भारतकोश
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संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

* गौतमके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति तथा गौतमी गङ्गाका माहात्म्य * १५१

पार्वतीसहित भगवान् शंकर उत्तम गुणोंसे युक्त आठ विराट् स्वरूप धारण करते हैं। इस प्रकार विद्वान् पुरुष प्रतिदिन भगवान् महादेवजीकी स्तुति किया करते हैं। महेश्वरका जो पृथ्वीमय शरीर है, वह अपने विषयोंद्वारा सुख पहुँचाने, समस्त चराचर जगत्का भरण-पोषण करने, उसकी सम्पत्ति बढ़ाने तथा सबका अभ्युदय करनेके लिये है। शान्तिमय शरीरवाले भगवान् शिवने जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करनेके लिये पृथ्वीके आधारभूत जलका स्वरूप धारण किया है। उनका वह लोक-प्रतिष्ठित रूप सब लोगोंको सुख पहुँचाने तथा धर्मकी सिद्धि करनेका भी हेतु है। महेश्वर! आपने समयकी व्यवस्था करने, अमृतका स्रोत बहाने, जीवोंकी सृष्टि, पालन और संहार करने तथा प्रजाको मोह, सुख एवं उन्नतिका अवसर देनेके लिये सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्निका शरीर धारण किया है। ईश! आपने जो वायुका रूप ग्रहण किया है, उसमें भी एक रहस्य है। सब लोग प्रतिदिन बढ़ें, चलें, फिरें, शक्तिका उपार्जन करें, अक्षरोंका उच्चारण कर सकें, जीवन कायम रहे और अनेक प्रकारके आमोद-प्रमोदकी सृष्टि हो, इसीलिये आपका वह रूप है। भगवन्! इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि अपने-आपको आप ही ठीक-ठीक जानते हैं। भेद (अवकाश)-के बिना न कोई क्रिया हो सकती है न धर्म हो सकता है, न अपने या परायेका बोध होगा न दिशा, अन्तरिक्ष, द्युलोक, पृथ्वी तथा भोग और मोक्षका ही अन्तर जान पड़ेगा; अतः महेश्वर! आपने यह आकाशरूप ग्रहण किया है। धर्मकी व्यवस्था करनेका निश्चय करके आपने ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, उनकी शाखाओं और शास्त्रोंका विभाग किया है तथा लोकमें भी इसी उद्देश्यसे गाथाओं, स्मृतियों और पुराणोंका प्रसार किया है।

ये सब शब्दस्वरूप ही हैं। शम्भो! यजमान, यज्ञ, यज्ञोंके साधन, ऋत्विक्, यज्ञका स्थान, फल, देश और काल—ये सब आप ही हैं। आप ही परमार्थतत्त्व हैं। विद्वान् पुरुष आपके शरीरको यज्ञाङ्गमय बतलाते हैं। केवल वाग्विलास करनेसे क्या लाभ—कर्ता, दाता, प्रतिनिधि, दान, सर्वज्ञ, साक्षी, परम पुरुष, सबका अन्तरात्मा तथा परमार्थस्वरूप सब कुछ आप ही हैं। भगवन्! वेद, शास्त्र और गुरु भी आपके तत्त्वका भलीभाँति उपदेश नहीं कर सके हैं। निश्चय ही आपतक बुद्धि आदिकी भी पहुँच नहीं है। आप अजन्मा, अप्रमेय और शिव-शब्दसे वाच्य हैं, आप ही सत्य हैं। आपको नमस्कार है। किसी समय भगवान् शिवने अपनी प्रकृतिको इस भावसे देखा कि यह मेरी सम्पत्ति है; उसी समय वे एकसे अनेक हो गये, विश्वरूपमें प्रकट हो गये। वास्तवमें उनका प्रभाव अतर्क्य और अचिन्त्य है। भगवान् शिवकी प्रिया शिवा देवी भी नित्य हैं। भव (भगवान् शंकर)-में उनका भाव (हार्दिक अनुराग) पूर्णरूपसे बढ़ा हुआ है; वे इस भव (संसार)-की उत्पत्तिमें स्वयं कारण हैं तथा सर्वकारण महेश्वरके आश्रित हैं। शिवा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा विश्वविधाता शिवकी विलक्षण शक्ति हैं। संसारकी उत्पत्ति, स्थिति, अन्नकी वृद्धि तथा लय—ये सनातन भाव जहाँ होते रहते हैं, वह एकमात्र पार्वतीदेवीका ही स्वरूप है। वे भगवान् शंकरकी प्राणवल्लभा हैं। उनके लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। समस्त जीव जिनके लिये अन्नदान देते और तपस्या करते हैं, वे जगज्जननी माता पार्वती ही हैं। उनकी उत्तम कीर्ति बहुत बड़ी है। वे शिवकी प्रियतमा हैं। इन्द्र भी जिनकी कृपादृष्टि चाहते हैं, जिनका नाम लेनेसे मङ्गलकी प्राप्ति होती है, जो सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हो इसे निर्मल बनाती हैं, वे

५७- गौतमका भगवान् शङ्करसे गङ्गाजीकी याचना

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  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

भगवती उमा ही हैं। उनका रूप सदा चन्द्रमाके समान ही मनोरम है। जिनके प्रसादसे ब्रह्मा आदि चराचर जीवोंकी बुद्धि, नेत्र, चेतना और मनमें सदा सुखकी प्राप्ति होती है, वे जगद्गुरु शिवकी सुन्दरी शक्ति शिवा वाणीकी अधीश्वरी हैं। आज ब्रह्माजीका भी मन मलिन हो रहा है, फिर अन्य जीवोंकी तो बात ही क्या—यह सोचकर जगन्माता उमाने अनेक उपायोंसे सम्पूर्ण जगत्‌को पवित्र करनेके लिये गङ्गाका अवतार धारण किया है। श्रुतियोंको देखकर तथा सब प्रमाणोंसे भगवान् शंकरकी प्रभुतापर विश्वास करके लोग जो धर्मोंका अनुष्ठान करते और उनके फलस्वरूप जो उत्तम भोग भोगते हैं, यह भगवान् सदाशिवकी ही विभूति है। वैदिक अथवा लौकिक कार्य, क्रिया, कारक और साधनोंका जो सबसे उत्तम एवं प्रिय साध्य है, वह अनादि कर्त्ता शिवकी प्राप्ति ही है। जो सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म, परप्रधान, सारभूत और उपासनाके योग्य है, जिसका ध्यान तथा जिसकी प्राप्ति करके श्रेष्ठ योगी पुरुष मुक्त हो जाते—पुनः संसारमें जन्म नहीं लेते, वे भगवान् उमापति ही मोक्ष हैं। माता पार्वती! भगवान् शंकर जगत्‌का कल्याण करनेके लिये जैसे-जैसे अपार मायामय रूप धारण करते हैं, वैसे-ही-वैसे तुम भी उनके योग्य रूप धारण करती हो। इस प्रकार तुममें पातिव्रत्य जाग्रत् रहता है।

गौतमजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर वृषभाङ्कित ध्वजावाले साक्षात् भगवान् शिव उनके सामने प्रकट हुए और प्रसन्न होकर बोले—'गौतम! तुम्हारी भक्ति, स्तुति तथा उत्तम व्रतसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ। माँगो, तुम्हें क्या दूँ? जो वस्तु देवताओंके लिये भी दुर्लभ हो, वह भी तुम माँग सकते हो।'

गौतमने कहा—जगदीश्वर! समस्त लोकोंको पवित्र करनेवाली इन पावन देवीको, जो आपकी जटामें स्थित और आपको परम प्रिय हैं, ब्रह्मगिरिपर छोड़ दीजिये। ये समुद्रमें मिलनेतक सबके लिये तीर्थरूप होकर रहें। इनमें स्नान करनेमात्रसे मन, वाणी और शरीरद्वारा किये हुए ब्रह्महत्या आदि समस्त पाप नष्ट हो जायें। चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, अयनारम्भ, विषुवयोग, संक्रान्ति तथा वैधृतियोग आनेपर अन्य पुण्यतीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वह इनके स्मरणमात्रसे ही प्राप्त हो जाय। ये समुद्रमें पहुँचनेतक जहाँ-जहाँ जायें, वहाँ-वहाँ आप अवश्य रहें। यह श्रेष्ठ वर मुझे प्राप्त हो तथा इनके तटसे एक योजनसे लेकर दस योजनतककी दूरीके भीतर आये हुए महापातकी मनुष्य भी यदि स्नान किये बिना ही मृत्युको प्राप्त हो जायें तो वे भी मुक्तिके भागी हों।

**ब्रह्माजी कहते हैं—**गौतमकी यह बात सुनकर भगवान् शंकर बोले—'इससे बढ़कर दूसरा कोई तीर्थ न तो हुआ है न होगा; यह बात सत्य है, सत्य है, सत्य है और वेदमें भी निश्चित की गयी है कि गौतमी गङ्गा (गोदावरी) सब तीर्थोंसे

* गौतमके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति तथा गौतमी गङ्गाका माहात्म्य * १५३

अधिक पवित्र हैं।' यों कहकर वे अन्तर्धान हो गये। लोकपूजित भगवान् शिवके चले जानेपर गौतमने उनकी आज्ञासे जटासहित सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाको साथ ले देवताओंसे घिरकर ब्रह्मगिरिमें प्रवेश किया। उस समय महाभाग महर्षि, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय भी आनन्दमग्न होकर जय-जयकार करते हुए ब्रह्मर्षि गौतमकी प्रशंसा करने लगे।

पवित्र एवं संयत चित्तवाले गौतमने जटाको ब्रह्मगिरिके शिखरपर रखा और भगवान् शङ्करका स्मरण करते हुए गङ्गाजीसे हाथ जोड़कर कहा—'तीन नेत्रोंवाले भगवान् शिवकी जटासे प्रकट हुई माता गङ्गा! तुम सब अभीष्टोंको देनेवाली और शान्त हो। मेरा अपराध क्षमा करो और सुखपूर्वक यहाँसे प्रवाहित होकर जगत्का कल्याण करो। देवि! मैंने तीनों लोकोंका उपकार करनेके लिये तुम्हारी याचना की है और भगवान् शंकरने भी इसी उद्देश्यकी सिद्धिके लिये तुम्हें दिया है। अतः हमारा यह मनोरथ असफल नहीं होना चाहिये।'

गौतमका यह वचन सुनकर भगवती गङ्गाने उसे स्वीकार किया और अपने-आपको तीन स्वरूपोंमें विभक्त करके स्वर्गलोक, मर्त्यलोक एवं रसातलमें फैल गयीं। स्वर्गलोकमें उनके चार रूप हुए, मर्त्यलोकमें वे सात धाराओंमें बहने लगीं तथा रसातलमें भी उनकी चार धाराएँ हुईं। इस प्रकार एक ही गङ्गाके पंद्रह आकार हो गये। गङ्गा देवी सर्वत्र हैं, सर्वभूतस्वरूपा हैं, सब पापोंका नाश करनेवाली तथा सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाली हैं। वेदमें सदा उन्हींके यशका गान किया जाता है। जिनकी बुद्धि अज्ञानसे मोहित है, वे मर्त्यलोकके निवासी समझते हैं कि गङ्गा केवल मर्त्यलोकमें ही हैं, पाताल अथवा स्वर्गमें नहीं हैं। भगवती गङ्गा जहाँतक पहुँचकर सागरमें मिली हैं, वहाँतक वे देवमयी मानी गयी हैं। महर्षि गौतमके छोड़नेपर वे पूर्वसमुद्रकी ओर चली गयीं। उस समय देवर्षियोंद्वारा सेवित कल्याणमयी जगन्माता गङ्गाकी मुनिश्रेष्ठ गौतमने परिक्रमा की। इसके बाद उन्होंने देवेश्वर भगवान् त्र्यम्बकका पूजन किया। उनके स्मरण करते ही करुणासिन्धु भगवान् शिव वहाँ प्रकट हो गये। पूजा करके महर्षि गौतमने कहा—'देवदेव महेश्वर! आप सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये मुझे इस तीर्थमें स्नान करनेकी विधि बताइये।'

भगवान् शिव बोले—महर्षे! गोदावरीमें स्नान करनेकी सम्पूर्ण विधि सुनो। पहले नान्दीमुख श्राद्ध करके शरीरकी शुद्धि करे, फिर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उनसे स्नान करनेकी आज्ञा ले। तदनन्तर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए गोदावरी नदीमें स्नान करनेके लिये जाय। उस समय पतित मनुष्योंके साथ वार्तालाप न करे। जिसके हाथ, पैर और मन भलीभाँति संयममें रहते हैं, वही तीर्थका पूरा फल पाता है। भावदोष (दुर्भावना)-का परित्याग करके अपने धर्ममें स्थिर रहे और थके-माँदे, पीड़ित मनुष्योंकी सेवा करते हुए उन्हें यथायोग्य अन्न दे। जिनके पास कुछ नहीं है, ऐसे साधुओंको वस्त्र और कम्बल दे। भगवान् विष्णुकी तथा गङ्गाजीके प्रकट होनेकी दिव्य कथा सुने। इस विधिसे यात्रा करनेवाला मनुष्य तीर्थके उत्तम फलका भागी होता है।

गौतम! गोदावरी नदीमें दो-दो हाथ भूमिपर तीर्थ होंगे। उनमें मैं स्वयं सर्वत्र रहकर सबकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करता रहूँगा। सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा अमरकण्टकपर्वतपर अधिक उत्तम मानी गयी हैं। यमुनाका विशेष महत्त्व उस स्थानपर है, जहाँ वे गङ्गासे मिली हैं। सरस्वती नदी प्रभासतीर्थमें श्रेष्ठ बतायी गयी हैं। तृष्णा,

३९- भागीरथी गङ्गाके अवतरणकी कथा

१५४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

भीमरथी और तुङ्गभद्रा—इन तीन नदियोंका जहाँ समागम हुआ है, वह तीर्थ मनुष्योंको मुक्ति देनेवाला है। इसी प्रकार पयोष्णी नदी भी जहाँ तपती (ताप्ती)-में मिली हैं, वह तीर्थ मोक्षदायक है; परंतु ये गौतमी गङ्गा मेरी आज्ञासे सर्वत्र सर्वदा और सब मनुष्योंको स्नान करनेपर मोक्ष प्रदान करेंगी। कोई-कोई तीर्थ किसी विशेष समयमें देवताका शुभागमन होनेपर अधिक पुण्यमय माना जाता है, किंतु गोदावरी नदी सदा ही सबके लिये तीर्थ है। मुनिश्रेष्ठ! दो सौ योजनके भीतर गोदावरी नदीमें साढ़े तीन करोड़ तीर्थ होंगे। ये गङ्गा निम्नाङ्कित नामोंसे प्रसिद्ध होंगी—माहेश्वरी, गङ्गा, गौतमी, वैष्णवी, गोदावरी, नन्दा, सुनन्दा, कामदायिनी, ब्रह्मतेजःसमानीता तथा सर्वपापप्रणाशिनी। गोदावरी मुझे सदा ही प्रिय हैं। ये स्मरणमात्रसे पाप-राशिका विनाश करनेवाली हैं। पाँचों भूतोंमें जल श्रेष्ठ है! जलमें भी जो तीर्थका जल है, वह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। तीर्थ-जलमें भी भागीरथी गङ्गा श्रेष्ठ हैं और उनसे भी गौतमी गङ्गा उत्कृष्ट मानी गयी हैं; क्योंकि वे भगवान् शंकरकी जटाके साथ लायी गयी थीं। अतः इनसे बढ़कर कल्याणकारी तीर्थ दूसरा कोई नहीं है। मुने! स्वर्ग, पृथ्वी और पातालमें भी गङ्गा सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली हैं।

**ब्रह्माजी कहते हैं—**नारद! इस प्रकार साक्षात् भगवान् शंकरने संतुष्ट होकर महात्मा गौतमको गोदावरीका जो माहात्म्य बतलाया था। वही मैंने तुमको सुनाया है।


भागीरथी गङ्गाके अवतरणकी कथा

**नारदजीने कहा—**सुरश्रेष्ठ! एक ही गङ्गाके आपने दो भेद बतलाये हैं। एक तो वह है, जो गौतम नामक ब्राह्मणके द्वारा लाया गया और दूसरा अंश भगवान् शंकरकी जटामें ही रह गया, जिसे क्षत्रिय राजा भगीरथ ले आये। अतः उसीका प्रसङ्ग मुझे सुनाइये।

**ब्रह्माजी बोले—**देवर्षे! वैवस्वत मनुके वंशमें राजा इक्ष्वाकुके कुलमें सगर नामके एक अत्यन्त धार्मिक राजा हो गये हैं। वे यज्ञ करते, दान देते और सदा धार्मिक आचार-विचारसे रहते थे। उनके दो पत्नियाँ थीं। वे दोनों ही पतिभक्ति-परायणा थीं, किंतु उनमेंसे किसीको भी संतान न हुई। इसलिये राजाके मनमें बड़ी चिन्ता थी। एक दिन उन्होंने महर्षि वसिष्ठको अपने घर बुलाया और विधिपूर्वक उनकी पूजा करके पूछा—‘किस उपायसे मुझे संतान होगी?’ उनकी यह बात सुनकर महर्षि वसिष्ठने कुछ कालतक ध्यान किया। उसके बाद राजासे कहा—‘राजन्! तुम पत्नीसहित सदा ऋषि-महर्षियोंका सेवन करते रहो।’ यों कहकर महर्षि वसिष्ठ अपने आश्रमको चले गये। एक समयकी बात है—राजर्षि सगरके घरपर एक तपस्वी महात्मा पधारे। राजाने उन महर्षिका पूजन किया। इससे संतुष्ट होकर वे बोले—‘महाभाग! वर माँगो।’ यह सुनकर राजाने पुत्र होनेके लिये प्रार्थना की। मुनि बोले—‘तुम्हारी एक पत्नीके गर्भसे एक ही पुत्र होगा, किंतु वह वंशधर होगा; और दूसरी स्त्रीके गर्भसे साठ हजार पुत्र उत्पन्न होंगे।’ वरदान देकर जब मुनि चले गये, तब उनके कथनानुसार यथासमय राजाके हजारों पुत्र हुए। राजा सगरने उत्तम दक्षिणासे युक्त बहुतेरे अश्वमेध-यज्ञ किये। फिर एक अश्वमेध-यज्ञके लिये उन्होंने विधिपूर्वक

* भागीरथी गङ्गाके अवतरणकी कथा * १५५

दीक्षा ग्रहण की और अश्वकी रक्षाके लिये सेनासहित अपने पुत्रोंको नियुक्त किया। अश्व पृथ्वीपर भ्रमण करने लगा। इसी बीचमें कहीं अवसर पाकर इन्द्रने उस अश्वको हर लिया और रक्षकोंको सौंप दिया। राजकुमार घोड़ेको इधर-उधर ढूँढ़ने लगे, परंतु कहीं भी वह उन्हें दिखायी न दिया। तब उन्होंने देवलोकमें जाकर ढूँढ़ा, पर्वतों और सरोवरोंमें खोजा और कितने ही जङ्गल छान डाले; मगर कहीं भी उसका पता न लगा। इसी समय आकाशवाणी हुई—'सगरपुत्रो! तुम्हारा घोड़ा रसातलमें बँधा है और कहीं नहीं है।' यह सुनकर वे रसातलमें जानेके लिये सब ओरसे पृथ्वीको खोदने लगे। क्षुधासे पीड़ित होनेपर वे सूखी मिट्टी खाते और दिन-रात भूमि खोदते रहते। इस प्रकार वे शीघ्र ही रसातलमें जा पहुँचे। सगरके बलवान् पुत्रोंको वहाँ आया सुनकर राक्षस थर्रा उठे और उनके वधका उपाय करने लगे। वे बिना युद्ध किये ही भयभीत हो उस स्थानपर आये, जहाँ महामुनि कपिल सो रहे थे। कपिलजीका क्रोध बड़ा प्रचण्ड था। राक्षसोंने वह घोड़ा ले जाकर तुरंत कपिलजीके सिरहानेकी ओर बाँध दिया और स्वयं चुपचाप दूर खड़े होकर देखने लगे कि अब क्या होता है। इतनेमें ही सगरके पुत्र रसातलमें घुसकर देखते हैं कि घोड़ा बँधा है और पास ही कोई पुरुष सो रहा है। उन्होंने कपिलजीको ही अश्व चुराकर यज्ञमें विघ्न डालनेवाला माना और यह निश्चय किया कि इस महापापीको मारकर हमलोग अपना अश्व महाराजके निकट ले चलें। कोई बोले—'अपना पशु बँधा है, इसे ही खोलकर ले चलें। इस सोये हुए पुरुषको मारनेसे क्या लाभ।' यह सुनकर दूसरे बोल उठे—'हम शूरवीर राजा हैं, शासक हैं। इस पापीको उठायें और क्षत्रियोचित तेजसे इसका वध कर डालें।' फिर क्या था, वे मुनिको कटु वचन सुनाते हुए लातोंसे मारने लगे।

इससे मुनिश्रेष्ठ कपिलको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने सगरपुत्रोंकी ओर रोषपूर्ण दृष्टिसे देखा और भस्म कर डाला। वे सब-के-सब जलकर राख हो गये। नारद! यज्ञमें दीक्षित महाराज सगरको इन सब बातोंका पता न लगा। उस समय तुमने ही जाकर सगरको यह सब समाचार सुनाया। इससे राजाको बड़ी चिन्ता हुई। अब क्या करना चाहिये, यह बात उनकी समझमें न आयी। राजा सगरके एक दूसरा पुत्र भी था, जिसका नाम असमञ्जा था। वह मूर्खतावश नगरके बालकोंको उठाकर पानीमें फेंक देता था। तब पुरवासियोंने एकत्रित होकर राजा सगरको इस बातकी सूचना दी। पुत्रका यह अन्याय जानकर महाराजको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अपने अमात्योंसे कहा—'यह असमञ्जा बालकोंकी हत्या करनेवाला तथा क्षत्रियधर्मका त्यागी है। अतः यह इस देशका

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  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

त्याग कर दे।' महाराजका यह आदेश सुनकर अमात्योंने राजकुमारको तुरंत देशनिकाला दे दिया। असमञ्जा वनमें चला गया। अब राजा सगर चिन्ता करने लगे कि 'हमारे सब पुत्र ब्राह्मणके शापसे रसातलमें नष्ट हो गये। एक बचा था, वह भी वनमें चला गया। इस समय मेरी क्या गति होगी?'

असमञ्जाके एक पुत्र था, जो अंशुमान् नामसे विख्यात हुआ। यद्यपि अंशुमान् अभी बालक था तो भी राजाने उसे बुलाकर अपना कार्य बतलाया। अंशुमान्ने भगवान् कपिलकी आराधना की और घोड़ा ले आकर राजा सगरको दे दिया। इससे वह यज्ञ पूर्ण हुआ। अंशुमान्‌के तेजस्वी पुत्रका नाम दिलीप था। दिलीपके पुत्र परम बुद्धिमान् भगीरथ हुए। भगीरथने जब अपने समस्त पितामहोंकी दुर्गतिका हाल सुना, तब उन्हें बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने नृपश्रेष्ठ सगरसे विनयपूर्वक पूछा—'महाराज! उन सबका उद्धार कैसे होगा?' राजाने उत्तर दिया—'बेटा! यह तो भगवान् कपिल ही जानते हैं।' यह सुनकर बालक भगीरथ रसातलमें गये और कपिलको नमस्कार करके अपना सब मनोरथ उन्हें कह सुनाया। कपिल मुनि बहुत देरतक ध्यान करके बोले—'राजन्! तुम तपस्याद्वारा भगवान् शंकरकी आराधना करो और उनकी जटामें स्थित गङ्गाके जलसे अपने पितरोंकी भस्मको आप्लावित करो। इससे तुम तो कृतार्थ होगे ही, तुम्हारे पितर भी कृतकृत्य हो जायेंगे।' यह सुनकर भगीरथने कहा—'बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा। मुनिश्रेष्ठ! बताइये, मैं कहाँ जाऊँ और कौन-सा कार्य करूँ?'

कपिलजी बोले— नरश्रेष्ठ! कैलासपर्वतपर जाकर महादेवजीकी स्तुति करो और अपनी शक्तिके अनुसार तपस्या करते रहो। इससे तुम्हारे अभीष्टकी सिद्धि होगी।

मुनिका यह वचन सुनकर भगीरथने उन्हें प्रणाम किया और कैलासपर्वतकी यात्रा की। वहाँ पहुँचकर पवित्र हो बालक भगीरथने तपस्याका निश्चय किया और भगवान् शंकरको सम्बोधित करके इस प्रकार कहा—'प्रभो! मैं बालक हूँ, मेरी बुद्धि भी बालककी ही है और आप भी अपने मस्तकपर बाल चन्द्रमाको धारण करते हैं। मैं कुछ भी नहीं जानता। आप मेरे इस अनजानपनसे ही प्रसन्न होइये। अमरेश्वर! जो लोग वाणीसे, मनसे और क्रियासे कभी मेरा उपकार करते हैं तथा हितसाधनमें संलग्न रहते हैं, उनका कल्याण करनेके लिये मैं उमासहित आपको प्रणाम करता हूँ। आप देवता आदिके लिये भी पूज्य हैं। जिन पूर्वजोंने मुझे अपने सगोत्र और समानधर्माके रूपमें उत्पन्न किया और पाल-पोसकर बड़ा बनाया, भगवान् शिव उनका अभीष्ट मनोरथ पूर्ण करें। मैं बालचन्द्रका मुकुट धारण करनेवाले भगवान् शंकरको नित्य प्रणाम करता हूँ।'

भगीरथके यों कहते ही भगवान् शिव उनके सामने प्रकट हो गये और बोले—'महामते! तुम निर्भय होकर कोई वर माँगो। जो वस्तु देवताओंके लिये भी सुलभ नहीं है, वह भी मैं तुम्हें निश्चय ही दे दूँगा।' यह आश्वासन पाकर भगीरथने महादेवजीको प्रणाम किया और प्रसन्न होकर कहा—'देवेश्वर! आपकी जटामें जो सरिताओंमें श्रेष्ठ गङ्गाजी विराजमान हैं, उन्हें ही मेरे पितरोंका उद्धार करनेके लिये दे दीजिये। इससे मुझे सब कुछ मिल जायगा।' तब महेश्वरने हँसकर कहा—'बेटा! मैंने तुम्हें गङ्गा दे दी। अब तुम उनकी स्तुति करो।' महादेवजीका वचन सुनकर भगीरथने गङ्गाजीकी प्राप्तिके लिये भारी तपस्या की और मनको संयममें रखकर भक्तिपूर्वक गङ्गाका स्तवन किया। बालक होनेपर भी भगीरथने अबालकोचित

४०- वाराहतीर्थ, कुशावर्त, नीलगङ्गा और कपोततीर्थकी महिमा; कपोत और कपोतीके अद्भुत त्यागका वर्णन

* वाराहतीर्थ, कुशावर्त, नीलगङ्गा और कपोततीर्थकी महिमा * १५७

पुरुषार्थ करके गङ्गाजीकी भी कृपा प्राप्त की। महादेवजीसे प्राप्त हुई गङ्गाको पाकर उन्होंने उनकी परिक्रमा की और हाथ जोड़कर कहा— 'देवि! महामुनि कपिलके शापसे मेरे पितर

दुर्गतिमें पड़े हुए हैं। माता! आप उनका उद्धार करें।'

देवनदी गङ्गा सबका उपकार करनेवाली हैं। वे स्मरणमात्रसे सब पापोंका नाश कर देती हैं। उन्होंने भगीरथकी प्रार्थना सुनकर 'तथास्तु' कहा और लोकोंका उपकार एवं पितरोंका उद्धार करनेके लिये भगीरथके कथनानुसार सब कार्य किया। राजा सगरके जो पुत्र भस्म होकर रसातलमें पड़े थे, उन्हें अपने जलसे आप्लावित करके गङ्गाजीने उनके खोदे हुए गड्ढेको भर दिया। महामुने! इस प्रकार तुम्हें क्षत्रिया गङ्गाका वृत्तान्त सुनाया। ये माहेश्वरी, वैष्णवी, ब्राह्मी, पावनी, भागीरथी, देवनदी तथा हिमगिरिशिखराश्रया (हिमालयकी चोटीपर रहनेवाली) आदि नामोंसे पुकारी जाती हैं। इस प्रकार महादेवजीकी जटामें स्थित गङ्गाका जल दो स्वरूपोंमें विभक्त हुआ। विन्ध्यगिरिके दक्षिणभागमें जो गङ्गा हैं, उन्हें गौतमी (गोदावरी) कहते हैं और विन्ध्यगिरिके उत्तरभागमें स्थित गङ्गा भागीरथी कहलाती हैं।


वाराहतीर्थ, कुशावर्त, नीलगङ्गा और कपोततीर्थकी महिमा;

कपोत और कपोतीके अद्भुत त्यागका वर्णन

नारदजीने कहा— भगवन्! आपके मुखसे कथा सुनते-सुनते मेरे मनको तृप्ति नहीं होती। पहले गौतम ब्राह्मणके द्वारा लायी हुई गङ्गाका वर्णन कीजिये। उनके पृथक्-पृथक् तीर्थोंके फल, पुण्य तथा इतिहासपर भी क्रमशः प्रकाश डालिये।

ब्रह्माजी बोले— नारद! गोदावरीके पृथक्-पृथक् तीर्थों, फलों और माहात्म्योंका पूरा-पूरा वर्णन न तो मैं कर सकता हूँ और न तुम सुननेमें ही समर्थ हो; तथापि कुछ बतलाता हूँ। जहाँ भगवान् त्र्यम्बक गौतमके सामने प्रत्यक्ष प्रकट हुए थे, वह तीर्थ त्र्यम्बकके नामसे प्रसिद्ध है (वही गौतमी गङ्गाका उद्गमस्थान है)। वह भोग और मोक्ष देनेवाला है। दूसरा वाराहतीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसका स्वरूप बतलाता हूँ। पूर्वकालकी बात है, सिन्धुसेन नामक राक्षस देवताओंको परास्त करके यज्ञ छीनकर रसातलमें जा पहुँचा। यज्ञके रसातल चले जानेपर पृथ्वीपर उसका सर्वथा अभाव हो गया। देवताओंने सोचा, यज्ञके बिना न तो यह लोक रह जायगा और न परलोक ही; अतः अपने शत्रुके पीछे उन्होंने

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  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

रसातलमें भी धावा किया। परंतु इन्द्र आदि देवता सिन्धुसेनको जीत न सके। तब उन्होंने पुराणपुरुष भगवान् विष्णुके पास जाकर यज्ञापहरण आदि राक्षसकी सब करतूत कह सुनायी। भगवान्‌ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—'मैं वाराहरूप धारण करके शङ्ख, चक्र और गदा हाथमें ले रसातलमें जाऊँगा और मुख्य-मुख्य राक्षसोंका संहार करके पुण्यमय यज्ञको लौटा लाऊँगा। देवताओ! तुम सब लोग स्वर्गमें जाओ। तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये।'

गङ्गाजी जिस मार्गसे रसातलमें गयी थीं, उसी मार्गसे पृथ्‍वीको छेदकर चक्रधारी भगवान् भी रसातलमें पहुँच गये। उन्होंने वाराहरूप धारण करके रसातलवासी राक्षसों और दानवोंका वध किया तथा महायज्ञको मुखमें रखकर रसातलसे निकल आये। उस समय देवता ब्रह्मगिरिपर श्रीहरिकी प्रतीक्षा करते थे। उस मार्गसे निकलकर भगवान् गङ्गास्रोतमें आये और रक्तसे लथपथ हुए अपने अङ्गोंको गङ्गाजीके जलसे धोया। उस स्थानपर वाराह नामक कुण्ड हो गया। इसके बाद भगवान्‌ने मुँहमें रखे हुए महायज्ञको दे दिया। इस प्रकार उनके मुखसे यज्ञका प्रादुर्भाव हुआ, इसलिये वाराहतीर्थ परम पवित्र और सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको देनेवाला है। वहाँ किया हुआ स्नान और दान सब यज्ञोंका फल देता है। जो पुण्यात्मा पुरुष वहाँ रहकर अपने पितरोंका स्मरण करता है, उसके पितर सब पापोंसे मुक्त हो स्वर्गमें चले जाते हैं। त्र्यम्बकमें एक कुशावर्त नामक तीर्थ है, उसके स्मरणमात्रसे मनुष्य कृतार्थ हो जाता है। वह समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। कुशावर्त उस तीर्थका नाम है, जहाँ महात्मा गौतमने गङ्गाका कुशोंसे आवर्तन किया था। वे वहाँ गङ्गाको कुशसे लौटाकर ले आये थे। कुशावर्तमें किया हुआ स्नान और दान पितरोंको तृप्ति देनेवाला है। जहाँ नदियोंमें श्रेष्ठ गङ्गा नीलपर्वतसे निकली हैं, वहाँ वे नीलगङ्गाके नामसे विख्यात हैं। मनुष्य शुद्धचित्त होकर नीलगङ्गामें स्नान आदि जो कुछ भी शुभ कर्म करता है, वह सब अक्षय जानना चाहिये। उससे पितरोंको बड़ी तृप्ति होती है।

गोदावरीमें परम उत्तम कपोततीर्थ भी है, जिसकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है। मुने! मैं उस तीर्थका स्वरूप और महान् फल बतलाता हूँ, सुनो। ब्रह्मगिरिपर एक बड़ा भयंकर व्याध रहता था। वह ब्राह्मणों, साधुओं, यतियों, गौओं, पक्षियों तथा मृगोंकी हत्या किया करता था। वह पापात्मा बड़ा ही क्रोधी और असत्यवादी था। उसके हाथमें सदा पाश और धनुष मौजूद रहते थे। उस महापापी व्याधके मनमें सदा पापके ही संकल्प उठते थे। उसकी स्त्री और पुत्र भी उसी स्वभावके थे। एक दिन अपनी पत्नीकी प्रेरणासे वह घने जङ्गलमें घुस गया। वहाँ उस पापीने अनेक प्रकारके मृगों और पक्षियोंका वध किया। कितनोंको जीवित ही पकड़कर पिंजड़ेमें डाल दिया। इस प्रकार बहुत दूरतक घूम-फिरकर वह अपने घरकी ओर लौटा। तीसरे पहरका समय था। चैत्र और वैशाख बीत चुके थे। एक ही क्षणमें बिजली कौंधने लगी और आकाशमें मेघोंकी घटा छा गयी। हवा चली और पानीके साथ पत्थरोंकी वर्षा होने लगी। मूसलाधार वर्षा होनेके कारण बड़ी भयंकर अवस्था हो गयी। व्याध राह चलते-चलते थक गया था। जलकी अधिकताके कारण मार्गका ज्ञान नहीं हो पाता था। जल, थल और गड्ढेकी पहचान असम्भव हो गयी थी। उस समय वह पापी सोचने लगा, 'कहाँ जाऊँ, कहाँ ठहरूँ, क्या करूँ? मैं यमराजकी भाँति सब प्राणियोंके प्राण लिया करता हूँ। आज

  • वाराहतीर्थ, कुशावर्त, नीलगङ्गा और कपोततीर्थकी महिमा * १५९

मेरा भी प्राणान्त कर देनेवाली पत्थरोंकी वृष्टि हो रही है। आसपास कोई ऐसी शिला अथवा वृक्ष नहीं दिखलायी देता, जहाँ मेरी रक्षा हो सके।'

इस प्रकार भाँति-भाँतिकी चिन्तामें पड़े हुए व्याधने थोड़ी ही दूरपर एक उत्तम वृक्ष देखा, जो शाखा और पल्लवोंसे सुशोभित हो रहा था। वह उसीकी छायामें आकर बैठ गया। उसके सब वस्त्र भीग गये थे। वह इस चिन्तामें पड़ा था कि मेरे स्त्री-बच्चे जीवित होंगे या नहीं। इसी समय सूर्यास्त भी हो गया। उसी वृक्षपर एक कबूतर अपनी स्त्री और पुत्र-पौत्रोंके साथ रहता था। वह वहाँ सुखसे निर्भय होकर पूर्ण तृप्त और प्रसन्न था। उस वृक्षपर रहते हुए उसके कई वर्ष बीत चुके थे। उसकी स्त्री कबूतरी बड़ी पतिव्रता थी। वह अपने पतिके साथ उस वृक्षके खोखलेमें रहा करती थी। वहाँ हवा और पानीसे पूरा बचाव था। उस दिन दैववश कपोत और कपोती दोनों ही चारा चुगनेके लिये गये थे, किंतु केवल कपोत ही लौटकर उस वृक्षपर आया। भाग्यवश कपोती भी वहीं व्याधके पिंजड़ेमें पड़ी थी। व्याधने उसे पकड़ लिया था, परंतु अभीतक उसके प्राण नहीं गये थे। कपोत अपनी संतानोंको मातृहीन देखकर चिन्तित हुआ। भयानक वर्षा हो रही थी। सूर्य डूब चुका था, फिर भी वह वृक्षका खोखला कपोतीसे खाली ही रह गया—यह विचारकर कपोत विलाप करने लगा। उसे इस बातका पता नहीं था कि कपोती यहीं पिंजड़ेमें बँधी पड़ी है। कपोतने अपनी प्रियाके गुणोंका वर्णन आरम्भ किया—'हाय! मेरे हर्षको बढ़ानेवाली कल्याणमयी कपोती न जाने क्यों अभीतक नहीं आयी। वही मेरे धर्मकी जननी है—उसके सहयोगसे ही मैं धर्मका सम्पादन कर पाता हूँ। मेरे इस शरीरकी स्वामिनी भी वही है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिमें वही सर्वदा मेरी सहायता करती है। मुझे प्रसन्न देखकर वह हँसती है और खिन्न जानकर मेरे दुःखोंका निवारण करती है। उचित सलाह देनेमें वह मेरी सखी है और सदा मेरी आज्ञाके ही पालनमें संलग्न रहती है। सूर्य अस्त हो गया तो भी वह कल्याणी अभीतक नहीं आयी। वह पतिके सिवा दूसरा कोई व्रत, मन्त्र, देवता, धर्म अथवा अर्थ नहीं जानती। वह पतिव्रता है। पतिमें ही उसके प्राण बसते हैं। पति ही उसका मन्त्र और पति ही उसका प्रियतम है। मेरी कल्याणमयी भार्या अभीतक नहीं आयी। क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? मेरा यह घर उसके बिना आज जङ्गल-सा दिखायी देता है। उसके रहनेपर भयंकर स्थान भी शोभासम्पन्न और सुन्दर दिखायी देता है। जिसके रहनेपर यह घर वास्तवमें घर कहलाता है, वह मेरी प्रिय भार्या अबतक नहीं आयी। मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकूँगा। अपने प्रिय शरीरको भी त्याग दूँगा। किंतु ये बच्चे क्या करेंगे। ओह! आज मेरा धर्म लुप्त हो गया है।'

इस प्रकार विलाप करते हुए स्वामीके वचन सुनकर पिंजड़ेमें पड़ी हुई कपोती बोली—'खगश्रेष्ठ! मैं यहाँ पिंजड़ेमें बँधी हुई बेबस हो गयी हूँ। महामते! यह व्याध मुझे जालमें फँसाकर ले आया है। आज मैं धन्य हूँ और अनुगृहीत हूँ; क्योंकि पतिदेव मेरे गुणोंका बखान करते हैं। मुझमें जो गुण हैं और जो नहीं हैं, उन सबका मेरे पतिदेव गान कर रहे हैं। इससे मैं निस्सन्देह कृतार्थ हो गयी। पतिके संतुष्ट होनेपर स्त्रियोंपर सम्पूर्ण देवता संतुष्ट हो जाते हैं। इसके विपरीत यदि पति असंतुष्ट हो तो स्त्रियोंका अवश्य नाश हो जाता है। प्राणनाथ! तुम्हीं मेरे देवता, तुम्हीं प्रभु, तुम्हीं सुहृद्, तुम्हीं शरण,

१६० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


तुम्हीं व्रत, तुम्हीं स्वर्ग, तुम्हीं परब्रह्म और तुम्हीं मोक्ष हो।१ आर्य! मेरे लिये चिन्ता न करो। अपनी बुद्धिको धर्ममें स्थिर करो। तुम्हारी कृपासे मैंने बहुतेरे भोग भोग लिये हैं।'

अपनी प्रिया कपोतीका यह वचन सुनकर कपोत उस वृक्षसे उतर आया और पिंजड़ेमें पड़ी हुई कपोतीके पास गया। वहाँ पहुँचकर उसने देखा, मेरी प्रिया जीवित है और व्याध मृतककी भाँति निश्चेष्ट हो रहा है। तब उसने उसे बन्धनसे छुड़ानेका विचार किया। कपोतीने रोकते हुए कहा—'महाभाग! संसारका सम्बन्ध स्थिर रहनेवाला नहीं है, ऐसा जानकर मुझे बन्धनसे मुक्त न करो। इसमें मुझे व्याधका अपराध नहीं जान पड़ता। तुम अपनी धर्ममयी बुद्धिको दृढ़ करो। ब्राह्मणोंके गुरु अग्नि हैं। सब वर्णोंका गुरु ब्राह्मण है। स्त्रियोंका गुरु उसका पति है और सब लोगोंका गुरु अभ्यागत है। जो लोग अपने घरपर आये हुए अतिथिको वचनोंद्वारा संतुष्ट करते हैं, उनके उन वचनोंसे वाणीकी अधीश्वरी सरस्वती देवी तृप्त होती हैं। अतिथिको अन्न देनेसे इन्द्र तृप्त होते हैं। उसके पैर धोनेसे पितर, उसके भोजन करनेसे प्रजापति, उसकी सेवा-पूजासे लक्ष्मीसहित श्रीविष्णु तथा उसके सुखपूर्वक शयन करनेपर सम्पूर्ण देवता तृप्त होते हैं। अतः अतिथि सबके लिये परम पूजनीय है। यदि सूर्यास्तके बाद थका-माँदा अतिथि घरपर आ जाय तो उसे देवता समझे; क्योंकि वह सब यज्ञोंका फलरूप है। थके हुए अतिथिके साथ गृहस्थके घरपर सम्पूर्ण देवता, पितर और अग्नि भी पधारते हैं। यदि अतिथि तृप्त हुआ तो उन्हें भी बड़ी प्रसन्नता होती है और यदि वह निराश होकर चला गया तो वे भी निराश होकर ही लौटते हैं।२ अतः प्राणनाथ! आप सर्वथा दुःख छोड़कर शान्ति धारण कीजिये और अपनी बुद्धिको शुभमें लगाकर धर्मका सम्पादन कीजिये। दूसरोंके द्वारा किये हुए उपकार और अपकार दोनों ही साधु पुरुषोंके विचारसे श्रेष्ठ हैं। उपकार करनेवालोंपर तो सभी उपकार करते हैं। अपकार करनेवालोंके साथ जो अच्छा बर्ताव करे, वही पुण्यका भागी बताया गया है।३

**कपोत बोला—**सुमुखि! तुमने हम दोनोंके


१. तुष्टे भर्तरि नारीणां तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः। विपर्यये तु नारीणामवश्यं नाशमाप्नुयात्॥
त्वं दैवं त्वं प्रभुर्मह्यं त्वं सुहृत्त्वं परायणम्। त्वं व्रतं त्वं परं ब्रह्म स्वर्गो मोक्षस्त्वमेव च॥
(८०।४०-४१)

२. गुरुर्ग्निद्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः॥
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः। अभ्यागतमनुप्राप्तं वचनैस्तोषयन्ति ये॥
तेषां वागीश्वरी देवी तृप्ता भवति निश्चितम्। तस्यान्नस्य प्रदानेन शक्रस्तृप्तिमवाप्नुयात्॥
पितरः पादशौचेन अन्नाद्येन प्रजापतिः। तस्योपचाराद्वै लक्ष्मीर्विष्णुना प्रीतिमाप्नुयात्॥
शयने सर्वदेवास्तु तस्मात्पूज्यतमोऽतिथिः।
अभ्यागतमनुश्रान्तं सूर्योढं गृहमागतम्। तं विद्याद्देवरूपेण सर्वक्रतुफलो ह्यसौ॥
अभ्यागतं श्रान्तमनुव्रजन्ति देवाश्च सर्वे पितरोऽग्नयश्च। तस्मिन् हि तृप्ते मुदमाप्नुवन्ति गते निराशेऽपि च ते निराशाः॥
(८०।४७—५२)

३. उपकारोऽपकारश्च प्रवराविति सम्मतौ। उपकारिषु सर्वोऽपि करोत्युपकृतिं पुनः॥
अपकारिषु यः साधुः पुण्यभाक् स उदाहृतः॥
(८०।५४-५५)

* वाराहतीर्थ, कुशावर्त, नीलगङ्गा और कपोततीर्थकी महिमा *१६१

योग्य ही उत्तम बात कही है; किंतु इस विषयमें मुझे कुछ और भी कहना है, उसे सुनो। कोई एक हजार प्राणियोंका भरण-पोषण करता है। दूसरा दसका ही निर्वाह करता है और कोई ऐसा है, जो सुखपूर्वक केवल अपनी जीविकाका काम चला लेता है; किंतु हमलोग ऐसे जीवोंमेंसे हैं, जो अपना ही पेट बड़े कष्टसे भर पाते हैं। कुछ लोग खाई खोदकर उसमें अन्न भरकर रखते हैं। कुछ लोग कोठेभर धानके धनी होते हैं और कितने ही घड़ोंमें धान भरकर रखते हैं; परंतु हमारे पास तो उतना ही संग्रह होता है, जितना अपनी चोंचमें आ जाय। शुभे! तुम्हीं बताओ, ऐसी दशामें इस थके-माँदे अतिथिका आदर-सत्कार मैं किस प्रकार करूँ?

कपोतीने कहा—नाथ! अग्नि, जल, मीठी वाणी, तृण और काष्ठ आदि जो भी सम्भव हो, वह अतिथिको देना चाहिये। यह व्याध सर्दीसे कष्ट पा रहा है।^१

अपनी प्यारी स्त्रीका कथन सुनकर पक्षिराज कपोतने पेड़पर चढ़कर सब ओर देखा तो कुछ दूरीपर उसे आग दिखायी दी। वहाँ जाकर वह चोंचसे एक जलती हुई लकड़ी उठा लाया और व्याधके आगे रखकर अग्निको प्रज्वलित किया; फिर सूखे काठ, पत्ते और तिनके बार-बार आगमें डालने लगा। आग प्रज्वलित हो उठी। उसे देखकर सर्दीसे दुःखी व्याधने अपने जड़वत् बने हुए अङ्गोंको तपाया। इससे उसको बड़ा आराम मिला। कपोतीने देखा व्याध क्षुधाकी आगमें जल रहा है, तब उसने अपने स्वामीसे कहा—'महाभाग! मुझे आगमें डाल दीजिये। मैं अपने शरीरसे इस दुःखी व्याधको तृप्त करूँगी। सुव्रत! ऐसा करनेसे तुम अतिथि-सत्कार करनेवाले पुण्यात्माओंके लोकमें जाओगे।'

कपोत बोला—शुभे! मेरे जीते-जी यह तुम्हारा धर्म नहीं है। मुझे ही आज्ञा दो। मैं ही आज अतिथि-यज्ञ करूँगा।

यों कहकर कपोतने सबको शरण देनेवाले भक्तवत्सल विश्वरूप चतुर्भुज महाविष्णुका स्मरण करते हुए अग्निकी तीन बार परिक्रमा की; फिर व्याधसे यह कहते हुए अग्निमें प्रवेश किया कि 'मुझे सुखपूर्वक उपयोगमें लाओ।' कपोतने अपने जीवनको अग्निमें होम दिया, यह देख व्याध कहने लगा—'अहो! मेरे इस मनुष्य-शरीरका जीवन धिक्कार देने योग्य है, क्योंकि मेरे ही लिये पक्षिराजने यह साहसपूर्ण कार्य किया है।' यों कहते हुए व्याधसे कपोतीने कहा—'महाभाग! अब मुझे छोड़ दो। देखो, मेरे ये पतिदेव मुझसे दूर चले जा रहे हैं।' उसकी बात सुनकर व्याध सहम गया और तुरंत ही पिंजड़ेमें पड़ी हुई कपोतीको उसने छोड़ दिया। तब उसने भी पति और अग्निकी परिक्रमा करके कहा—'स्वामीके साथ चितामें प्रवेश करना स्त्रियोंके लिये बहुत बड़ा धर्म है। वेदमें इस मार्गका विधान है और लोकमें भी सबने इसकी प्रशंसा की है। जैसे साँप पकड़नेवाला मनुष्य साँपको बिलसे बलपूर्वक निकाल लेता है, उसी प्रकार पतिका अनुगमन करनेवाली नारी पतिके साथ ही स्वर्गलोकमें जाती है।' ^२

यों कहकर कपोतीने पृथ्वी, देवता, गङ्गा


१. अग्निरपः शुभा वाणी तृणकाष्ठादिकं च यत्। एतदप्यर्थिने देयं शीतार्तो लुब्धकस्त्वयम्॥ (८०।६०)
२. स्त्रीणामयं परो धर्मो यद्भर्तुरनुवेशनम्। वेदे च विहितो मार्गः सर्वलोकेषु पूजितः॥
व्यालग्राही यथा व्यालं बिलादुद्धरते बलात्। एवं त्वनुगता नारी सह भर्त्रा दिवं व्रजेत्॥
(८०।७५-७६)

४१- दशाश्वमेधिक और पैशाचतीर्थका माहात्म्य

१६२* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

तथा वनस्पतियोंको नमस्कार किया और अपने बच्चोंको सान्त्वना देकर व्याधसे कहा—'महाभाग! तुम्हारी ही कृपासे मेरे लिये ऐसा शुभ अवसर प्राप्त हुआ है। मैं पतिके साथ स्वर्गलोकमें जाती हूँ।' यों कहकर वह पतिव्रता कपोती आगमें प्रवेश कर गयी। इसी समय आकाशमें जय-जयकारकी ध्वनि गूँज उठी। तत्काल ही सूर्यके समान तेजस्वी अत्यन्त सुन्दर विमान उतर आया। दोनों दम्पति देवताके समान दिव्य शरीर धारण करके उसपर आरूढ़ हुए और आश्चर्यमें पड़े हुए व्याधसे प्रसन्न होकर बोले—'महामते! हम देवलोकमें जाते हैं और तुम्हारी आज्ञा चाहते हैं। तुम अतिथिके रूपमें हम दोनोंके लिये स्वर्गकी सीढ़ी बनकर आ गये। तुम्हें नमस्कार है।'

उन दोनोंको श्रेष्ठ विमानपर बैठे देख व्याधने अपना धनुष और पिंजड़ा फेंक दिया और हाथ जोड़कर कहा—'महाभाग! मेरा त्याग न करो। मैं अज्ञानी हूँ। मुझे भी कुछ दो। मैं तुम्हारे लिये आदरणीय अतिथि होकर आया था, इसलिये मेरे उद्धारका उपाय बतलाओ।'

उन दोनोंने कहा—व्याध! तुम्हारा कल्याण हो। तुम भगवती गोदावरीके तटपर जाओ और उन्हींको अपना पाप भेंट कर दो। वहाँ पंद्रह दिनोंतक डुबकी लगानेसे तुम सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे। पापमुक्त होनेपर जब पुनः गौतमी गङ्गामें स्नान करोगे, तब अश्वमेध-यज्ञका फल पाकर अत्यन्त पुण्यवान् हो जाओगे। नदियोंमें श्रेष्ठ गोदावरी ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजीके अंशसे प्रकट हुई हैं। उनके भीतर पुनः गोते लगाकर जब तुम अपने मलिन शरीरको त्याग दोगे, तब निश्चय ही श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकमें पहुँच जाओगे।

उन दोनोंकी बात सुनकर व्याधने वैसा ही किया, फिर वह भी दिव्य रूप धारण करके एक श्रेष्ठ विमानपर जा बैठा। कपोत, कपोती और व्याध—तीनों ही गौतमी गङ्गाके प्रभावसे स्वर्गमें चले गये। तभीसे वह स्थान कपोततीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वहाँ स्नान, दान, पितरोंकी पूजा, जप और यज्ञ आदि कर्म करनेपर वे अक्षय फलको देनेवाले होते हैं।


दशाश्वमेधिक और पैशाचतीर्थका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं— गोदावरी गङ्गामें कार्तिकेयजीका भी एक तीर्थ है, जो बहुत उत्तम है। वह कौमार-तीर्थके नामसे भी प्रसिद्ध है। उसका नाम सुननेमात्रसे मनुष्य कुलीन और रूपवान् होता है। उसके आगे कृत्तिकातीर्थ है, जिसके श्रवणमात्रसे सोमपानका फल मिलता है। महामुने! अब दशाश्वमेधिक तीर्थका माहात्म्य सुनो। उसके श्रवणमात्रसे अश्वमेध-यज्ञके फलकी

* दशाश्वमेधिक और पैशाचतीर्थका माहात्म्य * १६३

प्राप्ति होती है। विश्वकर्माके पुत्र महाबली विश्वरूप हुए। विश्वरूपके प्रथम नामक पुत्र हुआ। उसके पुत्रका नाम भौवन हुआ। महाबाहु भौवन सार्वभौम राजा हुए। उनके पुरोहित कश्यप थे, जो सब प्रकारके ज्ञानमें निपुण थे। एक दिन महाबाहु भौवनने अपने पुरोहितसे पूछा—'मुने! मैं एक ही साथ दस अश्वमेध-यज्ञ करना चाहता हूँ। वह यज्ञ कहाँ करूँ?' कश्यपने प्रयागका नाम लिया और उन-उन स्थानोंपर यज्ञ करनेको बताया, जहाँ श्रेष्ठ द्विजोंने पूर्वकालमें बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। राजाके यज्ञमें बहुत-से ऋषि ऋत्विज हुए। पुरोहितने एक ही साथ दस अश्वमेध-यज्ञ आरम्भ किये, किंतु उनमेंसे एक भी पूर्ण न हुआ। यह देखकर राजाको बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने प्रयाग छोड़कर अन्य स्थानोंमें उन यज्ञोंका आरम्भ किया, किंतु वहाँ भी विघ्न-दोष आ पहुँचे। इस प्रकार अपने यज्ञोंको अपूर्ण देख राजाने पुरोहितसे कहा—'देश और कालके दोषसे अथवा मेरे और आपके दोषसे हमारे दस अश्वमेध-यज्ञ पूर्ण नहीं हो पाते।' यों कहकर दुःखी हुए राजा भौवन अपने पुरोहित कश्यपके साथ बृहस्पतिके ज्येष्ठ भ्राता संवर्तके पास गये और इस प्रकार बोले—'भगवन्! मुझे ऐसा कोई उत्तम प्रदेश बतलाइये, जहाँ एक ही साथ आरम्भ किये हुए दस अश्वमेध-यज्ञ पूर्ण हो जायँ।' तब मुनिश्रेष्ठ संवर्तने कुछ कालतक ध्यान करके महाराज भौवनसे कहा—'ब्रह्माजीके पास जाओ। वे ही उत्तम प्रदेश बतायेंगे।'

महाबुद्धिमान् भौवन महात्मा कश्यपको साथ ले मेरे पास आ पहुँचे और मुझसे भी उत्तम देश आदिके विषयमें प्रश्न करने लगे। उस समय मैंने भौवन और कश्यपसे कहा—'राजेन्द्र! तुम गोदावरीके तटपर जाओ। वही यज्ञके लिये पुण्यवान् प्रदेश है। वेदोंके पारगामी विद्वान् ये महर्षि कश्यप ही श्रेष्ठ गुरु हैं। इनकी कृपा और गौतमी गङ्गाके प्रसादसे एक ही अश्वमेधसे अथवा वहाँ स्नान करनेमात्रसे तुम्हारे दस अश्वमेध-यज्ञ सिद्ध हो जायेंगे।' यह सुनकर राजा भौवन कश्यपजीके साथ गौतमीके तटपर आये और वहाँ अश्वमेध-यज्ञकी दीक्षा ग्रहण की। वह महायज्ञ आरम्भ होकर जब पूर्ण हो गया, तब राजा इस पृथ्वीका दान करनेको उद्यत हुए। उसी समय आकाशवाणी हुई—'राजन्! तुमने पुरोहित कश्यपजीको पर्वत, वन और काननोंसहित पृथ्वी देनेकी कामना करके सब कुछ दान कर दिया। अब भूमिदानकी अभिलाषा छोड़कर अन्नदान करो। वह महान् फल देनेवाला है। तीनों लोकोंमें अन्नदानके समान दूसरा पुण्यकार्य नहीं है। विशेषतः गङ्गाजीके तटपर श्रद्धाके साथ किये हुए अन्नदानकी महिमा अकथनीय है।*

तुमने जो प्रचुर दक्षिणासे युक्त यह अश्वमेध-यज्ञ किया है, इससे तुम कृतार्थ हो गये। अब इस विषयमें तुम्हें अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। तिल, गौ, धन, धान्य—जो कुछ भी गोदावरीके तटपर दिया जाता है, वह सब अक्षय हो जाता है।

यह सुनकर सम्राट् भौवनने ब्राह्मणोंको बहुत-सा अन्नदान किया। तबसे वह तीर्थ दशाश्वमेधिकके नामसे विख्यात हुआ। वहाँ स्नान करनेसे दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है।

उससे आगे पैशाचतीर्थ है, जो ब्रह्मवादी


* भूमिदानस्पृहां त्यक्त्वा अन्नं देहि महाफलम्। नान्नदानसमं पुण्यं त्रिषु लोकेषु विद्यते॥
विशेषतस्तु गङ्गायाः श्रद्धया पुलिने मुने।
(८३। २१-२२)

४२- क्षुधातीर्थ और अहल्या-संगमतीर्थका माहात्म्य

१६४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

महर्षियोंद्वारा सम्मानित है। यह गोदावरीके दक्षिण-तटपर स्थित है। अब मैं उसका स्वरूप बतलाता हूँ, सुनो। मुनिश्रेष्ठ नारद! ब्रह्मगिरिके पार्श्वभागमें अञ्जन नामसे प्रसिद्ध एक पर्वत है। वहाँ एक सुन्दरी अप्सरा शापभ्रष्ट होकर उत्पन्न हुई। उसका नाम अञ्जना था। उसके सब अङ्ग बहुत सुन्दर थे, किंतु मुँह वानरीका था। केसरी नामक श्रेष्ठ वानर अञ्जनाके पति थे। केसरीके एक दूसरी भी स्त्री थी, जिसका नाम अद्रिका था। वह भी शापभ्रष्ट अप्सरा ही थी। उसके भी सब अङ्ग सुन्दर थे। किंतु मुँह बिल्लीके समान था। अद्रिका भी अञ्जन पर्वतपर ही रहती थी। एक समय केसरी दक्षिणसमुद्रके तटपर गये थे। इसी बीचमें महर्षि अगस्त्य अञ्जन पर्वतपर आये। अञ्जना और अद्रिका दोनोंने महर्षिका यथोचित पूजन किया। इससे प्रसन्न होकर महर्षिने कहा—'तुम दोनों वर माँगो।' वे बोलीं—'मुनीश्वर! हमें ऐसे पुत्र दीजिये, जो सबसे बलवान्, श्रेष्ठ और सब लोगोंका उपकार करनेवाले हों।' 'तथास्तु' कहकर मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य दक्षिण दिशामें चले गये। कुछ कालके बाद अञ्जनाने वायुके अंशसे हनुमान्‌जीको जन्म दिया और अद्रिकाके गर्भसे निर्ऋतिके अंशसे पिशाचोंका राजा अद्रि उत्पन्न हुआ। इसके बाद उन दोनों स्त्रियोंने उक्त देवताओंसे कहा—'हमें मुनिके वरदानसे पुत्र तो प्राप्त हुए, किंतु इन्द्रके शापसे हमारा मुख कुरूप होनेके कारण सारा शरीर ही विकृत हो गया है। इसे दूर करनेके लिये हम क्या उपाय करें—इसे आप दोनों बतायें।' तब भगवान् वायु और निर्ऋतिने कहा—'गोदावरीमें स्नान और दान करनेसे तुम्हें शापसे छुटकारा मिल जायगा।' यों कहकर वे दोनों वहीं अन्तर्धान हो गये। तब पिशाचरूपधारी अद्रिने अपने भाई हनुमान्‌जीको प्रसन्न करनेके लिये माता अञ्जनाको लाकर गोदावरीमें नहलाया। इसी प्रकार हनुमान्‌जी भी अद्रिकाको लेकर बड़ी उतावलीके साथ गौतमी गङ्गाके तटपर आये। तबसे वह पैशाच और आञ्जनतीर्थके नामसे विख्यात हुआ। वह समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला शुभ तीर्थ है। ब्रह्मगिरिसे तिरपन योजन पूर्वकी ओर मार्जार-तीर्थ है। मार्जार-तीर्थसे आगे हनुमत्-तीर्थ और वृषाकपि-तीर्थ है। उसके आगे फेना-संगमतीर्थ बताया गया है, जो समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। उसका स्वरूप और फल उसीके प्रसङ्गमें बताया जायगा।

क्षुधातीर्थ और अहल्या-संगम-तीर्थका माहात्म्य

ब्रह्माजी कहते हैं— नारद! अब क्षुधातीर्थका वर्णन करता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो। वह परम पुण्यमय तीर्थ मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। पूर्वकालमें कण्व नामसे प्रसिद्ध एक ऋषि थे। वे वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और तपस्वी थे। महर्षि कण्व भूखसे पीड़ित होकर अनेक आश्रमोंपर घूमा करते थे। एक दिन वे गौतमके पवित्र आश्रमपर आये। वह आश्रम अन्न और जलसे सम्पन्न था। अपनेको क्षुधासे पीड़ित और गौतमको वैभवशाली देख कण्वका मन विरक्तिसे भर गया। वे सोचने लगे—'गौतम भी एक श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं और मैं भी उन्हींकी भाँति तपोनिष्ठ हूँ। बराबरवालेके पास याचना करना कदापि उचित नहीं है। अतः यद्यपि मैं भूखसे व्याकुल हूँ और मेरे शरीरमें पीड़ा भी हो रही है, तथापि गौतमके घरमें भोजन नहीं करूँगा। इस समय गौतमी गङ्गाके तटपर चलूँ और उन्हींसे सम्पत्ति माँगूँ।' ऐसा निश्चय करके महर्षि कण्व परम पावन

६१- कण्वके द्वारा गङ्गा और क्षुधाकी स्तुति

  • क्षुधातीर्थ और अहल्या-संगम-तीर्थका माहात्म्य * । १६५

गङ्गाजीके तटपर गये और स्नान करके पवित्र एवं संयतचित्त हो कुशासनपर बैठकर गौतमी गङ्गा तथा क्षुधादेवीकी स्तुति करने लगे।

कण्व बोले— भारी पीड़ाओंको हरनेवाली भगवती गङ्गा! तुम्हें नमस्कार है तथा सब लोगोंको पीड़ा देनेवाली क्षुधादेवी! तुमको भी नमस्कार है। महादेवजीकी जटासे प्रकट हुई कल्याणमयी गौतमी! तुम्हें नमस्कार है तथा महामृत्युके मुखसे निकली हुई क्षुधादेवी! तुम्हें भी नमस्कार है। देवि! तुम्हीं पुण्यात्माओंके लिये शान्तिरूपा और दुरात्माओंके लिये क्रोधस्वरूपा हो। नदीके रूपसे सबके पाप-ताप हर लेती हो और क्षुधारूपमें आकर सबको पाप-ताप देती रहती हो। कल्याणकारिणी देवी! तुम्हें नमस्कार है। पापोंका दमन करनेवाली गङ्गा! तुम्हें प्रणाम है। भगवती शान्तिकरी! तुम्हें नमस्कार है। दरिद्रताका विनाश करनेवाली देवी! तुम्हें प्रणाम है!

कण्वके इस प्रकार स्तुति करनेपर उनके सामने दो रूप प्रकट हुए—'एक तो गङ्गाका मनोहर स्वरूप और दूसरी क्षुधाकी भयानक मूर्ति। द्विजश्रेष्ठ कण्वने पुनः हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए कहा—'देवि गोदावरी! तुम सम्पूर्ण मङ्गलोंके लिये भी मङ्गलमयी हो। शुभे! ब्राह्मी, माहेश्वरी, वैष्णवी और त्र्यम्बका—ये सब तुम्हारे ही नाम हैं। तुम्हें नमस्कार है। भगवान् त्र्यम्बककी जटासे प्रकट होकर महर्षि गौतमका पाप नष्ट करनेवाली गोदावरी! तुम सात धाराओंमें विभक्त होकर समुद्रमें मिलती हो। तुम्हें नमस्कार है। क्षुधादेवी! तुम समस्त पापियोंके लिये पापमयी, दुःखमयी और लोभमयी हो। धर्म, अर्थ और कामका नाश करनेवाली भी तुम्हीं हो। तुम्हें बारंबार नमस्कार है।'

कण्वका यह वचन सुनकर गङ्गा और क्षुधा दोनों ही बहुत प्रसन्न हुईं और बोलीं—'सुव्रत! तुम मनोवाञ्छित वर माँगो।' तब कण्वने गङ्गाजीको प्रणाम करके कहा—'देवि! मुझे मनके अनुकूल भोग, वैभव, आयु, धन और मोक्ष प्रदान कीजिये।' गङ्गासे यों कहकर द्विजश्रेष्ठ कण्वने क्षुधादेवीसे कहा—'क्षुधे! तुम तृष्णा एवं दरिद्रतारूपिणी, अत्यन्त पापमयी तथा रूक्ष स्वभाववाली हो। मेरे अथवा मेरे वंशजोंके यहाँ तुम कभी न रहना। जो क्षुधातुर मनुष्य इस स्तोत्रसे तुम्हारी स्तुति करें, उनके दारिद्र्य और दुःखका नाश हो जाय।* जो लोग इस परम पुण्यमय तीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान, दान और जप आदि करें, वे धन-सम्पत्तिके भागी हों।


* मयि मद्वंशजे चापि क्षुधे तृष्णे दरिद्रिणि। याहि पापतरे रूक्षे न भूयास्त्वं कदाचन॥
अनेन स्तवेन ये वै त्वां स्तुवन्ति क्षुधातुराः। तेषां दारिद्र्यदुःखानि न भवेयुर्वरोऽपरः॥
(८५।२०-२१)

६२- गौतमके द्वारा प्रसवकालमें गायकी परिक्रमा

१६६* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

जो तीर्थ अथवा अपने घरमें इस स्तोत्रका पाठ करे, उसे दरिद्रता और दुःखसे कभी भय न हो।'

'एवमस्तु' कहकर गङ्गा और क्षुधा दोनों अपने-अपने स्थानको चली गयीं। तबसे उस तीर्थके तीन नाम हो गये—काण्वतीर्थ, गाङ्गतीर्थ और क्षुधातीर्थ। नारद! वह तीर्थ सब पापोंको दूर करनेवाला और पितरोंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाला है।

गोदावरीमें अहल्यासंगम नामक एक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाला है। मुनिश्रेष्ठ! उस तीर्थकी उत्पत्तिका वृत्तान्त सुनो। पूर्वकालकी बात है, मैंने अत्यन्त कौतूहलवश कुछ सुन्दरी कन्याओंकी सृष्टि की। उनमेंसे एक कन्या सबसे श्रेष्ठ और उत्तम लक्षणोंसे युक्त थी। उसके सब अङ्ग बड़े मनोहर तथा रूप और गुणोंसे सम्पन्न थे। उस समय मेरे मनमें यह विचार हुआ कि कौन पुरुष इस कन्याका पालन-पोषण करनेमें समर्थ है। सोचनेपर महर्षि गौतम ही मुझे समस्त गुणोंमें श्रेष्ठ, तपस्वी, बुद्धिमान्, समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित और वेद-वेदाङ्गोंके ज्ञाता प्रतीत हुए। अतः उन्हींको मैंने वह कन्या दे दी और कहा—'मुनिश्रेष्ठ! जबतक यह युवती न हो जाय, तबतक तुम्हीं इसका पालन-पोषण करना। युवावस्था होनेपर पुनः इस साध्वी कन्याको मेरे पास ले आना।' यों कहकर मैंने गौतमको वह कन्या समर्पित कर दी। गौतम अपने तपोबलसे निष्पाप हो चुके थे। उन्होंने विधिपूर्वक उस कन्याका पालन-पोषण किया और युवती होनेपर उसे वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित करके मेरे पास ले आये। उस समय उनके मनमें कोई विकार नहीं था। अहल्याको देखकर इन्द्र, अग्नि और वरुण आदि सब देवता बारी-बारीसे मेरे पास आये और कहने लगे—'सुरेश्वर! यह कन्या मुझे दे दीजिये।' इन्द्रका तो उसके लिये विशेष आग्रह था। महर्षि गौतमकी महत्ता, गम्भीरता और धीरताका विचार करके मुझे बड़ा विस्मय हुआ। मैंने सोचा—'यह सुमुखी कन्या गौतमको ही देने योग्य है और किसीको नहीं। अतः उन्हींको दूँगा।' ऐसा निश्चय करके मैंने देवताओं और ऋषियोंसे कहा—'यह सुन्दरी कन्या उसीको दी जायगी, जो सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके सबसे पहले यहाँ उपस्थित हो जाय; दूसरे किसीको नहीं मिलेगी।

मेरी बात सुनकर सब देवता अहल्याकी प्राप्तिके लिये पृथ्वीकी परिक्रमा करने चले गये। इसी बीचमें कामधेनु सुरभि बच्चा देने लगी। अभी बच्चेका आधा शरीर ही बाहर निकला था। उसी अवस्थामें गौतमने उसे देखा और उसीको पृथ्वीभावसे देखते हुए उसकी परिक्रमा की। साथ ही उन्होंने शिवलिङ्गकी भी प्रदक्षिणा की। इसके बाद सोचा, सम्पूर्ण देवताओंने अभी पृथ्वीकी एक परिक्रमा भी पूरी नहीं की और मेरे द्वारा दो परिक्रमाएँ पूरी हो गयीं। ऐसा निश्चय करके वे मेरे समीप

  • क्षुधातीर्थ और अहल्या-संगम-तीर्थका माहात्म्य * १६७

आये और मुझे प्रणाम करके बोले— 'कमलासन! विश्वात्मन्! आपको बारंबार नमस्कार है। ब्रह्मन्! मैंने सारी वसुधाकी प्रदक्षिणा कर ली।' मैंने ध्यानके द्वारा सब बातें जानकर गौतमसे कहा—'ब्रह्मर्षे! तुम्हींको यह सुन्दरी कन्या दी जाती है। वास्तवमें तुमने पृथ्‍वीकी परिक्रमा पूरी कर ली। जो वेदोंके लिये भी दुर्बोध है, उस धर्मका स्वरूप तुम जानते हो। जो गाय आधा प्रसव कर चुकी हो, वह सात द्वीपोंवाली पृथ्‍वीके तुल्य है। उसकी परिक्रमा कर ली जाय तो समूची पृथ्‍वीकी परिक्रमा हो जाती है। शिवलिङ्गकी प्रदक्षिणाका भी यही फल है। अतः उत्तम व्रतका पालन करनेवाले गौतम! मैं तुम्हारे धैर्य, ज्ञान और तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ।' यों कहकर मैंने गौतमको अहल्या सौंप दी। उन दोनोंका विवाह हो जानेपर देवतालोग पृथ्‍वीकी परिक्रमा करके धीरे-धीरे आने लगे। आनेपर सबने अहल्याके साथ गौतमका विवाह हुआ देखा। इससे उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। अन्तमें सब देवता स्वर्गमें चले गये, परंतु इन्द्रके मनमें इससे बड़ी ईर्ष्या हुई। मैंने प्रसन्न होकर महात्मा गौतमको रहनेके लिये ब्रह्मगिरि प्रदान किया, जो परम पवित्र, समस्त अभिलषित वस्तुओंको देनेवाला तथा मङ्गलमय है। मुनिश्रेष्ठ गौतम वहाँ अहल्याके साथ विहार करने लगे।

इन्द्रने स्वर्गमें भी गौतमकी पवित्र कथा सुनी। अतः मुनिको, उनके आश्रमको और उनकी सुन्दरी पत्नीको देखनेके लिये वे ब्राह्मणका वेष धारण करके आये। वहाँ आनेपर उन्होंने मनमें पापकी भावना लेकर अहल्याको देखा। उस समय वे अपने-आपको भी भूल गये। देश-कालकी भी सुध न रही और ऋषिके शापका भय भी उन्होंने भुला दिया। उनका हृदय कामके वशीभूत हो रहा था। एक समय महर्षि गौतम मध्याह्नसे पहलेकी क्रिया समाप्त करके शिष्योंके साथ आश्रमसे बाहर गये। उस समय अवसर देखकर इन्द्रने अपने मनके अनुकूल कार्य किया। वे गौतमका रूप धारण करके आश्रममें आये और सर्वाङ्गसुन्दरी अहल्यासे बोले—'प्रिये! मैं तुम्हारे गुणोंसे आकृष्ट हूँ। तुम्हारे रूपका स्मरण करके मेरा मन विचलित हो गया है। पाँव लड़खड़ा रहे हैं।' यों कहकर हँसते-हँसते उन्होंने अहल्याका हाथ पकड़ लिया और आश्रमके भीतर चले गये। अहल्याने उन्हें गौतम ही समझा। यह कोई जार पुरुष है—यह बात उसके ध्यानमें नहीं आयी। वह इन्द्रके साथ सुखपूर्वक रमण करने लगी। इतनेमें ही महर्षि गौतम पुनः अपने शिष्योंके साथ लौट आये। प्रतिदिनका ऐसा नियम था कि जब वे बाहरसे आश्रमपर आते तब प्रियवादिनी अहल्या आगे बढ़कर उनका स्वागत करती, प्रिय लगनेवाली बातें कहती और अपने सद्गुणोंसे उन्हें संतुष्ट करती थी। उस दिन अहल्याको न देखकर परम बुद्धिमान् गौतमको ऐसा जान पड़ा मानो कोई बड़ी अद्भुत बात हो गयी। मुनिश्रेष्ठ गौतम द्वारपर खड़े हैं और सब लोग उनकी ओर देखते हैं। अग्निहोत्र और शालाके रक्षक तथा घरमें कामकाज करनेवाले अनुचर उन्हें देखकर बड़े विस्मयमें पड़े और भयभीत होकर बोले—'भगवन्! यह कैसी विचित्र बात है कि आप भीतर और बाहर दोनों जगह देखे जाते हैं। अहो! आपकी तपस्याका ही यह प्रभाव है कि आप अनेक रूप धारण करके विचरते हैं।'

यह सुनकर गौतमके मनमें बड़ा आश्चर्य हुआ। वे सोचने लगे—आश्रमके भीतर कौन गया है। उन्होंने पुकारा—'प्रिये! अहल्‍ये! आज तुम मुझसे बोलती क्यों नहीं?' महर्षिका वचन सुनकर अहल्याने उस जारसे कहा—'अरे! तू

६३- गौतमका इन्द्र और अहल्याको शाप

१६८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

कौन है, जो मुनिका रूप धारण करके तूने मेरे साथ यह पापकर्म किया है?' यह कहती हुई वह भयके मारे शय्यासे सहसा उठकर खड़ी हो गयी। पापाचारी इन्द्र भी मुनिके भयसे बिलाव बन गया। अहल्या थर-थर काँप रही थी। उसके वेश-भूषा बिगड़ चुके थे। अपनी प्यारी पत्नीको कलङ्कित हुई देख महर्षिने क्रोधमें आकर कहा— 'तुमने यह दुःसाहस कैसे किया?' उनके इस प्रकार पूछनेपर देवी अहल्याने लज्जावश कोई उत्तर नहीं दिया। तब मुनि उस जारकी खोज करने लगे। इतनेमें उस बिलावपर उनकी दृष्टि पड़ी। अरे! ठीक-ठीक बता, तू कौन है? यदि झूठ बोलेगा तो मैं तुझे अभी भस्म कर दूँगा।'

इन्द्र हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला—'तपोधन! मैं शचीका स्वामी इन्द्र हूँ, मुझसे ही यह पाप हो गया है। मैंने जो कुछ कहा है, वह सत्य है। ब्रह्मन्! कामदेवके बाणोंसे जिनका हृदय विदीर्ण हो चुका है, वे कौन-सा दुष्कर्म नहीं करते। आप करुणाके सागर हैं, मुझ महापापीको क्षमा करें। साधु पुरुष अपराधीपर भी कठोरता नहीं दिखाते।'

गौतम बोले—इन्द्र! तूने स्त्रीकी योनिमें आसक्त होकर यह पापकर्म किया है, अतः तेरे शरीरमें योनिके सहस्रों चिह्न हो जायँगे।

इसके बाद मुनिने अहल्यासे भी कुपित होकर कहा—'तू सूखी नदी हो जा।'

अहल्या बोली—भगवन्! जो पापिनी स्त्रियाँ मनसे भी दूसरे पुरुषकी कामना करती हैं, वे तथा उनके समस्त पूर्वज भी अक्षय नरकोंमें पड़ते हैं। आप कृपा करके मेरी बातोंपर ध्यान दें। यह इन्द्र आपका रूप धारण करके मेरे पास आया था। ये सब लोग इस बातके साक्षी हैं।

रक्षकोंने कहा—'ऐसी ही बात है। अहल्या ठीक कहती हैं।' मुनिने भी ध्यानके द्वारा सच्ची बातको जान लिया और शान्त होकर अपनी पतिव्रता पत्नीसे कहा—'कल्याणी! नदी होनेपर जब तुम सरिताओंमें श्रेष्ठ गौतमी गङ्गासे मिलोगी, उस समय पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त कर लोगी।' महर्षिका वचन सुनकर पतिव्रता अहल्याने वैसा ही किया। गौतमी गङ्गासे मिलनेपर पुनः उसका वही स्वरूप हो गया, जैसा मैंने बनाया था। तत्पश्चात् देवराज इन्द्रने हाथ जोड़कर महर्षि गौतमसे कहा—'मुनिश्रेष्ठ! अपने घरपर आये हुए मुझ पापिष्ठकी रक्षा कीजिये।' यों कहकर इन्द्र उनके चरणोंमें गिर पड़े। यह देख महर्षिने कृपापूर्वक कहा—'पुरंदर! तुम्हारा कल्याण हो। तुम गोदावरीके तटपर जाओ और उसमें स्नान करो। इससे तुम्हारे सारे पाप क्षणभरमें धुल जायँगे। तुम्हारे शरीरमें योनिके जो सहस्रों चिह्न हैं, वे नेत्रोंके रूपमें परिणत हो जायँगे। तुम सहस्राक्ष हो जाओगे। नारद! गौतमीके प्रभावसे ये

४३- जनस्थान, अश्वतीर्थ, भानुतीर्थ और अरुणा-वरुणा-संगमकी महिमा

* जनस्थान, अश्वतीर्थ, भानुतीर्थ और अरुणा-वरुणा-संगमकी महिमा * १६९


दो आश्चर्यजनक बातें मैंने देखी हैं—अहल्या नदी होकर पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त हुई और शचीपति इन्द्र सहस्राक्ष हो गये। तबसे वह तीर्थ

अहल्या-संगमके नामसे विख्यात हुआ, उसे इन्द्रतीर्थ भी कहते हैं। वह मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला है।


जनस्थान, अश्वतीर्थ, भानुतीर्थ और अरुणा-वरुणा-संगमकी महिमा

**ब्रह्माजी कहते हैं—**उसके बाद विश्वविख्यात जनस्थान नामक तीर्थ है, जिसका विस्तार चार योजनका है। वह स्मरणमात्रसे मनुष्योंको मुक्ति देनेवाला है। पूर्वकालकी बात है, वैवस्वत मनुके वंशमें जनक नामसे प्रसिद्ध एक राजा हुए। उन्होंने वरुणकी पुत्री गुणार्णवाके साथ विवाह किया था। गुणार्णवा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धि करनेवाली थी। जनकमें भी ये ही गुण थे, अतः राजाको अपने गुणोंके अनुरूप सुयोग्य भार्या मिली। विप्रवर याज्ञवल्क्य राजा जनकके पुरोहित थे। एक दिन राजाने अपने पुरोहितसे पूछा—‘द्विजश्रेष्ठ! बड़े-बड़े मुनियोंने यह निर्णय किया है कि भोग और मोक्ष दोनों श्रेष्ठ हैं; अन्तर इतना ही है कि भोग अन्तमें विरस हो जाता है और मुक्ति नित्य एवं निर्विकार है। अतः भोगसे भी मुक्तिको ही श्रेष्ठ माना गया है। आप बतायें, भोगसे मुक्तिकी प्राप्ति कैसे होती है? सब प्रकारकी आसक्तियोंका त्याग करनेसे जो मुक्ति प्राप्त होती है, वह तो अत्यन्त दुःखसाध्य है; अतः जिस उपायसे अत्यन्त सुखपूर्वक मुक्ति हो सके, वह बताइये।

**याज्ञवल्क्य बोले—**राजन्! साक्षात् भगवान् वरुण तुम्हारे गुरुजन, श्वशुर और हितकारी हैं। उन्हींके पास चलकर पूछो। वे तुम्हें हितका उपदेश देंगे।

तदनन्तर याज्ञवल्क्य और जनक दोनों राजा वरुणके पास गये और वहाँ उन्होंने मुक्तिका मार्ग पूछा।

**वरुणने कहा—**दो प्रकारसे मुक्ति प्राप्त होती है—एक तो कर्म करनेसे और एक कर्म न करनेसे। वेदमें यह मार्ग निश्चित किया गया है कि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ कर्मसे बँधे हुए हैं। नृपश्रेष्ठ! कर्मद्वारा सब प्रकारके साध्योंकी सिद्धि होती है, इसलिये मनुष्योंको सब तरहसे वैदिक कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये। इससे वे इस लोकमें भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करते हैं। अकर्मसे कर्म पवित्र है। कर्म भिन्न-भिन्न आश्रमों और वर्णोंके अनुसार

१७०* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

अनेक प्रकारके होते हैं। वर्णों और आश्रमोंमें भी चार आश्रम कर्मके द्वारा माने गये हैं। उनमें भी गृहस्थाश्रम अधिक पुण्यदायक है। उससे भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त हो सकते हैं।* यही मेरा मत है।†

यह सुनकर राजा जनक और बुद्धिमान् याज्ञवल्क्यने वरुणका पूजन किया और पुनः यह बात पूछी—'सुरश्रेष्ठ! आपको नमस्कार है। आप सर्वज्ञ हैं। बताइये, कौन-सा देश और तीर्थ ऐसा है जो भोग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाला है?

वरुणने कहा— इस पृथ्वीपर भारतवर्ष और उसमें भी दण्डकवन पुण्यदायक है। इसमें किया हुआ शुभ कर्म मनुष्योंको भोग तथा मोक्ष दोनों प्रदान करता है। तीर्थोंमें गौतमी गङ्गा श्रेष्ठ हैं। वे मुक्तिदायिनी मानी गयी हैं। वहाँ यज्ञ और दान करनेसे मोक्षकी प्राप्ति होगी।

वरुणका यह उपदेश सुनकर याज्ञवल्क्य और जनक उनकी आज्ञा ले अपनी पुरीमें लौट आये, फिर गङ्गातीर्थपर जाकर राजा जनकने अश्वमेध आदि यज्ञ किये और विप्रवर याज्ञवल्क्यने उन यज्ञोंमें आचार्यका कार्य किया। गौतमी गङ्गाके तटपर यज्ञ करनेसे राजाको मोक्षकी प्राप्ति हुई। तत्पश्चात् जनकवंशके बहुत-से राजा क्रमशः वहाँ आकर यज्ञ करते और गोदावरीकी कृपासे मोक्षके भागी होते रहे। तभीसे यह तीर्थ जनस्थानके नामसे विख्यात हुआ। जनकोंका यज्ञस्थान होनेसे उसका नाम जनस्थान पड़ गया। वहाँ स्नान, दान और पितरोंका तर्पण करनेसे तथा उस तीर्थका चिन्तन करने, वहाँ जाने और भक्तिपूर्वक उसका सेवन करनेसे मनुष्य सब अभिलषित वस्तुओंको पाता और मोक्षका भागी होता है।

अरुणा और वरुणा नामकी दो परम पवित्र नदियाँ हैं। उन दोनोंका गोदावरीमें संगम हुआ है, जो बहुत ही पवित्र तीर्थ है। उसकी उत्पत्तिकी कथा सब पापोंका नाश करनेवाली है। उसे बताता हूँ, सुनो। महर्षि कश्यपके ज्येष्ठ पुत्र आदित्य (सूर्य) समस्त लोकोंमें विख्यात हैं। वे तीनों लोकोंके नेत्र हैं। उनकी किरणें अत्यन्त दुस्सह हैं। भगवान् सूर्यके रथमें सात घोड़े जुते होते हैं। सूर्यदेव सम्पूर्ण लोकोंद्वारा पूजित हैं। उनकी पत्नीका नाम उषा है। उषा विश्वकर्माकी पुत्री और त्रिभुवनकी अद्वितीय सुन्दरी है। उसे अपने स्वामीके तीव्र तापका सहन नहीं हो पाता था। वह सदा इसी चिन्तामें पड़ी रहती कि 'मुझे क्या करना चाहिये?' उषाके दो बुद्धिमान् पुत्र थे—वैवस्वत मनु और यम। एक कन्या भी थी, जो परम पवित्र यमुना नदीके रूपमें विख्यात हुई। एक दिन उषाने अपने ही समान रूपवाली अपनी छाया उत्पन्न की और उससे कहा—'तू मेरी-ही-जैसी होकर मेरी आज्ञासे पतिकी सेवा तथा मेरे पुत्रोंका पालन कर। मैं जबतक लौट न आऊँ, तबतक तुम्हीं पतिकी प्रेयसी बनकर रहो; यह रहस्य किसीको न बताना। मेरी संतानोंपर भी यह भेद प्रकट न होने पाये।' छायाने 'बहुत अच्छा' कहकर उषाकी आज्ञा स्वीकार कर ली और उषा घरसे निकल गयी। उसने तपस्याके लिये उत्तरकुरु नामक देशको प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर उसने घोड़ीका रूप धारण करके कठोर तपस्या आरम्भ की। जब सूर्यदेवको


* गृहस्थ-आश्रममें भोगकी प्राप्ति तो स्वाभाविक है और मोक्षकी प्राप्ति निष्काम धर्मका अनुष्ठान करनेसे होती है।
† अकर्मणः कर्म पुण्यं कर्म चाप्याश्रमेषु च
जात्याश्रितं च राजेन्द्र तत्रापि शृणु धर्मवित्। आश्रमाणि च चत्वारि कर्मद्वाराणि मानद॥
चतुर्णामाश्रमाणां च गार्हस्थ्यं पुण्यदं स्मृतम्। (८८।१३-१५)