भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

२६- ब्रह्माद्वारा भगवती राधाका स्तवन

प्रकृतिखण्ड १४५

जानेपर भी पापी पवित्र हो सकता है और उन रजःकणोंकी जितनी संख्या होती है, उतने वर्षोंतक वह देवीके लोकमें बसनेका अधिकारी माना जाता है।

देवी! जो भक्ति एवं ज्ञानसे सम्पन्न होकर मेरे नामका स्मरण करते हुए प्राण-त्याग करते हैं, वे सीधे मेरे परमधाममें जाते हैं और वहाँ पार्षद बनकर दीर्घकालतक निवास करते हैं। वे असंख्य प्राकृतिक प्रलय देख सकते हैं। मृत व्यक्तिका शव बड़े पुण्यके प्रभावसे ही तुम्हारे अंदर आ सकता है। जितने दिनोंतक उसकी एक-एक हड्डी तुम्हारेमें रहती है, उतने समयतक वह वैकुण्ठमें वास करता है। यदि कोई अज्ञानी व्यक्ति तुम्हारे जलका स्पर्श करके प्राण-त्याग करता है तो वह मेरी कृपासे सालोक्यपदका अधिकारी होता है। अथवा कोई कहीं भी मरे; यदि मरते समय जिस-किसी प्रकारसे भी तुम्हारे नामका स्मरण हो जाता है तो उसे मैं सालोक्य-पद प्रदान करता हूँ। ब्रह्माकी आयुपर्यन्त वह वहाँ रह सकता है। कोई तीर्थमें मरे या अतीर्थमें, तुम्हारे स्मरणके प्रभावसे सारूप्यपदका अधिकारी वह पुरुष, ऐसा शक्तिशाली बन जाता है कि वह त्रिलोकीको भी पवित्र कर सकता है। जिनके बान्धव मेरे भक्त हैं—वे चाहे पशु आदि ही क्यों न हों—वे सर्वोत्तम रत्ननिर्मित विमानपर सवार होकर गोलोकमें चले जाते हैं।

मुनिवर! इस प्रकार गङ्गासे कहकर भगवान् श्रीहरिने राजा भगीरथसे कहा—‘राजन्! तुम अभी इन गङ्गाकी स्तुति तथा भक्तिभावके साथ पूजा करो।’ तब भगीरथ भक्तिपूर्वक गङ्गाके स्तवन और पूजनमें संलग्न हो गये। कौथुमिशाखामें कहे हुए ध्यान और स्तोत्रसे उन्होंने गङ्गाकी पूजा सम्पन्न की। तदनन्तर उन्होंने परमप्रभु परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको बार-बार प्रणाम किया। इसके बाद भगीरथ और गङ्गाकी अभीष्ट स्थानकी ओर यात्रा आरम्भ हो गयी तथा भगवान् अन्तर्धान हो गये।

नारदने पूछा—वेदज्ञोंमें प्रमुख प्रभो! किस ध्यान-स्तोत्रसे तथा किस पूजा-क्रमसे राजा भगीरथने गङ्गाकी पूजा की? यह मुझे स्पष्ट बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! राजा भगीरथने नित्यक्रियाके पश्चात् स्नान किया। दो स्वच्छ वस्त्र धारण किये। तब इन्द्रियोंको नियन्त्रणमें रखकर भक्तिपूर्वक छः देवताओंकी पूजा की। वे छः देवता हैं—गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और भगवती शिवा। इन देवताओंका पूजन करनेपर वे गङ्गाजीकी पूजाके पूर्ण अधिकारी बन गये। नारद! विघ्न दूर होनेके लिये गणेशकी, आरोग्यताके लिये सूर्यकी, पवित्रताके लिये अग्निकी, मुक्ति-प्राप्तिके लिये विष्णुकी, ज्ञानके लिये ज्ञानेश्वर शिवकी तथा बुद्धिकी वृद्धिके लिये भगवती शिवाकी पूजा करना आवश्यक है। विद्वान् पुरुषको इन देवताओंकी पूजा सम्पन्न कर लेनेपर ही अन्य किसी पूजामें सफलता प्राप्त होती है। मुने! सुनो, इस प्रकारसे भगीरथने गङ्गाका ध्यान किया था।

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! यह ध्यान सम्पूर्ण पापोंको नष्ट कर देता है। गङ्गाका वर्ण श्वेत चम्पाके समान स्वच्छ है। ये समस्त पापोंका उच्छेद कर देती हैं। परब्रह्म पूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णके श्रीविग्रहसे इनका प्राकट्य हुआ है। ये परम साध्वी और उन्हींके समान सुयोग्य हैं। वह्निशुद्ध चिन्मय वस्त्र इनकी शोभा

१४६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बढ़ाते हैं। रत्नमय भूषणोंसे ये विभूषित हैं। इन आदरणीया देवीने शरत्पूर्णिमाके सैकड़ों चन्द्रमाओंकी स्वच्छ प्रतिभाको अपनेमें स्थान दे रखा है। ये सदा मुस्कराती रहती हैं। इनके तारुण्यमें कभी शिथिलता नहीं आती। ये शान्तस्वरूपिणी देवी भगवान् नारायणकी प्रिया हैं। सत्सौभाग्य कभी इनसे दूर नहीं हो सकता। इनके सिरपर सघन अलकावली है। मालतीके पुष्पोंकी माला इनकी शोभा बढ़ा रही है। इनके ललाटपर चन्दन-बिन्दुओंके साथ सिन्दूरकी बिन्दी है, जिससे उनका लालित्य बढ़ गया है। गण्डस्थलपर कस्तूरीसे पत्ररचना की गयी है, जो नाना प्रकारके चित्रोंसे सुशोभित है। इनके परम मनोहर दोनों होठ पके हुए बिम्बाफलकी लालिमाको तुच्छ कर रहे हैं। इनकी मनोहर दन्तपंक्तियोंके सामने मोतियोंकी लड़ी नगण्य समझी जाती है। इनके कटाक्षपूर्ण बाँकी चितवनसे युक्त नेत्र परम मनोहर हैं। इनका वक्षःस्थल विशाल है। स्थल-कमलकी प्रभाका पराभव करनेवाले दो सुन्दर चरण हैं। रत्नमय पादुकाओंसे शोभा पानेवाले उन चरणोंमें महावर लगा है। देवराज इन्द्रके मुकुटमें लगे हुए मन्दारके फूलोंके रजःकणसे इन देवीके श्रीचरणोंकी लालिमा गाढ़ी हो गयी है। देवता, सिद्ध और मुनीन्द्र अर्घ्य लेकर सदा सामने खड़े हैं। तपस्वियोंके मुकुटमें रहनेवाले भौंरोंकी पंक्तिसे इनके चरण संयुक्त हैं। इनके पावन चरण मुमुक्षुजनोंको मुक्ति देनेमें तथा कामी पुरुषोंकी कामना पूर्ण करनेमें अत्यन्त कुशल हैं। ये परमादरणीया देवी सबकी पूज्या, वर देनेमें प्रवीण, भक्तोंपर कृपा करनेमें परम कुशल, भगवान् विष्णुका पद प्रदान करनेवाली तथा विष्णुपदी नामसे सुविख्यात हैं। इन परम साध्वी गङ्गादेवीकी मैं उपासना करता हूँ।

ब्रह्मन्! इसी ध्यानसे तीन मार्गोंसे विचरण करनेवाली कल्याणी गङ्गाका हृदयमें स्मरण करना चाहिये। इसके बाद सोलह प्रकारके उपचारोंसे इनकी पूजा करे। आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, शीतल जल, वस्त्र, आभूषण, माला, चन्दन, आचमन और सुन्दर शय्या—ये अर्पण करनेके योग्य सोलह उपचार हैं। इन्हें भगवती गङ्गाको भक्तिपूर्वक समर्पण करके प्रणाम करे और दोनों हाथ जोड़कर स्तुति करे। इस प्रकार गङ्गादेवीकी उपासना करनेवाले बड़भागी पुरुषको अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। इसके बाद श्रीगङ्गाजीका परम पुण्यदायक और पापनाशक स्तोत्र सुनाकर फिर भगवान् नारायणने कहा।

**भगवान् नारायण बोले—**नारद! राजा भगीरथ उस स्तोत्रसे गङ्गाकी स्तुति करके उन्हें साथ ले वहाँ पहुंचे, जहाँ सगरके साठ हजार पुत्र जलकर भस्म हो गये थे। गङ्गाका स्पर्श करके बहनेवाली वायुका स्पर्श होते ही वे राजकुमार तुरंत वैकुण्ठमें चले गये।

भगीरथके सत्प्रयत्नसे गङ्गाका आगमन हुआ है। अतः गङ्गाको ‘भागीरथी’ कहते हैं। यों गङ्गाका सम्पूर्ण उत्तम उपाख्यान कह दिया। यह उपाख्यान पुण्यदायी तथा मोक्षका साधन है। अब आगे तुम और क्या सुनना चाहते हो?

प्रकृतिखण्ड १४७

नारदजीने पूछा—शिवजीके संगीतसे मुग्ध हो जब श्रीकृष्ण और राधा द्रवभावको प्राप्त हो गये तब क्या हुआ? उस समय वहाँ जो लोग उपस्थित थे, उन्होंने कौन-सा उत्तम कार्य किया? ये सब बातें विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा करें।

भगवान् नारायण बोले—नारद! एक समयकी बात है—कार्तिककी पूर्णिमा थी। राधा-महोत्सव बड़े धूमधामसे मनाया जा रहा था। भगवान् श्रीकृष्ण सम्यक् प्रकारसे राधाकी पूजा करके रासमण्डलमें विराजमान थे। तत्पश्चात् ब्रह्मादि देवता तथा शौनकादि ऋषि—प्रायः सभी महानुभावोंने बड़े आनन्दके साथ श्रीकृष्णपूजिता श्रीराधाजीकी पूजा की और फिर वे वहीं विराजमान हो गये। इतनेमें भगवान् श्रीकृष्णको संगीत सुनानेवाली देवी सरस्वती हाथमें वीणा लेकर सुन्दर ताल-स्वरके साथ गीत गाने लगीं। तब ब्रह्माने प्रसन्न होकर एक सर्वोत्तम रत्नसे बना हार पुरस्कार-रूपमें उन्हें अर्पण किया। शिवसे उन्हें अखिल ब्रह्माण्डके लिये दुर्लभ एक उत्तम मणि प्राप्त हुई। भगवान् श्रीकृष्णने उन्हें सम्पूर्ण रत्नोंमें श्रेष्ठ कौस्तुभमणि भेंट की। राधाने अमूल्य रत्नोंसे निर्मित एक अनुपम हार, भगवान् नारायणने एक सुन्दर पुष्पमाला तथा लक्ष्मीने बहुमूल्य रत्नोंके दो कुण्डल सरस्वतीको पुरस्काररूपमें दिये। विष्णुमाया, ईश्वरी, दुर्गा, नारायणी और ईशाना नामसे विख्यात भगवती मूलप्रकृतिने सरस्वतीके अन्तःकरणमें परम दुर्लभ परमात्मभक्ति प्रकट की। धर्मने धार्मिक बुद्धि उत्पन्न करनेके साथ ही प्रपञ्चात्मक जगत्में उनकी कीर्ति विस्तृत की। अग्निदेवने चिन्मय वस्त्र तथा पवनदेवने मणिमय नूपुर सरस्वतीको प्रदान किये।

इतनेमें ब्रह्मासे प्रेरित होकर भगवान् शंकर श्रीकृष्णसम्बन्धी पद्य, जिसके प्रत्येक शब्दमें रसके उल्लासको बढ़ानेकी शक्ति भरी थी, बारंबार गाने लगे। उसे सुनकर सम्पूर्ण देवता मूर्च्छित-से हो गये। जान पड़ता था, मानो सब चित्र-विचित्र पुतले हैं। बड़ी कठिनतासे किसी प्रकार उन्हें चेत हुआ। उस समय देखा गया कि समस्त रासमण्डलमें सम्पूर्ण स्थल जलसे आप्लावित है। श्रीराधा और श्रीकृष्णका कहीं पता नहीं है। फिर तो गोप, गोपी, देवता और ब्राह्मण—सभी अत्यन्त उच्च स्वरसे विलाप करने लगे। उस समय ब्रह्माजी भी वहीं थे। उन्होंने ध्यानके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णका पुनीत विचार समझ लिया। भगवान् श्रीकृष्ण ही श्रीराधाके साथ जलमय हो गये हैं—यह बात उन्हें भलीभाँति मालूम हो गयी। तब वे सभी महाभाग देवता परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे। सबने अपनी प्रार्थना सुनायी।

'विभो! हमारा केवल यही अभीष्ट वर है कि आप अपनी श्रीमूर्तिके हमें पुनः दर्शन करा दें।' ठीक उसी समय अति मधुर तथा स्पष्ट शब्दोंमें आकाशवाणी हुई। सब लोगोंने उसे भलीभाँति सुना। आकाशवाणीमें कहा गया—'मैं सर्वात्मा श्रीकृष्ण और मेरी स्वरूपाशक्ति राधा—हम दोनोंने ही भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये यह

११- तुलसीके कथा-प्रसङ्गमें राजा वृषध्वजका चरित्र-वर्णन

१४८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

जलमय विग्रह धारण कर लिया है। सुरेश्वरो ! तुम्हें मेरे तथा इन राधाके शरीरसे क्या प्रयोजन है ? मनु, मुनि, मानव तथा अगणित वैष्णवजन मेरे मन्त्रोंसे पवित्र होकर मुझे देखनेके लिये मेरे धाममें आयेंगे। ऐसे ही तुम्हें भी यदि स्पष्ट दर्शन करनेकी इच्छा हो तो प्रयत्न करो। शम्भु वहीं रहकर मेरी आज्ञाका पालन करें। ब्रह्मन् ! जगद्गुरो ! तुम स्वयं विधाता हो। भगवान् शंकरसे कह दो कि 'वे वेदोंके अङ्गभूत परम मनोहर विशिष्ट शास्त्र अर्थात् तन्त्रशास्त्रका निर्माण करें। उसमें सम्पूर्ण अभीष्ट फल देनेवाले बहुत-से अपूर्व मन्त्र उद्धृत हों। स्तोत्र, ध्यान, पूजाविधि, मन्त्र और कवच—इन सबसे वह तन्त्रशास्त्र सम्पन्न हो। मेरे मन्त्र और कवचका निर्माण करके तुम उसका यत्नपूर्वक गोपन करो। जो मुझसे विमुख हों, उन्हें इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। सैकड़ों और सहस्रोंमें कोई एक भी तो मेरा सच्चा उपासक होगा। वे भक्तजन ही मेरे मन्त्रसे पवित्र हों। यदि शंकर देवसभामें ऐसा शास्त्र निर्माण करनेके लिये सुदृढ़ प्रतिज्ञा करते हैं तो उन्हें तुरन्त ही मेरे दर्शन प्राप्त हो जायेंगे।'

आकाशवाणीके द्वारा इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरि चुप हो गये। उनकी वाणी सुनकर जगत्की व्यवस्था करनेवाले ब्रह्माने प्रसन्नतापूर्वक उसे भगवान् शंकरसे कहा। ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा ज्ञानके अधिष्ठाता भगवान् शंकरने ब्रह्माकी बात सुननेके पश्चात् हाथमें गङ्गा-जल ले लिया और आज्ञापालन करनेके लिये प्रतिज्ञा कर ली। फिर तो वे भगवती जगदम्बाके मन्त्रोंसे सम्पन्न उत्तम तन्त्रशास्त्रके निर्माणमें लग गये। 'प्रतिज्ञापालन करनेके लिये मैं वेदके सारभूत महान् तन्त्रशास्त्रका निर्माण करूँगा'—यह विचार उनके हृदयमें गूँजने लगा। उन्होंने अपना विचार व्यक्त किया कि 'यदि कोई मनुष्य गङ्गाका जल हाथमें लेकर प्रतिज्ञा करेगा और फिर उस अपनी की हुई प्रतिज्ञाका पालन नहीं करेगा तो वह 'कालसूत्र' नामक नरकका भागी होगा और ब्रह्माकी पूरी आयुतक उसे वहाँ रहना पड़ेगा।'

ब्रह्मन् ! गोलोकमें देवताओंकी सभा जुड़ी थी। उसमें भगवान् शंकर जब इस प्रकारकी बात कह चुके, तब अकस्मात् परब्रह्म परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण भगवती श्रीराधाके साथ वहाँ प्रकट हो गये। उन पुरुषोत्तम भगवान् श्रीहरिके प्रत्यक्ष दर्शन करनेपर देवताओंकी प्रसन्नताकी सीमा नहीं रही। वे उनकी स्तुति करने लगे।

इसके बाद उपस्थित देवताओंने अत्यन्त आनन्दमें भरकर फिरसे उत्सव मनाया। तत्पश्चात् समयानुसार भगवान् शंकरने शास्त्रदीपका— शास्त्रीय मतको प्रकाशित करनेवाले सात्त्विक तन्त्रशास्त्रका निर्माण किया।

नारद ! इस प्रकार सम्पूर्ण परम गोप्य प्रसङ्ग मैं तुम्हें सुना चुका। यह सबके लिये अत्यन्त दुर्लभ है। वे ही पूर्णब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण जलरूप होकर गङ्गा बन गये थे। गोलोकसे प्रकट होनेवाली गङ्गाका यही रहस्य है। यों भगवान् श्रीराधाकृष्ण ही गङ्गाके रूपमें प्रकट हुए हैं।

श्रीराधा और श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई यह गङ्गा भुक्ति और मुक्ति दोनोंको देनेवाली हैं। परमात्मा श्रीकृष्णकी व्यवस्थाके अनुसार जगह-जगह रहनेका सुअवसर इन्हें प्राप्त हो गया। श्रीकृष्णस्वरूपा इन आदरणीया गङ्गादेवीको सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके लोग पूजते हैं। (अध्याय १०)

प्रकृतिखण्ड १४९

श्रीराधाजीका गङ्गापर रोष, श्रीकृष्णके प्रति राधाका उपालम्भ, श्रीराधाके भयसे गङ्गाका श्रीकृष्णके चरणोंमें छिप जाना, जलाभावसे पीड़ित देवताओंका गोलोकमें जाना, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे राधाका प्रसन्न होना तथा गङ्गाका प्रकट होना, देवताओंके प्रति श्रीकृष्णका आदेश तथा गङ्गाके विष्णुपत्नी होनेका प्रसङ्ग

नारदजीने पूछा— सुरेश्वर! कलिके पाँच हजार वर्ष बीत जानेपर गङ्गाका कहाँ जाना होगा? महाभाग! यह प्रसङ्ग मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायणने कहा— नारद! सरस्वतीके शापसे गङ्गा भारतवर्षमें आयीं। शापकी अवधि पूरी हो जानेपर वह पुनः भगवान् श्रीहरिकी आज्ञासे वैकुण्ठमें चली जायेंगी। ऐसे ही सरस्वती भारतवर्षको छोड़कर श्रीहरिके धाममें पधारेंगी। शाप समाप्त हो जानेपर लक्ष्मीका भी भगवान्‌के पास पधारना होगा। नारद! ये ही गङ्गा, सरस्वती और लक्ष्मी भगवान् श्रीहरिकी प्रेयसी पत्नियाँ हैं। ब्रह्मन्! तुलसीसहित चार पत्नियाँ वेदोंमें प्रसिद्ध हैं।

नारदजीने पूछा— भगवन्! भगवान् श्रीहरिके चरणकमलोंसे प्रकट हुई गङ्गादेवी किस प्रकार परब्रह्मके कमण्डलुमें रहीं तथा शंकरकी प्रिया होनेका सुअवसर उन्हें कैसे मिला? मुनिवर! गङ्गा भगवान् नारायणकी प्रेयसी भी हो चुकी हैं। अहो! किस प्रकार ये सभी बातें संघटित हुईं? आप यह रहस्य मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायणने कहा— नारद! पूर्वकालमें जलमयी गङ्गा गोलोकमें विराजमान थीं। राधा और श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई यह गङ्गा उनका अंश तथा उन्हींका स्वरूप हैं। द्रवकी अधिष्ठात्री देवीके रूपमें अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके भूमण्डलपर पधारीं। उस समय भूमण्डलमें उनके रूप-लावण्यकी कहीं तुलना नहीं थी। उनका शरीर नूतन यौवनसे सम्पन्न था। उनके सभी अङ्ग रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत थे। शरद्-ऋतुके मध्याह्नकालमें खिले हुए कमलकी भाँति उनका मुस्कानभरा मुख परम मनोहर था। उनकी आभा तपाये हुए सुवर्णके सदृश थी। तेजमें वह शरत्कालके चन्द्रमाको भी परास्त कर रही थीं। मनोहरसे भी मनोहर उनकी कान्ति थी। उन्होंने शुद्ध सात्त्विक स्वरूप धारण कर रखा था। विशाल दो नेत्र अनुपम शोभा बढ़ा रहे थे। अत्यन्त कटाक्षपूर्ण दृष्टिसे वे देख रही थीं। सुन्दर अलकावली शोभा बढ़ा रही थी। उसमें उन्होंने मालतीके पुष्पोंका मनोहर हार लगा रखा था। ललाटपर चन्दन-बिन्दुओंके साथ सिन्दूरकी सुन्दर बिंदी थी। दोनों मनोहर गण्डस्थलोंपर कस्तूरीसे पत्ररचनाएँ हुई थीं। नीचे उनका अधर-ओष्ठ इतना सुन्दर था मानो दुपहरियाका विकसित फूल हो। दाँतोंकी अत्यन्त उज्ज्वल पंक्ति पके हुए अनारके दानोंकी भाँति चमक रही थी। अग्नि-शुद्ध दो दिव्य वस्त्रोंको उन्होंने धारण कर रखा था। ऐसी वे गङ्गा लज्जाका भाव प्रदर्शित करती हुई भगवान् श्रीकृष्णके पास विराजमान हो गयीं। वे अञ्चलसे अपना मुँह ढककर निर्निमेष नेत्रोंसे भगवान्‌के मुखरूपी अमृतका निरन्तर प्रसन्नतापूर्वक पान कर रही थीं। उनका मुखमण्डल प्रसन्नतासे खिल रहा था। भगवान् श्रीकृष्णके रूपने उन्हें बेसुध तथा अत्यन्त पुलकायमान बना दिया था।

इतनेमें भगवती राधिका वहाँ पधारकर विराजमान हो गयीं। उस समय राधाके साथ असंख्य गोपियाँ थीं। राधाकी कान्ति ऐसी थी मानो करोड़ों चन्द्रमाओंकी ज्योत्स्ना एक साथ

२७- वैकुण्ठमें विष्णुके समक्ष आकर शंकरका उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम करना तथा ब्रह्मा और अत्यन्त भयभीत सूर्यद्वारा शंकरको प्रणाम-निवेदन

१५०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

प्रकट हो। वे उस समय क्रोधकी लीला करना चाहती थीं; अतः उनकी आँखें लाल कमलकी तुलना करने लगीं। उनका वर्ण पीले चम्पककी तुलना कर रहा था तथा उनकी चाल ऐसी थी मानो मतवाला गजराज हो। अमूल्य रत्नोंसे बने हुए नाना प्रकारके आभूषण उनके श्रीविग्रहकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके शरीरपर अमूल्य रत्नोंसे जटित दो दिव्य चिन्मय पीताम्बर शोभा पा रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णके अर्घ्यसे सुशोभित चरणकमलोंको उन्होंने हृदयमें धारण कर रखा था। सर्वोत्तम रत्नोंसे बने हुए विमानसे उतरकर वे वहाँ पधारी थीं। ऋषिगण उनकी सेवामें संलग्न थे। स्वच्छ चँवर डुलाया जा रहा था। कस्तूरीके बिन्दुसे युक्त, चन्दनोंसे समन्वित, प्रज्वलित दीपकके समान आकारवाला बिन्दुरूपमें शोभायमान सिन्दूर उनके ललाटके मध्यभागमें शोभा पा रहा था। उनके सीमन्तका निचला भाग परम स्वच्छ था। पारिजातके पुष्पोंकी सुन्दर माला उनके गलेमें सुशोभित थी। अपनी सुन्दर अलकावलीको कँपाती हुई वे स्वयं भी कम्पित हो रही थीं। रोषके कारण उनके सुन्दर रागयुक्त ओष्ठ फड़क रहे थे। भगवान् श्रीकृष्णके पास जाकर वे सुन्दर रत्नमय सिंहासनपर विराजित हो गयीं। उनको पधारे देखकर भगवान् श्रीकृष्ण उठ गये और कुछ हँसकर आश्चर्य प्रकट करते हुए मधुर वचनोंमें उनसे बातचीत करने लगे।

उस समय गोपोंके भयकी सीमा नहीं रही। नम्रताके कारण कंधे झुकाकर उन्होंने भगवती राधिकाको प्रणाम किया और वे उनकी स्तुति करने लगे। परब्रह्म श्रीकृष्णने भी राधिकाकी स्तुति की। गङ्गा भी तुरंत उठ गयीं और उन्होंने राधाका स्तवन किया। उनके हृदयमें भय छा गया था। अत्यन्त विनय प्रकट करते हुए उन्होंने राधासे कुशल पूछी। वे डरकर नीचे खड़ी हो गयीं। उन्होंने ध्यानके द्वारा मन-ही-मन श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंकी शरण ली। गङ्गाके हृदयस्थित कमलके आसनपर विराजमान भगवान् श्रीकृष्णने उस समय डरी हुई गङ्गाको आश्वासन दिया। इस प्रकार सर्वेश्वर श्रीकृष्णसे वर पाकर देवी गङ्गा स्थिरचित्त हो सकीं। अब गङ्गाने देखा, देवी राधिका ऊँचे सिंहासनपर बैठी हैं। उनका रूप परम मनोहर है। वे देखनेमें बड़ी सुखप्रद हैं। ब्रह्मतेजसे उनका श्रीविग्रह प्रकाशमान हो रहा है। वे सनातनी देवी सृष्टिके आदिमें असंख्य ब्रह्माओंको रचती हैं। उनकी अवस्था सदा बारह वर्षकी रहती है। अभिनव यौवनसे उनका विग्रह परम शोभा पाता है। अखिल विश्वमें उनके सदृश रूपवती और गुणवती कोई भी नहीं है। वे परम शान्त, कमनीय, अनन्त, परम साध्वी तथा आदि-अन्त-रहित हैं। उन्हें 'शुभा', 'सुभद्रा' और 'सुभगा' कहा जाता है। अपने स्वामीके सौभाग्यसे वे सदा सम्पन्न रहती हैं। सम्पूर्ण स्त्रियोंमें वे श्रेष्ठ हैं तथा परम सौन्दर्यसे सुशोभित हैं। उन्हें भगवान् श्रीकृष्णकी अर्द्धाङ्गिनी कहा जाता है। तेज, अवस्था और प्रकाशमें वे भगवान् श्रीकृष्णके ही समान हैं। लक्ष्मीपति भगवान् विष्णुने लक्ष्मीको साथ लेकर उन महालक्ष्मीकी उपासना की है। परमात्मा श्रीकृष्णकी समुज्ज्वल सभाको ये अपनी कान्तिसे सदा आच्छादित करती हैं। सखियोंका दिया हुआ दुर्लभ पान उनके मुखमें शोभा पा रहा है। वे स्वयं अजन्मा होती हुई भी अखिल जगत्की जननी हैं। उनकी कीर्ति और प्रतिष्ठा विश्वमें सर्वत्र विस्तृत है। वे भगवान् श्रीकृष्णके प्राणोंकी साक्षात् अधिष्ठात्री देवी हैं। उन परम सुन्दरी देवीको भगवान् प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मानते हैं।

नारद ! रासेश्वरी श्रीराधाकी इस अनुपम झाँकीको देखकर गङ्गाका मन तृप्त न हो सका। वे निर्निमेष नेत्रोंसे निरन्तर राधा-सौन्दर्य-सुधाका पान करती रहीं। मुने ! इतनेमें राधाने मधुर वाणीमें

१२- वेदवतीकी कथा, इसी प्रसङ्गमें भगवान् रामके चरित्रका एक अंश-कथन, भगवती सीता तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

प्रकृतिखण्ड १५१

जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्णसे कहा। उस समय श्रीराधाका विग्रह परम शान्त था। उनमें नम्रता आ गयी थी और उनके मुखपर मुस्कान छायी थी।

श्रीराधाने कहा—प्राणेश! आपके प्रसन्न मुखकमलको मुस्कराकर निहारनेवाली यह कल्याणी कौन है? इसके तिरछे नेत्र आपको लक्ष्य कर रहे हैं। इसके भीतर मिलनेच्छाका भाव जाग्रत् है। आपके मनोहर रूपने इसे अचेत कर दिया है। इसके सर्वाङ्ग पुलकित हो रहे हैं। वस्त्रसे मुख ढँककर बार-बार आपको देखा करना मानो इसका स्वभाव ही बन गया है। आप भी उसकी ओर दृष्टिपात करके मधुर-मधुर हँस रहे हैं। आप अनेक बार ऐसा करते हैं और कोमल-स्वभावकी स्त्री-जाति होनेके कारण प्रेमवश मैं क्षमा कर देती हूँ।

आपने 'विरजा' (रजोगुणरहिता देवी)-से प्रेम किया। फिर वह अपना शरीर त्यागकर महान् नदीके रूपमें परिणत हो गयी। आपकी सत्कीर्तिस्वरूपिणी वह देवी नदीरूपमें अब भी विराजमान है। आपके औरस पुत्रके रूपमें उससे समयानुसार सात समुद्र उत्पन्न हो गये। प्राणनाथ! आपने 'शोभा' से प्रेम किया। वह भी शरीर त्यागकर चन्द्रमण्डलमें चली गयी। तदनन्तर उसका शरीर परम स्निग्ध तेज बन गया। आपने उस तेजको टुकड़े-टुकड़े करके वितरण कर दिया। रत्न, सुवर्ण, श्रेष्ठ मणि, स्त्रियोंके मुखकमल, राजा, पुष्पोंकी कलियाँ, पके हुए फल, लहलहाती खेतियाँ, राजाओंके सजे-धजे महल, नवीन पात्र और दूध—ये सब आपके द्वारा उस शोभाके कुछ-कुछ भाग पा गये। मैंने आपको 'प्रभा' के साथ प्रेम करते देखा। वह भी शरीर त्यागकर सूर्यमण्डलमें प्रवेश कर गयी। उस समय उसका शरीर अत्यन्त तेजोमय बन गया था। उस तेजोमयी प्रभाको आपने विभाजन करके जगह-जगह बाँट दिया। श्रीकृष्ण! आपकी आँखोंसे दूर हुई प्रभा अग्नि, यक्ष, नरेश, देवता, वैष्णवजन, नाग, ब्राह्मण, मुनि, तपस्वी, सौभाग्यवती स्त्री तथा यशस्वी पुरुष—इन सबको थोड़े-थोड़े रूपोंमें प्राप्त हुई।

एक बार मैंने आपको 'शान्ति' नामक गोपीके साथ रासमण्डलमें प्रेम करते देखा था। प्रभो! वह शान्ति भी अपने उस शरीरको छोड़कर आपमें लीन हो गयी। उस समय उसका शरीर उत्तम गुणके रूपमें परिणत हो गया। तदनन्तर आपने उसको विभाजित करके विश्वमें बाँट दिया। प्रभो! उसका कुछ अंश मुझ (राधा)-में, कुछ इस निकुञ्जमें और कुछ ब्राह्मणमें प्राप्त हुआ। विभो! फिर आपने उसका कुछ भाग शुद्ध सत्त्वस्वरूपा लक्ष्मीको, कुछ अपने मन्त्रके उपासकोंको, कुछ वैष्णवोंको, कुछ तपस्वियोंको, कुछ धर्मको और कुछ धर्मात्मा पुरुषोंको सौंप दिया।

पूर्वसमयकी बात है, 'क्षमा' के साथ आप मुझे प्रेम करते दृष्टिगोचर हुए थे। उस समय क्षमा अपना वह शरीर त्यागकर पृथ्वीपर चली गयी। तदनन्तर उसका शरीर उत्तम गुणके रूपमें परिणत हो गया था। फिर उसके शरीरका आपने विभाजन किया और उसमेंसे कुछ-कुछ अंश विष्णुको, वैष्णवोंको, धार्मिक पुरुषोंको, धर्मको, दुर्बलोंको, तपस्वियोंको, देवताओं और पण्डितोंको दे दिया। प्रभो! इतनी सब बातें तो मैं सुना चुकी। आपके ऐसे-ऐसे बहुत-से गुण हैं। आप सदा ही उच्च सुन्दरी देवियोंसे प्रेम किया करते हैं।

इस प्रकार रक्त कमलके समान नेत्रोंवाली राधाने भगवान् श्रीकृष्णसे कहकर साध्वी गङ्गासे कुछ कहना चाहा। गङ्गा योगमें परमप्रवीण थीं। योगके प्रभावसे राधाका मनोभाव उन्हें ज्ञात हो गया। अतः बीच सभामें ही अन्तर्धान होकर वे अपने जलमें प्रविष्ट हो गयीं। तब सिद्धयोगिनी

१५२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

राधाने योगद्वारा इस रहस्यको जानकर सर्वत्र विद्यमान उन जलस्वरूपिणी गङ्गाको अञ्जलिसे उठाकर पीना आरम्भ कर दिया। ऐसी स्थितिमें राधाका अभिप्राय पूर्ण योगसिद्धा गङ्गासे छिपा नहीं रह सका। अतः वे भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें जाकर उनके चरणकमलोंमें लीन हो गयीं।

तब राधाने गोलोक, वैकुण्ठलोक तथा ब्रह्मलोक आदि सम्पूर्ण स्थानोंमें गङ्गाको खोजा; परंतु कहीं भी वह दिखायी नहीं दीं। उस समय सर्वत्र जलका नितान्त अभाव हो गया था। कीचड़तक सूख गया था। जलचर जन्तुओंके मृत शरीरसे ब्रह्माण्डका कोई भी भाग खाली नहीं रहा था। फिर तो ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, अनन्त, धर्म, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य, मनुगण, मुनि-समाज, देवता, सिद्ध और तपस्वी—सभी गोलोकमें आये। उस समय उनके कण्ठ, ओठ और तालू सूख गये थे। प्रकृतिसे परे सर्वेश भगवान् श्रीकृष्णको सबने प्रणाम किया; क्योंकि ये श्रीकृष्ण सबके परम पूज्य हैं। वर देना इन सर्वोत्तम प्रभुका स्वाभाविक गुण है। इन्हें वरका प्रवर्तक ही माना जाता है। ये परमप्रभु सम्पूर्ण गोप और गोपियोंके समाजमें प्रमुख हैं। इन्हें निरीह, निराकार, निर्लिप्त, निराश्रय, निर्गुण, निरुत्साह, निर्विकार और निरञ्जन कहा गया है। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये अपनी इच्छासे ये साकार रूपमें प्रकट हो जाते हैं। ये सत्त्वस्वरूप, सत्येश, साक्षीरूप और सनातनपुरुष हैं। इनसे बढ़कर जगत्में दूसरा कोई शासक नहीं है। अतएव इन पूर्णब्रह्म परमेश्वर भगवान् श्रीकृष्णको उन ब्रह्मादि समस्त उपस्थित देवताओंने प्रणाम करके स्तवन आरम्भ कर दिया। भक्तिके कारण उनके कंधे झुक गये थे। उनकी वाणी गद्गद हो गयी थी। आँखोंमें आँसू भर आये थे। उनके सभी अङ्गोंमें पुलकावली छायी थी। सबने उन परात्पर ब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति की। इन सर्वेश प्रभुका विग्रह ज्योतिर्मय है। सम्पूर्ण कारणोंके भी ये कारण हैं। ये उस समय अमूल्य रत्नोंसे निर्मित दिव्य सिंहासनपर विराजमान थे। गोपाल इनकी सेवामें संलग्न होकर श्वेत चँवर डुला रहे थे। गोपियोंके नृत्यको देखकर प्रसन्नताके कारण इनका मुखमण्डल मुस्कानसे भरा था। प्राणोंसे भी अधिक प्रिय श्रीराधा इनके वक्षःस्थलपर शोभा पा रही थीं। उनके दिये हुए सुवासित पान ये चबा रहे थे। ऐसे ये देवाधिदेव परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण रासमण्डलमें विराजमान थे।

वहीं मुनियों, मनुष्यों, सिद्धों और तपस्वियोंने तपके प्रभावसे इनके दिव्य दर्शन प्राप्त किये। दिव्य दर्शनसे सबके मनमें अपार हर्ष हुआ। साथ ही आश्चर्यकी सीमा भी न रही। सभी परस्पर एक-दूसरेको देखने लगे। तत्पश्चात् उन समस्त सज्जनोंने अपना अभीष्ट अभिप्राय जगत्प्रभु चतुरानन ब्रह्मासे निवेदन किया। ब्रह्माजी उनकी प्रार्थना सुनकर विष्णुको दाहिने और महादेवको बायें करके भगवान् श्रीकृष्णके निकट पहुँचे। उस समय परम आनन्दस्वरूप श्रीकृष्ण और परम आनन्दस्वरूपिणी श्रीराधा साथ विराजमान थीं। उसी समय ब्रह्माने रासमण्डलको केवल श्रीकृष्णमय देखा। सबकी वेश-भूषा एक समान थी। सभी एक-जैसे आसनोंपर बैठे थे। द्विभुज श्रीकृष्णके रूपमें परिणत सभीने हाथोंमें मुरली ले रखी थी। वनमाला सबकी छवि बढ़ा रही थी। सबके मुकुटमें मोरके पंख थे। कौस्तुभमणिसे वे सभी परम सुशोभित थे। गुण, भूषण, रूप, तेज, अवस्था और प्रभासे सम्पन्न उन सबका अत्यन्त कमनीय विग्रह परम शान्त था। सभी परिपूर्णतम थे और सबमें सभी शक्तियाँ संनिहित थीं। उन्हें देखकर कौन सेवक हैं और कौन सेव्य—इस बातका निर्णय करनेमें ब्रह्मा सफल नहीं हो सके।

क्षणभरमें ही भगवान् श्रीकृष्ण तेजःस्वरूप हो जाते और तुरंत आसनपर बैठे हुए भी दिखायी

प्रकृतिखण्ड १५३


पड़ने लगते। एक ही क्षणमें उनके दो रूप निराकार और साकार ब्रह्माको दृष्टिगोचर हुए। फिर एक ही क्षणमें ब्रह्माजीने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अकेले हैं। इसके बाद तुरंत ही झट उन्हें राधा और कृष्ण प्रत्येक आसनपर बैठे दीख पड़े। फिर क्या देखते हैं कि भगवान् श्रीकृष्णने राधाका रूप धारण कर लिया है और राधाने श्रीकृष्णका। कौन स्त्रीके वेषमें है और कौन पुरुषके वेषमें—विधाता इस रहस्यको समझ न सके। तब ब्रह्माजीने अपने हृदयरूपी कमलपर विराजमान भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान किया। ध्यान-चक्षुसे भगवान् दीख गये। अतः अनेक प्रकारसे परिहार करते हुए भक्तिपूर्वक उनकी स्तुति की। तत्पश्चात् भगवान्‌की आज्ञासे उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं। फिर देखा तो श्रीराधाको वक्षःस्थलपर बैठाये हुए भगवान् श्रीकृष्ण आसनपर अकेले ही विराजमान हैं। इन्हें पार्षदोंने घेर रखा है। झुंड-की-झुंड गोपियाँ इनकी शोभा बढ़ा रही हैं। फिर उन ब्रह्मा प्रभृति प्रधान देवताओंने परम प्रभु भगवान्‌का दर्शन करके प्रणाम किया और स्तुति भी की। तब जो सबके आत्मा, सब कुछ जाननेमें कुशल, सबके शासक तथा सर्वभावन हैं, उन लक्ष्मीपति परब्रह्म भगवान् श्रीकृष्णने उपस्थित देवताओंका अभिप्राय समझकर उनसे कहा।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—ब्रह्मन्! आपकी कुशल हो, यहाँ आइये। मैं समझ गया, आप सभी महानुभाव गङ्गाको ले जानेके लिये यहाँ पधारे हैं; परंतु इस समय यह गङ्गा शरणार्थी बनकर मेरे चरणकमलोंमें छिपी है। कारण, वह मेरे पास बैठी थी। राधाजी उसे देखकर पी जानेके लिये उद्यत हो गयीं। तब वह चरणोंमें आकर ठहर गयी। मैं आपलोगोंको उसे सहर्ष दे दूँगा; परंतु आप पहले उसको निर्भय बनानेका पूर्ण प्रयत्न करें।

नारद! भगवान् श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर कमलोद्भव ब्रह्माका मुख मुस्कानसे भर गया। फिर तो वे सम्पूर्ण देवता, जो सबकी आराध्या तथा भगवान् श्रीकृष्णसे भी सुपूजिता हैं, उन भगवती राधाकी स्तुति करनेमें संलग्न हो गये! भक्तिके कारण अत्यन्त विनीत होकर ब्रह्माजीने अपने चारों मुखोंसे राधाजीकी स्तुति की। चारों वेदोंके प्रणेता चतुरानन ब्रह्माने भगवती राधाका इस प्रकार स्तवन किया।

ब्रह्माजी बोले—देवी! यह गङ्गा आपके तथा भगवान् श्रीकृष्णके श्रीअङ्गसे समुत्पन्न है। आप दोनों महानुभाव रासमण्डलमें पधारे थे। शंकरके संगीतने आपको मुग्ध कर दिया था। उसी अवसरपर यह द्रवरूपमें प्रकट हो गयी। अतः आप तथा श्रीकृष्णके अङ्गसे समुत्पन्न होनेके कारण यह आपकी प्रिय पुत्रीके समान शोभा पानेवाली गङ्गा आपके मन्त्रोंका अभ्यास करके उपासना करे। इसके द्वारा आपकी आराधना होनी चाहिये। फलस्वरूप वैकुण्ठाधिपति चतुर्भुज भगवान् श्रीहरि इसके पति हो जायँगे। साथ ही अपनी एक कलासे यह भूमण्डलपर भी पधारेगी और वहाँ भगवान्‌के अंश क्षारसमुद्रको इसका पति बननेका सुअवसर प्राप्त होगा। माता! यह गङ्गा जैसे गोलोकमें है, वैसे ही इसे सर्वत्र रहना

१३- भगवती तुलसीके प्रादुर्भावका प्रसङ्ग

१५४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

चाहिये। आप देवेश्वरी इसकी माता हैं और यह सदाके लिये आपकी पुत्री है।

नारद! ब्रह्माकी इस प्रार्थनाको सुनकर भगवती राधा हँस पड़ीं। उन्होंने ब्रह्माजीकी सभी बातोंको स्वीकार कर लिया। तब गङ्गा श्रीकृष्णके चरणके अँगूठेके नखाग्रसे निकलकर वहीं विराजमान हो गयी। सब लोगोंने उसका सम्मान किया। फिर जलस्वरूपा गङ्गासे उसकी अधिष्ठात्री देवी जलसे निकलकर परम शान्त विग्रहसे शोभा पाने लगी। ब्रह्माने गङ्गाके उस जलको अपने कमण्डलुमें रख लिया। भगवान् शंकरने उस जलको अपने मस्तकपर स्थान दिया। तत्पश्चात् कमलोद्भव ब्रह्माने गङ्गाको 'राधा-मन्त्र' की दीक्षा दी। साथ ही राधाके स्तोत्र, कवच, पूजा और ध्यानकी विधि भी बतलायी। ये सभी अनुष्ठानक्रम सामवेदकथित थे। गङ्गाने इन नियमोंके द्वारा राधाकी पूजा करके वैकुण्ठके लिये प्रस्थान किया।

मुने! लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा और विश्वपावनी तुलसी—ये चारों देवियाँ भगवान् नारायणकी पत्नियाँ हैं। तत्पश्चात् परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णने हँसकर ब्रह्माको दुर्बोध एवं अपरिचित सामयिक बातें बतलायीं।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— ब्रह्मन्! तुम गङ्गाको स्वीकार करो। विष्णो! महेश्वर! विधाता! मैं समयकी स्थितिका परिचय कराता हूँ; आपको ध्यान देकर सुनना चाहिये। तुमलोग तथा अन्य जो देवता, मुनिगण, मनु, सिद्ध और यशस्वी यहाँ आये हुए हैं, इन्हींको जीवित समझना चाहिये; क्योंकि गोलोकमें कालके चक्रका प्रभाव नहीं पड़ता। इस समय कल्प समास होनेके कारण सारा विश्व जलार्णवमें डूब गया है। विविध ब्रह्माण्डोंमें रहनेवाले जो ब्रह्मा आदि प्रधान देवता हैं, वे इस समय मुझमें विलीन हो गये हैं। ब्रह्मन्! केवल वैकुण्ठको छोड़कर और सब-का-सब जलमग्न है। तुम जाकर पुनः ब्रह्मलोकादिकी सृष्टि करो। अपने ब्रह्माण्डकी भी रचना करना आवश्यक है। इसके पश्चात् गङ्गा वहाँ जायगी। इसी प्रकार मैं अन्य ब्रह्माण्डोंमें भी इस सृष्टिके अवसरपर ब्रह्मादि लोकोंकी रचनाका प्रयत्न करता हूँ। अब तुम देवताओंके साथ यहाँसे शीघ्र पधारो। बहुत समय व्यतीत हो गया; तुमलोगोंमें कई ब्रह्मा समास हो गये और कितने अभी होंगे भी।

मुने! इस प्रकार कहकर परमाराध्या राधाके प्राणपति भगवान् श्रीकृष्ण अन्तःपुरमें चले गये। ब्रह्मा प्रभृति देवता वहाँसे चलकर यत्नपूर्वक पुनः सृष्टि करनेमें तत्पर हो गये। फिर तो गोलोक, वैकुण्ठ, शिवलोक और ब्रह्मलोक तथा अन्यत्र भी जिस-जिस स्थानमें गङ्गाको रहनेके लिये परब्रह्म परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णने आज्ञा दी थी, उस-उस स्थानके लिये उसने प्रस्थान कर दिया। भगवान् श्रीहरिके चरणकमलसे गङ्गा प्रकट हुई, इसलिये उसे लोग 'विष्णुपदी' कहने लगे। ब्रह्मन्! इस प्रकार गङ्गाके इस उत्तम उपाख्यानका वर्णन कर चुका। इस सारगर्भित प्रसङ्गसे सुख और मोक्ष सुलभ हो जाते हैं। अब पुनः तुम्हें क्या सुननेकी इच्छा है?

नारदने कहा— भगवन्! लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा और जगत्को पावन बनानेवाली तुलसी—ये चारों देवियाँ भगवान् नारायणकी ही प्रिया हैं। यह प्रसङ्ग तथा गङ्गाके वैकुण्ठको जानेकी बात मैं आपसे सुन चुका; परंतु गङ्गा विष्णुकी पत्नी कैसे हुई, यह वृत्तान्त सुननेका सुअवसर मुझे नहीं मिला। उसे कृपया सुनाइये।

भगवान् नारायण बोले— नारद! जब गङ्गा वैकुण्ठमें चली गयी, तब थोड़ी देरके बाद जगत्की व्यवस्था करनेवाले ब्रह्मा भी उसके साथ ही वैकुण्ठ पहुँचे और जगत्प्रभु भगवान् श्रीहरिको प्रणाम करके कहने लगे।

२८- तुलसीका बदरीवनमें जाकर दीर्घकालतक कठोर तपस्या करना

(१५५)


[चित्र: श्रीतुलसी]

श्रीतुलसी


[चित्र: भगवती गंगा]

भगवती गंगा

१५६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ब्रह्माजीने कहा— भगवन्! श्रीराधा और श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई ब्रह्मद्रवरूपिणी गङ्गा इस समय एक सुशीला देवीके रूपमें विराजमान है। दिव्य यौवनसे सम्पन्न होनेके कारण उसका शरीर परम मनोहर जान पड़ता है। शुद्ध एवं सत्त्वस्वरूपिणी उस देवीमें क्रोध और अहंकार लेशमात्रके लिये भी नहीं हैं। श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई वह गङ्गा उन्हें छोड़ किसी दूसरेको पति नहीं बनाना चाहती। किंतु परम तेजस्विनी राधा ऐसा नहीं चाहती। वह मानिनी राधा इस गङ्गाको पी जाना चाहती थी, परंतु बड़ी बुद्धिमानीके साथ यह परमात्मा श्रीकृष्णके चरणकमलोंमें प्रविष्ट हो गयी, इसीसे रक्षा हुई। उस समय सर्वत्र सूखे हुए ब्रह्माण्डगोलकको देखकर मैं गोलोकमें गया। सर्वान्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण वृत्तान्त जाननेके लिये वहाँ विराजमान थे। उन्होंने सबका अभिप्राय समझकर अपने चरणकमलके नखाग्रसे इसे बाहर निकाल दिया। तब मैंने इसे राधाकी पूजाके मन्त्र याद कराये। इसके जलसे ब्रह्माण्ड-गोलकको पूर्ण कराया। तदनन्तर राधा और श्रीकृष्णके चरणोंमें मस्तक झुकाकर इसे साथ लेकर यहाँ आया। प्रभो! आपसे मेरी प्रार्थना है कि इस सुरेश्वरी गङ्गाको आप अपनी पत्नी बना लीजिये। देवेश! आप पुरुषोंमें रत्न हैं। इस साध्वी देवीको स्त्रियोंमें रत्न माना जाता है। जिनमें सत्-असत्‌का पूर्ण ज्ञान है, वे पण्डितपुरुष भी इस प्रकृतिका अपमान नहीं करते। सभी पुरुष प्रकृतिसे उत्पन्न हुए हैं और स्त्रियाँ भी उसीकी कलाएँ हैं। केवल आप भगवान् श्रीहरि ही उस प्रकृतिसे परे निर्गुण प्रभु हैं। परिपूर्णतम श्रीकृष्ण स्वयं दो भागोंमें विभक्त हुए। आधेसे तो दो भुजाधारी श्रीकृष्ण बने रहे और उनका आधा अङ्ग आप चतुर्भुज श्रीहरिके रूपमें प्रकट हो गया। इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णके वामाङ्गसे आविर्भूत श्रीराधा भी दो रूपोंमें परिणत हुईं। दाहिने अंशसे तो वे स्वयं रहीं और उनके वामांशसे लक्ष्मीका प्राकट्य हुआ। अतएव यह गङ्गा आपको ही वरण करना चाहती है; क्योंकि आपके श्रीविग्रहसे ही यह प्रकट है। प्रकृति और पुरुषकी भाँति स्त्री-पुरुष दोनों एक ही अङ्ग हैं।

मुने! इस प्रकार कहकर महाभाग ब्रह्माने भगवान् श्रीहरिके पास गङ्गाको बैठा दिया और वे वहाँसे चल पड़े। फिर तो स्वयं श्रीहरिने विवाहके नियमानुसार गङ्गाके पुष्प एवं चन्दनसे चर्चित कर-कमलको ग्रहण कर लिया और वे उसके प्रियतम पति बन गये। जो गङ्गा पृथ्वीपर पधार चुकी थी, वह भी समयानुसार अपने उस स्थानपर पुनः आ गयी। यों भगवान्‌के चरणकमलसे प्रकट होनेके कारण इस गङ्गाकी 'विष्णुपदी' नामसे प्रसिद्धि हुई। गङ्गाके प्रति सरस्वतीके मनमें जो डाह था, वह निरन्तर बना रहा। गङ्गा सरस्वतीसे कुछ द्वेष नहीं रखती थी। अन्तमें ऊबकर विष्णुप्रिया गङ्गाने सरस्वतीको भारतवर्षमें जानेका शाप दे दिया था। मुने! इस प्रकार लक्ष्मीपति भगवान् श्रीहरिकी गङ्गासहित तीन पत्नियाँ हैं। बादमें तुलसीको भी प्रिय पत्नी बननेका सौभाग्य प्राप्त हो गया। अतएव तुलसीसहित ये चार प्रेयसी पत्नियाँ कही गयी हैं। (अध्याय ११-१२)


तुलसीके कथा-प्रसङ्गमें राजा वृषध्वजका चरित्र-वर्णन

नारदजीने पूछा— प्रभो! साध्वी तुलसी भगवान् श्रीहरिकी पत्नी कैसे बनी? इसका जन्म कहाँ हुआ था और पूर्वजन्ममें यह कौन थी? इस साध्वी देवीने किसके कुलको पवित्र किया था तथा इसके माता-पिता कौन थे? किस तपस्याके प्रभावसे प्रकृतिके अधिष्ठाता भगवान् श्रीहरि इसे

१४- तुलसीको स्वप्नमें शङ्खचूड़के दर्शन, शङ्खचूड़ तथा तुलसीके विवाहके लिये ब्रह्माजीका दोनोंको आदेश, तुलसीके साथ शङ्खचूड़का गान्धर्व-विवाह तथा देवताओंके प्रति उसके पूर्वजन्मका स्पष्टीकरण

प्रकृतिखण्ड १५७

पतिरूपसे प्राप्त हुए? क्योंकि ये परम प्रभु तो बिलकुल निःस्पृह हैं। दूसरा प्रश्न यह है कि ऐसी सुयोग्या देवीको वृक्ष क्यों होना पड़ा और यह परम तपस्विनी देवी कैसे असुरके चंगुलमें फँस गयी? सम्पूर्ण संदेहोंको दूर करनेवाले प्रभो! आप मेरे इस संशयको मिटानेकी कृपा करें।

भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! दक्षसावर्णि नामसे प्रसिद्ध एक पुण्यात्मा मनु हो गये हैं। भगवान् विष्णुके अंशसे प्रकट ये मनु परम पवित्र, यशस्वी, विशद कीर्तिसे सम्पन्न तथा श्रीहरिके प्रति अटूट श्रद्धा रखनेवाले थे। इनके पुत्रका नाम था ब्रह्मसावर्णि। उनका भी अन्तःकरण स्वच्छ था। उनके मनमें धार्मिक भावना थी और भगवान् श्रीहरिपर वे श्रद्धा रखते थे। ब्रह्मसावर्णिके पुत्र धर्मसावर्णि नामसे प्रसिद्ध हुए, जिनकी इन्द्रियाँ सदा वशमें रहती थीं और मन श्रीहरिकी उपासनामें निरत रहता था। धर्मसावर्णिसे इन्द्रियनिग्रही एवं परम भक्त रुद्रसावर्णि पुत्ररूपमें प्रकट हुए। इन रुद्रसावर्णिके पुत्रका नाम देवसावर्णि हुआ। ये भी परम वैष्णव थे। देवसावर्णिके पुत्रका नाम इन्द्रसावर्णि था। फिर भगवान् विष्णुके अनन्य उपासक इन इन्द्रसावर्णिसे वृषध्वजका जन्म हुआ। भगवान् शंकरमें इस वृषध्वजकी असीम श्रद्धा थी। स्वयं भगवान् शंकर इसके यहाँ बहुत कालतक ठहरे थे। इसके प्रति भगवान् शंकरका स्नेह पुत्रसे भी बढ़कर था। राजा वृषध्वजकी भगवान् नारायण, लक्ष्मी और सरस्वती—इनमें किसीके प्रति श्रद्धा नहीं थी। उसने सम्पूर्ण देवताओंका पूजन त्याग दिया था। अभिमानमें चूर होकर वह भाद्रपदमासमें महालक्ष्मीकी पूजामें विघ्न उपस्थित किया करता था। माघकी शुक्ल पञ्चमीके दिन समस्त देवता सरस्वतीकी विस्तृतरूपसे पूजा करते थे; परंतु वह नरेश उसमें सम्मिलित नहीं होता था। यज्ञ और विष्णु-पूजाकी निन्दा करना उसका मानो स्वभाव ही बन गया था। वह केवल भगवान् शिवमें ही श्रद्धा रखता था। ऐसे स्वभाववाले राजा वृषध्वजको देखकर सूर्यने उसे शाप दे दिया—‘राजन्! तेरी श्री नष्ट हो जाय!’

भक्तपर संकट देख आशुतोष भोलेनाथ भगवान् शंकर हाथमें त्रिशूल उठाकर सूर्यपर टूट पड़े। तब सूर्य अपने पिता कश्यपजीके साथ ब्रह्माजीकी शरणमें गये। शंकर त्रिशूल लिये ब्रह्मलोकको चल दिये। ब्रह्माको भी शंकरजीका भय था, अतएव उन्होंने सूर्यको आगे करके वैकुण्ठकी यात्रा की। उस समय ब्रह्मा, कश्यप और सूर्य तीनों भयभीत थे। उन तीनों महानुभावोंने सर्वेश भगवान् नारायणकी शरण ग्रहण की। तीनोंने मस्तक झुकाकर भगवान् श्रीहरिको प्रणाम किया, बारंबार प्रार्थना की और उनके सामने अपने भयका सम्पूर्ण कारण कह सुनाया। तब भगवान् नारायणने कृपापूर्वक उन सबको अभय प्रदान किया और कहा—‘भयभीत देवताओ! स्थिर हो जाओ। मेरे रहते तुम्हें कोई भय नहीं। विपत्तिके अवसरपर डरे हुए जो भी व्यक्ति जहाँ-कहीं भी मुझे याद करते हैं, मैं हाथमें चक्र लिये तुरंत वहीं पहुँचकर उनकी रक्षा करता हूँ*। देवो! मैं अखिल जगत्का कर्ता-भर्ता हूँ। मैं ही ब्रह्मरूपसे सदा संसारकी सृष्टि करता हूँ और शंकररूपसे संहार। मैं ही शिव हूँ। तुम भी मेरे ही रूप हो और ये शंकर भी मुझसे भिन्न नहीं हैं। मैं ही नाना रूप धारण करके सृष्टि और पालनकी व्यवस्था किया करता हूँ। देवताओ! तुम्हारा कल्याण हो; जाओ, अब तुम्हें भय नहीं होगा। मैं वचन देता हूँ, आजसे शंकरका भय तुम्हारे पास नहीं आ सकेगा। वे सर्वेश भगवान्


* स्मरन्ति ये यत्र तत्र मां विपत्तौ भयान्विताः। तांस्तत्र गत्वा रक्षामि चक्रहस्तस्त्वरान्वितः॥
(प्रकृतिखण्ड १३। २०)

१५८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

शंकर सत्पुरुषोंके स्वामी हैं। उन्हें भक्तात्मा और भक्तवत्सल कहा जाता है और वे सदा भक्तोंके अधीन रहते हैं। ब्रह्मन्! सुदर्शनचक्र और भगवान् शंकर—ये दोनों मुझे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हैं। ब्रह्माण्डमें इनसे अधिक दूसरा कोई तेजस्वी नहीं है। ये शंकर चाहें तो लीलापूर्वक करोड़ों सूर्योंको प्रकट कर सकते हैं। करोड़ों ब्रह्माओंके निर्माणकी भी इनमें पूर्ण सामर्थ्य है। इन त्रिशूलधारी भगवान् शंकरके लिये कोई भी कार्य असाध्य नहीं; तथापि कुछ भी बाहरी ज्ञान न रखकर ये दिन-रात मेरे ही ध्यानमें लगे रहते हैं। अपने पाँच मुखोंसे मेरे मन्त्रोंका जप करना और भक्तिपूर्वक मेरे गुण गाते रहना इनका स्वभाव-सा बन गया है। मैं भी रात-दिन इनके कल्याणकी चिन्तामें ही लगा रहता हूँ; क्योंकि जो जिस प्रकार मेरी उपासना करते हैं, मैं भी उसी प्रकार उनकी सेवामें तत्पर रहता हूँ*—यह मेरा नियम है।'

इतनेमें भगवान् शंकर भी वहाँ पहुँच गये। उनके हाथमें त्रिशूल था। वे वृषभपर आरूढ़ थे और आँखें रक्तकमलके समान लाल थीं। वहाँ पहुँचते ही वे वृषभसे उतर पड़े और भक्तिविनम्र होकर उन्होंने शान्तस्वरूप परात्पर प्रभु लक्ष्मीकान्त भगवान् नारायणको श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। उस समय भगवान् श्रीहरि रत्नमय सिंहासनपर विराजमान थे। रत्ननिर्मित अलङ्कारोंसे उनका श्रीविग्रह सुशोभित था। किरीट, कुण्डल, चक्र और वनमालासे वे अनुपम शोभा पा रहे थे। नूतन मेघके समान उनकी श्याम कान्ति थी। उनका परम सुन्दर विग्रह चार भुजाओंसे सुशोभित था और चार भुजावाले अनेक पार्षद स्वच्छ चँवर डुलाकर उनकी सेवा कर रहे थे। नारद! उनका सम्पूर्ण अङ्ग दिव्य चन्दनोंसे अनुलिप्त था। वे अनेक प्रकारके भूषण और पीताम्बर धारण किये हुए थे। लक्ष्मीका दिया हुआ ताम्बूल उनके मुखमें शोभा पा रहा था। ऐसे प्रभुको देखकर भगवान् शंकरका मस्तक उनके चरणोंमें झुक गया। ब्रह्माने शंकरको प्रणाम किया तथा अत्यन्त डरते हुए सूर्य भी शंकरको प्रणाम करने लगे। कश्यपने अतिशय भक्तिके साथ स्तुति और प्रणाम किया। तदनन्तर भगवान् शिव सर्वेश्वर श्रीहरिकी स्तुति करके एक सुखमय आसनपर विराज गये। विष्णु-पार्षदोंने श्वेत चँवर डुलाकर उनकी सेवा की। जब उनके मार्गका श्रम दूर हो गया, तब भगवान् श्रीहरिने अमृतके समान अत्यन्त मनोहर एवं मधुर वचन कहा।

भगवान् विष्णु बोले—महादेव! यहाँ कैसे पधारना हुआ? अपने क्रोधका कारण बताइये?

महादेवने कहा—भगवन्! राजा वृषध्वज मेरा परम भक्त है। मैं उसे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय मानता हूँ। सूर्यने उसे शाप दे दिया है—यही मेरे क्रोधका कारण है। जब मैं अपने कृपापात्र पुत्रके शोकसे प्रभावित होकर सूर्यको मारनेके लिये तैयार हुआ, तब वह ब्रह्माकी शरणमें चला


* ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ॥ (प्रकृतिखण्ड १३। २९)

प्रकृतिखण्ड १५९


गया और इस समय ब्रह्मासहित उसने आपकी शरण ग्रहण कर ली है। जो व्यक्ति ध्यान अथवा वचनसे भी आपके शरणापन्न हो जाते हैं, उनपर विपत्ति और संकट अपना कुछ भी प्रभाव नहीं डाल सकते। वे जरा और मृत्युसे सर्वथा रहित हो जाते हैं। भगवन्! शरणागतिका फल तो प्रत्यक्ष ही है, फिर मैं क्या कहूँ? आपका स्मरण करते ही मनुष्य सदाके लिये अभय एवं मङ्गलमय बन जाते हैं। परंतु जगत्प्रभो! अब मेरे उस भक्तकी जीवनचर्या कैसे चलेगी—यह बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि सूर्यके शापसे उसकी श्री नष्ट हो चुकी है। उसमें सोचने-समझनेकी शक्ति भी तनिक-सी नहीं रह गयी है।

भगवान् विष्णु बोले—शम्भो! दैवकी प्रेरणासे बहुत समय बीत गया। इक्कीस युग समाप्त हो गये। यद्यपि वैकुण्ठमें अभी आधी घड़ीका समय बीता है। अतः अब आप शीघ्र अपने स्थानपर पधारिये। किसीसे भी न रुकनेवाले अत्यन्त भयंकर कालने इस समय वृषध्वजको अपना ग्रास बना लिया है। यही नहीं, किंतु उसका पुत्र रथध्वज भी अब जगत्में नहीं है। इस समय रथध्वजके दो पुत्र हैं, उन महाभाग पुत्रोंके नाम हैं—धर्मध्वज और कुशध्वज। वे परम वैष्णवपुरुष सूर्यके शापसे श्रीहीन होकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं—ऐसा कहा जाता है। राज्य भी उनके हाथमें नहीं है। एकमात्र लक्ष्मीकी उपासना ही उनके जीवनका उद्देश्य बन गया है। अतः उनकी भार्याओंके उदरसे भगवती लक्ष्मी अपनी एक कलासे प्रकट होंगी। तब वे दोनों नरेश लक्ष्मीसे सम्पन्न हो जायँगे। शम्भो! अब आपके सेवक वृषध्वजका शरीर नहीं रहा। अतः आप यहाँसे पधार सकते हैं। देवताओ! अब आपलोग भी जानेका कष्ट करें।

नारद! इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरि लक्ष्मीके सहित सभासे उठे और अन्तःपुरमें चले गये। देवताओंने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने आश्रमकी यात्रा की। परिपूर्णतम शंकर उसी क्षण तपस्या करनेके विचारसे चल पड़े। (अध्याय १३)


वेदवतीकी कथा, इसी प्रसङ्गमें भगवान् रामके चरित्रका एक अंश-कथन, भगवती सीता तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

भगवान् नारायण कहते हैं—मुने! धर्मध्वज और कुशध्वज—इन दोनों नरेशोंने कठिन तपस्याद्वारा भगवती लक्ष्मीकी उपासना करके अपने प्रत्येक अभीष्ट मनोरथको प्राप्त कर लिया। महालक्ष्मीके वर-प्रसादसे उन्हें पुनः पृथिवीपति होनेका सौभाग्य प्राप्त हो गया। वे दोनों धनवान् और पुत्रवान् हो गये। कुशध्वजकी परम साध्वी भार्याका नाम मालावती था। समयानुसार उसके एक कन्या उत्पन्न हुई, जो लक्ष्मीका अंश थी। वह भूमिपर पैर रखते ही ज्ञानसे सम्पन्न हो गयी। उस कन्याने जन्म लेते ही सूतिकागृहमें स्पष्ट स्वरसे वेदके मन्त्रोंका उच्चारण किया और उठकर खड़ी हो गयी। इसलिये विद्वान् पुरुष उसे 'वेदवती' कहने लगे। उत्पन्न होते ही उस कन्याने स्नान किया और तपस्या करनेके विचारसे वह वनकी ओर चल दी। भगवान् नारायणके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाली उस देवीको प्रायः सभीने रोका; परंतु उसने किसीकी भी नहीं सुनी। वह तपस्विनी कन्या एक मन्वन्तरतक पुष्करक्षेत्रमें तपस्या करती रही। उसका तप अत्यन्त कठिन था तो भी लीलापूर्वक चलता रहा। अत्यन्त तपोनिष्ठ रहनेपर भी उसका शरीर हृष्ट-पुष्ट बना रहा। उसमें

२९- शङ्खचूड़ और तुलसीको ब्रह्माजीका आशीर्वादरूपमें विवाहकी आज्ञा देना

१६०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

दुर्बलता नहीं आ सकी। वह नवयौवनसे सम्पन्न बनी रही। एक दिन सहसा उसे स्पष्ट आकाशवाणी सुनायी पड़ी—'सुन्दरि! दूसरे जन्ममें भगवान् श्रीहरि तुम्हारे पति होंगे। ब्रह्मा प्रभृति देवता भी बड़ी कठिनतासे जिनकी उपासना कर पाते हैं, उन्हीं परम प्रभुको स्वामी बनानेका सौभाग्य तुम्हें प्राप्त होगा।'

मुने! यह आकाशवाणी सुननेके पश्चात् रुष्ट हो वह कन्या गन्धमादन पर्वतपर चली गयी और वहाँ पहलेसे भी अधिक कठोर तप करने लगी। वहाँ चिरकालतक तप करके विश्वस्त हो वहीं रहने लगी। एक दिन वहाँ उसे अपने सामने दुर्निवार रावण दिखायी पड़ा। वेदवतीने अतिथि-धर्मके अनुसार पाद्य, परम स्वादिष्ट फल और शीतल जल देकर उसका सत्कार किया। रावण बड़ा पापिष्ठ था। फल खानेके पश्चात् वह वेदवतीके समीप जा बैठा और पूछने लगा—'कल्याणी! तुम कौन हो और क्यों यहाँ ठहरी हुई हो?' वह देवी परम सुन्दरी थी। उस साध्वी कन्याके मुखपर मन्द मुस्कानकी छटा छायी रहती थी। उसे देखकर दुराचारी रावणका हृदय विकारसे संतप्त हो गया। वह वेदवतीको हाथसे खींचकर उसका शृंगार करनेको उद्यत हुआ। रावणकी इस कुचेष्टाको देखकर उस साध्वीका मन क्रोधसे भर गया। उसने रावणको अपने तपोबलसे इस प्रकार स्तम्भित कर दिया कि वह जड़वत् होकर हाथों एवं पैरोंसे निश्चेष्ट हो गया। कुछ भी कहने-करनेकी उसमें क्षमता नहीं रह गयी। ऐसी स्थितिमें उसने मन-ही-मन उस कमललोचना देवीके पास जाकर उसका मानस स्तवन किया। शक्तिकी उपासना विफल नहीं होती, इसे सिद्ध करनेके विचारसे देवी वेदवती रावणपर संतुष्ट हो गयी और परलोकमें उसकी स्तुतिका फल देना उन्होंने स्वीकार कर लिया। साथ ही उसे यह शाप दे दिया—

'दुरात्मन्! तू मेरे लिये ही अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ कालका ग्रास बनेगा; क्योंकि तूने कामभावसे मुझे स्पर्श कर लिया है; अतः अब मैं इस शरीरको त्याग देती हूँ; देख ले।'

देवी वेदवतीने इस प्रकार कहकर वहीं योगद्वारा अपने शरीरका त्याग कर दिया। तब रावणने उसका मृत शरीर गङ्गामें डाल दिया और मनमें इस प्रकार चिन्ता करते हुए घरकी ओर प्रयाण किया—'अहो! मैंने यह कैसी अद्भुत घटना देखी? यह मैंने क्या कर डाला?'—इस प्रकार विचार कर अपने कुकृत्य और उस देवीके देहत्यागको याद करके रावण बहुत विषाद करने लगा। मुने! वह देवी साध्वी वेदवती दूसरे जन्ममें जनककी कन्या हुई और उस देवीका नाम सीता पड़ा; जिसके कारण रावणको मृत्युका मुख देखना पड़ा था। वेदवती बड़ी तपस्विनी थी। पूर्वजन्मकी तपस्याके प्रभावसे स्वयं भगवान् श्रीराम उसके पति हुए। ये राम साक्षात् परिपूर्णतम श्रीहरि हैं। देवी वेदवतीने घोर तपस्याके द्वारा आराधना करके इन जगदीश्वरको पतिरूपमें प्राप्त किया था। वह साक्षात् रमा थी। सीतारूपसे विराजमान उस सुन्दरी देवीने बहुत दिनोंतक भगवान् श्रीरामके साथ सुख भोगा। उसे पूर्वजन्मकी बातें स्मरण थीं, फिर भी पूर्वसमयमें तपस्यासे जो कष्ट हुआ था, उसपर उसने ध्यान नहीं दिया। वर्तमान सुखके सामने उसने सम्पूर्ण पूर्वक्लेशोंकी स्मृतिका त्याग कर दिया था। श्रीराम परम गुणी, समस्त सुलक्षणोंसे सम्पन्न, रसिक, शान्त-स्वभाव, अत्यन्त कमनीय तथा स्त्रियोंके लिये साक्षात् कामदेवके समान सुन्दर एवं श्रेष्ठतम देवता थे। वेदवतीने ऐसे मनोऽभिलषित स्वामीको प्राप्त किया। कुछ कालके पश्चात् रघुकुलभूषण, सत्यसंध भगवान् श्रीराम पिताके सत्यकी रक्षा करनेके लिये वनमें पधारे। वे सीता और लक्ष्मणके साथ समुद्रके

प्रकृतिखण्ड १६१


समीप ठहरे थे। वहाँ ब्राह्मणरूपधारी अग्निसे उनकी भेंट हुई। भगवान् रामको दुःखी देखकर विप्ररूपधारी अग्निका मन संतप्त हो उठा। तब सर्वथा सत्यवादी उन अग्निदेवने सत्यप्रेमी भगवान् रामसे ये सत्यमय वचन कहे।

ब्राह्मणवेषधारी अग्निने कहा— भगवन्! मेरी कुछ प्रार्थना सुनिये। श्रीराम! यह सीताके हरणका समय उपस्थित है। ये मेरी माँ हैं; इन्हें मेरे संरक्षणमें रखकर आप छायामयी सीताको अपने साथ रखिये; फिर अग्निपरीक्षाके समय इन्हें मैं आपको लौटा दूँगा। परीक्षा-लीला भी हो जायगी। इसी कार्यके लिये मुझे देवताओंने यहाँ भेजा है। मैं ब्राह्मण नहीं, साक्षात् अग्नि हूँ।

भगवान् श्रीरामने अग्निकी बात सुनकर लक्ष्मणको बताये बिना ही व्यथित-हृदयसे अग्निके प्रस्तावको मान लिया। नारद! उन्होंने सीताको अग्निके हाथों सौंप दिया। तब अग्निने योगबलसे मायामयी सीता प्रकट की। उसके रूप और गुण साक्षात् सीताके समान ही थे। अग्निदेवने उसे रामको दे दिया। मायासीताको साथ ले वे आगे बढ़े। इस गुप्त रहस्यको प्रकट करनेके लिये भगवान् रामने उसे मना कर दिया। यहाँतक कि लक्ष्मण भी इस रहस्यको नहीं जान सके; फिर दूसरेकी तो बात ही क्या है? इसी बीच भगवान् रामने एक सुवर्णमय मृग देखा। सीताने उस मृगको लानेके लिये भगवान् रामसे अनुरोध किया। भगवान् राम उस वनमें जानकीकी रक्षाके लिये लक्ष्मणको नियुक्त करके स्वयं मृगको मारनेके लिये चले। उन्होंने बाणसे उसे मार गिराया। मरते समय उस मायामृगके मुखसे 'हा लक्ष्मण!'—यह शब्द निकला। फिर सामने श्रीरामको देख उनका स्मरण करते हुए उसने सहसा प्राण त्याग दिये। मृगका शरीर त्यागकर वह दिव्य देहसे सम्पन्न हो गया और रत्ननिर्मित दिव्य विमानपर सवार होकर वैकुण्ठधामको चला

गया। यह मारीच पूर्वजन्ममें वैकुण्ठधामके द्वारपर वहाँके द्वारपाल जय और विजयका किंकर था तथा वहीं रहता था। वह बड़ा बलवान् था। उसका नाम था 'जित'। सनकादिकोंके शापसे जय-विजयके साथ वह भी राक्षस-योनिमें आ गया था। उस दिन उसका उद्धार हो गया और वह उन द्वारपालोंके पहले ही वैकुण्ठके द्वारपर पहुँच गया।

तदनन्तर 'हा लक्ष्मण' इस कष्टभरे शब्दको सुनकर सीताने लक्ष्मणको रामके पास जानेके लिये प्रेरित किया। लक्ष्मणके चले जानेपर रावण सीताका अपहरण कर खेल-ही-खेलमें लङ्काकी ओर चल दिया। उधर लक्ष्मणको वनमें देखकर राम विषादमें डूब गये। वे उसी क्षण अपने आश्रमपर गये और सीताको वहाँ न देख विलाप करने लगे। फिर, सीताको खोजते हुए वे बारंबार वनमें चक्कर लगाने लगे। कुछ समय बाद गोदावरी नदीके तटपर उन्हें जटायुद्वारा सीताका समाचार मिला। तब वानरोंको अपना सहायक बनाकर उन्होंने समुद्रमें पुल बाँधा। उसके द्वारा लङ्कामें पहुँचकर उन रघुश्रेष्ठने अपने बाणसे बन्धु-बान्धवोंसहित रावणका वध कर डाला। तत्पश्चात् उन्होंने सीताकी अग्निपरीक्षा करायी। अग्निदेवने उसी क्षण वास्तविक सीताको भगवान् रामके सामने उपस्थित कर दिया। तब छायासीताने अत्यन्त नम्र होकर अग्निदेव और भगवान् श्रीराम—दोनोंसे कहा—'महानुभावो! अब मैं क्या करूँगी, सो बतानेकी कृपा कीजिये।'

तब भगवान् श्रीराम और अग्निदेव बोले— देवी! तुम तप करनेके लिये अत्यन्त पुण्यप्रद पुष्करक्षेत्रमें चली जाओ। वहीं रहकर तपस्या करना। इसके फलस्वरूप तुम्हें स्वर्गलक्ष्मी बननेका सुअवसर प्राप्त होगा।

भगवान् श्रीराम और अग्निदेवके वचन सुनकर छायासीताने पुष्करक्षेत्रमें जाकर तप

१६२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

आरम्भ कर दिया। उसकी कठिन तपस्या बहुत लम्बे कालतक चलती रही। इसके बाद उसे स्वर्गलक्ष्मी होनेका सौभाग्य प्राप्त हो गया। समयानुसार वही छायासीता राजा द्रुपदके यहाँ यज्ञकी वेदीसे प्रकट हुई। उसका नाम ‘द्रौपदी’ पड़ा और पाँचों पाण्डव उसके पतिदेव हुए। इस प्रकार सत्ययुगमें वही कल्याणी वेदवती कुशध्वजकी कन्या, त्रेतायुगमें छायारूपसे सीता बनकर भगवान् श्रीरामकी सहचरी तथा द्वापरमें द्रुपदकुमारी द्रौपदी हुई। अतएव इसे ‘त्रिहायणी’ कहा गया है। तीनों युगोंमें यह विद्यमान रही है।

नारदजीने पूछा—संदेहोंके निराकरण करनेमें परम कुशल मुनिवर! द्रौपदीके पाँच पति कैसे हुए? मेरे मनकी यह शङ्का मिटानेकी कृपा करें।

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! जब लङ्कामें वास्तविक सीता भगवान् श्रीरामके पास विराजमान हो गयी, तब रूप और यौवनसे शोभा पानेवाली छायासीताकी चिन्ताका पार न रहा। वह भगवान् श्रीराम और अग्निदेवके आज्ञानुसार भगवान् शंकरकी उपासनामें तत्पर हो गयी। पति प्राप्त करनेके लिये व्यग्र होकर वह बार-बार यही प्रार्थना कर रही थी कि ‘भगवान् त्रिलोचन! मुझे पति प्रदान कीजिये।’ यही शब्द उसके मुँहसे पाँच बार निकले। भगवान् शंकर परम रसिक हैं। छायासीताकी यह प्रार्थना सुनकर वे मुस्कराते हुए बोले—‘तुम्हें पाँच पति मिलेंगे।’ नारद! इस प्रकार त्रेताकी जो छायासीता थी, वही द्वापरमें द्रौपदी बनी और पाँचों पाण्डव उसके पति हुए। यह सब जो बीचकी बातें थीं, सुना चुका। अब जो प्रधान विषय चल रहा था, वह सुनो।

भगवान् रामने लङ्कामें मनोहारिणी सीताको पा जानेके पश्चात् वहाँका राज्य विभीषणको सौंप दिया और वे स्वयं अयोध्या पधार गये। अयोध्या भारतवर्षमें है। ग्यारह हजार वर्षोंतक भगवान् श्रीरामने वहाँ राज्य किया। तत्पश्चात् वे समस्त पुरवासियोंसहित वैकुण्ठधामको पधारे। लक्ष्मीके अंशसे प्रादुर्भूत जो वेदवती थी, वह लक्ष्मीके विग्रहमें विलीन हो गयी। इस प्रकारका पवित्र आख्यान मैंने कह सुनाया। इस पुण्यदायी उपाख्यानके प्रभावसे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। अब धर्मध्वजकी कन्याका प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो। (अध्याय १४)


भगवती तुलसीके प्रादुर्भावका प्रसङ्ग

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! धर्मध्वजकी पत्नीका नाम माधवी था। वह राजाके साथ गन्धमादन पर्वतपर सुन्दर उपवनमें आनन्द करती थी। यों दीर्घकाल बीत गया, किंतु उन्हें इसका ज्ञान न रहा कि कब दिन बीता, कब रात। तदनन्तर राजा धर्मध्वजके हृदयमें ज्ञानका प्रादुर्भाव हुआ और उन्होंने हास-विलाससे विलग होना चाहा; परंतु माधवी अभी तृप्त नहीं हो सकी थी, फिर भी उसे गर्भ रह गया। उसका गर्भ प्रतिदिन बढ़ता और उसकी शोभा बढ़ाता रहा। नारद! कार्तिककी पूर्णिमाके दिन उसके गर्भसे एक कन्या प्रकट हुई। उस समय शुभ दिन, शुभ योग, शुभ क्षण, शुभ लग्न और शुभ ग्रहका संयोग था। ऐसे योगसे सम्पन्न शुक्रवारके दिन देवी माधवीने लक्ष्मीके अंशसे प्रादुर्भूत उस कन्याको जन्म दिया। कन्याका मुख ऐसा मनोहर था मानो शरद-ऋतुकी पूर्णिमाका चन्द्रमा हो। नेत्र शरत्कालीन प्रफुल्ल कमलके समान सुन्दर थे। अधर पके हुए बिम्बाफलकी तुलना कर रहे थे। मनको

१५- पुष्पदन्तका दूत बनकर शङ्खचूड़के पास जाना और शङ्खचूड़के द्वारा तुलसीके प्रति ज्ञानोपदेश

'प्रकृतिखण्ड १६३

मुग्ध करनेवाली उस कन्याके हाथ और पैरके तलवे लाल थे। उसकी नाभि गहरी थी। शीतकालमें सुख देनेके लिये उसके सम्पूर्ण अङ्ग गरम रहते थे और उष्णकालमें वह शीतलाङ्गी बनी रहती थी। वह सदा सोलह वर्षकी किशोरी जान पड़ती थी। उसके सुन्दर केश ऐसे थे मानो वटवृक्षको घेरकर शोभा पानेवाले बरोह हों। उसकी कान्ति पीले चम्पककी तुलना कर रही थी। वह असंख्य सुन्दरियोंमें एक थी। स्त्री और पुरुष उसे देखकर किसीके साथ तुलना करनेमें असमर्थ हो जाते थे; अतएव विद्वान् पुरुषोंने उसका नाम 'तुलसी' रखा। भूमिपर पधारते ही वह ऐसी सुयोग्या बन गयी, मानो साक्षात् प्रकृति देवी ही हो।

सब लोगोंके मना करनेपर भी उसने तपस्या करनेके विचारसे बदरीवनको प्रस्थान किया। वहाँ रहकर वह दीर्घकालतक कठिन तपस्या करती रही। उसके मनका निश्चित उद्देश्य यह था कि स्वयं भगवान् नारायण मेरे स्वामी हों। ग्रीष्मकालमें वह पञ्चाग्नि तपती और जाड़ेके दिनोंमें जलमें रहकर तपस्या करती। वर्षा-ऋतुमें वह वृष्टिकी धाराका वेग सहन करती हुई खुले मैदानमें आसन लगाकर बैठी रहती। हजारों वर्षोंतक वह फल और जलपर रही; फिर हजारों वर्षोंतक वह केवल पत्ते चबाकर रही और हजारों वर्षोंतक केवल वायुके आधारपर उसने प्राणोंको टिकाकर रखा। इससे उसका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया था। तदनन्तर वह सहस्रों वर्षोंतक बिलकुल निराहार रही। निर्लक्ष्य होकर एक पैरपर खड़ी हो वह तपस्या करती रही। उसे देखकर ब्रह्मा उत्तम वर देनेके विचारसे बदरिकाश्रममें पधारे। हंसपर बैठे हुए चतुर्मुख ब्रह्माको देखकर तुलसीने प्रणाम किया। तब जगत्की सृष्टि करनेमें निपुण विधाताने उससे कहा।

ब्रह्माजी बोले— तुलसि! तुम मनोऽभिलषित वर माँग सकती हो। भगवान् श्रीहरिकी भक्ति, उनकी दासी बनना अथवा अजर एवं अमर होना जो भी तुम्हारी इच्छा हो, मैं देनेके लिये तैयार हूँ।

तुलसीने कहा— तात पितामह! सुनिये, मेरे मनमें जो अभिलाषा है, उसे बता रही हूँ, आप सर्वज्ञ हैं; अतः आपके सामने मुझे लज्जा ही क्या है। पूर्वजन्ममें मैं तुलसी नामकी गोपी थी। गोलोक मेरा निवास-स्थान था। भगवान् श्रीकृष्णकी प्रिया, उनकी अनुचरी, उनकी अर्द्धाङ्गिनी तथा उनकी प्रेयसी सखी—सब कुछ होनेका सौभाग्य मुझे प्राप्त था। गोविन्द नामसे सुशोभित उन प्रभुके साथ मैं हास-विलासमें रत थी। उस परम सुखसे अभी मैं तृप्त नहीं थी। इतनेमें एक दिन रासकी अधिष्ठात्री देवी भगवती राधाने रासमण्डलमें पधारकर रोषसे मुझे यह शाप दे दिया कि 'तुम मानव-योनिमें उत्पन्न होओ।' उसी समय भगवान् गोविन्दने मुझसे कहा—'देवी! तुम भारतवर्षमें रहकर तपस्या करो। ब्रह्मा वर देंगे, जिससे मेरे स्वरूपभूत अंश चतुर्भुज श्रीविष्णुको तुम पतिरूपसे प्राप्त कर लोगी।' इस प्रकार कहकर देवेश्वर

१६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भगवान् श्रीकृष्ण भी अन्तर्धान हो गये। गुरो! मैंने अपना वह शरीर त्याग दिया और अब इस भूमण्डलपर उत्पन्न हुई हूँ। सुन्दर विग्रहवाले शान्तस्वरूप भगवान् नारायणको मैं प्रियतम पतिरूपसे प्राप्त करनेके लिये वर माँग रही हूँ। आप मेरी अभिलाषा पूर्ण करनेकी कृपा करें।

ब्रह्माजी बोले—भगवान् श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट सुदामा नामक एक गोप भी इस समय राधिकाके शापसे भारतवर्षमें उत्पन्न है। उस परम तेजस्वी गोपको श्रीकृष्णका साक्षात् अंश कहते हैं। शापवश उसे दनुके कुलमें उत्पन्न होना पड़ा है। 'शङ्खचूड़' नामसे वह प्रसिद्ध है। त्रिलोकीमें कोई भी ऐसा नहीं है जो उससे बढ़कर हो। वह सुदामा इस समय समुद्रमें विराजमान है। भगवान् श्रीकृष्णका अंश होनेसे उसे पूर्वजन्मकी सभी बातें स्मरण हैं। सुन्दरि! शोभने! तुम भी पूर्वजन्मके सभी प्रसङ्गोंसे परिचित हो। इस जन्ममें वह श्रीकृष्णका अंश तुम्हारा पति होगा। इसके बाद शान्तस्वरूप भगवान् नारायण तुम्हें पतिरूपसे प्राप्त होंगे। लीलावश वे ही नारायण तुमको शाप दे देंगे। अतः अपनी कलासे तुम्हें वृक्ष बनकर भारतमें रहना पड़ेगा और समस्त जगत्को पवित्र करनेकी योग्यता तुम्हें प्राप्त होगी। सम्पूर्ण पुष्पोंमें तुम प्रधान मानी जाओगी। भगवान् विष्णु तुम्हें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय मानेंगे। तुम्हारे बिना पूजा निष्फल समझी जायगी। वृन्दावनमें वृक्षरूपसे रहते समय लोग तुम्हें 'वृन्दावनी' कहेंगे। तुमसे उत्पन्न पत्तोंसे गोपी और गोपोंद्वारा भगवान् माधवकी पूजा सम्पन्न होगी। तुम मेरे वरके प्रभावसे वृक्षोंकी अधिष्ठात्री देवी बनकर गोपरूपसे विराजनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके साथ स्वेच्छापूर्वक निरन्तर आनन्द भोगोगी।

नारद! ब्रह्माकी यह अमरवाणी सुनकर तुलसीके मुखपर हँसी छा गयी। उसके मनमें अपार हर्ष हुआ। उसने महाभाग ब्रह्माको प्रणाम किया और वह कहने लगी।

तुलसीने कहा—पितामह! मैं बिलकुल सच्ची बातें कहती हूँ—दो भुजासे शोभा पानेवाले श्यामसुन्दर भगवान् श्रीकृष्णको पानेके लिये मेरी जैसी अभिलाषा है, वैसी चतुर्भुज श्रीविष्णुके लिये नहीं है; परंतु उन गोविन्दकी आज्ञासे ही मैं चतुर्भुज श्रीहरिके लिये प्रार्थना करती हूँ। ओह! वे गोविन्द मेरे लिये परम दुर्लभ हो गये हैं। भगवन्! आप ऐसी कृपा करें कि उन्हीं गोविन्दको मैं पुनः निश्चय ही प्राप्त कर सकूँ। साथ ही मुझे राधाके भयसे भी मुक्त कर दीजिये।

ब्रह्माजी बोले—देवी! मैं तुम्हारे प्रति भगवती राधाके षोडशाक्षर-मन्त्रका उपदेश करता हूँ। तुम इसे हृदयमें धारण कर लो। मेरे वरके प्रभावसे अब तुम राधाको प्राणके समान प्रिय बन जाओगी। सुभगे! भगवान् गोविन्दके लिये तुम वैसी ही प्रेयसी बन जाओगी जैसी राधा हैं।

मुने! इस प्रकार कहकर जगद्धाता ब्रह्माने तुलसीको भगवती राधाका षोडशाक्षर-मन्त्र बता दिया। साथ ही स्तोत्र, कवच, पूजाकी सम्पूर्ण विधियाँ तथा किस क्रमसे अनुष्ठान करना चाहिये—ये सभी बातें बतला दीं। तब तुलसीने भगवती राधाकी उपासना की और उनके कृपाप्रसादसे वह देवी राधाके समान ही सिद्ध हो गयी। मन्त्रके प्रभावसे ब्रह्माजीने जैसा कहा था, ठीक वैसा ही फल तुलसीको प्राप्त हो गया। तपस्या-सम्बन्धी जो भी क्लेश थे, वे मनमें प्रसन्नता उत्पन्न होनेके कारण दूर हो गये; क्योंकि फल सिद्ध हो जानेपर मनुष्योंका दुःख ही उत्तम सुखके रूपमें परिणत हो जाता है।

(अध्याय १५)