं कि यह मानव-चोला बड़ा ही सुखदायी है, इसी में गुरु ज्ञान समा सकता है। वास्तव में इस मानव चोले के कारण ही चौरासी बनायी गयी ताकि जीव मूर्ख रहे, सत्य शब्द को न पकड़ पाए। (क्योंकि विभिन्न योनियों से आने के कारण जीव चेतन नहीं हो पाता है, यदि लगातार मानव चोला मिलता रहे तो जीव चेतन होकर भक्ति में लग जायेंगे और संसार का कार्य नहीं चलेगा) इसलिए उसे चौरासी में डाला गया, जहाँ ज्ञान नहीं है, जहाँ आत्म-साक्षात्कार नहीं किया जा सकता। इसी कारण बार-2 जीव काल के मुख में जाता है और चेतन नहीं हो पाता है। यदि मानव तन पाकर कोई सच्चे नाम को पकड़ ले तो अमर-लोक चला जाता है।
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निह अछर है सार, अछर ते लिखि पावई ॥
धर्मनि करो विचार, निह अछर निह तत्व है ॥
साहिब धर्मदास को सार तत्व के विषय में समझाते हुए कह रहे हैं कि वो निःअक्षर है, अक्षर की सीमा से परे है, अक्षर तो लिखा जा सकता है, इसलिए हे धर्मदास! जो सार तत्व है, वो निःअक्षर है, निःतत्व है।
शब्द शब्द सब कोई कहे, वह तो शब्द विदेह। जिभया पर आवे नहीं, निरख परख के लेह ॥
रक्षक की कला दिखा अंत में जीवों को खा जाता है निरंजन
रक्षक की कला दिखा अंत में जीवों को
खा जाता हैं निरंजन
धर्मदास ने पूछा
धर्मदास कहे शुभ दिन मोरा । हे प्रभु दर्शन पायउ तोरा ॥ हे साहिब मैं तुम बलिहारी । आगल कथा कहो निरवारी ॥ चार खानि रचि पुनि कस कीन्हा । सो सब मोहि बतावो चीन्हा ॥
धर्मदास जी ने कहा—हे साहिब । आज बहुत ही शुभ दिन है जो आपका दर्शन हुआ, कृपा करके अब मुझे आगे की कथा कहो, मुझे बताओ कि चार खानि की रचना के बाद क्या किया गया !
साहिब ने कहा
सुन धर्मन यह है यमबाजी । जेहि न चीन्हे पंडित काजी ॥ चारहु मिलि यह रचना कीन्हा । कच्चा रंग सु जीवहि दीन्हा ॥ पाँच तत्व तीनों गुण जानो । चौदह यम ता संग पिछानो ॥ यहि विधि कीन्हीं नर की काया । मारे खाय बहुरि उपजाया ॥ ओंकार है वेद को मूला । ओंकार में सब जग भूला ॥ है ओंकार निरंजन जानो । पुरुष नाम सो गुप्त अमानो ॥ सहस अठासी ब्रह्मा जाया । भा विस्तार काल की छाया ॥ ब्रह्मा ते जिव उपजे बारा । तिन पुनि कथे बहुत विस्तारा ॥ स्मृति शास्त्र पुराण भटकावा । अलख निरंजन ध्यान दृढ़ावा ॥ वेद मते सब जिव भरमाने । सत्य पुरुष को मर्म न जाने ॥ निरंकार कस कीन्ह तमासा । सो चरित्र बूझो धर्मदासा ॥
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साहिब कह रहे हैं—हे धर्मदास! यह काल का खेल पंडित-काजी आदि नहीं समझ पाए। अद्वा और त्रिदेव ने मिल जगत की रचना की और जीव को कच्छा रंग दिया यानी नश्वर शरीर में डाला। पाँच तत्व, तीन गुण और 14 यम एक जीव के साथ कर दिये। यानी 14 यम इस काया में जीव को भटकाने के लिए रखे। इस तरह मनुष्य की देही का निर्माण किया और बार-2 मार-खाकर बार-2 उत्पन्न किया। वेद में भी ओंकार की बात की गयी और इसी ओंकार में सारा जगत भटक गया। यही ओंकार निरंजन अथवा निरंकार है। परम पुरुष का भेद गुप्त रखा गया। काल ने अपना इतना विस्तार किया कि 88 हजार ब्रह्मा उत्पन्न किये, फिर ब्रह्मा ने आगे जीवों की सृष्टि की और वेद, शास्त्र आदि में सबको उलझा दिया, निरंजन का ध्यान करने को कहा। वेद-मत के अनुसार सभी जीव भ्रमित हुए, परम पुरुष का भेद नहीं मिला। साहिब कह रहे हैं— हे धर्मदास! यह सब निरंजन ने ही किया।
असुर है जीव सतावै, देव ऋषि मुनि कारकं । पुनि धरि अवतार रक्षक, असुर करत संहारकं ॥ जीव को दिखलाय लीला, आपनी महिमा घनी । यहि जान जीव बाँध आसा, यही है रक्षक धनी ॥ रक्षक कला दिखलाय कर, अंत काल भक्षण करै । पीछे जीव पछिताय बहुत, जब काल के मुख में परै ॥
यही निरंजन असुर रूप में आकर जीवों को सताता है, ऋषि-मुनियों को तंग करता है और फिर यही अवतार धारण कर रखवाला बनने की कला दिखाते हुए असुरों का संहार करता है। यह जीवों को अपनी लीला दिखाकर अपनी महिमा बताता है और जीव सोचते हैं कि शायद यही रक्षक है, पर वो रक्षक की कला दिखाकर अंतकाल में जीवों को खा जाता है। और फिर जीव जब काल के मुख में जाते हैं तो पछताते हैं।
जीवों को कष्ट दिये निरंजन ने
जीवों को कष्ट दिये निरंजन ने
यम बाजी कोई चीन्ह न पाया। आशा दे यम जीव नचाया ॥ लख जीव नित प्रति खाई। महा अपरबल काल कसाई ॥ तप्त शिला निशि दिन तहँ जरइ। तापर लै जीवन कहँ धरई ॥ जीवहि जारे कष्ट दिलावे। तब फिर लै चौरासी नावे ॥
साहिब कह रहे हैं कि काल का खेल कोई नहीं समझ पाया, यह ऐसा भयानक कसाई है कि लाख जीवों को प्रतिदिन तप्त शिला पर भून-भून कर खाता है। जीवों को जलाकर कष्ट देकर फिर चौरासी की खानि में फेंक देता है।
जीव कीन्ह तब बहुत पुकारा। काल कष्ट देत अपारा ॥
यमकर कष्ट सह्यो न जाई। है कोई रक्षक करो सहाई ॥
ऐसे मैं जब काल जीवों को बहुत कष्ट दे रहा था तो जीवों ने पुकार की कि काल हमें बड़ा कष्ट दे रहा है, जो हमसे सहा नहीं जा रहा। यदि कोई रक्षक है तो हमें बचाओ!
चकिया सब रागन की रानी ॥ एक पट धरती चले, एक चले असमानी। काल निरंजन पीसन लागे सवालाख की धानी ॥
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अमर लोक से साहिब चले
अमर लोक से साहिब चले
देख जीवन विकल अति, दया पुरुष जनाइया। दयानिधि सत पुरुष साहिब, तबहिं मोहिं बुलाइया ॥ कहे मुहिं समुझाय बहु विधि, जीव जाय चितावहू। तुम दरश ते हो जीव शीतल, जाय तपन बुझावहू ॥
जीवों की पुकार जब परम पुरुष के पास पहुँची तो वे दयाल हुए, कबीर साहिब कह रहे हैं कि तब उन्होंने मुझे बुलाया और समझाकर कहा कि जीवों को चिताकर ले आओ।
कर परनाम ज्ञानी चले, करन हँस को काज। जोपै काल न मानि है, तुम्हीं पुरुष को लाज ॥
परम पुरुष को प्रणाम कर जीवों के काम के लिए साहिब चल पड़े।
नो भी पिस गये दस भी पिस गये, पिस गये सहज अठासी। कथनी कथ कथ पिस गये भक्ता, भये गर्भ के वासी ॥
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निरंजन ने की साहिब से बहस
निरंजन ने साहिब से बहस की
जबहिं पुरुष आज्ञा कीन्हा। जीवन काज पृथ्वी पग दीन्हा ॥ आवत मिल्यो धर्म अन्याई। तिन पुनि हमसो रार बढ़ाई ॥ मो कहँ देखि धर्म ढिग आवा। महा क्रोध बोले अतुरावा ॥ योगजीत इहँवा कस आवो। सो तुम हमसों वचन सुनावो ॥
जब साहिब आए तो रास्ते में निरंजन मिला, उसने क्रोधित होकर पूछा कि यहाँ क्यों आए हो!
निरंजन ने कहा
जाहु ज्ञानी घर आपने, मानो वचन हमार। तीन लोक पुरुषहिं दिये, स्वर्ग पताल संसार ॥
निरंजन ने कहा—हे ज्ञानी! वापिस अपने घर जाओ, यह संसार मेरा है, परम-पुरुष ने दिया है।
साहिब ने कहा
मुहि जो पठयो पुरुष को, करन हंस के काज। कालहि मार संहारि हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥
साहिब ने कहा कि मुझे परम पुरुष ने जीवों के कल्याण के लिए भेजा है, तुझे मारने का सामान भी उन्होंने मुझे दिया है।
तासों कह्यो सुनो धर्मराई। जीव काज संसार सिधाई ॥ तप्त शिला पर जीव जरावहु। जारि बारि निज स्वाद करावहु ॥ तुम अस कष्ट जीव कहँ दीन्हा। तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीन्हा ॥ जीव चिताय लोक लै जाऊँ। काल कष्ट से जीव बचाऊँ ॥ ताते हम संसारहि जायब। दे परवाना लोक पठायब ॥
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साहिब ने कहा कि तुम तप्त शिला पर जीवों को भून-2 कर खा रहे हो, उन्हें अपार कष्ट दे रहे हो, इसलिए परम पुरुष की आज्ञा से मैं यहाँ आया हूँ, जीवों को चिताकर अमर लोक ले जाऊँगा।
निरंजन ने कहा
तबै निरंजन बोले बानी। कैसे हंस छुड़ावो ज्ञानी ॥ जग के माहिं कीन्ह हम बासा। पशु पंछी जल थल में आसा ॥ तिनसौ साठ हम पैठ लगाहीं। तामें सकल जीव उरझाहीं ॥ तापर काम क्रोध हम डारी। तृष्णा सकल जीव कहँ मारी ॥ तापर कीन्हों एक हम काजा। पाप पुण्य थापे हम राजा ॥ इनमें जीव बंधे सब झारी। कैसे हंसहि लेव उबारी ॥
निरंजन ने कहा कि जीवों को कैसे छुड़ा ले जाओगे! कहा- मैं ही सब में समाया हुआ हूँ। (मन रूप में निरंजन सबके अन्दर बैठा है) फिर तीन सौ ऐसे स्थान हैं, जहाँ मैंने पैठ लगायी हुई है, (360 ऐसे स्थान हैं जहाँ निरंजन ने थोड़ी-2 शक्तियाँ रखी हुई हैं, खुद बैठा हुआ है) सभी उनमें उलझे हैं, इस पर भी मैंने सबको काम, क्रोध, तृष्णा आदि से मारा हुआ है, बेहाल किया हुआ है। फिर मैंने पाप-पुण्य में जीव को बाँध दिया है, तुम उन्हें कैसे छुड़ाओगे!
साहिब ने कहा
सत्त शब्द हम बोले बानी। बचन हमारे छूटे प्राणी ॥ गहै शब्द जब मन चित्तलाई। भजिहै काल जिव लेब छुड़ाई ॥
साहिब ने कहा कि मैं सत्य कह रहा हूँ, जब जीव मेरे शब्द को पकड़ लेगा, वो छूट जायेगा।
निरंजन ने कहा
तबै निरंजन बोले बानी। सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ॥ तिनसौ साठ पैठ उरझेरा। कैसे हंसन लेव उबेरा ॥
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साहिब बन्दगी
गंगा जमुना सरसवती जानी । पुष्कर गोदावरी मानी ॥ बद्री केदार हमका ठाऊँ । जहाँ तहाँ हम तीरथ लगाऊँ ॥ सेतु बन्ध पुनि कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आय हम थाना ॥ गढ़ गिरनार दत्त को थाना । ताहि घेर हम बैठे निहाना ॥ कमरू माह कमच्छा देवी । नीमखार मिसरख जम लेवी ॥ नगर अयोध्या रामहिं राजा । खैहैं दइत बाँध सब साजा ॥ याही पैठ जग जीव भुलाई । किहिं विधि हंस लेव मुकताई ॥
निरंजन ने कहा कि बड़े स्थान हैं, जहाँ जीव भ्रमित है। गंगा, यमुना, गोदावरी, मथुरा, बद्रीनाथ, केदार, अयोध्या, पुष्कर आदि जगहों पर बैठ मैंने जीवों को भुलाया हुआ है, फिर किस विधि से तुम उन्हें छुड़ाओगे!
साहिब ने कहा
तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमते जीव छुड़ावहुँ आनी ॥ पुरुष नाम को कहुँ समुझाई । जम राजा तब छोड़ पराई ॥ घाट-घाट बैठे उरझेरा । हमरे शब्द ते होय निबेरा ॥ सुन रे काल दुष्ट अन्याई । शब्द सग हंस घर जाई ॥
साहिब ने कहा—हे निरंजन! मैं परम पुरुष का नाम दूँगा, यम का जोर फिर उनपर नहीं चलेगा, तुम स्थान-2 पर बैठे उन्हें भ्रमित कर रहे हो, मेरे शब्द से वे छूट जायेंगे, शब्द उन्हें अपने साथ अमर लोक ले जायेगा।
निरंजन ने कहा
का ज्ञानी देहो अधिकारा । हमरो नहिं छूटे यम जारा ॥ पाँच पचीस तीन गुन आही । यह लै सकल शरीर बनाई ॥ तामें पाप पुण्य को वासा । मन बैठा ले हमरी फाँसा ॥