भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
४४० भावप्रकाशनिघण्टुः तथा जीभ ठंडी मालूम पड़ती है। औषध में इन्हीं फलों का व्यवहार किया जाता है। कुछ लोग इसके दो भेद मानते हैं। छोटे तथा पतले छिलके वाले फलों को शीतलचीनी एवं बड़े तथा मोटे छिलके वाले फलों को कबाबचीनी कहा जाता है। वास्तव में एक ही लता के यह फल होते हैं। प्राचीन काल से मुखशुद्धि के लिये पान के साथ या स्वतन्त्र रूप में तथा मसालों में इसका प्रयोग किया जाता रहा है। रासायनिक संगठन-कबाबचीनी में उड़नशील तैल ५-२०%, क्यूबैबिन् (Cubebin, C₂₀ H₂₀ O₆), राल, तैल, स्टार्च, गोंद, क्यूबैबिक् एसिड (Cubebic acid) करीब ०.९६% तथा कॅल्शियम ऑक्सॅलेट, फॉस्फेट एवं मॅलेट तथा मॅग्नेशियम् मॅलेट ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसमें के प्रधान गुणकारी तत्त्व उड़नशील तैल एवं क्यूबैबिक् एसिड हैं। पुराने कबाबचीनी द्वारा निकाले तैल में गंधहीन एवं पारदर्शक एक प्रकार का कर्पूर (Camphor of cubeb, C₁₅ H₂₆ O) पाया जाता है। इसमें का उड़नशील तैल स्वच्छ, हलके पीताभ या नीलाभ हरित रंग का, विशिष्ट गंधयुक्त एवं उष्ण कर्पूरवत् स्वादवाला होता है। इस तैल में प्रधान रूप में टर्पेन्स् (Terpenes) एवं सेस्क्वि टर्पेन्स् (Sesquiterpenes) पाये जाते हैं। भारतीय कबाबचीनी में भी उपर्युक्त तैल से मिलता-जुलता उड़नशील तैल पाया जाता है। तैल को शीत तथा प्रकाशहीन स्थान में बन्द बोतलों में रखना चाहिये। परीक्षा-किसी श्वेत पात्र में कबाबचीनी का चूर्ण रखकर उस पर १ बूंद गंधक का तेजाब रखकर ऊपर से देखने से नीलारुण (Purple) रंग दिखलाई देता है। अच्छी कबाबचीनी में सिकुड़े हुये अविकसित फल १०% से अधिक, कांड ५% से अधिक, इनको छोड़कर अन्य पदार्थ २% से अधिक, राख ८% से अधिक एवं अम्ल में न घुलने वाली राख २% से अधिक न होनी चाहिये। गुण और प्रयोग-कबाबचीनी उष्ण, उत्तेजक, कफघ्न, वातघ्न, प्रतिदूषक (Antiseptic), मूत्रजनक, दीपन, पाचन, रुचिकर, वृष्य, तृष्णा शामक तथा मुख की दुर्गन्ध एवं जड़तानाशक है। इसमें स्थानिक प्रक्षोभक गुणों के कारण यह श्लेष्मकला के लिये उत्तेजक है। प्रचूषण के पश्चात् इसके कार्यकारिसत्व का उत्सर्ग वृक्क एवं श्वसनसंस्थान द्वारा होता है। मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान की श्लेष्मकला पर इसका स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। अधिक मात्रा में सेवन करने पर यह पाचनक्रिया विकृत कर देती है। त्वचा की उत्तेजना से कभी-कभी खुजली भी उत्पन्न होती है। (१) प्रतिदूषक एवं मूत्रल औषध की तरह इसे पुराने सोजाक में देते हैं। ३०-६० रत्ती चूर्ण दुग्ध के साथ या २ १/२ रत्ती फिटकिरी के साथ दिन में ३ बार देते हैं। इससे बस्तिशोथ में भी लाभ होता है। (२) श्वसन संस्थान के विकारों में प्रतिदूषक एवं उत्तेजक कफनिःसारक रूप में खदिरादि गुटिका जैसी चूसने की गोली बनाकर उसे चूसने को दिया जाता है। गले की शिथिलता तथा मुखपाक आदि में भी इससे लाभ होता है। गायक गला साफ करने के लिये इसको चूसते हैं। खाँसी आदि में इसके चूर्ण को मधु के साथ चटाते हैं। इसका धूम्रपान श्वास में लाभदायक है। (३) नाक के श्लेष्मा को कम करने के लिये इसके नस्य का उपयोग किया जाता है। (४) इसके तैल को मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान के रोग, बस्तिशोथ, सोजाक तथा सोजाक की पुरानी अवस्था में शर्करा के साथ या गोंद के साथ इमल्शन बनाकर या कॅपसूल में रख कर प्रयोग करते हैं। जीर्ण श्वसनिका शोथ में इसको उष्ण जल में डालकर उसकी वाष्प सूँघी जाती है। मात्रा-चूर्ण १-४ माशा। तैल ५-२० बूँद।
कर्पूरादिवर्गः ४४१ अथ गन्धकोकिला गन्धमालती च। तयोर्गुणानाह स्निग्धोष्णा कफहत्तिक्ता सुगन्धा गन्धकोकिला। गन्धकोकिलया तुल्या विज्ञेया गन्धमालती।।१९७।। ४८. गन्धकोकिला एवं गन्धमालती ये दोनों ही संदिग्ध गन्ध द्रव्य हैं। बाजार में गन्धकोकिला नाम से एक प्रकार के फल बिकते हैं जो देखने में हवुषा के समान किन्तु कुछ चिपटे होते हैं। गन्धमालती नाम से एक प्रकार की जड़ के छोटे-छोटे टुकड़े मिलते हैं जो रेशेदार किंचित् बादामी रंग के होते हैं। आगे पुष्पवर्ग में मालती (जाती, चमेली) एवं स्वर्णजाती का वर्णन आया है। मालती (रतेड) नामक एक अन्य लता होती है जिसे कुछ लोगों ने गंधमालती लिखा है। इसकी एक अन्य उपजाति भी पाई जाती है। निघंटुकारों ने जो जातिभेद लिखा है वह संभवतः यही रतेड हो या यह यहाँ पर वर्णित गन्धमालती हो। गन्धमालती (रतेड) का लैटिन नाम (Aganosma caryophyllata G. Don.) (अँगनोस्मा कॅरियोफाइलॅटा जी० डोन) एवं इसी के भेद A. calycina A. DC. का (अँ० कॅलिसिना ए० डी० सी०) है जिनका संक्षेप में यहाँ वर्णन किया गया है। ले०-Aganosma caryophyllata G. Don. (अँगनोस्मा कॅरियोफाइलॅटा जी. डोन.)। Fam. Apocynaceae (एपोसाइनेसी)। हि०, बं०-मालती। संथा०-रतेड़। यह बंगाल, मुंगेर, उत्तरी सरकार एवं दक्षिण में होता है। इसकी लता-विस्तार में फैलने वाली तथा आरोही होती हैं। पत्ते-लट्त्वाकार या अंडाकार ३-५.५ × १.५-४ इञ्च बड़े, पर्णशिराएँ रक्ताभ, आमने-सामने के पत्ते कभी-कभी छोटे-बड़े एवं फलक का आधार तिरछा होता है। पुष्प- बड़े, श्वेत, सुगंधित तथा समस्त काण्डज गुच्छों में आते हैं। आभ्यंतर नाल नीचे पतला किन्तु ऊपर चौड़ा रहता है। फली-दो-दो, अग्र पर जुड़ी हुई एवं ४ से १४ इञ्च लम्बी तथा अग्र की ओर क्रमशः संकुचित रहती है। गुण और प्रयोग-यह वामक है। इसके पत्तों का पैत्तिक विकारों में प्रयोग करते हैं। पानी से अंगुलियों के बीच जब पक जाता है तब इसकी अग्र्य कलिकाओं का स्वरस लगाया जाता है। इसके पुष्पों का नेत्र विकारों में प्रयोग करते हैं। अथ लामज्जकम्। (उशीरवत् पीतच्छवितृणविशेषः)। तस्य नामगुणानाह लामज्जकं सुनालं स्यादमृणालं लवं१ लघु। इष्टकापथकं सेव्यं नलदञ्चावदातकम् ।।१९८।। लामज्जकं हिमं तिक्तं लघु दोषत्रयास्रजित्। त्वगामयस्वेदकृच्छ्रदाहपित्तास्ररोगनुत् ।।१९९।। 'लामज्जक' जो कि 'वीरण' घास की भाँति पीत वर्ण का एक विशेष तृण होता है उसके नाम तथा गुण-लामज्जक, सुनाल, अमृणाल, लव, लघु, इष्टकापथक, सेव्य, नलद और अवदातक ये सब संस्कृत नाम 'लामज्जक' के हैं। लामज्जक-तिक्तरसयुक्त, शीतवीर्य और लघु होता है एवं यह त्रिदोष, रक्तविकार, चर्मरोग, पसीना, मूत्रकृच्छ्र, दाह और रक्तपित्त इन सबों को दूर करता है। [१९८-१९९] ४९. लामज्जक लामज्जक भी संदिग्ध द्रव्य है। भावप्रकाशकार इसे खस की तरह का पीतवर्ण का तृणविशेष मानते हैं। कुछ ग्रंथकारों का कहना है कि जब तक इसका निर्णय नहीं हो जाता तब तक लामज्जक के स्थान पर खस का व्यवहार करना १. लयमिति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
४४२ भावप्रकाशनिघण्टुः चाहिये । कुछ नवीन ग्रन्थकारों ने लामज्जक का ले० नाम Cymbopogon jwarankusa (साइम्बोपोगोन् ज्वरांकुश) लिखा है। श्रीयुत् यादव जी अपनी द्रव्यगुणविज्ञान पुस्तक में लिखते हैं कि यह (साइम्बो-ज्वरांकुश) यूनानी औषध विक्रेताओं के यहाँ इजखिर नाम से बिकता है तथा इजखिर उष्णवीर्य द्रव्य होने से इसे लामज्जक नहीं मान सकते। वे इसे भूतृण मानते हैं। बाजार में एक पीतवर्ण का खस मिलता है। हो सकता है कि उसका लैटिन नाम ज्ञात न हो या वह खस का ही भेद हो लेकिन लामज्जक के स्थान पर उसका प्रयोग किया जा सकता है। यहाँ निम्नलिखित वर्णन साइम्बोपोगोन् ज्वरांकुश का किया गया है- हिं०-लखवी, लामज्जक, करनकुश, घाटजारी। मिर्जापुर-इन्द्रबगई। बं०-कारांकुस। म०-पिवलावाला। पं०-बुर, इमरंकुश। गु०-पिलो वालो। ते०-पासनगड्डि। ता०-कामाट्चिपिल्लु। क०-करिलावचा। अ०- इजखिर। इरा०-गुंगियाह। ले०-Andropogon jwarancusa Jones (एण्ड्रोपोगॉन् ज्वरान्कुश जोन्स); Cymbopogon jwarankusa Schult. (साइम्बोपोगॉन् ज्वरान्कुश शुल्ट)। Fam. Gramineae (ग्रैमिनी)। लामज्जक-यह सुगन्धित घास हिमालय, उत्तरप्रदेश, पञ्जाब, सिन्ध और बंबई में उत्पन्न होती है। यह तृण जाति की वनौषधि ३-६ फुट ऊँची होती है। पत्ते-चिपटे, चिकने, कड़े, २ फीट तक लम्बे, ०.२ इञ्च चौड़े और ऊपर की ओर क्रमशः कम चौड़े होकर लम्बे पतले नोकवाले होते हैं। पत्रकोश स्थाई, टेढ़े और उनके गुच्छों के बीच में डण्डी निकली रहती है। जड़-लम्बी, गुच्छेदार, कोमल, स्वाद में कड़वी, तीती एवं अत्यन्त सुगन्धित तथा पीले रंग की होती है। इसके पञ्चाङ्ग का व्यवहार किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके घास में करीब १% सुगंधित तैल होता है। गुण और प्रयोग-इसके फूल रक्तस्तंभक हैं तथा जड़ एवं पत्ते वातानुलोमक, उत्तेजक, आर्तवजनन, मूत्रजनन, स्वेदजनक एवं अल्प मात्रा में कफघ्न हैं। रक्तस्राव रोकने के लिये इसके फूलों को क्षत पर बाँधते हैं। इसके पंचाग को पीस कर शोथ पर लेप किया जाता है। ज्वर में पंचांग के क्वाथ से स्नान कराते हैं। द्राक्षासव में इसका पंचाग डाल कर गरम करके देने से पेशाब बहुत होता है। आमवात में विरेचन औषध के साथ इसे देते हैं। इसमें अल्प मात्रा में कफघ्न गुण होने के कारण कफ रोगों में दाह कम करने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। गर्भाशय का थोड़ा संकोच करने के कारण इसको प्रसूति ज्वर में देते हैं। वातरक्त में इसका उपयोग किया जाता है। बच्चों के कुपचन के लिए भी यह उत्तम है। मात्रा- १/४-१/२ तोला। अथैलवालुकम् । (कङ्कोलसदृशं कुष्ठगन्धि) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह एलवालुकमैलेयं सुगन्धि हरिवलुकम् । ऐलवालुकमेलालु कपित्थत्वच्¹ मीरितम् ॥१२०॥ एलालु कटुकं पाके कषायं शीतलं लघु । हन्तिकण्डूव्रणच्छर्दितृट्कासारुचिहृद्रुजः ॥ बलासविषपित्तास्रकुष्ठमूत्रगदकृमीन् ॥१२१॥ एलवालुक जो कि देखने में 'शीतलचीनी' की भाँति तथा गंध में 'कूठ' के समान होती है, उसके नाम तथा गुण-एलवालुक, ऐलेय, सुगन्धित, हरिवलुक, ऐलवालुक, एलालु और कपित्थत्वग् ये सब संस्कृत नाम 'एलवालुक' के हैं। एलवालुक-कषाय रस युक्त किन्तु पाक में कटुरसयुक्त, शीतवीर्य और लघु होती है। यह खुजली, १. कपित्थफल इति पाठ० ।
कर्पूरादिवर्गः ४४३
व्रण, वमन, प्यास, खाँसी, अरुचि, हृद्रोग, कफ, विष, रक्तपित्त, कुष्ठ, मूत्ररोग और कृमिरोग, इन सबों को दूर करती है। [१२०-१२१] ५०. एलवालुक एलवालुक संदिग्ध द्रव्य है। भावप्रकाशकार इसे 'कंकोलसदृशं कुष्ठगंधि' मानते हैं। चरक में शुक्रशोधन और वेदनास्थापन दशेमानि में एवं कषायस्कंध में इसका उल्लेख है। आसवयोनि में इसकी छाल का उल्लेख है। अर्शोक्त अभयारिष्ट, उन्मादोक्त कल्याणकघृत तथा पांडु के बीजकारिष्ट में इसका पाठ है। सुश्रुत के लोध्रादिगण में इसका पाठ है। उपर्युक्त विवेचन से यह बात स्पष्ट है कि एलवालुक, ॲलोज् (मुसब्बर) नहीं हो सकता जैसा कि कुछ लोग मानते हैं क्योंकि एलवालुक का पाठ त्वगासवयोनि में होने से यह कोई वृक्ष है ऐसा मालूम होता है। अधिकांश विद्वान् प्रुन्स् सिरेसस् को एलवालुक मानते हैं क्योंकि इसका एक नाम आलुवालु है। यह शायद एलवालुक का अपभ्रंश हो। डॉ० देसाई, गिसेकिआ फार्नेसिओइडिस् को एल्वालुक मानते हैं। इन दोनों का संक्षेप में वर्णन किया जा रहा है। कुछ लोगों ने मुकिआ स्काब्रेला आर्न० (Mukia scabrella Arn.) को माना है जो दीपन, मृदुविरेचन एवं मूत्रजनन है तथा जिसके पत्तों का प्रयोग चक्कर में, बीजों का प्रयोग स्वेद लाने के लिये एवं मूल का आध्मान में उपयोग किया जाता है। एलवालुक-१ हिं०-आलूवालू। पं०-गिलास। अं०-Dwarf cherry (ड्वार्फचेरी)। ले०-Prunus cerasus Linn. (प्रूनस् सिरॅसस् लिन.)। Fam. Rosaceae (रोज़ेसी)। इसके वृक्ष हिमालय के पर्वतों में लगाये हुए मिलते हैं। इसके पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे, १-१।। इञ्च चौड़े, लट्वाकार-अंडाकार, अग्र यकायक नोकीला तथा किनारा दन्तुर (तीक्ष्णाग्रगोल दाँत) होता है। पुष्प-श्वेत या गुलाबी एवं; फल-गोल, चिकना, चमकीला और घेरे में आधा इञ्च तक होता है। इसके बीज बाजार में बिकते हैं जिनकी मज्जा का औषध में व्यवहार किया जाता है। इसका स्वाद कडुवा एवं सुगन्धित रहता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक उड़नशील तैल एवं पद्माकाष्ठ आदि में पाया जाने वाला हाइड्रोसायेनिक् एसिड (Hydrocyanic acid) नामक तीव्र विष रहता है। गुण और प्रयोग-यह कडुवा पौष्टिक एवं वेदनास्थापक है। मज्जा तन्तु के रोगों में इसका व्यवहार किया जाता है। इसके अन्य गुण उपर्युक्त विष के समान हैं। इसकी छाल ग्राही एवं ज्वरहर होती है। मात्रा-२-५ रत्ती। एलवालुक-२ हिं०-बालुका साग। बं०-बालुक। म०-व(वा) लुची भाजी। ता०-मनलकिरै। ते०-एसकदन्तिकुर। ले०-Gisekia pharnaceoides Linn. (गिसेकिआ फार्नेसिओइडिस् लिन.)। Fam. Ficoidaceae (फिकोइडॅसी)। यह वनस्पति पंजाब, सिंध, दक्षिण तथा सिलोन में होती है। इसके क्षुप-छोटे, फैले हुये तथा अनेक शाखाओं से युक्त होते हैं। पत्र-विपरीत, मांसल, अखंड, अंडाकृति, करीब १ इञ्च लम्बे तथा आधार की तरफ नोकीले होते हैं। पुष्प-अनेक; फल-बाह्यदल से आवृत झिल्लीदार होते हैं। बीज-काले से, पृष्ठ पर गोलाई लिये हुए एवं श्वेत छोटी ग्रंथियों से युक्त होते हैं। बंगाल में वालुक नाम से यह बीज बिकते हैं। औषध में पंचाग का व्यवहार किया जाता है।
४४४ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन-पत्तों में बालू की तरह क्षार के कंकड रहते हैं । इसी से इसे बालू का साग कहा जाता है । गुण और प्रयोग-इसका पंचाग, सुगंधित, आनुलोमक एवं कृमिघ्न है । कृमिरोग में इसके पंचाग का रस १ औंस तथा शीतजल १ औंस मिलाकर सुबह खाली पेट पिलाते हैं । हर दूसरे दिन ३, ४ बार के प्रयोग से स्फीतकृमि (Taenia) मर कर निकल जाते हैं । अथ कैवर्तीमुस्तकम् (केवटी मोथा) । तस्य नामलक्षणगुणानाह कुटन्नटं दासपुरं बालेयं परिपेलवम् । प्लवगोपुरगोनर्दकैवर्तीमुस्तकानि च ।। १२२ ।। मुस्तावत्पेलवपुरं¹ शुकाभं² स्याद्वितुन्नकं ।। १२३ ।। वितुन्नकं हिमं तिक्तं कषायं कटु कान्तिदम् । कफपित्तास्रवीसर्पकुष्ठकण्डूविषप्रणुत् ।। १२४ ।। 'केवटीमोथा' के नाम लक्षण तथा गुण-कुटन्नट, दासपुर, बालेय, परिपेलव, प्लव, गोपुर, गोनर्द, कैवर्तीमुस्तक और वितुन्नक ये सब संस्कृत नाम 'केवटीमोथा' के हैं। केवटीमोथा के लक्षण-यह मोथा की भाँति, कोमल दलकोश तथा शुक की भाँति वर्ण से युक्त होता है । केवटीमोथा-कटु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शीतवीर्य और कान्तिवर्धक होता है और यह कफ, पित्त, रक्तविकार, वीसर्प, कुष्ठ, खुजली तथा विष को दूर करता है । [१२२- १२४] ❖ 'केवटीमोथा'-'गुडतजी' इति च लोके । इदं तु वितुन्नकनाम्नो वृक्षस्य त्वग मुस्ताकृतिः ।। १२२- १२४ ।। यहाँ पर यह भी समझना चाहिये कि लोक में 'केवटीमोथा' गुडतजी नाम से भी प्रसिद्ध है तथा यह वितुन्नकनामक वृक्ष का छिल्का है एवं आकार में मोथा की भाँति होने से इसे केवटीमोथा कहते हैं । [१२२-१२४] ५१. केवटीमोथा कैवर्तमुस्तक का उपर्युक्त वर्णन भ्रमात्मक मालूम पड़ता है । मुस्ता के आकारवाली वितुन्नक नामक वृक्ष की छाल कैवर्तमुस्तक है यह उपर्युक्त वर्णन से मालूम होता है । केवटीमोथा नाम से ग्रन्थिसदृश छोटे काले कन्द मिलते हैं जो मोथा वर्ग (Cyperus) के ही होते हैं । इसके गुणों में तथा मोथे के गुणों में विशेष अन्तर नहीं है । इसलिये इन्हें कैवर्तमुस्तक माना जा सकता है । डॉ० देसाई ने ले०-Celosia argentea Linn.; Fam. Amaranthaceae (सेलोसिआ आर्जेण्टिआ, लिन. ॲमॅरेन्थ्येसी) का संस्कृत नाम शितवार, वितुन्नक लिखा है । इसे हिं० में सुर्वाली, सफेद मुर्गा कहा जाता है । शाकवर्ग में वर्णित, शितिवार यही मालूम होता है । शितिवार के पर्यायों में 'सुनिषण्णक' शब्द भी आता है किन्तु ये दो भिन्न द्रव्य मालूम होते हैं । सुनिषण्णक यह चौपतिया साग है जिसका वर्णन आगे शाकवर्ग में किया गया है । शितिवार यह सुर्वाली होने की अधिक संभावना है । इसका क्षुप समस्त भारत में होता है । यह ३ फीट ऊँचा, पत्ते-एकान्तर, लम्बे, पतले तथा कम चौड़े; पुष्प-सफेद तथा गुलाबी एवं क्षुप के अन्त में गुच्छों में; फली-दीर्घ वृत्ताकार छोटी; बीज-बहुत, काले से भूरे रंग के होते हैं । पत्तों का शाक खाते हैं तथा बीजों का भी व्यवहार किया जाता है । बीज शीतल, स्नेहन तथा पौष्टिक होते हैं । १ तोला बीज, मिश्री तथा उष्ण दुग्ध के साथ कामोत्तेजना के लिये देते हैं । बीजों का फांट अतिसार में तथा मूत्राघात में मिश्री एवं बीज का उपयोग किया जाता है । मात्रा-१/२-१ तोला । १. पुटमिति पाठा० । २. शुक्राभमिति पाठा० । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
कर्पूरादिवर्गः ४४५ अथ स्पृक्का (असबरग)। सुगन्धिद्रव्यम् (शाकविशेषः)। 'लङ्कोइकपुरी'ति लोके च। तस्या नामगुणानाह स्पृक्काऽसृग् ब्राह्मणी देवी मरुन्माला लता लघुः। समुद्रान्ता वधूः कोटिवर्षा लङ्कोषिकेत्यपि ।। १२५ ।। स्पृक्का स्वाद्वी हिमा वृष्या तिक्ता निखिलदोषनुत्। कुष्ठकण्डूविषस्वेददाहाश्री¹ ज्वररक्तहृत् ।। १२६ ।। स्पृक्का (असबरग) जो कि सुगन्धित द्रव्यों में से एक प्रकार का शाक ही है तथा जिसे लोक में 'लङ्कोइकपुरी' भी कहते हैं, उसके नाम तथा गुण—स्पृक्का, असृग्, ब्राह्मणी, देवी, मरुन्माला, लता, लघु, समुद्रान्ता, वधू, कोटिवर्षा और लङ्कोषिका ये सब संस्कृत नाम 'स्पृक्का' के हैं। स्पृक्का—स्वादिष्ट, शीतवीर्य, वृष्य, तिक्त रसयुक्त तथा सम्पूर्ण दोषों को दूर करने वाली होती हैं एवं यह कुष्ठ, खुजली, विष, पसीना, दाह, अलक्ष्मी, ज्वर तथा रक्तविकार को नष्ट करती है। [१२५-१२६] ५२. स्पृक्का स्पृक्का भी एक सन्दिग्ध द्रव्य है। डल्हण ने इसे 'कुटिलपुष्पा सुगन्धिद्रव्यमौत्तरापथिकम्' (सु० सू० ३८) लिखा है। चरक में भी इसका उल्लेख है। कुछ लोगों ने इसका ले० नाम मार्सिलिआ क्वाड्रिफोलिएटा (Marsilia quadrifoliata) तथा कुछ ने ट्राइफोलिअम् ऑफिसिनेल् (Trifolium officinale) लिखा है जो उचित नहीं मालूम पड़ता। डॉ० देसाई ने एनिसोमेलिस् मलवारिका को स्पृक्का लिखा है। वर्णन एवं गुण-धर्म की दृष्टि से यह उचित मालूम होता है अतः इसी का वर्णन किया जा रहा है। गु०—मखमली चोधारों। म०—कपुरीमधुरी, कालोतुंबो, गावजबान, चोधारा। क०—करितुंबे। ते०—मोगबीराकु। ता०—पेथिमसरी। अं०—Malabar catmint (मॅलॅबर् केट्मिण्ट्)। ले०—Anisomeles malabarica R. Br. (एनिसोमेलिस् मलवारिका र० ब्र०)। Fam. Labiatae (लेविएटी)। इसका क्षुप—अत्यन्त रोमश तथा झाड़ीदार दक्षिण भारत में होता है। यह ४-६ फीट ऊँचा रहता है। पत्ते—मोटे, लंबगोल, कुछ शल्याकृति, दन्तुर तथा सवृन्त रहते हैं। पुष्प—हलके जामुनी रंग के रहते हैं। इसके पत्र सुगन्धि एवं कड़वे रहते हैं। रासायनिक संगठन—इसमें उड़नशील तैल तथा एक कडुवा क्षाराभ रहता है। गुण और प्रयोग—यह उत्तम स्वेदजनन, शीतप्रशमन तथा उत्तेजक है। यह तीव्र औषध है। उदर शूल, अपचन तथा कुपचन में इसे खिलाते हैं तथा इसका पेट पर लेप भी करते हैं। बच्चों में दंतोद्भेद के समय होने वाले विकारों में इससे अच्छा लाभ होता है। कृमिज्वर तथा अन्य ज्वरों में विशेष कर जीर्ण ज्वर में इससे लाभ होता है। आमवातादि में इसके उड़नशील तैल को लगाया जाता है तथा पत्तों के क्वाथ से सेंका जाता है। तैल का भी आंतरिक प्रयोग पाचन के विकारों में किया जाता है। मात्रा—स्वरस १/४-१/२ चम्मच। तैल-२-५ बूँद। 'पर्पटी' इति प्रसिद्धं 'पद्मावती' इति चोत्तरदेशे, सुगन्धि द्रव्यम्। अथ पर्पटी (पनडी)। तस्या नामानि गुणाँश्चाह पर्पटी रञ्जना कृष्णा जतुका जननी जनी। जतुकृष्णाऽग्निसंस्पर्शा जतुकृच्छ्रकवर्तिनी ।। १२७ ।। पर्पटी तुवरा तिक्ता शिशिरा वर्णकृल्लघुः। विषव्रणहरी कण्डूकफपित्तास्रकुष्ठनुत् ।। १२८ ।। १. दाहास्र इति पाठ०। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
४४६ भावप्रकाशनिघण्टुः 'पर्पटी' जो कि 'पद्मावती' नाम से उत्तर देश में प्रसिद्ध सुगन्धित द्रव्य है उसके नाम तथा गुण-पर्पटी, रञ्जना, कृष्णा, जतुका, जननी, जनी, जतुकृष्णा, अग्निसंस्पर्शा, जतुकृत् और चक्रवर्त्तिनी ये सब संस्कृत नाम 'पर्पटी' के हैं। पर्पटी-कषाय तथा तिक्त रसयुक्त, शीतवीर्य, शरीर के वर्ण को उज्ज्वल करने वाली और लघु होती है। यह विष, व्रण, खुजली, कफ, पित्तरक्त और कुष्ठ को दूर करने वाली है। [१२७-१२८] ५३. पर्पटी सुगन्धित पानडी के स्वरूप के बारे में भी पर्याप्त मत भिन्नता है। डॉ० देसाई ने गु०-सुगन्धी पानडी नाम से एक क्षुप का वर्णन किया है जिसका नीचे वर्णन दिया गया है। सं०-पाची। हि०-पाचोली। बं०-पाटचोली, पाचपट। गु०-सुगन्धीपानडी। म०-पाँच। कोंक-माली। ले०-Pogostemon patchouli Hook. f. (पोगोस्टेमॉन् पाचौली हुक.)। Fam. Labiatae (लेबिएटी)। इसका स्वावलम्बी, अनेक शाखायुक्त क्षुप कोंकण में प्रसिद्ध है। यह जंगलों में होता है तथा इसकी उपज भी की जाती है। उपज से इसकी आकृति में परिवर्तन हो जाता है। पत्ते-अंडाकृति, दन्तुर तथा लंबे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-बहुत छोटे तथा तुलसी की तरह गुच्छों में आते हैं। यह क्षुप बहुत सुगन्धित होता है। इसके पत्तों का उपयोग औषध में किया जाता है। रेशमी तथा ऊनी वस्त्रों में कीड़े न लगें इसलिये उनमें इसके पत्ते रखते हैं। रासायनिक संगठन-इसमें एक अत्यन्त सुगन्धित उड़नशील तैल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह रक्तस्तम्भक, मूत्रजनन तथा वातानुलोमक है। रक्तमूत्र में १ माशा भाँग के साथ २ तोला पत्तों का रस देते हैं। मात्रा-१/२-१ चम्मच। अथ नलिका। उत्तरापथे प्रसिद्धा सुगन्धा प्रवालाकृतिः 'यवारी' इति च क्वचित्प्रसिद्धा। तस्या नामानि गुणांश्चाह नलिका विद्रुमलता कपोतचरणा नटि। धमन्त्यञ्जनकेशी च निर्मध्या१ सुपिरा नली ।।१२९।। नलिका शीतला लघ्वी चक्षुष्या कफपित्तहृत्। कृच्छ्राश्मवाततृष्णाऽस्रकुष्ठकण्डूज्वरापहा ।।१३०।। 'नलिका' जो कि उत्तरदेश में प्रसिद्ध सुगन्धित द्रव्य देखने में मूँगे के समान होती है और जो कि कहीं- कहीं 'यवारी' नाम से भी प्रसिद्ध है उसके नाम तथा गुण-नलिका, विद्रुमलता, कपोत चरणा, नटी, धमनी, अञ्जनकेशी, निर्मध्या, सुषिरा और नली ये सब संस्कृत नाम नलिका के हैं। नलिका-शीतवीर्य, लघु तथा नेत्र के लिये हितकर होती है। यह कफ, पित्त, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, वात, तृषा, रक्तदोष, कुष्ठ, खुजली तथा ज्वर को दूर करती है। [१२९-१३०] ५४. नलिका नलिका नामक गन्धद्रव्य भी सन्दिग्ध है। कुछ लोग इसे रतनजोत मानते हैं। रतनजोत भी कुछ हदतक सन्दिग्ध ही है। नालुका नाम से एक सुगन्धित गोल मुड़ी हुई छाल के टुकड़े या चूर्ण बाजार में बिकता है। यह तज की ही एक जाति है। इसे नलिका कहा जा सकता है कि नहीं, यह कहना कठिन है। नालुका का विशेष उपयोग शोथहर लेप के रूप में बहुत किया जाता है। १. निर्मथ्या इति पाठा० ।
कर्पूरादिवर्गः ४४७ अथ प्रपौण्डरीकम् । सुगन्धि द्रव्यम् (पुण्डेरी) इति लोके प्रसिद्धम् । तस्य नामानि गुणाँश्चाह प्रपौण्डरीकं पौण्डर्यं चक्षुष्यं पौण्डरीयकम् । पौण्डर्यं मधुरं तिक्तं कषायं शुक्रलं हिमम् । चक्षुष्यं मधुरं पाके वर्ण्यं पित्तकफप्रणुत् ।।१३१।। ‘पुण्डेरी’ इस नाम से लोक में प्रसिद्ध सुगन्धि द्रव्य के नाम तथा गुण—प्रपौण्डरीक, पौण्डर्य, चक्षुष्य और पौण्डरीयक ये सब संस्कृत नाम ‘पुण्डेरी’ के हैं । पुण्डेरी—मधुर, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शुक्रजनक, शीतवीर्य, नेत्र के लिये हितकर, पाक में मधुर और शरीर के वर्ण को उत्तम करने वाला तथा पित्तकफ का नाशक है । [१३१] ५५. पुण्डेरी प्रपौण्डरीक भी एक संदिग्ध द्रव्य है । कुछ लोगों ने पुण्डरीक तथा प्रपौण्डरीक में नाम तथा गुण सादृश्य होने से दोनों को एक मान लिया है लेकिन यह उचित नहीं है । पुण्डरीक श्वेत कमल का नाम है । पुण्डरीक नाम से सुश्रुत (क० अ० २) में कन्दविष का उल्लेख है । ‘पुण्डरीकेण रक्तत्वमक्ष्णोर्वृद्धिस्तथोदरे ।’ प्रपौण्डरीक का एक नाम ‘चक्षुष्य’ होने से ‘चाकसू’ नामक वनस्पति को प्रपौण्डरीक के स्थान पर लिया जा सकता है । डॉ० देसाई ने चाकसू को ‘वन्यकुलत्थ’ लिखा है । वन्यकुलत्थ-रक्तपित्तकृत्, शीतल, कफवातहर एवं कषाय रसयुक्त होती है । कुछ लोग यूनानी द्रव्य ममीरा मानते हैं क्योंकि उसका नेत्र रोगों में बहुत व्यवहार होता है । निम्न वर्णन चाकसू का है । सं०—चक्षुष्या, अरण्यकुलत्थिका । हिं०—चाक्षुस्, चाकसू । पं०—चक्सू । गु०—चीमेड । कांठि०—चमेड । म०—चिनोल, कानकुटी, चिम्न । ता०—करुकानम् । ते०—चनुपाल विट्टलु । कं०—क्रीड, निन्द्रताछ । अ०—जश्मीजज, इब्बुस्सूदान । फा०—चश्मीजज, चशूम । ले०—Cassia absus Linn. कैसिआ एब्सस् लिन०) । Fam. Leguminosae (लेगुमिनोसी) । यह प्रायः सर्वत्र प्राप्त होता है । इसके एक वर्षायु क्षुप-८-१८ इञ्च ऊँचे होते हैं । पत्रनाल बड़ा और पत्रदण्ड पर प्रत्येक पत्रकद्वय के बीच एक रेखाकार ग्रन्थि होती है । पत्रक—संख्या में ४, आयताकार, .६-.९ इञ्च लम्बे, करीब-करीब कुण्ठिताग्र और मध्यशिरा के दोनों ओर के उनके दोनों भाग आधार पर असमान होते हैं । पुष्प सवृन्त पीले या लाल जिसमें केवल ४ पुंकेशर होते हैं और जो अग्रय मंजरी मे रहते हैं । फली—चिपटी, रोमश तथा १-१ १/२ इञ्च लम्बी होती है । बीज—संख्या में पाँच, चमकीले, काले भूरे, चिकने, चिपटे, अंडाकृति किन्तु एक सिरा पतला और लम्बाई तथा चौड़ाई में १/६ इञ्च होते हैं । बीज का कवच निकाल देने से पीले रंग की तथा कड़वी मज्जा निकलती है । रासायनिक संगठन—इसके बीजों में २ १/२% राख होती है । उसमें मँगेनीझ का अंश रहता है । गुण और प्रयोग—यह संग्राहक एवं नेत्राभिष्यंदप्रशमन है । पूययुक्त नेत्राभिष्यंद में भुने हुए बीजों की मज्जा का १/२ रत्ती चूर्ण पलकों के अन्दर रखते हैं । बीजों को पानी में साने हुए गेहूँ के आटे में रख, गरम राख में गरम कर, छिलका निकाल कर नेत्ररोगों में प्रयोग किया जाता है । चाकसू के २१ बीज तथा सफेद चंदन ५ माशे रात में जल में भिगो कर सुबह उस जल को छानकर पिलाने से रक्त मूत्र ठीक होता है । इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे कर्पूरादिवर्गः समाप्त ।। ❖※❖ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ गुडूच्यादिवर्गः अथ गुडूची। तस्य उत्पत्तिं नामानि गुणांश्चाह अथ लङ्केश्वरो मानी रावणो राक्षसाधिपः। रामपत्नीं बलात्सीतां जहार मदनातुरः ।।१।। ततस्तं बलवान् रामो रिपुं जायाऽपहारिणम्। वृतो वानरसैन्येन जघान रणमूर्धनि ।।२।। हते तस्मिन्सुरारातौ रावणे बलगर्विते। देवराजः सहस्राक्षः परितुष्टश्च राघवे ।।३।। तत्र ये वानराः केचिद्राक्षसैर्निहता रणे। तानिन्द्रो जीवयामास संसिच्यामृतवृष्टिभिः ।।४।। ततो येषु प्रदेशेषु कपिगात्रात्परिच्युताः। पीयूषबिन्दवः पेतुस्तेभ्यो जाता गुडूचिका ।।५।। गुडूची मधुपर्णी स्यादमृताऽमृतवल्लरी। छिन्ना छिन्नरूहा छिन्नोद्भवा वत्साडनीति च ।।६।। जीवन्ती तन्त्रिका सोमा सोमवल्ली च कुण्डली। चक्रलक्षणिका धीरा विशल्या च रसायनी ।।७।। चन्द्रहासा वयस्था च मण्डली देवनिर्मिता। गुडूची कटुका तिक्ता स्वादुपाका रसायनी ।।८।। संग्राहिणी कषायोष्णा लघ्वी बल्याऽग्निदीपिनी। दोषत्रयामतृड्दाहमेहकासांश्च पाण्डुताम् ।।९।। कामलाकुष्ठवातास्रज्वरक्रिमिवमीन्हरेत् । (प्रमेहश्वासकासार्शः कृच्छ्रहृद्रोगवातनुत्) ।। १०।। अब यहाँ से गुडूच्यादिवर्ग आरम्भ होता है। उसमें प्रथम 'गिलोय' की उत्पत्ति, नाम तथा गुण कहते हैं। उत्पत्ति—जबकि अभिमानी, लङ्का के राजा, राक्षसों के स्वामी रावण ने कामातुर हो श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी श्रीसीताजी को बलपूर्वक हरण किया, तब बलवान् श्रीरामचन्द्रजी ने स्त्री के हरण करनेवाले उस शत्रु (रावण) को वानरों की सेनाओं से युक्त हो युद्ध में मारा। बल से गर्वीले, देवताओं के शत्रु उस रावण के मारे जाने पर हजार नेत्रों वाले देवताओं के राजा इन्द्र, श्रीरामचन्द्रजी पर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने उस युद्ध में जो कोई वानर राक्षसों के द्वारा मारे गये थे उन्हें अमृत की वर्षा से सींचकर जिला दिया। उसके बाद जिन स्थानों पर वानरों के शरीर से अमृत की बूँदें पृथ्वी पर गिरीं, उनसे 'गिलाय' की उत्पत्ति हुई। नाम—गुडूची, मधुपर्णी, अमृता, अमृतवल्लरी, छिन्ना, छिन्नरुहा, छिन्नोद्भवा, वत्साडनी, जीवन्ती, तन्त्रिका, सोमा, सोमवल्ली, कुण्डली, चक्रलक्षणिका, धीरा, विशल्या, रसायनी, चन्द्रहासा, वयस्था, मण्डली और देवनिर्मिता ये सब संस्कृत नाम 'गिलोय' के हैं। गुण—गिलोय कटु, तिक्त तथा कषाय रस युक्त एवं विपाक में मधुर रसयुक्त, रसायन, संग्राही, उष्णवीर्य, लघु, बलकारक, अग्निदीपक तथा त्रिदोष, आम, तृषा, दाह, मेह, कास, पाण्डुरोग, कामला, कुष्ठ, वातरक्त, ज्वर, क्रिमि और वमि को दूर करती है। (यह प्रमेह, श्वास, काश, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, हृद्रोग और वात इन सबों का नाश करने वाली होती है)। [१-१०] इसके पत्तों के गुण आगे शाकवर्ग में लिखे हुए हैं। १. गिलोय हिं०-गिलोय, गुरुच, गुडुच। बं०-गुलंच, पालो (सत्व)। म०-गुलवेल, गरुड़ वेल। गु०-गलो। क०- अमरदवल्ली, अमृत वल्ली। ते०-तिप्पतीगे। ता०-शिन्दिलकोडि, अमृडवल्ली। उ०-गुलंचा। पं०-गिलो।
गुडूच्यादिवर्गः ४४९ क०-गरुड़वेल। मला०-अम्रितु। गोआ०-अमृतवेल। फा०-गिलोई, गिलोय। अ०-गिलोइ। अं०-टिनोस्पोरा। ले०-Tinospora cordifolia (Willd.) Miers (टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया मायर्स)। Fam. Menispermaceae (मेनिस्यर्मेसी)। गिलोय-प्रायः सब प्रान्तों के जंगल-झाड़ियों में पाई जाती है विशेषकर गरम प्रान्तों में अधिक होती है। देहरादून और सहारनपुर के जङ्गलों में बहुत पायी जाती है। इसकी बहुवर्षायु, चिकनी एवं मांसल लता-बहुत विस्तार में वृक्षों पर फैल जाती है। शाखाओं से डोरे के समान शीरियाँ निकल कर भूमि की ओर लटकती हैं। पत्ते-पान के समान, २-४ इञ्च के घेरे में गोलाकार नुकीले, चिकने, पतले, ७-९ शिराओं से युक्त एवं १-३ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त होते हैं। प्रायः वसन्त ऋतु में इसके पुराने पत्ते पीले होकर गिर जाते हैं और ज्येष्ठ तक नवीन पत्ते निकल आते हैं। उसी समय हरापन युक्त पीले रंग के अथवा केवल पीले रंग के फूलों के गुच्छे आते हैं। फल-मटर के समान होते हैं और पकने पर ये लाल हो जाते हैं। बीज-कुछ टेढ़े तथा चिकने होते हैं। इसके मूल तथा कांड का व्यवहार औषध के लिये किया जाता है। ताजी अवस्था में कांड की छाल हरी तथा मांसल रहती है तथा उस पर पतली भूरे रंग की बाह्य त्वचा रहती है जिसकी पपड़ी निकलती रहती है। इस पर छोटे- छोटे गड्ढे होते हैं। इसको काटने से अन्दर का भाग चक्राकार दिखाई देता है। ताजी एवं हरी गुडुच ज्यादा लाभप्रद होती है। गरमी में मई महीने के आखिर में इसका संग्रह करना चाहिये। प्रयोग के पूर्व इसके ऊपर की छाल खुरचकर निकाल दी जाती है। इसमें गन्ध नहीं होती किन्तु स्वाद कड़वा होता है। इससे कुछ भिन्न इसकी एक दूसरी जाति प्रायः बड़ी (४°-९° x ८°), मृदु रोमश और प्रायः त्रिखण्ड पत्तियों वाली होती है। इसके बीज के कठोर आवरण पर छोटे-छोटे दाने होते हैं। इसे सं०-पद्मगुडूची, बं०-पद्मगुलंच, माल०, पं०-बड़ी सरसटीलत एवं ले०-Tinospora malabarica (Lam.) Miers (टिनोस्पोरा मलवारिका मायर्स) कहते हैं। दोनों के गुण और स्वरूप में स्थूल रूप से कोई अन्तर न मिलने के कारण दोनों का ही व्यवहार गुडूची के नाम से किया जाता है। इसे कुछ विद्वानों ने सुदर्शन माना है। रासायनिक संगठन-इसकी ताजी कांड त्वक् में तीन रवेदार पदार्थ, गिलोइन ग्लूकोसाइड (Giloin, C₂₃ H₃₂ O₁₀, 5H₂ O), गिलोइनिन नामक कड़वा पदार्थ (Giloinin, C₁₇ H₁₈ O₅) तथा गिलोस्टेरॉल (Gilosterol, C₂₈ H₄₈ O) पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त इसमें बर्बेरिन (Berberine) एवं मोम की तरह का एक पदार्थ पाया जाता है। गुडूचीसत्व-अच्छी मोटी गुडुच बरसात के पूर्व संग्रहकर ऊपर की छाल छुड़ाकर साफ धोकर छोटे टुकड़े बना पत्थर के खरल में महीन कूट डाले। इसमें चौगुना जल डाल १२-२४ घंटा भींगने के बाद अच्छी तरह मसलकर कपड़े से छान ले। सत्व नीचे बैठने के बाद ऊपर का जल धीरे से निथार कर सत्व को सुखाकर बन्द बोतलों में रखें। कुछ लोग निथरे हुए जल में फिर से उसी गुडुच को मसल एवं उबाल कर छान लेते हैं तथा उस द्रव को पहले निकाले हुए सत्व में मिलाकर धूप में सुखा लेते हैं जिससे इसमें उष्ण जल में घुलनशील पदार्थ भी आ जाते हैं। कुछ लोग निथारे हुए जल को औटाकर स्वतन्त्र प्रयोग भी करते हैं। गुण और प्रयोग-गुडुच कड़वी, उष्ण, त्रिदोषघ्न, रसायन, बल्य, ज्वरहर, दीपन, मूत्रजनन, त्वग्रोगहर, पित्तसारक तथा विषघ्न है। नवीन, अनुसंधानों से गुडूची का व्याधिप्रतिकारक गुण व्यापक रूप में प्रमाणित हुआ है। जीर्ण पूतिकेन्द्र (Chronic septic focus) जनित विकार, जीर्ण विषमज्वर तथा यकृत् की हीनकार्यता आदि में कुछ काल तक गुडूची का प्रयोग करते रहने से अवश्य लाभ होता है। ३२ भाव.I
४५० भावप्रकाशनिघण्टुः इसका प्रयोग त्वग्रोग, विषमज्वर, जीर्णज्वर, कुष्ठ, वातरक्त, प्रमेह, मूत्रकृच्छ्र, कामला, पांडु, मन्दाग्नि, वमन, तृषा, दाह, रक्तार्श एवं कृमि आदि अनेक रोगों में किया जाता है। (१) ताजी गिलोय को साफ धोकर बनाया कल्क १० तो० एवं अनन्तमूल का चूर्ण १० तो० इनको १०० तो० उबलते जल में बन्द पात्र में दो घंटे बन्द रखें। फिर मसल कर छान लें। यह फांट उत्तम रसायन एवं मूत्रजनन है। कुष्ठ, फिरङ्गोपदंश की द्वितीयावस्था, वातरक्त तथा जीर्ण आमवात में यह बहुत लाभदायक होता है। ज्वर के पश्चात् उत्पन्न दौर्बल्य तथा अन्य दौर्बल्य युक्त व्याधियों में इसका उपयोग पौष्टिक रूप में किया जाता है। इसको ५-१० तो० दिन में ३ बार पिलाते हैं। (२) सौम्य विषमज्वर तथा जीर्णज्वर में जो शीत मालूम पड़ता है वह इसके क्वाथ से दूर होता है। जीर्णज्वर में इसके क्वाथ में या स्वरस में छोटी पीपल एवं मधु मिलाकर पिलाते हैं जिससे ज्वर, कफ, प्लीहावृद्धि एवं अरुचि आदि दूर होती है। (३) प्रमेह, नवीन सोजाक तथा अन्य मूत्रविकारों में इसका स्वरस अधिक मात्रा में दिया जाता है। अधिक मात्रा से पाखाना भी साफ होता है। प्रमेह में २-३ ड्रा० स्वरस पाषाणभेदचूर्ण ५-८ र० एवं मधु के साथ या दुग्ध एवं शर्करा के साथ दिन में ३ बार पिलाते हैं। गुडुच, हरिद्रा एवं आँवला इनका क्वाथ अथवा गुडूची स्वरस एवं मधु का प्रयोग भी लाभदायक होता है। (४) गुडूची से पित्तमार्ग का अभिष्यन्द कम होने के कारण पित्त का स्राव ठीक होने लगता है। कुपचन, मन्द उदरशूल तथा कामला में इसका उपयोग किया जाता है। कामला में इसका स्वरस मधु मिलाकर सुबह पिलाना चाहिये। इसमें गुडुच के पत्तों का कल्क तक्र के साथ लाभदायक होता है। पैत्तिक वमन में इसका स्वरस पिलाने से लाभ होता है। (५) त्वग्रोगों में यह प्रधान औषध है। इनमें एक हाथ प्रमाण में गुडुच, गुग्गुलु के साथ या कड़वी नीम या हरिद्रा, खदिर एवं आँवला के साथ देते हैं। इससे कंडू, दाह, दाग एवं चकत्ते आदि अच्छे होते हैं। वातरक्त में दुग्ध के साथ सिद्ध किया हुआ इसका तैल लाभदायक माना जाता है। पित्ताधिक्य युक्त वातरक्त में इसका क्वाथ पिलाते हैं। (६) अर्श में इसका स्वरस या चूर्ण तक्र के अनुपान से देते हैं। (७) स्तन्यशुद्धि के लिये इसका क्वाथ पिलाया जाता है। (८) रसायन रूप में इसका स्वरस या मधु एवं गुड़ के साथ इसके चूर्ण का प्रयोग किया जाता है। (९) गुडूचीसत्व—ज्वरहर रूप में इसका बहुत उपयोग किया जाने से इसे भारतीय क्विनीन कहा जाता है। प्लीहावृद्धि एवं बस्तिशोथ में यह बहुत उपयोगी है। आँव, जीर्ण अतिसार, रक्तातिसार, अम्लपित्त, मूत्रविकार एवं शुक्रक्षय में यह लाभदायक है। औषधीय गुणों के अतिरिक्त यह उत्तम पोषक पदार्थ भी है। मात्रा—चूर्ण १-३ मा०, क्वाथ ४-८ तो०; सत्व ५-१५ रत्ती। अथ नागवल्ली (पान) । तस्या नामानि गुणाँश्चाह ताम्बूलवल्ली ताम्बूली नागिनी नागवल्लरी । ताम्बूलं विशदं रुच्यं तीक्ष्णोष्णं तुवरं सरम् ।।११।। वश्यं तिक्तं कटु क्षारं रक्तपित्तकरं लघु । बल्यं श्लेष्मास्यदौर्गन्ध्यमलवातश्रमापहम् ।।१२।। पान के नाम तथा गुण—ताम्बूलवल्ली, ताम्बूली, नागिनी, नागवल्लरी और ताम्बूल ये सब संस्कृत नाम ‘पान’ के हैं। पान—विशदगुणयुक्त, रुचिकारक, तीक्ष्ण, उष्णवीर्य, कसैला, दस्तावर, वशकारक, तिक्त, कटु रसयुक्त, क्षार गुणयुक्त, रक्तपित्त का उत्पादक, लघु तथा बलकारक होता है। यह कफ, मुख की दुर्गन्धता, मल वात तथा श्रम को दूर करता है। [११-१२] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
गुडूच्यादिवर्गः ४५१ २. पान हिं०-पान। बं०-पान। म०-नागवेल, विड्याचेपान। ते०-तमाल पाकु। ता०-वेत्तिलै। गु०, मा०- नागरवेल। मला०-वेत्तिल। फा०-तंबोल, बर्गे तम्बोल। अ०-तंबूल। अं०-Betel Leaf (बिटल लीफ)। ले०-Piper betel Linn. (पाइपर बीटल लिन.)। Fam. Piperaceae (पाइपरेसी)। पान-सर्वप्रसिद्ध और सर्वप्रिय एक बेल के पत्र हैं। भारतवर्ष, लंका एवं मलयद्वीप के उष्ण एवं आर्द्रप्रदेशों में इसकी खेती की जाती है। इसकी मूलारोहिणी लता-अत्यन्त सुहावनी और कोमल होती है। कांड-अर्धकाष्ठमय, मजबूत तथा गाँठों पर मोटा रहता है। पत्ते-पीपल के पत्तों के समान बड़े, चौड़े, अंडाकार, कुछ हृदयाकृति, कुछ लम्बाग्र, प्रायः ७ शिराओं से युक्त, चिकने, मोटे एवं करीब १ इञ्च लम्बे पर्णवृन्त से युक्त रहते हैं। पुष्प-अवृन्त काण्डज (Spike) पुष्पव्यूहों में आते हैं। फल-करीब दो इञ्च लम्बे, मांसल, लटकते हुये व्यूहाक्ष में छोटे-छोटे बहुत फल रहते हैं। पान में मनोहर गंध रहती है तथा इसका स्वाद कुछ उष्ण एवं सुगंधयुक्त रहता है। इसके खेत की जमीन बीच में ऊँची और दोनों किनारे नीचे होते हैं। इससे खेत में पानी नहीं ठहरता। धूप और पाले से बचाव के लिये खेत के चारों ओर फूस की दीवार और छाजनी बना देते हैं। खेत के भीतर क्यारी बनाकर फरहद, जियल इत्यादि की डालियाँ लगा देते हैं। इन्हीं के सहारे पान की बेल फैलती है। बंगला, साँची, महोबा, महाराज पुरी, विलोआ, कपूरी, फुलवा इत्यादि नामों से इसकी कई जातियाँ होती हैं। ध० नि० में इसके कृष्ण और शुभ्र ये दो भेद लिखे हुये हैं। रा० नि० में श्रीवाटी (सिरिवाडीपान), अम्लवाटी (अंबाडेपर्ण), सतसा (सातसीपर्ण), गुहागरे (अडगरपर्ण), अम्लसरा (मालव में होने वाला अंगरापर्ण), पटुलिका (आंध्र में होने वाला पोटकुली पर्ण) एवं ह्रेसणीया (समुद्रदेशपर्ण) ये पान के सात भेद लिखे हैं जिनके अलग-अलग गुण भी लिखे हैं।१ स्थानादि भेद से पान विभिन्न प्रकार का होता है। अति प्राचीनकाल से अपने यहाँ पान का व्यवहार मुखशुद्धि, रुचिवृद्धि एवं सुगन्धि के लिये किया जाता है। चरक में मात्राशितीय अध्याय में 'धार्याण्यास्येन वैशद्यरुचिसौगन्ध्यमिच्छता... कंकोलफलं पत्रं तांबूलस्य शुभं तथा एवं सुश्रुत में अन्नपानविधि अध्याय में इसका उल्लेख है। रासायनिक संगठन-पान के पत्तों में एक सुगन्धि उड़नशील तैल (०.२-१.०%), स्टार्च, शर्करा, टॅनिन एवं डायास्टेस (Diastase, 0.8-1.8%) ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसका तैल इसके पीले रंग का, सुगन्धि, स्वाद में तीक्ष्ण तथा दाहकारक एवं ०.९५८-१.०५७ वि० गु० वाला रहता है। इस तैल में चविकॉल (Chavicol), कंडेनीन Candenene), चविबेटॉल (Chavibetol), यूजेनॉल का सामाजिक (Isomeride of Eugenol) एवं सेस्क्विटर्पेन (Sesquiterpene) ये पदार्थ पाये जाते हैं। जावा एवं मनिला के तैल में फेनॉल (Phenols) की मात्रा बहुत रहती है। पुराने पत्तों की अपेक्षा नवीन पत्तों में तैल, डायास्टेस एवं शर्करा की मात्रा अधिक रहती है। चविकॉल यह कार्बोलिक एसिड की अपेक्षा ५ गुना अधिक प्रतिदूषक (Antiseptic) है जो इसके स्वरस में रहता है। गुण और प्रयोग-पान उत्तम दीपन, पाचन, श्लेष्मघ्न, वातहर, पित्तप्रकोपक, उष्ण, स्वर्य, सुगंधि, शोथघ्न, व्रणरोपक, प्रतिदूषक, कृमिघ्न, वृष्य एवं मुँह की कंडू-मल-क्लेद-दुर्गन्धनाशक है। १. श्रीवाटी मधुरा तीक्ष्णा वातपित्तकफापहा। रसाढ्या सरसा रुच्या विपाके शिशिरा स्मृता ॥ स्यादम्लवाटी कटुकाम्लतिक्ता तीक्ष्णा तथोष्णा मुखपाककर्त्री। विदाहपित्तास्रविकोपनी च विष्टंभदा वातनिबर्हणी च ॥ सतसा मधुरा तीक्ष्णा कटुरुष्णा च पाचनी। गुल्मोदराध्मानहरा रुचिकृद्दीपनी परा ॥ गुहागरे सप्तशिरा प्रसिद्धा तत्पर्णजूतातिरसोऽतिरुच्या। सुगन्धितीक्ष्णा मधुरातिहृद्या सन्दीपनो पुंस्त्वकराऽतिबल्या ॥ नाम्नाऽन्याऽम्लसरा सुतीक्ष्णमधुरा रुच्या हिमा दाहनुत्। पित्तोद्रेकहरा सुदीपनकरी बल्या मुखामोदनी ॥ स्त्रीसौभाग्यविवर्धनी मदकरी राज्ञां सदा वल्लभा। गुल्माऽऽध्मानविबन्धजिच्च कथिता, सा मालवे तु स्थिता ॥ अन्ध्रे पटुलिका नाम कषायोष्णा कटुस्तथा। मलापकर्षा कंठस्य पित्तकृद्वातनाशनी ॥ हेसणीया कटुस्तीक्ष्णा हृद्या दीर्घदला च सा। कफवातहरा रुच्या कटुदीपनपाचनी ॥ (रा० नि०)
४५२ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका प्रयोग पीनस, कास, कफविकार, आध्मान तथा शोथादि में एवं कफविकारों में अनुपान के रूप में बहुत किया जाता है। सुपारी, चूना, कत्था एवं इलायची आदि पान के पत्ते में रख कर उसका बीड़ा बनाकर मुखशुद्धि आदि के लिये लोग खाते हैं। इसको खाते-खाते लोगों को इसका व्यसन हो जाता है। कोकेन खाने वाले पान में कोकेन रखकर खाते हैं। कई औषधों को पान में रखकर खाने की प्रथा है। जिसने पान कभी नहीं खाया है उसे प्रथम इसके सेवन के पश्चात् मुँह में जलन-सी मालूम होती है, गले में एक तरह की जकड़न मालूम होती है, स्वाद ग्रहण करने की शक्ति कम होती है एवं मुँह आदि में छाले पड़ जाते हैं। कुछ देर तक बेचैनी, जी का धँसना, मूर्च्छा, संन्यास, कुछ उत्तेजना एवं स्वेदोत्पत्ति आदि लक्षण किसी-किसी में होते हैं। इसके तैल के सेवन के पश्चात् मुख तथा आमाशय में उष्णता का अनुभव होता है। प्रारंभ में केन्द्रीय वातनाड़ी संस्थान की उत्तेजना के पश्चात् अधिक मात्रा से एक तरह का नशा उत्पन्न होता है। इसमें डायास्टेस (Diastase) की पर्याप्त मात्रा होने के कारण यह स्टार्च आदि पिष्टमय पदार्थों के पाचन में सहायक होता है। इसके अतिरिक्त पान चबाने से लालास्राव की वृद्धि होती है जो पाचन में सहायक होती है। भात खाने वालों में इससे विशेष लाभ होता है और यदि वे पान बंद कर दें तो उनका पाचन ठीक नहीं होता। पान खाने का जिन्हें व्यसन हो जाता है उन्हें पान खाने से अच्छा मालूम होता है। उनका मन प्रसन्न होता है, थकावट दूर होती है, प्यास तथा भूख मालूम नहीं पड़ती एवं कुछ कामोत्तेजना होती है। यह तीव्र मादक नहीं होता तथा इसके व्यसन से कोई विषैले परिणाम नहीं होते। सोकर उठने पर, स्नान के पश्चात्, भोजन के पश्चात् एवं वमन के पश्चात्, पान के सेवन का विधान है।¹ (१) कफप्रधान रोगों में यह बहुत लाभदायक होता है। तमक श्वास, श्वसनिका शोथ एवं स्वरयंत्र शोथ आदि में पान का रस पिलाते हैं एवं पान को ऊपर से बाँधते हैं। बच्चों के कास, श्वासकृच्छ्र, श्वसनिकाशोथ एवं प्रतिश्याय आदि में पान के पत्तों को एरण्डतैल लगाकर, गरम कर छाती पर बाँधने से बहुत लाभ होता है। (२) रोहिणी (डिप्थीरिया Diphtheria) नामक बच्चों में अधिक होने वाले घातक गले के विकार में ४ पत्तों का रस थोड़े गरम पानी में मिलाकर गरारा करने को देते हैं। पान के तेल को १ बूँद की मात्रा में करीब आध पाव उष्ण जल में मिलाकर इसी प्रकार प्रयोग करते हैं तथा उसकी वाष्प सूँघते हैं। (३) गाँठ, शोथ एवं व्रण पर इसके पत्तों को गरम कर बाँधने से शोथ एवं वेदना कम होती है एवं व्रण जल्दी अच्छा होता है। इसी प्रकार स्तनों पर बाँधने से दुग्ध रुक जाता है तथा सूजन कम होती है। पान के रस में थोड़ा चूना मिलाकर शोथ आदि पर पोल्टिस के रूप में व्यवहार करते हैं। (४) कोंकण की तरह पान के फलों को मधु के साथ खाँसी में देते हैं। (५) उड़ीसा में इसके मूल को काली मिर्च के साथ संततिनियमन के लिये सेवन करते हैं। (६) नेत्राभिष्यंद एवं रतौंधी में पत्तों का रस मधु मिलाकर आँख में डाला जाता है। निषेध-नेत्ररोग, रक्तपित्त, क्षत, वातविकार, विषबाधा, शोथ, मदात्यय, मोह एवं मूर्च्छा में इसका सेवन निषिद्ध है।² मात्रा-स्वरस १/२-१ तो०। १. पथ्यं सुप्तोत्थिते स्नाते भुक्ते वांते च संगरे। समायां विदुषां राज्ञां कुर्यात् तांबूलचर्वणम् ॥ २. न नेत्ररोगे न च रक्तपित्ते क्षते न वाते न विषे न शोषे। मदात्यये नापि च मोहमूर्च्छाश्वासेषु ताम्बूलमुशन्ति वैद्याः ॥ (सुषेणदेवः)
गुडूच्यादिवर्गः ४५३ अथ बिल्वः (बेल) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह बिल्वः शाण्डिल्यशैलूषौ मालूरश्रीफलावपि ।१ श्रीफलस्तुवरस्तिक्तो ग्राही रूक्षोऽग्निपित्तकृत् ।। वातश्लेष्महरो बल्यो लघुरुष्णश्च पाचनः ।।१३।। बेल के नाम तथा गुण-बिल्व, शाण्डिल्य, शैलूष, मालूर और श्रीफल ये सब संस्कृत नाम बेल के हैं । बेल- कषाय तथा तिक्त रस युक्त, ग्राही, रूक्ष, अग्निवर्धक, पित्तकारक, वात कफनाशक, बलकारक, लघु, उष्णवीर्य तथा पाचक है । [१३] ३. बेल हिं०-बेल, श्रीफल । बं०, म०-बेल । गु०-बीली । क०-बेलपत्रे । ते०-मारेडु, बिल्वपंडु । ता०- बिल्वम, बिल्वपझम । मा०-बील, बोलो । मल०-कुवलप-पैझम । सिन्ध०-बिल, कटोरी । उडि०-बेलो । अ०- सफरजले हिंदी । फा०-वेह हिंदी, बल, शुल्ल । अं०-Bengal Quince (बेंगॉल् क्विन्स); Bael fruit (बेल फ्रुट) । ले०-Aegle marmelos Corr. (इगल् मार्मेलोस कॉर) । Fam. Rutaceae (रूटेंसी) । यह आसाम, ब्रह्मा, बंगाल, बिहार, युक्तप्रान्त, अवध, झेलम, मध्य और दक्षिण हिन्दुस्तान तथा सिलोन में जंगली और प्रायः सभी स्थानों में बागी दोनों प्रकार से उत्पन्न होता है । इसका वृक्ष-मध्यमाकार का ५० फुट से भी ऊँचा होता है । शाखाओं पर सीधे, मोटे, तीक्ष्ण एक इञ्च तक लम्बे काँटे होते हैं । टहनियों पर पत्ते विषमवर्ती रहते हैं । प्रत्येक सींक पर तीन-तीन पत्रकों से युक्त पत्ते रहते हैं । पत्रक- कसोंदी के पत्तों के आकार वाले एवं अंडाकार-भालाकार होते हैं । बीचवाला पत्ता अन्य दो से कुछ बड़ा होता है । फाल्गुन- चैत्र में पुराने पत्ते गिर जाते हैं और चैत्र-वैशाख में क्रम से नवीन पत्ते निकल आते हैं । इसी समय में हरियाली लिये सफेद रङ्ग के, ४, ५ पंखड़ियों (अन्तर्दल) वाले एवं करीब १ इञ्च चौड़े फूल लगते हैं और उनमें मधु के समान मन्द गन्ध निकलती है । फल-(बीजिमांसल फल-Berry) गोलाकार ३-८ इञ्च व्यास के, हरिताभ रंग के, पकने पर पीताभ भूरे रंग के एवं चिकने होते हैं । बहिर्भित्ति (Epicarp) से बाह्य कठोर काष्ठमय छिलका बनता है जो करीब ३ मि० मि० मोटा, रक्ताभ रंग का एवं अन्दर से रेशेदार होता है । मध्यभित्ति एवं अन्तर्भित्ति से गूदा बनता है जो आवरण से चिपका हुआ तथा हलके रक्ताभ नारंगी रंग का होता है । बीज-बहुत, १०-१५ समूहों में, बिनौले के सदृश सफेद रोमों से युक्त एवं चिकने तथा रंगहीन गोंद से लिपटे रहते हैं । फलों में मन्द सुगंध आती है तथा इनका स्वाद गोंद की तरह होता है । बेल के दो तरह के फल होते हैं । लगाये हुये फल बड़े, सुस्वादु एवं कम बीज वाले होते हैं । जंगली फल छोटे, कुछ मादक एवं इसके बीज अधिक गोंद से लिपटे होते हैं तथा ये मछली मारने के काम में आते हैं । बेल अपने यहाँ बहुत पवित्र माना गया है । सूतिकागार के निर्माण में एवं सूतिका के पलंग की लकड़ी बेल की लेने का चरकादि में विधान है । सुश्रुत में मेधायुष्कामीय अध्याय (चि० अ० २८) में विशिष्ट पद्धति से ऋग्वेदोक्त श्रीसूक्त के द्वारा बिल्व की आहुति आदि का विधान किया है जिससे अलक्ष्मी का नाश एवं आयुवृद्धि होती है । बेल के मूल, त्वचा, पक्व-अपक्व फल, पत्र एवं पुष्प का औषध में व्यवहार किया जाता है । चूर्णादि के लिये कच्चे फल का, मुरब्बे के लिये अधपके फल का और पानक के लिये परिपक्व फल का गूदा लेना चाहिये । दशमूल आदि कषायों में मूल या वृक्ष की त्वचा ली जाती हैं । रासायनिक संगठन-बेल के फलों में गोंद एवं पेक्टिन (Pectin) के अतिरिक्त प्रहासक (Reducing) शर्करा ३.७%, संपूर्णशर्करा ४.६%, तैल जिसमें मार्मेलोसिन Marmelosin, C₁₃ H₁₂ O₃) नामक एक महत्त्व का रवेदार १. गन्धगर्भः शलाटुश्च कण्टकी च सदाफलः । (क्वाचित्कः) CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
४५४ भावप्रकाशनिघण्टुः पदार्थ रहता है तथा उड़नशील तैल रहता है। पक्व फलों में टैनिन सदृश पदार्थ अत्यल्प मात्रा में रहते हैं। इसके मूल, पत्र एवं छाल में प्रहासक शर्करा एवं टैनिन पाया जाता है। इसके बीजों में एक हलके पीले रंग का तैल होता है। गुण और प्रयोग-कच्चा बेल कटु, तिक्त, कषाय, स्निग्ध, उष्ण, दीपन, ग्राही, वात-कफनाशक एवं आन्त्र को बल देने वाला है। पक्व फल-मधुर, सुगन्धित, गुरु, विदाही, विष्टम्भि, दुर्जर, दोषकर, आनुलोमिक एवं दुर्गन्धयुक्त अधोवायु उत्पन्न करने वाला है। बिल्वपत्र-वातहर, शोथहर, ज्वरहर, श्लेष्मनिःसारक, ग्राही एवं आमशूलघ्न होते हैं। बिल्वमूल-वातनाड़ीसंस्थान के लिये शामक, मधुर, छर्दिघ्न एवं वातहर है। पुष्प-अतिसार, तृषा एवं वमन में लाभदायक होते हैं। इसकी मज्जा का तैल उष्ण एवं उत्तम वातहर माना जाता है। इसके बीज- १॥ माशे की मात्रा में अच्छे विरेचक होते हैं। बिल्व का उपयोग अतिसार, प्रवाहिका, संग्रहणी, मधुमेह, कर्णरोग, वातरोग, वमन, कामला, अर्श, शोथ एवं ज्वर में किया जाता है। (१) इसके पके फल का गूदा मृदुविरेचक होने के कारण इसका जल में शर्बत बनाकर लेने से जीर्ण विबन्ध, अर्श, आध्मान एवं कुपचन में लाभ होता है। जिन्हें बार-बार विबन्ध एवं अतिसार क्रमशः हुआ करता है उन्हें नित्य सुबह यह दिया जाता है। स्निग्ध एवं मृदुविरेचक रूप में यह प्रवाहिका की रोग-निर्मुक्तावस्था एवं संग्रहणी की प्रारंभिक अवस्था में दिया जाता है। प्रवाहिका में इसको लेते रहने से विबन्ध नहीं होता जिससे आन्त्रिक व्रण जल्दी अच्छे होते हैं। संग्रहणी [L
गुडूच्यादिवर्गः ४५५ (६) बिल्वफल को गोमूत्र के साथ पीसकर अजाक्षीर के साथ तैल सिद्ध कर कर्णबिन्दु के रूप में प्रयोग करने से बाधिर्य में लाभ होता है। मात्रा- चूर्ण २-८ माशा; प्रवाहीसत्व १/२-२ ड्राम; क्वाथ १/२-२ औंस। अथ गम्भारी । तस्या नामानि गुणाँश्चाह गम्भारी भद्रपर्णी च श्रीपर्णी मधुपर्णिका। काश्मीरी काश्मरी हीरा काश्मर्यः पीतरोहिणी ॥१४॥ कृष्णावृन्ता मधुरसा महाकुसुमिकाऽपि च। काश्मरी तुवरा तिक्ता वीर्योष्णा मधुरा गुरुः ॥१५॥ दीपनी पाचनी मेध्या भेदिनी भ्रमशोषजित्। दोषतृष्णाऽऽमशूलार्शोविषदाहज्वरापहा ॥१६॥ गम्भारी के नाम तथा गुण- गम्भारी, भद्रपर्णी, श्रीपर्णी, मधुपर्णिका, काश्मीरी, काश्मरी, हीरा, काश्मर्य, पीतरोहिणी, कृष्णावृन्ता, मधुरसा और महाकुसुमिका ये सब संस्कृत नाम गम्भारी के हैं। गम्भारी- मधुर, कषाय तथा तिक्त रस युक्त, उष्णवीर्य, गुरु, अग्निदीपक, पाचक, मेधा के लिये हितकर तथा मलभेदक होती है। वह भ्रम, शोष, वातादिक दोष, तृषा, आम, शूल, बवासीर, विष, दाह और ज्वर इन सब रोगों को दूर करने वाली होती है। [१४-१६] अथ गम्भारीफलगुणानाह तत्फलं बृंहणं वृष्यं गुरु केश्यं रसायनम्। वातपित्ततृषारक्तक्षयमूत्रविबन्धनुत् ॥१७॥ स्वादु पाके हिमं स्निग्धं तुवराम्लं विशुद्धिकृत्। हन्याद्दाहतृषावातरक्तपित्तक्षतक्षयान् ॥१८॥ इसके फल के गुण- इसका फल बृंहण (धातुवर्धक), वृष्य (वीर्यवर्धक), गुरु, बालों के लिये हितकर और रसायन होता है। यह वात, पित्त, तृषा, रक्तक्षय, मूत्र सम्बन्धी विबद्धता का नाशक है और पाक में मधुर रस, स्वाद में कषाय तथा अम्ल रसयुक्त, शीतवीर्य, स्निग्ध एवं शुद्धिकारक होता है। यह दाह, तृषा, वात, रक्तपित्त, क्षत और क्षय इन सब रोगों को दूर करता है। [१७-१८] ४. गम्भारी हिं०, पं०- गम्भारी, खम्भारे, कम्भार, गम्भार, गम्हार, कुम्हार, कासमर। बं०- गामार गाछ, गम्बार। म०- शिवण। गु०- शीवण, सेवन। क०- सीवनी। ते०- गुमारटेक। ता०- गुमड़ी। आसाम- गोमरी। गरो०- बोल्को बक। मा०- शेवण, शिवण, कुम्भेरेन। ले०- Gmelina arborea Linn. (मेलीना आर्बोरिआ लिन.)। Fam. Verbenaceae (वर्विनेसी)। गम्भारी- इस देश के कई प्रान्तों में उत्पन्न होती है, विशेषकर दक्षिण, कोंकण, मध्यभारत, बरार, सिलोन, पश्चिमोत्तर-हिमालय, चट्टगाँव, पूर्व बंगाल एवं बिहार आदि प्रान्तों में पाई जाती है। इसका वृक्ष- बड़ा होता है। ऊँचाई में कहीं-कहीं ६० फुट से भी ऊँचा वृक्ष देखने में आता है। छाल का रंग सफेद, ताजी छाल किञ्चित् पीलापन युक्त हरियाली लिये सफेद तथा सफेदी लिये भूरे रंग की होती है। छाल पर काले चिह्न या छोटे-छोटे गोल दाने होते हैं। इसकी टहनियाँ- श्वेताभ एवं रोमश होती हैं। काट- प्रायः आधा इञ्च मोटा, बिना रेशे का और हलका या गहरा नारंगी रंग से मिला रहता है। पत्ते- ४-९ इञ्च लम्बे, ३-७ इञ्च चौड़े, लट्वाकार, चौड़े, प्रायः हृद्वत्, नोकीले, अधरतल पर प्रायः क्षोदलिप्त, २-६ इञ्च लम्बे वृन्त से युक्त और आमने-सामने, परन्तु प्रायः एक सन्धि के दोनों पत्ते कुछ छोटे-बड़े होते हैं। वसन्त ऋतु में पुराने पत्ते गिरकर नये पत्ते निकलते हैं। इसी समय ३-८ इञ्च लम्बी मंजरियों में रक्ताभ या पीले रंग के १-१.५ इञ्च लम्बे फूल आते हैं और उन पर भूरे रंग की छींटें रहती हैं। फल- बहेड़े के समान परन्तु कुछ लम्बाई लिये अष्ठिल, अभ्यण्डाकार, .७५-१ इञ्च व्यास वाले और २-१ कोश तथा बीज वाले होते हैं। वे जेष्ठ आषाढ़ तक पक कर भूमि में गिर पड़ते हैं।
४५६भावप्रकाशनिघण्टुः
इसके दो भेद भी पाये जाते हैं जिनमें से एक में पुष्पव्यूह बड़े होते हैं तथा दूसरे में पत्ते कुछ छोटे, चर्मल, अधर तल पर नसें उभरी हुई तथा पुष्पव्यूह छोटे होते हैं। यह दशमूल गण की औषध है। इसका 'कासमर' नाम काश्मर्य का और 'गम्हार' गम्भारी की अपभ्रंश है। इसके फल, मूल, त्वक एवं पत्र का चिकित्सा में उपयोग होता है। रासायनिक संगठन—इसके मूल में पीतवर्ण का गाढ़ा तैल, राल, क्षाराभ, अत्यल्प बेंजोइक् एसिड एवं मैगॅनीज रहित राख ये पदार्थ पाये जाते हैं। इसके फल में ब्यूटिरिक् (Batyric) तथा टार्टरिक् (Tartaric) अम्ल, क्षाराभ, शर्करा सदृश पदार्थ, राल तथा अत्यल्प टैनिन ये पदार्थ पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग—इसके कोमल पत्र शीतल तथा स्नेहन; फल तृषाहर, दाहशामक, स्नेहन एवं रक्तपित्तघ्न; मूल कटु, दीपन, बल्य एवं आनुलोमिक; पुष्प बल्य, वृष्य एवं रक्तपित्तनाशक; बीजतैल कफ एवं पित्त का शमन करने वाला है। (१) इसके कोमल पत्तों का स्वरस दुग्ध के साथ सोजाक में देते हैं। ग्रीष्मऋतु में होने वाले शिरःशूल में पत्तों को दुग्ध में पीसकर सर पर मलते हैं। (२) दाह तथा तृषायुक्त पैत्तिक ज्वर में इसके फल की मज्जा का शीतल क्वाथ शर्करा मिलाकर पिलाते हैं। रक्तपित्त में मधु के साथ इसके फल की मज्जा का प्रयोग किया जाता है। वायु के कारण गर्भशोष या बालशोष हो तो मुलेठी के साथ इससे सिद्ध दुग्ध का उपयोग लाभदायक होता है। (३) इसके मूल का क्वाथ ज्वर, अपचन तथा शोथ में देते हैं। मुलेठी के साथ बनाया हुआ इसका क्वाथ मधु एवं शर्करा मिलाकर दुग्धवृद्धि के लिये देते हैं। स्तनपुष्टि के लिये इसके रस से सिद्ध तिल तैल में रूई भिगोकर उसके धारण का विधान है। मात्रा—मूलचूर्ण ३-६ माशा; फल १-३ माशा। प्रतिनिधि एवं व्यामिश्रण—(क) अरिया कासमर या बूढ़ीकासमर के नाम की एक अन्य वृक्ष जाति (Premna flavescens Ham.– प्रेम्ना फ्लॅवेसेन्स हॅम्) भी पाई जाती है जिसके पत्ते गंभारी के पत्तों से मिलते-जुलते हैं। इसकी पत्तियों में एक मंद प्रिय गंध होती है और इसके पुष्प तथा फल बहुत छोटे होते हैं जिनसे इसका भेद मालूम हो जाता है। (ख) हिं०—तुम्ब्री, पिंडार, धवलपेड, पानी-गम्हार। म०—सिवनी, पितारी। बं०—पितालि। ले०—Trewia nudiflora Linn. (ट्रेविआ न्युडिफ्लोरा लिन.)। Fam. Euphorbiaceae (यूफोर्बिएसी)। इसके भी गम्हार एवं सिवनी (म०) नाम होने के कारण वास्तविक गम्हार के स्थान पर इसका कहीं-कहीं प्रयोग लोग करते हैं। इसके बड़े-बड़े वृक्ष होते हैं। छाल—चिकनी और धूसर वर्ण की होती है। पत्ते—लट्वाकार, ३-८ इञ्च लम्बे एवं ४-७ इञ्च चौड़े होते हैं। पर्णमूल गोल या हृद्वत् और पर्णवृन्त १.५-४ इञ्च लम्बा होता है। पुष्प—हरित- पीत होते हैं और नवीन पत्तियों के आने के पहले ही निकलते हैं। नरपुष्पों की मंजरियाँ ४-८ इञ्च लम्बी और नीचे की ओर लटकी हुई तथा स्त्री-पुष्प एकाकी अथवा २-३ और अग्र्य होते हैं। फल—पकने पर छोटे आलू के समान दिखाई देता है। नवीन शाखाओं पर जातच्युत उपपत्रों के कारण उभरी हुई स्पष्ट रेखाएँ होती हैं जिनके द्वारा वास्तविक गम्हार से इसकी भिन्नता मालूम होती है। इसके अतिरिक्त गम्हार की तरह इसकी पत्ती में दो छोटी पीली ग्रन्थियाँ नहीं होतीं यद्यपि दोनों के शिराक्रम में बहुत साम्य होता है। इसके मूल का उपयोग किया जाता है। मूल की छाल मोटी एवं चिकनी तथा हलके भूरे रंग की होती है। इसका स्वाद कसैला एवं कड़वा होता है। आमवात एवं वातरक्त में मूल को खिलाते हैं तथा लेप करते हैं। इससे उदरवात, पित्त एवं आमदोष का निर्हरण होता है।
गुडूच्यादिवर्गः ४५७ अथ पाटला (पाढला) घण्टापाटलिंश्च । तयोर्नामानि गुणाँश्चाह पाटलि पाटलाऽमोघा मधुदूतो फलेरुहा । कृष्णवृन्ता कुबेराक्षी१ कालस्थाल्यलिवल्लभा ॥१९॥ ताम्रपुष्पी च कथिताऽपरा स्यात्पाटला सिता । मुष्कको मोक्षको घण्टापाटलिः काष्ठपाटला ॥२०॥ पाढल तथा घण्टापाढल के नाम और गुण-पाटलि, पाटला, अमोघा, मधुदूती, फलेरुहा, कृष्णवृन्ता, कुबेराक्षी, कालस्थाली, अलिवल्लभा और ताम्रपुष्पी ये सब संस्कृत नाम 'पाढल' के हैं। और जो दूसरा 'घण्टापाढल' है उसके संस्कृत नाम-पाटला सिता, मुष्कक, मोक्षक, घण्टापाटलि तथा काष्ठपाटला ये सब हैं। [१९-२०] पाटला तुवरा तिक्ताऽनुष्णा दोषत्रयापहा । अरुचिश्वासशोथास्रच्छर्दिहिक्कातृषाहरी ॥२१॥ पाढल-कषाय तथा तिक्तरस युक्त एवं अनुष्णवीर्य है। यह त्रिदोष, अरुचि, श्वास, शोथ, रक्तप्रकोप, वमन, हिचकी और तृषा को दूर करने वाली है। [२१] अथ तत्पुष्पफलयोर्गुणानाह पुष्पं कषायं मधुरं हिमं हृद्यं कफास्रनुत् । पित्तातिसारहृत्कण्ठ्यं फलं हिक्काऽस्रपित्तहृत् ॥२२॥ इसके फूल तथा फल के गुण-फूल-कषाय तथा मधुर रस युक्त, शीतवीर्य, हृदय को हितकर तथा कफ, रक्तविकार और पित्तातिसार का नाशक एवं कण्ठ के लिये हितकर है। फल-हिचकी तथा रक्तपित्त का नाशक हैं। [२२] नोट-भावप्रकाशकार पाटला के दो भेद लिखते हैं एक 'पाटला' तथा दूसरी 'सिता पाटला'। किन्तु दोनों के गुणों में कोई भेद नहीं लिखा है। आधुनिक ग्रन्थकारों ने भी इसके दो प्रकार के वृक्षों का वर्णन किया है जिसमें से नं० ५ (पाटला) के पुष्प बाहर से लाल किन्तु अन्दर से पीली रेखाओं से युक्त होते हैं। यह दक्षिण में कम होने के कारण इसके स्थान पर वहाँ नं० ६ (सिता पाटला) का प्रयोग किया जाता है जिसके पुष्प पीले तथा गुलाबी रंग के होते हैं। श्री ठा० बलवन्तसिंह जी का मत है-काष्ठपाटला, मोक्षक यह भिन्न वर्ग तथा प्रजाति का वृक्ष है जिसका लैटिन नाम Schrebera swietenioides Roxb. (श्रेबेरा स्वीटेनिओइडिस् राक्स०); Fam. Oleaceae (ओलिएसी) है तथा इसी के क्षार को क्षार श्रेष्ठ कहा गया है। भावप्रकाशकार ने भी इसका (मोक्षक) स्वतंत्र वर्णन आगे वटादिवर्ग में किया है। इस दृष्टि से मोक्षक यह पाटला का पर्याय असमीचीन लगता है। ५. पाढल हिं०-पाढ़ल, पाडर, पारल। बं०-पारुल गाछ। म०, गु०-पाड़ल। क०-हुडै। उ०-बोरो, पाटुली। पं०-पाढ़ल, पाडल। कोल०-कंडियोर। सन्ता०-पपरी, पडेर। ने०-परैर। लि०-सिगियन। गोंड०-उन्तकार, पड़र। मील०-पन, डन। म०-पाडल, पडियालु। ले०-Stereospermum suaveolens DC. (स्टेरियोस्पर्मम् स्वावियोलेन्स डीसी)। Fam. Bignoniaceae (बिग्नोनिएसी)। यह प्रायः समस्त भारत, हिमालय की तराई से ट्रावनकोर और टेन स्रीम तक तथा सिलोन में किन्तु श्वेत भेद की अपेक्षा कुछ शुष्क भागों में पाया जाता है। इसका वृक्ष-३० से ६० फुट तक ऊँचा एवं सुन्दर होता है। इसके ऊँचे स्तम्भ पर शाखाएँ दिखाई पड़ती हैं। इसके नवीन भाग चिपचिपे, रोमश और ग्रन्तिमय होते हैं। छाल-चौथाई इञ्च मोटी, लगभग चिकनी, धूसर और काटने पर हलके पीले रंग की होती है और उसमें कड़े तथा मुलायम पर्त बारी-बारी से निकलते हैं। पत्ते-विपरीत, १-२ फीट लम्बे और अयुग्म पक्षाकार होते हैं। पत्रक-संख्या में ५-९ प्रायः ७, १. काचस्थाली इति पाठ०।
४५८ भावप्रकाशनिघण्टुः अंडाकार या आयताकार, ३-८ इञ्च लम्बे, २-३॥ इञ्च चौड़े, यकायक लम्बाग्र, अवृन्त या छोटे वृन्त वाले, प्रायः मृदुरोमश परन्तु छोटे पौधे के पत्रक खुरखुरे और तीक्ष्ण दन्तुर होते हैं। वसन्त ऋतु में इसके पुराने पत्ते गिरकर नवीन पत्ते निकल आते हैं और प्रायः इसी समय वृक्षों पर नलिकाकार फूल आते हैं। पुष्प-सुगन्धित, १-१.५ इञ्च लम्बे, बाहर से लाल परन्तु भीतर पीली रेखाओं से युक्त होते हैं। फलियाँ-१८ से २४ इञ्च तक लम्बी, गोल एवं पृष्ठ पर बिन्दुकित होती हैं। बीज-सपक्ष होते हैं और कार्क सदृश और लम्बगोल रचनाओं में छिपे रहते हैं। यह भी दशमूलगण का एक प्रसिद्ध द्रव्य है। इसके फल के भीतर से लम्बगोल टुकड़े निकाल कर जुलपित्ती तथा अधकपारी में बाँधे जाते हैं इसलिए कहीं-कहीं इस वृक्ष को अधकपारी कहते हैं। इसका छाल, पुष्प तथा फलमज्जा का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके सूखे हुए फूलों में शर्करा, एक तरह का लुआब तथा मांसल पदार्थ पाये जाते हैं। पुष्प जल में डालने से जल सुगन्धित हो जाता है। गुण और प्रयोग-इसके पुष्प वाजीकर, पौष्टिक एवं शीतल होते हैं। इसकी छाल कफघ्न, वातहर, अधोभाग दोषहर, त्रिदोषघ्न, विषघ्न एवं शोथहर हैं। कफ तथा वातप्रधान रोगों में पाटला का प्रयोग करते हैं। (१) फूलों का रस मधु के साथ हिचकी में देते हैं। (२) मधुमेह, अश्मरी एवं मूत्राघात में इसके पंचांग का क्षार तैल के साथ खिलाते हैं। (३) इसके छाल का फांट अम्लपित्त में देते हैं। (४) इसके फूलों का गुलकन्द पौष्टिक माना जाता है। (५) इसके मूल के घन क्वाथ में तैल मिलाकर अग्निदग्ध व्रण पर लगाते हैं तथा कोमल पत्तों से व्रणबन्धन करते हैं। मात्रा-चूर्ण १-३ माशा। ६. सफेद पाढ़ल (घंटा पाढ़र) हिं०-सफेद पाढ़ल, पाडर, परारी, घण्टा पाढ़र, कठपाडर। बं०-घंटा पारुल। म०, गु०-पाडल। ता०- पादिरि। ते०-कलिगोट्टु। कोल०-कंडियोर। ने०-पररी। भील०-पडुरनी। उ०-कोगारी पाटुली। अं०- Trumpet flower (ट्रम्पेट फ्लावर)। ले०-Stereospermum chelonoides DC. (स्टेरिओस्पर्मम् केलोनॉइडिस् डीसी०)। यह आसाम से सिलोन तक की गीली भूमि में, कुमाऊँ के पहाड़ पर, मध्य और दक्षिण हिन्दुस्तान तथा राजपूताना आदि कई प्रान्तों में होता है। यह दक्षिण में पहाड़ी प्रान्तों में विशेषकर पाया जाता है। इसका वृक्ष-३०-४० फुट तक ऊँचा होता है तथा कहीं-कहीं ६० फुट ऊँचा वृक्ष भी देखने में आता है। स्तम्भ-सीधा, बहुत ऊँचा एवं मोटा होता है और उस पर अनेक शाखाप्रशाखाएँ होती हैं। नीचे की शाखाएँ भूमि के समानान्तर एवं ऊपर की सीधी होती हैं। छाल-भूरे रंग की, मोटी तथा खुरदरी होती है। पत्ते-१२-१८ इञ्च लम्बे, अयुग्म पक्षाकार, विपरीत और छोटी-छोटी टहनियों के अग्र पर समूहबद्ध होकर रहते हैं। पत्रक-संख्या में ७-११, चिकने, अंडाकार और ३.५-५ इञ्च बड़े होते हैं। फूल-बड़े, तूर्याकृति, पीले और गुलाबी रंग के, सुगन्धित एवं रुचिकर होते हैं। फलियाँ-१०-२० इञ्च लम्बी, पतली, घेरे में गोल न होकर सपक्ष या चार उभरी हुई रेखाओं से युक्त होती हैं।
गुडूच्यादिवर्गः ४५९ प्रथम पाढल दक्षिण में कम मिलने के कारण वहाँ इस वृक्ष की छाल तथा पुष्प का पाटला के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसमें एक रवेदार कड़वा पदार्थ पाया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शीतल, वातहर एवं ज्वरघ्न है। मस्तिष्क तथा वातनाड़ी संस्थान पर इसकी अवसादक क्रिया होती है। इसके मूल का फांट ज्वर में रोगी को शांतता लाने के लिये देते हैं। इसके फूलों का रस पाचन ठीक होकर दूषित पित्त का निर्हरण हो इसलिये देते हैं। मात्रा-चूर्ण १-३ माशा। अथाग्निमन्थः । (अगेथू, अरनी इति च लोके) तस्य नामानि गुणाँश्चाह अग्निमन्थो जयःसस्याच्छ्रीपर्णी गणिकारिका । जया जयन्ती तर्कारी नादेयी वैजयन्तिका ।।२३।। अग्निमन्थः श्वयथुनुद्दीर्घोष्णः कफवातहृत् । पाण्डुनुक्तटुकस्तिक्तस्तुवरो मधुरोऽग्निदः ।।२४।। अगेथू या अरनी के नाम तथा गुण-अग्निमन्थ, जय, श्रीपर्णी, गणिकारिका, जया, जयन्ती, तर्कारी, नादेयी और वैजयन्तिका ये सब संस्कृत नाम 'अगेथू' या 'अरनी' के हैं। अरनी या अगेथू शोथनाशक, उष्णवीर्य, कफवात तथा पाण्डु रोग को दूर करने वाला, कटु, तिक्त, कषाय तथा मधुर रस युक्त एवं अग्निवर्धक है। [२३-२४] नोट-भावप्रकाशकार ने यद्यपि एक ही अग्निमंथ का वर्णन किया है तथापि अन्य निघंटुओं में लघु एवं बृहद् ऐसे दो भेद अग्निमंथ के लिखे हैं। दोनों के गुणों में विशेष अन्तर नहीं हैं किन्तु लघु अग्निमंथ को लेप, उपनाह एवं शोफ में विशेष उपयोगी लिखा है। 'लघ्वाग्निमंथस्य गुणाः प्रोक्ताः वृद्धाग्निमंथवत् । विशेषाल्लेपने चोपनाहे शोफे च कीर्तितः ।।' (नि० र०)। सुश्रुत के वरुणादि गण में तर्कारी और अग्निमंथ ये दोनों शब्द आये हैं। इससे ऐसा मालूम होता है कि ये दोनों भिन्न द्रव्य हैं। आधुनिक ग्रन्थकारों ने प्रेम्ना इण्टैग्रिफोलिआ (बृहद् अग्निमंथ) एवं क्लेरोडेण्ड्रम फ्नोमाइडीस् (क्षुद्र अग्निमंथ) ऐसे दो द्रव्यों का वर्णन किया है। ये दोनों ही एक वर्ग के हैं तथा इनके गुणों में भी साम्य होने के कारण दोनों को एक दूसरे के स्थान में प्रयोग किया जा सकता है। इनमें से प्रथम को कुछ लोगों ने तर्कारी माना है तथा द्वितीय को अग्निमंथ माना है। कुछ लोग इसके विपरीत मानते हैं जो अधिक उचित है क्योंकि क्लो० फ्लोमाइडिस्का स्थानिक नाम 'टेकार', तर्कारी का अपभ्रंश मालूम होता है। यहाँ दोनों का अलग-अलग वर्णन दिया जा रहा है। ७. क्षुद्राग्निमंथ हिं०-अरनी(णी), टेकार, उरिन। बं०-अरनी, गणियारी। संथा-पनजोत। मुंगे०-रैन। गु०-अरणी। म०-ऐरण, टांकली। ता०-थलंजी। ते०-तलूंकि। क०-तग्गि। मल०-तिरूतालि। ले०-Clerodendrum phlomidis Linn. f. (क्लेरोडेण्ड्रम् फलोमाइडीस् लिन. । Fam. Verbenaceae (वर्बिनेसी)। यह महाराष्ट्र, गुजरात, सिंध आदि सब प्रान्तों में प्रायः बाडों पर या सूखी जगहों में पाई जाती है। इसके गुल्म-बड़े (छोटे वृक्ष), प्रायः शाखाएँ-प्रसरणशील और टहनियाँ हलके खाकी रंग की तथा मृदुरोमश होती हैं। पत्ते-विपरीत, चौड़े लट्वाकार अथवा कुछ-कुछ तिर्यगायताकार, अखण्ड या दूर-दूर गोलदन्तुर, प्रायः २ x १.५ इञ्च बड़े, सवृन्त और मृदुरोमश (नवीन) या चिकने होते हैं। पुष्प-श्वेत, सुगंधि, पत्रकोणीय या अग्र्य गुच्छों में आते हैं। आभ्यंतर नाल .७५-.१ इञ्च बड़ा और मुख व्यास में .७५ इञ्च होता है। फल-अष्ठिल फल, करौंदे इतने बड़े, शीर्ष पर दबे हुए परन्तु अन्त में शुष्क होकर चार खण्डों में फट जाते हैं। जानवरों के प्रवाहिका तथा कृमिरोग में क्षुद्राग्निमंथ का उपयोग ग्रामीण करते हैं। बृहद् अग्निमंथ के अभाव में इसके पंचांग, मूल तथा पत्र का उपयोग किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA