आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
वायोविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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वातपित्तश्लेष्माओं का लोकगत अधिष्ठान.
षड्रसवादी वातपित्तश्लेष्माओं का संबंध लोकगत वायु, सूर्य और सोम ( चंद्र ) के साथ मस्थापित करते थे । क्योंकि इनके वर्ष, ऋण, शीत लक्षण जागतिक प्रभावों का और वातपित्तश्लेष्माओं के चय, प्रकोप, प्रक्षमों का घनिष्ठ संबंध अच्छी तरह सिद्ध हो चुका था । इस विषय में किसी को कुछ भी शंका नहीं थी । पर प्रत्येक संप्रदाय, अपने २ स्मृतिविज्ञान के अनुसार उक्त लोकगत ' विभूतियों ' का भी समन्वय मूलभूत द्रव्यों, गुणों अथवा धर्मों में करता था और तदनुसार वातपित्तश्लेष्माओं को भी द्रव्य, गुण, अथवा धर्म कहता था ।
धातुपंचकवादी भारद्वाज, जिस तरह शरीरगत धातु प्रसाद, ओज, तेज इन सचेतन द्रव्यों का शरीरगत अचेतन धातुपंचक में विशेषतः वायु, अग्नि, उदकों में समन्वय करते थे ( जैसा कि अष्टांगसंग्रहोक्त " वाण्वाकाशाभ्यां धातुः, आग्नेयं पित्तम्, अंबुषुषिबीभ्यां श्लेष्मा " और सौश्रुतिक "वायु-रात्मनैवात्मा, आग्नेयं पित्तम्, श्लेष्मा सोम्य इति" इन विधानों पर से सिद्ध होता है ) उसी तरह वायु, सूर्य, चंद्र इन जागतिक विभूतियों का भी धातुपंचक में समन्वय करते थे । सारांश उनकी दृष्टि में वातपित्तश्लेष्माओं का और वायु सूर्य चंद्र का अंतिम समन्वय धातुपंचक में होता था । इस
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आयुर्वेद-दर्शन
धातु पंचक को वे ' अभूत ' द्रव्य कहते थे अतः वे वातपित्त- श्लेष्माओं को भी ' द्रव्य ' कहते थे ।
पञ्चधातुवादी, भारद्वाज के उक्त समन्वय को ही स्वीकार करते थे । पर उनकी दृष्टि में आकाशादिक, ' भूत ' एवं चेतनाधातु के ' गुण ' होने के कारण वातपित्तश्लेष्मा भी तत्त्वतः ' गुण ' ही थे ।
किंतु अग्नीषोम लोकपक्षियों की दृष्टि में जिघर-नृधर देवताओं का साम्राज्य था । अतः वे वातपित्तश्लेष्माओं का विश्वगत प्रधान धर्मों में समन्वय करते थे । इस विषय में सर्व प्रथम अग्नीषोमवादियों के कथन को जानना परम आवश्यक है ।
अग्नीषोमवाद.
अग्नीषोमवादी, समस्त विश्व की तह में अग्नि और सोम संहक धर्मों का अस्तित्व प्रतिपादन करते थे । उनके सिद्धांत के अनुसार वे मधुरादि पडास्वादों का, ( अग्नीषोमी- यत्वाज्जगतो रसा द्विविधाः सौम्या अग्नेयाश्च ) गुणप्रसादाख्य वर्ग का अथवा विशिष्ट गुणों का, ( वीर्यं द्विविधमुष्णं शीतं च अग्नीषोमीयत्वाज्जगतः ) तेज व ओज संहक पदार्थों का, ( तेजोऽप्याग्नेयम्, ओजः सोमात्मकम् ) शुक्रार्तवों का, ( सौम्यंशुक्रमार्तवमाग्नेयम् ) पित्तश्लेष्माओं का, ( आग्ने-
ज्ञानोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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यं पित्तम्, श्लेष्मा सौम्यः) और आदान विसर्गात्मक ऋतुप्रभावों का अर्थात् काल का भी ( 'आदानमाग्नेयम्, विसर्गः सौम्यः' तथा ' अन्ये तु गुर्वादीनामग्नीषोमात्मकत्वादादानविसर्गविभागेन कालस्य च उष्णशीतात्मकत्वात् • द्विविधमेवामनन्ति ' ) समन्वय अग्नीषोम संज्ञक धर्मद्वय में करते थे । उनका यह बक्तव्य प्रसिद्ध है कि:—
नानात्मकमपि द्रव्यमग्नीषोमौ महाबलौ ।
व्यक्ताव्यक्तं जगदिव नातिक्रामति जातुचित् ॥ (अ. सं.)
अर्थात् समस्त द्रव्य समुदाय, नानात्मक ( आकाशादि पंचधात्वात्मक ) और अनेक रूपात्मक होते हुए भी अग्नीषोम संज्ञक महान् धर्मों के अतिरिक्त नहीं है जैसाकि समस्त जगत ' व्यक्त ' और ' अव्यक्त ' इन दो अवस्थाओं के अतिरिक्त नहीं है । सारांश अग्नीषोम धर्मों की भिन्न २ मात्राओं के संयुक्त परिणाम स्वरूप ही आकाशादि द्रव्य हैं ।
अग्नीषोमवादी पित्तश्लेष्माओं का आदानविसर्गों में, आदानविसर्गों का सूर्यचंद्र में और सूर्यचंद्रों का अग्नीषोम में समन्वय करते ही थे । वायु के विषय में यद्यपि उनका स्पष्ट कथन उपलब्ध नहीं होता तथापि यह अनुमान करना अनुचित नहीं होगा कि देहगत व लोकगत वायु को वे अग्नीषोमात्मक ही कहते होंगे ।
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अग्नीषोमवाद् का उक्त स्वरूप ध्यान में रखकर ही अग्नीषोमलोकपक्षियों के कथन का विचार करना होगा। कालवादी, यद्यपि अग्नीषोम संज्ञक धर्मद्वयों का अस्तित्व स्वीकार करते थे तथापि उनका यह कथन था कि ‘अग्नीषोम संज्ञक धर्मों के भी तह में ‘काल’ संज्ञक महती गति का अस्तित्व है’। त्रिधातुसिद्धांतवादी भी अग्नीषोम का अस्तित्व स्वीकार करते थे पर उनको अग्नीषोमवादियों का ‘वायु’ विषयक औदासिन्य मान्य नहीं था।
त्रिधातुसिद्धांतवादियों का ‘वायु’ शब्द धर्म बोधक (भी) है। धातुपंचकवादी जिस ‘वायु’ संज्ञक ‘द्रव्य’ को धातुप्रसादगत ‘करणवृत्ति’ रूप चेष्टाओं का जनक मानते थे उस प्राणद्रव्य के भी तह में इनको ‘वायु धर्म’ का अस्तित्व प्रतीत हो रहा था। इस धर्म की प्रतीति अन्यत्र भी होगई थी जैसा कि ‘हृन्मांस’ गत ‘प्रस्पंदन’। (इस धर्म को ओजगत धर्म भी कहा गया है) इस धर्म को वे अग्नीषोम से भी अधिक महत्वपूर्ण मानते थे। और इस-करणवृत्ति रूप वायु धर्म को ही भिन्न २ व्यापारानुसार प्राण, उदान, समान, व्याप्त, अपान कहते थे। लोक में इस वायु-धर्म का संबंध ‘काल’ संज्ञक महान् धर्म के साथ किया जाने लगा था। सरांश त्रिधातुसिद्धांतवादी, वंशांकुर-गत वातपित्तश्लेष्माओं का संबंध देहलोकगत वायु, अग्नि,
चाथोंविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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सोम, संज्ञक धर्मों के साथ प्रस्थापित करते थे। अर्थात् त्रिधातुवादियों की दृष्टि से वातपित्तश्लेष्मा तत्त्वतः ‘धर्म’ हैं।
इतिहास-प्रसिद्ध ‘वातकलाकलीय’ परिषद् इस त्रिधातु-सिद्धांत को प्रस्थापित करने के लिये ही हुई। अतः अब उस पर भी विचार करें।
वातकला कलीय परिषद्
इस परिषद् में सर्व प्रथम सांङ्कलायन कुश ने कहा कि:— ‘रूक्षलघुशीतदारुणखरविषदाः षड्मे वातगुणाभवंति’। इस पर कुमारशिरा भरद्वाज ने कहा कि:— ‘सत्त्रैरेवैगुणैरेवं द्रव्यैरेवंप्रभावेच्छ कर्माभिरभ्यस्यमानैर्वायुः प्रकोपमापद्यते, समानगुणाभ्यासो हि धातूनांवृद्धिकारणम्’। इस पर वाल्ही-कभिषक् कांकायन ने कहा कि ‘अतोविपरीतानि वातस्य प्रशमनानि भवंति, प्रकोपनविपर्ययो हि धातूनां प्रशमकारणम्’। इस पर धामार्गेव बडिस ने कहा कि ‘वातप्रकोपनानि खलु रूक्षलघुशीतदारुणखरविषदसुक्षिरकराणि शरीराणां, तथाविधेषु शरीरेषु वायुराश्रयं गत्वा आप्वायमानः प्रकोप-मापद्यते। वातप्रशमनानि पुनः स्तिग्धगुरुष्णश्चक्षुमृदु पिच्छलघनकराणि शरीराणां, तथा विधेषु शरीरेषु वायुरासञ्जयमानश्चरन् प्रज्ञांतिमापद्यते’। इन ऋषित्रयों के वक्तव्य में ध्यान रखने योग्य बातें यह हैं कि:— इसमें गुर्वादि विशलि गुणों के आधार पर वातपित्तश्लेष्माओं के
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लक्षण, प्रकोप और प्रक्षम का विधान किया है। ' तथा-विधेयुं शरीरेषु ' से ' धातुप्रकृति ' का निर्देश किया है। इस पर से यह ज्ञात होता है कि इस समय के पूर्व ही वात-पित्तकफप्रकृतियों की ज्ञान हो चुका था। ' सुषिर ' गुण का उल्लेख करना यह भी सिद्ध करता है कि त्रिधातुसिद्धांत के समर्थक, आकाश का वायु में अंतर्भाव करते थे।
इसके बाद राजर्षिवायोंविद् ने कहा कि:—एवमेतत्सर्वमनपवादं यथा भगवान् आह। यानि तु खलु वायोः कृपितऽकृपितस्य शरीराशरीरचरस्य च शरीरेषु चरतः कर्माणि वहिःशरीरेभ्यो वा भवन्ति तेषामवयवान् प्रत्यक्षानुमानोपमानैः साधयित्वा नमस्कृत्य वायवे यथाशक्ति प्रवक्ष्यामः। “ वायुस्तत्र-यंत्रधरः, प्राणोदानसमानव्यानापानात्मा, प्रवर्तकश्चैष्टाद्युष्मावचानां, नियंता प्रणेता च मनसः, सर्वेन्द्रियाणामुद्योजकः, सर्वेन्द्रियाथीनामगिबोढा, सर्वशरीरधातुव्यूहकरः, संधानकरः शरीरस्य, प्रवर्तकोवाचः, प्रकृतिः स्पर्शशब्दयोः, श्रोत्रस्पर्शनयोर्मूलम्, हर्षोत्साहयोर्योनिः, समीरणोऽग्नेः, दोषसंशोधनः, क्षेमा बहिर्मलानां, स्थूलाणुलोतसां भेत्ता, कर्ता गर्भांकृतीनां, आयुषोऽनुवृत्तिं प्रत्ययभूतो भवत्यकृपितः। कृपितस्तु खलु शरीरे शरीरं नानाविधैर्विकारैरुपतपति बलवर्णसुखायुषासुपधाताय, मनोव्याहर्षयति, सर्वेन्द्रियाण्युपहति, विनिर्हति गर्भान्, विकृति-मापादयति, अतिकालं धारयति, भयशोकमोहदैन्यातिप्रछापान् जनयति, प्राणांश्चोपरुणाधि ।
वायोविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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प्रकृतिभूतस्य खल्वस्य लोके चरतः कर्माणीमानि भवति । तद्यथा धरणी धारणं, ज्वलनोज्वालनम्, आदित्य-चन्द्रनक्षत्रग्रहगणानां संतानगतिविधानम्, सृष्टिश्च भेदानाम्, अपाविसर्गः, प्रवर्तनं स्रोतसम्, पुष्पफलानां चाभि-निर्वर्तनम्, उद्भेदनं चैन्द्रिदानाम्, कृतूनां प्रविभागः प्रविभागो धातूनाम्, धातुमानसंस्थानव्यक्तिः, बीजाभिसंस्कारः शस्यभिर्वर्द्धनमधिक्रिदोपशेषणे, अवैकारिकविकाराश्रयेति ।
प्रकृपितस्य खल्वस्य लोके चरतः कर्माणीमानि भवति । तद्यथा—शिखरि शिखरावमंथनम्, उन्मथनमनोकहानाम्, सागराणाम्, उद्भेदनं सरसाम्, प्रतिसरणमापगानाम्, उत्पीडनं आकंपनं च भूमेः, आधमनमंनुदानाम्, नीहारनिर्हीर्दपांशु-सिकतामस्त्यभेकरगक्षाररूधिराश्माशनिविसर्गः, भावानां चाभावकरणम्, चतुर्गुणांतकराणां भेद्यसूर्यानलानिलानां विसर्गः ।
आगे कांकायन के प्रजापति वाद में वायु के वैदिक विवेचन के साथ साथ इन अंशों का भी तौलनिक दृष्ट्या विवेचन होगा । सारांशः—
सहि भगवान्, प्रभवश्च अन्ययश्च भूतानाम् भावा-भावकरः, सुखासुखयोर्विधाता, मृत्युः, यमः, नियंता, प्रजापतिः, अदीतिः, विश्वकर्मा, विश्वरूपः, सर्वगः,
बार्योविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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प्रकृतिभूताः पुरुषमन्यापत्रेन्द्रियं बलवर्णसुलोपपन्नमायुषा महता उपपादयति, सन्ध्यगेवाऽऽचरिता धर्मार्यकांसा इव निःश्रेयसेन महता पुरुषमिहचामुष्मिन्न लोके, विकृतास्त्वेन महता विपर्य- येणोपपादयति ऋतवःक्षय इव विकृतिमापन्ना लोकमशुभेनो- पधातकाल इति ।
इस पर से यह बिलकुल स्पष्ट है कि इस परिपद में भारद्वाज को छोड़कर अन्य सब ऋषि, पंचात्मक लोकपक्षीय नहीं थे अपितु द्विधात्मक लोकपक्ष को त्रिधात्मक बनाने वाले थे । इसमें वातपित्तश्लेष्माओं के तात्विक स्वरूप पर विचार हुआ और उनका संबंध वायुअग्निसेमसंज्ञक जागतिक धर्मों के साथ प्रस्थापित किया गया । ये समस्त ऋषि गुर्विदि गुणों को प्रधान माननेवाले थे । इनमें कांकायन और पुनर्वसु आत्रेय आत्मा को स्वतःसिद्ध कहते थे और शेष सब ऋषि आत्मा और सत्व को रसज अथवा त्रिधातुज मानते थे । पुनर्वसु आत्रेय को (और कांकायन को भी) त्रिधात्वात्मक सिद्धांत यद्यपि स्वीकृत था तथापि सर्वांश में वे उससे सहमत नहीं थे । क्योंकि इसमें आत्मा या प्रजापति का स्वतः सिद्ध अस्तित्व नहीं माना जाता था, अतः उन्होंने अन्यत्रैकान्तिक 'वचनात्' कहकर अपने मत को सुरक्षित रक्खा ।
कुछ लोग दो बार्योविदों की कल्पना करते हैं पर वह कल्पना ही है । आगे चलकर हम देखेंगे कि इस त्रिधातु-
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आयुर्वेद-दर्शन
सिद्धांत का प्रजापतिवाद में और उसका भी पुनर्वसु आत्रेय के त्रिभागात्मक सिद्धांत में किस प्रकार समन्वय हुआ। अस्तु।
शारीरधातुओं का तीसरा वर्गीकरण प्रायः लक्षणस्कंध से संबंध रखता है। इसका अस्पष्ट आरंभ यद्यपि ‘वातादीनां रसादीनां मलानामोजसस्तथा’ (च. सू. अ. १७) इसमें दिखाई देता है तथापि उसका संशोधित रूप ‘दोष, धातु, मल, मूलं हि शरीरम्’ (सु. सू. अ. १५) इसीमें व्यक्त हुआ है। इसमें शारीरधातुओं के दोष, धातु और मल संज्ञक तीन प्रधान विभाग किये हैं।
हिरण्याक्ष कुशिक और षड्धातु वाद
वायोंविद के बाद हिरण्याक्ष ने कहा किः—
हिरण्याक्षस्तुनेत्याह नक्षात्मा रसजस्मृतः । नार्ताद्रियं मनः संति रोगाः शब्दादिजास्तथा ॥
अर्थात् रस को पुरुषरोगोत्पादक कहना उचित नहीं है । क्योंकि आत्मा, रसज नहीं है; अर्ताद्रिय मन, रसज नहीं है और शब्दादि अर्थों के हीनमिथ्यातियोग से पैदा होने वाले रोग भी रसज नहीं हैं ।
वायोंविद आत्मा को रसज कहते थे । वायोंविद को शब्दादि अर्थों के हीनमिथ्यातियोग से रोगों का पैदा होना यद्यपि मान्य था तथापि उनका यह कथन था कि शब्दादि जन्म रोगों कि वह में सत्त्ववादी जिस सत्त्व को कारण मानते हैं वह सत्त्व भी जब कि रस से ही पैदा होता है तब रस ही इनका कारण है । हिरण्याक्ष ने वायोंविद के इन विधानों का ही प्रतिवाद किया है । प्रतिवाद के पश्चात् अब स्वकीय मत कहते हैं किः—
षड्धातुजस्तु पुरुषो रोगाः षड्धातुजास्तथा । राशिः षड्धातुजः सांख्यैराद्यैः सम्पारिकीर्तितः ॥
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आयुर्वेद-दर्शन
अर्थात् पुरुष, षड्धातुओं से पैदा होता है और रोग भी षड्धातुओं से पैदा होते हैं। आद्यसारंख्यों ने भी (सारंख्यों में इनको ‘आद्यसारंख्य’ कहा जाता था) हेतुज पुरुष को षड्धातुओं का समुदाय ही कहा है।
यज्ञःपुरुषीय परिषद् में हिरण्याक्ष यद्यपि वार्योंविद् के रसवाद का प्रतिवाद करते हुए दिखाई देते हैं तथापि ये मुख्यतः भारद्वाज के धातुपंचकवाद के प्रतिस्पर्धी हैं।
हम यहां यह कहने का साहस करते हैं कि हिरण्याक्ष जिस षड्धातुवाद का समर्थन करते हैं उसका अभ्युत्थान भी ऐतिहासिक दृष्ट्या धातुपंचकवाद में से ही हुआ होगा।
धातुपंचकवाद में आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी इनको ‘अभूत’ और समस्त अचेतन सचेतन जगत् के ‘धारक’ कहा जाता था। और चेतना को इनका ही परिणाम माना जाता था। फलतः गर्भोत्पत्ति के विषय में भारद्वाज का यह कथन था किः—
गर्भस्तु खलु अंतरिक्षवाण्वगितोयभूमिविकारश्चेतनाधिष्ठान भूतः। (च. शा. अ. ४) अर्थात् गर्भ आकाशादि धातुपंचक का विकार होकर चेतना का अधिष्ठान है।
किंतु जिनको यह ज्ञात हो गया था कि चेतनाधातु ही स्वतः सिद्ध है और आकाशादिक ‘भूत’ अर्थात् पैदा हुए
हिरण्यगक्ष कुशिक और षड्धातु वाद
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हैं वे गर्भ को, शरीर को, अथवा धातुपंचक को चेतना का अधिष्ठान कहना स्वीकार नहीं करते थे अपितु चेतनाधातु को ही उनका सबका अधिष्ठान कहते थे। अतः उनका यह कथन था कि:—
एवम् अनया एव युक्त्या पंचमहाभूतविकारसमुदाया- त्मको गर्भः। चेतना तु अधिष्ठान भूतः। स हि अस्य षष्ठो- धातुरुक्तः। ( च. शा. अ. ४ ) अर्थात् इस युक्ति स इतना ही सिद्ध होता है कि “ गर्भ, पंचमहाभूतों के विकारों का समुदाय ” है और यह मान्य भी है। पर वह चेतना का अधिष्ठान नहीं है बल्कि चेतना ही उसका अधिष्ठान है। क्योंकि गर्भ के जिस तरह उक्त पांच धातु हैं उसी तरह चेतना भी उसका छठा धातु है।
षड्धातुवादियों का यह सामान्य सिद्धांत है कि:—
खादयश्चेतना षष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः।
चेतनाधातुरन्येकः स्मृतः पुरुष संज्ञकः॥ ( च. शा. )
अर्थात् आकाशादि पांच और चेतना इन छः धातुओं के समुदाय को पुरुष कहते हैं। और अकेला चेतनाधातु भी ‘ पुरुष ’ संज्ञक है। तहां चेतनाधातु-पुरुष के विषय में इनका यह कथन है कि:—
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आयुर्वेद-दर्शन
सहि हेतुः कारणं निमित्तमक्षरं कर्ता संता वेदिता बोद्धा द्रष्टा धाता ब्रह्मा विश्वकर्मा विश्वरूपः पुरुषः प्रभवोऽन्ययो नित्यो गुणी ग्रहणं प्राधान्यमन्यत्वं जीवो ज्ञः प्रकृतल्लेखतानावात् विमुभूतात्माचंद्रियात्माचांतरात्माचेति । ( च. शा. अ. ४ )
इस में कतिपय विशेषणों का स्पष्टीकरण आत्मवाद के विवेचन में किया गया है। धाता, ब्रह्मा, विश्वकर्मा, विश्वरूप इत्यादि विशेषण विराट् पुरुष के अथवा लोकाभिमानी पुरुष के उपलक्ष्य में हैं। और भूतात्मा, इंद्रियात्मा, क्षेत्रज्ञ, जीवात्मा इत्यादि विशेषण देहाभिमानी पुरुष के उपलक्ष्य में हैं। तहां भूतात्मा अथवा इंद्रियात्मा को 'शरीरधात्वात्मा' भी कहते हैं। जैसा कि 'शरीरधात्वात्मा शुक्रभूतांऽगान्दगात्संभवति' । ( च. शा. अ. ४ ) क्षेत्रज्ञ, अथवा जीवात्मा कर्मानुसार एक देह को छोड़ कर ( मनोजवो देहमुपैति देहात् ) दूसरे देह में प्रवेश करता है। यथा ' क्षेत्रज्ञः.....दैव संयोगात्.....भूतात्मना सह अन्वक्षं गर्भाशयमनु-प्रविश्यावतिष्ठते । ( सु. शा. अ. ३ )
' गुणी ' यह विशेषण महत्वपूर्ण है। चक्रपाणि दत्त ने इसका अर्थ ' भूतरूपगुणवान् ' करके यह भी कहा है कि ' गुणोऽप्रवान्, प्रधानं चात्मा, तव्यतिरिक्तानि भुतानि गुणाः '। सारांश आत्मा, गुणी होकर आकाशादिक उसके ' गुण ' हैं। आगे भी ' गुणग्रहणाय ' ' गुणोपादानम् ' इत्यादि स्थलों
हिरण्यगक्ष कुशिक और षड्धातु वाद
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में षड्धातुवादियों ने गुण शब्द से आकाशादिकों को ही संबोधित किया है।
अब इन गुणों के उत्पत्ति के विषय में कहते हैं कि:—
तत्र पूर्व चेतनाधातुः सत्वकरणो गुणग्रहणाय पुनः प्रवर्तते। स गुणोपादानकाले अंतरिक्षं पूर्वतरमन्येभ्यो गुणेभ्य उपादत्ते, यथा प्रलथात्यये सिस्सृभूतान्यक्षरभूतः सत्वोपादानः पूर्वतरमाकाशं सृजति, ततो व्यक्ततरगुणान्वाग्वार्दीश्वतुरः। सर्वमपि खल्वेतत् गुणोपादानम् अणुना कालेन भवति।
( च. शा. अ. ४ )
सारांश स्तुष्टि के आरंभ में और गर्भ में भी स्तुष्टिकर्ता चेतनाधातु, सत्वरूप उपादान अथवा करण से युक्त होकर सर्व प्रथम गुण ग्रहण में प्रवृत्त होता है अर्थात् गुणों को व्यक्त करता है। गुणोपादान के समय वह अन्य गुणों के पहिले आकाश-गुण को ग्रहण करता है और बाद में क्रमशः व्यक्ततर वायु आदि गुणों को ग्रहण करता है। यह गुण-ग्रहण अत्यल्प समय में हो जाता है।
धातुपंचकवादी, आकाशादिकों का नित्य द्रव्य मानते थे। उनका कहना था कि 'इन आकाशादिकों में अप्रतीघात-कत्वादि और शब्दादि गुण रहते हैं। ये गुण, इन द्रव्यों के स्वभाव हैं'। किंतु षड्धातुवादियों को चेतनाधातु, का
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आयुर्वेद-दर्शन
स्वतः सिद्ध अस्तित्व प्रतीत हो जाने के कारण वे आकाशादिकों को चेतनाधातु के 'गुण' कहते थे। अतः उक्त विधान में उन्होंने यह कहा है कि 'चेतनाधातु, आकाशादिगुणों को व्यक्त करता है। सारांश धातुपञ्चकवादी जिन गुणों को 'स्वभाव' कहते हैं उनको ही षड्धातुवादी आकाशादि नामों से संबोधित करते हैं। क्योंकि उनके मत से आकाशादिक, अभिव्यक्ति के समय गुणमात्र रहते हैं।
किंतु यहाँ यह जानना आवश्यक है कि अभिव्यक्ति के समय आकाशादिक, अप्रतीघातकत्वादि गुणमात्र रहते हैं अथवा शब्दादि गुणमात्र रहते हैं ? और इस विषय में षड्धातुवादियों का क्या कथन है ?
इस तरह देखा जाय तो षड्धातुवादी आकाशादिकों को अप्रतीघातकत्वादि गुण मात्र ( आकाश-अप्रतीघातकत्व, वायु-चलत्व, अग्नि-उष्णत्व, जल-द्रवत्व, पृथ्वी-स्वरत्व ) ही स्वीकार करते हुए प्रतीत होते हैं। क्योंकि षड्धातुवादियों का यह कथन कि 'इन गुणों की अभिव्यक्ति व्यक्त, व्यक्ततर, व्यक्ततम, इस क्रम से होती है;' वैज्ञानिक दृष्ट्या शब्दादि तन्मात्राओं में उत्तनी चरितार्थ नहीं होती जितनी कि अप्रतीघातकत्वादि लक्षणों या गुणों में। और इसी हेतु से षड्धातुवादी, गर्भगत गुणोपादन में अप्रतीघातकत्वादि गुणों के स्थान पर छिद्र, प्राण, संताप, छेद, मूर्ति
हिरण्याक्ष कुशिक और षड्धातु वाद
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इन गुणों का उल्लेख करते हैं जैसा कि उनके “पुरुषोऽयं लोकसम्मतः। यावंतो हि मूर्तिसंतो लोके भावविशेषास्तावंतः पुरुषे यावंतो पुरुषे तावंतो लोके। तस्य पुरुषस्य पृथ्वी मूर्तिः, आपः क्रेदः, तेजोऽभिंसंतापो, वायुः प्राणो, विद्यच्छिद्राणि, ब्रह्मांतरात्मा। ( च. शा. अ. ४ व ५ ) इस विधान पर से सिद्ध होता है। उक्त छिद्रादिगुण, अप्रतीघातकत्वादि गुणों के ही देहगत रूप हैं। इनका उल्लेख करना आकाशादिकों को अप्रतीघातकत्वादि गुणमात्र स्वीकार करना ही है। इतना ही नहीं तो षड्धातुवादी अब यह भी कहते हैं किः—
तन्मयान्येव भूतानि तद्गुणान्येवचादिशेत्।
तैश्च तद्वक्ष्णः कृत्स्नो भूतग्रामो न्यजन्यत ॥
तस्योपयोगोऽभिहितशक्तिर्त्सा प्रति सर्वदा ।
भूतेभ्यो हि परं यस्मान्नास्ति चिंता चिकित्सिते ॥
( सु. शा. अ. १ )
अर्थात् चूंकि जब कि चिकित्सा शास्त्र में सचेतन-अचेतन द्रव्यगत पंचमहाभूतों का ही विचार किया जाता है और चिकित्सा में अर्थात् शारीरधातुओं के सम-विषम करण में सर्वदा गुर्वादि गुणविशिष्टभूतग्राम का ही उपयोग होता है ( गुर्वादिगुणों के द्वारा ही साम्य-वैषम्य होता है ) तब यह कहना ही उचित है कि “ आकाशादि पंचमहाभूत, अप्रतीघातत्वादिलक्षणमय ( अभिन्यक्ति के समय तन्मात्र )
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आधुनिक-दर्शन
और छिद्र, प्राण आदि गुण विशिष्ट हैं। और इनके द्वारा तत्त्वज्ञान ही समस्त सचेतन अचेतन भूतप्राप्त पैदा हुआ है।”
पृथ्वीवादी, गुणप्रसदाख्य धातुओं का अथवा केवल गुर्बादि स्वभावों का अप्रतीघातकत्वादि गुणों में समन्वय करते थे। इन गुणों को ही वे आकाश आदि नामों से संबोधित करते थे और अभिव्याक्ति के समय आकाशादिकों को अप्रतीघातकत्वादमात्र स्वीकार करते थे।
पृथ्वीवादी, वातपित्तश्लेष्माओं के लोकगत अधिष्ठान पर विचार करते हुए वातपित्तश्लेष्माओं का अप्रतीघातकत्वादि गुणों में विशेषतः चक्षुत्त्व, उष्णत्व और द्रवत्व में समन्वय करते थे।
पृथ्वीवादानुसार आत्मा ‘गुणी’ है। आकाशादिक अपने मूलभूत अप्रतीघातकत्वादि रूपों में उसके ‘गुण’ हैं। ये गुण ‘अभूत’ नहीं हैं; बल्कि ‘भूत’ हैं। तदनुसार आकाशादिक ‘भूत’ अथवा ‘महाभूत’ कहे जाते हैं। इन महाभूतों में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंधों की प्रतीति होती है। किंतु ये ‘आत्मगुण’ नहीं हैं; अपितु ‘भौतिक गुण’ हैं। सारांश इनको ‘कार्यगुण’ माना जाता है ‘कारणगुण’ नहीं माना जाता।
पृथ्वीवादी, सत्व को आत्मा का ‘करण’ और ‘उपादान’ कहते हैं। किंतु इसको वे सातवों धातु नहीं
हिरण्यशक्ष कुशिक और षड्धातु वाद
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कहते । क्योंकि आत्मवादियों की बुद्धि, जिस प्रकार आत्मा से पैदा होकर आगे स्वयं ही अहंकार में तथा आकाशादिकों में परिणत होती है अथवा उनको जनती है उस प्रकार षड्धातुवादियों का सत्त्व, स्वयं गुणग्रहण या गुणोपादान नहीं करता । षड्धातुवादानुसार सत्त्व को इतना स्वतंत्र नहीं माना जाता । इसका मुख्य कारण यह है कि षड्धातुवादी, आत्मा के कर्तृत्व को और ज्ञातृत्व को भिन्न २ मानते हैं । उनके इस मत का निदर्शन “ निर्विकारः परस्त्वात्मा सत्त्वभूत गुणद्वियैः ” ( च. सू. अ. १ ) इस विधान पर ले होता है । इसमें सत्त्व गुणों का और भूत गुणों का अलग २ उल्लेख है । सारांश षड्धातुवादानुसार आत्मा का कर्तृत्व, गुणपंचक में व्यक्त होता है और ज्ञातृत्व, करणोपादान रूप त्रिगुणात्मक सत्त्व में । इस तरह यद्यपि आकाशादि गुणपंचक का और सत्त्व का आपस में जन्य जनक संबंध नहीं है तथापि जिस समय चेतनाधातु, गुणग्रहण में प्रवृत्त होता है तब वह करणोपादान संज्ञक सत्त्व से युक्त रहता है ।
रस, शुक्र, आत्मेवादि अन्य गमोत्पादक भावों का भूत पंचक में अतर्भाव करने के हेतु से षड्धातुवादी कहते हैं कि:—मातृजादयोप्यस्य महाभूतविकारा एव । तत्र अस्य आकाशात्मकं शब्दः, श्रोत्रं, लाघवं, सौक्ष्म्यं, विवेकश्च । वाय्वात्मकं स्पर्शः, स्पर्शनं च रौक्ष्यं, प्रेरणं, धातुव्यूहत्वं, चैष्टाश्च शारिरीयः ।
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आयुर्वेद-दर्शन
अग्न्यात्मकं रूपं, दर्शनं, प्रकाशः, पत्तिकौण्यं च । अवात्मकं रसो, रसनं, शैत्यं, मार्दवः, स्नेहः, छेदश्च । पृथिव्यात्मकं गंधो, व्रणं, गौरवं, शैर्यं, मूर्तिश्च । ( च. शा. अ. ४ )
पद्मवृत्तवादिओं के मत से इंद्रिय और इंद्रियार्थ दोनों ही पांचभौतिक होने के कारण उनका उक्त विधान में पंचीकरण किया गया है । इसीका स्पष्टीकरण अन्यत्र इस प्रकार किया गया है कि “ यतोऽभिहितं तत्संभवद्वयसमूहो-भूतादिरुक्तः, भौतिकानि च इंद्रियाण्यायुर्वेदे वक्ष्यंते तथैंद्रियाथाः” ( सु. शा. अ. १ ) अर्थात् जब कि उस कर्मपुरुष को पैदा करने वाला शुक्लशोणितान्तर्गत गुणप्रसादाख्य द्वयसमुदाय पांच-भौतिक है तब आयुर्वेद में इंद्रियों और इंद्रियार्थों को भातिक ही कहा जाता है । और इसी हेतु से यह कहा गया है कि ‘ तत्र यद्यदात्मकमिन्द्रियं विशेषात्तदात्मकमेवार्थमनुगृह्णाति, तत्स्वभावाद्विसुत्वाच्च ’ । ( च. सू. अ. ८ ) अथवा:—
इंद्रियेणेंद्रियार्थं तु स्वं स्वं गृह्णाति मानवः । नियतं तुल्ययोनित्वात्मान्येनान्यमिति स्थितिः ।
( सु. शा. अ. १ )
यहां यह भी ध्यान में रखना चाहिये कि जो संप्रदाय, श्रुतत्व में ही कर्तृत्व का समन्वय करते हैं उनकी यह दलील रहती है कि “ चूंकि जब कि इंद्रियों के द्वारा शब्दा-
हरिण्याक्ष कुशिक और षड्धातुवाद
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दिगुणों का ही ग्रहण होता है और अप्रतीघातकत्वादिक केवल स्पर्शक्षेय हैं तब आकाशादिकों का शब्दादि तन्मात्राओं में और उनका भी ज्ञान में समन्वय करना उचित है”। किंतु जो संप्रदाय ज्ञातृत्व और कर्तृत्व को भिन्न २ मानते हैं वे इस दलील को स्वीकार नहीं करते।
मालूम होता है कि षड्धातुवादी ‘कृत’कर्म के पक्षपाती थे जैसा कि कर्मवाद के प्रकरण में उद्घुत किये गये अंशों पर से सिद्ध होता है। पुनर्भव विषयक प्रमाणचतुष्टय इनका ही है। हरिण्याक्ष कुशिक, बात-कलाकलीय परिषद् में अनुपस्थित थे।