भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३८६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
नारदजीको विष्णु-मायाका दर्शन
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! यह विष्णुभगवान्की माया किस प्रकारकी है? जो इस चराचर जगत्को व्यामोहित करती है।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! किसी समय नारदमुनि श्वेतद्वीपमें नारायणका दर्शन करनेके लिये गये। वहाँ श्रीनारायणका दर्शन कर और उन्हें प्रसन्न-मुद्रामें देखकर उनसे जिज्ञासा की। भगवन्! आपकी माया कैसी है? कहाँ रहती है? कृपाकर उसका रूप मुझे दिखायें।
भगवान्ने हँसकर कहा—नारद! मायाको देखकर क्या करोगे? इसके अतिरिक्त जो कुछ चाहते हो वह माँगो।
नारदजीने कहा—भगवन्! आप अपनी मायाको ही दिखायें, अन्य किसी वरकी अभिलाषा नहीं है। नारदजीने बार-बार आग्रह किया।
नारायणने कहा—अच्छा, आप हमारी माया देखें। यह कहकर नारदकी अँगुली पकड़कर श्वेतद्वीपसे चले। मार्गमें आकर भगवान्ने एक वृद्ध ब्राह्मणका रूप धारण कर लिया। शिखा, यज्ञोपवीत, कमण्डलु, मृगचर्मको धारण कर कुशाकी पवित्री हाथोंमें पहनकर वेद-पाठ करने लगे और अपना नाम उन्हींने यज्ञशर्मा रख लिया। इस प्रकारका रूप धारणकर नारदके साथ जम्बूद्वीपमें आये। वे दोनों वैत्रवती नदीके तटपर स्थित विदिशा नामक नगरीमें गये। उस विदिशा नगरीमें धन-धान्यसे समृद्ध उद्यमी, गाय, भैंस, बकरी आदि पशु-पालनमें तत्पर, कृषिकार्यको भलीभाँति करनेवाला सीरभद्र नामका एक वैश्य निवास करता था। वे दोनों सर्वप्रथम उसीके घर गये। उसने इन विशुद्ध ब्राह्मणोंका आसन, अर्घ्य आदिसे आदर-सत्कार किया। फिर पूछा—'यदि आप उचित समझें तो अपनी रुचिके अनुसार मेरे यहाँ अन्नका भोजन करें।' यह सुनकर
वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी भगवान्ने हँसकर कहा—'तुमको अनेक पुत्र-पौत्र हों और सभी व्यापार एवं खेतीमें तत्पर रहें। तुम्हारी खेती और पशु-धनकी नित्य वृद्धि हो'—यह मेरा आशीर्वाद है। इतना कहकर वे दोनों वहाँसे आगे गये। मार्गमें गङ्गाके तटपर वेणिका नामके गाँवमें गोस्वामी नामका एक दरिद्र ब्राह्मण रहता था, वे दोनों उसके पास पहुँचे। वह अपनी खेतीकी चिन्तामें लगा था। भगवान्ने उससे कहा—'हम बहुत दूरसे आये हैं, अब हम तुम्हारे अतिथि हैं, हम भूखे हैं, हमें भोजन कराओ।' उन दोनोंको साथमें लेकर वह ब्राह्मण अपने घरपर आया। उसने दोनोंको स्नान-भोजन आदि कराया, अनन्तर सुखपूर्वक उत्तम शय्यापर शयन आदिकी व्यवस्था की। प्रातः उठकर भगवान्ने ब्राह्मणसे कहा—'हम तुम्हारे घरमें सुखपूर्वक रहे, अब जा रहे हैं। परमेश्वर करे कि तुम्हारी खेती निष्फल हो, तुम्हारी संततिकी वृद्धि न हो'—इतना कहकर वे वहाँसे चले गये।
मार्गमें नारदजीने पूछा—भगवन्! वैश्यने आपकी कुछ भी सेवा नहीं की, किंतु उसको आपने उत्तम वर दिया। इस ब्राह्मणने श्रद्धासे आपकी बहुत सेवा की, किंतु उसको आपने आशीर्वादके रूपमें शाप ही दिया—ऐसा आपने क्यों किया?
भगवान्ने कहा—नारद! वर्षभर मछली पकड़नेसे जितना पाप होता है, उतना ही एक दिन हल जोतनेसे होता है। वह सीरभद्र वैश्य अपने पुत्र-पौत्रोंके साथ इसी कृषि-कार्यमें लगा हुआ है, वह नरकमें जायगा, अतः हमने न तो उसके घरमें विश्राम किया और न भोजन ही किया। इस ब्राह्मणके घरमें भोजन और विश्राम किया। इस ब्राह्मणको ऐसा आशीर्वाद दिया है कि जिससे यह जगज्जालमें न फँसकर मुक्तिको प्राप्त करे।
584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section_14_1_Back
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
३८७
इस प्रकार मार्गमें बातचीत करते हुए वे दोनों कायकुब्ज देशके समीप पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक अतिशय रम्य सरोवर देखा। उस सरोवरकी शोभा देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए।
भगवान्ने कहा— नारद! यह उत्तम तीर्थस्थान है। इसमें स्नान करना चाहिये, फिर कत्रौज नामके नगरमें चलेगे। इतना कहकर भगवान् उस सरोवरमें स्नानकर शीघ्र ही बाहर आ गये।
तदनन्तर नारदजी भी स्नान करनेके लिये सरोवरमें प्रविष्ट हुए। स्नान सम्पन्न कर जब वे बाहर निकले, तब उन्होंने अपनेको दिव्य कन्याके रूपमें देखा। उस कन्याके विशाल नेत्र थे। चन्द्रमाके समान मुख था, वह सर्वाङ्ग-सुन्दरी कन्या दिव्य शुभलक्षणोंसे सम्पन्न थी। अपनी सुन्दरतासे संसारको व्यामोहित कर रही थी। जिस प्रकार समुद्रसे सम्पूर्ण रूपकी निधान लक्ष्मी निकली थीं, उसी प्रकार सरोवरसे स्नानके बाद नारदजी स्त्रीके रूपमें निकले। भगवान् अन्तर्धान हो गये। वह स्त्री भी अपने झुंडसे भ्रष्ट अकेली हरिणीकी तरह भयभीत होकर इधर-उधर देखने लगी। इसी समय अपनी सेनाओंके साथ राजा तालध्वज वहाँ आया और उस सुन्दरीको देखकर सोचने लगा कि यह कोई देवस्त्री है या अप्सरा? फिर बोला—‘बाले! तुम कौन हो, कहाँसे आयी हो?’ उस कन्याने कहा—‘मैं माता-पितासे रहित और निराश्रय हूँ। मेरा विवाह भी नहीं हुआ है, अब आपकी ही शरणमें हूँ।’ इतना सुनते ही प्रसन्नचित्त हो राजा उसे घोड़ेपर बैठाकर राजधानी पहुँचा और विधिपूर्वक उससे विवाह कर लिया। तेरहवें वर्षमें वह गर्भवती हुई। समय पूर्ण होनेपर उससे एक तुम्बी (लौकी) उत्पन्न हुई, जिसमें पचास छोटे-छोटे दिव्य शरीरवाले
युद्धमें कुशल बलशाली बालक थे, उसने उनको घृतकुण्डमें छोड़ दिया, कुछ दिन बाद पुत्र और पौत्रोंकी खूब वृद्धि हो गयी। वे महान् अहंकारी, परस्पर-विरोधी और राज्यकी कामना करनेवाले थे। अनन्तर राज्यके लोभसे कौरव और पाण्डवोंकी तरह परस्पर युद्ध करके समुद्रकी लहरोंकी भाँति लड़ते हुए वे सभी नष्ट हो गये। वह स्त्री अपने वंशका इस प्रकार संहार देखकर छाती पीटकर करुणापूर्वक विलाप करती हुई मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़ी। राजा भी शोकसे पीड़ित हो रोने लगा।
इसी समय ब्राह्मणका रूप धारण कर भगवान् विष्णु द्विजोंके साथ वहाँ आये और राजा तथा रानीको उपदेश देने लगे—‘यह विष्णुकी माया है। तुमलोग व्यर्थ ही रो रहे हो। सम्पूर्ण प्राणियोंकी अन्तमें यही स्थिति होती है। विष्णुमाया ही ऐसी है कि उसके द्वारा सैकड़ों चक्रवर्ती और हजारों इन्द्र उसी तरह नष्ट कर दिये गये हैं जैसे दीपकको प्रचण्ड वायु विनष्ट कर देती है। समुद्रको सुखानेके लिये भूमिको पीसकर चूर्ण कर डालनेकी तथा पर्वतको पीठपर उठानेकी सामर्थ्य रखनेवाले पुरुष भी कालके काराल मुखमें चले गये हैं। त्रिकूट पर्वत जिसका दुर्ग था, समुद्र जिसकी खाई थी, ऐसी लंका जिसकी राजधानी थी, राक्षसगण जिसके योद्धा थे, सभी शास्त्रों और वेदोंको जाननेवाले शुक्राचार्य जिसके लिये मन्त्रणा करते थे, कुबेरके धनको भी जिसने जीत लिया था, ऐसा रावण भी दैववश नष्ट हो गया*। युद्धमें, घरमें, पर्वतपर, अग्निमें, गुफामें अथवा समुद्रमें कहीं भी कोई जाय, वह कालके कोपसे नहीं बच सकता। भावी होकर ही रहती है। पातालमें जाय, इन्द्रलोकमें जाय, मेरु पर्वतपर चढ़ जाय, मन्त्र, औषध, शस्त्र आदिसे
- दुर्गस्त्रिकूटः परिखा समुद्रो रक्षांसि योधा धनदाच्च वित्तम्।
शास्त्रं च यस्यांशनासा प्रणीतं स रावणो दैववशाद् विपन्नः ॥ (उत्तरपर्व ४।१३)
584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section 14.2_Front In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३८८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
भी कितनी भी अपनी रक्षा करे, किंतु जो होना होता है, वह होता ही है—इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है। मनुष्योंके भाग्यानुसार जो भी शुभ और अशुभ होना है, वह अवश्य ही होता है। हजारों उपाय करनेपर भी भावी किसी भी प्रकार नहीं टल सकती१। कोई शोक-विह्वल होकर आँसू टपकाता है, कोई रोता है, कोई बड़ी प्रसन्नतासे नाचता है, कोई मनोहर गीत गाता है, कोई धनके लिये अनेक उपाय करता है, इस तरह अनेक प्रकारके जालकी रचना करता रहता है, अतः यह संसार एक नाटक है और सभी प्राणिवर्ग उस नाटकके पात्र हैं।'
इतना उपदेश देकर भगवान्ने रानीका हाथ पकड़कर कहा—'नारदजी! तुमने विष्णुकी माया देख ली। उठो! अब स्नानकर अपने पुत्र-पौत्रोंको अर्घ्य देकर और्ध्वदैहिक कृत्य करो। यह माया विष्णुने स्वयं निर्मित की है।' इतना कहकर उसी
पुण्यतीर्थमें नारदको स्नान कराया। स्नान करते ही स्त्री-रूपको छोड़कर नारदमुनिने अपना रूप धारण कर लिया। राजाने भी अपने मन्त्री और पुरोहितोंके साथ देखा कि जटाधारी, यज्ञोपवीतधारी, दण्ड-कमण्डलु लिये, वीणा धारण किये हुए, खड़ाऊँके ऊपर स्थित एक तेजस्वी मुनि हैं, यह मेरी रानी नहीं है। उसी समय भगवान् नारदका हाथ पकड़कर आकाश-मार्गसे क्षणमात्रमें श्वेतद्वीप आ गये।
भगवान्ने नारदसे कहा —देवर्षि नारदजी! आपने मेरी माया देख ली। नारदके देखते-देखते ऐसा कहकर भगवान् विष्णु अन्तर्हित हो गये। देवर्षि नारदजीने भी हँसकर उन्हें प्रणाम किया और भगवान्की आज्ञा प्राप्त कर तीनों लोकोंमें घूमने लगे। महाराज! इस विष्णुमायाका हमने संक्षेपमें वर्णन किया। इस मायाके प्रभावसे संसारके जीव पुत्र, स्त्री, धन आदिमें आसक्त हो रोते-गाते हुए अनेक प्रकारकी चेष्टाएँ करते हैं। (अध्याय ३)
संसारके दोषोंका वर्णन
महाराज युधिष्ठिरने पूछा —भगवन! यह जीव किस कर्मसे देवता, मनुष्य और पशु आदि योनियोंमें उत्पन्न होता है? बालभावमें कैसे पुष्ट होता है और किस कर्मसे युवा होता है? किस कर्मके फलस्वरूप अतिशय भयंकर दारुण गर्भवासका कष्ट सहन करता है? गर्भमें क्या खाता है? किस कर्मसे रूपवान्, धनवान्, पण्डित, पुत्रवान्, त्यागी और कुलीन होता है? किस कर्मसे रोगरहित जीवन व्यतीत करता है? कैसे सुखपूर्वक मरता है? शुभ और अशुभ फलका भोग कैसे करता
है? हे विमलमते! ये सभी विषय मुझे बहुत ही गहन मालूम होते हैं?
भगवान् श्रीकृष्णने कहा —महाराज! उत्तम कर्मोंसे देवयोनि, मिश्रकर्मोंसे मनुष्ययोनि और पाप-कर्मोंसे पशु आदि योनियोंमें जन्म होता है। धर्म और अधर्मके निश्चयमें श्रुति ही प्रमाण है। पापसे पापयोनि और पुण्यसे पुण्ययोनि प्राप्त होती है२।
ऋतुकालके समय दोषरहित शुक्र वायुसे प्रेरित स्त्रीके रक्तके साथ मिलकर एक हो जाता है। शुक्रके साथ ही कर्मोंके अनुसार प्रेरित जीवयोनियोंमें
१-पातालमाविशतु यातु सुरेन्द्रलोकमारोहतु क्षितिधराधिपतिं सुमेरुम्।
मन्त्रीपधिप्रहरणैश्च करोतु रक्षां यद्वावि तद्भवति नाथ विभावितोऽस्मि ॥ (उत्तरपर्व ४।९५)
२-शुभैर्देवत्वमाप्नोति मिश्रैर्मानुषतां ब्रजेत् । अशुभैः कर्मभिर्जनस्तुत्तियोनियु जायते ॥
प्रमाणं श्रुतिरेवात्र धर्माधर्मविनिश्चये । पापं पापेन भवति पुण्यं पुण्येन कर्मणा ॥ (उत्तरपर्व ४।६-७)
584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section_14_2_Back
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
३८९
प्रविष्ट होता है। एक दिनमें शुक्र और शोणित मिलकर कलल बनता है। पाँच रातमें वह कलल बुद्ध हो जाता है। सात रातमें बुद्ध मांसपेशी बन जाता है। चौदह दिनोंमें वह मांसपेशी मांस और रुधिरसे व्याप्त होकर दूद हो जाता है। पचीस दिनोंमें उसमें अङ्गुर निकलते हैं। एक महीनेमें उन अङ्गुरोंके पाँच-पाँच भाग—ग्रीवा, सिर, कन्धे, पृष्ठवंश तथा उदर हो जाते हैं। चार मासमें वही अङ्गुरोंका भाग अँगुली बन जाता है। पाँच महीनेमें मुख, नासिका और कान बनते हैं। छः महीनेमें दन्तपंक्तियाँ, नख और कानके छिद्र बनते हैं। सातवें महीनेमें गुदा, लिङ्ग अथवा योनि और नाभि बनते हैं, संधियाँ उत्पन्न होती हैं और अङ्गोंमें संकोच भी होता है। आठवें महीनेमें अङ्ग-प्रत्यङ्ग सब पूर्ण हो जाते हैं और सिरमें केश भी आ जाते हैं। माताके भोजनका रस नाभिके द्वारा बालकके शरीरमें पहुँचता रहता है, उसीसे उसका पोषण होता है। तब गर्भमें स्थित जीव सब सुख-दुःख समझता है और यह विचार करता है कि 'मैंने अनेक योनियोंमें जन्म लिया और बारम्बार मृत्युके अधीन हुआ तथा अब जन्म होते ही फिर संसारके बन्धनको प्राप्त करूँगा।' इस प्रकार गर्भमें विचारता और मोक्षका उपाय सोचता हुआ जीव अतिशय दुःखी रहता है। पर्वतके नीचे दब जानेसे जितना क्लेश जीवको होता है, उतना ही जरायुसे वेष्टित अर्थात् गर्भमें होता है। समुद्रमें डूबनेसे जो दुःख होता है, वही दुःख गर्भके जलमें भी होता है, तस लोहेके खम्भसे बाँधनेमें जीवको जो क्लेश होता है वही गर्भमें जठराग्निके तापसे होता है। तपायी हुई सूह्योंसे बेधनेपर जो व्यथा होती है, उससे आठ गुना अधिक गर्भमें जीवको कष्ट होता है। जीवोंके लिये गर्भवाससे अधिक कोई दुःख नहीं है। उससे भी कोटि गुना दुःख जन्म लेते
समय होता है, उस दुःखसे मूर्च्छा भी आ जाती है। प्रबल प्रसववायुकी प्रेरणासे जीव गर्भके बाहर निकलता है। जिस प्रकार कोल्हूमें पीडन करनेसे तिल निस्सार हो जाते हैं, उसी प्रकार शरीर भी योनियन्त्रके पीडनसे निस्तत्त्व हो जाता है। मुखरूप जिसका द्वार है, दोनों ओष्ठ कपाट हैं, सभी इन्द्रियाँ गवाक्ष अर्थात् झरोखे हैं, दाँत, जिह्वा, गला, वात, पित्त, कफ, जरा, शोक, काम, क्रोध, तृष्णा, राग, द्वेष आदि जिसमें उपकरण हैं, ऐसे इस देहरूप अनित्य गृहमें नित्य आत्माका निवास-स्थान है। शुक्र-शोणितके संयोगसे शरीर उत्पन्न होता है और नित्य ही मूत्र, विष्टा आदिसे भरा रहता है। इसलिये यह अत्यन्त अपवित्र है। जिस प्रकार विष्टासे भरा हुआ घट बाहर धोनेसे शुद्ध नहीं होता, इसी प्रकार यह देह भी स्नान आदिके द्वारा पवित्र नहीं हो सकता। पञ्चगव्य आदि पवित्र पदार्थ भी इसके संसर्गसे अपवित्र हो जाते हैं। इससे अधिक और कौन अपवित्र पदार्थ होगा। उत्तम भोजन, पान आदि देहके संसर्गसे मलरूप हो जाते हैं, फिर देहकी अपवित्रताका क्या वर्णन करें। देहको बाहरसे जितना भी शुद्ध करें, भीतर तो कफ, मूत्र, विष्टा आदि भरे ही रहेंगे। सुगन्धित तेल देहमें मलते रहें, परंतु कभी इस देहकी मलिनता कम नहीं होती। यह आश्चर्य है कि मनुष्य अपने देहका दुर्गन्ध सृष्टिकर, नित्य अपना मल-मूत्र देखकर और नासिकाका मल निकालकर भी इस देहसे विरक्त नहीं होता और उसे देहसे घृणा उत्पन्न नहीं होती। यह मोहका ही प्रभाव है कि शरीरके दोष और दुर्गन्ध देख-सृष्टिकर भी इससे ग्लानि नहीं होती। यह शरीर स्वभावतः अपवित्र है। यह केलेके वृक्षकी भाँति केवल त्वक आदिसे आवृत और निस्सार है। जन्म होते ही बाहरकी वायुके स्पर्शसे पूर्वजन्मोंका ज्ञान नष्ट
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३९०
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
हो जाता है और पुनः संसारके व्यवहारमें आसक्त हो अनेक दुष्कर्ममें रत हो जाता है और अपनेको तथा परमेश्वरको भूल जाता है। आँख रहते हुए भी नहीं देख पाता, बुद्धि रहते हुए भी भले-बुरेका निर्णय नहीं कर पाता। राग तथा लोभ आदिके वशीभूत होकर वह संसारमें दुःख प्राप्त करता रहता है। सूखे मार्गमें भी पैर फिसलते हैं, यह सब मोहकी ही महिमा है। दिव्यदर्शी महर्षियोंने इस गर्भका वृत्तान्त विस्तृत रूपसे वर्णन किया है। इसे सुनकर भी मनुष्यको वैराग्य उत्पन्न नहीं होता और अपने कल्याणका मार्ग नहीं सोचता—यह बड़ा ही आश्चर्य है।
बाल्यावस्थामें भी केवल दुःख ही है। बालक अपना अभिप्राय भी नहीं कह सकता और जो चाहता है, वह नहीं कर पाता, वह असमर्थ रहता है। इससे नित्य व्याकुल रहता है। दाँत आनेके समय बालक बहुत क्लेश भोगता है और भाँति-भाँतिके रोग तथा बालग्रह उसे सताते रहते हैं। वह क्षुधा-तृष्णासे पीड़ित होता रहता है, मोहसे विघ्ना आदिका भी भक्षण करने लगता है। कुमारारवस्थामें कर्ण-वेधके समय दुःख होता है। अक्षरारम्भके समय गुरुसे भी बड़ा ही भय होता है। माता-पिता ताडन करते हैं।
युवावस्थामें भी सुख नहीं है। अनेक प्रकारकी ईर्ष्या मनमें उपजती है। मनुष्य मोहमें लीन हो जाता है। राग आदिमें आसक्त होनेके कारण दुःख होता है, रात्रिको नींद नहीं आती और धनकी चिन्तासे दिनमें भी चैन नहीं पड़ता। स्त्री-संसर्गमें भी कोई सुख नहीं। कुष्ठी व्यक्तिके कोढ़में कीड़े पड़ जानेपर जो खुजलाहट होती है,
उसे खुजलानेमें जितना आनन्द होता है, उससे अधिक कामी व्यक्तिको स्त्रीसे सुख नहीं मिलता*। इस तरह विचार करनेपर मालूम होता है कि स्त्रीमें कोई सुख नहीं है।
व्यक्ति मान-अपमानके द्वारा, युवावस्था-वृद्धावस्थाके द्वारा और संयोग-वियोगके द्वारा ग्रस्त है तो फिर निर्विवाद सुख कहाँ? जो यौवनके कारण स्त्री-पुरुषोंके शरीर परस्पर प्रिय लगते हैं, वही वार्धक्यके कारण घृणित प्रतीत होते हैं। वृद्ध हो जाने, शरीरके काँपने और सभी अङ्गोंके जर्जर एवं शिथिल हो जानेपर वह सभीको अप्रिय लगता है। जो युवावस्थाके बाद वार्धक्यमें अपनेमें भारी परिवर्तन और अपनी शक्तिहीनताको देखकर विरक्त नहीं होता—धर्म और भगवान्की ओर प्रवृत्त नहीं होता, उससे बढ़कर मूर्ख कौन हो सकता है?
बुढ़ापेमें जब पुत्र-पौत्र, बान्धव, दुराचारी नौकर आदि अवज्ञा—उपेक्षा करते हैं, तब अत्यन्त दुःख होता है। बुढ़ापेमें वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-सम्बन्धी कार्योंको सम्पन्न करनेमें असमर्थ रहता है। इसमें वात, पित्त आदिकी विषमतासे अर्थात् न्यूनता-अधिकता होनेसे अनेक प्रकारके रोग होते रहते हैं। इसलिये यह शरीर रोगोंका घर है। ये दुःख प्रायः सभीको समय-समयपर अनुभूत होते ही हैं, फिर उसमें विशेष कहनेकी आवश्यकता ही क्या?
वास्तवमें शरीरमें सैकड़ों मृत्युके स्थान हैं, जिनमें एक तो साक्षात् मृत्यु या काल है, दूसरे अन्य आने-जानेवाली भयंकर आधि-व्याधियाँ हैं, जो आधी मृत्युके समान हैं। आने-जानेवाली
- अव्यक्तैन्द्रियवृत्तित्वाद् बाल्ये दुःखं महत्पुनः । इच्छत्रापि न शक्नोति कर्तुं वक्तुं च सत्क्रियाम् ॥ दन्तोत्थाने महद्दुःखं मौलेन व्याधिना तथा । बालरोगैश्च विविधैः पीडा बालग्रहैरपि ॥ क्रिमिभिस्तुष्टमानस्य कुष्ठिनः कामिनस्तथा । कण्ठूयनाग्रितापेन यद्धवेत् स्त्रीषु तद्वि तत् ॥
(उत्तरपर्व ४।६३-६४, ७९)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
३१९
आधि-व्याधियाँ तो जप-तप एवं औषध आदिसे टल भी जाती हैं, परंतु काल-मृत्युका कोई उपाय नहीं है। रोग, सर्प, शस्त्र, विष तथा अन्य घात करनेवाले बाघ, सिंह, दस्यु आदि प्राणिवर्ग ये सब भी मृत्युके द्वार ही हैं। किंतु जब रोग आदिके रूपमें साक्षात् मृत्यु पहुँच जाती है तो देव-वैद्य धन्वन्तरि भी कुछ नहीं कर पाते। औषध, तन्त्र, मन्त्र, तप, दान, रसायन, योग आदि भी कालसे ग्रस्त व्यक्तिकी रक्षा नहीं कर सकते। सभी प्राणियोंके लिये मृत्युके समान न कोई रोग है, न भय, न दुःख है और न कोई शंकाका स्थान अर्थात् केवल एकमात्र मृत्युसे ही सारे भय आदि आशंकाएँ हैं। मृत्यु पुत्र, स्त्री, मित्र, राज्य, ऐश्वर्य, धन आदि सबसे वियुक्त करा देती है और बद्धमूल वैर भी मृत्युसे निवृत्त हो जाते हैं।
पुरुषकी आयु सौ वर्षोंकी कही गयी है, परंतु कोई अस्सी वर्ष जीता है कोई सत्तर वर्ष। अन्य लोग अधिक-से-अधिक साठ वर्षतक ही जीते हैं और बहुत-से तो इससे पहले ही मर जाते हैं। पूर्वकर्मानुसार मनुष्यकी जितनी आयु निश्चित है, उसका आधा समय तो रात्रि ही सोनेमें हर लेती है। बीस वर्ष बाल्य और बुढ़ापेमें व्यर्थ चले जाते हैं। युवा-अवस्थामें अनेक प्रकारकी चिन्ता और कामकी व्यथा रहती है। इसलिये वह समय भी निरर्थक ही चला जाता है। इस प्रकार यह आयु समाप्त हो जाती है और मृत्यु आ पहुँचती है। मरणके समय जो दुःख होता है, उसकी कोई उपमा नहीं। हे मातः ! हे पितः ! हे कान्त ! आदि चिल्लाते व्यक्तिको भी मृत्यु वैसे ही पकड़ ले जाती है, जैसे मेढकको सर्प पकड़ लेता है। व्याधिसे पीड़ित व्यक्ति खाटपर पड़ा इधर-उधर हाथ-पैर पटकता रहता है और साँस लेता रहता है। कभी खाटसे भूमिपर और कभी भूमिसे
खाटपर जाता है, परंतु कहीं चैन नहीं मिलता। कण्ठमें घर्ष-घर्ष शब्द होने लगता है। मुख सूख जाता है। शरीर मूत्र, विष्टा आदिसे लिस हो जाता है। प्यास लगनेपर जब वह पानी माँगता है तो दिया हुआ पानी भी कण्ठतक ही रह जाता है। वाणी बंद हो जाती है, पड़ा-पड़ा चिन्ता करता रहता है कि मेरे धनको कौन भोगेगा? मेरे कुटुम्बकी रक्षा कौन करेगा? इस तरह अनेक प्रकारकी यातना भोगता हुआ मनुष्य मरता है और जीव इस देहसे निकलते ही जाँककी तरह दूसरे शरीरमें प्रविष्ट हो जाता है।
मृत्युसे भी अधिक दुःख विवेकी पुरुषोंको याचना अर्थात् माँगनेमें होता है। मृत्युमें तो क्षणिक दुःख होता है, किंतु याचनासे तो निरन्तर ही दुःख होता है। देखिये, भगवान् विष्णु भी बलिये माँगते ही वामन (अत्यन्त छोटे) हो गये। फिर और दूसरा है ही कौन जिसकी प्रतिष्ठा याचनासे न घटे। आदि, मध्य और अन्तमें दुःखकी ही परम्परा है। अज्ञानवश मनुष्य दुःखोंको झेलता हुआ कभी आनन्द नहीं प्राप्त करता। बहुत खाये तो दुःख, थोड़ा खाये तो दुःख, किसी समय भी सुख नहीं है। शुधा सब रोगोंमें प्रबल है और वह अन्नरूपी औषधिके सेवनसे थोड़ी देरके लिये शान्त हो जाती है, परंतु अन्न भी परम सुखका साधन नहीं है। प्रातः उठते ही मूत्र, विष्टा आदिकी बाधा, मध्याह्नमें क्षुधा-तृष्णाकी पीड़ा और पेट भरनेपर कामकी व्यथा होती है। रात्रिको निद्रा दुःख देती है। धनके सम्पादनमें दुःख, सम्पादित धनकी रक्षा करनेमें दुःख, फिर उसके व्यय करनेमें अतिशय दुःख होता है। इससे धन भी सुखदायक नहीं है। चोर, जल, अग्नि, राजा और स्वजनोंसे भी धनवालोंको अधिक भय रहता है। मांसको आकाशमें फेंकनेपर पक्षी, भूमिपर कुत्ते आदि जीव और जलमें मछली आदि खा
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३१२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
जाते हैं, इसी प्रकार धनवान्की भी सर्वत्र यही स्थिति होती है। सम्पत्तिके अर्जन करनेमें दुःख, सम्पत्तिकी प्राप्तिके बाद मोहरूपी दुःख और नाश हो जानेपर तो अत्यन्त दुःख होता ही है, इसलिये किसी भी कालमें धन सुखका साधन नहीं है। धन आदिकी कामनाएँ ही दुःखका परम कारण हैं, इसके विपरीत कामनाओंसे निःस्पृह रहना परम सुखका मूल है*।
हेमन्त-ऋतुमें शीतका दुःख, ग्रीष्ममें दारुण तापका दुःख और वर्षा-ऋतुमें झंझावात तथा वर्षाका दुःख होता है। इसलिये काल भी सुखदायक नहीं है। विवाहमें दुःख और पतिके विदेश-गमनमें दुःख, स्त्री गर्भवती हो तब दुःख, प्रसवके समय दुःख, संतानके दन्त, नेत्र आदिकी पीड़ासे दुःख। इस प्रकार स्त्री भी सदा व्याकुल रहती है। कुटुम्बियोंको यह चिन्ता रहती है कि गौ नष्ट हो गयी, खेती सूख गयी, नौकर चला गया, घरमें मेहमान आया है, स्त्रीके अभी संतान हुई है, इसके लिये रसोई कौन बनायेगा, कन्याके विवाह
आदिकी चिन्ता—इस प्रकार हजारों चिन्ताएँ कुटुम्बियोंके कारण लगी रहती हैं, जिनसे उनके शील, शुद्ध बुद्धि और सम्पूर्ण गुण नष्ट हो जाते हैं। जिस तरह कच्चे घड़ेमें जल डालते ही घटके साथ जल नष्ट हो जाता है, उसी तरह गुणोंसहित कुटुम्बी मनुष्यका देह नष्ट हो जाता है।
राज्य भी सुखका साधन नहीं है। जहाँ नित्य सन्धि-विग्रहकी चिन्ता लगी रहती है और पुत्रसे भी राज्यके ग्रहणका भय बना रहता है, वहाँ सुखका लेश भी नहीं है। अपनी जातिसे भी सबको भय होता है। जिस प्रकार एक मांसखण्डके अभिलाषी कुत्तोंको परस्पर भय रहता है, वैसे ही संसारमें कोई सुखी नहीं है। ऐसा कोई राजा नहीं जो सबको जीतकर सुखपूर्वक राज्य करे, प्रत्येकको दूसरेसे भय रहता है। इतना कहकर श्रीकृष्णभगवान्ने पुनः कहा कि 'महाराज! यह कर्मभय शरीर जन्मसे लेकर अन्ततक दुःखी ही है। जो पुरुष जितेन्द्रिय हैं और व्रत, दान तथा उपवास आदिमें तत्पर रहते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं।' (अध्याय ४)
विविध प्रकारके पापों एवं पुण्य-कर्मोंका फल
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! अधम कर्म करनेसे जीव घोर नरकमें गिरते हैं और अनेक प्रकारकी यातनाएँ भोगते हैं। उस अधम कर्मको ही पाप और अधर्म कहते हैं। चित्तवृत्तिके भेदसे अधर्मका भेद जानना चाहिये। स्थूल, सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म आदि भेदोंके द्वारा करोड़ों प्रकारके पाप हैं। परंतु यहाँ मैं केवल बड़े-बड़े पापोंका संक्षेपमें वर्णन
करता हूँ—परस्त्रीका चिन्तन, दूसरेका अनिष्ट-चिन्तन और अकार्य (कुकर्म)—में अभिनिवेश—ये तीन प्रकारके मानस पाप हैं। अनियन्त्रित प्रलाप, अप्रिय, असत्य, परनिन्दा और पिशुनता अर्थात् चुगली—ये पाँच वाचिक पाप हैं। अभक्ष्य-भक्षण, हिंसा, मिथ्या कामसेवन (असंयमित जीवन व्यतीत करना) और परधन-हरण—ये चार कायिक पाप हैं।
- अर्थस्योपार्जने दुःखमर्जितस्यापि रक्षणै । आये दुःखं व्यये दुःखमर्थभ्यश्च कुतः सुखम् ॥
चौरभ्यः सलिलादग्नेः स्वजनात् पार्थिवादपि । भयमर्थवतां नित्यं मृत्योः प्राणभूतामिव ॥
खे यातं पक्षिभिर्मांसं भक्ष्यते क्षापदैर्भुवि । जले च भक्ष्यते मत्स्येस्तथा सर्वत्र वितवान् ॥
विमोहयन्ति सम्पत्सु तापयन्ति विपत्तिषु । खेदयन्त्यर्जनाकाले कदा ह्यार्थाः सुखावहाः ॥
यथार्थपतिरुद्दिग्नो यश्च सर्वार्थनिःस्पृहः । यतश्चार्थपतिर्दुःखी सुखी सर्वार्थनिःस्पृहः ॥
(उत्तरपर्व ४।१२१—१२५)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
३९३
इन बारह कर्मोंके करनेसे नरककी प्राप्ति होती है। इन कर्मोंके भी अनेक भेद होते हैं। जो पुरुष संसाररूपी सागरसे उद्धार करनेवाले महादेव अथवा भगवान् विष्णुसे द्वेष रखते हैं, वे घोर नरकमें पड़ते हैं। ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्णकी चोरी और गुरु-पत्नीगमन—ये चार महापातक हैं। इन पातकोंको करनेवालोंके सम्पर्कमें रहनेवाला मनुष्य पाँचवाँ महापातकी गिना जाता है। ये सभी नरकमें जाते हैं।
अब मैं उपपातकोंका वर्णन करता हूँ। ब्राह्मणको कोई पदार्थ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर नहीं देना, ब्राह्मणका धन हरण करना, अत्यन्त अहंकार, अतिक्रोध, दाम्भिकत्व, कृतघ्नता, कृपणता, विषयोंमें अतिशय आसक्ति, अच्छे पुरुषोंसे द्वेष, परस्त्रीहरण, कुमारीगमन, स्त्री, पुत्र आदिको बेचना, स्त्री-धनसे निर्वाह करना, स्त्रीकी रक्षा न करना, ऋण लेकर न चुकाना; देवता, अग्नि, साधु, गौ, ब्राह्मण, राजा और पतिव्रताकी निन्दा करना आदि उपपातक हैं। इन पापोंको करनेवाले पुरुषोंका जो संसर्ग करते हैं, वे भी पातकी होते हैं। इस प्रकार पाप करनेवाले मनुष्योंको मृत्युके बाद यमराज नरकमें ले जाते हैं। जो भूलसे पाप करते हैं, उनको गुरुजनोंकी आज्ञाके अनुसार प्रायश्चित्त करना चाहिये। जो मन, वचन, कर्मसे पाप करते हैं एवं दूसरोंसे कराते हैं अथवा पाप करते हुए पुरुषोंका अनुमोदन करते हैं, वे सभी नरकमें जाते हैं और जो उत्तम कर्म करते हैं, वे स्वर्गमें सुखसे आनन्द भोगते हैं। अशुभ कर्मोंका अशुभ फल और शुभ कर्मोंका शुभ फल होता है।
महाराज! यमराजकी सभामें सबके शुभ-अशुभ कर्मोंका विचार चित्रगुप्त आदि करते हैं। जीवको अपने कर्मानुसार फल भोगना पड़ता है। इसलिये
शुभ कर्म ही करना चाहिये। किये गये कर्मका फल बिना भोगे किसी प्रकार नष्ट नहीं होता। धर्म करनेवाले सुखपूर्वक परलोक जाते हैं और पापी अनेक प्रकारके दुःखका भोग करते हुए यमलोक जाते हैं। इसलिये सदा धर्म ही करना चाहिये। जीव छियासी हजार योजन चलकर वैवस्वतपुरमें पहुँचता है। पुण्यात्माओंको इतना बड़ा मार्ग निकट ही जान पड़ता है और पापियोंके लिये बहुत लम्बा हो जाता है। पापी जिस मार्गसे चलते हैं, उसमें तीखे काँटे, कंकड़, पत्थर, कीचड़, गड्ढे और तलवारकी धारके समान तीक्ष्ण पत्थर पड़े रहते हैं तथा लोहेकी सुइयाँ बिखरी रहती हैं। उस मार्गमें कहीं अग्नि, कहीं सिंह, कहीं व्याघ्र और कहीं-कहीं मक्षिका, सर्प, वृक्षक आदि दुष्ट जन्तु घूमते रहते हैं। कहींपर डाकिनी, शाकिनी, रोग और बड़े क्रूर राक्षस दुःख देते रहते हैं। उस मार्गमें न कहीं छाया है और न जल। इस प्रकारके भयंकर मार्गसे यमदूत पापियोंको लोहेकी शृङ्खलासे बाँधकर घसीटते हुए ले जाते हैं। उस समय अपने बन्धु आदिसे रहित वे प्राणी अपने कर्मोंको सोचते हुए रोते रहते हैं। भूख और प्यासके मारे उनके कण्ठ, तालु और ओष्ठ सूख जाते हैं। भयंकर यमदूत उन्हें बार-बार ताड़ित करते हैं और पैरोंमें अथवा चोटीमें साँकलसे बाँधकर खींचते हुए ले जाते हैं। इस प्रकार दुःख भोगते-भोगते वे यमलोकमें पहुँचते हैं और वहाँ अनेक यातनाएँ भोगते हैं।
पुण्य करनेवाले उत्तम मार्गसे सुखपूर्वक पहुँचकर सौम्यस्वरूप धर्मराजका दर्शन करते हैं और वे उनका बहुत आदर करते हैं, वे कहते हैं कि महात्माओ! आपलोग धन्य हैं, दूसरोंका उपकार करनेवाले हैं। आपने दिव्य सुखकी प्राप्तिके लिये
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३९४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
बहुत पुण्य किया है। इसलिये इस उत्तम विमानपर चढ़कर स्वर्गको जायँ। पुण्यात्मा यमराजको प्रसन्नचित्त अपने पिताकी भाँति देखते हैं, परंतु पापी लोग उन्हें भयानक रूपमें देखते हैं। यमराजके समीप ही कालाग्रिके समान क्रूर कृष्णवर्ण मृत्युदेव विराजमान रहते हैं और कालकी भयंकर शक्तियाँ तथा अनेक प्रकारके रूप धारण किये सम्पूर्ण रोग वहाँ बैठे दिखायी देते हैं। कृष्णवर्णके असंख्य यमदूत अपने हाथोंमें शक्ति, शूल, अङ्गुश, पाश, चक्र, खड्ग, वज्र, दण्ड आदि शस्त्र धारण किये वहाँ स्थित रहते हैं। पापी जीव यमराजको इस रूपमें स्थित देखते हैं और यमराजके समीप बैठे हुए चित्रगुप्त उनकी भत्खी करके कहते हैं कि पापियो! तुमने ऐसे बुरे कर्म क्यों किये? तुमने पराया धन अपहरण किया है, रूपके गर्वसे पर-स्त्रियोंका सम्पर्क किया है और भी अनेक प्रकारके पातक-उपपातक तुमने किये हैं। अब उन कर्मोंका फल भोगो। अब कोई तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकता। इस प्रकार पापी राजाओंका तर्जन कर चित्रगुप्त यमदूतको आज्ञा देते हैं कि इनको ले जाकर नरकोंकी अग्निये डाल दो।
सातवें पातालमें घोर अन्धकारके बीच अति दारुण अट्टाईस करोड़ नरक हैं, जिनमें पापी जीव यातना भोगते हैं। यमदूत वहाँ उनको ऊँचे वृक्षोंकी शाखाओंमें टाँग देते हैं और सैकड़ों मन लोहा उनके पैरोंमें बाँध देते हैं। उस बोझसे उनका शरीर टूटने लगता है और वे अपने अशुभ कर्मोंको यादकर रोते तथा चिल्लाते हैं। तपाये हुए काँटोंसे युक्त लौह-दण्डसे और चानुकोंसे यमदूत उन्हें बार-बार ताड़ित करते हैं और साँपोंसे कटवाते हैं। जब उनके देहोंमें घाव हो जाता है तब उनमें नमक लगता है। कभी उनको उतारकर खोलते हुए तेलमें
डालते हैं, वहाँसे निकालकर विष्टाके कूपमें उनको डुबोते हैं, जिनमें कीड़े काट-काटकर खाते हैं, फिर मेद, रुधिर, पूय आदिके कुण्डोंमें उनको ढकेल देते हैं। जहाँ लोहेकी चौंचवाले काक और श्वान आदि जीव उनका मांस नोच-नोच कर खाते हैं। कभी उनको तीक्ष्ण शूलोंमें पिरोंते हैं।
अभक्ष्य-भक्षण और मिथ्या भाषण करनेवाली जिह्वाको बहुत दण्ड मिलता है। जो पुरुष माता, पिता और गुरुको कठोर वचन बोलते हैं, उनके मुखमें जलते हुए अंगारे भर दिये जाते हैं और घावोंमें नमक भरकर खोलता हुआ तेल डाल दिया जाता है। जो अतिथिको अन्न-जल दिये बिना उसके सम्मुख ही स्वयं भोजन करते हैं, वे इक्षुकी तरह कोल्हूमें पेर जाते हैं तथा वे असितालवन नामक नरकमें जाते हैं। इस प्रकार अनेक क्लेश भोगते रहनेपर भी उनके प्राण नहीं निकलते। जिसने परनारीके साथ संग किया हो, यमदूत उसे तस लोहेकी नारीसे आलिङ्गन कराते हैं और पर-पुरुषगामिनी स्त्रीको तस लौह पुरुषसे लिपटाते हैं और कहते हैं कि 'दुष्टे! जिस प्रकार तुमने अपने पतिको परित्याग कर पर-पुरुषका आलिङ्गन किया, उसी प्रकारसे इस लौह-पुरुषका भी आलिङ्गन करो।' जो पुरुष देवालय, बाग, वापी, कूप, मठ आदिको नष्ट करते हैं और वहाँ रहकर मैथुन आदि अनेक प्रकारके पाप करते हैं, यमदूत उनको अनेक प्रकारके यन्त्रोंसे पीड़ित करते हैं और वे जबतक चन्द्र-सूर्य हैं, तबतक नरककी अग्निये पड़े जलते रहते हैं। जो गुरुकी निन्दा श्रवण करते हैं, उनके कानोंको दण्ड मिलता है। इस प्रकार जिन-जिन इन्द्रियोंसे मनुष्य पाप करते हैं, वे इन्द्रियाँ कष्ट पाती हैं। इस प्रकारकी अनेक घोर यातना पापी पुरुष सभी नरकोंमें भोगते हैं,
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
३१५
इनका सौ वर्षोंमें भी वर्णन नहीं हो सकता। जीव नरकोंमें अनेक प्रकारकी दारुण व्यथा भोगते रहते हैं, परंतु उनके प्राण नहीं निकलते।
इससे भी अधिक दारुण यातनाएँ हैं, मृदुचित्त पुरुष उनको सुनकर ही दहलने लगते हैं। पुत्र, मित्र, स्त्री आदिके लिये प्राणी अनेक प्रकारका पाप करता है, परंतु उस समय कोई सहायता नहीं करता। केवल एकाकी ही वह दुःख भोगता है और प्रलयपर्यन्त नरकमें पड़ा रहता है। यह ध्रुव सिद्धान्त है कि अपना किया पाप स्वयं भोगना पड़ता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य शरीरको नश्वर जानकर लेशमात्र भी पाप न करे, पापसे अवश्य ही नरक भोगना पड़ता है। पापका फल दुःख है और नरकसे बढ़कर अधिक दुःख कहीं नहीं है। पापी मनुष्य नरकवासके अनन्तर फिर पृथ्वीपर जन्म लेते हैं। वृक्ष आदि अनेक प्रकारकी स्थावर योनियोंमें वे जन्म ग्रहण करते हैं और अनेक कष्ट भोगते हैं। अनन्तर कीट, पतंग, पक्षी, पशु आदि अनेक योनियोंमें जन्म लेते हुए अति दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाते हैं। स्वर्ग एवं मोक्ष देनेवाले मनुष्य-जन्मको पाकर ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे नरक न देखना पड़े। यह मनुष्य-योनि देवताओं तथा असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है। धर्मसे ही मनुष्यका जन्म मिलता है। मनुष्य-जन्म पाकर उसे धर्मकी वृद्धि करनी चाहिये। जो अपने कल्याणके लिये धर्मका पालन नहीं करता है, उसके समान मूर्ख कौन होगा?
यह देश सब देशोंमें उत्तम है। बहुत पुण्यसे प्राणीका जन्म भारतवर्षमें होता है। इस देशमें जन्म पाकर जो अपने कल्याणके लिये पुण्य करता है, वही बुद्धिमान् है। जिसने ऐसा नहीं किया, उसने अपने आत्माके साथ वञ्चना की। जबतक यह शरीर स्वस्थ है, तबतक जो कुछ पुण्य बन सके वह कर लेना चाहिये। बादमें कुछ भी नहीं हो सकता। दिन-रातके बहाने नित्य आयुके ही अंश खण्डित हो रहे हैं। फिर भी मनुष्योंको बोध नहीं होता कि एक दिन मृत्यु आ पहुँचेगी*। यह तो किसीको भी निश्चय नहीं है कि किसकी मृत्यु किस समयमें होगी, फिर मनुष्यको क्योंकर धैर्य और सुख मिलता है? यह जानते हुए कि एक दिन इन सभी सामग्रियोंको छोड़कर अकेले चले जायेंगे, फिर अपने हाथसे ही अपनी सम्पत्ति सत्प्रात्रोंको क्यों नहीं बाँट देते? मनुष्यके लिये दान ही पाथेय अर्थात् रास्तेके लिये भोजन है। जो दान करते हैं, वे सुखपूर्वक जाते हैं। दानहीन मार्गमें अनेक दुःख पाते हैं, भूखे मरते जाते हैं। इन सब बातोंको विचारकर पुण्य ही करना चाहिये, पापसे सदा बचना चाहिये। पुण्य-कर्मोंसे देवत्व प्राप्त होता है और पाप करनेसे नरककी प्राप्ति होती है। जो सत्यरुष सर्वात्मभावसे श्रीसदाशिवकी शरणमें जाते हैं, वे पद्मपत्रपर स्थित जलकी तरह पापोंसे लिस नहीं होते। इसलिये दृन्द्रसे छूटकर भक्तिपूर्वक ईश्वरकी आराधना करनी चाहिये तथा सभी प्रकारके पापोंसे निरन्तर बचना चाहिये। (अध्याय ५-६)
- आयुषः खण्डखण्डानि निपतन्ति तवाग्रतः। अहोरात्रापदेशेन किमर्थं नावबुध्यसे ॥ (उत्तरपर्व ६।११९)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३९६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
व्रतोपवासकी महिमामें शकटव्रतकी कथा
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैंने जो भीषण नरकोंका विस्तारसे वर्णन किया है, उन्हें व्रत-उपवासरूपी नौकासे मनुष्य पार कर सकता है। प्राणीको अति दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे पश्चात्ताप न करना पड़े और यह जन्म भी व्यर्थ न जाय एवं फिर जन्म भी न लेना पड़े। जिस मनुष्यकी कीर्ति, दान, व्रत, उपवास आदिकी परम्परा बनी है, वह परलोकमें उन्हीं कर्मोंके द्वारा सुख भोगता है। व्रत तथा स्वाध्याय न करनेवालेकी कहीं भी गति नहीं है। इसके विपरीत व्रत-स्वाध्याय करनेवाले पुरुष सदा सुखी होते हैं। इसलिये व्रत-स्वाध्याय अवश्य करने चाहिये।
राजन्! यहाँ एक प्राचीन इतिहासका वर्णन करता हूँ—योगको सिद्ध किया हुआ एक सिद्ध अति भयंकर विकृत रूप धारणकर पृथ्वीपर विचरण करता था। उसके लम्बे ओंठ, टूटे दाँत, पिङ्गल नेत्र, चपटे कान, फटा मुख, लम्बा पेट, टेढ़े पैर और सम्पूर्ण अङ्ग कुरूप थे। उसे मूलजालिक नामके एक ब्राह्मणने देखा और उससे पूछा कि आप स्वर्गसे कब आये और किस प्रयोजनसे यहाँ आपका आगमन हुआ? क्या आपने देवताओंके चित्तको मोहित करनेवाली और स्वर्गकी अलंकार-स्वरूपिणी रम्भाको देखा है? अब आप स्वर्गमें जायँ तो रम्भासे कहें कि अवन्तिपुरीका निवासी ब्राह्मण तुम्हारा कुशल पूछता था। ब्राह्मणका वचन सुनकर सिद्धने चकित हो पूछा कि 'ब्राह्मण! तुमने मुझे कैसे पहचाना?' तब ब्राह्मणने कहा कि 'महाराज! कुरूप पुरुषोंके एक-दो अङ्ग विकृत होते हैं, पर आपके सभी अङ्ग टेढ़े और विकृत हैं।' इसीसे
मैंने अनुमान किया कि इतना रूप गुप्त किये कोई स्वर्गके निवासी सिद्ध ही हैं। ब्राह्मणका वचन सुनते ही वह सिद्ध वहाँसे अन्तर्धान हो गया और कई दिनोंके बाद पुनः ब्राह्मणके समीप आया और कहने लगा—'ब्राह्मण! हम स्वर्गमें गये और इन्द्रकी सभामें जब नृत्य हो चुका, उसके बाद मैंने एकान्तमें रम्भासे तुम्हारा संदेश कहा, परंतु रम्भाने यह कहा कि मैं उस ब्राह्मणको नहीं जानती। यहाँ तो उसीका नाम जानते हैं जो निर्मल विद्या, पौरुष, दान, तप, यज्ञ अथवा व्रत आदिसे युक्त होता है। उसका नाम स्वर्गभरमें चिरकालतक स्थिर रहता है।' रम्भाका सिद्धके मुखसे यह वचन सुनकर ब्राह्मणने कहा कि हम शकटव्रतको नियमसे करते हैं, आप रम्भासे कह दीजिये। यह सुनते ही सिद्ध फिर अन्तर्धान हो गया और स्वर्गमें जाकर उसने रम्भासे ब्राह्मणका संदेश कहा और जब उसने उसके गुण वर्णन किये तब रम्भा प्रसन्न होकर कहने लगी—'सिद्ध महाकाल! मैं वनके निवासी उस शकट ब्रह्मचारीको जानती हूँ। दर्शनसे, सम्भाषणसे, एकत्र निवाससे और उपकार करनेसे मनुष्योंका परस्पर स्नेह होता है, परंतु मुझे उस ब्राह्मणका दर्शन-सम्भाषण आदि कुछ भी नहीं हुआ। केवल नाम-श्रवणसे इतना स्नेह हो गया है।' सिद्धसे इतना कहकर रम्भा इन्द्रके समीप गयी और ब्राह्मणके व्रत आदि करने तथा अपने ऊपर अनुरक्त होनेका वर्णन किया। इन्द्रने भी प्रसन्न हो रम्भासे पूछकर उस उत्तम ब्राह्मणको वस्त्राभूषण आदिसे अलंकृत कर दिव्य विमानमें बैठाकर स्वर्गमें बुलाया और वहाँ सत्कारपूर्वक स्वर्गके दिव्य भोगोंको उसे प्रदान किया। ब्राह्मण चिरकालतक वहाँ दिव्य
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
३९७
भोग भोगता रहा। यह शकट-व्रतका माहात्म्य हमने संक्षेपमें वर्णन किया है। दूदव्रती पुरुषके लिये राजलक्ष्मी, वैकुण्ठलोक, मनोवाञ्छित फल
आदि दुर्लभ पदार्थ भी जगत्में सुलभ हैं। इसलिये सदा सत्परायण पुरुषको व्रतमें संलग्न रहना चाहिये। (अध्याय ७)
तिलकव्रतके माहात्म्यमें चित्रलेखाका चरित्र
[ संवत्सर-प्रतिपदाका कृत्य ]
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गौरी, गणपति, दुर्गा, सोम, अग्नि तथा सूर्य आदि देवताओंके व्रत शास्त्रोंमें निर्दिष्ट हैं, उन व्रतोंका वर्णन आप प्रतिपदादि क्रमसे करें। जिस देवताकी जो तिथि है तथा जिस तिथिमें जो कर्तव्य है, उसे आप पूरी तरह बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी जो प्रतिपदा होती है, उस दिन स्त्री अथवा पुरुष नदी, तालाब या घरपर स्नान कर देवता और पितरोंका तर्पण करे। फिर घर आकर आटेकी पुरुषाकार संवत्सरकी मूर्ति बनाकर चन्दन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचारोंसे उसकी पूजा करे। ऋतु तथा मासोंका उच्चारण करते हुए पूजन तथा प्रणाम कर संवत्सरकी प्रार्थना करे और—संवत्सरोऽसि परिवत्सरोऽसीदावत्सरोऽसीद्वत्सरोऽसि वत्सरोऽसि। उषसस्ते कल्पन्तामहोरात्रास्ते कल्पन्तामर्धमासास्ते कल्पन्तां मासास्ते कल्पन्तामृतवस्ते कल्पन्ताथ संवत्सरस्ते कल्पताम्। प्रेत्या एत्यै सं चाञ्च प्र च सारय। सुपर्णचिदसि तथा देवतयाऽङ्गिरस्स्वद् ध्रुवः सीद ॥’ (यजु० २७।४५) यह मन्त्र पढ़कर वस्त्रसे प्रतिमाको वेष्टित करे। तदनन्तर फल, पुष्प, मोदक आदि नैवेद्य चढ़ाकर हाथ जोड़कर प्रार्थना करे—‘भगवन्! आपके अनुग्रहसे मेरा वर्ष सुखपूर्वक व्यतीत हो*।’ यह कहकर यथाशक्ति ब्राह्मणको दक्षिणा दे और उसी दिनसे
आरम्भ कर ललाटको नित्य चन्दनसे अलंकृत करे। इस प्रकार स्त्री या पुरुष इस व्रतके प्रभावसे उत्तम फल प्राप्त करते हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, ग्रह, डाकिनी और शत्रु उसके मस्तकमें तिलक देखते ही भाग खड़े होते हैं।
इस सम्बन्धमें मैं एक इतिहास कहता हूँ—पूर्व कालमें शत्रुञ्जय नामके एक राजा थे और चित्रलेखा नामकी अत्यन्त सदाचारिणी उनकी पत्नी थी। उसीने सर्वप्रथम ब्राह्मणोंसे संकल्पपूर्वक इस व्रतको ग्रहण किया था। इसके प्रभावसे बहुत अवस्था बीतनेपर उनको एक पुत्र हुआ। उसके जन्मसे उनको बहुत आनन्द प्राप्त हुआ। वह रानी सदा संवत्सरव्रत किया करती और नित्य ही मस्तकमें तिलक लगाती। जो उसको तिरस्कृत करनेकी इच्छासे उसके पास आता, वह उसके तिलकको देखकर पराभूत-सा हो जाता। कुछ समयके बाद राजाको उन्मत्त हाथीने मार डाला और उनका बालक भी सिरकी पीड़ासे मर गया। तब रानी अति शोकाकुल हुई। धर्मराजके किंकर (यमदूत) उन्हें लेनेके लिये आये। उन्होंने देखा कि तिलक लगाये चित्रलेखा रानी समीपमें बैठी है। उसको देखते ही वे उलटे लौट गये। यमदूतोंके चले जानेपर राजा अपने पुत्रके साथ स्वस्थ हो गया और पूर्वकर्मानुसार शुभ भोगोंका उपभोग करने लगा। महाराज! इस परम उत्तम
- भगवंस्त्वत्स्रादेन वर्ष शुभदमस्तु मे। (उत्तरपर्व ८।१०)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
३९८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
व्रतका पूर्वकालमें भगवान् शंकरने मुझे उपदेश किया था और हमने आपको सुनाया। यह तिलकव्रत समस्त दुःखोंको हरनेवाला है। इस
व्रतको जो भक्तिपूर्वक करता है, वह चिरकालपर्यन्त संसारका सुख भोगकर अन्तमें ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ८)
अशोकव्रत तथा करवीरव्रतका माहात्म्य
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! आश्विन मासकी शुक्ल प्रतिपदाको गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, सप्तधान्यसे तथा फल, नारिकेल, अनार, लड्डू आदि अनेक प्रकारके नैवेद्यसे मनोरम पल्लवोंसे युक्त अशोक-वृक्षका पूजन करनेसे कभी शोक नहीं होता। अशोक-वृक्षकी निम्नलिखित मन्त्रसे प्रार्थना करे और उसे अर्घ्य प्रदान करे—
पितृभ्रातृपतिश्चश्रृंश्रुशुराणां तथैव च।
अशोक शोकशमनो भव सर्वत्र नः कुले॥
(उत्तरपर्व ९।४)
‘अशोक-वृक्ष! आप मेरे कुलमें पिता, भाई, पति, सास तथा ससुर आदि सभीका शोक शमन करें।’
वस्त्रसे अशोक-वृक्षको लपेट कर पताकाओंसे अलंकृत करे। इस व्रतको यदि स्त्री भक्तिपूर्वक करे तो वह दमयन्ती, स्वाहा, वेदवती और सतीकी भाँति अपने पतिकी अति प्रिय हो जाती है। वनगमनके समय सीताने भी मार्गमें अशोक-वृक्षका भक्तिपूर्वक गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तिल, अक्षत आदिसे पूजन किया और प्रदक्षिणा कर वनको गयीं। जो स्त्री तिल, अक्षत, गेहूँ, सर्पप आदिसे अशोकका पूजन कर मन्त्रसे वन्दना और प्रदक्षिणा कर ब्राह्मणको दक्षिणा देती है, वह शोकमुक्त होकर चिरकालतक अपने पतिसहित संसारके सुखोंका उपभोग कर अन्तमें गौरी-लोकमें निवास करती है। यह अशोकव्रत सब प्रकारके
शोक और रोगको हरनेवाला है।
महाराज! इसी प्रकार ज्येष्ठ मासकी शुक्ल प्रतिपदाको सूर्योदयके समय अत्यन्त मनोहर देवताके उद्यानमें लगे हुए करवीर-वृक्षका पूजन करे। लाल सूत्रसे वृक्षको वेष्टित कर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, सप्तधान्य, नारिकेल, नारंगी और भाँति-भाँतिके फलोंसे पूजन कर इस मन्त्रसे उसकी प्रार्थना करे—
करवीर विषावास नमस्ते भानुवल्मभ।
मौलिमण्डनसद्वत् नमस्ते केशवेशयोः॥
(उत्तरपर्व १०।४)
‘भगवान् विष्णु और शंकरके मुकुटपर रत्नके रूपमें सुशोभित, भगवान् सूर्यके अत्यन्त प्रिय तथा विषके आवास करवीर (जहर करनेर) ! आपको बार-बार नमस्कार है।’
इसी तरह ‘आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयत्रभृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्॥’ (यजु० ३३।४३) इस मन्त्रसे प्रार्थना कर ब्राह्मणको दक्षिणा दे एवं वृक्षकी प्रदक्षिणा कर घरको जाय। सूर्यदेवकी प्रसन्नताके लिये इस व्रतको अरुन्धती, सावित्री, सरस्वती, गायत्री, गङ्गा, दमयन्ती, अनसूया और सत्यभामा आदि पतिव्रता स्त्रियोंने तथा अन्य स्त्रियोंने भी किया है। इस करवीरव्रतको जो भक्तिपूर्वक करता है, वह अनेक प्रकारके सुख भोग कर अन्तमें सूर्यलोकको जाता है। (अध्याय ९-१०)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
३९९
कोकिलाव्रतका विधान और माहात्म्य
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! जिस व्रतके करनेसे कुलीन स्त्रियोंका अपने पतिके साथ परस्पर विशुद्ध प्रेम बना रहे, उसे आप बतलाइये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! यमुनाके तटपर मथुरा नामक एक सुन्दर नगरी है। वहाँ श्रीरामचन्द्रजीने अपने भाई शत्रुघ्नको राजाके पदपर प्रतिष्ठित किया था। उनकी रानीका नाम कीर्तिमाला* था। वह बड़ी पतिव्रता थी। एक दिन कीर्तिमालाने अपने कुलगुरु, वसिष्ठमुनिसे प्रणामकर पूछा—‘मुनिश्रेष्ठ! आप मुझे कोई ऐसा व्रत बतायें, जिससे मेरे अखण्ड सौभाग्यकी वृद्धि हो।’
वसिष्ठजीने कहा—कीर्तिमाले! कल्याणकामिनी स्त्री आषाढ़ मासकी पूर्णिमाको सायंकाल यह संकल्प करे कि ‘श्रावण मासभर नित्य-स्नान, रात्रि-भोजन और भूमि-शयन करूँगी तथा ब्रह्मचर्यसे रहूँगी और प्राणियोंपर दया करूँगी।’ प्रातः उठकर सब सामग्री लेकर नदी, तालाब आदिपर जाय। वहाँ दन्तधवन कर सुगन्धित द्रव्य, तिल और आँवलेका उबटन लगाये और विधिसे स्नान करे। इस प्रकार आठ दिनतक स्नान करे। अनन्तर सर्वौषधियोंका उबटन लगाकर आठ दिनतक स्नान करे। शेष दिनोंमें वचका उबटन मलकर स्नान करे। तदनन्तर सूर्यभगवान्का ध्यान करे। इसके बाद तिल पीस करके उससे कोकिला पक्षीकी मूर्ति बनाये। रक्त चन्दन, चम्पाके पुष्प, पत्र, धूप,
दीप, नैवेद्य, तिल, चावल, दूर्वा आदिसे उसका पूजन कर इस मन्त्रसे प्रार्थना करे—
तिलसहे तिलसौख्ये तिलवर्णं तिलप्रिये।
सौभाग्यद्रव्यपुत्रांश्च देहि मे कोकिले नमः ॥
(उत्तरपर्व ११।१४)
‘तिलसहे कोकिला देवि! आप तिलके समान कृष्णवर्णवाली हैं। आपको तिलसे सुख प्राप्त होता है तथा आपको तिल अत्यन्त प्रिय है। आप मुझे सौभाग्य, सम्पत्ति तथा पुत्र प्रदान करें। आपको नमस्कार है।’
—इस प्रकार पूजन कर घरमें आकर भोजन ग्रहण करे। इस विधिसे एक मास व्रतकर अन्तमें तिलपिष्टकी कोकिला बनाकर उसमें रत्नके नेत्र और सुवर्णके पंख लगाकर ताम्रपात्रमें स्थापित करे। दक्षिणासहित वस्त्र, धान्य और गुड़ ससुर, दैवज्ञ, पुरोहित अथवा किसी ब्राह्मणको दान करे।
इस विधिसे जो नारी कोकिलाव्रत करती है, वह सात जन्मतक सौभाग्यवती रहती है और अन्तमें उत्तम विमानमें बैठकर गौरीलोकको जाती है। वसिष्ठजीसे व्रतका विधान सुनकर कीर्तिमालाने उसी प्रकार कोकिलाव्रतका अनुष्ठान किया। उससे उन्हें अखण्ड सौभाग्य, पुत्र, सुख-समृद्धि और शत्रुघ्नजीकी कृपा एवं प्रीति प्राप्त हुई। अन्य भी जो स्त्रियाँ इस व्रतको भक्तिपूर्वक करती हैं उन्हें भी सुख, सौभाग्य आदिकी प्राप्ति होती है। (अध्याय ११)
बृहत्तपोव्रतका विधान और फल
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं सभी पापोंका नाशक तथा सुर, असुर और मुनियोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ बृहत्तपोव्रतका विधान
बतलाता हूँ, आप सुनें—आश्विन मासकी पूर्णिमाके दिन आत्मशुद्धिपूर्वक उपवासकर रातमें घृतमिश्रित पायसका भोजन करना चाहिये। दूसरे दिन प्रातः
- सभी रामायणोंमें शत्रुघ्न-पत्नीका नाम श्रुतिकीर्ति प्राप्त होता है। इसे उसका पर्याय मानना चाहिये। भाव प्रायः समान है।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
४००
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
उठकर पवित्र हो आचमनकर बिल्बके काष्ठसे दन्तधावन करे। अनन्तर इस मन्त्रसे महादेवजीकी प्रार्थना करनी चाहिये—
अहं देवव्रतमिदं कर्तुमिच्छामि शाश्वतम्। तवाज्ञया महादेव यथा निर्वहते कुरु ॥
(उत्तरपर्व १२।४)
‘महादेव! मैं आपकी आज्ञासे निरन्तर बृहत्तपोव्रत करना चाहता हूँ। जिस प्रकार मेरा यह व्रत निर्विघ्न पूर्ण हो जाय, आप वैसी कृपा करें।’
नियमपूर्वक सोलह वर्षपर्यन्त प्रतिपदका व्रत करना चाहिये। फिर मार्गशीर्ष मासकी प्रतिपदाको उपवास कर गुरुजनोंसे आदेश प्राप्त करके महादेवका स्मरण करते हुए भक्तिपूर्वक शिवका पूजन करना चाहिये और रातमें दीपक जलाकर शिवको निवेदित करना चाहिये। शिवभक्त सप्लीक सोलह ब्राह्मणोंको निमन्त्रित कर वस्त्र, आभूषण आदिसे पूजन कर भोजन कराये या आठ दम्पतिको भोजन कराये। यदि शक्ति न हो तो एक ही दम्पतिका पूजन करे। निराहार व्रत करके रातमें भूमिपर शयन करना चाहिये। सूर्योदय होनेपर स्नान करके सभी सामग्रियोंको लेकर शिवजीका उद्घर्तन एवं पञ्चगव्यसे स्नान कराना चाहिये। अनन्तर पञ्चामृत, तिलमिश्रित जल और गर्म जलसे स्नान कराना चाहिये। स्नानके अनन्तर कर्पूर, चन्दन आदिका लेपकर कमल आदि उत्तम पुष्प चढ़ाने चाहिये। वस्त्र, पताका, वितान, धूप, दीप, घण्टा एवं भाँति-भाँतिके नैवेद्य महादेवजीको समर्पित कर अग्नि प्रज्वलित कर एवं उसकी पूजाकर विधिपूर्वक हवन करना चाहिये। घर आकर पञ्चगव्य-प्राशन कर आचार्य आदिको भोजन कराकर अपने सभी बन्धुओंके साथ मौन
होकर भोजन करना चाहिये। फिर स्वर्ण, वस्त्र आदि देकर ब्राह्मणोंसे क्षमा माँगे। धनवान् व्यक्ति श्रद्धापूर्वक साङ्गोपाङ्ग निर्दिष्ट विधिसे पूजन करे एवं यदि कोई व्यक्ति निर्धन हो तो वह श्रद्धापूर्वक जल, पुष्प आदिसे पूजा करे। इससे व्रतके सम्यक् फलकी प्राप्ति होती है। श्रद्धाके साथ कार्तिककी प्रतिपदासे लेकर प्रतिमास इस विधिसे व्रत करना चाहिये। अनन्तर पारणा करनी चाहिये। सोलहवें वर्षमें पारणाके दिन शिवजीकी पूजा कर सोनेकी सींग, चाँदीके खुर और घण्टा, काँसेके दोहन-पात्रके साथ उत्तम गाय महादेवजीके निमित्त शिवभक्त ब्राह्मणोंको देनी चाहिये। अनन्तर सोलह ब्राह्मणोंका विधि-विधानसे पूजनकर यथाशक्ति वस्त्र, आभूषण आदिसे पूजनकर उत्तम पदार्थोंका भोजन कराना चाहिये। यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराकर दक्षिणा दे। दीनों, अन्धों, अनाथों आदिको भी भोजन कराकर कुछ दान देना चाहिये। यह बृहत्तपोव्रत ब्रह्महत्या-जैसे पापोंका हरण और तीनों लोकोंमें अनेक प्रकारके उत्तम भोगोंको प्रदान करनेवाला है। चारों वर्णोंके लिये यह स्वर्गकी सीढ़ी है। धन पाकर भी जो इस व्रतको नहीं करता, वह मूढ़-बुद्धि है। सधवा स्त्री यदि इसे करती है तो उसका पतिसे वियोग नहीं होता और विधवा स्त्रीको भी भविष्यमें वैधव्य न प्राप्त हो, इसलिये उसे यह व्रत करना चाहिये। इस व्रतके अनुष्ठानसे धन, आयु, रूप, सौभाग्य आदिकी प्राप्ति होती है। सभी स्त्री-पुरुष इस व्रतको कर सकते हैं। सोलह वर्षोंतक इस बृहत्तपोव्रतका भक्तिपूर्वक अनुष्ठान कर व्रती सूर्यमण्डलका भेदन कर शिवजीके चरणोंको प्राप्त करता है। (अध्याय १२)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
४०९
जातिस्मर*-भद्रव्रतका फल और विधान तथा स्वर्णछीवीकी कथा
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! अपने पूर्व-जन्मोंका ज्ञान होना बहुत कठिन है। आप यह बतायें कि ऋषियोंके वरदान, देवताओंकी आराधना या तीर्थ, स्नान, होम, जप, तप, व्रत आदिके करनेसे पूर्वजन्मका ज्ञान प्राप्त हो सकता है या नहीं? यदि ऐसा कोई व्रत हो, जिसके करनेसे पूर्वजन्मका स्मरण हो सकता है तो आप उसका वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—राजन्! एक ही वर्षमें 'मार्गशीर्ष, फाल्गुन, ज्येष्ठ एवं भाद्रपद' क्रमशः इन चार मासोंमें भद्रव्रतका श्रद्धापूर्वक उपवास करनेसे मनुष्यको अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो जाता है। इस विषयमें एक आख्यान है, उसे आप सुनें—
प्राचीन कालमें यमुनाके किनारे शुभोदय नामका एक वैश्य रहता था। वह इस व्रतको करता था। कालक्रमसे वह मृत्युको प्राप्त हुआ और व्रतके प्रभावसे वह दूसरे जन्ममें राजा संजयके पुत्र-रूपमें उत्पन्न हुआ, उसका नाम था स्वर्णछीवी। उसे पूर्वजन्मका स्मरण था। कुछ दिनों बाद चोरोंने उसे मार डाला और नारदजीके प्रभावसे वह जीवित हो गया। इस व्रतके प्रभावसे अपने इस विगत वृत्तान्तोंको वह भलीभाँति जानता था।
राजाने पूछा—उसका स्वर्णछीवी नाम कैसे पड़ा? और चोरोंने उसे क्यों मार डाला? तथा किस उपायसे वह जीवित हुआ, इसका विस्तारपूर्वक वर्णन करें?
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! कुशावती नामकी नगरीमें संजय नामका एक राजा रहता था। एक दिन नारद और पर्वत नामके दो मुनि
राजाके पास आये। वे दोनों राजाके मित्र थे। राजाने अर्घ्य-पाद्य, आसनादि उपचारोंसे उनका पूजन तथा सत्कार किया। उसी समय राजाकी अत्यन्त सुन्दरी राजकन्या वहाँ आयी। पर्वतमुनिने उसे देखकर मोहित हो राजासे पूछा—राजन्! यह युवती कौन है? राजाने कहा—'मुने! यह मेरी कन्या है।' नारदजीने कहा—'राजन्! आप अपनी इस कन्याको मुझे दे दें और आप जो दुर्लभ वर माँगना चाहते हों, वह मुझसे माँग लें।' राजाने प्रसन्न होकर कहा—'देवर्षि! आप मुझे एक ऐसा पुत्र दें जो जिस स्थानमें मूत्र-पुरीष और निष्ठीवन (थूक, खखार)-का त्याग करे, वह सब उत्तम सुवर्ण बन जाय।' नारदजी बोले—'ऐसा ही होगा।'
राजाने अभीष्ट वर प्राप्त कर अपनी कन्याको वस्त्राभूषणसे अलंकृतकर नारदजीसे उसका विवाह कर दिया। नारदकी इस लीलाको देखकर पर्वतमुनिने ओठ क्रोधसे फड़कने लगे, आँखें लाल हो गयीं। वे नारदजीसे बोले—'नारद! तुमने इसके साथ विवाह कर लिया, अतः तुम मेरे साथ स्वर्ग आदि लोकोंमें नहीं जा सकोगे और जो तुमने इस राजाको पुत्र-प्राप्तिका वरदान दिया है, वह पुत्र भी चोरोंद्वारा मारा जायगा।' यह सुनकर नारदजीने कहा—'पर्वत! तुम धर्मको जाने बिना मुझे शाप दे रहे हो। यह कन्या है, इसपर किसीका भी अधिकार नहीं। धर्मपूर्वक माता-पिता जिसे दे दें, वही उसका स्वामी होता है। तुमने मूढ़तावश मुझे शाप दिया है, इसलिये तुम भी स्वर्गमें नहीं जा सकोगे। राजा संजयके पुत्रको चोरोंद्वारा मार डाले जानेपर भी मैं उसे यमलोकसे ले आऊँगा।'
- जातिस्मर शब्दका अर्थ है पूर्वजन्मोंको स्मरण करनेवाला व्यक्ति। यह योगदर्शनके अनुसार त्याग, अपरिग्रह और मन-बुद्धि एवं प्रकृतिके अनुशीलनसे प्राप्त होता है—'संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम्।' (योगदर्शन ३।१८) जिस प्रकार अद्वैत, सद्भाव, सरलता आदिको जातिस्मरता (आध्यात्मिकता, कुण्डलिनी-जागरणदि)-में सहायक माना है, उसी प्रकार अहंकार, कौटिल्य-द्वेष-द्वेहादिको आध्यात्मिकतामें बाधक भी मानना चाहिये और कल्याणकामीको उनसे सदा बचते रहनेकी भी चेष्टा करनी चाहिये।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
४०२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
इस प्रकार परस्पर शाप देकर और राजा संजयके द्वारा सत्कृत होकर दोनों मुनि अपने-अपने आश्रमकी ओर चले गये। तदनन्तर सातवें महीनेमें राजाको पुत्र उत्पन्न हुआ। वह कामदेवके समान अतिशय रूपवान् और पूर्वजन्मोंका ज्ञाता था। नारदजीके वरदानसे जिस स्थानपर वह मूत्र-पुरीष आदिका परित्याग करता, वहीं वह सुवर्ण हो जाता, इसलिये राजाने उसका नाम स्वर्णछीवी रखा। वह राजपुत्र सभी प्राणियोंकी बातोंको समझता था। राजा संजयने पुत्रके प्रभावसे बहुत धन प्राप्तकर राजसूय आदि यज्ञोंका विधिपूर्वक सम्पादन किया। उसने अनेक कूप, सरोवर, देवालयों आदिका निर्माण कराया। पुत्रकी रक्षाके लिये विशाल सेना भी नियुक्त कर दी।
स्वर्णछीवीके प्रभावसे राजा संजयके यहाँ स्वर्णकी ढेर सारी राशियाँ एकत्र हो गयीं। कुछ समयके बाद राजपुत्रकी अत्यन्त ख्याति सुनकर लोभवश मदोद्भूत चोरोंने स्वर्णछीवीका हरण कर लिया, परंतु जब उसके शरीरमें कहीं भी सोना नहीं देखा, तब चोरोंने उसे मारकर जंगलमें फेंक दिया। चोरोंद्वारा पुत्रके मारे जानेपर राजा बहुत दुःखी हो विलाप करने लगा। उस समय नारदजी वहाँ पुनः पधारे। नारदजीने अनेक प्राचीन राजाओंकी गाथाएँ सुनाकर राजाके शोकको दूर किया और यमलोकमें जाकर वे राजपुत्रको ले आये। पुत्रको प्राप्तकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उसने नारदजीसे पूछा—‘महाराज! किस कर्मके प्रभावसे यह मेरा पुत्र स्वर्णछीवी हुआ और किस कर्मके प्रभावसे इसको पूर्वजन्मका स्मरण है?’ नारदजीने कहा—‘राजन्! इसने ‘भद्र’ नामक व्रतको विधिपूर्वक चार बार किया है। यह उसीका प्रताप है।’ इतना कहकर नारदजी अपने आश्रमको चले गये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! इस व्रतके
करनेसे व्रतीका उत्तम कुलमें जन्म होता है और वह रूपवान् तथा पूर्वजन्मका ज्ञाता एवं दीर्घायु होता है। अब आप इस व्रतका विधान सुनें—इस व्रतके चार भद्र चार पादके रूपमें हैं। मार्गशीर्षमें पहला, फाल्गुनमें दूसरा, ज्येष्ठमें तीसरा और भाद्रपदमें चौथा पाद होता है। मार्गशीर्ष शुक्ल आदि तीन मास ‘विष्णुपद’ नामक भद्र सभी धर्मोंका साधक है। फाल्गुन शुक्ल आदि तीन मास ‘त्रिपुष्कर’ नामक भद्ररूप है और यह तप आदिका साधक एवं लक्ष्मीप्रद है। ज्येष्ठ शुक्ल आदि तीन मास ‘त्रिराम’ नामक भद्र है। यह सत्य और शौर्य प्रदान करता है। भाद्रपद शुक्ल आदि तीन मास ‘त्रिरंग’ नामक भद्र है, यह बहुत विद्या देनेवाला है। सभी स्त्री-पुरुषोंको इस भद्रव्रतको करना चाहिये।
राजा युधिष्ठिरने पूछा— जगत्पते! इन भद्रोंका विधान आप विस्तारपूर्वक कहें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! इस अतिशय गुप्त विधानको मैंने किसीसे नहीं कहा है, आपको मैं सुनाता हूँ, आप सावधान होकर सुनें—
मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी प्रारम्भिक चार तिथियाँ अत्यन्त श्रेष्ठ मानी गयी हैं। ये तिथियाँ हैं—द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी। व्रतीको प्रतिपदाके दिन जितेन्द्रिय होकर एकभुक्त रहना चाहिये। प्रातःकालमें द्वितीया तिथिको नित्यक्रियाओंको सम्पन्न कर मध्याह्नमें मन्त्रपूर्वक गोमय तथा मिट्टी आदि लगाकर स्नान करना चाहिये। इन मन्त्रोंके अधिकारी चारों वर्ण हैं, किंतु वर्णसंकरोंको इनका अधिकार नहीं है। विधवा स्त्री यदि सदाचारसम्पन्न हो तो वह भी इस व्रतकी अधिकारिणी है। सधवा स्त्री अपने पतिकी आज्ञासे यह व्रत ग्रहण करे। शरीरमें मिट्टी-लेपन करनेका मन्त्र इस प्रकार है—
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
४०३
त्वं मृत्युं वन्दित्वा देवैः समलैर्दैत्यघातिभिः ॥ मयापि वन्दित्वा भक्त्या मामतो विमलं कुरु ॥
(उत्तरपर्व १३।६५-६६)
‘मृतिके! दुष्ट दैत्योंका विनाश करनेवाले देवताओंके द्वारा आप वन्दित हैं, मैं भी भक्तिपूर्वक आपकी वन्दना करता हूँ, मुझे भी आप पवित्र बना दें।’
अनन्तर जलके सम्मुख जाकर सफेद सरसों, कृष्ण तिल, वच और सर्वौषधिका उबटन लगाकर जलमें मण्डल अङ्कित कर ये मन्त्र पढ़ने चाहिये—
त्वमादिः सर्वदेवानां जगतां च जगन्मये। भूतानां वीरुधां चैव रसानां पतये नमः ॥ गङ्गासागरजं तोयं पौष्करं नार्मदं तथा। यामुनं सान्निहत्तं च संनिधानमिहास्तु मे ॥
(उत्तरपर्व १३।६८-६९)
ये मन्त्र पढ़कर स्नानकर शुद्ध वस्त्र पहन, संध्या और तर्पण करे। फिर घर आकर नियमपूर्वक रहे और चन्द्रोदयपर्यन्त किसीसे सम्भाषण न करे।
इसी प्रकार द्वितीया आदि तिथियोंमें कृष्ण, अच्युत, अनन्त और हषीकेश—इन नामोंसे भक्तिपूर्वक भगवान्का पूजन करे। पहले दिन भगवान्के चरणारविन्दोंका, दूसरे दिन नाभिका, तीसरे दिन वक्षःस्थलका और चौथे दिन नारायणके मस्तकका विधिपूर्वक उत्तम पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे पूजन करे और रात्रिमें जब चन्द्रोदय हो, तब शशि, चन्द्र, शशाङ्क तथा इन्दु—इन नामोंसे क्रमशः चन्दन, अगुरु, कर्पूर, दधि, दूर्वा, अक्षत तथा अनेक रत्नों, पुष्पों एवं फलों आदिसे चन्द्रमाको अर्घ्य दे। प्रत्येक दिन जैसे-जैसे चन्द्रमाकी वृद्धि हो वैसे-वैसे अर्घ्यमें भी वृद्धि करनी चाहिये। अर्घ्य इस मन्त्रसे देना चाहिये—
नवो नवोऽसि मासान्ने जायमानः पुनः पुनः। त्रिरग्रिसमवेत्तान् वै देवानाप्यायसे हविः ॥ गगनाङ्गणसद्दीप दुग्धाब्धिधमथनोद्भव।
भाभासितदिगाभोग रमानुज नमोऽस्तु ते ॥
(उत्तरपर्व १३।८६-८७)
‘हे रमानुज! आप प्रत्येक मासके अन्तमें नवीन-नवीन रूपमें आविर्भूत होते रहते हैं। तीन अग्रियोंसे समन्वित देवताओंको आप ही हविष्यके द्वारा आप्पायित करते हैं। आपकी उत्पत्ति क्षीरसागरके मन्थनसे हुई है। आपकी आभासे ही दिशा-विदिशाएँ आभासित होती हैं। गगरूपी आँगनके आप सत्स्वरूपी देदीप्यमान दीपक हैं। आपको नमस्कार है।’
चन्द्रमाको अर्घ्य निवेदित कर वह अर्घ्य ब्राह्मणको दे दे। अनन्तर मौन होकर भूमिपर पद्मपत्र बिछाकर भोजन करे। पलाश या अशोकके पत्रोंद्वारा पवित्र भूमि या शिलातलका शोधन कर इस मन्त्रसे भूमिकी प्रार्थना करनी चाहिये—
त्वत्तले भोक्तुकामोऽहं देवि सर्वरसोद्भव ॥ मदनुग्रहाय सुस्वादं कुर्वन्त्रमभूतोपमम्।
(उत्तरपर्व १३।९०-९१)
‘सम्पूर्ण रसोंको उत्पन्न करनेवाली हे पृथ्वी देवि! आपके आश्रयमें मैं भोजन करना चाहता हूँ। मुझपर अनुग्रह करनेके लिये आप इस अन्नको अमृतके समान उत्तम स्वादयुक्त बना दें।’
अनन्तर शाक तथा पक्वानका भोजन करे। भोजनके बाद आचमन करे और अङ्गोंका स्पर्श कर चन्द्रमाका ध्यान करते हुए भूमिपर ही शयन करे। द्वितीयाके दिन क्षार एवं लवणरहित हविष्यका भोजन करना चाहिये। तृतीयाको नीवार (तिन्नी) तथा चतुर्थीको गायके दूधसे बने उत्तम पदार्थोंको ग्रहण करना चाहिये। पञ्चमीको घृतयुक्त कुशरात्र (खिचड़ी) ग्रहण करना चाहिये। इस भद्रव्रतमें सावों, चावल, गायका घृत तथा अन्य गव्य पदार्थ एवं अयाचित प्रास वन्य फल प्रशस्त माने गये हैं। अनन्तर प्रातःकाल स्नानकर पितरोंका तर्पण कर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें दान-दक्षिणा आदि
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
४०४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
देकर बिदा करना चाहिये। बादमें भृत्य एवं बन्धुजनोंके साथ स्वयं भी भोजन करे।
इस प्रकार तीन-तीन महीनोंतक चार भद्र-व्रतोंका जो वर्षपर्यन्त भक्तिपूर्वक प्रमादरहित होकर आचरण करता है, उसे चन्द्रदेव प्रसन्न होकर श्री, विजय आदि प्रदान करते हैं। जो कन्या इस भद्रव्रतका अनुष्ठान करती है, वह शुभ पतिको प्राप्त करती है। दुर्भगा स्त्री सुभगा
एवं साध्वी हो जाती है तथा नित्य सौभाग्यको प्राप्त करती है। राज्यार्थी राज्य, धनार्थी धन और पुत्रार्थी पुत्र प्राप्त करता है। इस भद्रव्रतके करनेसे स्त्रीका उत्तम कुलमें विवाह होता है तथा वह उत्तम शय्या, अन्न, यान, आसन आदि शुभ पदार्थोंको प्राप्त करती है और पुरुष धन, पुत्र, स्त्रीके साथ ही पूर्वजन्मके ज्ञानको भी प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १३)
यमद्वितीया तथा अशून्यशयन-व्रतकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण बोले —राजन्! कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी द्वितीया तिथिको यमुनाने अपने घर अपने भाई यमको भोजन कराया और यमलोकमें बड़ा उत्सव हुआ, इसलिये इस तिथिका नाम यमद्वितीया है। अतः इस दिन भाईको अपने घर भोजन न कर बहिनके घर जाकर प्रेमपूर्वक उसके हाथका बना हुआ भोजन करना चाहिये। उससे बल और पुष्टिकी वृद्धि होती है। इसके बदले बहिनको स्वर्णलंकार, वस्त्र तथा द्रव्य आदिसे संतुष्ट करना चाहिये। यदि अपनी सगी बहिन न हो तो पिताके भाईकी कन्या, मामाकी पुत्री, मौसी अथवा बुआकी बेटी—ये भी बहिनके समान हैं, इनके हाथका बना भोजन करे। जो पुरुष यमद्वितीयाको बहिनके हाथका भोजन करता है, उसे धन, यश, आयुष्य, धर्म, अर्थ और अपरिमित सुखकी प्राप्ति होती है।
राजा युधिष्ठिरने पूछा —भगवन्! आपने बताया कि सब धर्मोंका साधन गृहस्थाश्रम है, वह गृहस्थाश्रम स्त्री और पुरुषसे ही प्रतिष्ठित होता है। पत्नीहीन पुरुष और पुरुषहीन नारी धर्म आदि साधन सम्पन्न करनेमें समर्थ नहीं होते, इसलिये आप कोई ऐसा व्रत बतायें जिसके अनुष्ठानसे
दाम्पत्यका वियोग न हो।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले —महाराज! श्रावण मासके कृष्ण पक्षकी द्वितीयाको अशून्यशयन नामक व्रत होता है। इसके करनेसे स्त्री विधवा नहीं होती और पुरुष पत्नीसे हीन नहीं होता। इस तिथिको लक्ष्मीसहित भगवान् विष्णुका शय्यापर अनेक उपचारोंद्वारा पूजन करना चाहिये। इस दिन उपवास, नक्तव्रत अथवा अयाचित-व्रत करना चाहिये। व्रतके दिन दही, अक्षत, कन्द-मूल, फल, पुष्प, जल आदि सुवर्णके पात्रमें रखकर निम्नमन्त्रको पढ़ते हुए चन्द्रमाको अर्घ्य देना चाहिये—
गगनाङ्गणसम्भूत दुग्धाब्धिधमथनोद्भव।
भाभासितदिगाभोग रमानुज नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व १५।१८)
इस विधानके साथ जो व्यक्ति चार मासतक व्रत करता है, उसको कभी भी स्त्री-वियोग प्राप्त नहीं होता एवं उसे सभी प्रकारके ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं। जो स्त्री भक्तिपूर्वक इस व्रतको करती है, वह तीन जन्मतक विधवा और दुर्भगा नहीं होती। यह अशून्य-द्वितीयाका व्रत सभी कामनाओं और उत्तम भोगोंको देनेवाला है, अतः इसे अवश्य करना चाहिये। (अध्याय १४-१५)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
- उत्तरपर्व *
४०५
मधूकतृतीया एवं मेघपालीतृतीया-व्रत
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! मधूक-वृक्षका आश्रय ग्रहण करनेवाली भगवान् शंकरकी भार्या भगवती गौरीकी लक्ष्मी, सरस्वती आदि देवियोंने किस कारणसे अर्चना की, इसे आप बतायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— प्राचीन कालमें समुद्र-मन्थनसे मधूक-वृक्ष विनिर्गत हुआ। स्त्रियोंको अखण्ड सौभाग्य प्राप्त करानेवाले तथा सभी आधि-व्याधियोंको दूर करनेवाले उस वृक्षको भूलोकवासियोंने पृथिवीपर स्थापित किया। जया-विजया आदि सखियोंसहित भगवती गौरीको उस प्रफुल्लित सुन्दर वृक्षका आश्रय ग्रहण किये देखकर देवताओंने अपनी अभीष्ट इच्छाओंकी पूर्तिहेतु उसकी अनेक उपचारोंसे पूजा की। स्वयं लक्ष्मी, सरस्वती, सावित्री, गङ्गा, रोहिणी, रम्भा तथा अरुन्धती आदिने भी विनयपूर्वक पूजा की। भगवती गौरीने प्रसन्न होकर उन्हें अभिमत फल प्रदान किया। फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको इनकी उपासना हुई थी। इसलिये फाल्गुनके शुक्ल पक्षकी तृतीया तिथिको उपवासकर मधुवनमें जाकर मधूक-वृक्षके नीचे ब्रह्मचर्यमें स्थित, जटामुकुटसे सुशोभित, तपस्यारत तथा गोधाके रथपर आरूढ़, रुद्र-ध्यानपरायणा भगवती पार्वतीकी प्रतिमाका ध्यान करते हुए गन्ध, पुष्प, दीप, लाल चन्दन, केसर, मधुर द्रव्य, स्वर्ण, माणिक्य आदिसे पूजाकर देवीसे इस प्रकार अखण्ड सौभाग्यके लिये प्रार्थना करे—
ॐ भूषिता देवभूषा च भूषिका ललिता उमा।
तपोवनरता गौरी सौभाग्यं मे प्रयच्छतु॥
दौर्भाग्यं मे शमयतु सुप्रसन्नमनाः सदा।
अवैधव्यं कुले जन्म ददात्वपरजन्मनि॥
(उत्तरपर्व १६। ३-४)
‘तपोवनरता हे गौरी देवि! आपका नाम ललिता तथा उमा है। आप देवताओंकी
आभूषणस्वरूपा एवं सभीको आभूषित करनेवाली हैं और स्वयं आभूषित हैं। आप मुझे सौभाग्य प्रदान करें। आप मेरे दौर्भाग्यका शमन करें। दूसरे जन्ममें भी मेरा सौभाग्य अखण्डित रहे। आप सर्वदा मुझपर प्रसन्न रहें।’
अनन्तर फूल, जीरक, लवण, गुड़, घी, पुष्पमालाओं, कुंकूम, गन्ध, अगर, चन्दन एवं सिंदूर आदि तथा वस्त्रोंसे और अनेक देशोत्पन्न अंजनोंसे, पुआ, तिल और तण्डुल, घृतपूरित मोदक इत्यादि नैवेद्योंसे मधूक-वृक्षकी पूजा करे। उसकी प्रदक्षिणा कर ब्राह्मणोंको दक्षिणा दे। जो कन्या इस उत्तम तृतीया-व्रतको करती है, वह तीनों लोकोंमें दुष्प्राप्य भगवान् विष्णुके समान पति प्राप्त करती है। राजन्! मेरे द्वारा कथित यह व्रत चिरकालतक प्रसिद्ध रहेगा। इस व्रतको रुक्मिणीके सम्मुख प्रथम महर्षि कश्यपने कहा था। जो स्त्री इस व्रतका आचरण करेगी, वह नीरोग, सुन्दर दृष्टिसम्पन्न तथा अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे शोभायुक्त होकर सौ वर्षोंतक जीवित रहेगी। अनन्तर किंकिणीके शब्दोंसे समन्वित हंसयानसे रुद्रलोकको प्राप्त करेगी। वहाँ अनेक वर्षोंतक अपने पतिके साथ दिव्य भोगोंको प्राप्त कर आठों सिद्धियोंसे समन्वित होगी।
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! मेघपाली-व्रत कब और कैसे अनुष्ठित होता है, इसका क्या फल है तथा मेघपाली लता कैसी होती है ? इसे बतलानेकी कृपा करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले— आश्विन मासके कृष्ण पक्षकी तृतीया तिथिको भक्तिपूर्वक स्त्रियों अथवा पुरुषोंको सद्भर्मकी प्राप्तिके लिये मेघपालीको ससधान्य (यव, गोधूम, धान, तिल, कंगु, श्यामाक (सावौं) तथा चना) और अङ्कुरित गोधूमके साथ अथवा तिल-तण्डुलके पिण्डोंद्वारा अर्घ्य प्रदान करना चाहिये।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth