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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

बृहस्पति द्वारा विरचित इस ओषधि को विश्वे देवों ने धारण किया था. जो भग गायों में प्रवेश कर चुका है, हम इस ओषधि को उस भग से संपन्न करते हैं. (५५) बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्. यशो गोषु प्रविष्टं यत् तेनेमां सं सृजामसि.. (५६) बृहस्पति देव द्वारा इस ओषधि का सृजन हुआ है. गायों में जो यज्ञ प्रवेश कर गया है, मैं उस यज्ञ से इसे संयुक्त करता हूं. (५६) बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्. पयो गोषु प्रविष्टं यत् तेनेमां सं सृजामसि.. (५७) बृहस्पति द्वारा यह ओषधि विश्वे देवों के हेतु पुष्ट हुई है. गायों में जो दूध स्थित है, हम इस ओषधि को उस से संयुक्त करते हैं. (५७) बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्. रसो गोषु प्रविष्टो यस्तेनेमां सं सृजामसि.. (५८) बृहस्पति के द्वारा निर्मित इस ओषधि को सभी देवों ने पुष्ट किया है. गायों में जो रस प्रविष्ट है, हम उस रस से इस ओषधि को संयुक्त करते हैं. (५८) यदीमे केशिनो जना गृहे ते समनर्तिषू रोदेन कृण्वन्तो ३ घम्. अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्.. (५९) लंबे केशों वाले ये लोग तेरे घर में नाचते रहे हैं तथा रोके से पाप करते रहे हैं, अग्नि देव तुझे उस पाप से मुक्त कराएं. (५९) यदीयं दुहिता तव विकेश्यरुदद् गृहे रोदेन कृण्वत्य् १ घम्. अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्.. (६०) तेरी पुत्री अपने केशों को फैला कर रोती रही है, तेरे घर में हुए इस पाप से सविता और अग्नि तुझे छुड़ाएं. (६०) यज्जामयो यद्युवतयो गृहे ते समनर्तिषू रोदेन कृणवतीरघम्. अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्.. (६१) तेरी बहन तथा अन्य स्त्रियां दुःखी हुईं और रोती हुई तेरे घर में घूमती रही हैं. सविता और अग्नि तुझे उस पाप से मुक्त करें. (६१) यत् ते प्रजायां पशुषु यद्वा गृहेषु निष्ठितमघकृद्भिर्घं कृतम्. अग्निष्ट्वा तस्मादेनसः सविता च प्र मुञ्चताम्.. (६२) ebook converter DEMO Watermarks*

संतान और पशुओं को दुःखी करने वालों ने तेरे घर में जिस दुःख का विस्तार किया है. उस पाप से सविता और अग्नि तुझे छुड़ाएं. (६२) इयं नार्युप ब्रूते पूल्यान्यावपन्तिका. दीर्घायुरस्तु मे पतिर्जीवाति शरदः शतम्.. (६३) अग्नि में खीलों की आहुति देती हुई यह वधू कामना करती है कि मेरा पति दीर्घ आयु वाला हो और सौ वर्ष तक जीवित रहे. (६३) इहेमाविन्द्र सं नुद चक्रवाकेव दम्पती. प्रजयैनौ स्वस्तकौ विश्वमायुर्व्य श्रुताम्.. (६४) हे इंद्र! इन पति और पत्नी को ऐसा प्रेम दो, जैसे चकवी और चकवे में होता है. इन्हें सुंदर घर और संतानों से युक्त रखो. ये दोनों जीवनभर भांतिभांति के सुख भोगते रहें. (६४) यदासन्द्यामुपधाने यद् वोपवासने कृतम्. विवाहे कृत्यां यां चक्रूरास्नाने तां नि दध्मसि.. (६५) हम ने असंदी अर्थात् कुरसी पर, बिस्तर पर, सिरहाने तथा उपवस्त्र पर जो पाप किया और अपने विवाह में जो हिंसक प्रयोग किया, उसे हम स्नान के द्वारा धो डालते हैं. (६५) यद् दुष्कृतं यच्छमलं विवाहे वहतौ च यत्. तत् संभलस्य कम्बले मृज्महे दुरितं वयम्.. (६६) हम ने विवाह में तथा बरात के रथ में जो दुष्ट और मलिन कर्म किया, उसे हम मधुर भाषी पुरुष के कंबलों से युक्त करते हैं. (६६) संभले मलं सादयित्वा कम्बले दुरितं वयम्. अभूम यज्ञियाः शुद्धाः प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (६७) संभल अर्थात् दूत में मन को तथा कंबल में पाप को स्थित कर के हम यज्ञ करने योग्य शुद्ध हो जाएं. वह शुद्धि हमारी आयु को शुद्ध बनाए. (६७) कृत्रिमः कण्टकः शतदन् य एषः. अपास्याः केश्यं मलमप शीर्षण्यां लिखात्.. (६८) यह सैकड़ों दांतों वाला कंघा कृत्रिम रूप से बनाया गया है. यह हमारे शीश पर पहुंच कर हमारे शीश के मैल को छुड़ाए. (६८) अङ्गादङ्गाद् वयमस्या अप यक्ष्मं नि दध्मसि. तन्मा प्रापत् पृथिवीं मोत देवान् दिवं मा प्रापदुर्व १ न्तरिक्षम्. ebook converter DEMO Watermarks*

अपो मा प्रापन्मलमेतदग्ने यमं मा प्रापत् पितॄंश्च सर्वान्.. (६९) मैं इस कंघे से अपने शरीर के संहारक दोषों को दूर करता हूं. यह दोष मुझे न लगे, पृथ्वी को, आकाश को, अंतरिक्ष को, देवों को तथा जल को भी वह दोष न लगे. हे अग्नि! यह दोष पितरों तथा उन के अधिष्ठाता देव यमराज को भी न लगे. (६९) सं त्वा नह्यामि पयसा पृथिव्याः सं त्व नह्यामि पयसौषधीनाम्. सं त्वा नह्यामि प्रजसा धनेन सा संनद्धा सनुहि वाजमेमम्.. (७०) हे पत्नी! मैं पृथ्वी के जल के समान सारतत्त्व से तथा ओषधियों के सारतत्त्व से तुझे बांधता हूं. तू प्रजा और धन से संपन्न होती हुई मुझे धन देने वाली हो. (७०) अमो ऽ हमस्मि सा त्वं सामाहमस्म्यृक् त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वम्. ताविह सं भवाव प्रजामा जनयावहै.. (७१) हे पत्नी! मैं साम हूं और तू ऋचा है. मैं आकाश हूं और तू पृथ्वी है. मैं विष्णु रूप हूं और तू मेरी लक्ष्मी है. हम इस लोक में साथसाथ निवास करते हुए संतान को उत्पन्न करें. (७१) जनियन्ति नावग्रवः पुत्रियन्ति सुदानवः. अरिष्टासू सचेवहि बृहते वाजसातये.. (७२) हे पत्नी! अविवाहित लोग हम लोगों के समान विवाह करने की इच्छा करते हैं. दाता लोग पुत्र की कामना करते हैं. जब तक हमारे शरीरों में प्राण रहें, तब तक हम दोनों एकत्र हों तथा बल प्राप्ति के लिए मिल कर रहें. (७२) ये पितरो वधूददर्शा इमं वहतुमागजन्. ते अस्यै वध्वै संपत्न्यै प्रजावच्छर्म यच्छन्तु.. (७३) नव वधू को देखने की इच्छा वाले बहुत से लोग इस बरात को देखेंगे. वे इस वधू के लिए उत्तम सुख प्रदान करें. (७३) येदं पूर्वागन् रशनायमाना प्रजामस्यै द्रविणं चेह दत्त्वा. तां वहन्त्वगतस्यानु पन्थां विराडियं सुप्रजा अत्यजैषीत्.. (७४) रस्सी के समान बांधने वाली जो नारी पहले इस स्थान को प्राप्त हुई थी, हम संतान और धन के द्वारा उस वधू को उस मार्ग से ले जाएं, जिस पर अब तक कोई नहीं चला है. (७४) प्र बुध्यस्व सुबुधा बुध्यमाना दीर्घायुत्वाय शतशारदाय. गृहान् गच्छ गृहपत्नी यथासो दीर्घं त आयुः सविता कृणोतु.. (७५) हे उत्तम बुद्धि वाली! जगाई जाने पर तू सौ वर्ष की दीर्घायु प्राप्त करने के लिए जाग. तू ebook converter DEMO Watermarks*

गृहपत्नी बनने के लिए घर चल. सविता देव तुझे दीर्घ जीवन प्रदान करें. (७५)

सूक्त-१ देवता—अध्यात्म, व्रात्य

पंद्रहवां कांड सूक्त-१ देवता—अध्यात्म, व्रात्य व्रात्य आसीदीयमान एव स प्रजापतिं समैरयत्.. (१) व्रात्य अर्थात् समूहों का हित करने वाला समूहपति सब का प्रेरक था. भग ने प्रजापालक को उत्तम प्रेरणा दी. (१) स प्रजापतिः सुवर्णमात्मन्नपश्यत् तत् प्राजनयत्.. (२) उस प्रजापति ने आत्मा को उत्तम तेज से युक्त किया तथा उस ने सब को उत्पन्न किया. (२) तदेकमभवत् तल्ललाममभवत् तन्महदभवत् तज्ज्येष्ठमभवत् तद् ब्रह्माभवत् तत् तपो ऽ भवत् तत् सत्यमभवत् तेन प्राजायत.. (३) वह विलक्षण तथा विशाल हुआ. वह श्रेष्ठ ब्रह्म हुआ. वह तपाने वाला तथा सत्य हुआ. उस के द्वारा यह विश्व प्रकट हुआ. (३) सो ऽ वर्धत स महानभवत् स महादेवो ऽ भवत्.. (४) वह वृद्धि को प्राप्त हुआ. वही महान और महादेव हुआ. (४) स देवानामीशां पर्यैत् स ईशानो ऽ भवत्.. (५) वह देवों का स्वामी एवं ईशान हुआ. (५) स एकव्रात्यो ऽ भवत् स धनुऱादत्त तदेवेन्द्रधनुः.. (६) वह एक व्रात्य अर्थात् समूहों का स्वामी हुआ. उस ने धनुष उठाया और वह इंद्रधनुष बन गया. (६) नीलमस्योदरं लोहितं पृष्ठम्.. (७) उस का पेट नीला और पीठ लाल है. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-२ देवता—अध्यात्म, व्रात्य

नीलेनैवाप्रियं भ्रातृव्यं प्रोर्णोति लोहितेन द्विषन्तं विध्यतीति ब्रह्मवादिनो वदन्ति.. (८) वह नीले भाग से अप्रिय शत्रु को घेरता है तथा अपने लाल भाग से द्वेष करने वालों को वेधता है. ऐसा ब्रह्मवादी जन कहते हैं. (८) सूक्त-२ देवता—अध्यात्म, व्रात्य स उदतिष्ठत् स प्राचीं दिशमनुव्यचलत्.. (१) वह उठ कर पूर्व दिशा में चल दिया. (१) तं बृहच्च रथन्तरं चादित्याश्च विश्वे च देवा अनुव्य चलन्.. (२) बृहत् साम, रथंतर साम, सूर्य तथा सभी देवता उस के पीछेपीछे चले. (२) बृहते च वै स रथन्तराय चादित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्य आ वृश्चते य एवं विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (३) उस का सत्कार करने वाला बृहत् साम, रथंतर, सूर्य और सब देवताओं की प्रिय पूर्व दिशा में अपना प्रिय धाम बनाता है. (३) बृहतश्च वै स रथन्तरस्य चादित्यानां च विश्वेषां च देवानां प्रियं धाम भवति तस्य प्राच्यां दिशि.. (४) जो ऐसे विद्वान् व्रतचारी को अपशब्द कहता है, वह बृहत्, रथंतर, आदित्य और विश्वे देवों का अपराधी होता है. (४) श्रद्धा पुंश्चली मित्रो मागधो विज्ञानं वासोऽहरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ प्रवर्त्तौ कल्मलिर्मणिः.. (५) श्रद्धा पुंश्चली, मित्र अर्थात सूर्य स्तुति करने वाला, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात्रि केश, किरणें कुंडल तथा तारे मणि के समान होते हैं. (५) भूतं च भविष्यच्च परिष्कन्दौ मनो विपथम्.. (६) भूत और भविष्यत्—ये दोनों काल उस के रक्षक हैं तथा मन उस का युद्ध संबंधी रथ है. (६) मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः.. (७) eBook converter DEMO Watermarks*

श्वास और उच्छ्वास उस के रथ के घोड़े हैं. प्राण उस का सारथी है और वायु उस सारथी का चाबुक है. (७) कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (८) कीर्ति और यश उस के आगे चलने वाले हैं. कीर्ति उस के समीप आती है तथा यश उस के पास आता है. जो इस प्रकार जानता है, उसे कीर्ति और यश प्राप्त होते हैं. (८) स उदतिष्ठत् स दक्षिणां दिशमनु व्य चलत्.. (९) वह उठा और दक्षिण दिशा की ओर चला. (९) तं यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं च यज्ञश्च यजमानश्च पशवश्चानुव्यचलन्.. (१०) यज्ञ करने वाले और न करने वाले, वामदेव से संबंधित, यज्ञ, यजमान उस के अत्यधिक अनुकूल हुए और पीछेपीछे चले. (१०) यज्ञायज्ञियाय च वै स वामदेव्याय च यज्ञाय च यजमानाय च पशुभ्यश्च वृश्चते य एवं विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (११) जो इस प्रकार के विद्वान् और व्रत का आचरण करने वाले का उपहास करता है, वह यज्ञ करने वाले तथा न करने वाले, वामदेव संबंधी का, यज्ञ का, यजमान का और पशुओं का अपराधी बनता है. (११) यज्ञायज्ञियस्य च वै स वामदेव्यस्य च यज्ञस्य च यजमानस्य च पशूनां च प्रियं धाम भवति तस्य दक्षिणायां दिशि.. (१२) जो उस का सत्कार करता है, वह यज्ञाज्ञिय, वामदेव्य, यज्ञ, यजमान और पशुओं का प्रिय होता है. उस का स्थान दक्षिण दिशा में होता है. (१२) उषाः पुंश्चली मन्त्रो मागधो विज्ञानं वासो ऽ हरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ प्रवर्त्तौ कल्मलिर्मणिः.. (१३) उस की उषा स्त्री, मंत्र प्रशंसक, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात्रि केश, किरण कुंडल तथा तारे मणि के समान होते हैं. (१३) अमावास्या च पौर्णमासी च परिष्कन्दौ मनो विपथम्. मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः. कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (१४) अमावस्या और पूर्णमासी उस की रक्षा करने वाली होती हैं. मन उस का युद्ध संबंधी रथ ebook converter DEMO Watermarks*

होता है. श्वास एवं उच्छवाए उस के रथ के घोड़े हैं. प्राण उस का सारथी है. कीर्ति उस के निकट आती है तथा उस के पास यश मिलते हैं उसे कीर्ति एवं यश मिलते हैं. (१४) स उदतिष्ठत् स प्रतीचीं दिशमनु व्यचलत्.. (१५) वह उठा और पूर्व दिशा में चल दिया. (१५) तं वैरुपं च वैराजं चापश्च वरुणश्च राजानुव्यचलन्.. (१६) जल, वरुण, वैरूप और वैराज उस के पीछेपीछे चले. (१६) वैरूपाय च वै स वैराजाय चाद्भ्यश्च वरुणाय च राज्ञ आ वृश्चते य एवं विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (१७) जो इस प्रकार जानने वाले और व्रतधारी का अपमान करता है, वह वैरूप, वैराज, जल और राजा वरुण का अपराधी होता है. (१७) वैरूपस्य च वै स वैराजस्य चापां च वरुणस्य च राज्ञः प्रियं धाम भवति तस्य प्रतीच्यां दिशि.. (१८) जो यह बात जानता है, वह वैरूप, वैराज, जल और राजा वरुण का प्रिय धाम बनता है. (१८) इरा पुंश्चली हसो मागधो विज्ञानं वासो ऽ हरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ प्रवर्तौ कल्मलिर्मणिः.. (१९) ऐसे व्यक्ति के लिए पश्चिम दिशा में भूमि स्त्री, हास्य प्रशंसा करने वाला, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात्रि केश, किरण कुंडल तथा तारे मणि होते हैं. (१९) अहश्च रात्री च परिष्कन्दौ मनो विपथम्. मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः. कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (२०) दिन और रात उस के रक्षक होते हैं. श्वेसोच्छ्वास क्रम से उस के रथ के अश्व हैं. प्राण उस का सारथी है. वायु उस सारथी का चाबुक है. कीर्ति एवं यश उस के आगे चलने वाले हैं. कीर्ति तथा यश उस के समीप हैं जो यह जानता है, उसे यश और कीर्ति मिलते हैं. (२०) स उदतिष्ठत् स उदीचीं दिशमनु व्यचलत्.. (२१) वह उठा और उत्तर दिशा की ओर चलने लगा. (२१) ebook converter DEMO Watermarks*

तं श्यैतं च नौधसं च सप्तर्षयश्च सोमश्च राजानुव्यचलन्.. (२२) श्येत, नौधस, सप्तर्षि और राजा सोम उस के पीछे चलने लगे. (२२) श्यैताय च वै स नौधसाय च सप्तर्षिभ्यश्च सोमाय च राज्ञ आ वृश्चते य एवं विद्वांसं व्रात्यमुपवदति.. (२३) जो इस प्रकार जानने वाले व्रात्य का अपमान करता है, वह श्येत, नौधस, सप्तर्षि और राजा सोम का अपराधी बनता है. (२३) श्यैतस्य च वै स नौधसस्य च सप्तर्षीणां च सोमस्य च राज्ञः प्रियं धाम भवति तस्योदीच्यां दिशि.. (२४) जो यह बात जान लेता है वह श्येत, नौधस, सप्तर्षि और राजा वरुण का प्रिय बनता है. उत्तर दिशा में उस का प्रिय स्थान होता है. (२४) विद्युत् पुंश्चली स्तनयित्नुर्मागधो विज्ञानं वासो ऽ हरुष्णीषं रात्री केशा हरितौ प्रवतौ कल्मलिर्मणिः.. (२५) उस के लिए बिजली स्त्री, गरजने वाला मेघ प्रशंसक, विज्ञान वस्त्र, दिन पगड़ी, रात केश, किरणें, कुंडल तथा तारे मणि बन जाते हैं. (२५) श्रुतं च विश्रुतं च परिष्कन्दौ मनो विपथम्.. (२६) ज्ञान और विज्ञान उस के रक्षक होते हैं तथा मन उस का युद्ध संबंधी रथ होता है. (२६) मातरिश्वा च पवमानश्च विपथवाहौ वातः सारथी रेष्मा प्रतोदः.. (२७) श्वास और उच्छ्वास उस के रथ के घोड़े, प्राण सारथी और वायु उस का चाबुक बनता है. (२७) कीर्तिश्च यशश्च पुरःसरावैनं कीर्तिर्गच्छत्या यशो गच्छति य एवं वेद.. (२८) जो इस बात को जानता है कीर्ति और यश उस के आगे चलने वाले होते हैं. कीर्ति उस के पास आती है और यश उस के समीप आता है. (२८) सूक्त-३ देवता—अध्यात्म, व्रात्य सं संवत्सरमूर्ध्वो ऽ तिष्ठत् तं देवा अब्रुवन् व्रात्य किं नु तिष्ठसीति.. (१) वह एक वर्ष तक खड़ा रहा, तब देवताओं ने उस से पूछा—"हे व्रात्य! यह तप क्यों कर ebook converter DEMO Watermarks*

रहे हो?” (१) सो ऽ ब्रवीदासन्दीं मे सं भरन्त्विति.. (२) उस ने उत्तर दिया— “मेरे लिए आसंदी और बैठने की चौकी बनाओ.” (२) तस्मै व्रात्यायासन्दीं समभरन्.. (३) तब देवताओं ने उस के लिए आसंदी बनाई. (३) तस्या ग्रीष्मश्च वसन्तश्च द्वौ पादावास्तां शरच्च वर्षाश्च द्वौ.. (४) उस के दो पाए ग्रीष्म और वसंत ऋतुएं तथा शेष दो पाए शरद और वर्षा नामक ऋतुएं हुईं. (४) बृहच्च रथन्तरं चानूच्ये ३ आस्तां यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं च तिरश्च्ये.. (५) बृहत् और रथंतर उस चौकी के बाजू अर्थात् अगलबगल के फलक या तख्ते थे. यज्ञायज्ञिय और वामदेव्य उस के तिरछे फलक अर्थात् तख्ते थे. (५) ऋचः प्राञ्चस्तन्तवो यजूंषि तिर्यञ्चः.. (६) ऋग्वेद के मंत्र उसे बुनने के लिए लंबाई के तंतु और यजुर्वेद के मंत्र तिरछे तंतु थे. (६) वेद आस्तरणं ब्रह्मोपबर्हणम्.. (७) वेद उस का बिछौना था और ब्रह्म उस के ओढ़ने का वस्त्र था. (७) सामासाद उद्गीथो ऽ पश्रयः.. (८) सामवेद के मंत्र उस का गद्दा था और उद्गीथ उस का तकिया था. (८) तामासन्दीं व्रात्य आरोहत्.. (९) व्रात्य इस प्रकार की ज्ञानमयी चौकी पर चढ़ा. (९) तस्य देवजनाः परिष्कन्दा आसन्संकल्पाः प्रहाख्या ३ विश्वानि भूतान्युपसदः.. (१०) संकल्प उस के दूत बने तथा सभी प्राणी उस के साथ बैठने वाले हुए. (१०) विश्वान्येवास्य भूतान्युपसदो भवन्ति य एवं वेद.. (११) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य

जो इस बात को जानता है, सभी प्राणी उस के मित्र हो जाते हैं। (११) सूक्त-४ देवता—अध्यात्म, व्रात्य तस्मै प्राच्या दिशः. वासन्तौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् बृहच्च रथन्तरं चानुष्ठातारौ.. (१-२) देवताओं ने उस के लिए वसंत ऋतु के दो महीनों को पूर्व दिशा में रक्षक नियुक्त किया. बृहत्साम और रथंतर को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया। (१-२) वासन्तावेनं मासौ प्राच्या दिशो गोपायतो बृहच्च रथन्तरं चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (३) जो यह बात जानता है, वसंत ऋतु के दो महीने, पूर्व दिशा की ओर से उस की रक्षा करते हैं. बृहत् साम और रथंतर उस के अनुकूल हो जाते हैं. (३) तस्मै दक्षिणाया दिशः ग्रैष्मौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं चानुष्ठातारौ.. (४-५) दक्षिण दिशा की ओर देवताओं ने ग्रीष्म ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक बनाया तथा यज्ञायज्ञिय और वामदेव्य को उस का अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (४-५) ग्रैष्मावेनं मासौ दक्षिणाया दिशो गोपायतो यज्ञायज्ञियं च वामदेव्यं चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (६) जो इस बात को जानता है, दक्षिण दिशा की ओर से ग्रीष्म ऋतु के दो महीने उस की रक्षा करते हैं तथा यज्ञायज्ञिय और वामदेव उस के अनुकूल होते हैं. (६) तस्मै प्रतीच्या दिशः.. (७) वार्षिकौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् वैरूपं च वैराजं चानुष्ठातारौ.. (८) देवताओं ने पश्चिम दिशा में वर्षा ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक नियुक्त किया तथा वैरूप और वैराज को उस का अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (७-८) वार्षिकावेनं मासौ प्रतीच्या दिशो गोपायतो वैरूपं च वैराजं चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (९) जो इस बात को जानता है, वह पश्चिम दिशा की ओर से वर्षा ऋतु के दो महीनों द्वारा रक्षित रहता है तथा वैरूप और वैराज उस के अनुकूल रहते हैं. (९) तस्मा उदीच्या दिशः.. (१०) ebook converter DEMO Watermarks*

शारदौ मासौ गोप्तारावकुर्वञ्छ्यैतं च नौधसं चानुष्ठातारौ.. (११) देवताओं ने उत्तर दिशा की ओर से शरद ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक नियुक्त किया तथा श्येत और नौधस को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१०-११) शारदावेनं मासावुदीच्या दिशो गोपायतः श्यैतं च नौधसं चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (१२) जो यह बात जानता है, उत्तर दिशा की ओर से उस की रक्षा शरद ऋतु के दो महीने करते हैं तथा नौधस और श्येत उस के अनुकूल बन जाते हैं. (१२) तस्मै ध्रुवाया दिशः.. (१३) हैमनौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् भूमिं चाग्निं चानुष्ठातारौ.. (१४) देवताओं ने ध्रुव दिशा अर्थात् पृथ्वी की अथवा नीचे की ओर से हेमंत ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक नियुक्त किया तथा पृथ्वी और अग्नि को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१३-१४) हैमनावेनं मासौ ध्रुवाया दिशो गोपायतो भूमिश्चाग्निश्चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (१५) जो इस बात को जानता है, ध्रुव दिशा की ओर से हेमंत ऋतु के दो महीने उस पुरुष की रक्षा करते हैं. पृथ्वी और अग्नि उस के अनुकूल हो जाते हैं. (१५) तस्मा ऊर्ध्वाया दिशः.. (१६) शैशिरौ मासौ गोप्तारावकुर्वन् दिवं चादित्यं चानुष्ठातारौ... (१७) देवताओं ने ऊर्ध्व दिशा अर्थात् ऊपर की ओर से शिशिर ऋतु के दो महीनों को उस का रक्षक नियुक्त किया और आकाश तथा सूर्य को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१६-१७) शैशिरावेनं मासावूर्ध्वाया दिशो गोपायतो द्यौश्चादित्यश्चानु तिष्ठतो य एवं वेद.. (१८) जो इस बात को जानता है. वह ऊपर की दिशा की ओर से शिशिर ऋतु के दो महीनों के द्वारा रक्षित होता है. आकाश तथा सूर्य उस के अनुकूल हो जाते हैं. (१८) सूक्त-५ देवता—रुद्र तस्मै प्राच्या दिशो अन्तर्देशाद् भवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

देवताओं ने पूर्व दिशा के कोने से उस की रक्षा के लिए धनुष धारण करने वाले भव अर्थात् महादेव को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (१) भव एनमिष्वासः प्राच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति. नैनं शर्वो न भवो नेशानः.. (२) जो इस बात को जानता है, धनुष धारण करने वाले भव अर्थात् महादेव, शर्व, ईशान उस के अनुकूल रहते हैं. (२) नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (३) जो इसे जानता है, उस के अनुकूल रहने वाले पुरुषों और पशुओं की वे हिंसा नहीं करते. (३) तस्मै दक्षिणाया दिशो अन्तर्देशाच्छर्वमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (४) देवताओं ने दक्षिण दिशा की ओर से बाण चलाने वाले शर्व अर्थात् शिव को उस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (४) शर्व एनमिष्वासो दक्षिणाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति. नैनं शर्वो न भवो नेशानः नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (५) जो इस बात को जानता है, दक्षिण दिशा के कोण से शर्व, भव और ईशान उस के अनुकूल रहते हैं. जो पुरुष और पशु उस के अनुकूल होते हैं. शर्व उन की हिंसा नहीं करते. (५) तस्मै प्रतीच्या दिशो अन्तर्देशात् पशुपतिमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (६) देवताओं ने पश्चिम दिशा के कोने से बाण फेंकने वाले पशुपति को उस का अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (६) पशुपतिरेनमिष्वासः प्रतीच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति. नैनं शर्वो न भवो नेशानः. नास्य पशून् समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (७) जो इस बात को जानता है, पशुपति पश्चिम दिशा के कोने से उस के अनुकूल रहते हैं. जो पुरुष और पशु उस के अनुकूल होते हैं, पशुपति उन की हिंसा नहीं करते हैं. (७) तस्मा उदीच्या दिशो अन्तर्देशादुग्रं देवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (८)

देवों ने पश्चिम दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले पशुपति को इस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (८) उग्र एनं देव इष्वास उदीच्या दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति नैनं शर्वो न भवो नेशानः. नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (९) देवों ने उत्तर दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले उग्रदेव को इस का अनुष्ठान करने वाला बनाया. (९) तस्मै ध्रुवाया दिशो अन्तर्देशाद् रुद्रमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१०) जो इस बात को जानता है, धनुष धारण करने वाले उग्रदेव उत्तर दिशा के कोने से इस के पक्ष में रहते हैं, शर्व, भव और ईशान उसे हानि नहीं पहुंचाते. जो पुरुष और पशु इस के अनुकूल होते हैं, उग्रदेव उन की हिंसा नहीं करते. (१०) रुद्र एनमिष्वासो ध्रुवाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति नैनं शर्वो न भवो नेशानः नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (११) ध्रुव दिशा के कोने से देवों ने धनुष धारण करने वाले रुद्र को इस का अनुष्ठान करने वाला बनाया है. (११) तस्मा ऊर्ध्वाया दिशो अन्तर्देशान्महादेवमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१२) बाण धारण करने वाले रुद्र ध्रुव दिशा में इस की रक्षा करते हैं. जो इस बात को जानता है, शर्व, भव और ईशान उसे हानि नहीं पहुंचाते. जो मनुष्य और पशु इस के अनुकूल होते हैं. रुद्र उन की हिंसा नहीं करते. (१२) महादेव एनमिष्वास ऊर्ध्वाया दिशो अन्तर्देशादनुष्ठातानु तिष्ठति. नैनं शर्वो न भवो नेशानः. नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (१३) देवताओं ने ऊपर की दिशा के कोने से धनुष धारण करने वाले महादेव को तेरा अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. जो इस बात को जानता है, महादेव ऊपर की दिशा के कोने से उस की रक्षा करते हैं. जो पुरुष और पशु इस के अनुकूल होते हैं, उन की महादेव हिंसा नहीं करते हैं. (१३) तस्मै सर्वेभ्यो अन्तर्देशेभ्य ईशानमिष्वासमनुष्ठातारमकुर्वन्.. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*

देवताओं ने उस की सभी दिशाओं के कोनों से रक्षा करने के लिए धनुष धारण करने वाले ईशान को अनुष्ठान करने वाला नियुक्त किया. (१४) ईशान एनमिष्वासः सर्वेभ्यो अन्तर्देशेभ्यो ऽ नुष्ठातानु तिष्ठति नैनं शर्वो न भवो नेशानः.. (१५) नास्य पशून् न समानान् हिनस्ति य एवं वेद.. (१६) जो इस बात को जानता है, ईशान उस की सभी दिशाओं के कोनों से रक्षा करते हैं. जो पुरुष एवं पशु उस के अनुकूल होते हैं, ईशान भव और शर्व उन की हिंसा नहीं करते. (१५-१६) सूक्त-६ देवता—अध्यात्म, व्रात्य स ध्रुवां दिशमनु व्यचलत्.. (१) वह व्रात्य ध्रुव दिशा की ओर चल पड़ा. (१) तं भूमिश्चाग्निश्चौषधयश्च वनस्पतयश्च वानस्पत्याश्च वीरुधश्चानुव्य चलन्.. (२) पृथ्वी, अग्नि, ओषधि, वनस्पति तथा ओषधियां उस के पीछे चले. (२) भूमेरश्च वै सो ३ ग्नेश्चौषधीनां च वनस्पतीनां च वानस्पत्यानां च वीरुधां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (३) जो इस बात को जानता है, वह पृथ्वी, अग्नि, ओषधि एवं वनस्पतियों का प्रिय होता है. (३) स ऊर्ध्वां दिशमनु व्यचलत्.. (४) वह ऊपर की दिशा की ओर चला. (४) तमृतं च सत्यं च सूर्यश्च चन्द्रश्च नक्षत्राणि चानुव्यचलन्.. (५) ऋतु, सत्य, सूर्य, चंद्र और नक्षत्र उस के पीछे चले. (५) ऋतस्य च वै स सत्यस्य च सूर्यस्य च चन्द्रस्य च नक्षत्राणां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (६) जो इस बात को जानता है वह सूर्य, चंद्रमा तथा नक्षत्र का प्रिय स्थान होता है. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

स उत्तमां दिशमनु व्यचलत्.. (७) वह उत्तर दिशा की ओर चला. (७) तमृचश्च सामानि च यजूंषि च ब्रह्म चानुव्यचलन्.. (८) साम, यजु, ऋचाएं और ब्रह्म उस के पीछे चले. (८) ऋचां च वै स साम्नां च यजुषां च ब्रह्मणश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (९) जो इस बात को जानता है, वह साम, यजु, ऋचा और ब्रह्म का प्रिय धाम होता है. (९) स बृहतीं दिशमनु व्यचलत्.. (१०) उस ने बृहती दिशा में गमन किया. (१०) तमितिहासश्च पुराणं च गाथाश्च नाराशंसीश्चानुव्य चलन्.. (११) पुराण, इतिहास तथा मनुष्यों की प्रशंसात्मक गाथाएं उस के पीछेपीछे चलीं. (११) इतिहासस्य च वै स पुराणस्य च गाथानां च नाराशंसीनां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (१२) इस बात को जो जानता है, वह पुराण, इतिहास तथा गाथाओं का प्रिय धाम बनता है. (१२) स परमां दिशमनु व्यचलत्.. (१३) उस ने परम दिशा की ओर प्रस्थान किया. (१३) तमाहवनीयश्च गार्हपत्यश्च दक्षिणाग्निश्च यज्ञश्च यजमानश्च पशवश्चानुव्य चलन्.. (१४) आहवनीय, गार्हपत्य तथा दक्षिण अग्नियां उस के पीछेपीछे चलीं. (१४) आहवनीयस्य च वै स गार्हपत्यस्य च दक्षिणाग्नेश्च यज्ञस्य च यजमानस्य च पशूनां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (१५) जो इस बात को जानता है, आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिण नाम की अग्नियों का वह प्रिय धाम बनता है. (१५) सो ऽ नादिष्टां दिशमनु व्यचलत्.. (१६) ebook converter DEMO Watermarks*

वह अनादिष्ट दिशा की ओर चल पड़ा. (१६) तमृतवश्चार्तवाश्च लोकाश्च लौक्याश्च मासाश्चार्धमासाश्चाहोरात्रे चानुव्य चलन्.. (१७) ऋतुएं, पदार्थ, लोक, मास, पक्ष, दिवस और रात्रि उस के पीछेपीछे चलने लगे. (१७) ऋतूनां च वै स आर्तवानां च लोकानां च लौक्यानां च मासानां चार्धमासानां चाहोरात्रयोश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (१८) जो इस बात को जानता है, वह पुरुष ऋतुओं, पदार्थों, लोक, मासों, पक्षों, दिवसों और रात्रियों का प्रिय धाम बनता है. (१८) सो ऽ नावॄत्तां दिशमनु व्यचलत् ततो नावत्स्यैन्नमन्यत.. (१९) वह अनावृत दिशा की ओर चला. (१९) तं दितिश्चादितिश्चेडा चेन्द्राणी चानुव्यचलन्.. (२०) इडा, इंद्राणी, दिति और अदिति उस के पीछेपीछे चलीं. (२०) दितेश्च वै सो ऽ दितेश्चेडायाश्चेन्द्राण्याश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (२१) जो इस बात को जानता है. वह पुरुष इडा, इंद्राणी, दिति और अदिति का प्रिय धाम बनता है. (२१) स दिशो ऽ नु व्य चलत् तं विराडनु व्यचलत् सर्वे च देवाः सर्वाश्च देवताः.. (२२) उस ने दिशाओं की ओर गमन किया. विराट्, अदिति देव और देवता उस के पीछेपीछे चलने लगे. (२२) विराजश्च वै स सर्वेषां च देवानां सर्वासां च देवतानां. प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (२३) जो इस बात को जानता है, वह विराट और सभी देवों का प्रिय धाम होता है. (२३) स सर्वानन्तर्देशाननु व्यचलत्.. (२४) वह सभी अंतर्दिशाओं की ओर चला. (२४) तं प्रजापतिश्च परमेष्ठी च पिता च पितामहश्चानुव्यचलन्.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-७ देवता—अध्यात्म, व्रात्य

प्रजापति, परमेष्ठी पिता और पितामह उस के पीछे चले. (२५) प्रजापतेश्च वै स परमेष्ठिनश्च पितुश्च पितामहस्य च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (२६) जो पुरुष इस बात को जानता है, वह प्रजापति, परमेष्ठी, पिता और पितामह का प्रिय धाम होता है. (२६) सूक्त-७ देवता—अध्यात्म, व्रात्य स महिमा सद्भूत्वान्तं पृथिव्या अगच्छत् स समुद्रो ऽ भवत्.. (१) वह बड़ा समर्थ और गतिशाली हो कर पृथ्वी के अंत तक गया है और वह सागर बन गया. (१) तं प्रजापतिश्च परमेष्ठी च पिता च पितामहश्चापश्च श्रद्धा च वर्षं भूत्वानुव्य वर्तयन्त.. (२) उस के साथ प्रजापति, परमेष्ठी, पिता, पितामह श्रद्धा और वृष्टि हो कर रहने लगे. (२) ऐनमापो गच्छन्त्यैनं श्रद्धा गच्छन्त्यैनं वर्षं गच्छति य एवं वेद.. (३) जो इस बात को जानता है, जल उसे प्राप्त होते हैं. उसे श्रद्धा और वर्षा प्राप्त होती है. (३) तं श्रद्धा च यज्ञश्च लोकश्चान्नं चान्नाद्यं च भूत्वाभिपर्यावर्तन्त.. (४) श्रद्धा, यज्ञ, लोक अन्न और खानपान उस के चारों ओर रहने लगे. (४) ऐनं श्रद्धा गच्छत्यैनं यज्ञो गच्छत्यैनं लोको गच्छत्यैनमन्नं गच्छत्यैनमन्नाद्यं गच्छति य एवं वेद.. (५) जो यह जानता है, उसे श्रद्धा प्राप्त होती है, उसे लोक प्राप्त होते हैं. उस को अन्न प्राप्त होता है और उस को खानपान प्राप्त होता है. (५) सूक्त-८ देवता—अध्यात्म, व्रात्य सो ऽ रज्यत ततो राजन्यो ऽ जायत.. (१) वह अनुरक्त हुआ. उस के बाद वह राजा बन गया. (१) स विशः सबन्धूनन्नमन्नाद्यमभ्युदतिष्ठत्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-९ देवता—अध्यात्म, व्रात्य

वह प्रजाओं के, बंधुओं के अन्न के और खानपान के अनुकूल व्यवहार करने लगा. (२) विशां च वै स सबन्धूनां चान्नस्य चान्नाद्यस्य च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (३) जो पुरुष इस प्रकार जानता है, वह प्रजाओं, अन्नों और खानपान का प्रिय धाम होता है. (३) सूक्त-९ देवता—अध्यात्म, व्रात्य स विशो ऽ नु व्य चलत्.. (१) उस ने प्रजाओं के अनुकूल व्यवहार किया. (१) तं सभा च समितिश्च सेना च सुरा चानुव्यचलन्.. (२) इस से समिति, सभा, सेना और सुख उस के अनुकूल हुए. (२) सभायाश्च वै स समितेश्च सेनायाश्च सुरायाश्च प्रियं धाम भवति य एवं वेद.. (३) इस बात को जानने वाला सभा, समिति, सेनाओं की सुरानुकूलता प्राप्त करता है. (३) सूक्त-१० देवता—अध्यात्म, व्रात्य तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो राज्ञो ऽ तिथिर्गृहानागच्छेत्.. (१) श्रेयांसमेनमात्मनो मानयेत् तथा क्षत्राय ना वृश्चते तथा राष्ट्राय ना वृश्चते.. (२) ऐसा विशेष ज्ञानी व्रात्य जिस राजा का अतिथि हो, राजा उस का सम्मान करे. ऐसा करने से व्रात्य राष्ट्र को तथा क्षत्र शक्ति को नष्ट नहीं करता. (१-२) अतो वै ब्रह्म च क्षत्रं चोदतिष्ठतां ते अब्रूतां कं प्र विशावेति.. (३) इस के बाद ब्रह्म बल और क्षात्र शक्ति को हम किस में प्रवेश करें. (३) अतो वै बृहस्पतिमेव ब्रह्म प्रा विशत्विन्द्रं क्षत्रं तथा वा इति.. (४) ब्रह्मबल बृहस्पति में और क्षात्र बल इंद्र में प्रवेश करे. (४) अतो वै बृहस्पतिमेव ब्रह्म प्राविशदिन्द्रं क्षत्रम्.. (५)

तब ब्रह्म बल बृहस्पति में और क्षात्र बल इंद्र में प्रविष्ट हुए. (५) इयं वा उ पृथिवी बृहस्पतिर्द्यौरिवेन्द्रः.. (६) आकाश ही इंद्र है और पृथ्वी ही बृहस्पति है. (६) अयं वा उ अग्निर्ब्रह्मासावादित्यः क्षत्रम्.. (७) आदित्य क्षत्र बल है और अग्नि ब्रह्म बल है. (७) ऐनं ब्रह्म गच्छति ब्रह्मवर्चसी भवति.. (८) यः पृथिवीं बृहस्पतिमग्निं ब्रह्म वेद.. (९) जो पृथ्वी, बृहस्पति और अग्नि को ब्रह्म जानता है, वह ब्रह्म बल और ब्रह्मवर्चस को प्राप्त करता है. (८-९) ऐनमिन्द्रियं गच्छतीन्द्रियवान् भवति.. (१०) य आदित्यं क्षत्रं दिवमिन्द्रं वेद.. (११) जो आदित्य को क्षत्र और द्युलोक को इंद्र जानता है, उसे इंद्रियां प्राप्त होती हैं. (१०-११) सूक्त-११ देवता—अध्यात्म, व्रात्य तद् यस्यैवं विद्वान् व्रात्यो ऽ तिथिर्गृहानागच्छेत्.. (१) स्वयमेनमभ्युदेत्य ब्रूयाद् व्रात्य क्वा ऽ वात्सीर्व्रात्योदकं व्रात्य तर्पयन्तु व्रात्य यथा ते प्रियं तथास्तु व्रात्य यथा ते वशस्तथास्तु व्रात्य यथा ते निकामस्तथास्त्विति.. (२) इस प्रकार का विशेष ज्ञानी व्रात्य जिस घर में अतिथि हो, उसे स्वयं आसन दे कर कहे —हे व्रात्य! तुम कहां निवास करते हो? यह जल है. हमारे घर के व्यक्ति तुम्हें संतुष्ट करें. तुम्हें जो प्रिय हो, जैसा तुम्हारा वश हो और जैसा तुम्हारा काम हो उसी प्रकार का रहे. (१-२) यदेनमाह व्रात्य क्वा ऽ वात्सीरिति पथ एव तेन देवयानानव रुन्ध्धे.. (३) यह कहने पर कि हे व्रात्य! तुम कहां रहोगे? देवयान मार्ग ही खुल जाता है. (३) यदेनमाह व्रात्योदकमित्यप एव तेनाव रुन्ध्धे.. (४) व्रात्य से यह कहने वाला कि हे व्रात्य! यह जल है, अपने लिए जल को ही खोल लेता ebook converter DEMO Watermarks*