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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ
  • उत्तरपर्व *

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ध्यान करती थीं। कुछ कालमें उन्होंने गर्भमें भगवान्‌को धारण किया। नवें मासमें वामनभगवान्‌ अदितिके गर्भसे प्रादुर्भूत हुए। उनके पैर छोटे, शरीर छोटा, सिर बड़ा और छोटे बच्चेके समान हाथ-पैर, उदर आदि थे। वामनरूपमें जब अदितिने पुत्रको देखा और जब वह कुछ कहनेको उद्यत हुई तो देवमायासे उनकी वाणी अवरुद्ध हो गयी।

हे नरोत्तम! भाद्रपद मासके श्रवण नक्षत्रसे युक्त एकादशी तिथिमें जब त्रिविक्रम वामन-भगवान्‌का पृथ्वीपर अवतार हुआ तब पृथ्वी डगमगाने लगी। दैत्योंमें भय छा गया और देवगण प्रसन्न हो गये। महामुनि कश्यपने शिशुके जातकमार्दि संस्कार स्वयं ही किये। वामनभगवान्‌ दण्ड, मेखला, यज्ञोपवीत, कमण्डलु तथा छत्र धारणकर राजा बलिके यज्ञस्थलमें गये। उन्होंने बलिसे कहा—‘यज्ञपते! मुझे तीन पग भूमि प्रदान करो।’ बलिनै कहा—‘मैंने दे दिया।’ उसी समय भगवान्‌ वामनने अपना शरीर बढ़ाना प्रारम्भ किया। भगवान्‌ने अपना शरीर इतना विशाल बना लिया कि एक पगसे सम्पूर्ण पृथ्वीलोकको नाप लिया तथा द्वितीय पगसे ब्रह्मलोक नाप लिया। तीसरा पग रखनेके लिये जब कोई स्थान न मिला तो देवगण, सिद्ध, ऋषि-मुनि इस कृत्यको देखकर साधु-साधु कहने लगे और भगवान्‌की स्तुति करने लगे। तदनन्तर सभी दैत्यगणोंको जीतकर उन्होंने दैत्यराज बलिसे कहा—‘तुम अपने परिजनोंके साथ सुतललोकमें चले जाओ। मेरे द्वारा सुरक्षित रहकर तुम वहाँ अभीप्सित भोगोंका उपभोग करोगे। वर्तमानमें जो इन्द्र हैं, उनके बाद तुम इन्द्रत्वको प्राप्त करोगे।’ बलि भगवान्‌को प्रणामकर प्रसन्न हो

सुतललोकको चला गया। भगवान्‌ने देवताओंसे कहा—‘आपलोग अपने-अपने स्थानपर निश्चिन्त होकर रहें।’ भगवान्‌ भी संसारका कल्याण करके वहाँ अन्तर्धान हो गये।

राजन्! ये सभी कर्म एकादशी तिथिको हुए थे। अतः यह तिथि देवताओंकी विजयतिथि मानी गयी है। यही एकादशी तिथि फाल्गुन मासमें पुष्य नक्षत्रसे युक्त होनेपर विजया तिथि कही गयी है। एकादशीके दिन उपवासकर रात्रिमें भगवान्‌ वामनकी प्रतिमा बनाकर पूजा करनी चाहिये। प्रतिमाके समीप ही कुण्डिका, छत्र, चरणपादुका, यष्टि, यज्ञोपवीत, कमण्डलु तथा मुगचर्म आदि स्थापित करना चाहिये। अनन्तर विधिवत्‌ उनकी पूजा करनी चाहिये। निम्न मन्त्रोंसे उन्हें नमस्कार करे और प्रार्थना करे—

अनेककर्मनिर्वन्धवृत्तिसिन् जलशायिनम्। नतोऽस्मि मधुरावासं माधवं मधुसूदनम्॥ नमो वामनरूपाय नमस्तेऽस्तु त्रिविक्रम। नमस्ते मणिबन्धाय वासुदेव नमोऽस्तु ते॥ नमो नमस्ते गोविन्द वामनेश त्रिविक्रम॥ अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वकामप्रदो भव॥

(उत्तरपर्व ७६। ४८—५१)

इसके अनन्तर भगवान्‌को शयन कराये। गीत-वाद्य, स्तुति आदिके द्वारा जागरण करे। प्रातःकाल उस प्रतिमाकी पूजाकर मन्त्रपूर्वक उसे ब्राह्मणको निवेदित कर दे। ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। इस व्रतके करनेसे व्रतीका एक मन्वन्तरपर्यन्त विष्णुलोकमें वास होता है, तदनन्तर वह इस लोकमें आकर चक्रवर्ती दानी राजा होता है। वह नीरोग, दीर्घायु एवं पुत्रवान्‌ होता है। (अध्याय ७६)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

सम्प्राप्ति-द्वादशी एवं गोविन्द-द्वादशीव्रत

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—पौष मासके कृष्ण पक्षकी द्वादशीसे ज्येष्ठ मासकी द्वादशीतक प्रत्येक मासकी कृष्ण द्वादशीको षण्मासिक सम्प्राप्ति-द्वादशीव्रत किया जाता है। प्रत्येक मासमें क्रमशः पुण्डरीकाक्ष, माधव, विश्वरूप, पुरुषोत्तम, अच्युत तथा जय—इन नामोंसे उपवासपूर्वक भगवान्की पूजा करनी चाहिये। पुनः आषाढ़ कृष्ण द्वादशीसे व्रत ग्रहणकर मार्गशीर्षतक व्रतका नियम लेना चाहिये। पूर्वविधानसे उपवासपूर्वक उन्हीं नामोंसे क्रमशः भगवान्का पूजन करना चाहिये। प्रतिमास ब्राह्मणको भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। तेल एवं क्षार पदार्थ नहीं ग्रहण करने चाहिये। इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतके करनेसे सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और अन्तमें वह भगवान्के अनुग्रहसे उनके लोकको प्राप्त कर लेता है।

भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा—महाराज! इसी प्रकार गोविन्द-द्वादशी नामका एक अन्य व्रत है, जिसके करनेसे सभी अभीष्ट सिद्ध हो जाते हैं। पौष मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवास कर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे कमलनयन भगवान्

गोविन्दका पूजनकर अन्तर्मनमें भी इसी नामका उच्चारण करते रहना चाहिये। इस दिन पाखण्डियोंसे बात नहीं करनी चाहिये। ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। व्रतीको गोमूत्र, गोमय, दधि अथवा गोदुग्धका प्राशन करना चाहिये। दूसरे दिन स्नानकर उसी विधिसे गोविन्दका पूजन कर ब्राह्मणको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करना चाहिये। इसके साथ ही इस दिन गौको तृसिपूर्वक भोजन कराना चाहिये। इसी प्रकार प्रतिमास व्रत करते हुए वर्ष समाप्त होनेपर भगवती लक्ष्मीके साथ सुवर्णकी भगवान् गोविन्दकी प्रतिमा बनवाकर पुष्प, धूप, दीप, माला, नैवेद्य आदिसे उसका पूजनकर सवत्सा गौसहित ब्राह्मणोंको देना चाहिये। प्रतिमास गौओंकी पूजा तथा उन्हें ग्रासादिसे तृप्त करना चाहिये। पारणाके दिन विशेषरूपसे उनकी सेवा-भक्ति करनी चाहिये। इस व्रतको करनेसे वही फल प्राप्त होता है जो सुवर्णशृङ्गी सौ गोओंके साथ एक उत्तम वृषका दान देनेसे होता है। इस व्रतको सम्यक्-रूपसे करनेवाला सब सुख भोगकर अन्तमें गोलोकको प्राप्त होता है। (अध्याय ७७-७८)

अखण्ड-द्वादशी, मनोरथ-द्वादशी एवं तिल-द्वादशी-व्रतोंका विधान

राजा युधिष्ठिरने पूछा—श्रीकृष्ण! व्रतोपवास, दान, धर्म आदिमें जो कुछ वैकल्प्य अर्थात् किसी बातकी न्यूनता रह जाय तो क्या फल होता है? इसे आप बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! राज्य पाकर भी जो निर्धन, उत्तम रूप पाकर भी काने, अंधे, लँगड़े हो जाते हैं, वे सब धर्म-वैकल्प्यके प्रभावसे ही होते हैं। धर्म-वैकल्प्यसे ही स्त्री-पुरुषोंमें वियोग एवं दुर्भाग्य होता है, उत्तम कुलमें जन्म पाकर भी लोग दुःशील हो जाते हैं, धनाढ्य होकर भी

धनका भोग तथा दान नहीं कर सकते तथा वस्त्र-आभूषणोंसे हीन रहते हैं। वे सुख प्राप्त नहीं कर पाते। अतः यज्ञमें, व्रतमें और भी अन्य धर्म-कृत्योंमें कभी कोई त्रुटि नहीं होने देनी चाहिये।

युधिष्ठिरने पुनः कहा—भगवन्! यदि कदाचित् उपवास आदिमें कोई त्रुटि हो ही जाय तो उसके निवारणार्थ क्या करना चाहिये?

श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अखण्ड-द्वादशी-व्रत करनेसे सभी प्रकारकी धार्मिक त्रुटियाँ दूर हो जाती हैं। अब आप उसका भी विधान सुनें। मार्गशीर्ष

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  • उत्तरपर्व *

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मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको स्नानकर जनार्दन भगवान्का भक्तिपूर्वक पूजन कर उपवास रखना चाहिये और नारायणका सतत स्मरण करते रहना चाहिये। जितेन्द्रिय पुरुष पञ्चगव्यमिश्रित जलसे स्नान करके जौ और ब्रीहि (धान)-से भरा पात्र ब्राह्मणको दान करे और फिर भगवान्से यह प्रार्थना करे —

समजन्मनि यत्किंचिन्मया खण्डव्रतं कृतम्। भगवन् त्वत्प्रसादेन तदखण्डमिहास्तु मे॥ यथाखण्डं जगत् सर्वं त्वयैव पुरुषोत्तम। तथाखिला न्यखण्डानि व्रतानि मम सन्तु वै॥

(उत्तरपर्व ७९।१४-१५)

‘भगवन्! मुझसे सात जन्मोंमें जो भी व्रत करनेमें न्यूनता हुई हो, वह सब आपके अनुग्रहसे परिपूर्ण हो जाय। पुरुषोत्तम! जिस प्रकार आपसे यह सारा जगत् परिपूर्ण है, उसी प्रकार मेरे खण्डित सभी व्रत पूर्ण हो जायें।’

इस व्रतमें चार महीनेमें व्रतकी पारणा करनी चाहिये। चैत्रादि चार मासके अनन्तर दूसरी पारणा कर सत्-पात्र ब्राह्मणको देनेका विधान है। श्रावणादि चार मासके अनन्तर तीसरा पारण कर नारायणका पूजन करते हुए अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्ण, चाँदी, मृत्तिका अथवा पलाश-पत्रके पात्रमें घृत-दान करना चाहिये। संवत्सर पूर्ण होनेपर जितेन्द्रिय बारह ब्राह्मणोंको खीरका भोजन कराकर वस्त्राभूषण देकर वृत्तियोंके लिये क्षमा माँगनी चाहिये। इसमें आचार्यका विधिपूर्वक पूजन करनेका भी विधान है। इस तरहसे जो अखण्ड-द्वादशीका व्रत करता है, उसके सात जन्मतक किये हुए व्रत सम्पूर्ण फलदायक हो जाते हैं। अतः स्त्री-पुरुषोंको व्रतोंका वैकल्प्य दूर करनेके लिये अवश्य ही इस व्रतको सम्पादित करना चाहिये।

भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा— महाराज! स्त्री अथवा पुरुष दोनोंको फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी एकादशीको उपवास कर जगत्पति भगवान्का पूजन-

भजन और उठते-बैठते नित्य हरिका स्मरण करते रहना चाहिये। द्वादशीके दिन प्रभातमें ही स्नान-पूजन तथा घृतसे हवनके बाद ब्राह्मणको दक्षिणा देनेका विधान है। तदनन्तर भगवान्से अपने अभीष्ट मनोरथोंकी संसिद्धिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। तत्पश्चात् हविष्य-भोजन ग्रहण करना चाहिये। इस व्रतमें फाल्गुनसे ज्येष्ठतक प्रथम चार महीनोंमें रक्त पुष्प, गुग्गुल-धूप और हविष्यान्न-नैवेद्यसे भगवान्की पूजा-अर्चनाके बाद गोशुद्धछालित जल तथा हविष्यान्न ग्रहण करनेका विधान है। फिर आषाढ़से आश्विनतक चार महीनोंमें चमेलीके पुष्प, धूप और शाल्यन्न (साठी धान) आदिके नैवेद्योंद्वारा भगवान्की पूजा-स्तुति करनेके बाद कुशोदकका प्राशन तथा निवेदित नैवेद्य भक्षण करना चाहिये। कार्तिकसे माघ मासतक तीसरी पारणामें जपापुष्प (अड़हुल), उत्तम धूप और कसारके नैवेद्यसे नारायणके पूजोपरान्त गोमूत्र-प्राशन तथा कसार-भक्षण करनेका विधान है। प्रतिमास ब्राह्मणोंको दक्षिणा देनी चाहिये। वर्षके अन्तमें एक कर्ष (माशा) सुवर्णकी भगवान् नारायणकी प्रतिमाका पूजन कर, दो वस्त्र और दक्षिणासहित ब्राह्मणको निवेदित करना चाहिये। इसीके साथ बारह ब्राह्मणोंको भी भोजन कराकर प्रत्येकको अन्न, जलका घट, छतरी, जूता, वस्त्र और दक्षिणा देनी चाहिये। इस द्वादशी-व्रतके करनेसे सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। इसीसे इसका नाम मनोरथ-द्वादशी है। इन्द्रको त्रैलोक्यका राज्य भी इसी व्रतके परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ है। शुक्लाचार्यने धन तथा महर्षि धौम्यने निर्विघ्न विद्या प्राप्त की है। अन्य श्रेष्ठ पुरुषोंने तथा स्त्रियोंने भी इस व्रतके प्रभावसे अपने अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त किया है। जो कोई भी जिस-किसी अभिलाषासे इस व्रतको करता है, वह अवश्य पूर्ण होती है। जो पुरुष भगवान् पुरुषोत्तमका पूजन नहीं करते, गौ, ब्राह्मण आदिकी सेवा नहीं करते और मनोरथ-द्वादशीका

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

व्रत नहीं रखते, वे किसी भी प्रकारसे अपना अभीष्ट-फल प्राप्त नहीं कर सकते।

राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! थोड़े-से परिश्रमसे अथवा स्वल्पदानसे सभी पाप कट जायँ ऐसा कोई उपाय आप बतलायँ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! तिल-द्रादशी नामक एक व्रत है, जो परम पवित्र है और सभी पापोंका नाश करनेवाला है। माघ मासके कृष्ण पक्षकी द्रादशीको जब मूल अथवा पूर्वाषाढ़ नक्षत्र प्राप्त हो, तब उसके एक दिन पूर्व अर्थात् एकादशीको उपवास रखकर व्रत ग्रहण करना चाहिये। द्रादशीको भगवान् श्रीकृष्णका पूजन कर ब्राह्मणको कृष्ण तिलोंका दान करना चाहिये। व्रतीको भी

स्नानकर काले तिलका ही भोजन करना चाहिये। इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक कृष्ण द्रादशीमें व्रतकर अन्तमें तिलोंसे पूर्ण कृष्णवर्णके कुम्भ, पकवान, छत्र, जूता, वस्त्र और दक्षिणा बारह ब्राह्मणोंको देना चाहिये। उन तिलोंके बोनसे जितने तिल उत्पन्न होते हैं, उतने वर्षपर्यन्त इस व्रतको करनेवाला स्वर्गमें पूजित होता है और किसी जन्ममें अंध, बधिर, कुष्ठ आदि नहीं होता, सदा नीरोग रहता है। इस तिल-दानसे बड़े-बड़े पाप कट जाते हैं। इस व्रतमें न बहुत परिश्रम है और न ही बहुत अधिक व्यय। इसमें तिलोंसे ही स्नान, तिल-दान और तिल ही भोजन करनेपर अवश्य सद्गति मिलती है*। (अध्याय ७९—८१)

सुकृत-द्रादशीके प्रसंगमें सीरभद्र वैश्यकी कथा

राजा युधिष्ठिरने पूछा—श्रीकृष्णचन्द्र! ऐसा कौन-सा कर्म है, जिसके करनेसे सभी कष्ट दूर हो जायँ तथा कोई संताप भी न हो।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! आपने जो पूछा है, उस विषयमें एक आख्यानका वर्णन करता हूँ। पूर्वकालमें विदिशा (भेलसा) नगरीमें सीरभद्र नामक एक वैश्य रहता था। वह पुत्र-पौत्र, कन्या, स्त्री आदिके भरण-पोषणमें ही लगा रहता था, फलस्वरूप स्वप्नमें भी उसे परलोककी चिन्ता नहीं होती थी। वह न्याय-अन्याय हर तरहसे धनका ही उपार्जन करता, कभी दान, हवन, देवपूजन आदि कर्मका नाम भी नहीं लेता था। नित्य-नैमित्तिक कर्मोंका लोप उसने स्वयं कर लिया था। कुछ कालके अनन्तर वह वैश्य मृत्युको प्राप्त हुआ और विन्ध्यारण्यमें यातना-देहमें प्रेतरूपसे रहने लगा। एक दिन ग्रीष्म-ऋतुमें विपीत नामके वेदवेत्ता ब्राह्मणने उस प्रेतको देखा कि वह सूर्य-किरणोंसे संतप्त नदीके

बालूमें लोट रहा है, उसके सब अङ्गोंमें छाले पड़ गये हैं। प्याससे कण्ठ सूख रहा है और जिह्वा लटक गयी है। वह लम्बी-लम्बी साँस ले रहा है। उसकी यह दशा देखकर ब्राह्मणको बड़ी दया आयी और उसने उसका वृत्तान्त पूछा।

प्रेत कहने लगा—ब्रह्मन्! मैं पूर्व-जन्ममें परलोकके लिये किसी प्रकारके कर्म न करनेके कारण ही दग्ध हो रहा हूँ। मैं निरन्तर धन, घर, खेत, पुत्र, स्त्री आदिकी चिन्तामें ही आसक्त रहता था और मैंने अपने वास्तविक हितका चिन्तन कभी नहीं किया। इसीसे यह कष्ट भोग रहा हूँ। 'यह काम कर लिया और यह काम करना है'—इसी उधेड़बुनमें सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करनेका ही यह फल है। लोभवश मैं शीत-उष्ण सभी प्रकारके कष्टोंको झेल रहा हूँ। मैंने धर्मके लिये किंचित् भी कष्ट नहीं झेला, उससे अब पछताता हूँ। देवता, पित्र, अतिथि आदिका मैंने कभी पूजन नहीं किया और यही

  • यह कथा ब्रह्मपुराणमें भी आयी है।

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  • उत्तरपर्व *

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कारण है कि अब मुझे अन्न-जलतक नहीं मिल रहा है। अन्यायके द्वारा एकत्र किये गये धनका उपभोग दूसरे लोग कर रहे होंगे, यह सोच-सोचकर मुझे चैन नहीं मिलता। मैंने कभी ब्राह्मणोंका पूजन नहीं किया और न ही कभी देवार्चन ही किया। फलस्वरूप मेरी ऐसी दशा हुई है। चूँकि मैंने पापोंका ही संचय किया, अतः मैं उसके फलको अकेले ही भोग रहा हूँ। मैं अपने किये दुष्कर्मोंका ही फल भोग रहा हूँ। अतः हे मुनीश्वर ! यदि ऐसा कोई उपाय हो तो आप उसे बतायें, जिससे इस दुर्गतिसे मेरा उद्धार हो।

विपीतमुनि बोले—सीरभद्र ! दस जन्म पहले तुमने भगवान् अच्युतकी आराधनाकी इच्छासे सुकृत-द्रादशीका उपवास किया था, उसके प्रभावसे इस पापके बहुत बड़े भागका क्षय हो गया है, अब तुम्हें अल्पकालमें ही उत्तम गति प्राप्त होगी। यह द्रादशी-व्रत पापोंका क्षय तथा पुण्यका संचार करनेवाला है, इसी कारण इसका नाम सुकृत-द्रादशी है। इस तरह सीरभद्रको आश्वस्त कर विपीतमुनि अपने आश्रमको चले गये और सीरभद्र भी द्रादशीव्रतके फलस्वरूप थोड़े कालके अनन्तर मोक्षको प्राप्त हो गया।

इतना कहकर श्रीकृष्णभगवान् बोले—हे महाराज ! यह उपवासका प्रभाव है कि इतना पाप थोड़े ही कालमें क्षय हुआ, इसलिये मनुष्यको पुण्यके लिये सदा यत्न करना चाहिये और अपने कल्याणके लिये उपवासादि करते रहना चाहिये।

राजा युधिष्ठिरने पूछा—श्रीकृष्णचन्द्र ! पापोंसे अति दारुण नरककी यातना भोगनी पड़ती है।

ऐसा कौन-सा व्रत है, जिससे सब पाप नष्ट हो जायँ और मोक्ष प्राप्त हो।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज ! फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी एकादशीको उपवास कर काम, क्रोध, लोभ, मोह, दम्भ आदिका त्यागकर संसारकी असारताकी भावना करता हुआ 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर-मन्त्रका जप करना चाहिये और इसी भाँति द्रादशीको भी भगवान् मधुसूदनकी पूजा आदि करनी चाहिये। प्रथम चार (फाल्गुनसे ज्येष्ठ) मासके पारणमें चाँदी, ताँबे अथवा मृत्तिकाके पात्रोंमें यव भरकर ब्राह्मणोंको देना चाहिये। आषाढ़ादि द्वितीय पारणमें घृतपात्र देना चाहिये और कार्तिकदि चार मासमें तिलपात्र ब्राह्मणोंको अर्पण करना चाहिये। भगवान्की पूजाके अनन्तर उनके अनुग्रहकी प्राप्तिके लिये प्रार्थना करनी चाहिये। तदनन्तर भोजन करना चाहिये। वर्ष पूरा होनेपर सुवर्णकी विष्णु-प्रतिमा बनवाकर उसे पूजित कर वस्त्र, सुवर्ण, दक्षिणासहित सवत्साधेनु ब्राह्मणोंको देना चाहिये। इस विधिसे जो पुरुष अथवा स्त्री इस सुकृत-द्रादशीका व्रत करता है, वह कभी नरकको नहीं प्राप्त होता। नारायणके भक्तको कभी नरककी बाधा नहीं होती। विष्णुका नाम उच्चारण करते ही समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, फिर नरकके भयका तो प्रश्न ही नहीं उठता। इसी प्रकार वासुदेव नारायणके नामोंका उच्चारण करनेवाला कभी भी यमका मुख नहीं देखता। अतः भगवान्के पवित्र नामोंका उच्चारण करना चाहिये। (अध्याय ८२)

धरणी-व्रत ( अर्चावतार-व्रत )

राजा युधिष्ठिरने कहा—भगवन् ! वेदोंमें यह कहा गया है कि विधिपूर्वक यज्ञ करने, बड़े-बड़े दान देने और कठिन परिश्रम करनेसे परमेश्वरकी प्राप्ति होती है, किंतु कलियुगके

प्राणी, जो न दान दे सकते हैं और न ही यज्ञ करनेमें समर्थ हैं, उनकी मुक्ति किस प्रकार हो सकती है, यदि कोई उपाय हो तो आप उसे बतायें।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— राजन्! मैं आपको एक रहस्यपूर्ण बात बतलाता हूँ। प्रलयके समय जब धरणी (पृथ्वी) जलमें निमग्न होकर रसातल चली गयी, तब उस समय धरणीदेवीने अपने उद्धारके लिये व्रत किया था। व्रतके प्रभावसे प्रसन्न होकर भगवान् नारायणने वाराहरूप धारणकर उसे पुनः अपने स्थानपर लाकर स्थापित कर दिया। उस व्रतका विधान इस प्रकार है—

व्रतीको मार्गशीर्ष मासके कृष्ण पक्षकी दशमीको प्रातःकाल नित्य-स्नानादि क्रियाओंको सम्पन्न कर देवार्चन एवं हवनादि कर्म विधिपूर्वक करने चाहिये। उस दिन पवित्र, अत्यल्प हविष्यान्न-भोजन करना चाहिये। अनन्तर पुनः पाँच पग चलकर हाथ-पाँव धोकर पवित्र हो क्षीर-वृक्षके आठ अंगुलके दातूनसे दन्तधावन कर आचमन करना चाहिये। जलसे अङ्गोंका स्पर्शकर भगवान् जनार्दनका ध्यान करते हुए वह दिन व्यतीत करना चाहिये। एकादशीको निराहार रहकर भगवान्के नामोंका जप करना चाहिये। द्वादशीको प्रातः नदी आदिके पवित्र जलमें स्नान करना चाहिये। स्नानसे पूर्व नदी, तालाब अथवा शुद्ध एवं पवित्र स्थानकी मृत्तिका ग्रहण करनी चाहिये, मृत्तिका ग्रहण करते समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—

धारणं पोषणं त्वतो भूतानां देवि सर्वदा।

तेन सत्त्वेन मां पाहि पापान्मोचय सुव्रते॥

(उत्तरपर्व ८३।१७)

‘देवि सुव्रते! जिस शक्तिके द्वारा आप समस्त स्थावर-जंगमात्मक प्राणियोंका धारण-पोषण करती हैं, उसी शक्तिके द्वारा मुझे पापोंसे मुक्त कीजिये तथा सदा मेरा पालन कीजिये।’

पुनः उस मिट्टीको सूर्यको दिखाकर, शरीरमें लगाकर स्नान करे। तदनन्तर आचमनकर देवमन्दिरमें जाकर भगवान् नारायणके अङ्गोंकी पूजा करे। नारायणके आगे चार जलपूर्ण घटोंमें चार समुद्रोंकी

परिकल्पनाकर स्थापना करे। उन घटोंपर तिलपूर्ण पूर्णपात्र स्थापित करे। घटोंके मध्य एक पीठके ऊपर जलपात्रमें सुवर्ण, चाँदी अथवा काष्ठकी मत्स्यभगवान्की प्रतिमा बनाकर स्थापित करे। यथाविधि उपचारोंसे उनका पूजनकर प्रार्थना करे। रात्रिमें वहीं जागरण करे। प्रभातमें चारों घटोंको ऋग्वेदी, यजुर्वेदी, सामवेदी तथा अथर्ववेदी चार ब्राह्मणोंकी पूजाकर उन्हें निवेदित करे। जलपात्रमें स्थापित भगवान् मत्स्यकी प्रतिमा ब्राह्मण-दम्पतिको प्रदान करे। ब्राह्मणोंको पायसात्रसे संतुप्त कर पश्चात् स्वयं भी भोजन करे। राजन्! इस विधिसे जो मार्गशीर्ष कृष्ण द्वादशीका व्रत करता है, उसे दीर्घ आयुकी प्राप्ति होती है। जन्मान्तरमें किये गये ब्रह्महत्या आदि महापातकोंसे उसकी मुक्ति हो जाती है। यदि निष्कामभावसे व्रत करता है तो उसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं।

इसी प्रकार स्नानादि कर पौष मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवास कर भगवान् जनार्दनकी कूर्मरूपमें पूजा करनी चाहिये। माघ मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवासपूर्वक भगवान् वराहकी प्रतिमाका पूजनकर ब्राह्मणको दान करना चाहिये। इसी प्रकार फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवासपूर्वक भगवान् नरसिंहकी प्रतिमाका, चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको भगवान् वामनकी प्रतिमाका, वैशाख शुक्ल द्वादशीको परशुरामजीकी प्रतिमाका, ज्येष्ठ मासकी शुक्ल द्वादशीको भगवान् राम-लक्ष्मणकी प्रतिमाका, आषाढ़ शुक्ल द्वादशीको भगवान् वासुदेव (कृष्ण)-की प्रतिमाका, श्रावण मासकी शुक्ल द्वादशीको बुद्धभगवान्की तथा भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवासपूर्वक भगवान् कल्किकी प्रतिमाका यथाविधि अङ्ग-पूजन आदि कर घटोंकी स्थापना करके पूजित प्रतिमा आदि ब्राह्मणोंको निवेदित कर देनी चाहिये।

इस प्रकार दस मासोंमें भगवान्के दशावतारोंका

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उत्तरपर्व

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पूजनकर पूर्व-विधानसे आश्विन शुक्ल द्वादशीको उपवासपूर्वक भगवान् पद्मनाभकी तथा कार्तिक द्वादशीको वासुदेवकी पूजा करनी चाहिये। अन्तमें प्रतिमा तथा घटोंको ब्राह्मणको निवेदित कर दे। उन्हें भोजन कराकर, दक्षिणा प्रदान करे तथा दीनों, अनार्थोंको भी भोजन-वस्त्र आदिसे संतुष्ट करना चाहिये और फिर स्वयं भी भोजन करना चाहिये।

राजन्! इस प्रकार द्वादश मासोंमें जो इस व्रतको करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णु-सायुज्यको प्राप्त करता है। धरणीदेवीने इस व्रतको किया था। इसीलिये यह धरणी-व्रतके नामसे प्रसिद्ध हुआ। प्राचीन कालमें दक्षप्रजापतिने इस व्रतका

अनुष्ठानकर प्रजाओंका अधिपतित्व प्राप्त किया था। राजा युवनाश्वने इस व्रतके अनुष्ठानसे मान्थाता नामक श्रेष्ठ पुत्रको प्राप्तकर अन्तमें शाश्वत ब्रह्मपद प्राप्त किया था। इसी प्रकार हैहयाधिपति कृतवीर्यने इस व्रतके प्रभावसे महान् पराक्रमी चक्रवर्ती राजा सहस्त्रार्जुनको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था। शकुन्तलाने भी इस व्रतके प्रभावसे राजर्षि दुष्यन्तको पतिरूपमें तथा श्रेष्ठ भरतको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था। इसी प्रकार अन्य कई श्रेष्ठ चक्रवर्ती राजाओं तथा श्रेष्ठ पुरुषोंने इस व्रतके प्रभावसे उत्तम फल प्राप्त किया था। जो भी इसे करता है, भगवान् नारायण उसका उद्धार कर देते हैं१। (अध्याय ८३)

विशोकद्वादशी-व्रत और गुड-धेनु२ आदि दस धेनुओंके दानकी विधि तथा उसकी महिमा

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! इस भूतलपर कौन ऐसा उपवास या व्रत है, जो मनुष्यके अभीष्ट वस्तुओंके वियोगसे उत्पन्न शोकसमूहसे उद्धार करनेमें समर्थ, धन-सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाला और संसार-भयका नाशक है।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! आपने जिस व्रतके विषयमें प्रश्न किया है, वह समस्त जगत्को प्रिय तथा इतना महत्त्वशाली है कि देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। यद्यपि इन्द्र, असुर और मानव भी उसे नहीं जानते तथापि आप-जैसे भक्तिमान्के प्रति मैं अवश्य उसका वर्णन करूँगा। उस पुण्यप्रद व्रतका नाम विशोकद्वादशी-व्रत है। विद्वान् व्रतीको आश्विन मासमें दशमी तिथिके दिन अल्प आहार करके नियमपूर्वक इस व्रतका आरम्भ करना चाहिये। पुनः एकादशीके दिन व्रती उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर दातुन करे, फिर (स्नान आदिसे निवृत्त होकर) निराहार रहकर

भगवान् केशव और लक्ष्मीकी विधिपूर्वक भलीभाँति पूजा करे और 'दूसरे दिन भोजन करूँगा'—ऐसा नियम लेकर रात्रिमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर सर्वौषधि और पञ्चगव्य मिले जलसे स्नान करे तथा श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करके भगवान् विष्णुकी कमल-पुष्पोंद्वारा पूजा करे। पूजन करनेके पश्चात् एक मण्डल बनाकर मिट्टीसे वेदीका निर्माण कराये। वह वेदी बीस अंगुल लम्बी-चौड़ी, चारों ओरसे चौकोर, उत्तरकी ओर ढालू, चिकनी और सुन्दर हो। तत्पश्चात् बुद्धिमान् व्रती सूपमें नदीकी बालुकासे लक्ष्मीकी मूर्ति अङ्कित करे और उस सूपको वेदीपर रखकर 'देव्यै नमः', 'शान्त्यै नमः', 'लक्ष्म्यै नमः', 'श्रियै नमः', 'पुष्ट्यै नमः', 'तृष्ट्यै नमः', 'दृष्ट्यै नमः', 'हृष्ट्यै नमः' के उच्चारणपूर्वक लक्ष्मीकी अर्चना करे और यों प्रार्थना करे—'विशोका (लक्ष्मीदेवी) मेरे दुःखोंका नाश करें, विशोका मेरे लिये वरदायिनी हों, विशोका

१-वाराहपुराणके ३९वें अध्यायसे ५०वें तक ठीक इसी प्रकार इन द्वादश द्वादशी-व्रतोंकी कथा एवं व्रत-विधिका विस्तारसे वर्णन हुआ है।

२-यह विषय मत्स्यपुराण ८२, पद्मपु १। २१, वराहपुराण १०२, कृत्यकल्पतरु ५, दानकाण्ड पृ १४१ तथा दानमयूख, दानसागरादिमें विशेष शुद्धरूपसे उद्धृत हैं। तदनुसार इसे भी शुद्ध किया गया है।

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४८०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

मुझे संतति दें और विशोका मुझे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करें।' तदनन्तर श्वेत वस्त्रोंसे सूपको परिवेष्टित कर नाना प्रकारके फलों, वस्त्रों और स्वर्णमय कमलोंसे लक्ष्मीकी पूजा करे। चतुर व्रती सभी रात्रियोंमें कुशोदक-पान करे और सारी रात नृत्य-गीत आदिका आयोजन कराये। तीन पहर रात व्यतीत होनेपर व्रती मनुष्य स्वयं नींद त्यागकर जग जाय और अपनी शक्तिके अनुसार शय्यापर सोते हुए तीन या एक द्विज-दम्पतिके पास जाकर वस्त्र, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे 'जलशायिने नमोऽस्तु' जलशायी भगवान्को नमस्कार है—यों कहकर उनकी पूजा करे। इस प्रकार रातमें गीत-वाद्य आदि कराकर जागरण करे तथा प्रातःकाल स्नान कर पुनः द्विज-दम्पतिका पूजन करे और कृपणता छोड़कर अपनी सामर्थ्यके अनुकूल उन्हें भोजन कराये। फिर स्वयं भोजन करके पुराणोंकी कथाएँ सुनते हुए वह दिन व्यतीत करे। प्रत्येक मासमें इसी विधिसे सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये।

इस प्रकार व्रतकी समाप्तिके अवसरपर गद्वा, चादर, तकिया आदि उपकरणोंसे युक्त एक सुन्दर शय्या गुड-धेनुके साथ दान करके इस प्रकार प्रार्थना करे—'देवेश! जिस प्रकार लक्ष्मी आपका परित्याग करके अन्यत्र नहीं जाती, उसी प्रकार सौन्दर्य, नीरोगता और निःशोकता सदा मुझे निरवच्छिन्नरूपसे प्राप्त हों—मेरा परित्याग न करें और भगवान् केशवके प्रति उत्तम भक्ति प्राप्त हो।' वैभवकी अभिलाषा रखनेवाले व्रतीको समन्त्र गुड-धेनुसहित शय्या और लक्ष्मीसहित सूप-दान करना चाहिये। इस व्रतमें कमल, करवीर (कनेर), बाण (नीलकुसुम या अगस्त्य-वृक्षका पुष्प), ताजा (बिना कुम्हलाया हुआ) कुंकुम, केसर, सिंदुवार, मल्लिका, गन्धपाटला, कदम्ब, कुब्जक और

जाती—ये पुष्प सदा प्रशस्त माने गये हैं।

युधिष्ठिरने पुनः पूछा—जगत्पते! अब आप मुझे (विशोकद्वादशीके प्रसङ्गमें निर्दिष्ट) गुड-धेनुका विधान बतलाइये। साथ ही यह भी बतलानेकी कृपा कीजिये कि गुड-धेनुका रूप कैसा होता है और उसे किस मन्त्रका पाठ करके दान करना चाहिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! इस लोकमें गुड-धेनुके विधानका जो रूप है और उसका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसे मैं बतला रहा हूँ। गुड-धेनुका दान समस्त पापोंका विनाशक है। गुड-धेनुका दान करनेके दिन गोबरसे भूमिको लीप-पोतकर सब ओरसे कुश बिछाकर उसपर चार हाथ लम्बा काला मृगचर्म स्थापित कर दे, जिसका अग्रभाग पूर्व दिशाकी ओर हो। तदनन्तर एक छोटे मृगचर्ममें बछड़ेकी कल्पना करके उसीके निकट रख दे। फिर उसमें पूर्वमुख और उत्तर पैरवाली सवत्सा गौकी कल्पना करे। चार भार२ गुडसे बनी हुई गुड-धेनु सदा उत्तम मानी गयी है। उसका बछड़ा एक भार गुडका बनाना चाहिये। अपने गृहकी सम्पत्तिके अनुसार इस (गौ)—का निर्माण कराना चाहिये। इस प्रकार गौ और बछड़ेकी कल्पना करके उन्हें श्वेत एवं महीन वस्त्रसे आच्छादित कर दे। फिर घीसे उनके मुखकी, सीपसे कानोंकी, गन्नेसे पैरोंकी, श्वेत मोतीसे नेत्रोंकी, श्वेत सूतसे नाड़ियोंकी, श्वेत कम्बलसे गल-कम्बलकी, लाल रंगके चिह्नेसे पीठकी, श्वेत रंगके मृगपुच्छके बालोंसे रोएँकी, मूँगेसे दोनों भौँहोंकी, मक्खनसे दोनों स्तनोंकी, रेशमके धागेसे पूँछकी, काँसासे दोहनीकी, इन्द्रनीलमणिसे आँखोंकी तारिकाओंकी, सुवर्णसे सींगके आभूषणोंकी, चाँदीसे खुरोंकी और नाना प्रकारके फलोंसे नासापुटोंकी रचना कर धूप, दीप, आदिद्वारा उनकी अर्चना करनेके पश्चात् यों प्रार्थना करे—

१-विशोका दुःखनाशाय विशोका वरदास्तु मे। विशोका चास्तु संतत्यै विशोका सर्वसिद्धये ॥ (उत्तरपर्व ८४।१६)

२- दो हजार पल अर्थात् तीन मनके वजनको 'भार' कहते हैं।

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  • उत्तरपर्व *

४८१

‘जो समस्त प्राणियों तथा देवताओंमें निवास करनेवाली लक्ष्मी हैं, धेनुरूपसे वही देवी मेरे पापोंका विनाश करें। जो लक्ष्मी विष्णुके वक्षःस्थलपर विराजमान हैं, जो स्वाहारूपसे अग्निकी पत्नी हैं तथा जो चन्द्र, सूर्य और इन्द्रकी शक्तिरूपा हैं, वे ही धेनुरूपसे मेरे लिये सम्पत्तिदायिनी हों। जो ब्रह्माकी, कुबेरकी तथा लोकपालोंकी लक्ष्मी हैं, वे धेनुरूपसे मेरे लिये वरदायिनी हों। जो लक्ष्मी प्रधान पितरोंके लिये स्वधारूपा, यज्ञभोजी अग्नियोंके लिये स्वाहारूपा तथा समस्त पापोंको हरनेवाली धेनुरूपा हैं, वे मुझे ऐश्वर्य प्रदान करें।’ इस प्रकार उस गुड-धेनुको आमन्त्रित कर उसे ब्राह्मणको निवेदित कर दे। यही विधान घृत-तिल आदि सम्पूर्ण धेनुओंके दानके लिये कहा गया है।

नरेश्वर! अब जो दस पापविनाशिनी गौएँ बतलायी गयी हैं, उनका नाम और स्वरूप बतला रहा हूँ। पहली गुड-धेनु, दूसरी घृत-धेनु, तीसरी तिल-धेनु, चौथी मधु-धेनु, पाँचवीं जल-धेनु, छठी क्षीर-धेनु, सातवीं शर्करा-धेनु, आठवीं दधि-

धेनु, नवीं रस-धेनु और दसवीं स्वरूपतः प्रत्यक्ष धेनु है। सदा पर्व-पर्वपर अपनी श्रद्धाके अनुसार मन्त्रोच्चारणपूर्वक आवाहनसहित इन गौओंका दान करना चाहिये, क्योंकि ये सभी भोग और मोक्षरूप फलको प्रदान करनेवाली हैं। ये सभी सम्पूर्ण यज्ञोंका फल प्रदान करनेवाली, कल्याणकारिणी और पापहारिणी हैं। चूँकि इस लोकमें विशोकद्वादशी-व्रत सभी व्रतोंमें श्रेष्ठ माना गया है, इसलिये उसका अङ्ग होनेके कारण गुड-धेनु भी प्रशस्त मानी गयी है। उत्तरायण और दक्षिणायनके दिन, पुण्यप्रद विषुवयोग, व्यतीपातयोग अथवा सूर्य-चन्द्रके ग्रहण आदि पर्वोंपर इन गुड-धेनु आदि गौओंका दान करना चाहिये। यह विशोकद्वादशी पुण्यदायिनी, पापहारिणी और मङ्गलकारिणी है। इसका व्रत करके मनुष्य विष्णुके परमपदको प्राप्त हो जाता है तथा इस लोकमें सौभाग्य, नीरोगता और दीर्घायु प्राप्तकर अन्तमें श्रीहरिका स्मरण करता हुआ विष्णुलोक प्राप्त करता है।

(अध्याय ८४)

विभूतिद्वादशी *-व्रतमें राजा पुष्पवाहनकी कथा

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! अब मैं भगवान् विष्णुके विभूतिद्वादशी नामक सर्वोत्तम व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो सम्पूर्ण देवगणोंद्वारा अभिवन्दित है। बुद्धिमान् मनुष्य कार्तिक, वैशाख, मार्गशीर्ष, फाल्गुन अथवा आषाढ़ मासमें शुक्ल पक्षकी दशमी तिथिको स्वल्पाहार कर सायंकालिक संध्योपासनासे निवृत्त हो इस प्रकारका नियम ग्रहण करे—‘प्रभो! मैं एकादशीको निराहार रहकर भगवान् जनार्दनकी भलीभाँति अर्चना करूँगा और द्वादशीके दिन ब्राह्मणके साथ बैठकर भोजन करूँगा। केशव! मेरा यह नियम

निर्विघ्नतापूर्वक पूर्ण हो जाय और फलदायक हो।’ फिर रातमें ‘ॐ नमो नारायणाय’ मन्त्रका जप करते हुए सो जाय। प्रातःकाल उठकर स्नान-जप आदि करके पवित्र हो श्वेत पुष्पोंकी माला एवं चन्दन आदिसे भगवान् पुण्डरीकाक्षका पूजन करे।

एक वर्षतक प्रतिमास क्रमशः भगवान्के दस अवतारों तथा दत्तात्रेय और व्यासकी स्वर्णमयी प्रतिमाका स्वर्णनिर्मित कमलके साथ दान करना चाहिये। उस समय छल, कपट, पाखण्ड आदिसे दूर रहना चाहिये। राजन्! इस प्रकार यथाशक्ति बारहों द्वादशी-व्रतोंको

  • इस व्रतका वर्णन मत्स्यपु० ९९-१००, पद्मपु० सूष्टि ख० २०। १-४२, विष्णुधर्मो, व्रतराज, व्रतकल्पद्रुम आदिमें भी यों ही प्राप्त होता है। पाद्रीय कथामें तीर्थगुरु पुष्करक्षेत्रका भी सम्बन्ध प्रदृष्ट है।

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४८२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

समाप्त कर वर्षके अन्तमें गुरुको लवणपर्वतके साथ-साथ गौसहित शय्या-दान करना चाहिये। व्रती यदि सम्पत्तिशाली हो तो उसे वस्त्र, शृङ्गार-सामग्री और आभूषण आदिसे गुरुकी विधिपूर्वक पूजा कर ग्राम अथवा गृहके साथ-साथ भूमिका दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार अन्यान्य ब्राह्मणोंको भी भोजन कराकर उन्हें वस्त्र, गोदान, रत्नसमूह और धनराशियोंद्वारा संतुष्ट करना चाहिये। स्वल्प धनवाला व्रती अपनी सामर्थ्यके अनुसार दान करे तथा जो व्रती परम निर्धन हो, किंतु भगवान् माधवके प्रति उसकी प्रगाढ़ निष्ठा हो तो उसे तीन वर्षतक पुष्पार्चनकी विधिसे इस व्रतका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे विभूतिद्रादशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह स्वयं पापसे मुक्त होकर अपने सौ पीढ़ियोंतकके पितरोंको तार देता है। उसे एक लाख जन्मोंतक न तो शोकरूप फलका भागी होना पड़ता है, न व्याधि और दरिद्रता ही घेरती है तथा न बन्धनमें ही पड़ना पड़ता है। वह प्रत्येक जन्ममें विष्णु अथवा शिवका भक्त होता है। राजन्! जबतक एक सौ आठ सहस्र युग नहीं बीत जाते, तबतक वह स्वर्गलोकमें निवास करता है और पुण्य-क्षीण होनेपर पुनः भूतलपर राजा होता है।

भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा— महाराज! बहुत पहले रथन्तरकल्पमें पुष्पवाहन नामका एक राजा हुआ था, जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात तथा तेजमें सूर्यके समान था। उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर ब्रह्मने उसे एक सोनेका कमल (—रूप विमान) प्रदान किया था, जिससे वह इच्छानुसार जहाँ-कहीं भी आ-जा सकता था। उसे पाकर उस समय राजा पुष्पवाहन अपने नगर एवं जनपदवासियोंके साथ उसपर आरूढ़ होकर स्वेच्छानुसार देवलोकमें तथा सातों द्वीपोंमें विचरण किया करता था, कल्पके आदिमें

पुष्करनिवासी उस पुष्पवाहनका सातवें द्वीपपर अधिकार था, इसीलिये लोकमें उसकी प्रतिष्ठा थी और आगे चलकर वह द्वीप पुष्करद्वीपके नामसे कहा जाने लगा। चूँकि देवेश्वर ब्रह्मने इसे कमलरूप विमान प्रदान किया था, इसलिये देवता एवं दानव उसे पुष्पवाहन कहा करते थे। तपस्याके प्रभावसे ब्रह्माद्वारा प्रदत्त कमलरूप विमानपर आरूढ़ होनेपर उसके लिये त्रिलोकीमें कोई भी स्थान अगम्य न था। नरेन्द्र! उसकी पत्नीका नाम लावण्यवती था। वह अनुपम सुन्दरी थी तथा हजारों नारियोंद्वारा चारों ओरसे समादृत होती रहती थी। वह राजाको उसी प्रकार अत्यन्त प्यारी थी, जैसे शंकरजीको पार्वतीजी परम प्रिय हैं। उसके दस हजार पुत्र थे, जो परम धार्मिक और धनुर्धारियोंमें अग्रगण्य थे। अपनी इन सारी विभूतियोंपर बारम्बार विचारकर राजा पुष्पवाहन विस्मय-विमुग्ध हो जाता था। एक बार (प्रचेताके पुत्र) मुनिवर वाल्मीकि* राजाके यहाँ पधारे। उन्हें आया देखकर राजाने उनसे इस प्रकार प्रश्न किया—

राजा पुष्पवाहने पूछा— मुनीन्द्र! किस कारणसे मुझे यह देवों तथा मानवोंद्वारा पूजनीय निर्मल विभूति तथा अपने सौन्दर्यसे समस्त देवाङ्गनाओंको पराजित कर देनेवाली सुन्दरी भार्या प्राप्त हुई है। मेरे थोड़े-से तपसे संतुष्ट होकर ब्रह्मने मुझे ऐसा कमल-गृह क्यों प्रदान किया, जिसमें अमात्य, हाथी, रथसमूह और जनपदवासियोंसहित यदि सौ करोड़ राजा बैठ जायें तो भी वे जान नहीं पड़ते कि कहाँ चले गये। वह विमान तारागणों, लोकपालों तथा देवताओंके लिये भी अलक्षित-सा रहता है। प्रचेतः! मैंने, मेरी पुत्रीने अथवा मेरी भार्याने पूर्वजन्मोंमें कौन-सा ऐसा कर्म किया है, जिसका प्रभाव आज दिखलायी पड़ रहा है, इसे आप बतलायें।

तदनन्तर महर्षि वाल्मीकि राजाके इस आकस्मिक

  • वाल्मीकीय रामायण, उत्तरकाण्ड १३।१७, १६।१०, १११।११ तथा अध्यात्मरामायण ७।७।३१, बालरामायण, उत्तररामचरित आदिके अनुसार 'प्राचेतस' शब्द महर्षि वाल्मीकिका ही वाचक है।

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  • उत्तरपर्व *

४८३

एवं अद्भुत प्रभावपूर्ण वृत्तान्तको जन्मान्तरसे सम्बन्धित जानकर इस प्रकार कहने लगे—‘राजन्! तुम्हारा पूर्वजन्म अत्यन्त भीषण व्याधके कुलमें हुआ था। एक तो तुम उस कुलमें पैदा हुए, फिर दिन-रात पापकर्ममें भी निरत रहते थे। तुम्हारा शरीर भी कठोर अङ्ग संधियुक्त तथा बेडौल था। तुम्हारी त्वचा दुर्गन्धयुक्त थी और नख बहुत बड़े हुए थे। उससे दुर्गन्ध निकलती थी और तुम बड़े कुरूप थे। उस जन्ममें न तो तुम्हारा कोई हितैषी मित्र था, न पुत्र और न भाई-बन्धु ही थे, न पिता-माता और बहिन ही थी। भूपाल! केवल तुम्हारी यह परम प्रियतमा पत्नी ही तुम्हारी अभीष्ट परमानुकूल संगिनी थी। एक बार कभी भयंकर अनावृष्टि हुई, जिसके कारण अकाल पड़ गया। उस समय भूखसे पीड़ित होकर तुम आहारकी खोजमें निकले, परंतु तुम्हें कुछ भी जंगली (कन्द-मूल) फल आदि कोई खाद्य वस्तु प्राप्त न हुई। इतनेमें ही तुम्हारी दृष्टि एक सरोवरपर पड़ी, जो कमलसमूहसे मण्डित था। उसमें बड़े-बड़े कमल खिले हुए थे। तब तुम उसमें प्रविष्ट होकर बहुसंख्यक कमल-पुष्पोंको लेकर वैदिश* नामक नगर (विदिशा नगरी) में चले गये। वहाँ तुमने उन कमल-पुष्पोंको बेचकर मूल्य-प्राप्तिके हेतु पूरे नगरमें चक्कर लगाया। सारा दिन बीत गया, पर उन कमल-पुष्पोंका कोई खरीददार न मिला। उस समय तुम भूखसे अत्यन्त व्याकुल और थकावटसे अतिशय क्लान्त होकर पत्नीसहित एक महलके प्राङ्गणमें बैठ गये। वहाँ रात्रिमें तुम्हें महान् मङ्गल शब्द सुनायी पड़ा। उसे सुनकर तुम पत्नीसहित उस स्थानपर गये, जहाँ वह मङ्गल शब्द हो रहा था। वहाँ मण्डपके मध्यभागमें भगवान् विष्णुकी पूजा हो रही थी। तुमने उसका अवलोकन किया। वहाँ अनङ्गवती नामकी वेश्या माघ मासकी विभूतिद्वादशी-व्रतकी समाप्ति कर अपने गुरुको भगवान् हृषीकेशका विधिवत् शृङ्गार कर स्वर्णमय

कल्पवृक्ष, श्रेष्ठ लवणाचल और समस्त उपकरणोंसहित शय्याका दान कर रही थी। इस प्रकार पूजा करती हुई अनङ्गवतीको देखकर तुम दोनोंके मनमें यह विचार जाग्रत् हुआ कि इन कमलपुष्पोंसे क्या लेना है। अच्छा तो यह होता कि इनसे भगवान् विष्णुका शृङ्गार किया जाता। नरेश्वर! उस समय तुम दोनों पति-पत्नीके मनमें ऐसी भक्ति उत्पन्न हुई और इसी अर्चाके प्रसङ्गमें तुम्हारे उन पुष्पोंसे भगवान् केशव और लवणाचलकी अर्चना सम्पन्न हुई तथा शेष पुष्प-समूहोंसे तुम दोनोंने शय्याको भी सब ओरसे सुसज्जित किया।

तुम्हारी इस क्रियासे अनङ्गवती बहुत प्रसन्न हुई। उस समय उसने तुम दोनोंको इसके बदले तीन सौ अशर्फियाँ देनेका आदेश दिया, पर तुम दोनोंने बड़ी दृढ़तासे उस धन-राशिको अस्वीकार कर दिया। भूपते! तब अनङ्गवतीने तुम्हें (भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चोष्य) चार प्रकारका अन्न लाकर दिया और कहा—‘भोजन कीजिये’, किंतु तुम दोनोंने उसका भी परित्याग कर दिया और कहा—‘वरानने! हमलोग कल भोजन कर लेंगे। दृढ़व्रते! हम दोनों जन्मसे ही पापपरायण और कुकर्म करनेवाले हैं, पर इस समय तुम्हारे उपवासके प्रसङ्गसे हमें विशेष आनन्द प्राप्त हो रहा है।’ उसी प्रसङ्गमें तुम दोनोंको धर्मका लेशांश प्राप्त हुआ और तुम दोनोंने रातभर जागरण भी किया था। (दूसरे दिन) प्रातःकाल अनङ्गवतीने भक्तिपूर्वक अपने गुरुको लवणाचलसहित शय्या और अनेकों गाँव प्रदान किये। उसी प्रकार उसने अन्य बारह ब्राह्मणोंको भी सुवर्ण, वस्त्र, अलंकारादिसहित बारह गौएँ प्रदान कीं। तदनन्तर सुहृद, मित्र, दीन, अंधे और दरिद्रोंके साथ तुम लुब्धक-दम्पतिको भोजन कराया और विशेष आदर-सत्कारके साथ तुम्हें बिदा किया।

राजेन्द्र! वह सपत्नीक लुब्धक तुम्हीं थे, जो

  • यह इतिहास-पुराणदिमें अति प्रसिद्ध विदिशा नामकी नदीके तटपर बसा मध्यप्रदेशके मध्यकालीन इतिहासका बेसनगर, आजकलका भेलसा नगर है। इसपर कनिंघमका ‘भेलसा टौप्स’ ग्रन्थ प्रसिद्ध है।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

इस समय राजराजेश्वरके रूपमें उत्पन्न हुए हो। उस कमल-समूहसे भगवान् केशवका पूजन होनेके कारण तुम्हारे सारे पाप नष्ट हो गये तथा दृढ़ त्याग, तप एवं निर्लोभिताके कारण तुम्हें इस कमलमन्दिरकी भी प्राप्ति हुई है। राजन्! तुम्हारी उसी सात्त्विक भावनाके माहात्म्यसे, तुम्हारे थोड़े-से ही तपसे ब्रह्मरूपी भगवान् जनार्दन तथा लोकेश्वर ब्रह्मा भी संतुष्ट हुए हैं। इसीसे तुम्हारा पुष्कर-मन्दिर स्वेच्छानुसार जहाँ-कहीं भी जानेकी शक्तिसे युक्त है। वह अनङ्गवती वेश्या भी इस समय कामदेवकी पत्नी रतिके* सौतरूपमें उत्पन्न हुई है। यह इस समय प्रीति नामसे विख्यात है और समस्त लोकोंमें सबको आनन्द प्रदान करती तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा सत्कृत है। इसलिये राजराजेश्वर! तुम उस पुष्कर-गृहको भूलपर छोड़ दो और गङ्गातटका आश्रय लेकर विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करो।

उससे तुम्हें निश्चय ही मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी।

श्रीकृष्णने कहा— महाराज! ऐसा कहकर प्रचेतामुनि वहीं अन्तर्हित हो गये। तब राजा पुष्पवाहनने मुनिके कथनानुसार सारा कार्य सम्पन्न किया। राजन्! इस विभूतिद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करते समय अखण्ड-व्रतका पालन करना आवश्यक है। जिस किसी भी प्रकारसे हो सके, बारहों द्वादशियोंका व्रत कमल-पुष्पोंद्वारा सम्पन्न करना चाहिये। अन्ध! अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको दक्षिणा भी देनेका विधान है। इसमें कृपणता नहीं करनी चाहिये, क्योंकि भक्तिसे ही भगवान् केशव प्रसन्न होते हैं। जो मनुष्य पापोंको विदीर्ण करनेवाले इस व्रतको पढ़ता या श्रवण करता है अथवा इसे करनेके लिये सम्मति प्रदान करता है, वह भी सौ करोड़ वर्षोंतक देवलोकमें निवास करता है।

(अध्याय ८५)

मदनद्वादशी-व्रतमें मरुद्रणोंका आख्यान

युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! दिति (दैत्योंकी जननी)-ने जिस व्रतके करनेसे उनचास मरुद्रणोंको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था, अब मैं आपसे उस मदनद्वादशी-व्रतके विषयमें सुनना चाहता हूँ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! पूर्वकालमें वसिष्ठ आदि महर्षियोंने दितिसे जिस उत्तम मदनद्वादशी-व्रतका वर्णन किया था, उसीको आप मुझसे विस्तारपूर्वक सुनिये। व्रतधारीको चाहिये कि वह चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिको श्वेत चावलोंसे परिपूर्ण एवं छिद्ररहित एक घट स्थापित करे। उसपर श्वेत चन्दनका अनुलेप लगा हो तथा वह श्वेत वस्त्रके दो टुकड़ोंसे आच्छादित हो। उसके निकट विभिन्न प्रकारके ऋतुफल और

गन्नेके टुकड़े रखे जायँ। वह विविध प्रकारकी खाद्य-सामग्रीसे युक्त हो तथा उसमें यथाशक्ति सुवर्ण-खण्ड भी डाला जाय। तत्पश्चात् उसके ऊपर गुड़से भरा हुआ ताँबेका पात्र स्थापित करे। उसके ऊपर केलेके पत्तेपर काम तथा उसके वामभागमें शक्करसमन्वित रतिकी स्थापना करे। फिर गन्ध, धूप आदि उपचारोंसे उनकी पूजा करे और गीत, वाद्य तथा भगवान् विष्णुकी कथाका आयोजन करे। प्रातःकाल वह घट ब्राह्मणको दान कर दे। पुनः भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी नमकरहित भोजन करे और ब्राह्मणोंको दक्षिणा देकर इस प्रकार उच्चारण करे—‘जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहकर

  • हरिवंश एवं अन्य पुराणों तथा कथासरित्सागरादिमें भी रति और प्रीति—ये दो कामदेवकी पत्नियाँ कही गयी हैं। किंतु उसकी दूसरी पत्नी प्रीतिकी उत्पत्तिकी पूरी कथा यही है।

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  • उत्तरपर्व *

४८५

आनन्द नामसे कहे जाते हैं, वे कामरूपी भगवान् जनार्दन मेरे इस अनुष्ठानसे प्रसन्न हों।'

इसी विधिसे प्रत्येक मासमें मदनद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि वह द्वादशीके दिन आम्लक-फल खाकर भूतलपर शयन करे और त्रयोदशीके दिन अविनाशी भगवान् विष्णुका पूजन करे। तेरहवाँ महीना आनेपर घृतधेनु-सहित एवं समस्त सामग्रियोंसे सम्पन्न शय्या, कामदेवकी स्वर्णनिर्मित प्रतिमा और श्वेत रंगकी दुधारू गौ ब्राह्मणको समर्पित करे। उस समय शक्तिके अनुसार वस्त्र एवं आभूषण आदिद्वारा सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके उन्हें शय्या और सुगन्ध आदि प्रदान करते हुए ऐसा कहना चाहिये— 'आप प्रसन्न हों।' तत्पश्चात् उस धर्मज्ञ व्रतीको कामदेवके नामोंका कीर्तन करते हुए गोदुग्धसे बनी हुई हवि और श्वेत तिलोंसे हवन करना चाहिये। पुनः कृपणता छोड़कर ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये और उन्हें यथाशक्ति गन्ना तथा पुष्पमाला प्रदानकर संतुष्ट करना चाहिये। जो इस विधिके अनुसार इस मदनद्वादशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुकी समताको प्राप्त हो जाता है तथा इस लोकमें श्रेष्ठ पुत्रोंको प्राप्तकर सौभाग्य-फलका उपभोग करता है।

दितिके इस व्रतानुष्ठानके प्रभावसे प्रभावित होकर महर्षि कश्यप उसके निकट पधारे और परम प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने उसे पुनः रूप-यौवनसे सम्पन्न तरुण बना दिया तथा वर माँगनेके लिये कहा। दितिने कहा— 'पतिदेव! मैं आपसे एक ऐसे पुत्रका वरदान चाहती हूँ, जो इन्द्रका वध करनेमें समर्थ, अमित पराक्रमी और महान् आत्मबलसे सम्पन्न हो।' यह सुनकर महर्षि कश्यपने उससे कहा 'ऐसा ही होगा।'

कश्यपने पुनः उससे कहा— 'वरानने! एक सौ वर्षांतक तुम्हें इसी तपोवनमें रहना है और अपने गर्भकी रक्षाके लिये प्रयत्न करना है। वरवर्णिनि! गर्भिणी स्त्रीको संध्या-कालमें भोजन नहीं करना चाहिये। उसे न तो कभी वृक्षके मूलपर बैठना चाहिये, न उसके निकट ही जाना चाहिये। वह घरकी सामग्री—मूसल, ओखली आदिपर न बैठे, जलमें घुसकर स्नान न करे, सुनसान घरमें न जाय, लोगोंके साथ वाद-विवाद न करे और शरीरको तोड़े-मरोड़े नहीं। वह बाल खेलकर न बैठे, कभी अपवित्र न रहे, उत्तर दिशामें सिरहाना करके एवं कहीं भी नीचे सिर करके न सोये, न नंगी होकर रहे, न उद्विग्रचित रहे, न कभी भीगे चरणोंसे शयन करे, अमङ्गलसूचक वाणी न बोले, अधिक जोरसे हँसे नहीं, नित्य माङ्गलिक कार्योंमें तत्पर रहकर गुरुजनोंकी सेवा करे और (आयुर्वेदद्वारा गर्भिणीके स्वास्थ्यके लिये उपयुक्त बतलायी गयी) सम्पूर्ण औषधियोंसे युक्त गुनगुने गरम जलसे स्नान करे। बुरी स्त्रियोंसे बातचीत न करे, कपड़ेसे हवा न ले। मृतवत्सा स्त्रीके साथ न बैठे, दूसरेके घरमें न जाय, जल्दी-जल्दी न चले, महानदियोंको पार न करे। भयंकर और बीभत्स दृश्य न देखे। अजीर्ण भोजन न करे। कठिन व्यायामादि न करे। औषधियोंद्वारा गर्भकी रक्षा करती रहे, हृदयमें मात्स्यभाव न रखे। जो गर्भिणी स्त्री विशेषरूपसे इन नियमोंका पालन करती है, उसका उस गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह शीलवान् एवं दीर्घायु होता है। इन नियमोंका पालन न करनेपर निस्संदेह गर्भपातकी आशङ्का बनी रहती है। प्रिये! इसलिये तुम इन नियमोंका पालन करके अपने गर्भकी रक्षाका प्रयत्न करो। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जा रहा हूँ।' दितिके द्वारा पतिकी आज्ञा स्वीकार कर लेनेपर महर्षि कश्यप वहाँ अन्तर्धान हो गये।

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४८६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

तब दिति नियमोंका पालन करती हुई समय व्यतीत करने लगी। कालान्तरमें दितिको उनचास पुत्र (मरुद्रण) प्राप्त हुए।

राजन्! इस प्रकारसे जो भी नारी इस मदनह्लादशी-व्रतका अनुष्ठान करेगी, वह पुत्र प्राप्त कर पतिके सुखको प्राप्त करेगी। (अध्याय ८६)

अबाधक-व्रत एवं दौर्भाग्य-दौर्गन्ध्यनाशक-व्रतका माहात्म्य

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! जनशून्य घोर वनमें, समुद्रतरणमें, संग्राममें, चोर आदिके भयमें व्याकुल मनुष्य किस देवताका स्मरण करे, जिससे उस संकटके समय उसकी रक्षा हो सके, यह आप बतायें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! सर्वमङ्गला भगवती श्रीदुर्गादेवीका स्मरण करनेपर पुरुष कभी भी दुःख और भयको प्राप्त नहीं होता। भारत! जब मैं और बलदेवजी अपने गुरु संदीपनिमुनिके यहाँ सब विद्या पढ़ चुके तो उस समय हमने गुरुदक्षिणाके लिये गुरुजीसे प्रार्थना की। तब गुरुजीने हमारा दिव्य प्रभाव जानकर यही कहा—‘प्रभो! मेरा पुत्र प्रभासक्षेत्रमें गया था, वहाँ उसे समुद्रमें किसी प्राणीने मार दिया, उसी पुत्रको गुरुदक्षिणाके रूपमें मुझे प्राप्त कराओ।’ तब हम यमलोकमें गये और वहाँसे गुरुपुत्रको लेकर गुरुजीके समीप आये तथा गुरुदक्षिणाके रूपमें उनका पुत्र उन्हें समर्पित कर दिया। तदनन्तर गुरुको प्रणामकर जब हम चलने लगे, तब गुरुजीने कहा—‘पुत्रो! इस स्थानमें तुम अपने चरणोंका चिह्न बना दो’, हमने गुरुकी आज्ञाके अनुसार वैसा ही किया, फिर हम वापस घर आ गये। उसी दिनसे बलरामजीके दक्षिण पादका, मध्यमें सर्वमङ्गलाका और मेरे वाम चरणचिह्नका पुत्र-प्राप्तिकी कामनासे अथवा अपनी इच्छाओंकी पूर्तिके लिये सभी वहाँ पूजन

करते हैं। प्रत्येक मासको शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको एकभुक्त, नक्तव्रत अथवा उपवास रहकर मृतिका या सुवर्णकी इनकी प्रतिमा बना करके गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, मधु आदिसे जो स्त्री अथवा पुरुष पूजन करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो स्वर्गमें निवास करता है।

राजा युधिष्ठिरने पुनः पूछा—यदुशार्दूल! ऐसा कौन व्रत है, जिसके आचरणसे शरीरका दुर्गन्ध नष्ट हो जाय और दौर्भाग्य भी दूर हो जाय।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! इसी प्रश्नको रानी विष्णुभक्तिने जातूकण्ठ्यमुनिसे पूछा था, तब उन्होंने उनसे कहा—‘देवि! ज्येष्ठ मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीमें पवित्र जलाशयमें स्नान करे और शुद्ध स्थानमें उत्पन्न श्वेत आक, रक्त करवीर तथा निम्ब-वृक्षकी पूजा करे। ये तीनों वृक्ष भगवान् सूर्यको अत्यन्त प्रिय हैं। प्रातःकाल सूर्योदय हो जानेपर भगवान् सूर्यका दर्शनकर उनका अपने हृदयमें ध्यान करे। अनन्तर पुष्प, नैवेद्य, धूप आदि उपचारोंसे उन वृक्षोंकी पूजा करे और पूजनके अनन्तर उन्हें नमस्कार करे।

राजन्! इस विधिसे जो स्त्री-पुरुष इस व्रतको करते हैं, उनके शरीरकी दुर्गन्धि तथा उनका दौर्भाग्य दोनों दूर हो जाते हैं और वे सौभाग्यशाली हो जाते हैं।

(अध्याय ८७-८८)

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  • उत्तरपर्व *

४८७

धर्मराजका समाराधन-व्रत *

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! ऐसा कौन-सा व्रत है, जिसके करनेसे यमराज प्रसन्न हो जायँ और नरकका दर्शन न हो।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! एक बार जब मैं द्वारका-स्थित समुद्रमें स्नान करके बाहर निकला, तब देखा कि मुद्गलमुनि चले आ रहे हैं। उनका तेज सूर्यके समान था और उनके मुखके तपस्तेजसे दिशाएँ उद्घासित हो रही थीं। तब मैंने उनका अर्घ्य, पाद्य आदिसे सत्कार कर आदरपूर्वक उनसे पूछा—‘महाराज! प्राणियोंके लिये अत्यन्त भयदायक नरक तथा यमदूतों आदिका जिससे दर्शन न हो ऐसा कोई व्रत आप मुझसे बतलायें।’ यह सुनकर मुद्गलमुनि भी कुछ विस्मित-से हुए। किंतु बादमें शान्त-मन होकर वे बोले—‘प्रभो! एक बार ऐसा हुआ कि मुझे अकस्मात् मूर्च्छा आ गयी और मैं पृथ्वीपर गिर पड़ा, उस स्थितिमें मैंने देखा कि हाथमें लाठी लिये कुछ लोग आगसे जलते हुए-से मेरे शरीरसे निकलकर बाहर खड़े हुए थे और मेरे हृदयसे एक अँगूठेके बराबर व्यक्तिको बलपूर्वक खींचकर तथा रसिस्योंसे बाँधकर यमपुरीकी ओर ले जा रहे हैं। फिर मैं तत्काल क्या देखता हूँ कि यमराजकी सभा लगी है और लाल-पीले नेत्रोंवाले यमराज सभामें विराजमान हैं तथा कफ, वात, पित्त, ज्वर, मांस, शोथ, फोड़े, फुंसी, भांदर, अक्षिरोग, विषूचिका, गलग्रह आदि अनेकों प्रकारके रोग और मृत्यु उन्हें घेरे हुए हैं और वे सभी मूर्तिमान् होकर यमदेवकी उपासना कर रहे हैं। यमदूत भयंकर शस्त्र धारण किये हैं। कुछ राक्षस, दानव आदि भी वहाँ बैठे हैं। सिंह, व्याघ्र, बिच्छू, दंश, सियार, साँप, उल्लू, कीड़े-

मकोड़े आदि भयंकर जीव-जन्तु वहाँ उपस्थित हैं।’ यमराजने अपने किंकरोंसे पूछा—‘दूतो! तुमलोग यहाँ इन मुद्गलमुनिको क्यों ले आये? मैंने तो मुद्गल क्षत्रियको लानेके लिये कहा था, वह कौंडिन्यनगरका निवासी भीष्मकका पुत्र है, उसकी आयु समाप्त हो चुकी है, इन मुनिको तत्काल छोड़ दो और उसे ही ले आओ।’ यह सुनकर वे दूत कौंडिन्यनगर गये, किंतु वहाँ राजा मुद्गलमें मृत्युके कोई लक्षण न देखकर भ्रान्त होकर पुनः यमलोकमें वापस आये और उन्होंने सारा वृत्तान्त यमराजको बता दिया। इसपर यमराजने उनसे कहा—‘दूतो! जिन पुरुषोंने नरकार्ति-विनाशिनी त्रयोदशीका व्रत किया है, उन्हें यमकिंकर नहीं देख पाते, इसीलिये तुमलोगोंने राजा मुद्गलको पहचाना नहीं।’ पुनः यमदूतोंद्वारा व्रतके विधानको पूछे जानेपर यमराजने उनसे कहा—‘मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको जब रविवार एवं मंगलवार न हो, तब उस दिन तेरह विद्वान् और पवित्र ब्राह्मणों तथा एक पुराणवाचकका वरण करके पूर्वाह्नकालमें उन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख पवित्र आसनपर बैठाये। तिल-तैलसे उनका अभ्यंग करके गन्धकाषाय तथा हलके गरम जलसे उन्हें पृथक्-पृथक् स्नान कराये और उनकी सेवा-शुश्रूषा करे। अनन्तर पूर्वाभिमुख बैठाकर उन्हें शाल्यन्त्र, मुद्गन्त्र, गुडके अपूप तथा सुपक्क व्यञ्जन आदरपूर्वक खिलाये।

पुनः व्रती पवित्र होकर आचमन करे और उन ब्राह्मणोंकी अर्चना करे। ताम्रपात्रमें प्रस्थमात्र (एक पसर या एक सेर) तिल-तण्डुल, दक्षिणा, छत्र, जलपूर्ण कलश आदि उन्हें अलग-अलग प्रदान कर विसर्जित करे।

  • यह कथा स्कन्दपुराणके नामसे अनेक व्रत-निबन्धोंमें संग्रहीत है।

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४८८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

इसी प्रकार वर्षभरतक व्रत करे। कोई मानव यदि आदरपूर्वक एक बार भी इस व्रतको कर ले तो वह मेरे यमलोकका दर्शन नहीं करता। वह मेरी मायासे अदृष्ट रहता है, अन्तमें विमानद्वारा अर्कमण्डलमें प्रवेश कर वह विष्णुपुर और शिवपुरको प्राप्त करता है। यमदूतो! उस राजा मुद्दलने इस त्रयोदशी-व्रतको पहले किया था, इसीलिये तुम सब उस क्षत्रिय-श्रेष्ठका दर्शन नहीं कर पाये।

श्रीकृष्ण! उसी क्षण मेरी मूर्च्छा दूर हो गयी और मैं स्वस्थ हो गया। भगवन्! मैं आपके

दर्शनकी इच्छासे यहाँ आया था, जैसा पहले वृत्तान्त हुआ, वह सब मैंने आपको बतलाया।

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—राजन्! वे मुनि मुझसे इतना कहकर अपने स्थानको चले गये। कौन्तेय! आप भी इस व्रतको करें। इससे आपको यमलोक नहीं जाना पड़ेगा। इसी प्रकार जो कोई स्त्री-पुरुष इस त्रयोदशी-व्रतका श्रद्धापूर्वक आचरण करेंगे, वे सभी पापोंसे मुक्त होकर अपने पुण्य-कर्मके प्रभावसे स्वर्गमें पूजित होंगे और उन्हें कभी यमयातना नहीं सहनी पड़ेगी। (अध्याय ८९)

अनङ्ग-त्रयोदशी-व्रत

युधिष्ठिरने पूछा—संसारसे उद्धार करनेवाले स्वामिन्! आप रूप एवं सौभाग्य प्रदान करनेवाला कोई व्रत बतायें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! शरीरको क्लेश देनेवाले बहुत-से व्रतोंके करनेसे क्या लाभ? अकेले अनङ्ग-त्रयोदशी ही सब दोषोंका शमन एवं समस्त मङ्गलोंकी वृद्धि करनेवाली है। आप इसकी विधि सुनें।

पहले जब भगवान् शंकरने कामदेवको दग्ध कर दिया, तब वह बिना अङ्गके ही सबके शरीरमें निवास करने लगा। कामदेवने इस व्रतको किया था, इसीसे इसका नाम अनङ्ग-त्रयोदशी पड़ा। इस व्रतमें मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको नदी, तडाग आदिमें स्नान कर, जितेन्द्रिय हो, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और कालोद्भूत फलोंसे भगवान् शंकरका 'शशिशेखर' नामसे पूजन करे तथा तिलसहित अक्षतोंसे हवन करे। रात्रिको मधु-प्राशन कर सो जाय। इससे व्रती कामदेवके समान ही सुन्दर हो जाता है और दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। इसी प्रकार पौष मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीमें भगवान् शंकरका

'योगेश्वर' नामसे पूजन कर चन्दनका प्राशन करे तो शरीरमें चन्दनके समान गन्ध हो जाती है और व्रती राजसूय-यज्ञका फल प्राप्त करता है। माघ मासके शुक्ल पक्षकी त्रयोदशीको भगवान् शंकरका 'महेश्वर' नामसे पूजन कर मोतीका चूर्ण भक्षण करे तो उत्तम सौभाग्य प्राप्त करता है। इसी प्रकार फाल्गुनमें 'हरेश्वर' नामसे पूजन कर कंकोलका प्राशन करनेसे अतुल सौन्दर्य प्राप्त होता है। चैत्रमें 'सुरूपक' नामसे पूजन करने और कर्पूर-प्राशन करनेसे व्रती चन्द्रके तुल्य मनोहर हो जाता है एवं महान् सौभाग्य प्राप्त करता है। वैशाखमें 'महारूप' नामसे पूजन कर जातीफल (जायफल)-का प्राशन करे, इससे उत्तम कुलकी प्राप्ति होती है और उसके सब काम सफल हो जाते हैं तथा वह सहस्र गोदानका फल प्राप्त कर ब्रह्मलोकमें निवास करता है। ज्येष्ठमें 'प्रद्युम्न' नामसे पूजन करे और लवंगका प्राशन करे, इससे उत्तम स्थान, श्रेष्ठ लक्ष्मी और सभी सुख-सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं तथा वह एक सौ आठ वाजपेय-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। आषाढ़में 'उमाभर्ता' नामसे पूजन कर तिलोदकका प्राशन करे। इससे उत्तम रूप

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  • उत्तरपर्व *

४८९

प्राप्त होता है तथा वह सौ वर्षतक सुखी जीवन व्यतीत करता है। श्रावणमें 'उमापति' नामसे पूजन कर तिलोंका प्राशन करे, इससे पौण्डरीक-यज्ञका फल प्राप्त होता है। भाद्रपद मासमें 'सद्योजात' नामसे पूजन कर अगुरुका प्राशन करे, इससे वह भूमिपर सबका गुरु बनता है और पुत्र-पौत्र, धन आदि प्राप्त कर बहुत दिन संसारमें सुख भोगकर अन्तमें विष्णुलोकमें पूजित होता है। आश्विन मासमें 'त्रिदशाधिपति' नामसे पूजन कर स्वर्णादकका प्राशन करे तो व्रती उत्तम रूप, सौभाग्य, प्रगल्भता और करोड़ों निष्कंदनका फल प्राप्त करता है। कार्तिकमें 'विश्वेश्वर' नामसे पूजन कर दमन (दौना) फलका प्राशन करे तो व्रती अपने बाहुबलसे समस्त संसारका स्वामी होता है और अन्तमें

शिवलोकमें निवास करता है।

इस प्रकार वर्षभर इस उत्तम व्रतका पालन कर पारणा करनी चाहिये। फिर कलश स्थापित कर उसके ऊपर ताम्रपात्र और उसके ऊपर शिवकी प्रतिमा स्थापित कर श्वेत वस्त्रसे आच्छादित करे। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उसका पूजन कर उसे शिवभक्त ब्राह्मणको प्रदान कर दे। साथ ही पयस्विनी सवत्सा गौ, छाता और यथाशक्ति दक्षिणा देनी चाहिये। इस प्रकार जो इस अनङ्ग-त्रयोदशी-व्रतको करता है और व्रत-पारणाके समय महान् उत्सव करता है वह निष्कण्टक राज्य, आयुष्य, बल, यश तथा सौभाग्य प्राप्त करता है और अन्तमें शिवलोकमें निवास करता है।

(अध्याय ९०)

पाली-व्रत१ एवं रम्भा (कदली)-व्रत

राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! श्रेष्ठ स्त्रियाँ जलपूर्ण तडागों और सरोवरोंमें किस निमित्त स्नान-दान आदि कर्म करती हैं? इसे आप बतायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको बावली, कुएँ, पुष्करिणी तथा बड़े-बड़े जलाशयों आदिके पास पवित्र होकर भगवान् वरुणदेवको अर्घ्य प्रदान करना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि तडागके तटपर जाकर फल, पुष्प, वस्त्र, दीप, चन्दन, महावर, ससधान्य, बिना अग्निके स्पर्शसे पका हुआ अन्न, तिल, चावल, खजूर, नारिकेल, बिजौरा नीबू, नारंगी, अंगूर, दाड़िम, सुपारी आदि उपचारोंसे वारुणीसहित वरुणदेवकी एवं जलाशयकी विधिपूर्वक पूजा करे और उन्हें अर्घ्य प्रदान कर इस प्रकार

उनकी प्रार्थना करे—

वरुणाय नमस्तुभ्यं नमस्ते यादसाम्यते। अपाम्यते नमस्तेऽस्तु रसानाम्यतये नमः॥ मा क्लेदं मा च दीर्गन्ध्यं विरस्यं मा मुखेऽस्तु मे। वरुणो वारुणीभर्ता वरदोऽस्तु सदा मम॥

(उत्तरपर्व ११।७-८)

'जलचर जीवोंके स्वामी वरुणदेव! आपको नमस्कार है। सभी जल एवं जलसे उत्पन्न रस-द्रव्योंके स्वामी वरुणदेव! आपको नमस्कार है। मेरे शरीरमें पसीना, दुर्गन्ध या विरसता२ आदि मेरे मुखमें न हों। वारुणीदेवीके स्वामी वरुणदेव! आप मेरे लिये सदा प्रसन्न एवं वरदायक बने रहें।'

व्रतीको चाहिये कि इस दिन बिना अग्निके पके हुए भोजन अर्थात् फल आदिका भोजन करे।

१-'पाली' शब्द जटिल है, यह कोशोंमें प्रायः नहीं मिलता। इसका अर्थ कूप, तडाग आदि जलाशयोंको रक्षाके लिये बने घेरेसे है। उसीपर बैठकर स्त्रियाँ इस व्रतको सम्पन्न करती हैं। वरुणदेव चूँकि सभी जलोंमें रहते हैं, अतः इसे वहाँ बैठकर करना चाहिये।

२-च्वर आदिसे मुखका स्वाद बिगड़ जाता है, उसे विरसता कहते हैं।

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४९०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

इस विधिसे जो पाली-व्रतको करता है, वह तत्क्षण सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। आयु, यश और सौभाग्य प्राप्त करता है तथा समुद्रके जलकी भाँति उसके धनका कभी अन्त नहीं होता।

भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा— राजन्! अब मैं ब्रह्माजीकी सभामें देवर्षियोंके द्वारा पूछे जानेपर देवलमुनिप्रोक्त रम्भा-व्रतका वर्णन कर रहा हूँ। यह भी भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशीको ही होता है। सभी देवताओं, गन्धर्वों तथा अप्सराओंने भी इस व्रतका अनुष्ठान कर कदली-वृक्षको सादर अर्घ्य प्रदान किया था। व्रतीको चाहिये कि इस चतुर्दशीको नाना प्रकारके फल, अंकुरित अन्नों, सप्तधान्य, दीप, चन्दन, दही, दूर्वा, अक्षत, वस्त्र, पक्वान्न, जायफल, इलायची तथा लवंग आदि उपचारोंसे कदली-वृक्षका पूजनकर उसे निम्नलिखित मन्त्रसे अर्घ्य प्रदान करे—

चित्या त्वं कन्दलदलैः कदली कामदायिनि।

शरीरारोग्यलावण्यं देहि देवि नमोऽस्तु ते॥

(उत्तरपर्व ९२।७)

‘कदली देवि! आप अपने पत्तोंसे वायुके व्याजसे ज्ञान एवं चेतनाका संचार करती हुई सभी कामनाओंको देती हैं। आप मेरे शरीरमें रूप, लावण्य, आरोग्य प्रदान करनेकी कृपा करें। आपको नमस्कार है*।’

इसके अनन्तर स्वयं पके हुए फल आदिका भोजन ग्रहण करे। जो भी पुरुष अथवा स्त्री भक्तिसे इस व्रतको करती है, उसके वंशमें दुर्भाग्य, दरिद्रा, वन्ध्या, पापिनी, व्यभिचारिणी, कुलटा, पुनर्भू, दुष्ट और पतिकी विरोधिनी कोई कन्या नहीं उत्पन्न होती। इस व्रतको करनेपर नारी सौभाग्य, पुत्र-पौत्र, धन, आयुष्य तथा कीर्ति आदि प्राप्त कर सौ वर्षपर्यन्त अपने पतिके साथ आनन्दपूर्वक रहती है। इस रम्भा-व्रतको गायत्रीने स्वर्गमें किया था। इसी प्रकार गौरीने कैलासमें, इन्द्राणीने नन्दनवनमें, लक्ष्मीने श्वेतद्वीपमें, राज्ञीने रविमण्डलमें, अरुन्धतीने दारुवनमें, स्वाहाने मेरुपर्वतपर, सीतादेवीने अयोध्यामें, वेदवतीने हिमाचलपर और भानुमतीने नागपुरमें इस व्रतको किया था। (अध्याय ९१-९२)

आग्रेयी शिवचतुर्दशी-व्रतके प्रसंगमें महर्षि अङ्गिराका आख्यान

युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! प्राचीन कालमें जब अग्निदेव अदृश्य हो गये, उस समय अग्निना कार्य किसने किया और कैसे अग्निने पुनः अपना स्वरूप प्राप्त किया? इसे आप बतायें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— महाराज! एक बार उत्तथ्यमुनि और अङ्गिरामुनिका विद्यामें और तपमें परस्पर श्रेष्ठताके विषयमें बहुत विवाद हुआ। इसका निश्चय करनेके लिये दोनों ब्रह्मलोक गये

और उन्होंने ब्रह्माजीको सारा वृत्तान्त बतलाया। ब्रह्माजीने उनसे कहा कि ‘तुम दोनों जाकर सभी देवताओं और लोकपालोंको यहाँ बुला लाओ, तब सभीके समक्ष इसका निर्णय किया जायगा।’ ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर दोनों जाकर सभी देवता, ऋषि, गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, राक्षस, दैत्य, दानव आदिको बुला लाये। किंतु भगवान् सूर्य नहीं आये। ब्रह्माजीके पुनः कहनेपर उत्तथ्यमुनि

  • कदलीके व्याजसे सर्वशक्तिमयी दुर्गाकी ‘चितिरूपेण या कृत्स्नभेदद् व्याप्य स्थिता जगत्। नमस्तस्यै’ को ही स्मरण करते हुए प्रार्थना की गयी है।

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  • उत्तरपर्व *

४९१

सूर्यनारायणके समीप जाकर बोले—‘भगवन्! आप शीघ्र ही हमारे साथ ब्रह्मलोक चले।’ भगवान् सूर्यने कहा—‘मुने! हमारे चले जानेपर जगत्में अन्धकार छा जायगा, इसलिये हमारा चलना किस प्रकार हो सकता है, हम नहीं चल सकेंगे।’ यह सुनकर उत्थ्यमुनि वहाँसे चले आये और ब्रह्माजीको सब वृत्तान्त सुना दिया। तब ब्रह्माजीने अङ्किरामुनिसे सूर्यभगवान्को बुलानेके लिये कहा। अङ्किरामुनि ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर सूर्यनारायणके समीप गये और उनसे ब्रह्मलोक चलनेको कहा। सूर्यनारायणने वही उत्तर इनको भी दिया। तब अङ्किराने कहा—‘प्रभो! आप ब्रह्मलोक जायँ, मैं आपके स्थानपर यहाँ रहकर प्रकाश करूँगा।’ यह सुनकर सूर्यनारायण तो ब्रह्माजीके पास चले गये और अङ्किरा प्रचण्ड तेजसे तपने लगे। इधर भगवान् सूर्यने ब्रह्माजीसे पूछा—‘ब्रह्मन्! आपने किस निमित्तसे मुझे यहाँ बुलाया है?’ ब्रह्माजीने कहा—‘देव! आप शीघ्र ही अपने स्थानपर जायँ, नहीं तो अङ्किरामुनि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको दग्ध कर डालेंगे। देखिये उनके तापसे सभी लोग दग्ध हो रहे हैं। जबतक वे सब कुछ भस्म न कर डालें उससे पूर्व ही आप प्रतिष्ठित हो जायँ।’ यह सुनते ही सूर्यभगवान् पुनः अपने स्थानपर लौट आये और उन्होंने अङ्किरामुनिकी स्तुति कर उन्हें बिदा किया। अङ्किरा पुनः देवताओंके समीप आये। देवताओंने अङ्किरामुनिकी स्तुति की और कहा—‘भगवन्! जबतक हम अग्निको ढूँढ़ें तबतक आप अग्निके सभी कर्म कीजिये।’ देवताओंका ऐसा वचन सुनकर महर्षि अङ्किरा अग्निरूपमें देवकार्यादिको सम्पन्न करने लगे। जब अग्निदेव आये तो उन्होंने देखा कि अङ्किरामुनि अग्नि बनकर स्थित हैं। इसपर वे बोले—‘मुने! आप मेरा स्थान छोड़ दें। मैं आपकी शुभा नामकी

स्त्रीसे ज्येष्ठ एवं प्रिय पुत्रके रूपमें उत्पन्न होऊँगा और तब मेरा नाम होगा बृहस्पति। आपके और भी बहुत-से पुत्र-पौत्र होंगे।’ यह वर पाकर प्रसन्न हो महर्षि अङ्किराने अग्निका स्थान छोड़ दिया।

राजन्! अग्निदेवको चतुर्दशी तिथिको ही अपना स्थान प्राप्त हुआ था, इसलिये यह तिथि अग्निको अति प्रिय है और आग्नेयी चतुर्दशी तथा रौद्री चतुर्दशीके नामसे प्रसिद्ध है। स्वर्गमें देवता और भूमिपर मान्धाता, मनु, नहुष आदि बड़े-बड़े राजाओंने इस तिथिको माना है। जो पुरुष युद्धमें मारे जायँ, सर्प आदिके काटनेसे मरे हों और जिसने आत्मघात किया हो, उनका इस चतुर्दशी तिथिमें श्राद्ध करना चाहिये, जिससे वे सद्भक्तिको प्राप्त हो जायँ। इस तिथिके व्रतका विधान इस प्रकार है—चतुर्दशीको उपवास करे और गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे त्रिलोचन श्रीसदाशिवका पूजन करे, रात्रिमें जागरण करे। रात्रिमें पञ्चगव्यका प्राशन कर भूमिपर ही शयन करे। तैल-क्षारसे रहित श्यामाक (साँवा)-का भोजन करे। अग्निके नाम-मन्त्रोंद्वारा काले तिलोंसे १०८ आहुतियाँ प्रदान करे। दूसरे दिन प्रातः स्नान कर पञ्चामृतसे शिवजीको स्नान कराकर भक्तिपूर्वक उनका पूजन करे और पूर्वोक्त रीतिसे हवनकर उनकी प्रार्थना करे। पीछे आरती कर ब्राह्मणको भोजन कराये। उनको दक्षिणा दे और मौन हो स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार एक वर्ष व्रत कर सुवर्णकी त्रिलोचन भगवान् शंकरकी प्रतिमा बनाये। प्रतिमाको चाँदीके वृषभपर स्थितकर दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादित कर ताम्रपात्रमें स्थापित करे। तदनन्तर गन्ध, श्वेत पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उसका पूजन कर ब्राह्मणको दे दे। जो एक वर्षतक इस व्रतको करता है, वह लम्बी आयु प्राप्त कर अन्तमें तीर्थमें प्राण परित्याग कर

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४९२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

शिवलोकमें देवताओंके साथ विहार करता है। वहाँ बहुत कालतक रहकर वह पृथ्वीमें आकर ऐश्वर्यसम्पन्न धार्मिक राजा होता है। पुत्र-पौत्रोंसे

समन्वित होता है और चिरकालतक आनन्दित रहता है तथा अपने अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त करता है*। (अध्याय ९३)

अनन्तचतुर्दशी-व्रत-विधान

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—राजन्! सम्पूर्ण पापोंका नाशक, कल्याणकारक तथा सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला अनन्तचतुर्दशी नामक एक व्रत है, जिसे भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको सम्पन्न किया जाता है।

युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आपने जो अनन्त नाम लिया है, क्या ये अनन्त शेषनाग हैं या कोई अन्य नाग हैं अथवा परमात्मा हैं या ब्रह्म हैं? अनन्त संज्ञा किसकी है? इसे आप बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! अनन्त मेरा ही नाम है। कला, काष्ठ, मुहूर्त, दिन, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, युग तथा कल्प आदि काल-विभागोंके रूपमें मैं ही अवस्थित हूँ। संसारका भार उतारने तथा दानवोंका विनाश करनेके लिये वसुदेवके कुलमें मैं ही उत्पन्न हुआ हूँ। पार्थ! आप मुझे ही विष्णु, जिष्णु, हर, शिव, ब्रह्मा, भास्कर, शेष, सर्वव्यापी ईश्वर समझिये और अनन्त भी मैं ही हूँ। मैंने आपको विश्वास उत्पन्न करनेके लिये ऐसा कहा है।

युधिष्ठिरने पुनः पूछा—भगवन्! मुझे आप अनन्त-व्रतके माहात्म्य और विधिको तथा इसे किसने पहले किया था एवं इस व्रतका क्या पुण्य है, इसे बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—युधिष्ठिर! इस सम्बन्धमें एक प्राचीन आख्यान है, उसे आप

सुनें। कृतयुगमें वसिष्ठगोत्री सुमन्तु नामके एक ब्राह्मण थे। उनका महर्षि भृगुकी कन्या दीक्षासे वेदोक्त-विधिसे विवाह हुआ था। उन्हें सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका नाम शीला रखा गया। कुछ समय बाद उसकी माता दीक्षाका ज्वरसे देहान्त हो गया और उस पतिव्रताको स्वर्गलोक प्राप्त हुआ। सुमन्तुने पुनः एक कर्कशा नामकी कन्यासे विवाह कर लिया। वह अपने कर्कशा नामके समान ही दुःशील, कर्कश तथा नित्य कलहकारिणी एवं चण्डीरूपा थी। शीला अपने पिताके घरमें रहती हुई दीवाल, देहली तथा स्तम्भ आदिमें माङ्गलिक स्वस्तिक, पद्म, शङ्ख आदि विष्णुचिह्नोंको अङ्कित कर उनकी अर्चना करती रहती। सुमन्तुको शीलाके विवाहकी चिन्ता होने लगी। उन्होंने शीलाका विवाह कौंडिन्यमुनिके साथ कर दिया। विवाहके अनन्तर सुमन्तुने अपनी पत्नीसे कहा—‘देवि! दामादके लिये पारितोषिक रूपमें कुछ दहेज द्रव्य देना चाहिये।’ यह सुनकर कर्कशा क्रुद्ध हो उठी और उसने घरमें बने मण्डपको उखाड़ डाला तथा भोजनसे बचे हुए कुछ पदार्थोंको पाथेयके रूपमें प्रदान कर कहा—चले जाओ, फिर उसने कपाट बंद कर लिया।

कौंडिन्य भी शीलाको साथ लेकर बैलगाड़ीसे धीरे-धीरे वहाँसे चल पड़े। दोपहरका समय हो

  • प्रायः अन्य ज्यौतिष ग्रन्थों तथा पुराणोंके अनुसार अग्निदेवकी तिथि प्रतिपदा ही है। चतुर्दशी शिवजीकी तिथि है। यहाँ भी शिवजीकी ही पूजा है, अतः कल्यान्तर-व्यवस्था मान लेनी चाहिये।

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