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भैषज्य रत्नावली (गोविन्ददास सेन - सान्वय भाषा टीका सहित)

Bhaishajya Ratnavali Hindi

कविराज गोविन्ददास सेन (टीकाकार: वैद्य शंकरलाल) द्वारा

स्रोत: Bhaishajya Ratnavali with Hindi Translation by Vaidya Shankar Lal (1942) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,416 पृष्ठ

दशमांसपलत्रिंशज्झिण्टिकापञ्चविंशतिः ।

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६६६

महाकुक्कुटमांसतैल ।

माषस्यार्द्धाढकं देयं दशमूल्यास्तुलार्द्धकम् ।
बलामूलं च तस्यार्द्धं केतकीनां तथैव च ॥ २२ ॥
दशमांसपलत्रिंशज्झिण्टिकापञ्चविंशतिः ।
जलद्रोणद्वये पक्त्वा पादशेषेऽवतारिते ॥ २३ ॥
तिलतैलस्य च प्रस्थं पयो दत्त्वा चतुर्गुणम् ।
जीवनीयानि यान्यष्टौ मञ्जिष्ठाचव्यकट्फलम् ॥ २४ ॥
व्योषं रास्ना कणामूलं मधुकं पुष्करं तथा ।
माषात्मगुप्ता सैरण्डा शताह्वा लवणत्रयम् ॥ २५ ॥
कृष्णाऽश्वगन्धा ह्यमृता यमानीन्द्रवरी शठी ।
नागरं मागधी मुस्तं वर्षाभू रजनीद्वयम् ॥
शतावरी बृहत्यौ च एतैरक्षसमन्वितैः ॥ २६ ॥

उरद ४ सेर, दशमूल ५० पल, खिरेंटीकी जड २५ पल, केतकीकी जड २५ पल, मुर्गेका मांस ३० पल और पियाबांसेकी जड २५ पल इन सबको दो द्रोण जलमें पकाकर चौथाई भाग जल शेष रहनेपर उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें तिलका तैल एक प्रस्थ, गौका दूध ४ प्रस्थ एवं जीवनीयगणकी आठों ओषधियाँ, मँजीठ, चव्य, कायफल, त्रिकुटा, रायसन, पीपलामूल, मुलहठी, पोहकरमूल, उरद, कौंचके बीज, अण्डकी जड, सोया, बिडनमक, सेंधानमक, कालानमक, काली असगन्ध, गिलोय, अजवायन, इन्द्रजौ, कचूर, सोंठ, पीपल, नागरमोथा, पुनर्नवा, हल्दी, दारुहल्दी, शतवर, बडी कटेरी और कटेरी इन प्रत्येकके दो दो तोले कल्कको मिलाकर उत्तम प्रकारसे तैलको सिद्ध करै ॥ ३२२-३२६ ॥

पक्षाघातेषु सर्वेषु अर्दिते च हनुग्रहे ॥ २७ ॥
मन्दश्रुतौ चाश्रवणे तिमिरे च त्रिदोषजे ।
हस्तकम्पे शिरःकम्पे गात्रकम्पे शिरोग्रहे ॥ २८ ॥
शस्तं कलायखञ्जे च गृध्रस्यामपबाहुके ।
बाधिर्ये कर्णनादे च सर्ववातविकारनुत् ॥ २९ ॥
दण्डापतानके चैव मन्यास्तम्भे विशेषतः ।
हनुस्तम्भे प्रशस्तं स्यात्सूतिकातङ्कनाशनम् ॥ ३० ॥

६६६भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

त्वच्यं मांसप्रदं चैव शुक्राग्निवलवर्द्धनम् ।
अण्डवृद्धचन्त्रवृद्धिं वा वातरक्तं च नाशयेत् ॥ ३१ ॥

इस तैलको पक्षाघात, अर्दित, हनुग्रह, श्रवणशक्तिका नाश, त्रिदोषजन्य नेत्ररोग, हस्तकम्प, शिरःकम्प, देहकम्प, शिरःपीडा, कलायखञ्ज, गृध्रसी, अपबाहुक, बहरापन, कर्णनाद, दण्डापतानक, विशेषकर मन्यास्तम्भ और हनुस्तम्भ इन सब रोगोंमें सेवन करना । यह तैल सर्वप्रकारके वातरोग, प्रसूतसम्बन्धी सब रोग, अण्डवृद्धि, अन्त्रवृद्धि और वातरक्तरोगको नाश करता है। एवं त्वचाको हितकारी, वीर्य, अग्नि बलकी वृद्धि करता है ॥ २७-३१ ॥

माषतैल १-२ ।

तैलं संकुचितेऽभ्यङ्गे माषसैन्धवसाधितम् ।
बाहुशीर्षगते नस्यं पानं चोत्तरवस्तिकम् ॥
क्वाथोऽत्र माषनिष्पाद्यः सैन्धवं कल्कमेव च ॥ ३२ ॥

१—उड़द और सैन्धेनमकके द्वारा सिद्ध कियेहुए तैलको वायुके द्वारा शरीरमें संकोच होनेपर और बाहुशीर्षगत वातरोगमें मर्दन, नस्य, पान और उत्तरवस्तिद्वारा प्रयोग करनेसे शीघ्र उपकार होता है । इसमें उड़दोंका क्वाथ और सेंधानमकका कल्क लेना चाहिये ॥ ३२ ॥

माषात्मगुप्तातिरसो रुबूकरास्नाशताह्वालवणैः सुपिष्टैः ।
चतुर्गुणे माषबलाकषाये तैलं कृतं हन्ति च पक्षवातम् ॥ ३३ ॥

२—उड़द, कौंचके बीज, मूर्वा, अण्डकी जड, रास्ना, सोया और सेंधानमक इन सबके समान भाग मिश्रित कल्कके साथ उड़द और खिरेंटीके चौगुने क्वाथमें सिद्ध किया हुआ तिलका तैल पक्षवातरोगको नष्ट करता है ॥ ३३ ॥

लघुमाषतैल ।

माषप्रस्थं समावाप्य पचेत्सम्यग्जलाढके ।
पादशेषे रसे तस्मिन् क्षीरं दद्याच्चतुर्गुणम् ॥ ३४ ॥
प्रस्थं च तिलतैलस्य कल्कं दत्त्वाऽक्षसम्मितम् ।
जीवनीयानि यान्यष्टौ शतपुष्पां ससैन्धवाम् ॥ ३५ ॥
रास्नाऽऽत्मगुप्ता मधुकं बला व्योषं त्रिकण्टकम् ।
पक्षाघातेऽर्दिते वाते कर्णशूले च दारुणे ॥ ३६ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६६७

मन्दश्रुतौ चाश्रवणे तिमिरे च त्रिदोषजे ।
हस्तकम्पे शिरःकम्पे विश्वाच्यामपबाहुके ॥ ३७ ॥
शस्तंकलायखञ्जे च पानाभ्यञ्जनवस्तिभिः ।
माषतैलमिदं श्रेष्ठमूर्ध्वजत्रुगदापहम् ॥ ३८ ॥
उत्तम उड़दोंको १ प्रस्थ लेकर एक आढ़क जलमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रह जाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें दूध ४ प्रस्थ, तिलका तैल १ प्रस्थ एवं जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, ऋद्धि, वृद्धि, सोया, सेंधानमक, रास्ना, कौंचके बीज, मुलहठी, खिरेंटी, त्रिकुटा और गोखुरू इन सब औषधियोंके कल्कको दो दो तोले डालकर विधिपूर्वक उत्तम प्रकारसे तैलको सिद्ध करे । इस तैलको पान, अभ्यञ्जन ( मालिश ) और वस्तिक्रियाद्वारा पक्षाघात, अर्दितवात, दारुण कानकी पीडा, श्रवणशक्तिका ह्रास, बहरापन, त्रिदोष-जन्य नेत्ररोग, हस्तकम्प, शिरःकम्प, विश्वाची, अपबाहुक और कलायखञ्ज इन सब वातरोगोंमें प्रयोग करना चाहिये । यह माषतैल ऊर्ध्वजत्रुरोगको दूर करनेके लिये अत्युत्तम है ॥ ३४-३८ ॥

बृहन्माषतैल ।

माषातसीयवकुरुण्टककण्टकारीगोकण्टटुण्टुकजटाकपि-
कच्छुतोयैः । कार्पासकास्थिशणबीजकुलत्थकोल-
क्वाथेन बस्तपिशितस्य रसेन चापि ॥ ३९ ॥ शुण्ठ्या
समागधिकया शतपुष्पया च सैरण्डमूलसपुनर्नवया
सरण्या । रास्नाबलामृतलताकटुकैर्विपक्वं माषाख्यमेत-
दपबाहुहरं च तैलम् ॥ ४० ॥ अर्द्धाङ्गशोषमपतानक-
माढ्यवातमाक्षेपकं सभुजकम्पशिरःप्रकम्पम् । नस्येन
वस्तिविधिना परिषेचनेन हन्यात्कटीजघनजानुरुजश्च
सर्वाः ॥ ४१ ॥

उड़द, अलसी, जौ, पियाबाँसकी जड, कटेरी, गोखरू, शोनापाठेकी जडकी छाल, बालछड, कौंचके बीज, कपासके बीज ( बिनौले ), सनके बीज, कुलथी और सूखे बेर इन प्रत्येकके क्वाथ और बकरेके मांसरसके साथ सोंठ, पीपल, सोया, अण्डकी जड, पुनर्नवा, प्रसारिणी, रास्ना, खिरेंटी, गिलोय और कुटकी इन औषधियोंके

६६८ भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-

समान भाग मिश्रित कल्कके साथ तिलके तैलको यथाविधि पकावै । यह बृहन्मा- षनामक तैल नस्य, बस्तिक्रिया और मालिशद्वारा प्रयोग करनेसे अपबाहुकवात, अर्द्धाङ्गशोष, अपतानक, आन्ध्रवात, आक्षेपक वातरोग, बाहुकम्प, शिरःकम्प एवं कमर, जंघा और जानुगत सर्वप्रकारके रोगोंको निवारण करता है ॥ ३९-४१॥

सप्तप्रस्थमहामाषतैल ।

माषक्वाथे बलाक्वाथे रास्नाया दशमूलजे । यवकोलकुलत्थानां छागमांसरसे पृथक् ॥ ४२ ॥ प्रस्थे तैलस्य च प्रस्थं क्षीरं दत्त्वा चतुर्गुणम्। रास्नात्मगुप्तासिन्धूत्थशताह्वैरण्डमुस्तकैः ॥ जीवनीयबलाव्योषैः पचेदक्षसमैर्भिषक् ॥ ४३ ॥ हस्तकम्पे शिरःकम्पे बाधिर्ये चापबाहुके । बाहुशोषे कर्णशूले कर्णनादे च दारुणे ॥ ४४ ॥ विश्वाच्यामर्दिते कौब्ज्ये गृध्रस्यामपतानके । वस्त्यभ्यञ्जनपानेषु नावने च प्रयोजयेत् ॥ ४५ ॥ माषतैलमिदं श्रेष्ठमूर्ध्वजत्रुगदापहम् । क्वाथप्रस्थाः षडेवात्र विभक्त्यन्तेन दर्शिताः ॥ ४६ ॥

उडदोंका क्वाथ, खिरैंटीका क्वाथ, रास्नाका क्वाथ, दशमूलका क्वाथ एवं जौं बेर, कुलथी इन तीनोंका मिश्रित क्वाथ और बकरेका मांसरस ये प्रत्येक एक प्रस्थ लेकर एकत्र मिलालेवे । फिर उसमें तिलका तेल एक प्रस्थ, दूध चार प्रस्थ एवं रास्ना, कौंचके बीज, सैन्धानमक, सोया, अण्डकी जड, नागरमोथा, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, मषवन, जीवन्ती, मुलहठी, खिरैंटी, सोंठ, मिरच और पीपल इन प्रत्येकके कल्कको दो दो तोले डालकर उत्तम प्रकारसे तैलको पकावे । इस तैलको हस्तकम्प, शिरःकम्प, बधिरता, अपबा- हुक, बाहुशोष, कर्णशूल, दारुण कर्णनाद, विश्वाची, अर्दित, कुबडापन, गृध्रसी, अपतानक आदि वातरोगोंमें बस्तिक्रिया, मर्द्दन, पान और नस्यकर्मद्वारा प्रयोग करनेसे शीघ्र लाभ होता है। यह तेल ऊर्ध्वजत्रुरोगको नाश करनेके लिये अत्यन्त श्रेष्ठ औषध है । इसमें छः क्वाथ एक एक प्रस्थ लेना । यह बात क्वाथद्रव्यवाचक- शब्दोंके अन्तमें स्थित विभक्तियों द्वारा मालूम होती है ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६६९

महामाषतैल ।

माषस्यार्द्धाढकं दत्त्वा तुलार्द्धं दशमूलतः ।
पलानि च्छागमांसस्य त्रिंशद्रोणेऽम्भसः पचेत् ॥ ४७ ॥
पूतशीते कषाये च चतुर्थांशावशेषिते ।
प्रस्थं च तिलतैलं च पयो दद्याच्चतुर्गुणम् ॥ ४८ ॥
आत्मगुप्ता रुबूकं च शताह्वा लवणत्रयम् ।
जीवनीयानि मञ्जिष्ठा चव्यचित्रककट्फलम् ॥ ४९ ॥
सव्योषं पिप्पलीमूलं रास्ना मधुकसैन्धवम् ।
देवदार्वमृता कुष्ठं वाजिगन्धा वचा शठी ॥
एतैरक्षसमैर्भागैः साधयेन्मृदुनाऽग्निना ॥ ५० ॥

कपडेकी पोटलीमें बंधेहुए उडद अर्द्धाढक, दशमूल ५० पल और पोटलीमें बँधाहुआ बकरेका मांस ३० पल लेकर इन सबको १ द्रोण जलमें पकावे । पकते पकते जब चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर शीतल होनेपर वस्त्रमें छानलेवे । फिर इस क्वाथमें तिलका तैल १ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ एवं कौंच, अण्डकी जड, सोया, सेंधानमक, विरियासञ्चरनमक, कालानमक, जीवनीयगणकी दशों ओषधियाँ, मंजीठ, चव्य, चीतेकी जड, कायफल, त्रिकुटा, पीपलामूल, रास्ना, मुलहठी, सैंधानमक, देवदारु, गिलोय, कूठ, असगन्ध, वच और कचूर इन सब ओषधियोंके दो दो तोले कल्कको डालकर मन्दमन्द अग्निके द्वारा तैलको पकावे ॥ ४७–५० ॥

पक्षाघातेऽर्दिते वाते बाधिर्य्ये हनुसंग्रहे ।
कर्णमन्याशिरःशूले तिमिरे च त्रिदोषजे ॥ ५१ ॥
पाणिपादशिरोग्रीवाभ्रमणेमन्दसंक्रमे ।
कलायखञ्जे पाङ्गुल्ये गृध्रस्यामपबाहुके ॥ ५२ ॥
पाने वस्तौ तथाऽभ्यङ्गे नस्ये कर्णाक्षिपूरणे ।
तैलमेतत्प्रशंसन्ति सर्व्ववातरुजापहम् ॥ ५३ ॥

यह तैल—पक्षाघात, अर्दितवात, बधिरता, हनुग्रह, कर्णशूल, मन्यास्तम्भ, शिरःशूल, त्रिदोषज तिमिररोग, हाथ, पाँव, शिर और गर्दनका हिलना, शनैः शनैः चलना, कलायखञ्ज, पंगुता, गृध्रसीवात और अपबाहुक आदि वातरोगोंमें अत्यन्त प्रशंसनीय

दशमूलाढकं पक्त्वा जलद्रोणेऽङ्घ्रिशेषिते ।

६७० | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि-


औषध है । इस तैलको पान, बस्तिकर्म, मर्दन, नस्य आदि कार्योंमें एवं कानों और आँखोंमें भरना आदि क्रियाओं द्वारा व्यवहार करे । यह सर्वप्रकारके वातरोगोंको नष्ट करनेवाला है ॥ ५१–५३ ॥

निरामिषमहामाषतैल ।

दशमूलाढकं पक्त्वा जलद्रोणेऽङ्घ्रिशेषिते ।
तद्वन्माषाढकक्वाथे तैलप्रस्थं पयःसमे ॥ ५४ ॥
कल्केरेतैश्च मतिमान् साधयेन्मृदुनाऽग्निना ।
अश्वगन्धा शठी दारु बला रास्ना प्रसारिणी ॥ ५५ ॥
कुष्ठं परूषकं भार्गी द्वे विदार्यौ पुनर्नवा ।
मातुलुङ्गफलाजाज्यौ रामठं शतपुष्पिका ॥ ५६ ॥
शतावरी गोक्षुरकं पिप्पलीमूलचित्रकौ ।
जीवनीयगणं सर्वं सहृत्यैव ससैन्धवम् ॥ ५७ ॥
तत्साधु सिद्धं विज्ञाय माषतैलमिदं महत् ।
वस्त्यभ्यञ्जनपानेषु नावने च प्रशस्यते ॥ ५८ ॥

एक आढक परिणाम दशमूलको एक द्रोण जलमें पकाकर चौथाई भाग जल शेष रहनेपर उतारकर छानलेवे । इसी प्रकार एक आढक उडदोंका क्वाथ सिद्धकर दोनोंको एकत्र मिलालेवे । फिर उसमें तिलका तैल १ प्रस्थ, दूध ४ प्रस्थ एवं असगन्ध, कचूर, देवदारु, खिरैंटी, रायसन, प्रसारिणी, कूठ, फालसे, भारंगी, विदारीकन्द, क्षीरविदारी, पुनर्नवा, बिजौरानींबू, जीरा, कालाजीरा, हींग, सोया, शतावर, गोखुरू, पीपलामूल, चीतेकी जड, जीवनीयगणकी सब औषधियाँ और सैंधानमक इन सबके समान भाग मिलित कल्कको तैलसे चौथाई भाग डालकर यथाविधि तैलको पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब इस महामाष तैलको बस्तिक्रिया, अभ्यञ्जन ( मालिश करना ), पान करना और नस्य देना इन क्रियाओं द्वारा प्रयोग करना चाहिये ॥ ५४–५८ ॥

पक्षाघाते हनुस्तम्भे अर्दिते सापतन्त्रके ।
अपबाहुकविश्वाच्योः खांज्यपाङ्गुल्ययोरपि ॥ ५९ ॥
शिरोमन्याग्रहे चैव अधिमन्थे च वातिके ।
शुक्रक्षये कर्णनादे कर्णक्ष्वेडे च दारुणे ।
कलायखञ्जशमने भैषज्यमिदमादिशेत् ॥ ३६० ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६७१


यह औषध–पक्षाघात, हनुस्तम्भ, अर्दित, अपतन्त्रक, अपबाहुक, विश्वाची, खञ्जवात, पंगुता, शिरःपीडा, मन्यास्तम्भ, वातज नेत्ररोग, शुक्रक्षय, कर्णनाद, दारुण कर्णक्ष्वेड और कलायखञ्ज, इन सब रोगोंको शमन करनेके लिये अत्यन्त उपयोगी है ॥ ५९–३६० ॥

माषबलादितैल ।

माषक्वाथे बलाक्वाथे रास्नाया दशमूलजे ।
प्रसारिण्याः शताह्वायाः प्रस्थं दद्याद्विचक्षणः ॥ ६१ ॥
एतत्क्वाथैस्तैलसमो दधि क्षीरं समं समम् ।
लाक्षारसं काञ्जिकं च तिलतैलं प्रदापयेत् ॥ ६२ ॥
शतावरीविदार्योश्च रसं तैलादर्द्धमेव च ।
शताह्वा मधुरी मेथी रास्ना वारणपिप्पली ॥ ६३ ॥
मुस्तकं चाश्वगन्धा च उशीरं मधुयष्टिका ।
शालपर्णी पृश्निपर्णी बला च बहुपुत्रिका ।
पलद्वयं गृहीत्वा च तैलपात्रे प्रदापयेत् ॥ ६४ ॥

उडदका क्वाथ, खिरेंटीका क्वाथ, रास्नाका क्वाथ, दशमूलका क्वाथ, गन्धप्रसारणीका क्वाथ, सोयेका क्वाथ, तिलका तेल, दही, दूध, लाखका रस और काँजी इन सबको एक एक प्रस्थ, शतावर और विदारीकन्दका क्वाथ आधा आधा प्रस्थ ( ३२–३२ तोले ) लेकर एकत्र कर मन्द २ अग्निके द्वारा उत्तम प्रकारसे पकावे । पकते समय उसमें सोया, साफ, मेथी, रास्ना, गजपीपल, नागरमोथा, असगन्ध, खस, मुलहठी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, खिरेंटी, और शतावर इन ओषधियोंके कल्कको आठ आठ तोले लेकर डालदेवे जब तैल अच्छे प्रकारसे पककर सिद्धहो जाय तब उतारकर वस्त्रमें छान लेवे ॥ ६१–६४ ॥

वातरोगं निहन्त्याशु मन्यास्तम्भं नियच्छति ।
हनुस्तम्भविकारं च जिह्वादन्तगलग्रहान् ॥ ६५ ॥
प्रमेहान्विंशतिं हन्ति गात्रकम्पादिकं जयेत् ।
एतान्हरति रोगांश्च तैलं माषबलादिकम् ॥ ६६ ॥

यह माषबलादि तैल सम्पूर्ण वातरोग, मन्यानाडीका जकडजाना, हनुस्तम्भरोग, जीभ, दाँत और गलेकी पीडा, बीसों प्रकारके प्रमेह और शरीरका काँपना इन सब रोगोंका शीघ्र नष्ट करता है ॥ ६५ ॥ ६६ ॥

पादशेषे समं तैलं दधि दद्यात्सकाञ्जिकम् ॥ ६७ ॥

६७२भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

कुब्जप्रसारणी तैल ।

प्रसारणीशतं क्षुण्णं पचेत्तोयार्मणे शुभे ।
पादशेषे समं तैलं दधि दद्यात्सकाञ्जिकम् ॥ ६७ ॥
द्विगुणं च पयो दत्त्वा कल्कान्द्विपलिकॉंस्तथा ।
चित्रकं पिप्पलीमूलं मधुकं सैन्धवं बलाम् ॥ ६८ ॥
शतपुष्पां देवदारु रास्नां वारणपिप्पलीम् ।
प्रसारण्याश्च मूलानि मांसी भल्लातकानि च ॥ ६९ ॥
पचेन्मृद्वग्निना तैलम्—

सौ पल प्रसारणीको कूटकर एक द्रोण ( ३२ सेर ) जलमें पकावे । जब पकते पकते चौथाई भाग ( ८ सेर ) जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर इस क्वाथमें तिलका तैल, दही और काँजी ये प्रत्येक आठ आठ सेर, दूध सोलह सेर एवं चीता, पीपलामूल, मुलहठी, सेंधानमक, खिरेंटी, सोया, देवदारु, रास्ना, गज-पीपल, प्रसारणीकी जड, बालछड और भिलावे इन सबके कल्कको दो दो पल डालकर मन्दमन्द अग्निसे तैलको सिद्ध करे ॥ ६७-६९ ॥

—वातश्लेष्मामयाञ्जयेत् ।
अशीतिं नरनारीस्थान्वातरोगान्व्यपोहति ॥ ३७० ॥
कुब्जस्तिमितपङ्गुत्वं गृध्रसीखुडकार्दितम् ।
हनुपृष्ठशिरोग्रीवास्तम्भं चाशु नियच्छति ॥ ७१ ॥

यह तैल वात और कफजन्य सब रोगोंको दूर करता है। एवं स्त्री पुरुषोंके अस्सी प्रकारके वातरोगोंको नष्ट करता है । इससे कुब्जता, जडता, पंगुता, गृध्रसी, खुडक अर्दितवात, हनुस्तम्भ, पृष्ठशूल, शिरःपीडा और ग्रीवास्तंभ ये सब रोग शीघ्र नाश होते हैं ॥ ३७० ॥ ३७१ ॥

त्रिशतीप्रसारणीतैल ।

समूलपत्रशाखां च जातसारां प्रसारणीम् ।
कुट्टयित्वा पलशतं दशमूलशतं तथा ॥ ७२ ॥
अश्वगन्धापलशतं कटाहे समधिक्षिपेत् ।
वारिद्रोणे पृथक् कृत्वा पादशेषेऽवतारितम् ॥ ७३ ॥
कषायसममात्रं तु तैलमत्र प्रदापयेत् ।
दध्नस्तथाऽऽढकं दत्त्वा द्विगुणं चाम्लकाञ्जिकात् ॥ ७४ ॥

[चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता। ६५३

चतुर्द्रोणेन पयसा जीवनीयैः पलोन्मितैः ।
शृङ्गवेरपलात्पंच त्रिंशद्भल्लातकानि च ॥ ७५ ॥
द्वे पले पिपलीमूलाच्चित्रकाच्च पलद्वयम् ।
यवक्षारपले द्वे च सैन्धवस्य पलद्वयम् ॥ ७६ ॥
सौवर्चलपले द्वे च मञ्जिष्ठायाः पलद्वयम् ।
प्रसारणीपले द्वे च मधुकस्य पलद्वयम् ॥
सर्वाण्येतानि संहृत्य शनैर्मृद्वग्निना पचेत् ॥ ७७ ॥

मूल, पत्ते और शाखासहित प्रसारणी १०० पल, दशमूल १०० पल और असगन्ध १०० पल इन तीनोंको अलग अलग कूटकर जब उसमें सार भाग उत्पन्न होजाय तब एक एक द्रोण जलमें डालकर कढ़ाईमें पकावे । जब पककर चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर सबको एकत्र मिलाकर उसमें तिलका तेल ८ सेर, दहीका तोड ८ आढक, काँजी २ आढक, पाकके लिये जल ४ द्रोण, कल्कके लिये जीवनीयगणकी प्रत्येक औषधि एक एक पल, अदरख ५ पल, भिलावे ३० पल, पीपलामूल २ पल, चीता २ पल, जवाखार दो पल, सैंधानमक २ पल, कालानमक २ पल, मंजीठ २ पल, गन्धप्रसारिणी दो पल और मुलहठी २ पल इन सब औषधियोंको कूट पीसकर डालदेवे । फिर मन्दमन्द अग्निद्वारा धीरे धीरे तेलको पकावे । जब उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर छानलेवे ॥ ७२–७७ ॥

एतदभ्यञ्जने श्रेष्ठं वस्तिकर्मनिरूहणे ।
पाने नस्ये च दातव्यं न क्वचित्प्रतिहन्यते ॥ ७८ ॥
अशीतिं वातजाँरोगांश्चत्वारिंशच्च पैत्तिकान् ।
विंशतिं श्लैष्मिकांश्चैव सर्वानैतान् व्यपोहति ॥ ७९ ॥
गृध्रसीमस्थिभङ्गं च मन्दाग्नित्वमरोचकम् ।
अपस्मारं तथोन्मादं विभ्रमं मन्दगामिताम् ॥ ३८० ॥
त्वग्गताश्चापि ये वाताः शिरःसन्धिगताश्च ये ।
जानुसन्धिगताश्चैव पादपृष्ठगताश्च ये ॥ ८१ ॥

इस तैलको मालिश करना, वस्तिकर्म, निरूहवस्ति, पान करना, नस्य देना आदि कर्मोंमें प्रयोग करना । इसपर किसी प्रकारका परहेज नहीं करना चाहिये । यह

४३

६७४ | भैषज्यरत्नावली । | [ वातव्याधि-

तैल अस्सी प्रकारके वातरोग, चालीस प्रकारके पित्तरोग, बीस प्रकारके कफके रोग एवं गृध्रसीवात, हड्डीका टूटजाना मन्दाग्नि, अरुचि, अपस्मार, उन्माद, भ्रम, मन्द मन्द चलना, त्वचा, शिर, सन्धि, जानुसन्धि, पाँव और पृष्ठ इन स्थानोंमें स्थित वातकी पीडा इन सबको नष्ट करताहै ॥ ७८-८१ ॥

अश्वो वा वातसंभग्नो गजो वा यपि वा नरः ।
प्रसारयति यस्मात्तं तस्मादेषा प्रसारणी ॥ ८२ ॥
इन्द्रियाणां च जननी वृद्धानां च प्रसूयनी ।
एतेनान्धकवृष्णीनां कृतं पुंसवनं महत् ॥
प्रसारणीतैलमिदं बलवर्णाभिवर्द्धनम् ॥ ८३ ॥
अपनयति जरां पलितं शोषयति रुजां करोति तारुण्यम् ।
पक्षाघातं सर्वाङ्गहतं नाशयति वातगुल्मं च ॥ ८४ ॥
एतदुपयुज्यमानः प्रसन्नवर्णेन्द्रियो भवति ॥ ८५ ॥

वातसे पीडित घोडे या हाथी अथवा मनुष्यको वातबंधनसे छुडा देता है, इस कारण इसको प्रसारणी तैल कहते हैं । यह तैल इन्द्रियशक्तिको उत्पन्न करनेवाला, वृद्ध मनुष्योंको प्रसन्न करनेवाला, अन्धोंको दृष्टिशक्ति, नपुंसकोंको, पुरुषत्व देनेवाला एवं बल, वर्ण और जठराग्निकी वृद्धि करता है । वृद्धताको और पलितरोगको दूर करता है । रोगोंको नष्टकर तरुणताको उत्पन्न करता है । एवं पक्षाघात, सर्वाङ्गत-वात और वात गुल्मरोगका नाश करता है । इस तेलको सेवन करनेसे मनुष्य निर्म-लवर्ण और प्रसन्न इन्द्रियोंवाला होता है ॥

सप्तशंतिकप्रसारणीतैल ।

समूलपत्रमुत्पाट्य शरत्काले प्रसारणीम् ।
शतं ग्राह्यं सहचराच्छतावर्याः शतं तथा ॥ ८६ ॥
बलात्मगुप्ताश्वगन्धाकेतकीनां शतं शतम् ।
पचेच्चतुर्गुणे तोये द्रवैस्तैलाढकं पृथक् ॥ ८७ ॥
मस्तु मांसरसं चुक्रं पयश्चाढकमाढकम् ।
दध्याढकमायुक्तं पाचयेन्मृदुनाऽग्निना । ८८ ॥
द्रव्याणां तु प्रदातव्या मात्रा चार्द्धपलांशिका ।
तगरं मदनं कुष्ठं केशरं मुस्तकं त्वचम् ॥ ८९ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६७५

रास्ना सैन्धवपिप्पल्यौ मांसीमञ्जिष्ठयष्टिकाः ।
तथा मेदा महामेदा जीवकर्षभकौ पुनः ॥ ३९० ॥
शतपुष्पा व्याघ्रनखं शुण्ठी देवाह्वमेव च ।
काकोली क्षीरकाकोली वचा भल्लातकं तथा ॥ ९१ ॥
पेषयित्वा समानेतानत्साधनीया प्रसारणी ।
नातिपक्वं न हीनं च सिद्धं पूतं निधापयेत् ॥ ९२ ॥

शरदृतुमें मूल और पत्तोंसहित प्रसारणीको उखाड़कर १०० पल लेवे, पियावाँसा १०० पल, शतावर १०० पल, खिरेंटी १०० पल, कौंचकी जड़ १०० पल, असगन्ध १०० पल और केतकी १०० पल इन सबोंको अलग २ कूटकर चार सौ चार सौ पल जलमें पकावे । जब चौथाई भाग जल शेष रहे तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें दहीका तोड़, बकरेके मांसका रस, चूका, दूध, दही और तिलका तैल ये प्रत्येक २क एक आढक ( २५६ तोले ) एवं तगर, मैनफल, कूठ, केशर, नागरमोथा, दालचीनी, रास्ना, सेंधानमक, पीपल, बालछड, मंजीठ, मुलहठी, मेदा, महामेदा, जीवक, ऋषभक, सोया, नख, सोंठ, देवदारु, काकोली, क्षीरकाकोली, वच और भिलावे इन प्रत्येक द्रव्योंको दो दो तोले परिमाण पीसकर डालदेवे । फिर सबको यथाविधि एकत्र कर मन्दमन्द अग्निद्वारा तेलको पकावे । इस तेलको न तो बहुत पकावे और न कच्चा रक्खे । जब उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब उतारकर छान लेवे और शुद्ध पात्रमें भरकर रखदेवे ॥८६॥३९२॥

यत्र यत्र प्रदातव्या तन्मे निगदतः शृणु ।
कुब्जानामथ पंगूनां वामनानां तथैव च ॥ ९३ ॥
यस्य शुष्यति चैकाङ्गं ये च भग्नास्थिसन्धयः ।
वातशोणितदुष्टानां वातोपहतचेतसाम् ॥ ९४ ॥
स्त्रीमद्यक्षीणशुक्राणां वाजीकरणमुत्तमम् ।
वस्तौ पाने तथाऽभ्यङ्गे नस्ये चैव प्रयोजयेत् ॥
प्रयुक्तं शमयत्याशु वातजान्विविधान् गदान् ॥ ९५ ॥

जिस २ रोगमें इस तैलको देना चाहिये, उसको कहते हैं सुनो—कुबड़े लँगड़े और बौने मनुष्य एवं जिसका एक अङ्ग सूख गया हो, जिनकी हड्डियें और सन्धियें टूटगईं हों, वातरक्तसे पीडित, दूषितवातसे नष्ट होगया है चित्त जिनका ऐसे अधिक स्त्रीप्रसङ्ग, अत्यन्तमद्यपान करनेवाले और क्षीणवीर्यवाले मनुष्योंके

६७६भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

लिये यह तैल अत्युत्तम वाजीकरण औषध है। इसको पान, वस्तिकर्म, मालिश और नस्यकर्ममें प्रयोग करना चाहिये। विधिपूर्वक सेवन करनेसे यह तैल नानाप्रकारके वातजनित-रोगोंको बहुत जल्द नष्ट करता है ॥ ९३-३९५ ॥

एकादशशतिकप्रसारणीतैल ।

शाखामूलदलैः प्रसारशितुलास्तिस्रः कुरुण्टात्तुले
छिन्नायाश्च तुले तुले रुवुकतो रास्नाशिरीषात्तुलाम् ।
देवाह्वाच्च सकेतकाद् घटशते निःक्वाथ्य कुम्भांशके
तोये तैलघटं तुषाम्बुकलशौ दत्त्वाऽऽढकं मस्तुतः ॥ ९६ ॥

शुक्ताच्छागरसादथैक्षुरसतः क्षीराच्च दत्त्वाऽऽढकं
पृक्काकर्कटजीवकाद्यविकसाकाकोलिकाकच्छुराः ।
सूक्ष्मैलाघनदारुकुन्दुरुसरलाकाश्मीरमांसीनखैः
कालीयोत्पलपद्मकाह्वयनिशाकङ्कोलकर्मन्थकैः ॥ ९७ ॥

चाम्पेयाभयचोचपूगकटुकाजातीफलाभीरुभिः
श्रीवासाऽमरदारुचन्दनवचाशैलेयसिन्धूद्भवैः ।
तैलाम्भोदकटम्भराङ्घ्रिनलिकातृण्वीरकचोरकैः
कस्तूरीदशमूलकेतकनतश्यामाश्वगन्धाम्बुभिः ॥ ९८ ॥

कौन्तीताक्ष्यजशल्लुकीफललघुश्यामाशताह्वाभयै-
र्भालातत्रिफलाब्जकेशरमहाश्यामालवङ्गान्वितैः ।
सव्योषैश्चिपलैर्महीयसि पचेन्मन्देन पात्रेऽग्निना ॥ ९९ ॥

क्वाथके लिये शाखा, मूल और पत्तोंसहित गन्धप्रसारणी ३०० पल, नीली-कटसरैया २०० पल, गिलोय २०० पल, अण्डकी जड २०० पल, रास्ना और शिरसकी छाल सौ सौ पल, देवदारु १०० पल और केवडेकी जड १०० पल इन सबको कूटकर सौ द्रोण अर्थात् ३२०० सेर जलमें डालकर पकावे। जब पकते २ चौथाई भाग जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस क्वाथमें तिलका तैल १ द्रोण, काँजी २ द्रोण, दहीका तोड १ आढक, शुक्त (एक प्रकारकी काँजी), बकरेके मांसका रस, ईखका रस और गौका दूध ये प्रत्येक एक एक आढक (आठ आठ सेर) परिमाण डालदेवे। एवं कल्कके


१ अत्र वक्तव्यद्रव्यसम्पूत्त्यै त्रय एव पादा दृश्यन्ते ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहितः । ६७७

लिये असवरग, काकडासिङ्गी, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीर- काकोली, ऋद्धि, वृद्धि, मुगवन, मषवन, जीवन्ती, मुलहठी, मंजीठ, काकोली, कौंचकी जड, छोटी इलायची, कपूर, कुन्दरू, धूपसरल, केशर, बालछड, नख, कालीअगर, कुमुद पद्माख, हल्दी, शीतलचीनी, गंठिवन, नागकेशर, खस, दारचीनी, सुपारी (किसी २ के मतसे सुपारीके वृक्षकी छाल लेनी ), कुटकी, जायफल, शतावर, गन्धबिरोजा, देवदारु, लालचन्दन, वच, भूरिछरीला, सेंधानमक, शिलारस, नागर- मोथा, प्रसारणीकी जड, नलिका, पुनर्नवा, चोरक, कस्तूरी, दशमूल, केतकीकी जड, तगर, सुगन्धित, तृण, असगन्ध, सुगन्धवाला, रेणुका, रसौंत, सेमलकी जड, मैन- फल, अगर, श्यामालता, सोया, कूठ, भिलावे, त्रिफला, कमलकी केशर, कालिसर, लौङ्ग और त्रिकुटा इन सबको तीन तीन पल लेकर कल्क करके डालदेवे। फिर सबको एक बहुत बडे पात्रमें भरकर मन्दमन्द अग्निद्वारा तेलको पकावे ॥ ९६-९९॥

पानाभ्यञ्जनवस्तिनस्यविधिना तन्मारुतं नाशयेत् सर्वाङ्गाङ्गतं तथाऽवयवगं सन्ध्यस्थिमज्जाश्रितम् । श्लेष्मोत्थानकपैत्तिकांश्च शमयेन्नानाविधानामयान् धातून् बृंहयति स्थिरं च कुरुते पुंसां नवं यौवनम् ॥४००॥ वृद्धस्यापि बलं करोति सुमहद्वन्ध्यासु गर्भप्रदं पीत्वा तैलमिदं जरन्त्यपि सुतं सूतेऽधुना भूरुहाः । सिक्ताः शोषमुपागताश्च फलिनः स्निग्धा भवन्ति स्थिरा भग्नाङ्गाः सुदृढा भवंति मनुजा गावो हयाः कुञ्जराः॥१॥

इस तेलको पान और मालिश कराना, वस्तिक्रिया (पिचकारी लगाना), नस्य देना आदि क्रियाओंद्वारा सेवन करानेसे वातरोग नाश होता है। यह तैल सम्पूर्ण अङ्ग, अर्द्धाङ्ग व एकाङ्गमें स्थित वातकी पीडा एवं सन्धि, अस्थि और मज्जागत वात- व्याधि, कफजन्य और पित्तजन्य नानाप्रकारके रोगोंको शमन करता है। एवं धातु- ओंको पुष्ट, स्थिर और मनुष्योंके नवयौवनको स्थिर करता है। वृद्ध मनुष्यको भी अत्यन्त बलवान् करनेवाला और वन्ध्यास्त्रियोंको गर्भप्रदान करनेवाला है। इस तेलके पान करनेसे बुढापेमेंभी स्त्री पुत्रको उत्पन्न करती है। सूखे हुए वृक्षोंको इस तेलके द्वारा सींचनेसे वे फिर हरे भरे, फल फूल युक्त स्निग्ध और मजबूत होजाते हैं। टूटगये हैं अंग जिनके ऐसे मनुष्य, गौयें, घोडे और हाथी इस तेलके सेवनसे अत्यन्त दृढ अंगवाले होते हैं ॥ ४०० ॥ १ ॥

६७८भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

अष्टादशशतिकप्रसारणीतैल ।

समूलदलशाखायाः प्रसारण्याः शतत्रयम् ।
शतमेकं शतावर्या अश्वगन्धाशतं तथा ॥ २ ॥
केतकीनां शतं चैकं दशमूलाच्छतं शतम् ।
शतं वाट्यालकस्यापि शतं सहचरस्य च ॥ ३ ॥
जलद्रोणशतं दत्त्वा शतभागावशेषितम् ।
ततस्तेन कषायेण कषायद्विगुणेन च ॥ ४ ॥
सुव्यक्तेनारनालेन दधिमस्त्व्वाढकेन च ।
क्षीरशुक्तेक्षुनिर्यासाच्छागमांसरसाढकैः ॥
तैलद्रोणसमायुक्तं दृढे पात्रे निधापयेत् ॥ ५ ॥

मूल, पत्ते और शाखासहित प्रसारणी ३०० पल, शतावर १०० पल असगन्ध १०० पल, केतकी १०० पल, दशमूलकी प्रत्येक ओषधि १००-१०० पल, खिरेंटी १०० पल और पियाबाँसा १०० पल इन सबको एकत्र कूटकर १०० द्रोण ( ३२०० सेर ) जलमें पकावे । जब पकते पकते एक द्रोण ( ३२ सेर ) जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर उस काढेके साथ काढेसे दुगुनी अर्थात् ६४ सेर काँजी, दहीका तोड ८ सेर, दूध ८ सेर शुक्तनामक काँजी ८ सेर, ईखका रस ८ सेर बकरेके मांसका रस ८ सेर और तिलका तैल ३२ सेर मिलाकर एक सुदृढ पात्रमें भरदेवे ॥ २-५ ॥

द्रव्याणि यानि पेष्याणि तानि वक्ष्याम्यतः परम् ।
भल्लातकं नतं शुण्ठी पिप्पली चित्रकं शठी ॥ ६ ॥
वचा पृक्का प्रसारण्याः पिप्पल्या मूलमेव च ।
देवदारु शताह्वा च सूक्ष्मैलात्वचबालकम् ॥ ७ ॥
कुंकुमं मदमञ्जिष्ठा तुरुष्कं नखिकाऽगुरु ।
कर्पूरकुन्दुरुनिशालवङ्गध्यामचन्दनम् ॥ ८ ॥
कक्कोलं नलिका मुस्तं कालीयोत्पलपत्रकम् ।
शठी हरेणुशैलेयश्रीवासं च सकेतकम् ॥ ९ ॥
त्रिफला कच्छुरा भीरु सरलं पद्मकेशरम् ।
प्रियंगुशीरनलदं जीवकाद्यं पुनर्नवा ॥ १० ॥

दशमूल्यश्वगन्धे च नागपुष्पं रसाञ्जनम् ।

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६७९

दशमूल्यश्वगन्धे च नागपुष्पं रसाञ्जनम् । कटुकाजातिपूगानां फलानि शल्लकीरसम् ॥ ११ ॥ भागांस्त्रिपलिकान्दत्त्वा शनैर्मृद्वग्निना पचेत् । विस्तीर्णे सुदृढे पात्रे पाच्यैषा तु प्रसारणी ॥ १२ ॥

अब कल्ककी ओषधियोंको कहते हैं—भिलावे, तगर, सोंठ, पीपल, चीता, कचूर, वच, असवरग, प्रसारणी, पीपलामूल, देवदारु, सोया, छोटी इलायची, दारचीनी, सुगन्धवाला, केशर, कस्तूरी, मंजीठ, शिलारस, नख, अगर, कपूर, कुन्दुरु, हल्दी, लौंग, सुगन्ध, तृण, रक्तचन्दन, शीतल, चीनी, नलिका, नागरमोथा, काली अगर, कुमुद, तेजपात, कचूर, रेणुका, भूरिछरीला, गन्धाबिरोजा, केवडा, त्रिफला, कौंच, शतावर, धूपसरल, कमलकी केशर, फूलप्रियंगु, खस, बालछड, जीवकादिगणकी औषधियाँ, पुनर्नवा, दशमूल, असगन्ध, नागकेशर, रसौंत, कुटकी जायफल, सुपारी, सेमलकी मुषली और सालइका गोंद इन प्रत्येकके कल्कको बारह बारह तोले डालकर सबको एक बहुत बडे और दृढ पात्रमें भरकर इस प्रसारणीतैलको मन्दमन्द अग्निद्वारा शनैः शनै पकाना चाहिये । ( बडे बर्त्तनके अभावमें प्रत्येक ओषधिका अलग अलग क्वाथ पकावे ) ॥ ६–४१२ ॥

प्रयोगः षड्विधश्चात्र रोगार्त्तानां विधीयते । अभ्यङ्गात्त्वग्गतं हन्ति पानात्कोष्ठगतं तथा ॥ १३ ॥ भोजनात्सूक्ष्मनाडीस्थान्नस्यादूर्ध्वगतं तथा । पक्वाशयगते वस्तिर्निरूहः सर्वकायिके ॥ १४ ॥

यह तैल वातपीडित रोगियोंको छः प्रकारसे सेवन करावे । इसको मालिश करने से त्वचागत, वातरोग, पान करनेसे कोष्ठगत, वात, भोजन करनेसे सूक्ष्मनाडियोंमें स्थित वात, नस्य, देनेसे ऊर्ध्व अर्थात् शिरोगत वायु, वस्तिक्रिया ( पिचकारी लगाने ) से पक्वाशयगत वात, और निरूहवास्तिद्वारा प्रयोग करनेसे समस्त शरीरगत वातकी पीडा नाश होती है ॥ १३ ॥ १४ ॥

एतद्धि वडवाश्वानां किशोराणां यथाऽमृतम् । एतदेव मनुष्याणां कुञ्जराणां गवामपि ॥ १५ ॥

६८०भैषज्यरत्नावली[ वातव्याधि-

अनेनैव च तैलेन शुष्यमाणा महाद्रुमाः।
सिक्ताः पुनः प्ररोहन्ति भवन्ति फलशालिनः ॥ १६ ॥
वृद्धोऽप्यनेन तैलेन पुनश्च तरुणायते।
न प्रसूते च या नारी साऽपि पीत्वा प्रसूयते ॥ १७ ॥
अप्रजाः पुरुषो यस्तु सोऽपि पीत्वा लभेत्सुतम् ॥ १८ ॥
यह तैल किशोर अवस्थावाले मनुष्य एवं घोडा, घोडी, हाथी, गाय, बैल आदि पशुओंको भी अमृतकी समान हितकारी है। इस तैलके द्वारा सींचनेसे बडे बडे सूखे वृक्ष फिरसे हरे भरे और फल फूलयुक्त होजाते हैं। वृद्ध मनुष्य भी इस तैलके सेवनसे फिर तरुण होजाता है। जिस स्त्रीके सन्तान पैदा नहीं होती इस तैलको पान करनेसे उस स्त्रीके भी सन्तान उत्पन्न होती है। जो मनुष्य सन्तानहीन है वह भी इसको पान करके पुत्रको प्राप्त करता है ॥ १५-१८ ॥

अशीतिं वातजान्रोगान्पैत्तिकाञ्श्लैष्मिकानपि।
सन्निपातसमुत्थांश्च नाशयेत्क्षिप्रमेव हि ॥ १९ ॥
एतेनान्धकवृष्णीनां कृतं पुंसवनं महत्।
कृत्वा विष्णोर्बलिं चापि तैलमेतत्प्रयोजयेत् ॥ ४२० ॥
यह तैल अस्सी प्रकारके वातजरोग एवं पित्तज और कफज सर्वप्रकारके रोग और सन्निपातसे उत्पन्नहुए सम्पूर्ण रोगोंको तत्काल नष्ट करता है। इस तैलके प्रभावसे अन्धक और वृष्णिवंशी यादवोंको अत्यन्त सन्तानोत्पत्ति हुई थी। प्रथम विष्णुभगवान्का यथाविधि पूजन कर फिर इस तैलको प्रयोग करना चाहिये ॥ ४१९ ॥ ४२० ॥

महाराजप्रसारणीतैल ।

शतत्रयं प्रसारण्या द्वे पीतात्सहचारकात्।
अश्वगन्धैरण्डबला वरी रास्ना पुनर्नवा ॥ २१ ॥
केतकी दशमूलं च पृथक् त्वक् पारिभद्रकः।
एषां तुलां तु प्रत्येकं तुलार्द्धं किलिमात्तथा ॥ २२ ॥
तुलार्द्धं स्याच्छिरीषाच्च लाक्षायाः पञ्चविंशतिः।
पलानि लोध्राच्च तथा सर्वमेकत्र साधयेत् ॥ २३ ॥

चिकित्सा ] भाषाटीकासहिता । ६८१


जलपञ्चाढकशते सपादे तत्र शेषयेत् ।
द्रोणद्वयं काञ्जिकस्य षड्विंशत्याढकोन्मितम् ॥ २४ ॥
क्षीरदध्नोः पृथक् प्रस्थान् दशमस्त्वथाढकं तथा ।
इक्षो रसाढकौ चापि छागमांसतुलात्रये ॥ २५ ॥
पञ्चचत्वारिंशदम्भःप्रस्थान् पक्त्वा तु शेषयेत् ।
सप्तदश रसप्रस्थान् मञ्जिष्ठाक्वाथ एव च ॥ २६ ॥
कुडवोनाढकोन्मानो द्रव्यैरेभिस्तु साधयेत् ।
सुशुद्धं तिलतैलस्य द्रोणं प्रस्थेन संयुतम् ॥ २७ ॥

गन्धप्रसारिणी ३०० पल, पीले फूलकी कटसरैया २०० पल, असगन्ध, अण्डकी जड, खिरैंटी, शतावर, रास्ना, पुनर्नवा केतकी, दशमूल और फरहदकी छाल ये प्रत्येक सौ सौ पल, देवदारु ५० पल, शिरसकी छाल ५० पल, लाख २५


१-काञ्जिकं मानतो द्रोणः शुक्तेनात्र विधीयते ।

शुक्तविधि ।

अत्र शुक्तविधिर्मण्डप्रस्थः पञ्चाढकोन्मितम् । काञ्जिकं कुडवं दध्नो गुडप्रस्थो-
म्लमूलक।त् ॥ पलान्यष्टौ शोधिताद्र्रात् पलषोडशिकं तथा । कणाजीरकसिं-
न्धूत्थं हरिद्रामरिचं पृथक् ॥ द्विपलं भाविते भाण्डे घृतेनाष्टदिनं स्थितम् । सिद्धं
भवति तच्छुक्तं यदावतार्य गृह्यते ॥ तदा देयं चतुर्जातं पृथक् कर्षत्रयोन्मितम्।
पञ्चपल्लवतोयेन गन्धानां क्षालनं तथा ॥

( यद्यपि मूलमें काँजीका परिमाण २६ आढक लिखा है तथापि वृद्ध वैद्योंके मतसे १ द्रोण ही डालनी चाहिये, क्योंकि अधिक डालनेसे काँजीकी गन्ध आने लगती है । ) इसमें काँजीको एक द्रोण परिमाण शुक्तके साथ डालना चाहिये । भातका माँड १ प्रस्थ, काँजी ५ आढक, दही १६ तोले, गुड १ प्रस्थ, अम्लमूलक ( काँजीके नीचेकी जमी हुई गाद ) आठ पल, शुद्ध अदरख १६ पल एवं पीपल, जीरा, सेंधा नमक, हल्दी और कालीमिरच ये प्रत्येक ओषधि दो दो पल लेवे । इन सबको घीसे भावना दियेहुए पात्रमें भरकर उसका मुख बन्दकरके आठ दिनतक रखा रहनेदेवे । जब उत्तम प्रकारसे सिद्ध होजाय तब उसको निकालकर छानलेवे । फिर उसमें दारचीनी, तेजपात, इलायची और नागकेशर इनको तीन तीन कर्ष बारीक पीसकर मिलादेवे । इसको शुक्त कहते हैं ॥ यह शुक्तही महाराजप्रसारणी तैलमें काँजीके बदलेमें डालाजाता है । इसके सम्पूर्ण गन्धद्रव्योंको पञ्चपल्लवके क्वाथसे धोकर सुखालेना ।

६८२ भैषज्यरत्नावली । [ वातव्याधि-


पल और लोध २५ पल सबको एकत्र कूटकर ५२५ आढक जलमें पकावे । जब पकते पकते दो द्रोण जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । फिर काँजी १ द्रोण, दूध दस प्रस्थ, दही दस प्रस्थ, दहीका तोड एक आढक, ईखका रस ३ आढक और बकरेके मांसको ३०० पल लेकर ४५ प्रस्थ जलमें पकावे । जब पककर १७ प्रस्थ जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे । मञ्जीठका क्वाथ १५ शराव परिमाण इन सब द्रव्योंके साथ उत्तम तिलका तैल १ द्रोण १ प्रस्थ मिलाकर पकावे ॥ २१–२७ ॥

आद्य एभिर्द्रवैः पाकः कल्कौ भल्लातकं कणा ।
नागरं मरिचं चैव प्रत्येकं षट्पलोन्मितम् ॥ २८ ॥
पथ्याक्षधात्र्यः सरलं शताह्वा कर्कटी वचा ।
चोरपुष्पी शठी मुस्तद्वयं पद्मं च सोत्पलम् ॥ २९ ॥
पिप्पलीमूलमञ्जिष्ठा साश्वगन्धा पुनर्नवा ।
दशमूलं समुदितं चक्रमर्दो रसाञ्जनम् ॥ ४३० ॥
गन्धतृणं हरिद्रा च जीवनीयो गणस्तथा ।
एषां त्रिपलिकैर्भागैराद्यः पाको विधीयते ॥ ३१ ॥

पकते समय उसमें भिलावे (अभावमें लालचन्दन), पीपल, सोंठ और मिरच ये प्रत्येक छः छः पल, हरड, बहेडा, आमला, धूपसरल, सोया, काकडासिंगी, वच, चोरपुष्पी, कचूर, नागरमोथा, मोथा, कमल, नीलकमल, पीपलामूल, मंजीठ, असगन्ध, पुनर्नवा, दशमूल, चकवड, रसौंत, सुगन्धतृण, हल्दी, जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली, क्षीरकाकोली, मुगवन, मषवन, जीवन्ती और मुलहठी इन सबके तीन तीन पल कल्कको डालकर प्रथम पाक करे ॥ २८–४३१ ॥

देवपुष्पी बोलपत्रं शल्लकीरसशैलजे ।
प्रियंगूशीरमधुरी मांसी दारु बलाऽचलम् ॥ ३२ ॥
श्रीवासो नलिका खोटिः सूक्ष्मैला कुन्दुरुर्मुुरा ।
नखीत्रयं च त्वक्पत्री परमा पूतिचम्पकम् ॥ ३३ ॥
मदनं रेणुका पृक्का मरुवं च पलत्रयम् ।
प्रत्येकं गन्धतोयेन द्वितीयः पाक इष्यते ॥ ३४ ॥


१ भल्लातकासहत्वे तु रक्तचन्दनमिष्यते ।

चिकित्सा भाषाटीकासहिता । ६८३

पश्चात् चोरपुष्पी, गन्धबोल, तेजपात, शल्लकी रस (राल), भूरिछरीला, फूलप्रियंगु, खस, सौंफ, बालछड, देवदारु, खिरेंटी, शिलारस, सरलका गोंद, नलिका, पालकका शाक, छोटी इलायची, कुन्दुरु, सुरामांसी, तीनों प्रकारका नखीद्रव्य-अर्थात् बेरके पत्तेकी समान, नीलकमलके पत्तेकी समान कान्तिवान् और घोडेके खुरकी समान आकारवाली तेजपात, गन्धपलाशी, खट्टासमूष्क, चम्पाके फूल, मैनफल, रेणुका, असवरग और मरुआ (छोटे पत्तोंकी तुलसी) इन प्रत्येकके बारह बारह तोले कल्क और गन्धोदकके साथ तेलका दूसरा पाक करे ॥ ३२-३४ ॥

गन्धोदकं तु त्वक्पत्री पत्रकोशीरमुस्तकम् ।
प्रत्येकं सबलामूलं पलानि पञ्चविंशतिः ॥ ३५ ॥
कुष्ठार्द्धभागोऽत्र जलप्रस्था वै पञ्चविंशतिः ।
अर्द्धावशिष्टाः कर्त्तव्याः पाके गन्धाम्बुकर्मणि ॥ ३६ ॥

गन्धोदक बनानेकी विधि—तेजपात, सुगन्धितपत्र (तेजपातकी समान पत्रविशेष), खस, नागरमोथा और खिरेंटीकी जड ये प्रत्येक ओषधि पच्चीस पच्चीस पल और कूठ साढे बारह पल लेकर सबको एकत्र २५ प्रस्थ जलमें पकावे। जब पकते पकते आधा जल शेष रहजाय तब उतारकर छानलेवे। गन्धोदकका पाक करनेपर अर्द्धावशेष जल रखना चाहिये ॥ ३५–३६ ॥

गन्धाम्बुचन्दनाम्बुभ्यां तृतीयः पाक इष्यते ॥ ३७ ॥
संगृह्य चन्दनं श्वेतं पञ्चाशत्पलसंमितम् ।
तावत्येव जले पक्त्वा तच्छेषेऽर्द्धेऽवतारयेत् ॥
ततस्तु चन्दनं पिष्ट्वा मिश्रयेच्चन्दनोदकम् ॥ ३८ ॥

फिर गन्धोदक और निम्नलिखित चन्दनोदकके साथ तैलका तीसरा पाक करे।
चन्दनोदक बनानेकी विधि—सफेद चन्दनको ५० पल लेकर ५० सेर जलमें पकावे, २५ सेर शेष रहनेपर उतार लेवे। चन्दनको बारीक पीसकर जलमें घोलकर चन्दनोदक बनावे ॥ ३७ ॥ ३८ ॥

कल्कोऽत्र केशरं कुष्ठं त्वक्कालीयंककुंकुमम् ।
भद्रश्रियं ग्रन्थिपर्णं लता कस्तूरिका तथा ॥ ३९ ॥
लवङ्गागुरुकक्कोलजातीकोषफलानि च ।
एला लवङ्गच्छल्ली च प्रत्येकं त्रिपलोन्मितम् ॥ ४० ॥

६८४भैषज्यरत्नावली ।[ वातव्याधि-

कस्तूरी षट्पला चन्द्रात्पलं सार्द्धं च गृह्यते ॥ ४१ ॥

इस तीसरे पाकमें कल्कके लिये नागकेशर, कूट, दारचीनी, क्लम्बक (पिलाचन्दन), केशर, सफेदचन्दन, गठिवन, लताकस्तूरी, लौंग, अगर, सीतलचीनी, जावित्री, जायफल, इलायची और लौंगकी छाल ये प्रत्येक तीन तीन पल, कस्तूरी ६ पल और कपूर डेढ़ पल डालना चाहिये ॥ ३९-४१ ॥

वेधनार्थं पुनश्चन्द्रमदौ देयौ तथोन्मितौ ॥ ४२ ॥
महाप्रसारणी सेयं राजभोग्या प्रकीर्त्तिता ।
गुणान्प्रसारणीनां तु वहन्त्येषा बलोत्तमान् ॥ ४३ ॥

जब तैल उत्तम प्रकारसे पककर सिद्ध होजाय तब वेधनके लिये कपूर और कस्तूरीको पूर्वोक्त परिमाणमें पीसकर उस चूर्ण और थोडेसे तेलको एक बर्तनमें मिलालेवे । फिर उसको सिद्धहुए सम्पूर्ण तैलके साथ उत्तम प्रकारसे मिलाकर एक सकोरेसे ढककर रखदेवे । यह महाराजप्रसारणीतैल राजाओंके सेवन करनेयोग्य कहागया है । यह पूर्वोक्त प्रसारणी तैलोंके जो गुण हैं उनसे भी अधिक गुणोंकों करता है ॥ ४२ ॥ ४३ ॥

महासुगन्धितैल और लक्ष्मीविलासतैल ।

जिङ्गीचोरकदेवदारुसरलव्याघ्रीवचाचेलकात्वक्पत्रैः
सह गन्धपत्रकशठीपथ्याक्षधात्रीघनैः । एतैः शोधित-
संस्कृतैः पलयुगेत्याख्यातया संख्यया तैलप्रस्थ-
मवस्थितैः स्थिरमतिः कल्कैः पचेद्गान्धिकैः ॥ ४४ ॥
मांसीमुरामदनचम्पकसुन्दरीत्वग्ग्रन्त्यम्बुरुहमरुवकै-
र्द्विपलैः सप्तकैः । श्रीवासकुन्दुरुनखीनलिकाभिषीणां
प्रत्येकतः पलमुपास्य पुनः पचेत्तु ॥ ४५ ॥
एलालवङ्गचलचन्दनजातिपूतिकक्कोलकागुरुलता-
घुसृणैः पलार्द्धैः । कस्तूरिकाक्षसहितामलदीप्तियुक्तैः
पक्त्वा तु मन्दशिखिनैव महासुगन्धम् ॥ ४६ ॥
पञ्चाद्विकेन चार्द्धेन मदात्कर्पूरमिष्यते ।
कर्पूरमदयोरर्द्ध पत्रकल्कमिहेष्यते ॥ ४७ ॥
पक्वपूतेऽप्युष्ण एव सम्यक् पेषणवर्त्तितम् ।
दीयते गन्धवृद्ध्यर्थं पत्रकल्कं तदुच्यते ॥ ४८ ॥