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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

वषड्हुतेभ्यो वषड्हुतेभ्यः. देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित.. (७) इष्ट देवों और अग्नि देवों के लिए यह आज्य अग्नि में दिया जाए. हे मार्ग को जानने वाले देवो! तुम मार्ग पा कर हमारे यज्ञ में जिस मार्ग से आए हो, उसी मार्ग से लौट जाओ. (७) मनसस्पत इमं नो दिवि देवेषु यज्ञम्. स्वाहा दिवि स्वाहा पृथिव्यां स्वाहा ऽ न्तरिक्षे स्वाहा वाते धां स्वाहा.. (८) हे समस्त प्राणियों के स्वामी देव! हमारे इस यज्ञ को स्वर्ग में वर्तमान देवों तक पहुंचाओ. तुम हमारे यज्ञ को आकाश में, पृथ्वी पर, अंतरिक्ष में एवं सभी कर्मों के आधार वायु में स्थापित करो. (८) सूक्त-१०३ देवता—इंद्र सं बर्हिरक्तं हविषा घृतेन समिन्द्रेण वसुना सं मरुद्भिः. सं देवैर्विश्वेदेवैभिरक्तमिन्द्रं गच्छतु हविः स्वाहा.. (१) स्रुक आदि पात्र पुरोडाश और आज्य से पूर्ण हो कर इंद्र के साथ, वसुओं के साथ मरुद्गण के साथ तथा विश्वे देवों के साथ संपन्न हुए. इस प्रकार का पात्र इंद्र को प्राप्त हो तथा यह हवि शोभन आहुति वाला हो. (१) सूक्त-१०४ देवता—वेदी परि स्तृणीहि परि धेहि वेदिं मा जामिं मोषीरमुया शयानाम्. होतृषदनं हरितं हिरण्ययं निष्का एते यजमानस्य लोके.. (१) हे दर्भ घास के फूल! तुम यज्ञ वेदी के चारों ओर विस्तीर्ण हो कर उसे ढक लो. तुम इस वेदी पर सोते हुए यजमान के सहयोगियों का एवं संतान का विनाश मत करो. हे होताओं के बैठने के स्थान हरित वर्ण वाले एवं स्वर्ग के समान रमणीय दर्भ! तुम यज्ञ वेदी पर फैल जाओ. ये फैले हुए दर्भ यजमान के लोकों में सोने के अलंकार हों. (१) सूक्त-१०५ देवता—बुरे स्वप्न का विनाश पर्यावर्ते दुष्षप्न्यात् पापात् स्वप्न्यादभूत्याः. ब्रह्माहमन्तरं कृण्वे परा स्वप्नमुखाः शुचः.. (१) मैं बुरे स्वप्न से उत्पन्न पाप से छूट जाऊं तथा स्वप्न के दोष से भी अलग रहूं. मैं बुरे स्वप्न का निवारण करने वाले मंत्र को बोलता हूं. बुरे स्वप्न से संबंध रखने वाले शोक मुझ से दूर हों. ebook converter DEMO Watermarks*

(१) सूक्त-१०६ देवता—बुरे स्वप्न का विनाश यत् स्वप्ने अन्नमश्नामि न प्रातरधिगम्यते. सर्वं तदस्तु मे शिवं नहि तद् दृश्यते दिवा.. (१) स्वप्न देखते समय मैं जो अन्न खाता हूं, वह अन्न प्रातःकाल दिखाई नहीं देता. वह अन्न दिन में भी नहीं दिखाई देता. स्वप्न में खाया गया समस्त भोजन मेरे लिए कल्याण करने वाला हो. (१) सूक्त-१०७ देवता—द्यावा, पृथिवी आदि नमस्कृत्य द्यावापृथिवीभ्यामन्तरिक्षाय मृत्यवे. मेक्षाम्यूर्ध्वस्तिष्ठन् मा मा हिंसिषुरीश्वरा:.. (१) मैं धरती, आकाश, अंतरिक्ष और मृत्यु को नमस्कार कर के बैठा हूं. मैं ऊर्ध्व लोक को न जाऊं अर्थात् मृत्यु को प्राप्त न करूं. द्यावा, पृथ्वी आदि के अधिष्ठाता देव मेरी हिंसा न करें. (१) सूक्त-१०८ देवता—आत्मा को अस्या नो द्रुहो ऽ वद्यवत्या उन्नेष्यति क्षत्रियो वस्य इच्छन्. को यज्ञकाम: क उ पूर्तिकाम: को देवेषु वनुते दीर्घमायु:.. (१) हमें निवास स्थान देने का इच्छुक कौन क्षत्रिय राजा इस समय बाधा पहुंचाने वाली एवं अहितकारिणी पिशाची से हमारा उद्धार करेगा? हमारे द्वारा किए जाते हुए यज्ञ की कामना करता हुआ एवं हमें धन की आपूर्ति की इच्छा करता हुआ कौन सा देव देवों के मध्य चिरकाल तक होने वाले जीवन को प्राप्त करता है. (१) सूक्त-१०९ देवता—आत्मा क: पृश्निं धेनुं वरुणेन दत्त मथर्वणे सुदुघां नित्यवत्साम्. बृहस्पतिना सख्यं जुषाणो यथावशं तन्व: कल्पयाति.. (१) लाल आदि रंगों वाली, सरलता से दुही जाने वाली, सर्वदा बछड़े देने वाली एवं अथर्वा ऋषि के लिए वरुण द्वारा दी गई गाय को बृहस्पति देव के साथ मित्रता का भाव रखता हुआ कौन सा देव इच्छानुसार कल्पित कर सकता है. आशय यह है कि केवल बृहस्पति देव ही ऐसा कर सकते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-११० देवता—ब्रह्मचारी

सूक्त-११० देवता—ब्रह्मचारी अपक्रामन् पौरुषेयाद् वृणानो दैव्यं वचः. प्रणीतीरभ्यावर्तस्व विश्वेभिः सखिभिः सह.. (१) हे ब्रह्मचारी! तू पुरुषों के हितकारी लौकिक कर्म त्याग कर देव संबंधी वाक्य अर्थात् वेद मंत्रों के स्वाध्याय को स्वीकार करता हुआ संयमी बन तथा सभी ब्रह्मचारियों के साथ निवास कर. (१) सूक्त-१११ देवता—जातवेद यदस्मृति चकृम किं चिदग्न उपारिम चरणे जातवेदः. ततः पाहि त्वं नः प्रचेतः शुभे सखिभ्यो अमृतत्वमस्तु नः.. (१) हे अग्नि देव! हम ने तुम्हारे स्मरण से रहित जो कर्म किया है तथा इस यज्ञ के अनुष्ठान में जो कमी रह गई है, हे उत्तम कर्म जानने वाले अग्नि देव! तुम उस पाप से हमारी रक्षा करो. इस के पश्चात मैं अपने प्रिय व्यक्तियों के शोभन यज्ञ कर्म में संलग्न रहूं. (१) सूक्त-११२ देवता—सूर्य अव दिवस्तारयन्ति सप्त सूर्यस्य रश्मयः. आपः समुद्रिया धारास्तास्ते शल्यमसिम्रसन्.. (१) कश्यप नामक प्रधान सूर्य से संबंधित सात व्यापक किरणों वाले आरोग्य आदि सूर्य हैं. वे आकाश में उत्पन्न धारा रूपी जलों को आकाश से नीचे उतारते हैं. हे रोगी! वे जल शल्य के समान तेरे यक्ष्मा रोग को नष्ट कर दें. (१) सूक्त-११३ देवता—अग्नि यो न स्तायद् दिप्सति यो न आविः स्वो विद्वानरणो वा नो अग्ने. प्रतीच्येत्वरणी दत्वती तान् मैषामग्ने वास्तु भून्मो अपत्यम्.. (१) हे अग्नि! जो शत्रु हमें प्रच्छन्न रूप से मारना चाहता है, जो शत्रु हमें प्रकाश रूप में मारना चाहता है तथा दूसरे को बाधा पहुंचाने के उपाय जानता हुआ आत्मीय बंधु हमें मारना चाहता है - इन तीनों को दांतों वाली तथा कष्टकारिणी राक्षसी प्राप्त हो. अर्थात् वह अपने दांतों से खाने के लिए उन के समीप आए. हे अग्नि! उक्त तीनों का घर एवं संतान नष्ट हो जाए. (१) यो नः सुप्तानूजाग्रतो वाभिदासात् तिष्ठतो वा चरतो जातवेदः. ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-११४ देवता—अग्नि

वैश्वानरेण सयुजा सजोषास्तान् प्रतीचो निर्दह जातवेदः.. (२) हे अग्नि! जो शत्रु हमें सोते हुए मारना चाहता है, जो हमें जागते हुए मारना चाहता है, जो शत्रु हमें बैठे हुए मारना चाहता है तथा जो शत्रु हमें चलते हुए मारना चाहता है, हे अग्नि! तुम जठराग्नि से मिल कर और समान प्रीति वाले बन कर हमें मारने के लिए सामने आते हुए शत्रुओं को जलाओ. (२) सूक्त-११४ देवता—अग्नि इदमुग्राय बभ्रवे नमो यो अक्षेषु तनूवशी. घृतेन कलिं शिक्षामि स नो मृडातीदृशे.. (१) अधिक बलशाली एवं मटमैले रंग वाले उस देव को नमस्कार है जो जुए में विजय प्राप्त कराता है. वह जुए में पासों से इच्छानुसार विजय दिलाने वाला है. मंत्र युक्त घृत के द्वारा मैं कलि अर्थात पराजय देने वाले पांच अंकों को नष्ट करता हूं. नमस्कार से प्रसन्न जुए का देव इस प्रकार के जय लक्षण फल के द्वारा हमें सुखी करें. (१) घृतमप्सराभ्यो वह त्वमग्ने पांसूनक्षेभ्यः सिकता उपश्व. यथाभागं हव्यदातिं जुषाणा मदन्ति देवा उभयानि हव्या.. (२) हे अग्नि! तुम हमारी विजय के लिए अंतरिक्ष में घूमने वाली अप्सराओं को आज्य अर्थात् घृत पहुंचाओ तथा हमारे विरोधी जुआरियों के लिए सूक्ष्म धूल के कण, शकर और जल पहुंचाओ, जिस से वे पराजित हों. अपनेअपने भाग के अनुसार हवि प्राप्त करते हुए देव दो प्रकार के हवि से अर्थात् सोम और घृत से तृप्त होते हैं. (२) अप्सरसः सधमादं मदन्ति हविर्धानमन्तरा सूर्यं च. ता मे हस्तौ सं सृजन्तु घृतेन सपत्नं मे कितवं रन्धयन्तु.. (३) जुए की देवियां अप्सराएं भूलोक और अंतरिक्षलोक में एक साथ प्रसन्न होती हैं. वे अप्सराएं मेरे दोनों हाथों को जय लक्षण फल से संयुक्त करें तथा मेरे विरोधी जुआरी को मेरे वश में करें. (३) आदिनवं प्रतिदीव्ने घृतेनास्माँ अभि क्षर. वृक्षमिवाशन्या जहि यो अस्मान् प्रतिदीव्यति.. (४) मैं अपने विरोधी जुआरी को जीतने के लिए पासों के द्वारा जुआ खेलता हूं. हे जुए से संबंधित देवियो! मुझे सारपूर्ण विजय से युक्त कराओ. जो जुआरी मुझे जीतने के लिए मेरे विरोध में जुआ खेलता है, उस का उसी प्रकार विनाश करो, जिस प्रकार बिजली सूखे वृक्ष का विनाश कर देती है. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

यो नो द्युवे धनमिदं चकार यो अक्षाणां ग्लहनं शेषणं च. स नो देवो हविरिदं जुषाणो गन्धर्वेभिः सधमादं मदेम.. (५) जिस देव ने जुआ खेलते हुए लोगों को विरोधी जुआरी की हार के रूप में धन दिलाया है तथा जिस देव ने विरोधी जुआरी के पासों का ग्रहण और विरोध में दमन किया है, वह देव हमारी इस हवि को स्वीकार करे. हम जुए के देवों अर्थात् गंधर्वों के साथ प्रसन्न रहें. (५) संवसव इति वो नामधेयमुग्रंपश्या राष्ट्रभृतो ह्य१क्षाः. तेभ्यो व इन्द्वो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (६) हे गंधर्वो अर्थात् जुए के पासो! तुम वसु अर्थात् धन प्राप्त कराते हो, इसलिए तुम्हारा नाम संवसु है. क्योंकि पासे उग्रंपश्या राष्ट्रभृत नामक दो अप्सराओं से संबंधित हैं, इसलिए हम उन गंधर्वों अथवा पासों के लिए सोमयुक्त हवि प्रयुक्त करते हैं. इस के पश्चात जुआ खेलते हुए हम धनों के स्वामी बनें. (६) देवान् यन्नाधितो हुवे ब्रह्मचर्यं यदूषिम. अक्षान् यद् बभ्रूनालभे ते नो मृडन्त्वीदृशे.. (७) मैं दुःखी हो कर अग्नि आदि देवों को धन लाभ के हेतु बुलाता हूं. मैं ने वेदमंत्रों के ग्रहण के नियमों का पालन किया है तथा मैं मटमैले रंग के पासों को जुआ खेलने के लिए निर्मित कर रहा हूं इसलिए जुए के अधिष्ठाता देव जय लक्षण फल के द्वारा हमें सुखी करें. (७) सूक्त-११५ देवता—इंद्र, अग्नि अग्न इन्द्रश्च दाशुषे हतो वृत्राण्यप्रति. उभा हि वृत्रहन्तमा.. (१) हे अग्नि और इंद्र! तुम हवि देने वाले यजमान के पापों को पूर्ण रूप से नष्ट करो, क्योंकि तुम दोनों अर्थात् अग्नि और इंद्र ने वृत्र का वध किया है. (१) याभ्यामजयन्त्स्व १ र्ग्य एव यावातस्थतुर्भुवनानि विश्वा. प्रचर्षणी वृषणा वज्रबाहू अग्निमिन्द्रं वृत्रहणा हुवे ऽ हम्.. (२) पूर्वजों ने जिन अग्नि और इंद्र की सहायता से स्वर्ग को अपने अधीन किया है, जिन अग्नि और इंद्र ने सारे लोकों को अपनी महिमा से व्याप्त कर लिया है तथा जो अपने उपासकों के कर्म के फल को विशेष रूप से देखते हैं, उन्हें मनचाहा फल देने वाले, हाथों में वज्र धारण करने वाले तथा वृत्र हंता अग्नि और इंद्र को मैं विजय पाने के लिए बुलाता हूं. (२) उप त्वा देवो अग्रभीच्चमसेन बृहस्पतिः. इन्द्र गीर्भिर्न आ विश यजमानाय सुन्वते.. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-११६ देवता—वृषभ

हे इंद्र! तुम्हें बृहस्पति देव ने सोमपान के द्वारा अन्यत्र जाने से रोक दिया है. हे इंद्र! तुम सोम निचोड़ने वाले यजमान को धन आदि से पुष्ट करने के लिए हम स्तोताओं की स्तुतियां सुन कर आओ. (३) सूक्त-११६ देवता—वृषभ इन्द्रस्य कुक्षिरसि सोमधान आत्मा देवानामुत मानुषाणाम्. इह प्रजा जनय यास्त आसु या अन्यत्रेह तास्ते रमन्ताम्.. (१) हे छोड़े गए बैल! तुम सोम के आधार और इंद्र के उदर हो. तुम देवों और मनुष्यों के शरीर हो. तुम इस लोक में संतान उत्पन्न करो. सामने उपस्थित इस गांव में अथवा तुम्हारे निमित्त जो गाएं अन्यत्र विद्यमान हैं, उन में तुम्हारी प्रजाएं सुख से विहार करें. (१) सूक्त-११७ देवता—जल शुम्भनी द्यावापृथिवी अन्तिसुम्ने महिव्रते. आपः सप्त सुस्रुवुर्देवीस्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१) शोभाकारिणी, द्यावा पृथिवी के मध्य जो अज्ञानावृत जन चेतन और अचेत की मध्यवर्ती दशा में वर्तमान हैं, वे सात प्रकार के दिव्य जल बरसाते हैं. ऐसे द्यावा पृथिवी हमें पाप कर्म से बचाएं. (१) मुञ्चन्तु मा शपथ्या ३ दथो वरुण्या दुत. अथो यमस्य पड्वीशाद् विश्वस्माद् देवकिल्बिषात्.. (२) जल अथवा ओषधियां मुझे ब्राह्मण के आक्रोश से उत्पन्न पाप से तथा असत्य भाषण के कारण लगने वाले पाप से छुड़ाएं. वे यम के पाशों से तथा देव संबंधी सभी पापों से मुझे बचाएं. (२) सूक्त-११८ देवता—तृष्टिका तृष्टिके तृष्टवन्दन उदमूं छिन्धि तृष्टिके. यथा कृतद्विषासो ऽ मुष्मै शैप्यावते.. (१) हे तृष्टिका अर्थात् दाह उत्पन्न करने वाली वाणापर्ण्य नामक जड़ीबूटी तथा हे दाह उत्पन्न करने वाली तृष्टवंदना नामक जड़ीबूटी! इस स्त्री को भोक्ता पुरुष से बलपूर्वक दूर करो. हे कोक उत्पन्न करने वाली जड़ीबूटी तृष्टिका! प्रजनन एवं संभोग में सक्षम इस पुरुष के लिए तू द्वेष करने वाली बन. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

तृष्टासि तृष्टिका विषा विषातक्यसि. परिवृक्ता यथासस्यृषभस्य वशेव.. (२) हे तृष्टिका नामक जड़ीबूटी! तेरा स्वभाव दाह उत्पन्न करना है. जिस प्रकार तू विष स्वरूपा एवं विष का संयोग करने वाली है तथा जिस प्रकार तू सभी के द्वारा वर्जित है, जिस प्रकार बांझ गाय सांड के लिए त्याज्य होती है, उसी प्रकार वह नारी पुरुष के लिए विष रूपिणी हो. (२) सूक्त-११९ देवता—अग्नि, सोम आ ते ददे वक्षणाभ्य आ ते ऽ हं हृदयाद् ददे. आ ते मुखस्य संकाशात् सर्वं ते वर्च आ ददे.. (१) हे नारी! मैं तेरी योनि एवं जांघों के तेज का अपहरण करता हूं. हे नारी! मैं तेरे स्वस्थ मन से साधु पुरुष के ध्यान रूपी तेज का अपहरण करता हूं. मैं तेरे मुख से सब को प्रसन्न करने वाले तेज का अपहरण करता हूं. अधिक क्या कहूं, मैं तेरे सभी अंगों से सौभाग्य रूपी तेज का अपहरण करता हूं. (१) प्रेतो यन्तु व्याध्यः प्रानुध्याः प्रो अशस्तयः. अग्नी रक्षस्विनीर्हन्तु सोमो हन्तु दुरस्यतीः.. (२) मानसिक व्याधियां इस गृह के पीड़ित पुरुष से दूर चली जाएं तथा मानसिक व्याधियों से संबंधित लगातार स्मरण भी इस से दूर हो जाए. दूसरों के द्वारा होने वाली निंदा एवं हिंसा भी इस से दूर रहे. अग्नि देव राक्षसों और राक्षसियों का विनाश करें तथा सोमदेव दूसरों द्वारा होने वाली बुरी इच्छाओं को इस से दूर करें. (२) सूक्त-१२० देवता—सविता प्र पतेतः पापि लक्ष्मि नश्येतः प्रामुतः पत. अयस्मयेनाङ्केन द्विषते त्वा सजामसि.. (१) हे पाप रूपिणी लक्ष्मी अर्थात् दरिद्रता! तू इस प्रदेश से दूर चली जा. तू इस प्रदेश में दिखाई मत दे तथा इस प्रदेश से बहुत दूर चली जा. मैं तुझे अपने शत्रु के साथ लोहे के कांटों से बांधता हूं. (१) या मा लक्ष्मीः पतयालूरजुष्टा ऽ भिचस्कन्द वन्दनेव वृक्षम्. अन्यत्रास्मत् सवितस्तामितो धा हिरण्यहस्तो वसु नो रराणः.. (२) वंदना नाम की लताविशेष जिस प्रकार वृक्ष को चारों ओर से लपेट लेती है, उसी प्रकार ebook converter DEMO Watermarks*

दुर्गति करने वाली तथा प्रिय न लगने वाली दरिद्रता ने मुझे सभी ओर से घेर लिया है. हे सविता देव! इस दरिद्रता को मुझ से एवं मेरे प्रदेश से अन्यत्र स्थापित करो. हाथों में सोना लिए हुए सविता ने हमें धन दिया है. (२) एकशतं लक्ष्म्यो ३ मर्त्यस्य साकं तन्वा जनुषो ऽ धि जाता:. तासां पापिष्ठा निरित: प्र हिण्म: शिवा अस्मभ्यं जातवेदो नि यच्छ.. (३) एक सौ लक्ष्मियां मनुष्य के जन्म के साथ ही उत्पन्न होती हैं. उन में से अतिशय पापिष्ठ लक्ष्मी को हम इस प्रदेश से दूर भेजते हैं. हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता अग्नि देव! उन लक्ष्मियों में जो मंगलकारिणी हैं, उन्हें हमारे साथ स्थापित करो. (३) एता एना व्याकरं खिले गा विष्ठिता इव. रमन्तां पुण्या लक्ष्मीर्या: पापीस्ता अनीनशम्.. (४) मैं इन बताई गई एक सौ लक्ष्मियों को उसी प्रकार विभाजित कर के दो भागों में रखता हूं जिस प्रकार गोशाला में बैठी हुई गायों को ग्वाला विभाजित करता है. पुण्य लक्ष्मियां मुझ में सुख से निवास करें और पापकारिणी लक्ष्मियां मुझ से दूर चली जाएं. (४) सूक्त-१२१ देवता—चंद्रमा नमो रूराय च्यवनाय नोदनाय धृष्णवे. नम: शीताय पूर्वकामकृत्वने.. (१) शरीर का पसीना गिराने वाले, प्रेरक एवं सहन करने वाले, उष्णिग् ज्वर से संबंधित देव को नमस्कार है. अभिलाषाओं का विनाश करने वाले शीत ज्वर से संबंधित देव को नमस्कार है. (१) यो अन्येद्युरुभयद्युरभ्येतीमं मण्डूकमभ्ये त्वव्रतः.. (२) जो ज्वर दूसरे अथवा चौथे दिन आता है, वह नियमहीन ज्वर मेढक के पास चला जाए. (२) सूक्त-१२२ देवता—इंद्र आ मन्द्रैरिन्द्र हरिभिर्याहि मयूररोमभि:. मा त्वा केचिद् वि यमन् विं न पाशिनो ऽ ति धन्वेव तां इहि.. (१) हे इंद्र! स्तुति करने वाले योग्य एवं मोरों के समान रोमों वाले घोड़ों की सहायता से यहां आओ. हे इंद्र! कोई भी स्तोता अपनी स्तुतियों के द्वारा तुम्हें उस प्रकार न रोके, जिस प्रकार पक्षियों को पकड़ने वाला चिड़ीमार पक्षियों को रोकता है. जिस प्रकार प्यासा यात्री जल वाले ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१२३ देवता—सोम, वरुण

स्थान पर जाता है, उसी प्रकार दूसरे स्तुतिकर्ताओं का अतिक्रमण कर के तुम शीघ्र हमारे पास आओ. (१) सूक्त-१२३ देवता—सोम, वरुण मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजा ऽ मृतेनानु वस्ताम्. उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वा ऽ नु देवा मदन्तु.. (१) हे विजय के इच्छुक राजा! मैं तेरे मर्मस्थानों को कवच से ढकता हूं. सोम राजा तुझे अपने अविनाशी तेज से आच्छादित करें. वरुण देव तेरे लिए अधिक सुख दें. इंद्र आदि सभी देव शत्रु सेना को भयभीत करते हुए तुझे हर्षित करें. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१ देवता—आयु

आठवां कांड सूक्त-१ देवता—आयु अन्तकाय मृत्यवे नमः प्राणा अपाना इह ते रमन्ताम्. इहायमस्तु पुरुषः सहासुना सूर्यस्य भागे अमृतस्य लोके.. (१) सभी प्राणियों का विनाश करने वाले मृत्यु को नमस्कार है. हे ब्रह्मचारी! प्राण और अपान वायु तेरे शरीर में रमण करें. यह पुरुष प्राणों से युक्त हो. यह सूर्य प्रदेश में, भूलोक में एवं अमृतलोक में वर्तमान रहे. (१) उदेनं भगो अग्रभीदुदेनं सोमो अंशुमान्. उदेनं मरुतो देवा उदिन्द्राग्नी स्वस्तये.. (२) भग नामक अदिति पुत्र ने इस मूर्च्छित पुरुष का उद्धार किया है. अमृतमयी किरणों से सोम ने इस का उद्धार किया है. मरुत् देवों ने एवं अग्नि ने क्षेम के लिए इस का उद्धार किया है. (२) इह ते ऽ सुरिह प्राण इहायुरिह ते मनः. उत् त्वा निर्ऋत्याः पाशेभ्यो दैव्या वाचा भरामसि.. (३) हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तेरी प्राण वायु एवं चक्षु आदि इंद्रियां तेरे शरीर में निवास करें. तेरी आयु एवं मन भी तेरे इसी शरीर में रहें. हम निर्ऋति नामक पाप देवता के बंधनों से अपने मंत्रों द्वारा तेरा उद्धार करते हैं. (३) उत् क्रामातः पुरुष माव पत्था मृत्योः पड्बीशमवमुञ्चमानः. मा च्छित्था अस्माल्लोकादग्नेः सूर्यस्य संदृशः.. (४) हे पुरुष! तू मृत्यु के उन पाशों से छूट जा एवं पतन से बच. मृत्युदेव के पाश तेरे पैरों को बांधने वाले हैं. तू उन्हें काटता हुआ भूलोक से अलग मत हो. तू अग्नि और सूर्य का दर्शन करने के लिए इस लोक में रह. (४) तुभ्यं वातः पवतां मातरिश्वा तुभ्यं वर्षन्त्वमृतान्यापः. सूर्यस्ते तन्वे ३ शं तपाति त्वां मृत्युर्दयतां मा प्र मेष्ठाः.. (५) हे मरण के समीप पहुंचे हुए पुरुष! वायु तेरे सुख के लिए चले. जल तेरे लिए अमृत की ebook converter DEMO Watermarks*

वर्षा करे. सूर्य देव तेरे शरीर को सुख देने के लिए तपें. हे पुरुष! मृत्यु देव तुझ पर दया करें. (५) उद्यानं ते पुरुष नावयानं जीवातुं ते दक्षतातं कृणोमि. आ हि रोहेमममृतं सुखं रथमथ जिर्विर्विदथमा वदासि.. (६) हे पुरुष! मैं तेरे जीवन के लिए ओषधियों का निर्माण करता हूं तथा तुझे बल प्रदान करता हूं. मृत्यु के पाशों से तेरा छुटकारा हो, तू उन पाशों में न फंसे. तू समाप्त न होने वाले तथा इंद्रिय सुख के अनुकूल शरीर रूपी रथ पर बैठ. इस शरीर रूपी रथ पर बैठ कर तू कह कि मुझे चेतना प्राप्त हो गई है. (६) मा ते मनस्तत्र गान्मा तिरो भून्मा जीवेभ्यः प्र मदो मानु गाः पितॄन्. विश्वे देवा अभि रक्षन्तु त्वेह.. (७) तेरा मन यमराज के विषय में न जाए तथा तेरा मन विलीन भी न हो. तू अपने बंधुओं के प्रति असावधान न रहे. तू मरे हुए पूर्वजों का अनुगमन मत कर. इंद्र आदि देव इसी शरीर में तेरा पालन करें. (७) मा गतानामा दीधीथा ये नयन्ति परावतम्. आ रोह तमसो ज्योतिरेह्या ते हस्तौ रभामहे.. (८) तू पितृलोक में गए हुओं के मार्ग का ध्यान मत कर तथा मृत पूर्वजों के लिए मत रो. मरे हुए लोग तुझे भी यहां से दूर देश में ले जाएंगे. तू अंधकार को त्याग कर प्रकाश में स्थित हो. हम अंधकार से प्रकाश में ले जाने के लिए तेरे हाथ पकड़ते हैं. (८) श्यामश्च त्वा मा शबलश्च प्रेषितौ यमस्य यौ पथिरक्षी श्वानौ. अर्वाङेहि मा वि दीध्यो मात्र तिष्ठः पराङ्मनाः.. (९) हे मरने के समीप पहुंचे हुए पुरुष! यमराज के मार्ग के रक्षक दो कुत्ते हैं— एक काला और दूसरा चितकबरा. वे दोनों तुझे बाधा न पहुंचाएं. कुत्तों के काटने से बच कर तू हमारी ओर आ. तू मृत पुरुषों का ध्यान मत कर तथा इसी भूलोक में निवास करता हुआ एक बार भी वहां से विमुख मत हो. (१) मैतं पन्थामनु गा भीम एष येन पूर्वं नेयथ थं ब्रवीमि. तम एतत् पुरुष मा प्र पत्था भयं परस्तादभयं ते अर्वाक्.. (१०) हे प्राणहीन पुरुष! तू मरे हुए लोगों के मार्ग पर गमन मत कर. वह मार्ग भयानक है. मैं तुझे उस मार्ग के विषय में बताता हूं, जिस मार्ग से लोग मृत्यु से पूर्व नहीं जाते हैं. तू इस मृत्युरूपी अंधकार में प्रवेश मत कर, क्योंकि यमराज की नगरी में प्रवेश करने पर भय प्रतीत होता है. हमारी ओर आने में तुझे अभय मिलेगा. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

रक्षन्तु त्वा ऽ ग्नयो ये अप्स्व १ न्ता रक्षतु त्वा मनुष्या ३ यमिन्धते. वैश्वानरो रक्षतु जातवेदा दिव्यस्त्वा मा प्र धाग् विद्युता सह.. (११) जल के मध्य में जो वाडव आदि अग्नियां हैं, वे तेरी रक्षा करें. मनुष्य यज्ञ करने के लिए अथवा भोजन पकाने के लिए जिन अग्नियों को जलाते हैं, वे तेरी रक्षा करें. जन्म लेने वालों को जानने वाले जठराग्नि देव तेरी रक्षा करें. आकाश की बिजली तेरे शरीर के साथ रहती हुई तुझे भस्म न करे. (११) मा त्वा क्रव्यादभि मंस्तारात् संकसुकाच्चर. रक्षतु त्वा द्यौ रक्षतु पृथिवी सूर्यश्च त्वा रक्षतां चन्द्रमाश्च. अन्तरिक्षं रक्षतु देवहेत्या:.. (१२) मांस का नाश करने वाली अग्नि तुझे अपना आहार बनाने का विचार न करे. तू सब का भक्षण करने वाली अग्नि से दूर देश में विचरण कर. पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चंद्रमा तथा अंतरिक्ष देव के आयुध से तेरी रक्षा करें. (१२) बोधश्च त्वा प्रतीबोधश्च रक्षतामस्वप्नश्च त्व ऽ नवद्राणश्च रक्षताम्. गोपायंश्च त्वा जागृविश्च रक्षताम्.. (१३) गोबोध और प्रतिबोध नामक ऋषि तेरी रक्षा करें. स्वप्न न देखने वाला, निद्रा न लेने वाला, सदा शरीर की रक्षा करने वाला तथा जागने वाला देव – ये सब तेरी रक्षा करें. (१३) ते त्वा रक्षन्तु ते त्वा गोपायन्तु तेभ्यो नमस्तेभ्यः स्वाहा.. (१४) बोध आदि तेरा पालन करें और तेरी रक्षा करें. उन बोध आदि को नमस्कार है. यह हवि उन के लिए उत्तम आहुति वाला हो. (१४) जीवेभ्यस्त्वा समुद्रे वायुरिन्द्रो धाता दधातु सविता त्रायमाणः. मा त्वा प्राणो बलं हासीदसुं ते ऽ नु ह्वयामसि.. (१५) जीवनोपयोगी इंद्रियों के लिए एवं पुत्र, पत्नी, दास आदि की प्रसन्नता के लिए वायु, इंद्र, धाता एवं सविता तुझे मृत्यु से छीन कर हमें प्रदान करें. तेरी रक्षा करते हुए सविता देव तेरे प्राणों और शरीर के बल को तुझ से न छीनें. मैं तेरे प्राणों के अनुकूल उन का आह्वान करता हूं. (१५) मा त्वा जम्भः संहनुर्मा तमो विदन्मा जिह्वा बर्हिः प्रमयुः कथा स्याः. उत् त्वादित्या वसवो भरन्तूदिन्द्राग्नी स्वस्तये.. (१६) हे पुरुष! तुझे भक्षण करने के लिए मिले हुए दांतों वाला जंभ असुर न आए. अज्ञान अथवा अंधकार भी तुझे प्राप्त न करे. तेरी विस्तृत जीभ राक्षसों का वर्णन न करे. जिस ebook converter DEMO Watermarks*

प्रकार तू हिंसा रहित बने, उसे जंभ असुर न जाने. अदिति पुत्र देव तुझे मृत्यु से छुड़ाएं. आठ वसु इंद्र और अग्नि कल्याण के लिए तेरा उद्धार करें. (१६) उत् त्वा द्यौरुत् पृथिव्युत् प्रजापतिरग्रभीत्. उत् त्वा मृत्योरोषधयः सोमराज्ञीरपीपरन्.. (१७) द्यौ देवता एवं पृथ्वी तेरा भरणपोषण करें. सभी देवों के पिता प्रजापति ने तेरा उद्धार किया था. सोम की पत्नियों और जड़ीबूटियों ने मृत्यु से तुझे छुड़ाया था. (१७) अयं देवा इहैवास्त्वयं मा ऽ मुत्र गादितः. इमं सहस्रवीर्येण मृत्योरुत् पारयामसि.. (१८) हे आदित्य आदि देवो! यह पुरुष यहीं भूलोक में रहे. यह पुरुष इस भूलोक से स्वर्ग में न जाए. हम रक्षा करने वाले तुझ पुरुष को असीमित शक्ति के रक्षा विधान द्वारा मृत्यु से छीनते हैं. (१८) उत् त्वा मृत्योरपीपरं सं धमन्तु वयोधसः. मा त्वा व्यस्तकेश्यो ३ मा त्वा ऽ घरुदो रुदन्.. (१९) हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! अन्न के देव धाता तुझे मृत्यु से बचाएं एवं तेरा उद्धार करें. बिखरे हुए केशों वाले बांधव एवं नारियां तेरी मृत्यु पर न रोएं. तेरे संबंधी दुःख के कारण न रोएं. (१९) आहार्षमविदं त्वा पुनरागाः पुनर्णवः. सर्वाङ्ग सर्वं ते चक्षुः सर्वमायुश्च ते ऽ विदम्... (२०) हे मृत्यु के द्वारा पकड़े हुए पुरुष! मैं ने तुझे मृत्यु से छीन लिया है और इस प्रकार तुझे प्राप्त किया है. हे पुनः जन्म लेने वाले! तू संसार में दोबारा आया है. हे संपूर्ण अंगों वाले! तेरी चक्षु आदि इंद्रियां अपनेअपने विषय का प्रकाशन करने वाली हों. मैं ने तेरी सौ वर्ष की आयु प्राप्त कर ली है. (२०) व्यवात् ते ज्योतिरभूदप त्वत् तमो अक्रमीत्. अप त्वन्मृत्युं निर्ऋतिमप यक्ष्मं नि दध्मसि.. (२१) हे अचेतन पुरुष! तेरी अचेतना निकल गई है. तुझे जीवनरूपी प्रकाश प्राप्त हो गया है. मैं ने तुझ से मृत्यु की देवता निर्ऋति को दूर कर दिया है. मैं तेरे बाहरी और आंतरिक रोगों का भी विनाश करता हूं. (२१) सूक्त-२ देवता—आयु ebook converter DEMO Watermarks*

आ रभस्वेमाममृतस्य श्रुष्टिंमच्छिद्यमाना जरदष्टिरस्तु ते. असुं ते आयुः पुनरा भरामि रजस्तमो मोप गा मा प्र मेष्ठाः.. (१) हे आयु की कामना करने वाले पुरुष! तुम हमारे द्वारा किए जाते हुए अमरण संबंधी अनुष्ठान को अनुभव करो. तुम्हारा शरीर शत्रुओं के द्वारा छिन्नभिन्न न होने वाला तथा वृद्धावस्था को प्राप्त करने वाला हो. इस के लिए मृत्यु से छीने गए तेरे प्राणों को मैं पुनः आयु से भरता हूं. तू सत्व गुण के प्रतिबंधक रजोगुण और तमोगुण को प्राप्त न हो. तू हिंसा को भी प्राप्त न हो. (१) जीवतां ज्योतिरभ्येह्यर्वाङा त्वा हरामि शतशारदाय. अवमुञ्चन् मृत्युपाशानशस्तिं द्राघीय आयुः प्रतरं ते दधामि.. (२) हे पुरुष! तू मनुष्यों की ज्ञान दीप्ति प्राप्त कर के हमारे सामने आ. हम तुझे सौ संवत तक जीने के लिए मृत्यु से छीन लाए हैं. मृत्यु के ज्वर, सिरदर्द आदि पाशों से हम ने तुझे छुड़ाया है. हम तुझे निंदा से मुक्त करते हुए सौ वर्ष की दीर्घ आयु में अत्यधिक रूप से स्थापित करते हैं. (२) वातात् ते प्राणमविदं सूर्याच्चक्षुरहं तव. यत् ते मनस्त्वयि तद् धारयामि सं वित्स्वाङ्गैर्वद जिह्वयालपन्.. (३) हे प्राणरहित पुरुष! मैं ने तुम्हारे प्राणों को वायु से प्राप्त किया है. मैं ने तुम्हारे चक्षु को सूर्य से प्राप्त किया है तथा मैं तुम्हारे मन को तुम्हीं में धारण करता हूं. इस प्रकार तुम सभी अंगों से युक्त हो कर एवं जीभ से बोलते हुए व्यक्त उच्चारण करो. (३) प्राणेन त्वा द्विपदां चतुष्पदामग्निमिव जातमभि सं धमामि. नमस्ते मृत्यो चक्षुषे नमः प्राणाय ते ऽ करम्.. (४) हे प्राणहीन पुरुष! मैं दो पैरों वाले अर्थात् स्त्रीपुरुषों और चार पैरों वाले अर्थात् गाय, घोड़े आदि पशुओं के प्राणों से तुझे इस प्रकार संयुक्त करता हूं, जिस प्रकार अरणि मंथन से अग्नि उत्पन्न होती है. हे मृत्यु! मैं ने तेरे क्रूर नेत्र के लिए नमस्कार किया है तथा तेरे अत्यधिक बल के लिए भी मैं नमस्कार करता हूं. (४) अयं जीवतु मा मृतेमं समीरयामसि. कृणोम्यस्मै भेषजं मृत्यो मा पुरुषं वधीः.. (५) यह प्राणहीन पुरुष जीवित रहे. यह मरण को प्राप्त न हो. हम इसे चेष्टा करने के लिए प्रेरित करते हैं. हम इस मरने वाले पुरुष की चिकित्सा करते हैं. हे मृत्यु! तू इस का वध मत कर. (५) जीवलां नघारिषां जीवन्तीमोषधीमहम्. ebook converter DEMO Watermarks*

त्रायमाणां सहमानां सहस्वतीमिह हुवे ऽ स्मा अरिष्टतातये.. (६) जीवन देने वाली, रोष रहित, सेवन करने वाले की रक्षिका, रोग को पराजित करने वाली एवं शक्ति संपन्न जीवंती अर्थात् ग्वारपाठा नामक जड़ीबूटी को व्याधियों के नाश का इच्छुक मैं इस शांति कर्म के लिए बुलाता हूं. वह इस समीपवर्ती पुरुष का रोग निवारण करे. (६) अधि ब्रूहि मा रभथाः सृजेमं तवैव सन्त्सर्वहाया इहास्तु. भवाशर्वौ मृडतं शर्म यच्छतमपसिध्य दुरितं धत्तमायुः.. (७) हे मृत्यु! तुम इस के पक्षपात का वचन कहो. अर्थात् बोलो कि यह मेरा है. तुम इसे मारने का आरंभ मत करो. यह तुम्हारा ही जन है. यह भूलोक में सर्वत्र गति वाला बने. हे भव और शर्व! तुम इसे सुखी करो तथा इस के कल्याण का प्रयत्न करो. तुम इस के व्याधि रूपी पाप को निकाल कर इस में आयु को स्थापित करो. (७) अस्मै मृत्यो अधि ब्रूहीमं दयस्वोदितो ३ यमेतु. अरिष्टः सर्वाङ्गः सुश्रुज्जरसा शतहायन आत्मना भुजमश्रुताम्.. (८) हे मृत्यु! यह तुम से भयभीत है. तुम इसे बताओ कि यह तुम्हारी कृपा के योग्य है. तुम इस पर दया करो. यह अहिंसित, चक्षु आदि सभी अंगों से युक्त, उत्तम श्रोता एवं वृद्धावस्था पा कर सौ वर्षों तक अन्य जनों की अपेक्षा अधिक भोग प्राप्त करे. (८) देवानां हेतिः परि त्वा वृणक्तु पारयामि त्वा रजस उत् त्वा मृत्योरपीपरम्. आरादग्निं क्रव्यादं निरूहं जीवातवे ते परिधिं दधामि.. (९) रुद्र आदि देवों का आयुध तुम्हारी हिंसा न करे. मैं मूर्च्छा लक्षण वाले आवरण से तुम्हें अलग करता हूं. मैं मृत्यु के पाश से तुम्हारा उद्धार करता हूं. मैं मांस खाने वाली अग्नि को तुझ से दूर निकालता हूं तथा तेरे जीवन के लिए परकोटे के रूप में यज्ञ की अग्नि को धारण करता हूं. (९) यत् ते नियानं रजसं मृत्यो अनवधर्ष्यम्. पथ इमं तस्माद् रक्षन्तो ब्रह्मास्मै वर्म कृण्मसि.. (१०) हे मृत्यु! तेरे रजोमय मार्ग को कोई धर्षित नहीं कर सकता. उस मार्ग से मैं इस मृत्यु के समीप पहुंचे हुए पुरुष के लिए मनन रूपी कवच पहनाता हूं. (१०) कृणोमि ते प्राणापानौ जरां मृत्युं दीर्घमायुः स्वस्ति. वैवस्वतेन प्रहितान् यमदूतांश्चरतो ऽ प सेधामि सर्वान्.. (११) हे आयु को चाहने वाले पुरुष! मैं तेरे शरीर में प्राण और अपान वायु को स्थिर करता हूं. ebook converter DEMO Watermarks*

मैं ऐसा उपाय करता हूं, जिस से बुढ़ापा और मृत्यु तुझे न छू सकें. मैं तेरी आयु का विस्तार कर के तेरा कल्याण करता हूं तथा यमराज के द्वारा भेजे हुए एवं सभी जगह घूमते हुए यमदूतों को तुझ से दूर करता हूं. (११) आरादरातिं निर्ऋतिं परो ग्राहिं क्रव्यादः पिशाचान्. रक्षो यत् सर्वं दुर्भूतं तत् तम इवाप हन्मसि.. (१२) शत्रु बनी हुई एवं आगे आ कर पकड़ने वाले पाप देवता निर्ऋति का मैं समीप से हनन करता हूं तथा मांसाहारी पिशाचों का विनाश करता हूं. इस प्रकार दुष्टता को प्राप्त जो संपूर्ण राक्षस जाति है तथा जो अंधकार के समान दूसरों को ढकने वाले हैं, उन का मैं विनाश करता हूं. (१२) अग्नेष्टे प्राणममृतादायुष्मतो वन्वे जातवेदसः. यथा न रिष्या अमृतः सजूरसस्तत् ते कृणोमि तदु ते समृध्यताम्.. (१३) हे पाप देवता निर्ऋति के द्वारा प्राणरहित बनाए गए पुरुष! चिरजीवी एवं मरणरहित देव अग्नि से मैं तेरे प्राणों की याचना करता हूं. वह अग्नि देव सभी जन्म लेने वालों को जानते हैं. हे पुरुष! जिस प्रकार तू न मरे और मरणरहित हो कर प्रसन्न बने, मैं तेरे लिए उसी प्रकार का शांतिकर्म करता हूं. तुझ से संबंधित यह शांतिकर्म समृद्ध हो. (१३) शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ. शं ते सूर्य आ तपतु शं वातो वातु ते हृदे. शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्याः पयस्वतीः.. (१४) हे कुमार! तेरे घर से निकलने के समय द्यावा पृथ्वी मंगल करने वाली हों, संताप न पहुंचाएं तथा तुझे धन प्रदान करें. सूर्य तेरे लिए सुखकारक तपें तथा वायु तेरे मन के अनुकूल बन कर एवं सुखकारी हो कर चले. दिव्य जल तेरे लिए अनेक प्रकार के स्वादों से युक्त एवं कल्याणकारी हो कर बरसें. (१४) शिवास्ते सन्त्वोषधय उत् त्वाहार्षमधरस्या उत्तरां पृथिवीमभि. तत्र त्वादित्यौ रक्षतां सूर्याचन्द्रमसावुभा.. (१५) हे कुमार! तेरे भोजन के उपयोग में आने वाले गेहूं आदि अन्न सुखकारी हों. पृथ्‍वी के निचले भाग की अपेक्षा तेरे निमित्त ऊंची पृथ्‍वी का उद्धार किया गया है. पृथ्वी के उच्च भाग में अदिति के पुत्र सूर्य और चंद्रमा दोनों तेरी रक्षा करें. (१५) यत् ते वासः परिधानं यां नीविं कृणुषे त्वम्. शिवं ते तन्वे ३ तत् कृण्मः संस्पर्शेऽदृक्ष्णमस्तु ते.. (१६) हे बालक! जो वस्त्र तेरे ऊपरी भाग को ढक रहा है और जिसे तूने कमर के नीचे पहना ebook converter DEMO Watermarks*

है, ये दोनों प्रकार के वस्त्र तेरे शरीर के लिए कल्याणकारी एवं सुखद हों. इस वस्त्र को मैं ऐसा बनाता हूं कि यह छूने में कठोर न लगे. (१६) यत् क्षुरेण मर्चयता सुतेजसा वप्ता वपसि केशश्मश्रु. शुभं मुखं मा न आयुः प्र मोषीः.. (१७) हे सविता देव! अथवा हजामत बनाने वाले पुरुष! जब तुम केश काटने वाले नाई हो कर शोभन तेज वाले उस्तरे को चलाते हो, सिर और दाढ़ी के बाल काटते हो, तब मुंडन किए जाते हुए इस बालक का मुख तेजस्वी बनाओ तथा इस की आयु को मत चुराओ. (१७) शिवौ ते स्तां व्रीहिवावाबलासावदोमधौ. एतौ यक्ष्मं वि बाधेते एतौ मुञ्चतो अंहसः.. (१८) हे अन्न खाते हुए बालक! तेरे खाने के लिए निश्चित किए गए गेहूं और जौ तेरे लिए सुखकारी एवं शरीर बढ़ाने वाले हों. उपयोग के पश्चात ये गेहूं और जौ तेरे शरीर को विशेष रूप से पीड़ित न करें और तुझे पाप से छुड़ाएं. (१८) यदश्नासि यत्पिबसि धान्यं कृष्याः पयः. यदाद्यं १ यदनाद्यं सर्वं ते अन्नमविषं कृणोमि.. (१९) हे कुमार! तुम जिस प्रकार के अनाज को कठिनता से खाते हो तथा दूध के समान सारवान पिसे हुए धान्य को पीते हो, जो अन्न सुख से खाने योग्य है तथा जो खाने में कठिन है, इन सभी प्रकार के अन्नों को मैं विषहीन बनाता हूं. (१९) अह्ने च त्वा रात्रये चोभाभ्यां परि दद्मसि. अरायेभ्यो जिघत्सुभ्य इमं मे परि रक्षत.. (२०) हे कुमार! मैं रक्षा के निमित्त तुझे दिन और रात अर्थात् दोनों के देवताओं के लिए देता हूं. हे देवताओ! तुम निर्धन के पास से तथा खाने वाले राक्षसों के पास से इस बालक की रक्षा करना. (२०) शतं ते ऽ युतं हायनान् द्वे युगे त्रीणि चत्वारि कृण्मः. इन्द्राग्नी विश्वे देवास्ते ऽ नु मन्यन्तामहृणीयमानाः.. (२१) हे बालक! मैं तेरी अवस्था के सौ वर्षों को हजार वर्ष, हजार वर्षों को दो युग, दो युगों को तीन युग और तीन युगों को चार युग बनाता हूं. इस प्रकार की प्रार्थना को प्रसिद्ध इंद्र, अग्नि तथा विश्वे देव लज्जा अथवा क्रोध न करते हुए स्वीकार करें. (२१) शरदे त्वा हेमन्ताय वसन्ताय ग्रीष्माय परि दद्मसि. वर्षाणि तुभ्यं स्योनानि येषु वर्धन्त ओषधीः.. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*

हे बालक! मैं तुझे शरद ऋतु, हेमंत ऋतु, वसंत ऋतु और ग्रीष्म ऋतु के लिए देता हूं. हे बालक! जिन वर्षों में भोग के साधन गेहूं, जौ आदि बढ़ते हैं, वे वर्ष तेरे लिए सुखकारी हों. (२२) मृत्युरीशे द्विपदां मृत्युरीशे चतुष्पदाम्. तस्मात् त्वां मृत्योर्गोपतेरुद्धरामि स मा बिभेः.. (२३) मृत्यु देव दो पैरों वाले मनुष्यों और चार पैरों वाले पशुओं के स्वामी हैं. जिस प्रकार ग्वाला पशुओं का स्वामी होता है, उसी प्रकार मृत्यु देव सभी प्राणियों के स्वामी हैं. मैं तेरा मृत्यु से उद्धार करता हूं. तू भयभीत न हो. (२३) सो ऽ रिष्ट न मरिष्यसि न मरिष्यसि मा बिभेः. न वै तत्र म्रियन्ते नो यन्त्यधमं तमः.. (२४) हे मृत्यु देव से विमुख अर्थात् मृत्यु की हिंसा से रहित पुरुष! तू मरेगा नहीं. तू मरेगा नहीं, इसीलिए भय मत कर. जिस स्थान में शांति कर्म किया जाता है, वहां के लोग प्राण त्याग नहीं करते हैं तथा असहनीय मूर्च्छा को भी प्राप्त नहीं करते. (२४) सर्वो वै तत्र जीवति गौरश्वः पशुः. यत्रेदं ब्रह्म क्रियते परिधिर्जीवनाय कम्.. (२५) जहां गाय, घोड़े, पुरुष और पशु सभी जीवित रहते हैं, वहां महाशांति के लिए यज्ञ कर्म एवं राक्षस, पिशाच आदि का निवारण करने वाला कर्म किया जाता है जो जीवन के लिए कल्याणकारी होता है. (२५) परि त्वा पातु समानेभ्यो ऽ भिचारात् सबन्धुभ्यः. अमम्रिर्भवा ऽ मृतो ऽ तिजीवो मा ते हासिषुरसवः शरीरम्.. (२६) हे शांति चाहने वाले पुरुष! मेरे द्वारा किया गया शांति कर्म सभी ओर से तेरा पालन करे. यह तुझे विद्या एवं ऐश्वर्य में समान अन्य मनुष्यों और संबंधियों द्वारा किए हुए जादूटोने से बचाए. तेरी मृत्यु न हो और तू अत्यधिक जीवन प्राप्त करे. प्राण तेरे शरीर का त्याग न करें. (२६) ये मृत्यव एकशतं या नाष्ट्रा अतितार्याः. मुञ्चन्तु तस्मात् त्वां देवा अग्नेर्वैश्वानरादधि.. (२७) यमराज के जो प्रसिद्ध आयुध ज्वर, सिरदर्द आदि सौ संख्या में हैं और जो लोगों का नाश करने वाले हैं, उन से बचना कठिन है. अग्नि और वैश्वानर आदि देव तुझे उन सब से बचाएं. (२७) ebook converter DEMO Watermarks*

अग्नेः शरीरमसि पारयिष्णु रक्षोहासि सपत्नहा. अथो अमीवचातनः पूतुद्रुर्नाम भेषजम्.. (२८) हे पूतद्रु नामक वृक्ष! तू अग्नि से व्याप्त शरीर वाला है. तू राक्षसों और शत्रुओं का विनाशक है तथा रोग को बाहर निकालने वाला है. (२८) सूक्त-३ देवता—अग्नि रक्षोहणं वाजिनमा जिघर्मि मित्रं प्रथिष्ठमुप यामि शर्म. शिशानो अग्निः क्रतुभिः समिद्धः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम्.. (१) मैं राक्षसों का हनन करने वाले एवं बल के साधन अन्न से युक्त अग्नि के लिए हवन करता हूं. यज्ञ के द्वारा मैं मित्र बने हुए विस्तार को प्राप्त अग्नि की शरण जाता हूं. तीक्ष्ण ज्वालाओं वाले वे अग्नि देव आज्य आदि के द्वारा प्रज्वलित हों. इस प्रकार के अग्नि देव दिन में हिंसा करने वाले से हमारी रक्षा करें. (१) अयोदंष्ट्रो अर्चिषा यातुधानानुप स्पृश जातवेदः समिद्धः. आ जिह्वया मूरदेवान् रभस्व क्रव्यादो वृष्ट्वापि धत्स्वासन्.. (२) हे जन्म लेने वालों के ज्ञाता अग्नि देव! हमारे द्वारा किए हुए घृत आदि से भलीभांति प्रज्वलित हो कर तुम लोहे के दांतों के समान अपनी ज्वालाओं के द्वारा राक्षसों को जला दो. जादूटोने के द्वारा जो दूसरों की हत्या का खेल खेलते हैं, उन्हें तुम अपनी जीभ से स्पर्श करो तथा मांस भक्षक राक्षस पिशाच आदि का विनाश कर के अपना मुख बंद कर लो. (२) उभोभयाविन्नुप धेहि दंष्ट्रौ हिंस्रः शिशानो ऽ वरं परं च. उतान्तरिक्षे परि याह्यग्ने जम्भैः सं धेह्यभि यातुधानान्.. (३) यह रक्षा करने योग्य है और यह मारने योग्य है—इन दो प्रकार के ज्ञान वाले हे अग्नि देव! तुम हिंसक एवं तीखी ज्वालाओं वाले हो. तुम हमारे शत्रु एवं हमारे द्वारा द्वेष किए गए पुरुष को अपनी दोनों दाढ़ों के बीच में रख लो. इस के पश्चात तुम आकाश में विचरण करो. हे अग्नि देव! मुझे बाधा पहुंचाने के निमित्त घूमते हुए राक्षसों को दांतों से चबा डालो. (३) अग्ने त्वचं यातुधानस्य भिन्धि हिंसा ऽ शनिर्हरसा हन्त्वेनम्. प्र पर्वाणि जातवेदः शृणीहि क्रव्यात् क्रविष्णुर्वि चिनोत्वेनम्.. (४) हे अग्नि देव! तुम राक्षसों की त्वचा का छेदन करो. तुम्हारा हिंसक वज्र अपने ताप से इन राक्षसों की हत्या करे. हे जातवेद अग्नि! राक्षसों के जोड़ों को अलगअलग कर दो. इस के पश्चात भक्षक भेड़िया मांस की इच्छा करता हुआ इन्हें खींच कर ले जाए. (४) यत्रेदानीं पश्यसि जातवेदस्तिष्ठन्तमग्न उत वा चरन्तम्. ebook converter DEMO Watermarks*

उतान्तरिक्षे पतन्तं यातुधानं तमस्ता विध्य शर्वा शिशानः.. (५) हे जातवेद अग्नि देव! तुम कहीं बैठे हुए और कहीं चलतेफिरते हुए राक्षसों को देखते हो. वे इस देश में हमारे प्रति उपद्रव करते हैं. आकाश में भी जाते हुए उस राक्षस को खींच लेने वाले तुम तीक्ष्ण हो कर अपनी ज्वालाओं से मारो. (५) यज्ञैरिषूः संनममानो अग्ने वाचा शल्याँ अशनिभिर्दिहानः. ताभिर्विध्य हृदये यातुधानान् प्रतीचो बाहून् प्रति भङ्ग्ध्येषाम्.. (६) हे अग्नि! तुम हमारे यज्ञों के द्वारा अपने बाणों को सीधा करते हुए एवं हमारी स्तुतियों के द्वारा उन के फलों को तेज करते हुए उन बाणों को राक्षसों के हृदयों में चुभा दो. इस के पश्चात् हमारे वध के लिए उठी राक्षसों की भुजाओं को भग्न कर दो. (६) उतारब्धान्त्स्पृणुहि जातवेद उतारेभाणाँ ऋष्टिभिर्यातुधानान्. अग्ने पूर्वो नि जहि शोशुचान आमादः क्ष्विङ्कास्तमदन्त्वेनीः.. (७) हे जातवेद अग्नि देव! हम तुम्हारी स्तुति करते हैं. तुम हमारा पालन करो तथा हल्ला करने वाले राक्षसों का अपने आयुधों के द्वारा वध करो. तुम शत्रु को उस के आक्रमण के पूर्व ही मार डालो. उस मारे हुए का भक्षण कच्चा मांस खाने वाले पक्षी करें. (७) इह प्र ब्रूहि यतमः सो अग्ने यातुधानो य इदं कृणोति. तमा रभस्व समिधा यविष्ठ नृचक्षसश्चक्षुषे रन्धयैनम्.. (८) हे अग्नि देव! इस शांति कर्म में जो राक्षस हमारे शरीर को पीड़ा देने वाला काम करता है, उन से कह दो कि वह तुम्हारे द्वारा प्रहार करने योग्य है. हे अधिक युवा अग्नि देव, उस पापी को अपनी जलाने वाली ज्वाला से स्पर्श करो. हे अग्नि देव! तुम पुण्यात्मा और पापियों को साक्षी रूप हो कर देखते हो. तुम इस पापी को अपनी दृष्टि के द्वारा वश में कर लो. (८) तीक्ष्णेनाग्ने चक्षुषा रक्ष यज्ञं प्राञ्चं वसुभ्यः प्र णय प्रचेतः. हिंस्रं रक्षांस्यभि शोशुचानं मा त्वा दभन् यातुधाना नृचक्षः.. (९) हे अग्नि देव! अपने भयंकर एवं उग्र तेज के द्वारा हमारे यज्ञ की रक्षा करो. हे दयालु मन वाले अग्नि देव! हमारे इस यज्ञ को देवों तक पहुंचाओ और यज्ञ की रक्षा करते हुए तुम राक्षसों को मारो. वे तुम्हें अपने वश में न कर सकें. (९) नृचक्षा रक्षः परि पश्य विक्षु तस्य त्रीणि प्रति शृणीह्यग्रा. तस्याग्ने पृष्ठीर्हरसा शृणीहि त्रेधा मूलं यातुधानस्य वृश्च.. (१०) हे अग्नि देव! मनुष्यों का जो दंड एवं अनुग्रह कार्य है, उस के द्रष्टा तुम ही हो. जो राक्षस प्रजा को पीड़ा पहुंचाते है, तुम उन के ऊपर से तीन अंगों अर्थात् दो हाथों और तीसरे ebook converter DEMO Watermarks*