भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अनुरागसागर वाणी

Anuragsagar Vani

स्वामी मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished144 पृष्ठ

अनुरागसागर वाणी

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झूठे वचन सभा में कहई। टेढ़ी पाग छोर उरमई ॥ दया धरम मनहीं नहिं आवे। करें पुण्य तेहि हाँसी लावे ॥ भाला तिलक अरु चंदन करई। हाट बजार चिकन पट फिरई ॥ अन्तर पापी ऊपर दया। सो जिव यम के हाथ बिकाया ॥ लंब दाँत अरु वदन भयावन। पीरे नेत्र ऊँच अति पावन ॥

उकमज खानि से मानव तन में जो आए होते हैं, उन्हें शिकार खेलने में बड़ा आनन्द आता है। शिकार मारकर लाते हैं, और बड़े यत्न से पकाकर खाते हैं। गुरु और उनके नाम की निंदा करते हैं, झूठ बोलते हैं, टेढ़ी पगड़ी पहनते हैं, जिसका छोर लम्बा लटकता रहता है, उनके हृदय में दया-धर्म कुछ भी नहीं होता और दूसरों को पुण्य कर्म करते देख उनकी हँसी उड़ाते हैं। खुद माथे पर तिलक और चन्दन लगाकर बाजार में मटक-2 कर चलते हैं, उनके हृदय में कपट होता है, हृदय उनका कठोर होता है और ऊपर से कोमल बनते हैं, उनके दाँत लम्बे और शरीर डरावना होता है, उनकी आँखें आगे को उभरी होती हैं।

अचल खानि को कहौँ सँदेसा। देह धरे जस होवें भेसा ॥ छनिक बुद्धि होवे जिव कैरी। पलटत बुद्धि न लागे बेरी ॥ झंगा फेटा सिर पर पागी। राज द्वार सेवा भल लागी ॥ इत उत चितवत सैन जुमारहि। पर नारी कहँ सैन बुलावहि ॥ रस सों बात कहें मुख जानी। काम बान लागे उर आनी ॥ पर घर ताकहिं चोरों जायी। लाज सर्म उपजे नहिं भाई ॥ छन इक मन महँ बिसरे देवा। छन इक मन महँ कीजे सेवा ॥ छन इक ज्ञानी पोथी बाँचा। छन इक माहिं सबन घर नाचा ॥ छन इक मन में कीजे धर्मा। छन इक मन में करे अकर्मा ॥ भोजन करत माथ खजआई। बाँह जाँघ पुनि भींजत भाई ॥

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साहिब बन्दगी

भोजन करत सोय पुनि जाई । जो जगाय तिहि मारन धाई ॥ आँखें लाल होहिं पुनि जाकी । कहैं लग भेद कहौं मैं ताकी ॥

अस्थावर खानि से मनुष्य योनि में आने वालों की बुद्धि स्थिर नहीं होती, उनका निर्णय बदलता रहता है, सिर पर पगड़ी बाँधे रहते हैं, सरकारी नौकरी करते हैं, दूसरे की स्त्री की तरफ नज़र रखते हैं, इशारे से बुलाते हैं, कामुक बातें करते हैं और चोरों की तरह दूसरों के घर में घुसते हैं, यदि पकड़ लिए जाते हैं तो भी कोई शर्म नहीं होती, हँसते रहते हैं, एक क्षण में तो अपने ईष्ट को भूल जाते हैं और दूसरे ही क्षण उनकी सेवा करने लग जाते हैं, एक क्षण में तो पोथियाँ पढ़ने लगते हैं और दूसरे ही क्षण सबके घर में मौका मिलने पर नाचने लग जाते हैं, एक पल में तो शूरवीर हो जाते हैं और दूसरे ही पल कायर हो जाते हैं, एक पल तो अच्छे हो कर्म करने लगते हैं और दूसरे ही पल कुकर्मों में लग जाते हैं। भोजन करते हुए अपना माथा खुजलाते हैं, बाँह और जाँघ मलते हैं, भोजन के बाद सो जाते हैं और यदि कोई जगाए तो उसे मारने दौड़ते हैं, उनकी आँखें लाल होती हैं, उनका भेद कहाँ तक कहा जाए!

पिंडज खानिक लच्छ सुनाऊँ । गुन औगुन का भेद बताऊँ ॥ बैरागी उनमुनि मति धारी । करे धर्म पुनि वेद विचारी ॥ तीरथ औ पुनि योग समाधि । गुरु के चरण चित्त भल बाँधी ॥ वेद पुराण कथे बहु ज्ञाना । सभा बैठि बातें भल ठाना ॥ राज भोग कामिनि सुख माने । मन शंका कबहुँ नहिं आने ॥ उत्तम भोजन बहुत सुहाई । लौंग सुपारी बीरा खाई ॥ चच्छु तेज जाकर पुनि जानी । पराक्रम देही बल ठानी ॥ देखो स्वर्ग सदा तेहि हाथा । देखे प्रतिमा नावे माथा ॥

पिंडज खानि से मानव तन में आने वालों में वैराग्य होता है, वे वेद के अनुसार धर्म कार्य करते हैं, तीर्थ, योग आदि करते हैं और गुरु से प्रेम

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करते हैं, वेद, पुराण पढ़कर ज्ञान चर्चा करते हैं, राज भोग और स्त्री से प्रसन्न रहते हैं, मन में शंका नहीं आने देते हैं, उत्तम भोजन अच्छा लगता है, उनकी आँखों में तेज होता है, देह में पराक्रम होता है, स्वर्ग तो उनके हाथ ही होता है यानी अपने कर्मों से वे स्वर्ग तो हासिल कर ही लेते हैं।

छूटे नर की देह, जन्म धरे फिर आय के ॥

ताको कहैं संदेश, धर्मदास सुन कान दे ॥

साहिब कहते हैं कि जो मानव शरीर छोड़कर पुनः मानव तन पाता है, अब उसकी पहचान बताता हूँ।

आइ अछत जो नर मर जाई। जन्म धरे मानुस को आई ॥

सूरा होवे नर के माँहीं। भय डर ताके निकट न जाहीं ॥

माया मोह ममता नहिं व्यापे। दुश्मन ताहिं देख डर काँपे ॥

सत्य शब्द प्रतीत कर माने। निंदा रूप न कबहीं जाने ॥

सतगुरु चरण सदा चित राखे। प्रेम प्रीति सो दीनन भाखे ॥

ज्ञान अज्ञान दोइ कहैं बूझे। सत्य नाम परिचय नित सूझे ॥

जो मानुस अस लछन होई। धर्मदास लिख राखो सोई ॥

जो कुछ मानव तन पाने के बाद जल्दी शरीर छोड़ देते हैं, अपनी पूरी आयु से पहले शरीर त्याग देते हैं, वे वीर पुरुष होते हैं, उनके पास भय नाम की कोई वस्तु टिकती भी नहीं, उन्हें माया, मोह, ममता आदि भी नहीं सताती और उनके दुश्मन भी उनसे डरते हैं। वे सत्य शब्दों को प्रेम पूर्वक मान लेते हैं और दूसरों की निंदा नहीं करते। वे गुरु चरणों में चित लगाए रखते हैं, सत्य नाम को पहचान लेते हैं। ऐसे लक्षण जिनमें होते हैं, वे मानुष से मानुष तन में अपनी छूटी हुई आयु पूरी करने आए होते हैं।

चौरासी की धारा क्यों बनी?

चौरासी की धारा क्यों बनीं !

धर्मदास पूछते हैं

चौरासी योनिन की धारा । किह कारण यह कीन्ह पसारा ॥

नर कारण यह सृष्टि बनाई । कै कोइ और जीव भुगताई ॥

धर्मदास जी साहिब से पूछ रहे हैं कि मनुष्य के कारण यह सृष्टि बनाई गयी, फिर दूसरी योनियाँ क्यों बनीं ! यानी चौरासी लाख योनियाँ क्यों बनाई गयीं !

साहिब ने कहा

धर्मनि नर देही सुखदायी । नर देही गुरु ज्ञान समायी ॥

नर तनु काज कीन्ह चौरासी । शब्द न गहे मूढ़ मति नाशी ॥

चौरासी की चाल न छाड़े । सत्य नाम सो नेह न माड़े ॥

लै डारे चौरासी माहीं । परचै ज्ञान जहाँ कछु नाहीं ॥

पुनि पुनि दौड़ काल मुख जाहीं । ताहू ते जिव चेतत नाहीं ॥

यह तन पाय गहे सतनामा । नाम प्रताप लहे निजधामा ॥

साहिब धर्मदास से कहते हैं कि यह मानव-चोला बड़ा ही सुखदायी है, इसी में गुरु ज्ञान समा सकता है। वास्तव में इस मानव चोले के कारण ही चौरासी बनायी गयी ताकि जीव मूर्ख रहे, सत्य शब्द को न पकड़ पाए। (क्योंकि विभिन्न योनियों से आने के कारण जीव चेतन नहीं हो पाता है, यदि लगातार मानव चोला मिलता रहे तो जीव चेतन होकर भक्ति में लग जायेंगे और संसार का कार्य नहीं चलेगा) इसलिए उसे चौरासी में डाला गया, जहाँ ज्ञान नहीं है, जहाँ आत्म-साक्षात्कार नहीं किया जा सकता। इसी कारण बार-2 जीव काल के मुख में जाता है और चेतन नहीं हो पाता है। यदि मानव तन पाकर कोई सच्चे नाम को पकड़ ले तो अमर-लोक चला जाता है।

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निह अछर है सार, अछर ते लिखि पावई ॥

धर्मनि करो विचार, निह अछर निह तत्व है ॥

साहिब धर्मदास को सार तत्व के विषय में समझाते हुए कह रहे हैं कि वो निःअक्षर है, अक्षर की सीमा से परे है, अक्षर तो लिखा जा सकता है, इसलिए हे धर्मदास! जो सार तत्व है, वो निःअक्षर है, निःतत्व है।

शब्द शब्द सब कोई कहे, वह तो शब्द विदेह। जिभया पर आवे नहीं, निरख परख के लेह ॥

रक्षक की कला दिखा अंत में जीवों को खा जाता है निरंजन

रक्षक की कला दिखा अंत में जीवों को

खा जाता हैं निरंजन

धर्मदास ने पूछा

धर्मदास कहे शुभ दिन मोरा । हे प्रभु दर्शन पायउ तोरा ॥ हे साहिब मैं तुम बलिहारी । आगल कथा कहो निरवारी ॥ चार खानि रचि पुनि कस कीन्हा । सो सब मोहि बतावो चीन्हा ॥

धर्मदास जी ने कहा—हे साहिब । आज बहुत ही शुभ दिन है जो आपका दर्शन हुआ, कृपा करके अब मुझे आगे की कथा कहो, मुझे बताओ कि चार खानि की रचना के बाद क्या किया गया !

साहिब ने कहा

सुन धर्मन यह है यमबाजी । जेहि न चीन्हे पंडित काजी ॥ चारहु मिलि यह रचना कीन्हा । कच्चा रंग सु जीवहि दीन्हा ॥ पाँच तत्व तीनों गुण जानो । चौदह यम ता संग पिछानो ॥ यहि विधि कीन्हीं नर की काया । मारे खाय बहुरि उपजाया ॥ ओंकार है वेद को मूला । ओंकार में सब जग भूला ॥ है ओंकार निरंजन जानो । पुरुष नाम सो गुप्त अमानो ॥ सहस अठासी ब्रह्मा जाया । भा विस्तार काल की छाया ॥ ब्रह्मा ते जिव उपजे बारा । तिन पुनि कथे बहुत विस्तारा ॥ स्मृति शास्त्र पुराण भटकावा । अलख निरंजन ध्यान दृढ़ावा ॥ वेद मते सब जिव भरमाने । सत्य पुरुष को मर्म न जाने ॥ निरंकार कस कीन्ह तमासा । सो चरित्र बूझो धर्मदासा ॥

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साहिब कह रहे हैं—हे धर्मदास! यह काल का खेल पंडित-काजी आदि नहीं समझ पाए। अद्वा और त्रिदेव ने मिल जगत की रचना की और जीव को कच्छा रंग दिया यानी नश्वर शरीर में डाला। पाँच तत्व, तीन गुण और 14 यम एक जीव के साथ कर दिये। यानी 14 यम इस काया में जीव को भटकाने के लिए रखे। इस तरह मनुष्य की देही का निर्माण किया और बार-2 मार-खाकर बार-2 उत्पन्न किया। वेद में भी ओंकार की बात की गयी और इसी ओंकार में सारा जगत भटक गया। यही ओंकार निरंजन अथवा निरंकार है। परम पुरुष का भेद गुप्त रखा गया। काल ने अपना इतना विस्तार किया कि 88 हजार ब्रह्मा उत्पन्न किये, फिर ब्रह्मा ने आगे जीवों की सृष्टि की और वेद, शास्त्र आदि में सबको उलझा दिया, निरंजन का ध्यान करने को कहा। वेद-मत के अनुसार सभी जीव भ्रमित हुए, परम पुरुष का भेद नहीं मिला। साहिब कह रहे हैं— हे धर्मदास! यह सब निरंजन ने ही किया।

असुर है जीव सतावै, देव ऋषि मुनि कारकं । पुनि धरि अवतार रक्षक, असुर करत संहारकं ॥ जीव को दिखलाय लीला, आपनी महिमा घनी । यहि जान जीव बाँध आसा, यही है रक्षक धनी ॥ रक्षक कला दिखलाय कर, अंत काल भक्षण करै । पीछे जीव पछिताय बहुत, जब काल के मुख में परै ॥

यही निरंजन असुर रूप में आकर जीवों को सताता है, ऋषि-मुनियों को तंग करता है और फिर यही अवतार धारण कर रखवाला बनने की कला दिखाते हुए असुरों का संहार करता है। यह जीवों को अपनी लीला दिखाकर अपनी महिमा बताता है और जीव सोचते हैं कि शायद यही रक्षक है, पर वो रक्षक की कला दिखाकर अंतकाल में जीवों को खा जाता है। और फिर जीव जब काल के मुख में जाते हैं तो पछताते हैं।

जीवों को कष्ट दिये निरंजन ने

जीवों को कष्ट दिये निरंजन ने

यम बाजी कोई चीन्ह न पाया। आशा दे यम जीव नचाया ॥ लख जीव नित प्रति खाई। महा अपरबल काल कसाई ॥ तप्त शिला निशि दिन तहँ जरइ। तापर लै जीवन कहँ धरई ॥ जीवहि जारे कष्ट दिलावे। तब फिर लै चौरासी नावे ॥

साहिब कह रहे हैं कि काल का खेल कोई नहीं समझ पाया, यह ऐसा भयानक कसाई है कि लाख जीवों को प्रतिदिन तप्त शिला पर भून-भून कर खाता है। जीवों को जलाकर कष्ट देकर फिर चौरासी की खानि में फेंक देता है।

जीव कीन्ह तब बहुत पुकारा। काल कष्ट देत अपारा ॥

यमकर कष्ट सह्यो न जाई। है कोई रक्षक करो सहाई ॥

ऐसे मैं जब काल जीवों को बहुत कष्ट दे रहा था तो जीवों ने पुकार की कि काल हमें बड़ा कष्ट दे रहा है, जो हमसे सहा नहीं जा रहा। यदि कोई रक्षक है तो हमें बचाओ!

चकिया सब रागन की रानी ॥ एक पट धरती चले, एक चले असमानी। काल निरंजन पीसन लागे सवालाख की धानी ॥

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अमर लोक से साहिब चले

अमर लोक से साहिब चले

देख जीवन विकल अति, दया पुरुष जनाइया। दयानिधि सत पुरुष साहिब, तबहिं मोहिं बुलाइया ॥ कहे मुहिं समुझाय बहु विधि, जीव जाय चितावहू। तुम दरश ते हो जीव शीतल, जाय तपन बुझावहू ॥

जीवों की पुकार जब परम पुरुष के पास पहुँची तो वे दयाल हुए, कबीर साहिब कह रहे हैं कि तब उन्होंने मुझे बुलाया और समझाकर कहा कि जीवों को चिताकर ले आओ।

कर परनाम ज्ञानी चले, करन हँस को काज। जोपै काल न मानि है, तुम्हीं पुरुष को लाज ॥

परम पुरुष को प्रणाम कर जीवों के काम के लिए साहिब चल पड़े।

नो भी पिस गये दस भी पिस गये, पिस गये सहज अठासी। कथनी कथ कथ पिस गये भक्ता, भये गर्भ के वासी ॥

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निरंजन ने की साहिब से बहस

निरंजन ने साहिब से बहस की

जबहिं पुरुष आज्ञा कीन्हा। जीवन काज पृथ्वी पग दीन्हा ॥ आवत मिल्यो धर्म अन्याई। तिन पुनि हमसो रार बढ़ाई ॥ मो कहँ देखि धर्म ढिग आवा। महा क्रोध बोले अतुरावा ॥ योगजीत इहँवा कस आवो। सो तुम हमसों वचन सुनावो ॥

जब साहिब आए तो रास्ते में निरंजन मिला, उसने क्रोधित होकर पूछा कि यहाँ क्यों आए हो!

निरंजन ने कहा

जाहु ज्ञानी घर आपने, मानो वचन हमार। तीन लोक पुरुषहिं दिये, स्वर्ग पताल संसार ॥

निरंजन ने कहा—हे ज्ञानी! वापिस अपने घर जाओ, यह संसार मेरा है, परम-पुरुष ने दिया है।

साहिब ने कहा

मुहि जो पठयो पुरुष को, करन हंस के काज। कालहि मार संहारि हों, दीन्ह सकल मोहे साज ॥

साहिब ने कहा कि मुझे परम पुरुष ने जीवों के कल्याण के लिए भेजा है, तुझे मारने का सामान भी उन्होंने मुझे दिया है।

तासों कह्यो सुनो धर्मराई। जीव काज संसार सिधाई ॥ तप्त शिला पर जीव जरावहु। जारि बारि निज स्वाद करावहु ॥ तुम अस कष्ट जीव कहँ दीन्हा। तबहि पुरुष मोहि आज्ञा कीन्हा ॥ जीव चिताय लोक लै जाऊँ। काल कष्ट से जीव बचाऊँ ॥ ताते हम संसारहि जायब। दे परवाना लोक पठायब ॥

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साहिब ने कहा कि तुम तप्त शिला पर जीवों को भून-2 कर खा रहे हो, उन्हें अपार कष्ट दे रहे हो, इसलिए परम पुरुष की आज्ञा से मैं यहाँ आया हूँ, जीवों को चिताकर अमर लोक ले जाऊँगा।

निरंजन ने कहा

तबै निरंजन बोले बानी। कैसे हंस छुड़ावो ज्ञानी ॥ जग के माहिं कीन्ह हम बासा। पशु पंछी जल थल में आसा ॥ तिनसौ साठ हम पैठ लगाहीं। तामें सकल जीव उरझाहीं ॥ तापर काम क्रोध हम डारी। तृष्णा सकल जीव कहँ मारी ॥ तापर कीन्हों एक हम काजा। पाप पुण्य थापे हम राजा ॥ इनमें जीव बंधे सब झारी। कैसे हंसहि लेव उबारी ॥

निरंजन ने कहा कि जीवों को कैसे छुड़ा ले जाओगे! कहा- मैं ही सब में समाया हुआ हूँ। (मन रूप में निरंजन सबके अन्दर बैठा है) फिर तीन सौ ऐसे स्थान हैं, जहाँ मैंने पैठ लगायी हुई है, (360 ऐसे स्थान हैं जहाँ निरंजन ने थोड़ी-2 शक्तियाँ रखी हुई हैं, खुद बैठा हुआ है) सभी उनमें उलझे हैं, इस पर भी मैंने सबको काम, क्रोध, तृष्णा आदि से मारा हुआ है, बेहाल किया हुआ है। फिर मैंने पाप-पुण्य में जीव को बाँध दिया है, तुम उन्हें कैसे छुड़ाओगे!

साहिब ने कहा

सत्त शब्द हम बोले बानी। बचन हमारे छूटे प्राणी ॥ गहै शब्द जब मन चित्तलाई। भजिहै काल जिव लेब छुड़ाई ॥

साहिब ने कहा कि मैं सत्य कह रहा हूँ, जब जीव मेरे शब्द को पकड़ लेगा, वो छूट जायेगा।

निरंजन ने कहा

तबै निरंजन बोले बानी। सकल जीव बस हमरे ज्ञानी ॥ तिनसौ साठ पैठ उरझेरा। कैसे हंसन लेव उबेरा ॥

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साहिब बन्दगी

गंगा जमुना सरसवती जानी । पुष्कर गोदावरी मानी ॥ बद्री केदार हमका ठाऊँ । जहाँ तहाँ हम तीरथ लगाऊँ ॥ सेतु बन्ध पुनि कीन्ह ठिकाना । पुष्कर क्षेत्र आय हम थाना ॥ गढ़ गिरनार दत्त को थाना । ताहि घेर हम बैठे निहाना ॥ कमरू माह कमच्छा देवी । नीमखार मिसरख जम लेवी ॥ नगर अयोध्या रामहिं राजा । खैहैं दइत बाँध सब साजा ॥ याही पैठ जग जीव भुलाई । किहिं विधि हंस लेव मुकताई ॥

निरंजन ने कहा कि बड़े स्थान हैं, जहाँ जीव भ्रमित है। गंगा, यमुना, गोदावरी, मथुरा, बद्रीनाथ, केदार, अयोध्या, पुष्कर आदि जगहों पर बैठ मैंने जीवों को भुलाया हुआ है, फिर किस विधि से तुम उन्हें छुड़ाओगे!

साहिब ने कहा

तब ज्ञानी अस बोले बानी । जमते जीव छुड़ावहुँ आनी ॥ पुरुष नाम को कहुँ समुझाई । जम राजा तब छोड़ पराई ॥ घाट-घाट बैठे उरझेरा । हमरे शब्द ते होय निबेरा ॥ सुन रे काल दुष्ट अन्याई । शब्द सग हंस घर जाई ॥

साहिब ने कहा—हे निरंजन! मैं परम पुरुष का नाम दूँगा, यम का जोर फिर उनपर नहीं चलेगा, तुम स्थान-2 पर बैठे उन्हें भ्रमित कर रहे हो, मेरे शब्द से वे छूट जायेंगे, शब्द उन्हें अपने साथ अमर लोक ले जायेगा।

निरंजन ने कहा

का ज्ञानी देहो अधिकारा । हमरो नहिं छूटे यम जारा ॥ पाँच पचीस तीन गुन आही । यह लै सकल शरीर बनाई ॥ तामें पाप पुण्य को वासा । मन बैठा ले हमरी फाँसा ॥

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जहाँ तहाँ जग भरमावै । ज्ञान संधि कछु रहन न पावै ॥

एक शब्द की कैतक आशा । मेरे हैं चौरासी फाँसा ॥

निरंजन ने साहिब से कहा कि तुम जीवों को मुझसे छुड़ाकर ले ही नहीं जा सकते, मैंने पाँच तत्वों से शरीर की रचना की है। उस पर फिर पाप-पुण्य में जीवों को बाँधा हुआ है। मन रूप में मैं सबके अन्दर समाया हुआ हूँ, किसी को सोचने भी नहीं देता हूँ कि क्या माज़रा है, तुम्हारा एक शब्द क्या कर लेगा, मैंने चौरासी लाख योनियों में जीव को उलझाया हुआ है।

साहिब कहते हैं

बोले ज्ञानी शब्द बिचारी । छूटे चौरासी की धारी ॥

छूटे पाँच पचीस गुण तीनों । ऐसा शब्द पुरुष मैं दीन्हों ॥

साहिब ने कहा कि मेरे पास बड़ा ज़बरदस्त नाम है, जिन्हें परम पुरुष का नाम(शब्द) दे दूँगा, उनका तुम कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे। वो जीव तुम्हारे फंदे से आजाद हो जायेगा।

निरंजन ने कहा

हे ज्ञानी का करो बड़ाई । हमते नाहिं छूट जिव जाई ॥

इसने युग भये का तुम देखा । ज्ञानी हँस न ऐको पेखा ॥

का तुम करो का शब्द तुम्हारा । तीन लोक परलय कर डारा ॥

साधु संत हम देखी रीती । परलय परे सकल जग जीती ॥

करम रेख बाँधै सब साधा । सुर नर मुनि सकलो जग बाँधा ॥

निरंजन ने कहा कि इतने युग हो गये, क्या एक भी जीव को सतलोक आते देखा। बड़ी ताकत से मैंने जीव को बाँधा हुआ है, छूटने नहीं दूँगा, तुम और तुम्हारा शब्द क्या कर लेगा, मैं तीन लोक का नाश कर देता हूँ। निरंजन ने कई बार स्मृष्टि का प्रलय भी किया है। यह सब काम साहिब के नहीं हैं, परम पुरुष के नहीं हैं। इस पर साहिब ने कहा

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साहिब बन्दगी

भी है—जो रक्षक तहँ चीहनत नाहिँ, जो भक्षक तहँ ध्यान लगाहीं। निरंजन ने कहा कि इस पर भी मैंने पाप पुण्य में जीव को बाँधा हुआ है, आम आदमी की बात ही क्या है, सुर, नर, मुनि सारे संसार को बाँधा हुआ हूँ। एक भी जीव को जाने नहीं दूँगा। निरंजन ने साहिब से यह कहा। अब साहिब कह रहे हैं।

साहिब कहते हैं

ज्ञानी कहँ काल अन्यायी। शब्द बिना तू खाय चबाई॥

अब तुम कस खैहो बटसारा। पुरुष भाषों विश्वासा॥

सुभ अरू असुभ का करे निबेरा। मेटो काल सकल उरझेरा॥

साहिब ने कहा—हे निरंजन! इसलिए तो मैं आया हूँ, तुमने एक भी जीव को सतलोक नहीं आने दिया। तब इनके पास में सच्चा नाम नहीं था, ये अपने जोर से पार होना चाहते थे..... तुमने खा लिया। पर अब मैं परम पुरुष का बड़ा जबरदस्त नाम दूँगा, और तुम्हारा बस अब जीव पर नहीं चलने दूँगा, अन्दर से विश्वास भी नाम उन्हें देता जायेगा। शुभ और अशुभ का ज्ञान भी अन्दर से होता जायेगा, नाम जीव को पूरी सुरक्षा देता चलेगा और तुम्हारे सब बंधनों से छुड़ाकर अमर लोक ले जायेगा। साहिब ने एक अन्य स्थान पर भी कहा है—सुमिरन पाय सत्य जो वीरा, संग रहूँ मैं दास कबीरा।

निरंजन ने कहा

निरगुन काल तब बोले बानी। उरझे जीव सकल जम खानी॥

कैसे के तुम शब्द पसारो। कौने विधि तुम जीव उबारौ॥

ऐसे जीव सकल हैं करनी। कैसे पहुँचै पुरुष की सरनी॥

जग में जीव क्रोध विकरारा। कैसे पहुँचै पुरुष के द्वारा॥

क्रोधी जीव प्रेत अभिमानी। धरिहँ जन्म नरक की खानी॥

लोभ होय सरप विकरारा। माटी भखे जीव अधिकारा॥

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लोभ जन्म सूकर अवतारा । कैसे पावै मोक्ष को द्वारा ॥ विषई विषै सब विष की खानी । ऐ सब कहिये जम सहिदानी ॥

निरंजन ने कहा कि मैंने काम, क्रोध आदि में जीव को फँसाया हुआ है। ऐसे में तो कोई भी जीव परम पुरुष के लोक में नहीं पहुँच सकता। इस पर भी यम के 14 दूत मैंने हरेक में फिट किये हुए हैं, तुम उन्हें कैसे निकालोगे उन्हें ! प्रत्येक आदमी के भीतर यम के 14 दूत बैठे हुए हैं। एक का काम हैं-नींद लाना, एक का काम है- विषयों को दिल में उत्पन्न करना, एक का काम है-मौज करना। जिससे जीव मौज करता है। एक का काम है-चित्त भंग कर देना। इसका नाम है-चित्तभंगा, आदि ये यम के 14 दूत हैं, जो जीव को भ्रमित कर रहे हैं। इनके साथ काम, क्रोध आदि भी जीव पर छाए हुए हैं। विषयों में जीव को उलझा दिया है। जीव बड़ा गंदा हो गया है, तुम्हारे शब्द को कोई नहीं मानेगा।

साहिब ने कहा

ज्ञानी कहै करहु वरियारा । हमतो कीन्ह सकल निरबारा ॥ जोई ज्ञानी होय हमारा । काम क्रोध ते होय नियारा ॥ तूस्ना लोभहि देई बहाई । विषै जन्म सब दूर पराई ॥ उनको ध्यान शब्द अधिकारी । काम क्रोध सब होय नियारी ॥ नाम ध्यान हंस घर जाई । क्या रे काल तुम करो बड़ाई ॥ उनमें यम का परै न छाहीं । ताते हंस लोकहि जाई ॥

साहिब ने कहा कि जिस शरीर में यह नाम दे दूँगा, तेरा जोर उसमें नहीं चलेगा। वहाँ काम, क्रोध निकट नहीं आयेंगे और वो जीव निर्मल हो जायेगा, तुम उस जीव को छू भी नहीं पाओगे और वो जीव हंस रूप होकर अपने देश में चला जायेगा।

निरंजन ने कहा

कहे निरंजन सुन हो ज्ञानी । कथि हा जान तुम्हारी बानी ॥ युगत महात्म सबै बताऊँ । तुम्हारा नाम ले पंथ चलाऊँ ॥

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साहिब बन्दगी

अब निरंजन अपनी जगह आया। उसने कहा, मैं भी तुम्हारा नाम लेकर पंथ चलाऊँगा और जीवों को उलझा दूँगा। किसी को पता नहीं चलेगा कि सच क्या है और झूठ क्या है। यानी उसने कहा कि मैं नाम अपने वाला दूँगा और उस पर मोहर तुम्हारी होगी। इसलिए आज दुनिया में जीव उलझन में हैं, पता नहीं चल पाता है कि इतने नामों में से कौन-सा नाम सच्चा है और वो किसके पास है।

साहिब ने कहा

कहे ज्ञानी सुन काल विचारा। हंस हमार नहीं न्यारा ॥ निसवासर रहै लौ लीना। शब्द विचार होय नहीं भीना ॥ हंस हमारा शब्द अधिकारा। पुरुष परताप को करे सम्हारा ॥ नाम जपै अरु सुरत लगाई। मिले कर्म लागे नहीं काई ॥ शब्द मानि होय शब्द सरूपा। निश्चय हंस होय अनूपा ॥ साहिब ने कहा-हे निरंजन! जिसे सच्चा नाम मिल जाएगा, वो निर्मल हो जाएगा, फिर वो तुम्हारी तरफ जाएगा ही नहीं।

निरंजन ने कहा

ज्ञानी मोर अपर बल ज्ञाना। वेद किताब भरम हम माना ॥ इनको माने सब संसारा। कलि में गंगा मुक्ति द्वारा ॥ देही दान से उतरे पारा। ऐसे सुमृत कहें विचारा ॥ यह विधि जग जीव भुलाहीं। जरा मरन सब बंध बंधाहीं ॥ सूतक पातक वेद विचारा। पूछ वेद से करहि सँहारा ॥ एकादशी मुक्ति को भाई। योग जग्य करवे अधिकाई ॥

निरंजन ने कहा कि मैंने सूतक, पातक, कर्मकाण्ड आदि अनेक वहमों में जीवों को उलझाया हुआ है, सब इन्हीं को मानते हैं, तुम्हारी बात कोई मानेगा ही नहीं, इसलिए मत जाओ दुनिया में।

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साहिब ने कहा

सुनहु काल ज्ञान की संधी । छोरो जीव सकल की फंदी ॥ जब निज बीरा हंस पावै । जोग बरत तप सबै नसावै ॥ वेद किताब की छोड़े आसा । हंस करे शब्द विस्वासा ॥ ताके निकट काल नहीं आवे । निज बीरा जो सुरत लगावे ॥ जोग बरत पतहू है छारा । अद्भुत नाम सदा रखवारा ॥

साहिब ने कहा कि जिसे सच्चा नाम मिल जाएगा, उसका सारा वहम अन्दर से धुल जाएगा, काल भी उसके निकट नहीं आ पाएगा। नाम सदा उसकी रक्षा करेगा।

निरंजन ने कहा

अब तुम ज्ञानी भली सुनाई । मेरो उरझो सुरझो नहीं जाई ॥ पावै शब्द होय अभिमानी । कैसै लोक जाहिं प्रानी ॥ सब्द पाय कर चले न राहा । ज्ञानी कहाँ मुक्ति की थाहा ॥

निरंजन ने कहा कि मैंने जो उलझने डाली हुई हैं वे सुलझेंगी ही नहीं, जीव नहीं समझेगा, यदि तुमने अपना शब्द दे भी दिया, तो भी जीव अहंकार में रहेगा, तुम्हारे नियमों पर नहीं चलने पायेगा, फिर मुक्ति कैसे मिलेगी !

साहिब ने कहा

तब ज्ञानी बोले मुख बानी । सुनियो काल निरंजन आनी ॥ हंस भक्ति जो करे हमारी । राखो सदा सब्द निज धारी ॥ काम क्रोध अहंकार बिकारा । इनको तजिहैं हंस हमारा ॥ पहुँचे हंस पुरुष दरबारा । अरे काल तोको तज डारा ॥

साहिब ने कहा कि जो नाम पाकर मेरी भक्ति करेंगे, वे काम, क्रोध आदि छोड़ देंगे और तुम्हारी दुनिया को त्याग परम पुरुष के दरबार में पहुँच जायेंगे।

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साहिब बन्दगी

निरंजन ने कहा

निरंजन बोले गरब सो भाई । मोरे फंद तोर को जाई ॥ करम जंजीर बँधा संसारा । जोई हम जग जाल पसारा ॥ तीन लोक जोइन औतारा । आवागमन में फिर फिर पारा ॥ उपजै विनसै रहै भुलाई । देव रिषी मुनि सकलो खाई ॥ सिद्ध साधु अरु बड़े जु ज्ञानी । बाँध बाँध कर तोपि समानी ॥ करम रेख ते कोई न न्यारा । तीन देव सुर असुर पसारा ॥

निरंजन ने बड़े घमण्ड से कहा कि मेरे फंद को तोड़कर कौन जा सका है, मैंने कर्म की जंजीर से सारे संसार को बाँधा हुआ है, क्या ऋषि, क्या मुनि, क्या सिद्ध, क्या साधु, क्या देवता, त्रिदेव आदि सबको कर्म जाल में उलझाकर बार-बार खा जाता हूँ, कोई भी कर्म से न्यारा नहीं है।

साहिब ने कहा

कहै ज्ञानी सुन काल लबारा । करिहँ टूक जंजीर तुम्हारा ॥ हंसन लैहँ तुरत उबारी । पुरुष शब्द दीन्हँ मोहि भारी ॥

साहिब ने कहा-हे झूठे ! तेरी कर्म की जंजीर को भी तोड़ दूँगा, परम पुरुष ने मुझे ऐसा जबरदस्त नाम दिया है कि कर्म जाल से भी जीव को छुड़ा लेगा।

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क्रोधित निरंजन साहिब पर झपटा और असली रूप में आए साहिब

क्रोधित निरंजन साहिब पर झपटा

और असली रूप में आए साहिब

यह सुन काल भयंकर भयऊ। हम कहैं त्रास दिखावन लयऊ॥ सत्तर युग हम सेवा कीन्ही। राज बड़ाई पुरुष मुहिं दीन्ही॥ फिर चौंसठ युग सेवा ठयऊ। अष्टं गी पुरुष हम दयऊ॥ तब तुम मारि निकारे मोहि। योगजीत नहिं छाड़ों तोहिं॥ अब हम जान भली विधि पावा। मारों तोहि लेउँ अब दावा॥ गरजे काल महा बिकराला। सत्रह लाख लो पाँव पसारा॥ लपकै जीभ जिमि टूटे तारा। जिमि बिजली चमकै औंधियारा॥ सूढ़ बढा य दंत अति बाढ़। मध्य घेर ज्ञानी कहैं ठाढ़॥ हमरे पौरुष हम बरियारा। तुम ज्ञानी का करो हमारा॥

यह सुन निरंजन क्रोधित हो गया, साहिब को भय दिखाने लगा, कहा कि परम पुरुष की सेवा करके मैंने तीन लोक का राज्य और अष्टंगी को प्राप्त किया, पर तब तुमने मुझे मानसरोवर से निकाल दिया, इसलिए अब मैं तुमसे बदला लूँगा, तुम्हें नहीं छोड़ूँगा। निरंजन ने तब विकराल हाथी का रूप धारण किया और सूँढ़ और दाँत बढ़ाकर साहिब को बीच में घेर लिया, कहा- हम बड़े बलवान हैं, तुम हमारा क्या करोगे!

ज्ञानी पुरुष शब्द कियो जोरा। पकड़ सूँढ़ दाँत गहि मोरा॥ मारे उ सब्द पाँव कर पेली। तोर सूँढ़ समुद्र गहि मेली॥ पुरुष रूप तबहीं पुन धारा। जौन सूरूप सकल औतारा॥

साहिब ने कहा कि तब वहाँ मैंने परम पुरुष का रूप धारण किया, अपने मूल रूप में आया, उसपर सुरति फेंकी, उसके दाँत तोड़ दिये और उसकी सूँढ़ पकड़ उसे समुद्र में फेंक दिया।

निरंजन अधीन हुआ

निरंजन अधीन हुआ

भया अधीन दोई कर जोरी। तुम सतपुरुष सरन हम तोरी।। प्रथम ज्ञानी हम नहीं जाना। बन्धु जान कीन्हा अभिमाना।। तुमसो बल बुद्धि हम धारा। अब तुम करहु मोर उद्धार।। मैं साहिब तुमको नहीं चीन्हा। सतपुरुष तुम दरसन दीन्हा।। दोइ कर जोरि चरण चित लावा। धन्य भाग हम दरसन पावा।।

तब निरंजन अधीन हुआ और दोनों हाथ जोड़कर कहा कि मैं आपकी शरण में हूँ, आप तो स्वयं सत्पुरुष हैं, मैंने भाई जानकर आपसे युद्ध किया, आपको पहचाना नहीं, आपसे ही बल और बुद्धि का प्रयोग किया, इसलिए क्षमा करें। मेरा बड़ा भाग्य है कि आपने आज मुझे दर्शन दिये।

साहिब ने कहा

सुन रे काल निरंजन राई। पुरुष नाम जो बीरा पाई।। ताको खूँट गहो मत लाई। सो हँसा मेरे लोकहि आई।।

साहिब ने कहा कि हे निरंजन! जिसे नाम मिल जाएगा, उसे तुम नहीं पकड़ोगे, वो मेरे देश में आएगा।

निरंजन ने कहा

सुनो गुसाई विनती मोरी। नाम पाय करै कछु औरी।। ज्ञान कथै अनत चित वासा। आवागमन की राखै आसा।।

निरंजन ने कहा कि जो नाम पाकर गलत चलें, नियमों का पालन न करें, आवागमन की इच्छा रखें, उनका क्या होगा, क्या वे भी पार होंगे!

साहिब ने कहा

सुनो निरंजन बचन हमारा। नहीं सत्त वह जीव तुम्हारा।।

तब साहिब ने वहाँ निरंजन से करार किया कि नहीं, उसे तुम ले जाना, वो जीव तुम्हारा हो जाएगा।

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