आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
शर्लोम' का सत्त्ववाद
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नहीं कहा जा सकता कि चरकसंहिता में सत्त्ववादीविषयक और कौन २ अंश हैं। किंतु साधारणतः यह प्रतीत होता है कि जिस बात का स्पष्टीकरण चरकसंहिता में उपलब्ध नहीं होता उसका सुश्रुतसंहिता में उपलब्ध होता है। सुश्रुतसंहिता में जिस पंचविशतितत्वात्मक स्मृष्टि-विज्ञान का व प्रकृति-पुरुषवाद का उल्लेख है वह हमारी राय में सत्त्ववाद का ही उत्तर रूप है। अतः हम उसको यहाँ उद्धृत करते हैं। उसमें यह कहा गया है कि:—
सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्वरजस्तमोलक्षण- मष्टरूपमखिलस्य जगतः संभवहेतुरन्यत्कं नाम, तदेकं बहूनां क्षेत्रज्ञानामविद्यानं समुद्र इवोदकानां भावानाम्।
इसमें 'अन्यत्क' शब्द से त्रिगुणात्मिका प्रकृति की 'साम्यावस्था' का उल्लेख है। इस अन्यत्क को एक माना गया है और क्षेत्रज्ञों को बहुत। किंतु यह स्पष्ट नहीं है कि क्षेत्रज्ञों का यह बहुत्व, स्वरूपतः है या उपाधितः। आत्मवादी, आत्मा को 'अन्यत्क' कहते हैं और उस अन्यत्क से बुद्धि का प्रादुर्भाव बताते हैं, पर ये आत्मा या क्षेत्रज्ञ से अन्यत्क प्रकृति का पैदा होना स्वीकार नहीं करते अतः वे सृष्टयुत्पत्ति का विवेचन अन्यत्क प्रकृति से आरंभ करते हैं। जैसा कि:—
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आयुर्वेद-दर्शन
तस्मादव्यक्तान्महानुत्पद्यते तत्सिंह एव, तत्सिंहाश्च महत्-स्वसिंह एवाहंकार उपद्यते । स च त्रिविधो वैकारिक-स्वैजसोभूतादिरिति ।
इस पर से यह ज्ञात होता है कि ये सत्य रज तम की साम्यावस्था को 'अव्यक्त' और वैषम्यावस्था को 'महत्' अर्थात् बुद्धि कहते हैं । इन के मत से गुणों में विषमता पैदा होना ही अव्यक्त से बुद्धि का पैदा होना है । आत्मवादी, साम्यावस्थ सत्वरजतमें को आत्मा के गुण कहते हैं और उनकी साम्यावस्था का 'अव्यक्त' शब्द से अलग उल्लेख नहीं करते । बाकी महत् अथवा बुद्धि शब्द से आत्मवादी भी त्रिगुणों की वैषम्यावस्था को संबोधित करते हैं । त्रिगुणात्मिका बुद्धि से त्रिगुणात्मक अहंकार का पैदा होना दोनों को स्वीकार है । आगे इनका यह कथन है कि:-
तत्र वैकारिकादहंकारात्तैजस् साहाय्यात् तल्लक्षणान्येव एकादशेन्द्रिया ण्युत्पद्यंते । तद्यथा श्रोत्रत्वक् चक्षुर्जिह्वा घ्राणवाक् हस्तोपस्थ पायूपाद् मनसासीति । तत्र पूर्वाणि पंच बुद्धीन्द्रियाणि, इतराणि पंच कर्मेन्द्रियाणि उभय्यात्मकं मनः । भूतादेरपितैजस साहाय्यात्तल्लक्षणान्येव पंचतन्मात्राण्युत्पद्यंते । तद्यथा शब्द-तन्मात्रं, स्पर्शतन्मात्रं, रूपतन्मात्रं, रसतन्मात्रं, गंधतन्मात्रमिति । तेषां विशेषाः शब्दस्पर्शरूपरसगंधाः । तेष्यो भूतानि व्योमानिला-
शारलोमा का सत्त्ववाद
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नलजलोऽर्थः । एवमेषांतत्त्वचतुर्विंशतिवर्ण्यारूढ्याता । तत्र बुद्धी- द्वियाणां शब्दादयो विषयाः । कर्मेन्द्रियाणां यथासंख्यं वचनान- दानानंद विसर्ग विहरणानि ।
इसमें वैचारिक व तैजस गुणाधिक अहंकार से जिन इंद्रियों का पैदा होना बतलाया है वे भौतिक नहीं हैं अपितु ज्ञान के प्रकार हैं । उसी तरह भूतादि व तैजस गुणाधिक अहंकार से जिन तन्मात्राओं की पैदाइश बतलाई गई है वह भी ज्ञान के प्रकार हैं । इनके मत से आगे यह ज्ञान ही शब्दादि गुणों में और ये गुण भी आकाशादि द्रव्यों में परिणत होते हैं । तत्पश्चात् भौतिक इंद्रिय भी पैदा होते हैं । जो संप्रदाय ज्ञान को प्रधान मानते हैं और ज्ञान से ही कर्तृत्व का उदित होना स्वीकार करते हैं उनकी भाषा इसी प्रकार की होती है । आत्मवादी भी इस मत के हैं पर उनमें व इन में भेद यह है कि ये त्रिगुणात्मक अहंकार में गुणोत्पन्न दृष्ट्या दो प्रकार करके एक से एकादश इंद्रियों की व दूसरे से शब्दादि तन्मात्राओं की उत्पत्ति का विधान करते हैं । किंतु आत्मवादी, अहंकार के दो भेद नहीं करते और आकाशादि के उत्पत्ति के पूर्व तन्मात्राओं का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते । इस मत भेद का स्पष्ट चित्र उनके प्रकृति संज्ञक आठ तत्वों के उल्लेख में भी दिखाई देता है । क्योंकि अष्टप्रकृतियों के विषय में इनका यह कथन है कि:—
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आयुर्वेद-दर्शन
अन्यत्कं, महान्, अहंकारः पंचतन्मात्राणि चेत्यष्टौप्रकृतयः ।
अर्थात् ये पंचतन्मात्राओंका प्रकृति संज्ञक तत्त्वों में और आकाशादिकों का (शेषाः षोडशविकाराः) विकारों में उल्लेख करते हैं । किंतु आत्मवादी, ठीक इसके विपरीत अर्थात् आकाशादिकों को प्रकृतिसंज्ञक और शब्दादि गुणों को विकृतिसंज्ञक मानते हैं। दार्शनिकों ने इस मतभेद पर परदा डालने का यत्न किया है पर हमारी राय से इसको छिपाना आवश्यक नहीं है।
तत्र सर्व एव अचेतन एष वर्गः । पुरुषः पंच विशतितमः । सच्च कार्यकारणयुक्त श्वेतयिता भवति । सत्यप्यचैतन्ये प्रधानस्य पुरुषस्य कैवल्यार्थं प्रवृत्ति मुपदिशति क्षीरादींश्च हेतूनुदाहरति ।
अब कहते हैं कि अष्ट प्रकृति और षोडशविकार सहित चौबीस तत्त्वों का यह वर्ग 'अचेतन' है । और पुरुष पचाँसवों है । वह, ( 'चेतनावान्' होने के कारण ) विकार और प्रकृति-संज्ञक तत्त्वों का 'चेतयिता' है । पर तावन्मात्र से उसको कर्ता नहीं कहा जा सकता क्योंकि सारा कर्तृत्व, अन्यत्क प्रकृति को ही है । सिर्फ इस प्रकृति को जोकि अचेतन है; चेतना धातु के साश्रिध्यमात्र की आवश्यकता है । जिस तरह बच्चे के साश्रिध्य से माता के स्तन में दुग्ध का 'ओहा' आता है उसी तरह क्षेत्रज्ञ के साश्रिध्य मात्र से अन्यत्क प्रकृति में तत्त्वोदय होता है ।
शरलोमा का सत्त्ववाद
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इस कथन की पुष्टि शरलोमाने इन शब्दों में की है। कि दुःखद्वेषी आत्मा अपने आपको कदापि दुःख में नहीं डाल सकता; सत्त्व ही सब कुछ करता धरता है। किंतु इस पर यह सवाल पैदा होता है कि जब कि आत्मा स्वयं होकर कुछ नहीं करता तो बंध मोक्ष का किसके साथ संबंध है ? सर्ग प्रलय का यह चक्र क्यों चलाया जा रहा है ? इसपर कहते हैं कि यह सब कुछ पुरुष के 'कैवल्यार्थ' अर्थात् मोक्ष के हेतु हो रहा है। अस्तु।
अत उर्ध्वं प्रकृति पुरुषयोः साधर्म्यं वैधर्म्यं न्वाख्यास्यामः। तद्यथा उभावप्यनादी, उभावप्यनंतौ, उभावप्यलिङ्गौ, उभावपिनित्यौ, उभावप्यपरी उभौ च सर्वगताविति। एका तु प्रकृतिरचेतना, त्रिगुणा, बीजधर्मिणी, प्रसवधर्मिणी अमध्यस्थधर्मिणी चेति। बहवस्तुपुरुषाश्चेतनावंतो, अगुणा, अबीजधर्मिणो, अप्रसवधर्मिणो मध्यस्थधर्मिणश्चेति।
इसमें प्रकृति पुरुष दोनों को अनादि कहा गया है। मालूम होता है कि चरक संहितांतर्गत " आदिनास्त्यात्मनः क्षेत्रपारंपर्यमनादिकम् । अतस्तयोरनादित्वात्किंपूर्वमिति नोच्यते " ( च. शा. अ. १ ) इस विधान का संबंध इसी प्रकृति पुरुष वाद अर्थात् ही सत्त्ववाद से है। ये असंख्य आत्माओं को स्वीकार करते हैं पर उनको सर्वगत भी कहते हैं। सुश्रुत संहितामें इस मत को 'परमत' इति
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आयुर्वेद-दर्शन
एकें भाष्ये ’ कहकर इसका निषेध किया गया है और यह कहा गया है कि:—
नचायुर्वेदेषूपदिश्यंते सर्वगताः क्षेत्रज्ञा नित्याश्च असर्व- गतेषुच क्षेत्रज्ञेषु पुरुषरूपापकान् हेतुनुदाहरंति । आयुर्वेदेत्स- सर्वगताः क्षेत्रज्ञानित्याश्च तिर्यग्ग्येनि मानुष देवेषु संचरंति धर्माधर्म निमित्तम् । त एतेऽनुमानग्राह्याः परमसुक्ष्मा श्रेतना- वंतः शाश्वता लोहित रेतसोः संज्ञिपाते ष्वभिन्व्यज्यते ।
सारंश इसमें क्षेत्रज्ञों को ‘ असर्वगत ’ माना है और इसी को आयुर्वेदसम्मत कहा गया है । यह तो स्पष्ट ही है कि उक्त मत चरकसंहितांतर्गत आत्मवाद, सत्ववाद और षड्धातुवाद को स्वीकृत नहीं है पर इसमें भी संदेह नहीं है कि इस मतका आयुर्वेदमें बहुत प्राचीन समय से प्रचार है । क्योंकि इसका निषेध आत्मवादियोंने समाध्यवस्थापन्न मनका उदाहरण देकर किया है । सुश्रुतसंहिता में इसी के आगे यह कहा गया है कि ‘ यतोऽभिहितं पंचमहाभूत शरीरि क्षमवायः पुरुष इति स एव कर्मपुरुषश्रिकित्साधिकृतः ’ । इस परसे दो तर्क हो सकते हैं; एक यह कि षड्धातुवादियों के अंतर्गतही यह एक संप्रदाय था और दूसरा यह कि धातुपंचक वादियों मेंहि एक संप्रदाय ऐसा था जोकि परिणाम स्वरूप पुरुषों को असर्वगत मानता था । इसमें पहिला अधिक संभवनीय है । सिवाय यह भी संभव है कि आत्मा को असर्वगत मानने वाले उनका बहुत्व स्वरूपतः मानते थे ।
शरलोमा का सत्ववाद
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सत्ववादियों का अथवा प्रकृतिपुरुषवादियों का मुख्य सिद्धांत यह है कि:—
‘ तत्र कारणानुरूपं कार्यमिति कृत्वा सर्वं एवैते विशेषाः सत्त्वरजस्तमोमया भवन्ति, तद्वजन्तत्वात्तन्मयत्वात्तद्गुणा एव पुरुषा भवन्ति ’ ।
‘ कार्य सर्वदा कारण के अनुरूप होता है ’ तदनुसार आकाशादि धातु सत्त्वरजस्तमोमय हैं और कर्म पुरुष भी तद्गुण ही हैं क्योंकि इनकी अभिव्यक्ति इन गुणों से होती है और इनमें गुणों के पसार के अतिरिक्त कुछ नहीं है ।
सुश्रुत संहिता में इस मत को ‘ इति एकं भाष्यते ’ अर्थात् परमत बतलाया है । आयुर्वेद के प्रायोगिक क्षेत्र में आत्मवाद के सद्दश इसका भी अधिक प्रवेश नहीं है ।
शरलोमा, रसपरिषद् में और वातकलाकलीय परिषद् में उपस्थित नहीं थे ।
वायोंविद का, रसवाद और त्रिधातुसिद्धांत.
राजार्षि वायोंविदः—शरलोमा के प्रति वायोंविद ने कहा कि:—
वायोंविदस्तु नेत्याह न ह्येकं कारणं मनः । नतं शरीरं शारीरं रोगा न मनसः स्थितिः ॥
अर्थात् सत्त्व को पुरुषरोगोत्पादक कहना सचित नहीं है । क्योंकि शरीरनिरपेक्ष सत्त्व कुछ भी नहीं कर सकता । सिवाय शारीररोग, शरीर ( वातपित्तश्लेष्मा ) के बिना हो ही नहीं सकते और ना ही सत्त्व की स्थिति हो सकती है ।
जिस तरह मौद्रल्य आत्मा को और शरलोमा सत्त्व को पुरुष-रोगोत्पादक कहते हैं उसी तरह वायोंविद भी शरीर को पुरुषरोगोत्पादक कहते हैं । इस तरह यज्ञः पुरुषीय परिषद् में क्रमशः आत्मा, सत्त्व और शरीर इस त्रयी के नितांत समर्थको का उल्लेख किया जाना आयुर्वेद दर्शन के अंतिम निर्णय पर प्रकाश डालता है । आगे इस विषय में कहा ही जायगा अस्तु ।
वायोंविद का रसवाद और त्रिधातुसिद्धांत
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सत्त्ववादी, सत्त्व को ही मानसिक और शारीर रोगों का जनक कहते हैं। क्योंकि उनके मत से सत्त्व ही मन का और शरीर का जनक है। किंतु वायोंविद का कथन है कि शरीर के बिना सत्त्व की स्थिति ही नहीं है अर्थात् सत्त्व, शरीर का परिणाम है। मानसिक रोगों में यद्यपि सत्त्व कारण है तथापि शरीरनिरपेक्ष सत्त्व उनको भी पैदा नहीं कर सकता। और शारीर रोग तो बिना शरीर के पैदा हो ही नहीं सकते; उनमें सत्त्व का कुछ भी अधिकार नहीं है। सारांश जब कि शरीर मानस रोगों का तथा सत्त्व का भी जनक शरीर है तब शरीर को ही सत्त्वोत्पादक और रोगोत्पादक कहना उचित है।
इस विवाद पर से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि सत्त्व-वादी, सत्त्व को शरीर का जनक कहते थे तो ठीक उसके विपरीत शरीरवादी, शरीर को सत्त्व का जनक कहते थे।
हम आगे चलकर देखेंगे कि वायोंविद, अमीपोम लोकपक्षीय त्रिधातु-सिद्धांतवादी हैं। उनकी दृष्टि से शरीर त्रिधातुओं का बना हुआ है और सत्त्व या चेतना भी त्रिधातुओं का ही परिणाम है। सारांश त्रिधातु ही पुरुष व रोग को पैदा करते हैं। इनकी भाषा में 'शरीर' शब्द त्रिधातुओं का वाचक होकर 'पुरुष' शब्द प्राणी अथवा सचेतन सृष्टि का वाचक है। इस तरह सिद्धांत पक्ष में उनका यह कथन है कि त्रिधातुओं से
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आयुवद-दर्शन
सचेतन स्मृष्टि पैदा होती है। फिर भी यज्ञः-पुरुषीय-पारिषद् में उन्होंने 'रस' को पुरुषरोगोत्पादक कहा। जैसा कि:—
रसजानितु भूतानि व्याधयश्च प्रुथग्विघ्नाः।
आपो हि रसवत्यस्ताः स्मृता निर्वृत्ति हेतवः ॥
अर्थात् समस्त प्राणी और उनकी व्याधियाँ 'रस' से पैदा होती हैं। रस जलो में रहता है अतः जलों को भी सचेतन स्मृष्टि के उत्पत्ति में कारण कहते हैं।
वायोंविद् के इस रस को जानने के पूर्व यह स्वीकार करना होगा कि यह रस उनके त्रिधातु-सिद्धांत की ही कोई वस्तु है। इस दृष्टि से देखा जाय तो आर्तविक जलों में रहनेवाला यह रस वही है जिसको श्रुतियों में 'सोम' शब्द से संबोधित किया है। वैदिक ऋषि, सचेतनस्मृष्टि की उत्पत्ति का संबंध सामान्यतः आर्तविक जलों के साथ प्रस्थापित करते ही थे। क्योंकि जहां आर्तविक जलों की संभावना रहती है वहां सचेतन स्मृष्टि की भी संभावना रहती है फिर भी उनका लक्ष्य जलगत उस 'धर्म' पर था जो कि आर्तविक जलों के घटक में प्रधान घटक है।
इस विषय में “सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो-भिन्नोऽवरुणोऽअग्निः।” (यजु० अ० ७ मं. १४) यह मंत्र मन्त्रीय है। इसमें यह कहा गया है कि सोम की विश्व
वायोविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त
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( सचेतन ) रूप-धारिणी वह ( आर्तविक जलरूपा ) पहिली संस्कृति है जिसमें ( घटक के रूप में ) सोम, प्रधान होकर मित्र, वरुण और अग्नि भी हैं। सारांश सचेतन स्मृति को पैदा करनेवाला आर्तविक जल जिन घटकों का मिश्रण है उनमें सोम ही प्रधान होकर सचेतन स्मृति को पैदा करने के पूर्व आर्तविक जलों को पैदा करना उसका पहिला संस्कार है। इस सोम को ही ‘ अदभ्यः संश्रुतः प्रथिव्यैरसाच्छ विश्वकर्मणः समवर्तताम्रे ’ ( यजु० अ० ३१ मं० १७ ) इस मंत्र में ‘ रस ’ शब्द से संबोधित किया है। ( आगे प्रजापतिवाद के विवेचन के समय सोम तथा जलों पर हम अधिक विचार करेंगे )
त्रिधातु-सिद्धान्तवादी वायोविद् की दृष्टि से भी आर्तविक जल, वायु ( मित्र वरुण ) अग्नि और सोम इनका अर्थात् त्रिधातुओं का ही मिश्रण है। और जलगत सोम को ही वे ‘ रस ’ शब्द से संबोधित करते हैं। यद्यपि सिद्धान्त पक्ष में वे वायु-अग्नि-सोम इस त्रयी को पुरुषरोगोत्पादक कहते हैं तथापि यहां रसवाद का समर्थन करके उन्होंने यह व्यक्त किया है कि अचेतन द्रव्यों को सचेतन द्रव्यों में संगठित करनेवाला धर्म मुख्यतः जलगत रस अर्थात् सोम ही है।
उक्त रस विषयक मत अग्नीपोमलोक-पक्षियों का है। पंचात्मक लोक पक्षियों में भी कुछ उक्त मत को स्वीकार करते
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आयुवेद-दर्शन
थे जैसा कि “ सौम्याः खलवापोऽन्तरिक्ष प्रभवतः प्रकृति शीता लघ्व्यश्चान्यत्करसाश्च । ” ( च. सू. अ. २६ ) इसपर से व्यक्त होता है। इसमें यद्यपि आरंभिक जलों का प्रधानता से उल्लेख है तथापि उनको ‘अन्यत्क रस’ और सोमात्मक कहा ही है। किंतु कुछ जो कि सोम धर्म का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते थे; रस को आप्यगुण और जिह्वा वैषयिक भाव (अर्थात् व्यक्त रस) कहते थे जैसाकि ‘आकाशपवनदहनतोयभूभिषु यथा संख्येमकोत्तरपरिगुद्धाः शब्दस्पर्शरूपरसगंधाः; तस्मादाप्यो रसः ( सु. सू. ३० अ० ४२ ) और “ एक एव रस इत्युवाच भद्रकाप्यो यं तं पंचानामिन्द्रियार्थानामन्यतमं जिह्वावैषयिकं भावमाचक्षेत कुशलाः स पुनरुदकादनन्य इति ” । ( च. सू. अ. २६ ) इन विधानों पर से सिद्ध होता है।
उक्त रस विषयक मतभेद यहाँ समाप्त नहीं हुआ। क्योंकि इस रस से सचेतन सृष्टि, जिस क्रम से आरंभ होती है उसमें भी एतन्मूलक मतभेद दिखाई देता है। अतः अब उस पर विचार करें।
रसजन्य सचेतन घटक.
पंचात्मकलोक पक्षीय, चाहे फिर वे सोमसंज्ञक अन्यत्क रस के पक्षपाती हों अथवा आप्यगुण जिह्वा वैषयिक रस के; इस मूलभूत रस का आकाशादिकों के संसर्ग से सर्वे प्रथम मूर्तियों में और पश्चात् मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय इन छः आस्वादों में परि-
वायौविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धान्त
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गत होना स्वीकार करते हैं। जैसा कि 'तास्वंतंरिद्वाद्भ्रज्य- मानाभ्रद्वाष्ट्र पंचमहाभूतगुणसमन्विता जंगमस्थावराणां भूतानां मूर्तिरिभ्रीणयंति यासुमूर्तिषु षड्भिर्भूच्छीति रसाः। तेषां षण्णां सोमातिरेकात् ( अन्यमते भूम्यंबुगुणबाहुल्यात् ) मधुगोरसः। पृथिव्यभिभूयिष्ठत्वादम्लः। सलिखाभिभूयिष्ठत्वाक्ष्वणः। वायव त्रिभूयिष्ठत्वाऋतुकः। वाय्वाकाशातिरेक्तत्वात्तिकः। पवन पृथिव्यतिरेकात् कषाय इति। एवमेषां षण्णां रसानां षट्त्व- मुपपन्नमुनातिरेक विशेषान्महाभूतानां भूतानामिव जंगमस्था- वराणां नानावर्णाकृतिविशेषाः। षड्भूतुकत्वाच्चकालस्य उपपन्नो महाभूतानाम् ऊनातिरेक विशेषः। (च. सू. अ. २६)
यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि वर्षाजलगत रस का पंचमहाभूतों के गुणों से संबंध होकर स्थावर जंगम प्राणियों की जो 'मूर्तियाँ' पैदा होती हैं उनको पंचात्मक- लोकपक्षीय, 'षड्सात्मक' कहते हैं अर्थात् उनकी दृष्टि से 'मूर्ति' शब्द उन सचेतन द्रव्यों का वाचक है जो स्थावर जंगम प्राणियों के 'घटक' हैं। इन घटक द्रव्यों को वे छः आस्वादों में विभक्त करते हैं। उनका कथन है कि उक्त मूर्ति संज्ञक सचेतन आस्वाद, आर्तविकजलगत रस के साथ पंच- महाभूतों के गुणों का संबंध होकर बने हुए हैं।
अभीषोम लोकपक्षीय भी सोमसंज्ञक रस से सर्व प्रथम मूर्तियों का संगठित होना स्वीकार करते हैं। वैदिक
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आयुर्वेद-दर्शन
मत के अनुसार इन मूर्तियों ( विशेषतः सचेतन द्रव्यों ) के औषधि, अन्न, रेतस् और पुरुष ये चार प्रकार हैं जो कि क्रमशः पैदा होते हैं । आयुर्वेद में भिन्न २ दृष्टि से भिन्न २ प्रकार स्वीकार किये गये हैं । उदा० (१) दोष व देह, (२) औषधि (विहजितेबल) व पुरुष ( एनिमल ) और (३) गुणप्रसादाख्यधातु व द्रव्यप्रसादाख्यधातु । इनमें अन्न व रेतस् का इस लिये उल्लेख नहीं है कि पहिले में औषधि व पुरुष दोनों का समावेश है और दूसरे का द्रव्य प्रसादाख्यधातुओं में अंतर्भाव है ।
रस से सर्व प्रथम औषधि संज्ञक सचेतन द्रव्य पैदा होते हैं । ये अन्न व देह दोनों के घटक हैं । षड्रसवादी, इनको सामन्यतः ' दोष ' कहते थे और इनका तथा अन्न का भी वर्गीकरण मधुरादि छः आस्वादों में करते थे । किन्तु जिनका लक्ष्य गुर्वादि गुणों पर अधिक था वे उनके गुरुत्वादि प्रधान स्वभाव के अनुसार उनका २० गुणों में वर्गीकरण करते थे । और इसी हेतु से उनको सामान्यतः 'गुणप्रसादाख्यधातु,' ' शारीरधातुगुण ' ' धातुगुण ' अथवा ' आहार गुण ' कहते थे । आगे इन गुणप्रसादाख्यधातुओं को ओज, तेज, धातुप्रसाद इन तीन विभागों में अथवा ओज व तेज
१ जिन पदार्थों में दूषित होने का अर्थात सड़ने का धर्म हो उनकी यह संज्ञा है । अचेतन द्रव्यों में सड़ने का धर्म नहीं है ।
वायोंविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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संज्ञक दोही विभागों में विभक्त किया जाता था । सिवाय गुर्वादि गुणों में भी परिवर्तन और संख्या वृद्धि का यत्न हो रहा था । इन गुण प्रसादाख्य धातुओं के विविध संयोगसे ही द्रव्य प्रसादाख्य धातु बने हुए हैं जिनके कि समुदाय को देह अथवा पुरुष कहते हैं । अस्तु ।
अग्नीषोमवादी, जो कि ओषधि-संज्ञक सचेतन द्रव्यों का गुर्वादि गुणों में वर्गीकरण करते थे; षड् रस प्रयुक्त वर्गीकरण स्वीकार नहीं करते थे । उनका कहना था कि उक्त मधुरादि आस्वाद, गुणमूलक हैं । जैसा कि ‘अग्नीषोमीयत्वाज्जगत्रो रसा द्विविधाः; सौम्या आग्नेयाश्च । तत्र मधुरातिकृष्णयाः सौम्याः । कटुवम्ललवणा आग्नेयाः । मधुराम्ललवणाः स्निग्धानुरवश्च । कटुतिकृष्णयारूक्षाक्षलवश्च । सौम्याः क्षीताः । आग्नेयाश्चोष्णाः । (सु. सू. अ. ४२)
वायोंविद् जोकि गुर्वादि गुण प्रधान अग्नीषोम लोक पक्षीय हैं; ओषधि वर्ग का गुर्वादिगुणों में वर्गीकरण करते थे । मधुरादि आस्वादों को ये भी गुण मूलक ही कहते थे । जैसा कि उनके रसपरिषदस्थ “षड् रसा इति वायोंविदो राजर्षिः, गुरुलघुक्षीतोष्णस्निग्धरूक्षाः” इस वक्तव्य पर से सिद्ध होता है । षड् रसवादियों के प्रति उनका यह भी कथन था कि जब कि इन गुणों के द्वारा ही षड् रस, शारीर-द्रव्य प्रसादाख्य धातुओं के वृद्धिक्षय में कारण हैं तब षड्
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आयुर्वेद-दर्शन
रसों को साम्य वैषम्य कर कहने की अपेक्षा गुर्बादि गुणों को ही साम्य वैषम्य कर कहना उचित है।
षड्रसवादी षड्रसों के द्वारा और गुर्बादिगुण प्रधानतावादी गुणों के द्वारा धातुओं के वृद्धिहास अथवा साम्यवैषम्य का जिस प्रकार वर्णन करते थे उसको हम क्रमशः उद्घृत करते हैं। षड्रसवादियों का कहना था कि:—
‘ रसात्सावत् षट्, मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायाः । ते सम्यक् उपयुज्यमानाः शरीरं यापयंति । मिथ्योपयुज्यमाना- स्तु खलु दोष प्रकोपनायोपकल्पयंति । दोषाः पुनश्चयो, वातपित्तश्चैष्माणः । ते प्रकृतिभूताः शरीरोपकारका भवन्ति । विकृतिमापन्नास्तु नानाविधैर्विकारैः शरीरमुपतापयंति । तत्र दोषम् एकैकम् त्रयश्चयो रसा जनयंति, त्रयश्चयश्चोपशमयंति तद्यथा—कटुतिक्तकषाया वातं जनयंति; मधुराम्ललवणा- स्त्वेनं शमयंति । कटुकाम्ललवणाः पित्तं जनयंति; मधुर- तिक्तकषायास्त्वेनं शमयंति । मधुराम्ललवणाः श्लेष्माणं जनयंति; कटुतिक्तकषायास्त्वेनं शमयंति । रसदोष सन्निपाते तु ये रसा यैर्दोषैः समान गुणाः समान गुण भूयिष्ठा वा तेन तान् अभिवर्धयंति । विपरीत गुणास्तु विपरीत गुणभूयिष्ठा वा शमयंत्यभ्यस्यमानाः । इत्येतद्वय- वस्थाहेतोः षट्वमुपदिश्यते रसानां परस्परेण असंस्मृष्टानाम् त्रित्वं च दोषाणाम् । संसर्ग विकल्प विस्तरो हि एषामपरिसं-
वार्माविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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ख्येयो भवति, विकल्पभेदापरिसंख्येयत्वात्' (च. वि. अ. १) और गुर्वादि गुणप्रधानता वादी कहते थे कि:—
‘धातवः पुनः शरीराः समान् गुणैः समान गुणभूषिष्टैर्वाप्याहारविहारैरभ्यस्यमानैर्गुडि प्राप्नुवन्ति, ह्यासंतु विपरीत गुणैर्विपरीतगुणभूषिष्टैर्वाप्याहारविहारैरभ्यस्यमानैः । तत्र इमे शरीरधातु गुणाः संख्या सामर्थ्य रूप कर्तारः । तद्यथा-गुरु लघु शीतोष्ण स्निग्ध रूक्ष मंद तीक्ष्ण स्थिर सर मृदु कठिन विषद पिच्छिल श्लक्ष्ण खर सूक्ष्म स्थूल सांद्र द्रवोः । तेषु ये
१ इसका अर्थ यह है कि गुर्वादिगुणसंबन्ध गुणप्रसादाख्य-धातु ही रसादि श्रुकांत धातुओं के घटक अथवा उत्पादक हैं (परिणामतत्त्वाहारगुणाः शरीरगुण भावमापद्येते) । क्योंकि इनके वैविध्य (संख्या) पर उनका वैविध्य, इनके सामर्थ्य पर उनका सामर्थ्य (कार्य) और इनकी आकृति पर उनकी आकृति अवलंबित है । सुश्रुतसंहिता में भी यह कहा गया है कि:—‘गुणा य उक्ता द्रव्येषु शरीरेष्वपि ते तथा । खानहृद्विक्षयास्तस्माद् द्रव्याणां द्रव्यहेतुकाः’ (सु. सू. अ. ४२)
२ सुश्रुत संहिता में गुर्वादिगुणों का विवेचन इस प्रकार है:— अतऊध्वे प्रवक्ष्यामि गुणानां कर्मे विस्तरम् । कर्माभिस्तनुमीयते नाना द्रव्याश्रया गुणाः ॥ ल्हादनःस्तंभनःशीतो मूच्छांतुट् स्वेद दाहाजित् । ऊष्णस्तीद्रिपरीतैः स्यात्वाचनश्च विशेषतः ॥ स्नेहमार्दवकृत् स्निग्धो बलवर्ण करस्तथा । सूक्ष्मस्तद्विपरीतस्याद्विशेषास्तंभनः खरः ॥
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आयुर्वेद-दर्शन
गुरुवस्ते लघुभिराहारगुणैरभ्यस्यमानैराप्यायते; लघवश्च हसति । लघवस्तु लघुभिराप्यायते गुरवश्च हसति । एवमेव सर्वधातुगुणानां सामान्ययोगाद् वृद्धिः ' विपर्ययाद् हासः । ' ( च. शा. अ. ६ )
पिच्छिलो जीवनोवस्यः संधानः श्लेष्मलोगुरुः । विषदो विषरीतोऽस्मात्क्रेदशोषण रोपणः ॥ दाहपाककरस्तीदिणः स्नावणो मृदुरन्यथा । सादोपलेपबलकृद् गुरुस्तर्पणवृंशः ॥ लघुस्तद्विपरीतः स्यात्लेखनो रोपणस्तथा । दशाद्याः कर्मतः प्रोक्तास्तेषां कर्म विक्षोषणैः ॥ दक्षैवान्यान्प्रवक्ष्यामि द्रवार्दी स्ताश्रिषोधमे । द्रवः प्रक्रेदनः सांद्रः स्थूलः स्यात् बंधकारकः ॥ श्रूक्ष्णः पिच्छिल वञ्चयः कर्कशो विषदोयथा । सुखातुवर्धो सूक्ष्मश्च सुगंधो रोचनो मृदुः ॥ दुर्गंधो विषरीतोऽसमत् हृष्टासारचिकारकः । सरौऽनुलोमनः प्रोक्तो मर्दोयात्राकरः स्मृतः ॥ व्यवायी चार्विले देहं व्याप्यपाकाय कल्पते । विकारी विकसने धातुवर्धान्वमोक्षेत् । आशुकारीतथाद्युत्वाद्भावस्यंभसि तैलवत् ॥ सूक्ष्मस्तु सौक्ष्म्यात् सूक्ष्मेषु श्लोतस्त्वचनुरसरः स्मृतः । गुणाविंशतिरित्येवं यथावत्परिकीर्तताः ॥
इसमें मंद स्थिर और कठिन के बजाय सुगंध, दुर्गंध और मृदु का उल्लेख है ।
वार्योविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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इन विधानों पर से यह भली भांति स्पष्ट हो जाता है कि षड्रसवादी, ओषधि व अन्न का आस्वादों में वर्गीकरण करके उनके द्वारा वातपित्तश्लेष्माओं के तथा शारीरधातुओं के वृद्धि और ह्रास का होना स्वीकार करते थे। फिर भी उनका यह कथन था कि उक्त धातु साम्य अथवा वैषम्य रस गत गुणों के कारण होता है। इस पर से यह भी ज्ञात होता है कि षड्रसवादी, यद्यपि ओषधि अथवा अन्न संज्ञक सचेतन द्रव्यों का गुर्वादि गुणों में वर्गीकरण नहीं करते थे तथापि गुरुत्वादि स्वभावों का षड्रसों में अस्तित्व स्वीकार करते ही थे। इस पर गुर्वादि गुण प्रधानता वादियों का यह कथन था कि जब कि षड्रसों में गुरुत्वादि स्वभावों का अस्तित्व और उनके द्वारा साम्य वैषम्य का होना स्वीकार करना ही पड़ता है तब ओषधि व अन्न का इन गुणों में वर्गीकरण करना और उनको साम्य वैषम्य कर मानना ही उचित है।
पंचात्मक लोक पक्षीय दोनों प्रकार का वर्गीकरण करते थे फिरभी उनका अंतिम विश्लेषण पंचधात्वात्मक ही था और इसी हेतु से वे षडास्वादों की उत्पत्ति आकाशादिकों के न्यूनतातिरेक से प्रतिपादन करते थे। इनमें जो द्रव्य प्रधानतावादी थे वे द्रव्य को प्रधान मानते थे। उनका कथन था कि मधुरादि जिह्वा वैषयिक भाव, ( अर्थ ) गुरुत्वादि स्वभाव
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आयुर्वेद-दर्शन
और परादि प्रयत्नांत ये सब द्रव्य के गुण हैं। मधुरादि आस्वादों में जिन गुरुत्वादि गुणों का उल्लेख है वे आस्वादों में नहीं रहते (क्योंकि यह सिद्धांत है कि गुणों में गुण नहीं रहते) बल्कि आस्वादधिकरण द्रव्यों में रहते हैं। और आस्वादों में उनका उल्लेख भी इसी अभिप्राय से किया गया है। अग्नीषोम लोकपक्षियों के प्रति उनका यह भी कथन है कि भिन्न २ तंत्रकारों के भिन्न २ अभिप्राय रहते हैं उन अभिप्रायों को समझ बुझकर ही उनके विधानों का अर्थ लगाना चाहिए। ( च. सू. अ. २६ )
अग्नीषोमवादियों को इस तरह फटकारनेवाले चाहे धातु पंचकवादी ही क्यों न हों पर इसमें पुनर्वसु आत्रेय का भी अंग दिखाई देता है। और इसपर से यह भी ज्ञात होता है कि अग्नीषोमवादी अथवा त्रिधातु सिद्धांतवादी वार्योंविद जो कि षड्हरसों को गुर्वीदि गुणमूलक कहते थे; द्रव्य का प्राधान्यत्व स्वीकार नहीं करते थे। इस विवाद का रहस्य हम को तब तक ज्ञात नहीं होगा जब तक हम वार्योंविद के त्रिधातु सिद्धांत का और पुनर्वसु आत्रेय के अंतिम निर्णय का अभ्यास न करें।
त्रिधातु सिद्धांत का आरंभ
त्रिधातु सिद्धांत के सृष्टि विज्ञान में और षड्हरसवादियों के सृष्टिविज्ञान ( सूर्य, वायु, चंद्र इनसे क्रमशः ऋतु, रस, दोष देह व वल्ल की उत्पत्ति होती है ) में बाह्यतः