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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ
५५६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मन्त्रोच्चारणपूर्वक नित्यप्रति पूजा किया करती थीं। मुने! गोपियाँ चन्दन, अगुरु, कस्तूरी, कुंकुम, नाना प्रकारके मनोहर पुष्प, भाँति-भाँतिके पुष्पहार, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र, अनेकानेक फल, मणि, मोती और मूँगे चढ़ाकर तथा अनेक प्रकारके बाजे बजाकर प्रतिदिन देवीकी पूजा सम्पन्न करती थीं।

हे देवि जगतां मात: सृष्टिस्थित्यन्तकारिणि।
नन्दगोपसुतं कान्तमस्मभ्यं देहि सुव्रते॥

'उत्तम व्रतका पालन करनेवाली हे देवि! हे जगदम्ब! तुम्हीं जगत्की सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली हो; तुम हमें नन्दगोप-नन्दन श्यामसुन्दरको ही प्राणवल्लभ पतिके रूपमें प्रदान करो।'

इस मन्त्रसे देवेश्वरी दुर्गाकी मूर्ति बनाकर संकल्प करके मूलमन्त्रसे उनका पूजन करे। सामवेदोक्त मूलमन्त्र बीजमन्त्रसहित इस प्रकार है—

ॐ श्रीदुर्गायै सर्वविघ्नविनाशिन्यै नम:।—
इसी मन्त्रसे सब गोपकुमारियाँ भक्तिभाव और प्रसन्नताके साथ देवीको फूल, माला, नैवेद्य, धूप, दीप और वस्त्र चढ़ाती थीं। मूँगेकी मालासे भक्तिपूर्वक इस मन्त्रका एक सहस्र जप और स्तुति करके वे धरतीपर माथा टेककर देवीको प्रणाम करती थीं। उस समय कहतीं कि 'समस्त मङ्गलोंका भी मङ्गल करनेवाली और सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली शंकरप्रिये देवि शिवे! तुम्हें नमस्कार है। तुम मुझे मनोवाञ्छित वस्तु दो।' यों कह नमस्कार करके दक्षिणा दे सारे नैवेद्य ब्राह्मणोंको अर्पित करके वे घरको चली जाती थीं।

**भगवान् श्रीनारायण कहते हैं—**मुने! अब तुम देवीका वह स्तवराज सुनो, जिससे सब गोपकिशोरियाँ भक्तिपूर्वक पार्वतीजीका स्तवन करती थीं, जो सम्पूर्ण अभीष्ट फलोंको देनेवाली हैं।

जब सारा जगत् घोर एकार्णवमें डूब गया था; चन्द्रमा और सूर्यकी भी सत्ता नहीं रह गयी थी; कज्जलके समान जलराशिने समस्त चराचर विश्वको आत्मसात् कर लिया था; उस पुरातन कालमें जलशायी श्रीहरिने ब्रह्माजीको इस स्तोत्रका उपदेश दिया। उपदेश देकर उन जगदीश्वरने योगनिद्राका आश्रय लिया। तदनन्तर उनके नाभिकमलमें विराजमान ब्रह्माजी जब मधु और कैटभसे पीड़ित हुए, तब उन्होंने इसी स्तोत्रसे मूलप्रकृति ईश्वरीका स्तवन किया।

'ॐ नमो जय दुर्गायै'
**ब्रह्मा बोले—**दुर्गे! शिवे! अभये! माये! नारायणि! सनातनि! जये! मुझे मङ्गल प्रदान करो। सर्वमङ्गले! तुम्हें मेरा नमस्कार है। दुर्गाका 'दकार' दैत्यनाशरूपी अर्थका वाचक कहा गया है। 'उकार' विघ्ननाशरूपी अर्थका बोधक है। उसका यह अर्थ वेदसम्मत है। 'रेफ' रोगनाशक अर्थको प्रकट करता है। 'गकार' पापनाशक अर्थका वाचक है। और 'आकार' भय तथा शत्रुओंके नाशका प्रतिपादक कहा गया है। जिनके चिन्तन, स्मरण और कीर्तनसे ये दैत्य आदि निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं; वे भगवती दुर्गा श्रीहरिकी शक्ति कही गयी हैं। यह बात किसी औरने नहीं, साक्षात् श्रीहरिने ही कही है। 'दुर्ग' शब्द विपत्तिका वाचक है और 'आकार' नाशका। जो दुर्ग अर्थात् विपत्तिका नाश करनेवाली हैं; वे देवी ही सदा 'दुर्गा' कही गयी हैं। 'दुर्ग' शब्द दैत्यराज दुर्गमासुरका वाचक है और 'आकार' नाश अर्थका बोधक है। पूर्वकालमें देवीने उस दुर्गमासुरका नाश किया था; इसलिये विद्वानोंने उनका नाम 'दुर्गा' रखा। शिवा शब्दका 'शकार' कल्याण अर्थका, 'इकार' उत्कृष्ट एवं समूह अर्थका तथा 'वाकार' दाता अर्थका वाचक है। वे देवी कल्याणसमूह तथा उत्कृष्ट वस्तुको देनेवाली हैं; इसलिये 'शिवा' कही गयी हैं। वे शिव अर्थात् कल्याणकी मूर्तिमती राशि हैं;

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५५७

इसलिये भी उन्हें 'शिवा' कहा गया है। 'शिव' शब्द मोक्षका बोधक है तथा 'आकार' दाताका। वे देवी स्वयं ही मोक्ष देनेवाली हैं; इसलिये 'शिवा' कही गयी हैं। 'अभय' का अर्थ है भयनाश और 'आकार' का अर्थ है दाता। वे तत्काल अभय-दान करती हैं; इसलिये 'अभया' कहलाती हैं। 'मा' का अर्थ है राजलक्ष्मी और 'या' का अर्थ है प्राप्ति करानेवाला। जो शीघ्र ही राजलक्ष्मीकी प्राप्ति कराती हैं; उन्हें 'माया' कहा गया है। 'मा' मोक्ष अर्थका और 'या' प्राप्ति अर्थका वाचक है। जो सदा मोक्षकी प्राप्ति कराती हैं, उनका नाम 'माया' है। वे देवी भगवान् नारायणका आधा अङ्ग हैं। उन्हींके समान तेजस्विनी हैं और उनके शरीरके भीतर निवास करती हैं; इसलिये उन्हें 'नारायणी' कहते हैं। 'सनातन' शब्द नित्य और निर्गुणका वाचक है। जो देवी सदा निर्गुणा और नित्या हैं; उन्हें 'सनातनी' कहा गया है। 'जय' शब्द कल्याणका वाचक है और 'आकार' दाताका। जो देवी सदा जयदेती हैं, उनका नाम 'जया' है। 'सर्वमङ्गल' शब्द सम्पूर्ण ऐश्वर्यका बोधक है और 'आकार' का अर्थ है देनेवाला। ये देवी सम्पूर्ण ऐश्वर्यको देनेवाली हैं; इसलिये 'सर्वमङ्गला' कही गयी हैं। ये देवीके आठ नाम सारभूत हैं और यह स्तोत्र उन नामोंके अर्थसे युक्त है।

भगवान् नारायणने नाभिकमलपर बैठे हुए ब्रह्माको इसका उपदेश दिया था। उपदेश देकर वे जगदीश्वर योगनिद्राका आश्रय ले सो गये। तदनन्तर जब मधु और कैटभ नामक दैत्य ब्रह्माजीको मारनेके लिये उद्यत हुए तब ब्रह्माजीने इस स्तोत्रके द्वारा दुर्गाजीका स्तवन एवं नमन किया। उनके द्वारा स्तुति की जानेपर साक्षात् दुर्गाने उन्हें 'सर्वरक्षण' नामक दिव्य श्रीकृष्ण-कवचका उपदेश दिया। कवच देकर महामाया अदृश्य हो गयीं। उस स्तोत्रके ही प्रभावसे विधाताको दिव्य कवचकी प्राप्ति हुई। उस श्रेष्ठ कवचको पाकर निश्चय ही वे निर्भय हो गये। फिर ब्रह्माने महेश्वरको उस समय स्तोत्र और कवचका उपदेश दिया, जब कि त्रिपुरासुरके साथ युद्ध करते समय रथसहित भगवान् शंकर नीचे गिर गये थे। उस कवचके द्वारा आत्मरक्षा करके उन्होंने निद्राकी स्तुति की। फिर योगनिद्राके अनुग्रह और स्तोत्रके प्रभावसे वहाँ शीघ्र ही वृषभरूपधारी भगवान् जनार्दन आये। उनके साथ शक्तिस्वरूपा दुर्गा भी थीं। वे भगवान् शंकरको विजय देनेके लिये आये थे। उन्होंने रथसहित शंकरको मस्तकपर बिठाकर अभय दान दिया और उन्हें आकाशमें बहुत ऊँचाईतक पहुँचा दिया। फिर जयाने शिवको विजय दी। उस समय ब्रह्मास्त्र हाथमें ले योगनिद्रासहित श्रीहरिका स्मरण करते हुए भगवान् शंकरने स्तोत्र और कवच पाकर त्रिपुरासुरका वध किया था।

इसी स्तोत्रसे दुर्गाका स्तवन करके गोपकुमारियोंने श्रीहरिको प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त कर लिया। इस स्तोत्रका ऐसा ही प्रभाव है। गोपकन्याओंद्वारा किया गया 'सर्वमङ्गल' नामक स्तोत्र शीघ्र ही समस्त विघ्नोंका विनाश करनेवाला और मनोवाञ्छित वस्तुको देनेवाला है। शैव, वैष्णव अथवा शाक्त कोई भी क्यों न हो, जो मानव तीनों संध्याओंके समय प्रतिदिन भक्तिभावसे इस स्तोत्रका पाठ करता है, वह संकटसे मुक्त हो जाता है। स्तोत्रके स्मरणमात्रसे मनुष्य तत्काल ही संकटमुक्त एवं निर्भय हो जाता है। साथ ही सम्पूर्ण उत्तम ऐश्वर्य एवं मनोवाञ्छित वस्तुको शीघ्र प्राप्त कर लेता है। पार्वतीकी कृपासे इहलोकमें श्रीहरिकी सुदृढ़ भक्ति और निरन्तर स्मृति पाता है एवं अन्तमें भगवान्के दास्यसुखको उपलब्ध करता है।

इस स्तवराजके द्वारा व्रजाङ्गनाओंने एक मासतक प्रतिदिन बड़ी भक्तिके साथ ईश्वरीका स्तवन एवं नमन किया। जब मास पूरा हुआ

२६- श्रीकृष्णके रास-विलासका वर्णन

५५८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण तो व्रतकी समाप्तिके दिन वे गोपियाँ अपने वस्त्रोंको तटपर रखकर यमुनाजीमें स्नानके लिये उतरीं। नारद! रत्नोंके मोलपर मिलनेवाले नाना प्रकारके द्रव्य, लाल, पीले, सफेद और मिश्रित रंगवाले मनोहर वस्त्र यमुनाजीके तटपर छा रहे थे। उनकी गणना नहीं की जा सकती थी। उन सबके द्वारा यमुनाजीके उस तटकी बड़ी शोभा हो रही थी। चन्दन, अगुरु और कस्तूरीकी वायुसे सारा तट-प्रान्त सुरभित था। भाँति-भाँतिके नैवेद्य, देश-कालके अनुसार प्राप्त होनेवाले फल, धूप, दीप, सिन्दूर और कुंकुम यमुनाके उस तटको सुशोभित कर रहे थे। जलमें उतरनेपर गोपियाँ कौतूहलवश क्रीडाके लिये उन्मुख हुईं। उनका मन श्रीकृष्णको समर्पित था। वे अपने नग्न शरीरसे जल-क्रीड़ामें आसक्त हो गयीं। श्रीकृष्णने तटपर रखे हुए भाँति-भाँतिके द्रव्यों और वस्त्रोंको देखा। देखकर वे ग्वाल-बालोंके साथ वहाँ गये और सारे वस्त्र लेकर वहाँ रखी हुई खाद्य वस्तुओंको सखाओंके साथ खाने लगे। फिर कुछ वस्त्र लेकर बड़े हर्षके साथ उनका गट्ठर बाँधा और कदम्बकी ऊँची डालपर चढ़कर गोविन्दने गोपिकाओंसे इस प्रकार कहा। श्रीकृष्ण बोले- गोपियो ! तुम सब-की- सब इस व्रतकर्ममें असफल हो गयीं। पहले मेरी बात सुनकर विधि-विधानका पालन करो। उसके बाद इच्छानुसार जलक्रीड़ा करना। जो मास व्रत करनेके योग्य है; जिसमें मङ्गलकर्मके अनुष्ठानका संकल्प किया गया है; उसी मासमें तुमलोग जलके भीतर घुसकर नंगी नहा रही हो; ऐसा क्यों किया ? इस कर्मके द्वारा तुम अपने व्रतको अङ्गहीन करके उसमें हानि पहुँचा रही हो। तुम्हारे पहननेके वस्त्र, पुष्पहार तथा व्रतके योग्य वस्तुएँ, जो यहाँ रखी गयी थीं, किसने चुरा लीं? जो स्त्री व्रतकालमें नंगी स्नान करती है, उसके ऊपर स्वयं वरुणदेव रुष्ट हो जाते हैं। जान पड़ता है, वरुणके अनुचर तुम्हारे वस्त्र उठा ले गये। अब तुम नंगी होकर घरको कैसे जाओगी ? तुम्हारे इस व्रतका क्या होगा? व्रतके द्वारा जिस देवीकी आराधना की जा रही थी, वह कैसी है ? तुम्हारी वस्तुओंकी रक्षा क्यों नहीं कर रही है ? श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर व्रजाङ्गनाओंको बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने देखा, यमुनाजीके तटपर न तो हमारे वस्त्र हैं और न वस्तुएँ ही। वे जलमें नंगी खड़ी हो विषाद करने लगीं। जोर-जोरसे रोने लगीं और बोलीं- 'यहाँ रखे हुए हमारे वस्त्र कहाँ गये और पूजाकी वस्तुएँ भी कहाँ हैं? इस प्रकार विषाद करके वे सब गोपकन्याएँ दोनों हाथ जोड़ भक्ति और विनयके साथ हाथ जोड़कर वहीं श्यामसुन्दरसे बोलीं।' गोपिकाओंने कहा - गोविन्द ! तुम्हीं हम दासियोंके श्रेष्ठ स्वामी हो; अतः हमारे पहनने योग्य वस्त्रोंको तुम अपनी ही वस्तु समझो। उन्हें लेने या स्पर्श करनेका तुम्हें पूरा अधिकार है; परंतु व्रतके उपयोगमें आनेवाली जो दूसरी वस्तुएँ हैं, वे इस समय आराध्य देवताकी सम्पत्ति हैं; उन्हें दिये बिना उन वस्तुओंको ले लेना तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है। हमारी साड़ियाँ दे दो; उन्हें पहनकर हम व्रतकी पूर्ति करेंगी। श्यामसुन्दर ! इस समय उनके अतिरिक्त अन्य वस्तुओंको ही अपना आहार बनाओ। [ यह सुनकर ] श्रीकृष्णने कहा- तुमलोग आकर अपने-अपने वस्त्र ले जाओ। यह सुनकर श्रीराधाके अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया। वे श्रीहरिके निकट वस्त्र लेनेके लिये नहीं गयीं। उन्होंने जलमें योगासन लगाकर श्रीहरिके उन चरणकमलोंका चिन्तन किया, जो ब्रह्मा, शिव, अनन्त (शेषनाग) तथा धर्मके भी वन्दनीय एवं मनोवाञ्छित वस्तु देनेवाले हैं। उन चरणकमलोंका चिन्तन करते-करते उनके नेत्रोंमें

८७- रासमण्डलमें मधुसूदनद्वारा मुरलीवादन

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५५९ प्रेमके आँसू उमड़ आये और वे भावातिरेकसे उन गुणातीत प्राणेश्वरकी स्तुति करने लगीं। राधिका बोलीं- गोलोकनाथ ! गोपीश्वर ! मेरे स्वामिन् ! प्राणवल्लभ ! दीनबन्धो ! दीनेश्वर ! सर्वेश्वर ! आपको नमस्कार है। गोपेश्वर ! गोसमुदायके ईश्वर ! यशोदानन्दवर्धन ! नन्दात्मज ! सदानन्द ! नित्यानन्द ! आपको नमस्कार है। इन्द्रके क्रोधको भङ्ग (व्यर्थ) करनेवाले गोविन्द ! आपने ब्रह्माजीके दर्पका भी दलन किया है। कालियदमन ! प्राणनाथ ! श्रीकृष्ण ! आपको नमस्कार है। शिव और अनन्तके भी ईश्वर ! ब्रह्मा और ब्राह्मणोंके ईश्वर ! परात्पर ! ब्रह्मस्वरूप ! ब्रह्मज्ञ ! ब्रह्मबीज ! आपको नमस्कार है। चराचर जगत्रूपी वृक्षके बीज ! गुणातीत ! गुणस्वरूप ! गुणबीज ! गुणाधार ! गुणेश्वर ! आपको नमस्कार है। प्रभो ! आप अणिमा आदि सिद्धियोंके स्वामी हैं। सिद्धिकी भी सिद्धिरूप हैं। तपस्विन् ! आप ही तप हैं और आप ही तपस्याके बीज; आपको नमस्कार है। जो अनिर्वचनीय अथवा निर्वचनीय वस्तु है, वह सब आपका ही स्वरूप है। आप ही उन दोनोंके बीज हैं। सर्वबीजरूप प्रभो ! आपको नमस्कार है। मैं, सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, गङ्गा और वेदमाता सावित्री-ये सब देवियाँ जिनके चरणारविन्दोंकी अर्चनासे नित्य पूजनीया हुई हैं; उन आप परमेश्वरको बारंबार नमस्कार है। जिनके सेवकोंके स्पर्श और निरन्तर ध्यानसे तीर्थ पवित्र होते हैं; उन भगवान्को मेरा नमस्कार है। यों कहकर सती देवी राधिका अपने शरीरको जलमें और मन-प्राणोंको श्रीकृष्णमें स्थापित करके ठूँठे काठके समान अविचल- भावसे स्थित हो गयीं। श्रीराधाद्वारा किये गये श्रीहरिके इस स्तोत्रका जो मनुष्य तीनों संध्याओंके समय पाठ करता है, वह श्रीहरिकी भक्ति और दास्यभाव प्राप्त कर लेता है तथा उसे निश्चय ही श्रीराधाकी गति सुलभ होती है। * जो विपत्तिमें भक्तिभावसे इसका पाठ करता है, उसे शीघ्र ही सम्पत्ति प्राप्त होती है और चिरकालका खोया हुआ नष्ट द्रव्य भी उपलब्ध हो जाता है। यदि कुमारी कन्या भक्तिभावसे एक वर्षतक प्रतिदिन इस स्तोत्रको सुने तो निश्चय ही उसे श्रीकृष्णके समान कमनीय कान्तिवाला गुणवान् पति प्राप्त होता है। जलमें स्थित हुई राधिकाने श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका ध्यान एवं स्तुति करनेके पश्चात् जब आँखें खोलकर देखा तो उन्हें सारा जगत् श्रीकृष्णमय दिखायी दिया। मुने ! तदनन्तर उन्होंने यमुना तटको वस्त्रों और द्रव्योंसे सम्पन्न देखा। देखकर राधाने इसे तन्द्रा अथवा स्वप्नका विकार

  • गोलोकनाथ गोपीश मदीश प्राणवल्लभ। हे दीनबन्धो दीनेश सर्वेश्वर नमोऽस्तु ते॥ गोपेश गोसमूहेश यशोदानन्दवर्धन। नन्दात्मज सदानन्द नित्यानन्द नमोऽस्तु ते॥ शतमन्योर्मन्युभङ्ग ब्रह्मदर्पविनाशक। कालीयदमन प्राणनाथ कृष्ण नमोऽस्तु ते॥ शिवानन्तेश ब्रह्मेश ब्राह्मणेश परात्पर। ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मज्ञ ब्रह्मबीज नमोऽस्तु ते॥ चराचरतरोर्बीज गुणातीत गुणात्मक। गुणबीज गुणाधार गुणेश्वर नमोऽस्तु ते॥ अणिमादिकसिद्धीश सिद्धेः सिद्धिस্বরূপक। तपस्तपस्विंस्तपसां बीजरूप नमोऽस्तु ते॥ यदनिर्वचनीयं च वस्तु निर्वचनीयकम्। तत्स्वरूप तयोर्बीज सर्वबीज नमोऽस्तु ते॥ अहं सरस्वती लक्ष्मीर्दुर्गा गङ्गा श्रुतिप्रसूः। यस्य पादार्चनान्नित्यं पूज्या तस्मै नमो नमः॥ स्पर्शने यस्य भृत्यानां ध्यानेन च दिवानिशम्। पवित्राणि च तीर्थानि तस्मै भगवते नमः॥ इत्येवमुक्त्वा सा देवी जले संन्यस्य विग्रहम्। मनः प्राणांश्च श्रीकृष्णे तस्थौ स्थाणुसमा सती॥ राधाकृतं हरेः स्तोत्रं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। हरिभक्तिं च दास्यं च लभेद्राधागतिं ध्रुवम्॥ (२७।१००-११०)

५६० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण माना। जिस स्थानपर और जिस आधारमें जो द्रव्य पहले रखा गया था, वस्त्रोंसहित वह सब द्रव्य गोपकन्याओंको उसी रूपमें प्राप्त हुआ। फिर तो वे सब-की-सब देवियाँ जलसे निकलकर व्रत पूर्ण करके मनोवाञ्छित वर पाकर अपने- अपने घरको चली गयीं। नारदजीने पूछा—प्रभो! उस व्रतका क्या विधान है? क्या नाम है और क्या फल है? उसमें कौन-कौन-सी वस्तुएँ और कितनी दक्षिणा देनी चाहिये। व्रतके अन्तमें कौन-सा मनोहर रहस्य प्रकट हुआ? महाभाग! इस नारायण- कथाको विस्तारपूर्वक कहिये। भगवान् नारायण बोले—वत्स ! उस व्रतका सारा विधान मुझसे सुनो। उसका नाम गौरी-व्रत है। मार्गशीर्ष मासमें सबसे पहले स्त्रियोंने इसे किया था। यह पुरुषोंको भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाला तथा श्रीकृष्णकी भक्ति प्रदान करनेवाला है। भिन्न-भिन्न देशोंमें इसकी प्रसिद्धि है। यह व्रत पूर्वपरम्परासे पालित होनेवाला माना गया है। पतिकी कामना रखनेवाली स्त्रियोंको उनकी इच्छाके अनुसार फल देनेवाला है। इससे प्रियतम पति-निमित्तक फलकी प्राप्ति होती है। कुमारी कन्याको चाहिये कि वह पहले दिन उपवास करके अपने वस्त्रको धो डाले और संयमपूर्वक रहे। फिर मार्गशीर्ष मासकी संक्रान्तिके दिन प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक नदीके तटपर जाकर स्नान करके वह दो धुले हुए वस्त्र (साड़ी और चोली) धारण करे। तत्पश्चात् कलशमें गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और दुर्गा (पार्वती) — इन छः देवताओंका आवाहन करके नाना द्रव्योंद्वारा उनका पूजन करे। इन सबका पञ्चोपचार पूजन करके वह व्रत आरम्भ करे। कलशके सामने नीचे भूमिपर एक सुविस्तृत वेदी बनावे। वह वेदी चौकोर होनी चाहिये। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमसे उस वेदीका संस्कार करे (इन द्रव्योंसे चौक पूरकर उसे सजा दे)। इसके बाद बालूकी दशभुजा दुर्गामूर्ति बनावे। देवीके ललाटमें सिन्दूर लगावे और नीचेके अङ्गोंमें चन्दन एवं कपूर अर्पित करे। तदनन्तर ध्यानपूर्वक देवीका आवाहन करे। उस समय हाथ जोड़कर निम्नाङ्कित मन्त्रका पाठ करे। उसके बाद पूजा आरम्भ करनी चाहिये। हे गौरि शङ्करार्धाङ्गि यथा त्वं शङ्करप्रिया। तथा मां कुरु कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्॥ 'भगवान् शंकरकी अर्धाङ्गिनी कल्याणमयी गौरीदेवि ! जैसे तुम शंकरजीको बहुत ही प्रिय हो, उसी प्रकार मुझे भी अपने प्रियतम पतिकी परम दुर्लभा प्राणवल्लभा बना दो।' इस मन्त्रको पढ़कर देवी जगदम्बाका ध्यान करे। उनका गूढ़ ध्यान सामवेदमें वर्णित है, जो सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। नारद! वह ध्यान मुनीन्द्रोंके लिये भी दुर्लभ है, तथापि मैं तुम्हें बता रहा हूँ। इसके अनुसार सिद्ध पुरुष दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका ध्यान करते हैं। दुर्गाका ध्यान भगवती दुर्गा शिवा (कल्याणस्वरूपा), शिवप्रिया, शैवी (शिवसे प्रगाढ़ सम्बन्ध रखनेवाली) तथा शिवके वक्षःस्थलपर विराजमान होनेवाली हैं। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द मुसकानकी प्रभा फैली रहती है। उनकी बड़ी प्रतिष्ठा है। उनके नेत्र मनोहर हैं। वे नित्य नूतन यौवनसे सम्पन्न हैं और रत्नमय आभूषण धारण करती हैं। उनकी भुजाएँ रत्नमय केयूर तथा कङ्कणोंसे और दोनों चरण रत्ननिर्मित नूपुरोंसे विभूषित हैं। रत्नोंके बने हुए दो कुण्डल उनके दोनों कपोलोंकी शोभा बढ़ाते हैं। उनकी वेणीमें मालतीकी माला लगी हुई है, जिसपर भ्रमर मँडराते रहते हैं। भालदेशमें कस्तूरीकी बेंदीके साथ सिन्दूरका सुन्दर तिलक शोभा पाता है। उनके दिव्य वस्त्र अग्निकी ज्वालासे शुद्ध किये गये हैं। वे मस्तकपर रत्नमय

२७- श्रीराधाके साथ श्रीकृष्णका वन-विहार, वहाँ अष्टावक्रमुनिके द्वारा उनकी स्तुति तथा मुनिका शरीर त्यागकर भगवच्चरणोंमें लीन होना

• श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६१

मुकुट धारण करती हैं। उनकी आकृति बड़ी मनोहर है। श्रेष्ठ मणियोंके सारतत्त्वसे जटिल रत्नमयी माला उनके कण्ठ एवं वक्षःस्थलको उद्भासित किये रहती है। पारिजातके फूलोंकी मालाएँ गलेसे लेकर घुटनोंतक लटकी रहती हैं। उनकी कटिका निम्नभाग अत्यन्त स्थूल और कठोर है। वे स्तनों और नूतन यौवनके भारसे कुछ-कुछ झुकी-सी रहती हैं। उनकी झाँकी मनको मोह लेनेवाली है। ब्रह्मा आदि देवता निरन्तर उनकी स्तुति करते हैं। उनके श्रीअङ्गोंकी प्रभा करोड़ों सूर्योंको लज्जित करती है। नीचे-ऊपरके ओठ पके बिम्बफलके सदृश लाल हैं। अङ्गकान्ति सुन्दर चम्पाके समान है। मोतीकी लड़ियोंको भी लजानेवाली दन्तावली उनके मुखकी शोभा बढ़ाती है। वे मोक्ष और मनोवाञ्छित कामनाओंको देनेवाली हैं। शरत्कालके पूर्ण चन्द्रको भी तिरस्कृत करनेवाली चन्द्रमुखी देवी पार्वतीका मैं भजन करता हूँ।

इस प्रकार ध्यान करके मस्तकपर फूल रखकर व्रती पुरुष प्रसन्नतापूर्वक हाथमें पुष्प ले पुनः भक्तिभावसे ध्यान करके पूजन आरम्भ करे। पूर्वोक्त मन्त्रसे ही प्रतिदिन हर्षपूर्वक षोडशोपचार चढ़ावे। फिर व्रती भक्ति और प्रसन्नताके साथ पूर्वकथित स्तोत्रद्वारा ही देवीकी स्तुति करके उन्हें प्रणाम करे। प्रणामके पश्चात् भक्तिभावसे मनको एकाग्र करके गौरी-व्रतकी कथा सुने।

नारदजीने पूछा—भगवन्! आपने व्रतके विधान, फल और गौरीके अद्भुत स्तोत्रका वर्णन कर दिया। अब मैं गौरी-व्रतकी शुभ कथा सुनना चाहता हूँ। पहले किसने इस व्रतको किया था? और किसने भूतलपर इसे प्रकाशित किया था? इन सब बातोंको आप विस्तारपूर्वक बताइये; क्योंकि आप संदेहका निवारण करनेवाले हैं।

भगवान् श्रीनारायणने कहा—नारद! कुशध्वजकी पुत्री सती वेदवतीने महान् तीर्थ पुष्करमें पहले-पहल इस व्रतका अनुष्ठान किया था। व्रतकी समाप्तिके दिन कोटि सूर्योंके समान प्रकाशमान भगवती जगदम्बाने उसे साक्षात् दर्शन दिया। देवीके साथ लाख योगिनियाँ भी थीं। वे परमेश्वरी सुवर्णनिर्मित रथपर बैठी थीं और उनके प्रसन्नमुखपर मुस्कराहट फैल रही थी। उन्होंने संयमशीला वेदवतीसे कहा।

पार्वती बोलीं—वेदवती! तुम्हारा कल्याण हो। तुम इच्छानुसार वर माँगो। तुम्हारे इस व्रतसे मैं संतुष्ट हूँ; अतः तुम्हें मनोवाञ्छित वर दूँगी।

नारद! पार्वतीकी बात सुनकर साध्वी वेदवतीने उन प्रसन्नहृदया देवीकी ओर देखा और दोनों हाथ जोड़ उन्हें प्रणाम करके वह बोली।

वेदवतीने कहा—देवि! मैंने नारायणको मनसे चाहा है; अतः वे ही मेरे प्राणवल्लभ पति हों—यह वर मुझे दीजिये। दूसरे किसी वरको लेनेकी मुझे इच्छा नहीं है। आप उनके चरणोंमें सुदृढ़ भक्ति प्रदान कीजिये।

वेदवतीकी बात सुनकर जगदम्बा पार्वती हँस पड़ीं और तुरंत रथसे उतरकर उस हरिवल्लभासे बोलीं।

पार्वतीने कहा—जगदम्ब ! मैंने सब जान लिया। तुम साक्षात् सती लक्ष्मी हो और भारतवर्षको अपनी पदधूलिसे पवित्र करनेके लिये यहाँ आयी हो। साध्वि ! परमेश्वरि ! तुम्हारी चरणरजसे यह पृथ्वी तथा यहाँके सम्पूर्ण तीर्थ तत्काल पवित्र हो गये हैं। तपस्विनि ! तुम्हारा यह व्रत लोकशिक्षाके लिये है। तुम तपस्या करो। देवि! तुम साक्षात् नारायणकी वल्लभा हो और जन्म-जन्ममें उनकी प्रिया रहोगी। भविष्यमें भूतलका भार उतारनेके लिये तथा यहाँके दस्युभूत राक्षसोंका नाश करनेके लिये पूर्ण परमात्मा विष्णु दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें वसुधापर पधारेंगे। उनके दो भक्त जय और विजय ब्राह्मणोंके शापके कारण वैकुण्ठधामसे

८९- श्रीराधाके साथ श्रीकृष्णका वनविहार तथा अष्टावक्रमुनिके द्वारा उनकी स्तुति

५६२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

नीचे गिर गये हैं। उनका उद्धार करनेके लिये त्रेतायुगमें अयोध्यापुरीके भीतर श्रीहरिका आविर्भाव होगा। तुम भी शिशुरूप धारण करके मिथिलाको जाओ। वहाँ राजा जनक अयोनिजा कन्याके रूपमें तुम्हें पाकर यत्नपूर्वक तुम्हारा लालन-पालन करेंगे। वहाँ तुम्हारा नाम सीता होगा। श्रीराम भी मिथिलामें जाकर तुम्हारे साथ विवाह करेंगे। तुम प्रत्येक कल्पमें नारायणकी ही प्राणवल्लभा होओगी।

यों कह पार्वती वेदवतीको हृदयसे लगाकर अपने निवास-स्थानको लौट गयीं। साध्वी वेदवती मिथिलामें जाकर मायासे हलद्वारा भूमिपर की गयी रेखा (हराई)-में सुखपूर्वक स्थित हो गयीं। उस समय राजा जनकने देखा, एक नग्न बालिका आँख बंद किये भूमिपर पड़ी है। उसकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान उद्दीप्त है तथा वह तेजस्विनी बालिका रो रही है। उसे देखते ही राजाने उठाकर गोदमें चिपका लिया। जब वे घरको लौटने लगे, उस समय वहीं उनके प्रति आकाशवाणी हुई—'राजन्! यह अयोनिजा कन्या साक्षात् लक्ष्मी है; इसे ग्रहण करो। स्वयं भगवान् नारायण तुम्हारे दामाद होंगे।' यह आकाशवाणी सुन कन्याको गोदमें लिये राजर्षि जनक घरको गये और प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने लालन-पालनके लिये उसे अपनी प्यारी रानीके हाथमें दे दिया। युवती होनेपर सती सीताने इस व्रतके प्रभावसे त्रिलोकीनाथ विष्णुके अवताररूप दशरथनन्दन श्रीरामको प्रियतम पतिके रूपमें प्राप्त कर लिया। महर्षि वसिष्ठने इस व्रतको पृथ्वीपर प्रकाशित किया तथा श्रीराधाने इस व्रतका अनुष्ठान करके श्रीकृष्णको प्राणवल्लभके रूपमें प्राप्त किया। अन्यान्य गोपकुमारियोंने इस व्रतके प्रभावसे उनको पाया। नारद! इस प्रकार मैंने गौरी-व्रतकी कथा कही। जो कुमारी भारतवर्षमें इस व्रतका पालन करती है, उसे श्रीकृष्ण-तुल्य पतिकी प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं है।

भगवान् नारायण कहते हैं—इस प्रकार उन गोपकुमारियोंने एक मासतक व्रत किया। वे पूर्वोक्त स्तोत्रसे प्रतिदिन देवीकी स्तुति करती थीं। समाप्तिके दिन व्रत पूर्ण करके गोपियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने काण्व-शाखामें वर्णित उस स्तोत्रद्वारा परमेश्वरी पार्वतीका स्तवन किया, जिसके द्वारा स्तुति करके सत्यपरायणा सीताने शीघ्र ही कमल-नयन श्रीरामको प्रियतम पतिके रूपमें प्राप्त किया था। वह स्तोत्र यह है।

जानकी बोलीं—सबकी शक्तिस्वरूपे! शिवे! आप सम्पूर्ण जगत्की आधारभूता हैं। समस्त सद्गुणोंकी निधि हैं तथा सदा भगवान् शंकरके संयोग-सुखका अनुभव करनेवाली हैं; आपको नमस्कार है। आप मुझे सर्वश्रेष्ठ पति दीजिये। सृष्टि, पालन और संहार आपका रूप है। आप सृष्टि, पालन और संहाररूपिणी हैं। सृष्टि, पालन और संहारके जो बीज हैं, उनकी भी बीजरूपिणी हैं; आपको नमस्कार है। पतिके मर्मको जाननेवाली पतिव्रतपरायणे गौरि! पतिव्रते! पत्यनुरागिणि! मुझे पति दीजिये; आपको नमस्कार है। आप समस्त मङ्गलोंके लिये भी मङ्गलकारिणी हैं। सम्पूर्ण मङ्गलोंसे सम्पन्न हैं, सब प्रकारके मङ्गलोंकी बीजरूपा हैं; सर्वमङ्गले! आपको नमस्कार है। आप सबको प्रिय हैं, सबकी बीजरूपिणी हैं, समस्त अशुभोंका विनाश करनेवाली हैं, सबकी ईश्वरी तथा सर्वजननी हैं; शंकरप्रिये! आपको नमस्कार है। परमात्मस्वरूपे! नित्यरूपिणि! सनातनि! आप साकार और निराकार भी हैं; सर्वरूपे! आपको नमस्कार है। क्षुधा, तृष्णा, इच्छा, दया, श्रद्धा, निद्रा, तन्द्रा, स्मृति और क्षमा—ये सब आपकी कलाएँ हैं; नारायणि! आपको नमस्कार है। लज्जा, मेधा, तुष्टि, पुष्टि, शान्ति, सम्पत्ति और वृद्धि—ये सब भी आपकी ही कलाएँ हैं; सर्वरूपिणि! आपको नमस्कार है। दृष्ट और अदृष्ट दोनों आपके ही स्वरूप

२८- भगवान् श्रीकृष्णद्वारा अष्टावक्र (देवल)-के शवका संस्कार तथा उनके गूढ़ चरित्रका परिचय

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६३

हैं, आप उन्हें बीज और फल दोनों प्रदान करती हैं, कोई भी आपका निर्वचन (निरूपण) नहीं कर सकता है, महामाये! आपको नमस्कार है। शिवे! आप शंकरसम्बन्धी सौभाग्यसे सम्पन्न हैं तथा सबको सौभाग्य देनेवाली हैं। देवि! श्रीहरि ही मेरे प्राणवल्लभ और सौभाग्य हैं; उन्हें मुझे दीजिये। आपको नमस्कार है। जो स्त्रियाँ व्रतकी समाप्तिके दिन इस स्तोत्रसे शिवादेवीकी स्तुति करके बड़ी भक्तिसे उन्हें मस्तक झुकाती हैं; वे साक्षात् श्रीहरिको पतिरूपमें प्राप्त करती हैं। इस लोकमें परात्पर परमेश्वरको पतिरूपमें पाकर कान्त-सुखका उपभोग करके अन्तमें दिव्य विमानपर आरूढ़ हो भगवान् श्रीकृष्णके समीप चली जाती हैं*।

समाप्तिके दिन गोपियोंसहित श्रीराधाने देवीकी वन्दना और स्तुति करके गौरी-व्रतको पूर्ण किया। एक ब्राह्मणको प्रसन्नतापूर्वक एक सहस्र गौएँ तथा सौ सुवर्णमुद्राएँ दक्षिणाके रूपमें देकर वे घर जानेको उद्यत हुईं। उन्होंने आदरपूर्वक एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराया, बाजे बजवाये और भिखमंगोंको धन बाँटा। इसी समय दुर्गतिनाशिनी दुर्गा वहाँ आकाशसे प्रकट हुईं, जो ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रही थीं। उनके प्रसन्न मुखपर मन्द हास्यकी प्रभा फैल रही थी। वे सौ योगिनियोंके साथ थीं। सिंहसे जुते हुए रथपर बैठी तथा रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित थीं। उनके दस भुजाएँ थीं। उन्होंने रत्नसारमय उपकरणोंसे युक्त सुवर्णनिर्मित दिव्य रथसे उतरकर तुरंत ही श्रीराधाको हृदयसे लगा लिया। देवी दुर्गाको देखकर अन्य गोपकुमारियोंने भी प्रसन्नतापूर्वक प्रणाम किया। दुर्गाने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा—'तुम सबका मनोरथ सिद्ध होगा।' इस प्रकार गोपिकाओंको वर दे उनसे सादर सम्भाषण कर देवीने मुस्कराते हुए


* जानक्युवाच— शक्तिस्वरूपे सर्वेषां सर्वाधारे गुणाश्रये। सदा शङ्करयुक्ते च पतिं देहि नमोऽस्तु ते॥
सृष्टिस्थित्यन्तरूपेण सृष्टिस्थित्यन्तरूपिणि। सृष्टिस्थित्यन्तबीजानां बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥
हे गौरि पतिमर्मज्ञे पतिव्रतपरायणे। पतिव्रते पतिरते पतिं देहि नमोऽस्तु ते॥
सर्वमङ्गलमङ्गल्ये सर्वमङ्गलसंयुते। सर्वमङ्गलबीजे च नमस्ते सर्वमङ्गले॥
सर्वप्रिये सर्वबीजे सर्वाशुभविनाशिनि। सर्वेशे सर्वजनके नमस्ते शङ्करप्रिये॥
परमात्मस्वरूपे च नित्यरूपे सनातनि। साकारे च निराकारे सर्वरूपे नमोऽस्तु ते॥
क्षुत्तृष्णेच्छा दया श्रद्धा निद्रा तन्द्रा स्मृतिः क्षमा। एतास्तव कलाः सर्वा नारायणि नमोऽस्तु ते॥
लज्जा मेधा तुष्टिपुष्टिशान्तिसम्पत्तिवृद्धयः। एतास्तव कलाः सर्वाः सर्वरूपे नमोऽस्तु ते॥
दृष्टादृष्टस्वरूपे च तयोर्बीजफलप्रदे। सर्वानिर्वचनीये च महामाये नमोऽस्तु ते॥
शिवे शङ्करसौभाग्ययुक्ते सौभाग्यदायिनि। हरिं कान्तं च सौभाग्यं देहि देवि नमोऽस्तु ते॥
स्तोत्रेणानेन याः स्तुत्वा समाप्तिदिवसे शिवाम्। नमन्ति परया भक्त्या ता लभन्ति हरिं पतिम्॥
इह कान्तसुखं भुक्त्वा पतिं प्राप्य परात्परम्। दिव्यं स्यन्दनमारुह्य यान्त्यन्ते कृष्णसंनिधिम्॥
(२७।१७३—१८४)

५६४संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

मुखारविन्दसे राधिकाको सम्बोधित करके कहा।

**पार्वती बोलीं—**राधे! तुम सर्वेश्वर श्रीकृष्णको प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय हो। जगदम्बिके! तुम्हारा यह व्रत लोकशिक्षाके लिये है। तुम मायासे मानवरूपमें प्रकट हुई हो। सुन्दरि! क्या तुम गोलोकनाथ, गोलोक, श्रीशैल, विरजाके तटप्रान्त, श्रीरासमण्डल तथा दिव्य मनोहर वृन्दावनको कुछ याद करती हो? क्या तुम्हें प्रेमशास्त्रके विद्वान् तथा रतिचोर श्यामसुन्दरके उस चरित्रका किञ्चित् भी स्मरण होता है, जो नारियोंके चित्तको बरबस अपनी ओर खींच लेता है? तुम श्रीकृष्णके अर्द्धाङ्गसे प्रकट हुई हो; अतः उन्हींके समान तेजस्विनी हो। समस्त देवाङ्गनाएँ तुम्हारी अंशकलासे प्रकट हुई हैं; फिर तुम मानवी कैसे हो? तुम श्रीहरिके लिये प्राणस्वरूपा हो और स्वयं श्रीहरि तुम्हारे प्राण हैं। वेदमें तुम दोनोंका भेद नहीं बताया गया है; फिर तुम मानवी कैसे हो? पूर्वकालमें ब्रह्माजी साठ हजार वर्षोंतक तप करके भी तुम्हारे चरणकमलोंका दर्शन न पा सके; फिर तुम मानुषी कैसे हो? तुम तो साक्षात् देवी हो। श्रीकृष्णकी आज्ञासे गोपीका रूप धारण करके पृथ्वीपर पधारी हो; शान्ते! तुम मानवी स्त्री कैसे हो? मनुवंशमें उत्पन्न नृपश्रेष्ठ सुयज्ञ तुम्हारी ही कृपासे गोलोकमें गये थे; फिर तुम मानुषी कैसे हो? तुम्हारे मन्त्र और कवचके प्रभावसे ही भृगुवंशी परशुरामजीने इस पृथ्वीको इक्कीस बार क्षत्रिय-नरेशोंसे शून्य कर दिया था। ऐसी दशामें तुम्हें मानवी स्त्री कैसे कहा जा सकता है? परशुरामजीने भगवान् शंकरसे तुम्हारे मन्त्रको प्राप्त कर पुष्करतीर्थमें उसे सिद्ध किया और उसीके प्रभावसे वे कार्तवीर्य अर्जुनका संहार कर सके; फिर तुम मानुषी कैसे हो? उन्होंने अभिमानपूर्वक महात्मा गणेशका एक दाँत तोड़ दिया। वे केवल तुमसे ही भय मानते थे; फिर तुम मानवी स्त्री कैसे हो? जब मैं क्रोधसे उन्हें भस्म करनेको उद्यत हुई, तब हे ईश्वरि! मेरी प्रसन्नताके लिये तुमने स्वयं आकर उनकी रक्षा की; फिर तुम मानुषी कैसे हो? श्रीकृष्ण प्रत्येक कल्पमें तथा जन्म-जन्ममें तुम्हारे पति हैं। जगन्मातः! तुमने लोकहितके लिये ही यह व्रत किया है। अहो! श्रीदामके शापसे और भूमिका भार उतारनेके लिये पृथ्वीपर तुम्हारा निवास हुआ है; फिर तुम मानवी स्त्री कैसे हो? तुम जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाली देवी हो। कलावतीकी अयोनिजा पुत्री एवं पुण्यमयी हो; फिर तुम्हें साधारण मानुषी कैसे माना जा सकता है? तीन मास व्यतीत होनेपर जब मनोहर मधुमास (चैत्र) उपस्थित होगा, तब रात्रिके समय निर्जन, निर्मल एवं सुन्दर रासमण्डलमें वृन्दावनके भीतर श्रीहरिके साथ समस्त गोपिकाओंसहित तुम्हारी रासक्रीड़ा सानन्द सम्पन्न होगी। सती राधे! प्रत्येक कल्पमें भूतलपर श्रीहरिके साथ तुम्हारी रसमय लीला होगी, यह विधाताने ही लिख दिया है। इसे कौन रोक सकता है? सुन्दरी! श्रीहरिप्रिये! जैसे मैं महादेवजीकी सौभाग्यवती पत्नी हूँ, उसी प्रकार तुम श्रीकृष्णकी सौभाग्यशालिनी वल्लभा हो। जैसे दूधमें धवलता, अग्निमें दाहिका शक्ति, भूमिमें गन्ध और जलमें शीतलता है; उसी प्रकार श्रीकृष्णमें तुम्हारी स्थिति है। देवाङ्गना, मानवकन्या, गन्धर्वजातिकी स्त्री तथा राक्षसी—इनमेंसे कोई भी तुमसे बढ़कर सौभाग्यशालिनी न तो हुई है और न होगी ही। मेरे वरसे ब्रह्मा आदिके भी वन्दनीय, परात्पर एवं गुणातीत भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं तुम्हारे अधीन होंगे। पतिव्रते! ब्रह्मा, शेषनाग तथा शिव भी जिनकी आराधना करते हैं, जो ध्यानसे भी वशमें होनेवाले नहीं हैं तथा जिन्हें आराधनाद्वारा रिझा लेना समस्त योगियोंके लिये भी अत्यन्त कठिन है; वे ही भगवान् तुम्हारे अधीन रहेंगे। राधे! स्त्रीजातिमें तुम विशेष सौभाग्यशालिनी हो। तुमसे बढ़कर दूसरी कोई

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६५

स्त्री नहीं है। तुम दीर्घकालतक यहाँ रहनेके पश्चात् श्रीकृष्णके साथ ही गोलोकमें चली जाओगी।

मुने! ऐसा कहकर पार्वतीदेवी तत्काल वहीं अन्तर्हित हो गयीं। फिर गोपकुमारियोंके साथ श्रीराधिका भी घर जानेको उद्यत हुईं। इतनेमें ही श्रीकृष्ण राधिकाके सामने उपस्थित हो गये। राधाने किशोर-अवस्थावाले श्यामसुन्दर श्रीकृष्णको देखा। उनके श्रीअङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। वे नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थे। घुटनोंतक लटकती हुई मालती-माला एवं वनमाला उनकी शोभा बढ़ा रही थी। उनका प्रसन्न मुख मन्द हास्यसे शोभायमान था। वे भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। उनके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। नेत्र शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंको लज्जित कर रहे थे। मुख शरद्-ऋतुकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर था, मस्तकपर श्रेष्ठ रत्नमय मुकुट अपनी उज्ज्वल आभा बिखेर रहा था। दाँत पके हुए अनारके दाने-जैसे स्वच्छ दिखायी देते थे। आकृति बड़ी मनोहर थी। उन्होंने विनोदके लिये एक हाथमें मुरली और दूसरे हाथमें लीलाकमल ले रखा था। वे करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्य-लीलाके मनोहर धाम थे। उन गुणातीत परमेश्वरकी ब्रह्मा, शेषनाग और शिव आदि निरन्तर स्तुति करते हैं। वे ब्रह्मस्वरूप तथा ब्राह्मणहितैषी हैं। श्रुतियोंने उनके ब्रह्मरूपका निरूपण किया है। वे अव्यक्त और व्यक्त हैं। अविनाशी एवं सनातन ज्योतिः-स्वरूप हैं। मङ्गलकारी, मङ्गलके आधार, मङ्गलमय तथा मङ्गलदाता हैं।

श्यामसुन्दरके उस अद्भुत रूपको देखकर राधाने वेगपूर्वक आगे बढ़कर उन्हें प्रणाम किया। उन्हें अच्छी तरह देखकर प्रेमके वशीभूत हो वे सुध-बुध खो बैठीं। प्रियतमके मुखारविन्दकी बाँकी चितवनसे देखते-देखते उनके अधरोंपर मुस्कराहट दौड़ गयी और उन्होंने लज्जावश अञ्चलसे अपना मुख ढँक लिया। उनकी बारंबार ऐसी अवस्था हुई। श्रीराधाको देखकर श्यामसुन्दरके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। समस्त गोपिकाओंके सामने खड़े हुए वे भगवान् श्रीराधासे बोले।

**श्रीकृष्णने कहा—**प्राणाधिके राधिके! तुम मनोवाञ्छित वर माँगो। हे गोपकिशोरियो! तुम सब लोग भी अपनी इच्छाके अनुसार वर माँगो।

श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर श्रीराधिका तथा अन्य सब गोपकन्याओंने बड़े हर्षके साथ उन भक्तवाञ्छाकल्पतरु प्रभुसे वर माँगा।

**राधिका बोलीं—**प्रभो! मेरा चित्तरूपी चञ्चरीक आपके चरणकमलोंमें सदा रमता रहे। जैसे मधुप कमलमें स्थित हो उसके मकरन्दका पान करता है; उसी प्रकार मेरा मनरूपी भ्रमर भी आपके चरणारविन्दोंमें स्थित हो भक्तिरसका निरन्तर आस्वादन करता रहे। आप जन्म-जन्ममें मेरे प्राणनाथ हों और अपने चरणकमलोंकी परम दुर्लभ भक्ति मुझे दें। मेरा चित्त सोते-जागते, दिन-रात आपके स्वरूप तथा गुणोंके चिन्तनमें सतत निमग्न रहे। यही मेरी मनोवाञ्छा है।

**गोपियाँ बोलीं—**प्राणबन्धो! आप जन्म-जन्ममें हमारे प्राणनाथ हों और श्रीराधाकी ही भाँति हम सबको भी सदा अपने साथ रखें।

गोपियोंका यह वचन सुनकर प्रसन्नमुखवाले श्रीमान् यशोदानन्दनने कहा—'तथास्तु' (ऐसा ही हो)। तत्पश्चात् उन जगदीश्वरने श्रीराधिकाको प्रेमपूर्वक सहस्रदलोंसे युक्त क्रीडाकमल तथा मालतीकी मनोहर माला दी। साथ ही अन्य गोपियोंको भी उन गोपीवल्लभने हँसकर प्रसादस्वरूप पुष्प तथा मालाएँ भेंट कीं। तदनन्तर वे बड़े प्रेमसे बोले।

**श्रीकृष्णने कहा—**व्रजदेवियो! तीन मास व्यतीत होनेपर वृन्दावनके सुरम्य रासमण्डलमें तुम सब लोग मेरे साथ रासक्रीड़ा करोगी। जैसा

५६६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण मैं हूँ, वैसी ही तुम हो। हममें तुममें भेद नहीं है। मैं तुम्हारे प्राण हूँ और तुम भी मेरे लिये प्राणस्वरूपा हो। प्यारी गोपियो ! तुमलोगोंका यह व्रत लोकरक्षाके लिये है, स्वार्थसिद्धिके लिये नहीं; क्योंकि तुमलोग गोलोकसे मेरे साथ आयी हो और फिर मेरे साथ ही तुम्हें वहाँ चलना है। (तुम मेरी नित्यसिद्धा प्रेयसी हो। तुमने साधन करके मुझे पाया है, ऐसी बात नहीं है।) अब शीघ्र अपने घर जाओ। मैं जन्म-जन्ममें तुम्हारा ही हूँ। तुम मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर हो; इसमें संशय नहीं है। ऐसा कहकर श्रीहरि वहीं यमुनाजीके किनारे बैठ गये। फिर सारी गोपियाँ भी बारंबार उन्हें निहारती हुई बैठ गयीं। उन सबके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी; मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही थी। वे प्रेमपूर्वक बाँकी चितवनसे देखती हुई अपने नेत्र-चकोरोंद्वारा श्रीहरिके मुखचन्द्रकी सुधाका पान कर रही थीं। तत्पश्चात् वे बारंबार जय बोलकर शीघ्र ही अपने-अपने घर गयीं और श्रीकृष्ण भी ग्वाल-बालोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको लौटे। इस प्रकार मैंने श्रीहरिका यह सारा मङ्गलमय चरित्र कह सुनाया, गोपीचीर- हरणकी यह लीला सब लोगोंके लिये सुखदायिनी है। (अध्याय २७) श्रीकृष्णके रास-विलासका वर्णन नारदजीने पूछा- भगवन् ! तीन मास व्यतीत होनेपर उन गोपाङ्गनाओंका श्रीहरिके साथ किस प्रकार मिलन हुआ ? वृन्दावन कैसा है? रासमण्डलका क्या स्वरूप है? श्रीकृष्ण तो एक थे और गोपियाँ बहुत । ऐसी दशामें किस तरह वह क्रीड़ा सम्भव हुई? मेरे मनमें इस नयी-नयी लीलाको सुननेके लिये बड़ी उत्सुकता हो रही है। महाभाग ! आपके नाम और यशका श्रवण एवं कीर्तन बड़ा पवित्र है। कृपया आप उस रासक्रीड़ाका वर्णन कीजिये। अहो ! श्रीहरिकी रासयात्रा, पुराणोंके सारकी भी सारभूता कथा है। इस भूतलपर उनके द्वारा की गयी सारी लीलाएँ ही सुननेमें अत्यन्त मनोहर जान पड़ती हैं। सूतजी कहते हैं - शौनक ! नारदजीकी यह बात सुनकर साक्षात् नारायण ऋषि हँसे और प्रसन्न मुखसे उन्होंने कथा सुनाना आरम्भ किया। श्रीनारायण बोले- मुने ! एक दिन श्रीकृष्ण चैत्रमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिको चन्द्रोदय होनेके पश्चात् वृन्दावनमें गये। उस समय जूही, मालती, कुन्द और माधवीके पुष्पोंका स्पर्श करके बहनेवाली शीतल, मन्द एवं सुगन्धित मलयवायुसे सारा वनप्रान्त सुवासित हो रहा था। भ्रमरोंके मधुर गुञ्जारवसे उसकी मनोहरता बढ़ गयी थी। वृक्षोंमें नये-नये पल्लव निकल आये थे और कोकिलकी कुहू-कुहू-ध्वनिसे वह वन मुखरित हो रहा था। नौ लाख रासगृहोंसे संयुक्त वह वृन्दावन बड़ा ही मनोहर जान पड़ता था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमकी सुगन्ध सब ओर फैल रही थी। कर्पूरयुक्त ताम्बूल तथा भोग-द्रव्य सजाकर रखे गये थे। कस्तूरी और चन्दनयुक्त चम्पाके फूलोंसे रचित नाना प्रकारकी शय्याएँ उस स्थानकी शोभा बढ़ा रही थीं। रत्नमय प्रदीपोंका प्रकाश सब ओर फैला था। धूपकी सुगन्धसे वह वनप्रान्त महमह महक रहा था। वहीं सब ओरसे गोलाकार रासमण्डल बनाया गया था, जो नाना प्रकारके फूलों और मालाओंसे सुसज्जित था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरसे वहाँकी भूमिका संस्कार किया गया था। रासमण्डलके चारों ओर फूलोंसे भरे उद्यान तथा क्रीड़ासरोवर थे। उन सरोवरोंमें हंस, कारण्डव तथा जलकुकुट

२९- ब्रह्माजीका मोहिनीके शापसे अपूज्य होना, इस शापके निवारणके लिये उनका वैकुण्ठ-धाममें जाना और वहाँ अन्यान्य ब्रह्माओंके दर्शनसे उनके अभिमानका दूर होना

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६७ आदि पक्षी कलरव कर रहे थे। वे जलक्रीड़ाके योग्य सुन्दर तथा सुरत-श्रमका निवारण करनेवाले थे। उनमें शुद्ध स्फटिकमणिके समान स्वच्छ तथा निर्मल जल भरा था। उस रासमण्डलमें दही, अक्षत और जल छिड़के गये थे। केलेके सुन्दर खम्भोंद्वारा वह चारों ओरसे सुशोभित था। सूतमें बँधे हुए आमके पल्लवोंके मनोहर बन्दनवारों तथा सिन्दूर, चन्दनयुक्त मङ्गल-कलशोंसे उसको सजाया गया था। मङ्गल-कलशोंके साथ मालतीकी मालाएँ और नारियलके फल भी थे। उस शोभासम्पन्न रासमण्डलको देखकर मधुसूदन हँसे। उन्होंने कौतूहलवश वहाँ विनोदकी साधनभूता मुरलीको यह एक अद्भुत बात थी। चारों ओर देखकर वंशीध्वनिका अनुसरण करती हुई आगे बढ़ीं। मन-ही-मन महात्मा श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती जाती थीं। वे अपने सहज तेज तथा श्रेष्ठ रत्नसारमय भूषणोंकी कान्तिसे वनप्रान्तको प्रकाशित कर रही थीं। राधिकाकी सुशीला आदि जो अत्यन्त प्यारी तैंतीस सखियाँ थीं और समस्त गोपियोंमें श्रेष्ठ समझी जाती थीं; वे भी श्रीकृष्णके दिये हुए वरसे आकृष्ट-चित्त हो डरी हुई-सी घरसे बाहर निकलीं। कुलधर्मका त्याग करके निःशङ्क हो वनकी ओर चलीं। वे सब- की-सब प्रेमातिरेकसे मोहित थीं। फिर उन प्रधान गोपियोंके पीछे-पीछे दूसरी गोपियाँ भी जो जैसे थीं, वैसे ही—लाखोंकी संख्यामें निकल पड़ीं। वे सब वनमें एक स्थानपर इकट्ठी हुईं और कुछ देरतक प्रसन्नतापूर्वक वहीं खड़ी रहीं। वहाँ कुछ गोपियाँ अपने हाथोंमें माला लिये आयी थीं। कुछ गोपाङ्गनाएँ ब्रजसे मनोहर चन्दन हाथमें लेकर वहाँ पहुँची थीं। कई गोपियोंके हाथोंमें श्वेत चँवर शोभा पा रहे थे। वे सब बड़े हर्षके बजाया। वह वंशीकी ध्वनि उनकी प्रेयसी गोपाङ्गनाओंके प्रेमको बढ़ानेवाली थी। राधिकाने जब वंशीकी मधुर ध्वनि सुनी तो तत्काल ही वे प्रेमाकुल हो अपनी सुध- बुध खो बैठीं। उनका शरीर ठूँठे काठकी तरह स्थिर और चित्त ध्यानमें एकतान हो गया। क्षणभरमें चेत होनेपर पुनः मुरलीकी ध्वनि उनके कानोंमें पड़ी। वे बैठी थीं, फिर उठकर खड़ी हो गयीं। अब उन्हें बार-बार उद्वेग होने लगा, वे आवश्यक कर्म छोड़कर घरसे निकल पड़ीं। साथ वहाँ आयी थीं। कुछ गोपकन्याएँ कुंकुम, ताम्बूल-पात्र तथा काञ्चन, वस्त्र लिये आयी थीं।

३०- गङ्गाकी उत्पत्ति तथा महिमा

५६८ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

कुछ शीघ्रतापूर्वक उस स्थानपर आयीं, जहाँ चन्द्रावली (राधा) सानन्द खड़ी थीं। वे सब एकत्र हो प्रसन्नतापूर्वक मुस्कराती हुई वहाँ राधिकाकी वेश-भूषा सँवारकर बड़े हर्षके साथ आगे बढ़ीं। मार्गमें बारंबार वे हरि-नामका जप करती थीं। वृन्दावनमें पहुँचकर उन्होंने रमणीय रासमण्डल देखा, जहाँका दृश्य स्वर्गसे भी अधिक सुन्दर था। चन्द्रमाकी किरणें उस वनप्रान्तको अनुरञ्जित कर रही थीं। अत्यन्त निर्जन, विकसित कुसुमोंसे अलंकृत तथा फूलोंको छूकर प्रवाहित होनेवाली मलयवायुसे सुवासित वह रम्य रासमण्डल नारियोंके प्रेमभावको जगानेवाला और मुनियोंके भी मनको मोह लेनेवाला था। उन सबको वहाँ कोकिलोंकी मधुर काकली सुनायी दी। भ्रमरोंका अत्यन्त सूक्ष्म मधुर गुञ्जारव भी बड़ा मनोहर जान पड़ता था। वे भ्रमर भ्रमरियोंके साथ रह फूलोंका मकरन्द पान करके मतवाले हो गये थे।

तदनन्तर शुभ वेलामें सम्पूर्ण सखियोंके साथ श्रीकृष्णके चरणकमलोंका चिन्तन करके श्रीराधिकाने रासमण्डलमें प्रवेश किया। राधाको अपने समीप देखकर श्रीकृष्ण वहाँ बड़े प्रसन्न हुए। वे बड़े प्रेमसे मुस्कराते हुए उनके निकट गये। उस समय प्रेमसे आकुल हो रहे थे। राधा अपनी सखियोंके बीचमें रत्नमय अलंकारोंसे विभूषित होकर खड़ी थीं। उनके श्रीअङ्गोंपर दिव्य वस्त्रोंके परिधान शोभा पा रहे थे। वे मुस्कराती हुई बाँकी चितवनसे श्यामसुन्दरकी ओर देखती हुई गजराजकी भाँति मन्द गतिसे चल रही थीं। रमणीय राधा नवीन वेश-भूषा, नयी अवस्था तथा रूपसे अत्यन्त मनोहर जान पड़ती थीं। वे मुनियोंके मनको भी मोह लेनेमें समर्थ थीं। उनकी अङ्गकान्ति सुन्दर चम्पाके समान गौर थी। मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित कर रहा था। वे सिरपर मालतीकी मालासे युक्त वेणीका भार वहन करती थीं।

श्रीराधाने भी किशोर अवस्थासे युक्त श्यामसुन्दरकी ओर दृष्टिपात किया। वे नूतन यौवनसे सम्पन्न तथा रत्नमय आभरणोंसे विभूषित थे। करोड़ों कामदेवोंकी लावण्यलीलाके मनोहर धाम प्रतीत होते थे और बाँके नयनोंसे उनकी ओर निहारती हुई उन प्राणाधिका राधिकाको देख रहे थे। उनके परम अद्भुत रूपकी कहीं उपमा नहीं थी। वे विचित्र वेश-भूषा तथा मुकुट धारण किये सानन्द मुस्करा रहे थे। बाँके नेत्रोंके कोणसे बार-बार प्रीतमकी ओर देख-देखकर सती राधाने लज्जावश मुखको आँचलसे ढक लिया और वे मुस्कराती हुई अपनी सुध-बुध खो बैठीं। प्रेमभावका उद्दीपन होनेसे उनके सारे अङ्ग पुलकित हो उठे। तदनन्तर श्रीकृष्ण एवं राधिकाका परस्पर प्रेम-शृङ्गार हुआ।

मुने! नौ लाख गोपियाँ और उतने ही गोप-विग्रहधारी श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण—ये अठारह लाख गोपी-कृष्ण रासमण्डलमें परस्पर मिले। नारद! वहाँ कङ्कणों, किङ्किणियों, वलयों और श्रेष्ठ रत्न-निर्मित नूपुरोंकी सम्मिलित झनकार कुछ कालतक निरन्तर होती रही। इस प्रकार स्थलमें रासक्रीड़ा करके वे सब प्रसन्नतापूर्वक जलमें उतरे और वहाँ जल-क्रीड़ा करते-करते थक गये। फिर वहाँसे निकलकर नवीन वस्त्र धारण करके कौतूहलपूर्वक कर्पूरयुक्त ताम्बूल ग्रहण करके सबने रत्नमय दर्पणमें अपना-अपना मुँह देखा। तदनन्तर श्रीकृष्ण राधिका तथा गोपियोंके साथ नाना प्रकारकी मधुर-मनोहर क्रीड़ाएँ करने लगे।

फिर पवित्र उद्यानके निर्जन प्रदेशमें सरोवरके रमणीय तटपर जहाँ बाहर चन्द्रमाका प्रकाश फैल रहा था, जहाँकी भूमि पुष्प और चन्दनसे चर्चित थी, जहाँ सब ओर अगुरु तथा चन्दनसे सम्पृक्त मलय-समीरद्वारा सुगन्ध फैलायी जा रही थी और भ्रमरोंके गुञ्जारवके साथ नर-कोकिलोंकी मधुर काकली कानोंमें पड़ रही थी; योगियोंके परम गुरु

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६१

श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने अनेक रूप धारण करके स्थल-प्रदेशमें मधुर लीला-विलास किये। इसके बाद राधाके साथ सनातन पूर्णब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णने यमुनाजीके जलमें प्रवेश किया। श्रीकृष्णके जो अन्य मायामय स्वरूप थे, वे भी गोपियोंके साथ जलमें उतरे। यमुनाजीमें परम रसमयी क्रीड़ा करनेके पश्चात् सबने बाहर निकलकर सूखे वस्त्र पहने और माला आदि धारण कीं।

तदनन्तर सब गोप-किशोरियाँ पुनः रासमण्डलमें गयीं। वहाँके उद्यानमें सब ओर तरह-तरहके फूल खिले हुए थे। उन्हें देखकर परमेश्वरी राधाने कौतुकपूर्वक गोपियोंको पुष्पचयनके लिये आज्ञा दी। कुछ गोपियोंको उन्होंने माला गूँथनेके काममें लगाया। किन्हींको पानके बीड़े सुसज्जित करनेमें तथा किन्हींको चन्दन घिसनेमें लगा दिया। गोपियोंके दिये हुए पुष्पहार, चन्दन तथा पानको लेकर बाँके नेत्रोंसे देखती हुई सुन्दरी राधाने मन्द हास्यके साथ श्यामसुन्दरको प्रेमपूर्वक वे सब वस्तुएँ अर्पित कीं। फिर कुछ गोपियोंको श्रीकृष्णकी लीलाओंके गानमें और कुछको मृदङ्ग, मुरज आदि बाजे बजानेमें उन्होंने लगाया। इस प्रकार रासमें लीला-विलास करके राधा निर्जन वनमें श्रीहरिके साथ सर्वत्र मनोहर विहार करने लगीं। रमणीय पुष्पोद्यान, सरोवरोंके तट, सुरम्य गुफा, नदों और नदियोंके समीप, अत्यन्त निर्जन प्रदेश, पर्वतीय कन्दरा, नारियोंके मनोवाञ्छित स्थान, तैंतीस वन—भाण्डीरवन, रमणीय श्रीवन, कदम्बवन, तुलसीवन, कुन्दवन, चम्पकवन, निम्बवन, मधुवन, जम्बीरवन, नारिकेलवन, पूगवन, कदलीवन, बदरीवन, बिल्ववन, नारंगवन, अश्वत्थवन, वंशवन, दाडिमवन, मन्दारवन, तालवन, आम्रचूतवन, केतकीवन, अशोकवन, खर्जूरवन, आम्रातकवन, जम्बूवन, शालवन, कटकीवन, पद्मवन, जातिवन, न्यग्रोधवन, श्रीखण्डवन और विलक्षण केसरवन—इन सभी स्थानोंमें तीस दिन-राततक कौतूहलपूर्वक शृङ्गार किया, तथापि उनका मन तनिक भी तृप्त नहीं हुआ। अधिकाधिक इच्छा बढ़ती गयी, ठीक उसी तरह, जैसे घीकी धारा पड़नेसे अग्नि प्रज्वलित होती है। देवता, देवियाँ और मुनि, जो रास-दर्शनके लिये पधारे थे, अपने-अपने घरको लौट गये। उन सबने रास-रसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और आश्चर्यचकित हो हर्षका अनुभव करते हुए वे वहाँसे विदा हुए। बहुत-सी देवाङ्गनाओंने श्रीहरिके साथ प्रेम-मिलनकी लालसा लेकर भारतवर्षके श्रेष्ठ नरेशोंके घर-घरमें जन्म लिया।

(अध्याय २८)


श्रीराधाके साथ श्रीकृष्णका वन-विहार, वहाँ अष्टावक्रमुनिके द्वारा उनकी स्तुति तथा मुनिका शरीर त्यागकर भगवच्चरणोंमें लीन होना

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद ! तदनन्तर प्रेम-विह्वला गोपियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णने विविध भाँतिसे रास-क्रीड़ा की। गोपियाँ उन्मत्ता-सी हो गयीं। तब श्रीकृष्ण राधिकाको लेकर वहाँसे अन्तर्धान हो गये तथा अनेक सुरम्य वनों, पर्वतों, सरोवरों एवं नदी-तटोंपर ले जाकर राधिकाको आनन्द प्रदान करते रहे। श्रीराधाके साथ भ्रमण करते हुए श्यामसुन्दरने अपने सामने एक वट-वृक्ष देखा, जिसकी शाखाओंका अग्रभाग बहुत ही ऊँचा था। उस वृक्षका विस्तार भी बहुत अधिक था। उसके नीचे एक योजनतकका भूभाग छायासे घिरा हुआ था। केतकीवन भी वहाँसे निकट ही था। श्रीकृष्ण राधाके साथ वहीं बैठे थे। शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु उस स्थानको सुवासित कर रही थी। हर्षसे भरे हुए श्रीकृष्णने वहाँ राधासे चिरकालतक पुरातन एवं विचित्र रहस्यको

५७०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

बतानेवाली कथाएँ कहीं। इसी समय उन्होंने वहाँ आते हुए एक श्रेष्ठ मुनिको देखा, जिनके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिले हुए थे। परमात्मा श्रीहरिके जिस रूपका वे ध्यान करते थे, उसे हृदयमें न देखकर उनका ध्यान टूट गया था। अब वे अपने सामने बाहर ही उस रूपका प्रत्यक्ष दर्शन करने लगे थे। उनका शरीर काला था। सारे अवयव टेढ़े-मेढ़े थे और वे नाटे तथा दिगम्बर थे। उनका नाम था—अष्टावक्र। वे ब्रह्मतेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उनका मस्तक जटाओंसे भरा था और वे अपने मुँहसे आग उगल रहे थे, मानो मुखद्वारसे उनकी तपस्याजनित तेजोराशि ही प्रकट हो रही हो अथवा वे ऐसे लगते थे, मानो उनके रूपमें स्वयं ब्रह्मतेज ही मूर्तिमान्-सा हो गया हो। उनके नख और मूँछ-दाढ़ीके बाल बढ़े हुए थे। वे तेजस्वी और परम शान्त थे तथा भयभीत हो भक्तिभावसे दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाये हुए थे। उन्हें देख राधा हँसने लगीं; परंतु माधवने उन्हें ऐसा करनेसे रोका और उन महात्मा मुनीन्द्रके प्रभावका वर्णन किया। मुनिवर अष्टावक्रने गोविन्दको प्रणाम करके उनकी स्तुति की। पूर्वकालमें महात्मा भगवान् शंकरने उन्हें जिस स्तोत्रका उपदेश दिया था, उसीको उन्होंने सुनाया।

अष्टावक्र बोले—प्रभो! आप तीनों गुणोंसे परे होकर भी समस्त गुणोंके आधार हैं। गुणोंके कारण और गुणस्वरूप हैं। गुणियोंके स्वामी तथा उनके आदिकारण हैं। गुणनिधे! आपको नमस्कार है। आप सिद्धिस্বরূপ हैं। समस्त सिद्धियाँ आपकी अंशस्वरूपा हैं। आप सिद्धिके बीज और परात्पर हैं। सिद्धि और सिद्धगणोंके अधीश्वर हैं तथा समस्त सिद्धोंके गुरु हैं; आपको नमस्कार है। वेदोंके बीजस्वरूप परमात्मन्! आप वेदोंके ज्ञाता, वेदवान् और वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। वेद भी आपको पूर्णतः नहीं जान सके हैं। रूपेश्वर! आप वेदज्ञोंके भी स्वामी हैं; आपको नमस्कार है। आप ब्रह्मा, अनन्त, शिव, शेष, इन्द्र और धर्म आदिके अधिपति हैं। सर्वस्वरूप सर्वेश्वर! आप शर्व (महादेवजी)-के भी स्वामी हैं; सबके बीजरूप गोविन्द! आपको नमस्कार है। आप ही प्रकृति और प्राकृत पदार्थ हैं। प्राज्ञ, प्रकृतिके स्वामी तथा परात्पर हैं। संसार-वृक्ष तथा उसके बीज और फलरूप हैं। आपको नमस्कार है। सृष्टि, पालन और संहारके बीजस्वरूप ब्रह्मा आदिके भी ईश्वर! आप ही सृष्टि, पालन और संहारके कारण हैं। महाविराट् (नारायण)-रूपी वृक्षके बीज राधावल्लभ! आपको नमस्कार है। अहो! आप जिसके बीज हैं, उस महाविराट्रूपी वृक्षके तीन स्कन्ध (तने) हैं—ब्रह्मा, विष्णु और शिव। वेदादि शास्त्र उसकी शाखा-प्रशाखाएँ हैं और तपस्या पुष्प हैं। जिसका फल संसार है, वह वृक्ष प्रकृतिका कार्य है। आप ही उसके भी आधार हैं, पर आपका आधार कोई नहीं है। सर्वाधार! आपको नमस्कार है। तेजःस्वरूप! निराकार! आपतक प्रत्यक्ष प्रमाणकी पहुँच नहीं है। सर्वरूप! प्रत्यक्षके अविषय! स्वेच्छामय परमेश्वर! आपको नमस्कार है।

यों कहकर मुनिश्रेष्ठ अष्टावक्र श्रीकृष्णके

३१- गङ्गा-स्नानसे ब्रह्माजीको मिले हुए शापकी निवृत्ति, गोलोकमें ब्रह्माजीको भारतीकी प्राप्ति, भारतीसहित ब्रह्माका अपने लोकमें प्रवेश, भगवान् शिवके दर्पभङ्गकी कथा, वृकासुरसे उनकी रक्षा, श्रीराधिकाके पूछनेपर श्रीकृष्णके द्वारा शिवके तत्त्व-रहस्यका निरूपण

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७१


चरणकमलोंमें पड़ गये और श्रीराधा तथा गोविन्द दोनोंके सामने ही उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये। उनका शरीर भगवान्‌के पाद-पद्मोंके समीप गिर पड़ा और उससे प्रज्वलित अग्नि-शिखाके समान उनका तेज ऊपरको उठा। वह सात ताड़के बराबर ऊँचा उठकर भगवान्‌के चारों तरफ घूमकर पुनः उनके चरणोंमें गिरा और वहीं विलीन हो गया।

जो प्रातःकाल उठकर अष्टावक्रद्वारा किये गये स्तोत्रका पाठ करता है, वह परम निर्वाणरूप मोक्षको प्राप्त कर लेता है; इसमें संशय नहीं है। नारद! यह स्तोत्रराज मुमुक्षुजनोंके लिये प्राणोंसे भी बढ़कर है। श्रीहरिने पहले इसे वैकुण्ठधाममें भगवान् शंकरको दिया था। (अध्याय २९)


भगवान् श्रीकृष्णद्वारा अष्टावक्र (देवल)-के शवका संस्कार तथा उनके गूढ़ चरित्रका परिचय

नारदजीने पूछा—ब्रह्मन् ! (नारायणदेव !) उन महामुनिका कौन-सा अद्भुत रहस्य सुना गया ? मुनि अष्टावक्रके देह-त्यागके पश्चात् भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्णने क्या किया ?

भगवान् श्रीनारायण बोले—मुनिको मरा देख भगवान् श्रीकृष्ण उनके शरीरका दाह-संस्कार करनेको उद्यत हुए। महात्मा अष्टावक्रका वह रक्त, मांस एवं हड्डियोंसे हीन शरीर साठ हजार वर्षोंतक निराहार रहा; अतः प्रज्वलित हुई जठराग्निने उस शरीरके रक्त, मांस तथा हड्डियोंको दग्ध कर दिया था। मुनिका चित्त श्रीहरिके चरणारविन्दोंके चिन्तनमें ही लगा था; अतः उन्हें बाह्य ज्ञान बिलकुल नहीं रह गया था। मधुसूदन श्रीकृष्णने चन्दन-काष्ठकी चिता बनाकर उसमें अग्निसम्बन्धी कार्य (संस्कार) किया और फिर शोक-लीला करते हुए अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे मुनिके शवको उस चितापर स्थापित कर दिया। तदनन्तर शवके ऊपर भी काठ रखकर चितामें आग लगा दी। मुनिका शरीर जलकर भस्म हो गया। आकाशमें देवता दुन्दुभियाँ बजाने लगे और तत्काल ही वहाँसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। इसी बीच वहाँ रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित, मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाला तथा वस्त्रों और पुष्पहारोंसे अलंकृत एक सुन्दर विमान गोलोकसे उतरा और श्रीहरिके सामने प्रकट हो गया। उसमें श्रीकृष्णके समान ही रूप और वेश-भूषावाले श्रेष्ठ पार्षद विराजमान थे। वे उत्तम पार्षद तत्काल ही विमानसे उतर गये। उन सबके आकार श्रीकृष्णसे मिलते-जुलते थे। उन्होंने राधिका और श्यामसुन्दरको प्रणाम करके सूक्ष्म-देहधारी मुनीश्वर अष्टावक्रको भी मस्तक झुकाया और उन्हें उस विमानपर बिठाकर वे उत्तम गोलोकधामको चले गये। मुनीन्द्र अष्टावक्रके गोलोकधामको चले जानेपर वृन्दावनविनोदिनी साध्वी राधाने चकित हो जगदीश्वर श्रीकृष्णसे पूछा।

श्रीराधिका बोलीं—नाथ ! ये मुनिश्रेष्ठ कौन थे, जिनके समस्त अङ्ग ही टेढ़े-मेढ़े थे ? ये बहुत ही नाटे थे। इनके शरीरका रंग काला था और ये देखनेमें अत्यन्त कुत्सित होनेपर भी बड़े तेजस्वी जान पड़ते थे। उनका जो प्रज्वलित अग्निके समान तेज था, वह साक्षात् आपके चरणारविन्दमें विलीन हो गया। वे कितने पुण्यात्मा थे कि तत्काल विमानमें बैठकर गोलोकधामको चले गये और उन स्वात्माराम मुनिके लिये आपको भी रोना आ गया। प्रभो ! आपने अश्रुपूर्ण नेत्रोंसे इनका सत्कार किया है; अतः मैंने जो कुछ पूछा है, वह सारा विवरण शीघ्र ही विस्तारपूर्वक बताइये।

५७२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

राधिकाका यह वचन सुन भगवान् मधुसूदनने हँसकर युगान्तरकी कथाको कहना आरम्भ किया।

श्रीकृष्ण बोले— प्रिये! सुनो। मैं इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास बता रहा हूँ, जिसके सुनने और कहनेसे समस्त पापोंका नाश हो जाता है। प्रलयकालमें जब तीनों लोक एकार्णवके जलमें मग्न थे, तब मेरे ही अंशभूत महाविष्णुके नाभिकमलसे मेरी ही कलाद्वारा जगत्-विधाता ब्रह्माका प्रादुर्भाव हुआ। ब्रह्माजीके हृदयसे पहले चार पुत्र उत्पन्न हुए, जो सब-के-सब नारायणपरायण तथा ब्रह्मतेजसे प्रकाशमान थे। वे ज्ञानहीन बालकोंकी भाँति सदा नग्न रहते हैं और पाँच वर्षकी ही अवस्थासे युक्त दिखायी देते हैं। उन्हें बाह्यज्ञान नहीं होता; परंतु ब्रह्मतत्त्वकी व्याख्यामें वे बड़े निपुण हैं। सनक, सनन्दन, सनातन और भगवान् सनत्कुमार—ये ही क्रमशः उन चारोंके नाम हैं। एक दिन ब्रह्माजीने उनसे कहा—'पुत्रो! तुम जगत्की सृष्टि करो।' परंतु उन्होंने पिताकी बात नहीं मानी और मेरी प्रसन्नताके लिये वे तपस्या करनेको वनमें चले गये। उन पुत्रोंके चले जानेपर विधाताका मन उदास हो गया। यदि पुत्र आज्ञाका पालन न करे तो पिताको बड़ा दुःख होता है। उन्होंने ज्ञानद्वारा अपने विभिन्न अङ्गोंसे कई पुत्र उत्पन्न किये, जो तपस्याके धनी, वेद-वेदाङ्गोंके विद्वान् तथा ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, मरीचि, भृगु, अङ्गिरा, क्रतु, वसिष्ठ, वोढु, कपिल^१, आसुरि, कवि^२, शंकु, शङ्ख, पञ्चशिख और प्रचेता। उन तपोधनोंने ब्रह्माजीकी आज्ञासे दीर्घकालतक तप करके सृष्टिका कार्य सम्पन्न किया। वे सभी सपत्नीक थे और संसारकी सृष्टि करनेके लिये उन्मुख रहते थे। उन सभी तपोधनोंके बहुत-से पुत्र और पौत्र हुए। मुनिवंशकी परम्पराका कीर्तन करनेवाली वह मनोहर एवं पुण्यस्वरूपा कथा बहुत बड़ी है; अतः उसे यहीं समास किया जाता है। सुन्दरि राधिके! अब तुम वह कथा सुनो, जो प्रकृत प्रसङ्गके अनुकूल है। प्रचेतामुनिके पुत्र श्रीमान् मुनिवर असित हुए। असितने पुत्रकी कामनासे पत्नीसहित दीर्घकालतक तप किया; परंतु तब भी जब पुत्र नहीं हुआ तो वे अत्यन्त विषादग्रस्त हो गये। उस समय आकाशवाणी हुई—'मुने! तुम भगवान् शंकरके पास जाओ और उनके मुखसे मन्त्रका उपदेश ग्रहण करके उसे सिद्ध करो। उस मन्त्रकी जो अधिष्ठात्री देवी हैं वे शीघ्र ही तुम्हें साक्षात् दर्शन देंगी। उन अभीष्ट देवीके वरसे निश्चय ही तुम्हें पुत्रकी प्राप्ति होगी।' यह बात सुनकर वे ब्राह्मणदेवता शंकरजीके समीप गये। जो योगियोंके लिये भी अगम्य है, उस निरामय शिवलोकमें पहुँचकर पत्नीसहित असित दोनों हाथ जोड़ भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर एक योगीकी भाँति योगियोंके गुरु महादेवजीकी स्तुति करने लगे।

असित बोले— जगद्गुरो! आपको नमस्कार है। आप शिव हैं और शिव (कल्याण)-के दाता हैं। योगीन्द्रोंके भी योगीन्द्र तथा गुरुओंके भी गुरु हैं; आपको प्रणाम है। मृत्युके लिये भी मृत्युरूप होकर जन्म-मृत्युमय संसारका खण्डन करनेवाले देवता! आपको नमस्कार है। मृत्युके ईश्वर! मृत्युके बीज! मृत्युञ्जय! आपको मेरा प्रणाम है। कालगणना करनेवालोंके लक्ष्यभूत कालरूप परमेश्वर! आप कालके भी काल, ईश्वर और कारण हैं तथा कालके लिये भी कालातीत हैं। कालकाल! आपको नमस्कार है। गुणातीत! गुणाधार! गुणबीज! गुणात्मक! गुणीश! और गुणियोंके आदिकारण! आप समस्त गुणवानोंके गुरु हैं; आपको नमस्कार है। ब्रह्मस्वरूप! ब्रह्मज्ञ!


१-२ अन्य पुराणोंके अनुसार कपिलजी कर्दमके तथा कवि भृगुके पुत्र थे। सम्भव है ये दूसरे कपिल हों।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७३

ब्रह्मचिन्तनपरायण! आपको नमस्कार है। आप वेदोंके बीजरूप हैं। इसलिये ब्रह्मबीज कहलाते हैं; आपको मेरा प्रणाम है।

इस प्रकार स्तुति करके शिवको प्रणाम करनेके पश्चात् मुनीश्वर असित उनके सामने खड़े हो गये और दीनकी भाँति नेत्रोंसे आँसू बहाने लगे। उनके सम्पूर्ण शरीरमें रोमाञ्च हो आया। जो असितद्वारा किये गये महात्मा शंकरके इस स्तोत्रका प्रतिदिन भक्तिभावसे पाठ करता और एक वर्षतक नित्य हविष्य खाकर रहता है—उसे ज्ञानी, चिरञ्जीवी एवं वैष्णव पुत्रकी प्राप्ति होती है। जो धनाभावसे दुःखी हो, वह धनाढ्य और जो मूर्ख हो, वह पण्डित हो जाता है। पत्नीहीन पुरुषको सुशीला एवं पतिव्रता पत्नी प्राप्त होती है तथा वह इस लोकमें सुख भोगकर अन्तमें भगवान् शिवके समीप जाता है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने यह उत्तम स्तोत्र प्रचेताको दिया था और प्रचेताने अपने पुत्र असितको।

**श्रीकृष्ण कहते हैं—**मुनिका यह स्तोत्र सुनकर भक्तवत्सल भगवान् शंकर स्वयं ही अपने भक्त ब्राह्मणसे बोले।

**शंकरजीने कहा—**मुनिश्रेष्ठ! धैर्य धारण करो। मैं तुम्हारी इच्छाको जानता हूँ; अतः सत्य कहता हूँ। तुम्हें मेरे अंशसे मेरे ही समान पुत्र प्राप्त होगा। इसके लिये मैं तुम्हें एक ऐसा मन्त्र दूँगा, जिसकी कहीं तुलना नहीं है तथा जो सबके लिये परम दुर्लभ है।

यों कहकर भगवान् शिवने असितमुनिको वहीं षोडशाक्षर मन्त्र, स्तोत्र, पूजाविधि, परम अद्भुत 'संसार-विजय' नामक कवच तथा पुरश्चरणका उपदेश दिया। साथ ही यह भी कहा कि 'इस मन्त्रकी इष्टदेवी तुम्हें वर देनेके लिये प्रत्यक्ष दर्शन देंगी।' यों कहकर रुद्रदेव चुप हो गये और असितमुनि उन्हें नमस्कार करके चले गये। उन्होंने सौ वर्षोंतक उस उत्कृष्ट मन्त्रका जप किया। सती राधिके! तदनन्तर तुमने ही मुनिको प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्हें वर दिया—'वत्स! तुम्हें निश्चय ही महाज्ञानी पुत्रकी प्राप्ति होगी।' यह वर देकर तुम पुनः गोलोकमें मेरे पास चली आयीं। तदनन्तर यथासमय भगवान् शिवके अंशसे असितके एक पुत्र हुआ, जो कामदेवके समान सुन्दर था। उसका नाम हुआ देवल। देवल ब्रह्मनिष्ठ महात्मा हुए। उन्होंने राजा सुयज्ञकी सुन्दरी कन्या रत्नमालावतीको, जो सबका मन मोह लेनेवाली थी, विवाहकी विधिसे सानन्द ग्रहण किया। दीर्घकालतक पत्नीके साथ रहकर कालान्तरमें मुनिवर देवल संसारसे विरक्त हो गये और सारा सुख छोड़कर धर्ममें तत्पर हो श्रीहरिके चिन्तनमें लग गये। एक समय रात्रिमें वे विरक्त तपोधन शय्यासे उठे और कमनीय गन्धमादन पर्वतपर तपस्याके लिये चले गये। उनकी पत्नीकी जब निद्रा टूटी, तब वह सती अपने स्वामीको वहाँ न देख विरहाग्निसे दग्ध हो शोकवश अत्यन्त विलाप करने लगी। वह उठकर कभी खड़ी होती और कभी पछाड़ खाकर गिरती थी। रत्नमालावती बारंबार उच्चस्वरसे रोदन करने लगी। तपे हुए पात्रमें पड़े हुए धान्यकी जो दशा होती है, वही दशा उस समय उसके मनकी थी। उस सुन्दरीने खाना-पीना छोड़कर प्राणोंका परित्याग कर दिया। उसके पुत्रने उसका दाह-संस्कार आदि पारलौकिक कृत्य किया। मुनिवर देवल मेरे भक्त एवं जितेन्द्रिय थे। उन्होंने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक गन्धमादनकी गुफामें तप किया।

एक दिन रम्भाने उन परम सुन्दर, शान्तस्वभाव एवं कन्दर्पसदृश रूपवान् मुनिको देख उनसे मिलनकी प्रार्थना की। मुनिने उसकी याचना स्वीकार न करके कहा—'रम्भे! सुनो। मैं वेदोंका

५७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सारभूत वचन सुना रहा हूँ, जो तपस्वी ब्राह्मणोंके कुलधर्मके अनुकूल और सत्य है। जो मनुष्य अपनी पत्नीको त्यागकर परायी स्त्रीके साथ सम्बन्ध स्थापित करता है, वह जीते-जी मरा हुआ है। उसके यश, धन और आयुकी हानि होती है। भूतलपर जिसके यशका विस्तार नहीं हुआ, उसका जीवन निष्फल है। एक तपस्वीको उत्तम सम्पत्ति, राज्य और सुखसे क्या लेना है? मैं निष्काम और वृद्ध हूँ। मुझसे तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? माँ! तुम सुन्दरी हो; अतः किसी उत्तम वेश-भूषावाले सुन्दर तरुण पुरुषकी खोज करो।'

देवलजीकी यह बात सुनते ही रम्भाको क्रोध आ गया। उसने पुनः अपनी वही बात दोहरायी। तब मुनि उसे कुछ भी उत्तर न देकर पूर्ववत् ध्यानस्थ हो गये। यह देख रम्भाने रोषपूर्वक शाप देते हुए कहा—'कुटिलहृदय ब्राह्मण! तेरे सारे अवयव टेढ़े-मेढ़े हो जायँ। तेरा शरीर काजलके समान काला तथा रूप-यौवनसे शून्य हो जाय। आकार अत्यन्त विकृत तथा तीनों लोकोंमें निन्दित हो और तेरा पुरातन तप अवश्य ही शीघ्र नष्ट हो जाय।'

यह शाप प्राप्त होनेपर जब मुनिवर देवलने आँख खोलकर देखा तो सारा अङ्ग विकृत तथा पूर्वपुण्यसे वर्जित दिखायी दिया। तब वे अग्निकुण्ड तैयार करके शोकवश अपने प्राण त्याग देनेको उद्यत हुए। उस समय मैंने उन्हें दर्शन एवं वर दिया तथा दिव्य ज्ञान देकर उन्हें समझाया। प्रेमपूर्वक मेरे आश्वासन देनेपर वे शान्त हुए। उन महामुनिके आठों अङ्गोंको वक्र देख मैंने तत्काल ही कौतूहलवश उनका नाम अष्टावक्र* रख दिया। मेरे कहनेसे उन्होंने मलयाचलकी कन्दरामें आकर साठ हजार वर्षोंतक बड़ी भारी तपस्या की। प्रिये! उस तपकी समाप्ति होनेपर मेरा वह भक्त मुझसे आ मिला है। मैंने स्वयं उसे अपनेमें मिला लिया है। प्रलयकालमें सबके नष्ट हो जानेपर भी मेरे भक्तका नाश नहीं होता। इस मुनिने आहार बिलकुल छोड़ दिया था। अतः दीर्घकालकी तपस्या एवं जठराग्निकी ज्वालासे इनके शरीरका भीतरी भाग जलकर भस्मरूप हो गया था। प्रिये! ये मुनि मेरे ही लिये मलयाचलकी कन्दरा छोड़कर यहाँ आये थे। इन अष्टावक्र (देवल)-से बढ़कर दूसरा कोई मेरा भक्त न तो हुआ है और न होगा। ब्रह्माजीके प्रपौत्र मुनिवर देवल ऐसे उत्तम तपस्वी थे; परंतु उस पुंश्चलीके शापसे उसी तरह हीन अवस्थाको पहुँच गये, जैसे पूर्वकालमें ब्रह्माजी अपूजनीय हो गये थे। महात्मा देवलका यह सारा गूढ़ रहस्य मैंने कह सुनाया, जो सुखद और पुण्यप्रद है। अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? (अध्याय ३०)


* इस प्रसङ्गसे यह सूचित होता है कि असितपुत्र देवल (भी) कुछ कालतक 'अष्टावक्र' कहलाये। महाभारतके अनुसार 'अष्टावक्र' नामसे प्रसिद्ध एक दूसरे मुनि भी थे, जो जन्मसे ही वक्राङ्ग थे। उद्दालक-कन्या सुजाता उनकी माता थीं और महर्षि कहोड पिता। उन्होंने राजा जनकके दरबारमें शास्त्रार्थी पण्डित बन्दीको पराजित किया था। श्वेतकेतु उनके मामा थे। महर्षि वदान्यकी पुत्री सुप्रभाके साथ उनका विवाह हुआ था। समङ्गा नदीमें स्नान करनेसे इनके सब अङ्ग सीधे हो गये थे। महाभारत वनपर्वके अध्याय १३२ से लेकर १३४ तक उनका प्रसङ्ग है। अनुशासनपर्वके उन्तीसवें और इक्कीसवें अध्यायोंमें भी उनकी कथा आयी है।

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७५ ब्रह्माजीका मोहिनीके शापसे अपूज्य होना, इस शापके निवारणके लिये उनका वैकुण्ठधाममें जाना और वहाँ अन्यान्य ब्रह्माओंके दर्शनसे उनके अभिमानका दूर होना तदनन्तर श्रीराधिकाने पूछा - श्यामसुन्दर ! ब्रह्माजीको क्यों और किससे शाप प्राप्त हुआ था ? श्रीकृष्ण बोले- प्रिये ! एक बार मोहिनीने ब्रह्माजीसे मिलनकी प्रार्थना की। बहुत समयतक उसका इसके लिये प्रयास चलता रहा; परंतु ब्रह्माजीने उसके उस प्रस्तावको ठुकरा दिया और एक दिन मुनियोंके सामने मोहिनीका उपहास किया। इससे मोहिनी कुपित हो उठी और शाप देती हुई बोली—'ब्रह्मन् ! मैं आपकी दासीके समान हूँ, विनयशील हूँ और दैववश आपकी शरणमें आयी हूँ तो भी आप घमंडमें आकर मेरी हँसी उड़ा रहे हैं; अतः सुदीर्घ कालके लिये आप अपूजनीय हो जायँ। स्वयं भगवान् श्रीहरि शीघ्र ही आपके दर्पका दलन करेंगे। अन्य देवताओंकी प्रत्येक युगमें वार्षिक पूजा होगी; किंतु आपकी नहीं होगी। इस कल्पमें या कल्पान्तरमें, इस देहमें अथवा देहान्तरमें फिर आपकी पूजा नहीं होगी। अबतक जो हो गयी, सो हो गयी।' यों कहकर मोहिनी शीघ्र ही कामलोकमें गयी और पुनः सचेत होनेपर अपने कुकृत्यको याद करके विलाप करने लगी। जगद्विधाता ब्रह्मा मोहिनीका शाप सुनकर काँप उठे। उनका मस्तक झुक गया। उस समय कल्याणकारी मुनियोंने उन्हें एक उपाय बताया—'आप भगवान् वैकुण्ठनाथकी शरणमें जाइये।' ऐसा कहकर वे ऋषि-मुनि अपने-अपने आश्रमोंको चले गये। तत्पश्चात् ब्रह्माजी मेरे ही दूसरे स्वरूप परम शान्त कमलाकान्त श्यामवर्ण भगवान् नारायणकी शरणमें गये। वहाँ जा खिन्नवदन हो चार भुजाधारी श्रीहरिको प्रणाम करके वे जगत्स्रष्टा ब्रह्मा उनके पास ही बैठे। उन्होंने विपत्तिसे उबारनेवाले, दयासिन्धु, दीनबन्धु भगवान्‌से अपने आगमनका रहस्य बताया। वह सारा रहस्य सुनकर भगवान् विष्णु हँसते हुए बोले। श्रीनारायणने कहा—लोकनाथ ! क्षणभर ठहरो। इसी बीचमें कोई शीघ्रगामी द्वारपाल श्रीहरिके सामने आया और उन्हें प्रणाम करके बोला— 'भगवन् ! दूसरे किसी ब्रह्माण्डके अधिपति दशमुख ब्रह्मा स्वयं पधारकर द्वारपर खड़े हैं। वे आपके महान् भक्त हैं और आपका दर्शन करनेके लिये ही आये हैं।' द्वारपालकी यह बात सुनकर भगवान् नारायणने उक्त ब्रह्माको भीतर बुला लानेके लिये उसे अनुमति दे दी। द्वारपालकी आज्ञासे ब्रह्माने भीतर आकर भक्तिभावसे भगवान्‌की स्तुति की। उन्होंने ऐसे-ऐसे अति विचित्र स्तोत्र सुनाये, जो चतुर्मुख ब्रह्माने कभी नहीं सुने थे। स्तुति करके भगवान् विष्णुकी आज्ञा पाकर वे चतुर्मुख ब्रह्माको पीछे करके बैठे। तदनन्तर भगवान् नारायणने अपने चार भुजाधारी द्वारपालोंसे कहा— 'जो कोई भी आगन्तुक सज्जन हों, उन्हें आदरपूर्वक भीतर ले आओ।' वृन्दावनविनोदिनि ! इसी समय वहाँ अत्यन्त विनीतभावसे स्वयं शतमुख ब्रह्माका आगमन हुआ। उन्होंने भी अत्यन्त सुन्दर दिव्य स्तोत्रोंद्वारा गूढ़भावसे भगवान्‌का स्तवन किया। उनके मुखसे निकले हुए श्रेष्ठ स्तोत्र सभीके लिये अश्रुतपूर्व (सर्वथा नवीन) थे। वे भी स्तुतिके पश्चात् भगवान्‌की आज्ञा पाकर पहलेके आये हुए दोनों ब्रह्माओंके आगे बैठ गये। इसके बाद दूसरे किसी ब्रह्माण्डके अधिपति सहस्रमुख ब्रह्मा श्रीहरिके सामने उपस्थित हुए। उन्होंने भी भक्तिभावसे मस्तक झुकाकर किसीके द्वारा भी अबतक नहीं सुने गये उत्तम स्तोत्रोंसे भगवान्‌की स्तुति की।