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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

हे अमावस्या! तुम्हारे महत्त्व के कारण निवास करते हुए फल की कामना करने वाले
लोग तुम्हें हवि देते हैं. हमें वह फल प्राप्त हो और हम धनों के स्वामी बनें. पूर्ण चंद्र से युक्त
पौर्णमासी पश्चिम दिशा में विजयी होती है तथा पूर्व दिशा में विजय प्राप्त करती है. (१)
अहमेवास्यमावास्या ३ मामा वसन्ति सुकृतो मयीमे.
मयि देवा उभये साध्याश्चेन्द्रज्येष्ठाः समगच्छन्त सर्वे.. (२)
मैं ही अमावस्या संबंधी देव हूं. शोभन कर्मों वाले देवयज्ञ योग्यता के कारण मुझ में
निवास करते हैं. साध्य और सिद्ध नामक दोनों प्रकार के इंद्र आदि देव मुझ से मिलते हैं. (२)
आगन् रात्री संगमनी वसूनामूर्जं पुष्टं वस्वावेशयन्ती.
अमावास्यायै हविषा विधेमोर्जं दुहाना पयसा न आगन्.. (३)
अमावस्या की रात्रि हमें धन प्रदान करने के निमित्त आए. वह हमें अन्न का रस, पोषण
और धन देती हुई आए. (३)
अमावास्ये न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परिभूर्जजान.
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (४)
हे अमावस्या! तेरे अतिरिक्त कोई भी देव इस समय वर्तमान समस्त साकार प्राणियों में
व्याप्त होने वाला नहीं है. हम जिस फल की कामना करते हुए तुम्हें हवि देते हैं, हमें वह फल
प्राप्त हो और हम धनों के स्वामी बनें. (४)
सूक्त-८५ देवता—पौर्णमासी प्रजापति
पूर्णा पश्चादुत पूर्णा पुरस्तादुन्मध्यतः पौर्णमासी जिगाय.
तस्यां देवैः संवसन्तो महित्वा नाकस्य पृष्ठे समिषा मदेम.. (१)
पूर्ण चंद्र से युक्त पौर्णमासी पश्चिम दिशा में विजयी होती है तथा पूर्व दिशा में विजय
प्राप्त करती है. यह आकाश के मध्य में भी सर्वोत्कृष्ट सिद्ध होती है. हम इस पौर्णमासी में
यज्ञ करने योग्य देवों के साथ महत्त्व से निवास करते हुए, स्वर्ग के ऊपरी भाग में अन्न के
साथ प्रसन्न हों. (१)
वृषभं वाजिनं वयं पौर्णमासं यजामहे.
स नो ददात्वक्षितां रयिमनुपदस्वतीम्.. (२)
हम अभिलषित फल देने वाले तथा अन्न धन से युक्त पौर्णमास पर्व का यज्ञ करते हैं.
पौर्णमास यज्ञ हमें विनाश रहित, शत्रुओं की बाधा से रहित एवं उपभोग करने पर भी क्षीण न
होने वाला धन दे. (२)
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प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परिभूर्जजान.
यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो अस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (३)
हे प्रजापति! तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी देव इस समय वर्तमान समस्त आकार के
प्राणियों में व्याप्त होने वाला नहीं है. हम जिस फल की कामना करते हुए तुम्हें हवि देते हैं,
हमें वह फल प्राप्त हो और हम धनों के स्वामी बनें. (३)
पौर्णमासी प्रथमा यज्ञियासीदह्नां रात्रीणामतिशर्वरेषु.
ये त्वां यज्ञैर्यज्ञिये अर्धयन्त्यमी ते नाके सुकृतः प्रविष्टाः.. (४)
पौर्णमासी दिनों और रात्रियों में यज्ञ के योग्य प्रमुख तिथि है. पौर्णमासी सभी रात्रियों
और सोम आदि हवियों में उत्तम है. हे यज्ञ के योग्य पौर्णमासी! जो दर्श, पौर्णमास आदि यज्ञों
के द्वारा तुम्हारी अर्चना करते हैं, वे शोभन कर्मों वाले यजमान स्वर्ग में स्थित होते हैं. (४)
सूक्त-८६ देवता—सावित्री
पूर्वापरं चरतो माययैतौ शिशू क्रीडन्तौ परि यातो ऽ र्णवम्.
विश्वान्यो भुवना विचष्ट ऋतूँरन्यो विदधज्जायसे नवः.. (१)
सूर्य और चंद्र आगेपीछे चलते हुए आकाश में साथसाथ गमन करते हैं. ये शिशु के रूप
में सागरों के पास जाते हैं. इन में से एक आदित्य अर्थात् सूर्य समस्त प्राणियों को देखता है
तथा दूसरा चंद्रमा ऋतुओं, मासों एवं पक्षों का निर्माण करता हुआ नवीन होता रहता है. (१)
नवोनवो भवसि जायमानो ऽ ह्नां केतुरुषामेष्यग्रम्.
भागं देवेभ्यो वि दधास्यायन् प्र चन्द्रमस्तिरसे दीर्घमायुः.. (२)
हे चंद्रमा! तू शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा आदि तिथियों में उत्पन्न होता हुआ नवीन बनता है.
झंडे के समान दिनों का परिचय कराता हुआ तू रात्रियों के आगेआगे चलता है. हे चंद्रमा! इस
प्रकार ह्रास और वृद्धि के द्वारा पखवाड़े के अंत को प्राप्त हुआ तू हवि का विभाग करता है.
इस प्रकार तू दीर्घ आयु धारण करता है. (२)
सोमस्यांशो युधां पतेऽनूना नाम वा असि.
अनूनं दर्श मा कृधि प्रजया च धनेन च.. (३)
हे सोम अर्थात् चंद्रमा के अंश रूप पुत्र अर्थात् बुध एवं योद्धाओं के पालक! तुम सर्वदा
तेजस्वी हो, इसलिए हे द्रष्टव्य बुध! हवि के द्वारा तुम्हारी पूजा करने वाले मुझ को पुत्र आदि
प्रजा एवं धन से संपन्न बनाओ. (३)
दर्शो ऽ सि दर्शतो ऽ सि समग्रो ऽ सि समन्तः.
समग्रः समन्तो भूयासं गोभिरश्वैः प्रजया पशुभिर्गृहैर्धनेन.. (४)
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हे चंद्र! तुम अमावस्या के साथ ही सूर्य के भी देखने योग्य हो. इस के बाद तृतीया आदि
तिथियों में भी तुम कला रूप से दिखाई देते हो. इस के पश्चात अष्टमी आदि तिथियों में इस से
भी अधिक स्पष्ट दिखाई देते हो. पौर्णमासी तिथि में तुम संपूर्ण कलाओं से युक्त हो जाते हो.
इसी प्रकार मैं भी गाय आदि से समृद्ध और संपूर्ण बनूं. (४)
यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तस्य त्वं प्राणेना प्यायस्व.
आ वयं प्यासिषीमहि गोभिरश्वैः प्रजया पशुभिर्गृहैर्धनेन.. (५)
हे सोम! जो शत्रु हम से द्वेष करता है अथवा जिस शत्रु से हम द्वेष करते हैं, तुम उस
शत्रु के प्राणों का अपहरण करो. हम गायों, अश्वों, प्रजाओं, पशुओं, धनों और घरों से युक्त
हों. (५)
यं देवा अंशुमाप्याययन्ति यमक्षितमक्षिता भक्षयन्ति.
तेनास्मानिन्द्रो वरुणो बृहस्पतिरा प्याययन्तु भुवनस्य गोपा:.. (६)
जिस सोम को देवगण शुक्ल पक्ष में प्रतिदिन एकएक कला दे कर बढ़ाते हैं तथा जिस
सोम को संपूर्ण रूप में सभी दिनों में क्षीणता रहित पितर आदि पीते हैं. उस सोम के साथ
इंद्र, वरुण, बृहस्पति एवं सभी प्राणियों के रक्षक देव हवि आदि से प्रसन्न करने वाले हम को
बढ़ाएं. (६)
सूक्त-८७ देवता—अग्नि
अभ्यर्चत सुष्टुतिं गव्यमाजिमस्मासु भद्रा द्रविणानि धत्त.
इमं यज्ञं नयत देवता नो घृतस्य धारा मधुमत् पवन्ताम्.. (१)
गायों के समूह आदि की दृष्टि से जिन की शोभन स्तुति की जाती है, उन अग्नि की
अर्चना करो. वह हमें भद्र धन प्रदान करें तथा हमारे इस यज्ञ में अन्य देवों को लाएं. इसलिए
घृत की मधुवर्ण धाराएं देवों को प्राप्त हों. (१)
मय्यग्रे अग्निं गृह्णामि सह क्षत्रेण वर्चसा बलेन.
मयि प्रजां मय्यायुर्दधामि स्वाहा मय्यग्निम्.. (२)
मैं सब से पहले अरणि मंथन से उत्पन्न अग्नि को धारण करता हूं. मैं अग्नि को क्षत्रिय
संबंधी तेज, बल और सामर्थ्य के साथ हवि देता हूं. (२)
इहैवाग्ने अधि धारया रयिं मा त्वा नि क्रन् पूर्वचित्ता निकारिणः.
क्षत्रेणाग्ने सुयममस्तु तुभ्यमुपसत्ता वर्धतां ते अनिष्टतः.. (३)
हे अग्नि! तुम्हारी परिचर्या करने वाले हम हैं. हमें ही धन दो. हम से पहले जो लोग
तुम्हारे प्रति आकर्षित थे और हमारे अपकारी थे, वे तुम्हें स्वाधीन न बनाएं. हे अग्नि! तुम्हारा
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स्वरूप बल के साथ स्थिर हो, तुम्हारा परिचारक यह यजमान अपनी कामनाएं प्राप्त करे
तथा किसी से भी पराजित न हो. (३)
अन्वग्निरुषसामग्रमख्यदन्वहानि प्रथमो जातवेदाः.
अनु सूर्य उषसो अनु रश्मीननु द्यावापृथिवी आ विवेश.. (४)
अग्नि देव प्रातःकाल के पूर्व से ही प्रकाशित होते हैं. महान जातवेद अग्नि इस के पश्चात
दिनभर प्रकाशित रहते हैं. ये सूर्यात्मक अग्नि प्रातःकाल के पश्चात व्यापक किरणों के द्वारा
प्रकाशित होते हैं. अग्नि का यह प्रकाश धरती और आकाश दोनों में प्रवेश कर के प्रकाशित
करता है. (४)
प्रत्यग्निरुषसामग्रमख्यत् प्रत्यहानि प्रथमो जातवेदाः.
प्रति सूर्यस्य पुरुधा च रश्मीन् प्रति द्यावापृथिवी आ ततान.. (५)
अग्नि देव प्रातःकाल से पूर्व ही प्रकाशित होते हैं. महान जातवेद अग्नि इस के पश्चात
दिन भर प्रकाशित रहते हैं. अग्नि अनेक रूप से प्रवृत्त होने के कारण सूर्य की किरणों के रूप
में स्वयं ही प्रकाशित होते हैं. इस प्रकार अग्नि देव धरती और आकाश में सभी जगह
प्रकाशित होते हैं. (५)
घृतं ते अग्ने दिव्ये सधस्थे घृतेन त्वां मनुरद्या समिन्धे.
घृतं ते देवीर्नप्त्य १ आ वहन्तु घृतं तुभ्यं दुहतां गावो अग्ने.. (६)
हे अग्नि! तुम से संबंधित हवि देवों के साथ उन के निवास स्थान अर्थात् स्वर्ग में है. इस
समय हम तुम्हें घृत के द्वारा भलीभांति तृप्त करते हैं. हे अग्नि! तुम्हें दिव्य जल प्राप्त हो तथा
गाएं तुम्हारे लिए घृत प्रदान करें. (६)
सूक्त-८८ देवता—वरुण
अप्सु ते राजन् वरुण गृहो हिरण्ययो मिथः.
ततो धृतव्रतो राजा सर्वा धामानि मुञ्चतु.. (१)
हे समस्त देवों के स्वामी वरुण! जलों के मध्य तुम्हारा स्वर्ण निर्मित निवास स्थान है,
जहां दूसरे नहीं पहुंच सकते. इस कारण सच्चे कर्मों वाले राजा वरुण हमारे शरीर के सभी
स्थानों को त्याग दें अर्थात् हमें जलोदर आदि रोग न हो. (१)
धाम्नोधाम्नो राजन्नितो वरुण मुञ्च नः.
यदापो अघ्न्या इति वरुणेति यदूचिम ततो वरुण मुञ्च नः.. (२)
हे राजा वरुण! इन सभी रोग स्थानों से हमें त्याग दो तथा उन से संबंधी पापों से हमें
बचाओ. हे जलों के स्वामी एवं हिंसा रहित वरुण! हम ने प्रसिद्ध देवों का नाम न ले कर जो
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पाप किया है, उस से भी हमें बचाओ. (२)
उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधमं वि मध्यमं श्रथाय.
अधा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम.. (३)
हे वरुण! हमारे शरीर के ऊपरी भाग में स्थित अपने पाश को शिथिल करो तथा हमारे
शरीर के मध्य भाग में स्थित अपने पाश को भी शिथिल करो. इस के पश्चात् हे अदिति पुत्र
वरुण! सभी पापों से छूट कर हम तुम्हारे कर्म में पापरहित होने के लिए सम्मिलित हों. (३)
प्रास्मत् पाशान् वरुण मुञ्च सर्वान् य उत्तमा अधमा वारुणा ये.
दुष्वप्न्यं दुरितं नि ष्वास्मदथ गच्छेम सुकृतस्य लोकम्.. (४)
हे वरुण! तुम्हारे जो उत्तम और अधम पाप हैं, उन सब पापों से हमें छुड़ाओ. दुःस्वप्न में
होने वाले पाप को भी हम से दूर करो. पापहीन हो कर हम पुण्य के लोक में पहुंचें. (४)
सूक्त-८९ देवता—अग्नि, इंद्र
अनाधृष्यो जातवेदा अमर्त्यो विराडग्ने क्षत्रभृद् दीदिहीह.
विश्वा अमीवाः प्रमुञ्चन् मानुषीभिः शिवाभिरद्य परि पाहि नो गमय्.. (१)
हे अग्नि! कोई तुम्हें तनिक भी पराजित नहीं कर सकता. हे जातवेद! अमर, विराट्
और क्षत्र बल को धारण करने वाले वरुण हमारे इस यज्ञ स्थल में अतिशय दीप्त बनें तथा
सभी रोगों का विनाश कर के इस समय सभी मनुष्य संबंधी कल्याणों से हमारे घरों की रक्षा
करें. (१)
इन्द्र क्षत्रमभि वाममोजो ऽ जायथा वृषभ चर्षणीनाम्.
अपानुदो जनममित्रायन्तमुरुं देवेभ्यो अकृणोरु लोकम्.. (२)
हे इंद्र! तुम कष्ट से त्राण करने वाले बल को धारण कर के उत्पन्न हुए हो. हे अभिमत
फल देने वाले! जो हम मनुष्यों की उत्पत्ति के पश्चात शत्रु के समान आचरण करता है, उस
को हम से दूर कर के तुम ने देवों के लिए स्वर्ग नाम का विस्तीर्ण लोक बनाया है. (२)
मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत आ जगम्यात् परस्याः.
सृकं संशाय पविमिन्द्र तिग्मं वि शत्रून् ताढि वि मृधो नुदस्व.. (३)
इंद्र बुरे चरणों वाले एवं पर्वत निवासी सिंह के समान भयानक हैं. वह अत्यधिक दूरवर्ती
आकाश से आएं. आने के पश्चात वे अपने गतिशील वज्र को भलीभांति तेज कर के हमारे
शत्रुओं को मारें तथा संग्राम के लिए उद्यत अन्य शत्रुओं का भी विनाश करें. (३)
सूक्त-९० देवता—गरुड़
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त्यूम् षु वाजिनं देवजूतं सहोवानं तरुतारं रथानाम्.
अरिष्टनेमिं पृतनाजिमाशुं स्वस्तये तार्क्ष्यमिहा हुवेम.. (१)
हम यज्ञकर्म की पूर्ति के निमित्त गरुड़ का आह्वान करते हैं. वह बलशाली, देवों के द्वारा
सोम लाने हेतु प्रेरित तथा सब को पराजित करने वाले हैं. उन के रथ पर कोई आक्रमण नहीं
कर सकता. वह संग्राम में शत्रुओं को नष्ट करने वाले हैं. गरुड़ शत्रु सेनाओं के विजेता एवं
शीघ्रगामी है. (१)
सूक्त-९१ देवता—इंद्र
त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवेहवे सुहवं शूरमिन्द्रम्.
हुवे नु शक्रं पुरुहूतमिन्द्रं स्वस्ति न इन्द्रो मघवान् कृणोतु.. (१)
हम त्राण एवं रक्षा करने वाले इंद्र का आह्वान करते हैं. हम अपने आह्वानाें के द्वारा शूर
इंद्र को बुलाते हैं. हम शक्तिशाली एवं पुरुहूत इंद्र को बुलाते हैं. शक्तिशाली इंद्र हमें स्वास्थ्य
प्रदान करें. (१)
सूक्त-९२ देवता—इंद्र
यो अग्नौ रुद्रो यो अप्सव १ न्तर्य ओषधीर्वीरुध आविवेश.
य इमा विश्वा भुवनानि चाक्लृपे तस्मै रुद्राय नमो अस्त्वग्नये.. (१)
जो रुद्रदेव यज्ञ करने योग्य होने के कारण अग्नि में प्रवेश कर गए हैं तथा जिन्होंने
वरुण के रूप में जलों में प्रवेश किया है, जिन्होंने वृक्षों, लताओं और जड़ीबूटियों में स्थान
प्राप्त किया है, रुद्र इन सभी प्राणियों का निर्माण करने में समर्थ हुए हैं, उन अग्नि रूप रुद्र
को नमस्कार है. (१)
सूक्त-९३ देवता—सर्पविष का विनाश
अपेह्यरिरस्यरिर्वा असि. विषे विषमपृक्था विषमिव् वा अपृक्था:.
अहिमेवाभ्यपेहि तं जहि.. (१)
हे सर्पविष! तू इस डसे हुए पुरुष के शरीर से दूर चला जा, क्योंकि तू शत्रु है. तू केवल
इस का ही नहीं, सभी मनुष्यों का शत्रु है, इसीलिए तू विषैले सर्प में ही अपना विष संयुक्त
कर. तू अपना विषैला प्रभाव ही संयुक्त कर. हे विष! तू जिस सर्प का है, उसी के समीप जा
तथा उसी का विनाश कर. (१)
सूक्त-९४ देवता—अग्नि
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अपो दिव्या अचायिषं रसेन समपृक्ष्महि.
पयस्वानग्न आगमं तं मा सं सृज वर्चसा.. (१)
मैं दिव्य जलों की पूजा करता हूं. मैं उन जलों के रस से युक्त हो जाऊं. हे अग्नि! मैं
तुम्हारे लिए हवि ले कर आया हूं. इस प्रकार के मुझे तुम तेज से युक्त करो. (१)
सं माग्ने वर्चसा सृज सं प्रजया समायुषा.
विद्युर्मे अस्य देवा इन्द्रो विद्यात् सह ऋषिभिः.. (२)
हे अग्नि! मुझे तेज से, बल से, संतान से एवं लंबी आयु से युक्त करो. मेरी पवित्रता को
देवगण जाने तथा अतींद्रिय मुनियों के साथ इंद्र भी मेरी पवित्रता को जाने. (२)
इद्मापः प्र वहतावद्यं च मलं च यत्.
यच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्च शेपे अभीरुणम्.. (३)
हे जलो! मेरे इस पाप को दूर करो. मुझ में जो निंदा रूपी मल तथा असत्य है, उस से
देवगण द्रोह करें. अर्थात् उसे समाप्त कर दें. मैं ने ऋण ले कर उसे न चुकाने के लिए जो
शपथ खाई है, उस पाप को भी देवगण मुझ से दूर करें. (३)
एधो ऽ स्येधिषीय समिदसि समेधिषीय. तेजो ऽ सि तेजो मयि धेहि.. (४)
हे अग्नि! तुम दीप्त होते हो, इस के फल के रूप में मैं समृद्ध बनूं. हे अग्नि! तुम तेज
रूप हो, इसीलिए मुझ में भी तेज धारण करो. (४)
सूक्त-९५ देवता—मंत्रों में बताए गए
अपि वृश्च पुराणवद् व्रततेरिव गुष्पितम्. ओजो दासस्य दम्भय.. (१)
हे अग्नि! तुम पुराने शत्रुओं के समान इस समय भी जार रूप शत्रु का उसी प्रकार
विनाश करो, जिस प्रकार लताओं के समूह को काट देते हैं. (१)
वयं तदस्य सम्भृतं वस्विन्द्रेण वि भजामहै.
म्लापयामि भ्राजः शिश्नं वरुणस्य व्रतेन ते.. (२)
हम इंद्र देव की सहायता से इस सामने बैठे शत्रु के धन को अपने अधीन कर लें. हे
जार! तेरे शुभ वर्ण वाले एवं दीप्त वीर्य को वरुण देव संबंधी कर्म के द्वारा हम क्षीण करते हैं.
(२)
यथा शेपो अपायात्तै स्त्रीषु चासदनावयाः.
अवस्थस्य कन्दीपतः शाङ्कुरस्य नितोदिनः.
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सूक्त-९६ देवता—चंद्रमा, इंद्र

यदाततमव तत्तनु यदुत्ततं नि तत्तनु.. (३)
जिस प्रकार जार का प्रजनन अंग नारी संभोग के योग्य न रहे तथा नारी के समीप व्यर्थ
सिद्ध हो, उस प्रकार जार परकीया स्त्रियों में संभोग रहित हो जाए. जो जार संभोग हेतु
बुलाए जाने पर नारी को अत्यधिक व्यथित करता था, उस जार का विशाल प्रजनन अंग
छोटा हो जाए तथा उस का ऊपर उठा हुआ प्रजनन अंग नीचे को झुक जाए. (३)
सूक्त-९६ देवता—चंद्रमा, इंद्र
इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अवोभिः सुमृडीको भवतु विश्ववेदाः.
बाधतां द्वेषो अभयं नः कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम.. (१)
भली प्रकार रक्षा करने वाले एवं धन के स्वामी इंद्र अपने रक्षा साधनों से हमें सभी
प्रकार सुखी बनाएं. वह इंद्र हमें अभय प्रदान करें तथा हम शोभन शक्ति वाले धन के स्वामी
बनें. (१)
सूक्त-९७ देवता—चंद्रमा, इंद्र
स सुत्रामा स्ववाँ इन्द्रो अस्मदाराच्चिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु.
तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्याम.. (१)
शोभन रक्षा वाले एवं धन के स्वामी इंद्र हम से दूर से ही द्वेष करने वालों को नष्ट करें.
हम यज्ञ के योग्य इंद्र की शोभन बुद्धि में हों तथा वह हमारे प्रति सौमनस्य रखें. (१)
सूक्त-९८ देवता—इंद्र
इन्द्रेण मन्युना वयमभि ष्याम पृतन्यतः. घ्नन्तो वृत्राण्यप्रति.. (१)
सहायक इंद्र के कोप के कारण हम संग्राम की इच्छा रखने वाले शत्रुओं को पराजित
करें. पापों को इंद्र इस प्रकार नष्ट करें कि वह शेष न बचें. (१)
सूक्त-९९ देवता—सोम
ध्रुवं ध्रुवेण हविषा ऽ व सोमं नयामसि. यथा न इन्द्रः केवलर्विशः
संमनसस्करत्.. (१)
हम सोमरस को रथ में आसीन कर के हवि के साथ लाते हैं, जिस से इंद्र हमारी संतानों
को असाधारण एवं परस्पर सौमनस्य वाली बनाएं. (१)
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सूक्त-१०० देवता—गृद्ध

सूक्त-१०० देवता—गृद्ध
उदस्य श्यावौ विथुरौ गृध्रौ द्यामिव पेततुः.
उच्छोचनप्रशोचनावस्योच्छोचनौ हृदः.. (१)
इस शत्रु के नित्य चलने वाले दोनों काले होंठ विदीर्ण हो जाएं तथा इस प्रकार गिर पड़ें,
जिस प्रकार आकाश में उड़ता हुआ गिद्ध नीचे गिरता है. उच्छोचन और प्रशोचन नामक मृत्यु
देव इस शत्रु के हृदय को अधिक रूप में शोक पहुंचाने वाले हों. (१)
अहमेनावुदतिष्ठिपं गावौ श्रान्तसदाविव. कुर्कुराविव कूजन्तावुदवन्तौ
वृकाविव.. (२)
अनुष्ठान करने वाला मैं इस शत्रु के दोनों काले होंठों को इस प्रकार उखाड़ता हूं, जिस
प्रकार थक कर बैठी हुई गायों को डंडे से कोंच कर उठाया जाता है. भूंकते हुए कुत्तों को
पत्थर आदि फेंक कर भगाया जाता है और गायों के झुंड में से बछड़ों को पकड़ कर ले जाते
हुए भेड़ियों को ग्वाले बलपूर्वक भगाते हैं. (२)
आतोदिनौ नितोदिनावथो संतोदिनावुत.
अपि नह्याम्यस्य मेढ्रं य इतः स्त्री पुमान्जभार.. (३)
सभी प्रकार से व्यथा पहुंचाने वाले शत्रु के अत्यधिक बाधा डालने वाले दोनों होंठों को
मैं उखाड़ता हूं जो मिल कर बोलते हुए मुझे व्यथित करते हैं. हम से द्वेष रखने वाले जिस
पुरुष अथवा स्त्री ने इस स्थान से हमारा धन चुराया है, उस शत्रु के प्रजनन अंग को भी मैं
बांधता हूं. (३)
सूक्त-१०१ देवता—पक्षी
असदन् गावः सदने ऽ पप्तद् वसतिं वयः.
आस्थाने पर्वता अस्थुः स्थाम्नि वृक्कावतिष्ठिपम्.. (१)
गाय जिस प्रकार गोशाला में बैठती है, पक्षी जिस प्रकार अपने घोंसले में जाते हैं और
पर्वत जिस प्रकार अपने स्थान पर स्थित रहते हैं, मैं अपने शत्रु के घर में उसी प्रकार भेड़ियों
को स्थापित करता हूं. (१)
सूक्त-१०२ देवता—इंद्र, अग्नि
यदद्य त्वा प्रयति यज्ञे अस्मिन् होतश्चिकित्वन्नवृणीमहीह.
ध्रुवमयो ध्रुवमुता शविष्ठ प्रविद्वान् यज्ञमुप याहि सोमम्.. (१)
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हे यज्ञ में देवों का आह्वान करने वाले एवं हे ज्ञानवान अग्नि! हम ने तुम्हें आज इस यज्ञ
में होता के रूप में वरण किया है, इसीलिए तुम निश्चय ही यज्ञ करो तथा इस यज्ञ कर्म के
दोषों को शांत करो. तुम इस यज्ञ को विशेष रूप से सोमरस युक्त जानकर आओ. (१)
समिन्द्र नो मनसा नेष गोभिः सं सूरिभिर्हरिवन्त्सं स्वस्त्या.
सं ब्रह्मणा देवहितं यदस्ति सं देवानां सुमतौ यज्ञियानाम्.. (२)
हे इंद्र! हमें स्तुति रूपी शब्दों से युक्त कर के बोलने में कुशल बनाओ, जिस से हम
तुम्हारी स्तुति कर सकें. हे अश्वों के स्वामी इंद्र! हमें विद्वानों से युक्त करो, जिस से हमारा
विनाश न हो. हमें ब्रह्म ज्ञान एवं देव हितकारी अग्निहोत्र आदि से युक्त बनाओ. हमें अग्नि
आदि यज्ञ के योग्य देवों की सुमति में स्थापित करो. (२)
यानावह उशतो देव देवांस्तान् प्रेरय स्वे अग्ने सधस्थे.
जक्षिवांसः पपिवांसो मधून्यस्मै धत्त वसवो वसूनि.. (३)
हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम ने हवि की कामना करने वाले देवों का आह्वान किया है. तुम
उन्हें अपने निवास स्थान में रहने के लिए प्रेरित करो. हे पुरोडाश का भक्षण करने वाले, मधु
रस से युक्त आज्य को पीने वाले एवं लोकों के रक्षक देवो! तुम इस यजमान के लिए धन दो.
(३)
सुगा वो देवाः सदना अकर्म य आजग्म सवने मा जुषाणाः.
वहमाना भरमाणाः स्वा वसूनि वसुं घर्मं दिवमा रोहतानु.. (४)
हे देवो! तुम्हारे घर सुख से पहुंचने योग्य बनाए गए हैं. हवि का सेवन करने वाले तुम
सब घरों में आए थे. तुम अपने धनों को प्राप्त कर के हमारा पोषण करते हुए समस्त लोक में
निवास करने वाले आदित्य में स्थित बनो और हमें धन देने के पश्चात अपने स्थान को जाओ.
(४)
यज्ञ यज्ञं गच्छ यज्ञपतिं गच्छ. स्वां योनिं गच्छ स्वाहा.. (५)
हे यज्ञ! तू यज्ञ कर ने योग्य परमात्मा विष्णु के समीप जा, जिस से तू प्रतिष्ठित हो सके.
इस के पश्चात तू यज्ञ का पालन करने वाले यजमान को फल देने के हेतु प्राप्त हो. इस के
पश्चात तू सारे संसार के कारण बने हुए परमेश्वर की शक्ति को प्राप्त कर. यह आज्य शोभन
आहुति वाला हो. (५)
एष ते यज्ञो यज्ञपते सहसूक्तवाकः. सुवीर्यः स्वाहा.. (६)
हे यजमान! यह यज्ञ विविध स्तोत्रों वाला, शोभन पुत्र, पौत्र आदि से युक्त हो एवं तुम्हें
मिले. यह आज्य शोभन आहुति वाला हो. (६)
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वषड्हुतेभ्यो वषड्हुतेभ्यः. देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित.. (७)
इष्ट देवों और अग्नि देवों के लिए यह आज्य अग्नि में दिया जाए. हे मार्ग को जानने
वाले देवो! तुम मार्ग पा कर हमारे यज्ञ में जिस मार्ग से आए हो, उसी मार्ग से लौट जाओ.
(७)
मनसस्पत इमं नो दिवि देवेषु यज्ञम्.
स्वाहा दिवि स्वाहा पृथिव्यां स्वाहा ऽ न्तरिक्षे स्वाहा वाते धां स्वाहा.. (८)
हे समस्त प्राणियों के स्वामी देव! हमारे इस यज्ञ को स्वर्ग में वर्तमान देवों तक
पहुंचाओ. तुम हमारे यज्ञ को आकाश में, पृथ्वी पर, अंतरिक्ष में एवं सभी कर्मों के आधार
वायु में स्थापित करो. (८)
सूक्त-१०३ देवता—इंद्र
सं बर्हिरक्तं हविषा घृतेन समिन्द्रेण वसुना सं मरुद्भिः.
सं देवैर्विश्वेदेवैभिरक्तमिन्द्रं गच्छतु हविः स्वाहा.. (१)
स्रुक आदि पात्र पुरोडाश और आज्य से पूर्ण हो कर इंद्र के साथ, वसुओं के साथ
मरुद्गण के साथ तथा विश्वे देवों के साथ संपन्न हुए. इस प्रकार का पात्र इंद्र को प्राप्त हो
तथा यह हवि शोभन आहुति वाला हो. (१)
सूक्त-१०४ देवता—वेदी
परि स्तृणीहि परि धेहि वेदिं मा जामिं मोषीरमुया शयानाम्.
होतृषदनं हरितं हिरण्ययं निष्का एते यजमानस्य लोके.. (१)
हे दर्भ घास के फूल! तुम यज्ञ वेदी के चारों ओर विस्तीर्ण हो कर उसे ढक लो. तुम इस
वेदी पर सोते हुए यजमान के सहयोगियों का एवं संतान का विनाश मत करो. हे होताओं के
बैठने के स्थान हरित वर्ण वाले एवं स्वर्ग के समान रमणीय दर्भ! तुम यज्ञ वेदी पर फैल
जाओ. ये फैले हुए दर्भ यजमान के लोकों में सोने के अलंकार हों. (१)
सूक्त-१०५ देवता—बुरे स्वप्न का विनाश
पर्यावर्ते दुष्षप्न्यात् पापात् स्वप्न्यादभूत्याः.
ब्रह्माहमन्तरं कृण्वे परा स्वप्नमुखाः शुचः.. (१)
मैं बुरे स्वप्न से उत्पन्न पाप से छूट जाऊं तथा स्वप्न के दोष से भी अलग रहूं. मैं बुरे स्वप्न
का निवारण करने वाले मंत्र को बोलता हूं. बुरे स्वप्न से संबंध रखने वाले शोक मुझ से दूर हों.
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(१)
सूक्त-१०६ देवता—बुरे स्वप्न का विनाश
यत् स्वप्ने अन्नमश्नामि न प्रातरधिगम्यते.
सर्वं तदस्तु मे शिवं नहि तद् दृश्यते दिवा.. (१)
स्वप्न देखते समय मैं जो अन्न खाता हूं, वह अन्न प्रातःकाल दिखाई नहीं देता. वह अन्न
दिन में भी नहीं दिखाई देता. स्वप्न में खाया गया समस्त भोजन मेरे लिए कल्याण करने वाला
हो. (१)
सूक्त-१०७ देवता—द्यावा, पृथिवी आदि
नमस्कृत्य द्यावापृथिवीभ्यामन्तरिक्षाय मृत्यवे.
मेक्षाम्यूर्ध्वस्तिष्ठन् मा मा हिंसिषुरीश्वरा:.. (१)
मैं धरती, आकाश, अंतरिक्ष और मृत्यु को नमस्कार कर के बैठा हूं. मैं ऊर्ध्व लोक को न
जाऊं अर्थात् मृत्यु को प्राप्त न करूं. द्यावा, पृथ्वी आदि के अधिष्ठाता देव मेरी हिंसा न करें.
(१)
सूक्त-१०८ देवता—आत्मा
को अस्या नो द्रुहो ऽ वद्यवत्या उन्नेष्यति क्षत्रियो वस्य इच्छन्.
को यज्ञकाम: क उ पूर्तिकाम: को देवेषु वनुते दीर्घमायु:.. (१)
हमें निवास स्थान देने का इच्छुक कौन क्षत्रिय राजा इस समय बाधा पहुंचाने वाली एवं
अहितकारिणी पिशाची से हमारा उद्धार करेगा? हमारे द्वारा किए जाते हुए यज्ञ की कामना
करता हुआ एवं हमें धन की आपूर्ति की इच्छा करता हुआ कौन सा देव देवों के मध्य
चिरकाल तक होने वाले जीवन को प्राप्त करता है. (१)
सूक्त-१०९ देवता—आत्मा
क: पृश्निं धेनुं वरुणेन दत्त मथर्वणे सुदुघां नित्यवत्साम्.
बृहस्पतिना सख्यं जुषाणो यथावशं तन्व: कल्पयाति.. (१)
लाल आदि रंगों वाली, सरलता से दुही जाने वाली, सर्वदा बछड़े देने वाली एवं अथर्वा
ऋषि के लिए वरुण द्वारा दी गई गाय को बृहस्पति देव के साथ मित्रता का भाव रखता हुआ
कौन सा देव इच्छानुसार कल्पित कर सकता है. आशय यह है कि केवल बृहस्पति देव ही
ऐसा कर सकते हैं. (१)
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सूक्त-११० देवता—ब्रह्मचारी

सूक्त-११० देवता—ब्रह्मचारी
अपक्रामन् पौरुषेयाद् वृणानो दैव्यं वचः.
प्रणीतीरभ्यावर्तस्व विश्वेभिः सखिभिः सह.. (१)
हे ब्रह्मचारी! तू पुरुषों के हितकारी लौकिक कर्म त्याग कर देव संबंधी वाक्य अर्थात् वेद
मंत्रों के स्वाध्याय को स्वीकार करता हुआ संयमी बन तथा सभी ब्रह्मचारियों के साथ निवास
कर. (१)
सूक्त-१११ देवता—जातवेद
यदस्मृति चकृम किं चिदग्न उपारिम चरणे जातवेदः.
ततः पाहि त्वं नः प्रचेतः शुभे सखिभ्यो अमृतत्वमस्तु नः.. (१)
हे अग्नि देव! हम ने तुम्हारे स्मरण से रहित जो कर्म किया है तथा इस यज्ञ के अनुष्ठान
में जो कमी रह गई है, हे उत्तम कर्म जानने वाले अग्नि देव! तुम उस पाप से हमारी रक्षा करो.
इस के पश्चात मैं अपने प्रिय व्यक्तियों के शोभन यज्ञ कर्म में संलग्न रहूं. (१)
सूक्त-११२ देवता—सूर्य
अव दिवस्तारयन्ति सप्त सूर्यस्य रश्मयः.
आपः समुद्रिया धारास्तास्ते शल्यमसिम्रसन्.. (१)
कश्यप नामक प्रधान सूर्य से संबंधित सात व्यापक किरणों वाले आरोग्य आदि सूर्य हैं.
वे आकाश में उत्पन्न धारा रूपी जलों को आकाश से नीचे उतारते हैं. हे रोगी! वे जल शल्य
के समान तेरे यक्ष्मा रोग को नष्ट कर दें. (१)
सूक्त-११३ देवता—अग्नि
यो न स्तायद् दिप्सति यो न आविः स्वो विद्वानरणो वा नो अग्ने.
प्रतीच्येत्वरणी दत्वती तान् मैषामग्ने वास्तु भून्मो अपत्यम्.. (१)
हे अग्नि! जो शत्रु हमें प्रच्छन्न रूप से मारना चाहता है, जो शत्रु हमें प्रकाश रूप में
मारना चाहता है तथा दूसरे को बाधा पहुंचाने के उपाय जानता हुआ आत्मीय बंधु हमें मारना
चाहता है - इन तीनों को दांतों वाली तथा कष्टकारिणी राक्षसी प्राप्त हो. अर्थात् वह अपने
दांतों से खाने के लिए उन के समीप आए. हे अग्नि! उक्त तीनों का घर एवं संतान नष्ट हो
जाए. (१)
यो नः सुप्तानूजाग्रतो वाभिदासात् तिष्ठतो वा चरतो जातवेदः.
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सूक्त-११४ देवता—अग्नि

वैश्वानरेण सयुजा सजोषास्तान् प्रतीचो निर्दह जातवेदः.. (२)
हे अग्नि! जो शत्रु हमें सोते हुए मारना चाहता है, जो हमें जागते हुए मारना चाहता है,
जो शत्रु हमें बैठे हुए मारना चाहता है तथा जो शत्रु हमें चलते हुए मारना चाहता है, हे अग्नि!
तुम जठराग्नि से मिल कर और समान प्रीति वाले बन कर हमें मारने के लिए सामने आते हुए
शत्रुओं को जलाओ. (२)
सूक्त-११४ देवता—अग्नि
इदमुग्राय बभ्रवे नमो यो अक्षेषु तनूवशी.
घृतेन कलिं शिक्षामि स नो मृडातीदृशे.. (१)
अधिक बलशाली एवं मटमैले रंग वाले उस देव को नमस्कार है जो जुए में विजय प्राप्त
कराता है. वह जुए में पासों से इच्छानुसार विजय दिलाने वाला है. मंत्र युक्त घृत के द्वारा मैं
कलि अर्थात पराजय देने वाले पांच अंकों को नष्ट करता हूं. नमस्कार से प्रसन्न जुए का देव
इस प्रकार के जय लक्षण फल के द्वारा हमें सुखी करें. (१)
घृतमप्सराभ्यो वह त्वमग्ने पांसूनक्षेभ्यः सिकता उपश्व.
यथाभागं हव्यदातिं जुषाणा मदन्ति देवा उभयानि हव्या.. (२)
हे अग्नि! तुम हमारी विजय के लिए अंतरिक्ष में घूमने वाली अप्सराओं को आज्य
अर्थात् घृत पहुंचाओ तथा हमारे विरोधी जुआरियों के लिए सूक्ष्म धूल के कण, शकर और
जल पहुंचाओ, जिस से वे पराजित हों. अपनेअपने भाग के अनुसार हवि प्राप्त करते हुए देव
दो प्रकार के हवि से अर्थात् सोम और घृत से तृप्त होते हैं. (२)
अप्सरसः सधमादं मदन्ति हविर्धानमन्तरा सूर्यं च.
ता मे हस्तौ सं सृजन्तु घृतेन सपत्नं मे कितवं रन्धयन्तु.. (३)
जुए की देवियां अप्सराएं भूलोक और अंतरिक्षलोक में एक साथ प्रसन्न होती हैं. वे
अप्सराएं मेरे दोनों हाथों को जय लक्षण फल से संयुक्त करें तथा मेरे विरोधी जुआरी को मेरे
वश में करें. (३)
आदिनवं प्रतिदीव्ने घृतेनास्माँ अभि क्षर.
वृक्षमिवाशन्या जहि यो अस्मान् प्रतिदीव्यति.. (४)
मैं अपने विरोधी जुआरी को जीतने के लिए पासों के द्वारा जुआ खेलता हूं. हे जुए से
संबंधित देवियो! मुझे सारपूर्ण विजय से युक्त कराओ. जो जुआरी मुझे जीतने के लिए मेरे
विरोध में जुआ खेलता है, उस का उसी प्रकार विनाश करो, जिस प्रकार बिजली सूखे वृक्ष
का विनाश कर देती है. (४)
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यो नो द्युवे धनमिदं चकार यो अक्षाणां ग्लहनं शेषणं च.
स नो देवो हविरिदं जुषाणो गन्धर्वेभिः सधमादं मदेम.. (५)
जिस देव ने जुआ खेलते हुए लोगों को विरोधी जुआरी की हार के रूप में धन दिलाया
है तथा जिस देव ने विरोधी जुआरी के पासों का ग्रहण और विरोध में दमन किया है, वह देव
हमारी इस हवि को स्वीकार करे. हम जुए के देवों अर्थात् गंधर्वों के साथ प्रसन्न रहें. (५)
संवसव इति वो नामधेयमुग्रंपश्या राष्ट्रभृतो ह्य१क्षाः.
तेभ्यो व इन्द्वो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (६)
हे गंधर्वो अर्थात् जुए के पासो! तुम वसु अर्थात् धन प्राप्त कराते हो, इसलिए तुम्हारा
नाम संवसु है. क्योंकि पासे उग्रंपश्या राष्ट्रभृत नामक दो अप्सराओं से संबंधित हैं, इसलिए
हम उन गंधर्वों अथवा पासों के लिए सोमयुक्त हवि प्रयुक्त करते हैं. इस के पश्चात जुआ
खेलते हुए हम धनों के स्वामी बनें. (६)
देवान् यन्नाधितो हुवे ब्रह्मचर्यं यदूषिम.
अक्षान् यद् बभ्रूनालभे ते नो मृडन्त्वीदृशे.. (७)
मैं दुःखी हो कर अग्नि आदि देवों को धन लाभ के हेतु बुलाता हूं. मैं ने वेदमंत्रों के ग्रहण
के नियमों का पालन किया है तथा मैं मटमैले रंग के पासों को जुआ खेलने के लिए निर्मित
कर रहा हूं इसलिए जुए के अधिष्ठाता देव जय लक्षण फल के द्वारा हमें सुखी करें. (७)
सूक्त-११५ देवता—इंद्र, अग्नि
अग्न इन्द्रश्च दाशुषे हतो वृत्राण्यप्रति. उभा हि वृत्रहन्तमा.. (१)
हे अग्नि और इंद्र! तुम हवि देने वाले यजमान के पापों को पूर्ण रूप से नष्ट करो,
क्योंकि तुम दोनों अर्थात् अग्नि और इंद्र ने वृत्र का वध किया है. (१)
याभ्यामजयन्त्स्व १ र्ग्य एव यावातस्थतुर्भुवनानि विश्वा.
प्रचर्षणी वृषणा वज्रबाहू अग्निमिन्द्रं वृत्रहणा हुवे ऽ हम्.. (२)
पूर्वजों ने जिन अग्नि और इंद्र की सहायता से स्वर्ग को अपने अधीन किया है, जिन
अग्नि और इंद्र ने सारे लोकों को अपनी महिमा से व्याप्त कर लिया है तथा जो अपने
उपासकों के कर्म के फल को विशेष रूप से देखते हैं, उन्हें मनचाहा फल देने वाले, हाथों में
वज्र धारण करने वाले तथा वृत्र हंता अग्नि और इंद्र को मैं विजय पाने के लिए बुलाता हूं.
(२)
उप त्वा देवो अग्रभीच्चमसेन बृहस्पतिः.
इन्द्र गीर्भिर्न आ विश यजमानाय सुन्वते.. (३)
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सूक्त-११६ देवता—वृषभ

हे इंद्र! तुम्हें बृहस्पति देव ने सोमपान के द्वारा अन्यत्र जाने से रोक दिया है. हे इंद्र! तुम
सोम निचोड़ने वाले यजमान को धन आदि से पुष्ट करने के लिए हम स्तोताओं की स्तुतियां
सुन कर आओ. (३)
सूक्त-११६ देवता—वृषभ
इन्द्रस्य कुक्षिरसि सोमधान आत्मा देवानामुत मानुषाणाम्.
इह प्रजा जनय यास्त आसु या अन्यत्रेह तास्ते रमन्ताम्.. (१)
हे छोड़े गए बैल! तुम सोम के आधार और इंद्र के उदर हो. तुम देवों और मनुष्यों के
शरीर हो. तुम इस लोक में संतान उत्पन्न करो. सामने उपस्थित इस गांव में अथवा तुम्हारे
निमित्त जो गाएं अन्यत्र विद्यमान हैं, उन में तुम्हारी प्रजाएं सुख से विहार करें. (१)
सूक्त-११७ देवता—जल
शुम्भनी द्यावापृथिवी अन्तिसुम्ने महिव्रते.
आपः सप्त सुस्रुवुर्देवीस्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१)
शोभाकारिणी, द्यावा पृथिवी के मध्य जो अज्ञानावृत जन चेतन और अचेत की मध्यवर्ती
दशा में वर्तमान हैं, वे सात प्रकार के दिव्य जल बरसाते हैं. ऐसे द्यावा पृथिवी हमें पाप कर्म से
बचाएं. (१)
मुञ्चन्तु मा शपथ्या ३ दथो वरुण्या दुत.
अथो यमस्य पड्वीशाद् विश्वस्माद् देवकिल्बिषात्.. (२)
जल अथवा ओषधियां मुझे ब्राह्मण के आक्रोश से उत्पन्न पाप से तथा असत्य भाषण
के कारण लगने वाले पाप से छुड़ाएं. वे यम के पाशों से तथा देव संबंधी सभी पापों से मुझे
बचाएं. (२)
सूक्त-११८ देवता—तृष्टिका
तृष्टिके तृष्टवन्दन उदमूं छिन्धि तृष्टिके. यथा कृतद्विषासो ऽ मुष्मै
शैप्यावते.. (१)
हे तृष्टिका अर्थात् दाह उत्पन्न करने वाली वाणापर्ण्य नामक जड़ीबूटी तथा हे दाह
उत्पन्न करने वाली तृष्टवंदना नामक जड़ीबूटी! इस स्त्री को भोक्ता पुरुष से बलपूर्वक दूर
करो. हे कोक उत्पन्न करने वाली जड़ीबूटी तृष्टिका! प्रजनन एवं संभोग में सक्षम इस पुरुष के
लिए तू द्वेष करने वाली बन. (१)
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तृष्टासि तृष्टिका विषा विषातक्यसि. परिवृक्ता यथासस्यृषभस्य वशेव..
(२)
हे तृष्टिका नामक जड़ीबूटी! तेरा स्वभाव दाह उत्पन्न करना है. जिस प्रकार तू विष
स्वरूपा एवं विष का संयोग करने वाली है तथा जिस प्रकार तू सभी के द्वारा वर्जित है, जिस
प्रकार बांझ गाय सांड के लिए त्याज्य होती है, उसी प्रकार वह नारी पुरुष के लिए विष
रूपिणी हो. (२)
सूक्त-११९ देवता—अग्नि, सोम
आ ते ददे वक्षणाभ्य आ ते ऽ हं हृदयाद् ददे.
आ ते मुखस्य संकाशात् सर्वं ते वर्च आ ददे.. (१)
हे नारी! मैं तेरी योनि एवं जांघों के तेज का अपहरण करता हूं. हे नारी! मैं तेरे स्वस्थ
मन से साधु पुरुष के ध्यान रूपी तेज का अपहरण करता हूं. मैं तेरे मुख से सब को प्रसन्न
करने वाले तेज का अपहरण करता हूं. अधिक क्या कहूं, मैं तेरे सभी अंगों से सौभाग्य रूपी
तेज का अपहरण करता हूं. (१)
प्रेतो यन्तु व्याध्यः प्रानुध्याः प्रो अशस्तयः.
अग्नी रक्षस्विनीर्हन्तु सोमो हन्तु दुरस्यतीः.. (२)
मानसिक व्याधियां इस गृह के पीड़ित पुरुष से दूर चली जाएं तथा मानसिक व्याधियों
से संबंधित लगातार स्मरण भी इस से दूर हो जाए. दूसरों के द्वारा होने वाली निंदा एवं हिंसा
भी इस से दूर रहे. अग्नि देव राक्षसों और राक्षसियों का विनाश करें तथा सोमदेव दूसरों द्वारा
होने वाली बुरी इच्छाओं को इस से दूर करें. (२)
सूक्त-१२० देवता—सविता
प्र पतेतः पापि लक्ष्मि नश्येतः प्रामुतः पत.
अयस्मयेनाङ्केन द्विषते त्वा सजामसि.. (१)
हे पाप रूपिणी लक्ष्मी अर्थात् दरिद्रता! तू इस प्रदेश से दूर चली जा. तू इस प्रदेश में
दिखाई मत दे तथा इस प्रदेश से बहुत दूर चली जा. मैं तुझे अपने शत्रु के साथ लोहे के कांटों
से बांधता हूं. (१)
या मा लक्ष्मीः पतयालूरजुष्टा ऽ भिचस्कन्द वन्दनेव वृक्षम्.
अन्यत्रास्मत् सवितस्तामितो धा हिरण्यहस्तो वसु नो रराणः.. (२)
वंदना नाम की लताविशेष जिस प्रकार वृक्ष को चारों ओर से लपेट लेती है, उसी प्रकार
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दुर्गति करने वाली तथा प्रिय न लगने वाली दरिद्रता ने मुझे सभी ओर से घेर लिया है. हे
सविता देव! इस दरिद्रता को मुझ से एवं मेरे प्रदेश से अन्यत्र स्थापित करो. हाथों में सोना
लिए हुए सविता ने हमें धन दिया है. (२)
एकशतं लक्ष्म्यो ३ मर्त्यस्य साकं तन्वा जनुषो ऽ धि जाता:.
तासां पापिष्ठा निरित: प्र हिण्म: शिवा अस्मभ्यं जातवेदो नि यच्छ.. (३)
एक सौ लक्ष्मियां मनुष्य के जन्म के साथ ही उत्पन्न होती हैं. उन में से अतिशय पापिष्ठ
लक्ष्मी को हम इस प्रदेश से दूर भेजते हैं. हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता अग्नि देव! उन लक्ष्मियों
में जो मंगलकारिणी हैं, उन्हें हमारे साथ स्थापित करो. (३)
एता एना व्याकरं खिले गा विष्ठिता इव.
रमन्तां पुण्या लक्ष्मीर्या: पापीस्ता अनीनशम्.. (४)
मैं इन बताई गई एक सौ लक्ष्मियों को उसी प्रकार विभाजित कर के दो भागों में रखता
हूं जिस प्रकार गोशाला में बैठी हुई गायों को ग्वाला विभाजित करता है. पुण्य लक्ष्मियां मुझ
में सुख से निवास करें और पापकारिणी लक्ष्मियां मुझ से दूर चली जाएं. (४)
सूक्त-१२१ देवता—चंद्रमा
नमो रूराय च्यवनाय नोदनाय धृष्णवे.
नम: शीताय पूर्वकामकृत्वने.. (१)
शरीर का पसीना गिराने वाले, प्रेरक एवं सहन करने वाले, उष्णिग् ज्वर से संबंधित देव
को नमस्कार है. अभिलाषाओं का विनाश करने वाले शीत ज्वर से संबंधित देव को नमस्कार
है. (१)
यो अन्येद्युरुभयद्युरभ्येतीमं मण्डूकमभ्ये त्वव्रतः.. (२)
जो ज्वर दूसरे अथवा चौथे दिन आता है, वह नियमहीन ज्वर मेढक के पास चला जाए.
(२)
सूक्त-१२२ देवता—इंद्र
आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभि:.
मा त्वा केचिद् वि यमन् विं न पाशिनो ऽ ति धन्वेव तां इहि.. (१)
हे इंद्र! स्तुति करने वाले योग्य एवं मोरों के समान रोमों वाले घोड़ों की सहायता से यहां
आओ. हे इंद्र! कोई भी स्तोता अपनी स्तुतियों के द्वारा तुम्हें उस प्रकार न रोके, जिस प्रकार
पक्षियों को पकड़ने वाला चिड़ीमार पक्षियों को रोकता है. जिस प्रकार प्यासा यात्री जल वाले
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सूक्त-१२३ देवता—सोम, वरुण

स्थान पर जाता है, उसी प्रकार दूसरे स्तुतिकर्ताओं का अतिक्रमण कर के तुम शीघ्र हमारे
पास आओ. (१)
सूक्त-१२३ देवता—सोम, वरुण
मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजा ऽ मृतेनानु वस्ताम्.
उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वा ऽ नु देवा मदन्तु.. (१)
हे विजय के इच्छुक राजा! मैं तेरे मर्मस्थानों को कवच से ढकता हूं. सोम राजा तुझे
अपने अविनाशी तेज से आच्छादित करें. वरुण देव तेरे लिए अधिक सुख दें. इंद्र आदि सभी
देव शत्रु सेना को भयभीत करते हुए तुझे हर्षित करें. (१)
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सूक्त-१ देवता—आयु

आठवां कांड
सूक्त-१ देवता—आयु
अन्तकाय मृत्यवे नमः प्राणा अपाना इह ते रमन्ताम्.
इहायमस्तु पुरुषः सहासुना सूर्यस्य भागे अमृतस्य लोके.. (१)
सभी प्राणियों का विनाश करने वाले मृत्यु को नमस्कार है. हे ब्रह्मचारी! प्राण और
अपान वायु तेरे शरीर में रमण करें. यह पुरुष प्राणों से युक्त हो. यह सूर्य प्रदेश में, भूलोक में
एवं अमृतलोक में वर्तमान रहे. (१)
उदेनं भगो अग्रभीदुदेनं सोमो अंशुमान्.
उदेनं मरुतो देवा उदिन्द्राग्नी स्वस्तये.. (२)
भग नामक अदिति पुत्र ने इस मूर्च्छित पुरुष का उद्धार किया है. अमृतमयी किरणों से
सोम ने इस का उद्धार किया है. मरुत् देवों ने एवं अग्नि ने क्षेम के लिए इस का उद्धार किया
है. (२)
इह ते ऽ सुरिह प्राण इहायुरिह ते मनः.
उत् त्वा निर्ऋत्याः पाशेभ्यो दैव्या वाचा भरामसि.. (३)
हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तेरी प्राण वायु एवं चक्षु आदि इंद्रियां तेरे शरीर में
निवास करें. तेरी आयु एवं मन भी तेरे इसी शरीर में रहें. हम निर्ऋति नामक पाप देवता के
बंधनों से अपने मंत्रों द्वारा तेरा उद्धार करते हैं. (३)
उत् क्रामातः पुरुष माव पत्था मृत्योः पड्बीशमवमुञ्चमानः.
मा च्छित्था अस्माल्लोकादग्नेः सूर्यस्य संदृशः.. (४)
हे पुरुष! तू मृत्यु के उन पाशों से छूट जा एवं पतन से बच. मृत्युदेव के पाश तेरे पैरों को
बांधने वाले हैं. तू उन्हें काटता हुआ भूलोक से अलग मत हो. तू अग्नि और सूर्य का दर्शन
करने के लिए इस लोक में रह. (४)
तुभ्यं वातः पवतां मातरिश्वा तुभ्यं वर्षन्त्वमृतान्यापः.
सूर्यस्ते तन्वे ३ शं तपाति त्वां मृत्युर्दयतां मा प्र मेष्ठाः.. (५)
हे मरण के समीप पहुंचे हुए पुरुष! वायु तेरे सुख के लिए चले. जल तेरे लिए अमृत की
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