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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

ते रक्षति तपसा ब्रह्मचारी तस्मिन् देवाः संमनसो भवन्ति.. (८) आचार्य ने उसी क्षण आकाश और धरती दोनों को जन्म दिया. ये दोनों विस्तृत और गंभीर हैं. पृथ्वी विस्तृत है और आकाश गंभीर है. ब्रह्मचारी अपने तप से दोनों की चर्चा करता है. उस ब्रह्मचारी से सभी देव प्रसन्न होते हैं. (८) इमां भूमिं पृथिवीं ब्रह्मचारी भिक्षामा जभार प्रथमो दिवं च. ते कृत्वा समिधावुपास्ते तयोरर्पिता भुवनानि विश्वा.. (९) सब से पहले उत्पन्न ब्रह्मचारी ने इस विस्तृत भूमि को पहली भिक्षा के रूप में ग्रहण किया. इस के बाद स्वर्ग को दूसरी भिक्षा के रूप में ग्रहण किया. वह भिक्षा में प्राप्त उन स्वर्ग और धरती को समिधा बना कर अग्नि की परिचर्या अर्थात् सेवा करता है. स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य सभी प्राणी स्थापित किए गए हैं. (९) अर्वागन्यः परो अन्यो दिवस्पृष्ठाद् गुहा निधी निहितौ ब्राह्मणस्य. तौ रक्षति तपसा ब्रह्मचारी तत् केवलं कृणुते ब्रह्म विद्वान्.. (१०) स्वर्ग के ऊपरी भाग से तथा उस के नीचे के भाग अर्थात् धरती पर वेद रूपी खजाने को आचार्य की हृदयरूपी गुफा में छिपा दिया. दूसरा खजाना अर्थात् वेद के द्वारा प्रतिपाद्य देवों को स्थापित किया. वेद पढ़ने वाले से संबंधित इन दोनों खजानों की रक्षा ब्रह्मचारी अपने तप से करता है. वह वेद के रूप में उस के विषय ब्रह्म का ही साक्षात्कार करता है. (१०) अर्वागन्य इतो अन्यः पृथिव्या अग्नी समेतो नभक्षी अन्तरेमे. तयोः श्रयन्ते रश्मयो ऽ धि दृढास्ताना तिष्ठति तपसा ब्रह्मचारी.. (११) इस स्वर्ग के नीचे एक सूर्यात्मक अग्नि है और दूसरी पृथ्वी के ऊपर है. इस स्वर्ग और धरती के मध्य दोनों अग्नियां आपस में मिल कर उदय होती हैं. उन सूर्य और अग्नि से संबंधित किरणें धरती और स्वर्ग के मध्य आश्रय लेती हैं. ब्रह्मचारी अपने तप की महिमा से उन का देवता बनता है. (११) अभिक्रन्दन् स्तनयन्नरुणः शितिङ्गो बृहच्छेपो ऽ नु भूमौ जभार. ब्रह्मचारी सिञ्चति सानौ रेतः पृथिव्यां तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः.. (१२) मेघों में गर्जन करता हुआ, जल पूर्ण मेघ को प्राप्त वह ब्रह्मचारी वरुण बन कर अपने जलरूपी वीर्य को ऊंचे स्थानों पर बरसाता है. उस जल से धरती पर चारों दिशाएं प्राणियों को धारण करती हैं. (१२) अग्नौ सूर्ये चन्द्रमसि मातरिश्वन् ब्रह्मचार्य १ प्सु समिधमा दधाति. तासामर्चींषि पृथगभ्रे चरन्ति तासामाज्यं पुरुषो वर्षमापः.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*

ब्रह्मचारी अग्नि में, सूर्य में, चंद्रमा में, वायु में और जल में समिधा को धारण करता है. अग्नि आदि की किरणें अंतरिक्ष अर्थात् आकाश में अलग-अलग विचरण करती हैं. वे किरणें गायों में घृत को, पुरुष और स्त्री में संतान को तथा वर्षा में जल को उत्पन्न करती हैं. (१३) आचार्यो मृत्युर्वरुणः सोम ओषधयः पयः. जीमूता आसन्त्सत्वानस्तैरिदं स्व १ राभृतम्.. (१४) आचार्य ही मृत्यु, वरुण, सोम, जड़ीबूटियां, फसलें एवं जल है. आचार्य रूपी वरुण के अनुचर जलपूर्ण मेघ हुए. उन मेघों ने अपने भीतर वर्षा के निमित्त जल धारण किया है. (१४) अमां घृतं कृणुते केवलमाचार्यो भूत्वा वरुणो यद्यदैच्छत् प्रजापतौ. तद् ब्रह्मचारी प्रायच्छत् स्वन्मित्रो अध्यात्मनः.. (१५) वरुण देव आचार्य हो कर जल को ही उत्पन्न करते हैं. वह वरुण अपने जनक प्रजापति अर्थात् ब्रह्म से जो चाहता है, मित्र देव बन कर अपने ब्रह्मचर्य के माहात्म्य के द्वारा अपने शरीर से ही प्राप्त कर लेता है. (१५) आचार्यो ब्रह्मचारी ब्रह्मचारी प्रजापतिः. प्रजापतिर्वि राजति विराडिन्द्रो ऽ भवद्वशी.. (१६) आचार्य पहले विद्या का उपदेश कर के ब्रह्मचारी के रूप में उत्पन्न हुआ. ब्रह्मचारी तप के द्वारा अधिक महिमा को प्राप्त कर के जगत् स्रष्टा प्रजापति हुआ. प्रजापति विराट् हुआ. बाद में वह स्वतंत्र इंद्र हुआ. (१६) ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं वि रक्षति. आचार्यो ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते.. (१७) ब्रह्मचर्य रूपी तप से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है. आचार्य भी ब्रह्मचर्य के नियम के द्वारा अपने शिष्य को अपने समान बनाना चाहता है. (१७) ब्रह्मचर्येण कन्या ३ युवानं विन्दते पतिम्. अनड्वान् ब्रह्मचर्येणाश्वो घासं जिगीर्षति.. (१८) ब्रह्मचर्य के द्वारा कन्या युवा पति को प्राप्त करती है. ब्रह्मचर्य के द्वारा बैल और घोड़ा घास खाने की इच्छा करता है. (१८) ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत. इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्व १ राभरत्.. (१९) ब्रह्मचर्य रूपी तप के द्वारा देवों ने मृत्यु का हनन कर दिया अर्थात् देव अमर हो गए. इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

ने ब्रह्मचर्य के द्वारा देवों के लिए स्वर्ग पर अधिकार किया. (१९) ओषधयो भूतभव्यमहोरात्रे वनस्पतिः. संवत्सरः सहर्तुभिस्ते जाता ब्रह्मचारिणः... (२०) जड़ीबूटियां और फसलें, भूतकाल में उत्पन्न और भविष्य में उत्पन्न होने वाला प्राणि समूह, दिन और रात, ऋतुओं के साथ संवत्सर—ये सब ब्रह्मचर्य से उत्पन्न हुए. (२०) पार्थिवा दिव्याः पशव आरण्या ग्राम्याश्च ये. अपक्षाः पक्षिणश्च ये ते जाता ब्रह्मचारिणः... (२१) पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य, देव, जंगली और ग्रामीण पशु, बिना पंखों के और पंखों वाले प्राणी सभी ब्रह्मचर्य से उत्पन्न हुए. (२१) पृथक् सर्वे प्राजापत्याः प्राणानात्मसु बिभ्रति. तान्सर्वान् ब्रह्म रक्षति ब्रह्मचारिण्याभृतम्.. (२२) प्रजापति के द्वारा उत्पन्न देव, मनुष्य आदि सभी अपने शरीरों में प्राणों को धारण करते हैं. उन सभी की रक्षा आचार्य के द्वारा ब्रह्मचारी में धारण किया हुआ अर्थात् पढ़ाया हुआ वेद करता है. (२२) देवानामेतत् परिषूत्मनभ्यारूढं चरति रोचमानम्. तस्माज्जातं ब्राह्मणं ब्रह्म ज्येष्ठं देवाश्च सर्वे अमृतेन साकम्.. (२३) इस अपरोक्ष ब्रह्म का साक्षात्कार देवों ने किया है. यह ब्रह्म अपने प्रकाश से प्रकाशित और सब से उत्कृष्ट है. ब्राह्मण से सब से अधिक बढ़ा हुआ और प्रशंसनीय वेद रूपी ब्रह्म उत्पन्न हुआ है. अग्नि आदि सब देव अपने द्वारा उपभोग किए जाने वाले अमृत के साथ उत्पन्न हुए. (२३) ब्रह्मचारी ब्रह्म भ्राजद् बिभर्ति तस्मिन् देवा अधि विश्वे समोताः. प्राणापानौ जनयन्नाद् व्यानं वाचं मनो हृदयं ब्रह्म मेधाम्.. (२४) ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला पुरुष दीप्ति वाले वेदरूपी ब्रह्म को धारण करता है. उस वेद से सभी देव संबंधित हैं. देवों का निवास बना हुआ ब्रह्मचारी प्राण और अपान के बाद ज्ञान को, मन, वाणी, हृदय और मेधा को उत्पन्न करता है. (२४) चक्षुः श्रोत्रं यशो अस्मासु धेह्यन्नं रेतो लोहितमुदरम्.. (२५) हे ब्रह्मचारी रूपी ब्रह्म! हम स्तोत्राओं में चक्षु, क्षेत्र अर्थात् यज्ञ को धारण करो. तुम अन्न, वीर्य, रक्त तथा संपूर्ण शरीर को हम में धारण करो. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-८ देवता—अग्नि

तानि कल्पद् ब्रह्मचारी सलिलस्य पृष्ठे तपो ऽ तिष्ठत् तप्यमानः समुद्रे. स स्नातो बभ्रुः पिङ्गलः पृथिव्यां बहु रोचते.. (२६) ब्रह्मचारी उन अन्न आदि को उत्पन्न करता हुआ, जल के ऊपर तपस्या करता हुआ सागर पर वर्तमान रहता है. स्नान से पवित्र हुआ एवं कबरे रंग के साथ पीले रंग का होता हुआ पृथ्वी पर अधिक दीप्त होता है. अर्थात् अधिक चमकता है (२६) सूक्त-८ देवता—अग्नि अग्निं ब्रूमो वनस्पतीनोषधीरुत वीरुधः. इन्द्रं बृहस्पतिं सूर्यं ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१) हम अग्नि की, वनस्पतियों की, जड़ीबूटियों और फसलों की, वृक्षों की, इंद्र की, बृहस्पति की तथा सूर्य की स्तुति करते हैं. वे हमें सभी पापों से मुक्त करें. (१) ब्रूमो राजानं वरुणं मित्रं विष्णुमथो भगम्. अंशं विवस्वन्तं ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (२) हम तेजस्वी वरुण की, मित्र की, विष्णु की, भग की, अंश और विवस्वान् अर्थात् सूर्य की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (२) ब्रूमो देवं सवितारं धातारमुत पूषणम्. त्वष्टारमग्रियं ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (३) हम दानादि गुणों से युक्त सविता, धाता, पूषा, त्वष्टा और अग्नि की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (३) गन्धर्वाप्सरसो ब्रूमो अश्विना ब्रह्मणस्पतिम्. अर्यमा नाम यो देवस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (४) हम प्रथम गिने जाने वाले गंधर्वों की, अप्सराओं की, अश्विनीकुमारों की, त्वष्टा की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (४) अहोरात्रे इदं ब्रूमः सूर्याचन्द्रमसावुभा. विश्वानदित्यान् ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (५) हम दिनरात तथा सूर्य चंद्रमा दोनों की स्तुति करते हैं. हम सभी आदित्यों की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (५) वातं ब्रूमः पर्जन्यमन्तरिक्षमथो दिशः.

आशाश्च सर्वा ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (६) हम वायु की, मेघ की, आकाश की तथा दिशाओं की स्तुति करते हैं. हम सभी विदिशाओं अर्थात् दिशाओं के कोनों की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (६) मुञ्चन्तु मा शपथ्यादहोरात्रे अथो उषाः. सोमो मा देवो मुञ्चतु यमाहुश्चन्द्रमा इति.. (७) दिन, रात और उषाएं शपथ से उत्पन्न पाप से हमारी रक्षा करें. वे सोम देव मुझे पाप से मुक्त करें, जिन्हें लोग चंद्रमा कहते हैं. (७) पार्थिवा दिव्याः पशव आरण्या उत ये मृगाः. शकुन्तान् पक्षिणो ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (८) हम पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों, देवों, ग्रामीण पशुओं और सिंह आदि जंगली पशुओं की स्तुति करते हैं. हम शकुन बने हुए पक्षियों की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (८) भवाशर्वाविदं ब्रूमो रुद्रं पशुपतिश्च यः. इषूर्या एषां संविद्म ता नः सन्तु सदा शिवाः.. (९) हम उन भव, शर्व, रुद्र और पशुपति की स्तुति करते हैं. हम इन देवों के बाणों को जानते हैं. वे सदा हमारे लिए कल्याणकारी हों. (९) दिवं ब्रूमो नक्षत्राणि भूमिं यक्षाणि पर्वतान्. समुद्रा नद्यो वेशन्तास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१०) हम स्वर्ग की, नक्षत्रों अर्थात् तारों की, भूमि की, यक्षों और पर्वतों की स्तुति करते हैं. जो सागर, नदियां और सरोवर हैं, वे हमें पाप से बचाएं. (१०) सप्तर्षीन् वा इदं ब्रूमो ऽ पो देवीः प्रजापतिम्. पितॄन् यमश्रेष्ठान् ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (११) हम उन सप्तर्षियों की, जल देवियों की और प्रजापति की स्तुति करते हैं. हम ऐसे पितरों की स्तुति करते हैं, जिन में यमराज श्रेष्ठ हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (११) ये देवा दिविषदो अन्तरिक्षसदश्च ये. पृथिव्यां शक्रा ये श्रितास्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१२) जो देव स्वर्ग में निवास करते हैं और अंतरिक्ष अर्थात् धरती और आकाश के मध्य निवास करते हैं, जो देव पृथ्वी पर आश्रित हैं, वे हमें पाप से मुक्त करें. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

आदित्या रुद्रा वसवो दिवि देवा अथर्वाणः. अङ्गिरसो मनीषिणस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१३) आदित्य, रुद्र और वसु देव स्वर्ग में निवास करते हैं. जो देव पृथ्वी पर शक्तिशाली हैं, वे हमें पाप से मुक्त करें. वेद मंत्रों के दृष्टा अंगिरा गोत्रीय ऋषि तथा मनीषी पाप से हमारी रक्षा करें. (१३) यज्ञं ब्रूमो यजमानमृचः सामानि भेषजा. यजूंषि होत्रा ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१४) हम यज्ञ की, यजमान की, ऋचाओं की, सामवेद के मंत्रों की, यजुर्वेद के मंत्रों तथा इन वेदों में बताई गई ओषधियों एवं होताओं की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (१४) पञ्च राज्यानि वीरुधां सोमश्रेष्ठानि ब्रूमः. दर्भो भङ्गो यवः सहस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१५) फल पकने पर उन्नत होने वाली जड़ीबूटियों और फसलों में जो पांच श्रेष्ठ हैं और इन के राजा हैं, हम उन की स्तुति करते हैं. दर्भ भाग, जौ और सह नाम की विशेष ओषधि की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (१५) अरायान् ब्रूमो रक्षांसि सर्पान् पुण्यजनान् पितॄन्. मृत्यूनेकशतं ब्रूमस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१६) हम दान के प्रतिबंधक हिंसकों, राक्षसों, सर्पों, यातुधानों और पितरों की स्तुति करते हैं. मैं एक से एक मृत्युओं की स्तुति करता हूं. वे मुझे पाप से मुक्त करें. (१६) ऋतून्र् ब्रूम ऋतुपतीनार्तवानुत हायनान्. समाः संवत्सरान् मासांस्ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१७) हम ऋतुओं की, ऋतुओं के स्वामियों की, ऋतुओं से संबंधित पदार्थों की, अर्थात् चंद्र वर्षों की, सूर्य वर्षों की, संवत्सरों की तथा मासों की स्तुति करते हैं. वे हमें पाप से मुक्त करें. (१७) एत देवा दक्षिणतः पश्चात् प्राञ्च उदेत. पुरस्तादुत्तराच्चक्रा विश्वे देवाः समेत्य ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१८) हे दक्षिण दिशा में स्थित देवो! तुम आओ. चारों दिशाओं में स्थित सभी देव यहां यज्ञ में आ कर हमें पाप से मुक्त करें. (१८) विश्वान् देवानिदं ब्रूमः सत्यसंधानृतावधः.

विश्वाभिः पत्नीभिः सह ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१९) हम सच्ची प्रतिज्ञा वाले, सत्य अथवा यज्ञ की वृद्धि करने वाले सभी देवों की स्तुति करते हैं. वे अपनी पत्नियों के साथ यहां हमारे यज्ञ में आएं और हमें पाप से मुक्त करें. (१९) सर्वान् देवानिदं ब्रूमः सत्यसंधानृतावृधः. सर्वाभिः पत्नीभिः सह ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (२०) हम कहे गए और न कहे गए सच्ची प्रतिज्ञा वाले और यज्ञ अथवा सत्य की रक्षा करने वाले सभी देवों की स्तुति करते हैं. वे सभी अपनी पत्नियों के साथ आएं और हमें पाप से मुक्त करें. (२०) भूतं ब्रूमो भूतपतिं भूतानामुत यो वशी. भूतानि सर्वा संगत्य ते नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (२१) हम भूत की, भूतों के स्वामी की तथा भूतों को वश में करने वाले की स्तुति करते हैं. सभी भूत मिल कर हमें पाप से मुक्त करें. (२१) या देवीः पञ्च प्रदिशो ये देवा द्वादशर्तवः. संवत्सरस्य ये दंष्ट्रास्ते नः सन्तु सदा शिवाः.. (२२) पांच प्रधान दिशाओं की जो देवियां हैं तथा बारह मासों के स्वामी जो देव हैं और स्वतंत्र रूप प्रजापति की जो दाढ़ें अर्थात् पक्ष, सप्ताह आदि हैं, वे हमें पाप से मुक्त करें. (२२) यन्मातली रथक्रीतममृतं वेद भेषजम्. तदिन्द्रो अप्सु प्रावेशयत् तदापो दत्त भेषजम्.. (२३) इंद्र का सारथी मातलि रथ के बदले में खरीदी हुई मृत्यु का नाश करने वाली ओषधि को जानता है. इंद्र ने उस ओषधि को जल में डुबा दिया है. जल हमें वह ओषधि प्रदान करे. (२३) सूक्त-९ देवता—हवन से बचा भात उच्छिष्टे नाम रूपं चोच्छिष्टे लोक आहितः. उच्छिष्ट इन्द्रश्चाग्निश्च विश्वमन्तः समाहितम्.. (१) उच्छिष्ट अर्थात् होम के बाद बचे हुए भात में नाम और रूप वाला विश्व स्थित है. इस उच्छिष्ट में पृथ्वी आदि सभी लोक स्थित हैं. उच्छिष्ट ही इंद्र और अग्नि हैं. होम के बाद शेष बचे हुए इस भात में ईश्वर ने सारा जगत् स्थापित किया है. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

उच्छिष्टे द्यावापृथिवी विश्वं भूतं समाहितम्. आपः समुद्र उच्छिष्टे चन्द्रमा वात आहितः.. (२) उच्छिष्ट अर्थात् होम करने के बाद बचे हुए भात में स्वर्ग, पृथ्वी तथा उन में स्थित प्राणी आश्रित हैं. इस उच्छिष्ट में जल, सागर, चंद्रमा और वायु स्थित हैं. (२) सन्नुच्छिष्टे असंश्चोभौ मृत्युर्वाजः प्रजापतिः. लौक्या उच्छिष्ट आयत्ता वश्र द्रश्चापि श्रीमंयि.. (३) उच्छिष्ट अर्थात् होम करने के बाद शेष बचे भात में सत् और असत् दोनों के अतिरिक्त मृत्यु, मृत्यु का बल, प्रजापति तथा प्रजाएं स्थापित हैं. वरुण और सोम भी इस में स्थित हैं. उन की कृपा से मुझ में भी श्री स्थित हो. (३) दृढो दृंहस्थिरो न्यो ब्रह्म विश्वसृजो दश. नाभिमिव सर्वतश्चक्रमुच्छिष्टे देवताः श्रिताः.. (४) दृढ़ अंग वाला देव, दृढ़ होने के कारण स्थिर किया हुआ लोम, सभी प्राणी, जगत् का कारण ब्रह्म, दस प्राण एवं सभी देवता हुतशिष्ट अर्थात् हवन करने के बाद शेष बचे भात में उसी प्रकार आश्रित हैं, जिस प्रकार रथ का पहिया धुरी पर आश्रित रहता है. (४) ऋक् साम यजुरुच्छिष्ट उद्गीथः प्रस्तुतं स्तुतम्. हिङ्कार उच्छिष्टे स्वरः साम्नो मेडिश्च तन्मयि.. (५) ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के मंत्र, इन का गाया हुआ भाग एवं प्रस्तुत स्तुतियां उच्छिष्ट अर्थात् होम के बाद बचे हुए भात में आश्रित हैं. सभी उद्गाताओं के द्वारा प्रयोग किया जाता हुआ ‘हि’ शब्द, सामवेद के स्वर, सामवेद संबंधित वाणी—ये सब यज्ञ शेष के लिए मुझ में स्थित हैं. (५) ऐन्द्राग्नं पावमानं महानाम्नीर्महाव्रतम्. उच्छिष्टे यज्ञस्याङ्गान्यन्तर्गर्भइव मातरि.. (६) इंद्र और अग्नि की स्तुति से संबंधित सामवेद के मंत्र, तीनों में सोम देवता से संबंधित सामवेद के मंत्र, महानाम्नी और महाव्रत नाम के स्तोत्र तथा यज्ञ के अंग होम के बाद बचे भात में उसी प्रकार स्थित हैं, जिस प्रकार गर्भ माता के पेट में स्थित रहता है. (६) राजसूयं वाजपेयमग्निष्टोमस्तदध्वरः. अर्काश्वमेधावुच्छिष्टे जीवबर्हिर्मदिन्तमः.. (७) राजसूय, वाजपेय और अग्निष्टोम नाम के यज्ञ हिंसा रहित हैं. अर्क, अश्वमेध, जीवबर्हि तथा मादक सोमयाग—ये सभी उच्छिष्ट अर्थात् होम से शेष बचे भात में आश्रित हैं. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

अग्न्याधेयमथो दीक्षा कामप्रश्छन्दसा सह. उत्सन्ना यज्ञा: सत्राण्युच्छिष्टे ऽ धि समाहिता:.. (८) अग्नि के आधान के पश्चात सोम याग की दीक्षा, यजमान की इच्छाएं पूर्ण करने वाले मंत्रों के साथ लुप्तप्राय यज्ञ एवं सोमयाग उच्छिष्ट रूपी ब्रह्म में आश्रित हैं. (८) अग्निहोत्रं च श्रद्धा च वषट्कारो व्रतं तप:. दक्षिणेष्टं पूर्तं चोच्छिष्टे ऽ धि समाहिता:.. (९) अग्नि होम, श्रद्धा, वषट शब्द, व्रत, तप, दक्षिणा, वेदों में बताए गए याग, होमादि कर्म तथा स्मृतियों और पुराणों में बताए गए बावड़ी, कुआं आदि बनवाने के कर्म उच्छिष्ट अर्थात् यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (९) एकरात्रो द्विरात्र: सद्य: क्री: प्रक्रीरुक्थ्य:. ओतं निहितमुच्छिष्टे यज्ञस्याणूनि विद्यया.. (१०) एक रात्रि वाला सोमयाग, दो रात्रियों तक चलने वाला सोमयाग, एक दिन में होने वाले क्री और प्रक्री नाम के सोमयाग, उक्थों वाला सोमयाग, यज्ञ से संबंधित सूक्ष्म रूप, भावना के साथ यज्ञ शेष अर्थात् यज्ञ के पश्चात बचे हुए भातरूपी ब्रह्म में स्थित है. (१०) चतूरात्र: पञ्चरात्र: षड्रात्रश्चोभय: सह. षोडशी सप्तरात्रश्चोच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे ये यज्ञा अमृते हिता:.. (११) चार रात्रियों वाला, पांच रात्रियों वाला, छह रात्रियों वाला तथा इन से दूनी रात्रियों वाले सोमयाग, सोलह रात्रियों वाले, सात रात्रियों वाले सोमयाग तथा अमृत का फल देने वाले जो यज्ञ हैं, वे सब उच्छिष्ट अर्थात् यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (११) प्रतीहारो निधनं विश्वजिच्चाभिजित्च य:. साह्नातिरात्रावुच्छिष्टे द्वादशाहो ऽ पि तन्मयि.. (१२) उद्गीथ के बाद गाए जाने वाले सामवेद के मंत्र, प्रतीहार तथा सोमयागों की समाप्ति के मंत्र, विश्वजित और अभिजित नाम के यज्ञ, एक दिन में होने वाला सोमयाग साह्न, अतिरात्र नाम के जो सोमयाग यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं, वे सब मुझ में हों अर्थात् मेरे द्वारा किए जाएं. (१२) सूनृता संनति: क्षेम: स्वधोर्जामृतं सह:. उच्छिष्टे सर्वे प्रत्यञ्च: कामा: कामेन तात्पु:.. (१३) सूनृता, विनम्र भाव, क्षेम, स्वधा, अमृत, बल तथा सामने उपस्थित सभी कामनाएं यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. ये सभी कामना करने वाले यजमान को तृप्त करते हैं. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*

नव भूमीः समुद्रा उच्छिष्टे ऽ धि श्रिता दिवः. आ सूर्यो भात्युच्छिष्टे ऽ होरात्रे अपि तन्मयि.. (१४) नौ खंडों वाली पृथ्वी, सात सागर तथा स्वर्ग यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित है. सूर्य और रात दिन भी उच्छिष्ट अर्थात् यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. ये सभी मेरे द्वारा हों. (१४) उपहव्यं विषूवन्तं ये च यज्ञा गुहा हिताः. बिभर्ति भर्ता विश्वस्योच्छिष्टो जनितुः पिता.. (१५) उपहव्य, विषूवान नाम के सोमयाग तथा जो सोमयाग ज्ञात नहीं है, विश्व का भरणपोषण करने वाला तथा सवनयज्ञ का अनुष्ठान करने वाले का पालनकर्ता यज्ञशेष रूपी ब्रह्म है. (१५) पिता जनितुरुच्छिष्टो ऽ सोः पौत्रः पितामहः. स क्षियति विश्वस्येशानो वृषा भूम्यामत्तिघ्न्यः.. (१६) यज्ञशेष रूपी ब्रह्म अपने को उत्पन्न करने वाले का पिता है. यह भात प्राण वायु का पौत्र और पितामह है. विश्व का स्वामी और कामनाएं पूर्ण करने वाला वह सब को अतिक्रमण कर के भूमि पर निवास करता है. (१६) ऋतं सत्यं तपो राष्ट्रं श्रमो धर्मश्च कर्म च. भूतं भविष्यदुच्छिष्टे वीर्यं लक्ष्मीर्बलं बले.. (१७) ऋत, सत्य, तप, राष्ट्र, श्रम, धर्म, कर्म, भूतकाल, भविष्यकाल, वीर्य, लक्ष्मी और बल यज्ञशेष रूपी बल में आश्रित है. (१७) समृद्धिदोज आकूतिः क्षत्रं राष्ट्रं षडुर्व्यः. संवत्सरो ऽ ध्युच्छिष्ट इडा प्रैषा ग्रहा हविः.. (१८) समृद्धि, ओज, आकूति अर्थात् मन चाहे फल संबंधी संकल्प, क्षत्रिय का तेज, राष्ट्र, छह पृथिवियां, संवत्सर, इडा नाम की देवी, यज्ञ कर्मों में ऋत्विजों के प्रेरक मंत्र, गृह और हवि ये सभी यज्ञ शेषरूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (१८) चतुर्होतार आप्रियश्चातुर्मास्यानि नीविदः. उच्छिष्टे यज्ञा होत्राः पशुबन्धास्तदिष्टयः.. (१९) चतुर्होत्र नाम के मंत्र, पशुयाग संबंधी मंत्र, चार मासों में किए जाने वाले चार पर्व, स्तुति संबंधी देव के उत्कर्ष को बताने वाले मंत्र, नीविद, यज्ञ, होता, इष्टियां—ये सब यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*

अर्धमासाश्च मासाश्चार्तवा ऋतुभिः सह. उच्छिष्टे घोषिणीरापः स्तनयित्नुः श्रुतिर्मही.. (२०) आधा महीना अर्थात् पक्ष, महीने, ऋतुओं के साथ उन में उत्पन्न होने वाले पदार्थ, शब्द करने वाले जल, गर्जन करते हुए मेघ और पवित्र भूमि—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (२०) शर्कराः सिकता अश्मान ओषधयो वीरुधस्तृणा. अभ्राणि विद्युतो वर्षमुच्छिष्टे संश्रिता श्रिता.. (२१) पत्थरों के छोटे टुकड़े, बालू, पत्थर, जड़ीबूटी और फसलें, लताएं, तिनके, मेघ, बिजलियां और वर्षा ये सब यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित हैं. (२१) राद्धिः प्राप्तिः समाप्तिर्व्याप्तिर्मह एधतुः. अत्याप्तिरुच्छिष्टे भूतिश्चाहिता निहिता हिता.. (२२) सिद्धि, प्राप्ति, समाप्ति, व्याप्ति, तेज, वृद्धि, अत्यधिक प्राप्ति, समृद्धि तथा सामने स्थित हितकारी पदार्थ यज्ञशेष रूपी ब्रह्म में स्थित है. (२२) यच्च प्राणति प्राणेन यच्च पश्यति चक्षुषा. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२३) जो प्राण वायु के द्वारा जीवित रहता है, जो आंखों से देखता है, स्वर्ग में स्थित देव और स्वर्ग—ये सभी यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न है. (२३) ऋचः सामानि च्छन्दांसि पुराणं यजुषा सह. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२४) ऋग्वेद और सामवेद के मंत्र, छंद, यजुर्वेद के सहित प्राचीन मंत्र, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञ रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (२४) प्राणापानौ चक्षुः श्रोत्रमक्षितिश्च क्षितिश्च या. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२५) प्राण और अपान वायु, नेत्र, कान, विनाश का अभाव और विनाश, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए हैं. (२५) आनन्दा मोदाः प्रमुदोऽभीमोदमुश्च ये. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२६) विषयों के उपभोग से उत्पन्न आनंद नाम के विशेष सुख, हर्ष, अधिक प्रसन्नता एवं इन्हें ebook converter DEMO Watermarks*

देने वाले पदार्थ, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञशेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए. (२६) देवाः पितरो मनुष्या गन्धर्वाप्सरसश्च ये. उच्छिष्टाज्जज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रितः.. (२७) देव, पितर, मनुष्य, गंधर्व, अप्सराएं, स्वर्ग और स्वर्ग में स्थित देव—ये सभी यज्ञ शेष रूपी ब्रह्म से उत्पन्न हुए. (२७) सूक्त-१० देवता—मन्यु यन्मन्युर्जायामावहत् संकल्पस्य गृहादधि. क आसं जन्याः के वराः क उ ज्येष्ठवरो ऽ भवत्.. (१) ब्रह्म माया के अभिमुख उसी प्रकार प्राप्त हुआ, जिस प्रकार पति पत्नी के सामने जाता है. ब्रह्म ने माया को उसी प्रकार प्राप्त किया, जिस प्रकार पति अपनी पत्नी को घर से प्राप्त करता है. ब्रह्मा की सृष्टि रचना की इच्छा में वधू पक्ष के बंधन कौन थे? कन्या का वरण करने वाले कौन थे? उस समय प्रधान वर अर्थात् विवाह करने वाला कौन था? (१) तपश्चैवास्तां कर्म चान्तर्महत्यर्णवे. त आसं जन्यास्ते वरा ब्रह्म ज्येष्ठवरो ऽ भवत्.. (२) उस सृष्टि रचना के समय सृष्टि की रचना करने वाले परमेश्वर का तप और कर्म ही उस समय स्थित थे. यह तप और कर्म प्रलय काल के सागर का मंत्र था. विवाह के मुहूर्त पर जो कन्या पक्ष वाले बंधन थे, वे ही विवाह करने वाले थे. ब्रह्म उन में सब से बड़ा वर था. (२) दश साकमजायन्त देवा देवेभ्यः पुरा. यो वै तान् विद्यात् प्रत्यक्षं स वा अद्य महद् वदेत्.. (३) अग्नि आदि देवों की उत्पत्ति से पहले ही ज्ञानेंद्रियां और कर्मेंद्रियां उत्पन्न हुईं. जो उपासक उन देवों को जान सकेगा, वह प्रत्यक्ष ही ब्रह्म का उपदेश करेगा. (३) प्राणापानौ चक्षुः श्रोत्रमक्षितिश्च क्षितिश्च या. व्यानोदानौ वाङ्मनस्ते वा आकूतिमावहन्.. (४) प्राण और अपान वायु, नयन, कान, क्षीण होने वाली क्रिया शक्ति, क्षय रहित ब्रह्म, व्यान और उदान वायुएं, वाणी और मन ने देवकृत संकल्प को धारण किया. (४) अजाता आसन्नृतवो ऽ थो धाता बृहस्पतिः. इन्द्राग्नी अश्विना तर्हि कं ते ज्येष्ठमुपासत.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

सृष्टि रचना के समय वसंत आदि ऋतुएं उत्पन्न नहीं हुई थीं. धाता, बृहस्पति, इंद्र, अग्नि तथा दो अश्विनीकुमार भी उस समय उत्पन्न नहीं हुए थे. धाता आदि वे देव अपने जन्मदाता ब्रह्म की उपासना कर रहे थे. (५) तपश्चैवास्तां कर्म चान्तर्महत्यर्णवे. तपो ह जज्ञे कर्मणस्तत् ते ज्येष्ठमुपासत.. (६) प्रलय काल के महासागर में तप और कर्म ही थे. तप कर्म से उत्पन्न हुआ था. वे धाता आदि सृष्टि के कारण बने हुए ब्रह्म की उपासना कर रहे थे. (६) येत आसीद् भूमिः पूर्वा यामद्धात्तय इद् विदुः. यो वै तां विद्यान्नामथा स मन्येत पुराणवित्.. (७) सामने वर्तमान इस भूमि से पहले जो भूमि थी. उसे तप के प्रभाव से शक्ति प्राप्त करने वाले ऋषि जानते थे. जो अतीत काल के कल्प में स्थित उस भूमि को जो जानेगा, वह प्राचीन अर्थ को जानने वाला माना जाएगा. (७) कुत इन्द्रः कुतः सोमः कुतो अग्निरजायत. कुतस्त्वष्टा समभवत् कुतो धाताजायत.. (८) कहां से इंद्र, कहां से सोम और कहां से अग्नि उत्पन्न हुई? त्वष्टा कहां से उत्पन्न हुआ तथा धाता की उत्पत्ति कहां से हुई? (८) इन्द्रादिन्द्रः सोमात् सोमो अग्नेरग्निरजायत. त्वष्टा ह जज्ञे त्वष्टुर्धातुर्धाताजायत.. (९) पूर्व काल में जो इंद्र थे, उन से इन वर्तमान काल के इंद्र की उत्पत्ति हुई. इसी सोम से सोम, अग्नि से अग्नि, त्वष्टा से त्वष्टा और धाता से धाता उत्पन्न हुए. (९) ये त आसन् दश जाता देवा देवेभ्यः पुरा. पुत्रेभ्यो लोकं दत्त्वा कस्मिंस्ते लोक आसते.. (१०) प्राचीन काल में देवों से जो दस देव उत्पन्न हुए, वे अपने पुत्रों को यह लोक दे कर भी स्वयं किस लोक में निवास करते हैं? (१०) यदा केशानस्थि स्नाव मांसं मज्जानमाभरत्. शरीरं कृत्वा पादवत् कं लोकमनुप्राविशत्.. (११) जिस सृष्टि रचना के समय रचना करने वाले ने केशों को, अस्थियों को, स्नायुओं अर्थात् नसों को, मांस को और मज्जा अर्थात् चरबी को एकत्र किया. हाथपैरों वाले शरीर की रचना ebook converter DEMO Watermarks*

अङ्गा पर्वाणि मज्जानं को मांसं कुत आभरत्.. (१२)

कर के सृष्टि रचना करने वाले ब्रह्म ने उस शरीर में आत्मा के रूप में प्रवेश किया. (११) कुतः केशान् कुतः स्नाव कुतो अस्थीन्याभरत्. अङ्गा पर्वाणि मज्जानं को मांसं कुत आभरत्.. (१२) सृष्टि रचना करने वाले ईश्वर ने केशों, स्नायुओं अर्थात् नसों को और हड्डियों को किस उपादान कारण से बनाया, अंगों, जोड़ों, चरबी और मांस की रचना उस ने कहां से की? (१२) संसिचो नाम ते देवा ये संभारान्तसमभरन्. सर्वं संसिच्य मर्त्यं देवाः पुरुषमाविशन्.. (१३) ज्ञानेंद्रियां, कर्मेंद्रियों एवं प्राण, अपान आदि के रूप में जिन साधनों को पहले बताया गया है, उन्हें सृष्टि रचना करने वाले ब्रह्म ने एकत्र किया. उन साधनों से बने शरीर को रक्त, मज्जा आदि से गीला कर के उन देवों ने मरण धर्मा पुरुष का निर्माण कर के आत्मा के रूप में उस में प्रवेश किया. (१३) ऊरू पादावष्ठीवन्तौ शिरो हस्तावथो मुखम्. पृष्टीर्बर्जब्ये पार्श्वे कस्तत् समदधादृषिः.. (१४) जंघाओं को, पैरों को, घुटनों को, शीश को, हाथों को और मुख को, पसलियों को किस ऋषि ने बनाया. (१४) शिरो हस्तावथो मुखं जिह्वां ग्रीवाश्च कीकसाः. त्वचा प्रावृत्य सर्वं तत् संधा समदधान्मही.. (१५) शीश को, दोनों हाथों को, मुख को, जीभ को, गरदन को, हड्डियों को एवं उस सारे शरीर को त्वचा से ढक कर इस के निर्माण कर्ता देवता ने आपस में जोड़ दिया. (१५) यत्तच्छरीरमशयत् संधया संहितं महत्. येनेदमद्य रोचते को अस्मिन् वर्णमाभरत्.. (१६) इस प्रकार के शरीर का निर्माण करने वाले देवता सहित जो बढ़ा हुआ शरीर है, वह इस समय जिस रंग के कारण सुंदर लगता है, उस शरीर में किस नाम के देव ने उस रंग को बनाया है? (१६) सर्वे देवा उपाशिक्षन् तदजानाद् वधूः सती. ईशा वशस्य या जाया सास्मिन् वर्णमाभरत्.. (१७) सभी देवों ने समीप में शक्तिशाली होने की इच्छा की. परमेश्वर के साथ विवाह करने वाली माया ने देवों के द्वारा बनाए हुए उस शरीर को जाना. जो माया सारे संसार का नियंत्रण ebook converter DEMO Watermarks*

करने वाली है, उस ने इस शरीर में रंग भरा है. (१७) यदा त्वष्टा व्यतृणत् पिता त्वष्टुर्य उत्तरः. गृहं कृत्वा मर्त्यं देवाः पुरुषमाविशन्.. (१८) उस शरीर में आत्मा के रूप में उस का निर्माण करने वाला ईश्वर स्थित है. उस निर्माण कार्य से भी श्रेष्ठ इस विचित्र संसार का निर्माण करने वाला जो देव है, उस ने निर्माण के समय पुरुष के शरीर, आंखों, कानों आदि के रूप में छेद किए, तब उस निर्माण देव ने उस पुरुष शरीर को घर बना कर उस में प्रवेश किया. (१८) स्वप्नो वै तन्द्रीर्निर्ऋतिः पाप्मानो नाम देवताः. जरा खालत्यं पालित्यं शरीरमनु प्राविशन्.. (१९) नींद, आलस्य, पापदेवता एवं ब्रह्महत्या आदि पापों ने इस शरीर में प्रवेश किया. वृद्धावस्था, नयन आदि का नष्ट होना, त्वचा का ढीला हो जाना आदि के अभिमानी देवों ने शरीर में प्रवेश किया. (१९) स्तेयं दुष्कृतं वृजिनं सत्यं यज्ञो यशो बृहत्. बलं च क्षत्रमोजश्च शरीरमनु प्राविशन्.. (२०) चोरी, सुरा पीना आदि बुरे कर्म, इन से उत्पन्न पाप, सत्य भाषण, यज्ञ, महान यश, बल और क्षत्रियों से संबंधित ओज ने इस शरीर में प्रवेश किया. (२०) भूतिश्च वा अभूतिश्च रातयो ऽ रातयश्च याः. क्षुधश्च सर्वास्तृष्णाश्च शरीरमनु प्राविशन्.. (२१) समृद्धि, असमृद्धि अर्थात् संपन्नता और दीनता, मित्र और शत्रु, भूख और प्यास, इन सब ने पुरुष के शरीर में प्रवेश किया. (२१) निन्दाश्च वा अनिन्दाश्च यच्च हन्तेति नेति च. शरीरं श्रद्धा दक्षिणाश्रद्धा चानु प्राविशन्.. (२२) निंदा और प्रशंसा, हर्ष और शोक, धन की समृद्धि और इच्छा का अभाव— इन्होंने शरीर में प्रवेश किया. (२२) विद्याश्च वा अविद्याश्च यच्चान्यदुपदेश्यम्. शरीरं ब्रह्म प्राविशदृचः सामाथो यजुः.. (२३) शास्त्र आदि में ज्ञान और अज्ञान ने, अन्य उपदेश योग्य भावों ने, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के मंत्रों के पश्चात ब्रह्म अर्थात् ब्रह्म के अंश आत्मा ने शरीर में प्रवेश किया. (२३) ebook converter DEMO Watermarks*

आनन्दा मोदाः प्रमुदो ऽ भीमोदमुदश्च ये. हसो नरिष्टा नृत्तानि शरीरमनु प्राविशन्.. (२४) आनंद, मोद, प्रमोद, सामने वर्तमान मोद अर्थात् अभिमोद, हंसी, शब्द, रूप, स्पर्श आदि एवं नृत्य आदि ने इस शरीर में प्रवेश किया. (२४) आलापाश्च प्रलापाश्चाभीलापलपञ्च ये. शरीरं सर्वे प्राविशन्नायुजः प्रयजो युजः.. (२५) सार्थक वचन, निरर्थक वचन, अभिलाषाओं से पूर्ण वचन, आयोजन, प्रयोजन और योजना—इन सब ने मनुष्य के शरीर में प्रवेश किया. (२५) प्राणापानौ चक्षुः श्रोत्रमक्षितिश्च क्षितिश्च या. व्यानोदानौ वाङ् मनः शरीरेण त ईयन्ते.. (२६) प्राण और अपान वायुएं, नेत्र, कान, विनाश का अभाव और विनाश, व्यान और उदान वायुएं, वाणी और मन—ये सभी इस शरीर में प्रवेश कर के अपने-अपने काम लगे हैं. (२६) आशिषश्च प्रशिषश्च संशिषो विशिषश्च याः. चित्तानि सर्वे संकल्पाः शरीरमनु प्राविशन्.. (२७) मनचाहे फल की प्रार्थनाएं, उत्कृष्ट प्रार्थनाएं, भलीभांति होने वाली प्रार्थनाएं तथा अनेक प्रकार की प्रार्थनाएं, मनबुद्धि और अहंकार, सभी संकल्प—इन्होंने पुरुष शरीर में प्रवेश किया. (२७) आस्तेयीश्च वास्तेयीश्च त्वरणाः कृपणीश्च याः. गुह्याः शुक्रा स्थूला अपस्ता बीभत्सावसादयन्.. (२८) भलीभांति स्नान, स्नान से संबंधित जल, शीघ्रता से चलने वाले तथा थोड़ी मात्रा में होने वाले जल, गुफा में होने वाले, श्वेत वर्ण के अर्थात् स्वच्छ जल, अधिक मात्रा में होने वाले नदी रूप में वर्तमान जल—इन सब ने पुरुष के शरीर में प्रवेश किया. (२८) अस्थि कृत्वा समिधं तदष्टापो असादयन्. रेतः कृत्वाज्यं देवाः पुरुषमाविशन्.. (२९) हड्डियों को समिधा बना कर पहले कहे गए आठ प्रकार के जलों ने पुरुष के शरीर में प्रवेश किया. वीर्य को घृत बना कर देवों ने पुरुष के शरीर में प्रवेश किया. (२९) या आपो याश्च देवता या विराड् ब्रह्मणा सह. शरीरं ब्रह्म प्राविशच्छरीरे ऽ धि प्रजापतिः.. (३०) ebook converter DEMO Watermarks*

जो जल, जो देवता, जो विराट् तथा जो प्रजापति कहे गए हैं, ब्रह्म के साथ आत्मा के रूप में उन सभी ने पुरुष के शरीर में प्रवेश किया. (३०) सूर्यश्चक्षुर्वातः प्राणं पुरुषस्य वि भेजिरे. अथास्येतरमात्मानं देवाः प्रायच्छन्नग्नये.. (३१) सूर्य ने पुरुष के नयनों को तथा वायु ने पुरुष के प्राणों को मृत्यु के बाद ले लिया. प्राणों और इंद्रियों के अतिरिक्त पुरुष के शरीर को देवों ने अग्नि को दे दिया. (३१) तस्माद् वै विद्वान् पुरुषमिदं ब्रह्मेति मन्यते. सर्वा ह्यस्मिन् देवता गावो गोष्ठ इवासते.. (३२) इसी कारण विद्वान् इस पुरुष को ब्रह्म मानते हैं. जिस प्रकार गाएं गोशाला में रहती हैं, उसी प्रकार सब देवता मनुष्य के इस शरीर में निवास करते हैं. (३२) प्रथमेन प्रमारेण त्रेधाविष्वङ् वि गच्छति. अद एकेन गच्छत्यद एकेन गच्छत्यहैकेन नि षेवते.. (३३) पुरुष के शरीर में प्रवेश करने वाला जीवात्मा इंद्रियों के द्वारा पुण्य और पाप रूपी कर्म पूरे कर के मृत्यु के बाद स्वर्ग या नरक में स्थान प्राप्त करता है. पहले होने वाले स्थूल शरीर की मृत्यु के बाद वह जीवात्मा शरीर त्याग कर अनेक नियमों के अनुसार तीन प्रकार से जाता है. एक अर्थात् पाप कर्म से नरक में जाता है, पुण्य कर्म से स्वर्ग में जाता है तथा पुण्य और पाप से मिले हुए दोनों प्रकार के कर्म से यहां सुख दुःखों को अनुभव करता है. (३३) अप्सु स्तीमासु वृद्धासु शरीरमन्तरा हितम्. तस्मिञ्छवो ऽ ध्यन्तरा तस्माञ्छवो ऽ ध्युच्यते.. (३४) संसार को गीला करने वाले एवं बढ़े हुए उन जलों के मध्य शरीर स्थित है. उस ब्रह्मांड शरीर के ऊपर, नीचे और मध्य में वह आत्मा कहा जाता है. (३४) सूक्त-११ देवता—अर्बुदि ये बाहवो या इषवो धन्वनां वीर्याणि च. असीन् परशूनायुधं चित्ताकूतं च यद्धृदि. सर्वं तदर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृशे कुरूदारांश्च प्र दर्शय.. (१) हमारे योद्धाओं के जो बाण, जो भुजाएं और बल है, तलवारें और फरसारूपी आयुध, चित्त में संकल्पित शत्रुओं को मारना कार्य है, हे अर्बुद ऋषि के पुरुषार्थ! तुम यह सब हमारे शत्रुओं को दिखलाओ. शत्रुओं को डसने के लिए हमें अंतरिक्ष में विचरण करने वाले राक्षसों और पिशाचों को दिखाओ. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

उत्तिष्ठत सं नह्यध्वं मित्रा देवजना यूयम्. संदृष्टा गुप्ता वः सन्तु या नो मित्राण्यर्बुदे.. (२) हे मित्रो अर्थात् हमारी विजय के प्रदानशील देवगणो! तुम सेना की इस छावनी से विजय प्राप्ति के लिए प्रार्थना करो. आप के द्वारा दिए हुए हमारे योद्धा आप के द्वारा रक्षित हैं. हे अर्बुद सर्प! हमारे जो मित्र हैं जो हमारे शत्रुओं के साथ युद्ध करने के लिए आए हैं, उन के तुम अंग बनो. (२) उत्तिष्ठतमा रभेथामादानसंदाननाभ्याम्. अमित्राणां सेना अभि धत्तमर्बुदे.. (३) हे अर्बुदि सर्प! तुम और निर्बुद इस स्थान से चले जाओ. तुम यहां से दूर जाओ. तथा युद्ध करो. तुम आदान और संदान नाम की रस्सियों से शत्रुओं की सेना को बांधो. (३) अर्बुदिर्नाम यो देव ईशानश्च न्यर्बुदिः. याभ्यामन्तरिक्षमावृतमियं च पृथिवी मही. ताभ्यामिन्द्रमेदिभ्यामहं जितमन्वेमि सेनया.. (४) अर्बुदि, ईशान और न्यर्बुदि नाम के जो देव है, उन के द्वारा आकाश और विशाल पृथ्‍वी को ढक लिया है. स्वर्ग और धरती को व्याप्त कर के स्थित एवं इंद्र के मित्र अर्बुदि और न्यर्बुदि के द्वारा जीती हुई सेना का मैं अनुगमन करूं. (४) उत्तिष्ठ त्वं देवजनार्बुदे सेनया सह. भञ्जन्नमित्राणां सेनां भोगेभिः परि वारय.. (५) हे देव जाति से संबंधित अर्बुदि नाम के सर्प! तुम अपनी सेना के साथ उठो. इस के बाद तुम शत्रुओं की सेनाओं का वध करते हुए अपने सर्प शरीरों के द्वारा उन की आंखें बंद कर लो. (५) सप्त जातान् न्यर्बुद उदाराणां समीक्ष्यन्. तेभिष्ट्वमाज्ये हुते सर्वैरुत्तिष्ठ सेनया.. (६) हे न्यर्बुदि नाम के सर्प! पहले बताए हुए आंखों को बंद करने वाले सब शरीरों के शत्रुओं को दिखाते हुए तुम घृत एवं आज्य के होने पर उन सब के द्वारा जाते हुए शत्रुओं को उन सब को दिखाओ जो उन की आंखों को बंद कर देते हैं. तुम उन सब के साथ हमारी सेना के संग उठो. (६) प्रतिघ्नानाश्रुमुखी क्रुधकर्णी च क्रोशतु. विकेशी पुरुषे हते रदिते अर्बुदे तव.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा काटे जाने पर हमारे शत्रु पुरुष के मर जाने पर उस की पत्नी छाती पीटती हुई, आंसू बहाती हुई, गहनों से शून्य कानों वाली, बाल बिखराए हुए रोए. (७) संकर्षन्ती करूकरं मनसा पुत्रमिच्छन्ती. पतिं भ्रातरमात् स्वान् रदिते अर्बुदे तव.. (८) हे अर्बुदि नाम के सर्प! काटने के कारण शरीर में विष फैल जाने पर शत्रु की पत्नी हाथ मलती हुई विष के नाश के लिए अपने पुत्र की इच्छा करती हुई, इस के बाद पति की भी इच्छा करती हुई तथा विष दूर करने के लिए अपने संबंधियों की इच्छा करें. (८) अलिक्लवा जाष्कमदा गृध्राः श्येनाः पतत्रिणः. ध्वाङ्क्षाः शकुनयस्तृप्यन्त्वमित्रेषु समीक्षयन् रदिते अर्बुदे तव.. (९) हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे द्वारा हमारे शत्रुओं को काटे जाने पर धृष्ट पक्षी, शरीर को कष्ट देने वाले पक्षी, गिद्ध, बाज तथा अन्य मांस खाने वाले पक्षी और कौवे, जो हमारे शत्रुओं का मांस खाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, वे तृप्त हों. (९) अथो सर्वं श्वापदं मक्षिका तृप्यतु क्रिमिः. पौरुषेये ऽ धि कुणपे रदिते अर्बुदे तव.. (१०) हे अर्बुदि! तुम्हारे द्वारा काटे जाने पर हमारे शत्रुओं के शरीर में जो घाव हो जाते हैं, उन के शरीर को खा कर मांसभक्षी पशु, मक्खियां और कीड़े तृप्त हों. (१०) आ गृह्लीतं सं बृहतं प्राणापानान् न्यर्बुदे. निवाशा घोषाः सं यन्त्वमित्रेषु समीक्षयन् रदिते अर्बुदे तव.. (११) हे न्यर्बुदि तथा अर्बुदि नाम के सर्पो! तुम हमारे शत्रुओं के प्राण और अपान को ग्रहण करो. तुम्हारे द्वारा हमारे शत्रुओं को काटे जाने पर उन्हें देखने वालों के द्वारा दुःख भरे स्वर उच्चारण किए जाएं. (११) उद् वेपय सं विजन्तां भियामित्रान्सं सृज. उरुग्राहैर्बाहुड्कैर्विध्यमित्रान् न्यर्बुदे.. (१२) हे न्यर्बुदि नाम के सर्प! तुम हमारे शत्रुओं को कंपित करो. तुम्हारे भय के कारण वे अपने स्थान से भाग जाएं. इस के बाद तुम हमारे शत्रुओं के पैरों और हाथों को बांध कर मारो. (१२) मुह्यन्त्वेषां बाहवश्चित्ताकूतं च यद्धृदि. मैषामुच्छेषि किं चन रदिते अर्बुदे तव.. (१३) ebook converter DEMO Watermarks*

हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम्हारे खाए जाने पर उन शत्रुओं की भुजाएं निष्क्रिय हो जाएं. उन के मन में जो भी भावनाएं हैं, वे भी मोहित हो जाएं. हमारे शत्रुओं की जो रथ, घोड़ा हाथी आदि सेना है, वह भी शेष न बचे. (१३) प्रतिघ्नाना: सं धावन्तूर: पटूरावाघनाना:. अघारिणीर्विकेश्यो रुदत्य १: पुरुषे हते रदिते अर्बुदे तव.. (१४) हे अर्बुदि! तुम्हारे द्वारा जिन के पतियों को काटा गया है. हमारे उन शत्रुओं की पत्नियां अपने हाथों से अपने मुख और सीने को पीटती हुई, केश बिखेरे हुए उन मृत पुरुषों के समीप शीघ्र जाएं. (१४) श्वन्वतीरप्सरसो रूपका उताबुँदे. अन्तःपात्रे रेरिहतीं रिशां दुर्णिहितैषिणीम्. सर्वास्ता अर्बुदे त्वममित्रेभ्यो दृशे कुरूदारांश्च प्र दर्शय.. (१५) हे अर्बुदि! तुम हमारे शत्रुओं की माया के द्वारा निर्मित ऐसी अप्सराओं को दिखाओ, जिन के साथ शिकारी कुत्ते हों. तुम उन्हें ऐसी गायों को दिखाओ जो पात्र को बारबार चाट रही हों. तुम उन्हें उल्कापात आदि अद्भुत अपशकुन दिखाओ. (१५) खडूरे ऽ धिचङ्क्रमां खर्विकां खर्ववासिनीम्. य उदारा अन्तर्हिता गन्धर्वाप्सरसश्च ये. सर्पा इतरजना रक्षांसि.. (१६) हे अर्बुदि नाम के सर्प! तुम हमारे शत्रुओं को माया के द्वारा निर्मित ऐसे छोटे प्राणियों को दिखाओ. जो आकाश में चलफिर रहे हों और धीमी आवाज कर रहे हों. (१६) चतुर्दंष्ट्रांश्छायावदतः कुम्भमुष्काँ असृङ्मुखान्. स्वभ्यसा ये चोद्भ्यसा:.. (१७) जो यक्ष, राक्षस आदि अपनी माया से छिपे रहते हैं, उन काले रंग वालों और चार दांतों वालों को हमारे शत्रुओं को दिखाओ. जो राक्षस अनेक रूपों के कारण भयानक हैं, उन्हें भी तुम हमारे शत्रुओं को दिखाओ. (१७) उद् वेपय त्वमर्बुदे ऽ मित्राणाममूः सिचः. जयांश्च जिष्णुश्चामित्राँजायतामिन्द्रमेदिनौ.. (१८) हे अर्बुदि नाम के सर्प! विष की अधिकता के कारण हमारे शत्रुओं की जो सेनाएं दुखी हैं, उन्हें कंपित करो. हे विजय प्राप्त करने वाले अर्बुदि और न्यर्बुदि नाम के सर्पो! तुम हमारे शत्रुओं को पराजित करते हुए विजयी बनो एवं इंद्र के साथ मिल कर हमें विजयी बनाओ. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*