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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

चिकित्सा | भाषाटीकासहिता । | ६४६

आनाहेऽर्शोविकारेषु चातुर्थिकज्वरेऽपि च । हनुग्रहे तथा शोषे क्षीणे चैवापबाहुके ॥ ८५ ॥ दण्डापतानके भग्ने दाहे चाक्षेपके तथा । जीर्णज्वरे विषे कुष्ठे शेफःस्तम्भे मदात्यये ॥ ८६ ॥ आढ्यवातेऽग्निमान्द्ये च वातरक्तगदेषु च । एकाङ्गरोगिणे चैव तथा सर्वाङ्गरोगिणे ॥ ८७ ॥ हस्तकम्पे शिरःकम्पे जिह्वास्तम्भे ज्वरे भ्रमे । क्षीणेन्द्रिये नष्टशुके शुक्रनिस्सरणे तथा ॥ ८८ ॥ स्त्रीणां वातास्रपाते च पटले चाक्षिस्पन्दने । एकाङ्गस्पन्दने चैव सर्वाङ्गस्पन्दने तथा ॥ ८९ ॥ नगादिपतिते वाते स्त्रीणामप्राप्तिहेतुके । आभिचारिकदोषे च मनस्सन्तापसम्भवे ॥ १९० ॥

यह घृत सर्व प्रकारके वातरोग, विशेषकर अपस्मार, उन्माद, पक्षाघात, आध्मान, कोष्ठबद्धता, कर्णरोग, शिरोरोग, बधिरताँ, अपतन्त्रक, भूतोन्माद, गृध्रसी, उदररोग, नेत्ररोग, पार्श्वशूल, हृदयशूल, बाह्यायाम, अर्दित, वातकण्टक, हृदयरोग मूत्रकृच्छ्र, पंगुता, क्रोष्टुशीर्ष, खञ्जवात, कुब्जवात, गद्गदवात मिनमिनवात, अपतानक, अन्तरायाम, ऊर्ध्वगत रक्तपित्त, अफारा, बवासीर, चौथिया ज्वर, हनुग्रह, शोष, क्षीणता, अपबाहुक, दण्डापतानक, भग्नरोग, दाह आक्षेप, जीर्णज्वर, विषविकार, कोढ, लिंगस्तम्भ, मदात्यय, आढ्यवात, अग्निकी मन्दता, वातरक्त, एकांगवात, सर्वांगवात, हस्तकम्प, शिरःकम्प, जिह्वाकी जडता, ज्वर, भ्रम, इन्द्रियोंकी क्षीणता, वीर्यकी हीनता शुक्रपात, स्त्रियोंके वातके द्वारा रक्तस्राव होना, पटलगत नेत्ररोग, आँख फडकना, एक अंग व सम्पूर्ण अंगोंका स्पन्दन (फडकना), वृक्ष-पर्वतादिकें ऊपरसे गिरनेसे उत्पन्न हुई वात, स्त्रियोंकी अप्राप्तिके कारण उत्पन्न हुई वात, अभिचारक दोष और मनके सन्तापसे उत्पन्न हुई वातव्याधिमें सेवन करना चाहिये ॥ ८४-१९० ॥

ये वातप्रभवा रोगा ये च पित्तसमुद्भवाः । शिरोमध्यगता ये च जङ्घापार्श्वादिसंस्थिताः ॥ ९१ ॥ मातृग्रहाभिभूतश्च शिशुर्यश्च विशुष्यति । प्रक्षीणबलमांसश्च न वर्त्मगमनक्षमः ॥ ९२ ॥

६४६ | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि-

घृतेनानेन सिध्यन्ति वज्रं मुक्तमिवासुरान् ।
निहन्ति सकलान्रोगान् घृतं परमदुर्लभम् ॥ ९३ ॥

सर्व प्रकारके वातसे उत्पन्न होनेवाले रोग, पित्तसे होनेवाले सर्व प्रकारके रोग, सम्पूर्ण शिरके रोग, जंघा, पसली आदिके रोग, मातृग्रहादिके आक्रमणसे या अन्यान्य दोषोंसे बालकका सूखना, बल और मांसकी क्षीणता और मार्गमें चलनेकी असमर्थता आदि सम्पूर्ण रोग इस घृतके सेवन करनेसे इस प्रकार नष्ट होजाते हैं, जैसे छूटा हुआ वज्र असुरोंको तत्काल नाश करदेता है। यह परमदुर्लभ घृत समस्त रोगोंको हरनेवाला है ॥ ९१–९३ ॥

रसायनं वह्निबलप्रदं च वपुःप्रकर्षं विदधाति रूपम् ।
दन्तावलेन्द्रेण समानतेजा दीर्घायुषं पुत्रशतं करोति ॥ ९४ ॥
स्त्रीणां शतं गच्छति चातिरेकं न याति तृप्तिं सरसः समाङ्गः ।
अपुत्रिणीं पुत्रशतं करोति गतायुषं कामसमं बलिष्ठम् ॥ ९५ ॥
महद् घृतं नाम तु छागलाद्यं विनिर्मितं वातनिषूदनं च ।
शिवं शुभं रोगभयापहं च चकार हारीतमुनिर्विशिष्टः ॥ ९६ ॥

यह घृत रसायन, अग्निप्रदीपक, बलवर्द्धक, शरीरको श्रेष्ठ और सुन्दर करनेवाला, गजेन्द्रकी समान तेजस्वी और चिरायुवाले सौ पुत्रोंको उत्पन्न करनेवाला है। इसको सेवन करनेवाला मनुष्य सौ स्त्रियोंके साथ रमण करे तो भी (सारस पक्षीकी समान) तृप्त नहीं होता तथा समशरीर, अक्षीण वीर्यवाला ही रहता है। वन्ध्यास्त्री भी सैकड़ों पुत्रोंवाली होती है और वृद्ध मनुष्य कामदेवकी समान बलवान् होता है। इस वृद्धच्छागलाद्यनामक घृतको वातके नष्ट करने एवं कल्याण करनेके लिये और रोगोंका भय निवारण करनेके लिये हारीतमुनिने निर्माण किया है ॥ ९४–९६ ॥

हंसाद्यघृत ।

हंसमांसतुलां नीत्वा जलद्रोणे विपाचयेत् ।
पादशेषे रसे तस्मिन्प्रस्थं प्रतनसर्पिषः ॥ ९७ ॥
सैन्धवं कुडवार्द्धं च तैलमेरण्डसम्भवम् ।
कुडवं घृततुल्यं च भूलतासम्भवं रसम् ॥ ९८ ॥
प्रक्षिप्य विपचेत्सर्पिः कुशलो मतिमान् भिषक् ।
पक्षाघातादिवातेषु घृतं स्यादमृतोपमम् ॥ ९९ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६४७

हंसके मांसको १०० पल लेकर ३२ सेर जलमें पकावे। जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर उस रसमें पुराना घी १ प्रस्थ, सेंधानमक १६ तोले, अण्डीका तेल ३२ तोले और केंचुआका रस ६४ तोले डालकर चतुर वैद्य विधिपूर्वक घृतको पकावे। यह घृत पक्षाघात आदि वातरोगमें अमृतकी समान गुण करता है ॥ ९७-९९ ॥

रसोनाद्य तैल ।

रसोनाकल्कस्वरसेन पक्वं तैलं पिबेद्यस्त्वनिलामयार्तः ।
तस्याशु नश्यन्ति च वातरोगा ग्रन्था विशाला इव दुर्ग्रहीताः ॥ २०० ॥

जो वातरोगी लहसनके कल्क और स्वरसके साथ तिलके तैलको पकाकर पान करे तो उसके सम्पूर्ण वातरोग इस प्रकार नष्ट होते हैं जैसे दुष्टबुद्धिके पास पडे हुए महान् ग्रन्थ ॥ २०० ॥

मूलकाद्य तैल ।

मूलकस्वरसं तैलं क्षीरं दध्यम्लकाञ्जिकम् ।
तुल्यं विपाचयेत्कल्कैर्बलाशिग्रुकसैन्धवैः ॥ १ ॥
पिप्पलयतिविषारास्नाचविकागुरुचित्रकैः ।
भल्लातकवचाकुष्ठश्वदंष्ट्राविश्वभेषजैः ॥ २ ॥
पुष्कराह्वशठीबिल्वशताह्वानतदारुभिः ।
तत्सिद्धं पीतमत्युग्रान् हन्ति वातात्मकान् गदान् ॥ ३ ॥

मूलीका रस, तिलका तैल, गौका दूध, दही और काँजी ये सब समान भाग लेवे । कल्कके लिये खिरेंटी, सहिंजना, सेंधानमक, पीपल, अतीस, रायसन, चव्य, अगर, चीता, भिलावा, वच, कूठ, गोखुरू, सोंठ, पोहकरमूल, कचूर, बेलकी छाल, सौंफ, तगर और देवदारु इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र चूर्ण करलेवे और सबको यथाविधि मिलाकर तैलको पकावे । इस प्रकार सिद्ध किये हुए तैलको पीनेसे अत्यन्त प्रबल वातजन्य रोग शीघ्र नष्ट होते हैं ॥

वायुच्छायासुरेन्द्रतैल ।

बल्कलकं पलशतं तत्समं दशमूलकम् ।
जलषोडशिके पक्त्वा पादशेषं समुद्धरेत् ॥ ४ ॥
एतत्क्वाथे पचेत्तैलं द्वात्रिंशत्पलमेव च ।
कल्कार्थं दीयते तत्र मञ्जिष्ठा रक्तचन्दनम् ॥ ५ ॥

६४८भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

कुष्ठमेला देवदारु शैलजं सैन्धवं वचा ।
कक्कोलं पद्मकाष्ठं च शृङ्गी तगरपादिका ॥ ६ ॥
गुडूची मुद्रपर्णी च माषपर्णी शतावरी ।
नागजिह्वा श्यामलता शतपुष्पा पुनर्नवा ॥
एषां तोलद्वयं भागं दत्त्वा तैलं तु पाचयेत् ॥ ७ ॥

खिरेंटी १०० पल और दशमूल १०० पल लेकर दोनोंको पृथक् पृथक् सोलह-गुने जलमें पकावे । जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें तिलका तेल ३२ पल और कल्कके लिये मंजीठ, लालचन्दन, कूठ, इलायची, देवदारु, भुरिछरीला, सैंधानमक, वच, शीतलचीनी, पद्माख, काकड़ासिंगी, तगर, गिलोय, मुगवन, मषवन, शतावर, अनन्तमूल, सारिवा, सोया और पुनर्नवा इन प्रत्येकक दो दो तोल चूर्णको डालकर विधिपूर्वक तैलको पकावे ॥ ४-७ ॥

एतत्तैलवरं नाम्ना वायुच्छायासुरेन्द्रकम् ।
सर्ववातविकारेषु हितं पुंसां च योषिताम् ॥ ८ ॥
क्षीणशुक्रार्त्तवानां च नारीणां च विशेषतः ।
चेतोविकारं हन्त्याशु वातमाक्षेपसम्भवम् ॥ ९ ॥
मर्म्मवातं श्रमकृतं गात्रकम्पादिकं तथा ।
हिक्कां श्वासं च कासं च वातपित्तसमुद्भवम् ॥२१०॥
अपस्मारे महोन्मादे हितं लेपे च भक्षणे
श्रीमद्गहननाथेन रचितं विश्वसम्पदे ॥२११॥

यह वायुच्छायासुरेन्द्रनामक श्रेष्ठ तैल सर्व प्रकारक वातरोगोंमें हितकारी है । विशेषकर क्षीणवीर्यवाले पुरुषों और क्षीणरजवाली स्त्रियोंके लिये अत्यन्त उपकारी है । एवं मानसिकविकार, वातजन्य आक्षेपरोग, मर्मगत वात, श्रमजनित वात, शरीरमें कम्प होना, हिक्कारोग और वातपित्तजन्य श्वास, कासरोगको शीघ्र नष्ट करताहै । अपस्मार और प्रबल उन्माद रोगमें इस तेलको मर्दन और भक्षण करनेसे विशेष उपकार होताहै । इसको संसारके कल्याणके लिये श्रीगहननाथजीने रचा है ॥ ८-२११ ॥

[चिकित्सा] भाषाटीकासहिता । ६४९ <br/>

महाबलातैल ।

बलामूलकषायस्य दशमूलीकृतस्य च । यवकोलकुलत्थानां क्वाथस्य पयसस्तथा ॥ १२ ॥ अष्टावष्टौ शुभा भागास्तैलादेकस्तदेकतः । पचेदावाप्य मधुरं गणं सैन्धवसंयुतम् ॥ १३ ॥ तथाऽगुरुं सर्जरसं सरलं देवदारु च । मञ्जिष्ठा चन्दनं कुष्ठमेलां कालानुसारिवाम् ॥ १४ ॥ मांसी शैलेयकं पत्रं तगरं शारिवां वचाम् । शतावरीमश्वगन्धां शतपुष्पां पुनर्नवाम् ॥ १५ ॥ तत्साधु सिद्धं सौवर्णे राजते मृन्मयेऽपि वा । प्रक्षिप्य कलशे सम्यक् सुनिगुप्ते निधापयेत् ॥ १६ ॥

खिरेंटीकी जडका क्वाथ, दशमूलका क्वाथ, जा, बर और कुलथी इन प्रत्येक का क्वाथ आठ आठ सेर, दूध ९ सेर और तिलका तैल एक सेर लेवे । फिर सबको एकत्र मिलाकर उसमें काकोल्यादि गणकी ओषधियाँ ( जीवक, ऋषमक, ऋद्धि, वृद्धि, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, गिलोय, मुगवन, मषवन, पद्माख, वंशलोचन, काकडासिंगी, जीवन्ती, मुलहठी, दाख, पुण्डारिया) सेंधानमक, अगर, सफेदराल, धूपसरल, देवदारु, मंजीठ, लालचन्दन, कूठ, इलायची, तगर, बालछड, भूरिछरीला, तेजपात, तगर, सारिवा, वच, श्तावर, असगन्ध, सोया और पुनर्नवा इन सब ओषधियोंके समान भाग मिश्रित एक सेर कल्कको डालकर मन्दमन्द अग्नि के द्वारा उत्तम प्रकारसे तैलको सिद्ध करे । फिर उसको सुवर्ण या चाँदी अथवा मिट्टीके शुद्ध बर्त्तनमें भरकर और अच्छे प्रकारसे ढककर रखेदेवे ॥ १२–१६ ॥

बलातैलमिदं नाम्ना सर्ववातविकारनुत् । यथाबलं भिषङ् मात्रां सूतिकायै प्रदापयेत् ॥ १७ ॥ या च गर्भार्थिनी नारी क्षीणशुक्रश्च यः पुमान् । क्षीणवाते मर्महतेऽभिहते मथितेऽथवा ॥ १८ ॥ भग्न श्रमाभिपन्ने च सर्वथैवोपयोजयेत् । सर्वमाक्षेपकादींश्च वातव्याधीन् व्यपोहति ॥ १९ ॥

६५० भैषज्यरत्नावली । [वातव्याधि-


हिक्कां कासमधीमन्थं गुल्मं श्वासं सुदुस्तरम् ।
षण्मासानुपयुञ्जीतदन्त्रवृद्धिमपोहति ॥ २२० ॥
अत्युग्रधातुः पुरुषो भवेच्च नवयौवनः ।
एतद्धि राज्ञा कर्तव्यं राजमात्राश्च ये नराः ॥
सुखिनः सुकुमाराश्च बलिनश्चैव ये नराः ॥ २२१ ॥

यह महाबलानामक तैल सर्वप्रकारके वातरोग और अन्य अनेक रोगोंको नष्ट करता है । वैद्य, यह तेल प्रसूता स्त्रीको उसके बलके अनुसार एवं गर्भकी इच्छा करनेवाली स्त्री और क्षीणवीर्य मनुष्यको यथोचित मात्रासे सेवन करावे । इस तेलको वातके द्वारा शरीर क्षीण होनेपर, मर्महत, अभिहत अथवा मथितवात, अस्थि आदि के टूटजानेपर और श्रमजन्य वातरोगमें सर्वथा प्रयोग करना चाहिये । यह सर्वप्रकारकी आक्षेपादि वातव्याधि, हुचकी, खाँसी, नेत्ररोग, गुल्म, श्वास और अंत्रवृद्धिरोग इन सबको छः मासपर्यन्त सेवन करनेसे नष्ट कर देता है। इसको सेवन करनेसे मनुष्य अत्यन्त प्रबल धातुवाला और नवयौवनयुक्त होता है। राजकर्मचारी मनुष्य, सुख चाहनेवाले और बलकी इच्छा करनेवाले सुकुमार मनुष्योंको राजाकी आज्ञासे यह तेल निर्माणकर सेवन करना चाहिये ॥ १७–२२१ ॥

अश्वगन्धातैल ।

शतं पत्क्त्वाऽश्वगन्धाया जलद्रोणेऽवशेषितम् ।
विस्राव्य विपचेत्तैलं क्षीरं दत्त्वा चतुर्गुणम् ॥ २२ ॥
कल्कैर्मृणालशालूककबिसकिञ्जल्कमालती ।
पुष्पैर्ह्रीबेरमधुकशारिवापद्मकेशरैः ॥ २३ ॥
मेदापुनर्नवाद्राक्षामञ्जिष्ठाबृहतीद्वयैः ।
एलैवालुत्रिफलामुस्तचन्दनपद्मकैः ॥ २४ ॥
पक्वं रक्ताश्रयं वातं रक्तपित्तमसृग्दरम् ।
हन्यात्पुष्टिं बलं कुर्यात्कृशानां मांसवर्द्धनम् ॥ २५ ॥
रेतोयोनिविकारघ्नं व्रणदोषापकर्षणम् ।
षण्ढानपि वृषान्कुर्यात्पानाभ्यङ्गानुवासनैः ॥ २६ ॥

असगन्धको १०० पल लेकर एक द्रोण जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर उसमें तिलका तैल

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६५१

और तेलसे चौगुना दूध डालकर एवं कमलकी नाल, भसींडा, कमलके सूक्ष्म तन्तु, नागकेशर, मालतीके फूल, सुगन्धवाला, मुलहठी, सारिवा, कमलकेशर, मेदा, पुनर्नवा, दाख, मँजीठ, कटेरी, बडी कटेरी, इलायची, एलुआ, त्रिफला, नागरमोथा, चन्दन और पद्माख इन ओषधियोंके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ विधिपूर्वक तैलको सिद्ध करे । यह तैल वातरक्त, रक्तपित्त और रक्तप्रदरको नष्ट करता है । एवं शारीरिक पुष्टि, बल और कृश मनुष्योंके मांसकी वृद्धि करता है । वीर्य और योनिके विकारोंको दूर करता और व्रणके सम्पूर्ण दोषोंको हरता है । पान, मर्दन और अनुवासनवस्तिके द्वारा सेवन करनेसे यह तैल षण्ढ ( नपुंसक ) मनुष्योंकोभी अत्यन्त वीर्यवान् करता है ॥२२–२६॥

श्रीगोपालतैल ।

रसाढकं शतावर्याः कूष्माण्डामलयोस्तथा ।
वाजिगन्धासहचरबलानां च शतं पृथक् ॥ २७ ॥
परिपच्याम्भसां द्रोणे पादशेषेऽवतारयेत् ।
पञ्चमूलं महत् व्याघ्री मूर्वा केतकपूतिका ॥ २८ ॥
पारिभद्रस्य सर्वेषां ग्राह्यं दशपलं शुभम् ।
क्वाथयित्वा जलद्रोणे तत्पादमवशेषयेत् ॥ २९ ॥
आढकं तिलतैलस्य कल्कैरेतैश्च संपचेत् ।
अश्वगन्धा चोरपुष्पी पद्मकं कण्टकारिका ॥ ३० ॥
बलाऽगुरु घनं पूति शिह्लकागुरुचन्दनम् ।
चन्दनं त्रिफला मूर्वा जीवनीयकटुत्रयम् ॥ ३१ ॥
पूतिकुंकुमकस्तूर्यश्चातुर्जातं च शैलजम् ।
नखमुस्तमृणालानि नीलोत्पलमुशीर कम् ॥ ३२ ॥
मांसी मुरा सुरतरुर्वचा दाडिमतुम्बुरू ।
ऋद्धिवृद्धी दमनकं क्षुद्रैलाऽर्द्धपलं पृथक् ॥ ३३ ॥

शतावरका रस १ आढक ( २५६ तोले ), पेठेका रस १ आढक, आमलोंका रस १ आढक, असगन्ध, पीली कटसरैया और खिरैंटी इन तीनोंको सौ सौ पल लेकर पृथक् पृथक् एकएक द्रोण जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहे तब उतारकर छानलेवे । इसी प्रकार बेलकी छाल, शोनापाठेकी.छाल, खम्भारीकी छाल, पाढरकी छाल, अरणीकी छाल, बडी कटेरी, मूर्वाकी जड, केतकीकी

६५२भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

जड, पोईका शाक और फरहदकी छाल इन सबको दसदस पल लेकर एकएक द्रोणपरिमाण जलमें पकाकर चतुर्थांश जल शेष रहनेपर उतारकर छानलेवे । फिर सबको एकत्र मिलाकर उसमें तिलका तैल १ आढक एवं असगन्ध, चोरपुष्पी, पद्माख, कटेरी, खिरेंटी, अगर, नागरमोथा, रोहिषतृण, शिलारस, अगर, लालचन्दन, सफेदचन्दन, त्रिफला, मूर्वा, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, मषवन, जीवन्ती, मुलहठी, त्रिकुटा, रोहिषतृण, केशर, कस्तूरी, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, भूरिछरीला, नख, मोथा, कमलनाल, नीलकमल, खसकी जड, जटामांसी, मुरामांसी, देवदारु, वच, अनार, तुम्बुरु, ऋद्धि, वृद्धि, दौना और छोटी इलायची इन प्रत्येक ओषधिके दो दो तोले कल्कको डालकर मन्दमन्द अग्निके द्वारा उत्तम प्रकारसे तैलको पकावे ॥ २७-३३ ॥

एतत्तैलवरं हन्ति वातपित्तकफोद्भवान् ।
व्याधीनशेषाञ्जनयेत्स्मृतिं मेधां धृतिं धियम् ॥ ३४ ॥
वातरोगान्विशेषेण प्रमेहान् हन्ति विंशतिम् ।
गर्भं संस्थापयेत्स्त्रीणां सर्वं शूलं व्यपोहति ॥
मूत्रकृच्छ्रमपस्मारमुन्मादान्निखिलानपि ॥ ३५ ॥
स्थविरोऽपि जराजीर्णस्तैलस्यास्य निषेवणात् ।
लीलया प्रमदानां च उन्मदानां शतं जयेत् ॥ ३६ ॥
तिष्ठेद्यस्य गृहे तैलं श्रीगोपालाभिधंशुभम् ।
न तत्र भूताः सर्पन्ति न पिशाचा न राक्षसाः ॥ ३७ ॥
न दारिद्र्यं भवेत्तस्य विघ्नः कश्चिन्न जायते ।
अश्विभ्यां निर्मितं ह्येतद्विश्वकल्याणहेतवे ॥ ३८ ॥

यह उत्तम तैल मर्दन करनेसे वात, पित्त और कफसे उत्पन्न हुई सम्पूर्ण व्याधियोंको शीघ्र नष्ट करता है । एवं स्मरणशक्ति, मेधा, धैर्य और बुद्धिको उत्पन्न करता है । विशेषकर वातरोग और बीसों प्रकारके प्रमेहोंको दूर करता है और स्त्रियोंके गर्भको स्थापन करता है । सर्व प्रकारके शूलरोग, मूत्रकृच्छ्र, अपस्मार और सर्वप्रकारके उन्मादरोगोंको नाश करता है । जिसका देह वृद्धावस्थाके द्वारा जीर्ण होगया हो ऐसा वृद्ध मनुष्यभी इस तैलको सेवन करनेसे सैकड़ों उन्मत्त स्त्रियोंको सहजही जीत सकता है । जिसके घरमें यह श्रीगोपालनामक तैल रहता है वहाँ भूत, पिशाच और राक्षस कभी नहीं प्रवेश करते ।

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६५३

उसको न दरिद्रता प्राप्त होती है और न कोई विघ्न उपस्थित होता है । इस तैलको संसारके कल्याणके लिये अश्विनीकुमारोंने निर्माण्ण किया है ॥ ३४-२३८ ॥

विष्णुतैल ।

शालपर्णी पृश्निपर्णी बला च बहुपुत्रिका ।
एरण्डस्य च मूलानि बृहत्योः पूतिकस्य च ॥ ३९ ॥
गवेधुकस्य मूलानि तथा सहचरस्य च ।
एतेषां पलिकैर्भागैस्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥ २४० ॥
आजं वा यदि वा गव्यं क्षीरं दद्याच्चतुर्गुणम् ।
अस्य तैलस्य पक्वस्य शृणु वीर्यमतः परम् ॥ ४१ ॥
अश्वानां वातभग्नानां कुञ्जराणां तथैव च ।
अपुमांश्च नरः पीत्वा निश्चयेन पुमान् भवेत् ॥ ४२ ॥

शालपर्णी, पृश्निपर्णी, खिरेंटी, शतावर, अण्डकी जड, कटेरी, बडी कटेरीकी जड, दुर्गन्धकरञ्जकी जड, गरहेडुकी जड और पियावाँसेकी जड इन प्रत्येकके चार चार तोले कल्क और गौके अथवा बकरीके चार प्रस्थ दूधके साथ एक प्रस्थ ( ६४ तोले ) तिलका तेल मिलाकर यथाविधि पकाना चाहिये । अब इस प्रकार सिद्ध किये हुए तेलके वीर्यको कहता हू, उसको सुनो-यह तेल वातकी प्रबलतासे नष्ट अङ्गवाले हाथी और घोडोंके लिये अत्यन्त हितकर है । पुरुषत्वहीन मनुष्य इस तेलको पान करनेसे अवश्य पुरुषत्वको प्राप्त होता है ॥ ३९-४२ ॥

हृच्छूले पार्श्वशूले च तथैवार्द्धावभेदके ।
कामलापाण्डुरोगेषु शर्करास्वश्मरीषु च ॥ ४३ ॥
क्षीणेन्द्रिया नरा ये च जरसा जजरीकृताः ।
येषां चैव क्षयो व्याधिरन्त्रवृद्धिश्च दारुणा ॥ ४४ ॥
अर्दितं गलगण्डं च वातशोणितमेव च ।
स्त्रियो या न प्रसूयन्ते तासां चैव प्रदापयेत् ॥ ४५ ॥
गर्भमश्वतरी विन्द्यान्न च मृत्युवशं व्रजेत् ।
एतत्तैलवरं चैव विष्णुना परिकीर्त्तितम् ॥ ४६ ॥

हृदयशूल, पार्श्वशूल, अर्द्धावभेदक रोग, कामला, पाण्डुरोग, शर्कराका जाना, पथरीरोगमें एवं वृद्धताके कारण क्षीण होगई हैं इन्द्रिय जिनकी ऐसे और जीर्ण देह-

६५४ भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-

वाले वृद्ध मनुष्योंको तथा क्षयरोग, दारुण अन्त्रवृद्धि, अर्दितवात, गलगण्डरोग और वातरक्तसे युक्तको तथा वन्ध्यास्त्रियोंको यह तेल सेवन करना चाहिये। इसके प्रभावसे खच्चरी भी गर्भको धारण करती है और इसको सेवन करनेवाला मनुष्य मृत्युको प्राप्त नहीं होता, इस अत्युत्तम तेलको विष्णु भगवान्ने वर्णन किया है ॥ २४३-२४६ ॥

बृहद्विष्णुतैल ।

पयोधरं चाश्वगन्धा जीवकर्षभकौ शठी ।
काकोली क्षीरकाकोली जीवन्ती मधुयष्टिका ॥ ४७ ॥
मधूरिका देवदारु पद्मकाष्ठं च शैलजम् ।
मांसी चैला त्वचं कुष्ठं वचा चन्दनकुङ्कुमम् ॥ ४८ ॥
मञ्जिष्ठा मृगनाभिश्च श्वेतचन्दनरेणुकम् ।
पर्णिन्यः कुन्दुरुखोटी च ग्रन्थिकं च नखी तथा ॥ ४९ ॥
एतेषां पलिकैर्भागैस्तैलस्यापि तथाऽऽढकम् ।
शतावरीरसं तुल्यं दुग्धं चापि समं पचेत् ॥ २५० ॥

नागरमोथा, असगन्ध, जिविक, ऋषभक, कचूर, काकोली, क्षीरकाकोली, जीवन्ती, मुलहठी, सौंफ, देवदारु, पद्माख, भूरिछरीला, बालछड, इलायची, दारचीनी, कूट, वच, लालचन्दन, केशर, मंजीठ, कस्तूरी, श्वेतचन्दन, रेणुका, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मुगवन, मषवन, कुन्दुरु, गठिवन और नख इन प्रत्येक औषधिका कल्क चार चार तोले एवं तिलका तैल १ आढक, शतावरका रस १ आढक और गोदुग्ध १ आढक लेवे । इन सबको एकत्र मिलाकर विधिपूर्वक तैलको पकावे ॥ ४७-२५० ॥

विष्णुतैलमिदं श्रेष्ठं सर्ववातविकारनुत् ।
ऊर्ध्ववातं तथा वातमङ्गनिग्रहमेव च ॥ ५१ ॥
शिरोमध्यगतं वातं मन्थास्तम्भं गलग्रहम् ।
हन्ति नानाविधं वातं सन्धिमज्जागतं तथा ॥
यस्य शुष्यति चैकाङ्गं गतिर्यस्य च विह्वला ॥ ५२ ॥
ये वातप्रभावा रोगा ये च पित्तसमुद्भवाः ।
सर्वांस्तान्नाशयत्याशु सूर्यस्तम इवोदितः ॥ ५३ ॥

[ चिकित्सा भाषाटीकासहिता । ६५५

यह श्रेष्ठ विष्णुत्तैल सर्व प्रकारके वातविकारोंको दूर करता है। ऊर्ध्वगत वात' सर्वांगवातकी पीडा, शिरके वातरोग, मन्यास्तम्भ, गलेके रोग, सन्धि व मज्जागत वात और अन्य नानाप्रकारके वातरोगोंको नष्ट करता है। एक अंगका सूख जाना, गतिशक्तिकी शिथिलता एवं वातसे और पित्तसे उत्पन्न हुए सर्व प्रकारके रोगोंको यह तेल इस प्रकार नाश करदेता है जैसे सूर्यका प्रकाश अन्धकारको तत्काल नष्ट करदेता है ॥ ५१–५३ ॥ नारायणतैल ।

शतावरी चांशुमती पृश्निपर्णी शठी बला ।
एरण्डस्य च मूलानि बृहत्योः पूतिकस्य च ॥ ५४ ॥
गवेधुकस्य मूलानि तथा सहचरस्य च ।
एषां दशपलान्भागान्जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ५५ ॥
पादशेषे च पूते च गर्भं चैनं समावपेत् ।
पुनर्नवा वचा दारु शताह्वा चन्दनागुरु ॥ ५६ ॥
शैलेयं तगरं कुष्ठमेला मांसी स्थिरा बला ।
अश्वाह्वा सैन्धवं रास्ना पलार्द्धानि च योजयेत् ॥ ५७ ॥
गव्याजपयसोः प्रस्थौ द्वौ द्वावत्र प्रदापयेत् ।
शतावरीरसप्रस्थं तैलप्रस्थं विपाचयेत् ॥
अस्य तैलस्य सिद्धस्य शृणु वीर्यमतः परम् ॥ ५८ ॥

शतावर, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, कचूर, खिरेंटी, अण्डकी जड, कटेरी और बडी कटेरीकी जड, दुर्गन्धकरञ्जकी जड, गरहेडुयेकी जड, और पियाबाँसेकी जड इन सबको दस दस पल लेकर १ द्रोण जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर वस्त्रमें छान लेवे । फिर इस क्वाथमें पुनर्नवा, वच, देवदारू, सौंफ, रक्तचन्दन, अगर, भूरिछरीला, तगर, कूठ, इलायची, बालछड, शालपर्णी, खिरेंटी, असगन्ध, सैंधानमक और रास्ना इन प्रत्येकका कल्क दो दो तोले, एवं गौका दूध २ प्रस्थ, बकरीका दूध दो प्रस्थ, शतावरका रस १ प्रस्थ और तिलका तैल एक प्रस्थ डालकर उत्तम प्रकारसे तैलको पकावे । अब इस प्रकार सिद्ध कियेहुए तेलके वीर्यको सुनो—५४–५८ ॥

अश्वानां वातभग्नानां कुञ्जराणां तथा नृणाम् ॥ ५९ ॥
तैलमेतत्प्रयोक्तव्यं सर्ववातविकारनुत् ।
आयुष्मांश्च नरः पीत्वा निश्चयेन दृढो भवेत् ॥ ६० ॥

६५६ भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-

गर्भमश्वतरीविन्द्यात्किंपुनर्मानुषी तथा । हृच्छूलं पार्श्वशूलं च वातरक्तं गलग्रहम् ॥ ६१ ॥ अपचीं गण्डमालां च तथैवार्द्धावभेदकम् । कामलां पाण्डुरोगं च अश्मरीं चैव नाशयेत् ॥ ६२ ॥ तैलमेतद्भगवता विष्णुना परिकीर्तितम् । नारायणमिदं ख्यातं वातान्तकरणं परम् ॥ ६३ ॥

यह तेल वातरोगसे टूटगये अंग जिनके ऐसे घोडे, हाथी और मनुष्योंको सेवन कराना चाहिये । इससे सर्वप्रकारके वातरोग नष्ट होते हैं । इसको पान करनेसे मनुष्य दीर्घायु और सुदृढ अंगवाला होता है । इसके सेवन करनेसे खच्चरीभी गर्भको धारण कर लेतीहै फिर स्त्रीका तो कहनाही क्या ? यह तैल हृदयशूल, पसलीकी पीडा, वातरक्त, गलेके रोग, अपची, गण्डमाला, अर्द्धावभेदक, कामला, पाण्डुरोग और पथरी इन सब रोगोंको नष्ट करताहै । इस तैलको विष्णुभगवान्‌ने निर्माण कियाहै, इसलिये इसको नारायणतैल कहते हैं । यह सर्वप्रकारके वातरोगोंको समूल नाश करताहै ॥ २५९-२६३ ॥

मध्यमनारायणतैल ।

बिल्वोऽग्निमन्थः श्योनाकः पाटलः पारिभद्रकः । प्रसारण्यश्वगन्धा च बृहती कण्टकारिका । बला चातिबला चैव श्वदंष्ट्रा सपुनर्नवा ॥ ६४ ॥ एषां दशपलान्भागांश्चतुर्द्रोणेऽम्भसः पचेत् । पादशेषं परिस्राव्य तैलपात्रं प्रदापयेत् । शतपुष्पा देवदारु मांसी शैलेयकं वचा ॥ ६५ ॥ चन्दनं तगरं कुष्ठमेला पर्णीचतुष्टयम् । रास्ना तुरगगन्धा च सैन्धवं सपुनर्नवम् ॥ ६६ ॥ एषां द्विपलीकान्भागान्पेषयित्वा विनिक्षिपेत् । शतावरीरसं चैव तैलतुल्यं प्रदापयेत् ॥ ६७ ॥ आजं वा यदि वा गव्यं क्षीरं दद्याच्चतुर्गुणम् । पाने वस्तौ तथाऽभ्यङ्गे भोज्ये चैव प्रशस्यते ॥ ६८ ॥

बेलकी छाल, अरणीकी छाल, सोनापाठेकी छाल, पाढरकी छाल, फरहदकी छाल, प्रसारणी, असगन्ध, बडी कटेरी, कटेरी, खिरैंटी, कंघी, गोखुरू और

चिकित्सा ] भाषाटीकासहित । ६१७

पुनर्नवा इन सबको दसदस पल लेकर ४ द्रोण जलमें पकावे। जब पकते पकते चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। फिर उसमें तिलका तैल १ आढक ( २५६ तोले ) एवं सोया, देवदारु, बालछड, भूरिछरीला, वच, चन्दन, तगर, कूठ, इलायची, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, माषपर्णी, रास्ना, असगन्ध, सेंधानमक, पुनर्नवा इन प्रत्येक औषधिका कल्क आठ आठ तोले, शतावरका रस एक आढक और बकरी अथवा गौका दूध चार आढक परिमाण डालकर यथाविधि तेलको सिद्ध करे। इस तेलको पान करना, वस्तिक्रिया ( पिचकारी लगाना ), मालिश करना और भोजनादिकर्मोंमें व्यवहार करना चाहिये ॥ ६४-६८ ॥

अश्वो वा वातभग्नो वा गजो वा यदि वा नरः ।
पङ्गुश्च पीठसर्पी च तैलेनानेन सिद्ध्यति ॥ ६९ ॥
अधोभागे च ये वाताः शिरोमध्यगताश्च ये ।
मन्यास्तम्भे हनुस्तम्भे दन्तरोगे गलग्रहे ॥ २७० ॥
यस्य शुष्यति चैकाङ्गं गतिर्यस्य च विह्वला ।
क्षीणेन्द्रियाः क्षीणशुक्रा ज्वरक्षीणाश्च ये नराः ॥ ७१ ॥
बधिरा लम्बजिह्वाश्च मन्दमेधस एव वा ।
अल्पप्रजा च या नारी या च गर्भं न विन्दति ॥७२॥
वातार्त्तौ वृषणौ येषामन्त्रवृद्धिश्च दारुणा ।
एतत्तैलवरं तेषां नाम्ना नारायणं स्मृतम् ॥ ७३ ॥

इस तेलको सेवन करनेसे वातरोगसे पीडित घोडा, हाथी अथवा मनुष्य और पीठसे खिचडनेवाला व पंगु मनुष्य आरोग्य होता है। यह तेल अंधोभागस्थित और शिरोमध्यगत जो वातरोग हैं एवं मन्यास्तम्भ, हनुस्तम्भ, दन्तरोग और गलेके रोगोंमें विशेष उपयोगी है। जिसका एक अंग सूख गया हो, जिसकी गति विह्वल होगयी हो, जो क्षीण इन्द्रिय, नष्टवीर्य और जो ज्वरसे क्षीण देहवाले हैं तथा बहरे, लम्बी जीभ-वाले और मन्दबुद्धिवाले जो पुरुष हैं, अल्प सन्तानवाली और जो कदापि गर्भको धारण नहीं करती ऐसी स्त्री, जिनके अण्डकोष वातसे पीडित हैं और जिनके दारुण आन्त्र-वृद्धि रोग हो उन मनुष्योंको यह अत्युत्तम तेल है । इसको नारायण तैल कहते हैं ॥ २६९-२७३ ॥

महानारायणतैल ।

बिल्वोऽश्वगन्धा बृहती श्वदंष्ट्रा श्योनाकवाटचालक·
पारिभद्रम् । क्षुद्रा कठिल्लाऽतिबलाऽग्निमन्थ मूलानि

४२

६५८भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

चैषां सरणीयुतानाम् ॥ ७४ ॥ मूलं विदध्यादथ पाट-
लानां प्रस्थं सपादं विधिनोद्धृतानाम् । द्रोणैरपामष्टभि-
रेव पक्त्वा पादावशेषेण रसेन तेन ॥ ७५ ॥ तैलाढ-
काभ्यां सममेव दुग्धमाजं निदध्यादथवापि गव्यम् ।
एकत्र सम्यग्विपचेत्सुबुद्धिर्दद्याद्रसं चैव शतावरीणाम् ।
॥ ७६ ॥ तैलेन तुल्यं पुनरेव तत्र रास्नाश्वगन्धामिशि-
दारुकुष्ठम् । पर्णीचतुष्कागुरुकेशराणि सिंधूत्थमांसी-
रजनीद्वयं च ॥ ७७॥ शैलेयकं चन्दनपुष्कराणि एला-
स्र्यष्टीतगराब्दपत्रम् । भृङ्गाष्टवर्गाम्बु वचा पलाशं
स्थौणेयकूशीर कचोरकाख्याम्। एतैः समस्तैर्द्विपलप्रमाणै-
रालोड्य सर्वै विधिना विपक्वम् ॥ ७८ ॥

बेलकी छाल, असगन्ध, बडीकटेरी, गोखुरू, सोनापाठा, खिरेंटी, फरहद, कटेरी, पुनर्नवा, कंघी, अरणी, प्रसारणी और पाढलकी जड इन प्रत्येक ओषधिको अस्सी अस्सी तोले लेकर आठ द्रोण जलमें पकावे । जब पकते पकते दो द्रोण जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथके साथ तिलका तेल दो आढक ( सोलह सेर ), बकरी या गौका दूध दो आढक, शतावरका रस दो आढक एवं रायसन, असगन्ध, सौंफ, देवदारु, कूठ, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, मुद्रपर्णी, माषपर्णी, अगर, केशर, सैंधानमक, वालछड, हल्दी, दारुहल्दी, भूरिछरीला, चन्दन, पोहकरमूल, इलायची, मँजीठ, तगर, नागरमोथा, तेजपात, भाँगरो, अष्टवर्गकी आठों ओषधियाँ ( जीवक, ऋषभक, ऋद्धि, वृद्धि, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली ), सुगन्ध-वाला, वच, ढाककी जड, गठिवन, सफेद पुनर्नवा और चोरक ( भटेउर ) इन सब ओषधियोंके कल्कको आठ आठ तोले मिलाकर विधिपूर्वक तैलको पकावे ७४-७८

कर्पूरकाश्मीरमृगाण्डजानां चूर्णीकृतानां त्रिपलप्रमा-
णम् । प्रस्वेददौर्गन्ध्यनिवारणाय दद्यात्सुगन्धाय वदन्ति
केचित् ॥ ७९ ॥ नारायणं नाम महत् तैलं सर्वप्रकारे-
र्विधिवत्प्रयोज्यम् । आश्वेव पुंसां पवनार्दितानामेकाङ्ग-
हीनादितवेपमानाः ॥ २८० ॥ ये पङ्गवः पीठविसर्पिणश्च
बाधिर्यशुक्रक्षयपीडिताश्च । मन्याहनुस्तम्भशिरो-

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६५९

रुजार्त्ता मुक्तामयास्ते बलवर्णयुक्ताः ॥ ८१ ॥ संसेव्य तैलं सहसा भवन्ति वन्ध्या च नारी लभते च पुत्रम् । वीरो- पमं सर्वगुणोपपन्नं सुमेधसं श्रीविनयान्वितं च ॥ ८२ ॥ शाखाश्रिते कोष्ठगते च वाते वृद्धौ विधेयं पवनार्द्दि- तानाम् । जिह्वानिले दन्तगते च शूले उन्मादकौब्ज्य- ज्वरकर्शितानाम् ॥ ८३ ॥ प्राप्नोति लक्ष्मीं प्रमदाप्रियत्वं वपुःप्रकर्षं विजयं च नित्यम् । तैलोपसेवी जरया विमुक्तो जीवेच्चिरं चापि भवेद्युवेव ॥ ८४ ॥ देवासुरे युद्धपरे समीक्ष्य स्नाव्यस्थिभग्नानसुरैः सुरांश्च । नारा- यणेनामरबृंहणार्थं स्वनामतैलं विहितं च तेषाम् ॥ ८५ ॥

उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजानेपर इसमें सुगन्धिके लिये अथवा प्रस्वेद और दुर्गन्धको दूर करनेके लिये कपूर, केशर और कस्तूरी ये प्रत्येक चार चार तोले बारीक पीसकर मिलादेवे । इसको महानारायणतैल कहते हैं । यह तैल वातसे पीडित मनुष्य, एकाङ्गहीन, अर्दितवात और कम्पवातयुक्त मनुष्योंको सर्वप्रकारसे विधिपूर्वक सेवन कराना चाहिये । जो पंगु मनुष्य हैं और जो पीठसे खिवडते हैं एवं बहरे, वीर्यके क्षयसे पीडित, मन्यास्तम्भ, हनुस्तम्भ और जो शिरोरोगसे पीडित मनुष्य हैं वे इस तेलको सेवन करनेसे सम्पूर्ण रोगोंसे तत्काल मुक्त होजाते हैं और बल वर्णयुक्त होते हैं और वन्ध्या स्त्री-वीरपुरुषकी समान, सर्वगुण सम्पन्न, अत्यन्त बुद्धिमान्, लक्ष्मीवान् और विनययुक्त पुत्रको उत्पन्न करती है । यह तैल शाखागत-वात, कोष्ठस्थित वात और वातसे पीडित मनुष्योंके वातवृद्धि होनेपर, जिह्वागत और दन्तगत वातपीडामें एवं सर्वप्रकारके उन्माद, कुब्जता और ज्वरसे कृशदेहवाले मनु-ष्योंको सेवन करानेसे शीघ्र उपकार होता है । इसको सर्वप्रकारके वातरोगोंमें देना चाहिये । इस तैलको नित्य सेवन करनेवाला मनुष्य लक्ष्मी और स्त्रीसे प्रीति विज-यको प्राप्त होता है । एवं वृद्धमनुष्य जरा ( बुढापा ) से मुक्त होकर युवा पुरुषकी समान चिरकालतक जीवित रहता है । पूर्वकालमें देवता और असुरोंके भयंकर संग्राममें असुरोंके प्रहारसे टूटगये हैं स्नायु और हड्डियें जिनकी ऐसे देवताओंको देखकर श्रीविष्णुभगवान्‌ने उनकी रक्षाके लिये अपने नामसे इस तेलको निर्माण किया है ॥ २७९-२८५ ॥

६६० भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-


पुष्पराजप्रसारणीतैल ।

प्रसारणीपलशतं मूलं चैवाश्वगन्धजम् ।
पञ्चाशत्पलमानं तु जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ ८६ ॥
पादशेषे हरेत्क्वाथं क्वाथांशं तिलतैलकम् ।
तैलाच्चतुर्गुणं क्षीरं गव्यं वा माहिषं तथा ॥ ८७ ॥
पुण्डरीकरसस्तत्र शतावर्या रसस्तथा ।
तैलेन तुल्यो दातव्यः पाचयेन्मृदुवह्निना ॥ ८८ ॥
शतपुष्पा कणा चैव कुष्ठं च कण्टकारिका ।
शुण्ठी यष्टी देवदारु शालपर्णी पुनर्नवा ॥ ८९ ॥
मञ्जिष्ठा पत्रकं रास्ना वचा पुष्करमूलकम् ।
यमानी भूतिकं मांसी निर्गुण्डी च तथा बला ॥ २९० ॥
वह्निगोक्षुरकं चैव मृणालं बहुपुत्रिका ।
प्रतिकर्षमितं योज्यं सर्वमेकत्र पाचयेत् ॥ ९१ ॥

प्रसारणी १०० पल और असगन्धकी जडको ५० पल लेकर १ द्रोण (३२ सेर) जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग ( ८ सेर ) जल शेष रहजाय तब उतारकर छान लेवे । फिर तिलका तेल क्वाथसे चौथाई भाग अर्थात् २ सेर, तेलसे चौगुना गौ अथवा भैंसका दूध एवं श्वेत कमलका रस और शतावरका रस ये प्रत्येक दो दो सेर लेकर सबको एकत्र मिश्रित करके मन्द मन्द अग्निके द्वारा पकावे । पकते समय उसमें सोया, पीपल, कूठ, कटेरी, सोंठ, मुलहठी, देवदारु, शालपर्णी, पुनर्नवा, मंजीठ, तेजपात, रास्ना, वच, पोहकरमूल, अजवायन, गन्धैज-घास, बालछड, निर्गुण्डी, खिरेंटी, चीतेकी जड, गोखरू, कमलकी नाल और शतावर ये प्रत्येक औषधि एक एक कर्ष परिमाण कल्क करके डाल देवे॥८६–२९१॥

तैलशेषं समुद्धृत्य पुष्पराजप्रसारणीम् ।
अभ्यङ्गे योजयेत्पाने नस्यकर्मणि सर्वदा ॥ ९२ ॥
भग्नानां खञ्जपंगूनां शिरोरोगे हनुग्रहे ।
समस्तान्वातजात्रोगांस्तूर्णं नाश्यति ध्रुवम् ॥ ९३ ॥

जब पककर तेलमात्र शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । इस पुष्पराज-प्रसारणीतैलको अभ्यङ्ग, पान और नस्यकर्ममें सदा प्रयोग करे । यह तेल वातसे

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६६१

भग्न होगये हैं अङ्ग जिनके ऐसे खञ्ज और पंगु मनुष्योंके एवं शिरोरोग, हनुग्रह और बातजन्य सम्पूर्ण रोगोंको निश्चयही शीघ्र नष्ट करता है ॥ २९२-२९३ ॥

हिमसागरतैल ।

शतावरीरसप्रस्थे विदार्य्याः स्वरसे तथा ।
कूष्माण्डकरसप्रस्थे धात्र्याश्च स्वरसे तथा ॥ ९४ ॥
शाल्मल्याः स्वरसप्रस्थे तथा गोक्षुरकस्य च ।
नारिकेलरसप्रस्थे तिलतैलस्य प्रस्थतः ॥ ९५ ॥
कडल्याः स्वरसप्रस्थे क्षीरप्रस्थचतुष्टये ।
अस्यौषधस्य कल्कस्य प्रत्येकं कर्षसम्मितम् ॥ ९६ ॥
चन्दनं तगरं वाप्यं मञ्जिष्ठा सरलाऽगुरु ।
मांसी मुरा च शैलेयं यष्टी दारु नखी शिवा ॥ ९७ ॥
पूतिका पीडिका पत्रं कुन्दुरुर्नलिका तथा ।
वरी लोध्रं तथा मुस्तं त्वगेलापत्रकेशरम् ॥ ९८ ॥
लवङ्गं जातिकोषं च तथा मधुरिका शठी ।
चन्दनं ग्रन्थिपर्णं च कर्पूरं लाभतः क्षिपेत् ॥ ९९ ॥

शतावर क रस १ प्रस्थ, विदारीकन्दका स्वरस १ प्रस्थ, पेठेका रस एक प्रस्थ, आमलोंका स्वरस १ प्रस्थ, सेमलकी जडका स्वरस १ प्रस्थ, गोखुरूका रस एक प्रस्थ, नारियलका जल एक प्रस्थ केलेकी जडका स्वरस एक प्रस्थ, तिलका तैल एक प्रस्थ और दूध ४ प्रस्थ लेकर इनमें लालचन्दन, तगर, कूठ, मँजीठ, धूपसरल, अगर, बालछड, कपूरकचरी, भूरिछरीला, मुलहठी, देवदारु, नख, हरड, गन्धमार्जारवीर्य, पोई शाकके पत्ते, कुन्दुरु, नली, शतावर, लोध, नागरमोथा, दारचीनी, इलायची, तेजपात, नागकेशर, लौंग, जावित्री, सौंफ, कचूर, श्वेतचन्दन, गठिवन और कपूर इन प्रत्येक औषधिका कल्क एक एक कर्ष परिमाण अथवा इनमेंसे जितनी औषधियाँ मिल सकें उतनीहीका कल्क डालकर तेलको सिद्ध करे ॥९४-२९९॥

अस्य तैलस्य सिद्धस्य शृणु वीर्य्यमतः परम् ।
उच्चैः प्रपततो वायोर्गजतो वाजिनस्तथा ॥ ३०० ॥
उष्ट्रतो लोष्टपाताच्च पंगूनां पीठसर्पिणाम् ।
एकाङ्गशोषिणां चैव तथा सर्वाङ्गशोषिणाम् ॥ १ ॥

६६२भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

क्षतानां क्षीणशुक्राणामत्यन्तक्षयरोगिणाम् ।
हनुमन्याहतानां च दुर्बलानां तथैव च ॥ २ ॥
शोषिणां लम्बजिह्वानां तथा मिन्मिनभाषिणाम् ।
अत्यन्तदाहयुक्तानां क्षीणानां वातरोगिणाम् ॥ ३ ॥
एतत्तैलवरं श्रेष्ठं विष्णुना परिकीर्तितम् ।
हिमसागरमाख्यातं सर्ववातविकारनुत् ॥ ४ ॥
ये वातप्रभवा रोगा ये च पित्तसमुद्भवाः ।
शिरोमध्यगता ये च शाखामाश्रित्य ये स्थिताः ॥
ते सर्वे प्रशमं यान्ति तैलस्यास्य प्रसादतः ॥ ५ ॥

अब इस सिद्ध तेलके प्रभावको सुनो-उच्चस्थान, वात व हाथी, घोडा, ऊंट और मकानपरसे गिरेहुए मनुष्योंके लिये एवं पंगु (लँगडे), पीठसे खिंचडनेवाले, जिनका एक अंग सूख गया हो या जिनके सम्पूर्ण अंग सूख गये हों ऐसे मनुष्य, क्षयरोगी, क्षीणवीर्यवाले, अत्यन्त क्षयरोगी, हनुस्तम्भ और मन्यास्तम्भरोगी, दुर्बलमनुष्य, शोषरोगी, लम्बी जिह्वावाले और मिन्मिनाकर बोलनेवाले रोगी, अत्यन्त दाहयुक्त, क्षीणदेहवाले और वातरोगसे ग्रसित मनुष्योंके लिये यह तैल अत्यन्त श्रेष्ठ है। इस हिमसागरनामक तेलको विष्णुभगवान्ने वर्णन किया है। यह सर्व प्रकारके गतविकारोंको नष्ट करनेवाला है। वातसे उत्पन्नहुए, पित्तसे उत्पन्नहुए, शिरमें होनेवाले और शाखाश्रित जितने रोग हैं वे सब इस तेलके प्रभावसे नाश होते हैं ॥ ३००-५॥

सिद्धार्थकतैल ।

शतावरीस्तु निष्पीड्य रसं प्रस्थद्वयं हरेत् ।
तिलतैलं पचेत्प्रस्थं क्षीरं दत्त्वा चतुर्गुणम् ॥ ६ ॥
शतपुष्पा देवदारु मांसी शैलेयकं बला ।
चन्दनं तगरं कुष्ठमेला चांशुमती तथा ॥ ७ ॥
रास्ना तुरगगन्धा च समङ्गा शारिवाद्वयम् ॥ ८ ॥
सिन्धूद्भवं समं दद्याद्विश्वभेषजमेव च ।
एभिस्तैलं पचेद्धीमान् दत्त्वाऽऽर्द्रकरसं समम् ॥ ९ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६६३

शतावरको कूटकर निकालाहुआ रस २ प्रस्थ ( १२८ तोले ), तिलका तैल १ प्रस्थ ( ६४ तोले ), गौका दूध ४ प्रस्थ, अदरखका रस १ प्रस्थ और कल्कके लिये सोया, देवदारु, बालछड, भूरिछरीला, खिरेंटी, लाल चन्दन, तगर, कूठ, इलायची, शालपर्णी, रायसन, असगन्ध, वराहक्रान्ता, उसवा, अनन्तमूल, पृश्निपर्णी वच, अण्डकी जड, सेंधानमक और सोंठ इन सब औषधियोंको समान भाग मिश्रित १६ तोले लेकर सबको यथाविधि एकत्र करके उत्तम प्रकारसे तैलको सिद्ध करे ॥ ३०६-३०९ ॥

कौब्ज्येन वामना ये च पङ्गुपादाश्च ये नराः ।
महावातेन ये भग्ना अङ्गसङ्कुटिताश्च ये ॥ ३१० ॥
तेषां हितमिदं तैलं सन्धिवाते च शस्यते ।
येषां शुष्यति चैकाङ्गं गतिर्येषां च विह्वला ॥ ३११ ॥
क्षीणेन्द्रिया नष्टशुक्रा जरया जर्जरीकृताः ।
अमेधसश्च बधिरास्तेषामपि परं हितम् ॥ ३१२ ॥
मासमेकं पिबेद्यस्तु यौवनस्थः पुनर्भवेत् ।
सिद्धार्थकमिति ख्यातं नरनारीहिताय च ॥ ३१३ ॥

यह तेल-कुब्जताके होनेसे जो बौने होगये हैं, जो लँगडे हैं, जिनके भयङ्कर वातव्याधिसे शरीर नष्ट होगये हैं या जिनके अङ्ग कुचलगये हैं ऐसे मनुष्योंको अत्यन्त हितकारी है सन्धिगत वातमें एवं जिनका एक अङ्ग सूख गया है, जिनकी गति विह्वल है, जो क्षीण इन्द्रिय, क्षीणवीर्य मनुष्य, वृद्धतासे जर्जर होगये हैं देह जिनके ऐसे वृद्ध, बुद्धिहीन और बहरे जो मनुष्य हैं उनके लिये भी यह अत्यन्त उपयोगी है । जो एक महीनेतक इस तेलको निरन्तर पान करे तो वृद्ध मनुष्य फिर युवा होजाता है । यह सिद्धार्थक नामक तैल स्त्री और पुरुषोंके कल्याणके लिये प्रसिद्ध है ॥ ३१०-३१३ ॥

नकुलतैल ।

मधुकं जीरकं रास्ना सैन्धव शतपुष्पिका ।
यमानीमरीचं कुष्ठं विडङ्गं गजपिप्पली ॥ ३१४ ॥
सौवर्चलं चाजमोदा बला षड्ग्रन्थिका तथा ।
ग्रन्थिकं शैलजं मांसी कर्षमेषां पृथक्पृथक् ॥ ३१५ ॥

६६४भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

विनीय पाचयेत्तैलं प्रस्थं रुबुसमुद्भवम् ।
प्रस्थे च नकुलमांसस्य क्वाथे च दशमूलजे ।
प्रस्थे च काञ्जिकस्यापि मस्तुप्रस्थे तथैव च ॥ १६ ॥

नौलेका मांसरस, दशमूलका क्वाथ, काँजी और दहीका तोड इन सबको एक-एक प्रस्थ लेकर एकत्र मिलालेवे । फिर इसमें अण्डीका तेल एक प्रस्थ और कल्कके लिये मुलहठी, जीरा, रासन, सैंधानमक, सोया, अजवायन, मिरच, कूट, वाय-विडङ्ग, गजपीपल, कालानमक, अजमोद, खिरेंटी, वच, पीपलामूल, मूरिछरीला और बालछड इन प्रत्येकके कल्कको दो दो तोले डालकर विधिपूर्वक तेलको पकावे ॥ १४-१६ ॥

सिद्धं तैलमिदं हन्ति कम्पवातं सुदारुणम् ।
हस्तकम्पं शिरःकम्पं बाहुकम्पं च नाशयेत् ॥ १७ ॥
आमवातं समूलं च सर्वोपद्रवसंयुतम् ।
पानाभ्यञ्जनवस्तीभिर्नाशयेन्नात्र संशयः ॥ १८ ॥
आढ्यवातं कटीपृष्ठजानुजङ्घाश्रितं तथा ।
सन्धिस्थं वातमाश्वेव जयेन्नकुलसंज्ञकम् ॥ १९ ॥
हारीतभाषितमिदं तैलं हितचिकीर्षया ।
वैद्यानां सारभूतानां शतेनापि समुज्झितम् ॥ ३२० ॥
वातव्याधिनिहन्त्याशु कम्पवातं विशेषतः ।
अशीतिं वातजान्रोगान्नाशयेदाशु देहिनाम् ॥ २१ ॥

इस प्रकार सिद्ध कियाहुआ यह तैल दारुण कम्पवात, हाथोंका काँपना, शिरका काँपना, बाहुओंका काँपना, सर्वप्रकारके उपद्रव और शूलसहित आमवातरोग इन सबको निश्चय नाश करता है। इस नकुलनामक तैलको पान, मर्द्दन और वस्ति-क्रियाद्वारा प्रयोग करनेसे आढ्यवात एवं कमर, पीठ, जानु, जङ्घा और सन्धिस्थान-गत वातकी पीडा तत्काल नाश होती है। इस तैलको सम्पूर्ण प्राणियोंका हित करनेकी इच्छासे हारीतमुनिने वर्णन किया है। जिसको सैकडों बडे बडे योग्य चिकित्सकोंने त्यागदिया हो ऐसे वातरोगको यह तैल शीघ्र नष्ट करता है । विशेष-कर यह मनुष्योंके कम्पवात और अस्सीप्रकारके वातरोगोंको बहुत शीघ्र दूर करता है ॥ ३१७-३२१ ॥